पाखी लाएगी अनुपमा-वनराज को करीब तो काव्या उठाएगी ये कदम

सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupama)  टीआरपी लिस्ट में धमाल मचा रही है. शो की कहानी में बड़ा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. अब तक आपने देखा कि काव्या ने अनुज का जॉब प्रपोजल एक्सेप्ट कर लिया है तो वहीं अनुपमा ने भी काव्या के जॉब को लेकर अपना फैसला सुना दिया है. लेकिन अनुज नहीं चाहता कि अनुपमा को किसी भी तरह की परेशानी हो इसलिए उसने काव्या के सामने शर्त रखी है. उसने कहा है कि वह जॉब कर सकती है पर वनराज ऑफिस में आकर कोई तमाशा नहीं करेगा. इसे रोकने की  जिम्मेदारी काव्या की होगी. शो के आने वाले एपिसोड में दिलचस्प मोड़ आने वाला है. आइए बताते हैं कहानी के नए ट्विस्ट एंड टर्न के बारे में.

शो में दिखाया जा रहा है कि अनुपमा (Anupama) अपनी जिंदगी में आगे बढ़ रही है. उसने समाज और परिवारवालों का ताना सुनते हुए भी खुद को संभाला. और वह कभी भी गलत फैसले की ओर नहीं बढ़ीं. अनुपमा ने हमेशा सही रास्ता ही चुना है. शो के अपकमिंग एपिसोड में दिखाया जाएगा कि काव्या वनराज को बताएगी कि उसने अनुज का जॉब एक्सेप्ट कर लिया है.

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ऐसे में वनराज अपना आपा खो देगा. और वह काव्या से भिड़ जाएगा.  काव्या भी चुप नहीं बैठेगी. वह उसे मेंटल कहेगी. और ये भी कहेगी कि फिलहाल उसे डॉक्टर की जरूरत है. वनराज गुस्से में अपना हाथ मारेगा और उसका हाथ कट जाएगा.

 

शो में आप ये भी देखेंगे कि वनराज को इस हालत में देखकर अनुपमा उसकी ओर जाएगी लेकिन वह उसे धक्का मार देगा. तो वहीं काव्या अनुपमा को संभालेगी. ये सब पाखी देख लेगी. ऐसे में वह परेशान हो जाएगी और सीढ़ियां चढ़ते हुए गिर जाएगी.

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तो वहीं वनराज-अनुपमा उसे संभालेंगे. पाखी कहेगी कि पेरेट्स परेशान होकर डाइवोर्स ले लेते हैं, लेकिन जब बच्चे पेरेट्स से परेशान हो जाए तो ऐसे में वे क्या करें. इस बात को सुनकर अनुपमा-वनराज की आंख में आंसू आ जाएगा.

तो वहीं इस हादसे के बाद अनुपमा वनराज से बात करेगी. वह कहेगी कि हमारे लड़ाई के कारण ही पारितोष ने घर छोड़ दिया. पारितोष के बाद अब पाखी भी परेशान है. एक बार हम पहले भी वो पाखी को खो चुके हैं. अब वह उसे दोबारा नहीं खोना चाहती है. ऐसे में पाखी के कारण अनुपमा और वनराज झगड़े को खत्म करने की कोशिश करेंगे. शो में अब ये देखना होगा कि काव्या अनुपमा के साथ कैसा बिहेव करती है.

शिक्षा: ऑनलाइन क्लासेज शिक्षा का मजाक

लेखक- सौमित्र कानूनगो

शिक्षा का व्यापारीकरण होते तो हम सभी ने बीते कई सालों में देखा है लेकिन अब जो हो रहा है वह केवल व्यापारीकरण भर नहीं है. महामारी में बच्चों को औनलाइन शिक्षा देना अच्छा सुनाई पड़ता है, परंतु असमृद्ध परिवारों के लिए यह एक नई महामारी के जन्म जैसा है.

लौकडाउन और कोरोना महामारी के खतरे से जहां एक ओर पूरा मानव जीवन प्रभावित हो रहा है वहीं बच्चों की पढ़ाई भी सब से ज्यादा प्रभावित होती नजर आ रही है. मार्च में लौकडाउन लागू किए जाने के बाद से ही देश के शिक्षण संस्थान बंद हैं और पढ़ाई के लिए बच्चे अब औनलाइन एजुकेशन पर निर्भर हैं.

महामारी के खतरे को देखते हुए हमारे देश के विद्यार्थियों के लिए औनलाइन एजुकेशन एक अच्छा रास्ता है. लेकिन जहां हमारे देश में लगभग 70 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं और उन के पास लैपटौप या मोबाइल जैसी सुविधा भी नहीं होती है, वहां रहने वाले विद्यार्थी औनलाइन शिक्षा कैसे ले पाएंगे?

उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर के सरकारी विद्यालय में पढ़ाने वाली शिक्षिका शुभ्रा बनर्जी बताती हैं, ‘‘हमारे यहां 99 प्रतिशत बच्चे इतने समर्थ नहीं हैं कि उन के पास लैपटौप या उन के घर पर वाईफाई की सुविधा हो. कई बच्चों के घरों में फोन भी एक ही है, उस में भी कुछ ही बच्चों के पास स्मार्टफोन है, बाकी बच्चों के पास स्मार्टफोन भी नहीं है.’’

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स्क्रौल की वैबसाइट पर प्रकाशित एक आर्टिकल के मुताबिक, सिर्फ 24 प्रतिशत भारतीयों के पास स्मार्टफोन हैं और सिर्फ 11 प्रतिशत घर ऐसे हैं जहां किसी प्रकार का कंप्यूटर है, मतलब डैस्कटौप, लैपटौप, टेबलेट आदि है.

2017-2018 की शिक्षा पर नैशनल सैंपल सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक,

सिर्फ 24 प्रतिशत भारतीय घरों में ही इंटरनैट की सुविधा है.

ये आंकड़े हमें यह दिखाते हैं कि हमारे देश के कुछ विद्यार्थी तो सुविधा पा कर अपनी पढ़ाई कर पा रहे हैं पर एक बड़ी संख्या में विद्यार्थी सुविधा के अभाव में शिक्षा से दूर हैं.

स्मार्टफोन, लैपटौप, इंटरनैट के खर्चे ने अभिभावकों को भी परेशान कर दिया है. औनलाइन शिक्षा से वे अभिभावक ज्यादा परेशान हैं जिन के बच्चे निजी स्कूलों में निशुल्क शिक्षा अधिनियम के तहत पढ़ते हैं. सोचिए, जिन के पास फीस देने के पैसे नहीं, आखिर वे स्मार्टफोन और लैपटौप का खर्चा कैसे उठाएंगे?

कुछ महीने पहले तक बच्चों को मोबाइल फोन पर गेम खेलने के लिए मांबाप की डांट पड़ती थी. जब से कोरोना का कहर टूटा है, वही मातापिता अपने बच्चों के लिए लौकडाउन में भी बाजारबाजार घूम कर स्मार्टफोन, मोबाइल, टैबलेट खरीदते दिखे. वे अच्छी से अच्छी कंपनी का मोबाइल फोन ढूंढ़ रहे हैं जिस में पिक्चर भी क्लीयर आए, स्क्रीन भी बड़ी हो और जिस पर इंटरनैट भी धांसू चले.

घर की कमजोर आर्थिक स्थिति में बच्चों की पढ़ाई को ले कर मातापिता की बड़ी हुई चिंताओं की बानगी देखिए कि कोरोना महामारी ने एक गरीब पिता को अपनी बेटी के लिए स्मार्टफोन खरीदने और स्कूल की फीस भरने के लिए अपनी गाय बेचने पर मजबूर कर दिया.

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के एक पिता ने ऐसा इसलिए किया ताकि कोरोना के चलते उन की बेटी की पढ़ाई में कोई रुकावट न आए. लखनऊ में सैफ अयान के पिता आरिफ, जो खुद भी एक टीचर हैं, 7वीं कक्षा में पढ़ने वाले अपने बेटे सैफ की पढ़ाई को ले कर बहुत चिंतित हैं. सैफ आजकल औनलाइन पढ़ाई कर रहा है. खुद उन्हें भी अपने स्टूडैंट्स को औनलाइन पढ़ाना पड़ रहा है. बेटे की औनलाइन पढ़ाई के लिए उन को अलग से 12 हजार रुपए का नया स्मार्टफोन खरीदना पड़ा. इस के अलावा ट्राइपौड, ब्लैकबोर्ड, अच्छा इंटरनैट प्लान और पढ़ाई से संबंधित दूसरी जरूरी चीजों की खरीदारी में करीब 20 हजार रुपए खर्च हो गए.

लेकिन इतने ताम?ाम के साथ चल रही औनलाइन पढ़ाई का हाल यह है कि ढाई घंटे की औनलाइन पढ़ा के बाद आरिफ जब खुद सैफ को ले कर पढ़ाने बैठते हैं तब जा कर उस की सम?ा में कुछ आता है. शाम को उस को घर के पास ही चलने वाली ट्यूशन क्लास में भी भेजते हैं.

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आरिफ कहते हैं, ‘‘मोबाइल फोन पर टीचर जो लैक्चर दे रही हैं उस का 5 फीसदी भी बच्चे को सम?ा में आ जाए तो बहुत है. मोबाइल फोन पर लगातार आंखें गड़ाए रखने के बाद जब मेरा बेटा ढाई घंटे बाद उठता है तो उस की आंखों से पानी गिरता है, रातभर बच्चा सिरदर्द से परेशान रहता है. इस तरह और कुछ महीने पढ़ाई चली, तो बच्चा बीमार पड़ जाएगा.’’

औनलाइन शिक्षा की परेशानी

आरिफ कहते हैं, ‘‘औनलाइन क्लासेज शिक्षा का मजाक भर है. गाइडलाइन है कि 8वीं तक के छात्रों की औनलाइन क्लास डेढ़ घंटे से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. लेकिन स्कूल वाले 3 से 4 घंटे तक बच्चों को पीस रहे हैं. सैकंडथर्ड क्लास का बच्चा भी 4-4 घंटे मोबाइल फोन में आंखें गड़ाए बैठा है. उधर, टीचर को पता ही नहीं चलता है कि 40-50 बच्चों में कौन गंभीरता से पढ़ रहा है और कौन खेल कर रहा है, किस का ध्यान पढ़ाई पर है और किस का नहीं.

ऐसे छोटे बच्चों के साथ भी औनलाइन एजुकेशन का विकल्प काम नहीं कर रहा है, जो स्वभाव से शरारती हैं और एक जगह बैठ कर ध्यान लगा कर अपना काम नहीं करना चाहते हैं. ऐसे बच्चों के लिए बहुत देर तक स्क्रीन के सामने बैठना समस्या ही है.’’

मातापिता का भी यह कहना है कि हमारे खुद के पास इतना समय नहीं है कि हम बच्चे को पढ़ा सकें क्योंकि हमें भी घर से अपना काम करना पड़ रहा है. कुछ बच्चों के मातापिता पढ़ेलिखे न होने के कारण इस स्थिति में असहाय महसूस कर रहे हैं.

औनलाइन कक्षाओं के तहत संसाधनों की कमी का सब से अधिक सामना 10वीं और 12वीं के छात्रों को करना पड़ रहा है. मध्य प्रदेश राज्य के नरसिंगपुर शहर के प्राइवेट स्कूल में 12वीं कक्षा में पढ़ने वाला विद्यार्थी संचित बताता है, ‘‘हमारी औनलाइन क्लास में पढ़ाई ठीक से नहीं चल रही है. हमें व्हाट्सऐप ग्रुप पर अलगअलग विषय की, बस, पीडीएफ भेज देते हैं. हफ्ते में एक दिन भी कोई औनलाइन क्लास नहीं हो रही है, टैस्ट वगैरह कुछ नहीं हो रहा है, पूरा साल खराब जा रहा है. 12वीं है, पता नहीं कैसे क्या होगा.’’

दिल्ली के नजफगढ़ शहर के सरकारी स्कूल में 12वीं में पढ़ने वाली राधा कहती है, ‘‘औनलाइन पढ़ाई में हमारे सवाल, जो हमें टीचर से पूछने हैं, वे रह जाते हैं क्योंकि टीचर सभी बच्चों को रिप्लाई नहीं कर पाते हैं और हमारे सवालों के जवाब नहीं दे पाते हैं. क्लासरूम में यह आसान था क्योंकि टीचर से आप सामने खड़े हो कर सवाल पूछ सकते थे. हम क्लासरूम में दोस्तों से भी किसी विषय पर जो सम?ा न आ रहा हो, आसानी से उस पर चर्चा कर सकते थे. पर औनलाइन में वह नहीं हो पाता है.’’

इस के अलावा कुछ बड़ी कक्षाओं और छोटी कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों ने बताया कि वे संयुक्त परिवारों में रहते हैं तो उन के लिए पढ़ाई का माहौल ही नहीं बन पाता है. मध्य प्रदेश का संचित, जो 12वीं कक्षा में पढ़ता है, का कहना है, ‘‘पहले स्कूल जा कर मैं आराम से पढ़ सकता था. वह समय सिर्फ मेरे स्कूल का था. पर घर में इतनी चहलपहल के बीच मु?ो वह माहौल नहीं मिल पाता है.’’ कई बच्चों के घर छोटे हैं, उन में उन के लिए अलग कमरा या जगह नहीं है जिस वजह से भी उन्हें पढ़ने में मुश्किल हो रही है.

शिक्षा का बेड़ा गर्क

औनलाइन क्लासेस ने शिक्षा और छात्र दोनों का बेड़ा गर्क कर दिया है. छोटेछोटे बच्चों की 4-4 घंटे तक औनलाइन क्लास चल रही है. बच्चे पस्त हो रहे हैं, गार्जियन के सामने नएनए बहाने बना रहे हैं. बच्चे अवसाद के शिकार भी हो रहे हैं. सोचिए कि केजी क्लास का नन्हा सा बच्चा औनलाइन क्या सीख और पढ़ रहा होगा? क्या औनलाइन क्लासेज पैरेंट्स को बेवकूफ बना कर पैसे ऐंठने का जरिया नहीं हैं?

लखनऊ के क्राइस्ट चर्च स्कूल में पढ़ने वाले 5वीं कक्षा के विद्यार्थी आलिंद नारायण अस्थाना की मां शिफाली अस्थाना कहती हैं, ‘‘हम स्कूल की इतनी लंबीचौड़ी फीस क्यों भरें जब बच्चा औनलाइन कुछ सीख ही नहीं पा रहा है? इस औनलाइन क्लास ने हमारी तो कमर ही तोड़ दी है. बिजली हमारी, इंटरनैट का खर्चा हमारा, अलग से ट्यूशन टीचर हमें रखनी पड़ रही है, स्मार्टफोन, लैपटौप हमें खरीदने पड़ रहे हैं, तो स्कूल वाले किस बात की फीस और किस बात का मेंटेनैंस चार्ज मांग रहे हैं? न तो उन की बिल्ंिडग इस्तेमाल हो रही है, न बिजलीपानी और न ही बच्चे को लाने व ले जाने के लिए बस, तो स्कूल ट्यूशन फीस में ये तमाम चार्जेस क्यों जोड़ रहे हैं? हम ने तो 4 महीने से फीस नहीं दी है और आगे भी अगर इसी तरह औनलाइन क्लास चलेगी, तो कोई फीस नहीं देंगे.’’

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उन अभिभावकों की हालत तो और भी ज्यादा खराब है जो प्राइवेट नौकरी में रहते हुए छंटनी के शिकार हो गए या फिर बिजनैस में थे और कोरोनाकाल के लौकडाउन में उन के बिजनैस की रीढ़ ही टूट गई. जिंदगी में दो जून की रोटी के लाले पड़ गए तो बच्चों की फीस का इंतजाम कहां से करें? जिन के 3 या 4 बच्चे हैं, भला वे कहां से इतना पैसा लाएं कि हर बच्चे के हाथ में एक नया स्मार्टफोन और इंटरनैट कनैक्शन दे सकें?

घर में पहले एक स्मार्टफोन था, तो अब जरूरत उस से ज्यादा की है. स्मार्टफोन पर औनलाइन क्लास तो सजा ही है, सही माने में तो लैपटौप चाहिए. लेकिन 3-4 बच्चों के लिए 3-4 लैपटौप का इंतजाम अभिभावक कैसे करें? गाजियाबाद में रहने वाले अशोक मिश्रा के 3 बच्चे हैं, तीनों की क्लास एक ही वक्त शुरू हो जाती है. वे बेचारे अड़ोसपड़ोस से मोबाइल फोन मांग कर लाते हैं. घर में एक लैपटौप है, उस को ले कर ?ागड़ा मचता है.

फाइवस्टार स्कूलों की चांदी

हालांकि बड़े शहरों के फाइव स्टार स्कूलकालेज, जिन में बड़ेबड़े नेताओं और व्यापारियों का पैसा लगा है, को कोरोना महामारी से कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है. कई मैडिकल, इंजीनियरिंग कालेज लौकडाउन के बावजूद पैरेंट्स से पूरी फीस वसूल रहे हैं. ऐसे स्कूलों में फीस न देने का कोई रास्ता नहीं है. कोई मुरव्वत नहीं, फीस नहीं तो नाम कट. अब जहांतहां से इंतजाम कर के लोग फीस भर रहे हैं. यही नहीं, कुछ नामी स्कूल तो तय सीमा से ज्यादा फीस ले रहे हैं. सैमेस्टर की फीस जमा करने के लिए फाइव स्टार प्राइवेट यूनिवर्सिटी सिर्फ 2 दिन का वक्त देती हैं, वह भी बिना पूर्व सूचना के. फीस में एक दिन की भी देरी हुई, तो लेट पेमैंट के नाम पर करीब हजार रुपए का चूना लग जाता है. ज्यादा देर हो गई, तो दोगुनी फीस भी देनी पड़ सकती है.

इन यूनिवर्सिटीज में अपने बच्चों को पढ़ाने वाले उन तमाम मध्यवर्गीय, निम्नमध्यवर्गीय परिवारों की परेशानियों का कोई अंत नहीं है, जिन के 2 या उस से ज्यादा बच्चे हैं. सब की औनलाइन क्लास एक ही वक्त चलनी है, इसलिए सभी को लैपटौप और स्मार्टफोन इंटरनैट कनैक्शन के साथ चाहिए. अब स्कूल प्रशासन के सामने छात्रों के बीच अनुशासन मैंटेन करने का कोई ?ां?ाट नहीं है. स्कूल के रखरखाव की परेशानी भी कम हो गई है. खेल एक्टिविटीज बंद हैं. वाहन चल नहीं रहे हैं. लेकिन उन सब की फीस ली जा रही है. पढ़ाई की क्वालिटी के बारे में कोई सवाल नहीं उठ रहे. स्कूल प्रशासन को अच्छी तरह पता है कि कोरोनाकाल में अभिभावक संगठित नहीं हो सकते. सो, इन की पहले भी चांदी थी, अब भी चांदी है.

शिक्षा एक महंगा प्रोडक्ट

हम सारे आंकड़ों को, शिक्षकों और विद्यार्थियों के अनुभव को देखें तो लगता है कि औनलाइन एजुकेशन शिक्षा को एक बाजार से खरीदी जाने वाली चीज की तरह बना रही है जिस के पास पैसा और संसाधन हैं वे तो इसे आसानी से खरीद कर इस का लाभ उठा पा रहे हैं पर गरीब तबका और ऐसे लोग, जो गांव या कसबे में रहते हैं, सुविधा के अभाव के चलते अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दे पा रहे.

इस का मतलब यह नहीं है कि औनलाइन एजुकेशन नहीं होनी चाहिए. लेकिन प्रशासन को यह सोचना होगा कि अगर औनलाइन एजुकेशन के अलावा और कोई भी कदम उठाए जाएं तो उस का लाभ सिर्फ समृद्ध लोगों को ही न मिले, हमारे देश का वह तबका जो समृद्ध नहीं है वह छूट न जाए. संसाधनों के अभाव से ग्रस्त हमारे देश के शिक्षक और विद्यार्थी महामारी के दौर में अगली पूरी पीढ़ी की शिक्षा को दांव पर लगा देख इन सवालों के साथ प्रशासन की तरफ उम्मीद से देख रहे हैं.

आर्थिक तंगी से जूझ रहे स्कूल 

स्कूल, कालेज प्रशासन का भी हाल खस्ता है. कोरोनाकाल में कई छोटे स्कूल आर्थिक तंगी का शिकार हो कर बंद होने की कगार पर हैं. एक कसबाई स्कूल के प्रिंसिपल साहब कहते हैं, ‘‘छात्रों ने स्कूल में आना बंद कर दिया तो अभिभावकों ने फीस भी बंद कर दी. अध्यापक से ले कर चपरासी तक पैदल हो गए और सरकार बिजली का बिल, पानी का बिल भेजने में शर्म नहीं कर रही है. आखिर कुछ तो रियायत सरकार भी दिखाए.’’

तमाम प्राइवेट स्कूलकालेजों की हालत खस्ता है. प्राइवेट कालेज के कई अध्यापक अब सब्जी और फल बेच रहे हैं, ऐसी खबरें रोज आ रही हैं.

-साथ में नसीम अंसारी कोचर 

ममता- भाग 1: क्या माधुरी को सासुमां का प्यार मिला

मा धुरी को आज बिस्तर पकड़े  8 दिन हो गए थे. पल्लव के मित्र अखिल के विवाह से लौट कर कार में बैठते समय अचानक पैर मुड़ जाने के कारण वह गिर गई थी. पैर में तो मामूली मोच आई थी किंतु अचानक पेट में दर्द शुरू होने के कारण उस की कोख में पल रहे बच्चे की सुरक्षा के लिए उस के पारिवारिक डाक्टर ने उसे 15 दिन बैड रैस्ट की सलाह दी थी. अपनी सास को इन 8 दिनों में हर पल अपनी सेवा करते देख उस के मन में उन के प्रति जो गलत धारणा बनी थी एकएक कर टूटती जा रही थी. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि मनोविज्ञान की छात्रा होने के बाद भी वह अपनी सास को समझने में चूक कैसे गई?

उसे 2 वर्ष पहले का वह दिन याद आया जब मम्मीजी अपने पति पंकज और पुत्र पल्लव के साथ उसे देखने आई थीं. सुगठित शरीर के साथ सलीके से बांधी गई कीमती साड़ी, बौबकट घुंघराले बाल, हीरों का नैकलेस, लिपस्टिक तथा तराशे नाखूनों में लगी मैचिंग नेलपौलिश में वे बेहद सुंदर लग रही थीं. सच कहें तो वे पल्लव की मां कम बड़ी बहन ज्यादा नजर आ रही थीं तथा मन में बैठी सास की छवि में वह कहीं फिट नहीं हो पा रही थीं. उस समय उस ने तो क्या उस के मातापिता ने भी सोचा था कि इस दबंग व्यक्तित्व में कहीं उन की मासूम बेटी का व्यक्तित्व खो न जाए. वह उन के घर में खुद को समाहित भी कर पाएगी या नहीं. मन में संशय छा गया था लेकिन पल्लव की नशीली आंखों में छाए प्यार एवं अपनत्व को देख कर उस का मन सबकुछ सहने को तैयार हो गया था.

यद्यपि उस के मातापिता उच्चाधिकारी थे, किंतु मां को सादगी पसंद थी, उस ने उन्हें कभी भी गहनों से लदाफदा नहीं देखा था. वे साड़ी पहनती तो क्या, सिर्फ लपेट लेती थीं. लिपस्टिक और नेलपौलिश तो उन्होंने कभी लगाई ही नहीं थी. उन के अनुसार उन में पड़े रसायन त्चचा को नुकसान पहुंचाते हैं. वैसे भी उन्हें अपने काम से फुरसत नहीं मिलती थी.

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पापा को अच्छी तरह से रहने, खानेपीने और घूमने का शौक था. उन की  पैंटशर्ट में तो दूर रूमाल में भी कोई दागधब्बा रहने पर वे आसमान सिर पर उठा लेते थे. खानेपीने तथा घूमने का शौक भी मां के नौकरी करने के कारण पूरा नहीं हो पाया था, क्योंकि जब मां को छुट्टी मिलती थी तब पापा को नहीं मिल पाती थी और जब पापा को छुट्टी मिलती तब मां का कोई अतिआवश्यक काम आ जाता था.

उन के घर रिश्तेदारों का आना भी बंद हो गया था, क्योंकि उन्हें लगता था कि यहां आने पर मेजबान की परेशानियां बढ़ जाती हैं तथा उन्हें व्यर्थ की छुट्टी लेनी पड़ती है. अत: वे भी कह देते थे, जब आप लोगों का मिलने का मन हो तब आ कर मिल जाइए.

मां का अपने प्रति ढीलापन देख कर पापा टोकते तो वे बड़ी सरलता से उत्तर देतीं, ‘व्यक्ति कपड़ों से नहीं, अपने गुणों से पहचाना जाता है और यह भी एक सत्य है कि आज मैं जो कुछ हूं अपने गुणों के कारण हूं.’

वेएक प्राइवेट संस्थान में पर्सनल मैनेजर थीं. कभीकभी औफिस के काम से उन्हें टूर पर भी जाना पड़ता था. घर का काम नौकर के जिम्मे था, वह जो भी बना देता सब वही खा लेते थे. मातापिता का प्यार क्या होता है उसे पता ही नहीं था. जब वे छोटी थीं तब बीमार होने पर उस ने दोनों में इस बात पर झगड़ा होते भी देखा था कि उस की देखभाल के लिए कौन छुट्टी लेगा? तब वह खुद को अत्यंत ही उपेक्षित महसूस करती थी. उसे लगता था कि उस की किसी को जरूरत ही नहीं है.

मां अत्यंत ही महत्त्वाकांक्षी थीं. यही कारण था कि दादी के बारबार यह कहने पर कि वंश चलाने के लिए बेटा होना ही चाहिए, उन्होंने ध्यान नहीं दिया था. उन का कहना था कि आज के युग में लड़का और लड़की में कोई अंतर नहीं रह गया है. बस, परवरिश अच्छी तरह से होनी चाहिए लेकिन वे अच्छी तरह परवरिश भी कहां कर पाई थीं? जब तक दादी थीं तब तक तो सब ठीक चलता रहा, लेकिन उन के बाद वह नितांत अकेली हो गई थी. स्कूल से लौटने के बाद घर उसे काटने को दौड़ता था, तब उसे एक नहीं अनेक बार खयाल आया था कि काश, उस के साथ खेलने के लिए कोई भाई या बहन होती.

माधुरी को आज भी याद है कि हायर सेकेंडरी की परीक्षा से पहले मैडम सभी विद्यार्थियों से पूछ रही थीं कि वे जीवन में क्या बनना चाहते हैं? कोई डाक्टर बनना चाहता था तो कोई इंजीनियर, किसी की रुचि वैज्ञानिक बनने में थी तो कोई टीचर बनना चाहता था. जब उस की बारी आई तो उस ने कहा कि वह हाउस वाइफ बनना चाहती है. सभी विद्यार्थी उस के उत्तर पर खूब हंसे थे. तब मैडम ने मुसकराते हुए कहा था, ‘हाउस वाइफ के अलावा तुम और क्या बनना चाहोगी?’ उस ने चारों ओर देखते हुए आत्मविश्वास से कहा था, ‘घर की देखभाल करना एक कला है और मैं वही अपनाना चाहूंगी.’

उस की इस इच्छा के पीछे शायद मातापिता का अतिव्यस्त रहना रहा था और इसी अतिव्यस्तता के कारण वे उस की ओर समुचित ध्यान नहीं दे पाए थे और शायद यही कारण था कि वह अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए पल्लव की तरफ आकर्षित हुई थी, जो उस की तरह कालेज में बैडमिंटन टीम का चैंपियन था. वे दोनों एक ही क्लब में अभ्यास के लिए जाया करते थे.

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खेलतेखेलते उन में न जाने कब जानपहचान हो गई, पता ही न चला. उस से बात करना, उस के साथ घूमना उसे अच्छा लगने लगा था. दोनों साथसाथ पढ़ते, घूमते तथा खातेपीते थे, यहां तक कि कभीकभी फिल्म भी देख आते थे, पर विवाह का खयाल कभी उन के मन में नहीं आया था. शायद मातापिता के प्यार से वंचित उस का मन पल्लव के साथ बात करने से हलका हो जाता था.

‘यार, कब तक प्यार की पींगें बढ़ाता रहेगा? अब तो विवाह के बंधन में बंध जा,’ एक दिन बातोंबातों में पल्लव के दोस्त शांतनु ने कहा था.

‘क्या एक लड़की और लड़के में सिर्फ मित्रता नहीं हो सकती. यह शादीविवाह की बात बीच में कहां से आ गई?’ पल्लव ने तीखे स्वर में कहा था.

‘मैं मान ही नहीं सकता. नर और मादा में बिना आकर्षण के मित्रता संभव ही नहीं है. भला प्रकृति के नियमों को तुम दोनों कैसे झुठला सकते हो? वह भी इस उम्र में,’ शांतनु ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा.

शांतनु तो कह कर चला गया, किंतु नदी की शांत लहरों में पत्थर फेंक गया था. पिछली बातों पर ध्यान गया तो लगा कि शांतनु की बातों में दम है, जिस बात को वे दोनों नहीं समझ सके या समझ कर भी अनजान बने रहे, उस आकर्षण को उस की पारखी निगाहों ने भांप लिया था.

गंभीरतापूर्वक सोचविचार कर आखिरकार माधुरी ने ही उचित अवसर पर एक दिन पल्लव से कहा, ‘यदि हम अपनी इस मित्रता को रिश्ते में नहीं बदल सकते तो इसे तोड़ देना ही उचित होगा, क्योंकि आज शांतनु ने संदेह किया है, कल दूसरा करेगा तथा परसों तीसरा. हम किसकिस का मुंह बंद कर पाएंगे. आज हम खुद को कितना ही आधुनिक क्यों न कह लें किंतु कहीं न कहीं हम अपनी परंपराओं से बंधे हैं और ये परंपराएं एक सीमा तक ही उन्मुक्त आचरण की इजाजत देती हैं.’

पल्लव को भी लगा कि जिस को वह अभी तक मात्र मित्रता समझता रहा वह वास्तव में प्यार का ही एक रूप है, अत: उस ने अपने मातापिता को इस विवाह के लिए तैयार कर लिया.

पल्लव के पिताजी बहुत बड़े व्यवसायी थे. वे खुले विचारों के थे इसलिए अपने इकलौते पुत्र का विवाह एक उच्च मध्यवर्गीय परिवार में करने को तैयार हो गए. मम्मीजी ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि जातिपांति पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यदि उन्हें लड़की पसंद आई तभी वे इस विवाह की इजाजत देंगी.

Crime: दोस्ती, अश्लील फोटो वाला ब्लैक मेलिंग!

आज समय है सावधान रहने का! सावधानी चाहे वह युवती हों, पुरुष हों या उम्रदराज महिलाएं अगर आपकी मित्रता… फ्रेंडशिप जिसका आज कल बड़ा चलन में है, थोड़ी भी चुक नहीं हुई कि सामने वाला भयादोहन या फिर ब्लेक मेलिंग पर उतर आता है.

इसलिए आपको सावधान करते हुए एक ऐसी रिपोर्ट हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं जो आपको सचेत करती है और बताती है कि कैसे आजकल समाज में ब्लैक मेलिंग का खेल धड़ल्ले से चल रहा है. अक्सर लोग इतने सफल हो जाते हैं. कुछ ही मामले ऐसे होते हैं जिनमें ब्लैकमेल करने वाले पुलिस गिरफ्त में आ पाते हैं.

पहला घटनाक्रम-

एक ब्लैकमेलर ने पहले महिला पर चिकनी चुपड़ी बातों से प्रेम जाल फेंका. जब महिला प्रेम जाल में फंसी गई, तो दोनों अक्सर बातचीत करने लगे. आरोपी ने मौका देखकर महिला को ब्लैकमेल किया. महिला से तकरीबन साढ़े 5 लाख रुपये ठग लिया. महिला ने तंग आकर राजहरा थाने में शिकायत दर्ज कराई.

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दूसरा घटनाक्रम-

छत्तीसगढ़ के न्यायधानी कहे जाने वाले बिलासपुर में एक महिला ने पुरुष से संबंध बनाएं और वीडियो बनाकर अपने साथियों के साथ भयादोहन पर उतर आई.शिकायत के पश्चात पुलिस ने जांच की और दोषी पाया.

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तीसरा घटनाक्रम-

छत्तीसगढ़ के जिला अंबिकापुर में एक युवक ने कई लड़कियों से दोस्ती गांठी और लड़कियों के अश्लील वीडियो, फोटो बनाएं लाखों रुपए की ब्लेक मेलिंग की अंततः जेल की सलाखों में पहुंच गया.
इस तरह अनेक घटनाएं हमारे आसपास घटित हो रही हैं. दरकार है समझदारी और विवेक की . अगर हम और हमारे आस-पास कोई मित्र, संबंधी जरा भी भटका नहीं की, ब्लैक मेलिंग का शिकार हुआ समझिए.

वीडियो कॉल बना, ब्लैक मेलिंग का जरिया…

छत्तीसगढ़ के राजहरा में घटित एक सनसनीखेज घटना इन दिनों चर्चा में है. यहां एक युवक ने एक युवती से मित्रता की फिर उसका एक वीडियो कॉल के दरमियान अश्लील फोटो बना लिया और शुरू हो गया ब्लैकमेल करने.

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आरोपी आकाश जायसवाल उर्फ गोल्डी ने पहले बीमार होने का बहाना किया. फिर महिला से 3 लाख 60 हजार रुपये ले लिया. कुछ दिनों के बाद महिला ने रकम वापस मांगी. तो आरोपी ने महिला की अश्लील तस्वीर उसके सामने रखकर “सोशल मीडिया” पर वायरल करने की धमकी देने लगा. यही नहीं कथित आरोपी ने फिर 1 लाख 90 हजार रुपये महिला से वसूल लिया. कुल मिलाकर आरोपी ने साढ़े 5 लाख रुपये और जेवरात ठग लिया.

आरोपी ने महिला से लिए सोने के जेवरात को 50 हजार रुपये में एक बैंक में गिरवी रख दिया था, जिसे पुलिस ने बैंक के लॉकर से बरामद किया है. वही आरोपी ने महिला से मिली रकम से एक अदद कार भी खरीदी थी, जिसकी कीमत 4 लाख 50 हजार रुपये बताई जा रही है.

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यहां सबसे सनसनीखेज तथ्य यह सामने आया है

महिला की आरोपी ने वीडियो कॉल के दौरान अश्लील फोटो ले ली थी. यानी महिला को पता ही नहीं चला और वह शिकार बन गई.आगे आरोपी फोटो वायरल करने की बार-बार धमकी दे कर जान से मारने की धमकी भी देता था.

तांक झांक- भाग 3: क्यों शालू को रणवीर की सूरत से नफरत होने लगी?

Writer- Neerja Srivastava

शालू ने तरुण को इशारा किया. शालू ने तरुण को इशारे से ही तसल्ली दी और सैंडल उतार कर स्टेज पर आ गई.

फरमाइश का गाना बज उठा. फिर तो शालू ऐसी नाची कि सभी उस के साथ तालियां बजाते हुए मस्त हो थिरकने लगे. तरुण ने देखा वैस्टर्न डांस पर थिरकने वाले लोग भी ठुमकने लगे थे… वह नाहक ही घबरा रहा था… शालू तो छा गई…

गाना खत्म हुआ तो प्रिया के साथ रणवीर स्टेज पर आ गया. उस ने अपनी ठहरी हुई आवाज और धाराप्रवाह में चंद शेरों से सजे संक्षिप्त वक्तव्य के द्वारा सब को ऐसा मंत्रमुगध किया कि सभी वंसमोर वंसमोर कह उठे. प्रिया भी उसे गर्व से देखने लगी कि कितने शालीन ढंग से कितने खूबसूरती से शब्दों को पिरो कर बोलता है रणवीर. उस के इसी अंदाज पर तो वह मर मिटी थी. उस ने कुहनी के पास से रणवीर का बाजू प्यार से पकड़ लिया था. दोनों ने फिर किसी इंगलिश धुन पर डांस किया.

अब डांस फ्लोर पर सभी एकसाथ डांस का मजा लेने लगे. डांस का म्यूजिक चल पड़ा था. स्टेज पर वरवधू भी थिरकने लगे. सभी पेयर में नृत्य कर रहे थे. कभी पेयर बदल भी लिए जा रहे थे. शालू ने धीरेधीरे तरुण के साथ 1-2 स्टेप लिए पर पेयर बदलते ही वह घबरा उठी और किनारे लगी सीट में एक पर जा बैठी. तरुण थोड़ी देर नई रस्म में शामिल हो नाचता रहा.

एक बार प्रिया भी उस के पास आ गई पर दूसरे ही पल वह दूसरे की बांहों में थिरकती तीसरी के पास पहुंच गई. तरुण को झटका सा लगा. कुछ अजीब सा फील होने लगा, ‘कैसे हैं ये लोग… रणवीर अपने में मस्त किसी और की पत्नी के साथ और उस की पत्नी प्रिया किसी और के पति के साथ… अजब कल्चर है इन का. इस से अच्छी तो मेरी शालू है.’ उस ने दूर अकेली बैठी शालू की ओर देखा और फिर उस के पास चला गया.

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रणवीर ने देख लिया था, ‘उफ, शालू ने न तो खुद ऐंजौय किया और न पति को ही मजे लेने दिए. अपने पास बुला लिया… ऐसी पार्टियों के लायक ही नहीं वे… उधर प्रिया को देखो. कैसे एक हीरोइन सी सब की नजरों का केंद्र बनी हुई है. आई जस्ट लव हर…’ उसे नशा चढ़ने लगा था. कदमों के साथ उस की आवाज भी लड़खड़ाने लगी थी. रणवीर ने प्रिया को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया तो उस के कदम भी लड़खड़ाए और फिर फर्श पर जा गिरी. हड़कंप मच गया. क्या हुआ? क्या हुआ?

प्रिया दर्द से कराह उठी थी. पैर में फ्रैक्चर हो गया था. रणवीर तो खुद उसे उठाने की हालत में न था. तरुण और शालू ने जैसेतैसे अस्पताल पहुंचाया.

उमेशजी अपने ड्राइवर को गाड़ी ड्राइव करने के लिए बोल रहे थे पर रणवीर माना नहीं. रास्ते भर तरुण, उस की इधरउधर भागती गाड़ी के स्टेयरिंग को मुश्किल से संभालता रहा. पर इस सब से बेखबर शालू महंगी गाड़ी में बैठी एक बार फिर अपने रईस पति की कल्पना में खो गई थी.

प्रिया घर आ गई थी. उस के पैर में प्लास्टर चढ़ गया था. लाते समय भी शालू और तरुण अस्पताल पहुंचे थे. तभी एक गरीब महिला रोती हुई आई और सब से अपने बच्चे के लिए खून देने के लिए गुहार करने लगी.

‘‘तुम प्रिया मैडम के पास चलो शालू. मैं अभी आता हूं,’’ कह तरुण ने शालू से कहा तो वह उस का आशय समझ गई.‘‘अभी 10 दिन भी नहीं हुए तुम्हें खून दिए तरुण,’’ शालू बोली.

तरुण नहीं माना. उस गरीब को खून दे आया. फिर प्रिया को उस के फ्लोर पर सहीसलामत पहुंचाया. अगले दिन बौस से डांट भी खानी पड़ी. औफिस पहुंचने में लेट जो हो गया था.

‘तरुण भी न दूसरों की खातिर अपनी परवाह नहीं करता,’ शालू औटो में बैठी सोच रही थी.

अपने ब्लौक के गेट के पास आने पर उसे एक संतरे की रेहड़ी वाला दिखा. उस ने औटो रुकवाया और उतर कर औटो वाले को पैसे देने लगी.

तभी वहां से हवा में बातें करती एक लंबी सी गाड़ी गुजरी. वह रोमांचित हो उठी. उस ने सिर उठा कर देखा, ‘अरे ये तो हमारे पड़ोसी रणवीर हैं. काश, उस का पति भी कोई बीएमडब्ल्यू जैसी गाड़ी वाला होता.’ शालू अभी यह सोच ही रही थी कि वही गाड़ी उलटी साइड से आ कर रेहड़ी वाले से जा टकराई. रेहड़ी उलट गई और रेहड़ी वाला छिटक कर दूर जा गिरा. उस के संतरे सड़क पर चारों ओर बिखर गए. शालू ने साफ देखा था. गाड़ी गलत साइड से आ कर रेहड़ी वाले से टकराई थी. फिर भी रणवीर ने तमाचे उस गरीब को जड़ दिए. फिर चीख कर बोला, ‘‘देख कर नहीं चल सकता?’’

‘‘साहबजी…’’ आंसू बन रेहड़ी वाले का दर्द आंखों में उतर आया. वह हाथ जोड़े इतना ही बोल सका.

‘‘ये पकड़ अपने नुकसान के रुपए… ज्यादा नाटक मत कर… कुछ नहीं हुआ… अब जल्दी सड़क साफ कर,’’ कह रणीवर ने उसे 2 हजार का 1 नोट दिया. शालू रणवीर का क्रूर व्यवहार देखती रह गई कि इतना अमानवीय बरताव…

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उस की महंगी गाड़ी फिर तेजी से उस की आंखों से ओझल हो गई. शालू को इस समय कोई रोमांच न हुआ, बल्कि उसे अपनी आंखों में नमी सी महसूस होने लगी. उस ने पर्स से रुमाल निकाल कर रेहड़ी वाले के माथे से रिसता खून पोंछ कर बैंडएड चोट पर चिका दी. फिर संतरे उठवाने में उस की मदद करने लगी.

‘‘रहने दीजिए मैडमजी मैं उठा लूंगा,’’ रेहड़ी वाले के पैरों और हाथों में भी चोटें थीं.

शालू ने नजरों से ओझल हुई उस गाड़ी की ओर देखा. वहां सिर्फ धूल का गुबार था, जिस ने उस की सपनीली कल्पना को उड़ा कर रख दिया कि शुक्र है उस का तरुण महंगी बड़ी गाड़ी में घूमने वाले ऐसे छोटे दिल के घटिया इंसान की तरह नहीं है. न जाने उस ने कितनी बार तरुण को ऐसे जरूरतमंदों की मदद करते देखा है. रईस ही तो है वह. वास्तव में बड़े दिल वाला रईस. शालू को तरुण पर प्यार आने लगा और फिर वह तेज कदमों से घर की ओर बढ़ चली.

Manohar Kahaniya- राम रहीम: डेरा सच्चा सौदा के पाखंडी को फिर मिली सजा- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

हनीप्रीत के पूर्व पति विश्वास गुप्ता ने बाबा की गिरफ्तारी के बाद मीडिया को बताया था कि शादी के 2 या 3 दिन बाद बाबा राम रहीम ने उसे हनीप्रीत के साथ डेरे में मुलाकात के लिए बुलाया था. तब बाबा ने कहा था कि तुम हमारे साथ बाहर यात्राओं पर जाती हो, अगर बच्चा हुआ तो उस के स्कूल जाने और लालनपालन के चलते हमारी सेवा नहीं कर पाओगी, इसलिए बच्चा पैदा न करो.

बाबा ने कहा था कि हम तुम्हें बेटा मानते हैं, उसी तरह हनीप्रीत भी हमारी बेटी है. हम उसे भी उतना ही प्यार देंगे.

विश्वास गुप्ता ने आरोप लगाया था कि बाबा हर सप्ताह हनीप्रीत और उसे डेरे में बुलाने लगा. वह गुफा के अंदर बने बैडरूम में हनीप्रीत को बुलाता था और उसे लिविंग रूम में ही बैठने को कहता था.

पूछने पर बाबा कहता था कि बेटी अकेले में ससुराल के हर सुखदुख बता सके, इसलिए उस से अकेले में हालचाल पूछता हूं. विश्वास गुप्ता ने आरोप लगाए थे कि राम रहीम और हनीप्रीत की सभी मुलाकातें हर बार एक से डेढ़ घंटे तक होती थीं. इस दौरान बाबा के चेले और दूसरे सेवादार विश्वास गुप्ता को बातों और कुछ कामों में उलझाए रखते थे. बाद में बाबा ने विश्वास गुप्ता को सप्ताह में 2 दिन पत्नी के साथ गुफा में रहने का आदेश दिया.

बताते हैं कि उसी दौरान एक रात जब  विश्वास गुप्ता डेरे में बाबा की गुफा के लिविंग रूम में सो रहा था तो उस ने रात के वक्त बाबा के बैडरूम में अपनी पत्नी हनीप्रीत व बाबा को कामक्रीड़ा करते देखा. बस इसी के बाद से बाबा और हनीप्रीत से उस का मोहभंग हो गया.

बाद में हनीप्रीत और विश्वास गुप्ता के संबध बिगड़ने लगे तथा दोनों में अकसर तकरार होने लगी.

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विश्वास गुप्ता और हनीप्रीत का रिश्ता केवल 11 साल चला. बाबा राम रहीम ने साल 2009 में हनीप्रीत को बेटी के रूप में गोद ले लिया. जिस के बाद हनीप्रीत बाबा के साथ डेरे की गुफा में ही रहने लगी. हनीप्रीत को गोद लेने के बाद गुप्ता से हनी के मतभेद और गहरे हो गए.

गुप्ता ने जब हनीप्रीत पर घर वापस चलने का दबाव डाला तो उस के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज करवा दिया गया, जिस में उसे जेल की हवा खानी पड़ी. बाद में जेल से रिहा होने पर  साल 2011 में विश्वास गुप्ता ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में मुकदमा दायर कर राम रहीम के कब्जे से अपनी पत्नी यानी हनीप्रीत को मुक्त कराने की मांग की थी. अदालत में दी गई याचिका में विश्वास गुप्ता ने राम रहीम पर हनीप्रीत के साथ अवैध संबंध होने का भी आरोप लगाया था.

डेरे के सारे फैसले लेने लगी हनीप्रीत

बताते हैं कि बाद में डेरे के कुछ प्रभावशाली लोगों के दबाव के कारण विश्वास गुप्ता के परिवार वालों ने हनीप्रीत से उस का तलाक करवा दिया. लेकिन इस दौरान गुप्ता परिवार को बाबा के ऊंचे रसूख के कारण कई तरह की प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ा.

विश्वास गुप्ता से तलाक के बाद हनीप्रीत पूरी तरह बाबा के लिए समर्पित हो गई.

हनीप्रीत डेरा के हर महत्त्वपूर्ण फैसले लेने लगी. बाबा राम रहीम के साथ वह साए की तरह चौबीसों घंटे रहने लगी. बाबा हर फैसला हनीप्रीत से सलाह ले कर ही करता था.

इतना ही नहीं, बाबा ने हनीप्रीत की फिल्मों में काम करने की ख्वाहिश को देखते हुए ‘एमएसजी’ नाम से एक फिल्म कंपनी बनाई जिस के तहत बनी फिल्म ‘एमएसजी’, ‘जट्टू इंजीनियर’, ‘द वारियर लायन हार्ट’ समेत दूसरी और भी फिल्मों का निर्देशन हनीप्रीत ने ही किया. एमएसजी नाम की फिल्म में तो बाबा ने खुद हीरो के रूप में काम भी किया.

बाबा की बेबी हनीप्रीत इतनी ताकतवर हो चुकी थी कि उसी के हाथ में डेरे की सभी चाबियां रहती थीं. पैसे से ले कर हर वो फैसला जो डेरे से संबंधित होता था, वह हनीप्रीत ही करती थी.

हनीप्रीत भले ही दिखावे के लिए बाबा की बेबी रही हो, लेकिन लोग अब खुली जुबान से कहते हैं कि वह बाबा की हनी थी. शायद यही वजह थी कि गुरमीत राम रहीम की अपनी बीवी और बेटेबहू से दूरियां रहती थीं.

राम रहीम को अपने तौरतरीकों से चलाने वाली हनीप्रीत जेल जाने तक उस के साथ नजर आई थी और बाद में उसी ने डेरे का प्रबंध अपने हाथों में लिया.

गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद 600 करोड़ रुपए के टर्नओवर वाले उस के एमएसजी प्रोडक्ट्स की कमान भी बाद में हनीप्रीत के हाथों में आ गई. एमएसजी के सिरसा में 5 बड़े शोरूम थे, जिन में करीब 150 से ज्यादा प्रोडक्ट्स बेचे जाते थे.

हालांकि बाबा की गिरफ्तारी के बाद एमएसजी का यह कारोबार आर्थिक संकट का शिकार हो कर बंद हो गया, जिस से इस में निवेश करने वाले लगभग 10 हजार लोगों की रकम भी डूब गई.

साध्वियों के साथ रामचंद्र छत्रपति के परिवार को इंसाफ मिल चुका था, लेकिन राम रहीम के दामन पर लगे डेरा प्रेमी रणजीत सिंह की हत्या के दागों का इंसाफ होना अभी बाकी था.

18 अक्तूबर, 2021 को रणजीत सिंह हत्याकांड में पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत के जज सुशील कुमार ने राम रहीम समेत 5 लोगों को दोषी ठहरा कर उम्रकैद की सजा सुनाई. 19 साल तक अदालत में चले इस मामले की 250 पेशी हुई और 61 गवाही के बाद अदालत ने 5 आरोपियों को दोषी माना.

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रणजीत सिंह एक समय राम रहीम के डेरे का मैनेजर और उस का भक्त हुआ करता था, लेकिन 10 जुलाई, 2002 को अचानक रणजीत सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. हत्या का रहस्य बहुत गहरा था. हत्या के आरोप में राम रहीम के साथ उस का सहयोगी कृष्ण लाल भी फंसा था.

रणजीत सिंह हत्याकांड में 3 गवाह महत्त्वपूर्ण थे. इन में 2 चश्मदीद गवाह सुखदेव सिंह और जोगिंद्र सिंह थे. इन का कहना था कि उन्होंने आरोपियों को रंजीत सिंह पर गोली चलाते हुए देखा था.

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Satyakatha: फौजी की सनक का कहर- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

लेखक- शाहनवाज

राय सिंह को उस के अनैतिक रिश्ते की गंध समझते देर नहीं लगी. उस का शक विश्वास में बदल गया कि सुनीता के कृष्णकांत के साथ मधुर संबंध हैं. उस समय उसे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन शांत बने रहा.

यह घटना तो घट गई थी, लेकिन राव राय सिंह के मन में उठने वाले सवाल उसे रात को सोने नहीं दे रहे थे. वह लगातार चिंतित रहने लगा. उसे यह भी चिंता सताने लगी कि कहीं सुनीता उस के बेटे को धोखा न दे दे.

सुनीता और कृष्णकांत के बीच कोई अनैतिक रिश्ता तो नहीं? इस घटना के बाद वह अपनी बहू और कृष्णकांत को शक की नजरों से देखने लगा.

हालांकि उस ने इस का जिक्र किसी से नहीं किया था. अपनी पत्नी तक को नहीं बताया था. जबकि राय सिंह मन ही मन यह सब सोच कर कुढ़ता रहता था. वह सुनीता के मिजाज को अच्छी तरह जानता था, इसलिए उस पर दबाव नहीं बना पा रहा था. उसे पता था कि उस के खिलाफ कुछ भी बोलने का मतलब बेइज्जत होना है.

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उसी बीच फरवरी, 2021 में सुनीता फिर अपने मायके चली गई. एक महीने बाद कोरोना की दूसरी लहर ऐसी आई कि लौकडाउन और कर्फ्यू के चलते लोगों का कहीं आनाजाना मुहाल हो गया.

मई, 2021 में कृष्णकांत के गांव से उन के पिता के बीमार होने का फोन आया. उन्हें सपरिवार आननफानन अपने गांव जाना पड़ा. गांव से वह वापस गुरुग्राम आ तो गए लेकिन उन की आर्थिक स्थिति काफी खराब हो चुकी थी.

एक तरफ उन की नौकरी छूट गई थी, दूसरी तरफ मकान का किराया 7 महीने का बाकी हो गया था. किराए को ले कर राय सिंह से कृष्णकांत की कई बार बहस भी हो चुकी थी.

गांव में अपने पिता की देखभाल करने के 3 महीने बाद अगस्त में रक्षाबंधन के ठीक 5 दिन पहले लौटे थे. राय सिंह ने तब किराया न देने पर उन्हें खूब खरीखोटी सुनाई थी.

वह पहले से ही अपनी बहू को ले कर परेशान था. उस ने सोचा कि किराए के बहाने कमरा खाली करवा लेने पर कृष्णकांत से उस की बहू का संबंध खत्म हो जाएगा. कृष्णकांत ने कुछ समय की मोहलत मांगी.

उसी बीच 19 अगस्त को सुनीता भी मायके से गुड़गांव लौट आई. राय सिंह के किराया मांगने पर उस ने कृष्णकांत और परिवार की तरफदारी की. उस ने कहा वह खराब हालत में कहां जाएंगे.

सुनीता की बातों से राय सिंह के दिल को ठेस लगी. उस ने कृष्णकांत के सामने ही यह बात कही थी, जिस से उस ने बेइज्जती महसूस की थी. उस वक्त तो राय सिंह खून का घूंट पी कर रह गया, लेकिन मन ही मन में एक संकल्प भी ले लिया.

सुनीता द्वारा कृष्णकांत का पक्ष लिए जाने का कारण वह समझ रहा था. उन के रिश्तों को ले कर पहले से ही शक का कीड़ा मन में कुलबुला रहा था. सुनीता की तरफदारी से कीड़ा रेंगने लगा था.

एक दिन रात को अचानक उन की नींद खुल गई और पेड़पौधों की कटाईछंटाई करने वाले गंडासे की धार तेज करने लगा. पत्नी ने रात को ऐसा करते देख कर पूछा तब उस ने बहाना बनाते हुए कहा कि उसे कई पेड़ों की छंटाई करनी है. गंडासा की धार तेज करने का सिलसिला 19 अगस्त से 23 अगस्त तक चला.

23 तारीख की शाम को 7 बजे राव सिंह का बेटा आनंद यादव अपने कुछ दोस्तों के साथ खाटू श्याम मंदिर में दर्शन करने के लिए चला गया था. राय सिंह ने उसी रात अपनी योजना को अंजाम देने का मन बना लिया.

रात के 12 बजे के बाद राय सिंह पहले की तरह उठा और गंडासा निकाल कर छत की सीढि़यां चढ़ने लगे. उस की पत्नी विमलेश की नींद खुल गई, लेकिन उस ने समझा वे गंडासे की धार तेज करने गए होंगे. किंतु मोबाइल की रोशनी से घड़ी देखी तो ढाई बजे का समय देख कर चौंक गई.

उस के मन में कुछ आशंका हुई और दबेपांव छत पर जाने लगी. सीढि़यों पर अंधेरा था, जिस से वापस लौट कर अपने कमरे में आ कर लेट गई. उधर राय सिंह ने पहली मंजिल पर पहुंच कर अपनी बहू का कमरा खटखटाया.

2-3 बार दरवाजा खटखटाने के बाद अंदर से सुनीता ने गहरी नींद में दरवाजा खोला. इस से पहले कि सुनीता को कुछ पता चलता, राय सिंह ने उस के सिर पर गंडासे से जोरदार वार कर दिया.

सुनीता वहीं चीख कर गिर पड़ी. उस के गिरते ही राय सिंह ने दनादन शरीर पर कई वार कर दिए. उस के सिर से ले कर शरीर के कई हिस्से से खून बहने लगा.

नीचे राय सिंह की पत्नी विमलेश सुनीता की चीख सुन कर भागीभागी पहली मंजिल पर जा पहुंची. वहां पति के हाथ में खून से सने गंडासे को देख कर डर गई और उल्टे पांव अपने कमरे में आ कर लेट गई.

सुनीता को मौत के घाट उतारने के बाद वह सीधे दूसरी मंजिल पर जा पहुंचा. संयोग से कृष्णकांत ने अंदर से कुंडी बंद नहीं की थी. अंधेरे में हलकी फैली हुई रोशनी में राव सिंह ने कृष्णकांत और उस के पूरे परिवार को नीचे जमीन पर ही लेटे पाया.

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समय बरबाद नहीं करते हुए सब से पहले कृष्णकांत के सिर पर गंडासे से वार किया. पहला हमला ही इतना जोरदार था कि कृष्णकांत पहले ही वार से अपनी गहरी नींद से जाग ही नहीं पाए. वह बेसुध हो गए.

राव सिंह ने कृष्णकांत पर अपना आपा खोते हुए करीब 7 वार लगातार किए. कृष्णकांत की मौके पर ही मौत हो गई. तब तक थोड़ी दूरी पर सोई अनामिका नींद से जाग गई थी. जख्मी पति को देख कर उस ओर जैसे ही आने की कोशिश की, राय सिंह ने उस के सिर पर भी गंडासे का एक जोरदार वार कर दिया.

तब तक बच्चे जाग गए थे. वे अपने मांबाप को बेसुध हालत में देख कर कहने लगे, ‘‘अंकल माफ कर दीजिए. इन्हें मत मारिए. इन्हें छोड़ दीजिए.’’

तब तक राय सिंह अपना आपा खो चुका था. अनामिका पर एक के बाद एक कई वार करने के बाद बच्चों पर भी गंडासे से हमला बोल दिया और फिर अपने कमरे में आ कर बाथरूम में घुस गया.

इस जघन्य हत्याकांड के बाद राव सिंह बाथरूम में घुस कर नहाया. अपने कमरे में वह पंखे के नीचे बैठा. नए कपड़े पहने और करीब साढ़े 4 बजे उठ कर डेली रूटीन में व्यस्त हो गया. मूकदर्शक बनी जड़वत पत्नी विमलेश को ठहर कर देखा और पार्क की ओर सैर पर निकल पड़ा.

उसी दिन सुबह करीब साढ़े 6 बजे जब वह पार्क से अपने घर लौटा और दोबारा लाशों को जा कर देख आया. फिर हाथ में गंडासा लहराते हुए थाने चला गया. इस बात की पुष्टि बाद में इलाके के 3 सीसीटीवी कैमरों में कैद हो चुकी फुटेज से हुई.

उस के कपड़े और उस औजार पर खून के छींटों की जांच के बाद उस के द्वारा हत्या किए जाने की भी पुष्टि हो गई.

इस हत्याकांड की सुनीता के भाई अशोक यादव ने भी राजेंद्र पार्क पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई. उन्होंने रिपोर्ट में राव राय सिंह के परिवार पर सुनीता से पैसों की मांग का आरोप लगाया. इस कारण वह अकसर सासससुर से झगड़ कर मायके आ जाती थी.

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कथा लिखे जाने तक केस को सुलझाने के लिए गुरुग्राम की राजेंद्र पार्क पुलिस ने हर पहलू को ध्यान में रखते हुए परिवार के सभी सदस्यों के बयान ले लिए थे.

आरोपी राव राय सिंह को न्यायिक हिरासत में ले लिया गया था. इस पूरे हत्याकांड में एकमात्र बची हुई पीडि़त 6 साल की विधि तिवारी की हालत में लिखे जाने तक सुधार हो रहा था. उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भरती करवाया गया था.

तलाक के बाद शादी- भाग 3: देव और साधना आखिर क्यों अलग हुए

एक मवाली हंस कर बोला, ‘‘लो, हीरो भी आ गया.’’ उस ने चाकू निकाल लिया. साधना भी देव को पहचान कर उन बदमाशों से छूट कर दौड़ कर देव से लिपट गई. वह डर के मारे कांप रही थी. देव उसे तसल्ली दे रहा था, ‘‘कुछ नहीं होगा, मैं हूं न.’’

इस से पहले मवाली आगे बढ़ता, तभी पुलिस की एक जीप रुकी सायरन के साथ. पुलिस ने तीनों को घेर लिया. पुलिस अधिकारी ने पूछा, ‘‘आप लोग इतनी रात यहां कैसे?’’

‘‘जी, औफिस में लेट हो गई थी.’’

‘‘और आप?’’

‘‘मैं भी इसी औफिस में हूं. थोड़ा आगेपीछे हो गए थे.’’

साधना जिस तरह देव के साथ सिमटी थी, उसे देख कर पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘‘आप पतिपत्नी को साथसाथ चलना चाहिए.’’

तभी 3 में से 1 मवाली ने कहा, ‘‘वही तो साब, अकेली औरत, सुनसान सड़क. हम ने सोचा कि…’’

इस से पहले कि उस की बात पूरी हो पाती, थानेदार ने एक थप्पड़ जड़ते हुए कहा, ‘‘कहां लिखा है कानून में कि अकेली औरत, सुनसान सड़क और रात में नहीं घूम सकती है. और घूमती दिखाई दे तो क्या तुम्हें जोरजबरदस्ती का अधिकार मिल जाता है.’’

थानेदार ने कहा, ‘‘आप लोग जाइए. ये हवालात की हवा खाएंगे.’’‘‘तुम यहां कैसे?’’ साधना ने पूछा.

‘‘प्रमोशन पर,’’ देव ने कहा.

‘‘और परिवार,’’ साधना ने पूछा.

‘‘अकेला हूं. तुम्हारा परिवार?’’

‘‘अकेली हूं. भाईभाभी के साथ रहती हूं.’’

‘‘शादी नहीं की?’’

‘‘हुई नहीं.’’

‘‘और तुम ने?’’

‘‘ऐसा ही मेरे साथ समझ लो.’’

‘‘औफिस में तो दिखे नहीं?’’

‘‘कल से जौइन करना है.’’

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फिर थोड़ी चुप्पी छाई रही. देव ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘खुश हो तलाक ले कर?’’ वह चुप रही और फिर उस ने पूछा, ‘‘और तुम?’’

‘‘दूर रहने पर ही अपनों की जरूरत का एहसास होता है. उन की कमी खलती है. याद आती है.’’

‘‘लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है.’’

‘‘क्यों, क्या हम दोनों में से कोई मर गया है जो देर होचुकी है?’’

साधना ने देव के मुंह पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘मरें तुम्हारे दुश्मन.’’

न दोनों ने पास के एक शानदार  रैस्टोरैंट में खाना खाया. ‘‘घर चलोगी मेरे साथ? कंपनी का क्वार्टर है.’’

‘‘अब हम पतिपत्नी नहीं रहे कानून की दृष्टि में.’’

‘‘और दिल की नजर में? क्या कहता है तुम्हारा दिल.’’

‘‘शादी करोगे?’’

‘‘फिर से?’’

‘‘कानून, समाज के लिए.’’

‘‘शादी ही करनी थी तो छोड़ कर क्यों गई थी,’’ देव ने कहा.

‘‘औरत की यही कमजोरी है जहां स्नेह, प्यार मिलता है, खिंची चली जाती है. तुम्हारी बेरुखी और मां की प्रेमभरी बातों में चली गई थी.’’

‘‘कुछ मेरी भी गलती थी, मुझे तुम्हारा ध्यान रखना चाहिए था, लेकिन अब फिर कभी झगड़ा हुआ तो छोड़ कर तो नहीं चली जाओगी?’’ देव ने पूछा.

‘‘तोबातोबा, एक गलती एक बार. काफी सह लिया. बाहर वालों की सुनने से अच्छा है पतिपत्नी आपस में लड़ लें, सुन लें. एकदूसरे की.’’

अगले दिन औफिस के बाद वे दोनों एक वकील के पास बैठे थे. वकील दोस्त था देव का. वह अचरज में था,

‘‘यार, मैं ने कई शादियां करवाईं है और तलाक भी. लेकिन यह पहली शादी होगी जिस से तलाक हुआ उसी से फिर शादी. जल्दी हो तो आर्य समाज में शादी करवा देते हैं?’’

‘‘वैसे भी बहुत देर हो चुकी है, अब और देर क्या करनी. आर्य समाज से ही करवा दो.’’

‘‘कल ही करवा देता हूं,’’ वकील ने कहा.

शादी संपन्न हुई. इस बात की साधना ने अपनी मां को पहले खबर दी.

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मां ने कहा, ‘‘हम लोग ध्यान नहीं रख रहे थे क्या?’’

साधना ने कहा, ‘‘मां, लड़की प्रेमविवाह करे या परिवार की मरजी से, पति का घर ही असली घर है स्त्री के लिए.’’

देव ने अपने पिता को सूचना दी. उन्होंने कहा, ‘‘शादी दिल तय करता है अन्यथा तलाक के बाद उसी लड़की से शादी कहां हो पाती है. सदा खुश रहो.’’ और इस तरह शादी, फिर तलाक और फिर शादी.

अनकहा प्यार- भाग 2: क्या सबीना और अमित एक-दूसरे के हो पाए?

दुबई से नौकरी छोड़ कर आमिर ने अपना खुद का व्यापार शुरू कर दिया. बेटे सलीम को पढ़ाई के लिए उसे होस्टल में डाल दिया. सबीना का भी आमिर ने अच्छी तरह ध्यान रखा. उसे खूब प्रेम दिया. लेकिन जबजब आमिर सबीना से कहता कि नौकरी छोड़ दो. सबकुछ है हमारे पास. सबीना ने यह कह कर इनकार कर दिया कि कल तुम्हें कोई और भा गई. तुम ने फिर तलाक दे दिया तो मेरा क्या होगा? फिर मुझे यह नौकरी भी नहीं मिलेगी. मैं नौकरी नहीं छोड़ सकती. इस बात पर अकसर दोनों में बहस हो जाती. घर का माहौल बिगड़ जाता. मन अशांत हो जाता सबीना का.

‘तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं है?’ आमिर ने पूछा.

‘नहीं है,’ सबीना ने सपाट स्वर में जवाब दिया.

‘मैं ने तो तुम पर विश्वास किया. तुम्हें क्यों नहीं है?’

‘कौन सा विश्वास?’

‘इस बात का कि हलाला में पराए मर्द को तुम ने हाथ भी नहीं लगाया होगा.’

‘जब निकाह हुआ तो पराया कैसे रहा?’

‘मैं ने इस बात के लिए 3 लाख रुपए खर्च किए थे. ताकि जिस से हलाला के तहत निकाह हो, वह  हाथ भी न लगाए तुम्हें.’

‘भरोसा मुझ पर नहीं किया आप ने. भरोसा किया मौलवी पर. अपने रुपयों पर, या जिस से आप ने गैरमर्द से मेरा निकाह करवाया.’’

‘लेकिन भरोसा तो तुम पर भी था न.’

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‘न करते भरोसा.’

‘कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे 3 लाख रुपए भी गए और तुम ने रंगरेलियां भी मनाई हों.’ आमिर की इस बात पर बिफर पड़ी सबीना. बस, इसी मुद्दे को ले कर दोनों में अकसर तकरार शुरू हो जाती और सबीना पार्क में आ कर बैठ जाती.

पार्क की बैंच पर बैठे हुए उस की दृष्टि सामने बैठे हुए एक अधेड़ व्यक्ति पर पड़ी. वह थोड़ा चौंकी. उसे विश्वास नहीं हुआ इस बात पर कि सामने बैठा हुआ व्यक्ति अमित हो सकता है. अमित उस के कालेज का साथी. 45 वर्ष के आसपास की उम्र, दुबलापतला शरीर, सफेद बाल, कुछ बढ़ी हुई दाढ़ी जिस में अधिकांश बाल चांदी की तरह चमक रहे थे. यहां क्या कर रहा है अमित? इस शहर के इस पार्क में, जबकि उसे तो दिल्ली में होना चाहिए था. अमित ही है या कोई और. नहीं, अमित ही है. शायद मुझ पर नजर नहीं पड़ी उस की.

अमित और सबीना एकसाथ कालेज में पूरे 5 वर्ष तक पढ़े. एक ही डैस्क पर बैठते. एकदूसरे से पढ़ाई के संबंध में बातें करते. एकदूसरे की समस्याओं को सुलझने में मदद करते. जिस दिन वह कालेज नहीं आती, अमित उसे अपने नोट्स दे देता. जब अमित कालेज नहीं आता, तो सबीना उसे अपने नोट्स दे देती. कालेज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में दोनों मिल कर भाग लेते और प्रथम पुरुस्कार प्राप्त करते हुए सब की वाहवाही बटोरते. जिस दिन अमित कालेज नहीं आता, सबीना को कालेज मरघट के समान लगता. यही हालत अमित की भी थी. तभी तो वह दूसरे दिन अपनत्वभरे क्रोध में डांट कर पूछता. ‘कल कालेज क्यों नहीं आईं तुम?’

सबीना समझ चुकी थी कि अमित के दिल में उस के प्रति वही भाव हैं जो उस के दिल में अमित के प्रति हैं. लेकिन दोनों ने कभी इस विषय पर बात नहीं की. सबीना घर से टिफिन ले कर आती जिस में अमित का मनपसंद भोजन होता. अमित भी सबीना के लिए कुछ न कुछ बनवा कर लाता जो सबीना को बेहद पसंद था. वे अपनेअपने सुखदुख एकदूसरे से कहते. अमित ने बताया कि उस के घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है. घर में बीमार बूढ़ी मां है. जवान बहन है जिस की शादी की जिम्मेदारी उस पर है. अपने बारे में क्या सोचूं? मेरी सोच तो मां के इलाज और बहन की शादी के इर्दगिर्द घूमती रहती है. बस, अच्छे परसैंट बन जाएं ताकि पीएचडी कर सकूं. फिर कोई नौकरी भी कर लूंगा.’’

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सबीना उसे सांत्वना देते हुए कहती, ‘चिंता मत करो. सब ठीक हो जाएगा.

सबीना के घर की उन दिनों आर्थिक स्थिति अच्छी थी. उस के अब्बू विधायक थे. उन के पास सत्ता भी थी और शक्ति भी. कभी कहने की हिम्मम नहीं पड़ी उस की अपने अब्बू से कि वह किसी हिंदू लड़के से प्यार करती है. कहती भी थी तो वह जानती थी कि उस का नतीजा क्या होगा? उस की पढ़ाईलिखाई तुरंत बंद कर के उस के निकाह की व्यवस्था की जाती. हो सकता है कि अमित को भी नुकसान पहुंचाया जाता. लेकिन घर वालों की बात क्या कहे वह? उस ने खुद कभी अमित से नहीं कहा कि वह उस से प्यार करती है. और न ही अमित ने उस से कहा.

अमित अपने परिवार, अपने कैरियर की बातें करता रहता और वह अमित की दोस्त बन कर उसे तसल्ली देती रहती. पैसों के अभाव में सबीना ने कई बार अमित के लाख मना करने पर उस की फीस यह कह कर भरी कि जब नौकरी लग जाए तो लौटा देना, उधार दे रही हूं.

और अमित को न चाहते हुए भी मदद लेनी पड़ती. यदि मदद नहीं लेता तो उस का कालेज कब का छूट चुका होता. कालेज की तरफ से कभी पिकनिक आदि का बाहर जाने का प्रोग्राम होता, तो अमित के न चाहते हुए भी उसे सबीना की जिद के आगे झकना पड़ता. कई बार सबीना ने सोचा कि अपने प्यार का इजहार करे लेकिन वह यह सोच कर चुप रह गई कि अमित क्या सोचेगा? कैसी बेशर्म लड़की है? अमित को पहल करनी चाहिए. अमित

कैसे पहल करता? वह तो अपनी गरीबी

से उबरने की कोशिश में लगा हुआ था. अमित सबीना को अपना सब से अच्छा दोस्त मानता था. अपना सब से बड़ा शुभचिंतक. अपने सुखदुख का साथी. लेकिन वह भी कर न सका अपने प्यार

का इजहार.

प्यार दोनों ही तरफ था. लेकिन कहने की पहल किसी ने नहीं की. कहना जरूरी भी नहीं था. प्यार है, तो है. बीए प्रथम वर्ष से एमए के अंतिम वर्ष तक, पूरे 5 वर्षों का साथ. यह साथ न छूटे, इसलिए सबीना ने भी अंगरेजी साहित्य लिया जोकि अमित ने लिया था. अमित ने पूछा भी, ‘तुम्हारी तो हिंदी साहित्य में रुचि थी?’

‘मुझे क्या पता था कि तुम अंगरेजी साहित्य चुनोगे,’ सबीना ने जवाब दिया.

‘तो क्या मेरी वजह से तुम ने,’ अमित ने पूछा.

‘नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. सोचा कि अंगरेजी साहित्य ही ठीक रहेगा.’

‘उस के बाद क्या करोगी?’

‘तुम क्या करोगे?’

‘मैं, पीएचडी.’

‘मैं भी, सबीना बोली.’

Manohar Kahaniya- किडनैपिंग: चंबल से ऐसे छूटा अपहृत डॉक्टर- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

कार रुकते ही युवती अंजलि कार से उतर गई. 4 युवक दनदनाते हुए कार में घुस आए. उन्होंने डाक्टर को 2 थप्पड़ मारे और उन को कार की पिछली सीट पर बैठा दिया. 2 बदमाश आगे बैठ गए, जबकि 2 बदमाशों ने डाक्टर को पीछे की सीट पर बीच में बैठा लिया.

उन का मोबाइल बदमाशों ने गाड़ी में ही छीन कर बंद कर दिया. उस समय रात के साढ़े 8 बज रहे थे. अंजलि के साथी डाक्टर को ले गए थे चंबल के बीहड़ में उस के साथ ही बदमाशों ने उन की आंखों पर पट्टी बांध दी. डाक्टर इस घटना से बेहद घबरा गए. वे समझ गए कि उन का अपहरण हो गया है. इस बीच अंजलि 2 साथियों के साथ बाइक पर बैठ कर चली गई. रास्ते में एक बदमाश उतर कर चला गया.

बदमाश सैयां से गांव के रास्ते होते हुए 2 घंटे तक गाड़ी चलाते रहे. वे सैयां टोल क्रौस को छोड़ कर इरादत नगर से होते हुए धौलपुर इलाके में चले ले गए. डाक्टर को कार से उतार लिया. बदमाशों के पास हथियार भी थे. डर के कारण डाक्टर जैसा बदमाश कहते रहे, वैसा वे करते रहे.

रात में उन्हें बाइक से एक जगह ले जा कर उन्हें खाना खिलाया. फिर 3-4 किलोमीटर पैदल चलने के बाद बीहड़ में ले आए. डाक्टर को धौलपुर के दिहोली क्षेत्र में चंबल नदी के पास रात भर एक खेत में हाथपैर बांध कर रखा.

डाक्टर को कार से उतारने के बाद बदमाश ने अपने साथी पवन को कार ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी सौंप दी, लेकिन वह पुलिस चैकिंग में पकड़ा गया.

डाक्टर को दिन में बीहड़ में ले जा कर ऊंचे चबूतरे पर हाथ बांध कर बैठा दिया. बदमाशों ने डाक्टर से 5 करोड़ रुपए की फिरौती देने को कहा, वरना उस की मौत निश्चित है.

60 वर्षीय डाक्टर ने बदमाशों से कहा कि वह बीमार हैं, उन का हार्ट का औपरेशन हो चुका है. इतनी रकम उन के पास नहीं है. फिर भी बदमाश धमकाते रहे.

डाक्टर ने कहा कि वह बिना दवा खाए बीमार हो जाएंगे. बाजार से दवा लाने के लिए दवाओं के नाम भी बताए. लेकिन बदमाशों ने दवा ला कर नहीं दी. मांगने पर खाना और पानी दिया. बदमाशों के पास मोबाइल नहीं थे.

वहां की स्थिति देख कर डाक्टर को नहीं लग रहा था कि उन्हें बदमाशों से छुटकारा मिल पाएगा. बदमाश उन्हें लगातार धमका रहे थे. डाक्टर के बहुत कहने पर एक बदमाश दवाई लाने चला गया, जबकि 2 खाने के इंतजाम में पास के गांव में चले गए.

संयोग से एक डाक्टर को छोड़ कर शौच के लिए गया ही था कि तब तक पुलिस अकेले निढाल पड़े डाक्टर को अपने कब्जे में ले कर निकलने में सफल रही.

डाक्टर को अपने प्रेमजाल में फंसाने वाली युवती अंजलि का असली नाम मंगला पाटीदार है. वह महाराष्ट्र के गोंदिया जिले की रहने वाली है.

उस की 16 साल पहले शादी हुई थी. पति और 14 साल के बेटे के साथ भोपाल में रहती थी. वहीं धागा फैक्ट्री में काम करती थी. एक साल पहले हादसे में पति की मौत हो गई. इस के बाद वह महाराष्ट्र चली गई.

बदन सिंह गैंग ने कराया था अपहरण

भोपाल में जिस फैक्ट्री में वह काम करती थी, उसी में मथुरा की एक महिला भी काम करती थी. उस ने काम दिलाने के लिए 4 महीने पहले मथुरा बुलाया था. बेटे को वह मां के पास छोड़ आई थी. मथुरा आने पर सहेली ने बदन सिंह तोमर से उस का परिचय कराया.

बदन सिंह काम दिलाने के नाम पर आगरा लिवा लाया. लगभग एक महीना पहले उस ने आगरा के सदर में नैनाना जाट में किराए पर घर लिया. तब से वह बदन सिंह के साथ यहीं रह रही थी.

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बदन सिंह ने उसे लालच दिया कि वह काम क्या करेगी, एक बार में ही उसे इतने रुपए दिलवा देगा कि जिंदगी आराम से कट जाएगी. वह उस के लालच में फंस गई और डाक्टर के अपहरण की सूत्रधार बन गई. वह गैंग के सरगना बदन सिंह तोमर के लिए काम कर रही थी. उसे इस काम के लिए 25 हजार रुपए देने की बात कही गई थी.

अपहरण के बाद युवती को गैंग ने ठिकाने लगाने की साजिश रच रखी थी. संयोग से पुलिस ने उसे पकड़ लिया. इस से अंजान युवती बदमाश के साथ बाइक पर सवार हो चल दी थी. यह बात तब सामने आई, जब धौलपुर पुलिस के सिपाही दयालचंद ने युवती को पकड़ा. युवती का बाइक सवार साथी भाग गया, लेकिन उस का मोबाइल गिर गया. मोबाइल पर कुछ देर बाद फोन आया. सिपाही ने आवाज बदल कर बात की.

काल करने वाला बोला, ‘‘कहां रह गया, जल्दी आ जा. लड़की को बीहड़ में ले कर आना. उसे ठिकाने भी लगाना है. रात में ही ये काम करना है.’’

हनीट्रैप में डा. उमाकांत गुप्ता को फंसा कर उन का अपहरण करने वाले गैंग का सरगना बदन सिंह तोमर पुलिस के हाथ नहीं आ रहा था. उस की गिरफ्तारी के लिए पुलिस चंबल के किनारे स्थित गांवों में दबिश दे रही थी.

इसी दौरान पुलिस की मेहनत रंग लाई और 21 जुलाई की रात को एक लाख के ईनामी बदमाश बदन सिंह तोमर और उस के साथी अक्षय उर्फ चंकी पांडे को पुलिस ने गांव कछूपुरा में मुठभेड़ में मार गिराया.

पकड़े गए साथी पवन के अनुसार बदन सिंह तोमर उस का दोस्त था. बदन सिंह तोमर ने डा. गुप्ता का अपहरण पूरी तैयारी के साथ कराया था. वहीं डकैत केशव गुर्जर अपहरण करने के लिए कुख्यात है. कहने को धौलपुर पुलिस उसे 2 बार गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है. लेकिन पिछले 4 साल से वह धौलपुर व आगरा की पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ है.

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2017 में डा. निखिल का अपहरण बदन सिंह तोमर ने ही किया था. यह पकड़ केशव गुर्जर को सौंप दी थी. उस ने ही फिरौती वसूली थी. डा. निखिल के अपहरण के मामले में बदन सिंह जेल गया था. पुलिस ने सभी आरोपियों से पूछताछ करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

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