Holi Special: अधूरी चाह- भाग 1

चलिए, आप को संजय चावला से मिलाते हैं… आज से 25 साल पहले का संजय चावला.

संजय के पापा नौकरी करते हैं. एक बड़ा भाई, जिस की अपने ही घर के बाहर किराने की दुकान है. घर के बाहर के हिस्से में 3 दुकानें हैं. पापा ने पहले से ही 3 दुकानें बनाईं, तीनों बेटों के लिए.

छोटा बेटा अभी पढ़ रहा है. बड़े बेटे की शादी हो गई है. अब संजय का नंबर आया है, हजारों लड़कियां उस पर मरती थीं, एक से एक हसीना उस के कदमों में दिल बिछा देती थीं, उस की एक ?ालक पर ही लड़कियां तड़प उठती थीं, उस के साथ न जाने कितने सपनों के तानेबाने बुनतीं, लेकिन उस की भाभी को उस के लिए कोई लड़की नहीं जंचती.

अरे भई, कैसे जंचेगी? कोई संजय जैसी ही मिले तब न. संजय का गोराचिट्टा रंग, तीखे नैननक्श, आंखें ऐसीं जैसे नशा हो इन में, जो देखे बस खो जाए इन नशीली आंखों में. लंबा कद, चौड़ा सीना, होंठों के ऊपर छोटीछोटी बारीक सी मूंछें, चाल में गजब का रोबीलापन और स्वभाव जैसे हंसी बस इन्हीं की गुलाम हो. जी हां साहब, एकदम हंसमुख स्वभाव… ऐसे हैं संजय चावला.

बड़ी मशक्कत के बाद एक कश्मीर की कली भा गई संजय साहब को. क्यों न भाए कश्मीर की जो ब्यूटी है. शालिनी नाम है. नाम से मेल खाता स्वभाव. शालीन सी, बला की खूबसूरती जिसे देखते ही संजय साहब अपना दिल हार बैठे थे. बस, ?ाट से हां बोल दी शादी के लिए.

अरेअरे, कोई शालिनी से तो पूछो कि वह क्या चाहती है, लेकिन नहीं, कोई पूछने की जरूरत नहीं. उस का तो एक ही फैसला है कि जो मम्मीपापा कहेंगे, वही ठीक है.

बस तो चट मंगनी और पट ब्याह वाली बात हो गई. शादी के बाद जिम्मेदारी बढ़ गई. पहले दोनों भाई इसी एक ही किराने की दुकान पर बैठते थे, लेकिन अब संजय को लगा कि खर्चे बढ़े हैं, मगर आमदनी नहीं. तो उस ने भी नौकरी करने के बारे में सोचा. नौकरी भी अच्छी मिल गई. घरपरिवार में सब मिलजुल कर रहते हैं. इस बात को 8 साल बीत गए.

बड़े भाई सुनील के भी 2 बच्चे हैं और संजय के भी 2 बच्चे हैं. छोटे भाई  संदीप की भी शादी हो गई. परिवार भी बढ़े और खर्चे भी. मम्मीपापा भी नहीं रहे. अब तक तो बहुत प्यार था परिवार में, लेकिन कहते हैं न कि प्यार भी पैसा मांगता है, पेट भी पैसा मांगता है, पैसे बिना प्यार बेकार लगता है और प्यार से पेट भी नहीं भरता.

संजय ने कश्मीर में नौकरी तलाश की, तो दिल्ली से अच्छी नौकरी उसे कश्मीर में मिल गई और वह अपनी फैमिली के साथ कश्मीर शिफ्ट हो गया.

एक तो पहले से इतना हैंडसम, उस पर कश्मीर की आबोहवा में संजय और भी कातिल हो गया. जहां से निकलता, न जाने कितने दिलों पर छुरियां चलती थीं, कितने दिल घायल होते थे.

संजय परिवार को ले कर कश्मीर चला तो गया, लेकिन भाइयों से दूर रह नहीं सकता था. अकसर 4-6 महीने बाद जरूर मिलने आता और 10-15 दिन यहीं रहता.

लेकिन जब भी आता, महल्ला तो क्या जिसे भी पता चलता कि संजय आया है, सब लड़कियां, जिन की शादी भी हो चुकी थी, फिर भी संजय की एक ?ालक पाने के लिए किसी न किसी बहाने कोई संजय के घर और कोई उस के भाई की दुकान पर आती, ताकि संजय की एक ?ालक मिल जाए.

यह बात संजय भी अच्छे से जानता था और मन ही मन इतराता था, लेकिन आज संजय को दिल्ली आए 8 महीने हो चुके हैं. शुरू में 2 दिन तो बहुत ही औरतें आईं संजय की ?ालक पाने के बहाने (जी हां औरतें, क्योंकि संजय को कश्मीर गए अब तक 17 साल बीत चुके हैं). इन 17 सालों में ऐसा नहीं कि संजय दिल्ली नहीं आया या कभी वे लड़कियां संजय को देखने के बहाने नहीं आईं, मगर अब तक वे सब औरतें बन चुकी हैं न. दोस्तो, तकरीबन संजय और उन सब की उम्र (जो संजय पर मरती थीं) 45 से 50 साल के बीच है, तो औरतें ही कहेंगे न.

हां, तो अब बस 2 ही दिन औरतें आईं उस की ?ालक पाने को, लेकिन अब नहीं आतीं वे, क्योंकि उन से संजय का उतरा हुआ चेहरा देखा नहीं जाता. वे संजय को इस तरह हारा हुआ बरदाश्त नहीं कर पा रहीं, लेकिन फोन पर संजय से बात कर के उसे ढांढ़स बंधा रही हैं, उसे अपनी परेशानी से बाहर निकलने का रास्ता बताती हैं, उसे नई राह पर चलने की सलाह देती हैं, उसे अपने हक के लिए लड़ना सिखाती हैं, क्योंकि संजय ने कभी परिवार में किसी भी चीज को ले कर मेरातेरा किया ही नहीं, वह सबकुछ छोड़ कर कश्मीर चला गया था. वहां उस की अच्छी नौकरी थी, उस ने यहां से पुश्तैनी जायदाद पर कोई हक कभी जताया ही नहीं था. लेकिन आज उसे हक जताने की जरूरत है. आज हक जताने की मजबूरी है, लेकिन फिर भी भाई के सामने उस की बोलने की हिम्मत नहीं होती, इसलिए सब उसे अपने हक के लिए बोलने को कहते हैं.

संजय का कश्मीर में सबकुछ खत्म हो गया है, इसलिए अब वह भाइयों से पुश्तैनी जायदाद में अपना हिस्सा ले कर नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत करना चाहता है.

लेकिन ऐसा क्यों? जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है? ऐसा क्या हुआ संजय के साथ कि उस का खिलता चेहरा मुर?ा गया? ऐसा क्या हुआ, जो उसे भाई से आज इतने सालों बाद अपना हक मांगना पड़ा?

सुनिए, संजय की दर्दभरी दास्तां…

जब संजय ने कश्मीर शिफ्ट किया था, उस की अच्छीभली गृहस्थी चल रही थी, लेकिन कुछ ही समय बाद तकरीबन 4 साल के बाद एक बुरी छाया मंडराई परिवार पर.

जी हां, जब कोई मुसीबत आएगी तो बुरी छाया का मंडराना ही कहेंगे. शालिनी को लगाव हो गया किसी से यानी प्यार हो गया.

अजीब लग रहा है न सुन कर, लेकिन यही सच है. तकरीबन 32-33 साल की शालिनी और इसी उम्र का ही अजय श्रीवास्तव, जो शालिनी के घर से तकरीबन 200-250 मीटर की दूरी पर ही रहता था.

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Holi Special: अधूरी चाह

गहरी पैठ: मजदूर और वोटबैंक

पंजाब ने आज से नहीं, जब से कृषि क्रांति हुई है बिहार और उत्तर प्रदेश के बेरोजगारों को अपने यहां भरपूर काम दिया है. इस बार इन मजदूरों का नाम ले कर मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के एक बयान को ले कर प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और पूरी भाजपा उत्तर प्रदेश व बिहार के पंजाब में बसे मजदूरों को बहकाने में जुट गई. इन्हीं मजदूरों के वोटों पर अरविंद केजरीवाल की नजर है और चरणजीत सिंह चन्नी ने भैय्यों को पंजाब न आने दें का जो तंज कसा था वह केजरीवाल और योगी जैसों को पंजाब पर राज करने की कोशिश से रोकने का था.
बड़ा सवाल तो यह है कि पंजाब, दिल्ली या देश के दूसरे हिस्सों में उत्तर प्रदेश व बिहार के लोग भरभर कर जाते क्यों हैं? इसलिए रामचरित मानस से प्रभावित इन इलाकों की पिछड़ी जातियों की जनता को धर्म के नाम पर जम कर लूटा है. यहां आज भी एक तरह की छिपी हुई जमींदारी चल रही है जिस में हर ओहदेदार अपने को छोटामोटा राजा या महापुरोहित मानता है जिस का आदेश पिछड़ी जातियों के लोगों को मानना ही होगा चाहे वे पढ़लिख भी गए हों.
इस इलाके में, जिसे गौपट्टी कहा जाता है, मंदिर बनाए जा रहे हैं, कारखाने नहीं. यहां से गुजर कर चले जाने लायक सड़कें बनी हैं, यहां के रहने वालों की बस्तियों में नहीं. यहां स्कूल खुले हैं पर हर जाति, उपजाति के लिए अलग. यहां मंदिर बेशुमार हैं पर हर जाति के लिए अलग. पिछड़ों को ऊंचों के देवीदेवता छूने तक नहीं दिए जाते. इन पिछड़ी जातियों को तो ऊंचों के धर्म के नाम पर दूसरों का सिर फोड़ने के लिए इस्तेमाल किया गया है.
अब भी इस सवाल का जवाब नहीं दिया जा रहा कि आखिर उत्तर प्रदेश, बिहार के भैय्ये पंजाब आ क्यों रहे हैं? महान भगवाधारी या तिलकधारी पूजापाठ से बिहार व उत्तर प्रदेश में चमत्कार करा कर पंजाब जैसी खुशहाली क्यों नहीं पैदा कर पा रहे? इस पूजापाठ का लाभ क्या जब लाखों बेकार हों. जहां 36,000 नौकरियों के लिए सवा करोड़ आवेदन आखिर हुए क्यों?
इस की बड़ी वजह है कि इन पिछड़ों को आज भी ढंग से पढ़ाया नहीं जा रहा. गांवगांव में स्कूल खोले गए हैं पर इन पर तिलकधारी शिक्षकों का कब्जा है जो मानते हैं कि पौराणिक आदेश है कि पिछड़े और दलित पढ़ नहीं पाएं चाहे वह वेद हो, महाभारत हो या इतिहास और विज्ञान. यहां जो हिंदी पढ़ाई जाती है उस में संस्कृत शब्द ठूंस दिए गए हैं. ऊंचों के लिए इंगलिश मीडियम कहे जाने वाले स्कूल खोल दिए गए हैं जहां तिलकधारियों के बच्चे पढ़ने जाते हैं, ताकि पिछड़े बस उतना पढ़ें कि कमाने दिल्ली, मुंबई और पंजाब जा कर छोटामोटा हुनर का काम कर सकें और जानवरों की तरह गंदी बस्तियों में रह सकें.
चुनावी दिन हैं इसलिए भैय्यों की बात भी हो गई वरना देश के आकाओं, यहां तक कि उसी जमात से आने वाले नीतीश कुमार तक के पास पिछड़ों का सामाजिक, शैक्षिक, पारिवारिक स्तर उठाने की फुरसत नहीं है.

मसला: पौराणिक जीवियों के विरोध में मुखरता की कमी

 शैलेंद्र सिंह

सिस्टम में बदलाव के लिए राजनीतिक सत्ता जरूरी होती है. राजनीतिक सत्ता को बनाए रखने के लिए विचारों की शुद्धता से समझौता करना पड़ता है. विचारों को बनाए रखते हुए सत्ता को बहुत लंबे समय तक बैलैंस नहीं रखा जा सकता है. ऐसे में कई बार दूसरे विचारों को अपनाने का दिखावा किया जाता है और मतलब निकल जाने पर दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देने को राजनीतिक चतुराई कहा जाता है.

यह कड़वा सच है, जिस की हकीकत जान कर भी उस की धोखेबाजी की बुराई तो दूर बात भी नहीं की जाती. इसे सहज घटना की तरह लिया जाता है मानो यह बेईमानी तो धर्म से एप्रूव्ड है.

पौराणिक कथाओं तक में ऐसी कहानियों को बारबार दोहराया गया है, जिस की वजह से ऐसे कामों को गलत भी नहीं माना जाता है.

हिंदू पौराणिकजीवियों के सताए गए लोग भी पौराणिक कथाओं और नियमों में विश्वास करने लगे हैं, क्योंकि उन को समझाने के लिए कोई मीडिया या मंच नहीं है.

इस समुद्र मंथन की कहानी ऐसी ही एक पौराणिक कथा है, जिस के जरीए आज के हालात को समझाने की कोशिश करते हैं.

एक समय की बात है. राजा बलि के राज्य में दैत्य, असुर व दानव बहुत ज्यादा ताकतवर हो उठे थे. उन को असुरों के गुरु शुक्राचार्य से तमाम ताकतें हासिल हो गई थीं. दुर्वासा ऋषि के शाप से देवराज इंद्र कमजोर हो गए थे. दैत्यराज बलि का राज तीनों लोकों पर हो चुका था. इंद्र समेत सभी देवता उस से डरे रहते थे.

इस बात से दुखी देवता विष्णु के पास पहुंचे और उन को अपनी परेशानी सुनाई. तब विष्णु ने कहा कि यह तुम लोगों के लिए संकट का समय है. दैत्यों, असुरों व दानवों का दबदबा हो रहा है और तुम लोगों के लिए संकटकाल को दोस्ती के भाव से बिता देना चाहिए. तुम दैत्यों से दोस्ती कर लो और क्षीरसागर को मथ कर उस में से अमृत निकाल कर पी लो.

दैत्यों की मदद से यह काम आसानी से हो जाएगा. इस काम के लिए उन की हर शर्त मान लो और अपना काम निकाल लो. अमृत पी कर तुम अमर हो जाओगे और तुम में दैत्यों को मारने की ताकत आ जाएगी.

इस के बाद इंद्र ने समुद्र मंथन से अमृत निकालने की बात बलि को बताई. दैत्यराज बलि ने देवराज इंद्र से समझौता कर लिया. समुद्र मंथन की तैयारियों में ही देवताओं ने चतुराई दिखानी शुरू कर दी.

वासुकी नाग को मुंह की ओर से पकड़ते समय देवताओं ने ऐसा दिखावा किया, जैसे वही ताकतवर हैं. यह बात दैत्य, असुर, दानवों को अपना मजाक लगी. इन लोगों ने देवताओं से कहा कि हम किसी से ताकत में कम नहीं हैं. हम मुंह की ओर की जगह लेंगे.

तब देवताओं ने वासुकी नाग की पूंछ की ओर की जगह ले ली. समुद्र मंथन से जो निकला, वह देवता और दानव आपस में बांटने लगे. अच्छीअच्छी चीजों पर देवताओं ने कब्जा किया, बाकी चीजें दानवों को दे दीं.

जब अमृत कलश सामने आया, तो आपस में लड़ाई होने लगी. दोनों ही पक्ष इस पर अपना हक चाहते थे. जब देवता हारने लगे, तब एक बार ही छल का इस्तेमाल किया गया. देवताओं की निराशा को देख कर विष्णु ने तत्काल बहुत सुंदर कामुक युवती का मोहिनी रूप धर लिया और लड़ते दैत्यों के पास जा पहुंचे.

विष्णु को विश्वमोहिनी रूप में देख कर देत्य व देवताओं की तो बात ही क्या स्वयं ब्रह्मज्ञानी, कामदेव को भस्म कर देने वाले शंकर भी मोहित हो कर उन की ओर बारबार देखने लगे. जब दैत्यों ने उस नवयौवना सुंदरी को अपनी ओर आते देखा, तब वे अपना सारा झगड़ा भूल कर उसी सुंदरी की ओर एकटक देखने लगे.

विश्वमोहिनी बने विष्णु ने अमृत का बंटवारा कुछ इस तरह किया कि सारा का सारा देवताओं को मिल गया. अमृत कलश ले कर देवताओं और दैत्यों को अलगअलग लाइन में बैठने के लिए कहा. उस के बाद दैत्यों को अपने कटाक्ष से मदहोश करते हुए देवताओं को अमृतपान कराने लगे.

दैत्य उन के कटाक्ष से ऐसे मदहोश हुए कि अमृत पीना ही भूल गए. इस तरह देवताओं को अमृत पिला कर विष्णु वहां से लोप हो गए. उन के लोप होते ही दैत्यों की मदहोशी खत्म हो गई. वे गुस्सा हो देवताओं पर हमला करने लगे. भयंकर देवासुर संग्राम शुरू हो गया, जिस में देवराज इंद्र ने दैत्यराज बलि को हरा कर अपना इंद्रलोक वापस ले लिया.

ऐसे खो गई विचारधारा

भारत की राजनीति में भी ऐसी तमाम कहानियां हैं, जहां वोटों के लिए दलित और पिछड़ों का इस्तेमाल किया गया. वोट हासिल करने के बाद उन को इस हालत में पहुंचा दिया गया कि वे अपनी ताकत खो कर दूसरों के मुहताज हो गए.

80 के दौर में दलित चिंतन में कांशीराम का नया विचार आया कि सत्ता के जरीए सिस्टम को बदलना होगा. कांशीराम ने बामसेफ की जगह पर बसपा यानी बहुजन समाज पार्टी को शुरू किया. इसी दौर में राम मंदिर आंदोलन आगे बढ़ा, मंडल कमीशन लागू हुआ, समाज में उथलपुथल का दौर चला. दलितपिछड़ों के सामने पौराणिक विचारधारा कमजोर पड़ने लगी. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने ‘मिले मुलायमकांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ का नारा दे कर सत्ता पर कब्जा किया. ऐसा लगा कि सत्ता के जरीए सिस्टम बदलने के लिए दलितपिछड़े एक मंच पर आ गए हैं.

उत्तर प्रदेश में उस समय सरकार चला रहे समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों को रोकने के लिए अयोध्या में गोली चलवाई. इस के बाद मुलायम सिंह यादव को ‘मुल्ला मुलायम’ कहा जाने लगा. अब धर्म की राजनीति और राम मंदिर आंदोलन का विरोध पूरी ताकत से हो रहा था.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में सब को हरा कर सपाबसपा गठबंधन की सरकार बनी. उस दौर में यह साफ  दिख रहा था कि जातीय जागरूकता ने धर्म की राजनीति को हाशिए पर धकेल दिया है. अयोध्या की सरयू नदी में कुछ ही पानी बहा होगा कि सपा और बसपा जैसे दल धर्म के विरोध की राजनीति को छोड़ कर सत्ता की राजनीति पर उतर आए और धर्म का विरोध करना छोड़ दिया.

बसपा नेता मायावती धर्म का विरोध करते हुए कहती थीं, ‘हिंदू देवीदेवताओं की जो मूर्तियां खुद अपनी रक्षा नहीं कर पातीं, वे जनता की रक्षा क्या कर पाएंगी?’

कांशीराम खुद भी कहते थे कि पौराणिक विचारधारा नीबू के रस की तरह होती है. जैसे एक बूंद नीबू का रस पूरे दूध को फाड़ सकता है, वैसे ही पौराणिक विचारधारा के समर्थन की राजनीति होने लगी. मायावती ने मनुवादी भाजपा की मदद से 3 बार मुख्यमंत्री की कुरसी हासिल की.

साल 2007 में जब बसपा अपने बल पर जीत कर बहुमत से सत्ता में आई, तो इस का श्रेय ‘दलितब्राह्मण एकता’ वाले सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को दिया गया. 1990 के बाद मंडल कमीशन का असर देश की राजनीति पर कमजोर होने लगा और धर्म की राजनीति का असर बढ़ने लगा.

हर दल का नेता अयोध्या जा कर माथा टेकने लगा. 2014 के बाद तो अयोध्या में बौद्ध धर्म भी आडंबर का विरोध दिखावे भर तक सीमित रह गया. 6 दिसंबर को मसजिद के शहीद होने को होने वाले कार्यक्रम फकत तमाशाई बन कर रह गए. कई संगठन, जो अयोध्या को अछूत मान कर दूरी बनाए हुए थे, अयोध्या की भक्ति में डूब गए. अयोध्या की ब्रांडिंग का जरीया बनने लगे.

हिंदू पौराणिकजीवियों के सताए लोग भी पौराणिक कथाओं और नियमों में विश्वास करने लगे, क्योंकि उन के लिए पौराणिक कथाओं से मुकाबला करना आसान नहीं रह गया. बसपा के विचार खत्म हो गए, तो उस का जनाधार भी खो गया और वह सत्ता से दूर हो गई.

‘गैस्ट हाउस कांड’ को भूल कर मायावती ने समाजवादी पार्टी से समझौता किया. इस के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ, तो वापस अपनी जगह आ गईं. भाजपा के विरोध का स्वर नरम पड़ गया. अब दलित बसपा से ज्यादा भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया है.

इस्तेमाल किया और छोड़ा

मायावती कोई अकेली नेता नहीं हैं, जिन को पौराणिक विचारधारा ने इस्तेमाल किया और जब वह किसी काम के नहीं रह गए, तो उन को छोड़ दिया. ऐसे नेताओं की लंबी लिस्ट है. दलित नेताओं में एक बड़ा नाम रामविलास पासवान का था. रामविलास पासवान ऐसे नेता थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री वीपी सिंह, एचडी देवेगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, डा. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी सब के मंत्रिमंडल में प्रमुख मंत्री के रूप में काम किया था.

राम विलास पासवान का जन्म बिहार के खगरिया जिले के शाहरबन्नी गांव में हुआ था. वे एक अनुसूचित जाति परिवार में पैदा हुए थे.

रामविलास पासवान ने 2 शादियां की थीं. पहली शादी राजकुमारी देवी से हुई थी. पहली पत्नी राजकुमारी देवी से उषा और आशा 2 बेटियां हैं. बाद में उन्होंने पहली पत्नी को तलाक दे दिया. इस के बाद अमृतसर की रहने वाली एयरहोस्टेस और पंजाबी हिंदू रीना शर्मा से शादी की. उन से एक बेटा और एक बेटी हैं. उन के बेटे चिराग पासवान लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं. रामविलास पासवान 9 बार लोकसभा सांसद और 2 बार राज्यसभा सांसद रहे थे.

रामविलास पासवान ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत दलितों के अधिकार और सम्मान को ले कर की थी. साल 1983 में उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए दलित सेना का गठन किया. जनता दल और जनता दल (यूनाइटेड) से अलग हो कर लोक जनशक्ति पार्टी का गठन किया. इस के बाद वह भाजपा की अगुआई वाले राजग का सदस्य हो कर रह गए.

साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले ही बीमारी की हालत में रामविलास पासवान की मौत हो गई. पार्टी की कमान बेटे चिराग पासवान के हाथ आई. बिहार के चुनाव में पिता की तरह उन्होंने भाजपा का साथ दिया. भाजपा ने जनता दल (यूनाइटेड) नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और चिराग पासवान के बीच दूरियां बढ़ाने का काम किया.

बिहार चुनाव में हार के बाद चिराग पासवान और उन की पार्टी लोक जनशक्ति दोनों ही बिहार की राजनीति में अलगथलग पड़ गए.

रामविलास पासवान ने दलित राजनीति से अपना कैरियर शुरू किया और फिर सत्ता के लिए समझौता कर के कुरसी पर बने रहे. विचारधारा छोड़ने के बाद उन का जनाधार सिमट गया. वे उस पार्टी के पीछे चलने को मजबूर रहे, जिस के खिलाफ चुनाव लड़ने का काम किया करते थे.

पौराणिक विचारधारा ने रामविलास पासवान का इस्तेमाल कर उन के आधार को खत्म कर दिया. रामविलास पासवान के बाद उन की पार्टी गुम हो गई है.

न इधर के रहे न उधर के

दलित नेताओं में एक बड़ा नाम डाक्टर उदित राज का लिया जाता है. वे भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर उत्तरपश्चिम दिल्ली के सांसद बने थे.

उदित राज भी दलित राजनीति के सहारे आगे बढ़े थे. एससीएसटी संगठनों के अखिल भारतीय संघ के वे राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे.

इस के पहले साल 1988 में उदित राज को भारतीय राजस्व सेवा के लिए चुना गया था. एमए और एलएलबी की डिगरी लेने के साथ ही साथ अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय से उन्हें मानद उपाधि मिली थी. डाक्टर उदित राज की पत्नी का नाम सीमा राज है. उन के एक बेटा और एक बेटी हैं.

साल 2003 में डाक्टर उदित राज ने भारत सरकार की सभी सेवाओं से इस्तीफा दे दिया और ‘इंडियन जस्टिस’ नाम की पार्टी बनाई. उदित राज हमेशा की तरह अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य वंचित वर्गों के लिए लड़ते रहे.

उत्तर प्रदेश में मायावती के विकल्प के रूप में खुद को पेश करने के लिए उन्होंने ‘इंडियन जस्टिस’ पार्टी बनाई. जब कामयाबी नहीं मिली, तो दलित विचारधारा छोड़ पौराणिक विचारधारा के साथ हो लिए.

साल 2014 में डाक्टर उदित राज भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. साल 2014 में उत्तरपश्चिम दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र से आम आदमी पार्टी की राखी बिड़ला को हराने के बाद वे 16वीं लोकसभा में सांसद चुने गए.

सत्ता के लिए विचारधारा छोड़ने के बाद डाक्टर उदित राज का जनाधार खत्म हो गया. तब भाजपा ने उन को साल 2019 में निकाल दिया. डाक्टर उदित राज फिर से दलितों की लड़ाई लड़ने का दम भरने लगे, पर अब उन की पहले जैसी साख नहीं रही.

ऐसे नेताओं की लिस्ट में दलित नेता रामदास अठावले, ‘अपना दल’ की नेता अनुप्रिया पटेल के नाम भी शामिल हैं. समय के साथसाथ भाजपा की अगुआई वाले राजग में इन का कद इस कदर छोटा हुआ है कि अब रोटी, कपड़ा और मकान के लिए सरकार के आगे हाथ फैलाने को मजबूर हैं.

उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर को उत्तर प्रदेश सरकार से बाहर जाना पड़ा. योगी सरकार भी ओमप्रकाश राजभर के जनाधार को खत्म करने की योजना बना रही है. ऐसे तमाम दलित नेता भी अपनी विचारधारा को छोड़ कर पौराणिक विचारधारा के साथ जा खड़े हुए हैं. दलित नेताओं के ऐसे फैसलों से दलितों को बेहद नुकसान हुआ है.

समाज का हुआ नुकसान

पौराणिक विचारधारा ने केवल राजनीति को ही नेस्तनाबूद करने का काम नहीं किया है, बल्कि समाज को भी नुकसान पहुंचाया है. विचारों की लड़ाई को पूरी तरह से खत्म कर दिया. कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म करने के समय यह कहा गया कि इस से पूरे देश के लोग कश्मीर में जमीन खरीद सकेंगे.

देशभर के लोगों में खुशी की लहर उठने लगी. बिना सोचेसमझे लोग सोशल मीडिया पर कश्मीर में जमीन का टुकड़ा खरीदने को ले कर खुश होने लगे. धारा 370 को खत्म करने के बाद आज तक वहां के हालात सामान्य नहीं हुए हैं. बाहर के लोगों को तो छोड़ दें, वहां के रहने वाले भी पहले की तरह खुशहाली से नहीं रह पा रहे हैं.

ठीक इसी तरह अयोध्या में राम मंदिर बनाते समय यह कहा गया कि सभी जातियों के लोगों का यह मंदिर है. जब अयोध्या में राम मंदिर ट्रस्ट बना, तो उस में सब से बड़ी संख्या में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लोग शामिल हुए. राम मंदिर बनाने के लिए चंदा हर किसी से लिया जा रहा है. मंदिर के संचालन का काम केवल कुछ खास लोगों तक ही सीमित रहेगा.

पौराणिक विचारधारा की सब से बड़ी खासीयत यही है कि वह अपना काम निकालने के लिए हर जाति और धर्म की बात करती है, पर जैसे ही काम निकल जाता है, वह केवल अपने हित पर काम करती है.

समुद्र मंथन से ले कर दलित नेताओं के इस्तेमाल तक इस बात को देखा और समझा जा सकता है. चुनावी दौर की बात करें, तो वह भी सत्ता के लिए समुद्र मंथन सा होता है, जहां हर किसी के हक की बात होती है.

चुनाव में महंगाई कम करने, भ्रष्टाचार खत्म करने, रोजगार देने और देश के विकास की बात होती है. सत्ता पाने के बाद ये काम नहीं होते. जनता को किसी न किसी तरह बहकाने का काम किया जाता है. पौराणिक विचारधारा में आम लोगों को धर्म के नाम पर बेवकूफ  बनाया जाता है.

धर्म के नाम पर चंदा लिया जाता है. इस से मंदिर और उस से जुड़े लोगों का विकास होता है, भक्तों का केवल नुकसान होता है. यह बात नहीं बताई जाती है.

भक्ति की आड़ में दलित राजनीति की ही तरह से आरक्षण को बेदम किया जा रहा है. सरकार जिस तरह से खेती का निजीकरण करने वाले कृषि कानून ले कर आई है, उस से गरीब को और भी गरीब बनाना है, जिस से वह सरकार को वोट दे कर मिलने वाली सब्सिडी और नकद सहायता राशि पा कर खुश होते रहें. जैसे 500 रुपए महीने की ‘किसान सम्मान निधि’ पा कर किसान खुश हो रहे हैं. यह राशि तभी तक है, जब तक किसानों से काम है. उस के बाद किसानों की हालत भी दलित नेताओं की तरह से हो जानी है.

औरतों पर भक्ति की मार

पौराणिक विचारधारा की सब से ज्यादा मार औरतों पर ही पड़ती है. पौराणिक विचारधारा ने औरतों को गुलाम बना लिया है. ऐसे में हर राजनीतिक दल उन्हें संरक्षण नहीं देता है. समझने के लिए देखें, तो भाजपा की मोदी सरकार ने मुसलिम औरतों को राहत देने के लिए ‘तीन तलाक कानून’ में सुधार का काम किया, पर हिंदू धर्म की औरतों के लिए कुछ भी नहीं किया.

हिंदू औरतों के सब से ज्यादा मुकदमे फैमिली कोर्ट में लंबित हैं. सालोंसाल औरतें भटकती रहती हैं. औरतों को ले कर किसी तरह के रोजगार का अलग से प्रावधान नहीं किया गया. केवल कैरियर के लिहाज से नहीं, घरगृहस्थी को सही ढंग से चला सकें, उस के लिए भी कोई योजना नहीं बनाई गई. रसोई गैस के सिलैंडर महंगे हो रहे हैं. बच्चों की स्कूल की फीस महंगी हो गई है. गृहस्थी की गाड़ी चलाना मुश्किल हो गया है. औरतों के नाम पर नाममात्र की प्रौपर्टी है.

भक्ति की मार का ही असर है कि आज भी औरतें बेटा और बेटी में फर्क करती हैं. वे आईवीएफ तकनीक अपना कर बेटे ही पैदा करना चाहती हैं. मंगलसूत्र पहने रहती हैं. करवाचौथ का व्रत वही करती हैं. विधवा या परित्यक्ता होने पर अपने भाग्य को दोष देती हैं, मर्द को नहीं. अंधविश्वास में पड़ कर धर्म के बनाए चक्र में वे पिसती रहती हैं.

त्याग की कमी

धर्म और आडंबर के प्रचार और विरोध की शुरुआत को देखें तो लगता है कि साल 1990 में पहले धर्म के विरोध का जो लैवल था, वह धीरेधीरे कमजोर पड़ने लगा. इस में बामसेफ और वामपंथी दलों के विचारों का कमजोर पड़ना सब से प्रमुख रहा.

भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर आंदोलन के सहारे पौराणिक कथाओं और नियमों का जिस तरह से प्रचार करना शुरू किया, विरोध के स्वर कमजोर पड़ने लगे. पहले राजनीतिक दलों में विचारधारा को ले कर भ्रम पैदा हुआ, फिर सामाजिक संगठन इस का शिकार हुए. धीरेधीरे मीडिया में भी धर्म के आडंबर का विरोध खत्म हो गया. मीडिया में धर्म का प्रचार हावी होता गया. प्रिंट के मुकाबले इलैक्ट्रौनिक चैनलों ने धर्म के प्रचार को बढ़ावा देने का काम किया.

पौराणिक कथाओं का महिमामंडन शुरू हुआ. स्वर्ण की सीढि़यां, पुनर्जन्म, मंदिरों की कहानियों के जरीए धर्म का बखान दिनरात किया जाने लगा. इस के बाद बाबाओं के प्रवचन और पौराणिक कथाओं को टीवी सीरियल के रूप में पेश किए जाने का काम शुरू हुआ.

एक तरफ जहां धर्म का प्रचार करने में पैसा था, तो वहीं दूसरी तरफ धर्म और आडंबर का विरोध करने वाले माली रूप से टूटते जा रहे थे. जैसे नशे का प्रचार करने वाले आबकारी विभाग के पास बहुत पैसा होता है और नशे का विरोध करने वाले मद्य निषेध विभाग के पास पैसे की कमी होती है. इस वजह से वे अपने कार्यक्रमों को पूरा नहीं कर पाते हैं. धर्म और आडंबर का विरोध करने वालों की हालत भी उसी तरह से हो गई. पैसे की कमी में यह लड़ाई कमजोर पड़ती गई.

धर्म असरदार क्यों

धर्म की विचारधारा का विरोध और समर्थन एकसाथ शुरू हुआ. इस के बाद विरोध के स्वर हाशिए पर पहुंच गए. इस की वजह यह रही कि धर्म बहुत सारी जातियों को अपने साथ ले कर चलने में सफल हो गया.

जिन दलितों में एक जमाने में बौद्ध धर्म अपनाने की दिलचस्पी रहती थी, अब वह हिंदू धर्म की तरफ बढ़ने लगे. देवीदेवताओं को गाली देने वाले लोगों का साथ छोड़ कर यह देवीदेवताओं की पूजा करने लगे. तीजत्योहार मनाने लगे. मंदिरों में जाने लगे. ऐसे लोगों ने ही बसपा का साथ छोड़ दिया और पौराणिक कथाएं सुनाने वाले को वोट देना शुरू कर दिया.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस ने जब अपना संगठन बनाया, तो उस की राजनीतिक शाखा भी तैयार कर ली थी. जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी का सफल उदाहरण है.

संघ ने धर्म को सीढ़ी बना कर राजनीति की सत्ता को हासिल किया. इसी के जरीए सिस्टम को अपने मुताबिक बनाने का काम किया. राम मंदिर बनाना और अनुच्छेद 370 को हटाना इस के उदाहरण हैं.

जैसेजैसे भाजपा राजनीतिक संतुलन को साधने के लिए अलगअलग विचारों के लोगों को साथ लेगी, उस के विचारों में भी शुद्धता कम होगी और दूसरे विचार के लोगों के शामिल होने से पार्टी का हाशिए पर जाना शुरू हो जाएगा. अगर धर्म की विचारधारा को सत्ता हासिल नहीं होती, तो उस का प्रचारप्रसार इतना ज्यादा नहीं होता.

पौराणिक विचारधारा ने राजनीतिक समुद्र मंथन कर सत्ता को हासिल किया. सत्ता से मिले अमृत का खुद पान किया. अमृत की मांग दूसरे लोग न कर सकें, इस के लिए जातिधर्म के मोहपाश में उन को उलझाने का काम किया गया है.

अमृत के नाम पर नशा मोहिनी द्वारा पिलाया जा रहा है, यह न कोई बता रहा है और न औरतें सुनने को तैयार हैं, क्योंकि इन बातों को पुलिस, अदालत और कानून के नाम पर दबा दिया जाता है और सताए गए लोगों के नेता चुप हैं.

Holi Special: ये कैसा सौदा- भाग 1

Reeta Kashyap

जैसे ही उस नवजात बच्चे ने दूध के लिए बिलखना शुरू किया वैसे ही सब सहम गए. हर बार उस बदनसीब का रोना सब के लिए तूफान के आने की सूचना देने लगता है, क्योंकि बच्चे के रोने की आवाज सुनते ही संगीता पर जैसे पागलपन का दौरा सा पड़ जाता है. वह चीखचीख कर अपने बाल नोचने लगती है. मासूम रिया और जिया अपनी मां की इस हालत को देख कर सहमी सी सिसकने लगती हैं. ऐसे में विक्रम की समझ में कुछ नहीं आता कि वह क्या करे? उस 10 दिन के नवजात के लिए दूध की बोतल तैयार करे, अपनी पत्नी संगीता को संभाले या डरीसहमी बेटियों पर प्यार से हाथ फेरे.

संगीता का पागलपन हर दिन बढ़ता ही जा रहा है. एक दिन तो उस ने अपने इस नवजात शिशु को उठा कर पटकने की कोशिश भी की थी. दिन पर दिन स्थिति संभलने के बजाय विक्रम के काबू से बाहर होती जा रही थी. वह नहीं जानता था कि कैसे और कब तक वह अपनी मजदूरी छोड़, घर पर रह कर इतने लोगों के भोजन का जुगाड़ कर पाएगा, संगीता का इलाज करवा पाएगा और दीक्षित दंपती से कानूनी लड़ाई लड़ पाएगा. आज उस के परिवार की इस हालत के लिए दीक्षित दंपती ही तो जिम्मेदार हैं.

विक्रम जानता था कि एक कपड़ा मिल में दिहाड़ी पर मजदूरी कर के वह कभी भी इतना पैसा नहीं जमा कर पाएगा जिस से संगीता का अच्छा इलाज हो सके और इस के साथ बच्चों की अच्छी परवरिश, शिक्षा और विवाह आदि की जिम्मेदारियां भी निभाई जा सकें. उस पर कोर्टकचहरी का खर्चा. इन सब के बारे में सोच कर ही वह सिहर उठता. इन सब प्रश्नों के ऊपर है इस नवजात शिशु के जीवन का प्रश्न, जो इस परिवार के लिए दुखों की बाढ़ ले कर आया है जबकि इसी नवजात से उन सब के जीवन में सुखों और खुशियों की बारिश होने वाली थी. पता नहीं कहां क्या चूक हो गई जो उन के सब सपने टूट कर ऐसे बिखर गए कि उन टूटे सपनों की किरचें इतनी जिंदगियों को पलपल लहूलुहान कर रही हैं.

कोई बहुत पुरानी बात नहीं है. अभी कुछ माह पहले तक विक्रम का छोटा सा हंसताखेलता सुखी परिवार था. पतिपत्नी दोनों मिल कर गृहस्थी की गाड़ी बखूबी चला रहे थे. मिल मजदूरों की बस्ती के सामने ही सड़क पार धनवानों की आलीशान कोठियां हैं. उन पैसे वालों के घरों में आएदिन जन्मदिन, किटी पार्टियां जैसे छोटेबड़े समारोह आयोजित होते रहते हैं. ऐसे में 40-50 लोगों का खाना बनाने के लिए कोठियों की मालकिनों को अकसर अपने घरेलू नौकरों की मदद के लिए खाना पकानेवालियों की जरूरत रहती है. संगीता इन्हीं घरेलू अवसरों पर कोठियों में खाना बनाने का काम करती थी. ऐसे में मिलने वाले खाने, पैसे और बख्शिश से संगीता अपनी गृहस्थी के लिए अतिरिक्त  सुविधाएं जुटा लेती थी.

पिछले साल लाल कोठी में रहने वाले दीक्षित दंपती ने एक छोटे से कार्यक्रम में खाना बनाने के लिए संगीता को बुलाया था. संगीता सुबहसुबह ही रिया और जिया को अच्छे से तैयार कर के अपने साथ लाल कोठी ले गई थी. उस दिन संगीता और उस की बेटियां ढेर सारी पूरियां, हलवा, चने, फल, मिठाई, पैसे आदि से लदी हुई लौटी थीं. तीनों की जबान श्रीमती दीक्षित का गुणगान करते नहीं थक रही थी. उन की बातें सुन कर विक्रम ने हंसते हुए कहा था, ‘‘सब पैसों का खेल है. पैसा हो तो दुनिया की हर खुशी खरीदी जा सकती है.’’

संगीता थोड़ी भावुक हो गई. बोली, ‘‘पैसे वालों के भी अपने दुख हैं. पैसा ही सबकुछ नहीं होता. पता है करोड़ों में खेलने वाले, बंगले और गाडि़यों के मालिक दीक्षित दंपती निसंतान हैं. शादी के 15 साल बाद भी उन का घरआंगन सूना है.’’

‘‘यही दुनिया है. अब छोड़ो इस किस्से को. तुम तीनों तो खूब तरमाल उड़ा कर आ रही हो. जरा इस गरीब का भी खयाल करो. तुम्हारे लाए पकवानों की खुशबू से पेट के चूहे भी बेचैन हो रहे हैं,’’ विक्रम ने बात बदलते हुए कहा.

संगीता तुरंत विक्रम के लिए खाने की थाली लगाने लगी और रिया और जिया अपनेअपने उपहारों को सहेजने में लग गईं.

अगले ही दिन श्रीमती दीक्षित ने अपने नौकर को भेज कर संगीता को बुलवाया था. संदेश पाते ही संगीता चल दी. वह खुश थी कि जरूर कोठी पर कोई आयोजन होने वाला है. ढेर सारा बढि़या खाना, पैसे, उपहारों की बात सोचसोच कर उस के चेहरे की चमक और चाल में तेजी आ रही थी.

संगीता जब लाल कोठी पहुंची तो उसे मामला कुछ गड़बड़ लगा. श्रीमती दीक्षित बहुत उदास और परेशान सी लगीं. संगीता ने जब बुलाने का कारण पूछा तो वे कुछ बोली नहीं, बस हाथ से उसे बैठने का इशारा भर किया. संगीता बैठ तो गई लेकिन वह कुछ भी समझ नहीं पा रही थी. थोड़ी देर तक कमरे में चुप्पी छाई रही. फिर धीरे से अपने आंसू पोंछते हुए श्रीमती दीक्षित ने बताना शुरू किया, ‘‘हमारी शादी को 15 साल हो गए लेकिन हमें कोई संतान नहीं है. इस बीच 2 बार उम्मीद बंधी थी लेकिन टूट गई. विदेशी डाक्टरों ने बहुत इलाज किया लेकिन निराशा ही हाथ लगी. अब तो डाक्टरों ने भी साफ शब्दों में कह दिया कि कभी मां नहीं बन पाऊंगी. संतान की कमी हमें भीतर ही भीतर खाए जा रही है.’’

संगीता को लगा श्रीमती दीक्षित ने अपना मन हलका करने के लिए उसे बुलवाया है. संगीता तो उन का यह दर्द कल ही उन की आंखों में पढ़ चुकी थी. वह सबकुछ चुपचाप सुनती रही.

‘‘संगीता, तुम तो समझ सकती हो, मां बनना हर औरत का सपना होता है. इस अनुभव के बिना एक औरत स्वयं को अधूरा समझती है.’’

‘‘आप ठीक कहती हैं बीबीजी, आप तो पढ़ीलिखी हैं, पैसे वाली हैं. कोई तो ऐसा रास्ता होगा जो आप के सूने जीवन में बहार ले आए?’’ श्रीमती दीक्षित के दुख में दुखी संगीता को स्वयं नहीं पता वह क्या कह रही थी.

‘‘इसीलिए तो तुम्हें बुलाया है,’’ कह कर श्रीमती दीक्षित चुप हो गईं.

‘‘मैं…मैं…भला आप की क्या मदद कर सकती हूं?’’ संगीता असमंजस में पड़ गई.

‘‘तुम अपनी छोटी बेटी जिया को मेरी झोली में डाल दो. तुम्हें तो कुदरत ने 2-2 बेटियां दी हैं,’’ श्रीमती दीक्षित एक ही सांस में कह गईं.

यह सुनते ही जैसे संगीता के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई. उस का दिमाग जैसे सुन्न हो चला था. वह बड़ी मुश्किल से इतना ही कह पाई, ‘‘बीबीजी, आप मुझ गरीब से कैसा मजाक कर रही हैं?’’

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Holi Special: ये कैसा सौदा

अतरंगी अंदाज में दिखे शिल्पा के पति राज कुंद्रा हुए बुरी तरह ट्रोल

बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति और बिजनेसमैन राज कुंद्रा  अपने एक फैशन सेंस को लेकर चर्चाओं में है. बीते साल काफी सुर्खियां बटोरने वाले राज कुंद्रा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से हो रहा, जिसमें वो मीडिया के सामने ऐसा रूप लेकर आए कि जिसने भी देखा वो दंग रह गया. कइयों को तो इस  बात का यकीन ही नहीं हुआ कि वो वाकई में राज कुंद्रा ही हैं.

इस वीडियो में राज कुंद्रा ने काले रंग की जैकेट पहने नजर आ रहे हैं. इसके साथ ही राज चश्मा पहने भी नजर आ रहे हैं. लेकिन खास बात यह थी कि उन्होंने अपनी इस जैकेट से अपना पूरा चेहरा ढका हुआ था, जिसकी वजह से कोई भी उनकी शक्ल देख नहीं पा रहा था. वीडियो में राज कुंद्रा को पहचानना मुश्किल है.

बुरी तरह ट्रोल हुए राज

इस वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही सोशल मीडिया यूजर्स उन्हें ट्रोल करते नजर आ रहे हैं.

वीडियो को देख नेटिजन्स एक बार फिर राज कुंद्रा और उनके पॉर्नोग्राफिक केस के बारे में बातें करते नजर आ रहे हैं. राज के इस वीडियो पर कमेंट करते हुए एक यूजर ने लिखा, ऐसा काम करते ही क्यों हो जो मुंह छुपा ना पड़े.

वहीं एक और यूजर ने लिखा, ये तो मुंह दिखाने लायक नहीं रहा. जबकि एक अन्य यूजर ने कमेंट करते हुए कहा, ऐसा काम करोगे तो मुंह छुपा ही पड़ेगा.

पिछले साल गए थे जेल

बता दें कि बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी  के पति और जाने-माने बिजनेसमैन राज कुंद्रा  बीते साल काफी सुर्खियों में थे. दरअसल राज को अश्लील फिल्में बनाने के आरोप में 19 जुलाई 2021 मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने हिरासत में लिया था. इस दौरान यह जानकारी सामने आई थी कि राज कुंद्रा बीते डेढ़ साल में करीब 100 से ज्यादा अश्लील फिल्में बना चुके थे. मामले में करीब 2 महीने जेल में बंद रहने के बाद सितंबर में राज कुंद्रा को जमानत मिली थी.

मेरी हाल ही में नार्मल डिलीवरी हुई है, पति शारीरिक संबंध बनाना चाहते हैं, क्या करूं?

सवाल
मैं 30 वर्षीय विवाहित महिला हूं. 2 माह पूर्व नौर्मल डिलीवरी के जरिए मैं एक स्वस्थ बच्चे की मां बनी हूं. मेरे पति चाहते हैं कि हम पहले की तरह शारीरिक संबंध बनाएं. लेकिन मैं डरती हूं कि कहीं इस से कुछ परेशानी तो नहीं होगी. मैं यह जानना चाहती हूं कि क्या यह उपयुक्त समय है शारीरिक संबंध बनाने का?

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जवाब
आमतौर पर महिलाओं को सामान्य डिलीवरी के 6 हफ्ते के बाद सैक्स संबंध बनाने की सलाह दी जाती है. लेकिन यह प्रत्येक महिला के शारीरिक व मानसिक रूप से तैयार होने पर भी निर्भर करता है. कई बार जल्दबाजी संक्रमण का कारक बन सकती है. इसलिए, आप के लिए यही बेहतर होगा कि आप सैक्स संबंध बनाने से पूर्व एक बार अपनी गाइनीकोलौजिस्ट से अवश्य सलाह कर ले.

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प्रसव के बाद यौन संबंध

‘‘तुम क्या पहली औरत हो, जो मां बनी हो?’’

‘‘डिलीवरी के बाद तुम्हारे अंदर कितना बदलाव आ गया है, सिवा बच्चे के, तुम्हें तो और कुछ सूझता ही नहीं है.’’

‘‘लगता है, तुम्हारा बच्चा ही तुम्हारे लिए महत्त्वपूर्ण हो गया है, तभी तो मेरे पास तक आने में हिचकिचाने लगी हो.’’ इस तरह की न जाने कितनी बातें औरतें शिशु जन्म के बाद अपने पतियों से सुनती हैं, क्योंकि पति की यौन संबंध बनाने की मांग को ठुकराने की गलती उन से होती है. मगर प्रसव के बाद कुछ महीनों तक न तो औरत की यौन संबंध बनाने की इच्छा होती है, न ही डाक्टर ऐसा करने की सलाह देते हैं.

शारीरिक व मानसिक थकान

बच्चे के जन्म के बाद मानसिक व शारीरिक तौर पर एक औरत का थकना स्वाभाविक है. चूंकि प्रैग्नैंसी के 9 महीनों के दौरान उसे कई तरह के उतारचढ़ावों से गुजरना पड़ता है. बच्चे को जन्म देने के बाद भी उस के अंदर अनेक सवाल पल रहे होते हैं. कमजोरी और शिशु जन्म के साथ बढ़ती जिम्मेदारियां, रात भर जागना और दिन का शिशु के साथ उस की जरूरतें पूरी करतेकरते गुजर जाना आम बात होती है. औरत के अंदर उस समय चिड़चिड़ापन भर जाता है. नई स्थिति का सामना न कर पाने के कारण अकसर वह तनाव या डिप्रैशन का शिकार भी हो जाती है. मां बनने के बाद औरत कई कारणों की वजह से सैक्स में अरुचि दिखाती है. सब से प्रमुख कारण होता है टांकों में सूजन होना. अगर ऐसा न भी हो तो भी गर्भाशय के आसपास सूजन या दर्द कुछ समय के लिए वह महसूस करती है. थकावट का दूसरा बड़ा कारण होता है 24 घंटे शिशु की देखभाल करना, जो शारीरिक व मानसिक तौर पर थकाने वाला होता है. इसलिए जब भी वह लेटती है, उस के मन में केवल नींद पूरी करने की ही इच्छा होती है. कई औरतों की तो सैक्स की इच्छा कुछ महीनों के लिए बिलकुल ही खत्म हो जाती है.

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अपने शरीर के बदले हुए आकार को ले कर भी कुछ औरतों के मन में हीनता घिर जाती है, जिस से वे यौन संबंध बनाने से कतराने लगती हैं. उन्हें लगने लगता है कि वे पहले की तरह सैक्सी नहीं रही हैं. स्टे्रच मार्क्स या बढ़ा हुआ वजन उन्हें अपने ही शरीर से प्यार करने से रोकता है. बेहतर होगा कि इस तरह की बातों को मन में लाने के बजाय जैसी हैं, उसी रूप में अपने को स्वीकारें. अगर वजन बढ़ गया है, तो ऐक्सरसाइज रूटीन अवश्य बनाएं.

दर्द होने का डर

अकसर पूछा जाता है कि अगर डिलीवरी नौर्मल हुई है, तो यौन संबंध कब से बनाने आरंभ किए जाएं? इस के लिए कोई निर्धारित नियम या अवधि नहीं है, फिर भी डिलीवरी के 11/2 महीने बाद सामान्य सैक्स लाइफ में लौटा जा सकता है. बच्चे के जन्म के बाद कई औरतें सहवास के दौरान होने वाले दर्द से घबरा कर भी इस से कतराती हैं. औरत के अंदर दोबारा यौन संबंध कायम करने की इच्छा कब जाग्रत होगी, यह इस पर भी निर्भर करता है कि उस की डिलीवरी कैसे हुई है. जिन औरतों का प्रसव फोरसेप्स की सहायता से होता है, उन्हें सैक्स के दौरान निश्चिंत रहने में अकसर लंबा समय लगता है. ऐसा ही उन औरतों के साथ होता है, जिन के योनिमार्ग में चीरा लगता है. सीजेरियन केबाद टांके भरने में समय लगता है. उस समय किसी भी तरह का दबाव दर्द का कारण बन सकता है. फोर्टिस ला फेम की गायनाकोलौजिस्ट डा. त्रिपत चौधरी कहती हैं, ‘‘प्रसव के बाद 2 से 6 हफ्तों तक सैक्स संबंध नहीं बनाने चाहिए, क्योंकि बच्चे के जन्म के बाद औरत न सिर्फ अनगिनत शारीरिक परिवर्तनों से गुजरती है, वरन मानसिक व भावनात्मक बदलाव भी उस के अंदर समयसमय पर होते रहते हैं. चाहे डिलीवरी नौर्मल हुई हो या सीजेरियन से, दोनों ही स्थितियों में कुछ महीनों तक यौन संबंध बनाने से बचना चाहिए. ‘‘डिलीवरी के बाद के जिन महीनों को पोस्टपार्टम पीरियड कहा जाता है, उस दौरान औरत के अंदर सैक्स संबंध बनाने की बात तक नहीं आती. प्रसव के बाद कुछ हफ्तों तक हर औरत को ब्लीडिंग होती है. ब्लीडिंग केवल रक्त के रूप में ही नहीं होती है, बल्कि कुछ अंश निकलने व डिस्चार्ज की तरह भी हो सकती है. वास्तव में यह पोस्टपार्टम ब्लीडिंग औरत के शरीर से प्रैग्नैंसी के दौरान बचे रह गए अतिरिक्त रक्त, म्यूकस व प्लासेंटा के टशू को बाहर निकालने का तरीका होती है. यह कुछ हफ्तों से ले कर महीनों तक हो सकती है.

‘‘डिलीवरी चाहे नौर्मल हुई हो या सीजेरियन से औरत के योनिमार्ग में सूजन आ जाती है और टांकों को भरने में समय लगता है. अगर इस दौरान यौन संबंध बनाए जाएं तो इन्फैक्शन होने की अधिक संभावना रहती है. औरत किसी भी तरह के इन्फैक्शन का शिकार न हो जाए, इस के लिए कम से कम 6 महीनों बाद यौन संबंध बनाने की सलाह दी जाती है. योनिमार्ग या पेट में सूजन, घाव, टांकों की वजह से सहवास करने से उसे दर्द भी होता है.’’

क्या करें

अगर बच्चा सीजेरियन से होता है, तो कम से कम 6 हफ्तों बाद यौन संबंध बनाने चाहिए. लेकिन उस से पहले डाक्टर से जांच करवानी जरूरी होती है कि आप के टांके ठीक से भर रहे हैं कि नहीं और आप की औपरेशन के बाद होने वाली ब्लीडिंग रुकी कि नहीं. यह ब्लीडिंग यूट्रस के अंदर से होती है, जहां पर प्लासेंटा स्थित होता है. यह ब्लीडिंग हर गर्भवती महिला को होती है, चाहे उस की डिलीवरी नौर्मल हुई हो या सीजेरियन से. अगर डाक्टर सैक्स संबंध बनाने की इजाजत दे देते हैं, तो इस बात का ध्यान अवश्य रखें कि टांके अगर पूरी तरह भरे नहीं हैं तो किस पोजीशन में संबंध बनाना सही रहेगा. पति साइड पोजीशन रखते हुए संबंध बना सकता है, जिस से औरत के पेट पर दबाव नहीं पड़ेगा. अगर उस दौरान स्त्री को दर्द महसूस हो, तो उसे ल्यूब्रिकेंट का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि कई बार थकान या अनिच्छा की वजह से योनि में तरलता नहीं आ पाती. अगर औरत को दर्द का अनुभव होता हो तो पति पोजीशन बदल कर या ओरल सैक्स का सहारा ले सकता है. साथ ही, वैजाइनल ड्राईनैस से बचने के लिए ल्यूब्रिकेंट का इस्तेमाल करना अनिवार्य होता है. चूंकि प्रैग्नैंसी के बाद वैजाइना बहुत नाजुक हो जाती है और उस में एक स्वाभाविक ड्राईनैस आ जाती है, इसलिए नौर्मल डिलीवरी के बाद भी सैक्स के दौरान औरत दर्द महसूस करती है.

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पोस्टपार्टम पीरियड बहुत ही ड्राई पीरियड होता है, इसलिए बेहतर होगा कि उस के खत्म होने के बाद ही यौन संबंध बनाए जाएं. प्रसव के 1-11/2 महीने बाद यौन संबंध बनाने के बहुत फायदे भी होते हैं. सैक्स के दौरान स्रावित होने वाले हारमोंस की वजह से संकुचन होता है, जिस से यूट्रस को सामान्य अवस्था में आने में मदद मिलती है और साथी के साथ दोबारा से शारीरिक व भावनात्मक निकटता कायम करने में यौन संबंध महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. प्रसव के बाद कुछ महीनों तक पीरियड्स अनियमित रहते हैं, जिस की वजह से सुरक्षित चक्र के बारे में जान पाना असंभव हो जाता है. इस दौरान गर्भनिरोध करने के लिए कौपर टी का इस्तेमाल करना या ओरल पिल्स लेना सब से अच्छा रहता है. अगर प्रसव के बाद कई महीनों तक औरत के अंदर यौन संबंध बनाने की इच्छा जाग्रत न हो तो ऐसे में पति को बहुत धैर्य व समझदारी से उस से बरताव करना चाहिए.

पति का सहयोग

जैसे ही औरत शारीरिक व भावनात्मक रूप से सुदृढ़ हो जाती है, संबंध बनाए जा सकते हैं. इस दौरान पति के लिए इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है कि वह पत्नी पर किसी भी तरह का दबाव न डाले या जबरदस्ती सैक्स संबंध बनाने के लिए बाध्य न करे. हफ्ते में 1 बार अगर संबंध बनाए जाते हैं, तो दोनों ही इसे ऐंजौय कर पाते हैं और वह भी बिना किसी तनाव के. पति को चाहिए कि वह इस विषय में पत्नी से बात करे कि वह संबंध बनाने के लिए अभी तैयार है कि नहीं, क्योंकि प्रसव के बाद उस की कामेच्छा में भी कमी आ जाती है, जो कुछ समय बाद स्वत: सामान्य हो जाती है.

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जुबिन नौटियाल की दुल्हन बनेंगी ‘Kabir Singh’ की ये एक्ट्रेस

बॉलीवुड के मशहूर सिंगर जुबिन नौटियाल अपने गानों के कारण तो सुर्खियों में रहते ही हैं, लेकिन हाल ही में उन्हें लेकर यह खबर आई है कि वह ‘कबीर सिंह’ और ‘द बिग बुल’ एक्ट्रेस निकिता दत्ता  के साथ शादी के बंधन में बंध सकते हैं. दोनों को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि वह उत्तराखंड की वादियों में सात फेरे लेंगे. इसके साथ ही यह भी अफवाह है कि दोनों के परिवार एक-दूसरे से मिल चुके हैं, साथ ही शादी की प्लानिंग के लिए जुबिन नौटियाल एक्ट्रेस निकिता दत्ता के घर भी आए थे.

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ज़ुबिन और निकिता को अक्सर एक साथ रेस्त्रां और एयरपोर्ट पर देखा गया था .इसके साथ ही दोनों एक-दूसरे की सोशल मीडिया पोस्ट पर भी खूब कमेंट करते हुए नजर आते थे. हाल ही में एक्ट्रेस ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट से एक फोटो शेयर की थी, जिसमें वह वादियों का लुत्फ उठाती नजर आई थीं. इस फोटो को शेयर करते हुए एक्ट्रेस ने लिखा था, “मैं अपनी आत्मा इन पहाड़ों में छोड़ आई हूं।”

निकिता के इस पोस्ट पर ज़ुबिन ने बड़े रोमांटिक अंदाज़ में कमेंट करते हुए लिखा “क्या आप अपना दिल भी यहां भूल आई थीं?” ज़ुबिन के इस कमेंट से फैंस ने अंदाज़ा लगाना शुरू कर दिया. कई यूजर ने तो उनसे कमेंट में यह तक पूछ लिया था कि वे शादी कब कर रहे हैं?

बता दें कि जुबिन नौटियाल और निकिता दत्ता की मुलाकात ‘कबीर सिंह’ के सेट पर हुई थी. इस फिल्म में जहां निकिता दत्ता ने शाहिद कपूर के साथ मुख्य भूमिका अदा की थी तो वहीं जुबिन नौटियाल ने फिल्म के कई गाने गाए थे.

दोनों की शादी की खबरें भले ही चर्चा का विषय बनी हों, लेकिन इस बात पर दोनों की ओर से आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है.

दीवार: भाग 2

‘‘खानेवाने का कैसे चलता है फिर?’’

‘‘जानकी रात का खाना बना कर रख जाती है, सवेरे मैं देर से जाती हूं इसलिए आसानी से कुछ बना लेती हूं.’’

‘‘फिर भी कभी कुछ काम हो तो मुरली से कह देना, कर देगा.’’

‘‘थैंक्यू, अंकल. आप को भी जब फुरसत हो यहां आ जाइएगा. मैं तो 7 बजे तक आ जाता हूं,’’ राहुल ने कहा.  आनंद के जाने के कुछ देर बाद कपिल आया. बोला, ‘‘माफ करना भाई, फ्लैट बदलने के चक्कर में तुम्हारे आने की तारीख याद…’’

‘‘लेकिन बैठेबिठाए अच्छाभला फ्लैट बदलने की क्या जरूरत थी यार?’’ राहुल ने बात काटी.

‘‘जब उस बालकनी की वजह से जिसे इस्तेमाल करने की हमें फुरसत ही नहीं थी, आनंद साहब मुझे उस फ्लैट की मार्केट वैल्यू से कहीं ज्यादा दे रहे थे तो मैं फ्लैट क्यों न बदलता?’’  राहुल ने खुद को कहने से रोका कि हमें तो अभी तुम्हारी कमी महसूस नहीं हुई और शायद होगी भी नहीं. उसे न जाने क्यों आनंद अंकल अच्छे या यह कहो अपने से लगे थे. सब से अच्छी बात यह थी कि उन का व्यवहार बड़ा आत्मीय था.

अगली सुबह जया ने कहा, ‘‘आनंद अंकल के नाश्ते के बरतन मैं जानकी से भिजवाना भूल गई. तुम शाम को जानकी से कहना, दे आएगी.’’

लेकिन शाम को राहुल खुद ही बरतन लौटाने के बहाने आनंद के घर चला गया. आनंद बालकनी में बैठे थे, उन्होंने राहुल को भी वहीं बुला लिया.  ‘‘स्वच्छ तो खैर नहीं कह सकते लेकिन खुली हवा यहीं बैठ कर मिलती है और चलतीफिरती दुनिया भी नजर आ जाती है वरना तो वही औफिस के वातानुकूलित कमरे या घर के बैडरूम, ड्राइंगरूम और टैलीविजन की दुनिया, कुछ अलग सा महसूस होता है यहां बैठ कर,’’ आनंद ने कहा, ‘‘सुबह का तो खैर कोई मुकाबला ही नहीं है. यहां की ताजी हवा में कुछ देर बैठ जाओ तो दिनभर स्फूर्ति और चुस्ती बनी रहती है.’’  ‘‘तभी आप ने बहुत ऊंचे दामों में कपिल से यह फ्लैट बदला है,’’ राहुल बोला.  आनंद ने उसे गहरी नजरों से देखा और बोले, ‘‘कह सकते हो वैसे बालकनी के सुख देखते हुए यह कीमत कोई ज्यादा नहीं है. चाहो तो आजमा कर देख लो. सुबह अखबार तो पढ़ते ही होगे?’’

‘‘जी हां, चाय भी पीता हूं.’’

‘‘तो कल यह सब बालकनी में बैठ कर करो, सारा दिन ताजगी महसूस करोगे.’’

अगले दिन जया और राहुल सवेरे ही आनंद अंकल की बालकनी में आ कर बैठ गए. आनंद की बात ठीक थी, राहुल और जया अन्य दिनों की अपेक्षा दिन भर खुश रहे इसलिए रोज सुबह बालकनी में बैठने और आनंद के साथ खबरों पर टिप्पणियां करने का सिलसिला शुरू हो गया.  एक रविवार की सुबह आनंद ने जया  को आराम से अखबार पढ़ते देख कर पूछा, ‘‘आज संडे स्पैशल बे्रकफास्ट बनाने का मूड नहीं है क्या?’’

जया ने इनकार में सिर हिलाया, ‘‘संडे को हम ब्रेकफास्ट करते ही नहीं अंकल, चलतेफिरते फल, नट्स आदि खाते रहते हैं.’’

‘‘मैं तो भई संडे को हैवी ब्रेकफास्ट करता हूं, भरवां परांठे या पूरीभाजी का और फिर उसे पचाने के लिए जी भर कर गोल्फ खेलता हूं. तुम्हें गोल्फ का शौक नहीं है, राहुल?’’  राहुल ने उन की ओर हसरत से देखा और कहा, ‘‘है तो अंकल, लेकिन कभी खेलने का या यह कहिए देखने का मौका भी नहीं मिला.’’

‘‘समझो मौका मिल गया. चलो मेरे साथ.’’ और आनंद ने मुरली को आवाज दे कर राहुल और जया के लिए भी नाश्ता बनाने को कहा. नाश्ता कर आनंद और राहुल गोल्फ क्लब पहुंचे.  राहुल और आनंद के जाने के बाद मुरली गाड़ी में जया को ब्यूटी पार्लर ले गया. आज उस ने रिलैक्स हो कर पार्लर में आने का मजा लिया.  राहुल की तो बरसों पुरानी गोल्फ क्लब जाने की तमन्ना पूरी हो गई. खेलने के बाद अंकल के दोस्तों के साथ बैठ कर बीयर पीना और लंच लेना, फिर घर आ कर कुछ देर इतमीनान से सोना.  यह प्रत्येक रविवार का सिलसिला बन गया. जया भी इस सब से बहुत खुश थी, मुरली बगैर कहे सफाई के अलावा भी कई और काम कर देता था. मुरली के साथ जा कर वह अपने उन रिश्तेदारों या परिचितों से भी मिल लेती थी जिन से मिलने में राहुल को दिलचस्पी नहीं थी. शाम वह और राहुल इकट्ठे गुजारते थे. संक्षेप में आनंद अंकल के पड़ोस में आने से उन की जिंदगी में बहार आ गई थी. जया अकसर उन की पसंद का गाजर का हलवा या नाश्ता बना कर उन्हें भिजवाती रहती थी, कभी पिक्चर या सांस्कृतिक कार्यक्रम में जाने के लिए बगैर पूछे अंकल का टिकट भी ले आती थी.

कुछ अरसे तक तो सब ठीक चला फिर राहुल को लगने लगा कि जया का झुकाव अंकल की तरफ बढ़ता ही जा रहा है. औफिस से जल्दी लौटने पर वह अंकल को जबरदस्ती घर पर बुला लेती थी, कभी उन्हें अपनी शादी का वीडियो दिखाती थी, कभी साहिल की शादी का या राहुल के बचपन की तसवीरें.  अंकल भी उसे खुश करने के लिए दिलचस्पी से सब देखते रहते थे. तभी राहुल को प्रमोशन मिल गया. जाहिर है, जया ने सब से पहले यह खबर आनंद अंकल को सुनाई और उन्होंने उसी रात इस खुशी में क्लब में पार्टी दी जिस में कपिल, पूजा और अपार्टमैंट में रहने वाले कुछ और लोगों को भी बुलाया. जब राहुल के औफिस वालों ने दावत मांगी तो राहुल ने किसी रेस्तरां में दावत देने की सोची लेकिन खर्च बहुत आ रहा था. जया ने कहा कि दावत घर पर ही करेंगे. मुरली भी साथ रहेगा.  ‘‘लेकिन अंकल शाम को गाड़ी नहीं चलाते. अगर मुरली यहां रहेगा तो वे क्लब कैसे जाएंगे, शनिवार की शाम उन्हें घर में गुजारनी पड़ेगी,’’ राहुल ने कहा.

‘‘कमाल करते हो, राहुल. हमारी पार्टी छोड़ कर अंकल क्लब जाएंगे या अपने घर में शाम गुजारेंगे, यह तुम ने सोच भी कैसे लिया?’’

‘‘यानी अंकल पार्टी में आएंगे?’’ राहुल ने हैरानी से पूछा, ‘‘तुम ने यह भी सोचा है जया कि यह जवान लोगों की पार्टी है. उस में अंकल को बुलाने से हमारा मजा किरकिरा हो जाएगा.’’

जया चौंक गई. उस ने आहत स्वर में पूछा, ‘‘हर रविवार को अंकल के साथ गोल्फ क्लब जाने या कभी शाम को जिमखाना क्लब जाने में तुम्हारा मजा किरकिरा नहीं होता?’’  खैर, पार्टी बढि़या रही, अंकल ने पार्टी के मजे में खलल डालने के बजाय जान ही डाली और औफिस के लोग राहुल के उच्चकुलीन वर्ग के लोगों से संपर्क देख कर प्रभावित भी हुए. लेकिन राहुल को जया का अंकल से इतना लगाव चिढ़ की हद तक कचोटने लगा था.

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