Best Hindi Story: खुशी के आंसू

Best Hindi Story, लेखक – डा. राजेंद्र यादव आजाद

राधा पेट से थी. इस खबर से घर में खुशियां छा गईं, क्योंकि सालों बाद भवानी देवी की हवेली में किसी बच्चे की किलकारियां गूंजने वाली थीं.

भवानी देवी ने अपने बेटे विजय की शादी बड़ी धूमधाम से की थी. विजय वैसे तो पढ़ाई के साथसाथ खेलकूद में भी अव्वल आता था और अगर वह चाहता तो सिविल सेवा की नौकरी भी कर सकता था, लेकिन भवानी देवी की इच्छा थी कि उन का बेटा सेना का अफसर बने, क्योंकि भवानी देवी के पति कर्नल सूबे सिंह भी भारतीय सेना के जांबाज थे, जो 1971 के युद्ध में शहीद हो गए थे.

कर्नल सूबे सिंह के शहीद होने के समय भवानी देवी 6 महीने के पेट से थीं. पति के शहीद होने के 3 महीने बाद हवेली में किलकारियां गूंजी थीं. गमगीन परिवार में खुशियां छा गई थीं. भवानी देवी ने बड़े चाव से अपने बेटे का नाम विजय रखा था.

विजय धीरेधीरे बड़ा होता गया और भवानी देवी की उम्र ढलती गई. शहर से ग्रेजुएशन करने के बाद विजय भारतीय थल सेना में भरती हो गया था. इस के बाद उस की शादी एक अमीर परिवार की लड़की राधा से कर दी गई.

आज पोते के जन्म की खुशी में भवानी देवी फूली नहीं समा रही थीं. महल्ले में मिठाई बांटी गई.

समय का पहिया अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता जा रहा था तो भवानी देवी की हवेली में भी समय अपना रूप दिखा रहा था.

आज एक बार फिर हवेली में संकट के बादल मंडरा रहे हैं. भवानी देवी के पोते संदीप को भयंकर बुखार हो जाने के चलते शहर के बड़े अस्पताल में भरती कराया गया, लेकिन दाएं अंग को हवा लग जाने के चलते वह अपाहिज हो गया. घर का माहौल गमगीन हो गया.

संदीप जब अपाहिज हुआ था, तब उस की उम्र थी 4 साल थी. इसी दौरान राधा ने एक बेटी को भी जन्म दे दिया था.

विजय सेना में था, इसलिए वह अपनी बेटी और पत्नी राधा को शहर ले गया, लेकिन संदीप को दादी भवानी देवी ने उन के साथ शहर नहीं भेजा.

बड़ा बेटा संदीप अपाहिज होने के चलते विजय को अपने घर के वारिस की चिंता सताने लगी, तो उस ने तीसरी औलाद करने की सोची और बेटा पैदा हुआ.

इधर गांव में संदीप अपनी दादी के साथ ही रहता था. वह हवेली जो कभी लोगों से भरी रहती थी, अब सुनसान थी.

भवानी देवी ने संदीप का दाखिला गांव के ही सरकारी स्कूल में करा दिया. संदीप पढ़ाई में होशियार था.

उस ने कभी अपनी विकलांगता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. वह अपाहिज होते हुए भी अपने सभी काम कर लेता था.

दादी भवानी देवी संदीप को स्कूल छोड़ती और लाती थीं, लेकिन गांव के कुछ दबंग छात्र संदीप की विकलांगता के चलते उस का मजाक उड़ाते थे. संदीप खून का घूंट पी कर रह जाता था.

संदीप ने अपनी 12वीं जमात बहुत अच्छे नंबरों से पास की और आगे की पढ़ाई के लिए शहर में जाने इच्छा जाहिर की, तो विजय ने मना कर दिया, ‘‘आगे पढ़ कर क्या करोगे? तुम अपाहिज हो तो कौन तुम्हारा खयाल रखेगा?’’

लेकिन संदीप की जिद के चलते विजय को ?ाकना पड़ा, क्योंकि दादी भवानी देवी जो उस के साथ खड़ी थीं. उन्होंने विजय से कहा, ‘‘संदीप को आगे पढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. मैं इस के साथ रहूंगी.’’

संदीप ने शहर के कालेज में दाखिला ले लिया, लेकिन यहां भी उस की विकलांगता के चलते उस के सहपाठी उस का मजाक उड़ाने लगे, तो उसे निराशा ने घेर लिया.

आज जब संदीप कालेज से आया, तो वह अपनी दादी से कुछ नहीं बोला और अपने कमरे में जा कर बंद हो गया.

भवानी देवी ने सोचा कि दिनभर का थकाहारा होगा, इसलिए आराम कर रहा है, लेकिन जब रात को खाने के समय दादी ने संदीप का दरवाजा खटखटाया, तो भी उस ने कमरा नहीं खोला, तो वे चिंतित हो कर बोलीं, ‘‘संदीप, कमरा खोलो अपनी दादी के लिए.’’

थोड़ी देर के बाद जब संदीप ने दरवाजा खोला, तो वह अपनी दादी से लिपट कर रोने लगा.

‘‘क्या बात है बेटा? मुझे बताओ,’’ दादी बोलीं.

‘‘दादी, आप अभी गांव चलो. मैं अब नहीं पढ़ूंगा. पापा सही कहते थे कि तुम विकलांग हो, अब आगे नहीं पढ़ना चाहिए. मैं पढ़ाई छोड़ रहा हूं,’’ संदीप ने कहा.

‘‘यह क्या बेटा, अभी से हार मान ली… तुम्हें तो मेरा सपना पूरा करना है. तुम्हें पढ़ाई कर के आईएएस जो बनना है. तुम्हारी विकलांगता तुम्हारी पढ़ाई में बाधा नहीं बननी चाहिए. मैं हर पल तुम्हारे साथ खड़ी हूं. मैं जब तक तुम्हें आईएएस नहीं देख लूंगी, तब तक मरूंगी नहीं.

‘‘तुम्हें अपनी दादी के लिए पढ़ना होगा. तुम ऐसे लोगों के लिए मिसाल बनोगे, जो अपनी विकलांगता को बोझ समझ कर अपना रास्ता बदल लेते हैं.’’

‘‘ठीक है दादी, मैं आज के बाद कभी आप को शिकायत का मौका नहीं दूंगा.’’

अगली सुबह जब संदीप सो कर उठा तो उस में एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा था. वह फैसला कर चुका था कि अब चाहे उस की विकलांगता का कितना भी मजाक उड़ाया जाए, वह दुखी नहीं होगा. उसे तो केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना है.

कालेज में संदीप अपनी जगह बैठ कर क्लास लेने लगा. राजनीति विज्ञान के प्रोफैसर उम्मेद सिंह आए और अपना विषय पढ़ाने लगे.

इस के बाद संदीप दिनभर गुमसुम बैठा रहा था. लंच में नेहा ने उस के पास आ कर पूछा, ‘‘क्या बात है संदीप, आप कल उन आवारा लोगों की बातें दिल से क्यों लगा बैठे? चलो, चाय पी कर आते हैं. मुझे उम्मीद है आप उन की बातों को जरूर भूल जाओगे.

‘‘एक बात कहूं संदीप, जब मदमस्त हाथी चलता है तो उस के पीछे न जाने कितने कुत्ते भौंकते हैं. तुम हाथी हो मेरे दोस्त.’’

फिर वे दोनों कालेज की कैंटीन की तरफ चल दिए. थोड़ी देर के बाद वे कैंटीन में चाय पी कर वापस क्लास रूम में आ गए.

नेहा भी गांव से शहर पढ़ने आई थी. वह भी संदीप की ही क्लास में थी. वह मन ही मन संदीप को चाहने लगी थी, लेकिन उस ने कभी अपने प्यार का इजहार नहीं किया था. वे दोनों अब अच्छे दोस्त बन चुके थे.

संदीप हर बाधा को पार करता हुआ अपनी पढ़ाई कर रहा था. उस ने बीए भी अच्छे अंकों से पास की थी.

नेहा और संदीप ने राजनीति विज्ञान से एमए करने का विचार बनाया और दोनों का दाखिला जेएनयू में हो गया.

संदीप का केवल एक ही मकसद था कि उसे आईएएस बनने है, क्योंकि यह सपना संदीप का नहीं, बल्कि उस की दादी का भी था. वह अब होस्टल में रहते हुए अपनी एमए की पढ़ाई के साथसाथ आईएएस की तैयारी भी करने लगा था.

एक दिन नेहा ने कहा, ‘‘संदीप, आज गंगा ढाबे पर खाना खाने चलते हैं.’’

‘‘अरे नेहा, मैस में ही खा लेंगे न,’’ संदीप बोला.

‘‘नहीं, आज तो आप को मेरी बात माननी ही पड़ेगी,’’ नेहा बोली.

‘‘अरे बाबा, आप बड़ी जिद्दी हो,’’ संदीप ने कहा और दोनों हंस पड़े. जेएनयू में घूमते हुए वे गंगा ढाबा की तरफ चल पड़े.

‘‘संदीप, एक बात बोलूं… अगर आप सुनो तो,’’ नेहा बोली.

‘‘बोलो नेहा, क्या कहना चाह रही हो?’’ संदीप ने कहा.

‘‘संदीप, आई लव यू. मैं आप से बहुत प्यार करती हूं,’’ नेहा ने कहा, तो संदीप बोला, ‘‘नेहा, मुझ विकलांग के लिए यह आप की हमदर्दी है प्यार नहीं.’’

‘‘नहीं संदीप, मैं सच में आप से प्यार करती हूं. आप दुनिया के एक बेहतरीन इनसान हैं,’’ नेहा ने कहा.

‘‘तो क्या आज यह कहने के लिए ही आप ने मुझे बुलाया था?’’ संदीप ने पूछा.

‘‘कुछ ऐसा ही समझ लो,’’ नेहा ने कहा.

इस के बाद उन दोनों ने गंगा ढाबे पर खाना खाया. वैसे, संदीप भी मन ही मन नेहा को बहुत चाहता था, लेकिन कभी अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाया था. आज जब नेहा ने संदीप को आई लव यू कहा तो संदीप की भावनाओं का ज्वार टूट पड़ा और उस ने भी नेहा को आई लव यू बोल दिया.

संदीप और नेहा ने आईएएस का फार्म भर दिया था. अपनी एमए की पढ़ाई के साथसाथ वे दोनों आईएएस की भी कोचिंग ले रहे थे.

यूपीएससी ने प्रीलिमिनरी ऐग्जाम की तारीख तय कर दी, तो संदीप और नेहा के दिल की धड़कन बढ़ने लगी. तय समय पर प्रीलिमनरी का ऐग्जाम हो गया और नेहा और संदीप का रिजल्ट भी अच्छा रहा. वे दोनों प्रीलिमनरी पास कर चुके थे और अब मेन ऐग्जाम की तैयारी में जुट गए थे.

कहते हैं कि मेहनत रंग लाती है और संदीप व नेहा की मेहनत भी रंग ला रही थी. दोनों ने ही पहले चांस में ही मेन ऐग्जाम भी क्लियर कर लिया. अब बारी थी इंटरव्यू की. उन दोनों को यकीन था कि उन का इंटरव्यू भी अच्छा ही हो जाएगा.

नेहा बोली, ‘‘सुनो संदीप, मुझे उम्मीद है कि हमारा इंटरव्यू भी अच्छा हो जाएगा. मैं चाहती हूं कि आप अपने मम्मीपापा से हमारी शादी की बात कर लें.’’

नेहा की बातें सुनकर संदीप एकदम से चौंक गया और बोला, ‘‘क्या हम अभी शादी की बात करें? देखो नेहा, हम अच्छे दोस्त तो हैं लेकिन क्या आप के मम्मीपापा एक अपाहिज से अपनी आईएएस बेटी की शादी करा देंगे? शायद नहीं.

‘‘नेहा, आप का भविष्य बहुत उज्ज्वल है. आप ऐसा करो कि किसी अच्छे से लड़के से शादी कर लो. मैं अपाहिज हूं. मैं आप के लायक नहीं हूं.’’

‘‘क्या बात कर रहे हो संदीप… मैं ने आप से प्यार किया है. मैं आप के सिवा किसी की भी पत्नी नहीं हो सकती. अगर मेरी शादी आप से नहीं हुई, तो मैं जिंदगीभर शादी नहीं करूंगी.’’

संदीप बोला, ‘‘ठीक है तो फिर आप अपने मम्मीपापा से बात करो और मैं भी घर में बात करता हूं. लेकिन हम यह बात इस इंटरव्यू के बाद ही करेंगे.’’

‘‘ठीक है,’’ नेहा ने कहा.

इंटरव्यू में नेहा और संदीप पास हो गए. वे अब आईएएस बन चुके थे. दोनों को ही ट्रेनिंग के लिए मसूरी भेज दिया गया. ट्रेनिंग के बाद दोनों को ही राजस्थान कैडर मिला, तो वे बहुत खुश हुए.

नेहा ने तो अपने मम्मीपापा को इस शादी के लिए तैयार कर लिया, लेकिन संदीप के पापा और मम्मी इस शादी के लिए तैयार नहीं हुए, क्योंकि नेहा अनुसूचित जाति की लड़की थी और संदीप राजपूत था.

संदीप एक बार फिर टूट गया. उस ने नेहा को अपने मांबाप का फैसला सुना दिया.

नेहा बोली, ‘‘संदीप, मैं आप को अपना पति मान चुकी हूं और मैं आप के सिवा किसी दूसरे की पत्नी नहीं बन सकती. हम अच्छे दोस्त थे, हैं और आगे भी रहेंगे.’’

जब भवानी देवी की पता चला कि नेहा और संदीप शादी करना चाहते हैं, लेकिन विजय और राधा इस शादी से खुश नहीं हैं तो उन्होंने तय किया कि वे अपने पोते को उस का सच्चा प्यार दिला कर ही रहेंगी.

भवानी देवी तत्काल गांव से जयपुर आईं और संदीप व नेहा से बात की और कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए, वे यह शादी करा कर ही रहेंगी.

संदीप बोला, ‘‘दादी, पापा चाहते हैं कि मेरी शादी अपनी जाति में ही हो.’’

यह सुन कर भवानी देवी ने विजय को फोन किया और कहा, ‘‘तुम किस जमाने में जी रहे हो… आज 21वीं सदी में भी तुम जातिवाद की बातें कर रहे हो. क्या हो गया है तुम्हारी सोच को. देखो, मैं इन दोनों बच्चों की कोर्ट मैरिज करा रही हूं. तुम्हें आना है तो आ जाना.’’

अपनी मां की बातें सुन कर विजय गुस्से में आ गया और बोला, ‘‘मां, तुम जैसा चाहे वैसा करो. हमारा तुम से कोई वास्ता नहीं है और फोन काट दिया.’’

भवानी देवी ने संदीप और नेहा की कोर्ट मैरिज करवा दी. वे दोनों जयपुर में अपनी दादी के साथ रहने लगे. उन की जिंदगी की नैया हंसीखुशी चल रही थी.

नेहा ने एक बेटे को जन्म दे दिया था, लेकिन संदीप को दुख था कि वह अपने मांबाप का प्यार नहीं पा सका. लेकिन आज जब अखबारों में देश के टौप 10 आईएएस की लिस्ट में पहले व दूसरे नंबर पर संदीप और नेहा का नाम छपा तो विजय का सीना गर्व से चौड़ा हो गया.

विजय राधा से बोला, ‘‘देखो राधा, हमारा बेटा और बहू देश के टौप 10 आईएएस की लिस्ट में हैं. चलो, हम उन से मिलने जयपुर चलते हैं.’’

राधा और विजय जयपुर संदीप के घर आए और सारे गिलेशिकवे भूल कर बेटे और बहू को गले लगा लिया.

आज एक बार फिर भवानी देवी की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन ये आंसू गम के नहीं, बल्कि खुशी के थे. Best Hindi Story

Best Hindi Kahani: लेनदेन – पायल का क्या था प्लान

Best Hindi Kahani: मनोहर की चाय की गुमटी रेंगरेंग कर चल रही थी. घर का खर्च भी चलाना मुश्किल था. उसी में 5 लोगों का पेट पालना था. अपने एक खास ग्राहक के कहने पर मनोहर ने गुमटी पर शराब के पाउच भी रखने शुरू कर दिए. 2-4 ग्राहकों को बता भी दिया. फिर क्या था. चाय के बहाने पाउचों की बिक्री बढ़ती चली गई.

थानेदार को यह बात पता चली, तो वह 2 हवलदारों को ले कर गुमटी पर आ धमका और रोज के 4 सौ रुपए कमीशन मांगने लगा.

मनोहर हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाया, ‘‘साहब, मैं रोज 4 सौ रुपए नहीं दे पाऊंगा. हां, हर महीने इतने रुपए थाने में पहुंचा दिया करूंगा.’’ ‘‘तू मुझे 4 सौ रुपए की भीख देगा…’’ कह कर थानेदार ने उसे एक लात मारी और चिल्लाया, ‘‘खुलेआम दारू बेचता है और मुझे 4 सौ रुपए का थूक चाटने को कहता है.’’

मनोहर की पत्नी श्यामा ने दौड़ कर उसे उठाया और थानेदार से बोली, ‘‘हमें माफ कर दीजिए सरकार. हम दारू का धंधा ही छोड़ देंगे.’’ ‘‘तू दारू का धंधा छोड़ देगी, तो हमारी आमदनी कैसे होगी? तू दारू बेचेगी और रुपए के साथ सजसंवर कर मेरे पास आएगी,’’ कहते हुए थानेदार ने एक आंख दबाई.

तभी मनोहर की 15, 13 और 9 साल की 3 बेटियां स्कूल से छुट्टी होने के बाद बस्ता टांगे वहां आ गईं.

मनोहर की बड़ी बेटी पायल, जो 9वीं जमात में पढ़ रही थी, को समझते देर न लगी. वह बोली, ‘‘पापा, मैं ने मना किया था न कि दारू मत बेचो. देखो, आज पुलिस आ ही गई. हमारी इज्जत गई न…’’ कहतेकहते उस का गला भर आया.

‘‘ताजा गुलाब की तरह खिलीखिली है तेरी बेटी. आज रात इसे मेरे क्वार्टर पर 10 पाउच के साथ भेज देना,’’ कहते हुए थानेदार की आंखों में गुलाबी रंगत छा गई.

‘‘नहीं साहब, मैं इसे नहीं भेजूंगा,’’ मनोहर बोला. इतना सुनते ही थानेदार ने एक तमाचा मनोहर को रसीद कर दिया.

‘‘रात को 8 बजे तेरी बेटी थाने में पहुंच जानी चाहिए, नहीं तो समझ लेना कि कल मैं तेरा क्या हाल करूंगा,’’ कहते हुए उस ने दूसरा तमाचा उठाया, तभी एकाएक पायल बोली, ‘‘सर, मैं आने के लिए तैयार…’’ ‘‘बेटी, यह तू क्या कह रही है?’’ यह सुन कर मनोहर के होश उड़ गए.

‘‘पापा, आप डरिए मत. सर, कल से मेरे इम्तिहान शुरू हैं. मैं अगले हफ्ते आऊंगी. आप कहेंगे, तो मैं अपनी 2-4 सहेलियों को भी साथ लाऊंगी. वे सब तो मुझ से भी ज्यादा खूबसूरत हैं.’’ थानेदार ने खुशी से झूमते हुए एक आंख दबाई, फिर वह मनोहर से बोला, ‘‘तेरी बेटी कितनी समझदार है.’’

इस के बाद थानेदार वहां से चला गया. ‘‘बेटी, तू ने उस नीच के साथ यह कैसा सौदा कर लिया? अपने साथ सहेलियों की भी जिंदगी बरबाद करेगी,’’ कहते हुए मां श्यामा बहुत डर गई थी.

‘‘आप लोग शांत रहिए. मुझे जैसा करना होगा, मैं करूंगी,’’ कह कर पायल बस्ता लिए घर चली गई. पायल ने इस बारे में अपनी सहेलियों से बात की, तो वे सभी राजी हो गईं.

वादे के मुताबिक अगले हफ्ते ही पायल दारू और 4 सौ रुपए ले कर थाने पहुंच गई. थानेदार ने पूछा, ‘‘तुम्हारी सहेलियां किधर हैं?’’

‘‘2-4 नहीं, बल्कि वे तो 8-10 हैं. वे सब टेकरी के पास हैं. किसी ने आप को इस थाने में इतनी सारी लड़कियों के साथ कुछ उलटासीधा करते देख लिया, तो आप की लुटिया ही डूब जाएगी, इसलिए मैं ने उन को यहां से कुछ दूर रखा है सर…’’ पायल थानेदार के कान में धीरे से फुसफुसाई, ‘‘हम कड़ैया गांव चलें. वहां पुराने बरगद के पास एक खंडहरनुमा मकान है. वहां ज्यादा ठीक रहेगा.’’ ‘‘हाय पायल, मैं तो खुशी के मारे

मर जाऊं,’’ कह कर थानेदार ने उस के गुलाबी गाल मसल दिए और बोला, ‘‘तू तो बड़ी होशियार है. चल, वहीं चलते हैं.’’

थानेदार एक हवलदार के भरोसे थाना छोड़ कर पायल के साथ अपनी जीप से कुछ दूरी पर टेकरी के पास गया. वहां पायल की ही उम्र की 8-10 लड़कियों को जींसटौप में खड़ी देख थानेदार की लार टपकने लगी.

‘‘ऐसे गुलाब के फूलों के सामने ये रुपए क्या चीज हैं,’’ उस ने जेब से रुपए निकाल कर पायल को लौटा दिए, ‘‘हां, दारू तो मैं जरूर पीऊंगा.’’ पायल ने कहा, तो सारी लड़कियां जीप में बैठने लगीं, तभी 14-15 लड़के वहां आ धमके.

यह नजारा देख एक लड़के ने पायल को घूरते हुए पूछा, ‘‘पायल, तुम सब थानेदार साहब के साथ कहां जा

रही हो?’’ ‘‘विशाल, हम कड़ैया गांव में ट्रेनिंग के लिए जा रहे हैं. आएदिन लड़कियों के साथ उलटीसीधी घटनाएं हो रही हैं, इसलिए थानेदार साहब ने कहा है कि वे हम सब को कराटे सिखाएंगे?’’

‘‘हांहां,’’ थानेदार झट से बोला, ताकि उस की चोरी पकड़ी न जाए. ‘‘पायल, आज तुम इस पीली ड्रैस में बहुत खूबसूरत दिख रही हो. मैं तुम्हारा फोटो खींच लूं?’’

‘‘हांहां, खींचो न.’’ विशाल ने पायल के साथ थानेदार और सारी लड़कियों के भी फोटो खींचे.

थानेदार गाड़ी स्टार्ट कर पसीना पोंछते हुए बोला, ‘‘मैं तो डर ही गया था. अच्छा हुआ कि तुम ने ऐन मौके पर ट्रेनिंग की बात कह दी, नहीं तो मैं काम से गया था.’’ थानेदार के बगल में बैठी पायल और बाकी लड़कियां मुसकरा दीं.

कड़ैया गांव 10 किलोमीटर दूर था. थानेदार घूंटघूंट दारू पीते हुए आगे टंगे आईने में लड़कियों को देख मदहोश हुआ जा रहा था. वह बहुत तेज गाड़ी चला रहा था, ताकि जल्दी कड़ैया गांव पहुंचे. ‘‘सर… सर, गाड़ी रोकिए,’’ पायल इतराते हुए बोली.

थानेदार ने झट से ब्रेक मारा और पूछा, ‘‘यहां गाड़ी क्यों रुकवाई?’’ फिर उस ने चारों तरफ नजर दौड़ाई. वह एकदम सुनसान जंगल था. दूरदूर तक बड़ेबड़े पेड़ दिखाई दे रहे थे. कड़ैया गांव अभी 4-5 किलोमीटर दूर था.

‘‘सर, आगे जाने से क्या फायदा? जो काम वहां हो सकता है, क्या वह यहां नहीं हो सकता?’’ पायल ने थानेदार की लाललाल आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘कितना मस्त मौसम है. हलकीहलकी धूप, ठंडीठंडी बहती हवा, घने पेड़, आप और हम सब तितलियां.’’ ‘‘मुझ से ज्यादा तुम बेकरार हो,’’ थानेदार ने सीना फुला कर कहा, ‘‘चलो, यहीं उतरते हैं.’’

सभी जीप से उतर गए. थानेदार के साथ चिकनीचुपड़ी बातें करते हुए सारी लड़कियां आगे बढ़ रही थीं. पायल थानेदार को एकएक पाउच दारू थमाते जा रही थी. वह पाउच के कोने को दांत से काट कर गटागट शराब पीता जा रहा था.

‘‘सर, अपने कपड़े उतार लीजिए,’’ जींस वाली एक लड़की ने इतना कह कर थानेदार के गाल सहला दिए. लड़कियों के नशे में अंधे थानेदार ने रिवाल्वर उसे थमा कर अपनी खाकी वरदी खोल कर हवा में उछाल दी.

पायल ने उसे एक पेड़ के सहारे खड़ा कर दिया, ‘‘सर, आप कितने खूबसूरत हैं. काश, आप जैसे से मेरी शादी होती…’’ वह खूब मीठीमीठी बातें बोलती गई. थानेदार के पूरे शरीर में रोमांच हो आया. लेकिन जब वह उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ा, तो उस के होश फाख्ता हो गए.

बाकी लड़कियों ने थानेदार को रस्सी से पेड़ के सहारे कस कर बांध दिया था. खुद को पेड़ से बंधा पा कर थानेदार का दारू और लड़की का नशा काफूर हो गया, ‘‘अरे लड़कियो, यह क्या मजाक है. मुझे छोड़ो. प्यार का वक्त निकला जा रहा है,’’ सिर्फ अंडरवियर पहने थानेदार बोला.

सारी लड़कियां खिलखिला पड़ीं. एक लड़की ने कहा, ‘‘थानेदारजी, आप अकेले इतनी लड़कियों से कैसे प्यार करेंगे? आप तो बस इस पेड़ से बंधे इसे ही प्यार कीजिए. हम तो चले.’’ ‘‘मुझे इस जंगल में छोड़ कर तुम सब जाओगी, तो पुलिस तुम लोगों को जिंदा नहीं छोड़ेगी.’’

‘‘हमें कुछ नहीं होगा…’’ पायल बोली, ‘‘बल्कि तुम्हारा पूरा पुलिस महकमा बदनाम हो जाएगा कि तुम ने 8-10 लड़कियों को ट्रेनिंग देने के नाम पर उन के साथ गलत हरकत की. इस बात को साबित करने के लिए विशाल के कैमरे में तुम्हारे और हम सभी लड़कियों के फोटो मौजूद हैं.’’ थानेदार ने हड़बड़ा कर नजरें घुमाईं.

एक लड़की मुसकराते हुए थानेदार के हर एंगल से खटाखट फोटो खींचे जा रही थी. थानेदार अपना ही सिर खुद पेड़ पर मारने लगा, ‘‘अरे बाप रे, अब तो मेरी नौकरी गई…’’ फिर वह गरजा, ‘‘ऐ छोकरी, मेरे फोटो खींचना बंद कर.’’

पायल बोली, ‘‘थानेदार, तुम ने मुझ पर बुरी नजर डाली थी न, अब सब लेनदेन बराबर हो गया. मैं ने पापा को दारू बेचने से मना कर दिया और उन्होंने बेचनी भी बंद कर दी. ‘‘मगर फिर भी तुम ने उन को या दूसरे ठेले, गुमटी और रेहड़ी वालों को परेशान किया या उन की बीवीबेटी या मांबहन पर बुरी नजर डाली, तो तुम्हारी हवा में लहराती वरदी वाली और ये सब तसवीरें हर अखबार में छप जाएंगी.’’

थानेदार की तो हालत खराब हो गई कि जिस पायल के चक्कर में वह पड़ा था, उस ने तो उसे घनचक्कर बना दिया. थानेदार बोला, ‘‘मेरी मां, ऐसा गजब मत करना. मैं तुम्हारी हर बात मानूंगा. मेरी इज्जत बख्श दे. उलटे, मैं तुम्हें हर हफ्ते कमीशन दिया करूंगा, पर मेरा फोटो अखबार में मत छपवाना…’’

थानेदार को यों गिड़गिड़ाते हुए देख पायल के साथ आई सारी लड़कियां हंस पड़ीं और वहां से चली गईं. Best Hindi Kahani

Best Hindi Story: जुल्म की सजा – कहानी एक पिछड़े गांव की

Best Hindi Story: हमारे भारत देश को अंगरेजों की गुलामी से छुटकारा मिले हुए भले ही 65 साल से ज्यादा का समय बीत चुका है, पर आज भी न जाने कितने ऐसे गांव हैं, जो आजादी के सुख से अनजान हैं. ऐसा ही एक गांव है पिरथीपुर.

उत्तर प्रदेश के बदायूं, शाहजहांपुर और फर्रुखाबाद जिलों की सीमाओं को छूता, रामगंगा नदी के किनारे पर बसा हुआ गांव पिरथीपुर यों तो बदायूं जिले का अंग है, पर जिले तक इस की पहुंच उतनी ही मुश्किल है, जितनी मुश्किल शाहजहांपुर और फर्रुखाबाद जिला हैडक्वार्टर तक की है.

कभी इस गांव की दक्षिण दिशा में बहने वाली रामगंगा ने जब साल 1917 में कटान किया और नदी की धार पिरथीपुर के उत्तर जा पहुंची, तो पिरथीपुर बदायूं जिले से पूरी तरह कट गया. गांव के लोगों द्वारा नदी पार करने के लिए गांव के पूरब और पश्चिम में 10-10 कोस तक कोई पुल नहीं था, इसलिए उन की दुनिया पिरथीपुर और आसपास के गांवों तक ही सिमटी थी, जिस में 3 किलोमीटर पर एक प्राइमरी स्कूल, 5 किलोमीटर पर एक पुलिस चौकी और हफ्ते में 2 दिन लगने वाला बाजार था.

सड़क, बिजली और अस्पताल पिरथीपुर वालों के लिए दूसरी दुनिया के शब्द थे. सरकारी अमला भी इस गांव में सालों तक नहीं आता था.

देश और प्रदेश में चाहे जिस राजनीतिक पार्टी की सरकार हो, पर पिरथीपुर में तो समरथ सिंह का ही राज चलता था. आम चुनाव के दिनों में राजनीतिक पार्टियों के जो नुमाइंदे पिरथीपुर गांव तक पहुंचने की हिम्मत जुटा पाते थे, वे भी समरथ सिंह को ही अपनी पार्टी का झंडा दे कर और वोट दिलाने की अपील कर के लौट जाते थे, क्योंकि वे जानते थे कि पूरे गांव के वोट उसी को मिलेंगे, जिस की ओर ठाकुर समरथ सिंह इशारा कर देंगे.

पिरथीपुर गांव की ज्यादातर जमीन रेतीली और कम उपजाऊ थी. समरथ सिंह ने उपजाऊ जमीनें चकबंदी में अपने नाम करवा ली थीं. जो कम उपजाऊ जमीन दूसरे गांव वालों के नाम थी, उस का भी ज्यादातर भाग समरथ सिंह के पास गिरवी रखा था.

समरथ सिंह के पास साहूकारी का लाइसैंस था और गांव का कोई बाशिंदा ऐसा नहीं था, जिस ने सारे कागजात पर अपने दस्तखत कर के या अंगूठा लगा कर समरथ सिंह के हवाले न कर दिया हो. इस तरह सभी गांव वालों की गरदनें समरथ सिंह के मजबूत हाथों में थीं.

पिरथीपुर गांव में समरथ सिंह से आंख मिला कर बात करने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी. पासपड़ोस के ज्यादातर लोग भी समरथ सिंह के ही कर्जदार थे.

समरथ सिंह की पहुंच शासन तक थी. क्षेत्र के विधायक और सांसद से ले कर उपजिलाधिकारी तक पहुंच रखने वाले समरथ सिंह के खिलाफ जाने की हिम्मत पुलिस वाले भी नहीं करते थे.

समरथ सिंह के 3 बेटे थे. तीनों बेटों की शादी कर के उन्हें 10-10 एकड़ जमीन और रहने लायक अलग मकान दे कर समरथ सिंह ने उन्हें अपने राजपाट से दूर कर दिया था. उन की अपनी कोठी में पत्नी सीता देवी और बेटी गरिमा रहते थे.

गरिमा समरथ सिंह की आखिरी औलाद थी. वह अपने पिता की बहुत दुलारी थी. पूरे पिरथीपुर में ठाकुर समरथ सिंह से कोई बेखौफ था, तो वह गरिमा ही थी.

सीता देवी को समरथ सिंह ने उन के बैडरूम से ले कर रसोईघर तक सिमटा दिया था. घर में उन का दखल भी रसोई और बेटी तक ही था. इस के आगे की बात करना तो दूर, सोचना भी उन के लिए बैन था.

कोठी के पश्चिमी भाग के एक कमरे में समरथ सिंह सोते थे और उसी कमरे में वे जमींदारी, साहूकारी, नेतागीरी व दादागीरी के काम चलाते थे. वहां जाने की इजाजत सीता देवी को भी नहीं थी.

समरथ सरकार के नाम से पूरे पिरथीपुर में मशहूर समरथ सिंह की कोठी में बाहरी लोगों का आनाजाना पश्चिमी दरवाजे से ही होता था. इस दरवाजे से बरामदे में होते हुए उन के दफ्तर और बैडरूम तक पहुंचा जा सकता था.

कोठी के पश्चिमी भाग में दखल देना परिवार वालों के लिए ही नहीं, बल्कि नौकरचाकरों के लिए भी मना था.

अपने पिता की दुलारी गरिमा बचपन से ही कोठी के उस भाग में दौड़तीखेलती रही थी, इसलिए बहुत टोकाटाकी के बाद भी वह कभीकभार उधर चली ही जाती थी.

गांव की हर नई बहू को ‘समरथ सरकार’ से आशीर्वाद लेने जाने की प्रथा थी. कोठी के इसी पश्चिमी हिस्से में समरथ सिंह जितने दिन चाहते, उसे आशीर्वाद देते थे और जब उन का जी भर जाता था, तो उपहार के तौर पर गहने दे कर उसे पश्चिमी दरवाजे से निकाल कर उस के घर पहुंचा दिया जाता था.

आतेजाते हुए कभी गांव की किसी बहूबेटी पर समरथ सिंह की नजर पड़ जाती, तो उसे भी कोठी देखने का न्योता भिजवा देते, जिसे पा कर उसे कोठी में हर हाल में आना ही होता था.

समरथ सिंह की इमेज भले ही कठोर और बेरहम रहनुमा की थी, पर वे दयालु भी कम नहीं थे. खुशीखुशी आशीर्वाद लेने वालों पर उन की कृपा बरसती थी. अनेक औरतें जबतब उन का आशीर्वाद लेने के लिए कोठी का पश्चिमी दरवाजा खटखटाती रहती थीं, ताकि उन के

पति को फसल उपजाने के लिए अच्छी जमीन मिल सके, दवा व इलाज और शादीब्याह के खर्च वगैरह को पूरा करने हेतु नकद रुपए मिल सकें.

लेकिन बात न मानने से समरथ सिंह को सख्त चिढ़ थी. राधे ने अपनी बहू को आशीर्वाद लेने के लिए कोठी पर भेजने से मना कर दिया था. उस की बहू को समरथ के आदमी रात के अंधेरे में घर से उठा ले गए और तीसरे दिन उस की लाश कुएं में तैरती मिली थी.

अपनी नईनवेली पत्नी की लाश देख कर राधे का बेटा सुनील अपना आपा खो बैठा और पूरे गांव के सामने समरथ सिंह पर हत्या का आरोप लगाते हुए गालियां बकने लगा.

2 घंटे के अंदर पुलिस उसे गांव से उठा ले गई और पत्नी की हत्या के आरोप में जेल भेज दिया. बाद में ठाकुर के आदमियों की गवाही पर उसे उम्रकैद की सजा हो गई.

राधे की पत्नी अपने एकलौते बेटे की यह हालत बरदाश्त न कर सकी और पागल हो गई. इस घटना से घबरा कर कई इज्जतदार परिवार पिरथीपुर गांव से भाग गए.

समरथ सिंह ने भी बचेखुचे लोगों से साफसाफ कह दिया कि पिरथीपुर में समरथ सिंह की मरजी ही चलेगी. जिसे उन की मरजी के मुताबिक जीने में एतराज हो, वह गांव छोड़ कर चला जाए. इसी में उस की भलाई है.

समरथ सिंह की बेटी गरिमा जब थोड़ी बड़ी हुई, तो समरथ सिंह ने उस का स्कूल जाना बंद करा दिया. अब वह दिनरात घर में ही रहती थी.

गरमी के मौसम में एक दिन दोपहर में उसे नींद नहीं आ रही थी. वह लेटेलेटे ऊब गई, तो अपने कमरे से बाहर निकल कर छत पर चली गई और टहलने लगी.

अचानक उसे कोठी के पश्चिमी दरवाजे पर कुछ आहट सुनाई दी. उस ने झांक कर देखा, तो दंग रह गई. समरथ सिंह का खास लठैत भरोसे एक औरत को ले कर आया था. कुछ देर बाद कोठी का पश्चिमी दरवाजा बंद हो गया और भरोसे दरवाजे के पास ही चारपाई डाल कर कोठी के बाहर सो गया.

गरिमा छत से उतर कर दबे पैर कोठी के बैन इलाके में चली गई. अपने पिता के बैडरूम की खिड़की के बंद दरवाजे के बीच से उस ने कमरे के अंदर झांका, तो दंग रह गई. उस के पिता नशे में धुत्त एक लड़की के कपड़े उतार रहे थे. वह लड़की सिसकते हुए कपड़े उतारे जाने का विरोध कर रही थी.

जबरन उस के सारे कपड़े उतार कर उन्होंने उस लड़की को किसी बच्चे की तरह अपनी बांहों में उठा कर चूमना शुरू कर दिया. फिर वे पलंग की ओर बढ़े और उसे पलंग पर लिटा कर किसी राक्षस की तरह उछल कर उस पर सवार हो गए.

गरिमा सांस रोके यह सब देखती रही और पिता का शरीर ढीला पड़ते ही दबे पैर वहां से निकल कर अपने कमरे में आ गई. उसे यह देख कर बहुत अच्छा लगा और बेचैनी भी महसूस हुई.

अब गरिमा दिनभर सोती और रात को अपने पिता की करतूत देखने के लिए बेचैन रहती.

अपने पिता की रासलीला देखदेख कर गरिमा भी काम की आग से भभक उठती थी.

एक दिन समरथ सिंह भरोसे को ले कर किसी काम से जिला हैडक्वार्टर गए हुए थे. दोपहर एकडेढ़ बजे उन का कारिंदा भूरे, जिस की उम्र तकरीबन 20 साल होगी, हलबैल ले कर आया.

बैलों को बांध कर वह पशुशाला के बाहर लगे नल पर नहाने लगा, तभी गरिमा की निगाह उस पर पड़ गई. वह देर तक उस की गठीली देह देखती रही.

जब भूरे कपड़े पहन कर अपने घर जाने लगा, तो गरिमा ने उसे बुलाया. भूरे कोठरी के दरवाजे पर आया, तो गरिमा ने उसे अपने साथ आने को कहा.

गरिमा को पता था कि उस की मां भोजन कर के आराम करने के लिए अपने कमरे में जा चुकी है.

गरिमा भूरे को ले कर कोठी के पश्चिमी दरवाजे की ओर बढ़ी, तो भूरे ठिठक कर खड़ा हो गया. गरिमा ने लपक कर उस का गरीबान पकड़ लिया और घसीटते हुए अपने पिता के कमरे की ओर ले जाने लगी.

भूरे कसाई के पीछेपीछे बूचड़खाने की ओर जाती हुई गाय के समान ही गरिमा के पीछेपीछे चल पड़ा.

पिता के कमरे में पहुंच कर गरिमा ने दरवाजा बंद कर लिया और भूरे को कपड़े उतारने का आदेश दिया. भूरे उस का आदेश सुन कर हैरान रह गया.

उसे चुप खड़ा देख कर गरिमा ने खूंटी पर टंगा हंटर उतार लिया और दांत पीसते हुए कहा, ‘‘अगर अपना भला चाहते हो, तो जैसा मैं कह रही हूं, वैसा ही चुपचाप करते जाओ.’’

भूरे ने अपने कपड़े उतार दिए, तो गरिमा ने अपने पिता की ही तरह उसे चूमनाचाटना शुरू कर दिया. फिर पलंग पर ढकेल कर अपने पिता की तरह उस पर सवार हो गई.

भूरे कहां तक खुद पर काबू रखता? वह गरिमा पर उसी तरह टूट पड़ा, जिस तरह समरथ सिंह अपने शिकार पर टूटते थे.

गरिमा ने कोठी के पश्चिमी दरवाजे से भूरे को इस हिदायत के साथ बाहर निकाल दिया कि कल फिर इसी समय कोठी के पश्चिमी दरवाजे पर आ जाए. साथ ही, यह धमकी भी दी कि अगर वह समय पर नहीं आया, तो उसकी शिकायत समरथ सिंह तक पहुंच जाएगी कि उस ने उन की बेटी के साथ जबरदस्ती की है.

भूरे के लिए एक ओर कुआं था, तो दूसरी ओर खाई. उस ने सोचा कि अगर वह गरिमा के कहे मुताबिक दोपहर में कोठी के अंदर गया, तो वह फिर अगले दिन आने को कहेगी और एक न एक दिन यह राज समरथ सिंह पर खुल जाएगा और तब उस की जान पर बन आएगी. मगर वह गरिमा का आदेश नहीं मानेगा, तो वह भूखी शेरनी उसे सजा दिलाने के लिए उस पर झूठा आरोप लगाएगी और उस दशा में भी उसे जान से हाथ धोना पड़ेगा.

मजबूरन भूरे न चाहते हुए भी अगले दिन तय समय पर कोठी के पश्चिमी दरवाजे पर हाजिर हो गया, जहां गरिमा उस का इंतजार करती मिली.

अब यह खेल रोज खेला जाने लगा. 6 महीने बीततेबीतते गरिमा पेट से हो गई. भूरे को जिस दिन इस बात का पता चला. वह रात में ही अपना पूरा परिवार ले कर पिरथीपुर से गायब हो गया.

गरिमा 3-4 महीने से ज्यादा यह राज छिपाए न रख सकी और शक होने पर जब सीता देवी ने उस से कड़ाई से पूछताछ की, तो उस ने अपनी मां के सामने पेट से होना मान लिया. फिर भी उस ने भूरे का नाम नहीं लिया.

सीता देवी ने नौकरानी से समरथ सिंह को बुलवाया और उन्हें गरिमा के पेट से होने की जानकारी दी, तो वे पागल हो उठे और सीता देवी को ही पीटने लगे. जब वे उन्हें पीटपीट कर थक गए, तो गरिमा को आवाज दी.

2-3 बार आवाज देने पर गरिमा डरते हुए समरथ सिंह के सामने आई. उन्होंने रिवाल्वर निकाल कर गरिमा को गोली मार दी.

कुछ देर तक समरथ सिंह बेटी की लाश के पास बैठे रहे, फिर सीता देवी से पानी मांग कर पिया. तभी फायर की आवाज सुन कर उन के तीनों बेटे और लठैत भरोसे दौड़े हुए आए.

समरथ सिंह ने उन्हें शांत रहने का इशारा किया, फिर जेब से रुपए निकाल कर बड़े बेटे को देते हुए कहा, ‘‘जल्दी से जल्दी कफन का इंतजाम करो और 2 लोगों को लकड़ी ले कर नदी किनारे भेजो. खुद भी वहीं पहुंचो.’’

समरथ सिंह के बेटे पिता की बात सुन कर आंसू पोंछते हुए भरोसे के साथ बाहर निकल गए.

एक घंटे के अंदर लाश ले कर वे लोग नदी किनारे पहुंचे. चिता के ऊपर बेटी को लिटा कर समरथ सिंह जैसे ही आग लगाने के लिए बढ़े, तभी वहां पुलिस आ गई और दारोगा ने उन्हें चिता में आग लगाने से रोक दिया.

यह सुनते ही समरथ सिंह गुस्से से आगबबूला हो गए और तकरीबन चीखते हुए बोले, ‘‘तुम अपनी हद से आगे बढ़ रहे हो दारोगा.’’

‘‘नहीं, मैं अपना फर्ज निभा रहा हूं. राधे ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई है कि आप ने अपनी बेटी की गोली मार कर हत्या कर दी है, इसलिए पोस्टमार्टम कराए बिना लाश को जलाया नहीं जा सकता.’’

समरथ सिंह ने दारोगा के पीछे खड़े राधे को जलती आंखों से देखा.

वे कुछ देर गंभीर चिंता में खड़े रहे, फिर रिवाल्वर से अपने सिर में गोली मार ली.

इस घटना को देख कर वहां मौजूद लोग सन्न रह गए, तभी पगली दौड़ती हुई आई और दम तोड़ रहे समरथ सिंह के पास घुटनों के बल बैठ कर ताली बजाते हुए बोली, ‘‘देखो ठाकुर, तेरे जुल्मों की सजा तेरे साथ तेरी औलाद को भी भोगनी पड़ी. खुद ही जला कर अपनी सोने की लंका राख कर ली.’’

जैसेजैसे समरथ सिंह की सांस धीमी पड़ रही थी, वहां मौजूद लोगों में गुलामी से छुटकारा पाने का एहसास तेज होता जा रहा था. Best Hindi Story

Hindi Story: ठोकर – आखिर सरला ने गौरिका के विश्वास को क्यों तोड़ दिया?

Hindi Story: विश्वास आईने की तरह होता है. हलकी सी दरार पड़ जाए तो उसे जोड़ा नहीं जा सकता. ऐसा ही विश्वास किया था गौरिका ने सरला पर. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस पर वह अपनों से ज्यादा भरोसा करने लगी है वह उस के विश्वास को इस तरह चकनाचूर कर देगी.

गौरिका ने आंखें खोलीं तो सिर दर्द से फटा जा रहा था. एक क्षण के लिए तो सबकुछ धुंधला सा लगा, मानो कोई डरावना सपना देख रही हो. उस ने कराहते हुए इधरउधर देखने की कोशिश की थी.

‘सरला, ओ सरला,’ उस ने बेहद कमजोर स्वर में अपनी सेविका को पुकारा. लेकिन उस की पुकार छत और दरवाजों से टकरा कर लौट आई.

‘कहां मर गई?’ कहते हुए गौरिका ने सारी शक्ति जुटा कर उठने का यत्न किया. तभी खून में लथपथ अपने हाथ को देख कर उसे झटका सा लगा और वह सिरदर्द भूल कर ‘खूनखून…’ चिल्लाती हुई दरवाजे की ओर भागी थी.

गौरिका की चीख सुन कर पड़ोस के दरवाजे खुलने लगे और पड़ोसिनें निशा और शिखा दौड़ी आई थीं.

‘क्या हुआ, गौरिका?’ दोनों ने समवेत स्वर में पूछा. खून में लथपथ गौरिका को देखते ही उन के रोंगटे खड़े हो गए थे. गौरिका अधिक देर खड़ी न रह सकी. वह दरवाजे के पास ही बेसुध हो कर गिर पड़ी.

तब तक वहां अच्छीखासी भीड़ जमा हो गई थी. निशा और शिखा बड़ी कठिनाई से गौरिका को उठा कर अंदर ले गईं. वहां का दृश्य देख कर वे भय से कांप उठीं. दीवान पूरी तरह खून से लथपथ था.

गौरिका के सिर पर गहरा घाव था. किसी भारी वस्तु से उस के सिर पर प्रहार किया गया था. शिखा ने भी सरला को पुकारा था पर कोई जवाब न पा कर वह स्वयं ही रसोईघर से थोड़ा जल ले आई थी और उसे होश में लाने का यत्न करने लगी थी.

निशा ने तुरंत गौरिका के पति कौशल को फोन कर सूचित किया था. अन्य पड़ोसियों ने पुलिस को सूचना दे दी थी. सभी इस घटना पर आश्चर्य जाहिर कर रहे थे. बड़े से पांचमंजिला भवन में 30 से अधिक फ्लैट थे. मुख्यद्वार पर 2 चौकीदार दिनरात उस अपार्टमेंट की रखवाली करते थे. नीचे ही उन के रहने का प्रबंध भी था.

इस साईं रेजिडेंसी के ज्यादातर निवासी वहां लंबे समय से रह रहे थे और भवन को पूरी तरह सुरक्षित समझते थे. अत: इस प्रकार की घटना से सभी का भयभीत होना स्वाभाविक ही था.

आननफानन में कौशल आ गया. उस का आफिस अधिक दूर नहीं था. पर आज आफिस से फ्लैट तक पहुंचने का 15 मिनट का समय उसे एक युग से भी लंबा प्रतीत हुआ था. अपने घर का दृश्य देखते ही कौशल के हाथों के तोते उड़ गए. घर का सामान बुरी तरह बिखरा हुआ था. लोहे की अलमारी का सेफ खुला पड़ा था और सामान गायब था.

‘सरला…सरला,’ कौशल ने भी घर में घुसते ही उसे पुकारा था पर उसे न पा कर एक झटका सा लगा उस भरोसे को जो उन्होंने सरला को ले कर बना रखा था.

सरला को गौरिका और कौशल ने सेविका समझा ही नहीं था. वह घर का काम करने के साथ ही गौरिका की सहेली भी बन बैठी थी. कौशल का पूरा दिन तो दफ्तर में बीतता था. घर लौटने में रात के 9-10 भी बज जाते थे.

कौशल एक साफ्टवेयर कंपनी में ऊंचे पद पर था. वैसे भी काम में जुटे होने पर उसे समय का होश कहां रहता था.

गौरिका से कौशल का विवाह हुए मात्र 10 माह हुए थे. गौरिका एक संपन्न परिवार की 2 बेटियों में सब से छोटी थी. पिता बड़े व्यापारी थे, अत: जीवन सुख- सुविधाओं में बीता था. मातापिता ने भी गौरिका और उस की बहन चारुल पर जी भर कर प्यार लुटाया था. ‘अभाव’ किस चिडि़या का नाम है यह तो उन्होंने जाना ही नहीं था.

कौशल का परिवार अधिक संपन्न नहीं था पर उस के पिता ने बच्चों की शिक्षा में कोई कोरकसर नहीं उठा रखी थी. विवाह में गौरिका के परिवार द्वारा किए गए खर्च को देख कर कौशल हैरान रह गया था. 4-5 दिनों तक विवाह का उत्सव चला था. 3 अलगअलग स्थानों पर रस्में निभाई गई थीं. उस शानो- शौकत को देख कर मित्र व संबंधी दंग रह गए थे. पर सब से अधिक प्रभावित हुआ था कौशल. उस ने अपने परिवार में धन का अपव्यय कभी नहीं देखा था. जहां जितना आवश्यक हो उतना ही व्यय किया जाता था, वह भी मोलतोल के बाद.

सुंदर, चुस्तदुरुस्त गौरिका गजब की मिलनसार थी. 10 माह में ही उस ने इतने मित्र बना लिए थे जितने कौशल पिछले 5 सालों में नहीं बना सका था.

अब दिनरात मित्रों का आनाजाना लगा रहता. मातापिता ने उपहार में गौरिका को घरेलू साजोसामान के साथ एक बड़ी सी कार भी दी थी. कौशल कार्यालय आनेजाने के लिए अपनी पुरानी कार का ही इस्तेमाल करता था. गौरिका अपनी मित्रमंडली के साथ घूमनेफिरने के लिए अपनी नई कार का प्रयोग करती थी.

मायके में कभी तिनका उठा कर इधरउधर न करने वाली गौरिका ने मित्रों के स्वागतसत्कार के लिए इस फ्लैट में आते ही 3 सेविकाओं का प्रबंध किया था. घर की सफाई और बरतन मांजने वाली अधेड़ उम्र की दमयंती साईं रेजिडेंसी से कुछ दूरी पर झोंपड़ी में रहती थी. कपड़े धोने और प्रेस करने वाली सईदा सड़क पार बने नए उपनगर में रहती थी.

सरला को गौरिका ने रहने के लिए निचली मंजिल पर कमरा दे रखा था. वह भोजन बनाने, मित्रों का स्वागतसत्कार करने के साथ ही उस के साथ खरीदारी करने, सिनेमा देखने जाती थी. 4-5 माह में ही सरला कुछ इस तरह गौरिका की विश्वासपात्र बन बैठी थी कि उस के गहने संभालने, दूध, समाचारपत्र आदि का हिसाबकिताब करने जैसे काम भी वह करने लगी थी.

कुछ दिनों के लिए कौशल के मातापिता बेटे की गृहस्थी को करीब से देखने की आकांक्षा लिए आए थे और नौकरों का एकछत्र साम्राज्य देख कर दंग रह गए थे. उस की मां ने दबी जबान में कौशल को समझाया भी था, ‘बेटा, 2 लोगों के लिए 3 सेवक? तुम्हारी पत्नी तो तुम्हारा सारा वेतन इसी तरह उड़ा देगी. अभी से बचत करने की सोचो, नहीं तो बाद में कुछ भी हाथ नहीं लगेगा.’

‘मां, गौरिका हम जैसे मध्यम परिवार से नहीं है. उस के यहां तो नौकरों की फौज रखना साधारण सी बात है. हम उस से यह आशा तो नहीं कर सकते कि वह बरतन मांजने और घर की सफाई करने जैसे कार्य भी अपने हाथों से करेगी,’ कौशल ने उत्तर दिया था.

‘कपड़े धोने के लिए मशीन है, बेटे,’ मां बोलीं, ‘साफसफाई के लिए आने वाली दमयंती भी ठीक है, पर दिन भर घर में रहने वाली सरला मुझे फूटी आंखों नहीं भाती. कपडे़, गहने, रुपएपैसे आदि की जानकारी उसे भी है. किसी तीसरे को इस तरह अपने घर के भेद देना ठीक नहीं है. उस की आंखें मैं ने देखी हैं… घूर कर देखती है सबकुछ. काम रसोईघर में करती है, पर उस की नजरें पूरे घर पर रहती हैं. मुझे तो तुम्हारी और गौरिका की सुरक्षा को ले कर चिंता होने लगी है.’

‘मां, यह चिंता करनी छोड़ो. चलो, कहीं घूमने चलते हैं. सरला 6 माह से यहां काम कर रही है पर कभी एक पैसे का नुकसान नहीं हुआ. गौरिका को तो उस पर अपनों से भी अधिक विश्वास है,’ कौशल ने बोझिल हो आए वातावरण को हलका करने का प्रयत्न किया था.

‘रहने भी दो, अब बच्चे बड़े हो गए हैं. अपना भलाबुरा समझते हैं. हम 2-4 दिनों के लिए घूमने आए हैं. तुम क्यों व्यर्थ ही अपना मन खराब करती हो,’ कौशल के पिताजी ने बात का रुख मोड़ने का प्रयत्न किया था.

‘क्या हुआ? सब ऐसे गुमसुम क्यों बैठे हैं,’ तभी गौरिका वहां आ गई थी.

‘कुछ नहीं, मां को कुछ पुरानी बातें याद आ गई थीं,’ कौशल हंसा था.

‘बातें बाद में होती रहेंगी, हम लोग तो पिकनिक पर जाने वाले थे, चलिए न, देर हो जाएगी,’ गौरिका ने कुछ ऐसे स्वर में अनुनय की थी कि सब हंस पड़े थे.

सरला ने चटपट भोजन तैयार कर दिया था. थर्मस में चाय भर दी थी. पर जब गौरिका ने सरला से भी साथ चलने को कहा तो कौशल ने मना कर दिया था.

‘मांपापा को अच्छा नहीं लगेगा, उन्हें परिवार के सदस्यों के बीच गैरों की उपस्थिति रास नहीं आती,’ कौशल ने समझाया था.

‘मैं ने सोचा था कि वहां कुछ काम करना होगा तो सरला कर देगी.’

‘ऐसा क्या काम पड़ेगा. फिर मैं हूं ना, सब संभाल लूंगा,’ सच तो यह था कि खुद कौशल को भी परिवार में सरला की उपस्थिति हर समय खटकती थी पर कुछ कह कर गौरिका को आहत नहीं करना चाहता था.

कौशल के मातापिता कुछ दिन रह कर चले गए थे पर कौशल की रेनू बूआ, जो उसी शहर के एक कालिज में व्याख्याता थीं, दशहरे की छुट्टियों में अचानक आ धमकी थीं. चूंकि  कौशल घर में सब से छोटा था इसकारण वह बूआ का विशेष लाड़ला था.

गौरिका से बूआ की खूब पटती थी. पर सरला को कर्ताधर्ता बनी देख वह एक दिन चाय पीते ही बोल पड़ी थीं, ‘गौरिका, नौकरों से इतना घुलनामिलना ठीक नहीं है. तुम्हें शायद यह पता नहीं है कि तुम अपनी सुरक्षा को किस तरह खतरे में डाल रही हो. आजकल का समय बड़ा ही कठिन है. हम किसी पर विश्वास कर ही नहीं सकते.’

‘मैं जानती हूं बूआजी, इसीलिए तो मैं ने किसी पुरुष को काम पर नहीं रखा. मैं अपनी कार के लिए एक चालक रखना चाहती थी. अधिक भीड़भाड़ में कार चलाने से बड़ी थकान हो जाती है. पर देखिए, हम दोनों स्वयं ही अपनी कार चलाते हैं.’

रेनू बूआ चुप रह गई थीं. वह शायद बताना चाहती थीं कि पुरुष हो या स्त्री कोई भी विश्वास के योग्य नहीं है. फिर भी उन्होंने गौरिका से यह आश्वासन जरूर ले लिया कि भविष्य में वह रुपएपैसे, गहनों से सरला को दूर ही रखेगी.

गौरिका ने रेनू बूआ का मन रखने के लिए उन्हें आश्वस्त कर दिया पर उसे सरला पर अविश्वास करने का कारण समझ में नहीं आता था. उस के अधिकतर पड़ोसी एक झाड़ ूबरतन वाली से काम चलाते थे लेकिन वह सोचती थी कि उस का स्तर उन सब से ऊंचा है.

कौशल ने सब से पहले गौरिका को पास के नर्सिंग होम में भरती कराया था. सिर पर घाव होने के कारण वहां टांके लगाए गए थे. निशा और शिखा ने गौरिका के पास रहने का आश्वासन दिया तो कौशल घर आ गया और आते ही उस ने अपने और गौरिका के मातापिता को सूचित कर दिया. कौशल ने रेनू बूआ को भी सूचित कर दिया. बूआ नजदीक थीं और वह अच्छी तरह से जानता था कि उस पर आई इस आफत को सुनते ही बूआ दौड़ी चली आएंगी.

प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखा कर कौशल दोबारा नर्सिंग होम चला गया था. सिर में टांके लगाने के लिए गौरिका के एक ओर के बाल साफ कर दिए गए थे. हाथ में पट्टी बंधी थी, पर वह पहले से ठीक लग रही थी.

‘कौशल, मेरे कपड़े बदलवा दो. सरला से कहना अलमारी से धुले कपडे़ निकाल देगी,’ गौरिका थके स्वर में बोली थी.

‘नाम मत लेना उस नमकहराम का. कहीं पता नहीं उस का. तुम्हें अब भी यह समझ में नहीं आया कि तुम्हारी यह दशा सरला ने ही की है,’ कौशल क्रोधित हो उठा था.

‘क्या कह रहे हो? सरला ऐसा नहीं कर सकती.’

‘याद करने की कोशिश करो, हुआ क्या था तुम्हारे साथ? पुलिस तुम्हारा बयान लेने आने वाली है.’

गौरिका ने आंखें मूंद ली थीं. देर तक आंसू बहते रहे थे. फिर वह अचानक उठ बैठी थी.

‘मुझे कुछ याद आ रहा है. मैं आज सरला के साथ बैंक गई थी. 50 हजार रुपए निकलवाए थे. घर आ कर सरला खाना बनाने लगी थी. मैं ने उस से एक प्याली चाय बनाने के लिए कहा था. चाय पीने के बाद क्या हुआ मुझे कुछ पता नहीं,’ गौरिका सुबकने लगी थी, ‘2 दिन बाद तुम्हारे जन्मदिन पर मैं तुम्हें उपहार देना चाहती थी.’

तभी रेनू बूआ आ पहुंची थीं. उन के गले लग कर गौरिका फूटफूट कर रोई थी.

‘देखो बूआजी, क्या हो गया? मैं ने सरला पर अपनों से भी अधिक विश्वास किया. सभी सुखसुविधाएं दीं. उस ने मुझे उस का यह प्रतिदान दिया है,’ गौरिका बिलख रही थी.

रेनू बूआ चुप रह गई थीं. वह जानती थीं कि कभीकभी मौन शब्दों से भी अधिक मुखर हो उठता है. वह यह भी जानती थीं कि बहुत कम लोग दूसरों को ठोकर खाते देख कर संभलते हैं, अधिकतर को तो खुद ठोकर खा कर ही अक्ल आती है.

सरला 50 हजार रुपए के साथ ही घर में रखे गौरिका के गहनेकपड़े भी ले गई थी. लगभग 5 माह बाद वह अपने 2 साथियों के साथ पकड़ी गई थी और तभी गौरिका को पता चला कि वह पहले भी ऐसे अपराधों के लिए सजा काट चुकी थी. सुन कर गौरिका की रूह कांप गई थी. कौशल, मांबाप तथा घर के अन्य सभी सदस्यों ने उसे समझाया था कि भाग्यशाली हो जो तुम्हारी जान बच गई. नहीं तो ऐसे अपराधियों का क्या भरोसा.

इस घटना को 5 वर्ष बीत चुके हैं. फैशन डिजाइनर गौरिका का अपना बुटीक है. पर पति, 3 वर्षीय बंटी और बुटीक सबकुछ गौरिका स्वयं संभालती है. दमयंती अब भी उस का हाथ बंटाती है पर सब पर अविश्वास करना और अपना कार्य स्वयं करना सीख लिया है गौरिका ने. Hindi Story

Hindi Story: संकट की घड़ी – क्यों डर गया था नीरज

Hindi Story: उस ने घड़ी देखी. 7 बजने को थे. मतलब, वह पूरे 12 घंटों से यहां लगा हुआ था. परिस्थिति ही कुछ ऐसी बन गई थी कि उसे कुछ सोचनेसमझने का अवसर ही नहीं मिला था.

जब से वह यहां इस अस्पताल में है, मरीज और उस के परिजनों से घिरा शोरगुल सुनता रहा है. किसी को बेड नहीं मिल रहा, तो किसी को दवा नहीं मिल रही. औक्सीजन का अलग अकाल है. बात तो सही है. जिस के परिजन यहां हैं या जिस मरीज को जो तकलीफ होगी, यहां नहीं बोलेगा, तो कहां बोलेगा. मगर वह भी किस को देखे, किस को न देखे. यहां किसी को अनदेखा भी तो नहीं किया जा सकता. बस किसी तरह अपनी झल्लाहट को दबा सभी को आश्वासन देना होता है. किसी को यह समझने की फुरसत नहीं कि यहां पीपीई किट पहने किस नरक से गुजरना होता है. इसे पहने पंखे के नीचे खड़े रहो, तो पता ही नहीं चलता कि पंखा चल भी रहा है या नहीं. और यहां सभी को अपनीअपनी ही पड़ी है.

ठीक है कि सरकारी अस्पताल है और यहां मुसीबत में हारीबीमारी के वक्त ही लोग आते हैं. मगर इस कोरोना के चक्कर में तो जैसे मरीजों की बाढ़ आई है. और यहां न फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर है और न ह्यूमन रिसोर्सेज हैं. सप्लाई चेन औफ मेडिसिन का कहना ही क्या! किसी को कहो कि मरीज के लिए दवा बाहर से खरीदनी होगी या औक्सीजन का इंतजाम करना होगा, तो वह पहली नजर में ऐसे देखता है, मानो उसी ने अस्पताल से दवाएं या औक्सीजन गायब करवा दिया हो या वही उस की ब्लैक मार्केटिंग करवा रहा हो.

ऐसी खबरें अखबारों और सोशल मीडिया में तैर भी रही हैं. मगर फिर भी ऐसे में एक डाक्टर करे तो क्या. उस का काम मरीजों का इलाज करना है, न कि ब्लैक मार्केटियरों को पकड़ना या सुव्यवस्था कायम करना है. आखिर किस समाज में अच्छेबुरे लोग नहीं होते. फिर भी दवाएंऔक्सीजन आदि की व्यवस्था करा भी दें, तो ऐसे देखेंगे, मानो उसी पर अहसान कर रहा हो.

सैकंड शिफ्ट में आई नर्स मीना के साथ वह वार्ड का एक चक्कर लगा वापस लौटा. थोड़ी देर बाद उस ने उस से पूछा, “डाक्टर भानु आए कि नहीं?” “सर, उन्होंने फोन किया था कि थोड़ी देर में बस पहुंचने ही वाले हैं.”

“देखो, मैं अभी निकल रहा हूं. 10 घंटे से यहां लगा हुआ हूं. अगर और रुका, तो मैं कहीं बेहोश ना हो जाऊं, ऐसा मुझे लग रहा है.”

“ठीक है सर, मैं आप की हालत देख रही हूं. आप घर जाइए.” उस ने सावधानी से पहले पीपीई किट्स को और उस के बाद अपने गाउन और दस्ताने को खोला. इन्हें खोलते हुए उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी दूसरी दुनिया से बाहर निकला हो. इस के बाद उस ने स्वयं को सैनिटाइज करना शुरू किया. वहां से बाहर निकल कर अपनी कार के पास आया. वहां थोड़ी भीड़ कम थी. फिर भी उस ने मास्क हटा जोर से सांस खींच फेफड़ों में हवा भरी.

विगत समय के डाक्टर यही तो गलती करते थे कि अपने कमरे में जा कर गाउन, दस्ताने के साथ मास्क को भी हटा लेते थे. जबकि वहां के वातावरण में वायरस तो होता ही था, जो उन्हें अपनी चपेट में ले लेता था.

कार को सावधानी के साथ चलाते हुए वह मुख्य मार्ग पर आया. हालांकि शाम 7 बजे से लौकडाउन है. फिर भी कुछ दुकानें खुली हैं और लोग चहलकदमी करते नजर आ रहे हैं. ‘कब समझेंगे ये लोग कि वे किस खतरनाक दौर से गुजर रहे हैं ’ वह बुदबुदाया, ‘भयावह हो रहे हालात, प्रशासन की चेतावनी और सख्ती के बावजूद परिस्थितियों को समझ नहीं रहे हैं ये लोग.’

अपने घर के पास पहुंच कर उस ने चैन की सांस ली. उस ने हार्न बजा कर ही अपने आने की सूचना दी.  घर का दरवाजा खुला था और ढाई वर्ष का बेटा नीरज बरामदे में ही खेल रहा था. “पापा आ गए मम्मी,” कहते हुए वह दौड़ कर गेट तक आ गया था. मीरा घर से बाहर निकली और गेट को पूरी तरह से खोल दिया था. उस ने सावधानी से कार को घर के सामने पार्क किया. तब तक नीरज कार के चारों ओर चक्कर लगाता रहा. उस के कार के उतरते ही वह उस से चिपट पड़ा, तो उस ने उसे जोर से ढकेला और चिल्लाने लगा, “मीरा, तुम्हें अक्ल नहीं है, जो बच्चे को इस तरह खुले में छोड़ दिया.

“मैं अस्पताल से आ रहा हूं और यह मुझ से चिपक रहा है. दिनभर घर में टैलीविजन पर सीरियल देखती रहती हो. तुम्हें क्या पता कि वहां क्या चल रहा है. हमेशा जान जोखिम में डाल कर काम करना होता है वहां. संभालो नीरज को. और बाथरूम में गीजर औन किया है कि नहीं. कि मुझे ही वहां जा कर उसे औन करना होगा.”

“कहां का गुस्सा कहां उतारते हो,” धक्का खा कर गिरे बेटे को उठाते हुए मीरा बोली, “यह बच्चा क्या समझेगा कि बाहर क्या चल रहा है. प्ले स्कूल भी बंद है. घर में बंदबंद बच्चा आखिर करे क्या?” बाथरूम में जा कर उस ने अपने सारे कपड़े उतार कर एक टब में छोड़ दिए. फिर इस गरमी में भी पानी के गरम फव्वारे से साबुन लगा स्नान करने लगा.

नहाधो कर जब वह बाहर आया, तो उसे कुछ चैन मिला. एक कोने में उस की नजर पड़ी तो देखा कि नीरज अभी तक सुबक रहा था. वह उस की उपेक्षा कर अपने कमरे में चला तो गया, मगर उसे ग्लानि सी महसूस हो रही थी. बच्चे को उसे इस तरह ढकेलना नहीं चाहिए था.

मगर, क्या उस ने गलत किया. अस्पताल के परिसर में दिनभर कार खड़ी थी. वह खुद कोरोना पेशेंटों से जूझ कर आया था. कितनी भी सावधानी रख लो, इस वायरस का क्या ठिकाना कि कहां छुप कर चिपका बैठा हो. वह तो उस ने उसी के भले के लिए उसे किनारे किया था. नहींनहीं, किनारे नहीं किया था, बल्कि उसे ढकेल दिया था.

जो भी हो, उस ने उस के भले के लिए ही तो ऐसा किया था. अस्पताल से आने के बाद उस का दिमाग कहां सही रहता है. कोई बात नहीं, वह उसे मना लेगा. बच्चा है, मान जाएगा.  इसी प्रकार के तर्कवितर्क उस के दिमाग में चलते रहे .वह ड्राइंगरूम में आया. मीरा उस के लिए ड्राइंगरूम में चायनाश्ता रख गई.

12 साला बेटी मीनू उसे आ कर बस देख कर चली गई. और वह वहां अकेला ही बैठा रहा. फिर वह उठा और नीरज को गोद में उठा लाया.  पहले तो वह रोयामचला और उस की गिरफ्त से भाग छूटने की कोशिश करने लगा. अंततः वह उस की बांहों में मुंह छुपा कर रोने लगा. मीरा उसे चुपचाप देखती रही. उस का मुंह सूजा हुआ था. रोज की तो यही हालत है. वह क्या करे, कहां जाए. उस की इसी तुनकमिजाजी की वजह से उस ने अपनी स्कूल की लगीलगाई नौकरी छोड़ दी थी. और इन्हें लगता है कि मैं घर में बैठी मटरगश्ती करती हूं.

उस ने मीरा को आवाज दी, तो वह आ कर दूसरे कोने में बैठ गई.“तुम मुझे समझने की कोशिश करो,” उसी ने चुप्पी तोड़ी, “बाहर का वातावरण इतना जहरीला है, तो अस्पताल का कैसा होगा, इस पर विचार करो. वहां से कब बुलावा आ जाए, कौन जानता है.” “दूसरे लोग भी नौकरी करते हैं, बिजनेस करते हैं,” मीरा बोली, “मगर, वे अपने बच्चों को नहीं मारते… और न ही घर में उलटीसीधी बातें करते हैं.”

“अब मुझे माफ भी कर दो बाबा,” वह बोला, “अभी अस्पताल की क्या स्थिति है, तुम क्या जानो. रोज लोगों को अपने सामने दवा या औक्सीजन की कमी में मरते देखता हूं. मैं भी इनसान हूं. उन रोतेबिलखते, छटपटाते परिजनों को देख मेरी क्या हालत होती है, इसे समझने का प्रयास करो. और ऐसे में जब तुम लोगों का ध्यान आता है, तो घबरा जाता हूं.”

“मैं ने कब कहा कि आप परेशान नहीं हैं. तभी तो इस घर को संभाले यहां पड़ी रहती हूं. फिर भी आप को खुद पर नियंत्रण रखना चाहिए. ऐसा क्या कि नन्हे बच्चे पर गुस्सा उतारने लगे.” मीरा वहां से उठी और एक बड़ा सा चौकलेट ला कर उसे छिपा कर देती हुई बोली, “ये लीजिए और नीरज को यह कहते हुए दीजिए कि आप खास उस के लिए ही लाए हैं. बच्चा है, खुश हो जाएगा.”

मीरा की तरकीब काम कर गई थी. उस के हाथ से चौकलेट ले कर नीरज बहल गया था. पहले उस ने चौकलेट के टुकड़े किए. एकएक टुकड़ा पापामम्मी के मुंह में डाला. फिर एक टुकड़ा बहन को देने चला गया.  फिर पापा के पास आ कर उस की बालसुलभ बातें शुरू हो गईं. वह उसे ‘हांहूं’ में जवाब देता रहा. उस ने घड़ी देखी, 9 बज रहे थे. और उस पर थकान और नींद हावी हो रही थी. अचानक नीरज ने उसे हिलाया और कहने लगा, “अरे, आप तो सो रहे हैं. मम्मीमम्मी, पापा सो रहे हैं.”

मीरा किचन से निकल कर उस के पास आई और बोली, “आप बुरी तरह थके हैं शायद. इसीलिए आप को नींद आ रही है. मैं खाना निकालती हूं. आप खाना खा कर सो जाइए.” डाइनिंग टेबल तक वह किसी प्रकार गया. मीरा ने खाना निकाल दिया था. किसी प्रकार उस ने खाना खत्म किया और वापस कमरे में आ कर अपने बेड पर पड़ रहा. नीरज उस के पीछेपीछे आ गया था. उसे मीरा यह कहते हुए अपने साथ ले गई कि पापा काफी थके हैं. उन्हें सोने दो.

सचमुच थकान तो थी ही, मगर अब चारों तरफ शांति है, तो उसे नींद क्यों नहीं आ रही. वह उसी अस्पताल में क्यों घूम रहा है, जहां हाहाकार मचा है. कोई दवा मांग रहा है, तो किसी को औक्सीजन की कमी हो रही है. बाहर किसी जरूरतमंद मरीज के लिए उस के परिवार वाले एक अदद बेड के लिए गुहार लगा रहे हैं, घिघिया रहे हैं. और वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो विवश सा खड़ा है.

दृश्य बदलता है, तो बाहर कोई सरकार को, तो कोई व्यवस्था को कोस रहा है. कैसेकैसे बोल हैं इन के, ‘ये लालची डाक्टर, इन का कभी भला नहीं होगा… इस अस्पताल के बेड के लिए भी पैसा मांगते हैं… सारी दवाएं बाजार में बेच कर कहते हैं कि बाजार से खरीद लाओ… और औक्सीजन सिलिंडर के लिए भी बाजार में दौड़ो… क्या करेंगे, इतना पैसा कमा कर? मरने के बाद ऊपर ले जाएंगे क्या? इन के बच्चे कैसे अच्छे होंगे, जब ये कुकर्म कर रहे हैं?’

“नीरज… नीरज, मीनू कहां हो… कहां हो तुम,” वह चिल्लाया, तो मीरा भागीभागी आई, “क्या हुआ जी…? क्यों घबराए हुए हो…? कोई बुरा सपना देखा क्या…?”वह बुरी तरह पसीने से भीगा थरथर कांप रहा था. मीनू और नीरज भयभीत नजरों से उसे देख रहे थे. वह नीरज को गोद में भींच कर रोने लगा था. बेटी मीनू का हाथ उस के हाथ में था. मीरा उसे सांत्वना दे रही थी, “चिंता मत कीजिए. यह संकट की घड़ी भी टल जाएगी. सब ठीक हो जाएगा.” Hindi Story

Best Hindi Kahani: मान न मान – मर्यादा की तरकीब

Best Hindi Kahani: मर्दों के दबदबे वाले समाज की यह खासीयत होती है कि वे औरतों पर अपनी मरजी थोपने की कोशिश करते हैं. कोई औरत माने या न माने, जबरदस्ती वे उस के दिल में घुसने की कोशिश करने लगते हैं. मर्दों को यह सोचना चाहिए कि वे कितने भी बलशाली क्यों न हों, औरतें कितनी भी लाचार क्यों न हों, कभी उन की मरजी के खिलाफ उन्हें हासिल करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

औरत भले ही अबला की तरह लाचार नजर आती है, लेकिन मौका मिलने पर वह किसी घायल नागिन की तरह पलट कर हमला कर सकती है. कभी वह छुईमुई नजर आती है, तो कभी मर्यादा की दहलीज लांघ कर मर्द को सबक सिखाने के लिए मजबूर हो जाती है.

दूसरे बच्चों की तरह मर्यादा को भी पढ़लिख कर अपना कैरियर बनाना था और उस के बाद किसी अमीर लड़के से शादी कर के ऐश की जिंदगी जीनी थी.

मर्यादा की मौसी ने उसे समझाया कि अगर वह सचमुच अमीर पति चाहती है, तो उसे खुद ही किसी अमीर लड़के को अपने प्यार के झांसे में लेना होगा, वरना उस के मांबाप दहेज के पैसे नहीं दे सकेंगे. मर्यादा ने मौसी की बात गांठ बांध ली थी.

मर्यादा लखनऊ शहर के एक कालेज से एमबीए कर रही थी, पढ़ाई के लिए घर से भेजा हुआ खर्च पूरा नहीं पड़ता था, मजबूरी में उस ने लोगों के घर जा कर ब्राइडल मेकअप और मेहंदी लगाने का पार्टटाइम काम शुरू कर दिया.

पढ़ाई के अलावा मर्यादा दुलहनों को सजाने के साथ खुद भी सजनेसंवरने में बिजी रहती थी. उस का सीना पूरी तरह से नहीं उभरा था, फिर भी पैडेड ब्रा पहन कर वह बहुत ही मस्त दिखने लगी थी. उस के पेशे में मस्त दिखना बहुत जरूरी था. मर्यादा को अपनी क्लास के सिर्फ 2 लड़के अच्छे लगते थे. पहला खानदानी रईस राकेश था. उस का खुद का बिजनैस था. दूसरा संतोष पढ़ने में बहुत ही होशियार था. उस की सरकारी नौकरी लगना तय था. स्टूडैंट यूनियन का नेता अर्जुन बेवजह उस के पीछे पड़ा रहता था.

लेकिन जिंदगी में सबकुछ इनसान की योजना के मुताबिक नहीं होता. अर्जुन भले ही एक बैक बैंचर था, लेकिन उस ने मर्यादा को शादी के कई घरों में मेकअप आर्टिस्ट का काम दिलाया था.

एक दिन मर्यादा को साइट पर छोड़ने के बहाने अर्जुन ने रास्ते में पड़ने वाली खंडहर हवेली में ले जा कर जबरदस्ती उस का कुंआरापन लूट लिया.

भैंस जैसे सख्त उस लौंडे ने मर्यादा को दिन में तारे दिखा दिए थे. खून बहने के चलते उस पर बेहोशी छाने लगी. उस की जांघों के बीच की हड्डियां ककड़ी की तरह चटक गई थीं.

मर्यादा अपने बलात्कारी का खून कर देना चाहती थी, लेकिन जिस लड़के से वह अपनी इज्जत नहीं बचा सकी थी, उस की जान लेना इतना आसान नहीं था.

अगले दिन कालेज में मर्यादा अपने साथ हुई घटना की शिकायत किसी से नहीं कर सकी. अगर बाबूजी को पता चल गया तो उन्हें उस की पढ़ाई बंद करा कर घर बैठा देना था और फिर किसी चने बेचने या रिकशा चलाने वाले से उस की शादी करा देनी थी. उस ने खुदकुशी करनी चाही, लेकिन हिम्मत नहीं हुई.

मर्यादा द्वारा खामोशी से इतना सब सह लेने के चलते अर्जुन के चमचों का हौसला और ज्यादा बढ़ गया. अगले दिन कालेज में मर्यादा नाम के पोस्टर चिपके हुए थे. उन्होंने मर्यादा को अर्जुन की मंगेतर और अपनी भाभी के नाम से बदनाम कर दिया.

राकेश और सुरेश ने मर्यादा के चरित्र पर लांछन लगा कर उसे रिजैक्ट कर दिया था. हर जगह उस की बदनामी हो चुकी थी. चुनरी से चेहरा छिपाए बगैर उस का होस्टल से बाहर निकलना मुश्किल हो गया.

अर्जुन के अलावा हर इनसान मर्यादा को आवारा, बदचलन, बिगड़ी हुई लड़की समझने लगा. उस के पास एकमात्र रास्ता अर्जुन बचा था, फिर भी वह उसे कोई मौका नहीं दे रही थी.

अगले 3 महीनों तक अकेले कहीं ले जाने, मिलने, छूने, बोलने का कोई भी मौका मर्यादा ने अर्जुन को नहीं दिया, जिस से मर्यादा पर उस का क्रश बहुत बढ़ गया. अर्जुन अपनी बलात्कार की ज्यादती को भावनाओं का बहाव बता कर अपने प्यार की कसम खा रहा था.

इधर मौसी ने भी मर्यादा को समझाया था कि जो मर्द अपने पहले प्यार में ही किसी लड़की का खून निकाल कर उसे एक पूरी औरत बना देता है, वही सच्चा मर्द होता है. अर्जुन ने वह कर दिखाया था.

मर्यादा को अब अर्जुन के प्यार में कोई शक नहीं बचा था, लेकिन उस के पास पैसों की कड़की थी. उस की आमदनी का जरीया नहीं था, इसलिए वह उस से पीछा छुड़ाना चाहती थी.

इसी उधेड़बुन से तंग आ कर एक दिन मर्यादा ने अर्जुन को साफ शब्दों में समझा दिया कि अगर वह शादी के बाद मेरे लिए पैसे कमा कर नहीं ला सकता, तो उसे मेरा पीछा करने की कोई जरूरत नहीं है.

अर्जुन तैश में वहां से निकल गया. वह खुदकुशी कर सकता था. मर्यादा को मार सकता था. पर मर्यादा उस समय तक उस से इतना तंग आ चुकी थी कि वह क्या करेगा, इस की उसे कोई चिंता नहीं थी.

4 दिन बाद अर्जुन मर्यादा के लिए 4 लाख रुपए ले कर लौटा. मर्यादा ने कभी इतने सारे नोट एकसाथ नहीं देखे थे. उस की आंखें खुली की खुली रह गईं.

अब अर्जुन के सच्चे प्यार को स्वीकारने के अलावा मर्यादा के पास कोई उपाय नहीं बचा था. उस के पैसों की शर्त को अर्जुन ने पूरा कर दिया था और जिंदगीभर प्यार से रखने का भरोसा दिलाया था. वह सच्चे आशिक की तरह मर्यादा के जिस्म के हर रोम को प्यार करता था. घंटों उस के नंगे बदन को निहारता था. बिस्तर पर वह गुलाम की तरह बरताव करता था.

4 दिनों तक एकदूसरे की बांहों में पड़े हुए उन दोनों के सारे गिलेशिकवे खत्म हो चुके थे. उस घटना के लिए उस ने मर्यादा से बारबार और रोरो कर माफी मांगी थी. मर्यादा ने उसे माफ कर दिया.

अभी मेरी जिंदगी में कुछ अच्छा घटना शुरू हुआ ही था कि अर्जुन को पुलिस ने पकड़ लिया. दरअसल, अर्जुन ने पैट्रोल पंप के कैशियर को लूटा था. इस खबर से एक बार फिर मर्यादा की जिंदगी में भूचाल आ गया.

बहरहाल, अर्जुन ने मर्यादा का नाम नहीं बताया. उस ने भी अर्जुन को पहचानने से इनकार कर दिया. शायद अर्जुन बेहद प्यार करने के चलते मर्यादा को किसी परेशानी में डालना नहीं चाह रहा था या फिर पैसे बरामद करा कर अपना जुर्म कबूल करना नहीं चाह रहा था. मर्यादा ने सुना कि थाने में अर्जुन की खूब कुटाई हुई, फिर भी उस ने उस का नाम नहीं बताया.

अर्जुन के दिए हुए 4 लाख रुपए ले कर मर्यादा गांव भाग आई. रुपयों को उस ने बहुत अच्छी तरह से कपड़े में बांध कर भूसा रखने वाले कच्चे मकान के छप्पर में छिपा दिया. यहां भी डर के चलते वह 2 दिन तक खाना नहीं खा सकी. घर के बाहर से किसी गाड़ी की आवाज आती तो लगता कि पुलिस उसे पकड़ने आ गई है.

इस बीच मर्यादा को एक शानदार मौका हासिल हुआ. उस के एक दूर के रिश्तेदार ने बायोडाटा के आधार पर उसे शादी के लिए चुन लिया था. मर्यादा का होने वाला मंगेतर सरकारी नौकरी में था और खानदानी रईस था. उसे मर्यादा की शक्ल और उस का बायोडाटा मर्यादा को तो पसंद आ गया था, लेकिन वह दहेज भी मांग रहा था. इस से पहले कि कोई उसे मर्यादा के कालेज के कांड के बारे में बताए, उसे शादी कर के यहां से हजार किलोमीटर दूर अपनी ससुराल नरसिंहपुर भाग जाना चाहिए.

तय योजना के मुताबिक, अर्जुन को उस के हाल पर छोड़ कर अपने सारे कौंटैक्ट नंबर मिटा कर, मोबाइल फोन की सिम बदल कर, सोशल मीडिया एकाउंट डिलीट कर मर्यादा रविंद्र से शादी कर के अपनी ससुराल भाग गई. अर्जुन के दिए हुए 4 लाख रुपए से उसे दहेज की रकम जुटाने में बहुत मदद मिली थी.

ससुराल पहुंचते ही मर्यादा ने रविंद्र को पूरी तरह से अपने काबू में ले लिया था. मौसी की सिखाई हुई तरकीब के मुताबिक सुहागरात के दिन बेवजह चीखचिल्ला कर उस ने अपने पति को अहसास करा दिया कि वह अभी तक कुंआरी थी.

मर्यादा के वे 6 महीने बहुत मजे से गुजरे. इस के बाद वह अपने गांव लौटी थी. कुनकुनी धूप में अपने ब्रा को सुखाने के लिए डालते समय मर्यादा रविंद्र के विचारों में मगन थी. रविंद्र मर्यादा का बहुत ध्यान रखता था. जवानी का पूरा मजा लेने के लिए वे फैमिली प्लानिंग कर रहे थे.

मर्यादा रविंद्र के विचारों में डूबी ही थी कि ‘मर्यादा’ नाम पुकारे जाने से वह चौंक गई. उस ने बगल की छत पर झांका, तो धक की आवाज के बाद उस का दिल धड़कना बंद सा हो गया.

सामने अर्जुन खड़ा हुआ था. पहले से ज्यादा डरावना. उस के हाथ में देशी तमंचा देख कर मर्यादा को यकीन हो गया कि आज वह उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा.

मुसीबत के समय जिस की जैसी बुद्धि काम कर जाए. मर्यादा ने तुरंत ही अर्जुन को अपनी बांहों में भर लिया और झूठे आंसू बहाने लगी, ‘‘अर्जुन, तुम कहां थे इतने दिन? देखो तुम्हारे बिना मेरा क्या हाल हुआ? घर वालों ने जबरदस्ती मेरी शादी करा दी…’’ कहते हुए वह उस के सीने से लिपट कर फूटफूट कर रोने लगी.

अपनी चालाकी का असर होते देख कर मर्यादा अर्जुन की पैंट में हाथ डाल कर उसे अपने साथ सैक्स के लिए उकसाने लगी.

मर्द तो चौबीस घंटे सैक्स के लिए भूखे रहते ही हैं. खुले आसमान के नीचे, कुनकुनी धूप में, पानी की टंकी के पीछे लेट कर जिस्मानी संबंध बनाने लगे.

अर्जुन ने मर्यादा के हर झूठ को सच मान लिया. अब तो वह उस से लपेटलपेट कर और भी बहुत सारे झूठ बोलने लगी, ‘‘मैं ने अपने पति के साथ सिर्फ सात फेरे लिए हैं, अपना शरीर नहीं छूने दिया… मुझे प्यार करने का हक सिर्फ तुम्हें हैं अर्जुन…

‘‘रविंद्र मेरे शरीर को जीत सकता है, लेकिन आत्मा को नहीं… मैं जल्द ही रविंद्र को तलाक दे कर हमेशा के लिए तुम्हारी हो जाऊंगी…’’

आज मर्यादा को इस अर्जुन नाम के मूर्ख प्राणी से जरा भी डर नहीं लग रहा था. एक महीना, जब तक वह अपने मायके रही, अर्जुन से अपनी और अपने परिवार की भरपूर सेवा कराई.

अर्जुन एक बार फिर कहीं से 2 लाख रुपए लूट कर उस के लिए ले आया, ताकि इन पैसों से वह अपने पति को तलाक दे सके.

वे 2 लाख रुपए एक पुलिस वाले को अर्जुन के ऐनकाउंटर के नाम पर देने के बाद मर्यादा अपनी ससुराल भाग गई. वह मर्द का बच्चा अर्जुन जबरदस्ती मर्यादा की जिंदगी को ड्रामा बनाने की कोशिश कर रहा था. Best Hindi Kahani

Story In Hindi: वैंटिलेटर – कोरोना में दांव पर लगी जिंदगी

Story In Hindi: सरकार कहती है कि उस ने कोरोना महामारी का सामना बहुत अच्छी तरह से किया है, लौकडाउन ने लोगों को बरबाद होने से बचा लिया, पर कोरोना ने कितना नुकसान किया, यह या तो बलि चढ़ने वाला या फिर बलि लेने वाला बता सकता है.कोरोना की दूसरी लहर ने मेरे सारे सपनों को चकनाचूर कर दिया.

हमारे हंसतेखेलते परिवार को बरबाद कर दिया. हमारी जिंदगी को वैंटिलेटर बना दिया. कोरोना ने मुझे सिविल सर्विस प्रतियोगी से दूर कर के कारपोरेट वेश्या बना दिया.आज मैं अपनी यानी पूर्णिमा की कहानी आप को सुनाती हूं. मेरे पिताजी फलों के ठेले की फेरी लगा कर आराम से 800 से 1,200 रुपए रोजाना बचा लेते थे. उन्होंने कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया और यही सीख हम बच्चों को भी मिली थी.

12वीं क्लास में उत्तर प्रदेश की मैरिट लिस्ट में नाम आने के बाद पापा की इच्छा थी कि मैं आईएएस की तैयारी के लिए दिल्ली चली जाऊं और मां की इच्छा थी कि मेरे छोटे भाई विनोद को डाक्टरी की तैयारी कराऊं.मैं जानती थी कि दोनों सपने एकसाथ पूरे नहीं हो सकते, इसलिए मैं ने शहर के एक कालेज में एडमिशन ले लिया और विनोद को डाक्टरी की तैयारी कराने के लिए हम सब पाईपाई जोड़ने लगे.सरकार की गलत नीतियों के चलते महंगाई और बेरोजगारी वैसे ही हद पर थी.

पापा की कमाई तो घरखर्च में भी कम पड़ जाती थी. मेरी और मां की ट्यूशन की कमाई थी, जिस से थोड़ीबहुत बचत हो रही थी.अपने सरकारी कालेज के एक फंक्शन में मेरी मुलाकात शहर के सब से बड़े उद्योगपति के बिगड़ैल लड़के राजीव से हुई थी. मैं ने उस फंक्शन में रानी झांसी का किरदार निभाया था. मेरी बहुत तारीफ हुई थी. राजीव ने मुख्य अतिथि की हैसियत से मुझे पुरस्कार दिया था.राजीव एक बहुत ही महंगी कार से आया था. उस के गोरे, क्लीन शेव चेहरे पर क्रीम कलर का सूट बहुत अच्छा लग रहा था. उस के काले चश्मे में अपना अक्स देख कर मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई थी.

कालेज की बिगड़ी हुई लड़कियां पीछे की लाइन में बैठ कर राजीव के लिए तरहतरह की गंदीगंदी बातें करते हुए अफवाह फैला रही थीं. कुछ लड़कियां राजीव को शहर का सब से काबिल बैचलर बताते हुए उस के लिए ठंडी आहें भरने लगी थीं, तो एक सीनियर लड़की ने बताया कि वह पहले से शादीशुदा है.पता नहीं क्यों इस बात से मुझे भी बुरा लग गया. इस बीच राजीव को अपनी ओर घूरता देख मेरे शरीर में एक सिहरन सी पैदा हो गई. उस दिन के बाद राजीव से मेरी कभी मुलाकात नहीं हुई.मार्च, 2020 में कोरोना महामारी के चलते पूरे भारत में लौकडाउन हो गया.

हम सब की कमाई खत्म हो गई. डेढ़ महीने तो घर बैठ कर अपनी बचत इस्तेमाल करते रहे, उस के बाद पापा ने दोबारा ठेला लगाना शुरू कर दिया. सरकार ने फलसब्जियों की कीमत तो कंट्रोल कर दी थी, लेकिन यह तय नहीं हुआ था कि वह फुटकर में बेची जाएगी कि थोक में यानी दुकानदार 100 रुपए प्रति किलो से महंगे सेब नहीं बेच सकता, चाहे थोक हो या फुटकर.

इस का नतीजा यह हुआ कि मार्जन बहुत घट गया और अब उन्हें रोजाना 200-300 रुपए कमाने में दिक्कत हो रही थी.हमारे पड़ोस की कमला आंटी, जो बड़े लोगों के घरों में बरतन मांजती थीं, अनपढ़ होने के बावजूद उन की जिंदगी अब हम से कहीं बेहतर चल रही थी. उन की मालकिन ने दोबारा उन्हें काम पर बुलाना चालू कर दिया था. 2 महीने उन्हें घर बैठे के पैसे दिए थे, सो अलग.

कमला आंटी के बच्चों को उन की मालकिन के बच्चों की उतरन मिल जाती थी, जो हमारे नए कपड़ों से भी अच्छे होते थे. अब तो कई महीने से हमारे कपड़े खरीदे ही नहीं गए थे. विनोद कमला आंटी के बच्चों के कपड़ों पर ललचाता था, तो अकसर मैं अपने हिस्से के पैसों से भी उसी के लिए कपड़े खरीद देती थी.लड़कियों के कपड़े लड़कों से पहले छोटे हो जाते हैं, क्योंकि वे लंबाई के साथ चौड़ाई में भी बढ़ती हैं. लौकडाउन में मेरे सारे कपड़े छोटे पड़ने लगे थे.

सब से ज्यादा गुस्सा मुझे अपने सीने के साइज को ले कर था. हर सुबह इस का साइज मुझे कुछ बढ़ा हुआ महसूस होता था. मेरी सब से बड़ी साइज की कुरती भी सीने के पास से छोटी हो गई थी. मेरे तकरीबन सारे कपड़े कांख के पास से फटने शुरू हो चुके थे.कमला आंटी को समाजसेवियों के मुफ्त भंडारे का पता चल जाता था. उन्होंने साथ चलने को कहा, तो मैं ने बहुत आनाकानी की, पर मजबूरी में विनोद को ले कर उन के साथ फ्री राशन लेने जाना पड़ा. मैं ने जानबूझ कर और भी खराब कपड़े पहने थे, ताकि मदद देने वाले कुछ गलत न बोलने लगें.शरमाते हुए मैं भीख मांगने की लाइन में लगी ही थी कि धक्के की आवाज के साथ मेरे दिल की धड़कन रुक गई. सामने राजीव सर थे…

मेरे ड्रीम बौयफ्रैंड, जिन के बारे में सपने देखते हुए मैं ने दर्जनों बार मधुर मिलन किया था. मेरा चेहरा शर्म से लाल पड़ गया और मुझे रोना आ गया.जल्द मुझे अहसास हुआ कि दुनिया इतनी बुरी नहीं जितना मैं मानती थी. मदद बांटने वाले लड़के और राजीव सर ने मुझे लाइन तोड़ कर सामान दे दिया. इस से थोड़ी सी वीआईपी वाली फीलिंग आई, लेकिन भीख तो भीख ही होती है.अगले दिन राजीव सर ने दोबारा मुझे कसम दे कर बुलाया था. आज मैं अपने सब से अच्छे कपड़े पहन कर गई थी. राजीव सर थोड़ी देर से आए थे. भीख के लालच में जनता बेसब्री से उन का और उन की टीम का इंतजार कर रही थी.राजीव सर अपनी बड़ी शाही कार से आने के बाद सीधे मेरे पास आ कर रुके.

वे आज मेरे भाई विनोद के लिए एक बहुत बड़ी चौकलेट ले कर आए थे. वे मुझ में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी ले रहे थे. मुझे इस बात से शर्मिंदगी भी हो रही थी, तो दूसरी ओर मैं रोमांचित भी हो रही थी.राजीव सर बहुत देर से मेरे सीने को ही देखे जा रहे थे. तब मुझे अहसास हुआ कि मेरी नई कुरती भी कांख के पास से फट चुकी थी. मैं जब तक संभलती, तब तक राजीव सर मेरे ‘ताजमहल’ को अच्छी तरह ताड़ चुके थे.अगले दिन राजीव सर मेरे लिए टौप लाए थे और उन्होंने जबरदस्ती गाड़ी के अंदर जा कर नया टौप पहनने को मुझे मजबूर कर दिया.

मैं बाहर निकली, तो टौप से कंपनी का टैग निकालने के बहाने उन का मुंह मेरे बेहद करीब था. उन की सांस को मैं अपनी आंखों पर महसूस कर रही थी. उन के गुलाब की खुशबू का परफ्यूम बेहद मस्त था.अचानक उन्होंने मेरे नितंबों को अपनी हथेली से पकड़ते हुए अपनी ओर खींचना शुरू किया, तो घबरा कर मैं ने उन्हें धक्का दे दिया. उन से दूर भागते हुए दूर से ही उन्हें ‘थैंक्यू’ बोला और उन्हें ‘बाय’ बोलते हुए वहां से दौड़ निकली.विनोद ने बहुत पूछा कि दीदी हुआ क्या है, लेकिन मैं ने जवाब में सिर्फ विनोद का सिर चूमा. उस दिन के बाद विनोद ने बहुत जिद की, लेकिन मैं फ्री का राशन लेने नहीं गई. उस दिन से फिर मेरी राजीव सर से तीसरी बार मुलाकात नहीं हुई.अगस्त महीने में कोरोना का असर थोड़ा कम होने लगा था. मुफ्त का भोजन बंटना अब बंद हो चुका था.

मेरा कालेज दोबारा खुल गया था. मैं ने पूरा मन बना लिया था कि कोई नौकरी कर लूंगी. घर के माली हालात के हिसाब से मुझे अब अपने छोटे भाई को डाक्टर बनाने का सपना नामुमकिन सा लग रहा था.हमारे कालेज में सोशल डिस्टैंस, मास्क, सैनेटाइजर, कोरोना प्रोटोकाल का पालन करते हुए कोई न कोई कार्यक्रम होता रहता था. कालेज की सब से मेधावी छात्र होने के चलते इवैंट मैनेजमैंट की जिम्मेदारी मेरी रहती थी. मेरी आंखें हर मास्क के पीछे राजीव सर को ही तलाशती रहती थीं.

जिंदगी में पहली बार मुझे गरीब होने का दुख था. अगर कुछ अच्छे कपड़े होते, अगर मैं भी उन के साथ गरीबों को दान कर रही होती, तब हमारी दोस्ती के कुछ और माने होते. रोतेरोते मेरी आंख लग चुकी थी. राजीव सर सपने में मेरे सीने और जांघों को मसलते हुए मेरे होंठ चूम रहे थे. उन्होंने मेरे कपड़े उतारते हुए मुझे अपनी औफिस की टेबल पर लिटा दिया, उस के बाद वे मुझे प्यार करने लगे. जैसे ही वे मुझ में समाने लगे, तो मैं चौंक कर उठ गई. यह सिर्फ एक सपना होने पर मुझे तसल्ली हुई.कोरोना की दूसरी लहर शुरू होने के चलते बाजार बंद किए जाने लगे. पापा ने तय कर लिया था कि इस बार कुछ भी हो जाए, वे फेरी लगाना बंद नहीं करेंगे. यह फैसला हमारी जिंदगी की सब से बड़ी गलती साबित हुई.

पापा को कोरोना हो गया. बुखार, खांसी और थकान के साथसाथ उन्हें सांस लेने में भी दिक्कत हो रही थी. जाहिर था कि वे कोरोना की दूसरी अवस्था में थे. शाम होतेहोते पापा का औक्सीजन लैवल बहुत घट गया और उन्हें वैंटिलेटर की जरूरत महसूस होने लगी. सरकारी अस्पताल में वैंटिलेटर की कमी हो रही थी.कमला आंटी ने बताया, ‘‘एक बार सरकारी अस्पताल के इमर्जैंसी वार्ड में जाने के बाद मुरदे ही बाहर आ रहे हैं.’’रिश्तेदारों ने भी निजी अस्पताल का सुझाव दिया.

मम्मी ने डेढ़ लाख रुपए जोड़ रखे थे. यह रकम हम लोगों के लिए बहुत बड़ी थी. मम्मी को लगता था कि इस के बूते वे किसी भी समस्या से बाहर आ जाएंगी. पापा का निजी अस्पताल में इलाज शुरू हो गया. आरटीपीसीआर और एंटीजन टैस्ट पौजिटिव आया था. सीटी स्कैन में 19/24 इंफैक्शन पाया गया. अस्पताल के कमरे का एक दिन का चार्ज 1950 रुपए, नर्स का चार्ज 900 रुपए, डाक्टर की एक विजिट के 900 रुपए थे.रेडियोलौजी टैस्ट के लिए… ऐक्सरे चैस्ट पीए व्यू 550 रुपए, अल्ट्रासाउंड 2,000 रुपए, सीटी चैस्ट एचआरसीटी 7,150 रुपए. खून की जांच के लिए, एंटी एचसीबी टैस्ट 1,450 रुपए, ब्लड कल्चर 1,100 रुपए, डीडाईमर 1,600 रुपए और ब्लड शुगर 100 रुपए प्रति जांच.मैं ने पूछा, ‘‘मेरे पापा को तो शुगर नहीं है, तो टैस्ट क्यों?’’डाक्टर ने बताया कि मरीज को रैबजोल, लोपारिन, टेजिन वगैरह जो भी दवाएं दी जा रही हैं, सभी में ग्लूकोज है. कोरोना प्रोटोकाल में जरूरी है.

इन दवाओं के बाद मरीज को शुगर रिपोर्ट के मुताबिक इंसुलिन दिया जा रहा है.इन सारी बातों के बीच सिस्टर रोजी से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी. वे जींसटौप में स्कूटी से अस्पताल आती थीं. एक घंटा उन्हें अस्पताल की ड्रैस पहनने और मेकअप में लगता था. इस बीच अगर कोई उन्हें टोक दे तो उन्हें बहुत गुस्सा आता था. मुझे समझ नहीं आता था कि इस प्रोफैशन में मेकअप की क्या जरूरत? सिस्टर रोजी ने बताया कि औरत को हर प्रोफैशन में मेकअप की जरूरत होती है. औरत कितनी भी बुद्धिमान क्यों न हो, उसे अच्छा दिखना होता है.

मुझे उन की जौब बहुत अच्छी लगती थी. मैं उन से कई बार उन के जैसी जौब दिलाने को कह चुकी थी.सिस्टर रोजी मुसकरा कर कहती, ‘‘उस के लिए कुछ कंप्रोमाइज करना होता है. हाथी के दांत दिखाने के और खाने के और होते हैं…’’ और बात खत्म हो जाती थी.एक दिन रोजी मैडम ने अपनी मेकअप किट से मुझे लिपस्टिक लगा दी. मैं ने जिंदगी में पहली बार लिपस्टिक लगाई थी और केवल इस वजह से मैं आईने में बेहद खूबसूरत लगने लगी थी. रोजी मैडम ने बताया कि मेरे चेहरे की बनावट बहुत अच्छी है. सीने, कमर और नितंबों का अनुपात बहुत अच्छा है. अगर मैं कोशिश करूंगी, तो मुझे अच्छी नौकरी मिल जाएगी. अस्पताल में चौथे दिन ही हमारे सारे पैसे वैंटिलेटर की भेंट चढ़ गए.

डाक्टर ने प्लाज्मा थैरेपी के लिए 20,000 रुपए अलग से मांगे. मम्मी के ट्यूशन के बच्चों से उम्मीद नहीं थी, क्योंकि आधे बच्चे तो फ्री में ही ट्यूशन पढ़ते थे, बाकी भी गरीब परिवारों से थे. हमारे महल्ले में ज्यादातर गरीब लोग रहते थे.मेरे कालेज के बहुत से दोस्त पापा को देखने आए थे. जिन लड़कों से मैं सीधे मुंह कभी बात नहीं करती थी, उन्होंने भी हमारी मदद की थी.

इन सब को जोड़ कर कुल 8,000 रुपए हुए थे.मैं ने दोबारा कातर निगाह से दोस्तों को देखा. जितेंद्र मेरी मदद करने को तैयार हो गया, लेकिन वह कुछ रिटर्न चाहता था. जितेंद्र हमारे कालेज का सब से अमीर, बिगड़ा हुआ और स्टूडैंट यूनियन का नेता था. अगर मुझे यही सब करना होता, तो जितेंद्र का औफर मैं ने तुरंत स्वीकार कर लिया होता, पर उस की मदद लेने से मैं ने साफ इनकार कर दिया.रोजी मैडम ने हमें इलाज के खर्च में छूट दिला दी. कुछ रिश्तेदारों से मदद हो गई.

इस तरह मैं इस मुसीबत से तो बाहर आ गई, लेकिन अगले ही दिन एक नई मुसीबत आ पड़ी. डाक्टर अब रेमडेसिवीर खरीदने को कह रहे थे. मैं पूरी तरह लाचार हो चुकी थी.तभी मुझे अस्पताल के गेट से राजीव सर आते दिखे. सफेद खादी के कुरते और ग्रीन सनग्लास में वे फिल्मी हीरो की तरह लग रहे थे. इतने बुरे हालात में उन के सामने आने की मेरी जरा भी हिम्मत नहीं थी.

मैं ने दीवार की ओर सिर कर के उन से छिपने की कोशिश की, पर उन्होंने मुझे देख लिया.चिरपरिचित गुलाब की खुशबू महसूस होते ही मुझे पीछे मुड़ कर देखने की इच्छा होने लगी. एक परिचित आवाज में मेरा नाम ‘पूर्णिमा’ सुनते ही मेरा सब्र जवाब दे गया. मैं राजीव सर से लिपट कर देर तक रोती रही. काउंटर पर जा कर उन्होंने कुछ बात की, तो अकाउंटैंट हैरानी से मुझे देखने लगी. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि मेरी जैसी सीधीसादी, देहाती लड़की राजीव सर की दोस्त है.

राजीव सर उस अस्पताल के मालिक के बेटे थे.फिर उस के बाद 2 दिन और मेरे पापा वैंटिलेटर पर रहे, उस के बाद सामान्य औक्सीजन पर आ गए. अब अस्पताल में मुझ से पैसे मांगे ही नहीं जा रहे थे.रोजी मैडम को जब मेरी और राजीव सर की दोस्ती के बारे में पता चला, तो वे खुशी से फूली नहीं समा रही थी. उन्होंने मुझे दोपहर में स्टाफरूम में बुला कर गेट बंद कर लिया. मेरे सारे कपड़े उतारने के बाद उन्होंने मुझे शीशे के सामने खड़ा कर दिया.

मेरे एकएक अंग की खास बनावट के बारे में मुझे समझाने लगीं. मेरे सीने की नाप की तुलना में उभारों की माप कुछ ज्यादा थी और वे आम की तरह पिलपिले नहीं, सेब की तरह सख्त थे. उस पर निप्पल बटन की तरह न हो कर खूंटी की तरह थे. वे काले नहीं, सुर्ख गुलाबी थे. इसी तरह मेरे नितंबों का आकार भी कमर की तुलना में ज्यादा था और वे गीली मिट्टी की तरह लचर न हो कर रबड़ की तरह तने से थे. गोरा रंग और चेहरे की उभरी हुई बनावट मुझे आकर्षक और ग्लैमरस बनाते थे.

मतलब, मैं एक खास प्रोफैशन के लिए परफैक्ट थी. पर मुझे रोजी मैडम की बेहूदा बातें जरा भी पसंद नहीं आ रही थीं. उन्हें भलाबुरा बोल कर मैं बाहर निकल गई. कुदरत की मरजी को कोई नहीं समझ सका है. पापा के ठीक हो कर घर लौटते ही एक दिन राजीव सर का बुलावा आया. उन के एहसान का बदला चुकाने और उन की प्रेमिका बनने के लिए मैं पहले से तैयार बैठी थी. एक महीने में एक दर्जन जगहों पर बुला कर उन्होंने मुझे भरपूर भोगा, उस के बाद मुझे मेरी औकात समझा कर बाहर का रास्ता दिखा दिया.अपनी इज्जत गंवाने के बाद अब मेरे पास रोजी मैडम के बताए रास्ते पर चलने के अलावा कोई रास्ता न था. Story In Hindi

Hindi Story: सोने की पौलिश – जब एक प्रेमी की उतर गई कलई

Hindi Story: ना हर और चिया में इश्क की रवानगी अपनी हद पर थी और आज चिया अपनी स्कृटी को लगातार एक उड़ान दिए जा रही थी. रफ्तार बढ़ाने के साथसाथ उस के चेहरे की बादामी चमक भी बढ़ती जा रही थी. यह फेशियल की चमक नहीं थी, बल्कि यह तो रोड पर मर्दों की भीड़ को पीछे छोड़ देने से उमड़े फख्र की रौनक थी.

चिया के बाल अब भी हलके से गीले थे और उस के बालों से उठती हुई नैचुरल गंध पीछे की सीट पर बैठे नाहर को बहुत भा रही थी. कभीकभी नाहर जानबूझ कर अपने चेहरे को थोड़ा आगे कर देता, जिस से चिया के बाल उस के चेहरे को छू जाते थे. 28 साल का नाहर रोमांचित हुए बिना नहीं रह पा रहा था.

चिया ने आज हलके पीले रंग का सूट पहन रखा था. अनजाने में ही उस ने यह कलर नहीं चुन लिया था, बल्कि इसे तो आज इसलिए पहना था, क्योंकि यह नाहर का पसंदीदा रंग था.

नाहर लखनऊ यूनिवर्सिटी से हिंदी भाषा में पीएचडी कर रहा था, तो चिया एमकौम की छात्रा थी. नाहर अकसर यूनिवर्सिटी के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेता था और उन्हीं कार्यक्रमों में चिया कौमर्स फैकल्टी की नुमाइंदगी करती थी. बस यहीं से 2 नौजवान दिल एकदूसरे के लिए धड़कने लगे थे.

नाहर ‘वीर भारत’ नामक एक पार्टी का सदस्य था और आगे चल कर वह इस पार्टी का बड़ा नेता बनना चाहता था, जबकि चिया चाहती थी कि वह कोई अच्छी नौकरी करे.

‘‘पर, तुम ने यहां स्कूटी क्यों रोकी? मुझे तो यहां नहीं जाना…’’ चिया ने अपनी स्कूटी रैजीडैंसी के सामने रोकी, तो नाहर ने बिना सीट से उतरे हुए पूछा.

चिया ने इशारे से अंदर चल कर बैठ कर समय बिताने को कहा, तो नाहर ने साफ मना कर दिया. नाहर का कहना था कि वह किसी ऐसी जगह नहीं जाना चाहता, जहां पर उसे अपने और अपने देश की गुलामी की झलक मिलती हो और यह ‘रैजीडैंसी’ उसे ऐसा ही महसूस कराती है, जैसे वे अब भी अंगरेजों के गुलाम हों.

‘‘ये विदेशी हमलावर, जिन्होंने हमारे देश को तोड़ा और लूटा, मैं इन की हर चीज से नफरत करता हूं. अंगरेजों और मुगलों ने हमारी संस्कृति को बरबाद किया है…’’ नाहर ने भड़ास निकाली.

चिया नाहर की बात सुन रही थी और उसे नाहर की बातें बच्चों जैसी लग रही थीं, ‘अगर हम गुलाम रहे तो इस में हमारी आपसी फूट और बुजदिली जिम्मेदार रही होगी और फिर नाहर को विदेशी संस्कृति से इतनी ही परेशानी है तो वह पैंट और शर्ट क्यों पहनता है? यह भी तो विदेशी पहनावा है. वह क्यों नहीं कुरता और धोती पहन लेता…’ चिया ने अपने मन में सोचा, पर नाहर के गुस्से को देखते हुए कुछ नहीं कहा.

उन दोनों में कुछ देर के बाद शहीद पार्क में जा कर बैठने की बात पर राजीनामा हुआ, तो चिया ने कुछ दूरी पर ही बने शहीद पार्क की तरफ स्कूटी दौड़ा दी.

शहीद पार्क पहुंच कर चिया और नाहर ने अपने भविष्य को ले कर बातचीत शुरू कर दी थी. चिया के मन में आज कुछ ऐसी बातें हुए थीं, जो वह नाहर को बताना चाह रही थी, पर नाहर तो पार्क में आ कर भी चिया की बात पर कम ध्यान दे रहा था. वह शहीद पार्क में बने ऊंचे स्तंभों के पास जाता, उन्हें छूता और लंबीलंबी सांसें लेता, जैसे उस के अंदर देशभक्ति की भावना जाग रही हो.

नाहर के अंदर का यह बदलाव चिया से छिपा नहीं था, पर कई बार 2 लोगों के बीच पनपा हुआ प्रेम एकदूसरे की बड़ी से बड़ी कमी भी देख नहीं पाता और यही हाल चिया का भी था. नाहर को आर्टिफिशियल गहने पसंद थे, तो चिया को खालिस सोने के गहनों का शौक था.

‘‘इन पर सोने की पौलिश होती है, उतर जाए तो अंदर का जंग लगा हुआ लोहा ही रह जाता है,’’ चिया ने एक लौकेट नाहर को लौटाते हुए कहा था. उस की इस बात पर नाहर नाराज भी हुआ था, पर शांत ही रहा था.

चिया तो आज नाहर को यह बताना चाह रही थी कि अब उन दोनों को शादी के बंधन में बंध जाना चाहिए, क्योंकि वह पेट से थी.

कुछ महीने पहले जब यूनिवर्सिटी का सालाना जलसा था, तब कार्यक्रम के दौरान हुई बारिश चिया और नाहर के प्रेमाग्नि की गवाह बनी थी और उन दोनों के बीच शारीरिक संबंध बन गए थे और उस के बाद कई बार बने थे. बच्चा ठहर जाने की बात चिया आज नाहर को बता देना चाह रही थी.

‘‘अरे वाह… चिया… तुम ने मुझे यह सब बता कर एक नया अनुभव दिया है. भले ही समाज इसे एक भूल कहे, पर तुम्हारा यह तोहफा मैं कभी नहीं भूलूंगा,’’ कहते हुए नाहर ने चिया का माथा चूम लिया था.

चिया को नाहर का इस तरह प्रेम प्रदर्शन अच्छा लग रहा था. अब इस शादी को अमलीजामा पहनाने के लिए जरूरी था कि नाहर और चिया के घर वाले एकदूसरे से बात कर लें. इसी दिशा में पहला कदम खुद नाहर ने बढ़ाया था.

नाहर को अपने मांबाप को ले कर चिया का हाथ मांगने के लिए उस के घर जाना था. ऐसा हुआ भी. दरवाजा चिया ने ही खोला था. हलकी सी शर्म की चमक लिए हुए वह हाथ से बैठने का इशारा कर के आगे बढ़ गई.

नाहर का परिवार ड्राइंगरूम में आ गया. दरवाजे पर सजी हुई कलाकृतियां चिया के कलाप्रेमी होने का सुबूत दे रही थीं और चिया के इस हुनर को नाहर अच्छी तरह जानता भी था.

चिया के पापा सामने आ कर बैठ गए और कुछ औपचारिक बातें होने लगीं. चिया कुछ देर बाद चाय ले कर आ गई.

नाहर की मां ने चिया को अपने पास बुलाया और प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा. चिया को फूलों का बुके दिया. शायद चिया उन्हें पसंद आ गई थी.

‘‘आंटी नहीं दिख रही हैं?’’ नाहर ने पूछा, तो चिया ने बताया कि अम्मी अभी अपना रोजा खोल रही हैं. वे कुछ देर बाद उन्हें जौइन करेंगी.

चिया के ये शब्द नाहर के कानों में पिघलते हुए सीसे की तरह उतरते चले गए. हजार सवाल नाहर के चेहरे पर तैरने लगे, ‘रोजा… तो क्या चिया की मां मुसलिम हैं?’ नाहर के मन में एकसाथ हैरानी और नफरत के भाव आते चले गए.

‘‘हां नाहर, मेरी मां एक मुसलमान परिवार से हैं, जबकि मेरे पिता हिंदू हैं… और मैं ने तुम से यह बात छिपाने की कोशिश नहीं की. इनफैक्ट, तुम्हारे सामने मैं ने अपनी मां को हमेशा ‘अम्मी’ ही कहा था.’’

‘इस इंटरनैट की दुनिया में लोग अपने मांबाप को किसी भी नाम से पुकारते हैं और फिर तुम्हारे जैसी अच्छी हिंदी बोलने वाली लड़की की मां एक मुसलिम होगी, यह बात मेरी समझ में नहीं आती…’ नाहर बहुतकुछ कहना चाह रहा था. शायद वह चिल्लाना भी चाह रहा था, पर ज्यादा गुस्से के चलते ऐसा कर नहीं सका और जब उसे कुछ समझ नहीं आया, तब वह उठ कर चला गया. मौके की नजाकत देख कर नाहर के मांबाप भी वहां से चले गए.

चिया को नाहर का बरताव बड़ा अजीब सा लगा था. उधर नाहर लगातार यह सोच कर परेशान था कि क्यों वह चिया की सचाई पहचान नहीं पाया था. चिया की मां मुसलिम है और पिता भले ही हिंदू है, पर चिया भी तो मुसलिम ही हुई. कैसे उस ने चिया के हाथों से उसी के घर का बना खाना खा लिया और आज तक वह कितनी बार तो चिया की मां से मिला था, पर उन के मुसलिम होने की बात आज ही उस के सामनेक्यों आई?

कहीं यह चिया द्वारा जानबूझ कर तो नहीं किया गया? यकीनन ही ऐसा किया गया होगा, तभी तो चिया ने उस दिन उसे शारीरिक संबंध बनाने से नहीं रोका और इस का मतलब तो यह भी है कि चिया ने जानबूझ कर उस का धर्म भ्रष्ट होने दिया और अब वह खुद को पेट से हो कर बता कर उस से शादी करना चाहती है.

‘‘ओह, एक गहरी और सोचीसमझी साजिश का शिकार हो गया मैं…’’ बुदबुदा उठा था नाहर. उसे अपने शरीर से भी घिन आ रही थी. वह बारबार अपनेआप को पानी से धो रहा था और सवालजवाब किए जा रहा था.

चिया से फोन पर बात करना मुमकिन नहीं था, इसलिए उस ने मोबाइल फोन पर मैसेज टाइप किया, ‘मुझे धोखे में क्यों रखा? गैरजाति की होते हुए मेरे साथ धोखा किया. मेरे लिए अब तुम से शादी करना मुमकिन नहीं.

‘और हां, होने वाले बच्चे की धमकी देने की कोशिश मत करना, क्योंकि तुम्हारे चरित्र का क्या भरोसा? जिस तरह तुम मेरे साथ सोई, उसी तरह किसी और के साथ सोई होगी…’ और नाहर मैसेज लिखता ही चला गया, जिस में उस ने जीभर कर चिया के चरित्र पर सवाल उठाए थे.

नाहर की तरफ से ऐसी बातें भी कही जा सकती हैं, यह चिया ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. एक कमजोर और टूटे हुए दिल के सच्चे दोस्त उस के आंसू होते हैं. चिया अपनेआप को रोक न सकी और आंसुओं में बह गई.

‘‘तो क्या तू खुदकुशी करने को सोच रही है?’’ चिया की अम्मी शबनम ने उस के विचारों को पढ़ लिया था. कुछ न कह पाई चिया, बस अम्मी के सीने से चिपक कर रह गई.

एक समय में चिया की मां ने भी तो प्रेम ही किया था और चिया के पापा से शादी करने के लिए जातपांत के बंधनों को तोड़ कर और अपने परिवार को ठुकरा कर उस ने शादी रचाई थी, पर चिया के प्रति नाहर का प्रेम प्रेम नहीं कहा जा सकता.

‘‘अच्छा हुआ, जो समय रहते नाहर की हकीकत पता चला गई. ऐसी सोच जितनी जल्दी उजागर हो जाए, उतना अच्छा,’’ अम्मी ने चिया को समझाया कि उस ने तो नाहर से प्रेम किया था, पर नाहर जाति के फेर में उलझा हुआ एक साधारण सा लड़का निकला, इसलिए चिया को न ही परेशान होना चाहिए और न ही उसे कोई गलत कदम उठाने की जरूरत है.

‘‘तो फिर क्या करूं मैं? क्या इस बच्चे को दुनिया में आने से पहले ही मार दूं?’’ चिया फुसफुसाई तो अम्मी भी उस के पेट से होने की बात सुन कर ठिठक गईं, पर अगले ही पल उन्होंने कहा कि बेशक, वह बच्चे को मार सकती है, पर अगर वह ऐसा करेगी तो यह बच्चा जो नाहर और चिया के प्रेम की निशानी है, वह एक पाप की निशानी बन जाएगा.

अम्मी की बातें सुन कर चिया को ज्यादा कुछ समझ नहीं आया. वह अपने कमरे में चली गई.

कुछ दिनों बाद चिया के मोबाइल पर नाहर की मां ने बात की. उन्होंने चिया से परेशान न होने को कहा. साथ ही, यह भी कहा कि वे नाहर से खुल कर बात करेंगी और उसे इंसाफ दिला कर रहेंगी.

इंसाफ का नाम सुन कर चिया ने कुछ कहना चाहा, पर तब तक फोन कट चुका था.

‘‘तुम्हें एक लड़की से प्रेम हो जाता है और तुम उस के साथ घूमतेफिरते हो, संबंध भी बना लेते हो, फिर उस की मां के मुसलिम होने से तुम्हें एतराज हो जाता है,’’ मां नाहर से तीखे सुर में बोल रही थीं. बदले में नाहर ने भी गरमी से जवाब दिया कि उस के साथ धोखा हुआ है और उस से सही बात छिपाई गई है.

‘‘पर, क्या फर्क पड़ता है अगर उस की मां मुसलिम है, बचपन में तुम्हारे कई दोस्त थे जो मुसलिम थे और उन का घर पर भी आनाजाना था,’’ मां ने कहा.

‘‘बचपन की बात और थी मां, आगे चल कर मुझे नेता बनना है. इस के लिए मेरी हिंदूवादी छवि का बना रहना जरूरी है,’’ नाहर का रूखा जवाब था.

मां कुछ देर सोचती रहीं और फिर बोलीं, ‘‘और अगर मैं तुम्हें यह बता दूं कि तुम से पहले भी यह परिवार जाति का दंश झेल चुका है, तब तुम पर क्या बीतेगी?’’

मां ने कहा, तो नाहर बिफर उठा, ‘‘आप को जो कहना है कहो, पर सचाई तो यह है कि एक दूसरे धर्म की लड़की से शादी नहीं करूंगा मैं.’’

‘‘ठीक है तो सुनो, तुम्हारी बूआ ने भी एक मुसलिम से शादी कर ली थी और फिर उन्हें इस परिवार ने कभी नहीं स्वीकार किया. उन दोनों को जान से मार देने की कोशिश भी की गई थी. उन दोनों ने शहर छोड़ कर अपनी जान बचाई.

‘‘बूआ परिवार से अलग हो जाने का सदमा नहीं सहन कर पाई और उन्होंने खुदकुशी कर ली…’’ मां लगातार बोले जा रही थीं, पर आज यह सचाई सुन कर नाहर को भरोसा नहीं हो रहा था.

मां की बातें सुन कर दुविधा में पड़ गया था नाहर, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह जातपांत के चक्कर में पड़ कर इतना बेगैरत कैसे हो गया था. उस ने भी तो चिया की जाति बिना जाने प्रेम ही किया था, फिर उस की मां की जाति और धर्म जानने के बाद उस का चिया के लिए प्रेम कैसे खत्म हो गया? और जो

इस तरह से खत्म हो जाए, वह प्रेम नहीं हो सकता.

सच में नाहर एक बड़ी गलती करने जा रहा था. आज उसे आईना दिखाया गया तो उसे अपना असली चेहरा दिखाई दिया. सच ही तो है कि प्रेम और शादी एक निजी मामला है, जो जाति देख कर नहीं किया जाता.

‘‘ओह, तो क्या मुझे चल कर चिया से माफी मांगनी चाहिए और चिया से शादी की बात भी फाइनल कर लेनी चाहिए…’’ नाहर पसोपेश में था और यह सब बुदबुदाते हुए बाहर निकल गया. अगले आधे घंटे के बाद ही वह चिया के सामने खड़ा था.

‘‘पर, अब बहुत देर हो गई है नाहर… अब हम एक नहीं हो सकते. और अच्छा हुआ, जो तुम्हारे अंदर बैठे जातपांत का मैल मेरे सामने पहले ही निकल कर आ गया. अगर तुम्हारी यह सचाई मुझे बाद में पता चलती, तो शायद मैं कुछ न कर पाती…’’ मानो चिया बहुतकुछ कह देना चाहती थी और उस ने नाहर को खूब लताड़ा.

‘‘नहीं, पर अब मेरी आंखों पर पड़ा परदा हट गया है. अब मैं तुम्हें स्वीकारने को तैयार हूं,’’ नाहर ने कहा.

‘‘मुझे स्वीकार कर के मुझ पर एहसान करने जैसी कोई जरूरत नहीं, क्योंकि आज अगर मैं तुम्हारी ये बातें भूल भी जाऊं तो क्या गारंटी है कि तुम इन सब बातों को भविष्य में नहीं दोहराओगे?’’ चिया ने कहा.

नाहर चुप था. शायद उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था, ‘‘पर, इस बच्चे की जिम्मेदारी और खर्चा मैं उठाने को तैयार हूं,’’ नाहर ने कहा.

‘‘नहीं. तुम्हें उस के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है. मैं अपने बच्चे के लिए मां भी बनूंगी और पापा भी, और मेरी पूरी जिंदगी में यह कोशिश रहेगी कि मैं उसे ऐसी सीख देने में कामयाब रहूं, जहां वह हिंदूमुसलमान के भेदभाव से ऊपर उठ सके,’’ चिया पर नाहर की चिकनीचुपड़ी बातों का कोई असर नहीं हो रहा था.

यह बात सच थी कि नाहर ने चिया से प्रेम किया था, मगर यह प्रेम का कैसा रूप था, जो चिया की मां के मुसलिम होने से नफरत में बदल गया? नाहर के चरित्र पर चढ़ी सोने की पौलिश हट रही थी और उस के अंदर का जंग लगा हुआ लोहा सामने आ रहा था. Hindi Story

Story In Hindi: रुदन – रूसी नताशा के दिल की बात

Story In Hindi: नतालिया इग्नातोवा या संक्षेप में नताशा मास्को विश्वविद्यालय में हिंदी की रीडर थी. उस के पति वहीं भारत विद्या विभाग के अध्यक्ष थे. पतिपत्नी दोनों मिलनसार, मेहनती और खुशमिजाज थे.

नताशा से अकसर फोन पर मेरी बात हो जाती थी. कभीकभी हमारी मुलाकात भी होती थी. वह हमेशा हिंदी की कोई न कोई दूभर समस्या मेरे पास ले कर आती जो विदेशी होने के कारण उसे पहाड़ जैसी लगती और मेरी मातृभाषा होने के कारण मुझे स्वाभाविक सी बात लगती. जैसे एक दिन उस ने पूछा कि रेलवे स्टेशन पर मैं उस से मिला या उस को मिला, क्या ठीक है और क्यों? आप बताइए जरा.

उस ने मुझे अपने संस्थान में 2-3 बार अतिथि प्रवक्ता के रूप में भी बुलाया था. मैं गया, उस के विद्यार्थियों से बात की. उसे अच्छा लगा और मुझे भी. मैं भी दूतावास के हिंदी से संबंधित कार्यक्रमों में उसे बुला लेता था.

नताशा मुझे दूतावास की दावतों में भी मिल जाती थी. जब भी दूतावास हिंदी से संबंधित कोई कार्यक्रम रखता, तो समय होने पर वह जरूर आती. कार्यक्रम के बाद जलपान की भी व्यवस्था रहती, जिस में वह भारतीय पकवानों का भरपूर आनंद लेती.

2-3 बार भारत हो आई नताशा को हिंदी से भी ज्यादा पंजाबी का ज्ञान था और वह बहुत फर्राटे से पंजाबी बोलती थी. दरअसल, शुरू में वह पंजाबी की ही प्रवक्ता थी, लेकिन बाद में जब विश्व- विद्यालय ने पंजाबी का पाठ्यक्रम बंद कर दिया तो वह हिंदी में चली आई.

रूस में अध्ययन व्यवस्था की यह एक खास विशेषता है कि व्यक्ति को कम से कम 2 कामों में प्रशिक्षण दिया जाता है. यदि एक काम में असफल हो गए तो दूसरा सही. इसलिए वहां आप को ऐसे डाक्टर मिल जाएंगे जो लेखापाल के कार्य में भी निपुण हैं.

हम दोनों की मित्रता हो गई थी. वह फोन पर घंटों बातें करती रहती. एक दिन फोन आया, तो वह बहुत उदास थी. बोली, ‘‘हमें अपना घर खाली करना होगा.’’

‘‘क्यों?’’ मैं ने पूछा, ‘‘क्या बेच दिया?’’

‘‘नहीं, किसी ने खरीद लिया,’’ उस ने बताया.

‘‘क्या मतलब? क्या दोनों ही अलगअलग बातें हैं?’’ मैं ने अपने मन की शंका जाहिर की.

‘‘हां,’’ उस ने हंस कर कहा, ‘‘वरना भाषा 2 अलगअलग अभि- व्यक्तियां क्यों रखती?’’

‘‘पहेलियां मत बुझाओ. वस्तुस्थिति को साफसाफ बताओ,’’ मैं ने नताशा से कहा था.

‘‘पहले यह बताइए कि पहेलियां कैसे बुझाई जाती हैं?’’ उस ने प्रश्न जड़ दिया, ‘‘मुझे आज तक समझ नहीं आया कि पहेलियां क्या जलती हैं जो बुझाई जाती हैं.’’

‘‘यहां बुझाने का मतलब मिटाना, खत्म करना नहीं है बल्कि हल करना, सुलझाना है,’’ मैं ने जल्दी से उस की शंका का समाधान किया और जिज्ञासा जाहिर की, ‘‘अब आप बताइए कि मकान का क्या चक्कर है?’’

‘‘यह बड़े दुख का विषय है,’’ उस ने दुखी स्वर में कहा, ‘‘मैं ने तो आप को पहले ही बताया था कि मेरा मकान बहुत अच्छे इलाके में है और यहां मकानों के दाम बहुत ज्यादा हैं.’’

‘‘जी हां, मुझे याद है,’’ मैं ने कहा, ‘‘वही तो पूछ रहा हूं कि क्या अच्छे दाम ले कर बेच दिया.’’

‘‘नहीं, असल में एक आदमी ने मेरे मकान के बहुत कम दाम भिजवाए हैं और कहा है कि आप का मकान मैं ने खरीद लिया है,’’ उस ने रहस्य का परदाफाश किया.

‘‘अरे, क्या कोई जबरदस्ती है,’’ मैं ने उत्तेजित होते हुए कहा, ‘‘आप कह दीजिए कि मुझे मकान नहीं बेचना है.’’

‘‘बेचने का प्रश्न कहां है,’’ नताशा बुझे हुए स्वर में बोली, ‘‘यहां तो मकान जबरन खरीदा गया है.’’

‘‘लेकिन आप मकान खाली ही मत कीजिए,’’ मैं ने राह सुझाई.

‘‘आप तो दूतावास में हैं, इसलिए आप को यहां के माफिया से वास्ता नहीं पड़ता,’’ उस ने दर्द भरे स्वर में बताया, ‘‘हम आनाकानी करेंगे तो वे गुंडे भिजवा देंगे, मुझे या मेरे पति को तंग करेंगे. हमारा आनाजाना मुहाल कर देंगे, हमें पीट भी सकते हैं. मतलब यह कि या तो हम अपनी छीछालेदर करवा कर मकान छोड़ें या दिल पर पत्थर रख कर शांति से चले जाएं.’’

‘‘और अगर आप पुलिस में रिपोर्ट कर दें तो,’’ मुझे भय लगने लगा था, ‘‘क्या पुलिस मदद के लिए नहीं आएगी?’’

‘‘मकान का दाम पुलिस वाला ही ले कर आया था,’’ उस ने राज खोला, ‘‘बहुत मुश्किल है, प्रकाशजी, माफिया ने यहां पूरी जड़ें जमा रखी हैं. यह सरकार माफिया के लोगों की ही तो है. मास्को का जो मेयर है, वह भी तो माफिया डौन है. आप क्या समझते हैं कि रूस तरक्की क्यों नहीं करता? सरकार के पास पैसे पहुंचते ही नहीं. जनता और सरकार के बीच माफिया का समानांतर शासन चल रहा है. ऐसे में देश तरक्की करे, तो कैसे करे.’’

‘‘यह न केवल दुख का विषय है बल्कि बहुत डरावना भी है,’’ मुझे झुरझुरी सी हो आई.

‘‘देखिए, हम कितने बहादुर हैं जो इस वातावरण में भी जी रहे हैं,’’ नताशा ने फीकी सी हंसी हंसते हुए कहा था.

मैं 1997 में जब मास्को पहुंचा था, तो एक डालर के बदले करीब 500 रूबल मिलते थे. साल भर बाद अचानक उन की मुद्रा तेजी से गिरने लगी. 7, 8, 11, 22 हजार तक यह 4-5 दिनों में पहुंच गई थी. देश भर में हायतौबा मच गई. दुकानों पर लोगों के हुजूम उमड़ पड़े, क्योंकि दामों में मुद्रा हृस के मुताबिक बढ़ोतरी नहीं हो पाई थी. सारे स्टोर खाली हो गए और आम रूसी का क्या हाल हुआ, वह तब पता चला जब नताशा से मुलाकात हुई.

नताशा ने मुझे बताया था कि अपने मकान से मिली राशि और अपनी जमापूंजी से वह एक मकान खरीद लेगी जो बहुत अच्छी जगह तो नहीं होगा पर सिर छिपाने के लिए जगह तो हो

ही जाएगी.

‘‘क्यों नया मकान खरीदा?’’ उस के दोबारा मिलने पर मैं ने पूछा.

मेरा सवाल सुन कर नताशा विद्रूप हंसी हंसने लगी. फिर अचानक रुक कर बोली, ‘‘जानते हैं यह मेरी जो हंसी है वह असल में मेरा रोना है. आप के सामने रो नहीं सकती, इसलिए हंस रही हूं. वरना जी तो चाहता है कि जोरजोर से बुक्का फाड़ कर रोऊं,’’ वह रुकी और ठंडी आह भर कर फिर बोली, ‘‘और रोए भी कोई कितना. अब तो आंसू भी सूख चुके हैं.’’

मैं समझ गया कि मामला कुछ रूबल की घटती कीमत से ही जुड़ा होगा. मकानों के दाम बढ़ गए होंगे और नताशा के पैसे कम पड़ गए होंगे. मैं कुछ कहने की स्थिति में नहीं था, चुप रहा.

‘‘आप जानते हैं, राज्य का क्या मतलब होता है? हमें बताया जाता है कि राज्य लोगों की मदद के लिए है, समाज में व्यवस्था के लिए है, समाज के कल्याण के लिए है. यह हमारा, हमारे लिए, हमारे द्वारा बनाया गया राज्य है. लेकिन अगर आप ने इतिहास पढ़ा हो तो आप को पता चलेगा कि राज्य व्यवस्था का निर्माण दरअसल, लोगों के शोषण और उन पर शासन के लिए हुआ था? इसलिए हम जो यह खुशीखुशी वोट देने चल देते हैं, उस का मतलब सिर्फ इतना भर है कि हम अपनी इच्छा से अपना शोषण चुन रहे हैं.’’

नताशा बोलती रही, मैं ने उसे बोलने दिया क्योंकि मेरे टोकने का कोई औचित्य नहीं था और मुझे लगा कि बोल लेने से संभवत: उस का दुख कम होगा.

‘‘आप शायद नहीं जानते कि कल तक हमारे पास 80 हजार रूबल थे, जो हम ने अतिरिक्त काम कर के पेट काटकाट कर, पैदल चल कर, खुद सामान ढो कर और इसी तरह कष्ट उठा कर जमा किए थे. सोचा था कि एक कार खरीदेंगे पर जब उन हरामजादों ने हमारा मकान छीन लिया, तो सोचा कि चलो अभी मकान ही खरीदा जाए,’’ नताशा बातचीत के दौरान निस्संकोच गालियां देती थी जो उस के मुंह से अच्छी भी लगती थीं और उस के दुख की गहराई को भी जाहिर करती थीं, ‘‘पर हमें 2 दिन की देर हो गई और अब पता चला कि देर नहीं हुई, बल्कि देर की गई. हम तो सब पैसा तैयार कर चुके थे. लेकिन मकानमालिक को वह सब पता था, जो हमारे लिए आश्चर्य बन कर आया, इसलिए उस ने पैसा नहीं लिया.’’

नताशा ने रुक कर लंबी सांस ली और आगे कहा, ‘‘आप जानते हैं, यह मुद्रा हृस कब हुआ? यह अचानक नहीं हुआ, उन कुत्तों ने अपने सब रूबल डालर में बदल लिए या संपत्ति खरीद ली और फिर करवा दिया मुद्रा हृस. भुगतें लोग. रोएं अपनी किस्मत को,’’ इतना कह कर वह सचमुच रोने को हो आई, फिर अचानक हंसने लगी. बोली, ‘‘जाने क्यों, मैं, आप को यह सब सुना कर दुखी कर रही हूं,’’ उस ने फिर कहा, ‘‘शायद सहकर्मी होने का फायदा उठा रही हूं. जानते हैं न कि जिन रूबलों से मकान लिया जा सकता था वे अब एक महीने के किराए के लिए भी काफी नहीं हैं.’’

उस ने फीकी हंसी हंस कर फिर कहा, ‘‘और व्यवस्था पूरी थी. बैंक बंद कर दिए गए. लोग बैंकों के सामने लंबी कतारों में घंटों खड़े रहे. किसी को थोड़े रूबल दे दिए गए और फिर बैंकों को दिवालिया घोषित कर दिया गया. लोग सड़कों पर ही बाल नोचते, कपड़े फाड़ते देखे गए. लेकिन किसी का नुकसान ही तो दूसरे का फायदा होगा. यह दुनिया का नियम है.’’ Story In Hindi

Hindi Kahani: अपूर्ण – मंदार के आने के बाद क्या हुआ धारिणी की जिंदगी में

Hindi Kahani: ‘‘धारिणीआज पहली बार नौकरी के लिए बाहर निकली थी. रुद्र के गुजरने के बाद वाह बहुत अकेली ही थी. समीरा की जिम्मेदारी निभाते हुए वह थक जाती थी. समीरा के जिंदगी में पिता रुद्र की खाली जगह भी धारिणी को ही पूरी करनी पड़ती थी. नौकरी के कारण धारिणी की समस्याएं और भी बढ़ गईं. मगर घर में ऐसे कितने दिन बीतते? इसलिए नौकरी धारिणी की जरूरत बन गई थी. एक होस्टल में उसे रिसैप्शनिस्ट की नौकरी मिली थी. रोज रेल से आनाजाना सब से बड़ी समस्या थी, क्योंकि उसे इस की आदत नहीं थी. पहले दिन धारिणी का भाई सारंग साथ आया.’’

सारंग ने उस की अपने दोस्तों से पहचान करा दी, ‘‘दीदी, ये सब आप को मदद करेंगे… किसी को भी पुकारो.’’

‘‘जरूर, टैंशन मत लो मैडम,’’ दोस्तों के गु्रप से आवाज आई.

‘‘दीदी, ये मंदार शेटे. ये और आप ट्रेन से साथसाथ ही उतरोगे. शाम को भी यह आप के साथ ही रहेंगे. चलो, मैं अब निकलता हूं.’’

‘‘हां, जाओ,’’ धारिणी थोड़ी नाराजगी से बोली.

2 मिनट में ट्रेन आई. धारिणी महिलाओं के डब्बे में चढ़ने की कोशिश कर रही थी. सारंग के सभी दोस्त उसी डब्बे में चढ़ गए.

‘‘अरे, यह तो लेडीज डब्बा है… आप लोग इस डब्बे में कैसे?’’

‘‘ओ मैडम, हम यही रहते हैं. अपने गांव की ट्रेन में सबकुछ चलता है. यह मुंबई थोड़ी है,’’ मंदार बोला.

धारिणी चुप हो गई. मन ही मन आज का दिन अच्छा गुजरे ऐसी कामना करने लगी. जैसे

ही सावरगांव आया धारिणी और मंदार ट्रेन से नीचे उतरे, ‘‘चलो मैडम मैं आप को होटल तक छोड़ता हूं.’’

‘‘नहींनहीं, आप को क्यों परेशानी…’’

‘‘अरे, इस में किस बात की परेशानी. आप सारंग की बहन… सारंग मेरा अच्छा दोस्त है… मैं छोड़ता हूं आप को…’’

धारिणी का भी पहला दिन था. वह भी घबरा रही थी. मंदार के कारण उस ने खुद को थोड़ा हलका महसूस किया. इसलिए वह मंदार की गाड़ी में बैठ गई. वैसे दिन अच्छा ही गया. शाम रेलवे में उसे फिर मंदार मिला.

‘‘कैसा गया आज का दिन धारिणी… सौरी मैं जरा जल्द ही नाम से पुकारने लगा.’’

‘‘नहीं इट्स ओके. आप पुकारें नाम से. मैं गुस्सा नहीं होऊंगी.’’

दोनों घर पहुंचे. दूसरे दिन वही किस्सा. धीरेधीरे धारिणी और मंदार अच्छे दोस्त

बने. सुबहशाम मंदार और धारिणी रेल में मिलते थे. कभीकभार मंदार धारिणी को होटल तक छोड़ने के लिए भी आता था, तो कभी लेने के लिए आता था. रातबेरात व्हाट्सऐप पर उन का चैटिंग भी चलता था. धारिणी सभी समस्याएं मंदार के साथ शेयर करती थी.

‘‘जाने भी दो, कुछ नहीं होगा…’’ इन लफ्जों में मंदार धारिणी को समझता था.

धारिणी के लिए मंदार उस की स्ट्रैस रिलीफ की दवा था, समीरा, मांपिताजी, सारंग ये सभी रुद्र की खाली जगह भरने के लिए असमर्थ थे. लेकिन मंदार रुद्र की तरह मानसिक सहारा देता था. मंदार के कारण धारिणी फिर से संजनेसवरने लगी, हंसने लगी, अच्छे कपड़े पहन के घूमने लगी. उस के लिए वह अच्छा दोस्त था. बाइक पर कभीकभी वह उस के कंधे पर हाथ रखती थी. बोलतेबोलते अनजाने में पीठ पर चपत मारती थी. मगर ये सब एक अच्छा दोस्त होने के नाते ही होता था. 6-7 महीने अच्छे बीत गए. एक दिन सावरगांव उतर दोनों ने चाय पी.

‘‘तुम बहुत बातें करती हो मुझ से. ऐसा क्यों?’’

‘‘तुम अच्छे लगते हो मुझे. मुझे तुम्हारे साथ वक्त बिताना अच्छा लगता है. मुझे तुम्हारी पर्सनैलिटी भी बहुत अच्छी लगती है. रेल में नहीं बोल सकती सब के सामने. इस वक्त हम दोनों ही हैं, इसलिए बता रही हूं.’’

‘‘अरे बाप रे, क्या खा कर निकली हो

घर से?’’

‘‘कुछ नहीं, जो सच है वही बता रही हूं,

तुम से जो लड़की ब्याह करेगी वह सचमुच खुशहाल रहेगी.’’

‘‘हां, यहां से 35 किलीमीटर पर गुफाएं हैं. चलोगी देखने?’’

‘‘पागल हो गए क्या? मैं ने घर पर नहीं बताया. किसी कारण विलंब हुआ तो मांबाबूजी चिंता करेंगे.’’

‘‘नहीं, विलंब नहीं होगा, ट्रेन से तुम रात

9 बजे तक  घर पहुंच जाएगी.’’

‘‘मांबाबूजी क्या कहेंगे?’’

‘‘तुम मेरे साथ गुफा देखने जा रही हो यह मत बताना उन को. एक दिन झठ बोलेगी तो क्या फर्क पड़ने वाला है. पिछले 6 महीनों से मैं ने कुछ मांगा तुम से? थोड़ा घूम के आएंगे… तुम्हें चेंज मिलेगा. तुम्हारे लिए कह रहा हूं… मैं तो हजारों बार गया हूं वहां.’’

‘‘नहीं, मैं काम पर जाती हूं.’’

‘‘हां जाओ. अभी कह रही थी कि तुम्हारे साथ वक्त बिताना अच्छा लगता है. जब वक्त आया तो घबरा रही हो.’’

‘‘अरे, मुझे अच्छा लगता है तो क्या मैं तुम्हारे साथ पूरे गांव में कहीं भी घुमूं क्या?’’

‘‘ठीक है, यहां मेरा और सारंग का एक दोस्त रहता है. शाम को उस के बच्चे को देखने तो चलोगी न?’’

‘‘ट्रेन जाएगी फिर?’’

‘‘मैं छोड़ दूंगा तुम्हें तुम्हारे घर पर मेरी मां… इस बारे में पहले ही सोचा है मैं ने.’’

‘‘ठीक है, हो के आएंगे,’’ धारिणी ने मंदार नाराज न हो, इसलिए हामी भर दी.

‘‘1 घंटा जल्दी निकलना ताकि तुम्हें घर पहुंचने में देर न हो.’’

‘‘हां बाबा, कोशिश करूंगी.’’

शाम को धारिणी हमेशाकी तरह 4 बजे होटल के बाहर आ कर खड़ी हो गई. मंदार उस का ही इंतजार कर रहा था.

धारिणी ने बाइक पर बैठते हुए पूछा, ‘‘कहां रहता है तुम्हारा दोस्त?’’

आखिरकार गाड़ी एक घर के पास रुकी. घर को ताला लगा था. आसपास खेत फैले थे. जगह सुनसान थी. लोगों की बस्ती नहीं थी और चहलपहल भी नहीं थी.

‘‘इस घर को ताला क्यों लगा है मंदार?’’

‘‘चाबी मेरे पास है. आओ अंदर चलते हैं.’’

‘‘मगर क्यों? मुझे घर छोड़ दो.’’

‘‘बावली हो क्या? कभी न मिलने वाला एकांत मिला है हमें. आधा घंटा बैठेंगे, फिर निकलेंगे.’’

‘‘मैं नहीं जाउंगी अंदर.’’

‘‘देखो, तुम पहले आंखें बंद कर के खड़ी रहो. मैं सिर्फ एक जीभर के किस लूंगा और फिर निकलेंगे. तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है क्या?’’

‘‘देखो मंदार, तुम मुझे दोस्त की हैसीयत से अच्छे लगते हो. लेकिन इस बात के लिए मेरी नजदीकी सिर्फ रुद्र से थी और मरते दम तक उस से ही रहेगी.’’

‘‘लेकिन मुझे भी तुम अच्छी लगती हो और अगर मुझे तुम्हें स्पर्श करने को दिल करता है, तो इस में गलत क्या है?’’

‘‘शायद मेरी ही गलती… मुझे तुम से दूर रहना चाहिए था.’’

‘‘अरे सुनो तो, खाली 1/2 घंटा है हमारे पास. क्यों वक्त जाया कर रही हो? ऐसी कौन सी धनदौलत मांग रहा हूं तुम से…’’

‘‘माफ करना… मैं अगर अपनी मर्यादा समझती तो शायद तुम्हें गलतफहमी

न होती अपनी रिलेशनशिप पर… अब तो मेरी ट्रेन भी छूट गई होगी… मुझे सहीसलामत घर पहुंचा दो.’’

‘‘ओह मेरी मां. तुम टैंशन मत ले. तुम्हारी रजामंदी के सिवा मैं कुछ नहीं करूंगा,’’ कह मंदार ने जल्दी बाइक को किक लगाई. 8 बजे गाड़ी घर के सामने खड़ी थी. बाइक की स्पीड और मंदार का गुस्सा साथसाथ चल रहे थे. मगर रास्ते में दोनों एकदूसरे से एक लफ्ज तक नहीं बोले. घर आते ही धारिणी जल्दीजल्दी चलने लगी.

‘‘ओ मैडम, आप को बिना स्पर्श किए घर तक छोड़ा है मैं ने. आप जीत गईं, मैं हारा. मैं ही पागल था, जो हर वक्त आगेपीछे घूमता था. मेरी एक इच्छा पूरी करती, तो कौन सा पहाड़ टूट जाता… मैं कुछ सोने के लिए नहीं कह रहा था मेरे साथ. मैं भी अपनी मर्यादा जानता हूं मैडम.’’

‘‘मंदार, प्लीज इस तरह मुझ से बात मत करो. आखिरकार संस्कार भी कोई चीज होती है या नहीं? इस बात के लिए मेरा मन कभी भी राजी नहीं होगा. तुम्हारे कारण रुद्र के जाने के बाद मैं ने फिर से जीना सीखा. मगर तुम्हें अगर सिर्फ मेरा स्पर्श ही चाहिए, तो मुझ से फिर कभी मत मिलना.’’

‘‘यह भी कहती हो कि तुम मुझे अच्छे लगते हो… पगली स्पर्श करने से ही प्यार व्यक्त होता है.’’

‘‘मंदार मेरे तन पर केवल रुद्र का अधिकार था और रहेगा. तुम जो कह रहे हो वह मेरे संस्कार में कभी नहीं बैठेगा… मेरी सोच कुछ ऐसी ही है.’’

‘‘फिर एक बार गौर करना मेरे कहने पर… मैं इंतजार करूंगा तुम्हारा.’’

‘‘मंदार, तुम्हारी इस साल शादी होने वाली है. तुम्हारी पत्नी को क्या मुंह दिखाऊंगी मैं? तुम मेरे दोस्त हो. शायद उस से भी बढ़ कर हो. मगर हर चीज पूरी होनी ही चाहिए ऐसा नहीं होता. मेरे दोस्त, इसलिए आज से मैं तुम्हें कभी भी परेशान नहीं करूंगी… हम दोनों इस के बाद कभी नहीं मिलेंगे. अगर मेरे कारण तुम्हारा दिल टूट गया होगा, तो मुझे माफ कर देना.’’ Hindi Kahani

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