Hindi Romantic Story: बारिश – फुहार इश्क की

Hindi Romantic Story: मेरी शक्लसूरत कुछ ऐसी थी कि 2-4 लड़कियों के दिल में गुदगुदी जरूर पैदा कर देती थी. कालेज की कुछ लड़कियां मुझे देखते हुए आपस में फब्तियां कसतीं, ‘देख अर्चना, कितना भोला है. हमें देख कर अपनी नजरें नीची कर के एक ओर जाने लगता है, जैसे हमारी हवा भी न लगने पाए. डरता है कि कहीं हम लोग उसे पकड़ न लें.’

‘हाय, कितना हैंडसम है. जी चाहता है कि अकेले में उस से लिपट जाऊं.’

‘ऐसा मत करना, वरना दूसरे लड़के भी तुम को ही लिपटाने लगेंगे.’

धीरेधीरे समय बीतने लगा था. मैं ने ऐसा कोई सबक नहीं पढ़ा था, जिस में हवस की आग धधकती हो. मैं जिस्म का पुजारी न था, लेकिन खूबसूरती जरूर पसंद करने लगा था.

एक दिन उस ने खूब सजधज कर चारबत्ती के पास मेरी साइकिल के अगले पहिए से अपनी साइकिल का पिछला पहिया भिड़ा दिया था. शायद वह मुझ से आगे निकलना चाहती थी.

उस ने अपनी साइकिल एक ओर खड़ी की और मेरे पास आ कर बोली, ‘माफ कीजिए, मु?ा से गलती हो गई.’
यह सुन कर मेरे दिल की धड़कनें इतनी तेज हो गईं, मानो ब्लडप्रैशर बढ़ गया हो. फिर उस ने जब अपनी गोरी हथेली से मेरी कलाई को पकड़ा, तो मैं उस में खोता चला गया.

दूसरे दिन वह दोबारा मु?ो चौराहे पर मिली. उस ने अपना नाम अंबाली बताया. मेरा दिल अब उस की ओर खिंचता जा रहा था.

प्यार की आग जलती है, तो दोनों ओर बराबर लग जाती है. धीरेधीरे वक्त गुजरता गया. इस बीच हमारी मुहब्बत रंग लाई.

एक दिन हम दोनों एक ही साइकिल पर शहर से दूर मस्ती में ?ामते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे. आकाश में बादलों की दौड़ शुरू हो चुकी थी. मौसम सुहावना था. हर जगह हरियाली बिछी थी.

अचानक आसमान में काले बादल उमड़ने लगे, जिसे देख कर मैं परेशान होने लगा. मु?ो अपनी उतनी फिक्र नहीं थी, जितना मैं अंबाली के लिए परेशान हो उठा था, क्योंकि कभी भी तेज बारिश शुरू हो सकती थी.

मैं ने अंबाली से कहा, ‘‘आओ, अब घर लौट चलें.’’

‘‘जल्दी क्या है? बारिश हो गई, तो भीगने में ज्यादा मजा आएगा.’’

‘‘अगर बारिश हो गई, तो इस कच्ची और सुनसान सड़क पर कहीं रुकने का ठिकाना नहीं मिलेगा.’’
‘‘पास में ही एक गांव दिखाई पड़ रहा है. चलो, वहीं चल कर रुकते हैं.’’

‘‘गांव देखने में नजदीक जरूर है, लेकिन उधर जाने के लिए कोई सड़क नहीं है. पतली पगडंडी पर पैदल चलना होगा.’’

‘‘अब तो जो परेशानियां सामने आएंगी, बरदाश्त करनी ही पड़ेंगी,’’ अंबाली ने हंसते हुए कहा.

हम ने अपनी चाल तेज तो कर दी, लेकिन गांव की पतली पगडंडी पर चलना उतना आसान न था. अभी हम लोग सोच ही रहे थे कि एकाएक मूसलाधार बारिश होने लगी.

कुछ दूरी पर घासफूस की एक झोपड़ी दिखाई दी. हम लोग उस ओर दौड़ पड़े. वहां पहुंचने पर उस में एक टूटाफूटा तख्त दिखाई पड़ा, लेकिन वहां कोई नहीं था.

हम दोनों भीग चुके थे. झोपड़ी में शरण ले कर सोचा कि कुछ आराम मिलेगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

अंबाली ठंड से बुरी तरह कांपने लगी. जब उस के दांत किटकिटाने लगे, तो वह बोली, ‘‘मैं इस ठंड को बरदाश्त नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं है.’’

‘‘तुम मुझे अपने आगोश में ले लो. अपने सीने में छिपा लो, तुम्हारे जिस्म की गरमी से कुछ राहत मिलेगी,’’ अंबाली ने कहा. ‘‘अंबाली, हमारा प्यार अपनी जगह है, जिस पर मैं धब्बा नहीं लगने दूंगा, लेकिन तुम्हारी हिफाजत तो करनी होगी,’’ कह कर मैं ने अपनी कमीज उतार दी और उसे अपने सीने से चिपका लिया.
जब अंबाली मेरी मजबूत बांहों और चौड़े सीने में जकड़ गई, तो उस के होंठ जैसे मेरे होंठों से मिलने के लिए बेताब होने लगे थे.

मैं ने उस के पीछे अपनी दोनों हथेलियों को एकदूसरे पर रगड़ कर गरम किया और उस की पीठ सहलाने लगा, ताकि उस का पूरा बदन गरमी महसूस करे. तब मुझे ऐसा लगा, जैसे गुलाब की कोमल पंखुडि़यों पर ओस गिरी हो. मेरी उंगलियां फिसलने लगी थीं.

आधे घंटे के बाद बारिश कम होने लगी थी.

अंबाली मेरी बांहों में पूरी तरह नींद के आगोश में जा चुकी थी. मैं ने उसे जगाना ठीक नहीं सम?ा.
एक घंटे बाद मैं ने उसे जगाया, तब तक बारिश बंद हो चुकी थी.

अंबाली ने अलग हो कर अपने कुरते की चेन चढ़ाई और मुसकराते हुए पूछा, ‘‘तुम ने मेरे साथ कोई शैतानी तो नहीं की?’’

मैं हंसा और बोला, ‘‘हां, मैं ने तुम्हारे होंठों पर पड़ी बारिश की बूंदों को चूम कर सुखा दिया था.’’
‘‘धत्त…’’ थोड़ा रुक कर वह कहने लगी, ‘‘तुम्हारा सहारा पा कर मुझे नई जिंदगी मिली. ऐसा मन हो रहा था कि जिंदगीभर इसी तरह तुम्हारे सीने से लगी रहूं.’’

‘‘हमारा प्यार अभी बड़ी नाजुक हालत में है. अगर हमारे प्यार की जरा सी भी भनक किसी के कान में पड़ गई, तो हमारी मुहब्बत खतरे में तो पड़ ही जाएगी और हमारी जिंदगी भी दूभर हो जाएगी,’’ मैं ने कहा.
‘‘जानते हो, मैं तुम्हारे आगोश में सुधबुध भूल कर सपनों की दुनिया में पहुंच गई थी. मेरी शादी धूमधाम से तुम्हारे साथ हुई और विदाई के बाद मैं तुम्हारे घर पहुंची. वहां भी खूब सजावट थी.

‘‘रात हुई. मुझे फूलों से सजे हुए कमरे में पलंग पर बैठा दिया गया. तुम अंदर आए, दरवाजा बंद किया और मेरे पास बैठे.

‘‘हम दोनों ने वह पूरी रात बातें करते हुए और प्यार करने में गुजार दी,’’ इतना कह कर वह खामोश हो गई.

‘‘फिर क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हवा का एक बवंडर आया और मेरा सपना टूट गया. मैं ने महसूस किया कि मैं तुम्हारी बांहों में
हूं. मेरा जिस्म तुम्हारे सीने में समाया था,’’ इतना कहतेकहते वह मुझसे चिपक गई.

‘‘अंबाली, बारिश बंद हो चुकी है. अंधेरा घिरने लगा है. अब हमें अपने घर पहुंचने में बहुत देर हो जाएगी. तुम्हारे घर वाले चिंता कर रहे होंगे. कहीं हमारा राज न खुल जाए.’’

‘‘तुम ठीक कहते हो. हमें चलना ही होगा.’’

कुछ दिन कई वजहों से हम दोनों नहीं मिल सके. लेकिन एक शाम अंबाली मेरे पास सहमी हुई आई. मैं ने उस के चेहरे को देखते हुए पूछा, ‘‘आज तुम बहुत उदास हो?’’

‘‘आज मेरा मन बहुत भारी है. मैं तुम्हारे बिना कैसे जी सकूंगी, कहीं मैं खुदकुशी न कर बैठूं, क्योंकि उस के सिवा कोई रास्ता नहीं सूझता,’’ कह कर अंबाली रो पड़ी.

‘‘ऐसा क्या हुआ?’’

‘‘मेरे घर वालों को हमारे प्यार के बारे में मालूम हो गया. अब मेरी शादी तय हो चुकी है. लड़का पढ़ालिखा रईस घराने का है. अगले महीने की तारीख भी तय कर ली गई. अब मुझे बाहर निकलने की इजाजत भी नहीं मिलेगी,’’ अंबाली रोते हुए बोली.

‘‘तुम्हारे घर वाले जो कर रहे हैं, वह तुम्हारे भविष्य के लिए ठीक होगा. मेरातुम्हारा कोई मुकाबला नहीं. उन के अरमानों पर जुल्म मत करना. हमारा प्यार आज तक पवित्र है, जिस में कोई दाग नहीं लगा. सम?ा लो कि हम दोनों ने कोई सपना देखा था.’’

‘‘यह कैसे होगा?’’

‘‘अपनेआप को एडजस्ट करना ही पड़ेगा.’’

‘‘मेरे लिए कई रिश्ते आए, पर मैं ने किसी को पसंद नहीं किया. उस के बाद मैं तुम्हें अपना दिल दे बैठी, अब तुम मु?ो भूल जाने के लिए कहते हो. मैं तुम्हें बेहद प्यार करती हूं, मेरा प्यार मत छीनो. मैं तुम्हें भुला नहीं पाऊंगी. क्या तुम मुझे तड़पते देखते रहोगे? मैं तुम्हें हर कीमत पर हासिल करना चाहूंगी.’’

कुछ दिन हम लोग अपना दुखी मन ले कर समय बिताते रहे. किसी काम को करने की इच्छा नहीं होती थी. अंबाली की मां से उस की हालत देखी नहीं गई. वह एकलौती लाड़ली थी. उन्होंने अपने पति को बहुत सम?ाया.

अंबाली के पिता ने एक दिन हमारे यहां संदेशा भेजा, ‘आप लोग किसी दूसरे किराए के मकान में दूर चले जाइए, ताकि दोनों लड़केलड़की का भविष्य खराब न हो.’

हमें दूसरे मकान में शिफ्ट होना पड़ा. 3 महीने तक हम एकदूसरे से नहीं मिले. चौथे महीने अंबाली के पिता मेरे पिता से मिलने आए और साथ में मिठाई भी लाए थे.

बाद में उन्होंने कहा, ‘‘रिश्ता वहीं होगा, जहां अंबाली चाहेगी, इसलिए

2 साल में उस की पढ़ाई पूरी हो जाने पर विचार होगा. आप लोग दूर चले आए. हम दोनों की इज्जत नीलाम होने से बच गई, वरना ये आजकल के लड़केलड़की मांबाप की नाक कटा देते हैं.’’

मेरे पिता ने उन की बातों को सुना और हंस कर टाल दिया.

एक साल बीत जाने पर मेरा चुनाव एक सरकारी पद पर हो गया और मेरी बहाली दूसरे शहर में हो गई. मेरी शादी के कई रिश्ते आने लगे और मैं बहाने बना कर टालता रहा.

आखिर में मेरे पिता ने झला कर कहा, ‘‘अब हम लोग खुद लड़की देखेंगे, क्योंकि तुम्हें कोई लड़की पसंद नहीं आती. अगर तुम ने हमारी पसंद को ठुकरा दिया, तो हम लोग तुम्हें अकेला छोड़ कर चले जाएंगे.’’
मुझे उन के सामने झकना पड़ा और कहा, ‘‘आप लोग जैसा ठीक समझे, वैसा करें. मुझे कोई एतराज नहीं होगा.’’

शादी की जोरशोर से तैयारियां होने लगीं, लेकिन मुझे कोई दिलचस्पी न थी.
बरात धूमधाम से एक बड़े होटल में घुसी, जहां बताया गया कि लड़की के पिता बीमार होने के चलते द्वारचार पर नहीं पहुंच सके. उन के भाई बरात का स्वागत करेंगे.

लड़की को लाल घाघराचोली में सजा कर स्टेज तक लाया गया, पर उस के चेहरे से आंचल नहीं हटाया गया था.

लड़की ने मेरे गले में जयमाल डाली और मैं ने उस के गले में. तब लोग शोर करने लगे, ‘अब तो लड़की का घूंघट खोल दिया जाए, ताकि लोग उस की खूबसूरती देख सकें.’

लड़की का घूंघट हटाया गया, जिसे देख कर मैं हैरान रह गया. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे, मानो उसे जबरदस्ती बांधा गया था.

मैं ने एक उंगली से उस की ठुड्डी को ऊपर किया. उस की नजरें मुझे से टकराईं, तो वह बेहोश होतेहोते बची.

सुहागरात में अंबाली ने मेरे आगोश में समा कर अपनी खुशी का इजहार किया. उस का प्यार जिंदा रह गया. मैं ने उस के गुलाबी गाल पर अपने होंठ रख कर प्यार से कहा, ‘‘अंबाली, तुम्हारे गालों पर अभी तक बारिश की बूंदें मोतियों जैसी चमक रही हैं. थोड़ा मुझे अपने होंठों से चूम लेने दो.’’

यह सुन कर अंबाली खिलखिला कर हंस पड़ी, जैसे वह कली से फूल बन गई हो. Hindi Romantic Story

Bigg Boss 19 में इस क्रिकेटर की बहन ने ली वाइल्ड कार्ड एंट्री

Bigg Boss 19 इन दिनों दर्शकों के बीच खूब सुर्खियां बटोर रहा है. हर वीकेंड का वार एपिसोड दर्शकों के लिए किसी मनोरंजन पैकेज से कम नहीं होता. जहां सलमान खान घरवालों की क्लास लगाते नजर आते हैं, वहीं कुछ मेहमान शो में आकर मस्ती और मजा बढ़ा देते हैं. बीते एपिसोड में Bigg Boss OTT विनर एल्विश यादव ने भी एंट्री ली और कंटेस्टेंट्स के साथ एक दिलचस्प गेम खेला, जिसमें उन्हें एक-दूसरे के अंदर भरे “विष” का एंटीडोट देना था.

इसी बीच शो में एक नई वाइल्ड कार्ड एंट्री ने सभी की नजरें अपनी ओर खींच ली हैं. दरअसल, मशहूर क्रिकेटर दीपक चाहर की बहन मालती चाहर ने Bigg Boss 19 के घर में कदम रखा है. आते ही मालती ने अपने गेम का अंदाज दिखाना शुरू कर दिया है और दर्शक उनके आत्मविश्वास भरे रवैये से काफी प्रभावित नजर आ रहे हैं.

मालती चाहर एक जानी-मानी मौडल, एक्ट्रेस और फिल्ममेकर हैं. वह सोशल मीडिया पर अपनी ग्लैमरस तस्वीरों और बोल्ड पर्सनैलिटी के लिए अक्सर चर्चा में रहती हैं. उनकी एंट्री के साथ ही Bigg Boss के घर का माहौल एकदम बदल गया है. मालती कंटेस्टेंट्स से खुलकर भिड़ने और गेम में अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं. अब देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह वाइल्ड कार्ड एंट्री शो की दिशा कितनी बदलती है और दर्शकों को कितना एंटरटेन करती है. Bigg Boss 19

Bihar Elections: बिहार में भाजपा की मुश्किलें

Bihar Elections: हार की राजनीति हमेशा से ही उतारचढ़ाव से भरी रही है. यहां जनता का रुझान किसी एक दल के लिए परमानैंट नहीं रहता, बल्कि काम और हालात को देख कर बदलता रहता है.

मौजूदा हालात में देखा जाए तो भारतीय जनता पार्टी या राजग गठबंधन के लिए जनता का झुकाव उतना नहीं है, जितना कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए है.

नीतीश कुमार की सरकार ने सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सहूलियतों में सुधार किया, जिस के चलते आम लोग उन्हें ‘काम करने वाला नेता’ मानते हैं. गांवगांव में सड़कें बनीं, बिजली पहुंची और शहरों में अस्पताल व स्कूल की आलीशान इमारतें खड़ी की गईं, लेकिन एक हकीकत यह भी है कि इन इमारतों के भीतर सहूलियतों की भारी कमी है.

अस्पतालों में न तो डाक्टर मिलते हैं और न ही दवाएं. स्कूलों में टीचर तो गिनती के हैं, पर पढ़ाई का लैवल गिरा हुआ है. यही वजह है कि सरकारी स्कूलों में बच्चे जाना पसंद नहीं करते. ऊपर से भ्रष्टाचार ने पूरे तंत्र को खोखला कर दिया है.

नीतीश कुमार खुद भी अब चाह कर कुछ कर पाने की हालत में नहीं दिखते. इस वजह से आने वाला चुनाव उन के लिए भारी हो सकता है.

भाजपा की हालत और राजग की बैसाखी

बिहार में भाजपा की पकड़ उतनी मजबूत नहीं है जितनी वह दूसरे राज्यों में बना चुकी है. उस के पारंपरिक वोटर सवर्ण और वैश्य समुदाय से हैं, जिन की तादाद उतनी ही है, जितनी राजद के यादव वोटरों की. ऐसे में भाजपा को जीत पक्की करने के लिए जद (यू) जैसी पार्टी की बैसाखी चाहिए.

इस प्रदेश में भाजपा लगातार दलितों और पिछड़ों के बीच जगह बनाने की कोशिश करती रही है, लेकिन सांप्रदायिक एजेंडे और ‘हिंदूमुसलिम’ के रटेरटाए नारे उसे कामयाबी दिलाने में नाकाम रहे हैं.

राजग की सभाओं में भी वह जोश और भीड़ नहीं दिखती, जो महागठबंधन की यात्राओं में देखने को मिलती है. महागठबंधन के नेता राहुल गांधी और तेजस्वी यादव जब जनता के बीच पहुंचते हैं, तो भीड़ अपनेआप उमड़ पड़ती है. ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ के नारे के बाद महागठबंधन को एक नई मजबूती मिली है.

इस के उलट भाजपा की सभाओं में भीड़ जुटाने के लिए सरकारी और प्राइवेट स्कूलों को बंद किया जाता है, ‘जीविका दीदीयों’ को बुलाने के लिए प्रशासनिक दबाव बनाया जाता है और आम दर्शकों को भाड़े पर लाया जाता है. यह सब दिखाता है कि भाजपा के पास असली जनाधार की कमी है.

मुद्दों से ध्यान भटकाने की राजनीति

राजनीति में अकसर देखा जाता है कि असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए भावनात्मक कार्ड खेला जाता है. हाल ही में बिहार में भी कुछ ऐसा ही हुआ.

एक आदमी ने मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां के खिलाफ अपशब्द कहे. यह घटना बहुत गलत थी, लेकिन भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बना कर महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे असली सवालों से ध्यान हटाने की कोशिश की.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश से लौटते ही एक कार्यक्रम में आधे घंटे के भाषण में तकरीबन 25 मिनट अपनी मां का जिक्र कर दिया और यह कहा कि ‘मेरी मां का अपमान देश का अपमान है’.

लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जब भाजपा के कई नेता संसद से ले कर सार्वजनिक मंचों तक विपक्षी नेताओं की माताओं और आम औरतों का अपमान करते रहे हैं, तब प्रधानमंत्री ने कभी इस पर चिंता क्यों नहीं जताई? राजनीति में उन का यही दोहरापन जनता अच्छी तरह समझती है.

बिहार बंद काम न आया

भाजपा ने इस मां का अपमान करने वाले मुद्दे को आधार बना कर बिहार बंद का आह्वान किया. लेकिन बंद को कामयाब बनाने के लिए औरतों और आम जनता को अपमानित किया गया. सड़कों पर बदसुलूकी हुई, जबरन दुकानें बंद कराई गईं. पैसे दे कर भीड़ बुलाने जैसे आरोप लगाए गए.

यह सब लोकतंत्र के मूल्यों और जनता की गरिमा के खिलाफ था. सवाल यह है कि अगर किसी ने गाली दी भी थी, तो उस की गिरफ्तारी हो चुकी थी, फिर भी जनता को परेशान करना किस हद तक सही कहा जा सकता है?

बिहार की राजनीति इस समय एक चौराहे पर खड़ी है. नीतीश कुमार की इमेज अब भी भाजपा की तुलना में थोड़ी अच्छी है, लेकिन भ्रष्टाचार और कामकाज की कमजोरी ने उन के कद को भी कम किया है.

दूसरी ओर भाजपा अपने सांप्रदायिक एजेंडे से आगे नहीं बढ़ पा रही है. यही वजह है कि जनता का भरोसा महागठबंधन की ओर ज्यादा झुकता दिख रहा है.

राजनीति में जनता सिर्फ नारों और भावनाओं से नहीं, बल्कि काम और सहूलियत चाहती है. अगर भाजपा और राजग इसे समझने में नाकाम रहे, तो बिहार में उन की राह और मुश्किल हो जाएगी.

सब से बड़ी बात तो यह है कि अब भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी बिहार में अपनी पकड़ खोते नजर आ रहे हैं. स्थानीय भाजपा नेताओं का भी वोटरों पर ज्यादा भरोसा नहीं बन पा रहा है. यह राजग के लिए खतरे की घंटी हो सकती है. Bihar Elections

Editorial: एप्स पर बैन बना नेपाल में हिंसा की चिंगारी

Editorial: नेपाल में जवानों की जान मोबाइल और उस के एप्स छीनने की सजा इस बुरी तरह वहां की किशोरों और युवाओं की भीड़ ने सरकार को दी, इस को कोई सोच भी नहीं सकता था. अब तक सब यही समजते थे कि मोबाइल पर फालतू के मैसेज देने वाले और रील बनाने या देखने वाले युवा लड़केलड़कियां निकम्मे हैं, बेकार हैं, बेवकूफ हैं और लाचार है. उन्हें नहीं मालूम कि वे क्याकर रहे हैं.

बड़ी व बूढ़ी पीढ़ी को यह अहसास ही नहीं था कि युवाओं के लिए उन का साथी बन चुका मोबाइल तो उन की जान से भी बढ़ कर है. जब नेपाल के कम्यूनिस्ट प्रधानमंत्री ब्राह्मणवादी केपी शर्मा ओली ने इस में कुछ एप्स पर बैन लगाया तो सोचा था कि कमजोर युवा इसे चुपचाप आंख झुका कर मान लेंगे. पर वे इतने गुस्से में भर जाएंगे कि उन्होंने संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, सरकारी कार्यालयों, अखबारों के दफ्तरों को जला डाला और काठमांडू लाचार हो गया.

सेना भी कुछ ज्यादा नहीं कर पाई. यह साफ नहीं है कि यह गुस्सा सरकार पर था जो बेहद करप्ट है और जहां भाईभतीजावाद जम कर चल रहा है और कल के कम्यूनिस्टों के बच्चे आज महलों में रह रहे हैं, दूसरे देशों में जान खपा कर कमाई नेपाल भेज कर आए पैसे पर मौज उड़ा रहे हैं या सिर्फ मोबाइल प्रेम इस भयंकर आगजनी की वजह है.

मोबाइल आज के जवानों के हाथ में अकेला तरीका है जिस से वे दुनिया से जुड़े हैं. अखबारों को तो दूसरे देशों की तरह नेपाली युवाओं ने पढ़ना बंद कर दिया है क्योंकि वे सिर्फ सरकारी प्रचार कर रहे हैं.

नेपाल की आमदनी में तीसरा हिस्सा आज उन नेपालियों का है जो नेपाल से बाहर जा कर बेगाने देशों में गरमी, सर्दी या बारिश में रह कर काम कर रहे हैं और पेट काट कर पैसा अपने घरों में भेजते हैं. अपने मांबाप, भाईबहनों, प्रेमीप्रेमिकाओं से बात करने के लिए उन के पास यूट्यूब, व्हाट्सएप जैसे टूल ही हैं और वे भी उन से कोई छीन ले, यह उन्हे मंजूर नहीं है.

कम्यूनिस्ट होते हुए भी केपी शर्मा ओली यह नहीं समझ पाए जैसे वे ब्राह्मणवादी धर्म को नेपाल पर थोपते रहे हैं वैसे ही मोबाइल एक धर्म बन गया है. ये एप अब मंदिर बन गए हैं. अगर किसी मंदिर को ढहा दिया जाए तो बड़ीबूढ़ी पीढ़ी क्या करेगी? सब का सत्यानाश न? यही जेन जी ने किया है. उन्होंने बचपन से ही ओली वाले नकली देवीदेवताओं को नहीं देखा, उन्होंने तो कार्टून फिल्मों को देखा, टीवी के हीरोहीरोइनों को देखा, ठुमके लगाती लड़कियों को देखा.

जेन जी से न सिर्फ मांबाप छीनना, दोस्त छीनना, प्रेमीप्रेमिका छीनना चाहा, उन की सैक्सी भूख को भी छीनने की कोशिश की गई तो यह सब से बड़ा गुनाह है. आज दुनियाभर में टैक्नोलौजी ने सैक्स का छिपा बड़ा बाजार खड़ा कर दिया है और उस के बलबूते पर एलोन मस्क या सुंदर पिचाई अपना एंपायर खड़ा कर चुके हैं. मार्क जुकरबर्ग जैसों की ताकत को नेपाल के शासक पंडे नहीं सम?ा पाए और अब फटेहाल दुबके पड़े हैं.

जेन जी ऐसी पीढ़ी है जिसे मांबाप ने जीना सिखाया ही नहीं. उन्हें पैदा होते ही मोबाइल, टीवी के हाथों में सौंप दिया. सरकार भूल गई कि यह पीढ़ी अपने असली मांबाप, असली सगेसंबंधी मोबाइल और उस के एप्स को छीनने भी नहीं देगी.

॥॥॥

पिछले सालों में अमीर दुनियाभर में ज्यादा अमीर हो रहे हैं और गरीब या तो जहां के तहां हैं या कहींकहीं थोड़े घटेबढ़े हैं. अमीरों और गरीबों में एक बड़ा भारी फर्क अमेरिका और यूरोप तक में दिख रहा है. चीन, जो वैसे कम्यूनिस्ट है यानी बराबरी की बात करता है, भी अमीरों से भरा पड़ा है.

सभी देशों में जहां एक तरफ शानदार मौल बन रहे हैं, 5 सितारे वाले होटल बन रहे हैं, चमचम करते एयरपोर्ट बन रहे हैं, बड़े मकान बन रहे हैं, बड़ी गाडि़यां बन रही हैं, वहीं दूसरी और लगातार हर शहर में एक गंदा, बदबूदार इलाका फैल रहा है, कच्ची झोपड़ियां बन रही हैं, सड़कोंगलियों पर बिना घरों के लोग बढ़ रहे हैं.

जब साइंस इतनी तरक्की कर रहा है तो यह कैसे हो रहा है कि हर आदमी के लिए छत मुहैया नहीं कराई जा पा रही, हर गरीब को बीमारी में दवा नहीं मिल पा रही, हर बच्चे को अच्छी पढ़ाई और खेलने को जगह नहीं मिल पा रही? क्यों साइंस की तरक्की का आधा नहीं 90 फीसदी फायदा 10 फीसदी लोगों को मिल रहा है?

यह इसलिए हो रहा है कि आज गरीबों ने पढ़नालिखना और सम?ाना छोड़ दिया है. गरीब भी पढ़ालिखा हो सकता है कम से कम इतना पढ़ा कि वह सम?ा सके कि उस की सरकार जो कर रही है वह किस के फायदे के लिए है. लेकिन न पढ़ने वाले गरीबों ने सोच लिया है कि कहीं कभी कोई नेता उभरेगा जो उन्हें गंदगी से भरी बदबूदार जिंदगी से निकालेगा और हाथ पर हाथ धरे उन्हें सबकुछ मिल जाएगा. ऐसा न पहले कभी हुआ है, न आज होगा. आज गरीबों के पास वोटका हक है तो वोट लेने के लिए कुत्तों को 2-4 रोटी टुकड़े फेंक कर लुभा लिया जाता है और एक बार सत्ता में आने के बाद अमीर नेता खुल कर अमीरों को गरीबों की मेहनत का पैसा लूटलूट कर देते रहते हैं.

वजह साफ है कि गरीब को अब पता ही नहीं चलता कि उसे लूटा कैसे जा रहा है. साइंस और तकनीक का फायदा हुआ है कि गरीबों को बहकाना बहुत आसान हो गया है. गरीबों के हाथ में जबरन मोबाइल पकड़ा दिए गए हैं जिन में नाचने वाली लड़कियों के वीडियो भी होते हैं और साथ ही देश के शासक नेता के ‘महान’ कामों का बखान भी. आधीअधूरी जानकारी रखने वाला 2 बालटी पानी, 4 नालियों, 5 किलो राशन और मोबाइल पर भरपूर मिलने वाली चहकती लड़कियों को देख कर खुश हो जाता है.

सरकारें तरहतरह के टैक्स लागाती हैं. जबरन लगाए जीएसटी में कुछ कटौती को इस तरह ढोल के साथ पेश किया गया है कि लगता है कि अदानीअंबानी का खजाना छीन कर जनता में बांट दिया गया है. आधी समझ वाला इसे वरदान समझता है जिस के लिए उसे पहले ही मंदिरों, चर्चों, मसजिदों में बोला जाता रहा है.

गरीबों को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी. चतुराई किसी को पेट से नहीं मिलती. यह सीखी जाती है और हर कोई सीख सकता है. मूर्खता बीमारी है, जन्मजात मिली कमजोरी नहीं. गरीब कमजोर नहीं रहें, लूटे न जाएं, बहकाए न जाएं यह उन्हें समझना होगा और उन की समझदारी किसी कागज पर छपे अक्षरों में है, मोबाइल में भी नहीं और पौवे की बोतल में भी नहीं. Editorial

Live-in Relationship का खौफनाक अंजाम

Live-in Relationship, लेखक – महेश कांत शिवा

27 जून, 2025 को हरियाणा के पानीपत में एक औरत की उस के लिवइन पार्टनर ने गला काट कर हत्या कर दी और फरार हो गया. दरअसल, उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के गांव केलई की रहने वाली उषा के पति की काफी दिनों पहले मौत हो गई थी. गांव में रोजगार न होने के चलते वह कामधंधे की तलाश में पानीपत चली आई.

उषा पानीपत की गंगाराम कालोनी में किराए के कमरे में रहने लगी. यहां पर उस की मुलाकात उत्तर प्रदेश के बदायूं के रहने वाले महेंद्र नामक एक नौजवान से हुई. पहले उन दोनों में दोस्ती हुई और फिर बाद में उन्होंने लिवइन रिलेशनशिप में रहने का फैसला कर लिया.

बताया जाता है कि पिछले कुछ समय से उषा और महेंद्र में किसी बात को ले कर झगड़ा चल रहा था. 24 जून, 2025 को महेंद्र्र ने चाकू से उषा का गला काट कर उस की हत्या कर दी और फरार हो गया. हालांकि, पुलिस ने महेंद्र को 2 दिन बाद ही गिरफ्तार कर लिया.

महेंद्र ने पुलिस को बताया कि उषा उस से बातबात पर झगड़ा करने लगी थी. उसे शक था कि वह किसी दूसरे मर्द से फोन पर बात करने लगी थी. उस की इसी हरकत से तंग आ कर उस ने उषा की हत्या कर दी.

इसी तरह पश्चिम बंगाल की रहने वाली 24 साल की ब्यूटी खातून तकरीबन 6 महीने पहले अपने परिवार वालों को बिना बताए पानीपत आई थी. यहां वह पुराना औद्योगिक क्षेत्र के कुलदीप नगर में किराए पर रहने लगी और एक फैक्टरी में काम करने लगी.

इसी दौरान ब्यूटी खातून की जानपहचान सूरज पठान नाम के एक नौजवान से हुई. दोनों में पहले दोस्ती हुई और कुछ ही दिनों में दोस्ती प्यार में बदल गई. इस के बाद वे लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे.

हालांकि, ब्यूटी खातून ने अपनी बहन नेहा खातून को फोन कर के बता दिया था कि वह पानीपत में है और एक लड़के से प्यार करती है और वे दोनों एकसाथ रहते हैं. पर 19 जून, 2025 को सूरज पठान ने ब्यूटी खातून की हत्या कर दी.

गिरफ्तारी के बाद सूरज पठान ने बताया कि ब्यूटी खातून उस के अलावा किसी दूसरे लड़के से भी बात करती थी. उस ने अनेक बार ब्यूटी खातून को सम?ाया कि वह किसी दूसरे से बात न करे, लेकिन वह नहीं मानी.

इसी के चलते सूरज पठान ने 19 जून, 2025 को ईंट से ब्यूटी खातून के सिर पर वार किया, जिस से उस की मौत हो गई.

14 जून, 2025 को पानीपत से सटे करनाल शहर में 35 साल की पूजा नामक औरत की हत्या भी उस के लिवइन पार्टनर ने कर दी थी.

पूजा मूल रूप से कंबोपुरा गांव की रहने वाली थी और उस की शादी गांव बढ़ेडा में हुई थी. वह 3 बच्चों की मां थी. वह अपने पति को छोड़ कर करनाल की दीवान कालोनी में एक आदमी के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगी थी.

उन दोनों में किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ और पूजा के लिवइन पार्टनर ने उस की गला दबा कर हत्या कर दी और लाश को एक एंबुलैंस में घर के बाहर छोड़ कर फरार हो गया.

हरियाणा के पलवल के गांव नांगल ब्राह्मण का रहने वाला योगेश फरीदाबाद में प्राइवेट नौकरी करता था, जहां उस की जानपहचान उत्तर प्रदेश के अयोध्या की रहने वाली एक लड़की से हुई. दोनों में मुलाकात हुई और प्यार हो गया. इस के बाद योगेश ने साल 2017 में उस लड़की से लवमैरिज की थी.

शादी के बाद योगेश के 2 बच्चे हुए, जिन में 6 साल की बेटी और 10 महीने का बेटा था. इस के बाद उस की अपनी पत्नी से अनबन रहने लगी, तो योगेश की पत्नी उसे छोड़ कर बच्चों समेत अपने मायके चली गई और वहीं रहने लगी.

पत्नी के मायके जाने के बाद योगेश फरीदाबाद की नौकरी छोड़ कर हरियाणा के रेवाड़ी आ गया और यहां के धारूहेड़ा इलाके में एक अस्पताल में ओटी असिस्टैंट की नौकरी करने लगा.

नौकरी के दौरान योगेश की मुलाकात करनाल के वकीलपुरा सदर बाजार की रहने वाली प्रिया से हुई. दोनों में दोस्ती हुई और फिर प्यार हो गया, जिस के बाद उन दोनों ने लिवइन रिलेशनशिप में रहने का फैसला किया.

बाद में प्रिया भी अपने 3 बच्चों को ले कर आ गई और वे धारूहेड़ा के सैक्टर 6 में एक किराए के मकान में रहने लगे. प्रिया ने अपने तीनों बच्चों का दाखिला गुरुकुलम स्कूल में करा दिया.

बताया जाता है कि उन दोनों के बीच कुछ समय से किसी बात को ले कर अनबन चल रही थी. इसी बीच स्कूल की छुट्टी पड़ने के चलते प्रिया ने अपने तीनों बच्चों को अपनी बहन के पास भेज दिया. अब मकान में योगेश और प्रिया ही रह रहे थे.

जानकारी के मुताबिक, 2 से 6 जून, 2025 के बीच योगेश ने अपनी लिवइन पार्टनर प्रिया की गला घोंट कर हत्या कर दी और लाश को बैड में छिपाने के बाद खुद भी फांसी का फंदा लगा कर खुदकुशी कर ली.

इस बात का पता तब चला जब 6 जून, 2025 को लोगों को योगेश के मकान से बदबू आई, जिस के बाद लोगों ने पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने कमरे का दरवाजा तोड़ा तो योगेश फांसी पर लटका हुआ मिला.

रेवाड़ी पुलिस ने भी रूटीन वर्क की तरह योगेश की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और आगे की जांच में जुट गई. उस वक्त योगेश के परिवार वालों सुसाइड करने की वजह पत्नी से अनबन होना बताई थी.

बेटे की मौत के बाद योगेश के पिता गिरीराज 19 जून को अपने बेटे का सामान लेने के लिए धारूहेड़ा पहुंचे. जब वे कमरे से बैड को उठाने लगे, तो वह काफी भारी लगा.

जैसे ही बैड खोला गया, तो उस में कपड़ों के बीच में एक औरत हाथ दिखाई दिया. वह योगेश की लिवइन पार्टनर प्रिया की लाश थी.

इसी तरह मूल रूप से उत्तराखंड के नानकमत्ता की रहने वाली 2 बच्चों की मां पूजा गुरुग्राम के थाना सैक्टर 5 में उत्तराखंड के ही सितारगंज गौरीखेड़ा के मूल बाशिंदे 25 साल के मुश्ताक अहमद के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहती थी.

पूजा एक स्पा सैंटर में काम करती थी, जबकि मुश्ताक टैक्सी चलाता था. कुछ दिनों पहले मुश्ताक पूजा को घुमाने के बहाने उत्तराखंड ले गया और वहां पर गरदन धड़ से अलग कर उस की हत्या कर दी.

हत्या के बाद मुश्ताक ने लाश के सिर को एक प्लास्टिक के थैले में डाल कर नाले में बहा दिया, जबकि धड़ को चादर में लपेट कर दूसरे नाले में फेंक दिया और छिपने के लिए कर्नाटक भाग गया.

उधर, जब काफी दिनों से पूजा नहीं मिली, तो उस की बहन ने उस की थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई. पूजा की बहन ने पुलिस को बताया था कि उस की बहन मुश्ताक के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहती थी.

गुरुग्राम सैक्टर 5 थाना पुलिस ने पहले तो गुरुग्राम में ही पूजा की तलाश की, लेकिन जब वह नहीं मिली, तो उत्तराखंड में स्थानीय पुलिस के सहयोग से मुश्ताक को गिरफ्तार कर पूछताछ की गई.

मुश्ताक ने पुलिस को बताया कि उस की पूजा से मुलाकात रुद्र्रपुर बसस्टैंड पर हुई थी. वे दोनों बस से गुरुग्राम आ रहे थे. चूंकि दोनों एक ही राज्य के रहने वाले थे, तो दोनों में आसानी से दोस्ती हो गई. दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर ऐक्सचेंज किया.

इसी बीच पूजा की बहन की तबीयत खराब हो गई, तो मुश्ताक उसे अपनी टैक्सी में ले कर उस की बहन के घर भी गया, जिस से दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई और उन्होंने लिवइन रिलेशनशिप में रहने का फैसला किया. तब से पूजा मुश्ताक को अपना पति मानने लगी थी.

इस बीच मुश्ताक अपने घर उत्तराखंड गया तो उस के परिवार वालों ने उस पर दबाव बना कर अपनी रिश्तेदारी की ही एक लड़की से शादी करा दी. जब पूजा को इस बात का पता चला तो वह मुश्ताक के घर पहुंच गई और मुश्ताक को अपना पति बताते हुए हंगामा किया. परिवार और रिश्तेदारों ने विवाद को आगे न बढ़ाते हुए पूजा और मुश्ताक को घर से बाहर निकाल दिया.

कुछ दिनों बाद मुश्ताक पूजा को धूमाने के बहाने उत्तराखंड ले गया और गरदन काट कर उस की हत्या कर दी.

बढ़ती जरूरतें और इच्छाएं

दरअसल, लिवइन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों की समय बढ़ने के साथसाथ जरूरतें और इच्छाएं भी बढ़ने लगती हैं. लिवइन रिलेशनशिप में आने से पहले दोनों के बीच भले ही यह सहमति बने कि वे दोनों एकदूसरे पर निर्भर नहीं रहेंगे, दोनों एकदूसरे पर पैसे से जुड़ा दबाव या सामाजिक बंधन का दबाव नहीं डालेंगे.

लेकिन जैसेजैसे समय गुजरता है और दोनों के बीच रिश्ता गहरा होता चला जाता है, वैसे ही उन की जरूरतें बढ़नी शुरू हो जाती हैं. दोनों में कहीं न कहीं वे भावनाएं भी पैदा होने लगती हैं, जो पतिपत्नी के रिश्ते के बीच होती हैं.

लिवइन रिलेशनशिप टूटने की दूसरी बड़ी वजहें

* दोनों के साथ रहने के चलते उन के खर्चे भी बढ़ते चले जाते हैं, फिर खर्चे उठाएगा कौन, यह सम?ा नहीं आता.

* लड़की या लड़के द्वारा शादी का दबाव बनाना.

* रसोईघर का खर्च और मकान का किराया कौन भरेगा, यह बड़ी समस्या.

* अगर दोनों के पहले से बच्चे हैं, तो उन की स्कूल फीस और दूसरे खर्च कौन उठाएगा.

* दोनों के घूमनेफिरने पर होने वाला खर्च किस की जेब से जाएगा.

* आपसी संबंध बनने के बाद महिला का पेट से हो जाना.

* परिवार द्वारा लड़के या लड़की की शादी दूसरी जगह तय कर दिया जाना. Live-in Relationship

Hindi Family Story: सोने की बालियां

Hindi Family Story: ईमानदार संसारचंद मेहनत में यकीन रखने वाला नौजवान था. एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले संसारचंद की 3 बहनें और एक छोटा भाई था. 2 बहनों की शादी पहले ही हो चुकी थी. उन की शादी के बाद संसारचंद के पिता का देहांत हो गया. पिता की मौत के बाद उस ने भी अपने पुरखों का बढ़ईगीरी का काम संभाल लिया.

संसारचंद के हाथों में हुनर था और ईमानदारी के चलते काम की कोई कमी नहीं थी. कड़ी मेहनत से संसारचंद पूरे परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाए हुए था. वह अपनी मां, छोटी बहन और छोटे भाई की रोटी, पढ़ाईलिखाई और भविष्य के लिए दिनरात मेहनत करता था.

अब संसारचंद की छोटी बहन कमला ब्याह लायक हो चुकी थी. अपने ब्याह के बारे में सोचे बिना संसारचंद ने मेहनत से जोड़े पैसों से कमला के ब्याह की तैयारी शुरू कर दी. रिश्ता अच्छा था, लेकिन एक अड़चन आ खड़ी हुई. वह थी सोने की बालियां.

गांव का रिवाज था कि लड़की को ब्याह के समय खाली कानों से विदा नहीं किया जाता था. यह केवल रिवाज ही नहीं था, बल्कि इज्जत की बात भी थी.

संसारचंद की इतनी औकात नहीं थी कि वह महंगी सोने की बालियां खरीद सके. पुराने कर्ज अभी चुकाए नहीं गए थे. यह बात संसारचंद की बड़ी बहन विमला को पता चली. विमला अपने पति के साथ पास के गांव में खुशहाल जिंदगी बिता रही थी.

भाई की परेशानी सोचसोच कर विमला बेचैन हो जाती. वह यह सोचती कि संसारचंद कमला के लिए बालियों का इंतजाम कैसे कर पाएगा? शादी के समय अपने मायके से मिली सोने की बालियां, जो वह पहने हुए थी, कमला को देने के बारे में सोचती, तो ससुराल वालों के सवालों से डर कर वह अपने विचार से पीछे हट जाती, लेकिन फिर उस ने फैसला कर ही लिया.

कमला की शादी का दिन निकट आ रहा था. एक दिन, पति के काम पर चले जाने के बाद, विमला घर में अकेली थी. उस ने अपनी अलमारी खोली और उस पोटली को निकाला, जिस में शादी के समय मायके से मिली हुई सोने की बालियां रखी थीं.

उन्हें बहन को देने के बारे में सोच कर विमला कुछ देर के लिए दुविधा में पड़ गई, लेकिन दूसरी ओर, बहन की खुशी और भाई की मजबूरी उस की सोच पर भारी पड़ गई.

अगले दिन विमला अपने मायके पहुंची. हाथ में बालियों की पोटली थी.

‘‘ले भैया, कमला की शादी के लिए बालियों की जरूरत थी. मेरे पास ये थीं. क्या अपनी कमला को खाली कानों से विदा करेंगे? मैं फिर कभी बनवा लूंगी,’’ कहते हुए विमला ने बालियां संसारचंद की हथेली पर रख दीं.

‘‘नहीं बहन, मैं ऐसा नहीं कर सकता. तुम्हारा भी अपना परिवार है. तुम्हारे पति और ससुराल वाले क्या कहेंगे?’’ संसारचंद बोला.

लेकिन विमला अड़ी रही. बारबार कहने पर संसारचंद ने नम आंखों से बालियों वाली पोटली को मजबूती से पकड़ लिया.

कमला की शादी अच्छे से हो गई, लेकिन संसारचंद को भीतर ही भीतर यह टीस बनी रही कि उस की बहन ने अपनी एक कीमती चीज, अपने घर से चोरी कर के छोटी बहन को दे दी.

संसारचंद ने अपनेआप से वादा किया कि वह यह कर्ज जरूर उतारेगा. उस ने जीतोड़ मेहनत जारी रखी और पैसे इकट्ठा करने लगा.

2 साल बीत गए. एक दिन संसारचंद शहर में सुनार की दुकान पर पहुंचा. उस ने एक सुंदर जोड़ी सोने की बालियां तैयार करवाईं.

बालियां ले कर संसारचंद सुबहसुबह अपनी बहन विमला के घर तब पहुंचा, जब उस का पति अशोक काम पर जा चुका था.

चायपानी के बाद संसारचंद ने एक छोटीसी डब्बी विमला के हाथों में रख दी. विमला ने डब्बी खोली तो अंदर नई, चमचमाती सोने की बालियां थीं.

‘‘यह क्या भैया?’’ विमला ने हैरानी से पूछा.

‘‘जो तू ने कभी बिना मांगें दी थीं, आज मैं वे तुझे लौटाने आया हूं. मन पर बड़ा बोझ था इस कर्ज का,’’ संसारचंद भावुक हो गया.

‘‘पर कमला मेरी भी तो छोटी बहन है,’’ विमला बोली.

‘‘लेकिन बहन, मुझे पता है कि तू ने वे बालियां अपनी ससुराल से चुरा कर दी थीं, जिस के बोझ से मेरा मन भारी था,’’ संसारचंद बोला.

‘‘सच कहूं तो वह बोझ मेरे मन पर भी बहुत था. मुझे खुद भी लगता था जैसे मैं ने चोरी की है. मुझ से रहा नहीं गया और मैं ने पहले ही दिन अपने पति को सब सच बता दिया था,’’ विमला बोलती जा रही थी, ‘‘उस भले इनसान ने कहा कि विमला, तू ने ठीक किया. उस ने तो यह भी कहा कि ऐसी चीजें तो मुश्किल वक्त में ही काम आती हैं.’’

संसारचंद सुनता रहा. उस की आंखें भर आईं. वह बोला, ‘‘अशोक के लौट आने तक मैं यहीं रुकूंगा. उस भले इनसान का शुक्रिया अदा करना तो बनता है.’’

चारों ओर रिश्तों की मिठास से महक उठी थीं हवाएं… Hindi Family Story

Hindi Family Story: बिछोह की सांझ

Hindi Family Story, लेखक – संजीव स्नेही

कालेज का गलियारा, वही कैंटीन के ठहाके और लाइब्रेरी की खामोशी. इन सब में एक कहानी पल रही थी, करण और प्रिया की. दोनों एकदूसरे में इस कदर खोए थे कि कालेज की पढ़ाई भी कभीकभी पीछे छूट जाती थी. उन की हंसी, उन की बहसें, उन का छोटीमोटी बातों पर रूठनामनाना, सब कैंपस की फिजा में घुलमिल गया था.

जब कभी प्रिया उदास होती, करण का एक जोक उस के चेहरे पर मुसकान ले आता और जब करण किसी बात से परेशान होता, तो प्रिया की समझदारी उसे राह दिखाती.

उन के दोस्त उन्हें ‘एकदूजे के लिए’ कहते थे, और सच भी यही था. वे कालेज के हर पल को साथ जीते थे. सुबह की पहली क्लास से ले कर शाम की आखिरी चाय तक, उन की दुनिया एकदूसरे के इर्दगिर्द घूमती थी. कैंपस की हर बैंच, हर पेड़ उन के प्यार का गवाह था.

करण एक शांत स्वभाव का लड़का था, जो अपनी दुनिया में खोया रहता था, लेकिन प्रिया ने उस दुनिया में रंग भर दिए थे. वह चंचल, जीवंत और हमेशा खुश रहने वाली लड़की थी.

करण की गंभीरता को प्रिया की चंचलता ने पूरा किया था और प्रिया की उड़ान को करण के ठहराव ने एक ठोस जमीन दी थी. दोनों का तालमेल ऐसा था, मानो 2 अलगअलग ध्रुव एकसाथ मिल कर एक पूर्ण इकाई बन गए हों.

उन के झगड़े भी प्यारे होते थे. कभी प्रिया करण के देर से आने पर रूठ जाती, तो कभी करण उस के फोन न उठाने पर नाराज हो जाता, लेकिन यह रूठनामनाना केवल कुछ पलों का होता था, जिस के बाद प्यार और भी गहरा हो जाता था. उन के दोस्त अकसर उन से जलते थे कि कैसे वे एकदूसरे को इतनी अच्छी तरह समझते हैं.

कालेज का फैस्टिवल हो या कोई असाइनमैंट, वे हमेशा एक टीम में होते थे. साथ में देर रात तक जाग कर पढ़ाई करना, सुबहसुबह कैंटीन में नाश्ता करना और ऐग्जाम के तनाव में भी एकदूसरे का सहारा बनना, यह सब उन की दिनचर्या का हिस्सा था.

वे भविष्य के सपने बुनते थे, एकसाथ घर बनाने के, एकसाथ नई दुनिया घूमने के और एकसाथ हर चुनौती का सामना करने के. उन के सपने हवा में नहीं, बल्कि एकदूसरे के विश्वास पर टिके थे. उन्हें लगता था कि उन का प्यार अमर है और कोई भी चीज उन्हें अलग नहीं कर सकती.

मगर कालेज के दिन ढलते ही, बिछोह का अंधेरा छाने लगा. ग्रेजुएशन पूरी होते ही, जिंदगी ने उन्हें अलगअलग शहरों में धकेल दिया.

करण लौट आया अपने पहाड़ से घिरे छोटे से शहर में, जहां उस की पुरानी यादें सांस लेती थीं. यह शहर शांत और कुदरत के करीब था, ठीक करण के स्वभाव जैसा. यहां उस का पुश्तैनी कारोबार था, जिसे संभालने की जिम्मेदारी उस के कंधों पर थी.

प्रिया अपने परिवार के साथ महानगर की तेज रफ्तार जिंदगी में लौट गई, जहां हर दिन एक नई चुनौती थी और एक नई दौड़. मुंबई की चकाचौंध उसे अपनी ओर खींच रही थी और वह उस में रमने के लिए तैयार थी.

शुरुआत में सब ठीक था. फोन की घंटियां दिन में जबतब बजती रहतीं. घंटों बातें होतीं, जिस में कालेज के किस्से, भविष्य के सपने और एकदूसरे के शहर की कहानियां शामिल होतीं.

करण प्रिया को अपने पहाड़ की ठंडक और शांत नजारों के बारे में बताता और प्रिया उसे मुंबई की जगमगाती रातों और लोकल ट्रेन की भीड़भाड़ के बारे में बताती.

उन की आवाज में वही पुराना प्यार और अपनापन था, वही जुनून और वही चाहत थी. वे एकदूसरे को हर छोटीबड़ी बात बताते, अपने दिन की हर घटना साझा करते.

प्रिया करण को बताती कि कैसे उस ने आज लोकल ट्रेन में एक अजीबोगरीब वाकिआ देखा, तो करण उसे अपने शहर के शांत तालाब के पास सूर्यास्त का नजारा बताता. वे एकदूसरे की जिंदगी का हिस्सा बने रहने की पूरी कोशिश कर रहे थे, चाहे कितनी भी दूरियां हों.

लेकिन धीरेधीरे दूरियों का एहसास चुभने लगा. फोन पर घंटों बात करना भी अब उस छुअन, उस निकटता की भरपाई नहीं कर पाता था जो पहले उन की जिंदगी का हिस्सा था. रातें करवटें बदलते बीततीं.

करण को प्रिया की हंसी नहीं सुनाई देती थी, न ही प्रिया को करण के कंधे पर सिर रख कर सोने की राहत मिलती थी. वे एकदूसरे को मिस करते थे, इस हद तक कि उन के दिल में एक अजीब सा खालीपन महसूस होता था.

वीडियो काल पर एकदूसरे को देख कर कुछ पल की खुशी मिलती, लेकिन वह कभी उस गरमाहट की जगह नहीं ले पाती थी, जो आमनेसामने मिलने में होती है.

वे स्क्रीन पर एकदूसरे को देखते, मुसकराते, कुछ पल के लिए भूल जाते कि उन के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी है, लेकिन जैसे ही वीडियो काल खत्म होती, अकेलापन फिर से घेर लेता.

त्योहार आते, दोस्त मिलते, हर कोई अपनेअपने पार्टनर के साथ होता और करण व प्रिया को दूरियों का दर्द और ज्यादा महसूस होता.

दीवाली पर जब सब अपने परिवार के साथ होते, तो करण को प्रिया की कमी खलती थी, उस के साथ पटाके जलाने की याद आती थी. प्रिया को होली पर करण के साथ रंग खेलने की याद आती थी.

हर उत्सव उन्हें उस खालीपन का एहसास कराता जो उन की जिंदगी में आ गया था. वे एकदूसरे को तसवीरें भेजते, शुभकामनाएं देते, पर उन शुभकामनाओं में एक अनकहा दर्द छिपा होता था.

करण को याद आता वह दिन, जब प्रिया को बुखार हुआ था और वह पूरी रात उस के कमरे के बाहर बैठा रहा था, बस उस की खैरियत जानने के लिए. वह एक पल के लिए भी उस से दूर नहीं हुआ था.

प्रिया को याद आता वह वक्त, जब करण ने उस के जन्मदिन पर आधी रात को गिटार बजा कर गाना सुनाया था और उस की आंखों में चमक भर दी थी.

ये छोटीछोटी बातें, ये छोटेछोटे पल, जो अब सिर्फ यादों में थे, उन्हें और भी तड़पाते थे. फोन पर बात करते हुए भी कभीकभी चुप्पी छा जाती. कहने को बहुतकुछ होता, दिल में हजार बातें उमड़तीं, लेकिन दूरियों का बोझ इतना भारी था कि शब्द गले में अटक जाते.

संवाद की कमी नहीं थी, बल्कि भावनाओं को जाहिर करने की ताकत कमजोर होती जा रही थी. वे जानते थे कि कुछ बदल रहा है, लेकिन उसे रोकने में नाकाम थे.

एक शाम, करण छत पर अकेला बैठा था. चांदनी रात थी और तारे टिमटिमा रहे थे, मानो उस की उदासी को और बढ़ा रहे हों. उस ने प्रिया को फोन किया. प्रिया भी अपने बालकनी में बैठी थी, जहां से शहर की रोशनी दिख रही थी.

‘‘प्रिया…,’’ करण ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘कब मिलेंगे हम?’’ उस की आवाज में एक अनकहा दर्द था, एक गहरी चाहत थी.

प्रिया की आंखें भर आईं, ‘मुझे नहीं पता करण,’ उस ने हिचकिचाते हुए, आंसुओं को रोकते हुए कहा, ‘बस, इतना जानती हूं कि मुझे तुम्हारा इंतजार रहेगा.’

प्रिया के शब्दों में एक उम्मीद की किरण छिपी थी, एक भरोसा था कि भले ही राहें अनिश्चित हों, पर दिल में इंतजार कायम है.

उन की प्रेमकहानी अब केवल आवाजों और मीठे शब्दों पर टिकी थी. बिछोह का यह लंबा दौर उन्हें मजबूत बना रहा था या कमजोर, यह उन्हें पता नहीं था. वे एक अनजाने रास्ते पर चल रहे थे, जहां हर कदम के साथ चुनौतियां बढ़ रही थीं. लेकिन एक बात तय थी, उन के दिलों में एकदूसरे के लिए जो गहरा प्यार था, वह इन दूरियों से भी कहीं ज्यादा ताकतवर था.

हर फोन काल, हर मैसेज, हर वीडियो काल इस बात का सुबूत था कि उन का प्यार अभी भी जिंदा है, धड़क रहा है, बस इंतजार था उस दिन का, जब ये दूरियां मिटेंगी और बिछोह की यह दर्दनाक सांझ, मिलन के सुनहरे सूरज में बदल जाएगी.

वे जानते थे कि उन की कहानी अभी अधूरी है और मिलन ही उस का सुखद अंत होगा. वे इस अग्निपरीक्षा से गुजर रहे थे, यह जानते हुए कि उन का प्यार इस दूरी से और भी अटूट हो कर उभरेगा.

समय किसी के लिए नहीं रुकता और करण और प्रिया के लिए भी नहीं रुका. बिछोह की सांझ धीरेधीरे एक लंबी रात में बदल रही थी, एक ऐसी रात जिस की सुबह अनिश्चित थी.

शुरुआती महीनों का वह जोश, वह घंटों की बातचीत, अब यादों का हिस्सा बनने लगी थी. जिंदगी की आपाधापी में दोनों अपनेअपने शहर में अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाने लगे.

जिम्मेदारियां बढ़ीं, कैरियर की दौड़ तेज हुई और इसी के साथ उन के बीच की बातचीत भी कम होती गई. जो फोन की घंटियां दिन में कभी भी बज उठती थीं, वे अब हर 2-3 दिन में एक बार बजने लगीं.

फिर हफ्ते में एक बार और देखते ही देखते यह सिलसिला महीने 2 महीने और यहां तक कि 4 महीने में भी कभीकभार ही बात होने तक सीमित हो गया. और वह भी बस ‘हायहैलो’ या किसी औपचारिक शुभकामना तक.

दिल की बात कहना तो दूर, हालचाल पूछने का भी समय मानो सिमट गया था. उन के बीच की दूरियां केवल भौगोलिक नहीं रह गई थीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक दूरियां भी बढ़ती जा रही थीं.

इस तरह 2 साल बीत गए. ये 2 साल उन की जिंदगी में बहुत बड़े बदलाव ले कर आए थे.

करण ने अपने पिता के साथ मिल कर कारोबार में पूरी तरह से खुद को झोंक दिया था. पहाड़ों की ठंडी हवाओं में उस का कारोबार फलताफूलता रहा और वह व्यापारिक दांवपेंच सीखने में बिजी हो गया था.

उस ने अपनी कंपनी को नए मुकाम पर पहुंचाने के लिए दिनरात एक कर दिया था. उस की जिंदगी में अब केवल व्यापारिक सौदे, बैलेंस शीट और भविष्य की योजनाएं ही रह गई थीं.

वह सुबह जल्दी उठता, देर रात तक काम करता और हर नया प्रोजैक्ट उस के लिए एक चुनौती और एक जुनून बन गया था. उस ने खुद को इतना ज्यादा बिजी कर लिया था कि पुरानी यादों को सोचने का भी उसे समय नहीं मिलता था या शायद वह जानबूझ कर उन्हें दबाना चाहता था.

उस के दोस्तों ने भी देखा कि करण अब पहले जैसा नहीं रहा था. वह थोड़ा शांत और ज्यादा करोबारी हो गया था, लेकिन वे सम?ाते थे कि यह उस के कैरियर की जरूरत है.

वहीं, प्रिया ने फैशन के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाना शुरू किया था. मुंबई की चमकदमक से भरी दुनिया उसे अपनी ओर खींच रही थी.

वह फैशन डिजाइनिंग के बारीक पहलुओं को सीखने में मगन हो गई थी. नएनए डिजाइन बनाना, फैशन शो में हिस्सा लेना और बड़ेबड़े ब्रांड्स के साथ काम करना, यह सब उस की जिंदगी का हिस्सा बन गया था.

उस के आसपास हमेशा एक ग्लैमरस माहौल रहता था, जहां नए चेहरे, नई कहानियां और नई इच्छाएं थीं.

फैशन की दुनिया की चकाचौंध में वह इस कदर खो गई कि उसे करण की याद ही नहीं रही. उस के नए दोस्त थे, नई पार्टियां थीं और एक नई तेजतर्रार जिंदगी थी, जिस में पुरानी यादों के लिए शायद ही कोई जगह बची थी.

करण की शांत, पहाड़ी जिंदगी उस के लिए एक दूर की याद बन गया था, जिसे उस ने अपनी नई, ग्लैमरस दुनिया के पीछे कहीं छोड़ दिया था. उसे लगता था कि उस ने एक नई पहचान बना ली है और उसे पीछे मुड़ कर देखने की जरूरत नहीं है.

2 साल बाद, जिंदगी ने एक बार फिर अपना खेल खेला. दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में एक भव्य समारोह का आयोजन हुआ.

यह एक बड़ा औद्योगिक और व्यावसायिक कार्यक्रम था, जहां देशभर के विभिन्न क्षेत्रों के जानेमाने लोग जमा हुए थे. करण अपनी कंपनी का प्रतिनिधित्व करने आया था और प्रिया अपने फैशन ब्रांड की प्रमोशन के लिए.

होटल का बैंक्वैट हाल रोशनी से जगमगा रहा था. हलकी धीमी संगीत की धुन और लोगों की फुसफुसाहट से हाल में एक जीवंत माहौल था.

करण एक कोने में खड़ा अपने बिजनैस सहयोगियों से बात कर रहा था, जब उस की नजर भीड़ में एक जानीपहचानी आकृति पर पड़ी. एक पल के लिए उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ.

वह प्रिया थी. पहले से भी ज्यादा खूबसूरत, आत्मविश्वासी और चमकदार. उस ने एक शानदार, डिजाइनर ड्रैस पहन रखी थी और उस के आसपास लोगों का एक छोटा समूह था, जो उस की बातों पर हंस रहा था और उस की तरफ आकर्षित दिख रहा था. उस के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी, जो उस की कामयाबी और आत्मविश्वास को दिखा रही थी.

करण के दिल की धड़कनें अचानक तेज हो गईं. पिछले 2 सालों में उस की जिंदगी में बहुतकुछ बदल गया था, लेकिन प्रिया के लिए उस के मन में जो भावनाएं थीं, वे कहीं गहरे दबी हुई थीं, एक अनदेखी नदी की तरह जो अब अचानक सतह पर आ गई थीं.

उस ने महसूस किया कि उस की यादें, जो समय की धूल से ढकी थीं, एक ?ाटके में ताजा हो गई हैं. कालेज के दिन, प्रिया की हंसी, उन दोनों के साथ बिताए हर पल की तसवीर उस की आंखों के सामने कौंध गई.

उसे लगा जैसे उस ने इतने समय से कुछ खोया हुआ था और आज वह उस के सामने है. वह तुरंत प्रिया से बात करना चाहता था, उसे गले लगाना चाहता था, उस से पूछना चाहता था कि इतने समय से वह कहां थी, कैसी थी और क्या वह उसे भूली तो नहीं थी.

करण धीरेधीरे भीड़ को चीरता हुआ प्रिया की तरफ बढ़ा. उस के कदम भारी थे और उस का दिल एक अजीब से डर से कांप रहा था.

जैसे ही वह उस के करीब पहुंचा, उस ने देखा कि प्रिया लोगों से घिरी हुई थी. हर कोई उस से बात करना चाहता था, उस की तारीफ कर रहा था और उस के साथ तसवीरें खिंचवा रहा था.

प्रिया भी मुसकराते हुए उन से बातचीत कर रही थी, पूरी तरह अपनी नई दुनिया में लीन, अपनी कामयाबी की चमक में डूबी हुई. उस के चेहरे पर एक अलग ही आत्मविश्वास था, जो करण ने पहले कभी नहीं देखा था.

करण ने कई बार कोशिश की कि प्रिया की नजर उस पर पड़े, लेकिन प्रिया की आंखें उसे अनदेखा करती रहीं. वह इतनी बिजी थी कि शायद उसे अपने आसपास किसी और की परवाह ही नहीं थी या शायद वह उसे पहचान ही नहीं पाई.

करण वहीं खड़ा रहा, उम्मीद करता रहा कि प्रिया उसे पहचान लेगी और उस से बात करने आएगी. उस ने इंतजार किया, हर पल को एक सदी की तरह महसूस करते हुए.

5 मिनट, 10 मिनट, फिर 15 मिनट. लेकिन प्रिया अपनी धुन में मगन रही. वह लगातार लोगों से घिरी हुई थी और कभी भी उसकी तरफ मुड़ी ही नहीं, न ही उस की ओर एक नजर डाली.

करण का दिल भारी होता जा रहा था. उसे लग रहा था जैसे प्रिया उसे जानबूझ कर अनदेखा कर रही हो या शायद वह सच में उसे भूल चुकी हो या फिर शायद उस ने उसे पहचाना ही नहीं. उस के मन में एक अजीब सी टीस उठी, एक दर्द जो उसने सोचा था कि अब शांत हो चुका है, वह फिर से जाग गया था.

करण को कालेज के दिन याद आए, जब प्रिया उस से मिलने के लिए किसी भी भीड़ से निकल आती थी, चाहे कितनी भी रुकावटें क्यों न हों. उसे याद आया कि कैसे प्रिया उस की एक आवाज पर दौड़ी चली आती थी, कैसे उस की हर खुशी और हर दर्द में वह उस के साथ खड़ी होती थी.

और अब, वह उस के सामने खड़ा था, बस कुछ ही कदमों की दूरी पर और प्रिया उसे पहचान भी नहीं पा रही थी या शायद पहचानना नहीं चाहती थी. यह एहसास उसे अंदर से तोड़ रहा था.

उसे लगा जैसे वह इस चमकदमक भरी दुनिया में एक अजनबी है, जिसे प्रिया अब नहीं पहचानती, एक भूला हुआ अध्याय.

काफी देर तक इंतजार करने के बाद, जब करण को यह साफ हो गया कि प्रिया उस से बात करने नहीं आएगी, तो उस का दिल पूरी तरह से टूट गया. एक गहरी निराशा ने उसे घेर लिया. उस के चेहरे पर छाई मुसकान फीकी पड़ गई.

उस के मन में एक भयानक खालीपन छा गया. उसे लगा कि उस ने जिसे इतना प्यार किया था, वह अब उस के लिए बस एक याद बन चुकी है और शायद प्रिया के लिए वह अब कुछ भी नहीं रहा. वह बेमन से, भारी कदमों से समारोह से बाहर निकल गया.

दिल्ली की ठंडी हवा करण के गरम आंसुओं को पोंछने की कोशिश कर रही थी, लेकिन दिल में उठे तूफान को शांत करना आसान नहीं था. उस की उम्मीदें बिखर चुकी थीं और उसे लगा कि शायद उनका रिश्ता सचमुच खत्म हो चुका है या फिर कभी था ही नहीं, बस एक भरम था.

वह अपनी कार में बैठा और चुपचाप होटल से दूर चला गया, अपने टूटे हुए दिल और बिखरी हुई यादों के साथ.

करण को एहसास हुआ कि जिंदगी बदल गई है. लोग बदल गए हैं. और शायद सब से बड़ा बदलाव वह था, जो उन के रिश्ते में आया था.

वह जानता था कि इस घटना के बाद, अब उसे प्रिया के लिए अपनी भावनाओं को हमेशा के लिए दफन करना होगा.

यह बिछोह की सांझ अब एक स्थायी रात में बदल चुकी थी, जिस की कोई सुबह नहीं थी. Hindi Family Story

Story In Hindi: हम तो जिनावर हैं

Story In Hindi: फैक्टरी में दूसरी पाली रात को 1 बजे खत्म होती थी. अजय अपनी कार से कंपनी के मकान में जा रहा था. तरक्की होने के बाद उसे पाली पूरी के बाद भी देर तक रुकना पड़ता था, इसलिए कंपनी की टाउनशिप में जाने के समय रात को ज्यादा भीड़ नहीं मिलती थी.

घर से पहले एक बाजार था, जो बंद हो गया था. उमस भरी गरमी का मौसम था, पर कार की खिड़की में से आते ठंडी हवा के ?ांके अजय को अच्छे लग रहे थे.

तभी बाजार से आगे सुनसान जगह पर किसी शख्स को औंधा पड़े हुए देख कर एक बार तो अजय ने सोचा कि पड़ा रहने दो, मुझे क्या करना है. पर तब तक कार उस के नजदीक पहुंच गई.

कार की हैडलाइट की रोशनी में उस ने देखा, तो वह शख्स कंपनी की यूनिफौर्म पहने हुए था.

अजय कार रोक कर उस शख्स के पास गया, जो नशे में इतना बेहोश था कि उसे कोई भी रात के समय अपनी गाड़ी से कुचल कर जा सकता था.

अजय को वह आदमी कुछ जानापहचाना सा लग रहा था. जा कर उसे सीधा किया तो वह उस का पुराना पड़ोसी बलभद्र सिंह था, जिसे सभी बल्लू सिंह के नाम से बुलाते थे.

अजय ने जैसेतैसे बल्लू सिंह को उठा कर कार में लादा और उस के घर छोड़ने के लिए कार आगे बढ़ाई.

बल्लू सिंह अच्छे घर का था. अजय से उम्र में बड़ा होने के बावजूद वह और उस का परिवार, जिस में उस की पत्नी और 2 बच्चे शामिल थे, उसे बहुत इज्जत देते थे.

अजय ने देखा कि बल्लू सिंह की पत्नी कार की आवाज सुन कर डरते हुए घर का दरवाजा खोल रही थी. उसे लग रहा था कि कोई कर्ज मांगने वाला तो नहीं आ गया है.

अजय को देख कर बल्लू सिंह की पत्नी को राहत महसूस हुई और अजय के साथ बल्लू सिंह को कार से उतार कर घर के अंदर ले जाने में मदद करने लगी.

बल्लू सिंह को अजय बिस्तर पर लिटाने लगा, तब उस की पत्नी ने आंसू बहाते हुए बिना कुछ कहे उस की तरफ हाथ जोड़ कर मूक नजरों से उस का धन्यवाद किया. अजय बिना कुछ कहे चुपचाप चला आया.

बल्लू सिंह ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था, लेकिन बहुत ही अनुभवी और कुशल क्रेन आपरेटर था. इसी वजह से बड़े अफसर कोई भी बहुत जरूरी और रिस्की काम होने पर उसे ही याद करते थे खासकर प्रोडक्शन ईयर पूरा होने की आखिरी तिमाही में जनवरी से मार्च के समय जब रातभर काम चलता था.

रात की पाली के मुलाजिमों को ओवरटाइम करना पड़ता था, जिस की भुगतान की रकम कई बार तनख्वाह से ज्यादा हो जाती थी.

जैसा कि मेहनतकश तबका होता है, बल्लू सिंह को शराब पीने का शौक लग गया था, जो पहले तो कभीकभार पीने तक था, लेकिन ज्यादा पैसे हाथ में आने पर शराब की मात्रा और पीने का दौर बढ़ने लगा था. साथ में 2-4 यार भी मिल जाते थे, क्योंकि पीने का मजा तो यारों के साथ ही आता है.

कभीकभार पीने वाले बल्लू सिंह को अब रोज पीने की आदत हो गई थी. पहले शाम को ही पीता था, पर अब दिन में भी पीने लग गया था. लेकिन उस की क्रेन चलाने की कुशलता में कमी नहीं आई थी, बल्कि कई बार तो काम पूरा होने पर अफसर खुश हो कर अपनी जेब से रुपए दे कर कहते थे, ‘बल्लू सिंह, जाओ ऐश करो.’

ऐसे मौके रात को टैस्टिंग जैसे काम होने पर अकसर आते थे, क्योंकि टैस्टिंग कब होगी इस का निश्चित समय नहीं रहता था, इसलिए बल्लू सिंह को पहले ही रात को रुकने के लिए बोल देते थे कि यह काम तो बल्लू सिंह ही करेगा, साथ ही उसे ताकीद भी करते थे कि काम पूरा होने के बाद ही पीना.

हर समय हंसीमजाक करने वाला बल्लू सिंह धीरेधीरे शराब का आदी होने लगा. अब वह शराब की दुकान खुलते ही वहां पहुंचने लगा. जो दोस्त रात की पाली वाले होते थे, उन के साथ दिन में और दिन की पाली वालों के साथ रात में महफिल जमने लगी.

कहते हैं कि जब बुराई आती है तब अकेली नहीं आती है. वह दूसरे बुराइयों को साथ ले कर आती है.

शराब के साथ जर्दे वाला पान, गुटखा, सिगरेट और कभीकभी शराब पीने के लिए फैक्टरी से बाहर न जाने के चलते फैक्टरी के अंदर ही गांजे की चिलम का सुट्टा मारने वालों की संगति करने लगा. इन सब वजहों से नौकरी से छुट्टी ज्यादा होने लगी. जब छुट्टी नहीं रही, तो विदाउट पे करने लगा.

बल्लू सिंह को तकरीबन सालभर ओवरटाइम करना पड़ता था. इस वजह से तनख्वाह में कमी की भरपाई हो जाती थी, लेकिन कब तक. उसे अपने साथियों से तनख्वाह ज्यादा मिलती थी, पर अब उस के जुआ खेलने वाले नए साथियों का साथ भी मिलने लगा, जो तनख्वाह ज्यादा मिलने के चलते उसे जुआ खेलने के लिए उकसाने लगे.

शराब का नशा जुए की जीतहार के रोमांच से और बढ़ जाता था, जिस में बल्लू सिंह को बहुत मजा आने लगा. इन सब बुराइयों के एकसाथ आने से वह पत्नी के हाथ में जो तनख्वाह रखता था, उस में कमी आने लगी.

पत्नी समझदार, पढ़ीलिखी, अच्छे संस्कार की थी. उस ने घर और बच्चों को कम पैसों में संभाला, लेकिन समुद्र के पानी को बारबार उलीचने लगो तो समुद्र भी खाली होने लगेगा.

एक समय ऐसा आया कि बल्लू सिंह की तनख्वाह उस के शौक और नशे के आगे कम पड़ने लगी. इस वजह से रात को जब वह पी कर आता, तो घर में कलह होने लगती. अपने गुस्से और बेबसी को वह पत्नी की पिटाई कर के उतारता और फिर शराब की दुकान पर चला जाता.

कम तनख्वाह और बड़ते शौक के तनाव के चलते काम से कई दिनों तक गैरहाजिर रहने से बल्लू सिंह सूदखोरों, लोकल दादाओं के चंगुल में फंस गया, जो महीने की पहली तारीख को उस की तनख्वाह छुड़ा लेते थे और फिर उसे ही ब्याज पर रुपए इसी शर्त पर देते थे कि उसे शराब भी पिलानी पड़ेगी.

बल्लू सिंह को फैक्टरी जा कर काम करने में भी डर लगने लगा कि जो पैसा वह कमाएगा वह सूदखोर दादा ले जाएंगे. इसी डर के चलते वह फैक्टरी कभी जाता, तो कभी नहीं जाता. जो तनख्वाह मिलती, उस से अपने पीने का शौक पूरा करता और घर में फाकाकशी की नौबत आने लगी.

बच्चों की पढ़ाई की फीस जमा नहीं होने के चलते स्कूल वालों ने बच्चों का नाम काट दिया. तब बच्चों को उस ने सरकारी स्कूल में डाल दिया, जहां फीस कम लगती थी.

अब समस्या पीने की थी, जिसे उस ने शराब की दुकान पर सफाई कर के हल कर लिया था. दुकान वाला उसे सफाई करने के बदले शराब पिला देता था.

ब्याज वाले घर पर आ कर तगादा करते और बल्लू सिंह की पत्नी को धमकियां देने लगे, क्योंकि वह घर पर मिलता ही नहीं था. हमेशा हंसीमजाक करने वाले बल्लू सिंह का यह हाल हो जाएगा, किसी ने नहीं सोचा था.

एक रात की बात है. बल्लू सिंह की औरत ने अपने बच्चों को अजय के घर भेजा. एक बच्चे ने रोते हुए बताया, ‘‘अंकल, हमारे पापा मम्मी को मार रहे हैं. आप आ कर उन्हें बचा लो.’’

अजय तुरंत बच्चों के साथ गया और बल्लू सिंह पर चिल्लाया, ‘‘यह तुम क्या कर रहे हो बल्लू सिंह… क्या अपनी बीवी को इस तरह मारते हैं… शराब ने तुम्हें बिलकुल जानवर बना दिया है.’’

बल्लू सिंह ने अजय की आवाज सुन कर पानी बीवी को मारना बंद किया और कहने लगा, ‘‘भाई साहब, आप जानते नहीं कि यह औरत मेरी इज्जत खराब कर रही है. पड़ोस से पैसे उधार ले कर आई है. मैं क्या मर गया हूं, कमाता नहीं हूं…’’

बल्लू सिंह की औरत कहने लगी, ‘‘भाई साहब, कल से बच्चे भूखे हैं. घर में कुछ नहीं है. पिछले एक महीने से बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं.’’

यह सुन कर अजय गुस्से से कहने लगा, ‘‘बल्लू सिंह, तुम्हें अपने बीवी और बच्चों का जरा सा भी ध्यान नहीं है.’’

बल्लू सिंह उस के आगे हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘साहब, हम तो जिनावर हैं. हम पढ़ेलिखे नहीं हैं. फिर भी इस औरत को इतना तो सोचना चाहिए कि अपने आदमी की इज्जत को बना कर रखे.’’

बल्लू सिंह अपनी बेबसी को, अपनी कमी को, पति की इज्जत को ढकने के नाम पर पत्नी को मार कर दूर करने की कोशिश कर रहा था.

अजय ने कहा, ‘‘वह इज्जत कैसे बनाएगी, इज्जत तो तुम गिरा रहे हो. अपने बीवीबच्चों को भूखा रख रहे हो, उन्हें स्कूल नहीं भेज पा रहे हो. तुम्हारी पत्नी कब तक सब्र करेगी…’’

बल्लू सिंह बस नशे में एक ही बात कहता रहा, ‘‘साहब, हम तो जिनावर हैं. ये बड़ीबड़ी बातें हमें नहीं आती हैं.’’

अजय ने बल्लू सिंह की औरत को अपनी जेब से रुपए निकाल कर दिए और कहा, ‘‘सब से पहले खाने का कुछ सामान ले कर आओ. बच्चों और बल्लू सिंह को भी खिलाओ. और तुम भी भूखी मत रहना, खाना जरूर खाना.’’

बल्लू सिंह चाहे कितना भी खराब था, लेकिन अजय की बहुत इज्जत करता था. दूसरे दिन अजय सुबह की पाली होने के चलते फैक्टरी आ गया था. लंच में घर जाने पर उस की पत्नी ने बताया, ‘‘बल्लू भाई साहब आ कर माफी मांग रहे थे. मैं ने उन से कहा कि जब अजय आएंगे तब जो कहना उन से कहना.’’

दिनोंदिन बल्लू सिंह के घर की हालत खराब होती जा रही थी. वह घर की जिम्मेदारियों से बेपरवाह हो गया था. उसे सिर्फ एक ही चीज चाहिए थी, वह थी शराब, जिस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता था.

किसी भी तरह से वह अपने लिए शराब का बंदोबस्त कर लेता था, लेकिन उस के बीवीबच्चों का क्या होगा, नशे के आगे वह कुछ सोचना भी नहीं चाहता था.

बल्लू सिंह, जो कभीकभार फैक्टरी चला जाता था, वह भी उस ने बंद कर दिया था, क्योंकि उसके साथी क्रेन आपरेटर और स्लिंग लगाने वाले सिलिंगर उस को ताना मारने लगते थे कि बल्लू सिंह के बीवीबच्चे भूखे मर रहे हैं, उस के बच्चों का नाम स्कूल वालों ने काट दिया है, पर उसे तो सिर्फ शराब से मतलब है, उसे अपने परिवार की कोई चिंता नहीं है.

यह सब सुन कर बल्लू सिंह को सब के सामने शर्म आने लगती. वह किसी से भी ब्याज पर उधार ले कर तुरंत आउट पास ले कर शराब पीने के लिए फैक्टरी से बाहर चला जाता, जैसे शराब पीना उन के तानों का जवाब हो.

एक दिन की बात है. बल्लू सिंह की दूसरी पाली थी. वह भी आज काम पर आ गया था, लेकिन उस का कोई भरोसा नहीं था कि वह कब शराब पीने के लिए फैक्टरी से बाहर चला जाएगा.

बल्लू सिंह फैक्टरी में टैस्टिंग वाले पार्ट्स को टैस्टिंग एरिया में ले जाने के लिए क्रेन से उठाते हुए देख रहा था कि तभी उसे लगा कि पार्ट्स को उठाने के लिए स्लिंगर ने एक स्लिंग (वायर रोप) ठीक से नहीं लगाई है, क्योंकि वह एक कुशल क्रेन आपरेटर था, जिसे ऊपर क्रेन के केबिन में बैठ कर जल्दी पता चल जाता था कि स्लिंग ठीक से लगी है या नहीं.

बल्लू सिंह ने अपने साथी स्लिंगर को आवाज दे कर चेतावनी दी कि स्लिंग सही नहीं लगी है, पर तब तक पार्ट ऊपर उठ चुका था. कुछ काम की जल्दबाजी, कुछ स्लिंगर का ध्यान न देना, एक पार्ट स्लिंग से तेजी से लहराते हुए नीचे गिरने लगा.

यह सब बल्लू सिंह देख रहा था. उस ने अजय को दौड़ कर धक्का दिया. अजय दूर जा कर गिरा और वह भारी हिस्सा बल्लू सिंह पर गिर गया.

पूरी वर्कशौप में पहले तो सन्नाटा छा गया कि आज तो बल्लू सिंह गया. तब तक अजय खड़ा हो कर बल्लू सिंह के पास पहुंचा. वैसे भी वह शिफ्ट इंचार्ज था. उस ने तुरंत पास खड़े एक मुलाजिम को एंबुलैंस के लिए फोन करने को कहा.

इस बीच बाकी मुलाजिमों ने देखा कि बल्लू सिंह के पैर से खून का फव्वारा निकल रहा था. तभी उस के कराहने की आवाज आई.

अजय भी बल्लू सिंह की हालत देख कर डर गया था और सोच रहा था कि आज बल्लू सिंह नहीं होता, उस का बचना मुश्किल था.

तब तक एंबुलैंस के सायरन की आवाज आने लगी. बल्लू सिंह दर्द और खून बहने के चलते बेहोश हो गया था. मुलाजिमों और अजय ने मिल कर उसे एंबुलैंस तक उठा कर अंदर लिटा दिया.

एंबुलैंस के साथ आए मैडिकल स्टाफ ने प्राथमिक उपचार करना शुरू कर दिया. कंपनी के हौस्पिटल में जाते ही बल्लू सिंह को तुरंत आपरेशन थिएटर में ले जाया गया और उस के आपरेशन की तैयारी शुरू होने लगी.

अजय ने एक मुलाजिम को बल्लू सिंह के घर उस की पत्नी के साथ साथ अपनी पत्नी को भी खबर करने के लिए भेज दिया था. उस समय मोबाइल फोन की सुविधा नहीं थी.

थोड़ी देर बाद अजय की पत्नी बल्लू सिंह की पत्नी और उस के दोनों बच्चों को साथ ले कर आपरेशन थिएटर के बाहर आ गई.

अजय ने अपनी पत्नी को सारी बात बताई और कहा कि बल्लू सिंह ने उस की जान बचाने के लिए अपनी जान को दांव पर लगा दिया. आज बल्लू सिंह को कुछ हो जाता तो अजय अपनेआप को जिंदगीभर माफ नहीं करता.

बल्लू सिंह की पत्नी अपने बच्चों को अपनी छाती से चिपका कर अजय की बात सुनते हुए बस रो रही थी. उस के मुंह से एक शब्द नहीं निकला.

आपरेशन पूरा होने में तकरीबन 2 घंटे से ज्यादा लग गए. डाक्टर ने बाहर आ कर कहा कि आपरेशन ठीक से हो गया है. बल्लू सिंह के पैर में रौड लगा दी है, पर खून ज्यादा बहने के चलते उसे तुरंत खून चढ़ाना होगा.

अजय ने अपना खून के लिए कहा, पर उस का ब्लड ग्रुप मैच नहीं हुआ. तब अजय की पत्नी ने कहा, ‘‘आप मेरा ब्लड टैस्ट करें.’’

अजय की पत्नी का ब्लड ग्रुप मैच हो गया और उस ने अपना खून दे दिया. डाक्टर ने कहा कि और खून की जरूरत पड़ेगी, पर वह कल सुबह तक भी मिल जाएगा, तो कोई चिंता की बात नहीं है.

अजय ने अपने अफसरों को पूरे हालात के बारे में बता दिया था. अफसरों ने तुरंत रात की पाली के कुछ मुलाजिमों को, जिन का ब्लड ग्रुप बल्लू सिंह के ब्लड ग्रुप से मैच हो सकता था, हौस्पिटल भेज दिया.

इस तरह की सामाजिक जिम्मेदारी निभाने में मजदूर तबका हमेशा आगे रहता है. उन मुलाजिमों का ब्लड टैस्ट कर के उन के खून को हौस्पिटल के ब्लड बैंक में रखवा दिया था, जो सुबह काम आता.

उन मुलाजिमों को अजय ने अपने घर जा कर आराम करने के लिए कहा, तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि बल्लू सिंह के होश में आने के बाद ही वे घर जाएंगे.

रातभर अजय, उस की पत्नी, बल्लू सिंह का परिवार और साथी मुलाजिम आईसीयू के बाहर बैठे उस के होश में आने का इंतजार करने लगे.

सुबह जब बल्लू सिंह को होश आया, तभी डाक्टर का राउंड शुरू होने लगा. अजय ने डाक्टर से बल्लू सिंह के बारे में जानकारी ली.

डाक्टर ने कहा कि आपरेशन तो हो गया है, लिहाजा चिंता की कोई बात नहीं है, लेकिन इसे अपने पैरों पर खड़े होने में 3 महीने लग जाएंगे. तब भी यह पूरी तरह काम करेगा, ऐसा जरूरी नहीं है, क्योंकि पैर में अब रौड लग गई है, तो वह ओरिजनल जैसा काम नहीं करेगा.

3 दिन बाद बल्लू सिंह बात करने की हालत में आया, क्योंकि उसे दर्द और नींद के इंजैक्शन दिए जा रहे थे.

अजय की पत्नी ने अजय के कहने पर बल्लू सिंह की पत्नी को घरखर्च के लिए पैसे दे दिए थे. वह मना कर रही थी, लेकिन उस ने कहा कि ले लो अभी बहुत जरूरत पड़ेगी.

शाम को अजय अपनी पत्नी को साथ ले कर बल्लू सिंह को देखने हौस्पिटल पहुंचा. वहां बल्लू सिंह की पत्नी उस के पास बैठ कर फल खिला रही थी. अजय को देख कर वह खड़ी हो कर नमस्ते करने लगी. बल्लू सिंह ने भी उसे नमस्ते किया.

अजय ने पूछा, ‘‘अब कैसे हो तुम बल्लू सिंह?’’

‘‘सब आप की मेहरबानी है साहब.’’

अजय ने कहा, ‘‘बल्लू सिंह, तुम ने ठीक नहीं किया. मेरी जान बचाने के लिए अपनी जान की परवाह भी नहीं की. अगर तुम्हें कुछ हो जाता, तो इन बच्चों का क्या होता…’’

बल्लू सिंह कहने लगा, ‘‘साहब, हम मर जाते तो अच्छा होता. अपने बीवीबच्चों की जिनगी हमारे चलते खराब हो रही थी. हमारे मरने पर इन को कंपनी से बहुत रुपया मिल जाता और पैंशन भी मिल जाती, जिस से यह अपना और बच्चों का पेट पाल लेती.

‘‘हमारी जिनगी की कोई कीमत नहीं है. हमारे में और जिनावर में क्या फर्क है साहब, आखिर हम जिनावर…’’

बल्लू सिंह के बात पूरी करने से पहले ही अजय ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया और कहने लगा, ‘‘तुम जिनावर नहीं हो बल्लू सिंह. जो किसी की जान बचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं करता है, वह कभी जिनावर नहीं हो सकता है, वह अच्छा इनसान होता है.’’

अजय ने बल्लू सिंह की भाषा में जानवर को जिनावर कहने लगा. यह सुन कर बल्लू सिंह के चेहरे पर वही पुराने वाले बल्लू सिंह की मासूम मुसकराहट उभरने लगी.

अजय ने कहा, ‘‘बल्लू सिंह, मेरी जान तुम ने बचाई है, इसलिए मेरी कसम खा कर कहो कि आज से शराब, जुआ सब बंद कर दोगे और पुराने वाला माहिर क्रेन औपरेटर बन कर दिखाओगे.’’

बल्लू सिंह ने हाथ जोड़ कर वादा किया. यह सुन कर अजय की पत्नी की आंखों में आंसू आ गए.

उधर, खुशी के मारे बल्लू सिंह की पत्नी के आंसू रुक नहीं रहे थे. अजय की पत्नी उस के आंसू पोंछ कर उसे चुप कराने लगी. Story In Hindi

Romantic Hindi Story: इश्क की उड़ान

Romantic Hindi Story: कहते हैं कि जब कोई इश्क में होता है, तो उसे रंगीन ख्वाबों के नए पंख लग जाते हैं और वह अपनी ही बनाई दुनिया के आसमान में उड़ने लगता है. कल्पना और अजीत के इश्क की यह उड़ान उन्हें दिल्ली से भोपाल ले आई थी.

दिल्ली के लक्ष्मी नगर इलाके में पड़ोसी रहे कल्पना और अजीत के लिए भोपाल जाने की यह राह कहने को आसान थी, पर वहां उन के प्यार का एक अलहदा ही इम्तिहान होना था.

हुआ यों कि भोपाल आने से पहले दिल्ली में एक रात अजीत ने कल्पना को मोबाइल फोन पर बताया, ‘‘कल्पू, अब हमें अपने प्लान को आखिरी अंजाम तक ले जाना होगा. मुझे लगता है कि हम दोनों के घर वालों को हमारे प्यार की भनक लग गई है और इस से पहले कि वे जातपांत का वही पुराना राग अलापें, हमें यहां से कहीं दूर चले जाना होगा.’’

‘पर हम जाएंगे कहां?’ कल्पना ने सीधा सवाल किया.

‘‘देखो, हम इश्क के मारों की तरह सीधा मुंबई तो भागेंगे नहीं,’’ अजीत ने कहा.

‘तो मेरा सपनों का राजकुमार मुझे किस शहर में ले जा कर अपने दिल और घर की रानी बनाएगा?’ कल्पना ने ठिठोली की.

‘‘कल्पू, मैं ने सोच लिया है कि हम दोनों भोपाल चलेंगे. वहां मेरा एक दोस्त संजीव रहता है. वह हम दोनों को कोई काम भी दिला देगा और हमारी कोर्ट मैरिज भी करा देगा,’’ अजीत ने कहा.

‘ठीक है, मैं सारी तैयारी कर के रखूंगी,’ कल्पना ने कहा.

24 साल का अजीत ग्रेजुएशन कर चुका था और पढ़ाई में भी बहुत अच्छा था. वह बहुत सुलझा हुआ नौजवान था. वह हद से ज्यादा मेहनती भी था. रंगरूप से भी वह ठीक था. बस, एक ही कमी थी कि वह दलित समाज से था और ब्राह्मणों की लड़की कल्पना को अपना दिल दे बैठा था.

दूसरी तरफ कल्पना 22 साल की बहुत खूबसूरत लड़की थी. वह अपने मांबाप की एकलौती औलाद थी और उन की लाड़ली भी. पर वह अपने मांबाप को अजीत के बारे में बताने से डरती थी.

बहरहाल, एक दिन तय समय पर अजीत और कल्पना अपने घर में बिना बताए निकले और भोपाल की ट्रेन में बैठ कर दिल्ली के लिए जैसे हमेशा के लिए पराए हो गए.

भोपाल जंक्शन पर अजीत का दोस्त संजीव मिला और उन्हें अपने साथ घर ले गया. संजीव काफी साल से भोपाल में अकेला रह रहा था. उस का घर बड़ा तालाब के पास ही था.

जब अजीत और कल्पना ने पहली बार बड़ा तालाब देखा, तो कल्पना के मुंह से अचानक निकला, ‘‘संजीव, यह तालाब है या कोई समुद्र. मुझे तो लगा कि गांव का कोई तालाब होगा, थोड़ा सा बड़ा होगा, पर यह तो बहुत ज्यादा बड़ा है यार…’’

‘‘यह इनसानों द्वारा बनाई गई एक बहुत बड़ी झोल है और लगता है कि कोई समुद्री छोर है. ऐसा माना जाता है कि बड़ा तालाब को 11वीं शताब्दी में बनवाया गया था. तब इस इलाके में पीने की पानी की बड़ी समस्या थी.

‘‘भोपाल आज भी इसी तालाब का पानी पीता है. यही नहीं, बड़ा तालाब आज भोपाल के लोगों के लिए जीवनरेखा के साथसाथ मनोरंजन और रोजगार का जरीया भी बन गया है,’’ संजीव ने बताया.

‘‘मुझे तो भोपाल शहर बड़ा अच्छा लगा. रास्ते में जब हम आटोरिकशा में आ रहे थे तो ढलान और चढ़ाई वाली बलखाती सड़कें देख कर मैं तो रोमांचित हो गई,’’ कल्पना ने कहा.

‘‘यह शहर जितना खूबसूरत है, उस से भी ज्यादा खूबसूरत यहां के लोग हैं. और अब तो तुम भी यहां आ गई हो, तो हमारे शहर का रुतबा और ज्यादा बढ़ गया है,’’ संजीव कल्पना को देख कर बोला.

‘‘अगर तेरी फ्लर्टिंग खत्म हो गई हो तो हमें वह मकान भी दिखा दे, जहां हमारे रहने का इंतजाम किया गया है,’’ अजीत कल्पना को अपनी तरफ खींच कर बोला.

संजीव ने अपने ही इलाके में एक वन बीएचके फ्लैट दिखाया, जो पहली मंजिल पर बना था. ग्राउंड फ्लोर पर मकान मालिक अपने परिवार के साथ रहता था.

कल्पना और अजीत को वह मकान पसंद आया. उन्होंने अपना सामान वहां रखा. सब से अच्छी बात यह थी कि उस फ्लैट में मकान मालिक ने रोजमर्रा का जरूरी सामान रखा हुआ था, जिस का इस्तेमाल वे दोनों कर सकते थे.

ऊपर से तो कल्पना और अजीत बहुत खुश थे, पर मन ही मन वे डरे हुए थे. कल्पना जानती थी कि उस के पापा ने उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस थाने में लिखवा दी होगी और आज नहीं तो कल उन्हें पता चल जाएगा कि अजीत भी अपने घर से गायब है.

हालांकि, उन दोनों ने अपने मोबाइल फोन में नए सिमकार्ड भी डलवा लिए थे, पर उन की हिम्मत नहीं हो पा रही थी अपनेअपने घर बात करने की.

संजीव अपने मकान पर जा चुका था. उस का अगला काम था कल्पना और अजीत को कहीं कोई काम दिलाना और फिर उन की कोर्ट मैरिज करवाने का इंतजाम करना.

‘‘कल्पू, हम ने सही फैसला लिया है न? अगर तुम चाहो तो हम वापस जा कर अपने बड़ों से माफी मांग सकते हैं,’’ अजीत ने रोटी का कौर कल्पना को खिलाते हुए कहा.

‘‘सही या गलत का तो पता नहीं, पर अब जब हम यहां आ ही गए हैं, तो खुद को तो यह चुनौती दे ही सकते हैं कि चाहे कैसे भी हालात हों, हमें हिम्मत नहीं हारनी है,’’ कल्पना बोली.

कल्पना और अजीत दोनों अच्छे खातेपीते घर के थे. उन के पास इतने पैसे तो थे कि 2 महीने आराम से भोपाल में गुजार दें, पर अगर उन्हें जिंदगीभर साथ रहना था, तो सिर्फ प्यार की किश्ती उन का बेड़ा पार नहीं कर सकती थी. उन्हें कड़ी मेहनत करनी थी और जो भी काम मिलता, उस में अपना सबकुछ झोंक
देना था.

अगले दिन संजीव अजीत को एक अखबार एजेंट करीम मियां के पास ले गया. करीम मियां इस धंधे के पुराने खिलाड़ी थे. उन्होंने अजीत से कहा, ‘‘देखो बरखुरदार, तुम अच्छेखासे पढ़ेलिखे हो, पर फिलहाल मैं तुम्हें सुबह घरघर अखबार डालने का काम दिलवा सकता हूं. सुबह 2 घंटे का काम है. 2,000 रुपए महीना मिल जाएंगे. उस के बाद तुम कोई दूसरा धंधा भी पकड़ सकते हो.’’

‘‘करीम मियां, काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता. मुझे अखबार बांटने में कोई परेशानी नहीं है. पर मेरे पास कोई साइकिल नहीं है और मैं भोपाल में नया हूं,’’ अजीत बोला.

‘‘मुझे पता है बेटा. संजीव ने मु?ो सब बता दिया है. साइकिल तो मैं तुम्हें दे दूंगा और जहां तक अखबार बांटने के इलाके का सवाल है, तो मेरा एक छोकरा तुम्हें वे सारे घर दिखा देगा, जहां तुम्हें अखबार डालना है,’’ करीम मियां ने कहा.

अजीत को साइकिल मिल गई और उसे अगली सुबह से अपनी नई नौकरी पर लग जाना था. कल्पना खुश हुई कि चलो एक को तो नौकरी मिली.

‘‘यार, मैं सोच रहा हूं कि सुबह अखबार बांटने के बाद किसी दुकान पर कोई छोटीमोटी नौकरी भी पकड़ लूंगा. इस से हम दोनों अंटी से और ज्यादा मजबूत हो जाएंगे,’’ अजीत बोला.

‘‘सुनो अजीत, मैं ने कल्पना के लिए एक जगह बात की है. वह इलैक्ट्रोनिक्स आइटम का बड़ा शोरूम है, जहां लड़कियां पैकिंग करती हैं. उस शोरूम का मालिक बड़ा ही शरीफ है.

‘‘सब से अच्छी बात तो यह है कि वह शोरूम मेरे औफिस के ही नजदीक है. मैं ही सुबह कल्पना को अपनी बाइक से ले जाऊंगा और फिर शाम को वापस ले आऊंगा. महीने के 10,000 रुपए मिलेंगे,’’ संजीव बोला.

‘‘यह तो बहुत अच्छी खबर है. मैं घर पर अकेले क्या करती… कुछ पैसा और जुड़ेगा तो हम जल्दी सैटल हो कर शादी भी कर लेंगे,’’ कल्पना ने खुश हो कर कहा.

अगले दिन अजीत सुबह 5 बजे अपनी साइकिल ले कर करीम मियां के पास निकल गया. इधर, 8 बजे के आसपास संजीव कल्पना को ले कर इलैक्ट्रोनिक्स सामान के शोरूम में ले गया.

कल्पना को उसी दिन से काम मिल गया. सुबह 9 बजे से शाम के 6 बजे तक ड्यूटी थी. शाम को 6 बजे संजीव उसे अपनी बाइक से घर वापस ले आया.

घर पर अजीत मौजूद था. वह बोला, ‘‘कल्पू, कैसा रहा आज का दिन?’’

‘‘एकदम बढि़या. पैकिंग करने में ज्यादा दिक्कत नहीं है. मैं सोच रही हूं कि अगर मालिक मुझे ओवरटाइम भी करने दे तो मैं पैकिंग के अलावा वहां के और भी तमाम काम सीखना चाहूंगी, जैसे सेल्स वाले क्या करते हैं, टैलीविजन वगैरह सामान बेचने की कला कैसे आती है,’’ कल्पना ने अपने मन की बात रखी.

‘‘मुझे भी एक दुकान के बाहर मोबाइल फोन के कवर बेचने वाले अंकल ने नौकरी पर रख लिया है. 8,000 रुपए महीना देंगे. सुबह 8 बजे तक अखबार का काम खत्म, उस के बाद मोबाइल कवर बेचने का धंधा.

‘‘मुझे मोबाइल फोन की सारी सैटिंग्स पता हैं, किसी को कोई दिक्कत आएगी, तो उस की समस्या भी सुलझा दूंगा,’’ अजीत बोला.

‘‘फिर तो मेरी पार्टी बनती है. अभी बड़ा तालाब के सामने बने रैस्टोरैंट में चलते हैं और चाइनीज खाते हैं,’’ संजीव बोला.

वे तीनों बाहर खाना खाने चले गए. जब कल्पना और अजीत वापस घर आए, तो कल्पना बोली, ‘‘यार, वैसे तो सब सही जा रहा है, पर अभी भी एक अनजाना डर मन में है कि अगर हमारे घर वालों को पता चल गया, तो क्या होगा…’’

‘‘तुम सही कह रही हो. सारा दिन मुझे बस यही खयाल रहता है कि अगर उन्होंने तुम्हें ढूंढ़ लिया और जबरदस्ती अपने साथ ले गए, तो मेरा क्या होगा…’’ अजीत बोला.

‘‘क्यों न हम यहां के थाने में शिकायत लिखवा दें कि हम दोनों बालिग हैं और अपनी मरजी से यहां रहते हैं. अगर हमें कुछ खतरा महसूस होता है, तो पुलिस को हमारी हिफाजत करनी होगी,’’ कल्पना ने सु?ाव दिया.

‘‘इस सब का एक ही हल है और वह है हमारी कोर्ट मैरिज. हम कल ही अर्जी दाखिल कर देते हैं और मंजूरी मिलते ही शादी कर लेंगे,’’ अजीत बोला.

हुआ भी यही. तकरीबन 2 महीने बाद अजीत और कल्पना ने शादी कर ली. संजीव ने सारा इंतजाम किया था. इसी तरह देखतेदेखते 6 महीने गुजर गए.

अजीत और कल्पना अपनी नौकरी में जैसे खो गए थे. वे दोनों बहुत मेहनती थे और रोजाना 15 घंटे अपने काम को देते थे.

घर वापस आते तो बहुत ज्यादा थके होते थे. खाना खाया और बिस्तर पकड़ लिया. इस से उन दोनों की शादीशुदा जिंदगी नीरस होने लगी थी.

शायद यही वजह थी कि कल्पना अब संजीव के करीब हो रही थी या संजीव को ऐसा महसूस हो रहा था. वह शुरू से ही कल्पना की खूबसूरती का कायल था और उसे घर से शोरूम और शोरूम से घर लाने ले जाने में और ज्यादा जुड़ने लगा था.

कभीकभार जब कल्पना बहुत ज्यादा थकी होती थी, तब वह बाइक पर संजीव के कंधे से लग कर ऊंघने लगती थी. ऐसा कई बार अजीत ने भी देखा था, पर उसे कल्पना पर यकीन था. पर उसे कोई रिस्क भी नहीं लेना था.

एक दिन रविवार को अजीत और कल्पना बड़ा तालाब के सामने बैठे सुहानी शाम का मजा ले रहे थे.

अजीत ने कल्पना का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘क्या तुम इस शादी से खुश हो? मैं जानता हूं कि यह अनजाना शहर है और मेरे सिवा तुम्हारा यहां कोई नहीं है.

‘‘हम दोनों मजबूरी में ऐसा काम कर रहे हैं, जो हमारी पढ़ाई से कमतर है. जो खुशियां मुझे तुम्हें देनी चाहिए, वे मैं फिलहाल नहीं दे पा रहा हूं. कल्पू, तुम मुझे छोड़ कर तो नहीं चली जाओगी न?’’

अजीत के मुंह से अचानक यह सब सुन कर कल्पना एकदम हैरान रह गई. उस की आंखों में आंसू आ गए.

वह बोली, ‘‘अजीत, यह ठीक है कि हमारे दिन अच्छे नहीं चल रहे हैं और जो ख्वाब हम ने देखे थे, वे शायद इस हकीकत से ज्यादा हसीन थे, पर प्यार करने का मतलब यह नहीं होता कि दुख के समय में साथ छोड़ दो.

‘‘मैं इसलिए ज्यादा काम नहीं कर रही हूं कि मुझे घर काटने को दौड़ता है या मुझे ज्यादा पैसे चाहिए, बल्कि मैं चाहती हूं कि काम और मेहनत के मामले में मैं किसी भी तरह तुम से उन्नीस न रहूं. मैं हर हाल में तुम्हारे साथ खुश हूं और हमेशा रहूंगी.’’

अजीत के मन से शक के बादल छंट गए. इसी बीच एक दिन अजीत ने संजीव से कहा, ‘‘यार, तुम एक बार मेरे घर फोन कर के वहां के हालात के बारे में जानो. उन्हें यह जताना कि जैसे तुम्हें पता ही नहीं है कि मैं यहां तुम्हारे पास हूं.’’

‘‘पर अगर उन्हें भनक लग गई तो?’’ संजीव ने कहा.

‘‘आज नहीं तो कल उन्हें पता चल ही जाएगा. हम कब तक यों छिप कर रहेंगे. कल्पना कहती नहीं है, पर उसे अपने मम्मीपापा की बहुत याद सताती है,’’ अजीत बोला.

अगले दिन संजीव ने अजीत के घर फोन लगाया और बोला, ‘‘अंकल, मैं भोपाल से अजीत का दोस्त संजीव बोल रहा हूं. बड़े दिन से अजीत से बात नहीं हो पाई है. सब ठीक तो है न?’’

‘‘बेटा, अजीत तो कई महीने से गायब है. हमारे पड़ोसी ने उन की बेटी को अगवा करने के इलजाम में अजीत का नाम पुलिस थाने में लिखवा दिया है. पता नहीं वे दोनों कहां होंगे… साथ हैं भी या नहीं…’’

यह सुनते ही संजीव के मन में एक बार आया कि वह सब सचसच बता दे, पर कल्पना के बारे में सोच कर वह चुप रह गया.

जब अजीत के पापा ने अपनी पत्नी को संजीव के फोन के बारे में बताया, तो उन्हें शक हुआ कि कहीं अजीत और कल्पना भोपाल में तो नहीं हैं. वे तभी कड़ा मन कर के कल्पना के घर गईं और फोन वाली बात बता दी.

अगले ही दिन अजीत और कल्पना के मांबाप भोपाल जा पहुंचे और संजीव पर दबाव डालने और पुलिस की धमकी देने के बाद अजीत और कल्पना के मकान का पता उगलवा लिया.

घर की डोरबैल बजी. कल्पना को लगा कि संजीव आया होगा. उस ने दरवाजा खोला और सामने मम्मीपापा को देख कर उस का रंग सफेद पड़ गया.

तब तक अजीत भी दरवाजे पर आ गया था. उन्हें देख कर पहले तो वह सकपकाया, पर बाद में धीरे से बोला, ‘‘अंदर आइए.’’

उन सब के साथ संजीव भी था. वह इस सब के लिए खुद को अपराधी सा महसूस कर रहा था.

पहले तो कल्पना के पापा को बड़ा गुस्सा आया, पर जब उन्हें पता चला कि अपनी गृहस्थी को बेहतर करने के लिए वे दोनों इतनी ज्यादा कड़ी मेहनत कर रहे हैं, तो वे मन ही मन खुश भी हुए.

‘‘मैं न तो इस शादी से खुश हूं और न ही तुम दोनों से नाराज हूं. किसी मांबाप को गुस्सा तब आता है, जब उन की औलाद भाग कर शादी तो कर लेती है, पर दुनिया के थपेड़े खा कर उन का प्यार चार दिन में ही हवाहवाई हो जाता है.

‘‘तुम दोनों खुश रहो और हमेशा यहीं भोपाल में रहना, मैं सिर्फ इतना ही चाहता हूं, क्योंकि इस बुढ़ापे में मैं अपने खानदान और चार लोगों से यह नहीं सुनना चाहता कि मेरी बेटी ने छोटी जाति के लड़के से शादी कर के हमारी नाक कटवा दी.

‘‘मैं कुछ पैसे तुम्हें दे दूंगा और वहां पुलिस में दर्ज कराई गई अपनी शिकायत रद्द करवा दूंगा. मुझे लगता है कि अजीत के मांबाप को भी मेरा यह आइडिया सही लगेगा.’’

यह सुन कर अजीत के पापा की तो मानो जान में जान आई. उन के बोलने से पहले ही कल्पना ने कहा, ‘‘हमारा मकसद आप लोगों की बेइज्जती कराना नहीं था. यहां संजीव ने हमें सहारा दे कर हमारा हौसला बढ़ाया था. यह हमारा सच्चा दोस्त है.

‘‘और हां, हम दोनों ने शादी कर के कोई गुनाह नहीं किया है और अगर आप को लगता है कि हम यहीं भोपाल में रहें, तो हमें कोई दिक्कत नहीं है. हम यहीं अपनी गृहस्थी बसाएंगे.’’

‘‘अजीत बेटा, मैं जानता हूं कि तुम एक समझदार बच्चे हो. मैं और तुम्हारी मां भी यही चाहते हैं कि तुम यहां अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करो,’’ अजीत के पापा ने कहा. वे सब एक रात वहां रहे और फिर अगले दिन वहां से चले गए. उन्होंने कुछ पैसे भी अपने बच्चों के अकाउंट में डलवा दिए थे.

इस घटना को 6 साल बीत गए थे. एक दिन अजीत और कल्पना के पापा के पास एक ह्वाट्सएप आया, जिस में एक इनविटेशन था. अजीत और कल्पना ने अपनी कड़ी मेहनत से इलैक्ट्रोनिक्स के सामान का अपना शोरूम खोला था. अगले रविवार को उस की ओपनिंग थी.

वे चारों दोबारा भोपाल गए. अजीत और कल्पना बहुत खुश हुए. उन दोनों की मम्मियों ने उस शोरूम का उद्घाटन किया, जिस का नाम था ‘कल्पना इलैक्ट्रोनिक्स’. अजीत और कल्पना की कड़ी मेहनत का सुखद नतीजा. Romantic Hindi Story

Short Hindi Story: छोटी जात

Short Hindi Story: गांव पिपलिया खुर्द, जिला सतना. मिट्टी के घर, टूटी पगडंडी और रात के अंधेरे में अब भी लोग सड़कों पर नहीं निकलते. वहीं रहती थी सीमा, एक कोरी जात की लड़की. पिता रामभरोसे दलित टोले में जूते बनाने का काम करते थे. मां की बचपन में ही मौत हो गई थी.

‘बेटी हो कर पढ़ाई करेगी? तू तो हाथ का काम सीख, यही तेरा भविष्य है,’ बस्ती के लोग अकसर कहते.

मगर सीमा ने यह मान लिया था कि उस की जात उस की नियति नहीं है. गांव के सरकारी स्कूल से उस ने 10वीं जमात पास की, लेकिन असली लड़ाई तो उस के बाद शुरू हुई.

जब इंटर के लिए शहर जाना चाहा, तो पंचायत ने विरोध किया, ‘लड़की है, अकेली जाएगी शहर? और पढ़लिख कर करेगी क्या?’

पिता ने भी हाथ खड़े कर दिए, ‘‘बिटिया, हम गरीब हैं, छोटी जात वाले हैं, ये बड़े सपने हमें शोभा नहीं देते.’’

सीमा ने तब पहली बार सीधे आंखों में आंख डाल कर कहा, ‘‘बाबूजी, मैं पढूंगी. चाहे भूखी रहूं, लेकिन पढ़ाई नहीं छोडूंगी.’’

वह खेतों में मजदूरी करने लगी. दिन में स्कूल, रात में चूल्हा. शहर की गलियों में झाड़ू भी लगाई, लेकिन किताबों का साथ नहीं छोड़ा. धीरेधीरे, वह बीए, फिर एमए तक पहुंच गई.

कालेज में अकसर टीचर भी ताना मारते, ‘तुम जैसी जात की लड़कियां यहां क्यों आती हैं? टीचर बनोगी क्या?’

सीमा मुसकरा कर कहती, ‘‘नहीं सर, अफसर बनूंगी.’’

आईएएस की कोचिंग करनी थी, मगर पैसे नहीं थे. उस ने सरकारी लाइब्रेरी में बैठ कर नोट्स बनाना शुरू किया. दिनभर न पढ़ पाने पर रात को शौचालय की सफाई के बाद बल्ब की रोशनी में पढ़ती थी.

और एक दिन जब उस का नाम अखबार में आया, ‘सीमा बंसोड़, अनुसूचित जाति वर्ग से, टौपर’ तो उसी गांव की पंचायत, जो कभी विरोध करती थी, अब मिठाई बांट रही थी.

सीमा ने अपना पहला भाषण उसी स्कूल में दिया, जहां उस के नाम से कभी टीचर मुंह चिढ़ाते थे.

‘‘जात वह दीवार है, जिसे मैं गिरा नहीं सकी, लेकिन उस पर चढ़ कर मैं ने उड़ना जरूर सीख लिया.’’

अब वही लोग, जिन की बेटियां कभी स्कूल नहीं जाती थीं, सीमा को देख कर पूछते, ‘हमारी बेटी भी अफसर बन सकती है न?’

सीमा मुसकरा कर कहती, ‘‘अगर जात, गरीबी और लड़कपन एकसाथ हो सकते हैं, तो जीत भी साथ हो
सकती है.’’ Short Hindi Story

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