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Hindi Story : बेवफा कौन ?

Hindi Story : रघुवर  को कब शराब के शौक ने घेर लिया, उसे एहसास ही नहीं हुआ. उसकी ऐसे-ऐसों से मित्रता हो गई कि जो अपने आप में इस क्षेत्र के अखंड खिलाड़ी थे.  कहते हैं न, आदमी को एक ऐब पकड़ता है, तो दूसरे ऐब भी आने घेरने लगते हैं, सो रघुवर दास को दूसरी कई बुराइयों ने भी भी  जकड़ लिया.  परिणाम स्वरूप कोयला खान जाते समय नूर होटल में बैठकी भी जमने लगी है.

वहां खूब खाते-पीते और दूसरों की भी सेवा करते. फिर संध्या समय लौटते, तो बैठकी होती. धीरे धीरे हाथों में पैसे की तंगी होने लगी तो एक मित्र रामनारायण ने कहा, -“तुम्हें कितने पैसे चाहिए…. मैं हूं न .”

रघुवर  का चेहरा खिल गया.

रामनारायण ने कहा, – “ चलो, प्रभात  के पास, कितना पैसा चाहिए, मैं ब्याज में दिलवाता हूं .”

रघुवर ने मालिक राम की ओर देखा तो उसने भी सिर हिला कर पुष्टि की,-” कभी कभी मैं भी लेता हूं .”

-” कितना ब्याज है .” संशय से भर कर रघुवर दास ने जानना चाहा.

– “देखो, कम पैसे कम लोगे तो 10% ज्यादा लोगे तो 8% .”

” भैय्या, ऐसा क्यों ?”

– “हम भी स्वयं खुद लेते हैं ! ऐसा तो सभी जगह है… आखिर उन्हें भी तो बाल बच्चे पालने हैं, फिर कितना रिस्क है…घर से पैसे निकाल कर देते हैं . मजाक है क्या.”

रामनारायण ने बात समझायी तो रघुवर सहमत हो गया.

अब शराब के लिए पैसे ब्याज पर लिए जाने लगे थे. शुरू में रघुवर को लगा वह गलत कर रहा है, यह भविष्य के लिए घातक है मगर तब तक मदिरा का आनंद सर चढ कर बोलने लगा था. मित्रों ने समझाया था,- “हम लोग  कोयला खदान में काम करने वाले लोग हैं, अगर हमें स्वस्थ रहना है तो शराब पीनी होगी . नहीं पियोगे तो हाथ पैर में दर्द रहेगा, काम नहीं कर पाओगे…मन नहीं लगेगा .”

मालिकराम का उद्घोष था ,- “आखिर कमाते किसके लिए हो बंधु ! क्या बाल बच्चों का पालन-पोषण उनके लिए खपना ही हमारा जीवन है, क्या हम कुछ अपने लिये  नहीं जी सकते…”

रघुवर को बातें जंचती थी और वह बातें उसके मस्तिष्क पर गहरा असर डालती थी. कहते हैं न जैसा माहौल, वैसा वैसा चढ़े रंग ! बस रघुवर के साथ भी यही हुआ. वह एक नंबर का मदिरा प्रेमी बन गया और ब्याज पर रुपए लेकर जिंदगी का सुख भोगने लगा . मगर इसका परिणाम, भविष्य में  तो उसे ही भोगना था….

रघुवर को अचानक पता चला – उसे कैंसर है….!

शराब व सूदखोरी के संजाल में वह बुरी तरह फंसा ही हुआ था, अभी हाल मे शादी हुई थी, पत्नी रत्ना ! जैसा नाम, सचमुच वैसे ही रूप लावण्य से परिपूर्ण रत्नावती थी. उसकी सुंदरता के आगे कोई ठहर नहीं पाती थी . रघुवर का इलाज कोयला खदान की सबसे वृहदकाय हॉस्पिटल में होने लगा, इधर ‘म‌द्म’ का नशा छुट नहीं रहा !

एक दिन प्रभात  घर आ पहुंचा . रघुवर बीमार लेटा हुआ था . प्रभात आया तो पति का मित्र मान, रत्ना आगंतुक को भीतर ले आई .

-” भैय्या ! यह क्या सुन रहा हूं. बहुत दुख हुआ .” प्रभात ने दुखी स्वर में कहा.

– “अब क्या कहूं… कब क्या होगा, किसे पता था… प्रभात .”

– “ओह !बड़ी दुखद खबर है.मेरे लायक कोई भी सेवा हो तो कहना….”

रत्ना प्रभात की बातें सुन रही थी .घर की स्थिति खराब होती जा रही थी, राशन नहीं था, पैसे नहीं थे. ड्यूटी पर रघुवर जा नहीं पा रहा है .

रघुवर ने ने कहा, -” भैय्या ! तुमने तो हमेशा  मदद  की है, अभी भी तुम्हारा भरोसा है .”

-“हां, कहो… मैं हूं न !”

अब अक्सर प्रभात घर आ जाता, घंटों रत्ना से बातें करता .रत्ना उससे प्रभावित होती चली गई, उस पर विश्वास करने लगी है. कमजोर लता थोड़ा सा सहारा पा जाए तो उस पर ही आसरा कर बैठती है . रघुवर इलाज , पानी के लिए हॉस्पिटल जाता.कोयला खदान के चक्कर लगाता कभी लोन के लिए कभी पी.एफ की राशि से लोन के लिए. उसकी स्थिति दिनोंदिन खराब हो रही थी.

एक दिन  रघुवर  घर पहुंचा, संध्या का वक्त था .रत्ना को आवाज दी… दरवाजा खुला, तो देखा भीतर प्रभात बैठा है ! उसे तो मानो काठ मार गया…

” रत्ना ! यह ठीक नहीं है .” रघुवर का का स्वर दुःख से भरा हुआ था.

” मगर यह तो आपके मित्र हैं, आपके बारे में ही बातचीत कर रहे थे, हाल-चाल पूछ रहे थे.”

– “तुम जानती हो… मुझे यह पसंद नहीं .”

– “और आपको पता है,  बीमार हो… घर का खर्चा चलाने लायक भी  नहीं रहे .”

– “तो ?” तो क्या हुआ… मुझे लोन मिल जाएगा . तुम्हारा भविष्य सुरक्षित है .”

रघुवर असहाय है, क्या करें… एक तरफ बीमारी दूसरी तरफ रत्ना की जवां उम्र .  उसे लगा रत्ना प्रभात की ओर आकर्षित हो रही है, प्रभात अक्सर घर आता, उसका हाल चाल लेता, फिर खूब हंसता और रत्ना को हंसाता.

रघुवर एक दो दफे प्रतिकार की भाषा में बात की तो रत्ना  बोली,-”  तुम बीमार हो… अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दो…. और हां मुझ पर विश्वास रखो. ”

रघुवर मानो मन मसोस कर रह जाता . समय की मार त्रासदी यही तो है, कभी अपनी पत्नी रत्ना की खूबसूरती पर उसे नाज था, उसे लग रहा था, आज वह सबसे लावण्यमयी रत्ना उसके हाथों से निकल रही है और वह असहाय है…

एक दिन तो पराकाष्ठा हो गई. रत्ना बाथरूम में नहा रही थी . रघुवर बिस्तर पर पड़ा हुआ था .अचानक प्रभात आ गया.

” भैय्या कैसे हो ? कुछ मदद हो तो कहना… बिल्कुल संकोच नहीं….”

– “हां… हां अब… और किसको कहूगा .” तभी बाथरूम से रत्ना ने झांक कर देखा सामने प्रभात बैठा है . प्रभात ने रत्ना को देखा और सौंदर्य देखता रह गया,  रघुवर की आंखें भीग गई . वह सोच रहा था मैं  कितना असहाय हो चुका हूं.

रघुवर की नासाज तबीयत के बारे मे जानने, एक दिन प्रभात रघुवर के घर पहुँचा.दरवाज़ा रघुवर की पत्नी रत्ना ने खोला.  आज उसकी सुंदरता देख प्रभात सोच में पड़ गया. उसकी आँखों में एक बार फिर धूर्तता चमकने लगी . अपनी आवाज़ में शहद सी मधुरता घोलकर वह रघुवर से बोला,-” रघुवर,  तुम दवाई लो और आराम करो.जल्द ही ठीक हो जाओगे .”

रघुवर-“लेकिन मैं  अभी काम पर नही जा पा रहा हूँ .घर कैसे चलेगा.दवा कहाँ से आएगी.यही चिंता खाए जा रही है. आखिर तुम से कब तक मदद लूं.”

प्रभात,-”तुम परेशान मत हो बंधु,मैं सब इंतज़ाम कर दूँगा.”

प्रभात की‌ निगाहें  बहुत दिनों से रत्ना पर थी उसकी दुकान से  राशन आ रहा.पैसा आ गया.दवाइयां भी आने लगी.प्रभात  जब तब घर आने लगा.वह रत्ना से बात करने और उसे छूने की कोशिश करता.रत्ना उसके आने से सहम जाती.

एक रात रघुवर की तबियत बिगड़ गई.अस्पताल में डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए 75 हज़ार जमा करने की बात कही. रघुवर ने प्रभात को बुलाया . प्रभात तो मौक़े का इंतज़ार कर रहा था . तिरछी नज़रों से रत्ना को देखते हुए बोला,-“तुम्हारे ऊपर बहुत उधार हो गया है रघुवर और अब फिर इतना रूपया  !!! मुश्किल होगा व्यवस्था करना. हाँ, एक उपाय हैं यदि तुम दो चार दिन के लिए रत्ना को मेरे साथ भेज दो तो .”

-“प्रभातऽऽऽऽऽ .”  रघुवर चिल्लाने की कोशिश करने लगा और गश खाकर गिर पड़ा.

निरीह रत्ना एक बार प्रभात को देखती है और फिर पति  को . धीरे धीरे  उसका चेहरा कठोर हो गया.बोली -”मैं तैयार हूँ .”

प्रभात की आंखें चमक उठीं तुरंत रत्ना को लेकर दूसरे कमरे में चला गया. रघुवर बेबस देखता रहा.

आज उसे अपनी शराब पीने की लत का परिणाम देखने को मिल रहा था जिसका खामियाजा रत्ना भुगत रही थी.

रत्ना बाहर आयी.उसके हाथ मे ढेर सारे हज़ार रुपये थे. रघुवर अस्पताल में भर्ती हो गया .इधर प्रभात जब जब तब रत्ना के पास आता .मोहल्ले में चर्चा होने लगी .

10 दिन बाद जब रघुवर स्वस्थ हो घर पहुँचा तो रत्ना की लाश पंखे पर टंगी थी .इधर रघुवर रत्ना कि लाश से लिपट लिपट कर रो रहा था और कभी शराब न पीने की कसमें खा रहा था और उधर ख़बर छपी ……चरित्रहीन रत्ना ने की आत्महत्या .”खबर पढ़कर रघुवर अपना दिमाग़ी संतुलन खो बैठा.शराब के कारण एक और हसता खेलता परिवार उजाड़ दिया.

Hindi Story : सुबह का भूला

Hindi Story : ‘‘सुनो जरा, आज रमा दीदी के यहां लेडीज संगीत का प्रोग्राम है, इसलिए दोपहर को अस्पताल से जल्दी घर आ जाना. शाम को 5 बजे निकल चलेंगे. यहां से 80 किलोमीटर ही तो दूर है, शाम के 7 बजे तक पहुंच ही जाएंगे.’’

‘‘नहीं सीमा, यह कैसे मुमकिन होगा… शाम को 6 बजे से अपना क्लिनिक भी तो संभालना होगा. कितने मरीज दूसरे शहरों से आते हैं. सभी को परेशानी होगी,’’ डाक्टर श्रीधर ने अपनी परेशानी सीमा को बताई.

‘‘मतलब, आप को लौटतेलौटते तो रात के 9-10 बज जाएंगे और उस के बाद अगर हम जाएंगे भी तो प्रोग्राम खत्म होने के बाद ही पहुंचेंगे,’’ सीमा निराश हो कर बोली.

सीमा को अपनी बड़ी बहन रमा की बेटी की शादी में जाने का बड़ा ही मन था.

‘‘सीमा, तुम सम झने की कोशिश करो न कि एक डाक्टर पर समाज की कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है. वह अपनी जिम्मेदारियों से कैसे मुंह मोड़ सकता है…’’ श्रीधर सीमा को सम झाने के लहजे में बोला.

‘‘उस जिम्मेदारी को निभाने के लिए तो सरकार ने तुम्हें सरकारी अस्पताल में नौकरी दे रखी है. क्लिनिक पर तो तुम ज्यादा पैसा पाने के लिए ही तो जाते हो न?’’ सीमा ने उसी लहजे में जवाब दिया.

‘‘मैं जो कुछ भी कर रहा हूं, तुम्हीं लोगों के लिए तो कर रहा हूं. अभी श्रीशिव 6 साल का ही तो है. कल जब वह बड़ा होगा तो उस की पढ़ाईलिखाई के लिए जिन पैसों की जरूरत होगी, उन का इंतजाम भी तो अभी से करना होगा,’’ श्रीधर अपने समय पर न आ पाने की दलील को सही ठहराने के नजरिए से बोला.

‘‘तो फिर वहां जाने का प्रोग्राम कैंसिल करते हैं,’’ सीमा काफी निराश लहजे में बोली.

‘‘नहीं सीमा, प्रोग्राम कैंसिल करने की जरूरत नहीं है. वैसे भी शादी तो कल ही है, इसलिए कल सुबह 5 बजे हम यहां से निकल चलेंगे और जल्दी ही पहुंच जाएंगे.

‘‘वैसे भी शादीब्याह जैसे कार्यक्रम का मतलब अपने सभी नातेरिश्तेदारों, जानपहचान वालों से मुलाकात करना होता है, खाना, नाचनागाना नहीं.

‘‘शाम को 5 बजे तक मैं वहां से निकल जाऊंगा और फिर अपना क्लिनिक संभाल लूंगा. तुम शादीविदाई की रस्मों तक वहीं रुकना. कार्यक्रम खत्म होते ही मैं ड्राइवर और गाड़ी पहुंचा दूंगा,’’ श्रीधर ने अपनी योजना सम झाई. सीमा ने मन मार कर हां कर दी.

श्रीधर के पिता गांव के एक मिडिल स्कूल में टीचर थे. उसी गांव में उन की थोड़ीबहुत जमीन थी, इसीलिए वे गांव में ही रहते थे. गांव में एक प्राइमरी हैल्थ सैंटर था, जो समय से खुल कर बंद हो जाता था. डाक्टर पास के शहर से रोज आतेजाते थे. इस के अलावा गांव में कोई एंबुलैंस नहीं थी.

श्रीधर के दादाजी की मौत भी समय पर पूरा इलाज न मिलने के चलते हुई थी. इसी वजह से श्रीधर के पिताजी उसे डाक्टर बना कर गांव में लाना चाहते थे, ताकि गांव वालों को समय पर इलाज मिल सके.

मैडिकल की डिगरी मिल जाने के फौरन बाद ही श्रीधर की पहली बहाली एक ब्लौक लैवल के सरकारी अस्पताल में हो गई.

सीमा से शादी के समय वह इसी अस्पताल में थे. सीमा के परिवार वाले दबदबे वाले थे और उन्होंने श्रीधर का ट्रांसफर इस मैट्रो सिटी में करा दिया.

यहीं पर सरकारी नौकरी करतेकरते श्रीधर ने अपना क्लिनिक खोल लिया. आज हालात यह है कि श्रीधर 10,000 रुपए रोज तो कमा ही लेते हैं. यही वजह है कि श्रीधर सरकारी अस्पताल से छुट्टी ले कर शादी में तो जाना चाहते हैं, पर अपना क्लिनिक और प्रैक्टिस छोड़ना नहीं चाहते हैं.

सुबह के 5 बजे अच्छाखासा अंधेरा था. कुछ देर पहले बारिश भी हो चुकी थी. श्रीशिव को आगे बैठना पसंद था इसलिए वह ड्राइवर के साथ आगे बैठ गया. सीमा व श्रीधर पीछे बैठ गए.

सुबह का समय था, इसलिए रोड पर टै्रफिक न के बराबर था. ड्राइवर ने म्यूजिक सिस्टम भी औन कर दिया था. पीछे बैठे श्रीधर व सीमा नींद में ऊंघ रहे थे.

अभी तकरीबन 40-50 किलोमीटर ही आए थे कि सड़क की साइड में एक ढाबे के पास खड़ा ट्राला चलने लगा और शायद कंट्रोल न होने के चलते बीच सड़क पर लहराने लगा. तेज रफ्तार से आ रही श्रीधर की कार को रोकना नामुमकिन था. काफी खतरनाक हादसा हुआ था. ट्राला वाला अपना ट्राला ले कर भाग चुका था.

तेज रफ्तार के चलते कार का अगला हिस्सा पूरी तरह टूट गया था. श्रीशिव व ड्राइवर की हालत गंभीर थी और काफी खून निकल रहा था. श्रीधर व सीमा को भी गंभीर चोटें आई थीं, पर वे दोनों होश में थे. चीखनेचिल्लाने की आवाज सुन कर आसपास से काफी लोग मदद के लिए आ गए थे.

सीमा व श्रीधर को तुरंत बाहर निकाल लिया गया. वे दोनों बदहवास हालत में थे. श्रीशिव व ड्राइवर को निकालने की कोशिशें की जा रही थीं, पर डैश बोर्ड के बीच फंसे होने के चलते बहुत दिक्कतें आ रही थीं.

जैसे ही श्रीधर सामान्य हुए, तो उन्होंने पूछताछ शुरू की. पता चला कि यह एक छोटा सा गांव है. तकरीबन सवा सौ घर हैं और सब से नजदीक प्राथमिक स्वास्थ केंद्र यहां से 5 किलोमीटर दूर है. वहां पर भी डाक्टर मिलेगा या नहीं, कह नहीं सकते.

श्रीधर ने तुरंत ही अपने सरकारी अस्पताल में फोन किया और एंबुलैंस भेजने के लिए कहा. फिर भी एंबुलैंस के आ कर वापस जाने में कम से कम डेढ़ घंटा तो लग ही सकता था. अब तक श्रीशिव को कार से बाहर निकाला जा चुका था.

श्रीधर ने उसे चैक किया. श्रीशिव की अभी मंदमंद सांसें चल रही थीं. अगर अभी औक्सिजन दी जाए तो शायद जान बच जाए. श्रीधर अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे थे. अब तक ड्राइवर को भी निकाला जा चुका था, पर वह अब इस दुनिया में नहीं था.

दूर से आती एंबुलैंस की आवाज से श्रीधर को कुछ उम्मीद बंधी. एंबुलैंस रुकी और जैसे ही स्ट्रैचर निकाला जाने लगा, बेटे श्रीशिव ने अपनी अंतिम सांसें लीं.

‘‘अगर आज गांव में डाक्टर होता, एंबुलैंस होती तो शायद इन दोनों की जानें बच जातीं,’’ भीड़ में से कोई कह रहा था.

‘‘अरे, डाक्टर इस छोटे से गांव में क्यों आएंगे? उन्हें तो मलाई चाहिए, जो सिर्फ शहरों में ही मिलती है,’’ किसी और ने कहा.

‘‘जब डाक्टरी की पढ़ाई करते हैं, तब कसम खाते हैं कि जन सेवा करेंगे, पर डिगरी मिलते ही सब भूल जाते हैं और सिर्फ धन सेवा करते हैं,’’ तीसरे आदमी ने कहा.

इसी तरह की और भी बातें हो रही थीं, जो श्रीधर को साफ सुनाई नहीं दे रही थीं.

श्रीधर को भी वह सब याद आ रहा था कि पिताजी ने किस वजह से उसे मैडिकल की पढ़ाई करने के लिए भेजा था.

दादाजी की मौत की सारी घटना उस की आंखों के सामने घूम गई. आज इतिहास ने खुद को दोहरा दिया. पिछली बार मौत उस के दादा को ले गई थी, इस बार बेटे को.

बेटे श्रीशिव की मौत के क्रियाकर्मों को निबटाने के बाद जब पिताजी वापस गांव जाने लगे तो श्रीधर ने उन से कहा, ‘‘मैं वापस गांव लौटना चाहता हूं. वहां लोगों की सेवा करना चाहता हूं.’’

‘‘पर, वहां तुम्हें इतने पैसे कमाने के मौके नहीं मिलेंगे,’’ पिताजी ने साफ शब्दों में जवाब दिया.

‘‘अब पैसा कमा कर भी क्या करना है. मेरी जानकारी अपने ही गांव के लोगों के काम आ जाए, तो मैं अपनेआप को धन्य सम झूंगा,’’ श्रीधर ने साफसाफ लहजे में जवाब दिया.

‘‘तुम्हारा स्वागत है. अगर तुम्हारे जैसा हर डाक्टर सोच ले तो गांव से बेचारे गरीबों को छोटीछोटी बीमारियों के इलाज के लिए दौड़ कर शहर नहीं आना पड़ेगा. इस से शहर के डाक्टर का भी बोझ कुछ कम होगा और सभी को बेहतर इलाज मिल पाएगा,’’ पिताजी एक सांस में सब बोल गए.

दूसरे दिन औफिस जाते ही श्रीधर ने सब से पहले अपने कई अफसरों को चिट्ठी लिख कर अपने फैसले की सूचना दी और अपने ही गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में ट्रांसफर करने का अनुरोध किया.

सीमा का मन महीनों तक बुझा रहा, पर फिर जब अगले चुनावों में उसे निर्विरोध सरपंच चुन लिया गया तो उस की सब शिकायतें खत्म हो गईं.

आम जनता के निकट आने पर उसे पता चला कि जनता की समस्याएं आखिर वैसी हैं और कितना भी करो कम हैं. उसे खुशी हुई कि वे दोनों कम से कम कोशिश तो कर रहे हैं.

Hindi Story : सनक

Hindi Story : सुनयना के पिता नृपेंद्रनाथ ने जो मकान बनवाया था वह काफी लंबाचौड़ा और शानदार था. लोग उस की कीमत 8 लाख रुपए के आसपास आंकते थे, पर नृपेंद्रनाथ उस की लागत दोढाई लाख ही बताते थे. मकान के अलावा बैंक में जमा धन था. गृहस्थी की हर नई से नई वस्तु मौजूद थी.

नृपेंद्रनाथ राजकीय सेवा में थे और एक विभाग में निरीक्षक थे. ऊपरी आमदनी का तो पता नहीं, पर उन के पास जो कुछ भी था, उसे मात्र वेतन से एकत्र नहीं कर सकते थे. वह कहा भी करते थे कि नौकरी तो उन्होंने शौक के लिए की है. गांव में उन के पास काफी कृषि भूमि है, बाग हैं और शानदार हवेली है. उसी की आमदनी से भरेपूरे हैं.

किसी को फुरसत न थी सुदूर गांव जा कर, अपना खर्चा कर के, नृपेंद्रनाथ की जायदाद का पता लगाए. जरूरत भी क्या थी? इस कारण नृपेंद्रनाथ की बात सच भी माननी पड़ती थी.

सुनयना उन की एकमात्र कन्या थी. 2 पुत्र भी थे. सुनयना तो किसी प्रकार स्नातक हो गई थी, पर बेटों ने शिक्षा की अधिक आवश्यकता महसूस नहीं की थी. जरूरत भी क्या थी? जब पिता के पास ढेर सारा धन हो, जायदाद हो तो शिक्षा का सिरदर्द मोल लेना उचित नहीं होता. वे दोनों भी वही सोचते थे जो आमतौर पर अपने देश में भरपूर धन और जायदाद वालों के पुत्र सोचते हैं.

सुनयना के नाकनक्श अच्छे थे. बोली भी अच्छी थी. केवल कमी थी तो यह कि रंग गहरा सांवला था. आर्थिक रूप से कमी न होने के कारण उस ने गृहकार्य सीखने की आवश्यकता नहीं समझी थी.

सुनयना की मां स्नेहलता तो उस के ब्याह के लिए नृपेंद्रनाथ को तभी से कोंचने लगी थी जब उस ने 18वें में कदम रखा था. यह नहीं कि नृपेंद्रनाथ को चिंता नहीं थी. थी और बहुत थी. वह जैसा चाहते थे वैसा वर नहीं दिखाई दे रहा था. जिस का भी पता लगता, वह उन की शर्तों पर खरा नहीं उतरता था.

नृपेंद्रनाथ चाहते थे कि लड़का भारतीय प्रशासनिक सेवा में हो. उच्च ब्राह्मण कुल का हो. गोश्त, प्याज, लहसुन आदि न खाता हो. शराब न छूता हो. शानदार व्यक्तित्व का मालिक हो.

ऐसे दामाद की कीमत वह डेढ़ लाख स्वयं लगा चुके थे. 2 लाख तक जा चुके थे. ऐसे लड़के का पता लगता तो दौड़े चले जाते. प्रतीक्षा सूची में लग जाते, पर अभी तक ऐसा हुआ था कि ऐसे लड़कों को 3 लाख और साढ़े 3 लाख वाले उड़ा ले जाते.

नृपेंद्रनाथ भी धुन के पक्के थे. एक वांछित शर्तों वाला लड़का हाथ से निकल जाता तो दूसरे के पीछे पड़ जाते और तब तक पीछे पड़े रहते जब तक उसे भी ऊंची कीमत वाले छीन न लेते.

सुनयना के पास करने को कोई काम नहीं था. मां ने भी कुछ करवाने की जरूरत नहीं समझी. वह खूब खाती, खूब सोती और जागते समय उपन्यास पढ़ती. मुसीबत घर के बड़ेबूढ़े की होती है और ऐसी कन्या के विवाह में कठिनाई होती है, जिस का बाप अपने को बहुत बड़ा और कुलीन समझता हो. पिता की जिद ने सुनयना को 28 वर्ष की परिधि में ला दिया. उम्र के कारण कठिनाई और बढ़ गई थी.

स्थिति यह आ गई थी कि लोग नृपेंद्रनाथ को देख कर वक्रता से मुसकरा पड़ते. कह ही डालते, ‘‘कायदे से इन्हें कोई मिनिस्टर तलाशना चाहिए जिस के आगेपीछे प्रशासनिक सेवा वाले दुम हिलाते हैं.’’

नृपेंद्रनाथ के कान में भी बात गई. कोई असर न हुआ. उत्तर दे दिया, ‘‘मंत्री अस्थायी होते हैं और प्रशासनिक सेवा वाले स्थायी होते हैं.’’

नृपेंद्रनाथ के साले चक्रपाणि ने सुझाया, ‘‘जीजाजी, हो सकता है कि लड़का अभी शराब न पीता हो, गोश्त न खाता हो, सिगरेट न पीता हो. पर शादी के बाद यह सब करने लगे तो आप क्या कर लेंगे?’’

नृपेंद्रनाथ ने कोई उत्तर न दिया. उन के कानों पर जूं भी न रेंगी. वह अपनी शर्तों से तिल भर भी अलग होने को तैयार नहीं थे.

प्रो. कैलाशनाथ मिश्र का पुत्र भारतीय प्रशासनिक सेवा में चुन लिया गया.

नृपेंद्रनाथ ने विवाह का प्रस्ताव रखा तो लड़के पंकज ने दोटूक उत्तर दे दिया, ‘‘एक मामूली इंस्पेक्टर की बेटी से विवाह? क्या हमारे स्तर के लोग देश में खत्म हो गए हैं?’’

नृपेंद्रनाथ ने उत्तर सुना. उत्तर क्या था जहर का घूंट था. जिद की सनक में उन्हें पीना ही पड़ गया, पर वह अपने उद्देश्य पर कायम रहे.

ऊब कर सुनयना की मां ने भी कह डाला, ‘‘अच्छे परिवार का ऐसा स्वस्थ लड़का देखिए जिस से दोनों की जोड़ी अच्छी लगे. इतना और ध्यान रखिए कि कामकाज से लगा हो.’’

नृपेंद्रनाथ झिड़क देते, ‘‘तुम्हें तो अक्ल आ ही नहीं सकती. जब अपने पास सबकुछ है तो इकलौती बेटी के लिए लड़का भी उच्च पद वाला ही ढूंढ़ना है.’’

जवाब मिला, ‘‘तुम्हारी सनक के कारण लड़की बूढ़ी हुई जा रही है. उस की चचेरी और ममेरी बहनें 2-2 बच्चों की मां बन गई हैं. जब खेत ही सूख गया तो वर्षा का क्या फायदा?’’

इस कटु सत्य का कोई उत्तर देने के स्थान पर नृपेंद्रनाथ टाल जाना ही उचित समझते थे. अपनी शर्तों के संबंध में झुकने को तैयार होने की बात सोच ही न सकते थे. ऐसा न था कि लड़के न थे. उच्च कुल वाले भी थे. अच्छे पदों पर भी थे. पूर्ण शाकाहारी भी थे. स्वस्थ और सुंदर थे. परंतु नृपेंद्रनाथ की सनक भारतीय प्रशासनिक सेवा वाले के लिए ही थी.

कपिलजी को रामायण याद थी. जो कुछ कहते थे उस में एक चौपाई जरूर जोड़ देते. रामायण कंठस्थ थी पर उस के कोई आदर्श चरित्र उन में न थे.

पर वह भी एक दिन बोल ही पड़े, ‘‘लिखा न विधि वैदेहि विवाहू. प्रशासनिक सेवा का शुभ धनु न टूटेगा और न नृपेंद्रनाथ भाई की पुत्री का ब्याह होगा.’’

कपिलजी की पत्नी हां में हां मिलाती हुई बोलीं, ‘‘अब सुनयना का ब्याह क्या होगा. उस का 32वां वर्ष खत्म हो रहा है. अब उस को कुंआरा वर शायद ही मिले. विधुर या तलाकशुदा ही मिल सकता है.’’

सुनयना भी ऊब सी गई थी. अपनी सहेली शिल्पा से यों ही कह गई, ‘‘पिताजी की सनक भी खूब है. जिद में पड़े हैं. क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा वालों को छोड़ कर और अच्छे लड़के नहीं मिल सकते समाज में? अच्छा हुआ कि नानीजी ने ऐसा नहीं सोचा. नहीं तो मां भी अभी तक कुंआरी ही होतीं अथवा कुंआरी ही मर चुकी होतीं.’’

वैसे हर कन्या चाहती है कि उस का पति कमाने वाला हो, पर कमाई से भी बढ़ कर वह अच्छे स्वभाव का स्वस्थ पुरुष पसंद करती है, जिस के पास 2 भुजाएं हैं वह कमाई तो कर ही लेता है.

नृपेंद्रनाथ अब अजीब स्थिति में आ गए थे. वह जिसे पसंद करते उसे वह और उन का परिवार पसंद न आता. कभी कुछ बात बनती भी तो कन्या की उम्र और सांवलापन आड़े आ जाता.

पुत्रों को अपनी मस्ती से मतलब था. पत्नी कभीकभी भुनभुना लेती थी. रिश्तेदारों और सुहृदों ने जिक्र करना ही छोड़ दिया था.

नृपेंद्रनाथ मूर्ख नहीं थे, पर उन की सनक ने उन्हें मूर्खता की हद तक पहुंचा दिया था. उन की सनक ध्यान ही न दे पाती थी कि कन्या के विचारों में कुंठाएं घर कर चुकी हैं और शरीर की कोमलता जठरता में बदल चुकी है. किसी विवाह या अन्य समारोह में जाने पर वह अलगथलग पड़ जाती. लोग कहते कुछ न थे पर उन की निगाहें उस में एक अजीब सी सनसनाहट पैदा कर देती थीं. यही सनसनाहट एक अजीब सी ग्रंथि को जन्म दे चुकी थी.

एक बूढ़ी महिला ने सुनयना को बिना सुहाग चिह्नों के देखा तो दुखी हो कर उस की मामी से कह ही डाला, ‘‘क्या यह जवानी में ही विधवा हो गई?’’

मामी ने उस का मुंह पकड़ा, ‘‘ताईजी, अभी तो इस का विवाह ही नहीं हुआ है. इस के पिताजी इस के लिए काफी दिनों से अच्छा लड़का तलाश रहे हैं.’’

बूढ़ी का पोपला मुंह और बिगड़ गया. कुछ तो प्रकृति ने पहले से बिगाड़ दिया था, ‘‘इस का बाप तो मूर्ख लगता है. गरीब से गरीब लड़की का ब्याह हो जाता है. अगर इस के बाप के पास कुछ नहीं है तो भी एक जोड़ी कपड़े में ही किसी को कन्या का दान कर देता. बेचारी कुंआरी विधवा बन कर तो न घूमती.’’

मामी ने राज उजागर कर दिया, ‘‘इस के पिताजी गरीब नहीं हैं, पैसे वाले हैं. पैसा जब अधिक हो जाता है तो दिमाग को खराब कर देता है और आदमी औकात से बढ़ कर सोचने लगता है. इस के पिताजी अगर औकात से बढ़ कर न सोचते तो आज से वर्षों पूर्व इस का विवाह हो जाता. अब तक बालबच्चों वाली हो गई होती.’’

बूढ़ी ने आगे कहना चाहा तो सुनयना की मामी ने रोक दिया, ‘‘रहने दो, ताईजी, अगर किसी के कान में भनक पड़ गई तो अच्छा नहीं होगा.’’

बात आईगई हो गई, पर कोई बात अगर मुख से निकल जाए तो किसी न किसी प्रकार किसी न किसी कान में पहुंच ही जाती है.

कुंआरी विधवा की बात सुन कर नृपेंद्रनाथ खूब बड़बड़ाए. कहने वाली को उलटीसीधी सुनाईं. पर वह सामने न थी. लेकिन उन की सनक पर इतना असर जरूर पड़ा कि भारतीय प्रशासनिक सेवा की शर्त को प्रांतीय प्रशासनिक सेवा में बदल दिया. बाकी शर्तें पूर्ववत ही रहीं.

फिलहाल किसी में इतना दम बाकी न था कि उन्हें समझा पाए कि फसल यदि समय से न बोई जाए और उगे पौधों को समय से पानी न दिया जाए तो अच्छी जुताई और भरपूर खाद देने के बावजूद फसल पर पीलापन छा जाता है. उपज मात्र भूसा रह जाती है. दानों के लिए तरसना पड़ता है.

सुनयना अब भी कुंआरी ही है. बाप की सनक उसे जला चुकी है. रहीसही कमी भी पूरी करती जा रही है.

Hindi Story : बेला फिर महकी

Hindi Story : मधु दीदी अपनत्व लुटा कर और मेरे दिलोदिमाग में भूचाल पैदा कर चली गई थीं. कितने अपनेपन से उन्होंने मेरी दुखती रग पर हाथ रखा था.

‘‘सच बेला, तुम्हारी तो तकदीर ही कुछ ऐसी है कि हर रिश्ता तुम्हें इस्तेमाल करने के लिए ही बना है. तुम ब्याह कर आईं तो भाई साहब तुम्हें मांपिताजी की सेवा में सौंप कर निश्ंिचत हो गए. इतने बरसों में हम ने कभी तुम्हें उन के साथ घूमनेफिरने या पिक्चर जाते नहीं देखा.

‘‘सासससुर की सेवा और बच्चों की परवरिश से उबरीं तो अब अफसर बहू के बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी तुम पर आ पड़ी है. शुक्र है कि बहू बोलती मीठा है. हां, जब सारी जिम्मेदारी सास पर डाल कर नौकरी के नाम पर तफरी की जा रही हो, तो व्यवहार तो मीठा रखना ही पड़ेगा. चलो, अच्छा है कि तुम उस की मिठास पर लट्टू हो कर उस के बच्चों को जीजान से पालती रहो वरना सारी असलियत सामने आ जाएगी.’’

मधु दीदी के इस अपनेपन ने जैसे सारे रिश्तों के अपनत्व की कलई खोल दी. सासससुर और रमेश बाबू के रूखे व्यवहार को सहने की तो जैसे आदत सी पड़ गई थी. उसे मैं ने अपनी नियति मान कर स्वीकार कर लिया था. बहू के लिए प्यार का परदा मधु दीदी ने हटा कर मुझे निराश ही कर दिया था.

बेला नाम मेरे पिताजी ने कितने अरमानों से रखा था. मेरे जन्म के बाद ही आंगन में पिताजी ने बेला का एक छोटा पौधा रोप दिया था. बेला को झाड़ बन कर फूलों से लद कर महकते और मेरी किलकारी को लरजती मुसकराहट में बदलते कहां वक्त लगा था. पिताजी ने बेला को अपने आंगन में ही महकने दिया और मुझे रमेश बाबू के आंगन को महकाने के लिए डोली में बिठा कर विदा कर दिया. मेरे पति रमेश बाबू ने मेरे कोमल जज्बात को कभी महत्त्व नहीं दिया. स्त्री के सामने प्रेम प्रदर्शन कर उसे सिर पर चढ़ाना उन्हें अपनी मर्दानगी के खिलाफ लगता था.

पिछवाड़े के बगीचे में पेड़ोें और झाडि़यों पर लिपटी अमरबेल को दिखला कर पति ने यह जतला दिया था कि उन की जिंदगी में मेरी हैसियत इस अमरबेल से अधिक कुछ नहीं है. जड़, पत्र और पुष्पविहीन पीली सी बदरंग अमरबेल… अनचाही बगिया में छाई रहती है, जिसे काटछांट कर जितना पीछा छुड़ाना चाहो वह उतनी ही अपनी लता फैला देती है.

मेरी ससुराल में सबकुछ स्वार्थ के रिश्तों पर कायम था. उस पर भी हर पल मुझे यह एहसास कराया जाता कि मैं निपट घरेलू महिला अमरबेल की तरह आश्रित और अनपेक्षित हूं. तब विरोध और विद्रोह बहुओं का अधिकार कहां था. पति से तिरस्कृत पत्नी सासससुर की लाड़ली भी नहीं बन पाती है. मैं ने सहमे हुए इस नए नाम अमरबेल  को चुपचाप स्वीकार कर लिया और बेला की महक न जाने कहां गुम होती गई. मैं और बगिया की अमरबेल बिन चाहत और जरूरत के अपनीअपनी उम्र आगे बढ़ाते रहे.

ऐसी नीरस जिंदगी के बाद बहू का अपनापन बुझे मन पर प्यार की फुहार बन कर आया. पोतेपोती की मासूम शरारतों और उन के साथ बढ़ी व्यस्तता में मन की टीस कहीं गहरे दबने लगी थी. यह टीस न चाहते हुए भी जानेअनजाने उभर आती थी, जब मैं अपने बेटे मयंक और बहू रीना में आपसी सामंजस्य और अधिक से अधिक समय साथ गुजारने की चाहत देखती. मयंक ने रीना का आफिस दूर होने से उसे आनेजाने में होने वाली परेशानी से बचने के लिए कार चलाना सिखाया और एक नई कार उसे जन्मदिन पर उपहार में दे दी.

इस समय भी मेरे पति मुझे ताना मारने से नहीं चूके कि अगर पत्नी लायक और समझबूझ में समान स्तर की हो तो इतना ध्यान रखा जाना लाजमी है. इस तरह जिंदगी भर मुझे दिए गए तिरस्कार का कारण बता दिया था उन्होंने और बरसों से घुटती, जीती मैं तब भी मौन रह गई थी. मैं बेला से अमरबेल जो बन चुकी थी.

लेकिन आज मधु दीदी ने जब मेरे और रीना के ममता भरे रिश्ते में मुझे स्वार्थ के दर्शन कराए तो मेरा कुंठित मन विद्रोह के लिए बेचैन हो उठा. बहू को लगातार मिल रही सुविधाएं और सम्मान व्यर्थ नजर आ रहा था. अब तक जाने- अनजाने हुई लापरवाही और गलतियां, जिन्हें मैं रीना की नादानी मान कर नजरअंदाज कर रही थी, आज वे सारी गलतियां मेरी पुरातन परंपराओं और संकुचित सोच को, जानबूझ कर मेरे सम्मान को ठेस पहुंचाने की कोशिश जान पड़ रही थीं.

गुस्से और अपमान से मेरे कान लाल थे और बढ़ी हुई धड़कन जैसे सारे बंधन तोड़ शरीर को कंपा रही थी. कल तक बहू से मिल रहा प्यार मुझे आत्मसंतोष दे रहा था, लेकिन आज मधु दीदी ने मेरे संतोष में आग लगा दी थी. बहू का सारा प्यार स्वार्थ के तराजू में तौल कर अपवित्र कर दिया था. अगर मैं गृहस्थी की साजसंवार, बच्चों का होमवर्क, स्कूल से वापस आने पर उन की देखभाल को दरकिनार कर सत्संग और पूजा में मन लगाऊं  तो आत्मशांति तो मिलेगी ही, बहू का व्यवहार बदलने से असलियत भी सामने आ जाएगी.

सोचा, क्यों न कुछ दिन के लिए अपनी बेटी रोजी के यहां चली जाऊं? जरा मेरे जाने के बाद यह महारानी भी जाने कि मेरे बिना वह अपनी अफसरी कैसे कायम रख सकती है, लेकिन वहां जाना क्या अच्छा लगेगा? नौकरीशुदा रोजी भी तो अपने सासससुर के साथ भरे परिवार में रहती है. उसे नौकरी करने के लिए प्रेरित भी तो मैं ने ही किया था, जिस से वह मेरी तरह प्रताडि़त हो कर नहीं सम्मान की जिंदगी जी सके.

बहुत कशमकश के बाद मैं ने हालात से लड़ने का फै सला लिया, ‘नहीं, मैं यहीं रह कर अपने लिए जीऊंगी. सारे दिन रीना और बच्चों की दिनचर्या के मुताबिक चक्करघिन्नी बनने के बजाय अब आदेशात्मक रवैया अपनाऊंगी. भला हो मधु दीदी का, जो उन्होंने मुझे समय रहते चौकन्ना कर दिया.’

हमेशा हंसतीमुसकराती रीना जो वक्तबेवक्त गलबहियां डाल कर मांमां की रट लगाए रहती है, आज मुझे खलनायिका लग रही थी. कुश और नीति के स्कूल से आने पर उन के कपड़े बदलवाने और खाना खिलाने में मन नहीं लग रहा था. दोनों बच्चे दादी को अनमना देख कर चुपचाप खाना खा कर टीवी देखने लगे थे.

बेचैनी अपनी चरम सीमा पर थी. बच्चों के पास जा कर टीवी देख कर मन बहलाने का प्रयास भी बेकार गया. सिर भारी हो रहा था. शाम होते ही बच्चे पार्क में खेलने और रमेश  बाबू अपने मित्रों के साथ टहलने चले गए. रसोई में जा कर रात के खाने की व्यवस्था देखने का मन आज कतई नहीं हो रहा था. परिवार की जिम्मेदारियों में सब से महत्त्वपूर्ण भूमिका होने के बावजूद आज मैं खुद को शोषित मान रही थी.

शाम का अंधेरा गहराने लगा था. बाहर बहू की कार का हार्न सुनाई दिया. मन गुस्से से और भर गया. रीना को पता है कि रामू अपने गांव गया है और बच्चे पार्क में होंगे तो हार्न बजाने पर क्या मैं गेट खोलने जाऊंगी? और फिर सामने बालकनी में खड़ी मधु दीदी ने अगर मुझे गेट खोलते देख लिया तो व्यंग्य से ऐसे मुसकराएंगी मानो कह रही हों कि अच्छी तरह करो अफसर बहू की चाकरी.

मैं रुकी रही कि दोबारा हार्न की आवाज आई. मैं गुस्से में उठी कि बहू को इतनी जोर से झिड़कूंगी कि मधु दीदी भी सामने के घर में सुन लें कि मैं भी सास का रौब रखती हूं.

मैं बाहर पहुंची तो रीना तुरंत कार से उतर कर गेट खोलने लगी, ‘‘अरे, मां, आप क्यों आईं. मैं तो भूल ही गई थी कि आज रामू घर में नहीं है,’’ उस की मीठी बोली में मैं सारा आक्रोश भूल गई.

‘‘ओफ, मां, आप कैसी अव्यवस्थित सी घूम रही हैं?  आप की तबीयत तो ठीक है न?’’ कहते हुए रीना ने मेरा माथा छू कर देखा, ‘‘लगता है आप ने दिन में जरा भी आराम नहीं किया. आप जल्दी से तैयार हो जाइए. रोजी दीदी और जीजाजी भी आने वाले हैं.’’

मैं फिर उस के जादू में बंधी कपड़े बदल बाल संवार कर आ गई. जल्दी ही रीना भी फ्रेश हो कर आ गई.

‘‘हां, अब लग रही हैं न आप बर्थडे गर्ल. हैप्पी बर्थ डे, मां,’’ कहते हुए बड़ा सा गुलदस्ता मेरे हाथों में दे कर रीना ने मेरे चरण स्पर्श किए.

‘तुम्हें कैसे पता चला’ वाले आश्चर्य मिश्रित भाव को ले कर जब मैं ने उसे गले लगाया तो उस ने बताया कि पापा के पेंशन के पेपर्स में आप की जन्मतिथि पढ़ी थी. मयंक भी आज आफिस से जल्दी घर आएंगे और हां, आज आप की और मेरी रसोई से छुट्टी है, क्योंकि हम सब आप का जन्मदिन मनाने होटल जा रहे हैं.’’

मैं मधु दीदी के बहकावे में आ कर अपनी संकीर्ण मनोदशा से खुद ही शर्मिंदा होने लगी. अब तक देखीसुनी बुरी सासुओं की कुंठा आज मुझ पर भी हावी हो गई थी. मुझे लगा कि पति, सासससुर से मिले अपमान को हर नारी की कहानी मान चुपचाप स्वीकार किया और निरपराध बहू को मात्र पड़ोसन के बहकावे में आ कर स्वार्थ का पुतला मान लिया. बरसों से अपने जन्मदिन को साधारण दिनों की तरह गुजारती आज बहू की बदौलत ही खुशियों के साथ मना पाऊंगी. पति के रूप में रमेश बाबू तो इन औपचारिकताओें के महत्त्व को कभी समझे ही नहीं.

‘‘मां, आओ, आप को अच्छी तरह तैयार कर दूं. बच्चों के पार्क से आते ही फिर उन्हें भी तैयार करना होगा,’’ यह कह कर बहू ने एक नई कोसा की साड़ी मुझे दी और बोली, ‘‘कैसी लगी साड़ी, मां?’’

‘‘तुम मेरी पसंद को कितनी अच्छी तरह समझती हो,’’ बस, इतना ही कह पाई मैं.

साड़ी पहन कर जब मैं उस के पास आई तो रीना ने बेला का एक बड़ा सा गजरा मेरे जूड़े पर सजा दिया तो मैं ने रीना को अपने सीने से लगा लिया.

आंखों में आए आंसुओं से मैं अपने दिन भर दिल में भरे जहर को निकाल देना चाहती हूं. मेरी प्यारी रीना और जूडे़ में बंधे बेला के गजरे की भीनीभीनी महक ने आज बरसों बाद यह एहसास करा दिया कि मैं अमरबेल नहीं, बेला हूं.

Hindi Story : भटकाव के बाद

Hindi Story : राज्य में पंचायत समितियों के चुनाव की सुगबुगाहट होते ही राजनीतिबाज सक्रिय होने लगे. सरपंच की नेमप्लेट वाली जीप ले कर कमलेश भी अपने इलाके के दौरे पर घर से निकल पड़ी. जीप चलाती हुई कमलेश मन ही मन पिछले 4 सालों के अपने काम का हिसाब लगाने लगी. उसे लगा जैसे इन 4 सालों में उस ने खोया अधिक है, पाया कुछ भी नहीं. ऐसा जीवन जिस में कुछ हासिल ही न हुआ हो, किस काम का.

जीप चलाती हुई कमलेश दूरदूर तक छितराए खेतों को देखने लगी. किसान अपने खेतों को साफ कर रहे थे. एक स्थान पर सड़क के किनारे उस ने जीप खड़ी की, धूप से बचने के लिए आंखों पर चश्मा लगाया और जीप से उतर कर खेतों की ओर चल दी.

सामने वाले खेत में झाड़झंखाड़ साफ करती हुई बिरमो ने सड़क के किनारे खड़ी जीप को देखा और बेटे से पूछा, ‘‘अरे, महावीर, देख तो किस की जीप है.’’

‘‘चुनाव आ रहे हैं न, अम्मां. कोई पार्टी वाला होगा,’’ इतना कह कर वह अपना काम करने लगा.

बिरमो भी उसी प्रकार काम करती रही.

कमलेश उसी खेत की ओर चली आई और वहां काम कर रही बिरमो को नमस्कार कर बोली, ‘‘इस बार की फसल कैसी हुई ताई?’’

‘‘अब की तो पौ बारह हो आई है बाई सा,’’ बिरमो का हाथ ऊपर की ओर उठ गया.

‘‘चलो,’’ कमलेश ने संतोष प्रकट किया, ‘‘बरसों से यह इलाका सूखे की मार झेल रहा था पर इस बार कुदरत मेहरबान है.’’

कमलेश को देख कर बिरमो को 4 साल पहले की याद आने लगी. पंचायती चुनाव में सारे इलाके में चहलपहल थी. अलगअलग पार्टियों के उम्मीदवार हवा में नारे उछालने लगे थे. यह सीट महिलाओं के लिए आरक्षित थी इसलिए इस चुनावी दंगल में 8 महिलाएं आमनेसामने थीं. दूसरे उम्मीदवारों की ही तरह कमलेश भी एक उम्मीदवार थी और गांवगांव में जा कर वह भी वोटों की भीख मांग रही थी. जल्द ही कमलेश महिलाओं के बीच लोकप्रिय होने लगी और उस चुनाव में वह भारी मतों से जीती थी.

‘‘क्यों बाई सा, आज इधर कैसे आना हुआ?’’ बिरमो ने पूछा.

‘‘अरे, मां, बाई सा वोटों की भीख मांगने आई होंगी,’’ महावीर बोल पड़ा.

महावीर का यह व्यंग्य कमलेश के कलेजे पर तीर की तरह चुभ गया. फिर भी समय की नजाकत को देख कर वह मुसकरा दी और बोली, ‘‘यह ठीक कह रहा है, ताई. हम नेताओं का भीख मांगने का समय फिर आ गया है. पंचायती चुनाव जो आ रहे हैं.’’

‘‘ठीक है बाई सा,’’ बिरमो बोली, ‘‘इस बार तो तगड़ा ही मुकाबला होगा.’’

कमलेश जीप के पास चली आई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह किधर जाए. फिर भी जाना तो था ही, सो जीप स्टार्ट कर चल दी. दिमाग में आज की राजनीति को ले कर उधेड़बुन मची थी कि अतीत में दादाजी के कहे शब्द याद आने लगे. दरअसल, राजनीति से दादाजी को बेहद घृणा थी, ग्राम पंचायत की बैठकों में वह भाग नहीं लेते थे.

एक दिन कमलेश ने उन से पूछा था, ‘दादाजी, आप पंचायती बैठकों में भाग क्यों नहीं लिया करते?’

‘इसलिए कि वहां टुच्ची राजनीति चला करती है,’ वह बोले थे.

‘तो राजनीति में नहीं आना चाहिए?’ उस ने जानना चाहा था.

‘देख बेटी, कभी कहा जाता था कि भीख मांगना सब से निकृष्ट काम है और आज राजनीति उस से भी निकृष्ट हो चली है, क्योंकि नेता वोटों की भीख मांगने के लिए जाने कितनी तरह का झूठ बोलते हैं.’

उस ने भी तो 4 साल पहले अपनी जनता से कितने ही वादे किए थे लेकिन उन सभी को आज तक वह कहां पूरा कर सकी है.

गहरी सांस खींच कर कमलेश ने जीप एक कच्चे रास्ते पर मोड़ दी. धूल के गुबार छोड़ती हुई जीप एक गांव के बीचोंबीच आ कर रुकी. उस ने आंखों पर चश्मा लगाया और जीप से उतर गई.

देखते ही देखते कमलेश को गांव वालों ने घेर लिया. एक बुजुर्ग बच्चों को हटाते हुए बोले, ‘‘हटो पीछे, प्रधानजी को बैठ तो लेने दो.’’

एक आदमी कुरसी ले आया और कमलेश से उस पर बैठने के लिए अनुरोध किया.

कमलेश कुरसी पर बैठ गई. बुजुर्ग ने मुसकरा कर कहा, ‘‘प्रधानजी, चुनाव फिर आने वाला है. हमारे गांव का कुछ भी तो विकास नहीं हो पाया.

‘‘हम तो सोच रहे थे कि आप की सरपंची में औरतों का शोषण रुक जाएगा, क्योंकि आप एक पढ़ीलिखी महिला हो और हमारी समस्याओं से वाकिफ हो, लेकिन इन पिछले 4 सालों में हमारे इलाके में बलात्कार और दहेज हत्याओं में बढ़ोतरी ही हुई है.’’

किसी दूसरी महिला ने शिकायत की, ‘‘इस गांव में तो बिजलीपानी का रोना ही रोना है.’’

‘‘यही बात शिक्षा की भी है,’’ एक युवक बोला, ‘‘दोपहर के भोजन के नाम पर बच्चों की पढ़ाई चौपट हो आई है. कहीं शिक्षक नदारद हैं तो कहीं बच्चे इधरउधर घूम रहे होते हैं.’’

कमलेश उन तानेउलाहनों से बेहद दुखी हो गई. जहां भी जाती लोग उस से प्रश्नों की झड़ी ही लगा देते थे. एक गांव में कमलेश ने झुंझला कर कहा, ‘‘अरे, अपनी ही गाए जाओगे या मेरी भी सुनोगे.’’

‘‘बोलो जी,’’ एक महिला बोली.

‘‘सच तो यह है कि इन दिनों अपने देश में भ्रष्टाचार का नंगा नाच चल रहा है. नीचे से ले कर ऊपर तक सभी तो इस में डुबकियां लगा रहे हैं. इसी के चलते इस गांव का ही नहीं पूरे देश का विकास कार्य बाधित हुआ है. ऐसे में कोई जन प्रतिनिधि करे भी तो क्या करे?’’

‘‘सरपंचजी,’’ एक बुजुर्ग बोले, ‘‘पांचों उंगलियां बराबर तो नहीं होती न.’’

‘‘लेकिन ताऊ,’’ कमलेश बोली, ‘‘यह तो आप भी जानते हैं कि गेहूं के साथ घुन भी पिसा करता है. साफसुथरी छवि वाले अपनी मौत आप ही मरा करते हैं. उन को कोई भी तो नहीं पूछता.’’

एक दूसरे बुजुर्ग उसे सुझाव देने लगे, ‘‘ऐसा है, अगर आप अपने इलाके के विकास का दमखम नहीं रखती हैं तो इस चुनावी दंगल से अपनेआप को अलग कर लें.’’

‘‘ठीक है, मैं आप के इस सुझाव पर गहराई से विचार करूंगी,’’ यह कहते हुए कमलेश वहां से उठी और जीप स्टार्ट कर सड़क की ओर चल दी. गांव वालों के सवाल, ताने, उलाहने उस के दिमाग पर हथौड़े की तरह चोट कर रहे थे. ऐसे में उसे अपना अतीत याद आने लगा.

कमलेश एक पब्लिक स्कूल में अच्छीभली अध्यापकी करती थी. उस के विषय में बोर्ड की परीक्षा में बच्चों का परिणाम शत- प्रतिशत रहता था. प्रबंध समिति उस के कार्य से बेहद खुश थी. तभी एक दिन उस के पास चौधरी दुर्जन स्ंिह आए और उसे राजनीति के लिए उकसाने लगे.

‘नहीं, चौधरी साहब, मैं राजनीति नहीं कर पाऊंगी. मुझ में ऐसा माद्दा नहीं है.’

‘पगली,’ चौधरी मुसकरा दिए थे, ‘तू पढ़ीलिखी है. हमारे इलाके से महिला के लिए सीट आरक्षित है. तू तो बस, अपना नामांकनपत्र भर दे, बाकी मैं तुझे सरपंच बनवा दूंगा.’

कमलेश ने घर आ कर पति से विचारविमर्श किया था. उस के अध्यापक पति ने कहा था, ‘आज की राजनीति आदमी के लिए बैसाखी का काम करती है. बाकी मैं चौधरी साहब से बात कर लूंगा.’

‘लेकिन मैं तो राजनीति के बारे में कखग भी नहीं जानती,’ कमलेश ने चिंता जतलाई थी.

‘अरे वाह,’ पति ने ठहाका लगाया था, ‘सुना नहीं कि करतकरत अभ्यास के जड़मति होत सुजान. तुम्हें चौधरी साहब समयसमय पर दिशानिर्देश देते रहेंगे.’

कमलेश के पति ने चौधरी दुर्जन सिंह से संपर्क किया था. उन्होंने उस की जीत का पूरा भरोसा दिलाया था. 2 दिन बाद कमलेश ने विद्यालय से त्यागपत्र दे दिया था.

प्रधानाचार्य ने चौंक कर कमलेश से पूछा था, ‘हमारे विद्यालय का क्या होगा?’

‘सर, मेरे राजनीतिक कैरियर का प्रश्न है,’ कमलेश ने विनम्रता से कहा था, ‘मुझे राजनीति में जाने का अवसर मिला है. अब ऐसे में…’

प्रधानाचार्य ने सर्द आह भर कर कहा था, ‘ठीक है, आप का यह त्यागपत्र मैं चेयरमैन साहब के आगे रख दूंगा.’

इस प्रकार कमलेश शिक्षा के क्षेत्र से राजनीति के मैदान में आ कूदी थी. चौधरी दुर्जन सिंह उसे राजनीति की सारी बारीकियां समझाते रहते. उस पंचायत समिति के चुनाव में वह सर्वसम्मति से प्रधान चुनी गई थी.

अब कमलेश मन से समाजसेवा में जुट गई. सुबह से ले कर शाम तक वह क्षेत्र में घूमती रहती. बिजली, पानी, राहत कार्यों की देखरेख के लिए उस ने अपने क्षेत्रवासियों के लिए कोई कमी नहीं छोड़ी थी. शिक्षा व स्वास्थ्य विभाग से भी संपर्क कर उस ने जनता को बेहतर सेवाएं उपलब्ध करवाई थीं.

‘ऐसा है, प्रधानजी,’ एक दिन विकास अधिकारी रहस्यमय ढंग से मुसकरा दिए थे, ‘आप का इलाका सूखे की चपेट में है. ऊपर से जो डेढ़ लाख की सहायता राशि आई है, क्यों न उसे हम कागजों पर दिखा दें और उस पैसे को…’

कमलेश ताव खा गई और विकास अधिकारी की बात को बीच में काट कर बोली, ‘बीडीओ साहब, आप अपना बोरियाबिस्तर बांध लें. मुझे आप जैसा भ्रष्ट अधिकारी इस विकास खंड में नहीं चाहिए.’

उसी दिन कमलेश ने कलक्टर से मिल कर उस विकास अधिकारी की वहां से बदली करवा दी थी. तीसरे दिन चौधरी साहब का उस के नाम फोन आया था.

‘कमलेश, सरकारी अधिकारियों के साथ तालमेल बिठा कर रखा कर.’

‘नहीं, चौधरी साहब,’ वह बोली थी, ‘मुझे ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों की जरूरत नहीं है.’

आज कमलेश का 6 गांवों का दौरा करने का कार्यक्रम था. वह अपने प्रति लोगों का दिल टटोलना चाहती थी लेकिन 2-3 गांव के दौरे कर लेने के बाद ही उस का खुद का दिल टूट चला था. उधर से वह सीधी घर चली आई और घर में घुसते ही पति से बोली, ‘‘मैं अब राजनीति से तौबा करने जा रही हूं.’’

पति ने पूछा, ‘‘अरे, यह तुम कह रही हो? ऐसी क्या बात हो गई?’’

‘‘आज की राजनीति भ्रष्टाचार का पर्याय बन कर रह गई है. मैं जहांजहां भी गई मुझे लोगों के तानेउलाहने सुनने को मिले. ईमानदारी के साथ काम करती हूं और लोग मुझे ही भ्र्रष्ट समझते हैं. इसलिए मैं इस से संन्यास लेने जा रही हूं.’’

रात में जब पूरा घर गहरी नींद में सो रहा था तब कमलेश की आंखों से नींद कोसों दूर थी. बिस्तर पर करवटें बदलती हुई वह वैचारिक बवंडर में उड़ती रही.

सुबह उठी तो उस का मन बहुत हलका था. चायनाश्ता लेने के बाद पति ने उस से पूछा, ‘‘आज तुम्हारा क्या कार्यक्रम है?’’

‘‘आज मैं उसी पब्लिक स्कूल में जा रही हूं जहां पहले पढ़ाती थी,’’ कमलेश मुसकरा दी, ‘‘कौन जाने वे लोग मुझे फिर से रख लें.’’

‘‘देख लो,’’ पति भी अपने विद्यालय जाने की तैयारी करने लगे.

कमलेश सीधे प्रधानाचार्य की चौखट पर जा खड़ी हुई. उस ने अंदर आने की अनुमति चाही तो प्रधानाचार्य ने मुसकरा कर उस का स्वागत किया.

कमलेश एक कुरसी पर बैठ गई. प्रधानाचार्य उस की ओर घूम गए और बोले, ‘‘मैडम, इस बार भी चुनावी दंगल में उतर रही हैं क्या?’’

‘‘नहीं सर,’’ कमलेश मुसकरा दी, ‘‘मैं राजनीति से नाता तोड़ रही हूं.’’

‘‘क्यों भला?’’ प्रधानाचार्य ने पूछा.

‘‘उस गंदगी में मेरा सांस लेना दूभर हो गया है.’’

‘‘अब क्या इरादा है?’’

‘‘सर, यदि संभव हो तो मेरी सेवाएं फिर से ले लें,’’ कमलेश ने निवेदन किया.

‘‘संभव क्यों नहीं है,’’ प्रधानाचार्य ने कंधे उचका कर कहा, ‘‘आप जैसी प्रतिभाशाली अध्यापिका से हमारे स्कूल का गौरव बढ़ेगा.’’

‘‘तो मैं कल से आ जाऊं, सर?’’ कमलेश ने पूछा.

‘‘कल क्यों? आज से ही क्यों नहीं?’’ प्रधानाचार्य मुसकरा दिए और बोले, ‘‘फिलहाल तो आज आप 12वीं कक्षा के छात्रों का पीरियड ले लें. कल से आप को आप का टाइम टेबल दे दिया जाएगा.’’

‘‘धन्यवाद, सर,’’ कमलेश ने उन का दिल से आभार प्रकट किया.

कक्षा में पहुंच कर कमलेश बच्चों को अपना विषय पढ़ाने लगी. सभी छात्र उसे ध्यान से सुनने लगे. आज वह वर्षों बाद अपने अंतर में अपार शांति महसूस कर रही थी. बहुत भटकाव के बाद ही वह मानसिक शांति का अनुभव कर रही थी.

Hindi Story : नैपकिंस का चक्कर

Hindi Story : शनिवार का दिन था. विकास के औफिस की छुट्टी थी. उस ने नहाधो कर अपना नाश्ता बनाया. फिर मधुश का इंतजार करने लगा. मधुश के साथ की कल्पना से ही वह उत्साहित था. मधुश 2 साल से उस की प्रेमिका थी. वह भी मेरठ में ही जौब करती थी. वह अपने मम्मीपापा और भाईबहन के साथ रहती थी. विकास थापरनगर में किराए के घर में अकेला रहता था.

दोनों किसी कौमन फ्रैंड की पार्टी में मिले थे. दोस्ती हुई जो फिर प्यार में बदल गई थी. विकास की मम्मी राधा सहारनपुर में रहती थीं. वे टीचर थीं. विकास के पिता नहीं थे. न कोई और भाईबहन. विकास हमेशा वीकैंड में मम्मी के पास चला जाता था पर इस बार उस की मम्मी ही कल रविवार को आने वाली थीं. दशहरे पर उन के स्कूल की छुट्टियां थीं.

मधुश अकसर अपने मम्मीपापा से  झूठ बोल कर कि ‘दिल्ली में मीटिंग है,’ विकास के पास रात में भी कभीकभी रूक जाती थी. डोरबैल बजी, मधुश थी. सुंदर, स्मार्ट, चहकती हुई मधुश ने घर में आते ही विकास के गले में बांहें डाल दीं. विकास ने भी उसे आलिंगनबद्ध कर लिया. दोनों ने पूरा दिन साथ में बिताया. रात तक मधुश का घर जाने का मन नहीं हुआ. विकास ने भी कहा, ‘‘आज रात में भी रुक जाओ, कल तो मां भी आ रही हैं.’’

‘‘मां के आने पर मैं बहुत खुश होती हूं, बहुत अच्छी हैं वे.’’

‘‘रुक जाओ आज, फिर कुछ दिन ऐसे नहीं मिल पाएंगे.’’

‘‘सोचती हूं कुछ, क्या बहाना करूं घर पर?’’

‘‘कह दो किसी सहेली के घर स्लीपओवर है.’’

‘‘हां, ठीक है,’’ मधुश ने अपनी सहेली निभा को फोन किया, ‘‘निभा, मेरे घर से कोई फोन आए तो कहना मैं तुम्हारे साथ ही हूं. जरा देख लेना.’’

निभा हंसी, ‘‘सम झ गई, वीकैंड मनाया जा रहा है.’’

‘‘हां.’’

‘‘अच्छा, डौंट वरी.’’

विकास ने मधुश को फिर बांहों में भर लिया. दोनों ने मिल कर डिनर बनाया. विकास ने कहा, ‘‘गरमी लग रही है, नहा कर आता हूं, फिर डिनर करते हैं.’’

विकास नहाने गया तो लाइट चली गई. मधुश ने कहा, ‘‘विकास, बहुत गरमी है, जब तक तुम नहा रहे हो, छत पर टहल आऊं?’’

‘‘हां, संभल कर रहना, पड़ोस की छत पर कोई हो तो लौट आना, पड़ोसिन आंटी कुछ दकियानूसी लेडी लगती हैं, मां से कुछ कह न दें.’’

‘‘हां, ठीक है,’’ मधुश छत पर चली गई. वह पहले भी ऐसे ही आती रहती थी, इसलिए उसे घर के आसपास का सब पता था. पड़ोस की छत पर कोई नहीं था. वह यों ही टहलती रही. खुलीखुली जगह, ठंडीठंडी हवा बेहद भली लग रही थी. अचानक उसे छत पर एक कोने में कुछ दिखा. वह  झुक कर देखने लगी. फिर बुरी तरह चौंकी, यूज्ड सैनेटरी नैपकिन था, ऐसे ही पड़ा हुआ. उसे बहुत गुस्सा आया. यह किस का है? दिमाग पता नहीं क्याक्या सोच गया. क्या कोई और लड़की भी आती है विकास के पास? शक ने जब एक बार मधुश के दिल में जगह बना ली तो गुस्सा बढ़ता ही चला गया. वह पैर पटकते हुए सीढि़यों से नीचे आई. विकास नहा कर आ चुका था. अपने गीले बालों के छींटे उस पर डालता हुआ शरारत से उसे बांहों में भरने के लिए आगे बढ़ा तो मधुश ने उस के हाथ  झटक दिए, चिल्लाई, ‘‘जरा, ऊपर आना.’’ विकास मधुश का गुस्सा देख चौंक गया, बोला, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘आना,’’ कह कर मधुश वापस छत पर चली गई, कोने में ले जा कर नैपकिन की तरफ इशारा करते हुए बोली, ‘‘यह किस का है?’’

‘‘यह क्या है? ओह, मु झे क्या पता.’’

‘‘फिर किसे पता होगा? तुम्हारी छत है, तुम्हारा घर है.’’

‘‘क्या फालतू बात कर रही हो, मु झे क्या पता.’’

‘‘विकास, क्या तुम्हारे किसी और लड़की से भी संबंध हैं?’’

‘‘क्या बकवास कर रही हो, मधुश, शक कर रही हो मु झ पर? मु झे तुम से यह उम्मीद नहीं थी.’’

‘‘मु झे भी तुम से यह उम्मीद नहीं थी, मैं जा रही हूं,’’ विकास मधुश को रोकता रह गया पर वह गुस्से में बड़बड़ाती निकल गई. विकास सिर पकड़ कर बैठ गया, वह देर रात तक मधुश को फोन करता रहा पर मधुश ने गुस्से में फोन ही नहीं उठाया.

मधुश और विकास एकदूसरे को प्यार तो बहुत करते थे, मधुश को भी विकास से नाराज हो कर अच्छा तो नहीं लग रहा था, पर मन में बैठा शक सामान्य भी नहीं होने दे रहा था. संडे को फिर सुबह ही विकास ने मधुश को फोन किया. उस ने नहीं उठाया तो विकास ने मैसेज किया, ‘मां आने वाली हैं, उन से मिलने तो आओगी न?’ मधुश को पढ़ कर हंसी आ गई. उस ने मैसेज ही किया, ‘हां, जब वे आ जाएं, मु झे बता देना.’

राधा उसे सचमुच अच्छी लगती थीं. अपनी अच्छी दोस्त कह कर विकास ने उसे पिछली बार मिलवाया था. संडे शाम को मधुश राधा से मिलने गई. राधा बहुत स्नेहपूर्वक उस से मिलीं, मधुश उन्हें अच्छी लगती थी. वे उदारमन की आधुनिक विचारों वाली महिला थीं. विकास मधुश से बात करने की कोशिश करता रहा. थोड़ीबहुत नाराजगी दिखाते हुए मधुश फिर सामान्य होती गई. हलकेफुलके माहौल में तीनों ने काफी समय साथ बिताया, फिर मधुश चली गई.

डिनर के बाद राधा ने कहा, ‘‘विकास, मैं थोड़ा छत पर टहल कर आती हूं.’’

‘‘ठीक है, मां.’’

राधा जब भी आती थीं, छत पर जरूर टहलती थीं. उन्हें दूसरी छत पर टहलती पड़ोसिन उमा दिखीं, औपचारिक अभिवादन हुए. उमा के जाने के बाद राधा को छत पर एक कोने में कुछ दिखाई दिया तो वे  झुक कर देखने लगीं, चौंकी, यूज्ड सैनेटरी नैपकिन. विकास की छत पर? ओह, इस का मतलब विकास और मधुश एकदूसरे के काफी करीब आ चुके  हैं. दोनों के बीच शायद अब बहुतकुछ चलता है, ठीक है. लड़की अच्छी है. अब उन का विवाह हो ही जाना चाहिए. वे काफीकुछ सोचतीविचारती नीचे आ गईं. विकास टीवी देख रहा था. उस के पास बैठती हुई बोलीं, ‘‘विकास, कुछ जरूरी बात करनी है.’’

‘‘हां, मां, बोलो.’’

‘‘अब तुम और मधुश विवाह कर लो.’’

वह चौंका, ‘‘अरे मां, यह अचानक कैसे सू झा?’’

‘‘हां, दोनों एकदूसरे को पसंद करते हो तो देर क्यों करनी.’’

‘‘पर मैं तो कभी उस के घरवालों से मिला भी नहीं.’’

‘‘वह सब तुम मु झ पर छोड़ दो. अभी मेरी छुट्टियां भी हैं, गंभीरतापूर्वक इस बात पर विचार करते हैं. तुम पहले मधुश से डिस्कस कर लो.’’

‘‘ठीक है, मां,’’ कह कर मुसकराता हुआ विकास मां से लिपट गया. वे मुसकरा दीं, ‘‘फिर मेरी चिंता भी कम हो जाएगी, अकेले रहते हो यहां.’’

‘‘आप भी तो वहां अकेली रहती हैं.’’ दोनों हंस दिए. विकास खुश था, मां पर खूब प्यार आ रहा था. फौरन अपने रूम में जा कर मधुश से बात की. वह भी चौंकी पर इस हैरानी में भी बहुत खुशी थी. बोली, ‘‘इतनी जल्दी, यह तो नहीं सोचा था, पर मम्मीपापा…’’

‘‘मां बात कर लेंगी.’’

मधुश भी पिछली नाराजगी एक तरफ रख विचारविमर्श करती रही. अगले ही दिन उस ने अपने मम्मीपापा को विकास के  बारे में सबकुछ बता दिया. और फिर विकास और राधा उन से मिलने गए. राधा के स्नेहमयी, गरिमापूर्ण व्यक्तित्व, आधुनिक विचारों से सब प्रभावित हुए. अच्छे खुशनुमा माहौल में सब तय हो गया. दोनों पक्ष विवाह की तैयारियों में जुट गए.

मधुश दुलहन बन विकास के घर चली आई. आई तो पहले भी कई बार थी पर अब के आने और तब के आने में जमीनआसमान का अंतर था. मां दोनों को ढेरों आशीष दे सहारनपुर चली गईं. कभी विकास और मधुश उन के पास चले जाते थे, कभी वे आ जाती थीं. एक दिन मां मेरठ आई हुई थीं, रात को उन के सिर में हलका दर्द था. वे छत पर खुली हवा में बैठ गईं. मधुश उन के पास ही तेल ले कर आई. बोली, ‘‘लाओ मां, तेल लगा कर थोड़ा सिर दबा देती हूं.’’

दोनों सासबहू के संबंध बहुत स्नेहपूर्ण थे. खुशनुमा, हलकी रोशनी में ताजगीभरी ठंडक में मधुश धीरेधीरे राधा का सिर दबाने लगी. उन्हें बड़ा आराम मिला. अचानक पायल के घुंघरुओं की आवाज ने उन दोनों का ध्यान खींचा, आंखों तक घूंघट लिए पड़ोस की छत पर एक नारी आकृति धीरेधीरे सावधानीपूर्वक चलते हुए इधरउधर देखती आई और विकास की छत पर एक कोने में कुछ फेंक कर मुड़ने लगी तो मधुश ने सख्त आवाज में कहा, ‘‘ऐ, रुको.’’ आकृति ठहर गई.

मधुश और राधा दोनों अपनी छत की मुंडेर तक गईं, कांपतीडरती सी एक नवविवाहिता खड़ी थी. मधुश ने फेंकी हुई चीज देखी, सैनेटेरी नैपकिन. ओह. पूछा, ‘‘यह क्या बदतमीजी है? तुम फेंकती हो यह हमारी छत पर?’’

लड़की ने ‘हां’ में सिर हिलाया. मधुश गुर्राई, ‘‘क्यों? यह क्या तरीका है? ऐसे फेंकते हैं?’’ लड़की रोंआसी हो गई, कहने लगी, ‘‘अभी कुछ महीने पहले ही मेरा विवाह हुआ है यहां, मैं गांव से आई हूं. सासुमां से बहुत डर लगता है, उन से पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि कैसे फेंकूं, आप से माफी मांगती हूं.’’ मधुश का सारा गुस्सा उस की डरी हुई आवाज पर खत्म हो गया. उसे उस पर तरस आया, बोली, ‘‘डरो मत, आगे से यहां मत फेंकना, किसी पेपर में लपेट कर अपने घर के डस्टबिन में डालना, ऐसे इधरउधर नहीं फेंकते.’’

‘‘जी, अच्छा,’’ कह कर वह तो चली गई, पर मधुश और राधा एकदूसरे को देख कर हंसती चली गईं.

मधुश ने हंसते हुए कहा, ‘‘मां, पता है मैं ने इसे छत पर देख कर विकास से  झगड़ा किया था. उस पर शक किया था. जिस दिन आप विवाह से पहले आई थीं, तब.’’ राधा और जोर से हंस पड़ीं. वे भी बताने लगीं, ‘‘और पता है तुम्हें, मैं ने भी उसी रात देखा था और तुम्हारे बारे में बहुतकुछ सोच लिया था. तभी फौरन तुम दोनों का विवाह करवाया था.’’

‘‘हां? हाहा, मां.’’

दोनों सासबहू चेयर्स पर बैठ गई थीं और उन की हंसी नहीं रुक रही थी. राधा का सिरदर्द तो हंसतेहंसते गायब हो चुका था और मधुश मन ही मन अपनी सासुमां को थैंक्यू कहते हुए प्यार और सम्मानभरी आंखों से निहार रही थी.

Hindi Story : नाव पर गाड़ी

Hindi Story : बाहर अदालत का चपरासी चिल्ला कर कह रहा था, ‘‘दिनेश शर्मा हाजिर हो…’’

दिनेश चुपचाप कठघरे में जा कर खड़ा हो गया. मजिस्ट्रेट लक्ष्मी ने दस्तावेजों को देखना बंद कर उस की ओर निगाह दौड़ाई. एकबारगी तो वे भी चौंकीं, फिर मुसकरा कर उस की ओर गहरी निगाहों से देखने लगीं, मानो कह रही हों, ‘मु झे पहचानते हो न. देखो, मु झे देखो. मैं वही देहाती लड़की हूं, जिसे तुम ने अपने अहम के चलते ठुकरा दिया था. आज मैं कहां हूं और तुम कहां हो.

‘तुम्हें अपनी शहरी सभ्यता और पढ़ाईलिखाई का बड़ा घमंड था न, मगर तुम कुछ कर नहीं पाए. लेकिन मैं अपनी मेहनत के बल पर बहुत अच्छी हालत में हूं और तुम इंसाफ के फैसले के लिए मेरे सामने कठघरे में खड़े हो.’

‘आज तो सारा हिसाबकिताब चुकता कर देगी,’ दिनेश मन में सोच रहा था. मगर लक्ष्मी उसी गंभीरता का भाव लिए बैठी थीं.

दोनों तरफ के वकील बहस में उल झे थे. लक्ष्मी उन की दलीलों को ध्यान से सुनते हुए दिनेश को देख रही थीं.

मामला जमीन के एक पुश्तैनी टुकड़े को ले कर था, जिस पर दिनेश एक मार्केट बनाना चाहता था. इस के लिए उस ने बाकायदा नगरनिगम से नक्शा पास करा कर काम भी शुरू कर दिया था. मगर उस के एक रिश्तेदार ने उस पर अपना दावा करते हुए कोर्ट से स्टे और्डर ले कर मार्केट का काम रुकवा दिया था.

‘यह लक्ष्मी आज मु झे नहीं छोड़ने वाली. इस से इंसाफ की उम्मीद करना बेकार है…’ दिनेश बारबार यही सोच रहा था, ‘पिछली बेइज्जती का बदला यह इस रूप में लेगी और मेरी मिल्कीयत से मु झे ही अलग कर देगी.’

2 साल पहले की ही तो बात थी, जब दिनेश ने लक्ष्मी को देखा था. उन का रिश्ता तकरीबन तय हो चुका था और वह दोस्तों के साथ उसे देखने लक्ष्मी के गांव गया था.

पहली ही नजर में दिनेश को लक्ष्मी कालीकलूटी, गांव की गंवार लड़कियों के समान दिखी थी. उन दिनों दिनेश राज्य लोक सेवा आयोग की प्रतियोगिता की तैयारी करते हवाई सपने देखा करता था. फिल्मी हीरो की तरह रंगढंग थे उस के.

दिनेश मुंहफट तो था ही, सो वह वहीं बोल पड़ा था, ‘इस गांव की गंवार सी दिखने वाली लड़की से शादी कर के मु झे अपना स्टेटस खराब करना है क्या?’

लक्ष्मी के घर वाले सन्न रह गए थे. मगर लक्ष्मी दबी आवाज में बोल पड़ी थी, ‘तो इस के लिए आप पर दबाव कौन डाल रहा है?’

‘अरे, यह लड़की तो बोलती भी है,’ वह मजाकिया लहजे में हंसते हुए बोला था, ‘मैं तो सोचता था कि गांव की लड़कियों के जबान नहीं होती.’

‘क्यों, गांव की लड़कियों के जबान क्यों नहीं होगी?’ लक्ष्मी आखिरकार हिम्मत कर के बोल पड़ी थी, ‘फिर मैं ने तो इसी साल ग्रेजुएशन किया है.’

‘तो कौन सा तीर मार लिया है तुम ने,’ दिनेश शर्मा ऐंठते हुए बोला था, ‘कोई एसडीओ, कलक्टर तो नहीं बन गईं. तुम्हारे जैसी ग्रेजुएट शहरों में चप्पलें चटकाते 100-100 रुपए की मास्टरी करती फिरती हैं.’

वहां से वापस लौटने के बाद दिनेश कई दिनों तक लक्ष्मी की चटकारे ले कर चर्चा किया करता था कि कैसे वह एक गंवार लड़की के चंगुल से बालबाल बच गया कि कैसे उस ने एक बातूनी, जवाब देने वाली लड़की से पिंड छुड़ा लिया है.

समय गुजरता रहा. इस बीच दिनेश ने अनेक प्रतियोगिता परीक्षाएं दीं, मगर वह सब में नाकाम रहा. इस बीच उस ने एमए की परीक्षा भी पास कर ली, मगर ढंग की कोई नौकरी न मिलने पर उस ने मैडिकल स्टोर की दुकान खोल ली.

दुकान ठीक ढंग से चलती न थी. तब उस ने अपनी पुश्तैनी जमीन पर एक मार्केट बनाना शुरू किया, ताकि उस से किराए के रूप में ही कुछ आमदनी हो सके. मगर इस बीच उस जमीन पर उस के एक रिश्तेदार ने अपना मुकदमा ठोंक दिया.

अब उस जमीन पर स्टे और्डर था और वह मुकदमेबाजी में फंस कर फटेहाल हो चुका था. फिर भी एक उम्मीद थी कि वह मुकदमा जीत जाएगा, मगर अब लक्ष्मी को देख कर उस की यह आस भी खत्म होती नजर आती थी.

अपना बयान दे कर दिनेश बु झे मन के साथ कठघरे से वापस लौटा और बैंच पर अपनी पत्नी सरला के नजदीक बैठ गया.

‘‘यह केस हम हार जाएंगे…’’ दिनेश बोला, ‘‘मजिस्ट्रेट के हावभाव से यही लग रहा है कि फैसला हमारे खिलाफ जाएगा.’’

‘‘अभी से उलटेसीधे विचार मन में नहीं लाइए…’’ सरला बोली, ‘‘बड़े पदों पर बैठे लोग बहुतकुछ देखते हैं. वे कभी भी नाइंसाफी नहीं होने देंगे.’’

‘‘ये सब फालतू की बातें हैं…’’ दिनेश  झुं झला कर बोला, ‘‘तुम्हें पता है, वहां मजिस्ट्रेट के पद पर कौन बैठा है?’’

‘‘मजिस्ट्रेट के पद पर कोई औरत बैठी है, तो इस से क्या हुआ. उसे भी सहीगलत की सम झ होगी.’’

‘‘अरे, वह और कोई नहीं, वही लक्ष्मी है, जिस की मैं कभी बेइज्जती कर चुका हूं. इसी लक्ष्मी की कहानी तो मैं तुम्हें सुनाता रहता हूं. मगर, आज देखो, वह कहां बैठी है और मैं कहां खड़ा हूं.’’

दिनेश की बात सुन कर सरला सन्न रह गई.

‘‘कहां तो यह भरोसा किया था कि जल्दी ही अपनी मार्केट का उद्घाटन कर दूंगा और कहां यह आफत सिर पर आ गिरी…’’ दिनेश बुदबुदाया, ‘‘अब फैसले का इंतजार क्या करना, वह तो मेरे खिलाफ जाना ही है.’’

तमाम सुबूतों की जांचपड़ताल करने और गवाहों की दलीलों को सुनने के बाद लक्ष्मी ने फैसला तैयार कर दिया था. लक्ष्मी का फैसला जान कर दिनेश ताज्जुब में पड़ गया, क्योंकि लक्ष्मी ने उस के हक में फैसला दिया था.

फैसला हो जाने के साथ ही अदालत का वह कमरा खाली हो चुका था. मजिस्ट्रेट लक्ष्मी पहले ही अपने केबिन में जा चुकी थीं.

लेकिन मुकदमे में जीत के बावजूद पता नहीं क्यों दिनेश को कुछ हार जाने का भी अहसास हो रहा था. फैसला उस के हक में गया है, उसे जैसे यकीन ही नहीं हो रहा था.

‘‘अब वापस नहीं चलना है क्या?’’ सरला की बातों से दिनेश चौंका.

सरला कह रही थी, ‘‘अभी हमें जल्दी से ढेरों काम निबटाने हैं.’’

‘‘पता नहीं क्यों, मु झे इस फैसले पर अभी भी यकीन नहीं हो रहा…’’ वह हिम्मत कर के बोला, ‘‘सचमुच सरला, मु झे ऐसा लग रहा है, मानो मैं जीत कर भी हार गया हूं.’’

‘‘वह भी गांव की एक गंवार लड़की से… क्यों?’’ सरला की इस बात से दिनेश का सिर  झुक सा गया.

‘‘यह आप नहीं, आप का अहंकार बोल रहा है,’’ सरला कहती गई, ‘‘और देखा जाए तो आज आप के अहंकार की हार हुई है. इसे स्वीकार कीजिए. समय और हालात हमेशा एक से नहीं रहते. यह तो बस मौका मिलने की बात है.’’

‘‘मैं एक बार लक्ष्मी से मिलना चाहता था.’’

‘‘तो मिल लीजिए न.’’

दिनेश ने चपरासी से मिन्नतें कर कहा कि वह मजिस्ट्रेट साहिबा से मिलना चाहता है.

मजिस्ट्रेट लक्ष्मी ने उसे मिलने की इजाजत दे दी थी.

दिनेश सरला के साथ  िझ झकते हुए लक्ष्मी के केबिन में दाखिल हुआ. मजिस्ट्रेट लक्ष्मी अपनी कुरसी पर बैठी थीं. उन्होंने दोनों को कुरसी की तरफ बैठने का इशारा किया, फिर चपरासी को चाय लाने का और्डर दिया.

‘‘हम आप के बड़े आभारी हैं,’’ बमुश्किल दिनेश के बोल फूटे, ‘‘आप ने हमारे हक में फैसला दे कर हमें अनेक मुसीबतों से बचा लिया है.’’

‘‘इस में आभार जैसी कोई बात नहीं…’’ लक्ष्मी हंस कर बोलीं, ‘‘मैं ने अपना फैसला किसी के पक्ष या विपक्ष में नहीं किया है. सुबूतों और गवाहों के बयान के मुताबिक मैं ने अपना फैसला सिर्फ इंसाफ के पक्ष में दिया है. यही मेरा फर्ज है. मैं भी इस देश के कायदे और कानून से बंधी हूं, और उन का सम्मान करती हूं.’’

दिनेश शर्मा पर जैसे घड़ों पानी पड़ गया. वह शर्म से गड़ा जा रहा था. उस ने बमुश्किल चाय की प्याली थाम रखी थी. लक्ष्मी उस के संकोच को तोड़ती हुई सी बोलीं, ‘‘पुरानी बातों को भूल जाइए शर्मा साहब. जिंदगी में अनेक हादसे घटते रहते हैं. इस से जिंदगी रुक नहीं जाती. आप चाय पीजिए.’’

‘‘हमें आप की बात सुन कर बहुत खुशी हुई…’’ सरला चाय का प्याला रखते हुए बोली, ‘‘अगले महीने मार्केट का उद्घाटन होना है. अगर आप उस दिन हमारे यहां आएंगी, तो हमारी खुशी दोगुनी हो जाएगी.’’

‘‘यह खुशी की बात है कि आप के मार्केट का उद्घाटन होने वाला है…’’ लक्ष्मी बोल रही थीं, ‘‘मु झे भी उस वक्त आप के यहां आने से खुशी होती, मगर मैं ने बताया न कि मैं कुछ कायदेकानून से बंधी हूं. उन में से एक कानून यह भी है कि मजिस्ट्रेट लोग उन लोगों के यहां के कार्यक्रमों में नहीं जाते, जिन के मुकदमे वे देखते हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं…’’ सरला अपनी निश्छल हंसी बिखेरते हुए बोली, ‘‘आप कायदेकानून से बंधी हैं, इसलिए आप नहीं आ सकतीं. मगर हमारे साथ तो ऐसा कोई बंधन नहीं. हम तो आप के यहां आ ही सकते हैं?’’

‘‘शौक से आइए…’’ लक्ष्मी अपनी गहरी नजरों से दिनेश शर्मा को देखते हुए बोलीं, ‘‘मु झे बहुत खुशी होगी, मगर साथ में इन्हें भी लाना.’’

एक सम्मिलित हंसी के बीच दिनेश संकोच से गड़ गया. वह अपने बौनेपन के अहसास से दबा जा रहा था. उद्घाटन के दिन भी क्या वह अपने इसी छोटेपन के अहसास से घिरा रहेगा. हां, यही उस की सजा है, जिसे उसे भुगतना ही होगा.

उद्घाटन के दिन दिनेश शर्मा की खुशी देखते बनती थी. उस का सालों का देखा हुआ सपना जो साकार हो रहा था. शहर के बिजी इलाके में 8-8 दुकानों की मार्केट का मालिक होना माने रखता था. आज मार्केट का उद्घाटन हुआ था. सैकड़ों लोगों ने उस के द्वारा कराए गए इस भव्य कार्यक्रम में आ कर भोजन किया था.

एकएक कर सारे मेहमान विदा हो चुके थे. दिनेश एक कुरसी पर बैठा कुछ सोच रहा था. अचानक सरला उस के पास जा कर खड़ी हो गई. लाल रंग की बनारसी साड़ी और जड़ाऊ गहनों से लदीफदी थी वह. वह उसे एकटक देखता रह गया. उस के हाथ में लाल रंग के एक मखमली डब्बे में चांदी का एक छोटा सा दीया था.

‘‘चलना नहीं है क्या?’’ सरला बोली, ‘‘फिर हमें वहां जा कर लौटना भी तो है.’’

‘‘अब कहां जाना है?’’ वह हैरान होते हुए बोला.

‘‘अरे, मजिस्ट्रेट लक्ष्मी के घर पर,’’ सरला हंस कर बोली, ‘‘वे आप का इंतजार कर रही होंगी.’’

दिनेश अनचाहे भाव के साथ उठ खड़ा हुआ.

मजिस्ट्रेट लक्ष्मी ने अपने पति आनंद के साथ उन का स्वागत किया. उस के पति आनंद शहर की यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे.

‘‘लक्ष्मी ने आप के बारे में मु झे सबकुछ पहले ही बता दिया है,’’ आनंद हंसते हुए बोले, ‘‘चलिए, आप ने इन्हें नकारा, तो मु झे ये मिल गईं.’’

‘‘मैं अपने किए पर वाकई बहुत शर्मिंदा हूं…’’ दिनेश बमुश्किल बोल पा रहा था, ‘‘मु झे अब अपनी गलती का अहसास हो रहा है, इसलिए अब मु झे और शर्मिंदा न कीजिए.’’

‘‘फिर भी आप को आगे का हाल जानने की उत्सुकता तो होगी ही,’’ लक्ष्मी उन्हें देखते हुए बोलीं, ‘‘उस दिन की घटना के बाद मैं पहले तो खूब रोई, फिर जीजान से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग गई. पहली बार तो नाकामी मिली, मगर दूसरी बार में मेरा चयन राज्य लोक सेवा आयोग के लिए हो गया. इस के बाद तो मैं ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.’’

‘‘सिर्फ एक बार,’’ लक्ष्मी के पति आनंद मुसकरा कर बोले, ‘‘शादी के समय को छोड़ कर.’’

एक सम्मिलित हंसी वहां गूंज उठी. मिठाइयों की प्लेट सजाते हुए लक्ष्मी ने दिनेश को देखा. वह नजरें चुरा रहा था.

सरला अपने साथ लाए चांदी के दीपक को वहीं बैठक में जला चुकी थी. उस की रोशनी में वह खो सी गई थी.

‘‘क्या करती लक्ष्मी बहन, मैं आप के लिए कुछ नहीं कर सकती, आप कायदेकानूनों से जो बंधी हैं.’’

‘‘किस कानून से…’’

‘‘यही कि आप हम से उपहार नहीं स्वीकार कर सकतीं, क्योंकि आप ने हमारा मामला देखा है.’’

फिर एक सम्मिलित हंसी गूंजी.

दिनेश किसी से नजरें नहीं मिला पा रहा था. विदा लेते वक्त लक्ष्मी ने उसे दोबारा देखा.

‘क्या अजीब बात है…’ लक्ष्मी ने सोचा, ‘कभीकभी गाड़ी को भी नदी पार कराने के लिए नाव पर चढ़ाया जाता है और तब उसे अपने छोटेपन का पता चलता है. चलो जो हुआ, अच्छा ही हुआ. किसी का अहंकार तो टूटा.’

Family Story : वसीयत

Family Story : सोम एक पढ़ालिखा नौजवान था. उसे इसी साल नौकरी मिल गई थी. उस ने तय किया कि वह अपना 23वां जन्मदिन मनाने के लिए गांव जाएगा.

गांव में अब सोम के लिए अपना कहने को बस एक चाचाजी ही रह गए थे. वह शुक्रवार की शाम को दफ्तर से सीधा बसअड्डे आ गया था. गांव और चाचाजी… इसी खुशी में डूब कर सोम खुशीखुशी गांव की बस में बैठ गया.

4 घंटे का सफर तय कर के सोम गांव में आ चुका था. वहां आ कर उस का मन हराभरा हो गया.

इस बार सोम 7-8 महीने बाद गांव आया था. गांव की सड़क पर उसे कुछ जानेपहचाने से चेहरे दिखाई दिए. सोम ने बहुत इज्जत के साथ उन्हें नमस्ते किया, मगर वे सभी उसे अजीब सी नजरों से घूरते रहे.

उन को नजरअंदाज कर सोम कुछ आगे बढ़ा, तो फिर से वही बात हुई. सोम ने एक परिचित से खुद ही आगे बढ़ कर पूछ लिया कि आखिर माजरा क्या है?

‘‘अपने रंगीनमिजाज चाचाजी के पास जाओ, तब मालूम होगा,’’ उस आदमी ने सोम को टका सा जवाब दिया और आगे बढ़ गया.

सोम हैरत में था. यह कैसी पहेली थी, वह समझ ही नहीं पा रहा था.

यही सोचतेसोचते सोम घर भी आ गया. चाचाजी आराम से नीम की छांव तले खाट पर अखबार पढ़ रहे थे.

चाचाजी को देखते ही सोम का मन अपार स्नेह से भर उठा. उस ने चाचाजी के पैर छुए, तभी एक औरत कमरे से बाहर आई. एकदम चाचाजी की हमउम्र. वह अनजान थी, फिर भी सोम ने उन्हें नमस्ते किया.

सोम सवालिया निगाहों से उस औरत को देखता रहा, तभी चाचाजी ने उस की उत्सुकता को शांत कर दिया, ‘‘बेटे सोम, ये आप की चाची हैं उमा. हम दोनों ने 3 दिन पहले ही मंदिर में ब्याह कर लिया है.’’

अपनी हैरानी को दबा कर सोम ने बहुत ही आदर से उन को दोबारा नमस्ते किया. वे खूब हंसमुख थीं.

आशीर्वाद देती रहीं. सोम अब एकदम खामोश हो गया. पलभर के भीतर ही वह समझ गया कि इतनी देर पहले तक रास्ते में हरेक उसे इस तरह से घूर क्यों रहा था.

मतलब, चाचाजी तो बेचारे बुरे फंस गए. 10 बीघा खेत. अलग से 3 बीघा में आम का बाग. इन नईनवेली चाचीजी ने तो चाचाजी को बेवकूफ बना दिया है.

सोम आगे कुछ और सोचता कि एक मधुर आवाज आई, ‘‘सोम बेटा, यह लो शरबत पी लो.’’

सोम थका हुआ तो था ही, वह उस शरबत को गटागट पी गया. उस ने इतना बेहतरीन और लाजवाब शरबत आज तक नहीं पिया था.

चाचीजी ने एक गिलास और दिया. सोम वह भी पी गया.

‘‘शुक्रिया चाचीजी,’’ सोम ने इस शब्द को चबा कर कहा, मगर वे तो इतनी सरल कि तब भी ‘खुश रहो बेटा’ कह कर भीतर चली गईं.

कुछ पल के लिए एकदम सन्नाटा सा छा गया था. सोम मन ही मन हिसाब लगा रहा था कि चाचीजी ने भी बढि़या हाथ मारा है. करोड़ों के मालिक हैं चाचाजी. उसी पल सोम के मन में एक दूसरा विचार भी कौंध गया. ऐसा विचार जो आज तक सोम के मन में नहीं आया था.

आज जिंदगी में पहली बार सोम इस खेत और बगीचे में अपने हिस्से को भी गिनने लगा था.

मतलबी सोम सब भूल गया था. चाचाजी का इतना त्याग, ऐसा बलिदान, उसे इस समय कुछ याद नहीं रहा. एक कार हादसे में सोम के मातापिता और चाचीजी नहीं रहे थे.

स्कूल से लौट कर आया सोम सब जानने के बाद अपने चाचाजी से लिपट गया था.

‘‘चाचाजी, अब आप एक और चाची तो नहीं लाओगे न…?’’ 10 साल का सोम अपने 40 साल के चाचाजी से भीख मांग रहा था.

‘‘नहीं बेटा, मैं कभी नहीं करूंगा दूसरी शादी,’’ कह कर चाचाजी ने सोम को अपनी गोद में भर लिया था.

उस दिन के बाद से सोम के लिए माता और पिता दोनों चाचाजी हो गए थे. सोम ने होस्टल में पढ़ने की जिद की, तो चाचाजी ने 10वीं जमात के बाद उस की यह तमन्ना पूरी करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी. अब तक भी उस की बेरोजगारी में उस के बैंक खाते में चाचाजी ही रुपए भेजते थे.

मगर, शहर का पानी पी कर सोम मतलबी सा हो गया था. अब वह अपनी यारीदोस्ती में मगन रहता था.

अपनी नौकरी में वह बिजी रहता था. यह सोच कर कि चाचाजी के साथ तो पूरा का पूरा गांव है, अब उन की परवाह क्या करना?

आज सोम को अपने हिस्से की जायदाद भी चाची की झोली में जाती दिख रही थी.

इतनी देर में नई चाजीजी खूब सारा नाश्ता ले कर आ गईं.

‘‘कल आप का जन्मदिन है सोम, आज से ही हम लोग जश्न शुरू करते हैं,’’ कह कर चाचीजी उस की प्लेट
में गुलाबजामुन, पकौड़े रखने लगीं.

सोम को तो इस धोखे से सदमा सा लग गया था कि तभी चाचीजी ने एक फाइल चाचाजी को थमा दी.

‘‘अरे हां सोम बेटा, यह लो जमीन के सारे कागज. सारी जायदाद और मकान, सब तुम को दे दिया है बेटे. मुझे तो उमा ने सहारा दे दिया है. वे एक कारोबारी हैं.

3-4 महीने से गांव में सर्वे कर रही थीं. हम को ऐसा लगा मानो कुदरत ने मिला दिया हो.

‘‘गांव वाले विरोध कर रहे हैं, मगर हम शादी के बंधन में बंध गए हैं,’’ सोम अपने चाचाजी की बात सुन रहा था.

चाचाजी आगे बताने लगे, ‘‘तुम्हारी चाची उमा कन्नड़ हैं और एकदम स्वाभिमानी. अब 3-4 दिन के बाद मैं भी इस के साथ कर्नाटक जा रहा हूं. जिस गांव ने हमें 3 दिन भी सहन नहीं किया, वहां आगे भी कौन सा संबंध रखा जाएगा, यह मैं जानता हूं.

‘‘तुम्हारी चाची ने ही कहा है कि उन के पास अपने कारोबार से कमाया हुआ इतना पैसा है कि एक पाई भी किसी से नहीं चाहिए. यह संभालो अपनी विरासत,’’ कह कर चाचाजी ने सोम को एक गुलाबजामुन खिला दिया.

सोम ने यह सुना, तो वह शर्म से पानीपानी हो गया.

‘उमा चाची, आप तो बहुत महान हो,’ सोम ने मन ही मन कहा.

‘‘बेटा, अभी तो एक मैनेजर है, जो सब देखभाल कर रहा है. आगे भी सब हो जाएगा. अगर चाहो तो नौकरी की जगह अपनी जमीन भी संभाल सकते हो,’’ उमा चाची ने बाहर आ कर सोम से कहा.

उमा चाची की यह बात सुन कर सोम का मन हुआ कि उन के पैरों की धूल को माथे पर सजा ले.

इस के बाद चाचाचाची बैंगलुरु चले गए और वहीं बस गए.

सोम आज भी हर साल 3-4 बार उन से मिलने जरूर जाता है. उस ने उमा चाची से स्वाभिमान और सचाई का अनूठा सबक सीखा है.

Love Story : मजहब की दीवार

Love Story : अदालत में आज सुबह से ही काफी चहलपहल नजर आ रही थी. शहर के वकील और मीडिया के लोगों का जमावड़ा अदालत के आसपास लग गया था. वहां की चाय और पनवाड़ी की गुमटियों पर लोगों की जबान पर एक ही चर्चा थी.

दरअसल, आज के दिन एक अंतर्धार्मिक शादी को ले कर उपजे झगड़े का फैसला जो आने वाला था.

गोरखपुर के रहने वाले गुलजार ने अदालत में याचिका दाखिल कर यह गुहार लगाई थी कि उस की पत्नी आरती को उस के मांबाप बंधक बनाए हुए हैं.

पुलिस सिक्योरिटी के बीच अदालत में मौजूद गुलजार के मन में तरहतरह के खयाल आ रहे थे. उस ने जिस आरती से आज से 2 साल पहले प्यार की पेंगें बढ़ाई थीं, उसे वह हर कीमत पर अपना जीवनसाथी बनाए रखना चाहता था, पर मजहब की दीवार उसे ऐसा करने से रोक रही थी.

25 साल के मेकैनिक गुलजार को 2 साल पहले का वाकिआ याद आ गया था.

उस दिन गुलजार अपने गैराज में आई एक मोटरसाइकिल की मरम्मत का काम कर रहा था, थोड़ी दूर पड़ोस में रहने वाली 19 साल की आरती स्कूल बस के आने का इंतजार कर रही थी.

वैसे तो एक ही महल्ले में रहने के चलते वे एकदूसरे से अनजान नहीं थे, पर गुलजार का ध्यान गाड़ी की मरम्मत के बजाय आरती को देखने में ज्यादा लग रहा था.

उस दिन जब आधा घंटे से ज्यादा का वक्त निकल जाने के बाद भी आरती की बस नहीं आई, तो गुलजार से रहा नहीं गया. आखिरकार उस ने पूछ ही लिया, ‘‘आज तुम्हारी बस नहीं आई आरती?’’

‘‘हां गुलजार, बस नहीं आई. आज से ही तिमाही इम्तिहान शुरू हो रहे हैं. समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं,’’ आरती ने जवाब दिया.

‘‘अगर कोई एतराज न हो, तो मैं तुम्हें मोटरसाइकिल से स्कूल छोड़ दूं?’’ गुलजार ने आरती से पूछा.

‘‘गुलजार, तुम अगर मुझे स्कूल छोड़ दोगे, तो मैं वक्त पर पहुंच कर इम्तिहान दे पाऊंगी.’’

गुलजार के मन की मुराद पूरी हो गई. आरती की ‘हां’ मिलते ही वह खुशी के मारे उछल पड़ा. उस दिन वह अपनी मोटरसाइकिल पर आरती को बिठा कर स्कूल छोड़ने चला गया.

मोटरसाइकिल पर आरती की छुअन पा कर गुलजार के शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई. स्कूल के गेट पर आरती को जैसे ही मोटरसाइकिल से उतारा, तो गुलजार की नजरें आरती से दोचार हुईं. बस, वह उसे देखता ही रह गया.

जवानी की दहलीज पर कदम रख रही आरती की खूबसूरती उसे पहली नजर में ही भा गई. आरती ने भी गुलजार को प्यारभरी नजरों से देख कर ‘थैंक्स’ कहा और ‘बाय’ करते हुए स्कूल गेट से भीतर चली गई.

गुलजार वैसे तो हाईस्कूल तक ही पढ़ा था, पर स्कूल आतेजाते बच्चों को देख कर वह बहुत खुश होता था. वह गाडि़यों की मरम्मत के काम के अलावा जरूरतमंद लोगों की मदद भी करता था. महल्ले के सब लोग उसे प्यार करते थे.

उस दिन आरती को स्कूल छोड़ कर आए गुलजार पर आरती के रूपरंग का नशा इस कदर छा चुका था कि वह अपनी सुधबुध खो बैठा. वह अब रोज आरती के स्कूल जाने के वक्त उस का दीदार करने समय से पहले ही गैराज पहुंचने लगा था.

आरती भी गुलजार की नजरों से अनजान नहीं थी. वह भी उस के मोहपाश में बंध चुकी थी.

एक दिन मौका पा कर गुलजार ने आरती से अपने प्यार का इजहार करते हुए कह दिया, ‘‘आरती, आई लव यू. मैं तुम से बेइंतिहा मुहब्बत करता हूं.’’

आरती गुलजार की सादगी पर फिदा हो चुकी थी. वह भी मन ही मन गुलजार से प्यार करने लगी थी.

जब गुलजार ने अपने प्यार का इजहार किया, तो आरती भी अपनेआप को रोक न सकी और उस ने भी शरमाते हुए इजहार का जवाब देते हुए कह दिया, ‘‘आई लव यू टू.’’

इस के बाद तो उन दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. जब भी मौका मिलता, वे दोनों शहर के एक बड़े पार्क में बैठ कर अपने दिल की बातें कहते और एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खाते.

मगर गुलजार और आरती का प्यार जमाने की नजरों से ज्यादा दिन छिप नहीं सका. उन के प्यार की कहानी आरती के घर वालों को पता चल गई, तो उस पर नजर रखी जाने लगी.

अब आरती छिपछिप कर गुलजार से मिलने लगी. दोनों शादी तो करना चाहते थे, मगर मजहब की दीवार उन के प्यार में सब से बड़ी रुकावट बन रही थी. हर वक्तहिंदूमुसलिम का राग अलापने वाले समाज के कुछ लोगों की नजर में उन का प्यार लव जिहाद के अलावा कुछ नहीं था. आरती के पापा को भी यह रिश्ता किसी भी हालत में मंजूर नहीं था.

घर वालों की तमाम बंदिशों के बावजूद भी गुलजार और आरती का मिलना बंद नहीं हो पाया, तो घर वालों ने आरती की स्कूल की पढ़ाई ही बंद करा दी. स्कूल जाना बंद होने की वजह से आरती अपने ही घर में कैद हो कर रह गई. दोनों बेचैन रहने लगे.

मौका मिलते ही वे कभी छिप कर मिल लेते, तो कभी मोबाइल फोन पर बातचीत कर तसल्ली कर लेते. जब कभी आरती के घर वालों को इस बात का पता चलता, तो वे उस की जम कर पिटाई करते.

अपने परिवार का सब से लाड़ला गुलजार खान अपने अब्बू और अम्मी के साथ रहता है. घर में बड़े भाई जावेद के अलावा एक छोटी बहन भी थी. बड़े भाई के निकाह के बाद अब्बू गुलजार के निकाह के लिए लड़की तलाश रहे थे, तभी उन के कानों तक भी गुलजार और आरती के इश्क की कहानी आ गई.

अब्बा ने गुलजार को समझाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘देख बेटा, आजकल हालात वाकई ठीक नहीं हैं. अलगअलग मजहब के लड़कालड़की की शादी को ‘लव जिहाद’ का नाम दे कर बहुत सख्ती की जा रही है.

‘‘अगर तू ने उस लड़की से निकाह कर लिया, तो हमारे परिवार को लोग छोड़ेंगे नहीं. तेरी छोटी बहन का निकाह भी तो मुझे करना है.’’

अब्बा की समझाइश का गुलजार पर कोई असर नहीं हुआ. उस ने साफसाफ कह दिया, ‘‘मैं हर हाल में आरती से ही शादी करूंगा.’’

बेटे के तेवर देख कर अब्बा ने गुलजार को आरती के साथ निकाह करने की बेमन से इजाजत दे दी थी, मगर आरती के घर वालों की मंजूरी मिलने की उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी.

मन मार कर एक दिन गुलजार के अब्बा आरती के पापा राकेश के पास शादी की बात करने गए, तो राकेश ने उन्हें भलाबुरा कहा और सख्त हिदायत देते हुए कहा, ‘‘अपने बेटे को समझ लो, वरना उस के हाथपैर तोड़ देंगे.’’

गुलजार के अब्बा खून का घूंट पी कर घर आ गए. गुलजार ने शहर के वकील से मिल कर सलाह ली और आरती के साथ एक प्लान बना कर शादी करने का फैसला कर लिया.

वे दोनों कोर्टमैरिज के लिए अर्जी देने एसडीएम कोर्ट पहुंचे, लेकिन वहां पर आरती के पापा के दोस्त सोनू ने उन्हें देख लिया.

घर आ कर सोनू ने राकेश को यह बात बता दी. आरती की इन हरकतों की वजह से समाज में राकेश की बदनामी हो रही थी. वे एक सरकारी दफ्तर में मुलाजिम थे. उन का संयुक्त परिवार था, जिस में पत्नी, एक बेटा, 2 बेटियां, मातापिता की जिम्मेदारी उन के कंधों पर थी. उन की जातिबिरादरी में लवमैरिज करना बड़ी बात तो नहीं थी, पर एक विधर्मी लड़के से शादी करना बहुत बड़ा गुनाह था.

ऐसा होने पर कानून के साथसाथ उन के धर्म के लोग उन का समाज में जीना मुश्किल कर देते. यही सोच कर वे आरती को समझा रहे थे, मगर वह यह सब समझने को तैयार नहीं थी.

आरती के घर वालों का एकएक दिन तनाव में गुजर रहा था. उस दिन आरती के पापा आगबबूला हो गए और गुस्से में आरती को जमीन पर धकेल दिया.

आरती को चोट लगने के चलते उठनेबैठने में दिक्कत होने लगी, तो उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां पर ऐक्सरे रिपोर्ट में पता चला कि आरती की कमर की हड्डी में फ्रैक्चर आ गया है.

आरती अस्पताल में महीनेभर भरती रही और उसे पूरी तरह ठीक होने में 6 महीने का समय लग गया. आरती के दादादादी सामाजिक रीतिरिवाजों का वास्ता दे कर उसे खूब समझाते, मगर उस पर इस का कोई असर नहीं पड़ता था. वह तो अपने मनमंदिर में गुलजार के प्यार का दीया जलाए बैठी थी.

एक दिन गुलजार ने आरती को फोन पर कहा, ‘‘आरती, यहां हमारी शादी मुमकिन नहीं है.’’

‘मगर, क्यों गुलजार?’ आरती ने चिंता जाहिर करते हुए पूछा.

‘‘मध्य प्रदेश की सरकार ने एक कानून बनाया है, जिस के तहत शादी के लिए धर्म परिवर्तन करना कानूनन अपराध माना गया है,’’ गुलजार ने आरती को समझाते हुए कहा.

‘मतलब, मुहब्बत भी सरकार से पूछ कर करनी होगी…’ आरती ने नाराजगी के साथ कहा.

‘‘लेकिन आरती, तुम चिंता मत करो. मैं ने इस का भी हल निकाल लिया है,’’ गुलजार बोला.

‘कैसा हल निकाला है? मुझे तो अब डर लगने लगा है,’ आरती बोली.

‘‘हम दोनों भाग कर मुंबई चलते हैं, वहां पर कोर्ट में शादी कर लेंगे. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा, तो वापस जबलपुर आ जाएंगे,’’ गुलजार ने कहा.

एक साल की लंबी जद्दोजेहद में आरती और गुलजार बुरी तरह टूट चुके थे. दोनों यह बात अच्छी तरह समझ चुके थे कि जबलपुर में शादी करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है.

इसी दौरान गुलजार ने एक पत्रिका में मुंबई के यूथ इंडिया ग्रुप के बारे में पढ़ा, तो ग्रुप से जुड़े वकील सुभाष के बारे में जानकारी हुई. उस ने सुन रखा था कि यूथ इंडिया गु्रप इस तरह की शादी कराने में मदद करता है.

उम्मीद की किरण दिखते ही उन दोनों ने मुंबई जाने का प्लान बनाया और एक दिन ट्रेन के जरीए जबलपुर से मुंबई के लिए भाग निकले.

गुलजार और आरती ने मुंबई पहुंच कर यूथ इंडिया ग्रुप के वकील सुभाष को अपनी पूरी कहानी सुनाई.

दोनों की कहानी सुन कर सुभाष ने अपने ग्रुप की एडवाइजर कंचन को उन की मदद करने को कहा.

कंचन की मदद से उन दोनों ने बांद्रा कोर्ट में पहुंच कर शादी कर ली. बाकायदा बीएमसी में शादी का रजिस्ट्रेशन कराया और शादी करने की जानकारी स्पीड पोस्ट के जरीए घर वालों के अलावा अपने शहर के पुलिस थाने में भेज दी गई.

इधर आरती के घर से भाग जाने से उस के घर वालों की अपने इलाके में बदनामी हो रही थी. लिहाजा, घर वालों ने शहर के पुलिस स्टेशन में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

आरती के घर वालों ने एक संगठन हिंदू सेना के जरीए पुलिस पर दबाव बनाना शुरू कर दिया. यह संगठन अपने को धर्म का हिमायती बता कर एक हिंदू लड़की से मुसलिम लड़के की शादी को लव जिहाद का नाम दे कर नए कानून की दुहाई दे रहा था.

प्रेम विवाह की राह कांटों से भरी हुई थी. परेशानियां अभी तक उन का पीछा नहीं छोड़ रही थीं.

आंदोलनकारियों के दबाव में शहर की पुलिस आरती के भाई को ले कर मुंबई पहुंच गई. कागजी कार्यवाही पूरी कर पुलिस दोनों को वापस ले आई.

ट्रेन में सफर के दौरान ही पुलिस आरती के बयान नोट करती रही और आरती का भाई गुलजार को रास्तेभर धमकाता रहा.

शहर के पुलिस स्टेशन पहुंचने पर आंदोलन कर रहे कुछ लोगों के साथ आरती के घर वालों ने भी गुलजार और आरती को खूब डरायाधमकाया, मगर आरती और गुलजार अपनी बात पर कायम रहे.

आरती के भाई ने उन से कोर्टमैरिज से संबंधित सभी कागजात छीन लिए और आरती को अपने घर ले गया.

इधर पुलिस स्टेशन में पुलिस ने गुलजार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया. पुलिस स्टेशन के दारोगा गुलजार से बोले, ‘‘यह इश्कमुहब्बत का चक्कर छोड़ो और आरती को उस के हाल पर छोड़ दो, वरना जेल में सड़ते रहोगे.’’

लेकिन प्यार के रंग में डूबे गुलजार ने दारोगा से साफसाफ कह दिया, ‘‘सर, मैं आरती से बेपनाह मुहब्बत करता हूं. उस से मैं ने शादी भी की है. मैं किसी भी कीमत पर उस से जुदा नहीं हो सकता.’’

दारोगा ने 2 बेंत गुजलार की पीठ पर जमाते हुए कहा, ‘‘जब तुम्हें गांजा रखने के झूठे केस में जेल भेज देंगे, तब तुम्हारी अक्ल ठिकाने आ जाएगी और यह प्यार का भूत भी उतर जाएगा.’’

गुलजार ने जब दारोगा की बात मानने से इनकार कर दिया, तो उसे पुलिस स्टेशन में बुरी तरह से पीटा गया, जिस से वह बेहोश हो गया. बाद में उसे अस्पताल में भरती करा दिया गया.

जब गुलजार की तबीयत ठीक हो गई, तो पुलिस ने इस ताकीद के साथ उसे छोड़ दिया कि वह अब आरती और उस के घर का रुख भूल कर भी न करे.

पुलिस ने जैसे ही आरती को उस के घर वालों को सौंपा, तो उन्होंने आरती को खूब डरायाधमकाया, मगर आरती ने भी बेफिक्र हो कर कह दिया, ‘‘हम दोनों अपनी जान दे देंगे, मगर एकदूसरे के बिना नहीं रह सकते.’’

जब घर वालों को लगा कि आरती उन की बात मानने वाली नहीं है, तो उन्होंने उसे ननिहाल भेज दिया.

आरती का ननिहाल उत्तर प्रदेश के एक गांव में था, जहां पहुंचना इतना आसान नहीं था. ननिहाल में भी उस के मामा आरती पर कड़ी नजर रखते थे. मोबाइल फोन पापा ने पहले ही छीन लिया था. ऐसी सूरत में आरती और गुलजार का हाल बुरा था.

गुलजार को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे और क्या न करे. गुलजार और आरती का इश्क इतने कड़े इम्तिहान ले रहा था, मगर दोनों हार मानने को तैयार नहीं थे.

तकरीबन एक हफ्ते बाद आरती ने मौका मिलते ही मामा के फोन से गुलजार को फोन कर के बताया, ‘‘मुझे यहां पर बंधक बना कर रखा गया है. मौत भी मुझे गले लगाने को तैयार नहीं है. एक दिन फांसी का फंदा लगाने की भी कोशिश की, मगर मामा ने दरवाजा तोड़ कर मुझे बचा लिया.’’

यह सुन कर गुलजार का दिल दहल गया. उस ने आरती को हिम्मत देते हुए कहा, ‘आरती, तुम ने यह कदम उठाने से पहले यह क्यों नहीं सोचा कि मेरा क्या होगा. मैं तुम्हारे बगैर जी नहीं सकता. थोड़ा सब्र करो आरती.’

गुलजार ने एक बार फिर यूथ इंडिया ग्रुप के सुभाष से मदद की गुहार लगाई. सुभाष ने गुलजार के शहर के एक नामी एडवोकेट के जरीए कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हैबियस कोर्पस रिट) लगाने का सुझाव दिया.

हैबियस कोर्पस कानून में ऐसा इंतजाम है, जिस के तहत कोई भी किसी को गैरकानूनी ढंग से बंधक बनाए जाने की शिकायत कर सकता है.

गुलजार की तरफ से वकील ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की. इस के बाद अदालत ने आरती को पेश करने का निर्देश शहर के एसपी को दे दिया. आननफानन ही पुलिस ने आरती के घर वालों को उसे जल्द कोर्ट में पेश करने को कहा.

आखिरकार कोर्ट के आदेश पर आरती को उस के ननिहाल से शहर लाया गया. कोर्ट में पेश होने के पहले की रात आरती ने पुलिस स्टेशन में भी गुलजार के साथ ही रहने की बात कही, मगर पुलिस ने रात होने पर आरती को उस के पापा के दोस्त के घर भेज दिया.

वहां पर भी आरती को फिर से डराधमका कर बयान बदलने के लिए काफी दबाब बनाया गया. दूसरे दिन सुबह आरती को पुलिस की कस्टडी में कोर्ट में पेश किया गया.

‘और्डर… और्डर…’ अदालत की कार्यवाही शुरू की जाए.

जैसे ही गुलजार के कानों में जज की कुरसी पर बैठी मजिस्ट्रेट की आवाज गूंजी, तो वह यादों के सफर से वापस लौट आया.

अदालत में सुनवाई के दौरान सरकारी वकील इस शादी का विरोध कर रहे थे. उन का कहना था कि यह शादी गैरकानूनी है. गुलजार ने आरती को बहलाफुसला कर धर्म परिवर्तन करने पर मजबूर किया है. लिहाजा, आरती को उस के मातापिता को सौंप दिया जाए.

गुलजार के वकील ने अदालत से दरख्वास्त की, ‘‘मी लौर्ड, आरती को अपनी बात कहने की इजाजत दी जाए.’’

‘‘इजाजत है.’’

अदालत का आदेश मिलते ही थोड़ी ही देर में आरती कठघरे में खड़ी हो गई. सब की नजरें उसी पर टिकी हुई थीं.

गुलजार का दिल भी जोरों से धड़क रहा था. उसे डर था कि आरती इस समय उस के घर वालों की कैद में है. ऐसे में वह अपने बयान से मुकर गई, तो उस के सपने शीशे की तरह टूट जाएंगे.

गुलजार इस बात से भी चिंतित था कि मध्य प्रदेश में लव जिहाद से संबंधित कठोर कानून बना है. मध्य प्रदेश देश के उन राज्यों में से एक है, जहां पर धर्म परिवर्तन को ले कर कानून बनाया गया है, जिस के मुताबिक शादी और किसी दूसरे कपट से भरे तरीके से किए गए धर्मांतरण के मामले में 10 साल की कैद और एक लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है.

आरती ने अपने दिल को मजबूत करते हुए अदालत को बताया, ‘‘मैं अब 21 साल की हूं और मैं ने गुलजार से अपनी मरजी से शादी कर इसलाम धर्म कबूल किया है. मुझे कभी भी धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर नहीं किया गया. मैं ने जो भी कदम उठाया है, वह अपनी मरजी से उठाया है.

‘‘मेरे घर वाले मुझे जबरदस्ती ननिहाल ले गए थे. वहां मुझे सताया गया और बंधक बना कर रखा गया. मैं पूरे होशोहवास में आप के सामने कह रही हूं. मैं गुलजार के साथ ही रहूंगी.’’

मजिस्ट्रेट ने आरती की बात को ध्यान से सुना और कुछ देर बाद कोर्ट ने कहा, ‘‘आरती ने अपने बयान में साफ कर दिया है कि उस ने याचिका लगाने वाले से शादी की थी और वह हर हाल में उस के साथ रहना चाहती है. उस की उम्र को ले कर भी किसी तरह का कोई विवाद नहीं है. अंतर्धार्मिक जोड़े को विवाह या लिवइन रिलेशनशिप में रहने का हक है.’’

मजिस्ट्रेट ने आरती और गुलजार को एकसाथ रहने का अपना फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘पुलिस इस जोड़े को प्रोटैक्शन दे और घरपरिवार के लोग भी उन के इस फैसले का सम्मान करें.’’

अदालत का फैसला आते ही गुलजार की आंखें खुशी से नम हो गईं. उस ने अपने हाथ ऊपर उठाते हुए अदालत का शुक्रिया अदा किया.

समाज ने जिस प्रेमी जोड़े को दरदर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया था, अदालत के इस फैसले ने साबित कर दिया कि प्यारमुहब्बत में धर्म की दीवार बाधक नहीं बन सकती.

इस फैसले के बाद जैसे ही आरती गुलजार के करीब आई, तो दोनों एकदूसरे के गले लग गए और उन की आंखों से बरबस आंसू निकल आए.

Family Story : नादान

Family Story : गुस्से से बिफरते हुए दारोगा ने दुष्यंत का कौलर कस कर पकड़ते हुए कहा, ‘‘मैं तेरे खिलाफ ऐसा केस बनाऊंगा कि तू इस जन्म में तो जेल से बाहर आने से रहा. तू इनसान है या हैवान… तुझे जरा भी दया नहीं आई अपनी ही बीवी को जलाते हुए… अरे, वह तेरे दुखसुख की साथी थी.’’

इस पर दुष्यंत गिड़गिड़ाता हुआ बोला, ‘‘साहब, मेरा यकीन कीजिए… मैं ने कुछ नहीं किया… उस ने खुद ही यह सब किया है.’’

लेकिन दारोगा रोज ऐसे केस देखता था. लोग कहीं 2 महीने की दुलहन, तो कहीं 4 महीने की दुलहन को दहेज के लिए जला देते थे. हर बार बच्चियों को जला हुआ देख कर उस का खून खौल जाता था. उसे बहुत दुख होता था. उस की भी 2 बेटियां थीं.

सरकारी अस्पताल के आईसीयू रूम के बाहर खड़े लोगों को लगातार अंदर से चीखने की आवाज आ रही थी, जो काफी दर्दभरी थी. कमजोर दिल के लोग सुनते तो घबरा ही जाते.

अंदर दुष्यंत की पत्नी दीपा, जो जल चुकी थी, की पट्टियां बदली जा रही थीं, जो काफी दर्दनाक काम था. अकसर पट्टी के साथ चमड़ी भी उखड़ने लगती, जिस से पीड़ा होती थी, लेकिन इंफैक्शन से बचाने के लिए पट्टी बदलना और दवा लगाना भी जरूरी था.

सभी के चेहरे दुखी और मन बेचैन थे. दारोगा बयान लेने के लिए आया था, लेकिन पीडि़ता इस हालत में नहीं थी कि अभी बयान दे सके. वह चाहता था कि जल्द से जल्द बयान ले ले, ताकि कोई उस के बयान को प्रभावित न कर सके, लेकिन दर्द और जलन से परेशान वह बयान देने की हालत में नहीं थी. आखिर कितनी देर तक दारोगा इंतजार करता, वह चला गया.

दुष्यंत अपनी पत्नी दीपा के साथ हुई घटना को ले कर परेशान था और अब दारोगा की बातों ने उस को खुद अपने भविष्य को ले कर परेशान कर दिया था. वह जानता था कि अगर दीपा को कुछ हो गया, तो उसे जेल जाने से कोई भी नहीं बचा सकता.

गलती किस की है और किस की नहीं, इस के कोई माने नहीं हैं. अब इतनी जल्दी उसे इन सब चीजों से छुटकारा नहीं मिलने वाला है. आखिर वह कहां से लाएगा सुबूत कि उस ने कुछ गलत नहीं किया है.

इधर अस्पताल भले ही सरकारी था, लेकिन फिर भी कदमकदम पर पैसों का खर्च था. सरकारी सुविधा नाम की थी. हर काम के लिए इन लोगों को ‘सुविधा शुल्क’ चाहिए था और वह भी मुंहमांगा. न करने का मतलब यह कि अपने मरीज को ज्यादा तकलीफ देना.

पैसा मिलने पर ही उन के दिल भी पसीजते थे, वरना चाहे मरीज दर्द से चीखपुकार कर मर जाए, इन के दिल पत्थर के हो जाते थे.

दुष्यंत को हर चीज से नफरत होने लगी थी. यह बात वह अच्छी तरह से जानता था कि वह एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुका है, जहां से उस का निकलना तकरीबन नामुमकिन है.

रातभर अस्पताल की बैंच पर करवट बदलते और मच्छरों से जूझते हुए दुष्यंत की अपनी तबीयत भी कुछ नासाज हो चुकी थी. उस की सास कमला, जो अस्पताल में उस के साथ ही थीं, अस्पताल के बाहर से कागज के कप में चाय ले कर आई थीं.

पता नहीं क्यों दुष्यंत को अपनी सास कमला पर भी बहुत गुस्सा आ रहा था, लेकिन वह फिर सोच रहा था कि आखिर इस सब में उन की गलती भी क्या है. जो भी किया है, वह दीपा ने किया है.

कमला भी अपनी बेटी के इस कांड से शर्मिंदा थीं. वे जानती थीं कि दुष्यंत कभी भी अपनी पत्नी को जला कर मारने की कोशिश नहीं करेगा, लेकिन वे मां थीं. करें तो क्या करें.

अगले दिन दारोगा फिर दीपा का बयान लेने के लिए आया. दारोगा को देखते ही दुष्यंत का चेहरा उतर जाता था. वह दारोगा की अनापशनाप बातों और बेइज्जती का घूंट चुपचाप पी जाता था. इस के अलावा उस के पास कोई चारा भी नहीं था.

दारोगा सामने वाली बैंच पर ही बैठ कर डाक्टर का इंतजार कर रहा था, ताकि डाक्टर से इजाजत ले कर दीपा का बयान ले सके.

डाक्टर किसी और मरीज के औपरेशन में बिजी थे, तो उन के आने में समय लगना था.

दारोगा कुछ देर तो अपने मोबाइल फोन को चलाता रहा, फिर सामने उस की नजर दुष्यंत पर गई. उस का दीनहीन चेहरा देख कर उस ने अपने मन में गाली दी और सोचने लगा, ‘देखने में कितना शरीफ और मासूम है. क्या ऐसा हो सकता है कि यह अपनी बीवी को जिंदा जलाए?

‘‘लेकिन जब तक इस की बीवी बयान नहीं दे देती, तब तक सच और झूठ का पता नहीं चल सकता. बहुत बार जो मासूम दिखता है, वही असली अपराधी रहता है.’

दारोगा ने दुष्यंत को अपने पास बुलाया और पूछा, ‘‘मुझे सचसच बता, आखिर तू ने ऐसा क्यों किया?’’

दुष्यंत एक फीकी और दर्दभरी हंसी हंसते हुए बोला, ‘‘साहब, जब आप पहले ही मान बैठे हैं कि मैं अपराधी हूं, तो मेरे कहने और नहीं कहने से क्या फर्क पड़ जाएगा…

‘‘लेकिन, यह सच है कि मैं ने कुछ नहीं किया और मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि दीपा अपने साथ ऐसा कर लेगी, वरना हम दोनों में झगड़ा होने के बाद मैं इसे छोड़ कर बाहर नहीं जाता. मैं तो झगड़ा टालने के लिए इसे छोड़ कर गया था,’’ इतना कहतेकहते वह रोने लगा.

दारोगा भी आखिर इनसान था. वह जानता था कि मर्द की जिंदगी में बहुत सी बातें ऐसी होती हैं, जो वह किसी से नहीं बता पाता है और दुख अपने अंदर ही पाले रहता है.

‘‘आखिर कोई तो वजह रही होगी, जो तेरी बीवी ने आग लगा ली?’’ दारोगा का सवाल बदल गया.

बैंच पर बैठे दुष्यंत ने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया और जैसे हार मान कर बोला, ‘‘सब से बड़ी वजह मेरी गरीबी है… अगर मेरे पास पैसा होता या कोई बड़ी नौकरी होती, तो मैं यह नौबत ही नहीं आने देता.

‘‘मैं गुजरात में हीरा छिलाई कारखाने में काम करता हूं. रातदिन डबल ड्यूटी करने पर घरखर्च भेजने के बाद कुछ पैसों का जुगाड़ कर लिया था, ताकि यहां पर आ कर कोई छोटीमोटी दुकान खोल कर हमेशा के लिए यहीं बस जाऊं, क्योंकि इतने बड़े शहर में रहना मुमकिन नहीं है.

‘‘वहां खर्च बहुत ज्यादा है, उस के मुकाबले कमाई कम है. इतना हाड़ तोड़ने के बाद जब मैं ने कुछ पैसा बचाया था, तो दीपा को लग रहा था कि वहां पर बहुत कमाई है, तो हम दोनों को वहीं पर चल कर रहना चाहिए.

‘‘बताओ साहब, मैं तो शेयरिंग रूम में रहता हूं. कभीकभी फैक्टरी में ही सो जाता हूं. मैं औरत जात को कहां रखता? वहां पर तो आलम यह है कि अगर रूम में 2 लोग सोते हैं, तो 2 लोगों को बाहर रहना पड़ता है, क्योंकि रूम बहुत छोटा है.

‘‘दीपा की जिद थी कि हम दोनों गुजरात चलेंगे और मेरी जिद थी कि यहीं पर एक छोटीमोटी दुकान खोल कर चैन से जिएंगे. हमारा इसी बात को ले कर झगड़ा हुआ था.

‘‘हां, मैं ने उसे डांटा था, लेकिन मैं कहां गलत था? वह मेरी मजबूरियां समझने को तैयार ही नहीं थी. आखिर मैं जब तक जवान हूं, तब तक डबल ड्यूटी कर लूंगा और उस के बाद जब शरीर साथ नहीं देगा, तब क्या करूंगा?

‘‘मांबाप हैं नहीं कि घर से कोई बड़ा सहारा मिलेगा. आप ने मेरा टूटाफूटा घर तो देखा ही है. ससुराल वाले भी पैसे से इतने मजबूत नहीं हैं कि वहां से कुछ मदद मिल जाए.

‘‘साहब, गरीबी बहुत बड़ी बीमारी है. हर कदम पर परेशानी और बेइज्जती झेलनी पड़ती है. कहा जाता है कि मर्द औरत पर जुल्म करता है, लेकिन मर्द कितने जुल्म खुद सहता है, यह कोई नहीं जानता है,’’ कहने के साथसाथ दुष्यंत फफकफफक कर रोने लगा.

दारोगा को दुष्यंत के साथ हमदर्दी होने लगी, लेकिन उसे तो अपनी ड्यूटी करनी ही थी. पहले के बजाय अब उस की बोली में कुछ नरमी थी, क्योंकि कहीं न कहीं उस का मन कह रहा था कि दुष्यंत गुनाहगार नहीं है, लेकिन दीपा के बयान से ही सबकुछ साफ हो पाएगा.

उस दिन भी दीपा इस हालत में नहीं थी कि वह बयान दे सके, इसलिए दारोगा को खाली हाथ ही जाना पड़ा.

इधर अस्पताल का खर्च बढ़ता ही जा रहा था. दुष्यंत के पास अपनी देह के सिवा अब कुछ नहीं बचा था. जितनी भी जमापूंजी थी, सब खर्च हो चुकी थी, लेकिन दीपा की हालत अब पहले से बेहतर थी.

जलने वाले दिन तो दुष्यंत दीपा को ध्यान से देख भी नहीं पाया था, लेकिन चौथे दिन अब उस की हालत थोड़ी ठीक थी. पट्टियां बदलते समय पहली दफा दीपा को देख कर दुष्यंत डर गया, क्योंकि उस के बाल सारे जल चुके थे. छाती और बाजू का हिस्सा भी थोड़ाबहुत जल चुका था. दीपा काफी भयानक लग रही थी.

दुष्यंत सिहर गया. वह तुरंत कमरे से बाहर निकल गया और जा कर रोने लगा. सास कमला दूर से सब देख
रही थीं. उन की अनुभवी आंखें सारी बातों को महसूस कर रही थीं, लेकिन वे बेबस थीं.

दुष्यंत अब अस्पताल वालों को ‘सुविधा शुल्क’ देने की हालत में नहीं था. लिहाजा, बहुत सारे काम तो अस्पताल के स्टाफ वाले नहीं करते थे. बहुत मुश्किल से जीहुजूरी करने पर एकाध नर्स आती थी, लेकिन दुष्यंत को मदद के लिए साथ में रहना पड़ता था.

खैर, 5वें दिन दारोगा बयान लेने के लिए आया. दीपा ने वही सबकुछ बताया, जो दुष्यंत कह रहा था. दारोगा को पहले ही अंदाजा हो गया था कि इस औरत ने तुनकमिजाजी में अपना घर और खुद को फूंक लिया है और अपनी जिंदगी नरक बना ली है, लेकिन उसे तो अपनी ड्यूटी करनी ही थी. वह ज्यादा कुछ नहीं कर सकता था, लेकिन ऐसे लोगों का परिवार उजड़ते और बिखरते देख कर उसे दुख भी होता था.

लेकिन दारोगा को इस बात की खुशी थी कि कम से कम दुष्यंत तो बेकुसूर है, क्योंकि वह जानता था कि एक बार किसी को अपराध में लंबी सजा हो जाने के बाद जवानी तो जेल में ही कट जाती है और बुढ़ापा बाहर घिसटने के लिए बच जाता है, लेकिन अच्छा हुआ कि दुष्यंत के साथ ऐसा कुछ नहीं होगा.

फिर भी बयान लेने के बाद दारोगा दीपा से यह कहना नहीं भूला, ‘‘तुम ने अपनी थोड़ी सी नादानी में अपने घर को आग लगा दी और अपनी जिंदगी को भी तुम ने ऐसा कर लिया. न तुम पहले जैसी जिंदगी जी पाओगी और न ही अब पति का पहले जितना प्यार ही पा सकोगी, क्योंकि तुम ने उसे तन, मन और धन तीनों से तोड़ दिया है.

‘‘तुम्हारा इलाज कराने में उस ने अपनी सारी जमापूंजी गंवा दी है. सोचो कि तुनकमिजाजी में तुम ने क्याक्या खो दिया है… वह तो तुम्हारे सुख के लिए ही तुम से लड़ रहा था…

‘‘तुम ने अपने शरीर को ही नहीं जलाया है, बल्कि अपनी खुशियों के साथसाथ अपने पति की जिंदगीभर की कमाई, उस की खुशियां, उस की जिंदगी में भी आग लगा दी है… कोशिश करना कि आगे सब ठीक रहे.’’

इतना कहने के बाद दारोगा ने दुष्यंत के पास जा कर उस के कंधे पर अपना हाथ रखा और बोला, ‘‘कई बार हमें उन लोगों के साथ भी कठोर होना पड़ता है, जो बेकुसूर होते हैं.’’

दीपा फफक कर रोने लगी और बोली, ‘‘आप सही कह रहे हैं. मैं ने अपनी जिंदगी को नरक बना लिया है और खुद तो जली ही, अपनी खुशियां भी जला डाली हैं.’’

उधर कमरे में खड़ा दुष्यंत भी रो रहा था. अब पतिपत्नी के बीच कोई भी झगड़ा नहीं था. कुछ बचा ही नहीं था, जिस पर झगड़ा किया जा सके. सारी खुशियां, सारे सपने उस आग में झुलस कर रह गए थे और उस के भद्दे निशान दीपा के पूरे शरीर पर थे.

लेखिका – रेखा शाह

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