उजली परछाइयां- भाग 2: क्या अंबर और धरा का मिलन हुआ?

मन साफ सच्चा हो तो सूरत को भी हसीन बना देता है. धरा के चेहरे की खूबसूरती में गजब का आकर्षण था. अभी 23 वर्ष की पिछले महीने ही तो हुई थी. दूसरी ओर धरा जबजब अंबर को देखती तो सोचती थी कि कितना प्यार करता है अपनी बीवी को. काश, मुझे भी ऐसा ही कोई मिले. तलाक की बात सुन कर पहली बार अंबर को रोते देखा था धरा ने और उस के शब्द कानों में अब तक गूंज रहे थे कि ‘मर जाऊंगा लेकिन तलाक नहीं दूंगा. मैं नहीं रह सकता उस के बिना.’

अंबर की गहरी भूरी आंखों में दर्द भरा रहता था. 30 की उम्र हो गई थी लेकिन पर्सनैलिटी उस की ऐसी थी कि देखने वाला प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था. धरा समझ नहीं पाती थी कि रोशनी को अंबर में ऐसी क्या कमी नजर आई थी जो उसे छोड़ गई.

जुलाई में धरा की दीदी देहरादून घूमने आई थी और उस की खूब खातिर की गई. देहरादून का मौसम खुशगवार था. इसलिए घूमनेफिरने का अलग मजा था. अंबर भी उसे पूछ कर ही सारे प्रोग्राम बना रहा था. प्राकृतिक सौंदर्य के लिए मसूरी, सहस्रधारा, चकराता, लाखामंडल तथा डाकपत्थर देखने का प्रोग्राम अंबर ने झटपट बना डाला. अंबर का किसी और को इंपौर्टेंस देते देख न जाने क्यों धरा के मन में जलन हुई और उसे पहली बार एहसास हुआ कि अनजाने में ही वह अंबर को चाहने लगी है. लेकिन क्यों, कब, कैसे, इस की वजह वह खुद नहीं जानती थी. इस की वजह शायद अंबर का इतना प्यारा इंसान होना था या फिर शायद इतनी गहराई से अपनी बीवी के लिए प्यार था कि धरा खुद उस के प्यार में पड़ गई थी.

धरा के दिल में अंबर ने अनजाने में जगह बना ली थी वहीं धरा जिस तरह सब का खयाल रखती और खुश रहती, वह अंबर के घर वालों को अपना बना रही थी. उस की ये आदतें सब के साथ अंबर को भी उस की तरफ खींच रही थीं. जब कोई चीज हमारे पास न हो तो उस की कमी ज्यादा ही लगती है, घर में भी सब को धरा को देख कर बहू की कमी कुछ ज्यादा ही अखरने लगी थी.

अंबर अकसर धरा को तंग करता रहता, कभी उलझे हुए बालों को खींचता तो कभी गालों पर हलकी चपत लगा देता. दोनों के दिलों में अनकही मोहब्बत जन्म ले चुकी थी जिस का एहसास उन्हें जल्दी ही हुआ. एक दिन धरा ने अंबर को छेड़ते हुए कहा, ‘मुझे तंग क्यों करते रहते हो, सब के लिए आप के दिल में प्यार है, फिर मुझ से ही क्या झगड़ा है?’ इस पर अंबर की मां ने जवाब दिया, ‘वह इसलिए गुस्सा करता है कि तू हमें पहले क्यों नहीं मिली.’ इन चंद शब्दों ने सब के दिलों का हाल बयां कर दिया था.

वह अचानक यह सुन कर बाहर भाग गई थी, बाहर बालकनी में रेलिंग पकड़ कर खड़ी थी. सांसें ऊपरनीचे हो रही थीं. अंबर ने पास आ कर कहा, ‘मैं ने और मेरे घर वालों ने तुम्हारी जैसी पत्नी और बहू का सपना देखा था.’ अंबर ने आगे कहा, ‘पता नहीं कब से, लेकिन मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं. हां, मगर मैं तुम से शादी नहीं कर सकता क्योंकि अगर मैं ने ऐसा किया तो अपने बेटे को हमेशा के लिए खो सकता हूं.’

धरा का सुर्ख होता चेहरा सफेद पड़ गया था. उस ने नजरें उठा कर अंबर को देखा, तो अंबर की आंखों में आंसू थे, ‘मेरे पास जीने की वजह सिर्फ यह है कि कभी मेरा बेटा मुझे मिलेगा. मैं तुम से शादी नहीं कर सकता लेकिन अपना बुढ़ापा जरूर सिर्फ तुहारे साथ बिताना चाहूंगा. सुबहसुबह तुम्हारे हाथ की चाय पिया करूंगा,’ उस वक्त दोनों की सांसें महसूस कर सकती थी धरा जब अंबर ने ये शब्द कहे थे जिन्होंने एक पल में ही उस को आसमान पर ले जा कर वापस नीचे धरातल पर पटक दिया था.

एक पल को धरा को लगा यह कैसा प्यार है और कैसी बेतुकी बात कही है अंबर ने, लेकिन दूसरे ही पल उसे भविष्य में अंबर में एक हारा और टूटा हुआ पिता नजर आया जिस का बेटा उसे कह रहा था कि तुम ने दूसरी शादी के लिए मुझे और मेरी मां को छोड़ा. शायद सही भी थी अंबर की बात. 4 साल का बच्चा जब मां के साथ रहता है तो वह उतना ही सच समझेगा जितना उसे बताया जाएगा.

जिस से प्यार करती है उसे अपनी वजह से ही टूटा हुआ कैसे देखती धरा. अगर अंबर बेटे के लिए उस का इंतजार कर सकता है तो धरा भी तो अंबर का इंतजार कर सकती है. फिर अंबर मान भी जाता लेकिन अपने ही घर वालों को मनाना भी तो धरा के लिए आसान नहीं था.

अंबर का हाथ पकड़ कर धरा बोली, ‘अगर सच में हमारे बीच प्यार है तो एक दिन हम जरूर मिलेंगे. मैं इंतजार करूंगी उस दिन का जब सबकुछ सही होगा और रही शादी की बात, तो राधाकृष्णा की भी शादी नहीं हुई थी लेकिन आज भी उन का नाम साथ ही लिया जाता है.’

लेकिन शर्तें तो दिमाग लगाता है, दिल नहीं और सब हालात को जानतेसमझते भी उन दोनों के तनमन भी दूर नहीं रह सके. शादी की बात तो दोबारा नहीं हुई, लेकिन दोनों के ही घर वालों को उन के बीच पनपे रिश्ते का अंदाजा हो गया था. ऐसे ही साथ रहते 2 साल निकल गए थे. अब भी अंबर अपने बेटे किट्टू से बात करने को तरसता था. सबकुछ वैसा ही चल रहा था.

धरा ने जौब जौइन कर ली और एक फ्रैंड की शादी में गई थी. वहां से आ कर एक बार फिर उस के दिल में अंबर से शादी करने की चाहत करवट लेने लगी. बहुत मुश्किल था उस का अंबर के इतने पास होते हुए भी दूर होना और इसीलिए उस का प्यार और उस की छुअन को अपने एहसासों में बसा कर धरा देहरादून छोड़ मुंबई आ गई थी. अब एक ही धुन थी उसे, टीवी इंडस्ट्री में नाम की और बहुत सारे पैसे कमाने की जिस से शादी न सही कम से कम सफल हो कर अपने घर वालों के प्रति कर्तव्य निभा सके.

जुम्मन और अलगू का बदला – भाग 2

ठाकुर जिगलान को अपनी सेहत और मूंछों को चुस्तदुरुस्त रखने के अलावा महंगी गाडि़यों का भी शौक था. उस के गैराज में कई महंगी गाडि़यां खड़ी थीं, जिन की देखभाल में 2-4 आदमी हमेशा लगे रहते थे.

गांव में एक फजलू ढोलक वाला रहता था. उसे सब ‘चाचा’ कहते थे. 55 साल का फजलू ढोलक बजाने में माहिर था. हालांकि गांव में डीजे का चलन तो पौपुलर हो रहा था, पर छोटे मौकों पर लोग फजलू को ही बुलवा लेते थे. जो आता, ढोलक बजाता और नजराना ले कर चला जाता. उस की ढोलक की थाप में ऐसी गमक थी कि छोटे बच्चे और किशोर लड़के अपनेआप झूमने लगते.

फजलू ने अपनी ढोलक आज धूप में सूखने को रखी थी, ताकि उस की थाप में कुछ और आवाज बढ़ कर आ सके.

कच्चे रास्ते के किनारे 2 बांसों को गाड़ कर उस के बीच में अपनी ढोलक को फजलू ने सूखने के लिए लटका दिया था कि इतने में ठाकुर जिगलान अपनी गाड़ी चलाता हुआ वहां से निकला. सामने ढोलक सूखती देख कर उस ने अचानक से ब्रेक लगा दिए और अपने एक चमचे को ढोलक उतार कर नीचे रखने को कहा.

चमचा जैसे सबकुछ समझ गया. उस ने ढोलक उतार कर सामने रास्ते पर रख दी. फजलू की नजरें इस सारे कांड को देख तो रही थीं और उस की जबान डर के मारे हिल नहीं सकी. वह कुछ न बोल सका और जिगलान ने अपनी गाड़ी उस ढोलक पर चढ़ा दी.

‘भाड़’ की आवाज के साथ ढोलक चूरचूर हो गई थी. अपनी कमाई के एकमात्र जरीए को इस तरह फूटता देख कर फजलू फफक पड़ा था. ठाकुर जिगलान ने कुटिल मुसकराहट के साथ गाड़ी आगे बढ़ा दी.

ठाकुर जिगलान को यही सब करने में मजा था. इस तरह से कभी वह गुड्डू कुम्हार के बरतन भी फोड़ देता, जो उस ने चाक से बना कर सूखने को रखे होते, तो कभी दूध दुहते रमुआ के पास गाड़ी ले जा कर जोर का हौर्न बजा देता, तो भैंस दूध दुहना छोड़ देती. लोगों को परेशान देख कर ठाकुर जिगलान को मजा आता था.

जुम्मन को गांव में वापस आए 3 महीने से ज्यादा हो गया था और अब उस ने सड़क के किनारे अपनी एक छोटी सी दुकान भी खोल ली थी और दुकान के बाहर मोटरसाइकिल और कार के कुछ पुराने टायरट्यूब सजा कर रख दिए थे, ताकि आनेजाने वालों को पता चल सके कि यह मेकैनिक की दुकान है.

धीरेधीरे दुकान चलने लगी, तो जुम्मन का आत्मविश्वास भी बढ़ने लगा था और अब वह रन्नो से रोज शाम को एक तय जगह पर मिलने भी जाता था और वहां पर रन्नो के साथ सलमा भी आती थी, सो अलगू को तो आना ही था.

वे चारों एकदूसरे से छिपछिप कर मिलते, तो प्यारमुहब्बत की बातें करते. एकदूसरे की उंगलियों को छू कर ही उन्हें अपने जोबन का असीम सुख हासिल हो जाता.

जुम्मन और अलगू दोनों अपना घर तो बसाना चाहते थे, पर दोनों के सामने धर्म और जाति की समस्या सामने आ रही थी और दोनों जोड़े जानते थे कि दूसरे धर्म में शादी कर पाना इतना आसान नहीं होगा, पर वे सब अपने दिल के हाथों मजबूर थे.

ठाकुर जिगलान के चमचों के कानों तक यह खबर पहुंच चुकी थी कि शहर से आया हुआ जुम्मन एक हिंदू लकड़ी रन्नो से शादी करना चाहता है और उस का दोस्त अलगू मुसलिम धर्म की लड़की सलमा से शादी करना चाहता है और अब तो जुम्मन ने घर जा कर लड़की के मांबाप से बात भी कर ली है और उस के घर वाले भी राजी हैं.

‘‘हमारी नाक के नीचे यह प्यारमुहब्बत का खेला चल रहा है और हमें ही नहीं मालूम…’’ ठाकुर जिगलान गरज उठा था.

औरतखोर ठाकुर जिगलान के अहंकार को अंदर तक चोट पहुंची थी. उस ने तुरंत ही अपने गुरगों को आदेश दिया कि रन्नो और सलमा को अगवा कर उस के नहर वाले बंगले में लाया जाए.

ठाकुर जिगलान के इरादे खतरनाक नजर आ रहे थे. एक गुरगा थोड़ा झिझक कर बोला, ‘‘साहब, अगर इन दोनों को एकएक कर के उठाएंगे, तो गांव में हल्ला हो जाएगा और यह जो जुम्मन है न, यह थोड़ा इंटरनैट वगैरह चलाता है, इसलिए थोड़ा ठंडा कर के खाइए मालिक.’’

ठाकुर जिगलान पहले तो भड़का, पर इंटरनैट का नाम सुन कर और कुछ सोच कर चुप हो गया. उस के चमचे ने उसे बताया कि 2 दिन के बाद पड़ोस वाले गांव में मेला लगेगा और रन्नो और सलमा जरूर उस मेले में जुम्मन और अलगू से मिलने की गरज से जाएंगी. बस, वहां से दोनों को अगवा कर के आप के सामने पेश कर देंगे.

‘‘हां, फिर एक ही रात में 2 अलगअलग जात के माल का मजा मारेंगे हम,’’ ठाकुर जिगलान हवस भरी आवाज में बोल रहा था.

जब तक हमारे खुद के साथ कुछ बुरा नहीं होता, तब तक हमें यही लगता है कि हमारे साथ तो बुरा हो ही नहीं सकता और यही इस गांव के सारे लोग सोचा करते थे.

बुरा तो हो ही गया, जब मेले में जा रही रन्नो और सलमा को अगवा कर नहर वाले बंगले के एक कमरे में बंद कर दिया गया, जहां पर दारू के नशे में चूर ठाकुर जिगलान ने दोनों का रेप किया. एक बार नहीं कई बार किया.

उस के बाद ठाकुर जिगलान के गुरगों ने भी अपना मुंह काला किया और पौ फटने से पहले उन लड़कियों को वापस उन के घर के बाहर डाल गए.

हर बार की तरह ही दोनों लड़कियों की मां ने ज्यादा शोर नहीं मचाने को कहा. कमोबेश दोनों घरों से एकजैसे विचार निकल रहे थे. भले ही दोनों परिवारों में धर्मजाति की खाई थी, पर मुसीबत के समय दोनों परिवारों के रुदन का स्वर एकजैसा ही था.

रन्नो और सलमा के परिवार वालों ने बात दबाने की बहुत कोशिश की, पर ऐसी बातें भला कहां छिपती हैं. गांव के लोगों से होते हुए यह बात जुम्मन और अलगू तक भी पहुंची, तो वे दोनों गुस्से से पागल हो गए.

जुम्मन तो ठाकुर जिगलान को जिंदा नहीं छोड़ना चाहता था, पर जुम्मन ने उसे धीरज रखने को कहा और यह भी कहा, ‘‘हमें बदला प्लानिंग से लेना होगा और ऐसे में अगर जिगलान को मार भी देंगे तो क्या… उस के गुरगे बदले में हमें मार देंगे… फिर रन्नो और सलमा का क्या होगा? उन से तो कोई शादी भी नहीं करेगा.’’

रन्नो का नाम आने पर जुम्मन थोड़ा शांत हुआ.

जुम्मन और अलगू दोनों बदला लेना तो चाह रहे थे और यह भी सोच रहे थे कि बदला ऐसे लिया जाए कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

जब से ठाकुर जिगलान ने रन्नो और सलमा की अस्मत लूटी थी, तब से उस के चेहरे पर तृप्ति का भाव बना रहता था. आज उसे शहर जाना था. उस के ड्राइवर ने उस की पसंदीदा कार को साफ कर के खड़ा किया था.

ठाकुर जिगलान बड़ी ऐंठ में आया और उस में बैठ गया. उस की कार शहर की तरफ चल दी.

जुम्मन ने सड़क से ठाकुर जिगलान को जाते देखा, तो अलगू को मोबाइल पर फोन लगाया, ‘‘थोड़ी देर में जिगलान की गाड़ी का ऐक्सीडैंट होने वाला है.’’

अंधविश्वास की बलिवेदी पर : भाग 2- रूपल क्या बचा पाई इज्जत

पर अभी जो रूपल के साथ हो रहा था, वह तो और भी बुरा था. पिछले कुछ वक्त से उस ने महसूस किया था कि आश्रम के काम के बहाने उसे गुरुजी के साथ जानबूझ कर अकेले छोड़ा जाता है.

रूपल छोटी जरूर थी, पर इतनी भी नहीं कि अपने शरीर पर रेंगते उन हाथों की बदनीयती पहचान न सके. वैसे भी उस ने गुरुदेव को अपने खास कमरे में आश्रम की एक दूसरी सेवादारिन के साथ जिन कपड़ों और हालात में देखा था, वे उसे बहुत गलत लगे थे. गुरुदेव के प्रति उस की भक्ति और आस्था उसी वक्त चूर हो चुकी थी.

मगर उस ने यह बात जब मामी को बताई तो उन्होंने इसे नजर का धोखा कह कर बात वहीं खत्म करने को कह दिया था. तब से रूपल के मन में एक दहशत सी समा गई थी. वह बिना मामी के उस आश्रम में पैर भी नहीं रखना चाहती थी. सपने में भी वह बाबा अपनी आंखों में लाल डोरे लिए अट्टहास लगाता उस की ओर बढ़ता चला आता और नींद में ही डर से कांपते हुए रूपल की चीख निकल जाती. पर मामी का गुस्सा उसे वहां जाने पर मजबूर कर देता.

‘आखिर इस हालत में कब तक मैं बची रह सकती हूं. काश, मैं मां को बता सकती. वे आ कर मुझे यहां से ले जातीं…’ रूपल का दर्द आंखों से बह निकला.

‘‘बहरी हो गई क्या. कुकर सीटी पर सीटी दिए जा रहा?है, तुझे सुनाई नहीं देता?’’ अचानक मामी के चिल्लाने पर रूपल ने गालों पर ढुलक आए आंसू आहिस्ता से पोंछ डाले, ‘‘जी मामी, यहीं हूं,’’ कह कर उस ने गैस पर से कुकर उतारा.

‘‘सुन, आज गुरुजी का बुलावा है. सब काम निबटा कर वहां चली जाना,’’ सुबह मामा के औफिस जाते ही मामी ने रूपल को फरमान सुनाया.

‘‘मामीजी, एक बात कहनी थी आप से…’’ थोड़ा डरते हुए रूपल के मुंह से निकला, ‘‘दरअसल, मैं उन बाबा के पास नहीं जाना चाहती. वह मुझे अकेले में बुला कर यहांवहां छूने की कोशिश करता है. मुझे बहुत घिन आती है.’’

‘‘पागल हुई है लड़की… इतने बड़े महात्मा पर इतना घिनौना इलजाम लगाते हुए तुझे शर्म नहीं आती. उस दिन भी तू उन के बारे में अनापशनाप बके जा रही थी. तू बखूबी जानती भी है कि वे कितने चमत्कारी हैं.’’

‘‘मामीजी, मैं आप से सच कह रही हूं. प्लीज, आप मुझ से कोई भी काम करा लो लेकिन उन के पास मत भेजो,’’ रूपल की आंखों में दहशत साफ दिखाई दे रही थी.

‘‘देख रूपल, अगर तुझे यहां रहना है, तो फिर मेरी बात माननी पड़ेगी, नहीं तो तेरी मां को फोन लगाती हूं और तुझे यहां से ले जाने के लिए कहती हूं.’’

‘‘नहीं मामी, मां पहले ही बहुत परेशान हैं, आप उन्हें फोन मत करना. आप जहां कहेंगी मैं चली जाऊंगी,’’ रूपल ने दुखी हो कर हथियार डाल दिए.

यह सुन कर मामी के होंठों पर एक राजभरी मुसकान बिखर गई. पता नहीं पर उस दिन रूपल की मामी भी उस के साथ गुरुजी के आश्रम पहुंचीं. कुछ ही देर में बाबा भक्तों को दर्शन देने वाले थे.

‘‘तू यहीं बैठ, मैं अंदर कुछ जरूरी काम से जा रही हूं,’’ मामी बोलीं.

रूपल को सब से अगली लाइन में बिठा कर मामी ने उसे अपना मोबाइल फोन पकड़ाया.

‘‘बाबा, मैं ने अपना काम पूरा किया. आप को एक कन्या भेंट की है. अब तो मेरी गोदी में नन्हा राजकुमार खेलेगा न?’’ मामी ने बाबा के सामने अपना आंचल फैलाते हुए कहा.

‘‘अभी देवी से प्रभु का मिलन बाकी है. जब तक यह काम नहीं हो जाता, तू कोई उम्मीद लगा कर मत बैठना,’’ बाबा के पास खड़े सेवादार ने जवाब दिया.

‘‘लेकिन, मैं ने तो अपना काम पूरा कर दिया…’’

‘‘हम ने तुझे पहले ही कहा था कि प्रभु और देवी के मिलन में कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए. तुझे उसे खुद तैयार करना होगा. इस काम में प्रभु को जबरदस्ती पसंद नहीं.’’

‘‘ठीक है, कल तक यह काम भी हो जाएगा,’’ मामी ने बाबा के पैरों को छूते हुए कहा. उधर तुरंत ही किसी काम से मामा का फोन आने से मामी के पीछे चल पड़ी रूपल ने जैसे ही ये बातें सुनीं, उस के पैरों तले जमीन सरक गई.

मामी को आते देख रूपल थोड़ी सी आड़ में हो गई. ‘कहां गई थी?’’ उसे अपने पीछे से आते देख मामी हैरान हो उठीं.

‘‘बाथरूम गई थी…’’ रूपल ने धीरे से इशारों में बताया.

रूपल बुरी तरह डर चुकी थी. अपनी मामी का खौफनाक चेहरा उस के सामने आ चुका था. अब तक उसे यही लगता था कि मामी भले ही तेज हैं, पर वे अच्छी हैं और बाबा की सचाई से बेखबर हैं, जिस दिन उन्हें गुरुजी की असलियत पता चलेगी वे उसे कभी आश्रम नहीं भेजेंगी. पर अब खुद उस की आंखों पर पड़ा परदा उठ गया था. उसे मामी की हर चाल अब समझ आ चुकी थी.

शादी के 10 साल तक बेऔलाद होने का दुख उन्होंने इस तरह दूर करने की कोशिश की. गांव में आ कर उन की गरीबी पर तरस खा कर उसे यहां एक साजिश के तहत लाना और बाबा के आश्रम में जबरदस्ती भेजना. इन बातों का मतलब अब वह समझ चुकी थी.

लेकिन अब रूपल क्या करे. उसे अपनी मां की बहुत याद आ रही थी. वह बस हमेशा की तरह उन के आंचल के पीछे छिप जाना चाहती थी.

‘मैं मां से इस बारे में बात करूं क्या… पर मां तो मामी की बातों पर इतना भरोसा करती हैं कि मेरी बात उन्हें झूठी ही लगेगी. और फिर घर के हालात… अगर मां जान भी जाएं तो क्या उस का गांव जाना ठीक होगा. वहां मां अकेली 4-4 जनों का खानाखर्चा कैसे संभालेंगी?’ बेबसी और पीड़ा से उस की आंखें भर आईं.

‘‘रूपल… 2 लिटर दूध ले आना, आज तेरी पसंद की सेवइयां बना दूंगी. तुझे मेरे हाथ की बहुत अच्छी लगती हैं न,’’ बातों में मामी ने उसे भरपूर प्यार परोसा.

खाना खा कर रात को बिस्तर पर लेटी रूपल की आंखों से नींद कोसों दूर थी. मामी ने आज उसे बहुत लाड़ किया था और मांबहनों के सुखद भविष्य का वास्ता दे कर सच्चे भाव से बाबा की हर बात मान कर उन की भक्ति में डूब जाने को कहा था. पर अब वह बाबा की भक्ति में डूब जाने का मतलब अच्छी तरह समझती थी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

जीवन की नई शुरुआत – भाग 2 : कोरोना का साइड इफैक्ट

‘ओय मुन्नी, तू ने फेंका?’ रघु लपका.

‘नहीं तो, फेंका होगा किसी ने,’ एक पत्ता मुंह में दबाते हुए शरारती अंदाज में मुन्नी बोली.

‘देख, झठ मत बोल, मुझे पता है कि तू ने ही फेंका है.’

‘अच्छा, और क्याक्या पता है तुझे?’ कह कर वह पेड़ से नीचे कूद कर भागने लगी कि रघु ने ?ापट कर उस का हाथ पकड़ लिया.

‘छोड़ रघु, कोई देख लेगा,’ अपना हाथ रघु की पकड़ से छुड़ाते हुए मुन्नी बोली.

‘नहीं छोड़ ूगा. पहले यह बता, तू ने मेरे सिर पर पत्ता क्यों फेंका?’ आज रघु को भी शरारत सू?ा थी.

‘हां, फेंका तो, क्या कर लेगा?’ अपने निचले होंठ को दांतों तले दबाते हुए मुन्नी बोली और दौड़ कर अपने घर भाग गई.

दिनभर का थकाहारा रघु मुन्नी को देखते ही उत्साह से भर उठता और मुन्नी भी रघु को देखते बौरा जाती. भूल जाती दिनभर के काम को और अपनी मां की डांट को भी. एकदूसरे को देखते ही दोनों सुकून से भर उठते थे.

18 साल की मुन्नी और 22 साल के रघु के बीच कब और कैसे प्यार पनप गया, उन्हें पता ही नहीं चला. इश्क परवान चढ़ा तो दोनों कहीं अकेले मिलने का रास्ता तलाशने लगे. दोनों बस्ती के बाहर कहीं गुपचुप मिलने लगे. मोहब्बत की कहानी गूंजने लगी, तो बात मुन्नी के मातापिता तक भी पहुंची और मुन्नी के प्रति उन का नजरिया सख्त होने लगा, क्योंकि मुन्नी के लिए तो उन्होंने किसी और को पसंद कर रखा था.

इसी बस्ती के रहने वाले मोहन से मुन्नी के मातापिता उस का ब्याह कर देना चाहते थे और वह मोहन भी तो मुन्नी पर गिद्ध जैसी नजर रखता था. वह तो किसी तरह उसे अपना बना लेना चाहता था और इसलिए वह वक्तबेवक्त मुन्नी के मांबाप की पैसों से मदद करता रहता था.

मोहन रघु से ज्यादा कमाता तो था ही, उस ने यहां अपना 2 कमरे का घर भी बना लिया था. और सब से बड़ी बात कि वह भी नेपाल से ही था, तो और क्या चाहिए था मुन्नी के मांबाप को? मोहन बहुत सालों से यहां रह रहा था तो यहां उस की काफी लोगों से पहचान भी बन गई थी. काफी धाक थी इस बस्ती में उस की. इसलिए तो वह रघु को हमेशा दबाने की कोशिश करता था. मगर रघु कहां किसी से डरने वाला था. अकसर दोनों आपस में भिड़ जाते थे. लेकिन उन की लड़ाई का कारण मुन्नी ही होती थी.

मोहन को जरा भी पसंद नहीं था कि मुन्नी उस रघु से बात भी करे. दोनों को साथ देख कर वह बुरी तरह जलकुढ़ जाता.

मुन्नी के कच्चे अंगूर से गोरे रंग, मैदे की तरह नरम, मुलायम शरीर, बड़ीबड़ी आंखें, पतले लाललाल होंठ और उस के सुनहरे बालों पर जब मोहन की नजर पड़ती, तो वह उसे खा जाने वाली नजरों से घूरता.

मुन्नी भी उस के गलत इरादों से अच्छी तरह वाकिफ थी, तभी तो वह उसे जरा भी नहीं भाता था. उसे देखते ही वह दूर छिटक जाती. और वैसे भी, कहां मुन्नी और कहां वह मोहन, कोई मेल था क्या दोनों का? कालाकलूटा नाटाभुट्टा वह मोहन मुन्नी से कम से कम 14-15 साल बड़ा था. उस की पत्नी प्रसव के समय सालभर पहले ही चल बसी थी. एक छोटा बेटा है, उस से बड़ी 5 साल की एक बेटी भी है, जो दादी के पास रहती है. वही दोनों बच्चों की अब मां है.

वैसे भी पीनेखाने वाले मोहन की पत्नी मरी या उस ने खुद ही उसे मार दिया, क्या पता? क्योंकि आएदिन तो वह अपनी पत्नी को मारतापीटता ही रहता था. खूंखार है एक नंबर का. अब जाने सचाई क्या है, मगर मुन्नी को वह फूटी आंख नहीं सुहाता था.

उसे देखते ही मुन्नी को घिन आने लगती थी. मगर उस के मांबाप जाने उस में क्या देख रहे थे, जो अपनी बेटी की शादी उस से करने को आतुर थे. शायद पैसा, जो उस ने अच्छाखासा कमा कर रखा हुआ था.

लेकिन मुन्नी का प्यार तो रघु था. उस के साथ ही वह अपने आगे के जीवन का सपना देख रही थी और उधर रघु भी जितनी जल्दी हो सके उसे अपनी दुलहन बनाने को व्याकुल था. अपनी मां से भी उस ने मुन्नी के बारे में बात कर ली थी. मोबाइल से उस का फोटो भी भेजा था, जो उस की मां को बहुत पसंद आया था. कई बार फोन के जरिए मुन्नी से उन की बात भी हुई थी और अपने बेटे के लिए मुन्नी उन्हें एकदम सही लगी थी.

एक शाम मुन्नी की कोमलकोमल उंगलियों को अपनी उंगलियों के बीच फंसाते हुए रघु बोला था, ‘मुन्नी, छोड़ दे न लोगों के घरों में काम करना. मु?ो अच्छा नहीं लगता.’

‘छोड़ दूंगी, ब्याह कर ले जा मु?ो,’ मुन्नी ने कहा था.

‘हां, ब्याह कर ले जाऊंगा एक दिन. और देखना, रानी बना कर रखूंगा तुम्हें. मेरा बस चले न मुन्नी, तो मैं आकाश की दहलीज पर बना सात रंगों की इंद्रधनुषी अल्पना से सजा तेरे लिए महल खड़ा कर दूं,’ कह कर मुसकराते हुए रघु ने मुन्नी के गालों को चूम लिया था. लेकिन उन के बीच तो जातपांत और पैसों की दीवार आ खड़ी हुई थी. तभी तो मुन्नी के घर से बाहर निकलने पर पहरे गहराने लगे थे. जब वह घर से बाहर जाती तो किसी को साथ लगा दिया जाता था, ताकि वह रघु से मिल न सके, उस से बात न कर सके. लेकिन हवा और प्यार को भी कभी कोई रोक पाया है? किसी न किसी वजह से दोनों मिल ही लेते.

इधर मुन्नी के मांबाप जितनी जल्दी हो सके अपनी बेटी का ब्याह उस मोहन से कर देना चाहते थे. वह मोहन तो वैसे भी शादी के लिए उतावला हो रहा था. उसे तो लग रहा था शादी कल हो, तो आज ही

हो जाए.

इधर रघु जल्द से जल्द बहुत ज्यादा पैसे कमा लेना चाहता था, ताकि मुन्नी के मांबाप से उस का हाथ मांग सके. और इस के लिए वह दिनरात मेहनत भी कर रहा था. दिन में वह मिस्त्री का काम करता, तो रात में होटल में जा कर प्लेंटें धोता था.

लेकिन अचानक से कोरोना ने ऐसी तबाही मचाई कि रघु का कामधंधा सब छूट गया. कुछ दिन रखेधरे पैसे से काम चलता रहा. इस बीच, वह काम भी तलाशता रहा, लेकिन सब बेकार. अब तो दानेदाने को मुहताज होने लगा वह. कर्जा भी कितना लेता भला. भाड़ा न भरने के कारण मकानमालिक ने भी कोठरी से निकल जाने का हुक्म सुना दिया.

इधर, उस मोहन का मुन्नी के घर आनाजाना कुछ ज्यादा ही बढ़ने लग गया, जिसे मुन्नी चाह कर भी रोक नहीं पा रही थी. आ कर ऐसे पसर जाता खटिया पर, जैसे इस घर का जमाई बन ही गया हो. चिढ़ उठती मुन्नी, पर कुछ कर नहीं सकती थी. लेकिन मन तो करता मुंह नोच ले उस मोहन के बच्चे का या दोचार गुंडों से इतना पिटवा दे कि महीनाभर बिछावन पर से उठ ही न पाए.

दर्द एक हो तो कहा जाए. यहां तो दर्द ही दर्द था दोनों के जीवन में. जिस दुकान से रघु राशन लेता था, उस दुकानदार ने भी उधार में राशन देने से मना कर दिया.

उधर गांव से खबर आई कि रघु की चिंता में उस की मां की तबीयत बिगड़ने लगी है, जाने बच भी पाए या नहीं. मकानमालिक ने कोरोना के डर से जबरदस्ती कमरा खाली करवा दिया. अब क्या करे यहां रह कर और रहे भी तो कहां? इसलिए साथी मजदूरों के साथ रघु ने भी अपने घर जाने का फैसला कर लिया.

रघु के गांव जाने की बात सुन कर मुन्नी सहम उठी और उस से लिपट कर बिलख पड़ी यह कह कर कि ‘मु?ो छोड़ कर मत जाओ रघु, मैं घुटघुट कर मर जाऊंगी. मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती. मु?ो म?ादार में छोड़ कर मत जाओ.’

मुन्नी की आंखों से बहते अविरल आंसुओं को देख रघु की भी आंखें भीग गईं, क्योंकि वह जानता था मुन्नी और उस का साथ हमेशा के लिए छूट रहा है. उस के जाते ही मुन्नी के मांबाप मोहन से उस का ब्याह कर देंगे. लेकिन फिर भी कुछ क्षण उस के बालों में उंगलियां घुमाते हुए आहिस्ता से रघु ने कहा था वह जल्द ही लौट आएगा.

मुन्नी जानती थी कि रघु ?ाठ बोल रहा है, वह अब वापस नहीं आएगा. लेकिन यह भी सच था कि वह रघु की है और उस की ही हो कर रहेगी, नहीं तो जहर खा कर अपनी जान खत्म कर लेगी. लेकिन उस अधेड़ उम्र के दुष्ट मोहन से कभी ब्याह नहीं करेगी.

मुन्नी के मांबाप ने जब उस दिन मोहन से उस की शादी का फरमान सुना दिया था, तब मुन्नी ने दोटूक अपना फैसला दे दिया था कि वह किसी मोहनफोहन से ब्याह नहीं करेगी, वह तो रघु से ही ब्याह करेगी, नहीं तो

मर जाएगी.

उस के मरने की बात पर मांबाप पलभर को सकपकाए थे, लेकिन फिर आक्रामक हो उठे थे. ‘उस रघु से ब्याह करेगी, जिस का न तो कमानेखाने का ठिकाना है और न ही रहने का. क्या खिलाएगा और कहां रखेगा वह तु?ो?’

मां ने भी दहाड़ा था, ‘कल को कोई ऊंचनीच हो गई तो हमें मुंह छिपाने के लिए जगह भी नहीं मिलेगी. और बाकी 4 बेटियों का कैसे बेड़ा पार लगेगा? लड़की की लाज मिट्टी का सकोरा होती है, सम?ा बेटी तू.’ मगर, मुन्नी को कुछ सम?ानाबू?ाना नहीं था.

दांत भींच लिए थे उस ने यह कह कर, ‘अगर तुम लोगों ने जबरदस्ती की तो मैं अपनी जान दे दूंगी सच कहती हूं,’ और अपनी कोठरी में सिटकिनी लगा कर फूटफूट कर रो पड़ी थी.

मुन्नी की मां का तो मन कर रहा था बेटी का टेंटुआ ही दबा दे, ताकि सारा किस्सा ही खत्म हो जाए. हां, क्यों नहीं चाहेगी, आखिर बेटियों से प्यार ही कब था उस को. ‘हम बेटियां तो बो?ा हैं इन के लिए’ अंदर से ही बुदबुदाई थी मुन्नी.

‘देखो इस कुलच्छिनी को, कैसे हमारी इज्जत की मिट्टी पलीद कर देना चाहती है. यह सब चाबी तो उस रघु की घुमाई हुई है, वरना इस की इतनी हिम्मत कहां थी. अरे नासपीटी, भले हैं तेरे बाप. कोई और होता तो दुरमुट से कूट के रख देता. मेरे भाग्य

फूटे थे जो मैं ने तु?ो पैदा होते ही नमक न चटा दिया.’

खूब आग उगली थी उस रात मुन्नी की मां ने. उगले भी क्यों न, आखिर उसे अपने हाथ से तोते जो उड़ते नजर आने लगे थे. एक तो कमाऊ बेटी, ऊपर से पैसे वाला दामाद जो हाथ से सरकता दिखाई देने लगा था. सोचा था, बाकी बेटियों का ब्याह भी मोहन के भरोसे कर लेगी, मगर यहां तो… ऊंचा बोलबोल कर आवाज फट चुकी थी मुन्नी की मां की, मगर फिर भी मुन्नी पर कोई फर्क नहीं पड़ा था. उस की जिद तो अभी भी यही थी कि वह रघु की है और उस की ही रहेगी.

अम्मा- भाग 2: आखिर अम्मा वृद्धाश्रम में क्यों रहना चाहती थी

अपर्णा समझ गई थी कि बेटी के रिक्त स्थान ने अपनी जगह शून्य तो बनाया हुआ है, पर बाबूजी और अम्मां, बहू के नाज की डोलियां भी बड़े लाड़ से उठा रहे हैं.

बाबूजी की मृत्यु के बाद बहुत कुछ बदल गया. उन 13 दिनों में ही अम्मां बेहद थकीथकी सी रहने लगी थीं. नीरा और अजय अम्मां का बेहद ध्यान रख रहे थे पर आनेजाने वाले लंबी सांस भर कर, अम्मां को चेतावनी जरूर दे जाते थे.

‘पति के जाने के बाद पत्नी का सबकुछ छिन जाता है. अधिकार, आधिपत्य सबकुछ,’ दूसरी, पहली के सुर में सुर मिला कर सर्द आह भरती.

जितने मुंह उतनी बातें. ऐसी नकारात्मक सोच से कहीं उन के हंसतेखेलते परिवार का वातावरण दूषित न हो जाए, अम्मां ने 4 दिनों में ही बाबूजी का उठाला कर दिया.

लोगों ने आलोचना में कहा, ‘बड़ी माडर्न हो गई है लीलावती,’ पर अम्मां तो अम्मां ठहरीं. अपने परिवार की खुशियों के लिए रूढि़यों और परंपराओं का त्याग, सहर्ष ही करती चली गईं.

लोगों की आवाजाही बंद हुई तो दिनचर्या पुराने ढर्रे पर लौट आई. अम्मां हर समय इसी  कोशिश में रहतीं कि घर का वातावरण दूषित न हो. उसी तरह बच्चों के साथ हंसतीखेलतीं, घर का कामकाज भी करतीं लेकिन 9 बजे के बाद वह जग नहीं पाती थीं और कमरे का दरवाजा भेड़ कर सो जातीं. अजय अच्छी तरह समझता था कि 12 बजे तक जागने वाली अम्मां 9 बजे कभी सो ही नहीं सकतीं. आखिर उन्हीं की गोद में तो वह पलाबढ़ा था.

एक रात 12 बजे, दरवाजे की दरार में से पतली प्रकाश की किरण बाहर निकलती दिखाई दी तो अजय उन के कमरे में चला गया. अम्मां लैंप के मद्धिम प्रकाश में स्वामी विवेकानंद की कोई पुस्तक पढ़ती जा रही थीं और रोती भी जा रही थीं. अजय ने धीरे से उन के हाथ से पुस्तक ली और बंद कर के पास ही स्टूल पर रख कर उन की बगल में बैठ गया. अम्मां उठ कर पलंग पर बैठ गईं और बोलीं, ‘तू सोया नहीं?’

‘आप नहीं सोईं तो मैं कैसे सो जाऊं? इस तरह से तो आप कोई बीमारी पाल लेंगी,’ अजय ने चिंतित स्वर में कहा.

‘अच्छा है, मेरे जीने का अब मकसद ही क्या रह गया है. तेरे बाबूजी ने मुझे सबकुछ दे दिया. धन, ऐश्वर्य, मानसम्मान. जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है मुझे. दोनों बच्चों की शादी हो गई. अपनीअपनी गृहस्थी में रमे हुए हो तुम दोनों. नातीपोतों का मुंह देख लिया. तेरे बाबूजी के बिना अब एकएक दिन भारी लग रहा है.’

अजय ने पहली बार अम्मां को कमजोर पड़ते देखा था, ‘और सुबहशाम मैं आप का चेहरा न देखूं तो मुझे चैन पड़ता है क्या? कभी सोचा है अम्मां कि मैं कैसे रह पाऊंगा तुम्हारे बिना?’

अम्मां ने बेटे के थरथराते होंठों पर हाथ रख दिया. बेटे की आंखों से टपका एकएक आंसू का कतरा उन्होंने अपने आंचल में समेट लिया था.

उस दिन के बाद से अजय अम्मां को एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ता था. मां को अकेलापन महसूस न हो, इसलिए लवकुश अम्मां के पास ही सोने लगे. वैसे भी उन्होंने ही उन्हें पाला था. अब वह बच्चों को स्कूल बस तक छोड़ने और लेने भी जाने लगीं. घर लौट कर उन का होमवर्क भी अम्मां ही करवा देती थीं. अजय हर काम अम्मां से पूछ कर या बता कर करता. यहां तक कि सुबहशाम सब्जी कौन सी बनेगी यह भी अम्मां से ही पूछा जाता. शाम को अपर्णा भी पति के साथ आ जाती थी.

इस तरह घर का माहौल तो बदल गया पर नीरा को अपना अधिकार छिनता सा लगने लगा. पति का अम्मां के प्रति जरूरत से ज्यादा जुड़ाव उसे पसंद नहीं आया. उठतेबैठते अजय को उलाहना देती, ‘ऐसी भी क्या मातृभक्ति कि उठतेबैठते, सोतेजागते मां की आराधना ही करते रहो.’

‘नीरा, कुछ ही समय की बात है. समय स्वयं मरहम का काम करता है. धीरेधीरे अम्मां भी सहज होती चली जाएंगी. बाबूजी और अम्मां का साथ दियाबाती का साथ था. जरा सोचो, कैसे जीती होंगी वह बाबूजी की मृत्यु के बाद.’

‘अजी, पिताजी तो मेरे भी गुजरे थे. 2-4 दिन रह कर सामाजिकता निभाई और अपने घर के हो कर रह गए. यहां तो 6 माह से गमी का माहौल चल रहा है. ऊपर से अपर्णा दीदी अलग धमक पड़ती हैं.’

अजय ने नीरा के होंठों को कस कर भींच दिया था पर चौखट पर खड़ी अपर्णा ने सबकुछ सुन लिया था. उस के तो तनबदन में आग सी लग गई पर सीधे नीरा से कुछ न कह कर अम्मां से जरूर मन की भड़ास निकाली थी.

‘3-3 ननदें हैं मेरी. हफ्ते में बारीबारी से तीनों आती हैं. मेरी सास के साथ मुंह से मुंह जोड़ कर बैठी रहती हैं, चौके में मैं अकेली पिसती हूं. सब्जी काट कर भी कोई नहीं देता. एक यह घर है, सबकुछ किया कराया मिलता है, तब भी बहू को चैन नहीं.’

‘तेरी ससुराल में होता होगा. बहू तो घर की लक्ष्मी होती है. उस की निंदा कोई बेटी से क्यों करे? वह पहले ही अपना घर छोड़ कर पराए घर की हो गई,’ अपर्णा की बात को बीच में काट कर अम्मां ने साफगोई से बीचबचाव करते हुए कहा था.

पर बेटी के जाने के बाद उन्होंने बारीकी से विश्लेषण किया. सुहाग उन का उजड़ा, वैधव्य उन्हें मिला. न किसी से कुछ मांगा, न ही गिलाशिकवा किया. चुपचाप कोने में बैठी, किताबों से मन बहलाती रहीं. फिर भी घर का वातावरण दूषित क्यों हो गया.

मन में यह विचार आया कि कहीं ऐसा तो नहीं, अजय उन्हें ज्यादा समय देने लगा है. इसलिए नीरा चिड़चिड़ी हो गई है. हर पत्नी को अपने पति का सान्निध्य भाता ही है.

अम्मां ने एक अहम फैसला लिया. अगले दिन शाम होते ही वह सत्संग पर निकल गई थीं. अपनी हमउम्र औरतों के साथ मिल कर कुछ देर प्रवचन सुनती रहीं फिर गपशप में थोड़ा समय व्यतीत कर वापस आ गईं. यही दिनचर्या आगे भी चलती रही.

हमेशा की तरह अजय अम्मां के कमरे में जाता और जब वह नहीं मिलतीं तो नीरा से प्रश्न करता. नीरा 10 दलीलें देती, पर अजय को चैन नहीं था. व्यावहारिक दृष्टिकोण रखने वाली अम्मां ‘कर्म’ पर विश्वास करती थीं. घर छोड़ कर सत्संग, कथा, कीर्तन करने वाली महिलाओं को अम्मां हेयदृष्टि से ही देखती थीं. फिर अब क्या हो गया?

नीरा प्रखर वक्ता की तरह बोली, ‘बाबूजी के गुजरने के बाद अम्मांजी कुछ ज्यादा ही नेमनियम मानने लगी हैं. शायद समाज के भय से अपने वैधव्य के प्रति अधिक सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है.’

एक शाम अम्मां घर लौटीं तो घर कुरुक्षेत्र का मैदान बना हुआ था. नीरा बुरी तरह चीख रही थी. अजय का स्वर धीमा था. फिर भी अम्मां ने इतना तो सुन ही लिया था, ‘दालरोटी का खर्च तो निकलता नहीं, फलदूध कहां से लाऊं?’

रात को नीरा अम्मां के कमरे में फलदूध रखने गई तो उन्होंने बहू को अपने पास बिठा लिया और बोलीं, ‘एक बात कहूं, नीरा.’

‘जी, अम्मां,’ उसे लगा, अम्मां ने शायद हम दोनों की बात सुन ली है.

‘तुम ने एम.ए., बी.एड. किया है और शादी से पहले भी तुम एक पब्लिक स्कूल में पढ़ाती थीं.’

‘वह तो ठीक है अम्मां. पर तब घरपरिवार की कोई जिम्मेदारी नहीं थी. अब लवकुश भी हैं. इन्हें कौन संभालेगा?’ नीरा के चेहरे पर चिढ़ के भाव तिर आए.

‘मैं संभालूंगी,’ अम्मां ने दृढ़ता से कहा, ‘चार पैसे घर में आएंगे तो घर भी सुचारु रूप से चलेगा.’

सासबहू की बात चल ही रही थी, जब अजय और अपर्णा कमरे में प्रविष्ट हुए. नीरा चौके में चायनाश्ते का प्रबंध करने गई तो अजय ने ब्रीफकेस खोल कर एकएक कर कागज अम्मां के सामने फैलाने शुरू किए और फिर बोला, ‘अम्मां, सी.पी. फंड, इंश्योरेंस, गे्रच्युटी से कुल मिला कर 5 लाख रुपए मिले हैं. मिल तो और भी सकते थे, पर बाबूजी ने यहां से थोड़ाथोड़ा ऋण ले कर हमारी शादियों और शिक्षा आदि पर खर्च किया था. 7 हजार रुपए महीना तुम्हें पेंशन मिलेगी.’

‘अरे, बेटा, मैं क्या करूंगी इतने पैसों का? तुम्हीं रखो यह कागज अपने पास.’

‘अम्मां, पैसा तुम्हारा है. सुख में, दुख में तुम्हारे काम आएगा,’ अजय ने लिफाफा अम्मां को पकड़ा दिया.

नीरा ने सुना तो अपना माथा पीट लिया. बाद में अजय को आड़े हाथों ले कर बोली, ‘राजीखुशी अम्मां तुम्हें अपनी जमा पूंजी सौंप रही थीं तो ले क्यों न ली? पूरे मिट्टी के माधो हो. अब बुढि़या सांप की तरह पैसे पर कुंडली मार कर बैठी रहेगी.’

मुझ में सेक्स की कूवत नहीं है, क्योंकि लगातार हस्तमैथुन करने से मेरा अंग छोटा व पतला हो गया है, क्या करूं?

सवाल
मैं 26 साल का हूं. मेरी शादी हो चुकी है, पर मुझे लगता है कि मुझ में हमबिस्तरी करने की कूवत नहीं है, क्योंकि लगातार हस्तमैथुन करने से मेरा अंग छोटा व पतला हो गया है. क्या करूं?

जवाब
हस्तमैथुन से हमबिस्तरी करने की कूवत कम नहीं होती. छोटेपतले अंग से भी इस काम में फर्क नहीं पड़ता. हमबिस्तरी से पहले बीवी के अंगों को सहला कर उसे तैयार करें, फिर दिमाग में कोई वहम लाए बगैर हमबिस्तरी करें.

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एक औसत दर्जे के सेक्स से समझौता करने की कोई वजह नहीं है, जब आप हर बार, हर स्थिति में सेक्स का लाजवाब अनुभव ले सकती हैं. चाहे आप पहली बार सेक्स कर रही हों या यह केवल एक रात के आनंद की बात हो. हमारे पास हर स्थिति को यादगार और शानदार बनाने के नियम हैं. जरूरत है तो बस इनका पालन करने की.

स्थिति: जब आप पहली बार सेक्स कर रही हों

क्या करें: यह जरूरी नहीं है कि सेक्स का पहला अनुभव सपनों जैसा और यादगार ही हो. बजाय इसके संभावना इस बात की ज्यादा है कि यह बेतुका, अजीब और अनिश्चित हो सकता है. आपकी उम्मीदों से कहीं बदतर साबित हो सकता है.

पहले सेक्स के अनुभव को आनंददायक बनाने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है-उस क्षण का भरपूर आनंद उठाएं-बिना किसी चिंता या भय के. ‘‘धीरे-धीरे आगे बढ़ें और सहज बनी रहें,’’ कहती हैं डा. अवनी तिवारी, सीनियर कंसल्टेंट और सेक्सोलॉजिस्ट, मेट्रो मल्टीस्पेशिऐलिटी हौस्पिटल नोएडा. ‘‘जल्दबाज़ी न करें और न ही ख़ुद पर दबाव डालें. अपनी व्यग्रता और चिंता को छिपाने के लिए ड्रिंक न करें. यदि आप पहले सेक्स की बेहतर यादें चाहती हैं तो होश में बनी रहें. सेक्स के बारे में जानकारी हासिल करें. एक अनाड़ी पार्टनर सेक्स का मूड खराब कर सकता है. तो देर न करें, सेक्स के बारे में जानकारी हासिल करना शुरू कर दें.’’

सलाह : आपके शरीर से वे उतने ही अपरिचित हैं, जितनी अनजान आप उनके शरीर से हैं. अत: उनसे पूछें कि वे क्या चाहते हैं और उन्हें बताएं कि आपको आनंद कैसे मिल सकता है. प्रत्येक एहसास और स्पर्श का आनंद उठाएं और उन्हें भी इसका आनंद लेने दें.

स्थिति: जब आप रोमांच के मूड में हों

क्या करें: सेक्स का पारंपरिक तरीका कंफर्ट फूड की तरह है. इससे आपकी भूख तो मिट सकती है, पर लालसा अतृप्त रह जाती है. ‘‘मेरे पति बिस्तर पर अच्छे हैं, लेकिन वे प्रयोग करने में आगे नहीं बढ़ना चाहते. वहीं मैं कई सारी चीजें आजमाना चाहती हूं – रोल प्ले से लेकर ब्लाइंड फ़ोल्ड्स तक,’’ कहती हैं श्रीमोई सेन. पिछली बार जब मैं कुछ नया करना चाह रही थी, तब उन्होंने कोई खास रुचि नहीं दिखाई. उसके बाद तो उनसे कुछ नया करने का आग्रह करना और भी मुश्किल हो गया.’’

विविधता और नए प्रयोग करना स्वस्थ्य और रोमांचक सेक्स जीवन की कुंजी है. हां, इसके लिए आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके पार्टनर को भी यह पसंद हो. वे जिसमें सहज महसूस नहीं करते, उनपर वह करने का दबाव डालना सही नहीं होगा.

‘‘यदि आप उनसे कुछ नया करवाना चाहती हैं तो आपको पहले यह जानना होगा की क्या वे रोमांच के लिए तैयार हैं?’’ कहते हैं डा. राजेश गोयल, कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट, सर गंगाराम हौस्पिटल. ‘‘यदि वे आपके विचारों से सहमत नहीं हैं तो उन्हें बातचीत द्वारा तैयार करने की कोशिश करें. यदि उन्हें चौंकाना चाहेंगी तो हो सकता है चीजें आपकी योजनानुसार न हों. यह न केवल तनावपूर्ण हो सकता है, बल्कि इससे सेक्शुअल चोट का भी खतरा होता है.’’

जानकारी : वर्ष 2014 में जरनल औफ यूरोलौजी में छपे एक अध्ययन के अनुसार वुमन औन टौप पोजिशन पुरुषों के लिए खतरनाक हो सकती है. उन्हें पीनाइल फ्रैक्चर का खतरा रहता है.

स्थिति: जब आप अपने रिश्ते की गर्मजोशी फिर तलाश रही हों

क्या करें: समय के साथ सेक्स में नीरसता आना स्वाभाविक है. कपल्स का सेक्स जीवन एक ढर्रे पर चलने लगता है. उनके बीच की गर्मजोशी कम हो जाती है. सेक्स की बारंबारता और विविधता में भी कमी देखी जाती है. बच्चों की मौजूदगी, औफिस का तनाव और रोजमर्रा के जीवन की चुनौतियां आपकी सेक्स जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर देती हैं. फिर भी अच्छी बात यह है कि आप थोड़े-से दिमागी व्यायाम से अंतरंग पलों में दोबारा जान डाल सकती हैं.

‘आपका मस्तिष्क सेक्स के लिए इस्तेमाल होनेवाला सबसे शक्तिशाली अंग है.’ यकीन मानिए यह बात पूरी तरह सच है. मुंबई के सेक्सोलौजिस्ट डा. राज ब्रह्मभट्ट कहते हैं, ‘‘नई चीजें आजमाने से अंतरंग पलों के रोमांच को दोबारा पाया जा सकता है. नीरसता को दूर करने के लिए नए सेक्शुअल पोजिशन्स अपनाएं. रोल प्ले आजमाएं या बिस्तर पर कुछ उत्तेजक खेल खेलें. विकल्प अंतहीन हैं.’’

अपने दिमाग की सबसे तीव्र सेक्शुअल फंतासी को आजमाने का वक्त आ गया है. सप्ताहांत में शहर से दूर चले जाएं और एजेंडे पर सिर्फ और सिर्फ सेक्स ही हो. ऐसा सोचें कि आप पहली डेट पर हैं और एक-दूसरे के करीब आने के लिए बेताब हैं. आप स्ट्रिप पोकर जैसे गेम्स खेल सकते हैं और एक-दूसरे को सेक्स मैसेजेस भेज सकते हैं.

सलाह : ‘‘प्यार और सेक्स कभी मरते नहीं. वे तो रोजाना की चिंताओं के पीछे छुप भर जाते हैं. अपने मतभेदों को भुलाकर अपनी सारी ऊर्जा सेक्स में लगा दें,’’ कहते हैं डा. गोयल.

स्थिति: जब आप वन नाइट-स्टैंड आजमा रही हों

क्या करें: वन नाइट स्टैंड का विचार आते ही दिमाग में एक सेक्सी अजनबी से मिलने का दृश्य आ जाता है. फिर आप उसके साथ होटल के एक कमरे में जाकर जीवन के सबसे बेहतरीन सेक्स का आनंद उठाती हैं. इस बात से बेफिक्र होकर कि वह शादीशुदा है या आपमें सचमुच रुचि लेने लगा है-बस सेक्स का मजा लेने के लिए सेक्स करना अपने आप में अद्भुत होता है. फिर भी आगे-पीछे की सोचकर कभी-कभी मूड खराब भी हो सकता है.

‘‘एक कौन्फ्रेंस के दौरान मैंने अपने एक दूसरे शहर के कलीग के साथ वन नाइट स्टैंड किया था,’’ कहती हैं बृंदा सिंह. ‘‘जबकि वो सेक्स के दौरान काफी खुश था, पर मैंने अपना ज्यादातर समय इस चिंता में बिता दिया कि कहीं वो बाकी टीम को इस बारे में बता न दे. शुक्र है कि उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया. पर मैंने महसूस किया कि वन नाइट स्टैंड केवल ऐसे व्यक्ति के साथ ही आजमाना चाहिए जिससे कभी दोबारा मिलने की संभावना न हो.’’ वहीं डा. तिवारी कहती हैं, ‘‘बिना किसी प्रतिबद्धता वाला सेक्स, वन नाइट स्टैंड और केवल सेक्स फ्रेंड जैसे मुद्दे बेहद पेचीदा होते हैं. आप दोनों के बीच चीजें बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए. हालांकि कई लोगों को आगे विश्वास की कमी का सामना करना पड़ता है.’’

सलाह : गर्भनिरोधक का प्रयोग करना न भूलें, क्योंकि जाहिर है आप एक अनचाहा गर्भ नहीं चाहेंगी और न ही एसटीडी. खुद कंडोम रखें, पार्टनर के भरोसे न रहें.

कम्मो डार्लिंग – भाग 2 : इच्छाओं के भंवरजाल में कमली

मां ने उस से कहा था, ‘बेटा, कमली मुझे बहुत अच्छी लगती है. तेरे पीछे वह जिस तरह मेरी देखभाल करती है, उस तरह तो मेरी अपनी बेटी होती, तो वह भी नहीं कर पाती. मैं ने सोच लिया है कि तेरी शादी मैं कमली से ही कराऊंगी, क्योंकि मुझे पूरा यकीन है कि वह तेरा घर अच्छी तरह संभाल लेगी. नीतेश मन से अभी शादी करने को तैयार नहीं था. उस की इच्छा थी कि पहले वह अच्छा पैसा कमाने लगे. शहर में किराए के मकान को छोड़ कर अपना मकान बना ले, कुछ पैसा इकट्ठा कर ले, ताकि भविष्य में पैसों के लिए किसी का मुंह न ताकना न पड़े. लेकिन मां की खुशी के लिए उसे अपनी इच्छाओं का गला घोंट कर कमली से शादी करनी पड़ी.

शादी के कुछ ही महीनों बाद अचानक नीतेश की मां की तबीयत बिगड़ गई. काफी इलाज के बाद भी वे बच नहीं पाईं. नीतेश कमली को अपने साथ शहर ले आया. वहां कमली के रहनसहन, खानपान, बोलचाल और पहननेओढ़ने में एकदम बदलाव आ गया. उसे देख कर लगता ही नहीं था कि वह गांव की वही अल्हड़ और सीधीसादी कमली है, जो कभी सजनासंवरना भी नहीं जानती थी.

कमली में आए इस बदलाव को देख कर नीतेश को जितनी खुशी होती, उतना ही दुख भी होता था, क्योंकि वह दूसरों की बराबरी करने लगी थी. पड़ोस की कोई औरत 2 हजार रुपए की साड़ी खरीदती, तो वह 3 हजार रुपए की साड़ी मांगती. किसी के घर में 10 हजार रुपए का फ्रिज आता, तो वह 15 हजार वाले फ्रिज की डिमांड करती. नीतेश ने कई बार कमली को समझाया भी कि दूसरों की बराबरी न कर के हमें अपनी हैसियत और आमदनी के मुताबिक ही सोचना चाहिए, लेकिन उस के ऊपर कोई असर नहीं हुआ, जिस का नतीजा यह निकला कि वह अपनी इच्छाओं को पूरा करने की खातिर एक ऐसे भंवरजाल में जा फंसी, जिसे नीतेश ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था.

एक दिन शाम को नीतेश अपनी ड्यूटी से वापस आया, तो घर के दरवाजे पर ताला लटका हुआ था. उस ने सोचा कि कमली किसी काम से कहीं चली गई होगी, इसलिए वह बाहर खड़ा हो कर उस का इंतजार करने लगा. इस बीच उस ने कई बार कमली को फोन भी मिलाया, लेकिन उस का फोन बंद था. रात के तकरीबन 12 बज चुके थे, तभी उस के दरवाजे के सामने एक चमचमाती कार आ कर रुकी, जिस में से कमली नीचे उतरी. उस के कदम लड़खड़ा रहे थे. उस के लड़खड़ाते कदमों को देख कर कार में बैठा शख्स बोला, ‘‘कम्मो डार्लिंग, संभल कर.’’

कमली उस की ओर देख कर मुसकराई. वह शख्स भी मुसकराया और बोला, ‘‘ओके कम्मो डार्लिंग, बाय.’’ इतना कह कर वह वहां से चला गया. यह देख कर नीतेश हैरान रह गया. उस का दिल टूट गया. उसे कमली से नफरत हो गई. उस के जी में तो आया कि वह अपने हाथों से उस का गला घोंट दे, मगर…

कमली शराब के नशे में इस कदर चूर थी कि उसे घर का ताला खोलना भी मुश्किल हो रहा था. नीतेश ने उस से चाबी छीनी और दरवाजा खोल कर अंदर चला गया. विचारों की कश्ती में सवार सोफे पर बैठा नीतेश खुद से सवाल कर रहा था और खुद ही उन के जवाब दे रहा था. उसे खामोश देख कर कमली ने कहा, ‘‘नीतेश, मुझ से यह नहीं पूछोगे कि मैं इतनी रात को कहां से आ रही हूं? मेरे साथ कार में कौन था और मैं ने शराब क्यों पी है?’’

‘‘कमली, अगर बता सकती हो तो सिर्फ इतना बता दो कि मेरे प्यार में ऐसी कौन सी कमी रह गई थी, जिस ने तुम्हें कमली से कम्मो डार्लिंग बनने के लिए मजबूर कर दिया?’’

‘‘नीतेश, मैं तुम्हें अंधेरे में नहीं रखना चाहती. सबकुछ साफसाफ बता देना चाहती हूं. मैं आकाश से प्यार करने लगी हूं.’’

‘‘प्यार…?’’ चौंकते हुए नीतेश ने कहा. ‘‘हां, नीतेश. यह वही आकाश है, जिस के साड़ी इंपोरियम से हम एक बार साड़ी खरीदने गए थे. तुम्हें याद होगा िमैं ने गुलाबी रंग की साड़ी पसंद की थी और तुम ने उस साड़ी को महंगा बता कर खरीदने से इनकार कर दिया था.

तब आकाश ने तुम से कहा था कि साड़ी महंगी बता कर भाभीजी का दिल मत तोड़ो. भाभीजी की खूबसूरती के सामने 3 हजार तो क्या 20 हजार की साड़ी भी सस्ती होगी. लेकिन तुम आकाश की बातों में नहीं आए, जिस से मेरा दिल टूट गया.’’

‘‘दिल टूट गया और तुम आकाश से प्यार करने लगीं?’’ ‘‘नीतेश, हर लड़की की तरह मेरे भी कुछ सपने हैं. मैं भी ऐश की जिंदगी जीना चाहती हूं. महंगी से महंगी साड़ी और गहने पहनना चाहती हूं.

मगर मैं जानती हूं कि तुम जैसे तंगदिल और दकियानूसी इनसान के साथ रह कर मेरा यह अरमान कभी पूरा नहीं होगा, इसलिए मैं सोचने लगी कि काश, मैं आकाश की पत्नी होती. वह कितने खुले दिन का इनसान है. कितनी खुशनसीब होगी वह लड़की, जो आकाश की पत्नी होगी.

कितना प्यार करता होगा आकाश अपनी पत्नी को. लेकिन आकाश शादीशुदा नहीं है, यह तो मुझे तब पता चला, जब एक दिन आकाश से अचानक मेरी मुलाकात बाजार में हो गई और उस ने मुझ से अपने साथ कौफी पीने को कहा. मैं खुद को रोक नहीं पाई और उस के साथ कौफी पीने चली गई.’’

औनर किलिंग- भाग 2: आखिर क्यों हुई अतुल्य की हत्या?

उस लड़की ने कंपकंपाते हाथों से पानी का गिलास लिया और एक ही सांस में पूरा गिलास खाली करते हुए बोली, ‘‘वे लोग मेरे पीछे पड़े हैं. वे मु झे भी जान से मार डालना चाहते हैं. लेकिन किसी तरह मैं अपनी जान बचाते हुए यहां तक पहुंची हूं, ताकि पुलिस को सब बता सकूं.’’

‘‘हांहां, मैं सम झ गया. लेकिन तुम डरो मत, क्योंकि अब तुम पुलिस के पास हो.’’

पर, घबराहट के मारे उस लड़की के मुंह से ठीक तरह से आवाज भी नहीं निकल पा रही थी. उस का पूरा शरीर कांप रहा था. चेहरा पीला पड़ गया था. होंठ काले पड़ गए थे. आंखें सूजी हुई थीं.

लड़की को घबराया हुआ देख कर इंस्पैक्टर माधव ने हवलदार को इशारा किया कि दरवाजे पर 2 और बंदूकधारी तैनात कर दो, ताकि इस लड़की का डर थोड़ा कम हो.

जब वह लड़की थोड़ा शांत हुई और लगा कि यहां उस की जान को कोई खतरा नहीं है, तो वह बताने लगी, ‘‘इंस्पैक्टर साहब, मैं अमृता हूं और वे दोनों हत्यारे मेरे भाई हैं. उन्होंने ही मेरे अतुल्य की हत्या…’’ बोल कर वह फूटफूट कर रोने लगी.

इंस्पैक्टर माधव को अमृता की बात से यह तो सम झ में आने ही लगा था कि जरूर यह इश्कमुहब्बत का मामला है, लेकिन वे उस लड़की के मुंह से सारी कहानी सुनना चाहते थे.

अपने आंसू पोंछ कर अमृता बताने लगी कि वह और अतुल्य एकदूसरे से प्यार करते थे और जल्द ही दोनों अपने रिश्ते के बारे में परिवार वालों को बताने ही वाले थे कि यह सब हो गया.

अपने और अतुल्य के बारे में बताते हुए अमृता अतीत की यादों में खोती चली गई.

अमृता उस गांव के ठाकुर की बेटी थी और अतुल्य एक कुम्हार परिवार का बेटा. लेकिन कुम्हार का काम उस के दादापरदादा किया करते थे. अतुल्य के पिताजी तो इसी गांव के एक स्कूल में टीचर थे.

स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद अतुल्य ने शहर जा कर एक इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला ले लिया और इधर अमृता के घर वाले उसे गांव के ही कालेज में दाखिला दिलवाने लगे. मगर वह जिद करने लगी कि उसे शहर के कालेज में जा कर पढ़ना है.

थोड़ी आनाकानी के बाद अमृता के घर वाले उसे शहर भेजने को राजी हो गए. अमृता का दाखिला भी उसी कालेज में हो गया, जिस में अतुल्य पढ़ रहा था.

अमृता की बड़ी भाभी रुक्मिणी, जो उसे अपनी बेटी की तरह प्यार करती थीं, ने अपने हाथों से उस के लिए नमकीन, मिठाई, मठरी, चिवड़ा बनाया और सम झाया कि वह शहर में अपना खयाल रखे और कोई बात हो, तो उन्हें फोन जरूर करे.

‘‘हां, जरूर करूंगी मेरी मां…’’ अपनी भाभी के गले लग कर उन से विदा लेते हुए अमृता बोली थी.

एक ही शहर में रहने और एक ही कालेज में पढ़ने के चलते अमृता और अतुल्य की नजदीकियां और बढ़ती चली गईं. कालेज के बाद अकसर वे दोनों कहीं एकांत जगह पर बैठ कर अपने भविष्य के सपने बुनते.

इस शहर में दोनों के लिए एक अच्छी बात यह थी कि यहां उन्हें कोई पहचानने वाला नहीं था, वरना गांव में तो डर लगा रहता था कि जाने कब कौन देख ले और बात का बतंगड़ बना कर उन के परिवार को सुना आए और फिर उन का एकदूसरे को देखना तक मुहाल हो जाए, इसलिए तो वे दोनों बचबचा कर किसी तरह उस पुरानी फैक्टरी में मिला करते थे, जहां लोगों का आनाजाना न के बराबर होता था.

लेकिन अब शहर में वे दोनों आजाद पंछी की तरह जहां मन होता वहां उड़तेफिरते रहते थे, हंसतेमुसकराते, गुनगुनाते हुए एकदूसरे की बांहों में कैसे 3 साल बीत गए, पता ही नहीं चला.

लेकिन अब कालेज पूरा होने के एक साल के बाद अमृता के घर वाले उस के लिए लड़का देखने लगे थे और इधर अतुल्य की मां भी बहू लाने के सपने देखने लगी थीं. उन दोनों ने इतने सालों तक यह बात इसलिए अपने परिवार वालों से छिपा कर रखी थी कि सही समय आने पर बता देंगे.

वैसे भी अतुल्य की सब से छोटी बहन की अगले ही महीने शादी तय हुई थी. शादी में तो जाना ही था, सोचा उसी समय वह अपने और अमृता के रिश्ते के बारे में सब को बता देगा.

इधर अमृता को यकीन था कि उस के परिवार वाले उस की खुशियों के आड़े कभी नहीं आएंगे, क्योंकि वह अपने परिवार में सब की लाड़ली जो थी. आज तक ऐसा नहीं हुआ, जो उस की कोई भी जिद पूरी न की गई हो.

अमृता के दोनों भाई उसे अपनी हथेलियों पर और पिता सिर पर बिठा कर रखते थे. घर में उसे इसलिए सब इतना प्यार करते थे, क्योंकि उन के घर में 3 पुश्तों के बाद बेटी पैदा हुई थी.

अमृता के पिताजी गांव के जमींदार तो थे ही, वे लोगों को सूद पर पैसे भी दिया करते थे. गांवभर के लोग जरूरत के समय उन के पास सूद पर पैसे लेने आते थे. लेकिन उन का एक उसूल था कि चाहे जितने पैसे ले जाओ सूद पर, लेकिन अगर तय समय पर पैसे नहीं लौटा पाए, तो उन की खैर नहीं.

पैसों के बदले वे मजबूर लोगों की जमीन, घर यहां तक कि गायभैंस तक अपने कब्जे में कर लेते थे और तब तक वापस नहीं देते थे, जब तक उन के पूरे पैसे नहीं मिल जाते थे.

लेकिन अतुल्य के पिता इन लोगों से दूरी बना कर रखने में ही अपनी भलाई सम झते थे. वे जानते थे कि कोयले से न दोस्ती अच्छी और न ही दुश्मनी अच्छी. ऊपर से घर में 4-4 जवान बेटियां हैं, इसलिए वे गांव के किसी भी मसले से दूर ही रहते थे.

‘‘अमृता, तुम से एक बात पूछूं क्या?’’ गोद में लेटी अमृता की हथेली को प्यार से दबा कर चूमते हुए अतुल्य बोला था, ‘‘अगर तुम्हारे या मेरे परिवार वालों ने हमें एक न होने दिया तो हम क्या करेंगे? मैं तो तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगा. सच कहता हूं अमृता?’’ बोलते हुए अतुल्य उदास हो गया था.

रूममेट के साथ फ्रेंडशिप

26 साल का अभिषेक कुमार बिहार के समस्तीपुर जिले में एक किसान परिवार से है. साल 2013 में 12वीं जमात के इम्तिहान अच्छे नंबरों से पास करने के बाद पत्रकार बनने का सपना लिए वह देश की राजधानी दिल्ली आ गया.

पत्रकारिता में ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के लिए उस ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामलाल आनंद कालेज में दाखिला लिया. दाखिला लेने के साथ ही अभिषेक ने कालेज से 16 किलोमीटर दूर लक्ष्मी नगर मैट्रो स्टेशन में एक पीजी किराए पर लिया. लेकिन पीजी लेने में सब से बड़ी दिक्कत उस के किराए की थी.

लक्ष्मी नगर आमतौर पर छोटे शहरों से आए नौजवानों से भरा रहता है. वहां के मकानों की दीवारें कोचिंग सैंटर के बोर्ड से पटी पड़ी हैं. यही वजह है कि ज्यादातर कोचिंग की पढ़ाई करने वाले छात्रों का हब लक्ष्मी नगर बना हुआ है, जिस के चलते किराए पर कमाई का कारोबार वहां खूब फलफूल रहा है.

रूममेट की खोज

लक्ष्मी नगर में उस दौरान अभिषेक अकेला रह कर 6,000 रुपए महीना कमरे का किराया देने की हालत में नहीं था, इसलिए वह चाह रहा था कि जल्द ही उस का कोई रूममेट बने, जिस के साथ वह कमरे के खर्चों को शेयर कर सके.

इस मसले पर अभिषेक का कहना है, ‘‘ज्यादातर लोग जानपहचान वाले को ही रूम पार्टनर रखना पसंद करते हैं और यह ठीक भी रहता है, क्योंकि इस से रूममेट को समझनेसमझाने में ज्यादा समय नहीं खपता और एकदूसरे से कोई बात बेझिझक कही जा सकती है.

‘‘बहुत बार जब 2 अनजान लोग एकसाथ रहते हैं, तो काम और पैसों को ले कर झिकझिक बनी रहती है. छोटेछोटे खर्चों या काम में बड़ेबड़े झगड़े या शक की गुंजाइश बन जाती है.’’

गलत रूममेट

उत्तर प्रदेश के आगरा की रहने वाली 29 साल की श्रुति गौतम दिल्ली यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही हैं. वे मुखर्जी नगर में फ्लैट ले कर रह रही हैं. साथ ही, वे बतौर गैस्ट टीचर कालेज में पढ़ाती भी हैं.
श्रुति गौतम कहती हैं, ‘‘मैं साल 2016 में दिल्ली आई थी. साल 2016-17 में मैं जिस फ्लैट में रही, वहां सब ठीक चल रहा था. वहां मैं सब से छोटी थी, बाकी मेरे से कुछ सीनियर थे. फिर मैं ने जब रूम बदला, तो मुझे अपने साथ रूममेट की जरूरत थी.

‘‘उस दौरान मुझे 2 लड़कियां मिलीं. वे दोनों उम्र में मुझ से छोटी थीं. हम ने मिल कर फ्लैट लिया. शुरू में लगा कि सब ठीक है, लेकिन धीरेधीरे समस्या आती है कि आप की ट्यूनिंग नहीं मिलती. जैसे आप सोते हैं 10 बजे और रूममेट को 2 बजे सोने की आदत है. आप को खाने में कुछ पसंद है, तो उसे कुछ दूसरा. ऐसे में झगड़े होने लगते हैं.’’

काम का हिसाब

श्रुति गौतम कहती हैं, ‘‘साल 2018 की बात है, तब मैं आईपी मैं कालेज गैस्ट टीचर के तौर पर पढ़ा रही थी. मेरी एक रूममेट ने मेन डोर की चाबी लौक पर ही छोड़ दी, जिस के बाद कमरे से लैपटौप और मोबाइल फोन चोरी हो गया था.

‘‘उस समय मैं ने उसे खूब डांट दिया था. उसे बुरा लग गया और उस के मन में मेरे लिए कड़वाहट बैठ गई. तब से हमारी बात ठीक से हुई नहीं और आखिर में उसी ने कमरा छोड़ दिया.’’

श्रुति गौतम आगे कहती हैं, ‘‘रूम में काम बंटा हुआ होता है, लेकिन उस के बावजूद कोई काम करने को राजी नहीं होता. गंदे बरतन पड़े हैं तो पड़े ही रहेंगे. टायलैट सब से साफ रहने वाली जगह होनी चाहिए और सभी को इसे साफ करना चाहिए, लेकिन बोलबोल कर भी काम पूरा नहीं किया जाता.

‘‘खाना बनाते समय कई झगड़े होते हैं. जो खाना बनाने वाला है, वह कह दे कि प्याज काट दो या आटा गूंद दो तो काम से कन्नी काटने के लिए बहाने बनते हैं कि मुझे भूख नहीं है. कपड़े जहांतहां फैले होते हैं. इस के साथ हिसाबकिताब में भी दिक्कत आ जाती है. इस का आखिर में एक ही हल निकलता है कि आप एक कामवाली रख लो.’’

धर्मजाति के फंडे

अभिषेक बताता है, ‘‘लक्ष्मी नगर या मुखर्जी नगर में ही देखो, तो ज्यादातर अपनी जातबिरादरी के लोगों के साथ ही रहते हैं और शायद रहना पसंद भी करते हों. इसे समझना कोई बड़ी बात नहीं. कालेज में पढ़नेलिखने आए नौजवान जब कालेज में जाते हैं, तो अपने जातिधर्म के चुनाव उम्मीदवार को ही जिताते हैं, उसी के लिए नारे लगाते हैं.

‘‘मैं यह नहीं कह रहा कि सिर्फ जातिवादी या सांप्रदायिक सोच के चलते ऐसा है, मसला आराम का भी होता है. अपनी बिरादरी में वे ज्यादा आरामदायक महसूस करते हैं, कल्चर को ले कर जल्दी एकदूसरे की बातें समझ लेते हैं.

‘‘बहुतों पर पारिवारिक दबाव भी होता है कि किस के साथ रहना है या नहीं रहना है. सब से बड़ी वजह यह है कि ज्यादातर बाहरी नौजवान जानपहचान वालों के साथ ही यहां रहते हैं. हमारा सामाजिक ढांचा ऐसा है कि हम अपनी बिरादरी और धर्म से अलग किसी दूसरे से ज्यादा नजदीकियां बना नहीं पाते हैं.’’

उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के बिसनपुर गांव के सनी कुमार एसटी समाज से आते हैं. वे गांव से मीलों दूर इलाहाबाद शहर के कटरा इलाके में किराए का कमरा ले कर कानून की पढ़ाई कर रहे हैं.

सनी कुमार कहते हैं, ‘‘रूममेट ढूंढ़ते हुए जाति से ज्यादा धर्म को देखा जा रहा है, खासकर यह मामला हिंदू और मुसलमान में ज्यादा देखने को मिलता है. जिस इलाके में मैं रहता हूं, वहां अलगअलग धर्म के लोगों का एकसाथ रूम शेयर करने का उदाहरण मैं अभी तक देख नहीं पाया हूं, लेकिन जाति से अलग उदाहरण दिख जाते हैं. यह मैं ने गौरखपुर में भी महसूस किया था.’’

इस मसले पर श्रुति गौतम के विचार अलग हैं. वे कहती हैं, ‘‘मेरे खयाल से रूममेट ढूंढ़ते समय आज का नौजवान तबका धर्मजाति नहीं देखता है. वजह यह है कि ज्यादातर बाहर से आने वाले युवा एक टारगेट ले कर आते हैं, उस के आड़े ये चीजें इतनी माने नहीं रखतीं.

‘‘हां, यहां पेंच पड़ता है परिवार का. अगर किसी का बेटा या बेटी बाहर पढ़ने गए हैं या नौकरी के लिए आए हैं, तो परिवार नजर रखता है कि वह किस के साथ है. उस की पार्टनर किस धर्मजाति से है. ऐसे में इन चीजों को ध्यान में रख कर रूममेट की जातिधर्म पर सोचते होंगे. लेकिन जिन्हें इन बातों से कुछ फर्क नहीं पड़ता, वे परिवार में इन बातों को बताते ही नहीं हैं या झूठ कह देते हैं.’’

ऐसे बनाएं रूममेट से अच्छा रिश्ता

कमरे की साफसफाई–  रूममेट का आपस में झगड़ा इसी को ले कर ज्यादा होता है, इसलिए जरूरी है कि इस पर ध्यान दिया जाए. इस के लिए कुछ नियम बनाए जा सकते हैं. जैसे, बारीबारी से कमरा साफ करें, भीतर आने से पहले जूते साफ कर लें, अपने कपड़े समय पर धो लें, टायलैट इस्तेमाल करने के बाद साफ जरूर करें, कमरे के मैनेजमेंट के लिए अलमारी, बुक रैक, डस्टबिन, पैन बौक्स वगैरह का इस्तेमाल करें, ताकि चीजें यहांवहां गुम न हों.

हिसाब रखें सही

कई बार लेनदेन में रूममेट के साथ अनबन हो जाती है. अगर एक बार पैसों को ले कर अनबन होती है, तब वह शंका आजीवन मिटाए नहीं मिटती है, इसलिए हिसाब बेहतर और क्लियर रखें.

रूममेट की सहूलियत का खयाल

कई बार हमारी केवल अपनी सहूलियत दूसरे के लिए सिरदर्द भी बन जाती है. हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि आप के साथ उस रूम में कोई और भी है, जिसे कुछ तरह की चीजों से दिक्कत हो सकती है. जैसे देर रात फोन पर बात करना, देर रात तक टैलीविजन देखना या मोबाइल फोन पर बात करना वगैरह.

प्राइवेसी का ध्यान रखना

ऐसा नहीं है कि रूममेट के साथ हर बात शेयर की जाए या उसे हर बात बताने पर जोर दिया जाए. हर किसी की अपनी प्राइवेसी होती है. उस की इज्जत करना जरूरी है. अगर रूममेट आरामदायक महसूस नहीं कर रहा, तो उस की पर्सनल लाइफ में दखल न दें.

बिना पूछे सामान न इस्तेमाल करें

कई बार लोग रूममेट के सामान को अपना समझ कर इस्तेमाल करने लगते हैं, जो गलत है खासकर बगैर पूछे. ध्यान रहे कि खुद के लिए जरूरत का सामान जोड़ लें. अगर मुमकिन नहीं है, तो रूममेट से सामान इस्तेमाल करने से पहले इजाजत लें.

रूममेट की सही पहचान

भले ही रूममेट के साथ थोड़े समय के लिए ही जिंदगी बितानी होती है, पर फिर भी एक बेहतर रूममेट की पहचान करना जरूरी होता है. इस के लिए कुछ बातों के बारे में जान लेना बहुत जरूरी है :

सोशल मीडिया अकाउंट देखें

अगर किसी एप की मदद से रूममेट की खोज की है, तो उस के सोशल मीडिया अकाउंट्स को चैक कर लें. वहां उस की जानकारी मिल जाएगी, उस का तौरतरीका और रवैए की पहचान होने में मदद मिलेगी.

पहचान के लिए पब्लिक स्पेस

रूममेट की पहचान जैसे भी या जहां से भी हो, पहली मुलाकात में एकांत जगह या रूम में बुलाने से बचना चाहिए. एकदूसरे को जानने के बाद ही मेलजोल आगे बढ़ाएं.

पसंदनापसंद पर खुल कर बात

रूममेट के साथ रोज 10-12 घंटे गुजारने होते हैं, इसलिए जरूरी है कि एकदूसरे की पसंदनापसंद जानें. खुल कर पूछें और बताएं शराब, सिगरेट, मांसाहार और पार्टी के मामले में.

रूममेट के डौक्यूमैंट देखें

अगर इन सब के बाद वह रूममेट बनने को तैयार है, तो उस के डौक्यूमैंट्स वैरिफाई करें. इस में आधारकार्ड, वोटर आईडी, औफिस या कालेज कार्ड हो सकता है.

मैं अहम हूं- भाग 2: शशि की लापरवाही

उस के व्यावहारिक होने का थोड़ा अंदाजा तो बाहर से ही मिल रहा था. जब अंदर जा कर देखा तो एलईडी टैलीविजन, कंप्यूटर, चमचमाता महंगा फर्नीचर ओह, क्याक्या गिनाए. शशि की हैरानी को इंदुशायद भांप गई थी. बड़े गर्व से, गर्व के बजाय घमंड कहना ही उचित होगा, बोली, ‘यह सब मेरी मेहनत का फल है. यदि विकी को छात्रावास में न रखती तो इतने आराम से नौकरी थोड़े ही की जा सकती थी. उस को देखने के लिए आया, नौकर रखो, फिर उन नौकरों की निगरानी करो, अच्छा सिरदर्द ही समझो. अब मुझे कोई फिक्र नहीं. हर महीने 70 हजार रुपए कमा लेती हूं. काम भी अच्छा ही है. एक मल्टीनैशनल कंपनी में कंसल्टैंट के तौर पर काम करती हूं. जरा ढंग से संवर के रहना, लोगों से मिलना और मुसकान बिखेरते रहना. संवर के रहना किस औरत को अच्छा नहीं लगेगा. अरे, मैं तो बोले ही जा रही हूं. आप भी कहेंगी, अच्छी मिली. आइए, मैं आप को पूरा घर दिखाऊं.’

शयनकक्ष तो बिलकुल फिल्मी था. बढि़या सुंदर डबलबैड और उस पर बिछी चादर इतनी सुंदर कि हाय, शशि कल्पना में अपनेआप को उस पर अजय के साथ देखने लगी. सिर को झटक कर उस विचार को तुरंत निकाल देने की कोशिश की. बाहर के कमरे में आने पर अजय बोला, ‘चलो शशि, क्या यहीं रहने का इरादा है?’

इंदु ने अजय से कहा, ‘आप इन्हें कभीकभी यहां ले आया करिए. इन का मन भी बहला करेगा. आप को समय न हो तो मनोज को फोन कर दिया कीजिए, हम खुद ही इन्हें ले आएंगे.’ शशि की इच्छा तो हुई कि कहे, जब आप लेने आएंगी तो वहीं, मेरे घर पर बातचीत हो सकती है. पर उस का मन इतना भारी हो रहा था कि लग रहा था कि अगर एक बोल भी मुंह से निकला तो वह रो देगी. वह समझ रही थी कि इंदु सिर्फ अपने धन का दिखावा भर दिखाना चाहती थी. घर लौटते हुए आधे रास्ते तक दोनों चुप रहे. फिर अजय एकदम बोला, ‘मनोज की पत्नी भी खूब है.’ वह आगे कुछ बोले, इस से पहले शशि ने टोक दिया, ‘हां, मुझ जैसी बेवकूफ थोड़ी है.’

उस की आवाज रोंआसी थी. अजय ने आश्चर्य से उस की ओर देखा और प्यार से बोला, ‘शशि, कैसी बेवकूफों सी बातें करती हो?’ फिर उस ने एकदम दांतों तले जीभ दबा ली. यह वह अनजाने में क्या बोल गया, मानो शशि की कही हुई बात का समर्थन कर दिया हो. एकदम बात बदलते हुए बोला, ‘बहुत देर हो गई, बच्चे शायद सो भी गए होंगे.’ पर शशि की आग्नेय दृष्टि देख कर फिर वह रास्ते भर चुप ही रहा.

घर पहुंचने पर शशि सिरदर्द का बहाना कर के बिना कुछ खाएपिए लेट गई. पर रातभर उसे इंदु के बैडरूम के ही सपने आते रहे. इंदु की अलमारी में सजी साडि़योें की इंद्रधनुषी छटा रहरह कर आंखों के सामने नाच रही थी. ओह, कितनी साडि़यां, रोज एकएक पहने तो साल में उसे 3 या 4 बार से अधिक पहनने का मौका न आए. अब तो उन की दूसरी कार भी आने को है. वैसे तो कई लोगों के अच्छे व बड़े घर, कार सब देख चुकी है. खुद उस के भाईसाहब के पास कार है पर वे बहुत बड़े इंजीनियर हैं. अपने पति की बराबरी में तो जो भी हैं, सब का रहनसहन करीबकरीब एकसा ही है. शशि ने यह नहीं सोचा था कि उस की बेचैनी एक दिन उसे नौकरी करने पर मजबूर कर देगी. आवेदन देने के पहले कई दिन तक ऊहापेह में पड़ी रही. ढाई साल का बबलू, उसे कौन संभालेगा? सासूमां बूढ़ी हैं. अजय से जब राय मांगी तो उन्होंने भी यही कहा, ‘भई, परिस्थितिवश नौकरी करना बुरी बात नहीं, पर तुम्हें नौकरी की क्या जरूरत पड़ गई? कम से कम बबलू ही कुछ बड़ा हो कर स्कूल जाने लगे तो ठीक है. फिर आगे तुम्हारी इच्छा.’

सासससुर ने भी कहा, ‘बहू, बबलू को तो हम संभाल लेंगे. हमारा और है ही कौन. पर तुम्हारा शरीर भी तो दोनों भार को सहन कर सके तब न. जो भी करो, सोचसमझ कर करो.’’ पर उस के सिर पर तो जैसे जनून सवार था. 6-7 दिन तक तो स्कूल में बबलू की खूब याद आती थी, फिर ठीक लगने लगा. पर रोज स्कूल से लौट कर जब घर में कदम रखती तो घर की कुछ अव्यवस्थता मन को खटकती. एक दिन जब वह स्कूल से लौटी तो घर में कोई मेहमान आए हुए थे. कामवाली घर पर नहीं थी तो नीलू उन को पानी दे रही थी. नीलू को देखते ही उस का गुस्सा सातवें आसमान पर आ पहुंचा. बाल बिखरे हुए, फ्रौक की तुरपन उधड़ी हुई, हाथ में पेंटिंग कलर लगे हुए थे, अजीब हाल बना रखा था. नीलू को बगल से पकड़ कर खींचते हुए वह अंदर ले गई. उस का तमतमाता चेहरा देख कर वहां का वातावरण एकदम बोझिल हो गया. नीलू सुबकती हुई एक कोने में खड़ी हो गई.

उस समय शशि को अपनी गलती का खयाल नहीं आया, बल्कि उसे सब पर गुस्सा आया कि सब उस से खार खाए बैठे हैं और जानबूझ कर उस का अपमान करना चाहते हैं. पर आज लगता है, वास्तव में उस ने अपनी नौकरी के आगे बाकी हर बात को गौण समझ लिया. पहले वह अजय के मोजे, रूमाल देख कर रख दिया करती थी, उस के कपड़ों पर प्रैस, बटन आदि का भी ध्यान रखती थी. दोपहर के समय बच्चों के पुराने कपड़ों को बड़ा करना, मरम्मत करना आदि काफी कुछ काम कर लेती थी. अब तो अजय अपने हाथ से बटन लगाना आदि छोटीमोटी मरम्मत कर लेता है, पर मुंह से कुछ नहीं बोलता. बबलू भी इन 2 ही महीनों में कुछ दुबला हो गया है. दादी दूध दे सकती हैं, खिला सकती हैं, प्यार भी बहुत करती हैं, पर मां की ममता व आरंभिक शिक्षा और कोई थोड़े ही दे सकता है.

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