अपहरण नहीं हरण : भाग 3- क्या हरीराम के जुल्मों से छूट पाई मुनिया?

अपनी सीट पर बैठ कर देवा ने पानी भरी प्लास्टिक की बोतल का ढक्कन खोल कर पानी पिया, फिर मुनिया की तरफ बोतल बढ़ा दी, ‘‘लो प्यास लग आई होगी, पानी पी लो.’’ वाकई बड़ी देर से मुनिया की इच्छा पानी पीने की हो रही थी. उस ने बोतल में मुंह लगाया और बचा हुआ सारा पानी गटक गई.

खाली बोतल को उस ने देवा की तरफ बढ़ाया, फिर बोली, ‘‘क्या तुम वाकई मेरे बारे में जानना चाहते हो?’’ जब देवा ने हां में सिर हिलाया, तो वह बोली, ‘‘मेरी पूरी दास्तां सुनने के बाद तुम्हें मेरे उद्धार का रास्ता ढूंढ़ना होगा, क्योंकि मैं कैसे भी इस हरीराम से पिंड़ छुड़ाना चाहती हूं. बोलो, कर पाओगे मेरा उद्धार?’’ देवा ने विश्वास दिलाने के लिए मुनिया का हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया. मुनिया ने अपनी आपबीती सुनानी शुरू की और जब आपबीती खत्म हुई तो रात के 11 बज चुके थे और जाने कब देवा ने मुनिया को अपनी एक बांह के घेरे में ले लिया था.

बस के अंदर की लाइटें भी बंद थीं. थकान से भरे होने के चलते ज्यादातर लोगों ने अपनीअपनी सीट पर ऊंघ कर एकएक नींद पूरी कर ली थी. देवा ने अपना हाथ मुनिया के कंधों से हटाया. उस ने महसूस किया कि अपनी आपबीती सुनाते हुए वह जितनी बार भी सुबक कर रोई है, उतनी बार उस की कमीज का सीने वाला हिस्सा गीला हुआ है और अभी भी गीला है.

कुछ सोच कर देवा अपनी सीट से उठा और ड्राइवर और उस के पास बैठे कंडक्टर से उस ने पूछा, ‘‘कहीं गाड़ी रोकोगे भी या यों ही चलते जाओगे?’’ ‘‘हम 10 मिनट बाद चाय पीने के लिए रुकेंगे. वहीं जिसे फ्रैश होना होगा, हो लेगा, फिर आगे जब राजस्थान बौर्डर पार कर के मध्य प्रदेश की तरफ बढ़ेंगे, तब खाना खाने के लिए एक ढाबे पर रुकेंगे.

वहीं अलगअलग प्रदेश से आनेजाने वाली बसें तकरीबन एक घंटे के लिए रुकती हैं, फिर अपनेअपने रूट पर निकल जाती हैं,’’ कंडक्टर बोला. ‘‘अच्छा, यह बताओ कि कब तक भोपाल पहुंचा दोगे?’’ ‘‘कुछ कह नहीं सकते, क्योंकि इस महामारी का प्रकोप हर इलाके में तेजी से फैल रहा है. सुन रहे हैं कि चीन से यह बीमारी पूरी दुनिया में फैल रही है. भारत भी इस की चपेट में आ चुका है.

बस की कहीं भी रोक कर चैकिंग की जा सकती है, इसलिए कह नहीं सकते कि हम अपनी मंजिल पर कब पहुंचेंगे.’’ देवा जानकारी ले कर वापस अपनी सीट पर लौट आया था. उस की आहट पा कर झपकी लेती मुनिया सीधी हो कर बैठ गई. लगातार देवा को चुप देख कर मुनिया थोड़ा घबराई और बोली, ‘‘क्या हमारी किसी बात से नाराज हो गए?’’ ‘‘नहीं, तुम से हम नाराज क्यों होंगे. हम तो तुम्हें चाहने लगे हैं. हमारे दिमाग में अभीअभी एक विचार आया है.

बस यही सोच रहे हैं कि तुम्हारी खुशी की खातिर उस विचार को अंजाम दें या नहीं. फिर तुम पूरी तरह साथ दोगी, तभी वह मुमकिन होगा.’’ ‘‘तुम हमारी खुशी की सोचो और हम साथ न दें, ऐसा नहीं हो सकता. तुम बताओ तो सही, क्या करना है?’’ मुनिया ने पूछा. देवा ने इस बार अपने होंठ मुनिया के कानों से लगा दिए और अपनी योजना उस के कानों में बताने लगा, फिर बात पूरी कर के उस ने अंधेरे का फायदा उठा कर मुनिया के गालों को चूम लिया.

तभी बस झटका खा कर रुक गई. चाय पीने और फ्रैश होने की जगह आ गई थी. बस के अंदर की लाइटें जगमगा उठी थीं. बस का इंजन बंद कर के ड्राइवर भी उतर गया और कंडक्टर ने गुहार लगाई ‘‘बस यहां 20 मिनट रुकेगी, चाय पी लो, फ्रैश हो लो…’’ बस के रुकते ही देवा अपनी सीट से उठ कर खड़ा हो गया. मुनिया से पूछा, ‘‘नीचे उतरने का मन है?’’ मुनिया ने इशारे से कहा, कि तुम उतरो मैं आती हूं.

इतना कह कर उस ने पलट कर हरीराम वाली सीट की तरफ देखा. हरीराम के साथ जग्गू दादा भी हड़बड़ा कर उठ खड़े हुए थे. वे दोनों जैसेतैसे खड़े हुए, फिर नीचे उतरने के लिए बस के गेट की तरफ बढ़े. उन को अपनी सीट के पास से गुजरते हुए मुनिया ने महसूस किया और कुछ इस अंदाज में अपना सिर पीछे की तरफ लुढ़का लिया मानो बड़ी देर से गहरी नींद में सो रही हो.

पास से गुजरता हुआ हरीराम दो पल को ठिठक कर रुका. उस का मन हुआ कि इतनी चैन से सोती हुई मुनिया को तेजी से झकझोर कर उठाए, पर पीछे से जग्गू दादा की आवाज सुन कर आगे बढ़ गया, ‘‘अरे, उसे सोने दो. चलो, चाय पी कर आते हैं. बस ज्यादा देर नहीं रुकेगी.’’ उन के उतरते ही तकरीबन खाली हो चुकी बस के अंदर देवा तेजी से मुनिया के पास आया और बोला, ‘‘टौयलैट आ रही हो तो उतर कर जल्दी से कर आओ. बाईं तरफ चली जाना. उधर ही लेडीज टौयलैट है.

उन दोनों के चाय पी कर लौटने से पहले आ जाना.’’ मुनिया नीचे उतरी और उस के आने तक देवा अपनी सीट पर ही बैठा रहा. उस के वापस आते ही वह फिर नीचे उतर गया. फिर जब दोबारा सब सवारियां बैठ गईं और बस स्टार्ट हुई तो 2 पानी की बोतलें और गरमागरम भुजिया ले कर देवा भी वापस अपनी सीट पर आ कर बैठ गया. बस फिर चल दी. मुनिया और देवा एकदूसरे के प्रति जिस अपनेपन के भाव से भरते जा रहे थे, उस से खुद भी हैरान थे.

उन के एकदूसरे के करीब बैठने का अंदाज भी बदल चुका था. दोनों बड़े मजे से भुजिया खाने में जुटे हुए थे. बस अपनी रफ्तार से आगे बढ़ी चली जा रही थी. तकरीबन 2 बजे के आसपास बस उस जगह रुकी, जहां और भी बसें पहले से ही अलगअलग दिशाओं से आ कर रुकी हुई थीं. देवा ने बस से उतर कर यह जानकारी हासिल कर ली कि कौन सी बस देवास की तरफ इस से पहले निकलेगी.

उधर मुनिया ने अपनी सीट से उठ कर खाने की पोटली और पानी की बोतल हरिया को पीछे जा कर दे दी और बोली, ‘‘लो, खाना खा लो. इस में जग्गू दादा के लायक भी रोटियां हैं.’’ इधर जग्गू दादा बैठे थे, इसलिए पोटली उन्होंने ही पकड़ी और दोनों खाना खाने में जुट गए. खाना खाने के बाद उन्होंने भांग की एकएक गोली पानी में घोल कर पी और पीछे सिर टिका कर आंखें बंद कर लीं. कुछ ही देर में मुनिया ने खिड़की के बाहर देखा. देवा उसे बाहर आने का इशारा कर रहा था.

वह अपना बैग पहले से ही बाहर उठा कर ले जा चुका था.  मुनिया ने बस से नीचे उतरने से पहले हरिया की सीट की तरफ देखा. पलभर को एक खिंचाव सा हुआ. आखिर 2 साल तो वह हरिया के साथ रही ही थी, फिर मन को कड़ा कर के वह बस से नीचे उतर गई. देवा बोला, ‘‘तुम कंडक्टर को बताओ कि कौन सी अटैची तुम्हारी है.’’  बस के पीछे सामान चढ़ानेउतारने वाली लटकती सीढ़ी के कुछ डंडों पर चढ़ने के बाद मुनिया ने इशारे से बता कर अपनी अटैची उतरवाई.

अटैची उतरते ही देवा ने एक हाथ में मुनिया का हाथ पकड़ा और दूसरे हाथ में उस की अटैची उठा कर उस बस की तरफ दौड़ पड़ा, जो स्टार्ट हो कर देवास की तरफ जाने को तैयार थी. पहले उस ने मुनिया को चढ़ाया, फिर खुद चढ़ गया. मुनिया ने इस बस की खिड़की से उस बस की तरफ देखा जिस में हरिया रह गया था. एक बार उस ने मन में विचार आया कि कहीं देवा किसी मोड़ पर धोखा न दे जाए और वह कहीं की न रहे. मर्द औरत से ज्यादा उस के शरीर को चाहता है.

देवा भी कहीं उस के शरीर से खेलने के बाद उसे छोड़ न दे.  तभी देवा की आवाज उस के कानों में पड़ी, ‘‘मुनिया, हम सवेरेसवेरे ही देवास पहुंच जाएंगे. बड़े पापा का घर वहीं है.’’ ‘‘वह तो ठीक है, पर अपने घर पहुंच कर मेरा क्या परिचय दोगे? पता नहीं क्यों मेरा मन एक अजीब से डर से घबरा रहा?है. लगता है, कोई अनहोनी न हो जाए,’’ मुनिया बोली. ‘‘तुम ने मुझ पर विश्वास किया है न? बस, मैं इतना ही कहूंगा कि अगर मैं तुम्हारे विश्वास पर खरा न उतरूं, तो तुम अपने हरीराम के पास चली जाना,’’ कहतेकहते देवा रुका, फिर मुनिया का हाथ अपने हाथों में ले कर बोला, ‘‘तुम यह क्यों नहीं सोच रही हो कि मेरी तो किसी भी लड़की से शादी हो सकती थी, पर मैं ने तुम्हीं को क्यों चुना?

‘‘अपनी बात याद करो. तुम ने कहा था कि देवा क्या तुम मेरा उद्धार कर पाओगे? यों समझ लो कि तुम्हारी जिंदगी के उद्धार की बात ही है, इस समय मेरे मन में.’’ देवा की बातों से थोड़ा निश्चिंत हो कर मुनिया ने उस के कंधे पर अपना सिर टिका दिया और कुछ ही पलों में तेज दौड़ती बस के हिचकोलों ने उसे नींद में सुला दिया. सवेरे जब आंख खुली तो मुनिया देवास में थी.

बस से उतर कर देवा उसे ले कर सीधा अपने बड़े पापा के घर  आ गया.  मुनिया को देख कर बड़ी अम्मां और बड़े पापा ने हैरान होते हुए सवालिया निगाहों से देवा को देखते हुए पूछा कि यह कौन है? ‘‘बड़े पापा, यह मुनिया है. मेरी दुलहन. हम ने शहर में ही शादी कर ली थी, पर आप को बताना भूल गए थे, फिर वह मुनिया की तरफ घूमा और बोला, ‘‘अरे घबराओ नहीं… बड़े पापा और बड़ी अम्मां दोनों के पैर छुओ न झुक कर.’’ ‘‘ओह, तो तुम भी हमारी तरह अपनी पसंद की दुलहन ले कर घर में घुसे हो. अरे, हमें तो अपना समय याद आ गया जब…’’ कहतेकहते बड़े पापा अपना समय याद कर के हंस पड़े. तभी मुनिया उन दोनों के पैरों में झुक गई, हालांकि उस की आंखें भी छलक आई थीं, पर बूंदों को जमीन पर गिरने से वह बचा ले गई.

फिर क्यों: क्या था दीपिका का फैसला – भाग 2

जब सास उसे तरहतरह के ताने देने लगी तो दीपिका ने आखिर चुप्पी तोड़ दी. उस ने सभी के सामने सच्चाई बता दी. पर उस का सच किसी ने स्वीकार नहीं किया. सभी ने उस की कहानी मनगढ़ंत बताई.

आखिर अपने सिर बदचलनी का इलजाम ले कर दीपिका मातापिता के साथ मायके आ गई.

वह समझ नहीं पा रही थी कि अब क्या करे. भविष्य अंधकारमय लग रहा था. होने वाले बच्चे की चिंता उसे अधिक सता रही थी.

5 दिन बाद दीपिका जब कुछ सामान्य हुई तो मां ने उसे समझाते हुए गर्भपात करा कर दूसरी शादी करने की सलाह दी.

कुछ सोच कर दीपिका बोली, ‘‘मम्मी, गलती मैं ने की है तो बच्चे को सजा क्यों दूं. मैं ने फैसला कर लिया है कि मैं बच्चे को जन्म दूंगी. उस के बाद ही भविष्य की चिंता करूंगी.’’

दीपिका को ससुराल आए 20 दिन हो चुके थे तो अचानक तुषार आया. वह बोला, ‘‘मुझे विश्वास है कि तुम बदचलन नहीं हो. तुम्हारे पेट में मेरे भाई का ही अंश है.’’

‘‘जब तुम यह बात समझ रहे थे तो उस दिन अपना मुंह क्यों बंद कर लिया था, जब सभी मुझे बदचलन बता रहे थे?’’ दीपिका ने गुस्से में कहा.

‘‘उस दिन मैं तुम्हारे भविष्य को ले कर चिंतित हो गया था. फिर यह फैसला नहीं कर पाया था कि क्या करना चाहिए.’’ तुषार बोला.

दीपिका अपने गुस्से पर काबू करते हुए बोली, ‘‘अब क्या चाहते हो?’’

‘‘तुम से शादी कर के तुम्हारा भविष्य संवारना चाहता हूं. तुम्हारे होने वाले बच्चे को अपना नाम देना चाहता हूं. इस के लिए मैं ने मम्मीपापा को राजी कर लिया है.’’

औफिस और मोहल्ले में वह बुरी तरह बदनाम हो चुकी थी. सभी उसे दुष्चरित्र समझते थे. ऐसी स्थिति में आसानी से किसी दूसरी जगह उस की शादी होने वाली नहीं थी, इसलिए आत्ममंथन के बाद वह उस से शादी के लिए तैयार हो गई.

दीपिका बच्चे की डिलीवरी के बाद शादी करना चाहती थी, लेकिन तुषार ने कहा कि वह डिलीवरी से पहले शादी कर के बच्चे को अपना नाम देना चाहता है. ऐसा ही हुआ. डिलीवरी से पहले उन दोनों की शादी हो गई.

जिस घर से दीपिका बेइज्जत हो कर निकली थी, उसी घर में पूरे सम्मान से तुषार के कारण लौट आई थी. फलस्वरूप दीपिका ने तुषार को दिल में बसा कर प्यार से नहला दिया और पलकों पर बिठा लिया.

तुषार भी उस का पूरा खयाल रखता था. घर का कोई काम उसे नहीं करने देता था. काम के लिए उस ने नौकरी रख दी थी.

तुषार का भरपूर प्यार पा कर दीपिका इतनी गदगद थी कि उस के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे.

डिलीवरी का समय हुआ तो बातोंबातों में तुषार ने दीपिका से कहा, ‘‘तुम अपने बैंक की डिटेल्स दे दो. डिलीवरी के समय अगर मेरे एकाउंट में रुपए कम पड़ जाएंगे तो तुम्हारे एकाउंट से ले लूंगा.’’

दीपिका को उस की बात अच्छी लगी. बैंक की पासबुक, डेबिट कार्ड और ब्लैंक चैक्स पर दस्तखत कर के पूरी की पूरी चैकबुक उसे दे दी.

नौरमल डिलीवरी से बेटा हुआ तो उस का नाम गौरांग रखा गया. 6 महीने बाद तुषार ने हनीमून पर शिमला जाने का प्रोग्राम बनाया तो दीपिका ने मना नहीं किया.

वहां से लौट कर आई तो बहुत खुश थी. तुषार का अथाह प्यार पा कर वह विक्रम को भूल गई थी.

गौरांग एक साल का हो गया था. फिर भी दीपिका ने तुषार से डेबिट कार्ड और दस्तखत किए हुए चैक्स वापस नहीं लिए थे. इस की कभी जरूरत महसूस नहीं की थी. तुषार ने उस के अंधकारमय जीवन को रोशनी से नहला दिया था. ऐसे में भला वह उस पर अविश्वास कैसे कर सकती थी.

जरूरत तब पड़ी, जब एक दिन दीपिका के पिता को बिजनैस में कुछ नुकसान हुआ और उन्होंने उस से 3 लाख रुपए मांगे. तब दीपिका ने पिता का एकाउंट नंबर तुषार को देते हुए कहा, ‘‘तुषार, मेरे एकाउंट से पापा के एकाउंट में 3 लाख रुपए ट्रांसफर कर देना.’’

इतना सुनते ही तुषार ने दीपिका से कहा, ‘‘डार्लिंग, तुम्हारे एकाउंट में रुपए हैं कहां. मुश्किल से 2-4 सौ रुपए होंगे.’’

दीपिका को झटका लगा. क्योंकि उस के एकाउंट में तो 12 लाख रुपए से अधिक थे. आखिर वे पैसे गए कहां.

उस ने तुषार से पूछा, ‘‘मेरे एकाउंट में उस समय 12 लाख रुपए से अधिक थे. इस के अलावा हर महीने 40 हजार रुपए सैलरी के भी आ रहे थे. सारे के सारे पैसे कहां खर्च हो गए?’’

तुषार झुंझलाते हुए बोला, ‘‘कुछ तुम्हारी डिलीवरी में खर्च हुए, कुछ हनीमून पर खर्च हो गए. बाकी रुपए घर की जरूरतों पर खर्च हो गए. तुम्हारे पैसों से ही तो घर चल रहा है. मेरी सैलरी और पापा की पेंशन के पैसे तो शिखा की शादी के लिए जमा हो रहे हैं.’’

तुषार का जवाब सुन कर दीपिका खामोश हो गई. पर उसे यह समझते देर नहीं लगी कि उस के साथ कहीं कुछ न कुछ गलत हो रहा है.

डिलीवरी के समय उसे छोटे से नर्सिंगहोम में दाखिल किया गया था. उस का बिल मात्र 30 हजार रुपए आया था. हनीमून पर भी अधिक खर्च नहीं हुआ था. जिस होटल में ठहरे थे, वह बिलकुल साधारण सा था. उन का खानापीना भी सामान्य हुआ था.

जो होना था, वह हो चुका था. उस पर बहस करती तो रिश्ते में खटास आ जाती. लिहाजा उस ने भविष्य में सावधान रहने की ठान ली.

तुषार से अपनी बैंक पास बुक, चैकबुक और डेबिट कार्ड ले कर उस ने कह दिया कि वह घर खर्च के लिए महीने में सिर्फ 10 हजार रुपए देगी. सैलरी के बाकी पैसे गौरांग के भविष्य के लिए जमा करेगी और शिखा की शादी में 2 लाख रुपए दे देगी.

दीपिका के निर्णय से तुषार को दुख हुआ, लेकिन वह उस समय कुछ बोला नहीं.

अगले दिन ही दीपिका ने बैंक से ओवरड्राफ्ट के जरिए पैसे ले कर अपने पिता को दे दिए. पर उन्हें यह नहीं बताया कि तुषार ने उस के सारे रुपए खर्च कर दिए हैं.

कुछ दिनों तक सब कुछ सामान्य रहा. उस के बाद अचानक तुषार ने उस से कहा, ‘‘मैं ने नौकरी छोड़ दी है.’’

‘‘क्यों?’’ दीपिका ने पूछा.

‘‘बिजनैस करना चाहता हूं. इस के लिए तैयारी कर ली है, पर तुम्हारी मदद के बिना नहीं कर सकता.’’

‘‘तुम्हारी मदद हर तरह से करूंगी. बताओ, मुझे क्या करना होगा?’’ दीपिका ने पूछा.

‘‘तुम्हें अपने नाम से 50 लाख रुपए का लोन बैंक से लेना है. उसी रुपए से बिजनैस करूंगा. मेरा कुछ इस तरह का बिजनैस होगा कि लोन 5 साल में चुकता हो जाएगा.’’

‘‘इतने रुपए का लोन मुझे नहीं मिलेगा. अभी नौकरी लगे 5 साल ही तो हुए हैं.’’

‘‘मैं ने पता कर लिया है. होम लोन मिल जाएगा.’’

‘‘होम लोन लोगे तो बिजनैस कैसे करोगे. इस लोन में फ्लैट या कोई मकान लेना ही होगा.’’ दीपिका ने बताया.

‘‘इस की चिंता तुम मत करो. मैं ने सारी व्यवस्था कर ली है. तुम्हें सिर्फ होम लोन के पेपर्स पर दस्तखत कर बैंक में जमा करने हैं.’’

‘‘मैं कुछ समझी नहीं, तुम करना क्या चाहते हो. ठीक से बताओ.’’

बिजली कहीं गिरी असर कहीं और हुआ- भाग 2: कौन थी खुशबू

इस तरह के विचार मन में आने के बाद शारदा कोशिश करने के बाद भी खुशबू के प्रति अपने व्यवहार को सामान्य नहीं कर पा रही थीं. यह बात जैसे आहिस्ता – आहिस्ता शारदा के मन में घर बना रही थी कि 7 वर्ष पहले शायद नर्सिंगहोम में उस के बच्चे को भी बदल कर किसी दूसरे को दे दिया गया. अगर ऐसा हुआ था तो उस ने अवश्य एक बेटे को ही जन्म दिया होगा.

मन में उठने वाले इन विचारों ने जैसे शारदा के जीवन का सारा सुखचैन ही छीन लिया.

अपने मन में चल रहे विचारों के मंथन को शारदा अपने पति रमाकांत से छिपा नहीं सकी थी. उन ने बोलीं कि मैं ने भी तो अपने तीसरे बच्चे को इसी नर्सिंगहोम में जन्म दिया था. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि औरों की तरह मैं ने भी कहीं धोखा ही खाया हो? खुशबू वास्तव में हमारी बच्ची न हो?’’

शारदा की बात सुन रमाकांत स्तब्ध रह गए, ‘‘उन्हें इस तरह की बातें नहीं सोचनी चाहिए. ऐसी बातों का अब कोई मतलब नहीं. 7 साल बीत चुके हैं. ऐसी बातें सोचने से हमारी ही परेशानी बढ़ेगी,’’ रमाकांत ने उन्हें सम झाने की कोशिश की.

‘‘मैं चाह कर भी इस शक को अपने मन से निकाल नहीं  सकती. क्या तुम्हें नहीं लगता कि 7 साल पहले हमारे साथ जो कुछ भी हुआ था अजीब हुआ था? अपने दिल पर जरा हाथ रख कर कहो मैं जो भी कह रही हूं गलत कह रही हूं? तुम कह सकते हो कि पंडित और ज्योतिषयों ठोंग करते हैं. उन की बातें  झूठी होती हैं. मगर क्या मशीनें भी  झूठ बोलती हैं? मैडिकल साइंस भी अंधी है?’’

‘‘तुम्हारी इन सारी बातों के मेरे पास जवाब नहीं शारदा, मगर मैं तुम से इतना ही पूछना चाहता हूं कि गड़े मुरदे को उखाड़ने से क्या फायदा होगा? मैं मानता हूं नर्सिंगहोम में बहुत से लोगों के साथ धोखा हुआ, मगर इस बात का कोई सुबूत हम लोगों के पास नहीं कि उन लोगों में हम शामिल थे ही. बेकार मन में वहम पालो कि खुशबू हमारी बेटी नहीं.’’

‘‘यह वहम नहीं, एक हकीकत हो सकती है,’’ शारदा ने शब्दों पर जोर देते हुए शारदा ने कहा.

‘‘मैं तुम्हारी बात मान भी लूं, तो इस हकीकत को साबित कौन करेगा? रमाकांत का लहजा तलख हो गया.

‘‘हमें पुलिस से संपर्क करना चाहिए.’’

‘‘क्या पुलिस इस बात का फैसला करेगी कि खुशबू हमारी बेटी है या नहीं?’’

‘‘तुम हमेशा मेरी बात का उलट मतलब निकालते हो, पुलिस सारे मामले की जांच कर रही है. वह इस मामलें में हमारी मदद कर सकती है,’’ शारदा ने कहा. उन के स्वर में बेसब्री थी.

‘‘तुम्हारे कहने का मतलब यह है कि हम अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारें. पुलिस के पास जाए और उस से कहें कि हमें शक है कि खुशबू हमारी बेटी नहीं, नर्सिंगहोम वालों ने बेइमानी  कर के हमारे बच्चे को भी बदल दिया था. जानती हो इस के बाद क्या होगा? पुलिस इस मामले में हमें जांच का आश्वासन देगी, मगर इस के साथ ही वह एक काम और भी करेगी और खुशबू को हम से छीन किसी अनाथालय में भेज देगी. वह तब तक उसी अनाथालय में रहेगी जब तक पुलिस की जांच पूरी नहीं हो जाती. इस के साथ ही अगर तुम्हारे शक के मुताबिक पुलिस की जांच में यह साबित हो जाए कि नर्सिंगहोम वालों ने हमारा बच्चा भी बदला था तो इस बात की कोई गारंटी नहीं कि खुशबू के बदले में हमें कोई दूसरा बच्चा मिल ही जाएगा. अगर तुम इन सब चीजों का सामना करने के लिए तैयार हो तो मैं पुलिस स्टेशन चलने को तैयार हूं,’’ रमाकांत ने पत्नी को गहरी नजरों से देखते हुए कहा.

इस पर शारदा मानो धर्मसंकट में पड़ती हुई नजर आईं. इस के बाद पुलिस के पास जाने की बात शारदा ने पति से नहीं की. हां पंडित रामकुमार तिवारी से जरूर जिक्र किया, पर पुलिस के पास जाने को उस ने भी मना किया.

बिना कुछ हासिल किए ही कोई चीज गंवाने का रिस्क उठाने की हिम्मत शारदा में नहीं थी. अपने शक के कारण पुलिस के पास जाने का खयाल तो शारदा ने फिलहाल मन से निकाल दिया, मगर इस से उस के मन में जैसे घर बना चुका वहम नहीं निकला कि  वह भी नर्सिंगहोम वालों के धोखे की शिकार है.

शारदा के मन के वहम ने मासूम खुशबू के जीवन को बहुत ही उदास बना डाला था. वह मम्मी में पहले वाला प्यार ढूंढ़ती नजर आती थी जो उसे नहीं मिलता था. मम्मी के व्यवहार की बेरुखी देख मासूम खुशबू यह भी नहीं सम झ पाती कि उस से गलती क्या हुई है?

रमाकांत खुशबू के पति शारदा के बदले व्यवहार से परेशान थे, पर समस्या के तत्काल समाधान का रास्ता नहीं सू झ रहा था.

सारी कशमकश के बीच एक नई बात कह कर शारदा ने रमाकांत के लिए एक नया सिरदर्द पैदा कर दिया.

डीएनए के माने वास्तव में क्या थे और वह क्या था यह तो शारदा को मालूम नहीं था, मगर पंडित रामकुमार तिवारी के कहने पर और टीवी पर खबरें सुनने से उन्हें इतना अवश्य मालूम था कि उन के टैस्ट से किसी भी बच्चे के असली मांबाप का पता लगाया जा सकता है.

शारदा ने रमाकांत से कहा, ‘‘पंडितजी कह रहे थे कि एक टैस्ट होना है जिस से किसी भी बच्चे के असली मांबाप के बारे में बिलकुल सही ढंग से जाना जा सकता है. मैं ने मोबाइल पर पढ़ा था, डीएनए या ऐसा ही कोई मिलताजुलता नाम था इस टैस्ट का. क्यों न हम भी अपना व खुशबू का टैस्ट करवा लें? उस से दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. पंडितजी ने एक लैब का कार्ड भी दिया है कि वह उन की जानपहचान की है.

शारदा की बात सुन रमाकांत कुछ पलों के लिए तो हक्काबक्का रह गए.

वे नहीं जानते थे कि  खुशबू को ले कर शारदा की सोच इस हद तक चली गई है.

‘‘इस टैस्ट को क्या तुम ने कोई मजाक सम झा है? इस पर बहुत पैसा खर्च होगा,’’ रमाकांत ने शारदा को टालने की गरज से कहा.

‘‘चाहे जितना भी खर्च आए करो, मगर किसी तरह भी मु झे मेरी दिनरात की दिमागी तकलीफ से छुटकारा दिलाओ वरना यह मु झे मार डालेगी,’’ शारदा ने कहा.

शारदा की बात से रमाकांत को लगा कि मामला एक नाजुक शक्ल ले रहा है. खुशबू को ले कर लगातार अंदर से घुल रही शारदा का तनाव खतरनाक सीमा तक बढ़ गया है. अगर जल्दी शारदा को उस की वर्तमान मनोस्थिति से बाहर निकालने का कोई रास्ता नहीं खोजा गया तो इस के बुरे नतीजे सामने आ सकते हैं.

रमाकांत ने इस बारे में बहुत सोचा, बहुत मंथन किया. अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि शारदा को उन की वर्तमान मनोस्थिति में से निकालने के लिए  झूठ का ही सहारा लेना पड़ेगा.

तभी रमाकांत को अपने बचपन के दोस्त सतीश धवन की याद आ गई, जो डाक्टर था.

सतीश धवन अपने क्लीनिक के साथसाथ एक लैब का भी मालिक था. रमाकांत ने डाक्टर सतीश धवन से मिल कर उसे अपनी सारी समस्या बताई. रामकुमार तिवारी के दिए गए लैब के कार्ड को भी दिखाया.

बीती ताहि बिसार दे – भाग 5 : देवेश के दिल की

मां के पास उस के लिए कई रिश्ते आए थे, जिन में से कई रिश्ते कुआरी लड़कियों के भी थे. पर वे रिश्ते ऐसे ही थे जैसे एक विवाहित व 1 बच्चे के पिता के लिए आ सकते थे. देवेश उन रिश्तों के बारे में सुनता भी नहीं था. देवेश की कुंआरी भावनाएं जो अभी जस की तस थीं. वह सोच भी नहीं पाता था कि उस का विवाह एक बार हो चुका है और वह एक बच्चे का पिता है. उस के जीवन की उलझनों का शिकार अकसर शनी हो जाता था. वह न कभी शनी को गोद में उठाता न कभी दुलारता. एक अनजानी सी नफरत घर कर गई थी उस मासूम बच्चे के लिए उस के दिल में. वह उसे अपनी जिंदगी की सब से बड़ी बाधा समझता था.

एकाएक कहीं दूर से घंटा बजने की आवाज सुनाई दी. स्मृतियों में खोया देवेश जैसे अपनेआप में लौट आया. घड़ी पर नजर डाली. रात के 2 बज रहे थे. उस ने एक लंबी सांस ली. उस की आंखें अभी भी गीली थीं. उस ने दोनों हथेलियों से अपनी आंखें पोंछीं और फिर बैडरूम में चला गया.

उस के बाद जब कभी शानिका आई, वह उस से सामना होने को टालता रहा. यह सोच कर कि शानिका से किसी पूर्व सूचना के घर आ गई. रागिनी उस समय घर पर नहीं थी. मां को प्रणाम कर वह किताबें ले कर स्टडीरूम में चली गई. उसे भी पता नहीं था कि देवेश इस समय घर पर होगा. देवेश को देख कर वह चौंक गई. शानिका को अचानक सामने आया देख कर देवेश भी चौंक गया. दिल की धड़कनें बेकाबू हो गईं. आज उसे शानिका बहुत दिनों बाद दिखाई दी.

‘‘अरे आप आज घर पर कैसे?’’

‘‘बस थोड़ा देर से जाऊंगा आज,’’ देवेश मुसकराते हुए बोला, ‘‘रागिनी को पता नहीं था कि आप आने वाली हैं? वह तो अभी घर पर नहीं है. पर जल्दी आ जाएगी.’’

‘‘कोई बात नहीं मैं इंतजार कर लूंगी. ये लीजिए अपनी किताबें,’’ वह किताबें मेज पर रखती हुई बोली.

‘‘दूसरी किताबें देख लीजिए जो आप को चाहिए,’’ वह मीठे स्वर में बोला. वह शानिका की मौजूदगी को इतने दिनों से टाल रहा था. लेकिन अब सामने आ गई थी तो उस का दिल नहीं कर रहा था कि वह जाए.

शानिका शेल्फ में किताबें देखने लगी. देवेश अपने दिल पर अकुंश नहीं रख पा रहा था. सोच रहा था, एक बार तो बात करे शानिका से कि आखिर वह क्या चाहती है. अपने ही ध्यान में जैसे किसी अदृश्य शक्ति से बंधा ऐसा सोचता हुआ वह उस के करीब आ गया.

‘‘शानिका,’’ वह भावुक स्वर में बोला.

‘‘जी,’’ एकाएक उसे इतने करीब देख कर शानिका उस की तरफ पलट गई.

‘‘मुझ से शादी करोगी?’’ उस की निगाहें उस के चेहरे पर टिकी थीं. उसे स्वयं पता नहीं था कि वह क्या बोल रहा है.

‘‘जी,’’ शानिका हकला सी गई, ‘‘मैं ने ऐसा कुछ सोचा नहीं अभी,’’ वह उलझी, परेशान सी बोली.

‘‘तो कब सोचोगी?’’ देवेश का स्वर हलका सा कठोर हो गया.

शानिका गरदन झुकाए नीचे देखने लगी.

‘‘बोलो शानिका कब सोचोगी?’’

‘‘पता नहीं मेरे घर वाले मानेंगे या नहीं…’’

‘‘अगर तुम्हारे घर वाले नहीं मानेंगे तो क्यों आई हो मेरी जिंदगी में तूफान ले कर,’’ वह उसे झंझोड़ता हुआ बोला, ‘‘क्यों मेरी भावनाओं को उकसाया तुम ने? मैं जैसा भी था अपने हाल से समझौता कर लिया था मैं ने. तुम ने क्यों हलचल मचा दी मेरे दिलदिमाग में. बताओ शानिका बताओ,’’ वह उसे बुरी तरह झंझोड रहा था. उस की आंखों में आंसू थे और चेहरे पर कठोरता के भाव.

शानिका देवेश को ऐसे रूप में देख कर हड़बड़ा सी गई. वह खुद को छुड़ाने का यत्न करने लगी. बोली, ‘‘छोड़ दीजिए मुझे. मैं आप की बात का जवाब बाद में दूंगी. आप अभी होश में नहीं हैं.’’

‘‘मैं होश में नही हूं और होश में न ही आऊं तो ठीक है… जाओ चली जाओ मेरे सामने से. फिर कभी मत आना मेरे सामने,’’ कह कर उस ने शानिका को हलका सा धक्का दे कर छोड़ दिया.

शानिका रोती हुई बाहर निकल गई. तभी अंदर आती रागिनी ने उसे पकड़ लिया. पूछा, ‘‘क्या हुआ शानिका? ऐसी बदहावास सी क्यों हो रही है और रो क्यों रही है? भैया ने कुछ कहा क्या?’’

‘‘नहीं…मैं घर जा रही हूं.’’

‘‘चली जाना…पहले मेरे साथ आ,’’ वह उसे खींचती हुई अपने बैडरूम में ले गई. उसे सहलाया, पानी पिलाया. जब वह संयत हो गई तो फिर बोली, ‘‘शानिका मैं नहीं जानता, तेरे और भैया के बीच ऐसी क्या बात हुई पर मैं बात का अंदाजा लगा सकती हूं. मैं जानती हूं भैया तुझ से बहुत प्यार करते हैं. तुझ से शादी करना चाहते हैं…मैं जानती हूं यह नामुमकिन है, फिर भी पूछना चाहती हूं कि तेरा दिल क्या कहता है? तेरे दिल में भैया के लिए वैसी कोमल भावनाएं हैं क्या? तू भी उन्हें पसंद करती है?’’

शानिका कुछ नहीं बोली. टपटप आंसू गिरने लगे.

‘‘बोल न शानिका,’’ रागिनी उसे प्यार से सहलाते हुए बोली.

‘‘मेरे चाहने से क्या होता…मम्मीपापा को कौन मनाएगा? मैं तो बोल भी नहीं सकती उन से.’’

‘‘मतलब कि तू भी भैया से प्यार करती है?’’

शानिका ने कोई जवाब नहीं दिया. चुपचाप नीचे देखती रही. थोड़ी देर दोनों चुप रहीं, फिर रागिनी बोली, ‘‘पापा की जिद्द ने भैया के जीवन में इतना बड़ा व्यवधान पैदा कर दिया. छोटी सी उम्र में उन्हें शादी के बंधन में बांध दिया और वह शादी उन के  लिए नासूर बन गई. वरना तू भी जानती है कि मेरे भैया जैसा लड़का चिराग ले कर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेगा, उन जैसा साथी पाने का तो कोई भी लड़की ख्वाब देख सकती है.’’

शानिका ने कोई जवाब नहीं दिया तो रागिनी फिर बोली, ‘‘अगर प्यार भैया से करती है, तो किसी दूसरे के साथ कैसे खुश रह पाएगी तू और जब तक अपनी बात नहीं बोलेगी तब तक कोई तेरी बात कैसे मानेगा…अपने दिल की बात अपने मातापिता से कहना कोई गुनाह तो नहीं. अगर प्यार करती है तो बोलने की भी हिम्मत कर. चुप मत रह. चुप रहना किसी समस्या का हल नहीं है. तेरी चुप्पी, भैया और तेरी दोनों की जिंदगी बरबाद कर देगी,’’ रागिनी ने उसे समझाबुझा कर घर भेज दिया.

बीती ताहि बिसार दे – भाग 2 : देवेश के दिल की

अभी भी नहीं भूलता देवेश उस दिन को जब उसे उस के पिता के कैंसर होने का पता चला था. कैंसर आखिरी स्टेज पर था. तब देवेश ने अपना एमबीए खत्म कर पिता के व्यवसाय में रुचि लेनी शुरू ही की थी कि पिता की बीमारी ने व्यवसाय का सारा भार उस के नाजुक कंधों पर डाल दिया. तब वह सिर्फ 23 साल का था. पिता की बीमारी ने सब को सकते में डाल दिया. किसी को कुछ नहीं सूझ रहा था.

देवेश ने पिता के इलाज में दिनरात एक कर दिया पर मौत की तरफ बढ़ते पिता के कदमों को वह नहीं लौटा पाया. एक दिन पिता ने उस से आखिरी इच्छा व्यक्त की कि यदि वह चाहता है कि वे सुखसंतोष से इस दुनिया से जाए तो वह शादी कर ले. वे उस की शादी देखना चाहते हैं.

देवेश परेशान सा हो गया. बोला, ‘‘इतनी जल्दी अभी तो मुझे बहुत कुछ करना है. ये भी कोई उम्र है शादी की? मेरे साथ के लड़के तो अभी पढ़ ही रहे हैं.’’

‘‘तू शादी कर लेगा बेटा, तो मैं चैन से मर सकूंगा. व्यवसाई परिवारों में तो शादियां जल्दी हो ही जाती हैं. तुझे जो करना है उस के बाद करते रहना. मेरी यह इच्छा पूरी कर दे देवेश… तेरी मां के लिए सहारा हो जाएगा और मैं भी एक जिम्मेदारी पूरी कर के चैन से दुनिया से जा पाऊंगा.’’

‘‘लेकिन पापा इतनी जल्दी लड़की कहां मिलेगी… कौन ढूंढ़ेगा?’’ वह मजबूर सा हो कर बोला.

‘‘लड़की है मेरी नजर में… मेरे दोस्त समीर की बेटी. एमबीए है. सुंदर है… समीर भी तैयार है इस रिश्ते के लिए.’’

पिता की हालत देख कर भावुक हो देवेश कुछ नहीं बोल पाया. आननफानन में एक सादे से समारोह में उस की शादी हो गई. उस की नवविवाहिता पत्नी 2 दिन उस के साथ रही. उन 2 दिनों में भी निमी के चेहरे व स्वभाव में उस ने एक अजीब तरह का तनाव महसूस किया. फिर उस ने सोचा कि वह भी शायद उस की तरह जल्दबाजी में हुई इस शादी के कारण उलझन में होगी. तीसरे दिन वह उसे 2-4 दिनों के लिए उस के मायके छोड़ आया. लेकिन वह जब उसे लेने गया तो उस ने आने से इनकार कर दिया. उस के ससुर ने कहा कि थोड़े दिनों वे स्वयं ही निमी को ससुराल छोड़ने आ जाएंगे. लेकिन निमी को न आना था न आई.

पिता थोड़े दिनों बाद सब को अलविदा कह गए. कुछ दिन तो पिता के जाने के दुख से उबरने में लग गए उसे. फिर मां ने उसे बहू को लिवा लाने भेज दिया. लेकिन निमी फिर भी आने को तैयार नहीं हुई. उसे कुछ समझ नहीं आया. निमी का व उस का संपर्क मात्र 2 दिन का था. इसलिए वह उसे बहुत जोरजबरदस्ती भी नहीं कर पा रहा था. नईनई ससुराल में भी कुछ बोल नहीं पा रहा था. छोटी सी उम्र में तमाम जिम्मेदारियों ने उसे अजीब सी उलझन में डाल दिया था.

धीरेधीरे दबीढकी बातें सामने आने लगीं. निमी किसी दूसरे लड़के से विवाह करना चाहती थी. पर उस के पिता को वह लड़का और रिश्ता पसंद नहीं था. अपने पिता की जिद्द की वजह से वह उस के साथ शादी के लिए तैयार हो गई. निभाना चाहा पर रह नहीं पाई और अब वह किसी भी सूरत में आने के लिए तैयार नहीं थी.

वह हतप्रभ रह गया. उस की जिंदगी ने यह कैसा मोड़ ले लिया और यह मोड़ इतने पर भी खत्म नहीं हुआ. इस के बाद वह गहरी खाई में गिर पड़ा, जब कुछ महीनों बाद पता चला कि निमी मां बनने वाली है. जब मां ने ये सब सुना तो उसे समझाबुझा कर दोबारा निमी को लिवा लाने भेजा. किसी तरह बेमन से वह निमी को लेने ससुराल चला गया. उस ने बहुत समझाया कि बीती बातों को भुला दे और उस के साथ नई जिंदगी शुरू करे.

निमी के मातापिता ने भी बहुत समझाया, पर निमी तो जैसे पगली सी हो गई थी. न वह आने को तैयार हुई और न ही वह ऐसी हालत में अपना खयाल रखती थी. उसे उस पर दया भी आई. वह भी उस की तरह अपने पिता की जिद्द की शिकार हो गई. थकहार कर वह वापस आ गया.

चिड़िया चुग गईं खेत: शादीशुदा मनोज के साथ थाईलैंड में क्या हुआ था – भाग 2

किसी का दर्द उस से देखा नहीं जाता था, खासतौर पर लड़कियों का. मसाज का वक्त खत्म हो गया था. मनोज केबिन से निकलने के लिए कपड़े पहनने लगा. जूली का चेहरा उदास सा था, आंखें भरी हुई थीं.

‘‘पता नहीं क्यों, आप से मिलना बहुत अच्छा लगा. आप और लोगों से बहुत अलग हैं. मैं ने सुना था कि भारतीय लोग चरित्र और मन से बहुत सच्चे और अच्छे होते हैं. आज आप के रूप में देख भी लिया.’’

मनोज अपनी तारीफ सुन कर खुश हो गया.

‘‘अब आप से फिर मुलाकात कब होगी? आप पटाया में कब तक हैं?’’ जूली ने आतुर स्वर में पूछा.

‘‘अभी तो मैं 3 दिनों तक यहीं हूं. आज मीटिंग के बाद शाम को फ्री हूं,’’ मनोज ने बताया.

जूली की आंखों में चमक आ गई, ‘‘तो आज शाम को मिल सकते हो क्या?’’ उस ने आग्रहभरे स्वर में पूछा.

‘‘हां, ठीक है. शाम को 6 बजे मिलता हूं,’’ मनोज ने कहा तो जूली खुश हो गई. उस ने मनोज का मोबाइल नंबर ले लिया और अपना उसे दे दिया. जूली से विदा हो कर मनोज बाहर आ गया.

भावेश और सुरेश पहले से ही बाहर उस की राह देख रहे थे. उसे देखते ही दोनों आपस में रहस्यमय ढंग से एकदूसरे को देख कर मुसकराए.

‘‘क्यों बे, तू तो आने को तैयार नहीं था और अब सब से ज्यादा देर अंदर तू ही बैठा रहा,’’ भावेश ने उस की चुटकी ली.

‘‘क्या कर रहा था अंदर? मालिश या और कुछ?’’ सुरेश ने आंख दबाते हुए मनोज की चुटकी ली.

मनोज झेंप गया, ‘‘अरे यार, तुम लोग जैसा समझ रहे हो वैसा कुछ नहीं है.’’

‘‘हां बेटा, हम सब समझते हैं कि कैसा है,’’ दोनों ने उसे चिढ़ाया.

तीनों वापस होटल आ गए. नहाधो कर सब बे्रकफास्ट करने पहुंचे. फिर 11 बजे से मीटिंग शुरू हो गई. 2 बजे लंच के बाद फिर से मीटिंग हुई. साढ़े 4 बजे मीटिंग खत्म होने पर मनोज अपने कमरे में आ कर बिस्तर पर औंधा पड़ गया. उसे कस कर नींद आ रही थी. अभी वह थोड़ी ही देर सोया होगा कि उस का मोबाइल बजने लगा.

फोन जूली का था. ‘‘क्या हुआ, आप सो रहे थे क्या? माफ कीजिएगा, मैं ने आप की नींद में खलल डाल दिया,’’ जूली क्षमायाचना करते हुए बोली.

‘‘अरे कोई बात नहीं, मैं बस उठ ही रहा था. कहो,’’ मनोज ने कोमल स्वर में कहा.

‘‘कुछ नहीं, मेरी ड्यूटी खत्म हो गई है. आप की याद आई तो सोचा फोन कर लूं,’’ मनोज के कोमल स्वर से उत्साहित हो कर जूली ने बात करनी शुरू की.

दोनों इधरउधर की बातें करने लगे. बातोंबातों में जूली ने मनोज से मिलने की और कुछ वक्त उस के साथ बिताने की इच्छा जाहिर की. कुछ देर सोचने के बाद मनोज ने 15 मिनट बाद मसाज पार्लर के बाहर मिलने का वादा किया.

15 मिनट बाद नए कपड़े पहन कर और ढेर सारा डियो लगा कर मनोज सब की नजरें बचाते हुए होटल से बाहर निकला. वह नहीं चाहता था कि उस

के साथ आए लोगों में से कोई उसे देख ले और टोके, खासतौर पर भावेश और सुरेश.

जूली पार्लर के बाहर ही खड़ी थी. मनोज को देखते ही उस का चेहरा खिल गया. दोनों पास के एक रैस्टोरेंट में जा कर बैठ गए. जूली ने मनोज के परिवार के बारे में पूछना शुरू किया.

‘‘मेरे घर में पत्नी और 2 बेटे हैं.’’

‘‘क्या करते हैं आप के बेटे? कौन सी क्लास में हैं?’’ जूली के स्वर में उत्सुकता थी.

‘‘बड़ा बेटा इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में है और छोटा बेटा प्रथम वर्ष में,’’ मनोज ने बताया.

‘‘अरे, आप तो बहुत यंग दिखते हैं. आप को देख कर लगता ही नहीं है कि आप के इतने बड़े बच्चे हैं,’’ जूली आश्चर्य से बोली, ‘‘काफी मैंटेन कर के रखा है आप ने अपनेआप को.’’

‘‘थैंक्यू सो मच,’’

मनोज का चेहरा खुशी से लाल हो गया. यह पहली बार हुआ था कि किसी लड़की ने उस की तारीफ की थी.

मनोज ने जूली की इच्छानुसार 2 कोल्ड डिं्रक और 2 बर्गर का और्डर दे दिया. फिर वह जूली से परिवार के बारे में बातें करने लगा.

‘‘तुम यहीं पटाया में रहती हो क्या?’’

‘‘नहीं, मैं बैंकौक के पास एक बहुत छोटे से शहर में रहती हूं,’’ जूली ने बताया.

‘‘फिर तुम यहां पटाया में कैसे आ गई?’’ मनोज ने उत्सुकता से पूछा, ‘‘तुम्हारे घर में कौनकौन हैं?’’

‘‘मेरे घर में बूढ़े मातापिता और 2 बड़े भाई हैं. यहां पटाया में मैं अपना और मातापिता का भरणपोषण करने के लिए आई हूं,’’ जूली ने खिड़की से बाहर देखते हुए बताया.

‘‘जब तुम्हारे 2 बड़े भाई भी हैं तो तुम्हें यहां इतनी दूर आने की क्या जरूरत थी?’’ मनोज ने आश्चर्य से पूछा.

एक गहरी सांस ले कर जूली ने विस्तार से बताना प्रारंभ किया, ‘‘मेरे दोनों बड़े भाई शादी कर के मातापिता से अलग हो गए हैं. वे घर में एक पैसा भी नहीं देते. यहां तक कि घर में आते भी नहीं हैं. मेरे पिता और मां दोनों जिंदगीभर दूसरों के खेतों में मजदूरी कर के अपना घर चलाते रहे. भाइयों की पढ़ाई और शादी में उन की सारी जमापूंजी खत्म हो गई. अब हमारे पास खाना खाने के भी लाले पड़ गए. पिता अब काफी बूढ़े हो गए हैं और अधिक मजदूरी नहीं कर सकते.’’

‘‘तो तुम ने वहीं कोई नौकरी क्यों नहीं कर ली?’’ मनोज ने सवाल किया.

‘‘पैसों की कमी के कारण पिताजी मुझे ज्यादा पढ़ा नहीं पाए. वहां ऐसी कोई नौकरी नहीं मिली जिस से गुजारे लायक कमा पाऊं. इसलिए मां ने 6 महीने पहले मुझे यहां पटाया भेज दिया ताकि मसाज का काम सीख कर पैसा कमा सकूं. वे तो मुझ से बुरा काम करने पर भी जोर दे रही हैं क्योंकि उस में पैसा बहुत मिलता है. पटाया में हजारों लड़कियों इसी काम में लगी हैं और सैलानियों से अच्?छाखासा पैसा ऐंठती हैं,’’ जूली ने तिक्त स्वर में कहा.

‘‘फिर तुम अब तक…?’’ मनोज ने उस के चेहरे पर एक भेदभरी नजर डालते हुए पूछा.

‘‘नहीं,मैं अभी तक वर्जिन (कुंआरी) हूं,’’ जूली ने तपाक से उत्तर दिया,

‘‘मैं किसी भी कीमत पर रेड जोन में नहीं जाना चाहती, चाहे मर ही क्यों न जाऊं. मैं इज्जत की जिंदगी गुजारना चाहती हूं.’

बात एक राज की- भाग 2 : एक भयानक योजना

‘‘तुम लोगों के टूर के पैसे भी मैं दे दूंगा.

बचेंगे 40 हजार रुपए तो तुम लोग भी अपने घर से 40 हजार रुपए जमा करने वाले ही थे. वे पैसे रास्ते के खर्च के लिए रख लेना. सभी के पास बराबर पैसा होगा,’’ रुधिर मुसकराता हुआ बोला.

‘‘और संपर्क करने के लिए फोन कौन सा इस्तेमाल करेंगे?’’ रक्ताभ ने पूछा.

‘‘कोई एक फोन यूज नहीं करेंगे. कल मैं पापा की फर्म का गुमाश्ता और्डर की फोटोकौपी, लैटरपैड, सील और बाकी डौक्युमैंट्स ले कर आ जाऊंगा. इतने डौक्युमैंट्स से कौर्पोरेट के नाम पर जितनी चाहे उतनी सिम ले सकते हैं. मैं 5 पोस्टपेड सिम निकलवा दूंगा. अगर कभी पुलिस कंप्लैंट हुई भी, तो शौपकीपर मेरा ही हुलिया बताएगा. इस से यह स्पष्ट होगा कि पापा की फर्म का ही कोई प्रतिद्वंद्वी यह काम मु?ा से दबाव डलवा कर करवा रहा है. तुम लोगों पर कोई शक नहीं जाएगा,’’ रुधिर ने योजना का पूरा खुलासा किया.

‘‘फिरौती की रकम किस जगह ली जाएगी?’’ रक्ताभ ने अगली परेशानी प्रस्तुत की.

‘‘हमारे फार्महाउस के बिलकुल विपरीत शहर के दूसरे छोर पर. रुपए किसी शौपिंग बैग में ही लेना ताकि किसी को शक न हो. रुपए लेने के बाद बताना कि तुम ने मुझे फार्महाउस के नजदीक छोड़ दिया है. यहां पर तो मैं पहले से रहूंगा ही,’’ रुधिर ने स्पष्ट किया.

‘‘हम लोगों का तो कोई काम नहीं रहेगा न? इतना काम तो तुम निबटा ही लोगे?’’ लालिमा ने पूछा.

‘‘अरे मैडम, मेन रोल तो आप लोगों का ही रहेगा. रक्ताभ के धमकीभरे फोन करने के बाद फौलोअप करने का काम बारीबारी से तुम दोनों करोगे. इस से ऐसा लगेगा कि गु्रप बहुत बड़ा व खतरनाक है. यदि वौयस चेंजिंग ऐप से कौल करोगे तो बेहतर रहेगा. कोई तुम्हारी आवाज को ट्रैस नहीं कर सकेगा. दूसरा, पैसे लेने भी तुम लोग ही जाओगे, क्योंकि रक्ताभ अगर अपना मुंह कवर करेगा तो लोगों के शक के घेरे में आ जाएगा और तुम लोग स्टौल से कवर कर के आसानी से जा सकती हो,’’ रुधिर ने दोनों लड़कियों को सम?ाया.

‘‘तुम्हारी योजना तो बहुत आकर्षक लग रही है. मुझे विश्वास है जरूर सफल होगी.’’ रक्ताभ ने आशा प्रकट की.

‘‘फार्महाउस पर रामू अंकल रहेंगे. वे अनाथ हैं, दादाजी उन्हें किसी अनाथालय से उठा कर लाए थे. इस कारण वे हमेशा हमारे एहसानमंद रहते हैं. मुझे बहुत अधिक चाहते हैं. इस कारण वहां खानेपीने, रहने की कोई समस्या नहीं होगी. हां, तुम लोग अपनी तरफ से कोई गलती मत करना,’’ रुधिर समझाते हुआ बोला.

‘‘बिलकुल ठीक,’’ रक्ताभ ने समर्थन किया.

‘‘ठीक है, तो अपनी योजना पक्की रही. कल मैं घर से निकलूंगा मगर कालेज नहीं आऊंगा. मैं कल ही सिमों का इंतजाम कर के पहुंचा दूंगा. आज से ठीक 6 दिनों बाद मेरा किडनैप कर के मेरे घर पर फोन कर देना. मेरे मम्मी व पापा का नंबर अभी से नोट कर लो,’’ रुधिर नंबर लिख कर देता हुआ बोला.

‘‘ठीक है, औल द बैस्ट,’’ रक्ताभ बोला.

‘‘औल द बैस्ट,’’ चारों एक स्वर में मगर धीमे से बुदबुदा कर बोले.

अगले 5 दिनों तक सभीकुछ तय योजना के मुताबिक चलता रहा. छठे दिन रुधिर तय समय पर निकल कर निश्चित किए गए रैस्टोरैंट के सामने साइकिल रख कर पैदल चल पड़ा. लगभग आधा किलोमीटर चलने के बाद रक्ताभ अपनी बाइक पर इंतजार करता हुआ मिल गया. वह उसे फार्महाउस पर छोड़ आया.

कालेज समाप्त होने के लगभग आधा घंटा बाद रक्ताभ ने रुधिर के पापा को फोन किया.

‘‘हैलो, शांतिलाल बोल रहे हैं?’’ रक्ताभ ने आवाज बदल कर पूछा.

‘‘हां, मैं शांतिलाल बोल रहा हूं. आप कौन?’’ उधर से आवाज आई.

‘‘मेरी बात ध्यान से सुनो और किसी दूसरे को बताने की कोशिश मत करना. हम ने तुम्हारे लड़के रुधिर का अपहरण कर लिया है. अगर उस की सलामती चाहते हो तो आज शाम 5 लाख रुपयों का इंतजाम कर लो. रुपया कहां लाना हैं, इस के बारे में हम शाम को बताएंगे. पुलिस को बताने पर अपने लड़के की लाश ही पाओगे,’’ रक्ताभ ने भरपूर पेशेवर रवैया अपनाते हुए कहा.

‘‘अपहरण? मेरे लड़के का? बहुत अच्छा किया. मेरी तरफ से जान ले लो उस की. रुपया छोड़ो, मैं एक पैसा भी नहीं देने वाला,’’ उधर से रुधिर के पापा ने कहा.

यह सुन कर रक्ताभ घबरा गया और उस ने फोन काट दिया. साथ में खड़ी हुई लालिमा और सिंदूरी से पूरी बात बताते हुए वह बोला, ‘‘कहीं हमारा दांव उलटा तो नहीं पड़ गया?’’

‘‘अब क्या होगा?’’ लालिमा घबराते हुए बोली.

‘‘अरे, इस समय तक तो रुधिर घर पहुंचता ही नहीं है. हम ने फोन में जल्दबाजी कर दी है. इसी कारण अतिआत्मविश्वास के साथ वे ऐसी बातें कर रहे हैं. 2 घंटे बाद उन्हें जब मालूम पड़ेगा की रुधिर सचमुच घर नहीं पहुंचा, तब वे घबराएंगे और हमारी बात मान लेंगे,’’ सिंदूरी ने अनुमान लगाया.

‘‘हां, हां, शायद ऐसा हो. ऐसा करते हैं हम शाम को 6 बजे पार्क में मिल कर फोन लगाते हैं,’’ रक्ताभ ने सहमति जताई.

‘‘सिंदूरी इस बार तुम फोन लगाओ. अब तो 6 घंटे गुजर चुके हैं. शायद अब तक रुधिर के घर वाले घबरा गए हों,’’ रक्ताभ ने पार्क में मिलते ही कहा.

‘‘हां, यह ठीक रहेगा,’’ लालिमा ने समर्थन किया.

‘‘ठीक है, मैं फोन लगाती हूं,’’ सिंदूरी ने कहा और फोन लगाने लगी, ‘‘हैलो, शांतिलालजी…’’

‘‘हां, मैं शांतिलाल ही बोल रहा हूं.’’ वे बीच में ही सिंदूरी की बात काटते हुए बोले, ‘‘तुम किडनैपर्स गैंग से बोल रही हो न? मेरा जवाब अभी भी वही है जो पहले था. आप लोग मेरा व अपना समय बरबाद न करें,’’ कहते हुए शांतिलाल ने गुस्से में फोन काट दिया.

गुड गर्ल: ससुराल में तान्या के साथ क्या हुआ – भाग 2

तान्या आश्चर्य से बोली,”मगर क्यों?”

“बेटा, यह समाज लड़कियों को देवी की तरह पूजता तो है पर मौका पाने पर हाड़मांस की इन जीतीजागती देवियों की भावनाओं और इच्छाओं अथवा अनिच्छाओं को कुचलने से तनिक भी गुरेज नहीं करता.”

समाज के इस निर्मम चेहरे से अनजान तान्या ने कंचन जी से पूछा,”मां, लेकिन ऐसा क्यों? मैं भी तो भैया जैसी ही हूं. मैं भी एक इंसान हूं फिर मैं अलग कैसे हुई?”

“बेटा, पुरुष के विपरीत स्त्री को एक ही जीवनचक्र में कई जीवन जीना पड़ता है. पहले मांबाप के नीड़रूपी घर में पूर्णतया लाङप्यार और सुरक्षित जीवन और दूसरा घर के बाहर भेदती हुई हजारों नजरों वाले समाज के पावरफुल स्कैनर से गुजरने की चुभती हुई पीड़ा से रोज ही दोचार होते हुए सीता की तरह अग्नि परीक्षा देने को विवश.

“बेटा, एक बात और, विवाह के बाद अकसर यह स्कैनर एक नया स्वरूप धारण कर लेता है, जिस की फ्रीक्वैंसी कुछ अलग ही होती है.”

“लेकिन हम लड़कियां ही एकसाथ इतने जीवन क्यों जिएं?”

“बेटा, निश्चित तौर पर यह गलत है और हमें इस का पुरजोर विरोध जरूर करना चाहिए. लेकिन स्त्री के प्रति यह समाज कभी भी सहज या सामान्य नहीं रहा है. या तो हमें रहस्य अथवा अविश्वास से देखा जाता है या श्रद्धा से लेकिन प्रेम से कभी नहीं, क्योंकि हम स्त्रियों की जैंडर प्रौपर्टीज समाज को हमेशा से भयाक्रांत करती रही है. सभी को अपने लिए एक शीलवती, सच्चरित्र और समर्पित पत्नी चाहिए जो हर कीमत पर पतिपरायण बनी रहे लेकिन दूसरे की पत्नी में अधिकांश लोगों को एक इंसान नहीं बल्कि एक वस्तु ही दिखाई पड़ती है.”

“लेकिन मां, यह तो ठीक बात नहीं, ऐसा क्यों?”

“बेटा, हम स्त्रियों के मामले में पुरुष हमेशा से इस गुमान में जीता आया है कि यदि कोई स्त्री किसी पुरुष के साथ जरा सा भी हंसबोल ले तो कुछ न होते हुए भी वह इसे उस के प्रेम और शारीरिक समर्पण की सहमति मान लेता है.”

“तो क्या मैं किसी के साथ हंसबोल भी नहीं सकती?”

“नहीं बेटा, मेरे कहने का अभिप्राय यह बिलकुल भी नहीं है. मैं तो तुम्हें सिर्फ आगाह करना चाहती हूं कि समाज के ठेकेदारों ने हमारे चारो ओर नियमकानूनों का एक अजीब सा जाल फैला रखा है, जिस में काजल का गहरा लेप लगा हुआ है. लेकिन हमें भी अपनेआप को कभी कमजोर या कमतर नहीं आंकना चाहिए जबकि उन्हें यह एहसास करा देना चाहिए कि हम न केवल इस जाल को काट फेंकने का सामर्थ्य रखते हैं बल्कि हमारे इर्दगिर्द फैलाए गए इसी काजल को अपने व्यक्तित्व की खूबसूरती का माध्यम बना उसे आंखों में सजा लेना जानते हैं, ताकि हम सिर उठा कर खुले आकाश में उड़ सकें और अपनी खुली आंखों से अपने सपनों को पूरा होते देख सकें.”

“मां, यह हुई न झांसी की रानी लक्ष्मी बाई वाली बात.”

अपनी फूल सी बिटिया को सीने से लगाती हुईं कंचनजी बोलीं,”बेटा, मैं तुम्हें कतई डरा नहीं रही थी. बस समाज की सोच से तुम्हें परिचित करा रही थी ताकि तुम परिस्थितियों का मुकाबला कर सको. तुम वही करना जो तुम्हारा दिल कहे. तुम्हारे मम्मीपापा सदैव तुम्हारे साथ हैं और हमेशा रहेंगे.”

समय अपनी गति से पंख लगा कर उड़ता रहा और देखतेदेखते एक दिन छोटी सी तान्या विवाह योग्य हो गई. संयोग से रवि और कंचनजी को उस के लिए एक सुयोग्य वर ढूंढ़ने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी.

एक पारिवारिक शादी समारोह में दिनकर का परिवार भी आया हुआ था. तान्या की निश्छल हंसी और मासूम व्यवहार पर मोहित हो कर दिनकर उसे वहीं अपना दिल दे बैठा. शादी की रस्मों के दौरान जब कभी तान्या और दिनकर की नजरें आपस में एक दूसरे से मिलतीं तो तान्या दिनकर को अपनी ओर एकटक देखता हुआ पाती. उस की आंखों में उसे एक अबोले पर पवित्र प्रस्ताव की झलक दिखाई पड़ रही थी. उस ने भी मन ही मन दिनकर को अपने दिल में जगह दे दिया.

दिनकर की मां को छोड़ कर और किसी को इस रिश्ते पर कोई आपत्ति नहीं थी. दरअसल, दिनकर की मां शांताजी अपने दूर के रिश्ते की एक लड़की को अपनी बहू बनाना चाहती थी जो कनाडा में रह रही थी और पैसे से काफी संपन्न परिवार की थी, दूसरे उन्हें तान्या का सब के साथ इतना खुलकर बातचीत करना पसंद नहीं था. लेकिन बेटे के प्यार के आगे उन्हें झुकना ही पड़ा और कुछ ही समय के अंदर तान्या और दिनकर विवाह के बंधन से बंध गए.

सरल एवं बालसुलभ व्यवहार वाली तान्या ससुराल में भी सब के साथ खूब जी खोलकर बातें करती, हंसती और सब को हंसाती रहती.

पति दिनकर बहुत अच्छा इंसान था. उस ने तान्या को कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह मायके में नहीं ससुराल में है. उस ने तान्या को अपने ढंग से अपनी जिंदगी जीने की पूरी आजादी दी.

दिनकर की मां शांताजी कभी तान्या को टोकतीं तो वह उन्हें बड़े प्यार से समझाता, “मां, तुम अपने बहू पर भरोसा रखो. वह इस घर का मानसम्मान कभी कम नहीं होने देगी. वह एक परफैक्ट गुड गर्ल ही नहीं एक परफैक्ट बहू भी है.”

लेकिन कुछ ही दिनों मे तान्या को यह एहसास हो गया कि उस के ससुराल में 2 लोगों का ही सिक्का चलता है, पहला उस की सास और दूसरा उस के ननदोई राजीव का.

दरअसल, उस के ननदोई राजीव काफी अमीर थे. जब तान्या के ससुर का बिजनैस खराब चल रहा था तो राजीव ने रूपएपैसे से उन की काफी मदद की थी. इसलिए राजीव का घर में दबदबा था और उस की सास तो अपने दामाद को जरूरत से ज्यादा सिरआंखों पर बैठाए रखती थी.

परी हूं मैं : तरुण ने दिखाई मुझे मेरी औकात – भाग 2

मुझे अस्पताल में भरती करना पड़ा और तरुण के हाथों पर भी पट्टियां बंध चुकी थीं तो रिद्धि व सिद्धि को किस के आसरे छोड़ते. अम्माजी को बुलाना ही पड़ा. आते ही अम्माजी अस्पताल पहुंचीं.

‘देख, तेरी वजह से तरुण भी जल गया. कहते हैं न, आग किसी को नहीं छोड़ती. बचाने वाला भी जलता जरूर है.’ जाने क्यों अम्मा का आना व बड़बड़ाना मुझे अच्छा नहीं लगा. आंखें मूंद ली मैं ने. अस्पताल में तरुण नर्स के बजाय खुद मेरी देखभाल करता. मैं रोती तो छाती से चिपका लेता. वह मुझे होंठों से चुप करा देता. बिलकुल ताजा एहसास.

अस्पताल से डिस्चार्ज हो कर घर आई तो घर का कोनाकोना एकदम नया सा लगा. फूलपत्तियां सब निखर गईं जैसे. जख्म भी ठीक हो गए पर दाग छोड़ गए, दोनों के अंगों पर, जलने के निशान.

तरुण और मैं, दोनों ही तो जले थे एक ही आग में. राजीव को भी दुर्घटना की खबर दी गई थी. उन्होंने तरुण को मेरी आग बुझाने के लिए धन्यवाद के साथ अम्मा को बुला लेने के लिए शाबाशी भी दी.

तरुण को महीनों बीत चले थे भोपाल गए हुए. लेकिन वहां उस की शादी की बात पक्की की जा चुकी थी. सुनते ही मैं आंसू बहाने लगी, ‘‘मेरा क्या होगा?’’

‘परी का जादू कभी खत्म नहीं होता.’ तरुण ने पूरी तरह मुझे अपने वश में कर लिया था, मगर पिता के फैसले का विरोध करने की न उस में हिम्मत थी न कूवत. स्कौलरशिप से क्या होना जाना था, हर माह उसे घर से पैसे मांगने ही पड़ते थे.

तो इस शादी से इनकार कैसे करता? लड़की सरकारी स्कूल में टीचर है और साथ में एमफिल कर रही है तो शायद शादी भी जल्दी नहीं होगी और न ही ट्रांसफर. तरुण ने मुझे आश्वस्त कर दिया.

मैं न सिर्फ आश्वस्त हो गई बल्कि तरुण के संग उस की सगाई में भी शामिल होने चली आई. सामान्य सी टीचरछाप सांवली सी लड़की, शक्ल व कदकाठी हूबहू मीनाकुमारी जैसी.

एक उम्र की बात छोड़ दी जाए तो वह मेरे सामने कहीं नहीं टिक रही थी. संभवतया इसलिए भी कि पूरे प्रोग्राम में मैं घर की बड़ी बहू की तरह हर काम दौड़दौड़ कर करती रही. बड़ों से परदा भी किया. छोटों को दुलराया भी. तरुण ने भी भाभीभाभी कर के पूरे वक्त साथ रखा लेकिन रिंग सेरेमनी के वक्त स्टेज पर लड़की के रिश्तेदारों से परिचय कराया तो भाभी के रिश्ते से नहीं बल्कि, ‘ये मेरे बौस, मेरे गाइड राजीव सर की वाइफ हैं.’

कांटे से चुभे उस के शब्द, ‘सर की वाइफ’, यानी उस की कोई नहीं, कोई रिश्ता नहीं. तरुण को वापस तो मेरे ही साथ मेरे ही घर आना था. ट्रेन छूटते ही शिकायतों की पोटली खोल ली मैं ने. मैं तैश में थी, हालांकि तरुण गाड़ी चलते ही मेरा पुराना तरुण हो गया था. मेरा मुझ पर ही जोर न चल पाया, न उस पर.

मौसम बदल रहे थे. अपनी ही चाल में, शांत भाव से. मगर तीसरे वर्ष के मौसमों में कुछ ज्यादा ही सन्नाटा महसूस हो रहा था, भयावह चुप्पियां. आंखों में, दिलों में और घर में भी.

तूफान तो आएंगे ही, एक नहीं, कईकई तूफान. वक्त को पंख लग चुके थे और हमारी स्थिति पंखकटे प्राणियों की तरह होती लग रही थी. मुझे लग रहा था समय को किस विध बांध लूं?

तरुण की शादी की तारीख आ गई. सुनते ही मैं तरुण को झंझोड़ने लगी, ‘‘मेरा क्या होगा?’’

‘परी का जादू कभी खत्म नहीं होगा,’ इस बार तरुण ने मुझे भविष्य की तसल्ली दी. मैं पूरा दिन पगलाई सी घर में घूमती रही मगर अम्माजी के मुख पर राहत स्पष्ट नजर आ रही थी. बातों ही बातों में बोलीं भी, ‘अच्छा है, रमेश भाईसाहब ने सही पग उठाया. छुट्टा सांड इधरउधर मुंह मारे, फसाद ही खत्म…खूंटे से बांध दो.’

मुझे टोका भी, कि ‘कौन घर की शादी है जो तुम भी चलीं लदफंद के उस के संग. व्यवहार भेज दो, साड़ीगहना भेज दो और अपना घरद्वार देखो. बेटियों की छमाही परीक्षा है, उस पर बर्फ जमा देने वाली ठंड पड़ रही है.’

अम्माजी को कैसे समझाती कि अब तो तरुण ही मेरी दुलाईरजाई है, मेरा अलाव है. बेटियों को बहला आई, ‘चाची ले कर आऊंगी.’

बड़े भारी मन से भोपाल स्टेशन पर उतरी मैं. भोपाल के जिस तालाब को देख मैं पुलक उठती थी, आज मुंह फेर लिया, मानो मोतीताल के सारे मोती मेरी आंखों से बूंदें बन झरने लगे हों.

तरुण ने बांहों में समेट मुझे पुचकारा. आटो के साइड वाले शीशे पर नजर पड़ी, ड्राइवर हमें घूर रहा था. मैं ने आंसू पोंछ बाहर देखना शुरू कर दिया. झीलों का शहर, हरियाली का शहर, टेकरीटीलों पर बने आलीशन बंगलों का शहर और मेरे तरुण का शहर.

आटो का इंतजार ही कर रहे थे सब. अभी तो शादी को हफ्ताभर है और इतने सारे मेहमान? तरुण ने बताया, मेहमान नहीं, रिश्तेदार एवं बहनें हैं. सब सपरिवार पधारे हैं, आखिर इकलौते भाई की शादी है. सुन कर मैं ने मुंह बनाया और बहनों ने मुझे देख कर मुंह बनाया.

रात होते ही बिस्तरों की खींचतान. गरमी होती तो लंबीचौड़ी छत थी ही. सब अपनीअपनी जुगाड़ में थे. मुझे अपना कमरा, अपना पलंग याद आ रहा था. तरुण ने ही हल ढूंढ़ा, ‘भाभी जमीन पर नहीं सो पाएंगी. मेरे कमरे के पलंग पर भाभी की व्यवस्था कर दो, मेरा बिस्तरा दीवान पर लगा दो.’

मुझे समझते देर नहीं लगी कि तरुण की बहनों की कोई इज्जत नहीं है और मां ठहरी गऊ, तो घर की बागडोर मैं ने संभाल ली. घर के बड़ेबूढ़ों और दामादों को इतना ज्यादा मानसम्मान दिया, उन की हर जरूरतसुविधा का ऐसा ध्यान रखा कि सब मेरे गुण गाने लगे. मैं फिरकनी सी घूम रही थी. हर बात में दुलहन, बड़ी बहू या भाभीजी की राय ली जाती और वह मैं थी.

सब को खाना खिलाने के बाद ही मैं खाना खाने बैठती. तरुण भी किसी न किसी बहाने से पुरुषों की पंगत से बच निकलता. स्त्रियां सभी भरपेट खा कर छत पर धूप सेंकनेलोटने पहुंच जातीं. तरुण की नानी, जो सीढि़यां नहीं चढ़ पाती थीं, भी नीम की सींक से दांत खोदते पिछवाड़े धूप में जा बैठतीं. तब मैं और तरुण चौके में अंगारभरे चूल्हे के पास अपने पाटले बिछाते और थाली परोसते.

आदत जो पड़ गई है एक ही थाली में खाने की, नहीं छोड़ पाए. जितने अंगार चूल्हे में भरे पड़े थे उस से ज्यादा मेरे सीने में धधक रहे थे. आंसू से बुझें तो कैसे? तरुण मनाते हुए अपने हाथ से मुझे कौर खिला रहे थे कि उस की भांजी अचानक आ गई चौके में गुड़ लेने…लिए बगैर ही भागी ताली बजाते हुए, ‘तरुण मामा को तो देखो, बड़ी मामीजी को अपने हाथ से रोटी खिला रहे हैं. मामीजी जैसे बच्ची हों. बच्ची हैं क्या?’

तरुण फुरती से दौड़ा उस के पीछे, तब तक तो खबर फैल चुकी थी. मैं कुछ देर तो चौके में बैठी रह गई. जब छत पर पहुंची तो औरतों की नजरों में स्पष्ट हिकारत भाव देखा और तो और, उस रोज से नानी की नजरें बदली सी लगीं. मैं सावधान हो गई.

ज्योंज्यों शादी की तिथि नजदीक आ रही थी, मेरा जी धकधक कर रहा था. तरुण का सहज उत्साहित होना मुझे अखर रहा था. इसीलिए तरुण को मेहंदी लगाती बहनों के पास जा बैठी. मगर तरुण अपने में ही मगन बहन से बात कर रहा था, ‘पुष्पा, पंजे और चेहरे के जले दागों पर भी हलके से हाथ फेर दे मेहंदी का, छिप जाएंगे.’

सुन कर मैं रोक न पाई खुद को, ‘‘तरुण, ये दाग न छिपेंगे, न इन पर कोई दूसरा रंग चढ़ेगा. आग के दाग हैं ये.’’

सन्नाटा छा गया हौल में. मुझे राजीव आज बेहद याद आए. कैसी निरापदता होती है उन के साथ, तरुण को देखो…तो वह दूर बड़ी दूर नजर आता है और राजीव, हर पल उस के संग. आज मैं सचमुच उन्हें याद करने लगी.

आखिरकार बरात प्रस्थान का दिन आ गया, मेरे लिए कयामत की घड़ी थी. जैसे ही तरुण के सेहरा बंधा, वह अपने नातेरिश्तेदारों से घिर गया. उसे छूना तो दूर, उस के करीब तक मैं नहीं पहुंच पाई. मुझे अपनी औकात समझ में आने लगी.

असल औकात अन्य औरतों ने बरात के वापस आते ही समझा दी. उन बहन-बुआ के एकएक शब्द में व्यंग्य छिपा था-‘‘भाभीजी, आज से आप को हम लोगों के साथ हौल में ही सोना पड़ेगा. तरुण के कमरे का सारा पुराना सामान हटा कर विराज के साथ आया नया पलंग सजाना होगा, ताजे फूलों से.’’

छुरियां सी चलीं दिल पर. लेकिन दिखावे के लिए बड़ी हिम्मत दिखाई मैं ने भी. बराबरी से हंसीठिठोली करते हुए तरुण और विराज का कमरा सजवाया. लेकिन आधीरात के बाद जब कमरे का दरवाजा खट से बंद हुआ. मेरी जान निकल गई, लगा, मेरा पूरा शरीर कान बन गया है. कैसे देखती रहूं मैं अपनी सब से कीमती चीज की चोरी होते हुए. चीख पड़ी, ‘चोर, चोर,चोर.’

गुल हुई सारी बत्तियां जल पड़ीं. रंग में भंग डालने का मेरा उपक्रम पूर्ण हुआ. शादी वाला घर, दानदहेज के संग घर की हर औरत आभूषणों से लदी हुई. ऐसे मालदार घरों में ही तो चोरलुटेरे घात लगाए बैठे रहते हैं.

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