Hindi Story: मजाक – मिलावटी खाओ, एंटीबॉडी बढ़ाओ

लेखक- अशोक गौतम, 

Hindi Story: इधर अखबार में जब से आईसीएमआर की स्टडी की यह रिपोर्ट हिलोरें मार रही है कि कोवैक्सीन और कोविशिल्ड को अगर एकसाथ मिला दिया जाए, तो इस का असर ज्यादा हो जाता है, तब से अपने शहर के नामीगिरामी मिलावट करने वालों की मूंछों की बिना तेल लगाए ही चमक देखने लायक है. भले की कानून के साथ मिलबैठ कर वे मिलावट का धंधा करते रहे हों, पर जनता की नजरों से छिपे रहते थे.

कल वही मिलावटी लाल सरजी मूंछों पर ताव देते सीना चौड़ा कर मेरे सामने पहाड़ से तन कर खड़े हो गए और मेरा रास्ता रोक दिया. उन्होंने सारे बदन पर गजब का इत्र लगाया हुआ था. उन का पूरा बदन उस समय किस्मकिस्म के असलीनकली मिलावटी इत्रों से महक रहा था.

मिलावटी लाल सरजी बोले, “देखो बबुआ, मिक्सिंग का कमाल. तुम लोग नाहक ही हमें तीसरे दर्जे का व्यापारी समझते हो तो समझते रहो, पर आज तो आईसीएमआर की स्टडी में ने भी मिक्सिंग पर अपनी मुहर लगा दी.

“बबुआ, जो सच है, वह सच है. जो सच था, वह सच था. जो सच है, वह सच ही रहेगा. उसे न तुम बदल सकते, न मैं, न कानून. कानून का डर दिखा कर झूठ को सच तो बनाया जा सकता है, पर सच को झूठ नहीं बनाया जा सकता. और सच यही है कि मिलावट के बिना जिंदगी जिंदगी नहीं, मिलावट के बिना इम्यूनिटी इम्यूनिटी नहीं.

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“हम मानें या न मानें, पर सच तो यही है कि है कि हम लोगों को बिना कौकटेल के कुछ भी पच नहीं सकता. शुद्ध खाने से हम सदियों से बीमार पड़ते रहे हैं. आज भी हम अपनी वही गलती दोहराने की वजह से बीमार पड़ रहे हैं और भविष्य में भी हम ने जो शुद्ध खाने की अपनी गलती नहीं सुधारी तो बीमार पड़ते रहेंगे. हमारी सारी इम्यूनिटी खत्म हो जाएगी, इसीलिए हमें न चाहते हुए भी जनहित में अपनी जान दिखाने को जोखिम में डाल आंखें मूंद जनता की जान बचाने के लिए, जनता की इम्यूनिटी का ग्राफ ऊपर की ओर बढ़ाए रखने के लिए शुद्ध देशी गाय के घी में चरबी मिलानी पड़ती है, असली दूध में नकली दूध मिलाना पड़ता है, चावल में जनता के हित के लिए कंकड़ मिलाने पड़ते हैं, इंगलिश शराब में देशी दारू मिलानी पड़ती है. दक्षिणपंथियों में वामपंथी मिलाने पड़ते हैं.

“किसलिए? इसलिए कि देश की इम्यूनिटी बढ़े, सरकार की इम्यूनिटी बढ़े. हम यह सब इसलिए नहीं करते कि ऐसा करने से हमारा मुनाफा बढ़ता है, बल्कि यह तो हम देश की रोग गतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए करते हैं. और हमारी कोशिशों के नतीजे तुम्हारे सामने हैं.

“कोई हमें चाहे कितना ही देशद्रोही क्यों न कहे, पर हमारे लिए जनता की इम्यूनिटी पहले है, अपना मुनाफा बाद में. पर तुम घटिया सोच वाले हमेशा सोचते उलटा ही हो.

“देशभक्तों को आज देश की चिंता भले ही न हो, पर हमें अपने मुनाफे से ज्यादा जनता की इम्यूनिटी की चिंता है. और ऊपर से एक तुम हो कि रोज सुबह उठ कर सब से पहले मिलावटी दूध की चाय की स्वाद लगा चुसकियां लेते हुए हम मिक्सिंग करने वालों को ही कोसते हो.

“भाई साहब, जो हम दूध में पानी न मिलाते, मसालों में लीद न मिलाते, हलदी में पीला रंग न मिलाते, सच में झूठ न मिलाते, धर्म में लूट न मिलाते, आटे में फाइबर के नाम पर लकड़ी का बुरादा न मिलाते, राग मल्हार में राग गंवार न मिलाते तो बुरा मत मानना भाई साहब, देश में एक भी केवल थाली बजाता, दिन में दीए जलाता कोरोना से कतई भी लड़ नहीं पाता. यह तो हमारी उस मिक्सिंग का ही चमत्कार है, जिस की वजह से इस समय भी देश की इम्यूनिटी सातवें आसमान पर है.

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“वैसे गलती से लाख ढूंढ़ने के बाद भी एक तो हमें आज शुद्ध मिलता ही नहीं, पर गलती से जो हम धोखे से शुद्ध खा ही जाते तो इस समय स्वर्ग की हवा खाते होते, क्योंकि शुद्ध खाने वालों में एंटीबौडीज उतने नहीं होते जितने मिक्सिंग किया खानेपीने वालों में होते हैं. यह बात हम बरसों से कह रहे थे, यह बात हम बरसों से जानते थे, पर कोई हमारी बात मानने को तैयार ही न था, घर का एमडी नीम हकीम जो ठहरा. अब आईसीएमआर कह रहा है तो मानना ही पड़ेगा.

“भाई साहब, गए वे दिन जब लापरवाही बढ़ती थी तो दुर्घटना के चांस बढ़ते थे. अब तो लापरवाही में ही सुरक्षा है.” Hindi Story

Honour Killing : पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश पर लगाया गोबर

आ  प ने ‘मुल्लमा’ शब्द तो सुना ही होगा. किसी धातु पर सोने या चांदी की पतली परत चढ़ाना, जिस से वह चमकने लगे और कीमती दिखे, जैसे ‘कलई’ या ‘गिलट’. पर क्या आप ने यह सुना है कि एक मांबाप ने अपनी ही बेटी को मार कर उस की लाश को वहां रखा, जहां वे अपने पालतू पशु बांधते थे और पकड़े जाने की सूरत में पुलिस को गुमराह करने के लिए उस लाश पर जानवरों का गोबर लगा दिया गया था?

इज्जत की खातिर अपनी औलाद को मारने का यह सनसनीखेज मामला उत्तर प्रदेश के मैनपुरी इलाके का है. औनर किलिंग की भेंट चढ़ी उस लड़की का नाम ज्योति था, जिस की लाश 20 जनवरी, 2023 को गांव के चौकीदार मनोज कठेरिया ने बरामद की थी. उस का परिवार भोगांव के मौजेपुर गांव में अपने घर से गायब था.

दरअसल, अशोक यादव नाम के एक शख्स की 24 साल की बेटी ज्योति के पास ही के एक गांव के रहने वाले नौजवान से प्रेम संबंध थे और वह उसी से शादी करना चाहती थी, पर परिवार वाले इस बात पर राजी नहीं थे. इसी तनातनी के चलते अशोक यादव ने अपनी पत्नी और बेटों की मदद से 19 जनवरी, 2023 की रात के 12 बजे ज्योति की गला दबा कर हत्या कर दी और पास ही बने अहाते में गड्ढा खोद कर लाश को दबा दिया था.

इस घटना के दूसरे दिन अशोक यादव के घर में ताला लगा देख कर गांव वालों ने इस की सूचना पुलिस को दी. घटना की एफआईआर गांव के ही चौकीदार मनोज कठेरिया ने अशोक यादव, उन की पत्नी रामा देवी, बेटे अमित, अनुज और अवनीश के खिलाफ दर्ज कराई थी.

लेकिन ट्रायल के दौरान ज्योति के मांबाप ने दावा किया था कि उस ने खुदकुशी की थी. उन्होंने आरोप लगाया कि मनोज कठेरिया ने सिंचाई को ले कर हुए एक झगड़े के चलते एफआईआर दर्ज कराई थी, क्योंकि उस की खेती की जमीन उन की जमीन से सटी हुई थी.

पर सुबूतों और गवाहियों के बाद अब उत्तर प्रदेश की मैनपुरी कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज जहेंद्र पाल सिंह ने ज्योति के मांबाप को उस की गला घोंट कर हत्या करने और लाश को खेत में दफनाने के जुर्म में उम्रकैद की सजा सुना दी. इतना ही नहीं, कोर्ट ने सुबूतों की कमी के चलते ज्योति के तीनों भाइयों को बरी कर दिया और हर कुसूरवार पर 60,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया. Honour Killing

Panna diamond mines : पन्ना खदान मजदूर- चमकते हीरे का काला सच

Panna diamond mines : मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल के पन्ना जिले के बड़गड़ी गांव की रहने वाली मजदूर रचना गोलदार ने हीरा दफ्तर से खदान क्षेत्र हजारा मुद्दा का पट्टा बनवाया था. रचना ने खदान में कड़ी मेहनत कर के हीरे की तलाश शुरू कर दी. एक हफ्ते के अंदर ही रचना को
8 हीरे मिले, तो उस की खुशी देखते ही बनती थी. रचना गोलदार ने 17 सितंबर, 2025 को पन्ना में बने सरकारी हीरा दफ्तर पहुंच कर हीरे जमा करवा दिए. खुदाई में मिले इन 8 हीरों में से 6 नग जेम्स क्वालिटी के थे. इनका कुल वजन 2.53 कैरेट था. इन में से सब से बड़े हीरे का वजन 0.79 कैरेट था. 2 हीरे औफ कलर के थे. हीरा दफ्तर में जमा हीरों को अगली नीलामी में रखा जाएगा. नीलाम होने के बाद सब से ज्यादा कीमत की बोली से मिलने वाली रकम में से टैक्स काट कर बाकी रकम हीराधारक रचना गोलदार के खाते में जमा हो जाएगी.
इसी तरह पन्ना में 1 अक्तूबर को 2 लोगों को हीरा मिला था. हरियाणा के हिसार के रहने वाले जोगिंदर सिंह को पन्ना के गांव पटी की उथली हीरा खदान में उज्ज्वल किस्म का हीरा मिला, जिस का वजन 1.27 कैरेट था. इसे उन्होंने हीरा दफ्तर में जमा करवाया, जिस की कीमत लाखों में आंकी जा रही है.
जोगिंदर सिंह ने हीरा दफ्तर, पन्ना में 16 मई, 2025 को पट्टा बनवाने की अर्जी लगाई थी. 20 मई, 2025 को उन्हें हीरा खोदने के लिए पट्टा मिल गया था. उस के बाद वे 4 महीने से ग्राम पंचायत कृष्णा कल्याणपुर की पटी हीरा खदान में मेहनत कर रहे थे. गोविंद सिंह आदिवासी ने भी पिछले दिनों ही पट्टा बनवाया था और ग्राम कृष्णा कल्याणपुर पटी में हीरे की खदान खोद रहे थे. उन्हें खदान की बजाय रास्ते में हीरा मिल गया. पन्ना में कीमती हीरे मिलने की यह कोई अनूठी घटना नहीं है. यहां बड़ी तादाद में काम कर रहे मजदूरों को हीरे मिलते रहते हैं और इसी आस में हजारों की तादाद में मजदूर यहां की हीरा खदान में रातदिन पसीना बहाते हैं. पन्ना में तकरीबन 25,000 लोग इसी उम्मीद से दिनरात पहाड़ खोद रहे हैं, नदी की रेत छान रहे हैं. इन में से कुछ ने तो परिवार समेत यहां डेरा डाल रखा है.
पन्ना में हीरा तलाशने का काम राजामहाराजाओं के दौर में भी चलता था. राजशाही के समय में हीरा राजघराने के महेंद्र भवन में जमा होता था. तब हीरे के बदले लोगों को उन की जरूरत का राशन और दूसरी सामग्री राजशाही की ओर से दी जाती थी. गोंड बस्ती से बुंदेला राज्य की राजधानी और फिर जिला बना पन्ना ‘हीरा नगरी’ के नाम से मशहूर यह इलाका मध्य प्रदेश के उत्तरपूर्व विंध्यांचल की पर्वतमालाओं के बीच है.

पन्ना जिले का वर्तमान स्वरूप
पन्ना और अजयगढ़ रियासत, चरखारी, बिजावर, छतरपुर और यूनाइटेड प्रोविंस को मिला कर बना है. मूल रूप से 13वीं शताब्दी तक गोंड बस्ती रहे पन्ना को महाराजा छत्रसाल बुंदेला ने अपनी राजधानी बनाया था. अप्रैल, 1949 के पहले यह विंध्य प्रदेश का हिस्सा था. जब 1 नवंबर, 1956 को मध्य प्रदेश का दोबारा गठन हुआ, तब यह मध्य प्रदेश में मिलाया गया था.
पन्ना जिले का नाम पन्ना जिला हैडक्वार्टर में बने पद्मावती देवी मंदिर के नाम पर रखा गया है. पन्ना को महाराजा छत्रसाल के शहर के रूप में भी जाना जाता है. पन्ना उत्तर में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले, पूर्व में सतना जिले, दक्षिण में कटनी और दमोह जिले और पश्चिम में छतरपुर जिले से घिरा हुआ है.

हीरा खोजने के लिए मिलता है पट्टा
पन्ना में सरकारी जमीन का पट्टा पाने के लिए हीरा दफ्तर में जा कर अर्जी फार्म भरना होता है. हीरा दफ्तर में अर्जी फार्म के साथ 3 फोटो, आधारकार्ड की फोटोकौपी और 200 रुपए का बैंक चालान पन्ना की भारतीय स्टेट बैंक की शाखा में जमा कराना होता है. चालान की एक कौपी हीरा दफ्तर में भी जमा करानी पड़ती है. इस के बाद 20 दिन के अंदर पट्टा मिल जाता है.
हीरा खोजने के लिए जमीन का एक पट्टा 7 गुना 6 मीटर का होता है. हीरे से लबरेज बताई जाने वाली खदान में कई किसानों की निजी और कुछ जमीन सरकार की है. सरकार की जमीन पर खनन के लिए खनिज दफ्तर से परमिशन लेनी पड़ती है. एक पट्टे के लिए 200 रुपए की फीस लगती है.
निजी जमीन पर आमतौर पर 2 तरह के करार होते हैं. एक में कुछ रुपए ले कर खनन की इजाजत दी जाती है, जबकि दूसरे में जमीन मालिक हीरा मिलने पर 25 फीसदी का हिस्सेदार होता है. ज्यादातर करार तो 25 फीसदी हिस्सेदारी वाले ही होते हैं. अगर किसी किसान के खेत में खुदाई होनी है, तो उस किसान का सहमतिपत्र खनन महकमे में जमा कराना होता है.
आमतौर पर जमीन मालिक इस के एवज में 25 फीसदी का करार करते हैं. इस का मतलब है कि अगर हीरा मिला हो तो उस जमीन मालिक को हीरे की कुल कीमत का 25 फीसदी हिस्सा मिलेगा.
चाल वाली मिट्टी में हीरा मिलने की उम्मीद ज्यादा होती है. इसे धो कर साफ किया जाता है और हीरा खोजा जाता है. हीरा मिट्टी की दूसरी लेयर में मिलता है. इसे चाल की लेयर कहा जाता है.
चाल उस मिट्टी की परत को कहते हैं, जिस में पत्थर व हीरे मिक्स होते हैं. यही मिट्टी बेहद काम की होती है, जो हीरा उगलती है. जब तक चाल की मिट्टी मिलती है, उस गहराई तक खुदाई होती है. इस मिट्टी को स्टोर किया जाता है. खुदाई में मिले बड़ेबड़े पत्थरों में हीरा मिलने की सब से ज्यादा उम्मीद होती है.
जो मिट्टी निकलती है उसे अच्छी तरह से 3 लैवल पर धोया जाता है. इस के बाद उसे सुखा कर हीरा तलाशा जाता है. चाल की मिट्टी को रातभर के लिए पानी वाले गड्ढे में भिगो कर रखते हैं.
यहां 3 तरह के पानी के गड्ढे बनाए जाते हैं. सब से पहले भिगोए गए चाल की मिट्टी को हाथों से मसला जाता है, फिर बड़े पत्थरों के टुकड़ों को अलग कर देते हैं. इस के बाद जाली की बनी लोहे की टोकनी में इस चाल वाली मिट्टी को ले कर पानी वाले दूसरे गड्ढे में धोया जाता है. दही की मथनी की तरह हाथों से मथा जाता है. इस से मिट्टी घुल जाती है और टोकनी में कंकड़पत्थर बचते हैं. इसे आखिरी में तीसरे साफ पानी वाले गड्ढे में धोते हैं, फिर इस कंकड़पत्थर को गोबर से लीप कर बनाए मिट्टी के फर्श पर सुखाते हैं. 1-2 घंटे बाद इस में हीरे को वैसे ही खोजा जाता है, जैसे चावल में कंकड़ देखा जाता है. हीरे जैसा चमकदार पत्थर मिलने पर उसे अलग कर देते हैं. हीरा होने का भरोसा होने पर उसे हीरा दफ्तर पहुंचाते हैं, वहां से पुख्ता होता है कि पत्थर हीरा है या कांच का टुकड़ा. पन्ना जिले में 11 जगहों पर हीरा मिलता है. पन्ना में जंगल सहित कुछ अन्य क्षेत्र भी चिन्हित हुए हैं, लेकिन अभी वहां हीरा खनन की इजाजत नहीं दी गई है.

ऐसे तय होती है हीरे की कीमत
हीरा दफ्तर में रोज खनन करने वाले चमकीले पत्थर दे कर जाते हैं, जिन की जांच की जाती है. कुछ ही लोग होते हैं जिन की जिंदगी में हीरा चमक लाता है. कलर क्लियरिटी, कट और वजन से हीरे की कीमत तय होती है. सब से अच्छा हीरा जैम क्वालिटी में ई और डी श्रेणी का माना जाता है.
पन्ना में अमूमन ई श्रेणी का हीरा मिल जाता है. जैम क्वालिटी के हीरे की अंगूठी और दूसरी ज्वैलरी बनती है, जबकि दूसरा इंडस्ट्रियल ब्लैक हीरा होता है. इस का ग्लास कटिंग, एयरप्लेन के छर्रे समेत दूसरी व्यावसायिक गतिविधियों में उपयोग होता है. इस की कीमत कम होती है. हीरा 50,000 से ले कर 15 लाख रुपए प्रति कैरेट तक बिक सकता है.
पन्ना में साल 1961 में हीरा दफ्तर बनाया गया था, तभी से हर 3 महीने में हीरे की नीलामी होती है. हीरे की नीलामी में गुजरात, मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद समेत कई राज्यों के व्यापारी आ कर बोली लगाते हैं.
पट्टे पर खदान ले कर हीरा तलाश करने वाले मजदूर को तुआदार कहा जाता है. खुदाई के दौरान मिलने वाले हीरे की जांच कराने के बाद तुआदार हीरा दफ्तर में उसे जमा कराता है.
हीरा दफ्तर द्वारा वजन और हीरे की क्वालिटी के आधार पर उस की न्यूनतम कीमत तय की जाती है. इस के बाद नीलामी होती है. अधिकतम कीमत में हीरा नीलाम किया जाता है. 11.50 फीसदी टैक्स काट कर बकाया राशि तुआदार को दे दी जाती है.

मालामाल हो चुके लोग
मई, 2022 में प्रताप सिंह यादव नाम के एक मजदूर को जैम क्वालिटी का हीरा मिला था. वह कुआं इलाके का रहने वाला है और उस की माली हालत ठीक नहीं थी. प्रताप सिंह यादव फरवरी, 2025 में सरकारी हीरा दफ्तर गया और 4 गुना 4 की एक जमीन हीरा खदान के लिए मंजूर करा ली. इस के बाद हीरा ढूंढ़ने के लिए वह दिनरात मेहनत करने लगा. 3 महीने की कड़ी मेहनत ने उस की झोली में हीरा डाल दिया. इस तरह रातोंरात गरीब मजदूर लखपति बन गया. उस हीरे का वजन 11.88 कैरेट है, जिस की कीमत तकरीबन 60 से 70 लाख रुपए आंकी गई. प्रताप ने इसे हीरा दफ्तर में जमा कर दिया है.
प्रताप सिंह यादव का कहना है कि हीरे की नीलामी से मिलने वाले पैसे से वह अपनी माली हालत सुधारेगा और बच्चों की पढ़ाई और भरणपोषण का खर्च निकालेगा.
पन्ना में सब से बड़ा 44 कैरेट का हीरा साल 1961 में रसूल मुहम्मद को मिला था. 67 साल बाद 2018 में 4 दोस्तों को 42 कैरेट से ज्यादा वजन का हीरा मिला था. यह हीरा उन्हें पटी की खदान में
9 अक्तूबर, 2018 को मिला था. इस खदान का पट्टा मोतीलाल प्रजापति के नाम पर था. हीरा दफ्तर से मोतीलाल को इस हीरे के एवज में सवा 2 करोड़ के आसपास की कीमत मिली थी.
पन्ना के बेनीसागर महल्ले में रहने वाले मोतीलाल अब भी हीरा खदानों में हीरा तलाशने का काम करते हैं. जब उन से पूछा गया कि करोड़ों का हीरा मिलने के बाद भी इस काम को क्यों नहीं छोड़ा, तो उन का जवाब था, ‘‘मैं ने जो जिंदगी जी है, वह मेरे बच्चे न जिएं. उन को अच्छी पढ़ाई कराना मेरा सपना है. इसी सपने को पूरा करने के लिए मैं अब भी हीरा खदानों की खाक छान रहा हूं.’’
47 साल के मोतीलाल 4 भाईबहनों में सब से बड़े हैं और उन्होंने केवल 10वीं जमात तक की पढ़ाई की है.
घर की माली हालत ठीक न होने से पढ़ाई बीच में छोड़ कर उन्हें मजदूरी करनी पड़ी. अभी परिवार में मां, पत्नी के अलावा 2 बेटे व एक बेटी हैं. मोतीलाल अपने 4 पार्टनरों के साथ 20 सालों से पटी की अलगअलग खदानों में हीरे की खाक छानते रहे हैं. उन की मेहनत रंग लाई, 9 अक्तूबर, 2018 को जब उन्हें पटी की खदान में 42.59 कैरेट का हीरा मिला. जब इस हीरे की नीलामी हुई तो यह हीरा सवा
2 करोड़ रुपए में बिका था. मोतीलाल ने इस रकम से सब से पहले अपना घर बनवाया और 20 सालों में जो उन पर जो कर्ज चढ़े थे, उसे पाईपाई चुकता किया और बची हुई रकम बच्चों के भविष्य की खातिर बैंक में जमा कर दी. पर इतना सबकुछ होने के बाद भी मोतीलाल का रूटीन पहले जैसा ही है. अब भी वे दोस्तों के साथ हीरापुर टपरियन की खदान में हीरे की तलाश में सुबह 5 बजे घर से निकल जाते हैं. दोपहर बाद वहां से ईंटभट्ठे पर काम करने चले जाते हैं और वहां से शाम ढलने के बाद लौटते हैं. मोतीलाल कहते हैं कि खदान में काम करते हुए उन्हें 25 साल हो गए हैं. पिछले साल उन्हें कम क्वालिटी का 5 कैरेट का हीरा मिला था, जो 1.62 लाख रुपए में नीलाम हुआ था. 11.50 फीसदी टैक्स कट गया था. बाकी रकम 4 पार्टनरों में बंट गई थी.
इसी तरह 22 फरवरी, 2022 को पन्ना जिले की पटी की उथली हीरा खदान से किशोरगंज बड़ा बाजार में
रहने वाले सुशील कुमार शुक्ला को 26.11 कैरेट का जैम क्वालिटी का हीरा मिला था.
नयापुवा पन्ना के रहने वाले 45 साल के रामप्यारे विश्वकर्मा 16 साल की उम्र में छतरपुर से पन्ना आए थे. उन के बड़े भाई लोहापत्थर का काम करते थे. यहां आ कर उन्होंने साइकिल पंक्चर की दुकान खोल ली. बेटा भरत बाइक रिपेयरिंग करता है. 5 साल पहले पत्नी की बीमारी से मौत हो गई. 2 बेटियां हैं. बड़ी लड़की मोहिनी 12वीं जमात में तो छोटी लड़की रोहिणी छठी जमात में पढ़ रही है.
पिछले 30 सालों से रामप्यारे भी हीरा तलाश रहे थे. उन की तलाश पूरी हुई
24 फरवरी, 2021 को, जब उन्हें 14.9 कैरेट का हीरा मिला. उन की खदान में कुल 7 पार्टनर थे. हीरे की नीलामी से 39 लाख रुपए मिले थे, जिस में से हरेक के हिस्से में 5.57 लाख रुपए आए थे.
रामप्यारे के हिस्से में आए पैसे वे बेटियों की शादी के लिए जमा कर चुके हैं और अब भी हीरे की तलाश के लिए खदान जाते हैं.
मई, 2022 में इटवां कला की रहने वाली चमेली बाई को 2.08 कैरेट का बेशकीमती हीरा कृष्ण कल्याणपुर पटी की उथली खदान से मिला था. चमेली बाई 10 साल से पन्ना में किराए के मकान में अपने परिवार के साथ रह रही हैं, लेकिन अभी तक मकान नहीं बनवा पाईं.
इसी मकसद को ले कर चमेली बाई ने फरवरी महीने में हीरा दफ्तर से कृष्ण कल्याणपुर पटी की उथली हीरा खदान का पट्टा जारी कराया था. 200 रुपए के चालान में उन्हें 4 गुना 4 मीटर की खदान मंजूर हुई, जिस के बाद उन्होंने खदान में हीरा तलाशने का काम किया और मई के महीने में उन्हें 2.08 कैरेट का उज्ज्वल किस्म का हीरा मिला था.

हीरे के बारे में रोचक जानकारी
भारत का हीरा उत्पादन में स्थान उस के रफ हीरों के उत्पादन से कहीं ज्यादा उस के पौलिशिंग उद्योग के चलते है. कच्चे हीरों को आयात कर के उन्हें तराशने और पौलिश कर के निर्यात करने में भारत अव्वल है.
इंडियन ब्यूरो औफ माइंस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हीरा मध्य प्रदेश के पन्ना जिले और आंध प्रदेश के गोलकोंडा और कोल्लूर खान के अलावा छत्तीसगढ़ के देवभोग इलाके में मिलता है. कोहिनूर नाम का मशहूर हीरा गोलकोंडा में ही मिला था, जो वर्तमान में ब्रिटेन के राजशाही मुकुट की शोभा बढ़ा रहा है.
हीरा रासायनिक तौर पर कार्बन का ही रूप है जो निष्क्रिय होने के साथ पानी में घुलनशील नहीं है. गुजरात के सूरत शहर में ज्यादातर हीरे को काटने और पौलिश करने का काम होता है. हीरे को 700 डिगरी तापमान से ज्यादा गरम करने पर वह जल कर कार्बन डाईआक्साइड के रूप में बदल कर राख जैसा कोई अवशेष नहीं छोड़ता है.

ऐसे करें हीरे की पहचान
हीरा की परख रखने वाले जौहरी बताते हैं कि असली हीरे के अंदर की बनावट ऊबड़खाबड़ होती है, लेकिन नकली या बनावटी हीरा अंदर से सामान्य दिखता है. असली हीरे में कुछ न कुछ खांचें होते हैं, जो 1,200 गुना ताकतवर माइक्रोस्कोप से देखे जा सकते हैं. हीरे को अखबार पर रखें और उस के पार से अक्षरों को पढ़ने की कोशिश करें. अगर टेढ़ी लकीरें दिखें तो हीरा नकली है. हीरे को पराबैंगनी किरणों में देखें. वह नीली आभा के साथ चमकता है तो हीरा असली है, अगर पीली, हरी या स्लेटी रंग की आभा निकले, तो यह मोइसानाइट नाम का पत्थर है. हीरा रोशनी को रिफ्लैक्ट करता है. असली हीरा बहुत कठोर होता है. हीरे को रगड़ने पर किसी भी तरह की खरोंच नहीं आती है. एक गिलास में पानी ले कर उस में हीरा डालने पर असली हीरा अपने घनत्व की अधिकता के चलते पानी में डूब जाता है, लेकिन नकली हीरा पानी में तैरने लगता है. हीरे के कोणों से आरपार देखने पर इंद्रधनुष की तरह सातों रंग दिखाई दें, तो समझिए कि हीरा असली है. जिस तरह चश्मे के ग्लास पर भाप चढ़ जाती हैं, उसी तरह अगर मुंह की भाप हीरे पर जम जाए तो समझ हीरा नकली है. असली हीरे पर नमी नहीं जमती है.
सरकार की उदासीनता की वजह से पन्ना में हीरा उद्योग बंद होने के कगार पर है. ज्यादातर हीरा खदानें बंद हो गई हैं. सरकार को चाहिए कि दुनिया के खूबसूरत रत्न ऐसे ही मिलते रहें, इस के लिए पन्ना के हीरा उद्योग को संरक्षित किया जाना चाहिए और वन भूमि विवाद के चलते जो हीरा खदानें बंद हो गई हैं, उन्हें भी चालू कराया जाना चाहिए, जिस से गरीबों की रोजीरोटी और अमीरों का शौक हमेशा के लिए महफूज रह सके. बुदेलखंड इलाके के पन्ना में कोई रेलवे स्टेशन नहीं है. नजदीकी रेलवे स्टेशन खजुराहो से पन्ना की दूरी 40 किलोमीटर है. जबलपुर डिवीजन के सतना रेलवे जंक्शन से पन्ना शहर की दूरी 75 किलोमीटर है. पन्ना झांसी से रांची जाने वाले नैशनल हाईवे 39 पर है. भोपाल, इंदौर से भी नियमित बस सेवा मुहैया है.

जुए के दांव जैसा है हीरा तलाशने का काम
जुए के खेल में दांव लगाने वाला जुआरी यह सोच कर दांव लगाता है कि जीत गया तो बिना मेहनत किए वह घर बैठ कर आराम की जिंदगी जिएगा, मगर जब वह जुए में हार जाता है तो पछतावा ही हाथ लगता है. ठीक उसी तरह मिट्टी की खदानों में हीरा खोजना जुए के दांव से कम नहीं है.
मध्य प्रदेश के पन्ना जिला हैडक्वार्टर से 40 किलोमीटर दूर खजुराहो के रहने वाले 40 साल के गोविंद रायकवाड़ आटोरिकशा चलाते थे, लेकिन कोविड महामारी में लौकडाउन के दौरान उन के आटोरिकशा का काम बंद हो गया. मजबूरी में गोविंद पन्ना आ गए और हीरा खदानों में अपनी किस्मत आजमाने लगे.
4-5 साल की खुदाई के बाद भी अभी तक उन्हें कुछ नहीं मिला है, जबकि वे चाहते तो फिर से आटोरिकशा चला कर अपना पुराना काम शुरू कर के अपने परिवार की आजीविका चला सकते थे, मगर जल्द करोड़पति बनने के चक्कर में वे हीरा खदान में खुदाई कर रहे हैं.
हीरे की ये खुली खदानें छोटेबड़े गड्ढो से भरी हैं, जिन में से कुछ गड्ढे इतने ज्यादा गहरे होते हैं कि उन में गिरने से जानलेवा हादसा या गंभीर चोट लग सकती है. पन्ना क्षेत्र के बाहर से आए खनिज मजदूर खदानों के अंदर रहने के लिए बेशरम के पौधे की झाड़ियों और प्लास्टिक की चादरों से छोटीछोटी ?ांपडि़यां बना कर रहते हैं. हीरा खनन का सब से बड़ी चुनौती सर्दियों की सर्द रातों में छोटीछोटी ?ांपडि़यों में रात बिताने की होती है. खाना पकाने के लिए पानी लाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना इन मजदूरों की मजबूरी है. हीरा खनन की होड़ ने कई लोगों ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगा दिया है, जबकि आंकड़े बताते हैं कि हजारों में से किसी एक मजदूर को ही बेशकीमती हीरा मिलता है. इस के बावजूद लोग दूसरा कामधंधा छोड़ कर अपनी किस्मत बदलने के लिए इस काम में रातदिन लगे हुए हैं.
पन्ना जिले के 42 साल के खदान मालिक रामप्यारे का बताते हैं कि पुरानी खदानों में अब पहले की तरह हीरे नहीं मिलते. 15 साल की उम्र से ही खनन के धंधे में लगे रामप्यारे को अपना पहला हीरा 20 साल पहले मिला था. 10 साल बाद उन्हें एक और हीरा मिला था, पर आजकल कोई अच्छा हीरा नहीं मिल रहा, बस हीरे के कुछ छोटेछोटे टुकड़े मिल रहे हैं, जिन की कीमत कुछ हजार रुपए है. इस आमदनी से जैसेतैसे गुजारा होता है.
पिछले 7 महीने से खुदाई कर रहे छोटूलाल अहिरवार और उन के छोटे भाई चंचल की भी कहानी भी यही है कि हीरे की खुदाई में उन्हें एक भी हीरा नहीं मिला और हजारों रुपए का नुकसान हो गया. जुए के खेल की तरह दोनों की अब सारी उम्मीदें टूट गई हैं और उन्होंने यह काम छोड़ने का मन बना लिया है.
हीरे की खोज में लगे मजदूरों को कोई यह समझने वाला भी नहीं है कि वे क्यों इस जुए के खेल में अपनी और अपने परिवार को जिंदगी को दांव पर लगा रहे हैं?

अंधविश्वास की जद में हीरा खदान
मध्य प्रदेश के उत्तरपूर्वी छोर पर बसा पन्ना आज भी इतना पिछड़ा है कि अब तक कोई रेलवे लाइन तक यहां नहीं पहुंची है. लेकिन साल और सागौन की घेराबंदी में यहां सैकड़ों हीरा खदानें हैं. इन खानों में काम करने वाले मजदूरों में औरतें ज्यादा दिखेंगी. मिट्टी से कंकड़ निकालतीं, कंकड़ से हीरे चुनतीं और अगर किसी तरह हीरा न मिले तो टोनाटोटका करते हुए वे अपनी जिंदगी बसर कर रही हैं.
ज्यादातर खदानों के आसपास पूजापाठ के लिए कुछ जगह छोड़ दी जाती है. हीरा छांटने से पहले मजदूर यहां बैठ कर ऊपर वाले का नाम लेते हैं. उस जगह पर जूताचप्पल पहन कर नहीं जाते. कई और टोटके भी हैं, जिन में मर्दऔरत का मेल आजमाया हुआ और सब से आखिरी टोटका है.
विश्रामगंज इलाके में रुंझ नदी बहती है. इस के बारे में कहा जाता है कि यहां पानी की धार में हीरे बहते मिल जाएंगे. इस अंधविश्वास पर भरोसा करते हुए हजारों लोग नदी के आसपास डेरा डाल चुके हैं. हीरा खोजते हुए कई लोग पार्टटाइम काम भी करने लगे हैं, जैसे चायपकौड़ी की टपरी लगाना. बुधवार और रविवार को खासतौर पर टोटकों का दिन माना जाता है. ऐसे ही एक टोटके में मर्दऔरत पहले तो लोबान जला कर चाल (कंकड़ों का ढेर जिस से हीरा छांटा जाना है) बिखरा दी जाती है.
इस के बाद पास ही जहां मचाई होती है, उस कीचड़ वाले गड्ढे में पतिपत्नी चले जाते हैं और बिना कपड़ों के सैक्स करते हैं. फिर कपड़ेलत्ते पहन कर काम में लग जाते हैं. मजदूरों का मानना है कि यह सब खदान में किसी के भी आने से पहले और भगवान के जागने के पहले होना चाहिए.
एक तरीका और है. जहां कंकड़ रखे होते हैं, वहां बीचोंबीच एक मजदूर को सुलाया जाता है और फिर
7 बार गोलाकार घसीटा जाता है. वह चिल्लाता है, ‘‘मिलेगा… मिलेगा…’’ पर कंकड़ों पर घिसटते हुए वह खूनमखून हो जाता है. कई बार गहरे जख्म भी बन जाते हैं, लेकिन फर्क नहीं पड़ता. मजदूर से ले कर ठेकेदार तक चाहते हैं कि बस किसी तरह हीरा मिल जाए.

सिलिकोसिस बीमारी से जूझ रहे हीरा मजदूर
मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की हीरा खदानों से जुड़ा एक पक्ष बेहद डरावना है. खदानों में काम कर रहे ज्यादातर मजदूर सिलिकोसिस नामक बीमारी से जूझ रहे हैं. फेफड़ों में पत्थर जैसी परत जमाने वाली इस लाइलाज बीमारी ने आधी उम्र में ही इन मजदूरों को बूढ़ा बना दिया है और कई मजदूरों की मौतों ने इन परिवारों को बेसहारा बना दिया है. गांधीग्राम, मनोर और बड़ौर जैसे गांवों में खदानों की धूल मजदूरों को सांसों में जा कर उन्हें अंदर ही अंदर खा रही है. पत्थर तोड़ते समय उड़ने वाली सिलिका सैंड सांस के जरीए फेफड़ों में जमा हो जाती है, जिस से सांस लेना दूभर हो जाता है. 16-17 साल की उम्र से खदानों में पसीना बहाने वाले मुकेश आदिवासी इस बीमारी से इस कदर पीडि़त हैं कि अब चलनेफिरने लायक नहीं बचे. सांस फूलना, लगातार खांसी और भूख न लगना उन की रोजमर्रा की जद्दोजेहद बन गई है. ऐसे में अपने बीवीबच्चों का पेट पालना मुश्किल हो गया है. हालात ये हैं कि कभीकभी भूखे पेट ही सोना पड़ता है.
इसी तरह खदानों में रातदिन नंगे पैर काम करने से मजदूरों के पैर भी सूज गए हैं. उन के फेफड़ों में भी दर्द रहता है. सांस लेने में दिक्कत होती है. वे ज्यादा बोल भी नहीं पाते.
हीरा खदानों में काम कर रहे मजदूरों को होने वाली इस बीमारी ने केवल मजदूरों की जिंदगी ही नहीं छीनी, बल्कि परिवारों को आर्थिक तंगी में धकेल दिया है. मजदूरों के हितों की दुहाई देने वाले संगठन और सरकारी अस्पताल मजदूरों को कभीकभार मास्क और दवाओं का वितरण कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं.     Panna diamond mines

Short Story: लॉकडाउन का शिकार

लेखक- प्रो. अलखदेव प्रसाद अचल,

Short Story: सूरज बचपन से ही पढ़नेलिखने में काफी मन लगाता था, पर जिस महल्ले में वह रह रहा था, वहां का माहौल काफी खराब था. ज्यादातर बच्चे स्कूल पढ़ने नहीं जाते थे. जो जाते भी थे वे या तो मिड डे मील के चक्कर में जाते थे या फिर मुफ्त में मिलने वाली स्कूल पोशाक के लालच में.

महल्ले के लोग यही सम झते थे कि पढ़नेलिखने का काम बाबुओं का है. वैसे भी पढ़नेलिखने से कुछ नहीं होता. किस्मत में जो होता है वही होता है. यही सोच उस तबके के लोगों को तरक्की की सीढ़ी पर ऊपर बढ़ने नहीं दे रही थी.

उन लोगों के बीच सूरज हकीकत में सूरज की तरह चमकता दिखाई दे रहा था. वह गांव के लड़कों के साथ खेलकूद करने के बजाय पढ़ाई करता और उस के बाद जो समय बचता, उस में अपने मांबाप के साथ दूसरे जरूरी कामों में लगा रहता था. यह देख कर गांव के बच्चे उस पर तरहतरह की फब्तियां भी कसते रहते थे, पर सूरज इस की परवाह नहीं करता था.

सूरज का बाप रामदहिन जिन मालिकों के यहां मजदूरी करता था, उसे मालिक यही नसीहत देता, ‘तुम बेकार ही अपने बेटे पर पैसे बरबाद कर रहे हो. अगर तुम्हारे साथ वह भी कमाता, तो तुम्हारी आमदनी दोगुनी हो जाती और घर में ज्यादा खुशहाली आ जाती.’

पर रामदहिन अपने मालिक की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं देता था. उसे लगता कि हम लोग तो जिंदगीभर अंगूठाछाप ही रह गए. चलो, जब बेटा अच्छा निकला है, तो उसे पढ़ा ही देते हैं.

पढ़ने के दौरान सूरज को कुछ खास तबके के लड़कों द्वारा छुआछूत की भावना का शिकार भी होना पड़ता था. क्लास में वह जिस बैंच पर बैठता, तो ऊंची जाति के बच्चे उस बैंच से उठ कर दूसरी बैंच पर बैठ जाते या फिर उसे साफसाफ कह देते कि पीछे चले जाओ, इस सीट पर मत बैठना.

सूरज जानता था कि इन लफंगों से  झगड़ा मोल लेना बेकार है. इन्हें तो पढ़ना है नहीं, तो इन से उल झ कर अपना समय क्यों बरबाद किया जाए.

पर हां, गांव में सूरज की पूछ जरूर थी. जब से उस ने हाईस्कूल में दाखिला लिया था, तभी से गांव में ‘कला संगम’ नामक एक संस्था बनाई गई थी, जिस का वह सचिव था. तकरीबन हर तबके के लड़के उस संस्था से जुड़े हुए थे. उसी संस्था के जरीए सूरज कभी नाटक का कार्यक्रम कराता, तो कभी किसी दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रम का.

गांव में चाहे किसी के यहां शादी समारोह हो या फिर श्राद्ध, सूरज अपने साथियों के साथ शुरू से आखिर तक वहां मुस्तैदी से रहता था. इस की वजह से लोग उस की तारीफ करते. शायद इसी वजह से अपने समाज में भी उस की लोकप्रियता बढ़ती चली जा रही थी.

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अब तो देखादेखी और लोग भी अपने बच्चों को सूरज की तरह पढ़ने और नेक काम करने की नसीहत देने लगे थे. सूरज भी गांव में ऐसे लोगों को सम झाता, जो अपने बच्चे को स्कूल न भेज कर काम में लगाए रहते या फिर पढ़ाई की अहमियत को न सम झते हुए उस के प्रति लापरवाह रहते.

इस का नतीजा यह हुआ कि उस के गांव के गरीबगुरबों के बच्चे भी स्कूल जाने लगे. यह बात अलग थी कि सरकारी स्कूल में मास्टरों द्वारा ध्यान न देने की वजह से बच्चों का जिस रूप में विकास होना चाहिए था, वह नहीं हो पाता था.

हाईस्कूल से सूरज को स्कौलरशिप मिलनी शुरू हो गई थी, जिस से कुछ राहत मिल जाती थी, पर हाईस्कूल पास करने के बाद जब कालेज में नामांकन की बारी आई, तो सूरज ने कालेज में नामांकन तो करा लिया, पर कालेजों में पढ़ाई नहीं होती थी, सिर्फ छात्रछात्राओं का नामांकन होता. समय पर रजिस्ट्रेशन होता. समय पर इम्तिहान होते. इसी तरह नतीजे भी आते रहते.

जो पैसे वाले होते, वे आईएससी में नामांकन कराते. निजी शिक्षण संस्थानों में या तो अलगअलग विषयों की ट्यूशन पढ़ते या फिर एकसाथ कोचिंग में पढ़ते, पर जिन की माली हालत सही नहीं थी या कोई सुविधाएं नहीं थीं, वे आर्ट्स ही लेना मुनासिब सम झते थे.

सूरज के पास न तो पैसे थे कि वह 1,000 रुपए महीना दे कर कोचिंग में पढ़ सकता था और न ही किसी शहर में ही रह कर पढ़ सकता था, इसलिए उस ने आर्ट्स लेना ही मुनासिब सम झा. वह घर पर ही पढ़ाई करता रहता. इस की ही बदौलत इंटर में संतोषजनक नतीजा भी आया था उस का.

जैसे ही सूरज ने अपना नामांकन बीए में कराया, वैसे ही उस के पिता ने उस की शादी तय कर दी, जबकि सूरज नहीं चाहता था कि अभी उस की शादी हो. इसलिए उस ने विरोध इस का करते हुए कहा, ‘पिताजी, आप इतनी जल्दी मेरी शादी क्यों करना चाहते हैं?’

पिताजी ने कहा, ‘बेटा, हर मांबाप अपनी जिंदगी में सपने बुनते हैं. तुम्हारी शादी हो जाएगी, तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाएगा?’

सूरज ने कहा, ‘जो भी बिगड़ेगा, उसे भोगना तो मु झे ही पड़ेगा.’

पिता ने कहा, ‘तो क्या इस बुढ़ापे में तुम्हारी बूढ़ी मां चूल्हे पर अपने हाथ जलाती रहे?’

सूरज ने कहा, ‘मां के तो हाथ ही जल रहे हैं पिताजी, मेरी तो जिंदगी ही जल जाएगी. पर चलिए, आप लोगों को इसी में खुशी है, तो मैं कुछ नहीं कहूंगा.’

सूरज की शादी के बाद घर के काम में मांबाप को काफी राहत मिलने लगी, इसीलिए वे दोनों भी काफी खुश रहने लगे. इधर सूरज भी अपनी पत्नी पुष्पा के प्रेमपाश में धीरेधीरे जकड़ता चला गया.

पुष्पा जब भी अपने मायके चली जाती, तो महीने के अंदर ही यह कहते हुए सूरज उसे लेने पहुंच जाता कि मां से ज्यादा काम नहीं होता है.

वैसे तो सूरज हर तरह से प्रगतिशील सोच रखता था, पर वर्तमान सरकार की नाकामियों के खिलाफ कोई बोल देता, तो उसे वह बरदाश्त नहीं करता था. कर्म के साथसाथ वह ऊपर वाले पर भी खूब यकीन रखता था. जब भी लोकसभा या विधानसभा का चुनाव आता, तो सूरज पार्टी का  झंडा उठाए रहता. जब कभी राजनीतिक बातें निकलतीं, तो वह सरकार की खूब तारीफ करता.

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इसी तरह दिन गुजरते चले गए. सूरज बीए हो गया. अब वह घर पर रह कर ही किसी कंपीटिशन इम्तिहान की तैयारी के लिए सोचता, पर मुमकिन होता दिखाई नहीं देता, जबकि उसी दौरान उस ने कंपीटिशन की तैयारी के लिए कई प्रतियोगी पत्रिकाएं भी खरीदी थीं, घर पर रह कर पढ़ाई की थी, पर कामयाबी नहीं मिल सकी थी.

सूरज जानता था कि परिवार के बीच रह कर प्रतियोगिता का इम्तिहान पास करना टेढ़ी खीर जैसा है और शहर में रह कर तैयारी करने के लिए उस के पास पैसे नहीं हैं. इधर बुढ़ापे की वजह से उस के मांबाप भी मेहनतमजदूरी करने से लाचार होते जा रहे थे.

उसी दौरान सूरज 2-2 बेटियों का बाप भी बन चुका था. उन में एक ढाई साल की थी, तो दूसरी 6 महीने की. न चाहते हुए भी 2-2 बच्चियों का पिता बनने पर सूरज इस हकीकत को अच्छी तरह सम झता था कि बिलकुल ही छोटे से घर में पत्नी से दूरियां बना कर रहना मुमकिन नहीं था, जबकि उन दोनों बच्चियों के जन्म पर सूरज के मांबाप की सोच थी कि ऊपर वाला देता है, तो वह पार भी लगाता है.

जबकि सूरज की सोच अपने मांबाप से अलग थी. वह जानता था कि अब कुछ करना होगा वरना या तो हम लोग फटेहाली के कगार पर पहुंच जाएंगे या फिर इतना पढ़लिख कर भी उसे बंधुआ मजदूर बनने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.

आश्विन का महीना था. चारों तरफ दुर्गा पूजा की तैयारियां चल रही थीं. जगहजगह रंगारंग कार्यक्रम के आयोजन होने वाले थे. दीवाली भी सिर पर थी. इसी मौके पर बगल के गांव का साथी रोहित छुट्टी पर घर आया था. वह कभी सूरज के साथ ही पढ़ता था, पर घर की माली तंगी की वजह से इंटर पास करने के बाद ही गुजरात चला गया था और प्राइवेट कंपनी में काम करने लगा था.

सूरज ने इस बार साथ चलने को कहा, तो रोहित जब वापस जाने लगा, तो सूरज को भी साथ लेता गया और प्राइवेट कंपनी में काम दिलवा दिया.

सूरज जिस कंपनी में काम करता था, उस में 8 घंटे के बजाय काम तो 12 घंटे करना पड़ता था, पर तनख्वाह 10,000  रुपए महीने ही मिलती थी. इस के अलावा कंपनी की तरफ से ही खानेपीने और रहने का इंतजाम था.

अब सूरज हर महीने सिर्फ घर पर पैसे ही नहीं भेजता था, बल्कि दोनों बच्चियों के नाम से बीमा भी करवा लिया था. फोन पर मांबाप को कह दिया था कि अब उन्हें मेहनतमजदूरी करने की कोई जरूरत नहीं है. आराम से खाइए, पीजिए और मस्त रहिए.

यह सुन कर मांबाप की आंखों में खुशी के आंसू भी छलक पड़े.

इस के साथ ही सूरज अपने मन में तरहतरह के सपने भी बुनने लगा था. उन सपनों में छोटा ही सही, पर अच्छा मकान बनाने, बच्चियों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने और घर में तरहतरह की सुविधाएं शामिल थीं. इन्हीं सपनों के साथ समय अपनी रफ्तार से बढ़ता जा रहा था.

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जब फागुन का महीना आया, वसंत का मदमाता मौसम लोगों के मन को गुदगुदाने लगा, तो पुष्पा को सूरज की कमी खलने लगी. इस दौरान उस की सूरज से बातें हुईं, तो पुष्पा ने पूछा, ‘क्या होली में अकेले ही रहना पड़ेगा?’

सूरज ने कहा, ‘इच्छा तो मेरी भी थी कि घर आऊं, पर लग नहीं रहा है. कंपनी के ऐसे बहुत सारे लोग होली की छुट्टी में अपने घर जा रहे हैं, जो सालभर से घर नहीं गए थे.

‘पुष्पा, अगर होली में नहीं आ पाऊंगा, तो शायद छठ के मौके पर एक हफ्ते के लिए ही सही, पर जरूर आऊंगा.’

लेकिन होली के बाद कोरोना की महामारी की सुगबुगाहट शुरू हो गई. देखते ही देखते सरकार ने स्कूलकालेजों, मौल, सिनेमाघरों, बाजारों को बंद करने का ऐलान कर दिया. लोगों में डर का माहौल काले बादलों की तरह छाने लगा.

फिर एकाएक सरकार ने एक दिन के लौकडाउन का भी ऐलान कर दिया. तब लगा, शायद इस से महामारी से नजात मिल जाएगी, पर दूसरी तरफ अखबारों और टीवी चैनलों में देश के कोनेकोने में कोरोना वायरस से प्रभावित लोगों की सूचना आने लगी.

फिर क्या था, सरकार ने आम लोगों की सुविधाओं का खयाल रखे बिना  21 दिन के लिए लौकडाउन का ऐलान कर दिया. इस के बाद हवा में खबर भी तैरने लगी कि लौकडाउन का समय बढ़ भी सकता है.

यह देख कर पूरे देश में अफरातफरी मच गई. देश के कोनेकोने में सरकारी और गैरसरकारी कंपनियों को बंद करा दिया गया, पर उस में काम करने वाले मुलाजिम कहां रहेंगे? कैसे रहेंगे? इस बारे में सरकार ने जरा भी नहीं सोचा.

सरकारी व गैरसरकारी कंपनियों के मालिकों ने अपने मुलाजिमों को सुविधाएं मुहैया कराने के मामले में अपने हाथ खड़े कर दिए. शहर में खानेपीने जैसी सारी दुकानें बंद करवा दी गईं. यातायात सुविधाएं एकाएक ठप हो गईं. अब मुलाजिमों के सामने सब से बड़ा संकट खड़ा हो गया कि कहां जाएं, क्योंकि भूखेप्यासे हजारों किलोमीटर की दूरी पैदल तय करना मौत को न्योता देने से कम नहीं लग रहा था.

सूरज इसी लौकडाउन में बुरी तरह फंस चुका था. उसे सम झ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. कई सालों से सूरज जिस सरकार की तारीफ करता आ रहा था, अब वही सरकार बुरी लगने लगी थी. वह रहरह कर गालियां भी बकने लगा था. सोच रहा था कि जब खुद की लापरवाही की वजह से इतने दिनों में कुछ नहीं बिगड़ा था, तो 3-4 दिनों में क्या बिगड़ जाता? अगर बिगड़ ही जाता, तो हम जैसे लोगों पर ध्यान देने की जवाबदेही तो उठानी चाहिए थी.

अब तो मोबाइल से घर पर बातें भी हो रही थीं, पर बातों से खुशियां पूरी तरह गायब थीं. जब सूरज ने देख लिया कि किसी भी सूरत में गुजरात में रह पाना मुमकिन नहीं है, तो एक दिन वह पैदल ही घर के लिए चल दिया, जबकि ऐसा भी नहीं था कि रास्ते में पैदल चलने वालों में सूरज सिर्फ अकेला था. उस की तरह सैकड़ोंहजारों लोग सड़कों पर उमड़े दिखाई पड़ रहे थे.

रास्ते में कहीं कोई सुविधा नहीं थी. अगर कहीं होता तो पुलिस वालों के डंडे का शिकार होना पड़ता. न रहने का ठिकाना, न खाने का. दिन में तेज धूप का सामना करना पड़ता, तो रात में  ठंड का.

धीरेधीरे सूरज के शरीर ने जवाब देना शुरू कर दिया. फिर भी दम मारता, पैर घसीटता वह आगे बढ़ता चला जा रहा था. उसी बीच एक रात सूरज पूरी थकावट में सोया था कि उस की जेब से मोबाइल फोन, कुछ नकदी और एटीएम कार्ड गायब हो गए.

अब सूरज के सामने मौत के सिवा कुछ नहीं दिखाई दे रहा था. शरीर पूरी तरह से जवाब दे चुका था. वैसे तो उस समय तक वह कुछ दिनों में सैकड़ों किलोमीटर की दूरियां तय कर चुका था, पर अभी भी कई ज्यादा किलोमीटर की दूरियां तय करना बाकी थी.

चलतेचलते सूरज की तबीयत पूरी तरह खराब हो चुकी थी. वह सर्दी, खांसी, जुकाम का शिकार हो चुका था. इसी बीच पुलिस वालों ने उसे गाड़ी में बैठाया और अस्पताल के जनरल वार्ड में भरती करा दिया.

इधर घर वालों की घबराहट काफी बढ़ती चली जा रही थी. उन की नींद हराम हो चुकी थी. इसी बीच 2 दिनों के बाद घर फोन आया कि कोरोना की चपेट में आने की वजह से सूरज की मौत हो गई है.

यह सुनते ही घर में जोरजोर से छाती पीट कर रोने की चीखें सुनाई पड़ने लगीं. गांव से ले कर ससुराल तक में यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई कि सूरज कोरोना का शिकार हो गया, पर यह किस को पता कि सूरज कोरोना वायरस का नहीं, बल्कि लौकडाउन का शिकार हो गया था. Short Story

Hindi Kahani: कोरोनावायरस – डराने वाली चिट्ठी

Hindi Kahani: लौकडाउन के दौरान चिट्ठी ने मुझे बहुत डराया. आप शायद मुझे पागल समझ रहे होंगे, लेकिन मेरा फलसफा समझने की कोशिश करेंगे तो आप को लगेगा कि मैं गलत नहीं कह रहा. इस चिट्ठी को पढ़ते हुए मैं जिस भय से गुजर रहा हूं, आप शायद न समझें.

‘आदरणीय अंकल जी,

‘प्रणाम.

‘पिछले 5 दिनों से पुणे के अपने फ्लैट में अकेले पड़ेपड़े मैं ने काफी कुछ सोचा है. सोचा, आप को बता दूं. उम्मीद है पत्र पूरा पढ़ने के बाद आप मुझे पागल नहीं समझेंगे. लौकडाउन के चलते कंपनी में कामकाज ठप  पड़ा है. मैं घर से ही प्रोजैक्ट पूरा कर रहा हूं, लेकिन माहौल देखते काम में मन नहीं लग रहा है.

‘न जाने क्यों मुझे लग रहा है कि सबकुछ खत्म होने वाला है. अपनी 28 साल की छोटी सी जिंदगी में मैं ने ऐसी दहशत कभी नहीं देखी. हमारे अपार्टमैंट के सभी दरवाजे बंद हैं. लोग सन्नाटे में हैं. अधिकतर फैमिली वाले हैं लेकिन कोई गाने नहीं सुन रहा, फिल्में नहीं देख रहा. कभीकभी सामने वाले मालेगांवकर अंकल के फ्लैट से टीवी की आवाज कानों में पड़ जाती है. मुझे एक ही शब्द समझ आता है वह है कोरोना.

‘मैं मानता हूं कि पूरी दुनिया एक अजीब से संकट से घिर गई है जिस से उबरने की तमाम कोशिशें मुझे बेकार लगती हैं. यहां नौकरी जौइन करने के बाद मैं ने आप से और दूसरे रिश्तेदारों से कोई वास्ता नहीं रखा लेकिन जाने क्यों आज आप लोगों की याद बहुत आ रही है. मम्मीपापा भी खूब याद आ रहे हैं. मैं यह मानने में कतई नहीं हिचकिचा रहा कि मैं अव्वल दरजे का खुदगर्ज आदमी हूं. मम्मीपापा की रोड ऐक्सिडैंट में मौत होने के बाद से ही मुझे लगने लगा था कि अब मुझे अकेले ही जीना है.

‘जी तो लिया लेकिन अब सोच रहा हूं कि क्या इसी दिन के लिए जिया था. मेरे कोई खास दोस्त भी नहीं हैं. हकीकत में मेरा इस शब्द पर कभी भरोसा ही नहीं रहा. अब जब मेरे चारों तरफ तनहाई है तब मुझे लग रहा है कि मुझे मर जाना चाहिए.

इन डरेसहमे हुए लोगों के बीच जिंदा

रहने से तो बेहतर है शांति से मर

जाया जाए.

‘थोड़ीथोड़ी देर बाद मुझे महसूस होता है कि कोरोना ने मुझे और मेरे फ्लैट को घेर लिया है. करोड़ों की तादाद में ये वायरस मेरी तरफ बढ़ रहे हैं. कई तो वाशबेसिन पर रखा सैनिटाइजर पीते जोरजोर से हंस रहे हैं. मेरा मास्क उन्होंने कुतर डाला है और बहुत से पिंडली से रेंगते हुए मेरे मुंह की तरफ बढ़ रहे हैं.

‘मैं उन्हें झटकता हूं, फिर घबराहट में अपार्टमैंट के मेन गेट पर आ कर केबिन में सिक्योरिटी गार्ड के पास जा कर बैठ जाता हूं. उस का असली नामपता नहीं मालूम. लेकिन सभी उसे पांडूपांडू कहते हैं. वह भी डरा हुआ है, मेरी तरफ देखता है, फिर हथेली पर तंबाकू रगड़ने लगता है. मुझे लगता है इसे भी इन्फैक्शन है, इसलिए वह मुझ से दूर भागता है. मुझे उस पर दया आती है कि इस बेचारे को इलाज नहीं मिला, तो यह भी मर जाएगा और एकएक कर सारे लोग मर जाएंगे.

‘मैं फिर फ्लैट पर आ जाता हूं लेकिन लिफ्ट से नहीं बल्कि सीढि़यों से क्योंकि लिफ्ट में वायरस मुझे गिरफ्त में ले सकते हैं. 8वें माले पर हांफते हुए चढ़ता हूं, तो लगता है वायरस मेरा पीछा कर रहे हैं. वे कभी भी मुझे जकड़ सकते हैं.

‘आप को याद है पापा एक गाना अकसर गाते थे – ‘जीवन में तू डरना नहीं, सिर नीचा कभी करना नहीं, हिम्मत वाले हो मरना नहीं…

‘लेकिन मुझे लगता है डर से ज्यादा यह अकेलापन मुझे मार रहा है. इसी डर के चलते मैं लैपटौप और टीवी भी नहीं चला रहा क्योंकि उन में से कोरोना निकल कर घर में फैल जाएंगे. खानेपीने का बहुत सा सामान रखा है जो बाजू वाली सिंह आंटी दे गई थीं, लेकिन दूर से मानो मैं संक्रमित होऊं. वे, हालांकि, अच्छी महिला हैं लेकिन सनकी सी भी हैं. पड़ोसी होने के नाते उन का फर्ज बनता है कि वे मेरी खबर लेती रहें पर वे भी स्वार्थी हैं, सब स्वार्थी हैं और आप भी स्वार्थी हैं.

कोरोना ने मुझे सिखाया है कि इस दुनिया में कोई किसी का सगा नहीं है. सारे रिश्तेनाते, यारीदोस्ती खुदगर्जी पर टिकी है जिस का इम्तिहान अब हो रहा है और नतीजे भी सामने आ रहे हैं. सब के सब सभी के होते हुए अकेले हैं, जो कोरोना और डर दोनों से मरेंगे, मैं भी.

‘चारों तरफ सन्नाटा है, कोई हलचल नहीं है. सब बुजदिलों की तरह घरों में दुबके आहिस्ताआहिस्ता आती मौत का इंतजार कर रहे हैं. वे कितने भी हाथ धो लें, बचेंगे नहीं. मैं तो नहा भी नहीं रहा क्या पता शौवर से ही कोरोना बरसने लगें.

‘आप मेरी इन बातों को पागलपन समझ रहे होंगे लेकिन मेरा फलसफा समझने की कोशिश करें तो आप को लगेगा कि मैं गलत नहीं कह रहा था. मैं भगवानवगवान को नहीं मानता, मैं राजनीति के पचड़े में भी नहीं पड़ता. बीटैक और एमबीए करने के बाद से मैं नौकरी कर रहा हूं. औफिस जाता हूं. 12 घंटे मन लगा कर काम करता हूं, खाना खाता हूं, फिर सो जाता हूं.

‘फैमिली सिस्टम में रहने वाले भी इसी तरह रहते हैं लेकिन दिखावा ज्यादा करते हैं वे. बहुत शातिर और धूर्त होते हैं. जिंदगीभर एकदूसरे का शोषण करते हैं, एकदूसरे का इस्तेमाल करते हैं और इसी की कीमत का भी लेनदेन करते हैं. कोरोना इस की पोल खोल रहा है. अगर आज घर में वह किसी को लग जाए तो सभी संक्रमित से दूर भागेंगे जैसे कोढ़ के मरीज से भागते हैं.

‘आइसोलेशन के नाम पर उसे अलग पटक देंगे, छूना तो दूर की बात है, उस की तरफ देखने से भी सहमेंगे. मेरी भी हालत ऐसी ही है. मैं अपने इस फ्लैट में पड़ापड़ा यों ही मर भी जाऊं तो मेरी लाश से उठती दुर्गंध से लोगों को पता चलेगा.

फिर लोग डरेंगे, अपार्टमैंट छोड़ कर भागेंगे. सरकारी अमला पूरी बिल्ंिडग सैनिटाइज करेगा, टीवी वाले आएंगे सनसनी फैलाएंगे. मेरी जन्मपत्री खंगालेंगे. जब कुछ खास जानकारी हाथ नहीं लगेगी तो मुझे लावारिस घोषित कर किसी नई खबर की तरफ दौड़ पड़ेंगे. आप देखना, ये भी मरेंगे जो नाम और पेशे के लिए जान हथेली पर लिए घूम रहे हैं, बल्कि कहना चाहिए कि भटक रहे हैं.

‘खैर मुद्दे की बात यह कि मैं गंभीरतापूर्वक खुदकुशी करने की सोच रहा हूं. मुझ से पलपल की यह मौत सहन नहीं हो रही है. मुझे मालूम है आप मेरा मरा मुंह देखने या मिट्टी ठिकाने लगाने नहीं आएंगे. सही भी है, कोई क्यों यह सिरदर्दी मुफ्त में मोल ले.

‘हां, मैं अगर यह वसीयत कर जाऊं कि मेरे मरने के बाद एक करोड़ का यह फ्लैट और 20-25 लाख रुपए की सेविंग आप की होगी तो यकीन मानें आप सिर के बल दौड़ कर आएंगे. पुणे तक आने का कर्फ्यू पास हाथोंहाथ बनवा लेंगे, सरकारी अफसरों और पुलिस वालों के सामने घडि़याली आंसू बहाएंगे कि भतीजा मर गया है, आखिरी बार देखने और क्रियाकर्म करने जाने दीजिए.

‘आप सोच रहे होंगे, बल्कि तय ही कर चुके होंगे, कि मैं वाकई डिप्रैशन बरदाश्त न कर पाने के कारण पागल हो गया हूं, तो आप गलत सोच रहे हैं. दरअसल, मेरी चिंता असहाय मानव जीवन है. आदमी खुद को ताकतवर कहते गर्व से फूला नहीं समाता लेकिन आज एक मामूली से वायरस के सामने कितना असहाय नजर आ रहा है. सारी साइंस और टैक्नोलौजी महत्त्वहीन हो गई है. कहा यह जा रहा कि सब्र रखो, सब ठीक हो जाएगा. रिसर्च चल रही है.

‘मैं कहता हूं कुछ नहीं हो रहा. आदमी न दिखने वाले इन कीड़ेमकोड़ों की ताकत के सामने कुछ नहीं है. वह प्रकृति की सब से कमजोर कृति है. एक कोरोना नाम के वायरस ने हजारों मार दिए और भी मरेंगे, फिर जब कोरोना का प्रकोप खत्म हो जाएगा तो लैब से कोई दाढ़ी वाला वैज्ञानिक बाहर आएगा, उस के हाथ में कोरोना की एक दवा होगी. लेकिन यह अंत नहीं होगा, जल्द ही कोई नया वायरस पैदा होगा, फिर हाहाकार मचेगा, लौकडाउन होगा और मैं फिर कैद हो कर रह जाऊंगा.

‘जबकि मैं काम करना चाहता हूं, जिंदा रहना चाहता हूं, खिलते हुए फूल देखना चाहता हूं, चहकतेखेलते हुए बच्चे देखना चाहता हूं, खूबसूरत युवतियों का अल्हड़पन देखना चाहता हूं, खूब सी बियर पीना चाहता हूं, सिगरेट के धुएं के छल्ले बनाना चाहता हूं, व्हाइट सौस के साथ पिज्जा खाना चाहता हूं, हिल स्टेशन जा कर छुट्टियां मनाना चाहता हूं, नएनए ब्रैंड के आफ्टर शेव ट्राई करना चाहता हूं, और तो और, मैं रेल की पटरियों के किनारे शौच करते हुए लोगों को भी देखना चाहता हूं.

‘मैं और भी बहुतकुछ करना चाहता हूं लेकिन यों कैद नहीं रहना चाहता, इसलिए मर जाने का यह बहादुरीभरा फैसला ले रहा हूं जिसे शातिर लोग बुजदिली कहते हैं. कोरोना मेरे दिमाग में आ गया है. मैं मजबूर हूं क्योंकि आधुनिकता की हकीकत मुझे समझ आ गई है.

‘इन क्षणों में मुझे उपदेशकों और आशावादियों पर तरस आ रहा है. ये लोग बहुत चालाक हैं जो चाहते हैं कि लोग जिंदा रहें, दुनिया चलती रहे और ये अपना भोंथरा ज्ञान बघारते रहें. ये खुद मरने से डरते हैं, इसलिए दूसरों को जिंदा रखना चाहते हैं. मेरी खुदकुशी इन के मुंह पर थप्पड़ मारेगी. यह जरूर आप दुनिया को बताएं, बाकी जिसे जो सोचना हो, सोचे. मुझे लग रहा है कोरोना दरवाजे के नीचे से दाखिल हो गया है और इस बार यह मन का वहम नहीं है.

‘चाची को प्रणाम और बच्चों को प्यार,

‘आप का भतीजा.’ Hindi Kahani

Hindi Story: मजाक – म से मछली म से मगरमच्छ

लेखक- अशोक गौतम, Hindi Story: होरी पंचम के खेत अब के फिर ज्यों बाढ़ की भेंट चढ़े तो उस ने तनिक दिमाग लगा कर तय किया कि क्यों न इन तालाब बने खेतों में मछलीपालन कर इनकम बढा़ई जाए, आपदा को अवसर में ही नहीं, सुनहरे अवसर में बदला जाए. इस का फायदा यह भी रहेगा कि वह सरकार के साथ भी चलेगा और इनकम भी हो जाएगी. मतलब, एक पंथ दो लाभ.

यह सोच कर होरी पंचम मछली बाबू के दफ्तर जा पहुंचा. उसे अपने औफिस में आया देख कर मछलीखालन विभाग माफ कीजिएगा मछलीपालन विभाग के हैड ने उस से पूछा, “कौन? मत्स्य कन्या?”

“नहीं साहब, होरी पंचम. गांव लमही, जिला कोई भी रख लो.”

“तो मछली बाबू को क्यों डिस्टर्ब किया भरी दोपहर में? मछली बाबू से क्या चाहते हो?”

“साहब, गाय पाल कर गोबर तो बढ़ा पर इनकम न बढ़ी, सो अब मछली पाल कर इनकम बढ़ाना चाहता हूं.”

“गुड… वैरी गुड. आदमी को समयसमय पर धंधा और सरकार बदलते रहना चाहिए. इस से धंधे और लीडरों में गतिशीलता बनी रहती है… तो क्या हुक्म है?”

“साहब, वैसे भी बाढ़ ने खेतों का तालाब बना दिया है, तो सोच रहा हूं कि जब तक खेतों का पानी उतरे, क्यों न तब तक खेतों में मछली की खेती ही कर ली जाए. मछलियों से इनकम के लिए क्या करना होगा साहब?”

“करना क्या… हम से मछलियों का बीज ले जाओ और जब तक बाढ़ जाए उस से पहले ही जन से जनप्रतिनिधि हुओं की तरह हाथ पर हाथ धरे सौ गुना कमाओ, वह भी लेटेबैठे.”

“पर मछली का बीज तो असली ही होगा न मछली साहब?” होरी पंचम ने मछली बाबू के आगे सवाल खड़ा किया तो मछली बाबू यों उछलते हुए बोले ज्यों पानी से बाहर मछली निकाले जाने पर उछलती है, “क्या मतलब है तुम्हारा? सरकार पर तो आएदिन सवाल खड़े करते ही रहते हो, अब सरकारी बीज पर भी सवाल खड़ा करते हो?”

“नहीं साहब… माफ करना… मेरा मतलब वह नहीं था जो आपजी सोच रहे हो, पर पिछली दफा भी मैं आम के पौधे ले गया था सरकार की नर्सरी से, बड़े हुए तो बबूल निकले. लोन पर गाय ले गया था सरकार के फार्म से. सोचा था कि देश में दूध की नदियां बहा दूंगा, पर घर जाते ही वह गाय सांड़ निकली. बस, इसीलिए जरा तसदीक करना चाहता था कि…” होरी पंचम ने मछली साहब के आगे हाथ जोड़ते हुए सच कहा तो मछली साहब बोले, “देखो, ये ऐसीवैसी मछलियां नहीं हैं, बल्कि हजार सरकारी टैस्टों से गुजरी हैं. ये साधारण किस्म की नहीं, असाधारण ब्रीड की मछलियां हैं होरी पंचम. जो बाढ़ का पानी उतरने से पहले ही मछली का हर बच्चा 30-30 किलो का न हो जाए तो कहना…”

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होरी पंचम ने मछली बाबू से 10 किलो मछली का बीज उधार के पैसों से लिया और घर जा कर खेत बने तालाबों में डाल दिया. पलक्षण मछलियों के बच्चे बढ़ने लगे. होरी पंचम उन के चारे के लिए साहूकार से उधार पर उधार लेने लगा कि ज्यों ही मछलियों की फसल तैयार होगी, वह साहूकार की पाईपाई चुका देगा.

पर हफ्ते बाद ही होरी पंचम ने देखा कि मछलियों के बच्चों की शक्ल मगरमच्छ के बच्चों में बदलने लगी है, तो उसे अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हुआ. पर फिर उस ने सोचा, ‘हो सकता है कि खास किस्म की मछलियां हों…’ पर फिर उस ने नोट किया कि जब वह उन्हें चारा देने जाता है तो वे उसे खाने को दौड़ पड़ती हैं सरकारी मच्छों की तरह.

आखिरकार होरी पंचम ने जब धनिया पंचम को यह बात बताई तो वह अपना सिर पीटतीपीटती खेत बने तालाब के पास आई. उस ने देखा तो उस के भी होश उड़ गए. मछलियों के बच्चे वाकई मगरमच्छ के बच्चों की शक्ल ले रहे थे.

यह देख कर होरी पंचम जल्दीजल्दी में धनिया के जूते पहने दौड़ादौड़ा फिर मछली बाबू के औफिस गया और जाते ही मछली बाबू के पैर पड़ फरियाद की. मछली बाबू उस समय कुरसी पर मच्छ की तरह पसरे थे.

होरी पंचम बोला, “मछली बाबू… मछली बाबू…”

“अब क्या हो गया? फसल तैयार हो गई क्या? मछली बाबू को नई फसल का पहला कटान चढ़ाने आए हो? और इनकम बढ़ाने का बीज चाहिए क्या?”

“नहीं मछली बाबू साहब, जो ले गया था अभी तो वही नहीं संभाला जा रहा,” कहतेकहते होरी पंचम रोने सा लगा.

“क्या मतलब है तुम्हारा?” मछली महकमे की कुरसी पर पसरे मछली बाबू मगरमच्छ से मगरमच्छियाए.

“मछली बाबू, जो असली मछलियों का बीज आप से इनकम बढ़ाने के चक्कर में ले गया था, वह बीज तो मछलियों से मगरमच्छ हुआ जा रहा है.”

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“तो क्या हो गया… म से मछली तो म से मगरमच्छ. हैं तो दोनों की सिंह राशि वाली ही न. शुक्र करो, जो दोनों की अलगअलग राशि न निकली. ऊपर से दोनों जल में रहने वाले. जो बीज आकाश में रहने वाले का और देह जमीन पर चलने वाले की निकलती तो बता क्या होता?

“बड़े लकी हो यार होरी पंचम, वरना यहां तो कई बार मछली बाबू से किसान ले मछलियों का बीज जाता है और बाद में वह बीज निकलता दरियाई घोड़ों का है.”

“तो साहब, अब…” होरी ने धीरे से पूछा.

पर मछली बाबू चुप रहा, कुरसी पर मगरमच्छ सा पसरा हुआ. Hindi Story

Happy Birthday Pawan Singh : हरियाणवी डांसर के साथ ‘कमर टच’ विवाद पर अक्षरा सिंह का गाना

Happy Birthday Pawan Singh :एक्टर पवन सिंह के विवादित कमर टच करने वाली घटना पर तंज करता हुआ एक गाना बेहद पॉपुलर हो रहा है, जिसे भोजपुरी एक्ट्रेस और सिंगर अक्षरा सिंह ने गाया है. गाने का नाम है दगाबाज रंगबाज. इसका गीत मनोज मतलबी का लिखा हुआ है. गाने के बोल दगाबाजी करे वाला रंगबाजी न करे … और इस गाने के सीन सीधे तौर पर भोजपुरी पावर स्टार पवन सिंह की ओर इशारा करते नजर आते हैं. कम से कम उनके फैंस को ऐसा ही महसूस हो रहा है. जानें क्या था यह विवाद और अक्षरा सिंह के गाने में ऐसा क्या है?

हरियाणवी एक्ट्रेस अंजलि राघव के साथ पवन सिंह का वीडियो
भोजपुरी स्टार पवन सिंह एक विवाद के कारण फिर सुर्खियों में थे. जब एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने हरियाणवी एक्ट्रेस अंजलि राघव की कमर को छूआ था. अक्षरा सिंह के गाने दगाबाज रंगबाज में पुरुष डांसर भी इसी तरह से डांस कर रही अक्षरा सिंह के कमर को टटोलने के अंदाज में  छूता है, तो अक्षरा उस पुरुष डांसर को थप्पड़ जड़ देती है. यही वजह है कि फैंस इस सीन को पवन सिंह और अंजलि राघव प्रकरण के साथ जोड़ रहे हैं, जो काफी चर्चा में रहा था.

अक्षरा सिंह और पवन सिंह की पुरानी तकरार
कभी पवन सिंह और सिंगर एक्ट्रेस अक्षरा सिंह एकदूसरे को डेट कर चुके हैं. हलांकि बहुत पहले ही दोनों का ब्रेकअप हो चुका है. अपने इंटरव्यू में अक्षरा सिंह यह भी इल्जाम लगा चुकी हैं कि पवन सिंह उनको कमरे में बंद करके मारपीट कर चुके हैं. इतना ही नहीं उनको जान से मारने तक की धमकी मिल चुकी है. पवन सिंह की पहली शादी साल 2014 में हुई थी. पहली पत्नी की मृत्यु के बाद पवन सिंह ने ज्योति सिंह से दूसरी शादी साल 2018 में की. हलांकि ज्योति सिंह के साथ भी उनका रिश्ता सही नहीं रहा और दोनों एकदूसरे पर इल्जाम लगाते रहते हैं.  पवन सिंह और ज्योति सिंह की लड़ाई में अक्षरा सिंह पूरी तरह से ज्योति सिंह का सपोर्ट करती दिखीं.
दगाबाज रंगबाज की गायिका अक्षरा सिंह को उनके इस गाने पर मिलियन्स में व्यूज मिल चुके हैं. इस गाने को देखने वाले भोजपुरी फैंस भी अक्षरा सिंह का सपोर्ट करते दिख रहे हैं. वीडियो को यूट्यूब पर देखने वाले अक्षरा को भोजपुरी शेरनी कह रहे हैं. Happy Birthday Pawan Singh 

Farah Khan : सोनिया गांधी से चीनी उधार लेने को लेकर फराह का नितिन गडकरी से सवाल

Farah Khan : डायरेक्टर और कोरियोग्राफर फराह खान अपने यूट्यूब चैनल के वीडियोज के लिए सेलिब्रेटीज के घर जा कर उनकी स्पेशल डिश पर कुकिंग टिप्स लेती हैं. ऐसे में फरहा जब केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के घर पहुंचीं, तो उनके कुछ सवाल सुन कर मंत्री महोदय भी जोर से हस पड़ें. कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के बारे में बात करने के दौरान ऐसा ही मंजर देखने को मिला और यही वजह है कि उनकी बातचीत की खूब चर्चा चल रही है.

फरहा खान के व्लॉग में परिवहन मंत्री नितिन गडकरी
जब फराह खान, केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के घर पहुंची, तो उन्होंने उनको अपना घर दिखाया.  इसी दौरान उन्होंने कहा कि बड़ेबड़े राजनेता उनके पड़ोसी रह चुके हैं.  इसमें पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शामिल रहे हैं.  उन्होंने बताया कि वे उनके मोर को खाना भी खिला चुके हैं. दरअसल एक मजाकिया माहौल में डायरेक्टर फराह खान ने पूछा कि पड़ोसी होने के नाते क्या उन्हाेंने या सोनिया गांधी ने कभी एकदूसरे से चीनी उधार ली है.  इस पर वहां बैठे सभी हंस पड़े. नितिन गडकरी ने फराह खान को बताया कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है लेकिन उस जगह पर बहुत मोर हैं, जो उनके गार्डन से हमारे गार्डन आते हैं, ऐसे में कभी हम उनको खाना खिलाते हैं तो कभी वो. बातचीत के दौरान फराह खान के साथ उनका मशहूर हो चुका कुक दिलीप भी मौजूद था. नितिन गडकरी ने फराह खान को अपने डेली रूटीन की जानकारी देते हुए बताया कि सुबह 7 बजे उठने के बाद वे दो घंटे एक्सरसाइज करते हैं. उन्होंने बताया कि वे अपना वजन काफी कम कर चुके हैं, वे कभी 135 किलो के हुआ करते थे अभी 89 किलो रह गए हैं.

दिलीप ने कर दी गांव के सड़क बनाने की मांग
फरहा खान के हर व्लॉग का आकर्षण बन चुके उनके कुक दिलीप ने इस मौके का फायदा उठाते हुए केंद्रीय मंत्री से एक खास मांग कर ली. दिलीप ने बिहार के अपने गांव में सड़क बनाने की इच्छा जताई, तो मंत्री जी ने बताया कि वे बिहार में काफी सड़कें बनवा चुके हैं और आनेवाले समय में भी यह काम जारी रहेगा. फराह खान इस इंटरव्यू के लिए केंद्रीय मंत्री के दिल्ली आवास पर पहुंची थीं. शुरुआत में वह बहुत ही नर्वस थी लेकिन बाद में पूरा माहौल सामान्य हो गया. एक मौके पर फरहा खान ने नितिन गडकरी से पूछा कि शादी के कितने साल हो गए हैं. इस पर उन्होंने कहा कि इसका जवाब उनकी पत्नी देगी. उनकी पत्नी कंचन गडकरी ने बताया कि उनकी शादी को 41 साल हो चुके हैं. हलांकि बाद में उन्हें भी याद आ गया  Farah Khan 

Hindi Kahani : तिकोनी डायरी

Hindi Kahani : तिकोनी डायरी
भाग-1

नागेश की डायरी

कई दिनों से मैं बहुत बेचैन हूं. जीवन के इस भाटे में मुझे प्रेम का ज्वार चढ़ रहा है. बूढ़े पेड़ में प्रेम रूपी नई कोंपलें आ रही हैं. मैं अपने मन को समझाने का भरपूर प्रयत्न करता हूं पर समझा नहीं पाता. घर में पत्नी, पुत्र और एक पुत्री है. बहू और पोती का भरापूरा परिवार है, पर मेरा मन इन सब से दूर कहीं और भटकने लगा है.

शहर मेरे लिए नया नहीं है. पर नियुक्ति पर पहली बार आया हूं. परिवार पीछे पटना में छूट गया है. यहां पर अकेला हूं और ट्रांजिट हौस्टल में रहता हूं. दिन में कई बार परिवार वालों से फोन पर बात होती है. शाम को कई मित्र आ जाते हैं. पीनापिलाना चलता है. दुखी होने का कोई कारण नहीं है मेरे पास, पर इस मन का मैं क्या करूं, जो वेगपूर्ण वायु की भांति भागभाग कर उस के पास चला जाता है.

वह अभीअभी मेरे कार्यालय में आई है. स्टेनो है. मेरा उस से कोई सीधा नाता नहीं है. हालांकि मैं कार्यालय प्रमुख हूं. मेरे ही हाथों उस का नियुक्तिपत्र जारी हुआ है…केवल 3 मास के लिए. स्थायी नियुक्तियों पर रोक लगी होने के कारण 3-3 महीने के लिए क्लर्कों और स्टेनो की भर्तियां कर के आफिस का काम चलाना पड़ता है. कोई अधिक सक्षम हो तो 3 महीने का विस्तार दिया जा सकता है.

उस लड़की को देखते ही मेरे शरीर में सनसनी दौड़ जाती है. खून में उबाल आने लगता है. बुझता हुआ दीया तेजी से जलने लगता है. ऐसी लड़कियां लाखों में न सही, हजारों में एक पैदा होती हैं. उस के किसी एक अंग की प्रशंसा करना दूसरे की तौहीन करना होगा.

पहली नजर में वह मेरे दिल में प्रवेश कर गई थी. मेरे पास अपना स्टाफ था, जिस में मेरी पी.ए. तथा व्यक्तिगत कार्यों के लिए अर्दली था. कार्यालय के हर काम के लिए अलगअलग कर्मचारी थे. मजबूरन मुझे उस लड़की को अनुराग के साथ काम करने की आज्ञा देनी पड़ी.

मुझे जलन होती है. कार्यालय प्रमुख होने के नाते उस लड़की पर मेरा अधिकार होना चाहिए था, पर वह मेरे मातहत अधिकारी के साथ काम रही थी. मुझ से यह सहन नहीं होता था. मैं जबतब अनुराग के कमरे में चला जाता था. मेरे बगल में ही उस का कमरा था. उन दोनों को आमनेसामने बैठा देखता हूं तो सीने पर सांप लोट जाता है. मन करता है, अनुराग के कमरे में आग लगा दूं और लड़की को उठा कर अपने कमरे में ले जाऊं.

अनुराग उस लड़की को चाहे डिक्टेशन दे रहा हो या कोई अन्य काम समझा रहा हो, मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता. तब थोड़ी देर बैठ कर मैं अपने को तसल्ली देता हूं. फिर उठतेउठते कहता हूं, ‘‘नीहारिका, जरा कमरे में आओ. थोड़ा काम है.’’

मैं जानता हूं, मेरे पास कोई आवश्यक कार्य नहीं. अगर है भी तो मेरी पी.ए. खाली बैठी है. उस से काम करवा सकता हूं. पर नीहारिका को अपने पास बुलाने का एक ही तरीका था कि मैं झूठमूठ उस से व्यर्थ की टाइपिंग का काम करवाऊं. मैं कोई पुरानी फाइल निकाल कर उसे देता कि उस का मैटर टाइप करे. वह कंप्यूटर में टाइप करती रहती और मैं उसे देखता रहता. इसी बहाने बातचीत का मौका मिल जाता.

नीहारिका के घरपरिवार के बारे में जानकारी ले कर अपने अधिकारों का बड़प्पन दिखा कर उसे प्रभावित करने लगा. लड़की हंसमुख ही नहीं, वाचाल भी थी. वह जल्द ही मेरे प्रभाव में आ गई. मैं ने दोस्ती का प्रस्ताव रखा, उस ने झट से मान लिया. मेरा मनमयूर नाच उठा. मुझ से हाथ मिलाया तो शरीर झनझना कर रह गया. कहां 20 साल की उफनती जवानी, कहां 57 साल का बूढ़ा पेड़, जिस की शाखाओं पर अब पक्षी भी बैठने से कतराने लगे थे.

नीहारिका से मैं कितना भी झूठझूठ काम करवाऊं पर उसे अनुराग के पास भी जाना पड़ता था. मुझे डर है कि लड़की कमसिन है, जीवन के रास्तों का उसे कुछ ज्ञान नहीं है. कहीं अनुराग के चक्कर में न आ जाए. वह एक कवि और लेखक है. मृदुल स्वभाव का है. उस की वाणी में ओज है. वह खुद न चाहे तब भी लड़की उस के सौम्य व्यक्तित्व से प्रभावित हो सकती थी.

क्या मैं उन दोनों को अलग कर सकता हूं?

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अनुराग की डायरी

नीहारिका ने मेरी रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया है. वह इतनी हसीन है कि बड़े से बड़ा कवि उस की सुंदरता की व्याख्या नहीं कर सकता है. गोरा आकर्षक रंग, सुंदर नाक और उस पर चमकती हुई सोने की नथ, कानों में गोलगोल छल्ले, रस भरे होंठ, दहकते हुए गाल, पतलीलंबी गर्दन और पतला-छरहरा शरीर, कमर का कहीं पता नहीं, सुडौल नितंब और मटकते हुए कूल्हे, पुष्ट जांघों से ले कर उस के सुडौल पैरों, सिर से ले कर कमर और कूल्हों तक कहीं भी कोई कमी नजर नहीं आती थी.

वह मेरी स्टेनो है और हम कितनी सारी बातें करते हैं? कितनी जल्दी खुल गई है वह मेरे साथ…व्यक्तिगत और अंतरंग बातें तक कर लेती है. बड़े चाव से मेरी बातें सुनती है. खुद भी बहुत बातें करती है. उसे अच्छा लगता है, जब मैं ध्यान से उस की बातें सुनता हूं और उन पर अपनी टिप्पणी देता हूं. जब उस की बातें खत्म हो जाती हैं तो वह खोदखोद कर मेरे बारे में पूछने लगती है.

बहुत जल्दी मुझे पता लग गया कि वह मन से कवयित्री है. पता चला, उस ने स्कूलकालेज की पत्रिकाओं के लिए कविताएं लिखी थीं. मैं ने उस से दिखाने के लिए कहा. पुराने कागजों में लिखी हुई कुछ कविताएं उस ने दिखाईं. कविताएं अच्छी थीं. उन में भाव थे, परंतु छंद कमजोर थे. मैं ने उन में आवश्यक सुधार किए और उसे प्रोत्साहित कर के एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेज दिया. कविता छप गई तो वह हृदय से मेरा आभार मानने लगी. उस का झुकाव मेरी तरफ हो गया.

शीघ्र ही मैं ने मन की बात उस पर जाहिर कर दी. वस्तुत: इस की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि बातोंबातों में ही हम दोनों ने अपनी भावनाएं एकदूसरे पर प्रकट कर दी थीं. उस ने मेरे प्यार को स्वीकार कर के मुझे धन्य कर दिया.

काम से समय मिलता तो हम व्यक्तिगत बातों में मशगूल हो जाते परंतु हमारी खुशियां शायद हमारे ही बौस को नागवार गुजर रही थीं. दिन में कम से कम 5-6 बार मेरे कमरे में आ जाते, ‘‘क्या हो रहा है?’’ और बिना वजह बैठे रहते, ‘‘अनुराग, चाय पिलाओ,’’ चाय आने और पीने में 2-3 मिनट तो लगते नहीं. इस के अलावा वह नीहारिका से साधिकार कहते, ‘‘मेरे कमरे से सिगरेट और माचिस ले आओ.’’

मेरा मन घृणा और वितृष्णा से भर जाता, परंतु कुछ कह नहीं सकता था. वे मेरे बौस थे. नीहारिका भी अस्थायी नौकरी पर थी. मन मार कर सिगरेट और माचिस ले आती. वह मन में कैसा महसूस करती थी, मुझे नहीं मालूम क्योंकि जब भी वह सिगरेट ले कर आती, हंसती रहती थी, जैसे इस काम में उसे मजा आ रहा हो.

एक छोटी उम्र की लड़की से ऐसा काम करवाना मेरी नजरों में न केवल अनुचित था, बल्कि निकृष्ट और घृणित कार्य था. उन का अर्दली पास ही गैलरी में बैठा रहता है. यह काम उस से भी करवा सकते थे पर वे नीहारिका पर अपना अधिकार जताना चाहते थे. उसे बताना चाहते थे कि उस की नौकरी उन के ही हाथ में है.

सिगरेट का बदबूदार धुआं घंटों मेरे कमरे में फैला रहता और वह परवेज मुशर्रफ की तरह बूट पटकते हुए नीहारिका को आदेश देते मेरे कमरे से निकल जाते कि तुम मेरे कमरे में आओ.

मैं मन मार कर रह जाता हूं. गुस्से को चाय की आखिरी घूंट के साथ पी कर थूक देता हूं. कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं, जिन पर मनुष्य का वश नहीं रहता. लेकिन मैं कभीकभी महसूस करता हूं कि नीहारिका को नागेश के आधिकारिक बरताव पर कोई खेद या गुस्सा नहीं आता था.

नीहारिका कभी भी इस बात की शिकायत नहीं करती थी कि उन की ज्यादतियों की वजह से वह परेशान या क्षुब्ध थी. वह सदैव प्रसन्नचित्त रहती थी. कभीकभी बस नागेश के सिगरेट पीने पर विरोध प्रकट करती थी. उस ने बताया था कि उस के कहने पर ही नागेश ने तब अपने कमरे में सिगरेट पीनी बंद कर दी, जब वह उन के कमरे में काम कर रही होती थी.

मुझे अच्छा नहीं लगता है कि घड़ीघड़ी भर बाद नागेश मेरे कमरे में आएं और बारबार बुला कर नीहारिका को ले जाएं. इस से मेरे काम में कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था पर मैं चाहता था कि नीहारिका जब तक आफिस में रहे मेरी नजरों के सामने रहे.

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नीहारिका की डायरी

मैं अजीब कशमकश में हूं…कई दिनों से मैं दुविधा के बीच हिचकोले खा रही हूं. समझ में नहीं आता…मैं क्या करूं? कौन सा रास्ता अपनाऊं? मैं 2 पुरुषों के प्यार के बीच फंस गई हूं. इस में कहीं न कहीं गलती मेरी है. मैं बहुत जल्दी पुरुषों के साथ घुलमिल जाती हूं. अपनी अंतरंग बातों और भावनाओं का आदानप्रदान कर लेती हूं. उसी का परिणाम मुझे भुगतना पड़ रहा है. हर चलताफिरता व्यक्ति मेरे पीछे पड़ जाता है. वह समझता है कि मैं एक ऐसी चिडि़या हूं जो आसानी से उन के प्रेमजाल में फंस जाऊंगी.

इस दफ्तर में आए हुए मुझे 1 महीना ही हुआ और 2 व्यक्ति मेरे प्रेम में गिरफ्तार हो चुके हैं. एक अपने शासकीय अधिकार से मुझे प्रभावित करने में लगा है. वह हर मुमकिन कोशिश करता है कि मैं उस के प्रभुत्व में आ जाऊं. दूसरा सौम्य और शिष्ट है. वह गुणी और विद्वान है. कवि और लेखक है. उस की बातों में विलक्षणता और विद्वत्ता का समावेश होता है. वह मुझे प्रभावित करने के लिए ऐसी बातें नहीं करता है.

पहला जहां अपने कर्मों का गुणगान करता रहता है. बड़ीबड़ी बातें करता है और यह जताने का प्रयत्न करता है कि वह बहुत बड़ा अधिकारी है. उस के अंतर्गत काम करने वालों का भविष्य उस के हाथ में है. वह जिसे चाहे बना सकता है और जिसे चाहे पल में बिगाड़ दे. अपने अधिकारों से वह सम्मान पाने की लालसा करता है. वहीं दूसरी ओर अनुराग अपने व्यक्तित्व से मुझे प्रभावित कर चुका है.

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नागेश से मुझे भय लगता है, अत: उस की किसी बात का मैं विरोध नहीं कर पाती. मुझे पता है कि मेरी किसी बात से अगर वह नाखुश हुआ तो मुझे नौकरी से निकालने में उसे एक पल न लगेगा. ऐसा उस ने संकेत भी दिया है. वह गंदे चुटकुले सुनाता और खुद ही उन पर जोरजोर से हंसता है. अपने भूतकाल की सत्यअसत्य कहानियां ऐसे सुनाता है जैसे उस ने अपने जीवन में बहुत महान कार्य किए हैं और उस के कार्यों में अच्छे संदेश निहित हैं.

मेरे मन में उस के प्रति कोई लगाव या चाहत नहीं है. वह स्वयं मेरे पीछे पागल है. मेरे मन में उस के प्रति कोई कोमल भाव नहीं है. वह कहीं से मुझे अपना नहीं लगता. मेरी हंसी और खुलेपन से उसे गलतफहमी हो गई है. तभी तो एक दिन बोला, ‘‘तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. शायद मैं तुम्हें चाहने लगा हूं. क्या तुम मुझ से दोस्ती करोगी?’’

मेरे घर की आर्थिक दशा अच्छी नहीं है. घर में 3 बहनों में मैं सब से बड़ी हूं. घर के पास ही गली में पिताजी की किराने की दुकान है. बहुत ज्यादा कमाई नहीं होती है. बी.ए. करने के बाद इस दफ्तर में पहली अस्थायी नौकरी लगी है. अस्थायी ही सही, परंतु आर्थिक दृष्टि से मेरे परिवार को कुछ संबल मिल रहा है. अभी तो पहली तनख्वाह भी नहीं मिली थी. ऐसे में काम छोड़ना मुझे गवारा नहीं था.

मन को कड़ा कर के सोचा कि नागेश कोई जबरदस्ती तो कर नहीं सकता. मैं उस से बच कर रहूंगी. ऊपरी तौर पर दोस्ती स्वीकार कर लूंगी, तो कुछ बुरा नहीं है. अत: मैं ने हां कह दिया. उस ने तुरंत मेरा दायां हाथ लपक लिया और दोस्ती के नाम पर सहलाने लगा. उस ने जब जोर से मेरी हथेली दबाई तो मैं ने उफ कर के खींच लिया. वह हा…हा…कर के हंस पड़ा, जैसे पौराणिक कथाओं का कोई दैत्य हंस रहा हो.

‘‘बहुत कोमल हाथ है,’’ वह मस्त होता हुआ बोला तो मैं सिहर कर रह गई.

दूसरी तरफ अनुराग है…शांत और शिष्ट. हम साथ काम करते हैं परंतु आज तक उस ने कभी मेरा हाथ तक छूने की कोशिश नहीं की. वह केवल प्यारीप्यारी बातें करता है. दिल ही दिल में मैं उसे प्यार करने लगी हूं. कुछ ऐसे ही भाव उस के भी मन में है. हम दोनों ने अभी तक इन्हें शब्दों का रूप नहीं दिया है. उस की आवश्यकता भी नहीं है. जब दो दिल खामोशी से एकदूसरे के मन की बात कह देते हैं तो मुंह खोलने की क्या जरूरत.

हमारे प्यार के बीच में नागेश रूपी महिषासुर न जाने कहां से आ गया. मुझे उसे झेलना ही है, जब तक इस दफ्तर में नौकरी करनी है. उस की हर ज्यादती मैं अनुराग से बता भी नहीं सकती. उस के दिल को चोट पहुंचेगी.

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नागेश के कमरे से वापस आने पर मैं हमेशा अनुराग के सामने हंसती- मुसकराती रहती थी, जिस से उस को कोई शक न हो. यह तो मेरा दिल ही जानता था कि नागेश कितनी गंदीगंदी बातें मुझ से करता था.

अनुराग मुझ से पूछता भी था कि नागेश क्या बातें करता है? क्या काम करवाता है? परंतु मैं उसे इधरउधर की बातें बता कर संतुष्ट कर देती. वह फिर ज्यादा नहीं पूछता. मुझे लगता, अनुराग मेरी बातों से संतुष्ट तो नहीं है, पर वह किसी बात को तूल देने का आदी भी नहीं था.

अब धीरेधीरे मैं समझने लगी हूं कि 2 पुरुषों को संभाल पाना किसी नारी के लिए संभव नहीं है.

नागेश को मेरी भावनाओं या भलाई से कुछ लेनादेना नहीं. वह केवल अपना स्वार्थ देखता है. अपनी मानसिक संतुष्टि के लिए मुझे अपने सामने बिठा कर रखता है. मुझे उस की नीयत पर शक है. हठात एक दिन बोला, ‘‘मेरे घर चलोगी? पास में ही है. बहुत अच्छा सजा रखा है. कोई औरत भी इतना अच्छा घर नहीं सजा सकती. तुम देखोगी तो दंग रह जाओगी.’’ मैं वाकई दंग रह गई. उस का मुंह ताकती रही…क्या कह रहा है? उस की आंखों में वासना के लाल डोरे तैर रहे थे. मैं अंदर तक कांप गई. उस की बात का जवाब नहीं दिया.

‘‘बोलो, चलोगी न? मैं अकेला रहता हूं. कोई डरने वाली बात नहीं है,’’ वह अधिकारपूर्ण बोला.

मैं ने टालने के लिए कह दिया, ‘‘सर, कभी मौका आया तो चलूंगी.’’

वह एक मूर्ख दैत्य की तरह हंस पड़ा. -क्रमश:

Kahani : सातवें आसमान की जमीन

लेखक : शवीरेंद्र बहादुर सिंह
Kahani : ड्राइंगरूम में हो रहे शोर से परेशान हो कर किचन में काम कर रही बड़ी दी वहीं से चिल्लाईं, ‘‘अरे तुम लोगों को यह क्या हो गया है. थोड़ी देर शांति से नहीं रह सकते? और यह नंदा, यह तो पागल हो गई है.’’

‘‘अरे दीदी मौका ही ऐसा है. इस मौके पर हम भला कैसे शांत रह सकते हैं. सुप्रिया दीदी टीवी पर आने वाली हैं, वह भी अपने मनपसंद हीरो के साथ, मात्र उन्हीं की पसंद के क्यों. अरे सभी के मनपसंद हीरो के साथ. अब भी आप शांत रहने के लिए कहेंगी.’’ नंदा ने कहा.

सब के सब नंदा को ताकने लगे. किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. सुप्रिया को ऐसा क्या मिल गया और कौन सा हीरो इस के लिए निमंत्रण कार्ड ले कर आया है, यह सब पता लगाना घर वालों के लिए आसान नहीं था. और नंदा तो इस तरह उत्साह में थी कि घर वालों को कुछ बताने के बजाए इस अजीबोगरीब खबर को फोन से दोस्तों को बताने में लगी थी.

नंदा की इस शरारत पर बड़ी दी ने खीझ कर उसे पकड़ते हुए कहा, ‘‘तेरा यह कौन सा नया नाटक है, कुछ बता तो सही.’’

‘‘बड़ी दी, सुप्रिया दीदी एक कांटेस्ट जीत गई हैं. ईनाम में उसे अपने फेवरिट हीरो के साथ टीवी पर आना है. अब तो समझ में आ गया कि नहीं?’’ नंदा ने स्पष्ट किया.

‘‘तुम्हारा मतलब सुप्रिया टीवी पर अपने ड्रीम बौय के साथ, फैंटास्टिक.’’ संदीप ने किताब बंद करते हुए नंदा की बात का समर्थन किया. नंदा ने आगे कहा, ‘‘भैया इतना ही नहीं, वह हीरो, सुप्रिया दीदी के लिए परफोर्म करेगा, गाना गाएगा. डांस करेगा. अब और क्या चाहिए? पर है कहां अपनी गोल्डन गर्ल?’’

‘‘नहा रही है लकी गर्ल, लेकिन उस ने तो मुझ से कुछ बताया ही नहीं, पर बाकी लोग तो हैं. सुप्रिया दीदी को लग रहा होगा, पता नहीं किसे बुरा लग जाए. इसीलिए किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं है. और जीतना तो एक सपना था. उसे कहां पता था कि सच हो जाएगा.’’

तभी परदे के पीछे से सुप्रिया आती दिखाई दी. अपार आनंद में डूबी सुप्रिया के चेहरे पर अजीब तरह की चमक थी. नंदा ने दौड़ कर सुप्रिया को बांहों में भर लिया, ‘‘सुप्रिया दी…लकी…लकी गर्ल.’’

दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़ कर नाचने लगीं. थक गईं तो निढाल हो कर सोफे पर गिर पड़ीं. इस बीच किसी को भी एक भी शब्द बोलने का मौका नहीं मिला. दोनों के सोफे पर बैठते ही बड़ी दी बोलीं, ‘‘यह क्या पागलपन है, सुप्रिया, घर में किसी को कुछ बताए बगैर तुम कांटेस्ट के फाइनल तक पहुंच गईं. चलो जो किया, ठीक किया. अमित को इस बारे में बताया है?’’

सुप्रिया आंखों से मधुर मुसकान मुसकराईं, उस के बजाए नंदा बोली, ‘‘बड़ी दी, इस तरह के काम कोई पूछ कर करता है? मान लीजिए आप से पूछने आती तो आप कांटेस्ट में हिस्सा लेने देतीं? दीदी अब छोड़ो इसे टीवी पर देखने के लिए तैयार हो जाइए. कमर कस कर तैयारी शुरू कर दीजिए.’’

‘‘तैयारी किस बात की. कोई ब्याह थोड़े ही करने जा रही हैं,’’ वह थोड़ा नाराज हो कर बोलीं, ‘‘आजकल के बच्चे भी न पागल… नादान…’’

‘‘दीदी, ब्याह क्या, यह तो उस से भी जबरदस्त है. लाखों दिलों की धड़कन, चार्मिंग, अमेजिंग लवर बौय अपनी सुप्रिया के साथ…’’

नंदा की बात पूरी होती, उस के पहले ही शैल, सुकुमार और नेहा का झुंड आ पहुंचा. इस के बाद तो जो हंगामा मचा. कान तक पहुंचने वाला शब्द भी ठीक से सुनाई नहीं दे रहा था. बड़ी दी, भैयाभाभी और घर के अन्य लोग परेशान थे. हवा रंगबिरंगी और सुगंधित हो गई थी. कौन सी डे्रस, कैसी हेयरस्टाइल, स्किनकेयर, फुटवेयर, परफ्यूम, डायमंड या पर्ल, गोल्ड या सिलवर… बातों की पतंगें उड़ती रहीं और सुप्रिया उन पर सवार विचारों में डूबी थी कि जीवन इतना भी सुंदर और अद्भुत हो सकता है.

वह असाधारण और अविस्मरणीय घटना घटी और विलीन हो गई. वह दृश्य देखते समय सुप्रिया के मित्रों में जो उत्तेजना थी, उस का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता. फिर भी इस पागल उत्साह में बड़ी दीदी ने थोड़ा अवरोध जरूर पैदा किया था. इस के बावजूद उन्होंने सभी को आइस्क्रीम खिलाई थी. सुप्रिया की ठसक देख कर सभी ने अनुभव किया कि अमित कितना भाग्यशाली है. उस की अनुपस्थिति थोड़ा खल जरूर रही थी. पता नहीं, चेन्नै में उस ने यह प्रोग्राम देखा या नहीं. सुप्रिया ने उसे कांटेस्ट की बात बताई भी थी या नहीं?

सुप्रिया के राजकुमार ने अपनी अत्यंत लोकप्रिय फिल्म का प्रसिद्ध गाना पेश किया था. उस ने उस का हाथ पकड़ कर डांस भी किया. एक प्रेमी की तरह चाहत भरी नजरों से उसे निहारा भी और घुटनों के बल बैठ कर उसे गुलाब भी दिया.

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‘‘इस समय आप को कैसा लग रहा है?’’ कार्यक्रम खत्म होने पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले ने पूछा था. खुशी में पागल हो कर उछल रही सुप्रिया कुछ पल तो बोल ही नहीं सकी. उस आनंद में उस की आंखों की पलकें तक नहीं झपक रही थीं. खुशी में आंसू आ जाते हैं. इस के बारे में उस ने पढ़ा और सुना था. पर सचमुच वह क्या होता है. उस दिन उसे पता चला. सातवां आसमान मतलब यही था, आउट आफ दिस वर्ल्ड. दिल से अनुभव किया था उस ने. उसे ऐसा भाग्य मिला. इस के लिए उस ने उस अदृश्य शक्ति को हाथ जोड़े और इसी के साथ तालियों की गड़गड़ाहट…

मेघधनुष लुप्त हो गया. सुप्रिया ने यह सप्तरंगी सपना समेट कर यादों के पिटारे में रख लिया कि जब मन हो पिटारा खोल कर देख लेगी. आखिर सुप्रिया पूरी तरह जमीन पर आ गई. इस की मुख्य वजह चेन्नै से अमित वापस आ गया था. आते ही उस ने फोन कर के यात्रा और अपने काम की सफलता की कहानी सुना कर पूछा, ‘‘तुम्हारा क्या हाल है, कुछ नया सुनाओ?’’

‘‘कुछ खास नहीं, बस चल रहा है.’’

‘‘नथिंग एक्साइटिंग?’’

‘‘कुछ नहीं, यहां क्या एक्साइटिंग हो सकता है. बस सब पहले की तरह…’’ सुप्रिया ने कहा. कांटेस्ट जीतने की परीकथा उस के होंठों तक आ कर लौट गई. शायद मन में कुछ खटक रहा था.

‘थाटलेस और मीनिंगलेस… चीप इंटरटेनमेंट…’ अमित टीवी के ज्यादातर प्रोग्रामों के लिए यही कहता था. जबकि उस की इस मान्यता का सुप्रिया से कोई लेनादेना नहीं था.

‘‘क्यों कोई लेनादेना नहीं है. उस के साथ शादी करने जा रही है. पूछ तो सही उस से कि उस ने तेरे कार्यक्रम की डीवीडी देखी थी या नहीं? वह देखना चाहता है या नहीं? दुनिया ने उस प्रोग्राम को देखा है. ऐसा भी नहीं कि उसे पता न हो. तब इस में उस से छिपाना क्या?’’ नंदा ने पूछा.

देखा जाए, तो एक तरह से उस का कहना ठीक भी था. सुप्रिया बारबार खुद से पूछती थी कि आखिर उस ने अमित से इस विषय पर बात क्यों नहीं की? किसी न किसी ने तो उसे बताया ही होगा. यह कोई छोटीमोटी बात नहीं थी. चारों ओर चर्चा थी. फिर यह कौन सी चोरी की बात है, जो उस से छिपाई जाए. पर अमित ने भी तो उस से इस बारे में कुछ नहीं पूछा.

सुप्रिया ने सब को पार्टी दी. सभी इकट्ठे हुए. बड़ी दी ने सब का स्वागत किया. क्योंकि मम्मीपापा के बाद इस समय घर में वही सब से बड़ी थीं. धमालमस्ती में उन्होंने कोई रुकावट नहीं डाली थी. अमित को भी आना था, इसलिए सुप्रिया पूरी एकाग्रता से तैयार हुई थी.

‘‘गौर्जियस?’’

उस दिन उस के प्रिय अभिनेता ने भी यही शब्द कहा था और उस समय सुप्रिया को जो सुख प्राप्त हुआ था, वह उसे अभी अमित तक पहुंचा नहीं सकी थी. अमित उस स्वप्नलोक जैसा कहां था. यह तो देखने की बात है, वर्णन करने की नहीं. नंदा तो जैसे मौका ही खोज रही थी. अन्य दोस्त भी कहां पीछे रहते.

सभी ने उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘यार अमित, यू रियली मिस्ड समथिंग. क्या ठसक थी सुप्रिया की. वह जैसे सचमुच प्रेम कर रहा हो और प्रपोज कर रहा हो… इस तरह घुटने के बल बैठ कर… मान गए यार.’’

‘‘अरे इन एक्टरों के लिए तो यह रोज का खेल है. दिन में दस बार प्रपोज करते हैं ये. यही अभिनय करना तो उन का काम है. यह उन के लिए बहुत आसान है.’’

‘‘सुप्रिया की आंखों में आंखें डाल कर अपलक ताक रहा था और बैकग्राउंड में वह गाना बज रहा था… कि तुम बन गए हो मेरे खुदा…ही वाज सो इंटेंस, सो इमोशनल, माई गौड. अमित, तुम देखते तो पता चलता. उस सब को शब्दों में नहीं व्यक्त किया जा सकता.’’

‘‘इस का मतलब अमित ने उसप्रोग्राम की डीवीडी नहीं देखी. इसे जलन हो रही होगी.’’ रौल ने कहा.

‘‘नो यंगमैन, जलन किस बात की. मुझे इन नाटकों में जरा भी रुचि नहीं है. यह सब दिखावा है. इस सब के लिए मेरे पास जरा भी समय नहीं है.’’

अमित की इन बातों पर सुप्रिया एकदम से उदास हो गई. उस का चेहरा एकदम से उतर गया.

‘‘अमित, तुम जिसे पल भर का नाटक कह रहे हो, उसी पल भर के नाटक में सुप्रिया किस तरह आनंद समाधि में समा गई थी, इस से पूछो. इस का हाथ पकड़ कर जब उस ने अपने होंठों से लगाया तो यह सहम सी गई. सच है न सुप्रिया?’’

सुप्रिया ने हां में सिर हिलाया.

नंदा ने उस के सिर पर ठपकी मार कर कहा, ‘‘चिंता में क्यों पड़ गई, अमित तुझे खा नहीं जाएगा. यह कोई 18वीं सदी का मेलपिग नहीं है.’’

अमित ने नंदा के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘थैंक्यू.’’

सुप्रिया उस समय बड़ी दी को याद कर रही थी. उन्होंने कहा, ‘‘लड़की के व्यवस्थित होने तक तमाम चीजों का ध्यान रखना पड़ता है. हर चीज बतानी पड़ती है. कांटेस्ट में भाग लिया है, इस में क्या बताना. भूल हो गई, कह देना. पर यह झूठ है. कांटेस्ट में हिस्सा लेने के लिए किसी ने जबरदस्ती तो नहीं की थी. अपनी मरजी से हिस्सा लिया था और जीतने की इच्छा के साथ. यह भी सच है कि जीतने की तीव्र इच्छा थी जीत का नशा भी चढ़ा था, इस में कोई झूठ भी नहीं, अब बचाव में कुछ कहना भी नहीं. जो अच्छा लगा, व किया. कोई अपराध तो नहीं किया. साथ रहना है तो यह स्पष्टता होनी ही चाहिए.’’

मन नहीं था, फिर भी सुप्रिया अमित के साथ इंडिया गेट आ गई थी. अब आ ही गई तो इस बारे में क्या सोचना, आने से पहले ही उस ने काफी सोचविचार कर तय कर लिया था कि उसे अपनी बात किस तरह कहनी है. इस के बावजूद काफी गुणाभाग और सुधार कर उस ने कहा, ‘‘अमित, तुम्हें मेरा यह निर्णय खराब तो नहीं लगा?’’

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‘‘खराब, किस बारे में?’’

‘‘वही टीवी और कांटेस्ट वाली बात.’’

‘‘छोड़ो न, डोंट टाक रबिश, तुम्हें यह पूछना पड़े, इस का मतलब तुम ने मुझे अभी जानापहचाना नहीं.’’

‘‘ऐसा नहीं है अमित, तुम मुझे मूडलेस लगते हो. तुम ने मुझ से कांटेस्ट की कोई बात तक नहीं की. घर में किसी ने प्रोग्राम देखा हो और किसी को कुछ न अच्छा लगा हो.’’

‘‘तुम्हें पता है मेरे यहां कोई रुढि़वादी या पुरानी सोच वाला नहीं है.’’

‘‘भले ही पुराने विचारों वाला नहीं है. पर कुछ न अच्छा लगा हो.’’

‘‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं है.’’

अमित ने दोनों हाथ ऊपर की ओर कर के सूरज की ओर देखते हुए कहा, ‘‘सूर्यास्त देख कर चलना है न?’’

सुप्रिया थोड़ा खीझ कर बोली, ‘‘सूर्यास्त को छोड़ो, तुम अपनी बात करो. चेन्नै से आने के बाद तुम काफी गंभीर हो गए हो. ऐसा क्यों?’’

‘‘नथिंग पार्टिक्युलर. तुम्हें ऐसे ही लग रहा है. तुम्हें इस चिंतित अनुभव के बाद तुम्हें सब कुछ डल और लाइफलेस लग रहा है.’’

‘‘अब आए न लाइन पर. सो यू डिड नाट लाइक इट. सही कहा जा सकता है.’’

‘‘तुम्हें जो अच्छा लगा. तुम ने वह किया. इस में मुझे अच्छा या खराब लगने का कोई सवाल ही नहीं उठता. हमारे संबंधों के बीच अब ये बातें नहीं आनी चाहिए.’’

‘‘सवाल है न. कुछ दिनों बाद हमें साथ जीना है. इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है.’’

‘‘तुम बेकार में पीछे पड़ी हो, फारगेट इट. कोई दूसरी बात करते हैं. कुछ खाते हैं.’’

‘‘अमित, तुम बात बदलने की कोशिश मत करो. मैं आज तुम्हारा पीछा छोड़ने वाली नहीं. चलो, दूसरी तरह से बात करती हूं. तुम ने डीवीडी क्यों नहीं देखी? वैसे तो तुम मुझ में बहुत रुचि लेते हो, भले ही इस बात को तुम चीप इंटरटेनमेंट मानते हो, इस के बाद भी तुम्हें मेरा प्रोग्राम देखना चाहिए था. मेरा प्रोग्राम देखने का तुम्हारा मन क्यों नहीं हुआ? मेरी खातिर तुम्हारे पास इतना समय भी नहीं है?’’

‘‘इस में समय की बात नहीं है. तुम्हें पता है, मुझे ऐसावैसा देखना पसंद नहीं है.’’

‘‘ऐसावैसा मतलब? अमित ऊपर देख कर चलने की जरूरत नहीं है और जिसे तुम चीप कह रहे हो, उसी तरह के अन्य प्रोग्राम तुम देखते हो. यह जो तुम क्रिकेट देखते हो, वह क्या है.’’

‘‘जाने दो न सुप्रिया, बेकार की बहस कर के क्यों शाम खराब कर रही हो.’’

‘‘शाम खराब हो रही है, भले हो खराब. आज मैं यह जान कर रहूंगी कि आखिर तुम्हारे मन में मेरे प्रति क्या है. सचसच बता दो. बात खत्म.’’

अमित ने एक लंबी सांस ली. शाम को पंक्षी अपने बसेरे की ओर जाने लगे थे. उस ने सुप्रिया की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘तुम ने कांटेस्ट में हिस्सा लिया, तुम्हारी मरजी. ठीक है न?’’

‘‘एकदम ठीक.’’

‘‘तुम्हें जीतना था, जिस की मुख्य वजह यह थी कि जीतने पर तुम्हारा फेवरिट हीरो तुम्हारे साथ परफोर्म करता. सच है न?’’

‘‘एकदम सच.’’

‘‘तुम जीतीं और तुम्हारा सपना पूरा हुआ, जिस से तुम्हें खुशी हुई. यह स्वाभाविक भी है. आई एम राइट?’’

‘‘एकदम सही, पर यह क्या मुझे गोलगोल घुमा रहे हो. मुद्दे की बात करो न. शाम हो रही है, मुझे घर भी जाना है. दीदी की तबीयत ठीक नहीं है. उन्हें आराम की जरूरत है.’’

‘‘चलो मुद्दे की बात करते हैं. वह अभिनेता, जो इस जीवन में कभी नहीं मिलने वाला तुम से झूठमूठ में प्रपोज किया, तुम से मिलने को आतुर हो इस तरह का नाटक किया, मात्र नाटक, इस झूठमूठ के नाटक में तुम मारे खुशी के रो पड़ीं. सचमुच में रो पड़ीं. तुम्हारी खुशी कोई एक्टिंग नहीं थी. सच कह रहा हूं न?’’

‘‘हां, मैं एकदम भावविभोर हो गई थी. वह खुशी… इट वाज जस्ट टू मच. अकल्पनीय आनंद की अनुभूति हुई थी मुझे.’’

‘‘तुम ने जो कहा, यह सब… अब याद करो, मैं ने तुम्हें प्रपोज किया, अंगूठी पहनाई, गुलाब दिया, हाथ में हाथ लिया, मेरे लिए तुम्हारी आंखें कभी भी एक बार भी प्यार में नहीं छलकीं. सो आई वाज जस्ट थिंकिंग कि यह सब क्या है? सचमुच, मैं यही सोचते हुए यहां आया था. तब से यही सोचे जा रहा हूं. खैर, चलो अब चलते हैं.’

 

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