Hindi Family Story: सूद माफ – कर्ज में डूबा दीनू

Hindi Family Story: जैसे ही सोमवती ने दीनू की चोटों पर सिंकाई करने के लिए गरम फाहा रखा, तो वह दर्द से कराह उठा. कुछ बदमाशों ने उसे लाठियों से पीट कर अधमरा कर दिया था.

दीनू से इतना ही कुसूर हुआ था कि कुछ साल पहले उस ने गांव के महाजन से खेती के लिए कुछ पैसा कर्ज लिया था, लेकिन तय समय बीत जाने के बाद भी कर्ज नहीं उतार सका था.

नतीजतन, धीरेधीरे कर्ज पर सूद की रकम मूल रकम से कई गुना ज्यादा हो गई, जो दीनू की जान के लिए बवाल बन गई.

आज दीनू ने महाजन से सूद की रकम चुकाने का वादा था, लेकिन किसी वजह से वह अपना वादा पूरा न कर सका, इसलिए महाजन ने अपने लठैतों को भेज कर उस की पिटाई कराई थी.

दीनू की पत्नी सोमवती की जवानी उफनती नदी की तरह चढ़ी है. उस की गठीली देह पर जवान मर्दों के साथसाथ बड़ेबूढ़ोें की नजर भी ठहर जाती है.सोमवती का ब्याह दीनू के साथ 5 साल पहले हुआ था, लेकिन उस के अभी तक कोई बच्चा नहीं था.

उसे यह टीस हमेशा सालती रहती थी.महाजन के गुरगे जबतब आते और दीनू पर लाठियां बरसा जाते. यह चिंता सोमवती को अंदर से खाए जा रही थी. वह इस परेशानी से नजात पाना चाहती थी, लेकिन उसे कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था.

एक दिन महाजन का मुनीम दीनू के प्रति हमदर्दी का मरहम लगाने उस वक्त सोमवती के पास आया, जब दीनू बैलों का चारा लाने गांव के हाट गया था.मुनीम बोला, ‘‘अकसर महाजन के गुरगे दीनू को बेरहमी से पीट जाते हैं.

तुम लोग उफ तक नहीं कर पाते.‘‘अगर मेरी बात मानो, तो इस से बचने का एक उपाय है… वह यह कि कोई महाजन के पास जा कर उस से सूद माफ करने के लिए कहे.

‘‘मेरा तजरबा कहता है कि वह तुम्हारी गरीबी पर तरस खा कर दीनू पर कर्ज का सारा सूद माफ कर देगा. इस से असल भुगतान करने में आसानी हो जाएगी.’’

‘‘मेरा पति इस बारे में कई बार महाजन के पास जा कर गुहार लगा चुका है, मगर महाजन को हमारी गरीबी पर कभी रहम नहीं आया,’’ सोमवती ने अपनी परेशानी बताई.मुनीम बोला, ‘‘महाजन में एक खूबी है कि वह खूबसूरत औरतों की बहुत कद्र करता है.

दीनू के बजाय महाजन पर तुम्हारी गुहार ज्यादा असरदार साबित हो सकती है.‘‘खूबसूरत व गठीले बदन वाली औरतें महाजन की कमजोरी भी हैं.

गांव की कई खूबसूरत औरतें महाजन की इसी कमजोरी का फायदा उठा कर अपने पति के कर्ज को माफ करा चुकी हैं.

‘‘अगर महाजन तुम्हारी बात मान कर दीनू के सूद को माफ कर दे, तो यकीनन तुम्हें एक बड़ी परेशानी से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा, वरना इस सूद को चुकातेचुकाते तुम लोगों के चेहरों पर झुर्रियां आ जाएंगी, फिर भी महाजन के मकड़जाल से छूट नहीं पाओगे.’’

‘‘सुना है कि सूद माफ कराने के बदले में औरतों को कुछ समय के लिए महाजन के पास ठहरना पड़ता है?’’ सोमवती ने मुनीम से पूछा.‘‘इस मुसीबत से छुटकारे के बदले अगर कुछ देर का जिस्मानी सुख महाजन को देना पड़ जाए, तो इस में हर्ज क्या है,’’

मुनीम ने सलाह दी.सोमवती के चेहरे पर गुस्से का भाव देख कर मुनीम वहां से खिसक लिया.दूसरे दिन शाम को सोमवती महाजन की हवेली के दरवाजे पर थी. मुनीम ने दरवाजा खोला. सोमवती को देख कर उस का चेहरा खुशी से खिल पड़ा.

मुनीम सोमवती को कमरे में बैठा कर महाजन के पास आ गया.‘‘साहब, दीनू किसान की पत्नी सोमवती आ गई है,’’ मुनीम ने सूचना दी.महाजन बोला, ‘‘उसे मेरे बैडरूम में भेज दो.’’मुनीम ने महाजन के आदेश का पालन करते हुए सोमवती को बैडरूम में पहुंचा दिया.

सोमवती को पहली बार मखमली मुलायम गद्दे पर बैठने को मिला था. वह सहमी सी महाजन के आने का इंतजार करने लगी.अचानक बैडरूम का दरवाजा खुला, महाजन को आता देख सोमवती के दिल की धड़कनें तेज चलने लगीं

.महाजन की प्यासी निगाहों ने सोमवती की देह का बारीकी से मुआयना किया. सोमवती सिमट कर तेजी से चलने वाली सांसों को काबू में करने की कोशिश करने लगी.

सोमवती की गठीली देह की चमक ने महाजन की आंखें चौंधिया दीं और चेहरे पर चमकीली मुसकान जगमगा गई.महाजन ने गहरी नजर से सोमवती की आंखों के पार झांका.

उन आंखों की पुतलियों में खुला न्योता था.महाजन और करीब आया, तो सोमवती सहमते हुए एक तरफ सिमट गई. अगले ही पल सोमवती की देह महाजन की बांहों में थी.

देह की गरमी पिघली, तो सोमवती ने सवाल उछाला, ‘‘अब तो मेरे पति के कर्ज का सारा सूद माफ हो जाएगा?’’‘‘हां… आज तुम्हारे पति के कर्ज का सारा सूद माफ हो गया है, लेकिन मूल रकम अभी बाकी है.

इसी तरह एक बार और यहां आ कर मूल रकम भी माफ करवा लेना,’’ महाजन होंठों पर मुसकराहट बिखेरता हुआ बोला.सोमवती महाजन के कानों में फुसफुसाते हुए बोली, ‘‘मेरे पति को इस बात की जरा भी भनक न मिले कि मैं यहां आई थी.’’

सोमवती ने महाजन को डरीडरी नजरों से देखा.‘‘निश्चिंत हो कर जाओ. तुम यहां आई थीं, इस बात की भनक हवाओं को भी नहीं मिलेगी,’’ महाजन ने उसे भरोसा दिलाया.

‘‘तुम्हें पता नहीं, दीवारों के भी कान होते हैं और उन से छन कर अफवाहें बाहर निकलने लगती हैं, जो मेरी इज्जत पर बुरा असर डाल सकती हैं,’’

सोमवती ने महाजन को चेताया.महाजन बोला, ‘‘शायद तुम्हारा इशारा मुनीम की तरफ है. मुनीम को चुप रहने की मैं अलग से तनख्वाह देता हूं.

लिहाजा, तुम उस की तरफ से जरा भी चिंता मत करो,’’ महाजन ने सोमवती को यकीन दिलाया.‘‘हां, और ये 2 सौ रुपए रख लो. कभी काम आएंगे. दीनू को मत बताना.’’सोमवती ने एक अरसे बाद 2 सौ रुपए देखे थे. उस ने वे रुपए अपने ब्लाउज में ठूंस लिए. Hindi Family Story

Hindi Kahani: लेनदेन – अफसर की नौकरी

Hindi Kahani: उन दिनों मैं इंटैलिजैंस डिपार्टमैंट में था. मेरी गिनती उन चुनिंदा अफसरों में होती थी, जिन की सभी इज्जत करते थे. इज्जत यों ही नहीं मिलती, उसे हासिल करने के लिए कठोर मेहनत और लगन की जरूरत होती है. इंटैलिजैंस डिपार्टमैंट में काम करना आसान नहीं होता. हर जुर्म को शुरू से आखिर तक देखना और उसे समझना होता है.

उन्हीं दिनों मैं जुर्म दूर करने पर एक किताब लिख रहा था. मसलन, जुर्म क्यों होते हैं? कैसे मिटाए जा सकते हैं?

इस सिलसिले में मैं कई जेलों और थानों में गया, मुलजिमों से मिला और उन के इंटरव्यू कर के जो तजरबा हासिल किया, उन्हें आज भी भुलाना नामुमकिन है.वह मेरा पहला तजरबा था.

एक 16-17 साल के लड़के को थाने में लाया गया था. एक दुकान से डबलरोटी चुराना उस का जुर्म था.मैं ने उस से कुछ सवाल किए थे, जो जवाब मिले, वे इस तरह थे:

‘‘तुम ने डबलरोटी क्यों चुराई?’’‘‘मां 2 दिन से भूखी थी.’’‘‘जानते हो कि ऐसा करना जुर्म है? तुम्हें इस चोरी की सजा मिलेगी.’’‘‘जानता हूं साहब, लेकिन मेरी मजबूरी थी.

मैं मां को भूखी मरते नहीं देख सकता.’’‘‘मान लो कि तुम आज नहीं पकड़े जाते, तो कल क्या करते? फिर से चोरी?’’‘‘हम कल में नहीं जीते. हमारा सिर्फ आज होता है साहब.’’

‘‘चोरी करते हुए पकड़े जाने का डर नहीं लगता? आखिर इस में क्या खुशी मिलती है?’’

‘‘यह मत पूछो. किसी दिन पर्स हाथ लग जाए और उस में 10-20 हजार रुपए हों, तो उस दिन सारे शहर में मुझ से बड़ा कोई और रईस नहीं होता.

‘‘उस दिन मैं अंगरेजी शराब पीता हूं. दोस्तों के साथ फिल्म देखता हूं और अच्छे होटल में खाना खाता हूं.’’‘‘तुम्हें पकड़े जाने का कोई अफसोस नहीं है?’’

‘‘नहीं…’’दूसरा तजरबा. मैं एक ऐसे शख्स से मिला था, जिन का पेशा विदेशों से ड्रग्स मंगवा कर उन्हें अपने देश में बेचना, हत्या करवाना, जबरन पैसा वसूलना, मजदूर यूनियनों को चलाना था.

अपने मातहतों के बीच वे मसीहा थे. सारा इलाका उन्हें भरपूर इज्जत देता था.‘‘आप अपराध जगत में कैसे आए?’’ मेरा पहला सवाल था.

‘‘यहां कोई अपनी मरजी से नहीं आता. जब आप का सभ्य समाज किसी को जरूरत से ज्यादा सताता है, तो वह परेशान हो कर अपराध की दुनिया में चला आता है.

‘‘आप लोग फिर उसे गुंडामवाली कहते हैं. आज जो काम आप की सरकार नहीं कर पा रही, मैं करता हूं. मैं गरीबों के पेट भरता हूं. बस्ती में जब सवेरा होता है, तो हर मां उठ कर अपने बच्चे के लिए यही कहती है कि वह बड़ा हो कर मु?ा जैसा बने.’’

‘‘तुम खुद तो कानून की नजरों में अपराधी हो ही, तो क्यों मासूम बच्चों को भी अपराध की अंधेरी दुनिया में धकेल रहे हो?’’‘‘मैं उन्हें कामधंधा देता हूं. बहुत बड़ी पगार देता हूं. खुशियां देता हूं. तो फिर क्या बुराई है इस में?’’

उस ने एक सवाल मुझे पर ही जड़ दिया था. वह एक शातिर अपराधी था. उसे सुधार पाना नामुमकिन था.अगले 2 अपराधियों में एक नेता था, तो दूसरा समाजसेवी. उन्हें देखते ही मुझे बचपन के दिन याद आ गए थे.

बचपन से होश संभालने तक मैं ने कई बहुरुपियों को देखा था. बहुरुपिए बाजार में, जुलूस में या किसी शादी के मौके पर सारे महल्ले में तरहतरह के स्वांग बना कर घूमा करते थे.

मुझे एक जोकर बने बहुरुपिए की हरकतें बड़ी अच्छी लगती थीं. अपने करतब दिखा कर बहुरुपिए हर घर से पैसे इकट्ठा करते और चले जाते थे. बहुरुपिया बनना उन की मजबूरी हुआ करती थी.

आज वही बहुरुपिए नेता और समाजसेवी बने सारे देश में फैल गए हैं. भेड़ की खाल में छिपे हुए भेडि़ए हैं.नेताजी की ओर देखते हुए मैं ने पूछा था, ‘‘आप पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं.

आप क्या कहते हैं?’’उस ने कहा था, ‘‘भ्रष्टाचार मत कहें. इस का नाम लेनदेन है. दुनिया इसी से चलती है. दुनिया के किसी कोने में सिर्फ लेनलेन या देनदेन नहीं चलता. मैं ने जनता के लिए बहुतकुछ किया और बदले में कुछ लिया, तो इस में भ्रष्टाचार कहां से घुस गया?

‘‘सोचो, सरकार आखिर आप को सहूलियतें देती है, तो टैक्स भी लेती है. बैंक कर्ज देते हैं, तो ब्याज भी तो लेते हैं. एक अदना सा बाबू अगर किसी का काम कर के उस से कुछ ले लेता है, तो आप लोगों को भ्रष्टाचार की बू क्यों आने लगती है?

‘‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस के उन शब्दों को याद करो, ‘तुम मु?ो खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा…’ उन्होंने भी तो लेनदेन की बात कही थी. क्या वे भ्रष्टाचारी थे?’’मैं हैरान था. उस नेता की बातों से दिमाग झन्ना गया था.

जो किसी से दब जाए, वह नेता नहीं होता और कामयाब नेता वही होता है, जो एक की चार सुना डाले.नेताजी इतने पर चुप नहीं रहे. वे आगे बोले, ‘‘आप लोग सिर्फ हमारी पार्टी के पीछे पड़े रहते हैं और उस पार्टी को पनाह देते हैं, जो भ्रष्टाचार की जननी है.

उस ने सारे नेता ही भ्रष्ट पैदा किए हैं. मेरा बस चले, तो मैं उस पार्टी की मान्यता ही रद्द करवा दूं. न रहेगा बांस, न रहेगा भ्रष्टाचार.’’नेताजी के मुंह से यह नया मुहावरा सुन कर मैं हंस पड़ा.नेताजी गुस्से से लालपीला होते हुए बोले, ‘‘हंसो मत अफसर. अगर मेरी पार्टी सत्ता में आ गई, तो मैं भारतीय अपराध संहिता से भ्रष्टाचार शब्द ही निकलवा दूंगा.

संशोधित शब्द होगा, लेनदेन. और यह अपराध नहीं होगा.’’नेता मोटी चमड़ी के होते हैं, इसलिए मु?ो ही चुप होना पड़ा.समाजसेवी बड़े विनम्र थे. वे भूरे रंग का कुरता और चूड़ीदार पाजामा पहने थे. एक काला ?ोला उन की बगल में था.

‘‘आप समाजसेवा के नाम पर चंदा लेते हैं, पर चैक से नहीं. किसी रसीद से भी नहीं. आप ने बड़ा आसान सा तरीका अपनाया है गबन करने का?’’ मैं ने उन से पूछ लिया.समाजसेवी भड़क गए, ‘‘सच को ?ाठ बनाना कोई आप लोगों से सीखे.

आप लोग जिस के पीछे पड़ जाते हैं, उस के बाल में से खाल निकालने की कोशिश करते हैं. हम लोग छोटा चंदा लेने वाले लोग हैं. बड़ा चंदा नहीं लेते. बड़ा चंदा घोटालों और घोटालेबाजों का होता है.’’

वे कुछ रुके और अपनी सांसों को दोबारा बटोरते हुए बोले, ‘‘भला 5 या 10 रुपए के लिए चैक लिखे जाते हैं? हम अपने हाथ में कुछ नहीं लेते. लोग दानपेटी में दान डाल जाते हैं.

हम तो खुद ही कहते हैं कि सरकार नोट छोटे कर डाले, भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा.‘‘अब बताइए कि सरकारें तो कुछ करती नहीं, हम से उम्मीद करती हैं कि हम छोटेछोटे रुपयों का भी हिसाब रखें,’’ बड़ी मुश्किल से उन के मन की भड़ास खत्म हुई थी.

इसी तरह के और भी कई सारे अपराधियों के इंटरव्यू करने के बाद मैं किसी नतीजे की तलाश में था.मैं कुरसी पर बैठा गहरी सोच में डूबा हुआ था कि अर्दली आया.

बिना पूछे उस ने मेरी दराज खोल कर नोटों की एक गड्डी उस में डाली और यह कहते हुए चला गया कि ठेकेदार बाबूलाल का हिसाब चुकता हो गया है. सब ने बांट लिया और आप का हिस्सा रख दिया. आप कल चैक पर दस्तखत कर देना. Hindi Kahani

Story In Hindi: एक हंसमुख लड़की – क्या था कजरी के दुख का कारण

Story In Hindi: उस की उम्र थी, यही कोई 18-19 बरस. बड़ीबड़ी आंखें, घने बाल, सफेद मोतियों की लड़ी से दांत. जब हंसती थी, तो लगता था मानो बिजली चमक गई हो. गलीमहल्ले के मनचलों पर तो उस की हंसी कहर बरसाती थी.

मुझे आज भी याद है, एक बार पड़ोस के चित्तू बाबू का लड़का काफी बीमार हो गया था. उस के परिवार के लोग बहुत परेशान थे, लेकिन कजरी बड़े इतमीनान से हंसते हुए कह रही थी, ‘‘ऐ बाबू, भैया ठीक हो जाएंगे, तुम फिक्र न करो,’’ और फिर ढेरों लतीफे सुनाने लगी. यहां तक कि बीमार लड़का भी कजरी के लतीफे सुनसुन कर हंसने लगा था.

मैं तकरीबन 10 साल बाद उस शहर, उस महल्ले में जा रहा था, जहां कजरी अपने बापू के साथ अकेली रहते हुए भी महल्लेभर के सुखदुख में शरीक होती थी.

एक बार जब मुझे एक कुत्ते ने काट लिया था, तो मैं बहुत परेशान हो गया कि अब तो 14 बड़ीबड़ी सूइयां लगवानी पड़ेंगी, लेकिन कजरी ने हंसतेहंसते कहा, ‘‘पड़ोसी बाबू, काहे को चिंता करते हो, कुत्ते ने ही तो काटा है, किसी सांप ने तो नहीं. सब ठीक हो जाएगा.’’

मैं भी कजरी की बात मान कर टीके लगवाने के पचड़े में पड़ने के बजाय घर में ही मामूली इलाज करवाता रहा. यह कजरी के बोल का फल था या कुछ और. खैर, मैं बहुत जल्दी ठीक हो गया.

वही सांवलीसलोनी कजरी मुझे फिर से मिलने वाली थी, यही सोचसोच कर मैं खुश हुआ जा रहा था, लेकिन मैं इस बात को ले कर परेशान भी था कि कहीं कजरी अपनी ससुराल न चली गई हो. 10 साल का अरसा कम नहीं होता.

अचानक ही एक कुली ने पूछा, ‘‘बाबूजी, सामान ले चलूं?’’

मैं चौंका, लेकिन तभी मुझे भान हुआ कि गाड़ी तो पहले से ही प्लेटफार्म पर आ कर खड़ी हो चुकी है और स्टेशन आ चुका है.

‘‘हांहां, ले चलो. कितने पैसे लोगे?’’ मैं ने पूछा.

‘‘100 रुपए लगेंगे,’’ कुली बोला.

‘‘अच्छा, ठीक है. चलो.’’

स्टेशन से बाहर आ कर मैं ने सोचा कि पहले कुछ नाश्ता कर लिया जाए, लेकिन फिर यह सोच कर कि अब तो कजरी के हाथ का बना नाश्ता ही करूंगा. मैं ने रिकशे वाले को आवाज दी, ‘‘सुमेरपुर चलोगे?’’

‘‘30 रुपए लगेंगे,’’ रिकशे वाले ने कहा और मेरा बैग व अटैची उठा कर रिकशे में रख लिया.

रिकशा चल पड़ा और मैं फिर गुजरे दिनों की दुनिया में खो गया.

एक दिन सुबहसुबह ही कजरी मेरे पास आई थी और हंसते हुए बोली थी, ‘‘पड़ोसी बाबू, आज मेरा दिल डूबा जा रहा है…’’ फिर खुद ही खिलखिला कर हंस पड़ी और बोली, ‘‘बाबू, मैं तो मजाक कर रही थी.’’

तभी अचानक कजरी के बापू के रोने की आवाज ने हम दोनों को चौंका दिया. दोनों ही लपके. कजरी के बापू के इर्दगिर्द भीड़ जमा थी और बीच में पड़ी थी, कजरी की मां की लाश.

मैं तो दंग रह गया. कजरी न रोई, न ही गुमसुम हुई. उस की मां की लाश को देख कर मैं उदासी में डूबा वापस अपने कमरे में आ गया.

शाम को कजरी मेरे सामने थी, वही हंसता हुआ चेहरा लिए. कह रही थी, ‘‘ऐ बाबू, मां मरी थोड़े ही है, वह तो सो रही है…’’ और फिर हंसते हुए वह बोली, ‘‘बाबू एक दिन तुम्हें भी और हमें भी तो इसी तरह सोना है.’’

फिर वह रुकी नहीं, तुरंत ही चली गई. मैं हैरानी से उसे जाते हुए देखता रहा.

रिकशे वाले को मैं ने रोक कर अपना कमरा खोला, सामान रखा और फिर उसे पैसे दिए. सोचा, इतने सालों के बाद कजरी से मिलने क्या खाली हाथ जाऊंगा. मैं पास की हलवाई की दुकान पर मिठाई लेने पहुंचा. एक किलो लड्डू लिए और पैसे दे कर मैं अपने घर जाने के बजाय सीधा कजरी के ही घर जा पहुंचा.

दरवाजा खटखटाया, तो एक अधेड़ आदमी ने दरवाजा खोला और बोला, ‘‘कहिए, कहां से आए हैं? किस से मिलना है? आइए, अंदर आइए.’’

मैं भी उस के पीछेपीछे चला गया. वह अंदर जा कर एक तरफ पड़ी चारपाई पर बैठ गया. फिर चारपाई पर बैठते

हुए मैं ने अधेड़ से पूछा, ‘‘भैया, त्रिलोचन बाबू दिखाई नहीं दे रहे… कहीं गए हैं क्या?’’

यह सुनते ही वह आदमी उदास हो गया. फिर धीरे से वह अधेड़ बोला, ‘‘मामा को मरे तो 4 बरस हो गए भैया. आप कौन हो? कहां से आए हो?’’

‘‘और कजरी…?’’ उस के सवाल का जवाब दिए बिना ही मैं ने पूछा.

‘‘कहीं गई होगी, शाम को आ जाएगी,’’ कहते हुए वह उठा और बोला, ‘‘बाबूजी, आप बैठो, मैं चाय बना कर लाता हूं.’’

‘‘अरे नहींनहीं, इस की कोई जरूरत नहीं है. लो, यह मिठाई रख लो… और हां, कजरी आए तो कह देना कि सामने वाले मकान में रहने वाला बाबू आया है,’’ कहते हुए मैं उठ खड़ा हुआ.

रातभर के सफर की वजह से मेरा बदन भारी हो रहा था. लिहाजा, कमरे में आ कर सब से पहले मैं नहाया और चारपाई पर लेट कर सोचने लगा कि

अब कैसी लगती होगी कजरी? यही सोचतेसोचते मैं सो गया.

शाम के वक्त मुझे ऐसा लगा, मानो कोई कह रहा हो, ‘‘पड़ोसी बाबू, पड़ोसी बाबू… उठो.’’

मैं ने लेटेलेटे ही सोचा कि यह कजरी ही होगी. आंखें खोलीं और देखा तो सचमुच कजरी ही थी. पर उसे देखते ही मैं हैरान रह गया कि क्या यह वही सुंदर लंबे बालों और पतले होंठों वाली कजरी है या कोई और?

वह बोली, ‘‘ऐ पड़ोसी बाबू, का सोचते हो? मैं कजरी ही हूं.’’

‘‘कजरी, आओ… बैठो, मैं तो सोच रहा था कि तुम इतनी दुबलीपतली कैसे हो गई?’’

जवाब में कजरी के होंठों पर फीकी मुसकान देख मैं चुप हो गया.

कुछ देर बाद भी जब वह कुछ न बोली, तो मैं ने कहा, ‘‘कजरी, बापू नहीं रहे, सुन कर बड़ा दुख हुआ. तुम बताओ, आजकल क्या कर रही हो? तुम्हारी शादी हो गई या नहीं?’’

जवाब में वह थोड़ी देर चुप रही, फिर बोली, ‘‘बाबू, जो इस दुनिया में आया है, उसे तो जाना ही है. बापू चले गए, अब मैं भी चली जाऊंगी.’’

‘‘अरे नहीं पगली, मैं ने यह तो नहीं कहा. खैर, मैं समझता हूं तुम्हें दुख हुआ होगा. अच्छा, यह बताओ कि कहां

गई थीं सुबह से? कहीं काम करती

हो क्या?’’

वह जोर से हंसी. पर, पीले पड़ गए दांतों को देख कर अब मुझे कजरी

की हंसी रास नहीं आई. फिर भी मैं शांत बना रहा.

हंसतेहंसते ही वह बोली, ‘‘बाबू, तुम थक गए होगे. मैं अभी तुम्हारे लिए खाना ले कर आती हूं,’’ और मेरे कुछ कहने से पहले ही वह बाहर जा चुकी थी.

उस के बाहर जाते ही मैं सोचने लगा कि कजरी कुछ छिपा रही है. उस की हंसी में अब पहले वाली बात नहीं है. तभी मुझे खयाल आया कि जब मैं ने उस से शादी की बात की थी, तो वह टाल

गई थी. अब आएगी तो सब से पहले यही पूछूंगा.

तकरीबन आधे घंटे बाद साड़ी के आंचल में छिपा कर कजरी मेरे लिए खाना ले कर आ गई. खाना पलंग पर रख कर वह नीचे बैठ गई और बोली, ‘‘खाना खाओ बाबूजी.’’

‘‘नहीं कजरी, पहले तू यह बता

कि तेरी शादी कहां हुई है? किस से

हुई है और कब हुई? तभी मैं खाना खाऊंगा…’’

‘‘खा लो न, बाबूजी…,’’ हंसते हुए वह बोली, ‘‘अभी बता दूंगी.’’

कजरी की मोहक अदा देख कर मैं और कुछ न बोल सका.

खाना खाने के बाद मैं चारपाई

पर लेट गया और बोला, ‘‘हां, अब बता.’’

कजरी हंसी और बोली, ‘‘बाबूजी, आप जानना चाहते हो न कि मेरा मर्द कौन है? मेरी ससुराल कहां है?’’

‘‘हां, हां, यही.’’

‘‘बाबूजी, वह जो सामने महल्ला है न… उस महल्ले का हर मर्द मेरा शौहर है, हर घर मेरी ससुराल है. बचपन में

मैं लोगों को खुश रखती थी न,

इसीलिए अब मुझे मर्दों को खुश रखना पड़ता है. ..

‘‘अच्छा बाबूजी, किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे बुला लेना,’’ और फिर हंसते हुए वह बाहर निकल गई.

मेरे ऊपर तो मानो आसमान ही टूट पड़ा, होंठ सिल गए, ऐसा लगा कि कोई तूफान आया और मुझे उड़ा ले गया. पर कजरी मेरे कई सवालों का जवाब दिए बिना जा चुकी थी.

सुबह यह खबर सुन कर कि कजरी ने कुएं में कूद कर जान दे दी, मैं मानो जमीन में गड़ गया. सोचने लगा कि अब कभी नहीं सुनाई देगी कजरी की मासूम हंसी, क्योंकि अब वह इस दुनिया से बहुत दूर जा चुकी है. Story In Hindi

Hindi Family Story: मां के आशीर्वाद से – क्या कैप्टन को मिल पाई जीत

Hindi Family Story: मां,  तुम्हारे आशीर्वाद से मैं लड़ाई के मोरचे पर पहुंच गया हूं. आते समय तुम्हारी कही आखिरी बात मुझे याद है.मां, यकीन मानना कि कैप्टन रंजीत की पीठ पर कभी गोली नहीं लगेगी. आखिरी सांस तक वह दुश्मनों से लड़ता रहेगा.

तुम्हारा बेटा, तुम्हारे सिखाए रास्ते पर चलता रहेगा. राजी को कहना कि मोह छोड़ दे. अपने लिए तो सभी जीते हैं, पर दूसरों के लिए जीने का मजा ही और है. उस जैसी हजारों सुहागनों के सुहाग मेरे संग मोरचे पर डटे हुए हैं.

मां, एक मोरचा यह युद्धभूमि है, दूसरा मोरचा तुम्हारे यहां है, सिविल में. तुम और राजी उस मोरचे पर लड़ने वालों के लिए काम करोगी, तो हमारे हाथ मजबूत होंगे. देशवासियों का जोश, हमारा जोश है.अच्छा, मां. आदेश आ गया है.

मुझे अपने कुछ जवानों के साथ दुश्मन के ठिकाने पर हमला करना है. तुम्हारा आशीर्वाद मेरे साथ है. पर वादा करो मां, अगर मैं वीरगति पा गया, तो तुम रोओगी नहीं और न ही राजी को रोने दोगी.अच्छा मां, अलविदा, जयहिंद.‘‘कैप्टन रंजीत…’’ ये एड्युडेंट थे.

‘‘यस सर.’’‘‘जाने से पहले कर्नल साहब से मिल लेना. उन के पास आप के लिए आखिरी आदेश बाकी है.’’कैप्टन रंजीत ने ‘हां’ में सिर हिलाया और कर्नल साहब के बंकर की ओर बढ़ गया.‘‘क्या मैं भीतर आ सकता हूं सर?’’‘‘यस, कैप्टन रंजीत.’’

कैप्टन रंजीत बंकर के भीतर चला जाता है और सैनिक ढंग से सैल्यूट करता है.कर्नल साहब ने अपने सामने मैप बिछाए हुए हैं और उस जगह को चैकआउट किए हुए हैं, जिस जगह पर हमला करना है.‘‘कैप्टन रंजीत, तुम मेरी रैजीमैंट के सब से अच्छे अफसरों में से एक हो…’’

कर्नल साहब ने कहना शुरू किया, ‘‘जिस अहम ठिकाने पर तुम्हें हमला करना है, वह ऊंचाई पर है. उस के नीचे से वह सड़क जा रही है, जहां से फर्स्ट लाइट में हमारी पूरी रैजीमैंट ने एडवांस करना है. जिस पर से हमें सुबह गुजर कर जाना है.

‘‘यहां से तुम अटैक नहीं कर सकते. मेन रोड होने के चलते दुश्मन का पूरा ध्यान इसी ओर है. इधर से जाने से तुम्हारी पूरी गतिविधियों को नोट किया जा सकता है.

‘‘दूसरा रास्ता है 35 फुट चौड़ा और 20 फुट गहरा वह बरसाती नाला, जो इस ठिकाने से पीछे हो कर जाता है. रास्ता बहुत बीहड़ है. कांटेदार झाडि़यों से अटा पड़ा है, पर तुम्हें इसी रास्ते को अपनाना है.‘‘एड्युडेंट ने आज उस जगह की रैकी (जासूसी) कर के यह आई स्कैच (दुश्मन के इलाके में घुस कर खास जगह का नक्शा) तैयार किया है.

इसे रख लो, तुम्हारे काम आएगा. तुम्हारे साथ 12 जवान हैं और उन में से 2 ऐसे हैं, जिन्होंने आज की रैकी में हिस्सा लिया था…’’कर्नल साहब बोलतेबोलते एकाएक रुक गए. लगा, जैसे वे एकदम पत्थर की तरह कठोर हो गए हैं.

फिर वे बोले, ‘‘कैप्टन रंजीत, मेरे लिए फर्स्ट लाइट में रैजीमैंट को एडवांस करवाना बहुत जरूरी है. यह तुम्हें याद रखना होगा. मुझे गम नहीं होगा, अगर इस ठिकाने को हासिल करने के लिए तुम्हारे सभी जवान वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं…’’

‘‘यस सर, मैं समझाता हूं सर.’’‘‘ठीक है …मैं वायरलैस पर तुम्हारे आखिरी संदेश का इंतजार करूंगा.’’‘‘यस सर.’’कैप्टन रंजीत सैल्यूट कर के बंकर से बाहर आ गया. बाहर सूबेदार राजू उस का इंतजार कर रहा है.‘‘सर, सभी जवान चलने के लिए तैयार हैं.’’

‘‘चलिए.’’कैप्टन रंजीत और सूबेदार राजू जवानों की ओर बढ़ जाते हैं. अपने अफसरों को आते देख सभी जवान लाइन से खड़े हो जाते हैं. एक बार सभी के चेहरों को गौर से देखने के बाद कैप्टन रंजीत ने कहा, ‘‘एड्युडेंट साहब के साथ आज कौन से 2 जवान रैकी पर गए थे?’’

‘‘मैं नायक मुहम्मद अली… सर.’’‘‘और मैं सिपाही सुजान सिंह… सर.’’‘‘आप दोनों हमें यह बताएं कि रास्ते में जो नाला पड़ता है, वह तैर कर पार किया जा सकता है या नहीं?’’

‘‘सर, इस संबंध में मेरा एक सु?ाव है,’’ नायक मुहम्मद अली ने कहा.‘‘कहो…’’‘‘आई स्कैच के मुताबिक, जहां से नाले को पार करने के लिए एड्युडेंट साहब ने मार्क किया है, वहां आरपार 2 बड़ेबड़े पेड़ हैं.

अगर मेरी कमर से रस्सा बांध दिया जाएगा, तो मैं तैर कर पार जा सकूंगा. दोनों ओर से रस्सा बांध कर मंकी रोप को तैयार किया जा सकेगा.’’‘‘शाबाश नायक अली. तुम्हारी स्विमिंग चैंपियनशिप किस दिन काम आएगी…’’

कैप्टन रंजीत ने कहना शुरू किया, ‘‘मेरे बहादुर जवानो, चलने से पहले जो आखिरी बात मैं आप लोगों से कहना चाहता हूं, वह बहुत खास है. हो सकता है कि इस हमले में दुश्मन के ठिकाने को लेने के लिए हम सब को अपनी जान देनी पड़े.’’

‘‘कहो, नायक अली…’’‘‘मैं दुश्मन को बता दूंगा कि मैं भी पक्का हिंदुस्तानी हूं.’’‘‘और सिपाही ठाकरे?’’‘‘इतिहास गवाह है कि लड़ाई के मैदान में मराठों ने कभी पीठ नहीं दिखाई.’’‘‘और लांस नायक पिल्लै?’’‘‘मैं भी बता दूंगा कि मद्रासी डरपोक नहीं होते.’’

‘‘और सिपाही सुजान सिंह?’’‘‘आज सुजान सिंह अपने दुश्मन पर कहर बन के गिरेगा.’’‘‘शाबाश… आज मेरे साथ पूरा हिंदुस्तान है. जिस देश में आप जैसे बहादुर जवान हैं, उस का कोई बाल बांका नहीं कर सकता…’’

कैप्टन रंजीत ने कहा, ‘‘हम सब नाला पार करने तक इकट्ठे जाएंगे. उस के बाद 2 पार्टियां बनेंगी. 6 जवान मेरे साथ रह कर आगे बढ़ेंगे और 6 जवान सूबेदार राजू के साथ.‘‘और एक बात का ध्यान रहे, सभी जवान मेरे हुक्म के बिना कोई कार्यवाही नहीं करेंगे.

नाला पार करने के बाद आगे के आदेश मिलेंगे… सभी जवान अपनेअपने हथियारों का अच्छी तरह निरीक्षण कर लें. संगीनें चढ़ा लें.’’चलते समय कैप्टन रंजीत ने अपने छोटे से वायरलैस सैट को चैक किया और सभी अपने मकसद की ओर बढ़ने लगे.

मंकी रोप से एकएक कर सभी ने चुपचाप भयानक बरसाती नाला पार कर लिया.कैप्टन रंजीत ने घड़ी की ओर देखा. रात के 3 बजे थे. उन के पास एक घंटा बाकी था.

कर्नल साहब को प्रोसीड सिगनल देने के बाद कैप्टन रंजीत ने जवानों को लाइन फोरमेशन में चलने का संकेत किया. सभी जवान सम?ा गए कि कैप्टन साहब का फैसला उचित ही है कि 2 पार्टियों में बंटने के बजाय इकट्ठा लाइन फोरमेशन में चलना चाहिए, क्योंकि ऊंचाई पर जा कर जगह छोटी हो गई थी.

दुश्मन को दोनों ओर से घेरने का कोई मतलब नहीं था, वह खुद ही तीनों ओर से घिर जाएगा.रास्ता बहुत ही बीहड़ था. कांटेदार झाडि़यों के बीच से गुजरते कैप्टन रंजीत और उस के जवानों के शरीर घायल होते जा रहे थे, परंतु फिर भी वे अपने टारगेट की ओर बढ़ते जा रहे थे… चुपचाप. सुबह 4 बजे के करीब वे अपने टारगेट से केवल 50 गज दूर रह गए.

तभी कैप्टन रंजीत ने अपने जवानों को ठहरने का आदेश दिया और वे खुद थोड़ा पीछे हट कर वायरलैस सैट से उलझ गए. उन की आवाज बहुत ही धीमी थी.‘‘हैलो टाइगर… हैलो टाइगर… ओवर.’’‘‘यस टाइगर स्पीकिंग… ओवर.’’‘‘सर, हम टारगेट से केवल 50 गज पीछे हैं.

लगता है, दुश्मन को अभी तक हमारे आने का पता नहीं है. मैं फायर करने जा रहा हूं सर. मुझे यकीन है कि हम उन पर जल्दी ही काबू पा लेंगे.’’‘‘ओके प्रोसीड. यहां से ठीक आधा घंटे बाद रैजीमैंट मूव करेगी. उस से पहले ही… ओवर.’’‘‘राइट सर… ओवर.

’’कैप्टन रंजीत ने सैट बंद कर दिया और सभी जवानों को और फैल जाने का संकेत किया, जिस से दुश्मन के भागने के एकमात्र रास्ते को पूरी तरह रोका जा सके, क्योंकि वह जानता है आगे 2 सौ फुट नीचे सड़क है.

दुश्मन अगर उस ओर भागता है, तो यह आत्महत्या करने के समान होगा और पीछे वे बैठे हैं.उस ने जवानों को संकेत द्वारा सम?ा दिया कि जैसे ही उस की कारबाइन मशीन से गोलियां निकलें, वे फायर शुरू कर दें.

थोड़ी देर बाद कैप्टन रंजीत की कारबाइन आग उगल रही थी. साथ ही, उन के साथी जवानों की राइफलें भी गूंज उठीं. एकाएक हुए हमले से दुश्मन हड़बड़ा गया. वह पीछे की ओर भागा.

तब कैप्टन रंजीत और उन के साथियों ने उन को संगीनों पर ले लिया.‘चार्ज…’ ‘घोंप…’ ‘निकाल’ की आवाजों के साथ ही ‘भारत माता की जय’ के नारों से पूरा आसमान गूंज उठा.

कैप्टन रंजीत के साथी शहीद होते चले गए. खुद भी दुश्मन की एक गोली से जख्मी हो गए. उन्होंने अपने कर्नल साहब को आखिरी संदेश दिया, ‘‘सर…सर, मां के आशीर्वाद से हम जीत गए हैं.

मेरे एकएक वीर जवान ने दुश्मनों पर कहर ढाया है, फिर वे शहीद हुए. पर…पर, सर, मैं अभी भी देख रहा हूं, 2 दुश्मन मेरी ओर बढ़ रहे हैं. जख्मी होने पर भी मैं उन के लिए काफी हूं.

‘‘सर, आप बेधड़क हो कर रैजीमैंट को मूव करें. अच्छा …अलविदा, सर. जयहिंद.’’‘जयहिंद कैप्टन…’कैप्टन रंजीत को लगा कर्नल साहब का गला भर आया है. उस ने सैट बंद किया और एक कंटीली झाड़ी की आड़ में मोरचा संभाल लिया. दुश्मन ने भी उसे देख लिया था. दोनों ओर से तड़ातड़ गोलियां चलीं और फिर चारों ओर शांति छा गई. Hindi Family Story

Family Story In Hindi: अमीर – बड़े दिलवाला लालू

Family Story In Hindi: ‘‘उठो… आंगनबाड़ी जाना है न?’’ मां लालू को जगाने की कोशिश कर रही थी.

‘थोड़ी देर और…’’ लालू ने अंगड़ाई लेते हुए कहा.

‘‘मुझे और तेरे बापू को काम पर जाने में रोज देरी होती है. चलो, तैयार हो जाओ,’’ मां झंझला कर बोली, तो लालू को उठना पड़ा.

मां ने बासी और कड़क रोटी चायनुमा पानी में डुबो कर नरम की थी. टिन की थाली में वही रोटी परोस कर लालू के सामने सरका दी.

लालू वही नरम और बासी रोटी बड़े चाव से खाने लगा.

‘‘ढंग से खाओ, कपड़ों पर मत गिराना,’’ मां बोली.

‘‘क्यों डांटती हो? बच्चा ही तो है,’’ बापू लालू की तरफ से बोला.

‘‘कल ही कपड़े धोए हैं,’’ मां के मन में साबुन का हिसाबकिताब चल रहा था.

इस के बाद मां और बापू चाय का पानी पी कर काम पर चले गए.

‘‘तुम ने रोटी नहीं खाई?’’ लालू ने पूछा, ‘‘ठकुराइन के घर की रोटी बहुत अच्छी होती है.’’

‘तुम्हारे उठने से पहले ही खा ली थी बेटा,’ मां और बापू दोनों सफाई से झठ बोल गए.

मां गांव के प्रधान के घर पर झाड़ू, बरतन, सफाई करती थी और बापू उन

के खेतों में मजदूर था. इन के घर में चूल्हा जलता था, तो सिर्फ चाय बनाने के लिए, वह भी गुड़ वाली चाय. वरना जो जूठा, बचा हुआ खाना मिलता, उसी पर वे लोग अपना गुजारा कर लेते थे.

मां और बापू दोनों दिनरात मजदूरी में जुटे रहते. बापू को कभी काम मिलता, तो कभी नहीं. मां को पुराने कपड़े, सामान, बचा हुआ खाना मिलता था.

प्रधान के घर में खाना खा कर मां अपना गुजारा कर लेती और अच्छा खाना मिले भले बासी ही सही, अपने बेटे लालू के लिए बांध कर घर ले आती.     5 साल का लालू इसी साल से आंगनबाड़ी में जाने लगा था.

बापू ने उस को इस जिद से भरती करवाया था कि वे दोनों तो अनपढ़ हैं. अगर वे लिखनापढ़ना जानते, तो वे मजदूर नहीं होते. लेकिन उन का बेटा पढ़ेगा. आगे चल कर वे उसे शहर भेजेंगे. वह पढ़लिख कर बड़ा आदमी बनेगा, उस के लिए भले ही उन दोनों को सारी जिंदगी भूखे पेट क्यों न रहना पड़े.

लालू को आंगनबाड़ी भेजने की एक और भी वजह थी. सरकारी नियमों के मुताबिक वहां से कौपीकिताबें मुफ्त में मिलती थीं. साल में एक बार 2 जोड़ी कपड़े मिलते थे. अगर छुट्टी न करो, तो हर रोज दोपहर का खाना मिलता था.

देशभर में 15 अगस्त बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था. आंगनबाड़ी में भी खास समारोह होना था.

आंगनबाड़ी को झाड़ू लगा कर साफ कराया गया. फूलों की माला से झंडे का स्तंभ सजाया गया. उस के चारों ओर रंगोली से नक्काशी बनाई गई.

थोड़ी ही देर में गांव के सरपंचजी आए. उन्होंने झंडा फहराया. सभी ने राष्ट्रगान गाया. उस के बाद ‘भारत माता की जय’ का जयघोष हुआ. फिर सरपंचजी ने भाषण किया.

समारोह खत्म होने के बाद सभी बच्चों को एकएक डब्बा दिया गया, जिस में 2 समोसे, 2 लड्डू और कुछ नमकीन थी. सभी बच्चे अपनाअपना डब्बा खोल कर समोसेलड्डू पर टूट पड़े.

लालू ने भी अपना डब्बा खोला. समोसे की बहुत अच्छी खुशबू आ रही थी. लालू ने नाक के पास ले जा कर वह खुशबू सूंघी. गांव के रतन हलवाई की दुकान के आसपास ऐसी ही खुशबू फैली रहती है.

लालू ने समोसे और लड्डू को प्यार भरी नजरों से देखा, फिर एक बार सूंघा और डब्बा बंद कर दिया.

आज 15 अगस्त होने की वजह से आंगनबाड़ी में छुट्टी थी. नतीजतन, दोपहर का खाना नहीं मिलने वाला था.

सारे बच्चे लड्डूसमोसा खा कर के घर जाने लगे. कुछ बच्चों ने नमकीन अपनी निकर की जेबों में भर ली और खाली डब्बे वहीं फेंक दिए.

लालू के हाथ में अभी भी डब्बा था, भरा हुआ डब्बा. लालू बड़े ध्यान से संभाल कर डब्बा ले कर अपने घर जा रहा था.

दूर खेतों में खड़े अपने झोंपड़े में आ कर लालू ने वह डब्बा ठंडे चूल्हे के पास रख दिया. थोड़ी देर के लिए वह झोंपडे़ में इधरउधर घूमा, फिर डब्बा चूल्हे के पास से उठाया. उसे डर था कि कहीं कोई चूहा या बिल्ली इसे खा न जाए. उस ने वह डब्बा चूल्हे के ऊपर जो तवा था, उस पर रख दिया. अब वह निश्चिंत हो गया और खेलने के लिए झोंपड़े के बाहर चला गया.

वह खेल में मस्त हो गया कि तभी अचानक उसे कुछ याद आया और दौड़ कर झोंपड़े के अंदर चला आया. डब्बा तो तवे पर सहीसलामत था, मगर चींटियों की कतारें उस के अंदरबाहर आजा रही थीं. उस ने झट से डब्बा खोला. अभी ज्यादा चींटियां अंदर नहीं घुसी थीं. उस ने फूंक मारमार कर चींटियों को भगाया.

इस हड़बड़ी में उस के हाथों पर कुछ चींटियां चिपक कर मर गई थीं. लालू ने अपने कपड़ों से लड्डू पोंछ कर साफ किए. वह खुश हुआ, लड्डू सहीसलामत थे.

पर अब क्या करे? उसे एक तरकीब सूझ. उन के पास एक ही खटिया थी, जो झोंपड़े के बाहर पड़ी रहती थी, जिस पर उस का बापू सोता था. खटिया के पाए ढीले हो गए थे, डोरियां ढीली पड़ गई थीं, उन में अच्छाखासा झोल आ गया था. लालू ने उस पर वह डब्बा रख दिया. अब उसे तसल्ली हो गई कि डब्बा एकदम महफूज है.

वह फिर से खेलने लगा. घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं था. आज वह खेल में ही अपना ध्यान लगा रहा था, पर खटिया पर रखे डब्बे पर भी नजर रख रहा था कि कहीं कुत्ता मुंह न मारे.

4-5 साल का छोटा भूखा, थका हुआ बच्चा कितनी देर खाने का डब्बा संभालता? आखिरकार डब्बा गोद में लिए वह खटिया पर लुढ़क गया.

शाम ढलतेढलते मांबापू दोनों काम से वापस आ गए. मां ने लालू को जगाया. आंख मलतेमलते वह जाग गया. मांबापू ने देखा कि उस की गोद में एक डब्बा है.

मां ने पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘आज आंगनबाड़ी में हमें यह दिया गया है,’’ लालू ने डब्बा मां के हाथों में देते हुए कहा.

मां ने डब्बा खोल कर देखा. उस में 2 लड्डू, 2 समोसे और नमकीन थी.

‘‘तुम ने खाया क्यों नहीं बेटा? आज तो तुम्हें वहां खाना भी नहीं मिला होगा,’’ बापू कह रहा था. उस की आवाज में नाराजगी थी.

यह नाराजगी लालू के खाना न खाने पर थी या एक वक्त का खाना न मिलने पर थी, यह तो वही जाने.

‘‘क्यों नहीं खाया?’’ मां गुस्से से बोली. उस की आवाज में गुस्से के साथसाथ तड़प भी थी कि उस का बच्चा दिनभर का भूखा है.

मांबापू सोचने लगे, ‘इस ने खाना क्यों नहीं खाया? डब्बा गोद में लिए लेटा रहा… तबीयत तो ठीक है न इस की? क्या हो गया है इसे?’

मांबापू दोनों ने नाराजगी और तड़प भरे दिल से लालू को डांट लगाई, ‘चलो, पहले लड्डू, समोसा खा लो. खाना गोद में लिए कोई सोता है भला?’

लालू बोला, ‘‘मां, मैं ने इसे तवे पर रखा था, तो इस में चींटियां घुस गईं. पर मैं ने लड्डू को पोंछपोंछ कर साफ कर दिया. चूहा, बिल्ली, कुत्ता कोई इसे मुंह न लगाए, इसलिए गोद में ले कर दिनभर संभालता रहा, तुम दोनों के लिए.’’

थकी हुई मां के जिस्म में न जाने कहां से ताकत आ गई. वह ?ाट से उठ गई. दो कदम की दौड़ लगा कर वह अपने बच्चे के पास आ गई. उस ने लालू का चेहरा कई बार चूमा.

झोंपड़े से पीठ टिकाए बैठा बापू मांबेटे का यह प्यारदुलार देख रहा था. उस ने सिर पर बांधा हुआ कपड़ा अपने हाथों से हलके से उतार कर अपनी आंखें पोंछीं. वह अपनी जगह से उठ गया और प्यार से बेटे के पास खटिया पर जा बैठा. उस ने लालू को सीने से लगाया और उस के माथे को चूमा. उस के उन नन्हे हाथों को चूमा, जो खाना खाने के बजाय खाने की हिफाजत कर रहे थे.

लालू ने अपनी मां से वह डब्बा लिया और बड़े प्यार से उस में से एक समोसा उठाया.

‘‘एक कौर मेरी रानी मां का,’’ कहते हुए लालू ने समोसा मां को खिलाया.

मां ने समोसे का छोटा सा टुकड़ा काट लिया. वही जूठा समोसा बापू के मुंह के पास ले जा कर कहा, ‘‘एक कौर मेरे राजा बापू का.’’

बाप ने भी समोसे खा लिया.

मां के गले से सिसकी निकली. बापू का गला रुंध गया. बापू ने समोसे के साथ सिसकी निगल ली.

मांबापू को समोसा खाते देख कर लालू खिलखिला कर हंस पड़ा. मां ने बचा हुआ समोसा बड़े प्यार से अपने लालू को खिलाया.

लालू बोला, ‘‘अब मेरी मां लड्डू खाएंगी, मेरा बापू लड्डू खाएगा. फिर लालू लड्डू खाएगा.’’

तेल में बने उस लड्डू का स्वाद क्या बताएं कि असली देशी घी के लड्डू का स्वाद भी फीका पड़ जाए.

खुले आसमान के नीचे चांदनी की चादर ओढ़े, झलाती हुई खटिया पर रानी मां, राजा बापू और उन का नन्हा राजदुलारा लालू एकदूसरे को टुकड़टुकड़ा खाना खिला रहे थे. तीनों के मुंह समोसे, लड्डू से और दिल खुशी से भरे थे. Family Story In Hindi

Hindi Romantic Story: सपना – क्या पूरे हुए विकास के सपने

Hindi Romantic Story: ट्रेन धीरेधीरे प्लेटफार्म पर पहुंच रही थी. वह एसी कोच में अपने छोटे से सूटकेस के साथ गैलरी में खड़ी ट्रेन के रुकने का इंतजार कर रही थी. जैसे ही गाड़ी ठहरी, वह झटके से नीचे उतरी.

गोरा रंग, चेहरे पर बिखरी कालीकाली जुल्फें मानो कोई छोटी सी बदली चांद को ढकने की कोशिश कर रही हो.

स्टेशन से बाहर निकली तो सवारियों की तलाश में आटोरिकशा वालों की भीड़ जमा थी. शहर में अनजान सी लग रही अकेली जवान लड़की को देख कर 10-12 आटोरिकशा वालों ने उसे घेर लिया और अपनेअपने लहजे से पूछने लगे, ‘बहनजी, कहां चलोगी…’, ‘मैडम, किधर को जाना है…’

वह खामोशी से खड़ी रही. सिर्फ कहीं न जाने का गरदन हिला कर इशारा करती रही. कुछ ही देर में भीड़ छंट सी गई.

उस ने अपनी सुराहीदार गरदन को इधरउधर घुमा कर देखा. थोड़ी ही दूरी पर एक आटोरिकशा वाला एक किताब ले कर ड्राइवर सीट पर पढ़ता हुआ दिखाई दिया. वह छोटेछोटे कदमों से उस की ओर बढ़ी.

‘‘लोक सेवा आयोग चलोगे…?’’ उस ने पूछा.

‘‘जी… जी… जरूर…’’ उस ड्राइवर ने अपनी किताब बंद करते हुए जवाब दिया.

‘‘क्या लोगे… मतलब, किराया कितना लगेगा…?’’ उस ने सूटकेस आटोरिकशा में रखते हुए पूछा.

‘‘80 रुपए…’’ उस ने बताया.

वह झट से आटोरिकशा में बैठ गई और बोली, ‘‘जल्दी चलो…’’

आटोरिकशा शहर की भीड़ से बाहर निकला ही था कि ड्राइवर ने पूछा, ‘‘आरएएस का इंटरव्यू देने के लिए आई हैं शायद आप?’’

‘‘जी…’’ उस ने छोटा सा जवाब दिया, फिर अगले ही पल उस ने पूछा, ‘‘तुम्हें कैसे मालूम कि मैं इंटरव्यू देने आई हूं?’’

‘‘जी, आप पहले तो लोक सेवा आयोग जा रही हैं. दूसरे, इन दिनों इंटरव्यू चल रहे हैं… और…’’

‘‘और क्या?’’ उस ने पूछा.

वह नौजवान ड्राइवर बोला, ‘‘आप का पहनावा बता रहा है कि आप किसी बड़े पद के लिए ही इंटरव्यू देने आई हैं. काश, आज मैं भी…’’

‘‘काश, आज मैं भी… क्या तुम भी…?’’ उस ने थोड़ा हैरानी से पूछा.

‘‘जी मैडम, मैं ने भी मेन ऐग्जाम दिया था… सिर्फ 2 नंबरों से रह गया,’’ उस ने उदास मन से आटोरिकशा को लोक सेवा आयोग की तरफ घुमाते हुए कहा.

‘‘आप तो बड़े होशियार हो… मैं पहली ही नजर में पहचान गई थी कि आटोरिकशा में किताब ले कर पढ़ने वाला कोई साधारण ड्राइवर नहीं हो सकता… फिर तुम्हारा लहजा भी आम ड्राइवरों जैसा नहीं है…’’ अपने पर्स से 100 रुपए का नोट निकालते हुए उस ने कहा.

आटोरिकशा लोक सेवा आयोग के मेन गेट के सामने खड़ा था.

‘‘यह लीजिए…’’ लड़की ने पैसे देते हुए कहा.

‘‘मैडम, बैस्ट औफ लक,’’ 20 रुपए लौटाते हुए उस ड्राइवर ने कहा.

‘‘थैंक्स… तुम मैडम मत कहो मुझे… मेरा नाम सपना है. और हां… मुझे शाम को वापस स्टेशन छोड़ने के लिए आ सकते हो क्या? आनेजाने का भाड़ा दे दूंगी तुम्हें,’’ सपना ने चेहरे से बालों को हटाते हुए कहा.

‘‘ठीक है सपनाजी, आप को मैं यहीं मिल जाऊंगा. वैसे, लोग मुझे विकास कहते हैं…’’ आटोरिकशा वाले ने जवाब दिया.

‘‘ओके…’’ इतना कह कर सपना चल दी.

शाम को ठीक 5 बजे विकास अपना आटोरिकशा ले कर लोक सेवा आयोग के सामने अपनी अजनबी सवारी को लेने पहुंच गया.

कुछ लड़केलड़कियां बाहर निकल रहे थे. किसी का चेहरा उतरा हुआ था, तो किसी का फूलों की माफिक खिला हुआ था. विकास की निगाहें मेन गेट पर लगी थीं.

‘‘आ गए… तुम,’’ पीछे की तरफ से आवाज आई.

विकास एक झटके से पलटा और बोला, ‘‘आप… मैं तो कब से मेन गेट की तरफ देख रहा था…’’

‘‘अरे, मैं पीछे वाले गेट से निकल आई.’’

‘‘कैसा हुआ आप का इंटरव्यू?’’

‘‘बहुत ही बढि़या. मुझे पूरा भरोसा है कि मेरा सिलैक्शन हो जाएगा…’’ सपना ने आटोरिकशा में बैठते हुए कहा.

सपना ने अपना मोबाइल खोला और बोली, ‘‘अरे, यह क्या हुआ अब…

‘‘क्या हुआ सपनाजी?’’

‘‘जोधपुर वाली मेरी ट्रेन तकरीबन

5 घंटे लेट है…’’

विकास मुसकराते हुए बोला, ‘‘सपनाजी, चिंता मत करो. आप मेरे

घर ठहर जाना. मेरा भी घर जाने का समय हो गया… और फिर रात को मुझे  आटोरिकशा चलाने के लिए स्टेशन ही आना है.’’

‘‘अरे नहीं, आप को बेवजह तकलीफ होगी…’’

‘‘कैसी तकलीफ…? इस बहाने भविष्य के एक प्रशासनिक अधिकारी की सेवा करने का हमें भी मौका मिल जाएगा,’’ विकास ने हंसते हुए कहा.

सपना के पास अब मना करने का कोई ठोस बहाना नहीं रह गया था.

‘‘मां, देखो कौन आया है हमारी झोंपड़ी में…’’ विकास ने सपना को मिलवाते हुए कहा.

बूढ़ी मां ने पहले तो पहचानने की कोशिश की, पर अगले ही पल वह बोली, ‘‘बेटी, मैं ने तुम्हें नहीं पहचाना?’’

‘‘अरे, पहचानोगी भी नहीं… ये सपनाजी हैं…’’ विकास ने सारी कहानी बता दी.

3-4 घंटे में ही सपना विकास के परिवार से घुलमिल गई. विकास गरीब जरूर था, लेकिन होशियार बहुत था.

सपना को स्टेशन ले जाने के लिए विकास घर से बाहर आने लगा, तो सपना ने उस से कहा, ‘‘मुझ से एक

वादा करो…’’

‘‘कैसा वादा?’’ विकास एक पल के लिए ठहर सा गया.

‘‘यही कि तुम फिर से इम्तिहान

की तैयारी करोगे और तुम्हें भी

कामयाब होना है,’’ सपना ने हिम्मत देते हुए कहा.

‘‘ठीक है, मैं पूरी कोशिश करूंगा.’’

‘‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती,’’ सपना ने हंसते हुए जवाब दिया.

स्टेशन पर सपना को छोड़ने के बाद विकास में भी फिर से तैयारी करने की इच्छा जाग गई. अब वह आईईएस की तैयारियों में जीजान से जुट गया.

तकरीबन एक महीने बाद आरएएस का नतीजा आया. सपना पास ही नहीं हुई थी, बल्कि टौप 10 में आई थी.

‘‘सपनाजी… बधाई…’’ विकास ने फोन मिलाते ही कहा.

‘थैंक्स… यह सब मां की दुआओं और तुम्हारी शुभकामनाओं का नतीजा है,’ सपना ने चहकते हुए कहा.

तकरीबन 2 साल तक उन दोनों के बीच फोन पर बातचीत होती रही. सपना एसडीएम बन चुकी थी. अब विकास की जिंदगी में बहुत बड़ा दिन आया. उस का आईईएस में चयन हो गया.

‘‘हैलो विकास, मैं तुम से एक

चीज मांगूं….’’

‘‘सपना, मुझ गरीब के पास तुम्हारे लायक देने के लिए कुछ नहीं है… और अभी मेरी ट्रेनिंग भी शुरू नहीं हुई है.’’

‘‘क्या एक आईईएस किसी आरएएस लड़की से शादी कर सकता है?’’ सपना ने अजीब सा सवाल किया.

‘‘क्यों नहीं… अगर दोनों में प्यार हो तो…’’ विकास ने कहा.

‘‘तो क्या तुम मुझ से शादी करोगे?’’ सपना ने साफसाफ पूछा.

कुछ पलों के लिए विकास चुप रहा.

‘‘बोलो विकास, क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करते?’’ सपना ने धीरे से पूछा.

‘‘जी… करता हूं,’’ विकास हकलाते हुए बोला. दरअसल, विकास का दूसरा सपना भी सच हो गया. कभी उस का पहला सपना प्रशासनिक अधिकारी बनना था और दूसरा सपना था सपना को पाना. Hindi Romantic Story

Hindi Family Story: गरीब का डर – बेटी को ले कर परेशान पिता

Hindi Family Story: टैलीविजन और सोशल मीडिया पर जैसे आग लगी हुई है, जब से श्रद्धा और आफताब वाला केस चला है. 35 टुकड़े फ्रिज में रखे गए थे. एकएक कर के वह जंगल में फेंक रहा था.‘‘नराधम, राक्षस, पापी, कुत्ता, नरक में भी जगह नहीं मिलेगी, कीड़े पड़ेंगे बदन में, मर जाए नासपिटा, न जाने कैसी कोख से जन्म लिया है, मांबाप के नाम को कलंक लगा दिया है, ऐसे कपूत से तो बेऔलाद भले…’’ रामआसरे अपनी सब्जी की पोटलियां खोलतेखोलते जोरजोर से बड़बड़ा रहा था.

प्लास्टिक की छोटी बालटी में पानी भरभर कर रामआसरे की पत्नी शारदा प्लास्टिक के छोटे मग से सब्जियों पर पानी छिड़कती जा रही थी. वह जानती थी कि पिछले कई दिनों से आफताब वाले केस को ले कर रामआसरे बड़ा दुखी है. रोज बड़बड़ करता है. घर में भी बेचैन सा रहता है. रोटी भी बेमन से खाता है. वह क्या करे? उस के बस में कुछ नहीं है.

रामआसरे देश का गरीब आदमी है, जिस तक सरकार की कोई योजना का लाभ नहीं जाता है, न ही मिल पाता है. पटरियों पर सब्जी की दुकानें लगाने वाले गरीबों की सुनता कौन है? स्मार्ट सिटी बनाने में सड़कें चौड़ी करने के लिए उन को हर बार लात मार कर भगा दिया जाता है. कभी भी जगह बदल देते हैं, यहां से खाली करो वहां दूसरी जगह दुकान लगाओ.

बेचारे दरबदर होते रहते हैं सब्जी वाले. सड़कें चौड़ी करने के चक्कर में इन की पुरानी ग्राहकी टूट जाती है. बड़ी मुश्किल होती है दुकान जमने में. अब यह परेशानी कौन सुने?सुबह से शाम तक काम ही काम. 2 बच्चों का भरणपोषण, बीमार मां की सेवा… गरीब आदमी है मां को आश्रम में नहीं डालेगा. ये अमीरों के चोंचले हैं.मां चाहे बीमार हो, लेकिन मां तो मां है.

मां के भरोसे ही जवान छोरी को छोड़ कर सब्जी की दुकान में शारदा के साथ बैठ कर शांति से सब्जी बेच पाता है.दोपहर में शारदा घर चली जाती है, तो वह अपनी बेटी की चिंता भी भूल जाता है. मां और पत्नी के घर रहने से बेटी की देखभाल भी हो जाती है.

शारदा 5 बजे शाम को पैट्रोल पंप वाले साहब लोगों के घर खाना बनाने जाती है और 7 बजे वापस भी आ जाती है. बनिया परिवार है. 5 जने हैं घर में. सभी की पसंद का खाना अलगअलग बनता है. कई सारे नौकरचाकर हैं.

शाम का खाना बनाने के लिए शारदा जाती है. सुबह और दोपहर के खाने के लिए दूसरे नौकर रखे हैं. बड़े लोगों की बड़ी बातें.3,000 रुपए महीना मिलते हैं इस बनिया परिवार से. इस के अलावा उन की जवान छोरी के कपड़े भी मिल जाते हैं, जो रामआसरे की जवान छोरी कजरी के काम आ जाते हैं.

होलीदीवाली पर मिठाई का डब्बा, शारदा को नई साड़ी और 1,000 रुपए इनाम में देते हैं. 4 साल से शारदा वहां खाना बना रही है. तब कजरी 15 साल की थी. आज 19 साल की हो गई है.मां की बीमारी की दवा वगैरह भी बनिया परिवार दिला देता है.

एक बार मां ज्यादा बीमार पड़ी थी. साहब ने पहचान के डाक्टर को फोन लगा कर जांच करने को कहा था. इतना अच्छा घर कैसे छोड़े? कितनी मदद मिल जाती है. गरीब आदमी का जीवन चल जाता है.उस दिन तो रामआसरे ने हद कर दी.

जैसे ही टीवी पर श्रद्धा और आफताब की खबर देखी, तो कजरी को डांटने लगा, ‘‘बता तेरा कोई लफड़ावफड़ा तो नहीं है किसी के साथ?’’कजरी डर गई थी बाप का गुस्सा  देख कर. रामआसरे के 2 घर छोड़ कर शकील चाचा का घर था. वहां भी जाना बंद करवा दिया था. शकील चाचा के घर में 2 जवान छोरी और एक जवान छोरा था.

शकील चाचा की पत्नी सायरा और रामआसरे के परिवार के अच्छे संबंध थे. आनाजाना था. बेड़ा गर्क हो आफताब का, जिस ने देश की हवा में जहर घोल दिया था.रामआसरे ने शाम को चाय की टपरी पर बैठना भी बंद कर दिया था शकील चाचा से बचने के लिए. शकील चाचा और रामआसरे के बच्चे साथसाथ खेलकूद कर जवान हुए थे.

रामआसरे को शकील चाचा के घर का जर्दा पुलाव और बिरयानी पसंद थी. जब शकील चाचा के घर से जर्दा पुलाव आता था, तो पूरा घर खुश हो कर खाता था. ऐसे ही होलीदीवाली की गुझिया की खुशबू शकील चाचा को पसंद थी. पूरा परिवार गुझिया पसंद करता था, पर कीड़े पड़ें आफताब को, जिस ने देश का माहौल खराब कर दिया.

रामआसरे ने घर में सख्त मना कर दिया था कि शकील चाचा की दुकान से कोई सामान नहीं आए. शकील चाचा की किराने की छोटी सी दुकान थी. जवान छोरे असलम को किसी गाड़ी के शोरूम में लगवा दिया था. वह सुबह 10 बजे चला जाता था और रात में 9 बजे तक घर आता था. 2 जवान छोरियों के साथ कजरी की दोस्ती थी. वह घर आतीजाती थी.

आफताब और श्रद्धा केस के बाद वह भी बंद करवा दिया था. एक अजीब सी दहशत थी रामआसरे के भीतर, जो गुस्से में कभी भी फट पड़ती थी.रामआसरे के मना करने के बाद भी परिवार के बच्चों में दोस्ती थी. क्या प्यार और इनसानियत के रिश्ते कभी टूट सकते हैं? लेकिन वे रामआसरे की भावनाओं का ध्यान रखते हुए उस के सामने नहीं मिलते थे.

शकील चाचा के छोरे असलम ने महल्ले में आए एक नए परिवार को भी दावत पर बुला लिया था. परिवार क्या था, बस मां और बेटे थे. बेटे का नाम शिवम था. पिता की कुछ साल पहले सड़क हादसे में मौत हो गई थी.उसी दावत में शिवम ने पहली बार कजरी को देखा तो देखता ही रह गया था. कजरी की सादगी उस के मन को भा गई थी.

असलम की बहनों के साथ कजरी कभी किसी काम से बाजार जाती थी, वहीं 1-2 बार उस की शिवम से ‘हायहैलो’ हो गई थी. इस से ज्यादा कुछ नहीं.शिवम सोच रहा था कि बात शुरू कैसे करे? उस ने सोचा कि वह असलम से बात करेगा, इसलिए उस ने असलम को मोबाइल पर अपनी बात बताई.

असलम बोला, ‘‘कुछ सोचते हैं. रामआसरे अंकल के सामने तो मिलने से रहे…’’अचानक असलम को आइडिया सूझा. उस ने शिवम को कहा, ‘‘तू एक काम कर कि रामआसरे अंकल की दुकान से सब्जी खरीदना शुरू कर दे. इस बहाने वे तुझे देखेंगे, फिर धीरेधीरे बात शुरू करना.’’

‘‘उस से क्या होगा?’’ शिवम ने पूछा.‘‘अरे यार, उन से बात तो शुरू हो जाएगी. कभीकभी कजरी खाना देने आती है, उसे देख भी लेना और मौका मिले तो बात भी कर लेना,’’ असलम ने कहा.‘‘यह आइडिया सही है,’’ शिवम खुश हुआ.उसी दिन शिवम सब्जी लेने पहुंच गया.

जानबूझ कर ज्यादा ही सब्जी खरीदी. सब्जी की तारीफ भी की.रामआसरे खुश हो गया और बोला, ‘‘बाबू साहब, सब्जी मंडी से ले कर आता हूं… ताजी हैं.’’शिवम ऐसे ही हर दूसरे दिन कुछ न कुछ सामान रामआसरे की दुकान पर लेने पहुंच जाता. आज शिवम लंच टाइम में गया, तो खुशी के मारे उछल पड़ा. वहां कजरी थी.‘‘कजरी तुम… बापू कहां गए हैं?’’

शिवम को देखते ही कजरी भी खुश हो गई. वह बोली, ‘‘बापू बैंक गए हैं. आप सब्जी लेने आए हो?’’‘‘सब्जी तो ठीक है… आज बड़े दिनों बाद मौका मिला है तुम से बात करने का. कहीं बाहर मिलो न, ढेर सारी बातें करनी हैं… अपना मोबाइल नंबर दो,’’ शिवम बोला.

‘‘मोबाइल नहीं है मेरे पास…’’ कजरी बोली, ‘‘पहले था, पर अब बापू टैंशन में रहते हैं मोबाइल और सोशल मीडिया को ले कर, इसलिए नहीं रखने देते.’’

‘‘ओह, फिर मुलाकात कैसे हो…’’ शिवम बोला.‘‘असलम से बात करना तुम, शायद वह कोई रास्ता बताए,’’ कजरी बोली.‘‘हां, यह ठीक रहेगा,’’

शिवम बोला और वह सब्जी खरीद कर वापस चला गया.रात को ही शिवम ने असलम को फोन पर आज की मुलाकात के बारे में बताया, फिर कजरी से बाहर मिलने के लिए मदद भी मांगी.

असलम बोला, ‘‘सोचता हूं कुछ.’’दूसरे दिन असलम ह्वाट्सएप ग्रुप पर मैसेज देख रहा था. ‘हैप्पी सावन’ के मैसेजों की भरमार थी.

अचानक उसे एक बात ध्यान आई कि 2 दिन बाद ही पीछे खाली मैदान में सावन का मेला लगता है, झूले और तमाम खानेपीने के स्टौल. कजरी को झूला झूलने का शौक है. वहीं मिलवा देगा उन दोनों को.2 दिन बाद हलकीहलकी फुहारें पड़ रही थीं.

कजरी शाहिदा और शमीम के साथ झूला झूलने वालों की कतार में खड़ी थी.सामने वाली चाय की टपरी में शिवम असलम के साथ चाय पी रहा था.

2 झूले खाली हुए ही थे. शाहिदा और शमीम आगे बढ़ी झूले में बैठने के लिए. कजरी भी बैठने की जिद करने लगी कि इतने में शिवम ने पीछे से उस के कंधे पर हाथ रख दिया.कजरी एकदम पलटी और बोली, ‘‘शिवम तुम…’’‘‘हां कजरी, चलो हम दोनों भुट्टा खाते हैं.’’

‘‘कजरी, तुम जाओ और शिवम से बात कर लो,’’ तभी असलम भी आ गया.कजरी शिवम के साथ भुट्टे के ठेले के पास चली गई.‘‘गरम भुट्टे का स्वाद नीबू और नमक के साथ बड़ा ही अच्छा लगता है… क्यों शिवम?’’‘‘बिलकुल कजरी,’’

शिवम बोला, ‘‘उतना ही नमकीन, जितना हमारा प्यार.’’

‘‘प्यार और नमकीन…?’’ कजरी हंसने लगी.

‘‘हां कजरी, जिंदगी में नमक से कभी दूर नहीं हो सकते. तुम मेरी जिंदगी का नमक हो.’

’‘‘अच्छा,’’ यह सुन कर कजरी हंस पड़ी.वे दोनों मेले में घूमते रहे और ढेर सारी बातों के बीच वक्त कब उड़ गया, पता ही नहीं चला.तभी असलम भी अपनी बहनों के साथ आ गया. उन के हाथों में भी भुट्टे थे.‘‘चलें शिवम?’’ असलम ने पूछा.‘‘ठीक है,’’

शिवम बोला.कजरी भी खुश थी इस मुलाकात से.‘‘शिवम, बापू से बात कब करोगे?’’‘‘जल्दी ही कुछ सोचते हैं,’’ शिवम बोला.असलम ने भी उन की हां में हां मिलाई.इस बात के कुछ दिन बाद असलम सुबहसुबह ही रामआसरे के घर पहुंच गया. रामआसरे घर के बाहर झाड़ू लगा रहा था. असलम जानता था कि वह सुबह घर के बरामदे की झाड़ू खुद ही लगाता है,

फिर पानी से छिड़काव करता है, तो मिट्टी की एक सौंधी सी खुशबू फैल जाती है.असलम को देखते ही रामआसरे का मूड खराब हो गया, ‘‘कहां सुबहसुबह आ टपका यह…’’‘‘नमस्ते अंकलजी,’’ असलम ने कहा.‘‘क्या हुआ? क्यों आए हो यहां?’’

रामआसरे पूछ बैठा.‘‘आप से बात करनी है, इसलिए चला आया. सुबह आप मिल जाओगे, नहीं तो सारा दिन आप को टाइम नहीं मिलेगा.’’‘‘कौन सी बात करनी है तुम्हें?’’ रामआसरे बोला.‘‘शादी की…’’ असलम इतना ही बोला था कि रामआसरे गुस्से में चिल्ला उठा, ‘‘अरी ओ शारदा, आ जा… जल्दी से देख तेरी बेटी के लक्षण…’’शारदा आवाज सुन कर दौड़ी चली आई, ‘‘क्या हुआ सुबहसुबह?’’

पर सामने असलम को देखा तो चुप हो गई.‘‘यह देखो शादी की बात करने आया है,’’ रामआसरे बोला.‘‘किस की शादी?’’ शारदा ने पूछा.‘‘कजरी की.’’असलम शांत था.‘‘अब भी बोलेगी कि तेरी लड़की कजरी ने कोई गुल नहीं खिलाया…’’ रामआसरे चिल्लाया.

‘‘अरे, पूरी बात तो सुनो कि यह क्या बोल रहा है…’’ शारदा ने कहा.‘‘अब बचा क्या है सुनने को… मैं तो बरबाद हो गया,’’ रामआसरे बोला.‘‘शांत रहो और पहले असलम की बात सुनो,’’ शारदा बोली.‘‘आंटीजी, एक लड़का है, जो कजरी से शादी करना चाहता है,’’

असलम ने अपनी बात पूरी की.‘मतलब, असलम खुद की शादी की बात नहीं करने आया…’ रामआसरे ने सोचा, फिर बोला, ‘‘तुम खुद की शादी की बात नहीं करने आए थे?’’‘‘मैं कब बोला आप को कि अपनी शादी की बात कर रहा हूं…’’‘‘अच्छाअच्छा… फिर?’’

रामआसरे उत्सुक हो गया.‘‘एक लड़का है शिवम, जो कजरी से शादी करना चाहता है. कजरी भी उसे जानती है,’’ असलम बोला.‘‘मतलब, इश्क वाला मामला है और तू बिचौलिया है. हद हो गई और हमें पता ही नहीं,’’ रामआसरे फिर गुस्साया.‘‘चुप रहो तुम…’’

शारदा बोली, ‘‘असलम, तुम आगे बोलो.’’‘‘आंटीजी, शायद आप उसे जानती होंगी…’’ असलम ने कहा.‘‘मैं कैसे जानूंगी?’’ शारदा हैरानी से बोली.‘‘मांबेटी दोनों एक…’’ रामआसरे बोला.‘‘अंकलजी, वे जो पैट्रोल पंप वाले साहब हैं न… शिवम, उन के पैट्रोल पंप पर काम करता है.’’

‘‘अच्छा… उस का कोई फोटो है?’’ शारदा बोली.‘‘हां आंटीजी,’’ कहते हुए असलम ने मोबाइल में फोटो दिखाया.शारदा ने जैसे ही फोटो देखा तो वह खुशी से चिल्ला पड़ी, ‘‘यह शिवम है…’’‘‘तू जानती है इसे?’’ रामआसरे ने बोलते हुए फोटो पर ध्यान से नजर दौड़ाई.

‘‘हां, कई बार देखा है. बंगले पर काम से आताजाता है. बड़ी पूजा में भी देखा था. नाम नहीं जानती थी,’’ शारदा के चेहरे से खुशी छलक पड़ रही थी.‘‘कजरी… ओ कजरी…’’ शारदा ने आवाज लगाई, पर कजरी कब से दरवाजे पर खड़ी थी और उन की बातें सुन रही थी.

‘‘कजरी, तू इस लड़के को जानती है?’’ रामआसरे ने पूछा.‘‘हां बापू, जानती हूं,’’ कजरी ने जवाब दिया.‘‘तू इसे पसंद करती है?’’ शारदा बोली.‘‘हां मां…’’ कहते हुए कजरी ने मां की पीठ में सिर छिपा लिया.रामआसरे खुश हो गया, फिर वह असलम से बोला,

‘‘बेटा, बाप हूं न… डर जाता हूं कि कहीं कुछ गलत न हो जाए…’’‘‘अंकलजी, कोई बात नहीं. माहौल ही ऐसा है.’’शारदा बोली, ‘‘साहब, लोगों के लिए मिठाई ले कर जाऊंगी आज.’’‘‘हम दोनों साथ चलेंगे,’’ रामआसरे बोला.‘‘और मेरी मिठाई अंकलजी?’’

असलम बोला.‘‘तेरी कोई मिठाई नहीं. मिठाई का डब्बा ले कर आ रहा हूं तेरे घर. शकील से बोलना कि जर्दा पुलाव खाए बहुत दिन हो गए हैं,’’ कह कर रामआसरे हंसने लगा. Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: यादों के सहारे – प्यार की अनोखी दास्तां

Hindi Romantic Story: ‘‘ तुम ने यह क्या फैसला कर लिया जेबा?’’ कार रोकते हुए प्रेम ने जेबा से पूछा.

‘‘इस के अलावा मैं और कर भी क्या सकती थी. मैं ने कोई गलत फैसला तो नहीं किया न?’’ प्रेम के करीब ही पार्क की नरम घास पर बैठते हुए जेबा ने जवाब दिया.

‘‘देखो जेबा, सवाल गलत और सही का नहीं, तुम्हारी जिंदगी का है.’’

‘‘तो फिर मैं क्या करूं?’’

‘‘हम इस शहर के बाहर चल कर कहीं शादी कर लेंगे.’’

‘‘हम चाहे कहीं भी जाएं, यह जालिम दुनिया वाले तो वहां होंगे ही. वैसे भी मेरे मांबाप चाहे जैसे भी हों, मैं उन के साथ धोखा नहीं कर सकती. मैं तुम्हारी यादों के सहारे जिंदगी गुजार दूंगी. किसी और मर्द से तो शादी कर ही नहीं सकती हूं, क्योंकि यह उस के साथ नाइंसाफी होगी. हां, तुम्हें पूरी इजाजत है, तुम जिस लड़की को पसंद करो, उस से शादी कर लेना.’’

‘‘तुम ने मुझे इतना नीच समझ लिया है जेबा…’’ दुखभरे शब्दों में प्रेम बोला, ‘‘तुम अगर अपने मांबाप के भरोसे को नहीं तोड़ सकती, तो मैं भी तुम्हारी तरह हमेशा कुंआरा ही रहूंगा. लेकिन मेरी एक इल्तिजा है. मुझ से कभी दूर मत होना, हमेशा मिलती रहना.’’

तब तक सूरज डूब चुका था. वे दोनों वहां से उठ गए. हमेशा हंसतीबोलती रहने वाली जेबा भी चुप थी रास्तेभर.

जेबा रहमान सांवले रंग, बड़ीबड़ी आंखों और खूबसूरत देह की धनी थी. वह अपने मांबाप की लाड़ली बेटी थी. उस से बड़ा एक भाई और था. उस के पिता यूनिवर्सिटी के जानेमाने प्रोफैसर थे.

जेबा और प्रेम ने एक ही स्कूल से मैट्रिक किया था. दोनों पढ़ाई में बहुत होशियार थे. मैट्रिक के बाद दोनों अलगअलग कालेजों में भरती हुए थे. जेबा ने आर्ट्स चुना था और प्रेम ने साइंस. दोनों एकदूसरे को बहुत चाहते थे.

बीए के बाद जेबा के मांबाप उस से शादी की जिद करने लगे. जेबा ने प्रेम का नाम लिया तो उन लोगों ने हिंदू लड़के का नाम सुनते ही कयामत खड़ी कर दी और उस की शादी प्रेम से करने से साफ इनकार कर दिया.

मांबाप ने जेबा के लिए उस की सहेली रूबीना के भाई यूसुफ को पसंद किया था, जो डाक्टर था और जेबा को चाहता भी था. लेकिन जेबा ने इस शादी से इनकार कर दिया और अपनी मां से कहा, ‘‘मैं शादी करूंगी तो सिर्फ प्रेम से, वरना जिंदगीभर कुंआरी रहूंगी.’’

उस के मांबाप ने उसे बहुत समझाया, मगर वह नहीं मानी. उस ने एमए में दाखिला ले लिया.

समय बीतता गया. प्रेम इंजीनियर बन चुका था और जेबा लैक्चरर. लेकिन वे अब भी मिलते और एकदूसरे का दुख बांटते रहे.

एक बार जेबा ने प्रेम से कहा था, ‘‘मैं चाहती हूं, मेरा दम तुम्हारी ही बांहों में निकले.’’

तब प्रेम ने भी कहा था, ‘‘मैं भी तुम्हारे साथ अपनी जान दे दूंगा. तुम्हारे बगैर मैं जिंदा नहीं रह सकता.’’

प्रेम का तबादला दूसरे शहर में हो गया. फिर भी वह हर महीने आता और जेबा से मिलता था.

एक बार जब वह आने वाला था. जेबा के किसी रिश्तेदार की शादी थी, जहां वह अपने मांबाप और भाईभाभी के साथ गई थी. जेबा को मालूम था कि आज प्रेम आने वाला है, इसलिए वह सिर्फ दावत में शामिल हो कर तबीयत खराब होने का बहाना बना कर कार से आ रही थी.

जेबा प्रेम के खयालों में खोई हुई थी. कार पूरी रफ्तार से चल रही थी और सामने आते हुए ट्रक से टकरा गई. जेबा के होशोहवास गुम हो गए. वह बेहोश हो चुकी थी.

इधर प्रेम जेबा के घर पर उस का इंतजार कर रहा था. वहां सिर्फ नौकर ही था, तभी फोन की घंटी बज उठी. उस ने लपक कर रिसीवर उठा लिया.

दूसरी तरफ से आवाज आई कि जेबा का कार चलाते हुए एक्सिडैंट हो गया है. वह सदर अस्पताल में भरती

है. उस के सिर और बाएं पैर में बहुत चोट आई है और खून भी बहुत निकल चुका है.

जेबा के पर्स से विजिटिंग कार्ड मिला था. उसी से उस के फोन नंबर का पता चला था, जिस पर बचाने वाले ने फोन किया था. सारी बात नौकर को बता कर प्रेम अस्पताल की ओर लपका.

जेबा अब तक बेहोश थी. डाक्टर ने प्रेम से कहा, ‘‘2 बोतल खून की सख्त जरूरत है. एक बोतल का इंतजाम तो अस्पताल में हो जाएगा, एक बोतल का आप करें. इन का ग्रुप ओ नैगेटिव है.

इस ग्रुप का खून बहुत मुश्किल से मिलता है.’’

‘‘ओ नैगेटिव, मैं भी तो इसी ग्रुप का हूं, आप मेरा खून ले लें डाक्टर, लेकिन जेबा को बचा लें.’’

तब तक जेबा के मांबाप और रिश्तेदार भी आ गए. वे लोग एक अजनबी को खून देते देख हैरान थे. उस का भाई प्रेम की तरफ सवालिया नजरों से देखने लगा.

प्रेम ने उसे एक तरफ ले जा कर कहा, ‘‘कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन के कोई नाम नहीं होते, लेकिन ये बेनाम रिश्ते और रिश्तों से ज्यादा मजबूत होते हैं. मेरा भी जेबा से ऐसा ही रिश्ता है.’’

तभी जेबा को होश आ गया. उस ने आंखें खोल कर सब को देखा. उस की नजर प्रेम पर कुछ देर टिकी और उस ने आंखें बंद कर लीं.

सुबहशाम अस्पताल आना और जेबा को देखना प्रेम का रोजाना का काम हो गया था. जेबा की हालत में कुछ सुधार हो रहा था, लेकिन उस के पैर को डाक्टरों को काटना पड़ा था.

एक शाम जब प्रेम जेबा को देखने अस्पताल गया, तो अंदर से कुछ बातें करने की आवाजें आ रही थीं. वह दरवाजे पर ही रुक गया. अंदर जेबा और उस की सहेली रूबीना थी.

रूबीना कह रही थी, ‘‘जेबा, तुम कब तक यों ही यादों के सहारे अकेली जिंदगी बिता सकती हो?’’

‘‘नहीं रूबी, तुम नहीं जानतीं कि जिन के पास बीती हुई यादों के सहारे होते हैं, उन्हें किसी और सहारे की जरूरत नहीं होती.’’

‘‘जेबा, मेरी बात मानो, तुम शादी कर लो. यूसुफ अब भी तुम से शादी करने को तैयार है. अब तो तुम अपाहिज भी हो चुकी हो. तुम अकेली कैसे रहोगी?’’

जेबा को एक धक्का सा लगा. उस की सहेली रूबीना आज उसे अपाहिज कह रही है और ऐसी बातें कर रही है, जिन से उसे नफरत है. वह तड़प उठी.

प्रेम अंदर चला आया. उस ने जेबा को चमेली के फूलों का एक गुलदस्ता दिया. वह बैठ कर चूमने लगी. उस ने प्रेम को जी भर कर देखा. अचानक

उस की आंखें पथरा गईं और वह लुढ़कने लगी. प्रेम ने झट से जेबा को सहारा दिया.

जेबा ने थर्राई आवाज में कहा, ‘‘प्रेम मुझे भ… भूल जाना… और ज… जो लड़की… पसंद आए… उस… से शादी… कर लेना.’’

प्रेम की आंखों से आंसू ढलक कर जेबा की मांग पर गिर गए. उस की सूनी मांग पर आज उस के प्रियतम के आंसू चमक रहे थे.

जेबा ने अपने प्रियतम की बांहों में दम तोड़ दिया. उस की और किसी इच्छा को समाज ने पूरा नहीं होने दिया, पर यह इच्छा तो पूरी हो गई.

रूबीना चुपचाप खड़ी सब देख रही थी कि तभी प्रेम की गरदन भी एक ओर लुढ़क गई. Hindi Romantic Story

Hindi Family Story: सिरमौर – एक दलित की पुकार

Hindi Family Story: ‘‘अरे भगेलुआ, कहां हो? जरा झोंपड़ी से बाहर तो निकलो. देखो, तुम्हारे दरवाजे पर बाबू सूबेदार सिंह खड़े हैं. तुम्हारी मेहरी इस पंचायत की मुखिया क्या बन गई है, तुम लोगों के मिलने और बात करने का सलीका ही बदल गया है,’’ लहलादपुर ग्राम पंचायत के मुखिया रह चुके बाबू सूबेदार सिंह के साथ खड़े उन के मुंशी सुरेंद्र लाल ने दलित मुखिया रमरतिया देवी के पति भगेलुआ को हड़काया.

मुंशी सुरेंद्र लाल की आवाज सुन कर भगेलुआ अपनी झोंपड़ी से बाहर निकला. सामने बाबू सूबेदार सिंह को खड़ा देख कर वह अचानक हकबका गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि उन का किस तरह से स्वागत करे, लेकिन दूसरे ही पल उस का मन नफरत से भर उठा.

जब पेट में लगी भूख की आग को शांत करने के लिए भगेलुआ बाबू सूबेदार सिंह के यहां काम मांगने जाता था, तो घंटों खड़े रहने के बाद उन से मुलाकात होती थी.

काम मिल जाता था, तो कई दिनों तक बेगारी करनी पड़ती थी. तब कहीं जा कर उसे मजदूरी मिलती थी.

कभीकभी माली तंगी की वजह से वह बाबू सूबेदार सिंह से कर्ज भी लेता था. कर्ज के लिए बाबू साहब से कहीं ज्यादा उसे मुंशी सुरेंद्र लाल की तेल मालिश करनी पड़ती थी.

10 रुपए सैकड़ा के हिसाब से सूद व सलामी काट कर मुंशी महज 80 रुपए उस के हाथ में देता था.

अपनी ओर भगेलुआ को टुकुरटुकुर ताकते देख कर बाबू सूबेदार सिंह ने उसे टोका, ‘‘इतनी जल्दी अपने बाबू साहब को भुला दिया क्या? अब तो पहचानने में भी देर कर रहा है.’’

‘‘मालिक, हम आप को कैसे भुला सकते हैं? आप ही तो हमारे पुरखों के अन्नदाता हैं. इस दलित के दरवाजे पर आने की तकलीफ क्यों की. भगेलुआ की जरूरत थी, तो किसी से खबर भिजवा दी होती, हम आप की हवेली पर पहुंच जाते.

‘‘हमारे लिए तो आप ही मुखिया हैं. लेकिन पता नहीं ससुरी इस सरकार को क्या सू?ा कि इस पंचायत को हरिजन महिला कोटे में डाल दिया.

‘‘और गजब तो तब हुआ, जब यहां की जनता की चाहत ने रमरतिया को मुखिया बना दिया,’’ भगेलुआ के मन में जो आया, वह एक ही सांस में बक गया.

‘‘जमाना बदल गया है भगेलुआ,’’ बाबू सूबेदार सिंह ने लंबी सांस खींचते हुए कहा.

‘‘जमाना बदल गया तो क्या हुआ मालिक, हम तो नहीं बदले हैं. हम तो आज भी आप के हरवाहे हैं. लेकिन ट्रैक्टर आ जाने से हमारे जैसे लोगों की रोजीरोटी छिन गई है.

‘‘खैर, जाने दीजिए. यह बताइए कि इतने दिनों बाद भगेलुआ की याद कैसे आ गई?’’

‘‘इधर से गुजर रहा था तो सोचा कि तुम से थोड़ा मिलता चलूं,’’ बाबू सूबेदार सिंह ने मन को मारते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं मालिक, यह तो आप ही का घर है. हम तो आज भी खुद को आप की प्रजा सम?ाते हैं. अगर कोई भूलचूक हो गई हो, तो माफ करना,’’ दोनों हाथ जोड़ कर भगेलुआ ने बाबू सूबेदार सिंह से कहा और दूसरे ही पल अपनी पत्नी रमरतिया को आवाज लगाई, ‘‘कहां हो रमरतिया, जल्दी ?ोंपड़ी से बाहर निकलो. आज हमारे दरवाजे पर बाबू सूबेदार साहब आए हैं.’’

‘‘आ रही हूं,’’ झोंपड़ी से निकलती रमरतिया की नजर जैसे ही सामने खड़े मुंशी सुरेंद्र लाल व बाबू सूबेदार सिंह पर पड़ी, उस ने अपना पल्ला माथे से थोड़ा सा नीचे सरका लिया और बोल पड़ी, ‘‘पांव लागूं महाराज. आइए, कुरसी पर बैठ जाइए.’’

झोंपड़ी के सामने रखी कुरसी झड़पोंछ कर रमरतिया भीतर चली गई.

जब रमरतिया को मुखिया का पद मिला था, तभी वह बाबू साहब से मुखिया का चार्ज लेने के लिए गई थी. ठीक 2 साल के बाद उस की यह उन से दूसरी मुलाकात थी.

वैसे तो रमरतिया और पूरे दलित तबके का बाबू साहब की हवेली से पुराना संबंध था. कहीं काम मिले न मिले, वहां तो कुछ न कुछ काम मिल ही जाता था. लेकिन रमरतिया के मुखिया बनने के बाद अब कहीं दूसरे के यहां काम करने की नौबत ही नहीं आई.

पंचायत की योजनाओं से ही उसे फुरसत नहीं मिलती थी. कोई न कोई समस्या ले कर उस को घेरे रहता था. लाल कार्ड, पीला कार्ड, जाति, आय, आवासीय प्रमाणपत्र, बुढ़ापा पैंशन, विधवा पेंशन, पारिवारिक कामों के अलावा मनरेगा के काम भी रमरतिया को ही देखने पड़ते थे.

वहीं जब बाबू सूबेदार सिंह मुखिया थे, तब दलितों, पिछड़ों को सीधे उन से मिल लेने की हिम्मत नहीं होती थी. वे उन के दरवाजे पर घंटों खड़े रहते थे. जब कोई बिचौलिया आता, तो उन का काम करवाता, नहीं तो वे कईकई दिनों तक सिर्फ चक्कर लगाया करते थे.

लेकिन रमरतिया के मुखिया बनते ही पंचायत की सभी जातियों का मानसम्मान बराबर हो गया था. सब का काम बिना मुश्किल के होता था.

रमरतिया जिला परिषद की बैठक में भी जाती, तो वहां सीधे कलक्टर साहब, ब्लौक प्रमुख, बीडीओ से अपनी पंचायत की समस्याओं पर बात करती. इंदिरा आवास, आंगनबाड़ी, पोषाहार, स्कूलों के मिड डे मील वगैरह के मामलों में वह अफसरों का ध्यान खींचती थी. जबकि बाबू साहब के समय में पता ही नहीं चलता था कि गांव वालों के लिए कौनकौन सी योजनाएं आई हैं.

मुखिया, पंचायत सेवक, प्रखंड विकास पदाधिकारी की मिलीभगत से सभी योजनाएं कागजों में सिमट कर रह जाती थीं.

योजनाओं की रकम अफसर डकार जाते थे. पूरे जिले के सभी महकमों में काफी भ्रष्टाचार था. दबंगों के डर से लोग डरेसहमे रहते थे. अगर कोई शिकायत करता भी था, तो दबंगों की शह पर बिचौलिए ही उस की जम कर पिटाई कर देते थे.

ऐसी बात नहीं थी कि रमरतिया के मुखिया बन जाने के बाद से भ्रष्टाचार खत्म हो गया था. फर्क यही था कि योजनाएं अब अमल में लाई जा रही थीं. घूस लेने के बाद बाबू व अफसर लोगों का काम करते थे. यही वजह थी कि हर गांव में नया प्राइमरी स्कूल, उपस्वास्थ्य केंद्र, राशन की दुकान, आंगनबाड़ी केंद्र वगैरह खुल गए थे.

औरतों और किसानों को माली तौर पर मजबूत बनाने के लिए स्वयं सहायता समूह भी बनाए गए थे. मछली पालन, बकरी पालन, सूअर पालन, भेड़ पालन, मुरगी पालन, डेरी फार्म वगैरह खुल गए थे.

इन सब कामों को करने का सेहरा मुखिया रमरतिया के सिर पर बंधता था. जब रमरतिया को सूचना मिलती थी कि फलां गांव के किसी किसान की हालत अच्छी नहीं है. वह माली तंगी और बीमारी से जू?ा रहा है, तो वह तुरंत सारे काम छोड़ कर वहां पहुंच कर उस की समस्या दूर करती थी.

बाबू सूबेदार सिंह और मुंशी सुरेंद्र लाल को कुरसी पर बैठे हुए कुछ ही समय बीता होगा कि रमरतिया से मिलने के लिए गांव वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी.

?ोंपड़ी के आगे एक मेजकुरसी लगी हुई थी, जहां रमरतिया की 14 साला बेटी भगजोगनी कुरसी पर बैठी हुई थी. वह गांव वालों की अर्जी को ले कर सहेजती हुई मेज के ऊपर रखती जाती. वह मैट्रिक के इम्तिहान देने के बाद खाली समय में अपनी मां के कामों में हाथ बंटाती थी. भगजोगनी से एक साल छोटा भाई दीपू 9वीं जमात में पढ़ता था.

इसी बीच रमरतिया एक थाली में बिसकुट और चाय से भरे 2 गिलास ले कर बाबू साहब के सामने आई. साथ ही, उस ने थाली को बाबू साहब के सामने रखी मेज पर रख दिया.

थाली देखते ही वे दोनों एकसाथ यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि बिना नहाए वे एक दाना भी मुंह में डालना हराम सम?ाते हैं. उन के पीछेपीछे भगेलुआ भी कुछ दूर तक छोड़ने के लिए गया.

रमरतिया की बढ़ती लोकप्रियता से बाबू सूबेदार सिंह की छाती पर सांप लोट रहा था. उस की ?ोंपड़ी के सामने उमड़ी गांव वालों की भीड़ ने उन का चैन छीन लिया था.

गांवों में बोरिंग करने पर सरकार ने रोक लगा दी थी, ताकि धरती के नीचे पानी का लैवल और नीचे न जा सके. तब रमरतिया ने गांव के पास से गुजरने वाली गंडक नहर में सरकारी मोटर पंप का इंतजाम करवाया. पंप से ले कर खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए नालियां बनवाईं. साथ ही, ऊंचे उठे हुए खेतों में सिंचाई का पानी पहुंचाने के लिए हजारों मीटर लंबे प्लास्टिक, कपड़े वगैरह के पाइप का जुगाड़ करवाया.

इतना ही नहीं, गंडक नहर से खेतों की नालियों को जोड़ा गया. सिंचाई की अच्छी व्यवस्था होने से लहलादपुर ग्राम पंचायत की फसलें लहलहा उठीं.

प्रखंड स्तरीय बैठक में बीडीओ और मुखिया प्रमुख ने रमरतिया की इस कोशिश की जोरदार ढंग से तारीफ की. दूसरी पंचायतों में भी यह सुविधा बहाल की गई, ताकि सभी किसान खुशहाल हो सकें.

रमरतिया धीरेधीरे इतनी लोकप्रिय हो गई कि गांवों में होने वाले शादीब्याह में उसे लोग बुलाना नहीं भूलते थे. बाबू सूबेदार सिंह जिस समारोह में पहुंचते, वहां पहले से बैठी हुई रमरतिया मिल जाती. उस की मौजूदगी से उन्हें ऐसा लगता कि जैसे उन के सामने दुम हिलाने वाले लोग आज खुद सिरमौर बन गए हैं.

राज्य सरकार ने मुखिया के जरीए सभी पंचायतों में टीचरों की बहाली का ऐलान किया था. इस ऐलान के बाद से गांवों के बेरोजगारों में नौकरी के लिए होड़ मच गई थी.

सभी के परिवार वाले पंचायत के मुखिया से अपनेअपने बेटेबेटी की नौकरी लगाने की सिफारिश में जुट गए थे. बाबू सूबेदार सिंह भी इसी सिलसिले में भगेलुआ के यहां पहुंचे थे, लेकिन भीड़ को देख कर वे कुछ बोल नहीं सके थे.

अब पीछेपीछे चल रहे भगेलुआ से उन्होंने कहा, ‘‘सुना है कि मेरी हवेली के पीछे वाले स्कूल में टीचर की बहाली है. मैं अपने बेटे प्रीतम सिंह को वहां रखवाना चाहता हूं.’’

भगेलुआ के चेहरे का रंग उड़ गया. वह कुछ बोल नहीं सका, क्योंकि उस स्कूल के लिए 25 बेरोजगारों की अर्जी पहले ही पड़ चुकी थी. ऊपर से बाबू साहब अपने लड़के को अलग से थोप रहे थे.

भगेलुआ को गुमसुम देख कर बाबू साहब ने उसे टोका, ‘‘रंग क्यों उड़ गया भगेलुआ? कुछ तो बोलो?’’

‘‘नहीं मालिक, रंग क्यों उड़ेगा. इस के बारे में रमरतिया से पूछना होगा.’’

‘‘अरे, रमरतिया तेरी पत्नी है. तेरी बात नहीं मानेगी, तो फिर किस की

बात मानेगी. एक लाख रुपए ले लो और चुपचाप प्रीतम सिंह की बहाली करा दो. कोई कानोंकान इस बात को नहीं जान सकेगा,’’ सूबेदार सिंह ने रुपए की गरमी का एहसास भगेलुआ को कराना चाहा.

‘‘नहीं… नहीं… आप से हम रुपयापैसा नहीं लेंगे.’’

‘‘तो ठीक है, तुम ही बताओ कि क्या लोगे? उसे हम पूरा करेंगे. बेटे की जिंदगी का सवाल है. आजकल ढूंढ़ने से भगवान तो मिल जाएंगे, पर सरकारी नौकरी नहीं.’’

‘‘मालिक, अगर कुछ देना ही है, तो तार गाछ वाली जमीन दे दीजिए. वह हमारे पुरखों की जमीन है. आप की मेहरबानी हो, तो उस जमीन पर हम घर बनाएंगे,’’ भगेलुआ ने हिम्मत जुटा कर अपने मन की बात रख दी.

‘‘क्या बात करते हो भगेलुआ, वह बैनामा जमीन है, वह भी बिलकुल मेन रोड के किनारे. उस की कीमत आज के भाव से 10 लाख रुपए से ज्यादा है. मैं उसे कैसे दे सकता हूं.

‘‘उस जमीन को मैं ने तेरे बाप से 3 हजार रुपए में खरीदा था. तुम इस तरह की सौदेबाजी पर उतर आओगे, मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था.

‘‘मैं तो रमरतिया की ईमानदारी का किस्सा सुन कर आ गया था. लेकिन यहां आने पर हकीकत कुछ और ही दिखाई पड़ रही है. भोलीभाली जनता का हक मार कर तुम लोग जल्दी अमीर बनने की जुगत में हो. इस की शिकायत मैं डीसी साहब से करूंगा. तुम लोगों का कच्चा चिट्ठा खोल के रख दूंगा,’’ बाबू सूबेदार सिंह गुस्से में फट पड़े.

‘‘नाराज हो गए मालिक. सच तो आखिर सच ही होता है. थोड़ी देर पहले आप ही ने तो कहा था कि जमाना बदल गया है. इस का मतलब हुआ कि पहले से शोषित, पीडि़त जनता अब जागरूक हो गई है. उसे अपने हक की जानकारी हो गई है.

‘‘आज की जनता किसी तरह का ठोस कदम उठाने से पहले सोचती है. मेरे बाप ने अपना परिवार पालने के लिए खानदानी जमीन को बेच दिया था. आप ने बैनामा सिर्फ मेरे बाप से कराया है, जबकि वे 4 भाई हैं. 3 छोटे भाइयों से बैनामा कराना अभी बाकी है.

‘‘उस खेत पर उन का भी हक है. आप किसी वकील से पूछ सकते हैं कि दादा के मरने के बाद उन के 4 बेटों का हिस्सा उस जमीन में होगा या नहीं…’’

‘‘चुप रहो भगेलुआ, बहुत हो गया…’’ बाबू सूबेदार सिंह के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई, तो गुस्से

में वे बोल पड़े, ‘‘मेरी जमीन पर तेरे चाचा लोग दावा ठोंकेंगे. एकएक को देख लूंगा.

‘‘चाहे दीवानी लड़ो या फौजदारी, जीत सिर्फ मेरी होगी, मेरी. तुम्हारा यह छल और बल बाबू सूबेदार सिंह के सामने चलने वाला नहीं है.’’

‘‘छल और बल. हमारे पास कहां से आ गया मालिक. यह हथियार तो आप की हवेली का है. दलितों, पीडि़तों को तो इंसाफ पर भरोसा है. हम अपने हक के लिए लड़ना जानते हैं. नाइंसाफी और जोरजुल्म जब छप्पर पर चढ़ कर बोलने लगता है, तो हम गरीबों का एकमात्र लाठी इंकलाब बनता है.

‘‘इस भरम में नहीं रहना कि जीत केवल हवेली की होगी. जो ?ाक कर चलना जानते हैं, वे सिर उठा कर दूसरों का सिर कलम करना भी जानते हैं…

यह हम ने आप जैसों से ही सीखा है,’’ भगेलुआ बोला.

‘‘चलिए मुंशीजी, चलिए. भगेलुआ पगला गया है…’’ हाथी के पैर के नीचे कुचले हुए सांप की तरह रेंगते हुए बाबू सूबेदार सिंह वहां से भागे.

भगेलुआ के चेहरे पर कुटिल मुसकान तैर गई थी. जिंदगी के जंगेमैदान में हमेशा मुंह की खाने वाला भगेलुआ आज जीत जो गया था. Hindi Family Story

Hindi Story: सही राह – कालू की दादागीरी

Hindi Story: मोहल्ले के लोग कालू उस्ताद के नाम से कांपते थे. कालू का जब मन होता था, वह किसी की दुकान से कुछ भी उठा लेता था. दुकानदारों के मन में डर था. कौन जाए कालू उस्ताद से भिड़ने, कहीं कुछ चला दे तो जान चुकानी पड़ेगी. इसलिए कोई उस का विरोध नहीं करता था.

लेकिन ऐसा कितने दिनों तक चलता. एक दिन कालू एक सब्जी वाले से जबरदस्ती पैसे हड़प रहा था. सब्जी वाला आनाकानी कर रहा था. इस से कालू चिढ़ गया और उस की पिटाई करने लगा.

‘‘मुझ से उलझता है. ठहर, तुझे अभी ठीक करता हूं,’’ कह कर वह उस पर पिल पड़ा.

मगर, तभी किसी के मजबूत हाथों ने उसे रोक लिया.

कालू ने मुड़ कर देखा, सामने मेजर अंकल थे. उन्होंने पूछा, ‘‘क्यों पीट रहे हो बेचारे को?’’

मेजर अंकल हालांकि उम्र में 50 से ज्यादा ही थे, लेकिन अब भी वे काफी ताकतवर थे. उन की आवाज में रोब था.

कालू के हाथ थम गए. वह वहां से जाने को हुआ. मेजर अंकल बोलने लगे, ‘‘कमजोरों को मारने में कोई महानता नहीं है. हिम्मत है, तो देश के दुश्मनों से लड़ो…’’

आसपास के लोगों का जमाव बढ़ने लगा. सभी को हैरानी हो रही थी कि आखिर मेजर अंकल क्यों कालू जैसे खतरनाक आदमी से उलझ गए. कालू उस समय तो आंखें तरेरते हुए वहां से चला गया. लोगों ने मेजर अंकल को समझाया कि वे सावधान रहें, कहीं कालू उन से बदला लेने न आ जाए.

उस रात कालू ठीक से सो न पाया. रहरह कर उस के कानों में मेजर अंकल के शब्द गूंज रहे थे. वह सुबह ही उठा और उन के घर की ओर चल पड़ा.

मेजर अंकल उस समय बगीचे की सफाई कर रहे थे. उन को इस शहर में आए अभी महीनाभर ही हुआ था. वे अकेले ही रहते थे.

पहले तो वे कालू को देख कर चौंके, फिर सामान्य हो कर पूछा, ‘‘क्या मुझे मारने आए हो?’’

कालू बुत बना खड़ा रहा. नजरें नीचे करते हुए वह बोला, ‘‘नहीं, कुछ बातें करनी हैं.’’

कालू को खुद हैरानी हो रही थी कि वह मेजर अंकल के सामने बदल कैसे गया. दोनों में बातचीत होने लगी.

‘‘घर के लोग कहां रहते हैं?’’

कालू के इस सवाल को सुनते ही मेजर अंकल फफक पड़े. वे बोले कि उन का बेटा सीमा पर हुई गोलाबारी में शहीद हो गया और सालभर पहले एक कार हादसे में घर के बाकी सदस्य मारे गए. पर उन्हें अपने बेटे की मौत पर कभी अफसोस नहीं हुआ, बल्कि उस पर गर्व है.

मेजर अंकल ने जब उसे फौजियों के बारे में बताया, तो कालू की जिज्ञासा बढ़ गई. उस ने मेजर अंकल से पूछा, ‘‘क्या मैं भी फौज में भरती हो सकता हूं?

‘‘हांहां, तुम बहादुर तो हो ही. दुश्मनों से लड़ने के लिए तुम जैसों की ही जरूरत है,’’ मेजर अंकल बोले.

कालू का सपना जल्द ही पूरा हो गया. सेना में उस का चयन हो गया.

उस की ट्रेनिंग कई जगहों पर हुई और सभी में उस का प्रदर्शन अच्छा रहा. पहले तो वह मेजर अंकल को हर हफ्ते चिट्ठी लिखता था, लेकिन बाद में यह सिलसिला भी खत्म हो गया. सालभर से वह अपने महल्ले में नहीं आया था.

सीमा पर घुसपैठियों के अचानक हमले से देश पर मुसीबत आ पड़ी. ऐसे में कई जांबाज फौजियों का चयन हुआ, जो कि घुसपैठियों को मार गिराएं. उन में कालू को भी शामिल किया गया.

सीमा पर खराब मौसम के चलते भारतीय जवानों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था, पर उन के हौसले बुलंद थे. कालू के दल ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर एक चौकी पर अपना कब्जा जमा लिया. पर रात के अंधेरे में दुश्मनों ने उन पर फिर हमला किया.

उस के बाद से इस दल के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. टीवी, रेडियो, समाचारपत्रों वगैरह में अकसर कालू और उस के साथियों की तसवीरें छपतीं कि ये लोग लापता हो गए हैं और शायद दुश्मनों की गिरफ्त में हैं.

महल्ले वालों ने जब कालू की तसवीरें देखीं, तो वे उसे पहचान गए.

‘‘अरे, ये तो अपना कालू है,’’ उस का पुराना दोस्त असलम बोला.

‘‘हां, पता नहीं बेचारा किस हाल में होगा?’’ बूढ़ी दादी सिर पर हाथ रखते हुए बोलीं. मेजर अंकल भी कालू के लिए परेशान थे.

जब हफ्तेभर तक उन लोगों की कोई खबर नहीं मिली, तो उन्हें मरा मान लिया गया. महल्ले वालों को बहुत दुख हुआ.

10वें दिन एक पहाड़ी चौकी पर एक फौजी बेहोशी की हालत में पाया गया. भारतीय जवान उसे पहचान गए, वह कालू ही था. उसे तुरंत अस्पताल भेजा गया.

कालू जैसे ही होश में आया, उस ने अफसरों को बताया कि वह इतने दिनों तक दुश्मनों की गिरफ्त में रहा. उस के अन्य साथी तो बच नहीं पाए, पर वह कैसे भी कर, उन के कब्जे से बच निकला और यहां तक आ गया.

कालू ने दुश्मनों के हमले की कई जानकारियां भी दीं. इस से भारतीय सेना सतर्क हो गई और उन्होंने घुसपैठियों की साजिश को नाकाम कर दिया.

कालू के जिंदा होने की सूचना अगले दिन अखबारों, टीवी में छा गई. कालू के चलते ही सेना ने कई खास ठिकानों पर फिर से अपना कब्जा कर लिया.

कालू जब पूरी तरह से ठीक हुआ, तो वह अपने महल्ले में सब से मिलने आया. पूरा महल्ला फूलमाला लिए उस के स्वागत को तैयार था.

पर कालू की नजरें मेजर अंकल को खोज रही थीं. जब वे उस से मिलने आए, तो वह उन के पैरों पर गिर पड़ा. वह बोला, ‘‘अगर उस दिन आप ने मुझे सही राह न दिखाई होती, तो अब तक मैं भटकता ही रहता. अब मैं अपने साथियों को भी देशसेवा के लिए प्रेरित करूंगा.’’ मेजर अंकल की आंखें नम हो गईं. उन्होंने उसे गले से लगा लिया. Hindi Story

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