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Hindi Family Story: मैं झूठ नहीं बोलती – सच बोलने वाली हिम्मती

Hindi Family Story: जब से होश संभाला, यही शिक्षा मिली कि सदैव सच बोलो. हमारी बुद्धि में यह बात स्थायी रूप से बैठ जाए इसलिए मास्टरजी अकसर ही  उस बालक की कहानी सुनाते, जो हर रोज झूठमूठ का भेडि़या आया भेडि़या आया चिल्ला कर मजमा लगा लेता और एक दिन जब सचमुच भेडि़या आ गया तो अकेला खड़ा रह गया.

मां डराने के लिए ‘झूठ बोले कौआ काटे’ की लोकोक्ति का सहारा लेतीं और उपदेशक लोग हर उपदेश के अंत में नारा लगवाते ‘सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला.’ भेडि़ये से तो खैर मुझे भी बहुत डर लगता है बाकी दोनों स्थितियां भी अप्रिय और भयावह थीं. विकल्प एक ही बचा था कि झूठ बोला ही न जाए.

बचपन बीता. थोड़ी व्यावहारिकता आने लगी तो मां और मास्टरजी की नसीहतें धुंधलाने लगीं. दुनिया जहान का सामना करना पड़ा तो महसूस हुआ कि आज के युग में सत्य बोलना कितना कठिन काम है और समझदार बनने लगे हम. आप ही बताओ मेरी कोई सहकर्मी एकदम आधुनिक डे्रस पहन कर आफिस आ गई है, जो न तो उस के डीलडौल के अनुरूप है न ही व्यक्तित्व के. मन तो मेरा जोर मार रहा है यह कहने को कि ‘कितनी फूहड़ लग रही हो तुम.’ चुप भी नहीं रह सकती क्योंकि सामने खड़ी वह मुसकरा कर पूछे जा रही है, ‘‘कैसी लग रही हूं मैं?’’

‘अब कहो, सच बोल दूं क्या?’

विडंबना ही तो है कि सभ्यता के साथसाथ झूठ बोलने की जरूरत बढ़ती ही गई है. जब हम शिष्टाचार की बात करते हैं तो अनेक बार आवश्यक हो जाता है कि मन की बात छिपाई जाए. आप चाह कर भी सत्य नहीं बोलते. बोल ही नहीं पाते यही शिष्टता का तकाजा है.

आप किसी के घर आमंत्रित हैं. गृहिणी ने प्रेम से आप के लिए पकवान बनाए हैं. केक खा कर आप ने सोचा शायद मीठी रोटी बनाई है. बस, शेप फर्क कर दी है और लड्डू ऐसे कि हथौड़े की जरूरत. खाना मुश्किल लग रहा है पर आप खा रहे हैं और खाते हुए मुसकरा भी रहे हैं. जब गृहिणी मनुहार से दोबारा परोसना चाहती है तो आप सीधे ही झूठ पर उतर आते हैं.

‘‘बहुत स्वादिष्ठ बना है सबकुछ, पर पेट खराब होने के कारण अधिक नहीं खा पा रहे हैं.’’

मतलब यह कि वह झूठ भी सच मान लिया जाए, जो किसी का दिल तोड़ने से बचा ले.

‘शारीरिक भाषा झूठ नहीं बोलती,’ ऐसा हमारे मनोवैज्ञानिक कहते हैं. मुख से चाहे आप झूठ बोल भी रहे हों आप की आवाज, हावभाव सत्य उजागर कर ही देते हैं. समझाने के लिए वह यों उदाहरण देते हैं, ‘बच्चे जब झूठ बोलते हैं तो अपना एक हाथ मुख पर धर लेते हैं. बड़े होने पर पूरा हाथ नहीं तो एक उंगली मुख या नाक पर रखने लगते हैं अथवा अपना हाथ एक बार मुंह पर फिरा अवश्य लेते हैं,’ ऐसा सोचते हैं ये मनोवैज्ञानिक लोग. पर आखिर अभिनय भी तो कोई चीज है और हमारे फिल्मी कलाकार इसी अभिनय के बल पर न सिर्फ चिकनीचुपड़ी खाते हैं हजारों दिलों पर राज भी करते हैं.

वैसे एक अंदर की बात बताऊं तो यह बात भी झूठ ही है, क्योंकि अपनी जीरो फिगर बनाए रखने के चक्कर में प्राय: ही तो भूखे पेट रहते हैं बेचारे. बड़ा सत्य तो यह है कि सभ्य होने के साथसाथ हम सब थोड़ाबहुत अभिनय सीख ही गए हैं. कुछ लोग तो इस कला में माहिर होते हैं, वे इतनी कुशलता से झूठ बोल जाते हैं कि बड़ेबड़े धोखा खा जाएं. मतलब यह कि आप जितने कुशल अभिनेता होंगे, आप का झूठ चलने की उतनी अच्छी संभावना है और यदि आप को अभिनय करना नहीं आता तो एक सरल उपाय है. अगली बार जब झूठ बोलने की जरूरत पड़े तो अपने एक हाथ को गोदी में रख दूसरे हाथ से कस कर पकड़े रखिए आप का झूठ चल जाएगा.

हमारे राजनेता तो अभिनेताओं से भी अधिक पारंगत हैं झूठ बोलने का अभिनय करने में. जब वह किसी विपदाग्रस्त की हमदर्दी में घडि़याली आंसू बहा रहे होते हैं, सहायता का वचन दे रहे होते हैं तो दरअसल, वह मन ही मन यह हिसाब लगा रहे होते हैं कि इस में मेरा कितना मुनाफा होगा. वोटों की गिनती में और सहायता कोश में से भी. इन नेताओं से हम अदना जन तो क्या अपने को अभिनय सम्राट मानने वाले फिल्मी कलाकार भी बहुत कुछ सीख सकते हैं.

विशेषज्ञों ने एक राज की बात और भी बताई है. वह कहते हैं कि सौंदर्य आकर्षित तो करता ही है, सुंदर लोगों का झूठ भी आसानी से चल जाता है. अर्थात सुंदर होने का यह अतिरिक्त लाभ है. मतलब यह भी हुआ कि यदि आप सुंदर हैं, अभिनय कुशल हैं तो धड़ल्ले से झूठ बोलते रहिए कोई नहीं पकड़ पाएगा. अफसोस सुंदर होना न होना अपने वश की बात नहीं.

गांधीजी के 3 बंदर याद हैं. गलत बोलना, सुनना और देखना नहीं है. अत: अपने हाथों से आंख, कान और मुंह ढके रहते थे पर समय के साथ इन के अर्थ बदल गए हैं. आज का दर्शन यह कहता है कि आप के आसपास कितना जुल्म होता रहे, बलात्कार हो रहा हो अथवा चोट खाया कोई मरने की अवस्था में सड़क पर पड़ा हो, आप अपने आंख, कान बंद रख मस्त रहिए और अपनी राह चलिए. किसी असहाय पर होते अत्याचार को देख आप को अपना मुंह खोलने की जरूरत नहीं.

ऐसा भी नहीं है कि झूठ बोलने की अनिवार्यता सिर्फ हमें ही पड़ती हो. अमेरिका जैसे सुखीसंपन्न देश के लोगों को भी जीने के लिए कम झूठ नहीं बोलना पड़ता. रोजमर्रा की परेशानियों से बचे होने के कारण उन के पास हर फालतू विषय पर रिसर्च करने का समय और साधन हैं. जेम्स पैटरसन ने 2 हजार अमेरिकियों का सर्वे किया तो 91 प्रतिशत लोगों ने झूठ बोलना स्वीकार किया.

फील्डमैन की रिसर्च बताती है कि 62 प्रतिशत व्यक्ति 10 मिनट के भीतर 2 या 3 बार झूठ बोल जाते हैं. उन की खोज यह भी बताती है कि पुरुषों के बजाय स्त्रियां झूठ बोलने में अधिक माहिर होती हैं जबकि पुरुषों का छोटा सा झूठ भी जल्दी पकड़ा जाता है. स्त्रियां लंबाचौड़ा झूठ बहुत सफलता से बोल जाती हैं. हमारे नेता लोग गौर करें और अधिक से अधिक स्त्रियों को अपनी पार्टी में शामिल करें. इस में उन्हीं का लाभ है.

बिना किसी रिसर्च एवं सर्वे के हम जानते हैं कि झूठ 3 तरह का होता है. पहला झूठ वह जो किसी मजबूरीवश बोला जाए. आप की भतीजी का विवाह है और भाई बीमार रहते हैं. अत: सारा बंदोबस्त आप को ही करना है. आप को 15 दिन की छुट्टी तो चाहिए ही. पर जानते हैं कि आप का तंगदिल बौस हर्गिज इतनी छुट्टी नहीं देगा. चाह कर भी आप उसे सत्य नहीं बताते और कोई व्यथाकथा सुना कर छुट्टी मंजूर करवाते हैं.

दूसरा झूठ वह होता है, जो किसी लाभवश बोला जाए. बीच सड़क पर कोई आप को अपने बच्चे के बीमार होने और दवा के भी पैसे न होने की दर्दभरी पर एकदम झूठी दास्तान सुना कर पैसे ऐंठ ले जाता है. साधारण भिखारी को आप रुपयाअठन्नी दे कर चलता करते हैं पर ऐसे भिखारी को आप 100-100 के बड़े नोट पकड़ा देते हैं. यह और बात है कि आप के आगे बढ़ते ही वह दूसरे व्यक्ति को वही दास्तान सुनाने लगता है और शाम तक यों वह छोटामोटा खजाना जमा कर लेता है.

कुछ लोग आदतन भी झूठ बोलते हैं और यही होते हैं झूठ बोलने में माहिर तीसरे किस्म के लोग. इस में न कोई उन की मजबूरी होती है न लाभ. एक हमारी आंटी हैं, उन की बातों का हर वाक्य ‘रब झूठ न बुलवाए’ से शुरू होता है पर पिछले 40 साल में मैं ने तो उन्हें कभी सच बोलते नहीं सुना. सामान्य बच्चों को जैसे शिक्षा दी जाती है कि झूठ बोलना पाप है शायद उन्हें घुट्टी में यही पिलाया गया था कि ‘बच्चे सच कभी मत बोलना.’  बाल सफेद होने को आए वह अभी तक अपने उसी उसूल पर टिकी हुई हैं. रब झूठ न बुलवाए, इस में उन की न तो कोई मजबूरी होती है न ही लाभ.

सदैव सत्य ही बोलूंगा जैसा प्रण ले कर धर्मसंकट में भी पड़ा जा सकता है. एक बार हुआ यों कि एक मशहूर अपराधी की मौत हो गई और परंपरा है कि मृतक की तारीफ में दो शब्द बोले जाएं. यह तो कह नहीं सकते कि चलो, अच्छा हुआ जान छूटी. यहां समस्या और भी घनी थी. उस गांव का ऐसा नियम था कि बिना यह परंपरा निभाए दाह संस्कार नहीं हो सकता. पर कोई आगे बढ़ कर मृतक की तारीफ में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं. अंत में एक वृद्ध सज्जन ने स्थिति संभाली.

‘‘अपने भाई की तुलना में यह व्यक्ति देवता था,’’ उस ने कहा, ‘‘सच भी था. भाई के नाम तो कत्ल और बलात्कार के कई मुकदमे दर्ज थे. अपने भाई से कई गुना बढ़ कर. अब उस की मृत्यु पर क्या कहेंगे यह वृद्ध सज्जन. यह उन की समस्या है पर कभीकभी झूठ को सच की तरह पेश करने के लिए उसे कई घुमावदार गलियों से ले जाना पड़ता है यह हम ने उन से सीखा.

मुश्किल यह है कि हम ने अपने बच्चों को नैतिक पाठ तो पढ़ा दिए पर वैसा माहौल नहीं दे पाए. आज के घोर अनैतिक युग में यदि वे सत्य वचन की ही ठान लेंगे तो जीवन भर संघर्ष ही करते रह जाएंगे. फिल्म ‘सत्यकाम’ देखी थी आप ने? वह भी अब बीते कल की बात लगती है. हमारे नैतिक मूल्य तब से घटे ही हैं सुधरे नहीं. आज के झूठ और भ्रष्टाचार के युग में नैतिक उपदेशों की कितनी प्रासंगिकता है ऐसे में क्या हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना छोड़ दें. संस्कार सब दफन कर डालें? प्रश्न कड़वा जरूर है पर पूछना आवश्यक. बच्चों को वह शिक्षा दें, जो व्यावहारिक हो जिस का निर्वाह किया जा सके. उस से बड़ी शर्त यह कि जिस का हम स्वयं पालन करते हों.

सब से बड़ा झूठ तो यही कहना, सोचना है कि हम झूठ बोलते नहीं. कभी हम शिष्टाचारवश झूठ बोलते हैं तो कभी समाज में बने रहने के लिए. कभी मातहत से काम करवाने के लिए झूठ बोलते हैं तो कभी बौस से छुट्टी मांगने के लिए. सामने वाले का दिल न दुखे इस कारण झूठ का सहारा लेना पड़ता है तो कभी सजा अथवा शर्मिंदगी से बचने के लिए. कभी टैक्स बचाने के लिए, कभी किरायाभाड़ा कम करने के लिए. चमचागीरी तो पूरी ही झूठ पर टिकी है. मतलब कभी हित साधन और कभी मजबूरी से. तो फिर हम सत्य कब बोलते हैं?

शीर्षक तो मैं ने रखा था कि ‘मैं झूठ नहीं बोलती’ पर लगता है गलत हो गया. इस लेख का शीर्षक तो होना चाहिए था,  ‘मैं कभी सत्य नहीं बोलती.’

क्या कहते हैं आप? Hindi Family Story

Hindi Kahani: ठगनी – लड़कों को हुस्न के जाल में फंसाने वाली लड़की

Hindi Kahani: घर के बगीचे में बैठा मैं अपने मोबाइल फोन के बटनों पर उंगलियां फेर रहा था. चलचित्र की तरह एकएक कर नंबरों समेत नाम आते और ऊपर की ओर सरकते जाते. उन में से एक नाम पर मेरी उंगली ठहर गई. वह नंबर परेश का था. मेरा पुराना जिगरी दोस्त. आज से तकरीबन 10 साल पहले आदर्श कालोनी में परेश अपने मातापिता व भाईबहनों के साथ किराए के मकान में रहता था. ठीक उस से सटा हुआ मेरा घर था.

हम लोग एकसाथ परिवार की तरह रहते थे. फिर मेरी शादी हो गई. अचानक पिता की मौत के बाद मैं अपने आदर्श नगर वाला मकान छोड़ कर पिताजी द्वारा दूसरी जगह खरीदे हुए मकान में रहने चला गया.

कुछ दिनों के बाद मैं एक दिन परेश से मिला था, तो मेरे घर वालों का हालचाल जानने के बाद उस ने बताया था कि वे लोग भी आदर्श नगर वाला किराए का मकान छोड़ कर किसी दूसरी जगह रहने लगे हैं.

काम ज्यादा होने के चलते फिर हम लोगों की मुलाकातें बंद हो गईं. हमें मिले कई साल गुजर गए. बचपन की वे पुरानी बातें याद आने लगीं. हालचाल पूछने के लिए सोचा कि फोन लगाता हूं. फोन का बटन उस नंबर पर दबते ही घंटी बजनी शुरू हो गई.

मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा कि चलो, फोन तो लग गया, क्योंकि इन दिनों क्या बूढ़े, क्या जवान, सभी में एक फैशन सा हो गया है सिम कार्ड बदल देने का. आज कुछ नंबर रहता है, तो कल कुछ.

थोड़ी देर बाद ही उधर से किसी औरत की आवाज सुनाई दी, ‘हैलो… कौन बोल रहा है? देखिए, यहां लाउडस्पीकर बज रहा है. कुछ भी ठीक से सुनाई नहीं पड़ रहा है.’

मैं ने अंदाजा लगाया, शायद परेश की भी शादी हो गई है. हो न हो, यह उसी की पत्नी है.

मैं फोन पर जरा ऊंची आवाज में बोला, ‘‘हैलो, मैं मयंक बोल रहा हूं… हैलो… सुनाई दे रहा है न… परेश ने मुझे यह नंबर दिया था. यह उसी का ही नंबर है न… मुझे उसी से बात करनी है. वह मेरे बचपन का दोस्त है. आदर्श नगर में हम लोग एकसाथ रहते थे.’’

उधर से फिर आवाज आई, ‘देखिए, कुछ सुनाई नहीं दे रहा है, आप…’

मैं ने फोन काट दिया. मैं हैरान सा था. पक्का करने के लिए दोबारा फोन लगाया कि सही में वह औरत परेश की पत्नी ही है या कोई और, मगर साफ आवाज न मिल पाने के चलते दिक्कत हो रही थी. वैसे, यह नंबर खुद परेश ने मुझे एक बार दिया था. जब वह बाजार में मिला था. यह औरत यकीनन उस की पत्नी ही होगी. आवाज से ऐसा लग रहा था, जैसे वह मेरा परिचय जानने की कोशिश कर रही थी.

रात के 8 बजे मैं खापी कर कुछ लिखनेपढ़ने के खयाल से बैठ ही रहा था कि मेरे मोबाइल फोन पर एक फोन आया. किसी मर्द की आवाज थी, जिसे मैं पहचान नहीं पा रहा था. फोन पर उस ने मेरा नाम पूछा. मैं ने जैसे ही अपना नाम बताया, तो वह तपाक से बोल पड़ा, ‘हैलो, मयंक भैया. आप का फोन था? सवेरे आप ने ही फोन किया था?’

मैं ने कहा, ‘‘हां.’’

उधर से फिर आवाज आई, ‘अरे भैया, मैं परेश बोल रहा हूं. देखिए न, मैं जैसे ही घर आया, तो मेरी पत्नी ने बताया कि किसी मयंक का फोन आया था. मैं ने सोचा कि कौन हो सकता है? यही सोचतेसोचते फोन लगा दिया.

‘और भैया, कैसे हैं? आप तो आते ही नहीं हैं. आइए, घर पर और अपनी भाभी से भी मिल लीजिएगा. बहुत मजा आएगा मिल कर.’

‘‘सचमुच…’’

‘एक बार आ कर तो देखिए.’

मैं ने कहा कि जरूर आऊंगा और फोन कट गया. बहुत दिनों से छूटी दोस्ती अचानक उफान मारने लगी. बहुत सारी बातें थीं, जो फोन पर नहीं हो सकती थीं. बचपन के वे दिन जब हम परेश के भाईबहनों के साथ उस के घर में बैठ कर खेलते थे. उस की मां मुझे बहुत मानती थीं. मैं उन्हें ‘काकी’ कहता था.

एक बार वे बहुत बीमार पड़ गई थीं. मैं अपने मामा की शादी में गांव चला गया था. वहां से महीनों बाद आया, तो पता चला कि काकी अस्पताल में भरती थीं. उन्हें आईसीयू में रखा गया था. वे किसी को पहचान नहीं पा रही थीं. आईसीयू से निकलते वक्त मैं उन के सामने खड़ा था. जब सिस्टर ने पूछा कि आप इन्हें पहचानते हैं, तो उन्होंने तपाक से मेरा नाम बता दिया था. उन के परिवार में खुशियां छा गई थीं.

बचपन के वे दिन चलचित्र की तरह याद आ रहे थे. मैं परेश और उस के परिवार से मिलना चाहता था, खासकर परेश की पत्नी से. वह दिखने में कैसी होगी? मिलने पर खूब बातें करेंगे.

एक दिन सचमुच मैं ने उस के घर जाने का मन बना लिया. घर के पास पहुंच कर मैं ने फोन लगाया. फोन उस की पत्नी ने उठाया था. इस बार आवाज दोनों तरफ से साफ आ रही थी. उस की आवाज मेरे कानों में पड़ते ही मेरी सांसें जोरजोर से चलने लगीं. शरीर हलका होने लगा. आवाज कांपने और हकलाने लगी. पानी गटकने की जरूरत महसूस होने लगी.

मैं ने फोन पर अपनेआप को ठीक करते हुए कहा, ‘‘हैलो, मैं मयंक…’’

उधर से परेश की पत्नी की आवाज आई, ‘अरे आप, हांहां पहचान गई, कहिए, कैसे हैं?’

मेरे मुंह से आवाज निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी. किसी तरह गले को थूक से थोड़ा गीला किया और कहा, ‘‘हां, मैं मयंक. इधर ही आया था एक दोस्त के घर. सोचा, आया हूं तो मिलता चलूं. आप को भी देखना है कि कैसी लगती हैं?’’ मैं ने एक ही सांस में अपनी इच्छा जाहिर कर दी.

उस ने तुरंत कहा, ‘हांहां, आप ठीक जगह पर हैं. मैदान के बगल में सड़क है, जो नदी तक जाती है. उसी पर आगे बढि़एगा. सामने एक मकान दिखेगा, उस में एक नारियल का पेड़ है. याद रखिएगा. आइए.’ ऐसा लग रहा था, जैसे मैं हवा में उड़ता जा रहा हूं और उड़ते हुए उस का घर खोज रहा हूं, जिस में एक नारियल का पेड़ है. जल्द ही घर मिल गया.

मैं ने घर के सामने पहुंच कर दरवाजा खटखटाया. एक खूबसूरत औरत बाहर निकली. मेरा स्वागत करते हुए वह मुझे घर के अंदर ले गई.

थोड़ी औपचारिकता के बाद मैं ने इधरउधर गरदन हिलाई और पूछा, ‘‘परेश कहीं दिख नहीं रहा है… और काकी?’’

‘‘परेश आता ही होगा, काकी गांव गई हैं,’’ यह कहते हुए वह मेरे बगल में ही थोड़ा सट कर बैठ गई. इतना करीब कि हम दोनों की जांघें उस के जरा से हिलने से सटने लगी थीं. मैं रोमांचित होने लगा. यहां आने से थोड़ी देर पहले मैं उसे ले कर जो सोच रहा था, वह सब हकीकत लगने लगा था. मैं उस से हंसहंस कर बातें कर रहा था कि इतने में दरवाजे पर दस्तक हुई.

मैं जलभुन गया कि अचानक यह कबाब में हड्डी बनने कहां से आ गया.

दरवाजा खुलते ही सामने एक अजनबी आदमी दिखा. चेहरे से दिखने में खुरदरा, उस के तेवर अच्छे नहीं लग रहे थे. मैं ने परेश की पत्नी की तरफ देखते हुए उस आदमी के बारे में पूछा, तो उस ने सपाट सा जवाब दिया, ‘‘यही तो है परेश,’’ और उस की एक कुटिल हंसी हवा में तैर गई.

मैं सकपका गया. यह परेश तो नहीं है. क्या मैं किसी अजनबी औरत के पास…

अभी मन ही मन सोच ही रहा था कि वह आदमी मेरे सामने आ गया और कमर से एक देशी कट्टा निकाल कर उस से खेलने लगा. फिर मुझे धमकाते हुए बोला, ‘‘तुम्हारी हर हरकत मेरे मोबाइल फोन में कैद हो गई है. अब तुम्हारी भलाई इसी में है कि बदनामी से पिंड छुड़ाना चाहते हो, तो तुम्हें 50 हजार रुपए देने होंगे.

‘‘तुम्हें कल तक के लिए मुहलत दी जाती है, वरना परसों ये तसवीरें तुम्हारे घर के आसपास बांट दी जाएंगी.’’

मुझे काटो तो खून नहीं. मैं ने हिम्मत कर के कहा, ‘‘मगर, यह तो परेश का घर है और यह उस की पत्नी है.’’ वे दोनों एकसाथ हंस पड़े. उस आदमी ने कहा, ‘‘गलत नंबर पर पड़ गए बरखुरदार. होगा तुम्हारे किसी दोस्त का नंबर, लेकिन अब यह नंबर मेरे पास है. यह मेरी पार्टनर लीना है और हम दोनों का यही धंधा है.’’

वह औरत जो अब तक मुझ से सट कर बैठी थी, मुझ से छिटक कर उस के बगल में जा खड़ी हुई. वह मुझे धमकाते हुए बोली, ‘‘किसी से कहना नहीं, चल फटाफट निकल यहां से और जल्दी से पैसों का इंतजाम कर.’’

मैं सहमा सा उस खूबसूरत ठगनी का मुंह देखता रह गया. Hindi Kahani

Best Hindi Kahani: आखिर कब तक – धर्म के नाम पर दो प्रेमियों की बलि

Best Hindi Kahani: राम रहमानपुर गांव सालों से गंगाजमुनी तहजीब की एक मिसाल था. इस गांव में हिंदुओं और मुसलिमों की आबादी तकरीबन बराबर थी. मंदिरमसजिद आसपास थे. होलीदीवाली, दशहरा और ईदबकरीद सब मिलजुल कर मनाते थे. रामरहमानपुर गांव में 2 जमींदारों की हवेलियां आमनेसामने थीं. दोनों जमींदारों की हैसियत बराबर थी और आसपास के गांव में बड़ी इज्जत थी.

दोनों परिवारों में कई पीढ़ियों से अच्छे संबंध बने हुए थे. त्योहारों में एकदसूरे के यहां आनाजाना, सुखदुख में हमेशा बराबर की साझेदारी रहती थी. ब्रजनंदनलाल की एकलौती बेटी थी, जिस का नाम पुष्पा था. जैसा उस का नाम था, वैसे ही उस के गुण थे. जो भी उसे देखता, देखता ही रह जाता था. उस की उम्र नादान थी. रस्सी कूदना, पिट्ठू खेलना उस के शौक थे. गांव के बड़े झूले पर ऊंचीऊंची पेंगे लेने के लिए वह मशहूर थी.

शौकत अली के एकलौते बेटे का नाम जावेद था. लड़कों की खूबसूरती की वह एक मिसाल था. बड़ों की इज्जत करना और सब से अदब से बात करना उस के खून में था. जावेद के चेहरे पर अभी दाढ़ीमूंछों का निशान तक नहीं था.

जावेद को क्रिकेट खेलने और पतंगबाजी करने का बहुत शौक था. जब कभी जावेद की गेंद या पतंग कट कर ब्रजनंदनलाल की हवेली में चली जाती थी, तो वह बिना झिझक दौड़ कर हवेली में चला जाता और अपनी पतंग या गेंद ढूंढ़ कर ले आता.

पुष्पा कभीकभी जावेद को चिढ़ाने के लिए गेंद या पतंग को छिपा देती थी. दोनों में खूब कहासुनी भी होती थी. आखिर में काफी मिन्नत के बाद ही जावेद को उस की गेंद या पतंग वापस मिल पाती थी. यह अल्हड़पन कुछ समय तक चलता रहा. बड़ेबुजुर्गों को इस खिलवाड़ पर कोई एतराज भी नहीं था.

समय तो किसी के रोकने से रुकता नहीं. पुष्पा अब सयानी हो चली थी और जावेद के चेहरे पर दाढ़ीमूंछ आने लगी थीं. अब जावेद गेंद या पतंग लेने हवेली के अंदर नहीं जाता था, बल्कि हवेली के बाहर से ही आवाज दे देता था.

पुष्पा भी अब बिना झगड़ा किए नजर झुका कर गेंद या पतंग वापस कर देती थी. यह झुकी नजर कब उठी और जावेद के दिल में उतर गई, किसी को पता भी नहीं चला.

अब जावेद और पुष्पा दिल ही दिल में एकदूसरे को चाहने लगे थे. उन्हें अल्हड़ जवानी का प्यार हो गया था.

कहावत है कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. गांव में दोनों के प्यार की बातें होने लगीं और बात बड़ेबुजुर्गों तक पहुंची.

मामला गांव के 2 इज्जतदार घरानों का था. इसलिए इस के पहले कि मामला तूल पकड़े, जावेद को आगे की पढ़ाई के लिए शहर भेज दिया गया. यह सोचा गया कि वक्त के साथ इस अल्हड़ प्यार का बुखार भी उतर जाएगा, पर हुआ इस का उलटा.

जावेद पर पुष्पा के प्यार का रंग पक्का हो गया था. वह सब से छिप कर रात के अंधेरे में पुष्पा से मिलने आने लगा. लुकाछिपी का यह खेल ज्यादा दिन तक नहीं चल सका. उन की रासलीला की चर्चा आसपास के गांवों में भी होने लगी.

आसपास के गांवों की महापंचायत बुलाई गई और यह फैसला लिया गया कि गांव में अमनचैन और धार्मिक भाईचारा बनाए रखने के लिए दोनों को उन की हवेलियों में नजरबंद कर दिया जाए.

ब्रजनंदनलाल और शौकत अली को हिदायत दी गई कि बच्चों पर कड़ी नजर रखें, ताकि यह बात अब आगे न बढ़ने पाए. कड़ी सिक्योरिटी के लिए दोनों हवेलियों पर बंदूकधारी पहरेदार तैनात कर दिए गए.

अब पुष्पा और जावेद अपनी ही हवेलियों में अपने ही परिवार वालों की कैद में थे. कई दिन गुजर गए. दोनों ने खानापीना छोड़ दिया था. आखिरकार दोनों की मांओं का हित अपने बच्चों की हालत देख कर पसीज उठा. उन्होंने जातिधर्म के बंधनों से ऊपर उठ कर घर के बड़ेबुजुर्गों की नजर बचा कर गांव से दूर शहर में घर बसाने के लिए अपने बच्चों को कैद से आजाद कर दिया.

रात के अंधेरे में दोनों अपनी हवेलियों से बाहर निकल कर भागने लगे. ब्रजनंदनलाल और शौकत अली तनाव के कारण अपनी हवेलियों की छतों पर आधी रात बीतने के बाद भी टहल रहे थे. उन दोनों को रात के अंधेरे में 2 साए भागते दिखाई दिए. उन्हें चोर समझ कर दोनों जोर से चिल्लाए, पर वे दोनों साए और तेजी से भागने लगे.

ब्रजनंदनलाल और शौकत अली ने बिना देर किए चिल्लाते हुए आदेश दे दिया, ‘पहरेदारो, गोली चलाओ.’

‘धांयधांय’ गोलियां चल गईं और 2 चीखें एकसाथ सुनाई पड़ीं और फिर सन्नाटा छा गया.

जब उन्होंने पास जा कर देखा, तो सब के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई. पुष्पा और जावेद एकदूसरे का हाथ पकड़े गोलियों से बिंधे पड़े थे. ताजा खून उन के शरीर से निकल कर एक नई प्रेमकहानी लिख रहा था.

आननफानन यह खबर दोनों हवेलियों तक पहुंच गई. पुष्पा और जावेद की मां दौड़ती हुई वहां पहुंच गईं. अपने जिगर के टुकड़ों को इस हाल में देख कर वे दोनों बेहोश हो गईं. होश में आने पर वे रोरो कर बोलीं, ‘अपने जिगर के टुकड़ों का यह हाल देख कर अब हमें भी मौत ही चाहिए.’

ऐसा कह कर उन दोनों ने पास खड़े पहरेदारों से बंदूक छीन कर अपनी छाती में गोली मार ली. यह सब इतनी तेजी से हुआ कि कोई उन को रोक भी नहीं पाया.

यह खबर आग की तरह आसपास के गांवों में पहुंच गई. हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी. सवेरा हुआ, पुलिस आई और पंचनामा किया गया. एक हवेली से 2 जनाजे और दूसरी हवेली से 2 अर्थियां निकलीं और उन के पीछे हजारों की तादाद में भीड़.

अंतिम संस्कार के बाद दोनों परिवार वापस लौटे. दोनों हवेलियों के चिराग गुल हो चुके थे. अब ब्रजनंदनलाल और शौकत अली की जिंदगी में बच्चों की यादों में घुलघुल कर मरना ही बाकी बचा था.

ब्रजनंदनलाल और शौकत अली की निगाहें अचानक एकदसूरे से मिलीं, दोनों एक जगह पर ठिठक कर कुछ देर तक देखते रहे, फिर अचानक दौड़ कर एकदूसरे से लिपट कर रोने लगे.

गहरा दुख अपनों से मिल कर रोने से ही हलका होता है. बरसों का आपस का भाईचारा कब तक उन्हें दूर रख सकता था. शायद दोनों को एहसास हो रहा था कि पुरानी पीढ़ी की सोच में बदलाव की जरूरत है. Best Hindi Kahani

Hindi Kahani: मुसाफिर – चांदनी ने कैसे उस के साथ मजे किए

Hindi Kahani: गर्भवती चांदनी को रहरह कर पेट में दर्द हो रहा था. इसी वजह से उस का पति भीमा उसे सरकारी अस्पताल में भरती कराने ले गया. उस ने लेडी डाक्टर से बड़ी चिरौरी कर जैसेतैसे एक पलंग का इंतजाम करवा लिया. नर्स के हाथ पर 10 रुपए का नोट रख कर उस ने उसे खुश करने का वचन भी दे दिया, ताकि बच्चा पैदा होने के समय वह चांदनी की ठीक से देखभाल करे.

चांदनी के परिवार में 4 बेटियां रानी, पिंकी, गुडि़या और लल्ली के अलावा पति भीमा था, जो सीधा और थोड़ा कमअक्ल था.

भीमा मरियल देह का मेहनती इनसान था. ढाबे पर सुबह से रात तक डट कर मेहनत से दो पैसे कमाना और बीवीबच्चों का पेट भरना ही उस की जिंदगी का मकसद था. जब कभी बारिश के दिनों में तालतलैया में मछलियां भर जातीं, तब भीमा की जीभ लालच से लार टपकाने लगती थी और वह जाल ले कर मछली पकड़ने दोस्तों के साथ घर से निकल पड़ता था.

गांव में मजदूरी न मिलने पर वह कई बार दिहाड़ी मजदूरी करने आसपास के शहर में भी चला जाता था. तब चांदनी अकेले ही सुबह से रात तक ढाबे पर रहती थी.

गठीले बदन और तीखे नाकनक्श की चांदनी 30 साल की हो कर भी गजब की लगती थी. जब वह ढाबे पर बैठ कर खनकती हंसी हंसती, तो रास्ता चलते लोगों के सीने में तीर से चुभ जाते थे. कितने तो मन न होते हुए भी एक कप चाय जरूर पी लेते थे.

अस्पताल में तनहाई में लेटी चांदनी कमरे की दीवारों को बिना पलक झपकाए देख रही थी. उसे याद आया, जब एक बार मूसलाधार बारिश में उस के गांव भगवानपुर से आगे 4 मील दूर बहती नदी चढ़ आई थी. सारे ट्रक नदी के दोनों तरफ रुक गए थे. तकरीबन एक मील लंबा रास्ता ट्रकों से जाम हो गया था.

तब न कोई ट्रक आता था, न जाता था. सड़क सुनसान पड़ी थी. इस कारण चांदनी का ढाबा पूरी तरह से ठप हो चुका था. वह रोज सवेरे ग्राहक के इंतजार में पलकपांवड़े बिछा कर बैठ जाती, पर एकएक कर के 5 दिन निकल गए और एक भी ग्राहक न फटका था. बोहनी तो हुई ही नहीं, उलटे गांठ के पैसे और निकल गए थे.

ऐसे में चांदनी एकएक पैसे के लिए मुहताज हो गई थी. चांदनी मन ही मन खुद पर बरसती कि चौमासे का भी इंतजाम नहीं किया. उधर भीमा भी 15 दिनों से गायब था. जाने कसबे की तरफ चला गया था या कहीं उफनती नदी में मछलियां खंगाल रहा था.

भीमा का ध्यान आते ही चांदनी सोचने लगी कि किसी जमाने में वह कितना गठीला और गबरू जवान था. आग लगे इस नासपिटी दारू में कि उस की देह दीमक लगे पेड़ की तरह खड़ीखड़ी सूख गई. अब नशा कर के आता है और उसे बेकार ही झकझोर कर आग लगाता है. खुद तो पटाके की तरह फुस हो जाता है और वह रातदिन भीतर ही भीतर सुलगती रहती है.

कभीकभी तो भीमा खुद ही कह देता है कि चांदनी अब मुझ में पहले वाली जान नहीं रही, तू तलाश ले कोई गबरू जवान, जिस से हमारे खानदान को एक चिराग तो मिल जाए.

तब चांदनी भीमा के मुंह पर हाथ रख देती और नाराज हो कर कहती कि चुप हो जा. शर्म नहीं आती ऐसी बातें कहते हुए. तब भीमा बोलता, ‘अरी, शास्त्रों में लिखा है कि बेटा पैदा करने के लिए घड़ी दो घड़ी किसी ताकतवर मर्द का संग कर लेना गलत नहीं होता. कितनों ने ही किया है. पंडित से पूछ लेना.’

चांदनी अपने घुटनों में सिर दे कर चुप रह जाती थी. रास्ता रुके हुए छठा दिन था कि रात के अंधेरे को चीरती एक टौर्च की रोशनी उस के ढाबे पर पड़ी. चांदनी आंखें मिचमिचाते हुए उधर देखने लगी. पास आने पर देखा कि टौर्च हाथ में लिए कोई आदमी ढाबे की तरफ चला आ रहा था.

वह टौर्च वाला आदमी ट्रक ड्राइवर बलभद्र था. बलभद्र आ कर ढाबे के बाहर बिछी चारपाई पर बैठ गया. बरसात अभी रुकी थी और आबोहवा में कुछ उमस थी.

बलभद्र ने बेझिझक अपनी कमीज उतार कर एक तरफ फेंक दी. वह एक गठीले बदन का मर्द था. पैट्रोमैक्स की रोशनी में उस का गोरा बदन चमक छोड़ रहा था. बेचैनी और उम्मीद में डूबती चांदनी कनखियों से उसे ताक रही थी.

थकान और गरमी से जब बलभद्र को कुछ छुटकारा मिला, तब उस का ध्यान चांदनी की ओर गया.

वह आवाज लगा कर बोला, ‘‘क्या बाई, कुछ रोटी वगैरह मिलेगी?’’

‘‘हां,’’ चांदनी बोली.

‘‘तो लगा दाल फ्राई और रोटी.’’

चांदनी में जैसे बिजली सी चमकी. उस ने भट्ठी पर फटाफट दाल फ्राई कर दी और कुछ ही देर में वह गरम तवे पर मोटीमोटी रोटियां पलट रही थी.

चारपाई पर पटरा लगा कर चांदनी ने खाना लगा दिया. खाना खाते समय बलभद्र कह रहा था, ‘‘5 दिनों में भूख से बेहाल हो गया.’’

जाने चांदनी के हाथों का स्वाद था या बलभद्र की पुरानी भूख, उसे ढाबे का खाना अच्छा लगा. वह 14 रोटी खा गया. पानी पी कर उस ने अंगड़ाई ली और वहीं चारपाई पर पसर गया. बरतन उठाती चांदनी को जेब से निकाल कर उस ने सौ रुपए का एक नोट दिया और बोला, ‘‘पूरा पैसा रख ले बाई.’’

चांदनी को जैसे पैर में पंख लग गए थे. उसे बलभद्र की बातों पर यकीन नहीं हो रहा था. बरतन नाली पर रख कर चांदनी फिर भट्ठी के पास आ बैठी. बलभद्र लेटेलेटे ही गुनगुना रहा था.

गीत गुनगुनाने के बाद बलभद्र बोला, ‘‘बाई, आज यहां रुकने की इच्छा है. आधी रात को कहां ट्रक के पास जाऊंगा. क्लीनर ही गाड़ी की रखवाली कर लेगा. क्यों बाई, तुम्हें कोई एतराज तो नहीं?’’

चांदनी को भला क्या एतराज होता. उस ने कह दिया कि उसे कोई एतराज नहीं है. अगर रुकना चाहो तो रुक जाओ और बलभद्र गहरी तान कर सो गया.

चांदनी की चारों बेटियां ढाबे के पिछले कमरे में बेसुध सोई पड़ी थीं. रात गहरी हो रही थी. बादलों से घिरे आसमान में बिजली की चमक और गड़गड़ाहट रहरह कर गूंज रही थी.

तब रात के 12 बजे होंगे. किसी और ग्राहक के आने की उम्मीद छोड़ कर चांदनी वहां से हटी. देखा तो बलभद्र धनुष बना गुड़ीमुड़ी हुआ चारपाई पर पड़ा था.

चांदनी भीतर गई और एक कंबल उठा लाई. बलभद्र को कंबल डालते समय चांदनी का हाथ उस के माथे से टकराया, तो उसे लगा कि उसे तेज बुखार है.

चांदनी ने अचानक अपनी हथेली बलभद्र के माथे पर रखी. वह टुकुरटुकुर उसे ही ताक रहा था. उन आंखों में चांदनी ने अपने लिए एक चाहत देखी.

तभी अचानक तेज हवा चली और पैट्रोमैक्स भभक कर बुझ गया. हड़बड़ा कर उठती चांदनी का हाथ सकुचाते हुए बलभद्र ने थाम लिया. थोड़ी देर कसमसाने के बाद चांदनी अपने बदन में छा गए नशे से बेसुध हो कर उस के ऊपर ढेर हो गई थी. सालों बाद चांदनी को बड़ा सुख मिला था.

भोर होने से पहले ही वह उठी और पिछले कमरे की ओर चल पड़ी थी. उस ने सोचा कि खुद भीमा ने ही तो इस के लिए उस से कहा था, और फिर इस काली गहरी अंधेरी रात में भला किस ने देखा था. यही सब सोचतेसोचते वह नींद में लुढ़क गई.

सूरज कितना चढ़ आया था, तब बड़ी बेटी ने उसे जगाया और बोली, ‘‘रात का मुसाफिर 5 सौ रुपए दे गया है.’’

वह चौंकती सी उठी, तो देखा बलभद्र जा चुका था. चारपाई पर पड़ा हुआ कंबल उसे बड़ा घिनौना लगा. वह देर तक बैठी रात के बारे में सोचती रही.

15 दिन बाद बलभद्र फिर लौटा और भीमा के साथ उस ने खूब खायापीया. नशे में डूबा भीमा बलभद्र का गुण गाता भीतर जा कर लुढ़क गया और चांदनी ने इस बार जानबूझ कर पैट्रोमैक्स बुझा दिया.

बलभद्र का अपना ट्रक था और खुद ही उसे चलाता था, इसलिए उस के हाथ में खूब पैसा भी रहता था. चांदनी का सांचे में ढला बदन और उस की चुप रहने की आदत बहुत भाई थी उसे. चांदनी अपने शरीर के आगे मजबूर होती जा रही थी और बलभद्र के जाते ही हर बार खुद को मन ही मन कोसती रहती थी.

अब बलभद्र के कारण भीमा की माली हालत सुधरने लगी. वह उस का भी गहरा दोस्त हो गया था. 3 लड़कों का बाप बलभद्र बताता था कि कितना अजीब है कि वह लड़की पैदा करना चाहता है और भीमा लड़के की अभिलाषा रखता है.

चांदनी चुप जरूर थी, लेकिन अंदर ही अंदर खुश रहती थी. उस का सातवां महीना था. भीमा के साथ आसपास के जानने वाले लोग भी बेचैनी से इस बच्चे के जन्म का इंतजार कर रहे थे.

तब पूरे 9 महीने हो गए थे. एक दिन अचानक बलभद्र खाली ट्रक ले कर वहां आ धमका और उदास होता हुआ बोला, ‘‘अब वह पंजाब में ही ट्रक चलाएगा, क्योंकि घर के लोगों ने नाराज हो कर उसे वापस बुलाया है.’’

यह सुन कर भीमा और चांदनी बेहद उदास हो गए थे. आखिरी बार चांदनी ने उसे अच्छा खाना खिलाया और दुखी मन से विदा किया. अगले ही दिन उसे अस्पताल आना पड़ा था. तब से वह बच्चा पैदा होने के इंतजार में थे.

उसे दर्द बढ़ गया, तो उस ने नर्स को बुलाया. आननफानन उसे भीतर ले जाया गया. आखिरकार उस ने बच्चे को जन्म दिया और बेहोश हो गई.

कुछ देर बाद होश में आने पर चांदनी ने जाना कि उस ने एक बेटे को  जन्म दिया है. वह जल्दी से बच्चे को घूरने लगी कि लड़के की शक्ल किस से मिलती है… भीमा से या बलभद्र से? Hindi Kahani

Best Hindi Kahani: बंद किताब – रत्ना के लिए क्या करना चाहता था अभिषेक

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‘‘तुम…’’

‘‘मुझे अभिषेक कहते हैं.’’

‘‘कैसे आए?’’

‘‘मुझे एक बीमारी है.’’

‘‘कैसी बीमारी?’’

‘‘पहले भीतर आने को तो कहो.’’

‘‘आओ, अब बताओ कैसी बीमारी?’’

‘‘किसी को मुसीबत में देख कर मैं अपनेआप को रोक नहीं पाता.’’

‘‘मैं तो किसी मुसीबत में नहीं हूं.’’

‘‘क्या तुम्हारे पति बीमार नहीं हैं?’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’

‘‘मैं अस्पताल में बतौर कंपाउंडर काम करता हूं.’’

‘‘मैं ने तो उन्हें प्राइवेट नर्सिंग होम में दिखाया था.’’

‘‘वह बात भी मैं जानता हूं.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘तुम ने सर्जन राजेश से अपने पति को दिखाया था न?’’

‘‘हां.’’

‘‘उन्होंने तुम्हारी मदद करने के लिए मुझे फोन किया था.’’

‘‘तुम्हें क्यों?’’

‘‘उन्हें मेरी काबिलीयत और ईमानदारी पर भरोसा है. वे हर केस में मुझे ही बुलाते हैं.’’

‘‘खैर, तुम असली बात पर आओ.’’

‘‘मैं यह कहने आया था कि यही मौका है, जब तुम अपने पति से छुटकारा पा सकती हो.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘बनो मत. मैं ने जोकुछ कहा है, वह तुम्हारे ही मन की बात है. तुम्हारी उम्र इस समय 30 साल से ज्यादा नहीं है, जबकि तुम्हारे पति 60 से ऊपर के हैं. औरत को सिर्फ दौलत ही नहीं चाहिए, उस की कुछ जिस्मानी जरूरतें भी होती हैं, जो तुम्हारे बूढ़े प्रोफैसर कभी पूरी नहीं कर सके.

‘‘10 साल पहले किन हालात में तुम्हारी शादी हुई थी, वह भी मैं जानता हूं. उस समय तुम 20 साल की थीं और प्रोफैसर साहब 50 के थे. शादी से ले कर आज तक मैं ने तुम्हारी आंखों में खुशी नहीं देखी है. तुम्हारी हर मुसकराहट में मजबूरी होती है.’’

‘‘वह तो अपनाअपना नसीब है.’’

‘‘देखो, नसीब, किस्मत, भाग्य का कोई मतलब नहीं होता. 2 विश्व युद्ध हुए, जिन में करोड़ों आदमी मार दिए गए. इस देश ने 4 युद्ध झेले हैं. उन में भी लाखों लोग मारे गए. बंगलादेश की आजादी की लड़ाई में 20 लाख बेगुनाह लोगों की हत्याएं हुईं. क्या यह मान लिया जाए कि सब की किस्मत

खराब थी?

‘‘उन में से हजारों तो भगवान पर भरोसा करने वाले भी होंगे, लेकिन कोई भगवान या खुदा उन्हें बचाने नहीं आया. इसलिए इन बातों को भूल जाओ. ये बातें सिर्फ कहने और सुनने में अच्छी लगती हैं. मैं सिर्फ 25 हजार रुपए लूंगा और बड़ी सफाई से तुम्हारे बूढ़े पति को रास्ते से हटा दूंगा.’’

अभिषेक की बातें सुन कर रत्ना चीख पड़ी, ‘‘चले जाओ यहां से. दोबारा अपना मुंह मत दिखाना. तुम ने यह कैसे सोच लिया कि मैं इतनी नीचता पर उतर आऊंगी?’’

‘‘अभी जाता हूं, लेकिन 2 दिन के बाद फिर आऊंगा. शायद तब तक मेरी बात तुम्हारी समझ में आ जाए,’’ इतना कह कर अभिषेक लौट गया.

रत्ना अपने बैडरूम में जा कर फफकफफक कर रोने लगी. अभिषेक ने जोकुछ कहा था, वह बिलकुल सही था.

रत्ना को ताज्जुब हो रहा था कि वह उस के बारे में इतनी सारी बातें कैसे जानता था. हो सकता है कि उस का कोई दोस्त रत्ना के कालेज में पढ़ता रहा हो, क्योंकि वह तो रत्ना के साथ कालेज में था नहीं. वह उस की कालोनी में भी नहीं रहता था.

रत्ना के पति बीमारी के पहले रोज सुबह टहलने जाया करते थे. हो सकता है कि अभिषेक भी उन के साथ टहलने जाता रहा हो. वहीं उस का उस के पति से परिचय हुआ हो और उन्होंने ही ये सारी बातें उसे बता दी हों. उस के लिए अभिषेक इतना बड़ा जोखिम क्यों उठाना चाहता है. आखिर यह तो एक तरह की हत्या ही हुई. बात खुल भी सकती है. कहीं अभिषेक का यह पेशा तो नहीं है? बेमेल शादी केवल उसी की तो नहीं हुई है. इस तरह के बहुत सारे मामले हैं. अभिषेक के चेहरे से तो ऐसा नहीं लगता कि वह अपराधी किस्म का आदमी है. कहीं उस के दिल में उस के लिए प्यार तो नहीं पैदा हो गया है.

रत्ना को किसी भी तरह के सुख की कमी नहीं थी. प्रोफैसर साहब अच्छीखासी तनख्वाह पाते थे. उस के लिए काफीकुछ कर रखा था. 5 कमरों का मकान, 3 लाख के जेवर, 5 लाख बैंक बैलेंस, सबकुछ उस के हाथ में था. 50 हजार रुपए सालाना तो प्रोफैसर साहब की किताबों की रौयल्टी आती थी. इन सब बातों के बावजूद रत्ना को जिस्मानी सुख कभी नहीं मिल सका. प्रोफैसर साहब की पहली बीवी बिना किसी बालबच्चे के मरी थी. रत्ना को भी कोई बच्चा नहीं था. कसबाई माहौल में पलीबढ़ी रत्ना पति को मारने का कलंक अपने सिर लेने की हिम्मत नहीं कर सकती थी.

रत्ना ने अभिषेक से चले जाने के लिए कह तो दिया था, लेकिन बाद में उसे लगने लगा था कि उस की बात को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता था. रत्ना अपनेआप को तोलने लगी थी कि 2 दिन के बाद अभिषेक आएगा, तो वह उस को क्या जवाब देगी. इस योजना में शामिल होने की उस की हिम्मत नहीं हो पा रही थी.

अभिषेक अपने वादे के मुताबिक 2 दिन बाद आया. इस बार रत्ना उसे चले जाने को नहीं कह सकी. उस की आवाज में पहले वाली कठोरता भी नहीं थी. रत्ना को देखते ही अभिषेक मुसकराया, ‘‘हां बताओ, तुम ने क्या सोचा?’’

‘‘कहीं बात खुल गई तो…’’

‘‘वह सब मेरे ऊपर छोड़ दो. मैं सारी बातें इतनी खूबसूरती के साथ करूंगा कि किसी को भी पता नहीं चलेगा. हां, इस काम के लिए 10 हजार रुपए बतौर पेशगी देनी होगी. यह मत समझो कि यह मेरा पेशा है. मैं यह सब तुम्हारे लिए करूंगा.’’

‘‘मेरे लिए क्यों?’’

‘‘सही बात यह है कि मैं तुम्हें  पिछले 15 साल से जानता हूं. तुम्हारे पिता ने मुझे प्राइमरी स्कूल में पढ़ाया था. मैं जानता हूं कि किन मजबूरियों में गुरुजी ने तुम्हारी शादी इस बूढ़े प्रोफैसर से की थी.’’

‘‘मेरी इज्जत तो इन्हीं की वजह से है. इन के न रहने पर तो मैं बिलकुल अकेली हो जाऊंगी.’’

‘‘जब से तुम्हारी शादी हुई है, तभी से तुम अकेली हो गई रत्ना, और आज तक अकेली हो.’’

‘‘मुझे भीतर से बहुत डर लग रहा है.’’

‘‘तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है. अगर भेद खुल भी जाता है, तो मैं सबकुछ अपने ऊपर ले लूंगा, तुम्हारा नाम कहीं भी नहीं आने पाएगा. मैं तुम्हें सुखी देखना चाहता हूं रत्ना. मेरा और कोई दूसरा मकसद नहीं है.’’

‘‘तो ठीक है, तुम्हें पेशगी के रुपए मिल जाएंगे,’’ कह कर रत्ना भीतर गई और 10 हजार रुपए की एक गड्डी ला कर अभिषेक के हाथों पर रख दी. रुपए ले कर अभिषेक वापस लौट गया.

तय समय पर रत्ना के पति को नर्सिंग होम में भरती करवा दिया गया. सभी तरह की जांच होने के बाद प्रोफैसर साहब का आपरेशन किया गया, जो पूरी तरह से कामयाब रहा. बाद में उन्हें खून चढ़ाया जाना था. अभिषेक सर्जन राजेश की पूरी मदद करता रहा. डाक्टर साहब आपरेशन के बाद अपने बंगले पर चले गए थे. खून चढ़ाने वगैरह की सारी जिम्मेदारी अभिषेक पर थी. सारा इंतजाम कर के अभिषेक अपनी जगह पर आ कर बैठ गया था. रत्ना भी पास ही कुरसी पर बैठी हुई थी. अभिषेक ने उसे आराम करने को कह दिया था.

रत्ना ने आंखें मूंद ली थीं, पर उस के भीतर उथलपुथल मची हुई थी. उस का दिमाग तेजी से काम कर रहा था. दिमाग में अनेकअनेक तरह के विचार पैदा हो रहे थे. अभिषेक ड्रिप में बूंदबूंद गिर कर प्रोफैसर के शरीर में जाते हुए खून को देख रहा था. अचानक वह उठा. अब तक रात काफी गहरी हो गई थी. वह मरीज के पास आया और ड्रिप से शरीर में जाते हुए खून को तेज करना चाहा, ताकि प्रोफैसर का कमजोर दिल उसे बरदाश्त न कर सके. तभी अचानक रत्ना झटके से अपनी सीट से उठी और उस ने अभिषेक को वैसा करने से रोक दिया.

वह उसे ले कर एकांत में गई और फुसफुसा कर कहा, ‘‘तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे, रुपए भले ही अपने पास रख लो. मैं अपने पति को मौत के पहले मरते नहीं देख सकती. जैसे इतने साल उन के साथ गुजारे हैं, बाकी समय भी गुजर जाएगा.’’ अभिषेक ने उस की आंखों में झांका. थोड़ी देर तक वह चुप रहा, फिर बोला, ‘‘तुम बड़ी कमजोर हो रत्ना. तुम जैसी औरतों की यही कमजोरी है. जिंदगीभर घुटघुट कर मरती रहेंगी, पर उस से उबरने का कोई उपाय नहीं करेंगी. खैर, जैसी तुम्हारी मरजी,’’ इतना कह कर अभिषेक ने पेशगी के रुपए उसे वापस कर दिए. इस के बाद वह आगे कहने लगा, ‘‘जिस बात को मैं ने इतने सालों से छिपा रखा था, आज उसे साफसाफ कहना पड़ रहा है.

‘‘रत्ना, जिस दिन मैं ने तुम्हें देखा था, उसी दिन से तुम्हें ले कर मेरे दिल में प्यार फूट पड़ा था, जो आज बढ़तेबढ़ते यहां तक पहुंच गया है. ‘‘इस बात को मैं कभी तुम से कह नहीं पाया. प्यार शादी में ही बदल जाए, ऐसा मैं ने कभी नहीं माना.

‘‘मैं उम्मीद में था कि तुम अपनी बेमेल शादी के खिलाफ एक न एक दिन बगावत करोगी. मेरी भावनाओं को खुदबखुद समझ जाओगी या मैं ही हिम्मत कर के तुम से अपनी बात कह दूंगा.

‘‘इसी जद्दोजेहद में मैं ने 15 साल गुजार दिए. आज तक मैं तुम्हारा ही इंतजार करता रहा. जब बरदाश्त की हद हो गई, तब मौका पा कर तुम्हारे पति को खत्म करने की योजना बना डाली. रुपए की बात मैं ने बीच में इसलिए रखी थी कि तुम मेरी भावनाओं को समझ न सको.

‘‘तुम ने इस घिनौने काम में मेरी मदद न कर मुझे एक अपराध से बचा लिया. वैसे, मैं तुम्हारे लिए जेल भी जाने को तैयार था, फांसी का फंदा भी चूमने को तैयार था.

‘‘मैं तुम्हें तिलतिल मरते हुए नहीं देख सकता था रत्ना, इसलिए मैं ने इतना बड़ा कदम उठाने का फैसला लिया था.’’

अपनी बात कह कर अभिषेक ने चुप्पी साध ली. रत्ना उसे एकटक देखती रह गई. Best Hindi Kahani

Story In Hindi: मजदूर की सच्ची मुहब्बत – डिग्गी का दर्द

Story In Hindi: सोन नदी पर पुल बन रहा था. सैकड़ों मजदूर और कई इंजीनियर लगे हुए थे. मजदूरों में मर्दऔरत दोनों थे. वे सब दूरदराज से आए थे, इसीलिए ठेकेदार ने उन के रहने के लिए साइट पर ही कच्चे मकान बनवा दिए थे.

मजदूरों में एक रोहित नाम का लड़का ठेकेदार का बहुत चहेता था. 6 फुट लंबा कद, गोराचिट्टा रंग, चौड़ा सीना, लंबे बालों वाले रोहित की पर्सनैलिटी गजब की थी. उस में कमी थी तो सिर्फ यही कि वह किसी की झूठी तारीफ नहीं कर पाता था, इसीलिए 25 साल की उम्र होने के बावजूद वह अकेला था.

एक दिन रोहित की नजर डिग्गी नाम की एक मजदूर लड़की पर पड़ी. डिग्गी का असली नाम क्या था, किसी को नहीं मालूम था, पर वहां ठेकेदार से ले कर इंजीनियर और मजदूर सभी उसे डिग्गी कह कर ही बुलाते थे.

20 साल की डिग्गी बहुत ही मेहनती लड़की थी. वह देखने में बहुत ही खूबसूरत थी, पर हालात की मारी वह बचपन में ही अनाथ हो गई थी और मजदूरी कर के अपना गुजारा करती थी.

डिग्गी चरित्र की बिलकुल साफ थी. बहुत से इंजीनियर और मजदूर उस की भरीपूरी देह देख कर उस पर फिदा हो गए थे. कुछ लोग तो पैसे का भी लालच देते थे, पर वह जिस्म का सौदा करने के बजाय मजदूरी करना ठीक समझी थी. उसे मालूम था कि जिस्म का सौदा कर के वह जवानी में तो ऐशोआराम की जिंदगी जी सकती है, पर उस सुख का अंत बहुत कष्टकारी होता है.

रोहित ने डिग्गी के बारे में सबकुछ पता लगा लिया था और उसे अच्छे से मालूम था कि डिग्गी को सिर्फ प्यार की ताकत से ही अपनाया जा सकता है.

रोहित ने अपने दिल की बात ठेकेदार को बता दी, जिस से ठेकेदार उसे उसी जगह रहने को बोलता जहां डिग्गी काम कर रही होती थी, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा समय उस के साथ बिता सके और एक दिन उस के दिल में अपनी जगह बना ले.

डिग्गी का शरीर बहुत आकर्षक और कामवासना से भरपूर था, पर दिनभर मेहनत करने के बाद वह रात को गहरी नींद में सो जाती थी. अकेले रहते हुए भी तनहाई उस से कोसों दूर थी.

इधर रोहित के सिर पर प्यार का भूत सवार था, इसलिए वह दिनभर काम करता, शरीर उस का भी थका रहता था, पर रात की तनहाई उसे काट खाने को दौड़ती थी, क्योंकि उस ने अपनी आंखों में डिग्गी को पाने का ख्वाब जो सजा रखा था.

एक दिन रोहित ने डिग्गी की तरफ देखा, पर जब डिग्गी उस की ओर देखने लगी तो उस ने नजरें घुमा लीं. पर धीरेधीरे डिग्गी समझ गई कि रोहित उस से प्यार करता है, क्योंकि यह लड़कियों का स्वभाव होता है कि वे मर्द की पहली नजर देख कर ही भांप लेती हैं कि सामने वाला उस से क्या चाहता है.

रोहित का जमीर इस बात की गवाही नहीं दे रहा था कि वह सामने से अपने दिल की बात डिग्गी से कह दे, पर एक शाम को ठेकेदार ने डिग्गी से बोल दिया, ‘‘डिग्गी, रोहित तुझे बहुत पसंद करता है, लेकिन वह कुछ कह नहीं पाता है. तुम दोनों की जोड़ी बहुत अच्छी जमेगी. क्या खयाल है तुम्हारा रोहित के बारे में?’’

इतना सुन कर डिग्गी शरमाते हुए वहां से चली गई. ठेकेदार समझ गया कि डिग्गी के दिल में भी रोहित के प्रति प्रेम है, नहीं तो वह उस की बातों का बुरा मान गई होती.

अब डिग्गी रोहित के चालचलन पर ध्यान देने लगी. सीधासादा लड़का किसी और मजदूर औरत से किसी तरह का लगाव नहीं रखता था, इसलिए डिग्गी मन ही मन उस से प्यार करने लगी. वह रोजाना सुबह उठ कर नहा लेती और साफसुथरे कपड़े पहनती. जिस दिन रोहित को नहीं देखती तो बेचैन हो जाती.

रोहित को भी एहसास हो चुका था कि डिग्गी के दिल में उस की ऐंट्री हो चुकी है. अब रोहित हर उस इनसान से झगड़ जाता था, जो डिग्गी के बारे में गलत बोलता था.

जाति से रोहित दलित था. वह ठेकेदार का चहेता और विश्वासपात्र मजदूर था. ठेकेदार ने उस के नाम से भी ठेकेदारी का लाइसैंस बनवा दिया था, ताकि जो टैंडर अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व्ड होता था, वह उस के हाथ से न जाने पाए.

ठेकेदार उस टैंडर को रोहित के नाम से ले लेता था. रोहित के खाते में पैसा आता और वह ईमानदारी से ठेकेदार को दे देता था. काम ठेकेदार अपने हिसाब से करवाता था, इसीलिए इंजीनियर और बाकी के मजदूर रोहित का कुछ नहीं बिगाड़ पाते थे.

एक दिन रोहित फावड़े से मिट्टी खोद रहा था कि अचानक फावड़ा उस के पैर में लग गया. चोट लगने से खून निकलने लगा. वहीं पर डिग्गी काम कर रही थी. वह तुरंत कपड़े से घाव को बांधने लगी और रोने लगी, ‘‘ध्यान कहां रहता है तुम्हारा, कितना खून निकल रहा है.’’

यह सुन कर बाकी मजदूर हैरान रह गए कि रोहित को चोट लगी है तो डिग्गी इतना परेशान क्यों हो गई? रोहित की आंखें भर आई थीं. वे दोनों सब के सामने एकदूसरे के गले लग गए.

रोहित से लिपट कर डिग्गी रोरो कर सुनाने लगी, ‘‘बरसों पहले मैं ने अपने मातापिता को खो दिया था, अब तुम मेरी जिंदगी में आए हो. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो फिर मेरा जीने का कोई मकसद ही नहीं रहेगा.’’

ठेकेदार ने उस शाम दोनों को अपने केबिन में बुलाया और बोला, ‘‘तुम दोनों की शादी मैं करा दूंगा, फिलहाल एकसाथ रहो.’’

डिग्गी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस रात रोहित हिम्मत कर के डिग्गी के कमरे पर गया. डिग्गी से जितना हो पाया था, वह उतना सजसंवर कर बैठी थी.

रोहित को अपने कमरे पर देख कर डिग्गी शरमाते हुए बोली, ‘‘रोटीसब्जी बनाई है, खा लो.’’

रोहित बोला, ‘‘मुझे तुम्हारे प्यार की भूख है. मैं तुम से प्यार करने आया हूं.’’

डिग्गी शरमाते हुए बोली, ‘‘मैं आप को अपना सबकुछ मानती हूं. मेरे जिस्म के एकएक हिस्से पर सिर्फ तुम्हारा ही हक है. आप मुझे कभी छोड़ कर मत जाना, नहीं तो मै एक पल भी जिंदा नहीं रह पाऊंगी.’’

रोहित बोला, ‘‘हम दोनों को अब सिर्फ मौत ही जुदा कर सकती है.’’

इतना सुन कर डिग्गी रोहित से लिपट गई. दोनों ने एकदूसरे पर चुंबनों की बौछार कर दी. नदी के किनारे बने उस छोटे से कमरे में डिग्गी की सिसकारियों के साथ दोनों की कामवासना शांत हो गई.

उस दिन से डिग्गी रोहित का भी खाना बनाती थी. काम खत्म होने के बाद रोहित मार्केट से सब्जीराशन जैसा घर का सामान खरीद लाता था.

धीरेधीरे समय बीतता गया. 8वीं तक पढ़ा रोहित ठेकेदारी के सारे दांवपेंच

जान चुका था. अब डिग्गी मजदूरी नहीं करती थी. वह रोहित के साथ साइट पर रहती और औरत मजदूरों की देखरेख करती थी.

एक बार सड़क पुल का टैंडर रोहित के नाम से लिया गया. काम शुरू हो गया था कि अचानक उस के मालिक की सड़क हादसे में मौत हो गई. रोहित को बहुत दुख हुआ. उस के ऊपर पुल बनवाने की सारी जिम्मेदारी आ गई.

इस के पहले भी कई टैंडर रोहित के नाम से कंप्लीट हो चुके थे, जिस से सारे अफसर और इंजीनियर रोहित को ही जानते थे. उस ने भी अपनी सूझबूझ का परिचय दिया और उस पुल को अपने हिसाब से कंप्लीट करवाया, जिस में बहुत सारा पैसा बचा लिया. इस के बाद उस ने अपने लिए एक फ्लैट खरीदा

और डिग्गी को साइट पर ले जाना बंद कर दिया.

रोहित दूसरे ठेकेदारों की तुलना में ज्यादा कमीशन देता था. सारे नेताओं और अफसरों से उस की पहचान हो चुकी थी, इसलिए उसे टैंडर मिलते गए और वह एक कुशल ठेकेदार बन गया. इधर डिग्गी भी अपने रोहित की तरक्की देख कर बहुत खुश थी.

एक बार साइट पर रोहित की मुलाकात नीलू नाम की एक इंजीनियर से हुई. नीलू रोहित की पर्सनैलिटी और पैसा देख कर आकर्षित हो गई और 8वीं जमात तक पढ़ा रोहित नीलू की खूबसूरती और इंगलिश बोलने की कला देख कर उस पर फिदा हो गया.

रोहित टैंडर की दुनिया में राज करना चाहता था, इसलिए सोचा कि अगर नीलू जैसी पढ़ीलिखी लड़की उस के साथ रहेगी तो उस का सपना पूरा हो जाएगा.

रोहित डिग्गी को भूल कर नीलू के प्रेमजाल में फंस गया. दोनों एकदूसरे को डेट करने लगे. 2-2 दिन तक रोहित घर नहीं जाता था. डिग्गी के फोन करने पर साइट पर होने का बहाना बनाता, लेकिन हकीकत में वह नीलू के साथ होटल में गुलछर्रे उड़ा रहा होता था.

एक रात जब रोहित घर नहीं आया तो डिग्गी साइट पर गई. वहां मजदूरों से पता चला कि ठेकेदार साहब तो नीलू मैडम के साथ गाड़ी में बैठ कर शाम को ही चले गए थे.

डिग्गी को बहुत दुख हुआ. उस रात उसे नींद नहीं आई. सुबह होते ही वह साइट पर आई और रोहित से लिपट कर रोने लगी. वह बोली, ‘‘रोहित, मेरे साथ ऐसा मत करो. तुम्हारे अलावा इस दुनिया में कोई नहीं है मेरा.’’

इस बात पर रोहित ने उसे कुछ पैसे दे कर बोला, ‘‘घर जाओ, आज शाम को आऊंगा. नीलू को ले कर ज्यादा चिंता मत करना. उस के आने से मुझे फायदा ही हुआ है, नुकसान नहीं.’’

डिग्गी बोली, ‘‘अगर आज शाम को नहीं आओगे, तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा, सोच लेना.’’

इधर नीलू को जब पता चला कि साइट पर डिग्गी आई थी, तो वह रोहित से नाराजगी जाहिर करते हुए बोली, ‘‘उसे इतना सिर पर मत चढ़ाओ और आज शाम को घर जाने के लिए क्यों बोले हो? आज शाम हम ने फिल्म देखने का प्लान बनाया है न…’’

रोहित नीलू को खोना नहीं चाहता था, इसलिए वह रात को घर नहीं गया और नीलू के साथ फिल्म देखने चला गया. इस बात को डिग्गी ने दिल पर ले लिया. अब वह समझ गई थी कि रोहित उस की जिंदगी में कभी वापस नहीं आएगा, इसलिए जिद में आ कर उस ने पंखे से लटक कर फांसी लगा ली.

सुबह रोहित जब घर गया, तो डिग्गी को पंखे से लटकता देख कर उस का सिर चकरा गया. वह तुरंत जमीन पर गिर गया और चिल्लाचिल्ला कर रोने लगा.

डिग्गी इतना बड़ा कदम उठा लेगी, रोहित ने शायद सपने में भी नहीं सोचा था. डिग्गी सही बोलती थी कि उस के बिना उस का इस दुनिया में कोई नहीं है. सब से बड़ा दुख रोहित को तब हुआ, जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह पता चला कि डिग्गी 3 महीने के पेट से थी.

डिग्गी और उस के पेट में पल रहे बच्चे की मौत का जिम्मेदार रोहित था. झूठे प्यार के चक्कर में एक मजदूर से ठेकेदार बना रोहित अपना सच्चा प्यार और बसाबसाया घरपरिवार खो बैठा. Story In Hindi

Funny Story In Hindi: साहबजी के श्री चरनन में

Funny Story In Hindi: आदरणीय… परमादरणीय सब से बड़े साहबजी, जयहिंद.

जैसे कि आप को पता ही है कि हम 4 चपरासी पिछले 15 सालों से आप के दफ्तर के दरवाजे पर बैठ कर आप के लिए काम करवाने आने वालों से आप के कहे मुताबिक रेट वसूलते रहे हैं. हम से रेट वसूलवाते हुए पता नहीं आप जैसे कितने बड़े साहब आए और आ कर चले गए, पर हम वहीं के वहीं रहे साहबजी.

हे सब से बड़े साहबजी, हमारे द्वारा वसूला गया रेट ऊपर तक जाता है, जैसा कि हमें बताया गया है. इस में हमें कोई एतराज भी नहीं कि हमारे द्वारा जनता से वसूला गया रेट कहां जाता है? जहां जाता हो, वहां जाता रहे. अपना काम तो बस, काम करवाने आयों से आप के द्वारा तय रेट वसूलने के बाद ही उसे दफ्तर में दाखिल होने की इजाजत देना है और इस काम को पिछले 15 सालों से हम पूरी ईमानदारी से निभाते भी आ रहे हैं.

हम ने बिन रेट लिए आप के दफ्तर में आज तक किसी को घुसने नहीं दिया, चाहे वह यमराज ही क्यों न हो. लेकिन हमारी इस ईमानदारी के बाद भी हम वहीं के वहीं बैठे हैं, पर उसी आप के दफ्तर के बाहर वाले स्टूल पर और हम से काम करवाने वाले पता नहीं कहां से कहां पहुंच गए.

कसम बीवीबच्चों की बड़े साहबजी, जो हम ने आज तक जनता से वसूले गए पैसों में से एक पैसा भी अपनी जेब में रखा हो. हम आप के दफ्तर के वे ईमानदार मुलाजिम हैं, जो छोटे बाबू की हथेली में 5 बजने के तुरंत बाद पूरी ईमानदारी से पाईपाई जमा करवाते रहे हैं. हम आप के दफ्तर के सींसियर बंदे हैं, इस का अंदाजा इसी बात से आसानी से लगाया जा सकता है बड़े साहबजी.

बड़े साहबजी, हमें इस बात का बिलकुल दुख नहीं है कि हम गलत काम करते हैं. वैसे भी सही काम यहां कौन कर रहा है? सभी तो अपनेअपने हिसाब से जनता को खा ही रहे हैं. पैसे ले कर भी उसे उस की फाइलों पर नचा ही रहे हैं. हर दफ्तर में जनता होती ही खाने को है, नचाने को है.

बड़े साहबजी, हम चाहते तो नहीं थे कि आप से गुहार लगाएं, आप को वसूले गए धन में से अपने हिस्से का दर्द सुनाएं, पर क्या करें बड़े साहबजी, अब पानी सिर से ऊपर हो रहा है, इसलिए हम आप से गुहार लगाते हैं कि जितना आप के कहने से हम काम करवाने आने वालों से वसूलते हैं, हमें अभी भी उस में से उतना ही कमीशन मिल रहा है, जितना 15 साल पहले मिला करता था.

आप ने अपने दफ्तर में काम करवाने आने वालों के रेट में तो कमरतोड़ इजाफा कर दिया है, पर हमें आप के लिए पैसे इकट्ठे करने में से 15 साल पहले वाला रेट ही मिल रहा है. उस में से भी 2 परसैंट छोटे बाबू मार जाते हैं.

बुरा मत मानना बड़े साहबजी, पर आप की वजह से जनता की सीधी गालियां कौन सुनता है? हम सुनते हैं साहबजी… हम. जनता से पैसे वसूलने के लिए बदनाम कौन होता है? आप? नहीं बड़े साहबजी, हम होते हैं… हम.

बड़े साहबजी, आप तो जानते ही हैं कि हमारे गालियां सुनने से नीचे से ऊपर तक पता नहीं कितनों की जेबें भरती हैं. पता नहीं आप को पता हो या न हो, पर अब वसूली के इस कमीशन में अपना गुजारा होना बहुत मुश्किल हो गया है बड़े साहबजी, इसलिए आप से सादर निवेदन है कि आप सब के लिए इकट्ठे किए गए पैसों में से हमारा कमीशन भी समय के साथ बढ़ाएं.

ऐसा नहीं है कि अपनी मजबूरी हम ने आज तक किसी से न कही हो. इस बारे हम ने म झले बाबू से कई बार गुहार लगाई, उन के आगे हाथ जोड़े, पर उन्होंने हर बार हमें हड़का कर टाल दिया कि जब तक उन्होंने जो फ्लैट खरीदा है, उस की किस्तें पूरी नहीं हो जातीं, उन का बेटा कौन्वैंट स्कूल से जैंटलमैन बन
कर निकल नहीं जाता, तब तक हमारे कमीशन में कोई इजाफा नहीं किया जा सकता. वे खुद इन दिनों केवल हमारे द्वारा वसूले गए पैसों के हिस्से से रोतेबिलखते पल रहे हैं.

बड़े साहबजी, हमारा पिछले 15 बरसों से कमीशन के तौर पर शोषण हो रहा है. जितना हमें आप के द्वारा कमीशन मिलता है, जनता में हम उस से कहीं ज्यादा बदनाम हो रहे हैं. महल्ले वाले सोचते हैं कि हमारे पास पता नहीं कितनी दौलत है, पर वे यह नहीं जानते कि हमारे द्वारा इकट्ठी की गई दौलत जाती कहांकहां है.

आप से हाथ जोड़ कर निवेदन है कि आप काम करवाने आने वालों से जो हम से इकट्ठा करवाते हैं, उस में से जो हमें कमीशन के नाम पर देते हैं, उस की परसैंटेज बढ़ाई जाए. पुराने रेट में जनता से पैसा वसूलने में अब हमें बहुत शर्म आने लगी है.

आप को तो आटेदाल के भाव क्या ही पता होंगे बड़े साहबजी, क्यों पता होंगे बड़े साहबजी, आप को यही बता दें कि बाजार में जो आटा पहले 10 रुपए किलो मिलता था, अब वह 40 रुपए किलो हो गया है और जनता से पैसा वसूलने पर हमारा कमीशन वही 15 साल पुराने वाला.

अब देखो न साहबजी, बाजार में जो दाल पहले 50 रुपए किलो मिलती थी, अब वह 100 रुपए किलो भी नहीं मिल रही और जनता से पैसा वसूलने पर हमारा कमीशन वही 15 साल पुराने वाला.

अब देखो न साहबजी, बाजार में जो दूध पहले 20 रुपए लिटर मिलता था, अब वह 50 रुपए लिटर भी नहीं मिल रहा और जनता से पैसा वसूलने पर हमरा कमीशन वही 15 साल पुराने वाला. आलूप्याज, सब्जियों के रेट तो आप से क्या ही डिसक्स करें…

बड़े साहबजी से निवेदन है कि परमानैंट सरकारी कमीशन एजेंट होने के नाते हमारे कमीशन में बैक डेट से दोगुना बढ़ोतरी की जाए. हो सके तो इस बीच जो हमारा बकाया बनता है, वह भी हमें एरियर के तौर पर एकमुश्त जारी किया जाए, ताकि हम अपने परिवार के साथ उठनेबैठने लायक बनें.

हम हैं आप के दफ्तर के दरवाजे पर सुबह के 9 बजे से ले कर शाम के 6 बजे तक बिना हिलेडुले जनता से पैसे वसूलने, जनता से 200-400 रुपल्ली लेने के बदले हजारहजार की गालियां सुनने वाले 4 कमीशनिया चपरासी. Funny Story In Hindi

Hindi Romantic Story: प्यार का धागा – कैसे धारावी की डौल बन गई डौली

Hindi Romantic Story: सांझ ढलते ही थिरकने लगते थे उस के कदम. मचने लगता था शोर, ‘डौली… डौली… डौली…’

उस के एकएक ठुमके पर बरसने लगते थे नोट. फिर गड़ जाती थीं सब की ललचाई नजरें उस के मचलते अंगों पर. लोग उसे चारों ओर घेर कर अपने अंदर का उबाल जाहिर करते थे.

…और 7 साल बाद वह फिर दिख गई. मेरी उम्मीद के बिलकुल उलट. सोचा था कि जब अगली बार मुलाकात होगी, तो वह जरूर मराठी धोती पहने होगी और बालों का जूड़ा बांध कर उन में लगा दिए होंगे चमेली के फूल या पहले की तरह जींसटीशर्ट में, मेरी राह ताकती, उतनी ही हसीन… उतनी ही कमसिन…

लेकिन आज नजारा बदला हुआ था. यह क्या… मेरे बचपन की डौल यहां आ कर डौली बन गई थी.

लकड़ी की मेज, जिस पर जरमन फूलदान में रंगबिरंगे डैने सजे हुए थे, से सटे हुए गद्देदार सोफे पर हम बैठे

हुए थे. अचानक मेरी नजरें उस पर ठहर गई थीं.

वह मेरी उम्र की थी. बचपन में मेरा हाथ पकड़ कर वह मुझे अपने साथ स्कूल ले कर जाती थी. उन दिनों मेरा परिवार एशिया की सब से बड़ी झोपड़पट्टी में शुमार धारावी इलाके में रहता था. हम ने वहां की तंग गलियों में बचपन बिताया था.

वह मराठी परिवार से थी और मैं राजस्थानी ब्राह्मण परिवार का. उस के पिता आटोरिकशा चलाते थे और उस की मां रेलवे स्टेशन पर अंकुरित अनाज बेचती थी.

हर शुक्रवार को उस के घर में मछली बनती थी, इसलिए मेरी माताजी मुझे उस दिन उस के घर नहीं जाने देती थीं.

बड़ीबड़ी गगनचुंबी इमारतों के बीच धारावी की झोपड़पट्टी में गुजरे लमहे आज भी मुझे याद आते हैं. उगते हुए सूरज की रोशनी पहले बड़ीबड़ी इमारतों में पहुंचती थी, फिर धारावी के बाशिंदों के पास.

धारावी की झोपड़पट्टी को ‘खोली’ के नाम से जाना जाता है. उन खोलियों की छतें टिन की चादरों से ढकी रहती हैं.

जब कभी वह मेरे घर आती, तो वापस अपने घर जाने का नाम ही नहीं लेती थी. वह अकसर मेरी माताजी के साथ रसोईघर में काम करने बैठ जाती थी.

काम भी क्या… छीलतेछीलते आधा किलो मटर तो वह खुद खा जाती थी. माताजी को वह मेरे लिए बहुत पसंद थी, इसलिए वे उस से बहुत स्नेह रखती थीं.

हम कल्याण के बिड़ला कालेज में थर्ड ईयर तक साथ पढे़ थे. हम ने लोकल ट्रेनों में खूब धक्के खाए थे. कभीकभार हम कालेज से बंक मार कर खंडाला तक घूम आते थे. हर शुक्रवार को सिनेमाघर जाना हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया था.

इसी बीच उस की मां की मौत हो गई. कुछ दिनों बाद उस के पिता उस के लिए एक नई मां ले आए थे.

ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद मैं और पढ़ाई करने के लिए दिल्ली चला गया था. कई दिनों तक उस के बगैर मेरा मन नहीं लगा था.

जैसेतैसे 7 साल निकल गए. एक दिन माताजी की चिट्ठी आई. उन्होंने बताया कि उस के घर वाले धारावी से मुंबई में कहीं और चले गए हैं.

7 साल बाद जब मैं लौट कर आया, तो अब उसे इतने बड़े महानगर में कहां ढूंढ़ता? मेरे पास उस का कोई पताठिकाना भी तो नहीं था. मेरे जाने के बाद उस ने माताजी के पास आना भी बंद कर दिया था.

जब वह थी… ऐसा लगता था कि शायद वह मेरे लिए ही बनी हो. और जिंदगी इस कदर खुशगवार थी कि उसे बयां करना मुमकिन नहीं.

मेरा उस से रोज ?ागड़ा होता था. गुस्से के मारे मैं कई दिनों तक उस से बात ही नहीं करता था, तो वह रोरो कर अपना बुरा हाल कर लेती थी. खानापीना छोड़ देती थी. फिर बीमार पड़ जाती थी और जब डाक्टरों के इलाज से ठीक हो कर लौटती थी, तब मुझ से कहती थी, ‘तुम कितने मतलबी हो. एक बार भी आ कर पूछा नहीं कि तुम कैसी हो?’

जब वह ऐसा कहती, तब मैं एक बार हंस भी देता था और आंखों से आंसू भी टपक पड़ते थे.

मैं उसे कई बार समझाता कि ऐसी बात मत किया कर, जिस से हमारे बीच लड़ाई हो और फिर तुम बीमार पड़ जाओ. लेकिन उस की आदत तो जंगल जलेबी की तरह थी, जो मुझे भी गोलमाल कर देती थी.

कुछ भी हो, पर मैं बहुत खुश था, सिवा पिताजी के जो हमेशा अपने ब्राह्मण होने का घमंड दिखाया करते थे.

एक दिन मेरे दोस्त नवीन ने मुझसे कहा, ‘‘यार पृथ्वी… अंधेरी वैस्ट में ‘रैडक्रौस’ नाम का बहुत शानदार बीयर बार है. वहां पर ‘डौली’ नाम की डांसर गजब का डांस करती है. तुम देखने चलोगे क्या? एकाध घूंट बीयर के भी मार लेना. मजा आ जाएगा.’’

बीयर बार के अंदर के हालात से मैं वाकिफ था. मेरा मन भी कच्चा हो रहा था कि अगर पुलिस ने रेड कर दी, तो पता नहीं क्या होगा… फिर भी मैं उस के साथ हो लिया.

रात गहराने के साथ बीयर बार में रोशनी की चमक बढ़ने लगी थी. नकली धुआं उड़ने लगा था. धमाधम तेज म्यूजिक बजने लगा था.

अब इंतजार था डौली के डांस का. अगला नजारा मुझे चौंकाने वाला था. मैं गया तो डौली का डांस देखने था, पर साथ ले आया चिंता की रेखाएं.

उसे देखते ही बार के माहौल में रूखापन दौड़ गया. इतने सालों बाद दिखी तो इस रूप में. उसे वहां देख

कर मेरे अंदर आग फूट रही थी. मेरे अंदर का उबाल तो इतना ज्यादा था कि आंखें लाल हो आई थीं.

आज वह मुझे अनजान सी आंखों से देख रही थी. इस से बड़ा दर्द मेरे लिए और क्या हो सकता था? उसे देखते ही, उस के साथ बिताई यादों के झरोखे खुल गए थे.

मु?ो याद हो आया कि जब तक उस की मां जिंदा थीं, तब तक सब ठीक था. उन के मर जाने के बाद सब धुंधला सा गया था.

उस की अल्हड़ हंसी पर आज ताले जड़े हुए थे. उस के होंठों पर दिखावे की मुसकान थी.

वह अपनेआप को इस कदर पेश कर रही थी, जैसे मुझे कुछ मालूम ही नहीं. वह रात को यहां डांसर का काम किया करती थी और रात की आखिरी लोकल ट्रेन से अपने घर चली जाती थी. उस का गाना खत्म होने तक बीयर की पूरी

2 बोतलें मेरे अंदर समा गई थीं.

मेरा सिर घूमने लगा था. मन तो हुआ उस पर हाथ उठाने का… पर एकाएक उस का बचपन का मासूम चेहरा मेरी आंखों के सामने तैर आया.

मेरा बीयर बार में मन नहीं लग रहा था. आंखों में यादों के आंसू बह रहे थे. मैं उठ कर बाहर चला गया. नवीन तो नशे में चूर हो कर वहीं लुढ़क गया था.

मैं ने रात के 2 बजे तक रेलवे स्टेशन पर उस के आने का इंतजार किया. वह आई, तो उस का हाथ पकड़ कर मैं ने पूछा, ‘‘यह सब क्या है?’’

‘‘तुम इतने दूर चले गए. पढ़ाई छूट गई. पापी पेट के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम तो करना ही था. मैं क्या करती?

‘‘सौतेली मां के ताने सुनने से तो बेहतर था… मैं यहां आ गई. फिर क्या अच्छा, क्या बुरा…’’ उस ने कहा.

‘‘एक बार माताजी से आ कर मिल तो सकती थीं तुम?’’

‘‘हां… तुम्हारे साथ जीने की चाहत मन में लिए मैं गई थी तुम्हारी देहरी पर… लेकिन तुम्हारे दर पर मुझे ठोकर खानी पड़ी.

‘‘इस के बाद मन में ही दफना दिए अनगिनत सपने. खुशियों का सैलाब, जो मन में उमड़ रहा था, तुम्हारे पिता ने शांत कर दिया और मैं बैरंग लौट आई.’’

‘‘तुम्हें एक बार भी मेरा खयाल नहीं आया. कुछ और काम भी तो कर सकती थीं?’’ मैं ने कहा.

‘‘कहां जाती? जहां भी गई, सभी ने जिस्म की नुमाइश की मांग रखी. अब तुम ही बताओ, मैं क्या करती?’’

‘‘मैं जानता हूं कि तुम्हारा मन मैला नहीं है. कल से तुम यहां नहीं आओगी. किसी को कुछ कहनेसम?ाने की जरूरत नहीं है. हम दोनों कल ही दिल्ली चले जाएंगे.’’

‘‘अरे बाबू, क्यों मेरे लिए अपनी जिंदगी खराब कर रहे हो?’’

‘‘खबरदार जो आगे कुछ बोली. बस, कल मेरे घर आ जाना.’’

इतना कह कर मैं घर चला आया और वह अपने घर चली गई. रात सुबह होने के इंतजार में कटी. सुबह उठा, तो अखबार ने मेरे होश उड़ा दिए. एक खबर छपी थी, ‘रैडक्रौस बार की मशहूर डांसर डौली की नींद की ज्यादा गोलियां खाने से मौत.’

मेरा रोमरोम कांप उठा. मेरी खुशी का खजाना आज लुट गया और टूट गया प्यार का धागा.

‘‘शादी करने के लिए कहा था, मरने के लिए नहीं. मुझे इतना पराया सम?ा लिया, जो मुझे अकेला छोड़ कर चली गई? क्या मैं तुम्हारा बो?ा उठाने लायक नहीं था? तुम्हें लाल साड़ी में देखने

की मेरी इच्छा को तुम ने क्यों दफना दिया?’’ मैं चिल्लाया और अपने कानों पर हथेलियां रखते हुए मैं ने आंखें भींच लीं.

बाहर से उड़ कर कुछ टूटे हुए डैने मेरे पास आ कर गिर गए थे. हवा से अखबार के पन्ने भी इधरउधर उड़ने लगे थे. माहौल में फिर सन्नाटा था. रूखापन था. गम से भरी उगती हुई सुबह थी वह. Hindi Romantic Story

Best Hindi Kahani: खिल उठी कलियां

Best Hindi Kahani: हवाईजहाज के पहिए से दिल्ली आया काबुल का किशोर अफगानिस्तान से एक 13 साल का किशोर हवाईजहाज के व्हील वैल (हवाईजहाज के पहिए की जगह) में छिप कर काबुल से दिल्ली पहुंच गया. जब उस किशोर से पूछताछ की गई, तो उस ने बताया कि वह अफगानिस्तान का रहने वाला है और गलती से भारत आने वाली फ्लाइट में चढ़ गया था, जबकि उसे ईरान जाना था. काबुल एयरपोर्ट पर वह मुसाफिरों की गाड़ी के पीछेपीछे अंदर घुस गया था और फिर हवाईजहाज के व्हील वैल में छिप गया था. सफर के दौरान पहिए के अंदर जाने के बाद दरवाजा बंद हो गया और वह उसी में चिपका रहा. यह बेवकूफी पर हिम्मत का काम है, क्योंकि जिस ऊंचाई पर हवाईजहाज उड़ता है, वहां बेहद ठंड होती है और औक्सीजन न के बराबर होती है

‘‘आप चाहें मु झ से कुछ भी कहें, लेकिन अब मैं दोबारा किसी कीमत पर काशान से निकाह नहीं करूंगी. उस ने मेरी जिंदगी जहन्नुम बना दी और आप बोल रही हैं कि मैं काशान से निकाह कर के अपनेआप को दोबारा उसी कैदखाने में कैद कर लूं? घुटन होती है मु झे वहां… आप लोग सम झते क्यों नहीं?’’ हिना बारबार अपनी अम्मी को सम झा रही थी, लेकिन वे किसी भी कीमत पर हिना का निकाह दोबारा काशान से ही करवाना चाहती थीं.

‘‘बेटी, तुम क्यों नहीं सम झ रही हो… काशान के अब्बू रफीक मियां ने खुद हमारे यहां आ कर माफी मांगी है. वे चाहते हैं कि तुम दोबारा उन के घर की बहू बनो,’’ हिना की अम्मी अमीना उसे प्यार से सम झाते हुए बोलीं.

‘‘चलिए ठीक है, मैं काशान से दोबारा निकाह करने के लिए तैयार हूं, मगर मैं किसी भी कीमत पर हलाला नहीं करूंगी. क्या बिना हलाला के रफीक मियां मेरा निकाह काशान से करवाएंगे?’’ हिना ने गुस्से से अपनी अम्मी से कहा.

‘‘हिना, तुम अच्छी तरह से जानती हो कि शरीयत में अगर शौहर गुस्से में आ कर अपनी बीवी को तलाक ए बिद्दत दे देता हैं और वह दोबारा उसी लड़की निकाह करना चाहता है, तो उस की बीवी को हलाला जैसी रस्म से गुजरना ही पड़ेगा… और फिर आसिफ तुम्हारा देवर भी लगता है. तुम उसे बचपन से जानती हो.

उस से चुपचाप तुम्हारा निकाह करवा दिया जाएगा और अगले दिन आसिफ तुम्हें तलाक दे देगा और तुम्हारा काशान से दोबारा हो जाएगा,’’ हिना की अम्मी अमीना ने शरीयत का हवाला देते हुए हिना को सम झाया.

‘‘तो क्या शौहर गलती करे और सजा केवल उस की बीवी को ही मिले? क्या औरत की कोई इज्जत और उस का वजूद नहीं होता है? जब जी चाहा अपना लिया और जब जी चाहा जिंदगी से निकाल कर फेंक दिया?’’ हिना रोते हुए बोली.

हिना की बात सुन कर अमीना चुपचाप कमरे से बाहर आ गईं.

हिना को सम झ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. जिस को वह बेइंतहा मुहब्बत करती थी आज उसी के साथ उस का हलाला करवाने की बात की जा रही है. उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वह आसिफ को एक बार फिर एक बड़ा जख्म देने की तैयारी कर रही है.

हिना को उस के शौहर काशान ने तलाक दे दिया था और उस के इद्दत के दिन पूरे हो गए थे, इसलिए उस की अम्मी और अब्बू उसे दोबारा काशान से निकाह करने के लिए बोल रहे थे, लेकिन वह किसी कीमत पर काशान से निकाह नहीं करना चाहती थी.

काश, हिना ने उस वक्त आवाज उठाई होती, जब आसिफ से उस की शादी न कर के काशान से करवाने की बात कही गई थी, तो आज उस की जिंदगी खराब नहीं होती.

यह सोचते ही हिना को ऐसा महसूस होने लगा था कि उस के जख्म एक बार फिर हरे हो गए हैं और उन में से टीस उठने लगी है.

कितनी मुहब्बत करते थे वे दोनों. आसिफ हिना के पड़ोस में ही रहता था. बचपन में वह और आसिफ साथ ही खेला करते थे. जब वह पढ़ाई करती थी, तो अकसर आसिफ से सवाल के जवाब पूछने पहुंच जाती थी.

पढ़तेपढ़ाते वे दोनों कब जवानी की दहलीज पर पहुंच गए, उन्हें इस का पता ही नहीं चला… यही नहीं, वे दोनों एकदूसरे से मुहब्बत भी करने लगे थे और यह बात किसी से छिपी हुई नहीं थी. 1-2 बार हिना के अब्बू ने खुद ही कहा था कि वे उस की शादी आसिफ से ही करवाएंगे.

सबकुछ ठीक ही चल रहा था. आसिफ अपने अब्बू के साथ कपड़े की दुकान पर ही बैठता था और साथ ही वह पढ़ाई भी कर रहा था. इसी बीच आसिफ के अब्बू बीमार पड़ गए. उन का काफी इलाज करवाया गया, लेकिन वे बच नहीं पाए.

आसिफ को अपने अब्बू के इलाज में काफी पैसे खर्च करने पड़ गए, जिस की वजह से दुकानदारी गड़बड़ा गई और घर के हालात खराब हो गए.

उस वक्त हिना ने खुद आसिफ का हौसला बढ़ाया था, जिस के चलते आसिफ की हिम्मत नहीं टूटी. उस ने पढ़ाई छोड़ कर दुकान पर बैठना शुरू कर दिया था. बेहतर क्वालिटी का सामान और पढ़ालिखा होने से उस की दुकान फिर चल निकली.

पैसे की कमी देखते हुए हिना ने आसिफ को बैंक से लोन लेने का सु झाव दिया. आसिफ ने भागदौड़ कर के बैंक से दुकान के लिए लोन ले लिया था. उसी से दुकान का काम भी अच्छा चल निकला.

उधर हिना के अब्बू ने उस का रिश्ता ढूंढ़ना शुरू कर दिया था. हिना को जब इस बात का पता चला, तो उस ने आसिफ से उस के घर पर अपनी अम्मी के जरीए रिश्ता भेजने के लिए बोल दिया.

आसिफ की अम्मी जब रिश्ता ले कर घर आईं, तो हिना बहुत खुश थी और वह आसिफ के साथ शादी के सपनों में खो गई. लेकिन हिना के अब्बू ने साफ मना करते हुए कह दिया, ‘‘हम अपनी बेटी की शादी किसी बड़े घर में करेंगे, जहां पर वह रानी बन कर रहेगी. तुम्हारे घर में तो उसे ढंग का कपड़ा और खाना भी नहीं मिलेगा.’’

हिना के अब्बू की बात सुन कर आसिफ की अम्मी चुपचाप वहां से चली गईं.

उस दिन हिना बहुत रोई थी, लेकिन वह इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाई कि अपने अब्बू से बोल सके कि वह आसिफ से ही शादी करेगी.

हिना को अच्छी तरह से याद है कि जब वह आसिफ से मिली थी, तो आसिफ काफी रोया था और उस को अपनी मुहब्बत की दुहाई दे रहा था, लेकिन वह खामोश रही और चुपचाप घर वापस आ गई थी.

हिना के अब्बू ने पैसे वाला देख कर उस की शादी आसिफ के चाचा रफीक मियां के बेटे काशान से करवा दी थी. रफीक मियां काफी अमीर थे. जमीनजायदाद के अलावा एक कपड़े की दुकान भी थी, जिस पर काशान अपने अब्बू के साथ बैठता था.

हिना की शादी बहुत ही धूमधाम के साथ हुई. सभी को यकीन था कि हिना वहां बहुत सुखी रहेगी. लेकिन शादी के एक महीने बाद से ही हिना और काशान में झगड़े शुरू हो गए. इन झगड़ों की वजह यह भी थी कि हिना पढ़ीलिखी थी और काशान ठीक से दस्तखत भी नहीं कर पाता था. काशान अकसर उस की बेइज्जती कर देता और पिटाई भी. वह हिना को कहीं अकेले बाहर भी नहीं जाने देता था.

काशान औनलाइन सट्टेबाजी किया करता था. यही नहीं, उस ने औनलाइन जुआ भी खेलना शुरू कर दिया था. हिना जब मना करती, तो काशान झगड़ा करना शुरू कर देता.

उधर लगातार जुए और सट्टेबाजी की वजह से दुकान में घाटा हो रहा था, लेकिन सास का कहना था कि जब से हिना के पैर घर में पड़े हैं, तब से नुकसान हो रहा है, जबकि सभी जानते थे कि काशान औनलाइन सट्टे और जुए में सबकुछ बरबाद कर रहा है.

एक दिन झगड़ा ज्यादा बढ़ गया तो सास भी अपने बेटे की तरफदारी करने लगीं और काशान ने हिना को तलाक दे दिया. तलाक की बात सुन कर सभी हैरान रह गए थे. हिना चुपचाप अपने घर आ गई थी. सभी सोच रहे थे कि हिना की जिंदगी खराब हो गई है, लेकिन यह बात हिना जानती थी कि कम से कम उसे इस जहन्नुम से तो छुटकारा मिल गया.

‘‘हिना…’’ तभी किसी की आवाज सुन कर वह यादों के भंवर से निकल कर वापस आ गई. उस ने देखा कि कमरे में उस की सहेली अंजुम खड़ी थी. उस ने अपने गालों पर आए आंसुओं को पोंछते हुए अंजुम को एक ओर बैठने का इशारा किया.

‘‘हिना, तुम क्यों नहीं खाला की बात मान लेती… जिस से तुम मुहब्बत करती थी उसी से तुम्हें हलाला की रस्म अदा करनी पड़ेगी, तो इस में परेशानी किस बात की है…’’ अंजुम उसे सम झाते हुए बोली.

आसिफ का नाम सुनते ही हिना के चेहरे पर अनोखी चमक आ गई थी, लेकिन वह कुछ नहीं बोली. पर फिर उस ने कुछ सोच कर अंजुम के सामने हामी भर ली. उस की ‘हां’ सुन कर अंजुम वहां से चली गई.

दूसरी ओर जब से रफीक चाचा ने आसिफ से हिना के साथ हलाला करने के रस्म अदायगी की बात कही थी, तब से वह काफी उल झन में था, इसलिए वह छत पर बैठा यों ही मोबाइल में फालतू की रील्स देख रहा था.

‘‘आसिफ, नीचे आ कर खाना खा लो,’’ तभी उसे अपनी अम्मी की आवाज सुनाई दी.

आसिफ ने मोबाइल जेब में रखा और छत से नीचे उतर आया. अम्मी ने उस को खाना दे दिया. उस ने हाथमुंह धो कर बेमन से खाना खाया और फिर अपने कमरे में चला गया.

आसिफ को लग रहा था कि हिना की बेइज्जती करने के लिए ही उस का इस्तेमाल किया जा है.

उधर हिना बिना किसी को बताए आसिफ के घर पहुंच गई. उस की अम्मी को ‘सलाम’ कर के वह सीधी आसिफ के कमरे में दाखिल हो गई.

‘‘क्या हो रहा है?’’ हिना ने पूछा.

‘‘तुम…?’’ आसिफ ने हैरान हो कर कहा.

‘‘हां आसिफ, मैं तुम से बात करने आई हूं,’’ सामने पड़े हुए स्टूल पर बैठते हुए हिना बोली.

‘‘क्या बात है?’’ आसिफ ने हिना से पूछा.

आसिफ को देख कर हिना को लग रहा था कि अचानक उस के दिल की धड़कन तेज हो गई थी.

‘‘अभी रफीक मियां तुम्हारे पास आए थे न?’’ हिना बोली.

‘‘हां, वे फिर तुम्हें अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं. वे मानते हैं कि गलती काशान की थी,’’ आसिफ धीरे से बोला.

‘‘अगर गलती काशान की थी, तो सजा मु झे क्यों दी जा रही है?’’ भर्राई हुई आवाज में हिना बोली.

‘‘काशान से दोबारा निकाह के लिए हलाला तो करना ही पड़ेगा,’’ आसिफ बोला.

‘‘मुझे मालूम है कि मेरा निकाह तुम्हारे साथ हो रहा है, इसीलिए अब मैं ने ‘हां’ कर दी है. मैं जानती हूं कि उस के अम्मीअब्बू को तो इस बात का एहसास नहीं हो रहा है कि उन की बहू के साथ उस घर में क्याक्या जुल्म हुए हैं और वह किस तरह जहन्नुम की आग में जल रही थी, क्योंकि उन्हें लगता है कि जिंदगी में पैसा ही सबकुछ है.

‘‘लेकिन तुम तो मु झ से मुहब्बत करते थे… तुम इस बात को कैसे भूल गए? बस, मैं तुम्हें इतना बताने आई हूं कि निकाह के बाद मैं तुम्हारी बीवी बन जाऊंगी. क्या तुम अपनी बीवी को किसी दूसरे के हवाले कर दोगे?’’ रोते हुए हिना बोली.

‘‘लेकिन…’’ हिना की बात से आसिफ के पूरे बदन में सिहरन सी दौड़ गई और वह कुछ बोल न सका.

‘‘और हां, अगर हलाला के नाम पर तुम ने मु झे तलाक दे दिया, तब भी मैं उस जहन्नुम में नहीं जाऊंगी. निकाह कुबूल करना या न करना मेरा फैसला होगा.’’

‘‘तब सभी मु झे गलत कहेंगे…’’ आसिफ ने कहा.

‘‘तुम तो पढ़ेलिखे सम झदार हो. क्या लोगों के कहने पर अपनी बीवी को छोड़ दोगे?’’ हिना रोती जा रही थी और बोले जा रही थी. उसे सम झ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

उधर हिना को रोते देख कर अनायास ही आसिफ की आंखों से भी आंसू बहने लगे थे. तभी किसी ने हिना के कंधे पर हाथ रखा. हिना ने देखा कि कमरे में उस के अब्बू आ गए थे और उन के साथ ही आसिफ की अम्मी भी खड़ी थीं.

‘‘बेटी, मुझे माफ कर दो. मैं सिर्फ अपनी इज्जत और रुतबे का खयाल कर रहा था. मैं नहीं जानता था कि मेरी बेटी किस दर्द से गुजर रही है. मैं ने तुम दोनों को एक बार अलग कर के गलती की थी, लेकिन अब मैं यह गलती दोबारा नहीं करूंगा. अब तुम सिर्फ आसिफ की ही दुलहन बनोगी,’’ अब्बू ने कहा.

हिना ने देखा कि उस के अब्बू की भी आंखों में आंसू थे. वह उठ कर कर अब्बू के गले लग गई. आज उसे लग रहा था कि एक बार फिर से उस की जिंदगी में बहार आ गई है और कलियां खिलने लगी हैं. Best Hindi Kahani

Hindi Family Story: एक सच यह भी

Hindi Family Story: ‘‘नलिनी…’’ अपने नाम की पुकार के साथ ही नलिनी के हड़बड़ाते कदम ठिठक गए और उस की नजरें पुकार की दिशा में घूम गईं.

‘‘इन लोगों ने मु झे जबरदस्ती पकड़ लिया है. मैं बेकुसूर हूं. मैं ने कुछ नहीं किया. इन्हें सम झाओ…’’

‘‘मैडम, क्या आप इसे पहचानती हैं?’’ एक पुलिस वाले ने नलिनी से पूछा.

अपने पति जतिन की आंखों में सवालिया निशान देख कर नलिनी के चेहरे पर घबराहट दिखने लगी और ‘हां’ में हिलने वाली उस की गरदन कब ‘न’ के अंदाज में इधर से उधर तेजी से हिल उठी, खुद नलिनी को भी पता नहीं चला.

रेहान का चेहरा लटक गया. आंखों में उभरे आशा के दीप अचानक से बुझ गए.

जिस सवाल से नलिनी पूरा दिन बचने की कोशिश करती रही, रात को बिस्तर पर आते ही जतिन ने वही सवाल बंदूक की गोली सा दाग दिया, ‘‘तुम वाकई उस शख्स को नहीं जानती?’’

‘‘किस को?’’ नलिनी ने अनजान बन कर पूछा, लेकिन उस के दिल की गड़गड़ाहट बेकाबू हुए जा रही थी.

‘‘वही जिसे मौल से पुलिस पकड़ कर ले जा रही थी.’’

‘‘आप मु झ पर शक कर रहे हैं?’’

‘‘नहीं. अगर तुम कह रही हो, तो वाकई तुम उसे नहीं जानती. आओ, अब सो जाते हैं,’’ जतिन हमेशा की तरह नलिनी को अपनी बांहों में ले कर सुलाने लगे, पर नलिनी का दिल रो उठा.

‘कितना प्यार और भरोसा करते हैं जतिन मु झ पर… और मैं उन के भरोसे का यह सिला दे रही हूं… सिर्फ उन का ही नहीं, बल्कि मैं ने रेहान का भी भरोसा तोड़ दिया है. कितनी उम्मीद से उस ने मु झे पुकारा था और मैं ने उसे पहचानने से ही इनकार कर दिया…’ गहराती रात के साथ नलिनी के दिल का दर्द बढ़ता जा रहा था. वह जतिन के सीने से लग कर फफक उठी.

‘‘मुझे माफ कर दीजिए. मैं ने आप से झूठ बोला था. मैं उस शख्स को जानती हूं,’’ नलिनी बोली.

‘‘मुझे मालूम है,’’ यह कहते हुए जतिन शांत थे.

‘‘क्या? पर कैसे?’’ नलिनी ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘अरे यार, वकील हूं. पारखी नजर और तेज दिमाग रखता हूं.’’

‘‘फिर भी आप ने कोई सवालजवाब नहीं किया?’’

‘‘तुम्हारे प्यार के आगे सब बातें फालतू हैं. अगर तुम नहीं बताना चाहती, तो मैं कभी भी नहीं पूछूंगा.’’

‘‘लेकिन मैं सबकुछ बताना चाहती हूं. मेरे दिल पर बहुत बड़ा बो झ है. सोचा तो था कि वह किस्सा वहीं दफन हो गया, पर अब आप को बताए बिना मु झे चैन नहीं पड़ेगा.

‘‘आप को तो पता ही है कि शादी से पहले मैं एक डिस्पैंसरी में नौकरी करती थी. लोगों की सम झाइश के लिए मुझे आसपास के कसबों और शहरों का दौरा करना पड़ता था. यह वाकिआ हमारी मंगनी के बाद का है.

‘‘मैं पास के एक शहर का दौरा कर के बस से लौट रही थी. एक कसबानुमा जगह पर बस रुकी. 2-4 मुसाफिर उतरे. उस के बाद ड्राइवर ने चाबी घुमाई, पर बस नहीं चली. खलासी और कुछ दूसरे लोगों ने उतर कर बस को धक्का भी लगाया, पर वह नहीं चली.

‘‘ड्राइवर ने हाथ खड़े कर दिए कि बस आगे नहीं जा पाएगी. अब तो सवेरे ही कुछ हो पाएगा. सभी लोग रात गुजारने का बंदोबस्त कर लें.

‘‘मेरे पास सूटकेस ले कर उतरने के अलावा कोई चारा नहीं था. मैं ने एक आदमी से किसी होटल का पता पूछा, तो उस ने सामने एक लौज की ओर इशारा कर दिया, जहां लुंगी पहने कुछ लोग शराब पीते, बोटियां चबाते नजर आ रहे थे.

‘‘मैं उस ओर जाने की सोचने से ही सिहर उठी थी. हमारी बस का एक मुसाफिर, जो मेरे सामने वाली सीट पर बैठा था और इसी कसबे में उतर गया था, अपने एक दोस्त से बतियाता अभी तक वहीं खड़ा था. उस ने मेरी कशमकश का अंदाजा लगा लिया था. वह मेरे पास आया और अपने घर चलने की कहने लगा.

‘‘उस ने मु झ से कहा, ‘घबराइए नहीं. घर पर मेरे मातापिता हैं, छोटी बहन भी है.’

‘‘मेरे पास दूसरा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. उस ने एक आटोरिकशा किया और मैं उस के साथ चल दी.’’
जतिन ने पूछा, ‘‘यह वही नौजवान था, जो आज मौल में मिला था?’’

‘‘हां, वही था. उस का नाम रेहान है. पर उस वक्त तक मु झे मालूम नहीं था कि मैं एक मुसलिम नौजवान के साथ जा रही हूं, वरना उस समय के हिंदूमुसलिम दंगे वाले माहौल में मैं ऐसा खतरा कभी नहीं उठाती.

‘‘जब तंग गलियों से आटोरिकशा गुजरने लगा, तो मु झे अहसास हुआ कि एक अनजान शख्स के साथ आ कर मैं ने कितनी बड़ी गलती कर दी है. इस से अच्छा तो वहीं बसस्टैंड पर ही जागते हुए रात गुजार देती.

इतने लोग थे तो वहां. पर अब क्या हो सकता था…

‘‘एक घर के आगे जा कर आटोरिकशा रुका, तो अंदर से एक लड़की चहकती हुई आई और ‘भाईजान’ कहते हुए उस शख्स से लिपट गई. तब कहीं जा कर मेरी जान में जान आई.

‘‘तब तक उस के मातापिता भी बाहर आ चुके थे. उन्हें देख कर मेरा माथा ठनका. पहली नजर में ही मु झे लग गया कि मैं किसी कट्टर मुसलिम परिवार में आ गई हूं.’’

‘‘लेकिन इस में इतना खौफ खाने की वजह?’’ जतिन ने सवाल किया.

‘‘एक तो यही कि उस समय भी माहौल ठीक नहीं था. दूसरे, अपने दौरों के दौरान मैं ने हमेशा यह महसूस किया कि मुसलिम बहुत कट्टर होते हैं और मेरी परिवार नियोजन की दलीलों पर वे जरा भी कान नहीं देते थे.’’

‘‘ओह…’’ जतिन के मुंह से निकला.

‘‘रेहान की बहन, जिस का नाम सलमा था, उसे चहकते हुए बता रही थी कि अम्मी ने उस की मनपसंद मुर्ग बिरयानी बना रखी है… मु झे तो यह सुन कर ही मितली आने लगी थी. पर उस की अम्मी बहुत सम झदार निकलीं. तब तक रेहान उन्हें मेरे बारे में सबकुछ बता चुका था…

‘‘रेहान की अम्मी बोलीं, ‘इसे अपना ही घर सम झो बेटी.’

‘‘यह बात कह कर उन्होंने मु झे अपना बना लिया था. फिर तो मेरे लाख कहने पर भी वे मेरे लिए ताजा खाना बना कर ही मानी थीं. सब ने मेरे साथ बैठ कर दाल और आलू की सब्जी खाई थी. यह कह कर कि बिरियानी हम कल खा लेंगे, मेहमाननवाजी का मौका कबकब मिलता है.

‘‘उन्होंने मेरा दिल जीत लिया था. सारा खौफ पल में छूमंतर हो गया था. रात को मैं और सलमा एक कमरे में सो गए थे. रेहान ने बैठक में बिस्तर लगा लिया था.

‘‘अनजान माहौल में नींद आते मु झे वक्त लगा था. सच कहूं, तड़के जा कर ही आंख लग पाई थी कि तभी मैं चौंक कर उठ बैठी थी. देखा, रेहान मेरे ऊपर झुका हुआ था.

‘‘मैं चिल्लाने ही वाली थी कि उस ने अपना हाथ मेरे मुंह पर रख दिया और बोला, ‘आप की बस ठीक हो गई है, इसलिए उठाने आया था. बाहर माहौल अभी भी गड़बड़ ही है. हमें चुपचाप निकलना होगा.’

‘‘मैं ‘ओह’ कह कर बुरी तरह झेंप गई थी. उस की अम्मी ने गले लग कर खूब अपनेपन से मु झे विदा किया था. रेहान मु झे छिपताछिपाता बसस्टैंड ले गया.

‘‘बस में बिठा कर वह तब तक मुसकरा कर हाथ हिलाता रहा, जब तक मैं उस की आंखों से ओ झल नहीं हो गई थी. मेरी उस से वही पहली और आखिरी मुलाकात थी.

‘‘पूरी रात किसी अनजान विधर्मी परिवार के साथ गुजारने की यह बात न तो मैं ने अपने परिवार वालों को बताई और न तुम्हें. बेवजह तिल का ताड़ बन जाता. आज भी यही सोच कर मैं ने उसे पहचानने से ही इनकार कर दिया कि पता नहीं तुम इस पहचान का क्या मतलब निकाल लो.’’

‘‘बस, इतना ही भरोसा है अपने प्यार पर? नलिनी, वक्त, इज्जत और एतबार ऐसे परिंदे हैं, जो एक बार उड़ जाएं, तो वापस नहीं आते,’’ जतिन ने कहा.

‘‘तभी तो शर्मिंदा हूं. और अब अपने प्यार पर विश्वास के संबल से ही सबकुछ बताने की हिम्मत कर पाई हूं… कल की घटना याद करती हूं, तो अब भी सहम जाती हूं. बम, आतंकवाद, विस्फोट… क्या रेहान ऐसा कर सकता है?’’

‘‘मैं ने खुद उसे कूड़ेदान में पैकेट रखते देखा था. उस के कूड़ेदान में पैकेट रख कर दूर हटने के थोड़ी देर बाद ही विस्फोट हो गया था,’’ जतिन गंभीर थे.

‘‘ओह, कोई इनसान इतना दोगला भी हो सकता है, मैं ने नहीं सोचा था. अच्छा हुआ, मैं ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. ऐसे आतंकवादी देशद्रोहियों को तो फांसी ही लगनी चाहिए,’’ नलिनी फिर से तैश में आ
गई थी.

‘‘तुम बहुत जल्द फैसले लेती, बदलती रहती हो नलिनी. जिस इनसान से, उस के परिवार से तुम मिल कर आई हो, मेहमाननवाजी देख कर आई हो, उस के बारे में इतनी जल्दी अपनी राय बदल ली?

‘‘जिस तरह कानों सुना हमेशा सच नहीं होता, उसी तरह कई बार आंखों देखा भी सच नहीं होता.

‘‘यह भी तो हो सकता है कि बम कूड़ेदान में पहले से रखा हो. रेहान उस में कूड़ा डालने गया हो और उस की तसवीर सीसीटीवी कैमरे में कैद होते ही विस्फोट हो गया हो…’’

‘‘हां, बिलकुल मुमकिन है. मु झे तो लगता है कि बिलकुल ऐसा ही हुआ है,’’ नलिनी बोली.

‘‘लो, फिर तुम ने इतनी जल्दी राय बदल ली… कभी किसी के बहकावे में मत आओ. अपना दिमाग भी लगाओ. इनसानी संबंधों में सब से बड़ी गलती यह है कि हम आधा सुनते हैं, एकचौथाई सम झते हैं, जीरो सोचते हैं, लेकिन अपनी राय दोगुनी देते हैं.’’

‘‘अच्छा वकील साहब. मैं ने हार मानी. मुझ में आप जैसा तेज दिमाग नहीं है,’’ नलिनी ने जैसे हथियार डाल
दिए थे.

‘‘मेरे साथ जेल चलोगी?’’

‘‘क्यों? हम ने क्या किया है?’’ नलिनी बौखला उठी थी.

‘‘रेहान से मिलने,’’ जतिन की मुसकराहट बरकरार थी.

‘‘ओह. आप तो मु झे डरा ही देते हैं,’’ कह कर नलिनी इतमीनान से जतिन के सीने से लग गई थी. जब जिंदगी नामक स्क्रीन लो बैटरी दिखाती है और कोई चार्जर नहीं मिलता, तब जो पावर बैंक काम आता है, उसे पति कहते हैं.

अगले दिन धड़कते दिल से जतिन का हाथ थामे नलिनी जेल में दाखिल हुई.

रेहान ने नलिनी को देखा, तो मुंह फेर लिया और बोला, ‘‘मैं इन्हें नहीं जानता. इन्हें कह दीजिए कि यहां से चली जाएं.’’

‘‘रेहान, भाई प्लीज, इसे माफ कर दो. यह उस वक्त बहुत घबरा गई थी. मैं जतिन हूं. नलिनी का पति और एक वकील. मुझे सब खुल कर बताओ. शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूं,’’ जतिन बोले.

‘‘मैं आतंकवादी कैसे हो सकता हूं साहब? मैं तो खुद अपना पूरा परिवार ऐसे ही एक हादसे में खो बैठा हूं,’’ रेहान बोला.

‘‘क्या? सलमा, अम्मी…’’ नलिनी हैरान थी.

‘‘हां, नलिनी बहन. सलमा, अम्मीअब्बू सब ऐसे ही एक विस्फोट में जान से हाथ धो बैठे थे. मैं तो जीतेजी ही मर चुका था.

‘‘इनसान उन चीजों से कम बीमार होता है, जो वह खाता है, बल्कि उन चीजों से ज्यादा बीमार होता है, जो उसे अंदर ही अंदर खाती हैं.

‘‘सम झ नहीं आता कि बेकुसूर लोगों की जान लेने से इन का कौन सा मकसद पूरा होता है? मुसलिम तो मैं भी हूं, लेकिन मेरा क्या किसी का भी धर्म ऐसा घिनौना काम करने की इजाजत नहीं देता.

‘‘मैं तो अपने डिस्पोजेबल बरतन कूड़ेदान में डालने गया था और काउंटर पर पैसे दे कर निकल ही रहा था कि वह धमाका हो गया.

‘‘मैं तो खुद हैरान था कि यह क्या हुआ कि तभी वहां तैनात पुलिस वालों ने पूछताछ करना शुरू कर दिया और मुझे पकड़ लिया.

‘‘जब तक माजरा समझ आता तब तक बहुत देर हो चुकी थी. मेरी पहचान ही मेरी दुश्मन बन गई.

‘‘धर्म एक होने से क्या इनसानों का मकसद भी एक हो जाता है? खैर, अब फांसी भी हो जाए तो कोई गम नहीं. मेरी बहन ने तो मु झे गलत नहीं सम झा. मेरे लिए इतना ही काफी है.’’

‘‘जल्दी जागना हमेशा ही फायदेमंद होता है. चाहे वह नींद से हो, अहम से हो या वहम से हो. चिंता मत करो. तुम्हारा केस अब मैं लड़ूंगा. तुम्हारी कही गई बातों पर मुझे भरोसा है. तुम बस अपना मनोबल बनाए रखना,’’ जतिन ने कहा.

नलिनी ने आगे बढ़ कर सलाखें पकड़े खड़े रेहान के हाथों पर अपने हाथ रख दिए थे, जो इस बात का सुबूत थे कि इस जंग में वह भी उस के साथ है. Hindi Family Story

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