एक मौका और दीजिए : बहकने लगे सुलेखा के कदम – भाग 2

उधर मनीष, नीलेश के प्रति अपने व्यवहार के लिए स्वयं को धिक्कार रहा था. पहली बार ऐसा हुआ था कि कोई प्रोग्राम बनने से पूर्व ही अधर में लटक गया था पर वह करता भी तो क्या करता. नीलेश की बातें सुन कर उस के दिल में  शक का कीड़ा कुलबुला कर नागफनी की तरह डंक मारते हुए उसे दंशित करने लगा था.

वह जानता था कि उसे महीने में 10-12 दिन घर से बाहर रहना पड़ता है. ऐसे में हो सकता है सुलेखा की किसी के साथ घनिष्ठता हो गई हो. इस में  कुछ बुरा भी नहीं है पर उसे यही विचार परेशान कर रहा था कि सुलेखा ने उस सुयश नामक व्यक्ति से उसे क्यों नहीं मिलवाया, जबकि नीलेश के अनुसार वह उस से मिलती रहती है. और तो और उस ने उस का नीलेश से अपना ममेरा भाई बता कर परिचय भी करवाया…जबकि उस की जानकारी में उस का कोई ममेरा भाई है ही नहीं…उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे पर सिर्फ अनुमान के आधार पर किसी पर दोषारोपण करना उचित भी तो नहीं है.

एक दिन जब सुलेखा बाथरूम में थी तो वह उस का सैलफोन सर्च करने लगा. एक नंबर  उसे संशय में डालने लगा क्योंकि उसे बारबार डायल किया गया था. नाम था सुश…सुश. नीलेश की जानकारी में सुलेखा का कोई दोस्त नहीं है फिर उस से बारबार बातें क्यों किया करती है और अगर उस का कोई दोस्त है तो उस ने उसे बताया क्यों नहीं. मन ही मन मनीष ने सोचा तो उस के अंतर्मन ने कहा कि यह तो कोई बात नहीं कि वह हर बात तुम्हें बताए या अपने हर मित्र से तुम्हें मिलवाए.

पर जीवन में पारदर्शिता होना, सफल वैवाहिक जीवन का मूलमंत्र है. अपने अंदर उठे सवाल का वह खुद जवाब देता है कि वह तुम्हारा हर तरह से तो खयाल रखती है, फिर मन में शंका क्यों?

‘शायद जिसे हम हद से ज्यादा प्यार करते हैं, उसे खो देने का विचार ही मन में असुरक्षा  पैदा कर देता है.’

‘अगर ऐसा है तो पता लगा सकते हो, पर कैसे?’

मन तर्कवितर्क में उलझा हुआ था. अचानक सुश और सुयश में उसे कुछ संबंध नजर आने लगा और उस ने वही नंबर डायल कर दिया.

‘‘बोलो सुलेखा,’’ उधर से किसी पुरुष की आवाज आई.

पुरुष स्वर सुन कर उसे लगा कि कहीं गलत नंबर तो नहीं लग गया अत: आफ कर के पुन: लगाया, पुन: वही आवाज आई…

‘‘बोलो सुलेखा…पहले फोन क्यों काट दिया, कुछ गड़बड़ है क्या?’’

उसे लगा नीलेश ठीक ही कह रहा था. सुलेखा उस से जरूर कुछ छिपा रही है… पर क्यों, कहीं सच में तो उस के पीछे उन दोनों में… अभी वह यह सोच ही रहा था कि सुलेखा नहा कर आ गई. उस के हाथ में अपना मोबाइल देख कर बोली, ‘‘कितनी बार कहा है, मेरा मोबाइल मत छूआ करो.’’

‘‘मेरे मोबाइल से कुछ नंबर डिलीट हो गए थे, उन्हीं को तुम्हारे मोबाइल से अपने में फीड कर रहा था,’’ न जाने कैसे ये शब्द उस की जबान से फिसल गए.

अपनी बात को सिद्ध करने के लिए वह ऐसा ही करने लगा जैसा उस ने कहा था. इसी बीच उस ने 2 आउटगोइंग काल, जो सुश को करे थे उन्हें भी डिलीट कर दिया, जिस से अगर वह सर्च करे तो उसे पता न चले.

अब संदेह बढ़ गया था पर जब तक सचाई की तह में नहीं पहुंच जाए तब तक वह उस से कुछ भी कह कर संबंध बिगाड़ना नहीं चाहता था. उस की पत्नी का किसी के साथ गलत संबंध है तथा वह उस से चोरीछिपे मिला करती है, यह बात भी वह सह नहीं पा रहा था. न जाने उसे ऐसा क्यों लगने लगा कि वह नामर्द तो नहीं, तभी उस की पत्नी को उस के अलावा भी किसी अन्य के साथ की आवश्यकता पड़ने लगी है.

‘तुम इतने दिन बाहर टूर पर रहते हो, अपने एकाकीपन को भरने के लिए सुलेखा किसी के साथ की चाह करने लगे तो इस में क्या बुराई है?’ अंतर्मन ने पुन: प्रश्न किया.

‘बुराई, संबंध बनाने में नहीं बल्कि छिपाने में है, अगर संबंध पाकसाफ है तो छिपाना क्यों और किस लिए?’

‘शायद इसलिए कि तुम ऐसे संबंध को स्वीकार न कर पाओ…सदा संदेह से देखते रहो.’

‘क्या मैं तुम्हें ऐसा लगता हूं…नए जमाने का हूं…स्वस्थ दोस्ती में कोई बुराई नहीं है.’

‘सब कहने की बात है, अगर ऐसा होता तो तुम इतने परेशान न होते… सीधेसीधे उस से पूछ नहीं लेते?’

‘पूछने पर मन का शक सच निकल गया तो सह नहीं पाऊंगा और अगर गलत निकला तो क्या मैं उस की नजरों में गिर नहीं जाऊंगा.’

‘जल्दबाजी क्यों करते हो, शायद समय के साथ कोई रास्ता निकल ही आए.’

‘हां, यही ठीक रहेगा.’

इस सोच ने तर्कवितर्क में डूबे मन को ढाढ़स बंधाया…उन के विवाह को 10 महीने हो चले थे. वह अपने पी.एफ. में उसे नामिनी बनाना चाहता था, उस के लिए सारी औपचारिकता पूरी कर ली थी. बस, सुलेखा के साइन करवाने बाकी थे. एक एल.आई.सी. भी खुलवाने वाला था, पर इस एपीसोड ने उसे बुरी तरह हिला कर रख दिया. अब उस ने सोचसमझ कर कदम उठाने का फैसला कर लिया.

यद्यपि सुलेखा पहले की तरह सहज, सरल थी पर मनीष के मन में पिछली घटनाओं के कारण हलचल मची हुई थी. एक बार सोचा कि किसी प्राइवेट डिटेक्टर को तैनात कर सुलेखा की जासूसी करवाए, जिस से पता चल सके कि वह कहां, कब और किस से मिलती है पर जितना वह इस के बारे में सोचता, बारबार उसे यही लगता कि ऐसा कर के वह अपनी निजी जिंदगी को सार्वजनिक कर देगा…आखिर ऐसी संदेहास्पद जिंदगी कोई कब तक बिता सकता है. अत: पता तो लगाना ही पड़ेगा, पर कैसे, समझ नहीं पा रहा था.

हफ्ते भर में ही ऐसा लगने लगा कि वह न जाने कितने दिनों से बीमार है. सुलेखा पूछती तो कह देता कि काम की अधिकता के कारण तबीयत ढीली हो रही है…वैसे भी सुलेखा का उस की चिंता करना दिखावा लगने लगा था. आखिर, जो स्त्री उस से छिप कर अपने मित्र से मिलती रही है वह भला उस के लिए चिंता क्यों करेगी?

उस दिन मनीष का मन बेहद अशांत था. आफिस से छुट्टी ले ली थी. सुलेखा ने पूछा तो कह दिया, ‘‘तबीयत ठीक नहीं लग रही है, अत: छुट्टी ले ली.’’

सुलेखा ने डाक्टर को दिखाने की बात कही तो वह टाल गया. आखिर बीमारी मन की थी, तन की नहीं, डाक्टर भी भला क्या कर पाएगा. रात का खाना भी नहीं खाया. सुलेखा के पूछने पर कह दिया कि बस, एक गिलास दूध दे दो, खाने का मन नहीं है. सुलेखा दूध लेने चली गई. उस के कदमों की आहट सुन कर उसे न जाने क्या सूझा कि अचानक अपनी छाती को कस कर दबा लिया तथा दर्द से कराहने लगा.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

कर्णफूल: क्यों अपनी ही बहन पर शक करने लगी अलीना-भाग 2

20-25 दिन की छुट्टी करने के बाद मैं ने जौब पर जाना शुरू कर दिया. मैं संभल तो गई, पर खामोशी व उदासी मेरे साथी बन गए. अम्मी मेरा बेहद खयाल रखती थीं. अलीना आपी भी आ गईं. हर तरह से मुझे ढांढस बंधातीं. वह काफी दिन रुकीं. जिंदगी अपने रूटीन से गुजरने लगी.

अलीना आपी ने इस विपत्ति से निकलने में बड़ी मदद की. मैं काफी हद तक सामान्य हो गई थी. उस दिन छुट्टी थी, अम्मी ने दो पुराने गावतकिए निकाले और कहा, ‘‘ये तकिए काफी सख्त हो गए हैं. इन में नई रुई भर देते हैं.’’

मैं ने पुरानी रुई निकाल कर नीचे डाल दी. फिर मैं ने और अलीना आपी ने रुई तख्त पर रखी. हम दोनों रुई साफ कर रहे थे और तोड़ते भी जा रहे थे. अम्मी उसी वक्त कमरे से आ कर हमारे पास बैठ गईं. उन के हाथ में एक प्यारी सी चांदी की डिबिया थी. अम्मी ने खोल कर दिखाई, उस में बेपनाह खूबसूरत एक जोड़ी जड़ाऊ कर्णफूल थे. उन पर बड़ी खूबसूरती से पन्ना और रूबी जड़े हुए थे. इतनी चमक और महीन कारीगरी थी कि हम देखते रह गए.

आलीना आपी की आंखें कर्णफूलों की तरह जगमगाने लगीं. उन्होंने बेचैनी से पूछा, ‘‘अम्मी ये किसके हैं?’’

अम्मी बताने लगीं, ‘‘बेटा, ये तुम्हारी दादी के हैं, उन्होंने मुझ से खुश हो कर मुझे ये कर्णफूल और माथे का जड़ाऊ झूमर दिया था. माथे का झूमर तो मैं ने अलीना की शादी पर उसे दे दिया था. अब ये कर्णफूल हैं, इन्हें मैं मलीहा को देना चाहती हूं. दादी की यादगार निशानियां तुम दोनों बहनों के पास रहेंगी, ठीक है न.’’

अलीना आपी के चेहरे का रंग एकदम फीका पड़ गया. उन्हें जेवरों का शौक जुनून की हद तक था, खास कर के एंटीक ज्वैलरी की तो जैसे वह दीवानी थीं. वह थोड़े गुस्से से कहने लगीं, ‘‘अम्मी, आप ने ज्यादती की, खूबसूरत और बेमिसाल चीज आपने मलीहा के लिए रख दी. मैं बड़ी हूं, आप को कर्णफूल मुझे देने चाहिए थे. ये आप ने मेरे साथ ज्यादती की है.’’

अम्मी ने समझाया, ‘‘बेटी, तुम बड़ी हो, इसलिए तुम्हें कुंदन का सेट अलग से दिया था, साथ में दादी का झूमर और सोने का एक सेट भी दिया था. जबकि मलीहा को मैं ने सोने का एक ही सेट दिया था. इस के अलावा एक हैदराबादी मोती का सेट था. उसे मैं ने कर्णफूल भी उस वक्त नहीं दिए थे, अब दे रही हूं. तुम खुद सोच कर बताओ कि क्या गलत किया मैं ने?’’

अलीना आपी अपनी ही बात कहती रहीं. अम्मी के बहुत समझाने पर कहने लगीं,  ‘‘अच्छा, मैं दादी वाला झूमर मलीहा को दे दूंगी, तब आप ये कर्णफूल मुझे दे दीजिएगा. मैं अगली बार आऊंगी तो झूमर ले कर आऊंगी और कर्णफूल ले जाऊंगी.’’

अम्मी ने बेबसी से मेरी तरफ देखा. मेरे सामने अजीब दोराहा था, बहन की मोहब्बत या कर्णफूल. मैं ने दिल की बात मान कर कहा, ‘‘ठीक है आपी, अगली बार झूमर मुझे दे देना और आप ये कर्णफूल ले जाना.’’

अम्मी को यह बात पसंद नहीं आई, पर क्या करतीं, चुप रहीं. अभी ये बातें चल ही रहीं थीं कि घंटी बजी. अम्मी ने जल्दी से कर्णफूल और डिबिया तकिए के नीचे रख दी.

पड़ोस की आंटी कश्मीरी सूट वाले को ले कर आई थीं. सब सूट व शाल वगैरह देखने लगे. हम ने 2-3 सूट लिए. उन के जाने के बाद अम्मी ने कर्णफूल वाली चांदी की डिबिया निकाल कर देते हुए कहा, ‘‘जाओ मलीहा, इसे संभाल कर अलमारी में रख दो.’’

मैं डिबिया रख कर आई. उस के बाद हम ने जल्दीजल्दी तकिए के गिलाफ में रुई भर दी. फिर उन्हें सिल कर तैयार किया और कवर चढ़ा दिए. 3-4 दिनों बाद अलीना आपी चली गईं. जातेजाते वह मुझे याद करा गईं, ‘‘मलीहा, अगली बार मैं कर्णफूल ले कर जाऊंगी, भूलना मत.’’

दिन अपने अंदाज में गुजर रहे थे. चाचाचाची और उन के बच्चे एक शादी में शामिल होने आए. वे लोग 5-6 दिन रहे, घर में खूब रौनक रही. खूब घूमेंफिरे. मेरी चाची अम्मी को कम ही पसंद करती थीं, क्योंकि मेरी अम्मी दादी की चहेली बहू थीं. अपनी खास चीजें भी उन्होंने अम्मी को ही दी थीं. चाची की दोनों बेटियों से मेरी खूब बनती थी, हम ने खूब एंजौय किया.

नादिर की मम्मी 2-3 बार आईं. बहुत माफी मांगी, बहुत कोशिश की कि किसी तरह इस मसले का कोई हल निकल जाए. पर जब आत्मा और चरित्र पर चोट पड़ती है तो औरत बरदाश्त नहीं कर पाती. मैं ने किसी भी तरह के समझौते से साफ इनकार कर दिया.

 

नाखून चबाना पड़ सकता है भारी, दें सकता है कई बिमारियों को बुलावा

अक्सर आपने कई लोगों को नाखून चबाते हुए  देखा होगा, जो दांत से अपने नाखून चबाते है, ऐसा ज्यादातर लोग जब किसी टेंशन में होते है या नर्वस होते है तब करते नजर आते है. लेकिन ऐसा करना आपने दांतों को कितना नुकसान पहुंचा सकता है क्या आप जानते है कि आपकी ये बुरी आदत आपके दांतो को नुकसान पहुंचा सकती है.

क्यों लोग चबाते हैं नाखून?

आखिर लोग नाखून क्यों चबाते हैं? इसकी वजह हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है. एक थ्योरी के मुताबिक, नाखून चबाने से लोग अपनी भावनाओं पर काबू पाने की कोशिश करते हैं. हालांकि,यह कोई अच्छी आदत नहीं है और इसके कारण आपकी मुस्कुराहट पर काफी बुरा असर पड़ सकता है.

नाखून चांबना और डेंटल हेल्थ

डेंटल एसोसिएशन के अनुसार, नाखून चबाने से आपके दांत टूट सकते हैं. अगर आपके दांतों में ब्रेसेस लगे हैं तो नाखून चबाने की आदत के कारण दांतों की जड़ें सड़ सकती है. जिससे दांत खराब होने का खतरा काफी ज्यादा बढ़ सकता है.

रिसर्च के मुताबिक, नाखून चबाने वालों में ब्रुक्सिज्म नाम की बीमारी होने की संभावना काफी ज्यादा होती है. ब्रुक्सिज्म को आम बोलचाल की भाषा में दांत पीसना (Grinding of the teeth) कहा जाता है. जिसे अधिकतर व्यक्ति अनजाने में ही करता है. इस आदत के कारण आगे चलकर सिरदर्द, चेहरे में दर्द, दांतों की संवेदनशीलता और यहां तक की दांत खराब होने की संभावना भी काफी ज्यादा बढ़ जाती है.

दांतों को नुकसान पहुंचाने के अलावा, नाखून काटने से बैक्टीरिया का खतरा भी काफी ज्यादा बढ़ सकता है. आपके दांतों में  ई. कोली ( E. coli ) और साल्मोनेला जैसी खतरनाक बीमारियां पैदा करने वाले बैक्टीरिया पैदा हो सकते हैं. इससे गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल बीमारी का सामना करना पड़ सकता है.  जो लोग आदतन अपने नाखून काटते हैं.

इसस आदत से कैसे पाएं छुटकारा

-नाखुन को हमेशा छोटा रखें

-नाखुनों में कोई कड़वी नेलपॉलिश लगाएं

-जब भी आपका नाखून चाबने का मन करें, तो अपना ध्यान कहीं ओर लगाएं, नाखून चबाने के अलावा आप स्ट्रेस बॉल का इस्तेमाल करें.

सेक्स करने के अगले दिन मेरे यूट्रस में दर्द होने लगा और मुझे बुखार भी हो गया, मैं क्या करूं?

सवाल-

मैं 21 साल की युवती हूं. कुछ दिनों पहले अपने बौयफ्रैंड के साथ शारीरिक संबंध स्थापित किया. हालांकि इस दौरान बौयफ्रैंड ने कंडोम का प्रयोग कर सेक्स किया पर दूसरे दिन सुबह मेरे यूट्रस में दर्द होने लगा और मुझे बुखार भी हो गया. अत: बताएं कि सुरक्षित संबंध बनाने के बाद भी दर्द क्यों हुआ?

जवाब-

सेक्स संबंध हमेशा सुरक्षित ही बनाना चाहिए. सेक्स क्रिया में कंडोम एक सरल व सहज गर्भनिरोधक है, जिस से अनचाहे गर्भधारण से बचा जा सकता है.

यूट्रस में दर्द और बुखार होने का सुरक्षित सेक्स संबंध बनाने से कोई वास्ता नहीं है. संभव है कि आप के साथ कोई अंदरूनी वजह रही होगी. बेहतर होगा कि आप अपने डौक्टर से मिल कर सलाह लें.

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सेक्स चाहिए बच्चा नहीं

विवाह के बाद जोड़े सेक्स का तो जम कर लुत्फ उठाते हैं पर बच्चा पैदा करने से परहेज करते हैं. कई युवा ऐसे भी हैं जो विवाह किए बगैर सेक्स का मजा लेते रहते हैं. कई युवा कंडोम, कौपर टी, गर्भनिरोधक गोलियों आदि का इस्तेमाल कर जिस्मानी रिश्ते बना रहे हैं. इस के पीछे उन का मकसद केवल सेक्स का मजा लेना ही होता है न कि बच्चे को जन्म देना. अगर बच्चा ठहर भी जाता है तो वे उसे गिराने में जरा भी देर नहीं लगाते हैं.

सेक्स का आनंद नैचुरल और सेफ तरीके से उठाया जाए तो मजा दोगुना हो जाता है. ऐसा नहीं करने से कई तरह की बीमारियों और परेशानियों में फंसने की गुंजाइश रहती है.

आजकल मातृत्व और पितृत्व की भावना कम होती जा रही है. औरत और मर्द का रिश्ता केवल सेक्ससुख का ही रह गया है. इसी वजह से यह चलन चल पड़ा है कि लोग मांबाप बनने से कतराते हैं. समाजविज्ञानी हेमंत राव कहते हैं कि महज सेक्स का सुख उठाने वाले जोड़े 30-35 साल की उम्र तक तो यह आनंद उठा सकते हैं लेकिन उस आयु तक अगर बच्चा पाने से परहेज किया जाए तो तरहतरह की जिस्मानी और दिमागी परेशानियां शुरू हो जाती हैं. कई ऐसे मामले हैं जहां लंबे समय तक बच्चे न चाहने वाले जोड़ों को बाद में काफी दिक्कतें उठानी पड़ती हैं.

हर चीज का समय होता है. बारबार गर्भपात कराने पर बच्चेदानी कमजोर हो जाती है, उस के फटने के आसार भी बढ़ जाते हैं. बारबार गर्भपात कराने से बां झपन की समस्या के होने का भी खतरा होता है. अगर बच्चा ठहर भी जाता है तो जन्म लेने वाले बच्चे के कमजोर और बीमार होने का खतरा बना रहता है. कई ऐसे उदाहरण हैं जहां देर से बच्चा होने पर वह दिमागी और जिस्मानी तौर पर बहुत कमजोर होता है. उस के कई अंगों का ठीक से विकास नहीं हो पाता है.

आज के युवा बच्चे को ऐसेट नहीं बल्कि लाइबिलिटी मानते हैं. यही वजह है कि ‘सेक्स का मजा लो और फिर अपने काम में लग जाओ’ की सोच बढ़ती जा रही है. अब वंश आगे बढ़ाने और मांबाप बनने का आनंद उठाना गुजरे जमाने की बात जैसी होती जा रही है. पहले के लोग बच्चे को बुढ़ापे का सहारा मानते थे पर आज के लोगों की सोच ऐसी नहीं है. उन की सोच है कि पैसा है तो सबकुछ खरीदा जा सकता है. कैरियर बनाओ, पैसा कमाओ और सेक्स का भरपूर मजा उठाओ, यही आज के युवाओं की सोच है.

हमारे देश में आज भी शादी की तमाम रस्मों और हनीमून की प्लानिंग तो की जाती है पर बच्चों की नहीं, जिस का नतीजा अनचाहा गर्भ या गर्भपात ही होता है. डा. नीरू अरोरा कहती हैं, ‘‘गर्भनिरोधक यानी कौंट्रासैप्टिव के चुनाव के मामले में आज कई दंपती यह तय ही नहीं कर पाते हैं कि कौन सा गर्भनिरोधक उन के लिए उपयुक्त है.’’

गर्भनिरोधकों के बारे में महिलाओं के मन में अनेक गलत धारणाएं रहती हैं, जैसे गर्भनिरोधक गोली से भविष्य में गर्भधारण में समस्या होगी, सेक्स की चाहत नहीं रहेगी, कैंसर की संभावना बढ़ेगी, वजन बढ़ जाएगा वगैरह. ये सारी धारणाएं गलत हैं.

‘गर्भनिरोधक गोलियों के प्रयोग से ओवेरियन कैंसर व सिस्ट के चांसेस कम होते हैं. इन के प्रयोग से घबराना नहीं चाहिए.’’

गर्भनिरोधक 2 प्रकार के होते हैं, प्राकृतिक व कृत्रिम.

प्राकृतिक गर्भनिरोधक

प्राकृतिक गर्भनिरोधक तरीकों का प्रयोग करते समय किसी भी तरह की गर्भनिरोधक दवाओं का प्रयोग नहीं किया जाता. इस के खास तरीके में सिर्फ मासिक चक्र को ध्यान में रखते हुए ‘सेफ पीरियड’ में ही सेक्स किया जाता है.

सुरक्षित मासिक चक्र : परिवार नियोजन के प्राकृतिक तरीकों में से एक सुरक्षित मासिक चक्र है. इस तरीके के तहत ओव्यूलेशन पीरियड के दौरान शारीरिक संबंध न रखने की सावधानियां बरती जाती हैं.

आमतौर पर महिलाओं में अगला पीरियड शुरू होने के 14 दिन पहले ही ओव्यूलेशन होता है. ओव्यूलेशन के दौरान शुक्राणु व अंडे के फर्टिलाइज होने की ज्यादा संभावना होती है. दरअसल, शुक्राणु सेक्स के बाद 24 से 48 घंटे तक जीवित रहते हैं, जिस से इस दौरान गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है.

फायदा : इस में न किसी दवा की, न किसी कैमिकल की और न ही किसी गर्भनिरोधक की जरूरत होती है. इस में किसी भी तरह का रिस्क या साइडइफैक्ट का डर भी नहीं रहता.

नुकसान : यह तरीका पूरी तरह से कामयाब नहीं कहा जा सकता. यदि पीरियड समय पर नहीं होता तो गर्भधारण की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है.

कैलेंडर वाच : प्राकृतिक तरीकों में एक कैलेंडर वाच है, जिसे सालों से महिलाएं प्रयोग में लाती हैं. इस में ओव्यूलेशन के संभावित समय को शरीर का टैंप्रेचर चैक कर के जाना जाता है और उसी के अनुसार सेक्स करने या न करने का निर्णय लिया जाता है. इस में महिलाओं को तकरीबन रोज ही अपने टैंप्रेचर को नोट करना होता है. जब ओव्यूलेशन होता है तो शरीर का तापमान आधा डिगरी बढ़ जाता है.

फायदा : इस में किसी भी प्रकार की दवा या कैमिकल का उपयोग नहीं होता. इस से कोई साइड इफैक्ट नहीं पड़ता और न सेहत के लिए ही कोई नुकसान होता.

नुकसान : यह उपाय भी पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है, खासकर उन महिलाओं के लिए जिन की माहवारी नियमित नहीं होती.

स्खलन विधि : इस विधि में स्खलन से पहले सेक्स क्रिया रोक दी जाती है, ताकि वीर्य योनि में न जा सके.

फायदा : इस का कोई भी साइड इफैक्ट नहीं है.

नुकसान : सहवास के दौरान हर पल दिमाग में इस की चिंता रहती है. लिहाजा, सेक्स का पूरापूरा आनंद नहीं मिल पाता. इस के अलावा शुरू में निकलने वाले स्राव में कुछ मात्रा में स्पर्म्स भी हो सकते हैं. इसलिए यह विधि कामयाब नहीं है.

कृत्रिम गर्भनिरोधक

प्रैग्नैंसी रोकने की जिम्मेदारी अकसर महिलाओं को ही उठानी पड़ती है. इसलिए उन्हें इस के लिए इस्तेमाल होने वाले कौंट्रासैप्टिव की जानकारी होना बेहद जरूरी है.

गर्भनिरोधक गोलियां : गर्भनिरोधक गोलियां भी कई प्रकार की होती हैं :

साइकिल गर्भनिरोधक गोली : इस का पूरा कोर्स 21 दिन का होता है. इस की 1 गोली माहवारी के पहले दिन से ही रोज ली जाती है. इस के साथ ही 3 हफ्ते तक बिना नागा यह गोली लेनी चाहिए.

फायदा : इस के उपयोग से माहवारी के समय दर्द से भी आराम मिलता है.

नुकसान : आप यदि एक दिन भी गोली खाना भूल गईं तो प्रैग्नैंट हो सकती हैं, साथ ही सिरदर्द, जी मिचलाना, वजन बढ़ना आदि समस्याएं भी हो जाती हैं.

ओनली कौंट्रासैप्टिव पिल : इसे ओसीपी भी कहा जाता है. इस का भी कोर्स 21 दिनों का होता है, जिस में 7 गोलियां हीमोग्लोबिन की भी होती हैं. इस तरीके से महिलाओं को एनीमिया की शिकायत नहीं होती क्योंकि इस में प्रोजेस्टेरोन और इस्ट्रोजन हार्मोन होते हैं.

आपातकालीन गोलियां: असुरक्षित सहवास के बाद अनचाहे गर्भ से बचने के लिए इस का इस्तेमाल किया जाता है.

फायदा : इस गोली का सेवन यौन संबंध बनाने के 72 घंटों के अंदर किया जाता है तो यह 96 फीसदी तक प्रभावशाली होती है.

नुकसान : इस का प्रयोग करना स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक नहीं है.

कौपर टी : गर्भनिरोधक के रूप में यह विश्व में सब से ज्यादा इस्तेमाल होती है. यह अंगरेजी के टी (ञ्ज) अक्षर के शेप की होती है और इस में पतला सा तार लगा होता है. इसे गर्भाशय के भीतर लगाया जाता है. इस से गर्भ नहीं ठहर पाता. जब भी बच्चे की चाहत हो इसे निकलवाया जा सकता है.

फायदा : इस में 99 फीसदी तक फायदा है. एक बार बच्चा होने के बाद दूसरा बच्चा होने के समय में गैप के लिए कौपर टी एक अच्छा जरिया है.

नुकसान : कौपर टी लगाने के बाद 2-3 महीने तक माहवारी ज्यादा आती है, लेकिन बाद में ठीक हो जाती है. इसे डाक्टर के द्वारा ही लगाया और निकलवाया जाता है.

गर्भनिरोधक इंजैक्शन : यह इस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरौन का इंजैक्शन है. यह 2 महीने या 3 महीने में लगाया जाता है. यह ओव्यूलेशन रोकता है, जिस से गर्भ नहीं ठहरता.

फायदा : इस का 99 फीसदी फायदा होता है. माहवारी भी कम दिनों तक होती है और माहवारी में दर्द नहीं होता.

नुकसान : इस से वजन बढ़ जाता है. इस इंजैक्शन के बाद नियमित व्यायाम और खानपान में संतुलित आहार जरूरी है.

दूर करें सेक्स से जुड़े सारे भ्रम, पढ़ें खबर

अकसर युवा सेक्स को ले कर कई तरह की भ्रांतियों से घिरे रहते हैं. अपनी गर्लफ्रैंड से सेक्स को ले कर अपने इमैच्योर फ्रैंड्स से उलटीसीधी ऐडवाइज लेते हैं और जब उस ऐडवाइज का सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ता है तो शर्मिंदगी से किसी से बताने में संकोच करते हैं. यहां युवाओं को यह बात समझनी जरूरी है कि सेक्स से सिर्फ मजा ही नहीं आता बल्कि इस से सेहत का भी बड़ा गहरा संबंध है.

सेक्स और सेहत को ले कर कम उम्र के युवकों और युवतियों में ज्यादातर नकारात्मक भ्रांतियां फैली हैं. स्वास्थ्य के लिए सेक्स कितना अच्छा है, यह बात न इन्हें स्कूल और कोचिंग सैंटर्स में पढ़ाई जाती है और न ही पैरेंट्स सेक्स ऐजुकेशन को ले कर इतने जागरूक हैं कि अपने युवा बच्चों को सेक्स और सेहत के बीच के सही तालमेल और पोजिटिवनैगेटिव फैक्टर्स से रूबरू करा सकें.

आएदिन देशदुनिया में कहीं न कहीं सेक्स और सेहत को ले कर रिसर्च होती रहती है जिस से अंदाजा लगाना आसान होता है कि सेक्स कोई बीमारी नहीं बल्कि आप की सेहत के लिए बहुत आवश्यक है बशर्तें इस के बाबत आप को सही गाइडैंस मिली हो.

सेक्स, सेहत और भ्रांतियां

सेक्स के बाद युवतियों के हिप्स और ब्रैस्ट का वजन बढ़ जाता है. सेक्स करने से कमजोरी आती है. सेक्स करने से शरीर में खून की कमी होती है. सेक्स के दौरान भयानक पीड़ा से गुजरना पड़ता है. सेक्स करने से पढ़ाई में मन नहीं लगता. ज्यादा सेक्स करने से वजन कम हो जाता है. सेक्स करने से लड़की तुरंत प्रैग्नैंट हो जाती है. सेक्स तनाव का बड़ा कारण है, सेक्स करने से हार्टअटैक का खतरा बढ़ जाता है. सेक्स का याद्दाश्त पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, सेक्स करने से ब्लड प्रेशर अनियंत्रित रहता है… वगैरावगैरा.

यह तमाम भ्रांतियां आजकल के युवकयुवतियों के दिमाग में घर कर गई हैं. इन के चलते सेक्स को ले कर जो रवैया युवाओं में होना चाहिए, वह नहीं दिखता.

हर मिथक और गलतफहमी के वैज्ञानिक और मैडिकल तथ्य हैं जो इन को सिरे से खारिज करते हैं. मसलन, वजन बढ़ने वाली बात की जाए, तो सैक्सुअल रिलेशन की शुरुआत होते ही युवतियों के हिप्स और ब्रैस्ट का वजन नहीं बढ़ता है. एक तर्क यह है कि युवतियों और महिलाओं के खून में स्पर्म आत्मसात हो जाता है और वह बाहर नहीं निकल पाता, लेकिन समझने वाली बात यह है कि 2-3 मिलीलिटर स्पर्म से मात्र 15 कैलोरी बढ़ती हैं. इसलिए सेक्स को मनोवैज्ञानिक रूप से वजन बढ़ने का सही तथ्य नहीं माना गया है.

विल्किस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक और एक अन्य अमेरिकन शोध बताते हैं कि  सप्ताह में एक या दो बार सेक्स करने से इम्युनोग्लोबुलिन नाम के ऐंटीबौडी में बढ़ोतरी होती है. इसलिए रैगुलर ऐक्सरसाइज करें और हैल्दी डाइट से वजन मैंटेन करें न कि सेक्स न करने से. शोध में यह बात भी सामने आई है कि यह हार्ट के लिए बेहद फायदेमंद है. वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया कि सप्ताह में 2 बार या इस से ज्यादा बार सेक्स करने वाले पुरुषों में दिल की बीमारी होने की आशंका 45 फीसदी तक कम होती है. इतना ही नहीं सेक्स करना आप के ब्लडप्रैशर और हृदयगति के लिए भी अच्छा है. सेक्स के दौरान जितना ज्यादा स्खलन होगा उस से प्रोस्टैट कैंसर होने की आशंका उतनी ही कम होगी.

रिसर्च से यह सच भी सामने आया कि जो लोग ज्यादा तनाव में रहते हैं वे ज्यादा सेक्स करते हैं. ऐसा करने से तनाव दूर हो जाता है. यह शोध मैसाच्यूसैट्स स्थित न्यू इंगलैंड इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने किया है.

परफैक्ट टाइमिंग है जरूरी

सेक्स के दौरान अगर सेहत को भी अनुकूल रखना चाहते हैं तो युवाओं को सेक्स का समय, माहौल और मानसिक दशा पर सतर्कता बरतने की जरूरत होती है. मान लीजिए आप सेक्स रात को ढाई बजे कर रहे हैं. उस समय एक सेक्स पार्टनर को हलकीहलकी नींद आ रही है. ऐसे में जाहिर है सेक्स का भरपूर आनंद तो मिलेगा नहीं, मानसिक तनाव ही बढे़गा. सेक्स सर्वे भी स्पष्ट करते हैं कि मौर्निंग सेक्स करने वाले ज्यादा खुश रहते हैं और हैल्दी भी यानी सेक्स के साथ टाइमिंग की बड़ी भूमिका है. स्कूल या औफिस से लौट कर सेक्स करने में जो आनंद और शरीर को रिलैक्स मिलेगा उस का अनुपात सुबहसुबह तरोताजा मूड में सेक्स करने वाले कपल से अलग होगा. इस का एक कारण यह भी है कि मोर्निंग सेक्स करने वालों के शरीर में एक ऐसे तत्त्व का रिसाव होता है जो पूरे दिन प्यार बनाए रखने में लाभदायक सिद्ध होता है. हफ्ते में तीन बार सुबहसुबह सेक्स करने वालों को हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा भी कम हो जाता है.

इसी तरह अगर किसी से झगड़ा हुआ है किसी नुकसान के चलते मन अस्थिर है, तो ऐसे समय सेक्स करने से न तो शारीरिक संतुष्टि मिलती है और न सेक्स का मजा, उलटा यह गलती बारबार दोहराने में सेक्स के प्रति मन भी उचटने लगता है और उदासीनता सेक्स लाइफ के लिए बिलकुल भी ठीक नहीं है.

सेक्स से रहें हैल्दी

सेक्स का सेहत से कितना गहरा रिश्ता है इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते साल  स्वीडिश सरकार ने अपने देश के नागरिकों की सेक्स लाइफ से चिंतित हो कर व्यापक पैमाने पर एक स्टडी शुरू की. 2019 में पूरी होनी वाली यह स्टडी इसलिए करवाई गई क्योंकि लोगों का सेक्स के प्रति झुकाव कम हो रहा था. वहां के हैल्थ मिनिस्टर के मुताबिक यदि स्वीडिश नागरिकों की सेक्स लाइफ तनाव और अन्य हैल्थ समस्याओं के कारण प्रभावित हो रही है तब भी यह एक राजनीतिक समस्या है.

सेक्स स्टडी कर रहे शोधकर्ताओं के मुताबिक, ‘‘सेक्स से लोगों की सेहत पर व्यापक असर होता है. जो लोग हफ्ते में कम से कम एक बार सेक्स करते हैं वे सेक्स न करने वालों की तुलना में ज्यादा खुश और प्रोडक्टिव रहते हैं.’’

सेक्स के दौरान न सिर्फ इम्यून सिस्टम बेहतर होता है बल्कि शरीर की फुरती में भी इजाफा होता है. इतना ही नहीं सही मूड, अवस्था और जगह में किए गए सेक्स से बालों, स्किन और नाखूनों को भी बेहतर बनाने में मदद मिलती है. सेक्स करने से हड्डियां और मसल्स भी मजबूत होते हैं. जो सेक्स को ले कर उदासीन रहते हैं उन्हें मीनोपोज के बाद आस्टियोपोरोसिस की समस्या का खतरा रहता है. नियमित सेक्स से एस्ट्रोजन हारमोंस का रिसाव ज्यादा होता है जो सेहत के लिए फायदेमंद होता है. सेक्स ऐक्सपर्ट मानते हैं कि युवाओं में अकसर सेक्स के दौरान एनर्जी लैवल और ऐक्ससाइटमैंट की कमी के चलते तनाव रहता है. ऐसे में वे सुझाव देते हैं कि ऐरोबिक्स शरीर को फिट रखने के लिए सब से बेहतरीन और शानदार वर्कआउट है. इस को करने से शरीर में हमेशा उत्तेजना और फुरती बनी रहेगी. ऐरोबिक्स एनर्जी लैवल को हमेशा बढ़ाए रखता है.

सेक्स, नुकसान और समाधान

जीवनयापन के लिए खाना, पानी, हवा की तरह सेक्स भी एक शारीरिक जरूरत है और इसे सक्रिय रखना युवा रहने के लिए बेहद जरूरी है. एक तरफ जहां सेक्स न करने के कई नुकसान हैं वहीं कुछ हमारी बिगड़ी आदतें ऐसी होती हैं जो हमें सेहत और सेक्स के मोरचे पर कमजोर कर देती हैं.

पहले बात करते हैं सेक्स से जुड़े नफेनुकसानों की. सेक्स न करने वाले हमेशा तनाव में डूबे रहते हैं और यह तनाव हमारे जीवन की सभी जरूरी चीजों को बुरी तरह से प्रभावित करता है. काम, पढ़ाई और निजी संबंधों में तनाव जहर का काम करता है.

जहां सेक्स के कई फायदे हैं वहीं कुछ नुकसान भी हैं. कहते हैं न कि अति हर चीज की बुरी होती है. सेक्स के मामले में यह बात लागू होती है. दिन में 2-3 बार सेक्स करना उसी को सूट करता है जिस का स्टेमिना बेहद अच्छा हो वरना इस से दिल के रोगियों के लिए मुश्किलें भी पैदा हो सकती हैं. इसी तरह जो युवा हस्तमैथुन के आदी हो जाते हैं, उन के लिए भी यह अनहैल्दी हो सकता है. गर्लफ्रैंड नहीं हो जिस की वजह से जो युवा पोर्न का सहारा लेते हैं, धीरेधीरे वे पोर्न के भी इतने आदी हो जाते हैं कि हर पल उन के दिमाग में वही चलता रहता है. इस एडिक्शन के चलते असली सेक्स के दौरान वह उत्तेजना नहीं आती जो पोर्न देखने के दौरान आती है. कई बार युवा अपने साथी दोस्तों, उन की गर्लफ्रैंड और सेक्स लाइफ के किस्से सुन कर कौंप्लैक्स के शिकार हो जाते हैं और चिड़चिडे़ और गुस्सैल होने लगते हैं. यह चीज आप के बोलचाल और व्यव्हार में भी दिखती है.

स्मोकिंग करने से भी सेक्स लाइफ बुरी तरह से बिगड़ जाती है. आजकल के युवा स्मोकिंग को फैशन और लाइफस्टाइल का हिस्सा मान कर कूल और टशन के नाम पर स्मोकिंग करते हैं. इस से सेक्स और्गन के सिकुड़ने से ले कर नपुंसक होने तक का खतरा रहता है.

मोटापा, अनियमित जीवनशैली और मानसिक तनाव जैसे कई तत्त्व सेक्स का खेल बिगाड़ सकते हैं. युवाओं को इन्ही कमियों को दूर करना होगा तभी वे युवावस्था का आनंद ले सकेंगे. याद रखें जिन युवाओं की सैक्सुअल जरूरतें समय से पूरी हो जाती हैं उन का स्वास्थ्य ऐसा न कर पाने वालों की तुलना में अच्छा होता है. इसलिए सेक्स से सेहत के तालमेल को सही बैठा कर बिंदास जिंदगी जीने के लिए कमर कस लीजिए, क्योंकि न तो जवानी बारबार आती है और न आप चिर युवा रह सकते हैं.

डौक्टर का काला धंधा

14 सितंबर, 2017 को उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित पुलिस मुख्यालय में चल रही उस बैठक में कई पुलिस अधिकारी मौजूद थे. इस मीटिंग में 11 सितंबर को फरार हुए देश के सब से बड़े किडनी सौदागर डा. अमित की गिरफ्तारी को ले कर रायमशविरा हो रहा था.

डा. अमित की सैकड़ों करोड़ की संपत्ति थी और वह हाईप्रोफाइल लाइफ जीता था. उसे विश्व की 14 भाषाओं का ज्ञान था, सैकड़ों बार विदेश यात्रा कर चुका था. उस के व्यावसायिक तार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़े थे.

खाड़ी देशों के अमीर शेखों से ले कर कई देशों के लोग उस के क्लाइंट रह चुके थे. वह अपने देश के गरीबों को रुपयों का लालच दे कर उन की किडनी खरीद कर अमीरों को बेचता था. डा. अमित राउत किडनी सौदागर भी था और किडनी ट्रांसप्लांट करने वाला डाक्टर भी. इस काम में वह लाखों के वारेन्यारे करता था.

विचारविमर्श के बाद मीटिंग खत्म हो गई. डीजीपी अनिल कुमार रतूड़ी के निर्देशन में डीआईजी पुष्पक ज्योति और एसएसपी निवेदिता कुकरेती इस पूरे मामले की मौनिटरिंग कर रही थीं. सभी की नजर डा. अमित राउत पर टिकी थी.

दरअसल, 11 सितंबर, 2017 की सुबह देहरादून की एसएसपी निवेदिता कुकरेती को सूचना मिली थी कि डोईवाला थाना क्षेत्र के लाल तप्पड़ स्थित उत्तराखंड डेंटल कालेज में बने गंगोत्री चैरिटेबल हौस्पिटल में किडनी निकालने और ट्रांसप्लांट करने का अवैध कारोबार किया जा रहा है. यह भी पता चला था कि जो 4 लोग किडनी बेचने के लिए आए थे, वे हरिद्वार के रास्ते दिल्ली जाने वाले हैं.

एसएसपी ने अविलंब एक पुलिस टीम का गठन कर दिया, जिस में थाना डोईवाला के इंसपेक्टर ओमबीर सिंह रावत, हरिद्वार के इंसपेक्टर प्रदीप बिष्ट, एसआई सुरेश बलोनी, दिनेश सती, राकेश पंवार, महिला एसआई मंजुल रावत, आदित्या सैनी, कांस्टेबल गब्बर सिंह, भूपेंद्र सिंह, विनोद, नीरज और राजीव को शामिल किया गया. पुलिस टीम ने सप्तऋषि चौकी के पास चैकिंग अभियान शुरू कर दिया. इसी बीच पुलिस ने एक इनोवा कार नंबर यूए 08 टीए 5119 को रोका. कार की चालक सीट पर एक युवक बैठा था, जबकि कार की पिछली सीट पर 2 महिलाएं व 3 पुरुष बैठे थे.

पुलिस को देख कर पीछे बैठे लोगों में से एक व्यक्ति बुरी तरह घबरा गया और उस ने भागने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस ने उसे दबोच लिया.

पुलिस पूछताछ में उन लोगों ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर पुलिसकर्मियों के रोंगटे खड़े हो गए. कार चालक का नाम दीपक था, जिसे किराए पर बुलाया गया था. जबकि अन्य लोगों में जावेद खान निवासी एस.बी. रोड सांताकु्रज, मुंबई, भावजी भाई निवासी जिला खेड़ा, गुजरात, शेखताज अली, 42 साल की सुसामा बनर्जी और 32 साल की कृष्णा दास. सुसामा बनर्जी और कृष्णा दास दक्षिण परगना, वेस्ट बंगाल की रहने वाली थीं.

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इन लोगों ने पुलिस को बताया कि अस्पताल का एजेंट जावेद खान उन्हें 3 लाख रुपए में किडनी खरीदने का वादा कर के अस्पताल लाया था. अस्पताल में कृष्णा दास व शेखताज अली की किडनी निकाल ली गई थी.

भावजी भाई और सुसामा बनर्जी को किडनी निकालने के लिए ले जाया गया. उन की किडनी निकालने की तैयारियां शुरू कर दी गई थीं. उसी बीच ठीक होने पर कृष्णा दास व शेखताज ने किडनी के बदले रुपए देने की मांग की तो एजेंट व अस्पताल संचालकों ने टालमटोल शुरू कर दी. यह देख कर भावजी भाई व सुसामा ने किडनी देने से इनकार कर दिया.

हंगामा बढ़ता देख अस्पताल वालों ने उन्हें एजेंट के साथ वापस भेज दिया. पैसों को ले कर हुए इस झगड़े की भनक किसी तरह सनीपुर कोतवाली में तैनात कांस्टेबल पंकज कुमार को लग गई थी.

झगड़ा किस बात को ले कर था, यह राज भी पता चल गया था. इस के बाद उस ने जरूरी जानकारियां जुटा कर एसएसपी निवेदिता कुकरेती को इस की सूचना दे दी थी. पुलिस ने कार की तलाशी ली तो उस में से ओमान सहित कुछ देशों के एयर टिकट मिले, जिस से पता चलता था कि गिरोह के तार विदेशों तक जुड़े हैं.

पुलिस ने जावेद खान से पूछताछ की तो उस ने चौंकाने वाला खुलासा किया कि वह हौस्पिटल के संचालक डा. अमित के लिए काम करता था. वह देश के अलगअलग हिस्सों से गरीब लोगों को रुपयों का लालच दे कर देहरादून लाता था. किडनी देने वालों को 3 लाख रुपए मिलते थे, जबकि उसे कमीशन मिलता था.

जावेद ने यह भी बताया कि हौस्पिटल के संचालक किडनी की खरीदफरोख्त करने के साथसाथ किडनी ट्रांसप्लांट भी करते थे. इस काम में उन्हें मोटी कमाई होती थी. यह खबर डीजीपी अनिल रतूड़ी, एडीजे (कानून व्यवस्था) राम सिंह मीना, डीआईजी पुष्पक ज्योति को मिली तो उन्होंने एसएसपी को इस मामले में तत्काल सख्त काररवाई करने के निर्देश दिए.

एसएसपी के निर्देशन में एसपी देहात सरिता डोभाल, एएसपी लोकेश्वर सिंह, मंजूनाथ टीसी सहित कई थानों की पुलिस टीम ने हौस्पिटल में रेड की, लेकिन तब तक अस्पताल का ज्यादातर स्टाफ और डा. अमित फरार हो चुका था.

स्वास्थ्य विभाग व एफएसएल की टीमों को भी मौके पर बुलवा लिया गया था. जांच के दौरान कई ऐसी दवाइयां मिलीं, जो किडनी ट्रांसप्लांट में काम आती थीं. औपरेशन थिएटर में भी ऐसे इंस्ट्रूमेंट मौजूद थे. पुलिस ने जरूरी रिकौर्ड व सबूतों को कब्जे में ले कर अस्पताल को सील कर दिया.

केस दर्ज कर के कार्रवाई

पुलिस ने इस संबंध में थाना डोईवाला में जावेद के अलावा डा. अमित कुमार, डा. अक्षय उर्फ राउत, डा. संजय दास, सुषमा कुमारी, राजीव चौधरी, चंदना गुडि़या के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 120बी, 370, 342 और मानव अंगों के प्रत्यारोपण अधिनियम 1994 की धारा 18, 19, 20के  अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया.

डा. अमित के अलावा अन्य लोग उस की टीम का हिस्सा थे. पुलिस ने भावजी भाई, शेखताज अली, सुसामा बनर्जी और कृष्णा दास को मैडिकल परीक्षण हेतु अस्पताल में भर्ती करा दिया. बाद में उन्हें कोर्ट में पेश कर के धारा 164 के तहत उन के बयान दर्ज कराए गए. पुलिस ने जरूरी पूछताछ के बाद जावेद को अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. पुलिस जांच के साथ ही डा. अमित और उस के साथियों की तलाश में जुट गई. विवेचना के दौरान पुलिस ने अमित के साथियों अनुपमा, नसीम, प्रदीप उर्फ बिल्लू, सरला व अभिषेक को भी आरोपी बनाया.

किडनी के अवैध कारोबार के अब तक के सब से बड़े खुलासे ने पुलिस से ले कर सुरक्षा एजेंसियों तक को सकते में डाल दिया था. जो गंभीर बातें सामने आईं, उन के अनुसार, पिछले कुछ समय में खाड़ी देशों के शेखों के अलावा यूरोप व एशियाई देशों के विदेशी डा. अमित के यहां किडनी ट्रांसप्लांट करा कर जा चुके थे. ऐसे लोग टूरिस्ट वीजा ले कर उत्तराखंड घूमने के बहाने आते थे, लेकिन उन का वास्तविक मकसद किडनी ट्रांसप्लांट कराना होता था.

5 टीमें लगाई गईं

मामला गंभीर था, लिहाजा प्रदेश सरकार के प्रवक्ता कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक ने भी इस मामले में विस्तृत जांच करने के आदेश दे दिए. डा. अमित व उस के साथियों की गिरफ्तारी के लिए 5 पुलिस टीमों का गठन किया गया. 48 घंटे बीत चुके थे, लेकिन डाक्टर का कुछ पता नहीं चल रहा था. आरोपी विदेश भाग सकता था, इसलिए लुकआउट नोटिस जारी कर के हवाई अड्डों को भी सूचना दे दी गई थी. इसी बीच 13 सितंबर को पुलिस को सूचना मिली कि आरोपी डाक्टर डोईवाला इलाके के ही नेचर विला रिसौर्ट में रुका हो सकता है. पुलिस टीम सर्च वारंट ले कर वहां पहुंची. वहां की तलाशी ले कर पुलिस ने एंट्री रजिस्टर को अपने कब्जे में ले लिया. लेकिन आरोपी वहां नहीं मिला.

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पुलिस ने कमरा नंबर 103 की खासतौर पर तलाशी ली और जरूरी चीजों की जांच पड़ताल की. पुलिस डा. अमित व उस के साथियों की सरगर्मी से तलाश में जुटी थी. उस के करीबियों को उठा कर पूछताछ की जा रही थी. डा. अमित सहित सभी फरार आरोपियों के मोबाइल भी स्विच्ड औफ  आ रहे थे. पुलिस उन की काल डिटेल्स हासिल कर चुकी थी, लेकिन उस से भी कोई मदद नहीं मिल रही थी.

इस बीच पुलिस ने डा. अमित से जुडे़ 9 बैंक खातों को सीज करा दिया. डा. अमित की फरारी पुलिस के लिए चुनौती बन गई थी. पुलिस टीमों के काम की मौनिटरिंग आला अधिकारी खुद कर रहे थे. 14 सितंबर को एएसपी लोकेश्वर सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम डा. अमित के करीबियों की मोबाइल सर्विलांस व मुखबिरों से मिली सूचना के जरिए दिल्ली होते हुए पहले चंडीगढ़ और फिर पंचकूला पहुंची. दरअसल, डा. अमित के एक मोबाइल नंबर की लास्ट लोकेशन वहीं मिली थी, इसलिए पुलिस ने अपनी जांच का दायरा बढ़ा दिया था.

देहरादून से पंचकूला

इस पुलिस टीम मे एसओजी प्रभारी पी.डी. भट्ट, थानाप्रभारी रानीपोखरी धर्मेंद्र सिंह, एसएसआई मनोज रावत, रायवाला थानाप्रभारी आशीष गोसाई, एसआई ब्रजपाल सिंह, भुवनचंद्र पुजारी, मंजुल रावत, दिनेश सिंह सती, योगेश कुमार व दीपक सिंह पंवार आदि शामिल थे. पुलिस के पास सूचना थी कि डा. अमित व उस के साथी पंचकूला की साहिलपुरी कालोनी के सैक्टर-8 स्थित एक घर में छिपे हैं, लेकिन पुलिस ने वहां दबिश दी तो घर बंद मिला. अगले दिन यानी 15 सितंबर को पुलिस टीम सैक्टर-18 स्थित फाइव स्टार होटल पल्लवी पहुंची. होटल की पार्किंग में एक बीएमडब्ल्यू कार नंबर-डीएल 3 एफटी 5000 व मर्सिडीज कार नंबर यूपी 16 एआर 1100 खडी थीं, जिन्हें देख कर पुलिस को शक हुआ.

पुलिस टीम ने होटल का रजिस्टर देख कर और डा. अमित का फोटो दिखा कर होटल के स्टाफ से पूछमाछ की तो उन्होंने ऐसे व्यक्ति का अपने यहां ठहरना बताया. पुलिस ने एक कमरे मे दस्तक दी तो दरवाजा एक युवती ने खोला. पुलिस को देख कर युवती बुरी तरह घबरा गई. पुलिस उसे किनारे कर के अंदर दाखिल हो गई. डा. अमित कमरे में आराम से बैड पर लेटा विदेशी खजूर खा रहा था. पुलिस को देख कर उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

पुलिस ने डा. अमित के साथसाथ युवती व दूसरे कमरे में रुके उन के 2 साथियों को गिरफ्तार कर लिया. डा. अमित कसमसा कर रह गया. पकड़े गए लोगों में नर्स सरला, जीवन और मैनेजमैंट का काम देखने वाला प्रदीप शामिल था. पुलिस ने उन के कब्जे से दोनों कारों के अलावा 5 मोबाइल फोन, जिन में 2 आईफोन थे और 33 लाख 73 हजार रुपए नकद बरामद किए. डा. अमित 2 हजार के नए नोटों की गड्डियां बैग में लिए घूम रहा था. पुलिस टीम सभी को गिरफ्तार कर के देहरादून ले आई.

डा. अमित सहित अन्य से पुलिस ने गहराई से पूछताछ की. जांच व पूछताछ में डा. अमित के किडनी के गोरखधंधे की ऐसी कहानी निकल कर सामने आई, जिस ने पुलिस के आला अधिकारियों को भी चौंका दिया. कालाधंधा करने वाला यह डाक्टर देश का सब से बड़ा किडनी सौदागर निकला.

64 वर्षीय अमित राउत मूलरूप से महाराष्ट्र का रहने वाला था और पिछले कई सालों से इस काम में लिप्त था. बताते हैं कि एक नेफ्रोलौजिस्ट के अधीन काम कर के उस ने किडनी ट्रांसप्लांट में महारथ हासिल की और फिर राह से भटक कर रैकेट चलाना शुरू कर दिया. सन 1993 में उस पर मुंबई में किडनी ट्रांसप्लांट का पहला केस दर्ज हुआ. उसे जेल जाना पड़ा. तब तक देश में न तो कोई ऐसा कानून था और न ही ऐसी कोई परिभाषा कि मानव अंगों का प्रत्यारोपण किन मामलों में सही है.

सरकार ने इसे गंभीरता से ले कर मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम बना दिया, जिस में स्पष्ट किया गया कि डोनर कौन हो सकता है और ब्लड रिलेशन की परिभाषा क्या है. जेल से जमानत पर आ कर अमित जयपुर गया और फिर से इसी काम में जुट गया.

ठिकाने बदलबदल कर वह अपना काम करता रहा. जिस शहर या राज्य में भी वह पकड़ा जाता, उसे हमेशा के लिए छोड़ देता. न उसे कानून का डर था और न शर्म. उत्तराखंड उसे अपने लिए सुरक्षित ठिकाना लगा. कई साल पहले उस ने अपने एक दोस्त राजीव चौधरी के साथ मिल कर उत्तराखंड के डेंटल कालेज के अंदर 50 लाख रुपए की सालाना लीज पर जगह ले कर गंगोत्री चैरिटेबल हौस्पिटल खोल लिया. चैरिटेबल की आड़ भर थी, वास्तव में अमित का असली धंधा कुछ और था. कई लोगों की अच्छेबुरे कामों को ले कर अपनी धारणा होती है.

किडनी ट्रांसप्लांट को ले कर डा. अमित की धारणा थी कि यह सामाजिक काम है. इस से लोगों की जिंदगी बचती है. कानून से खेलने की उस की जैसे आदत बन चुकी थी. क्योंकि इस में मोटी कमाई थी. वह जरूरतमंद गरीब लोगों की किडनी 2 से 3 लाख रुपए में लेता था, जबकि उसे 40 से 50 लाख रुपए में ट्रांसप्लांट करता था. अपने इस काम का वह इतना एक्सपर्ट हो चुका था कि उस का कभी भी कोई औपरेशन असफल नहीं हुआ.

दूसरे डाक्टरों को इस काम में 6 घंटे लगते थे, जबकि यह काम वह महज 2 से ढाई घंटे में कर देता था. वह देशभर में फैले अपने एजेंटों के जरिए कई बार डोनरों को हवाईजहाज की यात्रा कराता था. गरीब डोनर स्वेच्छा से किडनी देते थे और ट्रांसप्लांट कराने वाले विदेशी होते थे, इसलिए मामला खुलता नहीं था. अमित का पूरा स्टाफ उस के इस धंधे को जानता था. लेकिन वह उन्हें न सिर्फ अच्छा पैसा देता था, बल्कि अपने धंधे को समाज सेवा बताता था. अमित शातिर दिमाग था, वह 5 मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल करता था. इन में देशी एजेंटों, विदेशी एजेंटों, डाक्टरों व खरीददारों के लिए अलगअलग नंबर थे.

अरबों की संपत्ति का मालिक

अमित का अंतरराष्ट्रीय मैनेजमेंट नेटवर्क अमेरिका, श्रीलंका, नेपाल, तुर्किस्तान, ओमान, दुबई, इंग्लैंड समेत एक दर्जन से भी ज्यादा देशों में फैला हुआ था. विदेशी एजेंटों से संपर्क के लिए उस ने औनलाइन सिस्टम बनाया हुआ था. वह बड़े रईसों के औपरेशन के लिए विदेश भी जाता था. डा. अमित दिमाग का इतना तेज था कि उस की 14 भाषाओं पर पकड़ थी. इसी धंधे से अमित ने कई सौ करोड़ की संपत्ति जुटा ली थी.

भारत के दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मणिपुर, पंजाब, पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु राज्यों के अलावा कनाडा, आस्ट्रेलिया, ग्रीस, नेपाल व हौंगकौंग में भी उस की संपत्तियां हैं.

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देहरादून में ही उस की 50 बीघा से ज्यादा जमीन है. मनी लौंड्रिंग के केस में प्रवर्तन निदेशालय उस की संपत्तियों को जब्त भी करता रहा है. लेकिन डा. अमित की कमाई ही इतनी थी कि उस पर कोई असर नहीं पड़ा. 11 सितंबर को पैसों को ले कर डोनर से झगड़ा न हुआ होता तो शायद ही उस की पोल खुलती.

पुलिस द्वारा एजेंट के पकड़े जाने की खबर लगते ही वह अपने खास स्टाफ के साथ फरार हो गया था. अमित जानता था कि पुलिस उसे भूखे शेर की तरह ढूंढ रही है. वह छिपताछिपाता पंचकूला के होटल में जा कर रुका. डा. अमित पूरी तरह आश्वस्त था कि पुलिस उस तक पहुंच नहीं पाएगी. वहां से उस का इरादा नेपाल भागने का था, लेकिन उस से पहले ही वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया.

किडनी रैकेट के सरगना डा. अमित की फैमिली लाइफ भी अजीब निकली. उस की पहली शादी सुनीता के साथ हुई थी, जबकि दूसरी बीवी पूनम कनाडा में है. उस ने तीसरी शादी बुलबुल नाम की महिला से करने की बात पुलिस को बताई.

खुद को समाज सेवी समझता था डाक्टर

खास बात यह थी कि वह चौथी शादी करने की भी तैयारी में था, लेकिन किडनी कांड के उछलने के बाद उस की योजना पर पानी फिर गया. डा. अमित की पहली पत्नी का बेटा अक्षय एमबीबीएस और एमडी डिग्री धारक है और अमेरिका में रहता है. अपने काले धंधे को ले कर अमित को कोई अफसोस नहीं है. उस का कहना था कि कानून की नजर में वह भले ही अपराधी हो, लेकिन उस ने सैकड़ों जिंदगियां बचाई हैं. उन सब की दुआएं उस के साथ हैं.

पुलिस ने अमित सहित सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक अमित की जमानत नहीं हो सकी थी. जबकि पुलिस उस के अन्य साथियों को तलाश रही थी.

17 सितंबर को पुलिस ने अमित के दोस्त राजीव चौधरी (जो अस्पताल के संचालन का काम देखता था) की पत्नी अनुपमा, मैडिकल स्टोर संचालक अभिषेक व अमित के एक अन्य साथी जगदीश को भी गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था. राजीव के साथ अनुपमा भी हौस्पिटल का काम देखती थी. इतना ही नहीं, सर्जरी के लिए खरीदी जाने वाली दवाओं का भुगतान अनुपमा के खातों से ही होता था. पूछताछ के दौरान इन लोगों ने भी अमित के गोरधखंधे की पोल खोली है.

–  कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Raksha bandhan: अब हमारी बारी है-भाइयों ने बनाया बहन को सफल – भाग 2

‘‘बिलकुल मेरी पसंद की चाय बनाई है तुम ने, अंजलि. चायपत्ती तेज और चीनी व दूध कम. थैंक्यू,’’ पहला घूंट भरते ही नीरज ने अंजलि को

धन्यवाद दिया.

‘‘कविता ने एक बार दीदी को बताया था कि आप कैसी चाय पीते

हैं. दीदी ने उस के कहे को याद रखा और आप की मनपसंद चाय बना दी,’’ शिखा की इस बात को सुन कर अंजलि पहले शरमाई और फिर बेचैनी से भर उठी.

‘‘चाय मेरी कमजोरी है. एक वक्त था

जब मैं दिन भर में 10-12 कप चाय पी लेता था,’’ नीरज ने हलकेफुलके अंदाज में बात

आगे बढ़ाई.

‘‘आप जो भी तसवीर बनाते हैं, उस में चेहरे के भाव बड़ी खूबी से उभारते हैं,’’ शिखा ने उस की तारीफ की.

‘‘इतनी अच्छी तसवीरें भी नहीं बनाता हूं मैं.’’

‘‘ऐसा क्यों कह रहे हैं?’’

‘‘क्योंकि मेरी बनाई तसवीरें इतनी ही ज्यादा शानदार होतीं तो खूब बिकतीं. अपने चित्रों के बल पर मैं हर महीने कठिनाई से 5-7 हजार कमा पाता हूं. मेरा अपना गुजारा मुश्किल से चलता है. इसीलिए आज तक घर बसाने की हिम्मत नहीं कर पाया.’’

‘‘शादी करने के बारे में क्या सोचते हैं अब आप?’’ अरुण ने सवाल उठाया तो नीरज सब की दिलचस्पी का केंद्र बन गया.

‘‘जीवनसाथी की जरूरत तो हर उम्र के इंसान को महसूस होती ही है, अरुण. अगर मु झ जैसे बेढंगे कलाकार के लिए कोई लड़की होगी, तो किसी दिन मेरी शादी भी हो जाएगी,’’ हंसी भरे अंदाज में ऐसा जवाब दे कर नीरज ने खाली कप मेज पर रखा और फिर से बच्चों के साथ खेल में लग गया.

नीरज वहां से करीब 5 बजे शाम को गया. तीनों बच्चे उस के ऐसे प्रशंसक बन गए थे कि उसे जाने ही नहीं देना चाहते थे. बड़ों ने भी उसे बड़े प्रेम और आदरसम्मान से विदाई दी थी.

उस के जाते ही अंजलि बिना किसी से कुछ कहेसुने अपने कमरे में चली आई. अचानक उस का मन रोने को करने लगा, पर आंसू थे कि पलकें भिगोने के लिए बाहर आ ही नहीं रहे थे.

करीब 15 मिनट बाद अंजलि के दोनों छोटे भाई और भाभियां उस से मिलने कमरे में आ गए. उन के गंभीर चेहरे देखते ही अंजलि उन के आने का मकसद सम झ गई और किसी के बोलने से पहले ही भड़क उठी, ‘‘मैं बिलकुल शादी नहीं करूंगी. इस टौपिक पर चर्चा छेड़ कर कोई मेरा दिमाग खराब करने की कतई कोशिश न करे.’’

अजय उस के सामने घुटने मोड़ कर फर्श पर बैठ गया और उस का दूसरा हाथ

प्यार से पकड़ कर भावुक स्वर में बोला, ‘‘दीदी, 12 साल पहले पापा के असमय गुजर जाने के बाद आप ही हमारा मजबूत सहारा बनी थीं. आप ने अपनी खुशियों और सुखसुविधाओं को नजरअंदाज कर हमें काबिल बनाया… हमारे घर बसाए. हम आप का वह कर्ज कभी नहीं चुका पाएंगे.’’

‘‘पागल, मेरे कर्तव्यों को कर्ज क्यों सम झ रहा है? आज तुम दोनों को खुश और सुखी देख कर मु झे बहुत गर्व होता है,’’  झुक कर अजय का सिर चूमते हुए अंजलि बोली.

अरुण ने भरे गले से बातचीत को आगे बढ़ाया, ‘‘दीदी, आप के आशीर्वाद से आज हम इतने समर्थ हो गए हैं कि आप की जिंदगी में

भी खुशियां और सुख भर सकें. अब हमारी

बारी है और आप प्लीज इस मौके को हम दोनों से मत छीनो.’’

‘‘भैया, मु झ पर शादी करने का दबाव न बनाओ. मेरे मन में अब शादी करने की इच्छा नहीं उठती. बिलकुल नए माहौल में एक नए इंसान के साथ नई जिंदगी शुरू करने का खयाल ही मन को डराता है,’’ अंजलि ने कांपती आवाज में अपना भय पहली बार सब को बता दिया.

‘‘लेकिन…’’

‘‘दीदी, नीरजजी बड़े सीधे, सच्चे और नेकदिल इंसान हैं. उन जैसा सम झदार जीवनसाथी आप को बहुत सुखी रखेगा… बहुत प्यार देगा,’’ अरुण ने अंजलि को शादी के विरोध में कुछ बोलने ही नहीं दिया.

‘‘मैं तो तुम सब के साथ ही बहुत सुखी हूं. मु झे शादी के  झं झट में नहीं पड़ना है,’’ अंजलि

रो पड़ी.

‘‘दीदी, हम आप की विवाहित जिंदगी में  झं झट पैदा ही नहीं होने देंगे,’’ उस की बड़ी भाभी मंजु ने उस का हौसला बढ़ाया, ‘‘हमारे होते किसी तरह की कमी या अभाव आप दोनों को कभी महसूस नहीं होगा.’’

‘‘मैं जानता हूं कि नीरजजी अपने बलबूते पर अभी मकान नहीं बना सकते हैं. इसलिए हम ने फैसला किया है कि अपना नया फ्लैट हम तुम दोनों के नाम कर देंगे,’’ अरुण की इस घोषणा को सुन कर अंजलि चौंक पड़ी.

अजय ने अपने मन की बात बताई, ‘‘भैया से उपहार में मिले फ्लैट को सुखसुविधा की हर चीज से भरने की जिम्मेदारी मैं खुशखुशी उठाऊंगा. जो चीज घर में है, वह आप के फ्लैट में भी होगी, यह मेरा वादा है.’’

‘‘आप के लिए सारी ज्वैलरी मैं अपनी तरफ से तैयार कराऊंगी,’’ मंजु ने अपने मन की इच्छा जाहिर की.

‘‘आप के नए कपड़े, परदे, फ्लैट का नया रंगरोगन और मोटरसाइकिल भी हम देंगे आप को उपहार में. आप बस हां कर दो दीदी,’’ आंसू बहा रही शिखा ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की तो अंजलि ने खड़े हो कर उसे गले से लगा लिया.

‘‘दीदी ‘हां’ कह दो,’’ अंजलि जिस की तरफ भी देखती, वही हाथ जोड़ कर यह प्रार्थना दोहरा देता.

‘‘ठीक है, लेकिन शादी में इतना कुछ मु झे नहीं चाहिए. तुम दोनों कोई करोड़पति नहीं हो, जो इतना कुछ मु झे देने की कोशिश करो,’’ अंतत: बड़ी धीमी आवाज में अंजलि ने अपनी स्वीकृति दे दी.

‘‘हुर्रा,’’ वे चारों छोटे बच्चों की तरह खुशी से उछल पड़े.

अंजलि के दिलोदिमाग पर बना तनाव का बो झ अचानक हट गया और उसे अपनी जिंदगी भरीभरी और खुशहाल प्रतीत होने लगी.उसदिन पहली बार नीरज उन के घर सब के साथ लंच लेने आ रहा था. अंजलि के दोनों छोटे भाई और उन की पत्नियां सुबह से ही उस की शानदार आवभगत करने की तैयारी में जुटे हुए थे. उस के दोनों भतीजे और भतीजी बढि़या कपड़ों से सजधज कर बड़ी आतुरता से नीरज के पहुंचने का इंतजार कर रहे थे.

अंजलि की ढंग से तैयार होने में उस की छोटी भाभी शिखा ने काफी सहायता की थी. और दिनों की तुलना में वह ज्यादा आकर्षक और स्मार्ट नजर आ रही थी. लेकिन यह बात उस के मन की चिंता और बेचैनी को कम करने में असफल रही.

‘‘तुम सब 35 साल की उम्र में मु झ पर शादी करने का दबाव क्यों बना रहे हो? क्या मैं तुम सब पर बो झ बन गई हूं? मु झे जबरदस्ती धक्का क्यों देना चाहते हो?’’ ऐसी बातें कह कर अंजलि अपने भैयाभाभियों से पिछले हफ्ते में कई बार  झगड़ी पर उन्होंने उस के हर विरोध को हंसी में उड़ा दिया था.

कुछ देर बाद अंजलि से 2 साल छोटे उस के भाई अरुण ने कमरे में आ कर सूचना दी, ‘‘दीदी, नीरजजी आ गए हैं.’’

अंजलि ड्राइंगरूम में जाने को नहीं उठी, तो अरुण ने बड़े प्यार से बाजू पकड़ कर उसे खड़ा किया और फिर भावुक लहजे में बोला, ‘‘दीदी, मन में कोई टैंशन मत रखो. आप की मरजी के खिलाफ हम कुछ नहीं करेंगे.’’

परछाई: मायका या ससुराल, क्या था माही का फैसला?- भाग 2

सास भी बड़ी बहू से पूछे बिना कुछ न करतीं. उसे सब प्यार करते पर महत्त्व बड़ी को ही देते. जेठानी के साथ समझौता करना उसे अच्छा नहीं लगता था. जेठानी उस का रुख समझ कर बहुत संभल कर चलतीं पर कुछ न कुछ हो ही जाता. जेठजेठानी कहीं जाते तो बच्चे घर छोड़ जाते. बच्चों की चाचा के साथ घूमने की आदत तो पहले से ही थी. अब चाची भी आ गईं. तो क्या… वे दोनों कहीं भी जाना चाहते तो दोनों बच्चे भी उन के साथ लग लेते. वह विभव पर भुनभुनाती, ‘नई शादी हमारी हुई है या जेठजेठानी की? वे दोनों तो अकेले जाते हैं और हमारे साथ ये दोनों लग लेते हैं.’

‘तो क्या हुआ माही… उन्हें इस बात की समझ थोड़े ही है… बच्चे ही तो हैं.’

‘ये ऐसे ही हमारे साथ जाते रहे तो जब तक ये बड़े होंगे तब तक हम बूढ़े हो जाएंगे…’

‘अरे, जब हमारे चुनमुन होंगे तो उन्हें भाभी संभालेगी तब हम खूब अकेले घूमेंगे.’

‘जरूर संभालेंगी… अपने तो संभलते नहीं…’

जेठानी उस का मूड समझ कर बच्चों को जबरन रोकतीं. न मानने पर 1-2 थप्पड़ तक जड़ देतीं. बच्चे रोते तो उन्हें रोता देख कर विभव का मूड खराब हो जाता. और विभव का खराब मूड देख कर उस का मूड खराब हो जाता और जाने का सारा मजा किरकिरा हो जाता. उसे जेठानी पर तब और भी गुस्सा आता. लेकिन जिन बातों में वह जेठानी के साथ समझौता नहीं करना चाहती थी, उन्हीं बातों में भाभी के साथ समझौता करने की कोशिश करती. उन्हें खुश रखने का प्रयास करती ताकि उन के साथ संबंध अच्छे बने रहें.

भैयाभाभी कहीं जाते तो थोड़े दिन के लिए मायके आने के बावजूद वह भाई के बच्चों की देखभाल करती, उन्हें अपने साथ घुमाने ले जाती, चौकलेट, आइसक्रीम वगैरह खिलाती पर भाभी उसे फिर भी खास तवज्जो न देतीं. माही उस घर को अभी भी अपना घर समझती. फिर वही पहले वाला हक ढूंढ़ती. पर उस की सारी कोशिशें बेकार हो जातीं. भाभी उस से मतलब का रिश्ता निभातीं, इसलिए उन में आत्मीयता कभी नहीं आ पाई.

वह जबजब भाभी के साथ किचन में कुछ करने की कोशिश करती, तो भाभी उसे साफ जता देतीं कि अब उन को उस का अपने किचन में छेड़खानी करना पसंद नहीं. वह 2-4 दिन के लिए आई है. मां के साथ बैठे और जाए. फिर उस के बच्चे हुए तो सास बुजुर्ग होने की वजह से उस की अधिक देखभाल नहीं कर पाईं पर जेठानी ने अपना तनमन लगा दिया, मां जैसी देखभाल की उन की.

‘देखा माही… भाभी कितना खयाल रखती है तुम्हारा… मैं कहता था न कि उन्हें समझने में तुम गलती कर रही हो.’

जेठानी ने जाने की बात सुनी तो  किया मना

जेठानी की देखभाल से वह पिघलने को होती तो विभव की बात से जलभुन जाती. पहले बच्चे के समय जब मां ने बारबार कहा कि अब थोड़े दिन के लिए मायके आ जा तो सवा महीने के बच्चे को ले कर वह मायके चली आई. विभव से कह आई कि बहुत दिनों बाद जा रही हूं, इसलिए आराम से रहूंगी. तुम्हें तो वैसे भी मेरी जरूरत नहीं है.

जेठानी ने जाने की बात सुनी तो मना किया, ‘तुम अभी कमजोर हो माही… खुद की व बच्चे की देखभाल नहीं कर पाओगी… यहीं रहो, थोड़े महीने बाद चली जाना.’

भाभी का स्वभाव जानते हुए भी वह मायके पहुंची

‘मेरी मां व भाभी मेरी देखभाल करेंगी…’ भाभी का स्वभाव जानते हुए भी वह बोली. मायके पहुंची तो खुश थी वह. इस बार लंबे समय के लिए आई थी. जब घर पहुंची तो, भावुक हो कर मां व भाभी से मिलना चाहा पर भाभी का उखड़ा मूड देख कर उत्साह पर पानी फिर गया. मां भी बहुत उत्साहित नहीं दिखीं, लगा मां ने रीतरिवाज निभाने व उस का मन रखने के लिए उसे मायके आने को कहा था. शायद उन्हें सचमुच विश्वास नहीं था कि वह आ जाएगी.

ससुराल में जेठानी उस के आगेपीछे घूम कर उस का ध्यान रखतीं, बच्चे की पूरी देखभाल करतीं, सास हर समय सब से उस का ध्यान रखने को कहतीं, उस का बेटा सब की आंखों का तारा था वहीं मायके में मां की भी काम के करने की एक सीमा थी, फिर भी उन का पहला ध्यान अपने पोतेपोतियों पर रहता था, नहीं तो बहू की नाराजगी मोल लेनी पड़ती. भाभी को तो उस की देखभाल से मतलब ही नहीं था. जो खाना सब के लिए बनता वही उस के लिए भी बनता.

एक दिन रात में तबीयत खराब होने की वजह से वह बच्चे की देखभाल भी नहीं कर पा रही थी. मां ने रोते हुए बच्चे को उठा लिया पर उस का पेट दर्द रुक नहीं पा रहा था. मां ने हार कर उस के भाई के कमरे का दरवाजा खटखटा दिया. बहुत मुश्किल से भाई की नींद खुली, उस ने दरवाजा खोला.

‘बेटा माही की तबीयत ठीक नहीं है. पेट में दर्द हो रहा है…’

‘क्या मां… तुम भी न. छोटीछोटी बातों के लिए जगा देती हो. अरे परहेज वगैरह वह कुछ करती नहीं… हाजमा बिगड़ गया होगा. कोई दवादे देती. बेकार में नींद खराब कर दी.’

‘सब कुछ कर के देख लिया बेटा, पर दर्द रुक नहीं रहा.’

‘तो दर्द की कोई गोली दे दो. इतनी रात में मैं क्या कर सकता हूं. और तुम भी मां… कहां की जिम्मेदारी ले ली. उसे अपने घर भेजने की तैयारी करो. उन की जिम्मेदारी है वही संभालें. सो जाओ अभी सुबह देखेंगे.’ कह कर भाई ने दरवाजा बंद कर दिया.

मां लौट आईं. न माही ने कुछ पूछा. न मां ने कुछ कहा.

उस ने सब कुछ सुन लिया था. सारी रात वह दर्द से तड़पती रहीं, मां सिराहने बैठी रही, पर भाईभाभी ने सहानुभूति जताने की कोशिश भी न की. सुबह पेट दर्द कम हो गया पर तबीयत फिर भी ठीक नहीं थी लेकिन भैयाभाभी ने यह पूछने की जहमत नहीं उठाई कि रात में तबीयत ठीक नहीं थी अब कैसी है, वह सोच रही थी कि उस की इतनी तकलीफ में तो ससुराल में रात में पूरा घर हिल जाता. यहां तक की बच्चे भी उठ कर बैठ जाते, यहां मां के अलावा सब सो रहे थे.

सोचतेसोचते उस का मन भारी सा हो गया. किस मृगतृष्णा में बंधी हुई वह बारबार यहां आती है और भैयाभाभी के द्वारा अपमानित होती है. क्या खून के रिश्ते ही सब कुछ होते हैं? जेठजेठानी उस पर जान छिड़कते हैं, लेकिन उन्हें वह अपना नहीं समझ पाती, उलटा चाहती है कि उस का पति भी उन्हें अधिक तवज्जो न दे.

उन दोनों का सच: क्या पति के धोखे का बदला ले पाई गौरा

Story in Hindi

Raksha Bandhan : तृप्त मन- भाग 2

राजन की नौकरी लगे अब 1 साल हो गया था. उस के मन में भारत आने और मातापिता से मिलने की बड़ी इच्छा हो रही थी. वह दफ्तर में 1 माह के अवकाश का आवेदन कर भारत जाने के प्रबंध में लग गया. एअरटिकट मिलते ही राजन ने भारत फोन कर के मां को बताया कि वह फलां तारीख को भारत आ रहा है.

राजन घर पहुंचा तो दबे मन से ही सही पर सब ने उस का स्वागत किया. राजन को कुछ ही सालों में सबकुछ बदलाबदला सा लग रहा था. मां पहले से कुछ कमजोर दिख रही थीं. पिताजी के बाल आधे सफेद हो गए थे और राशी? वह तो कितनी बड़ी लग रही थी. उस के सिर पर हाथ रख कर राजन ने स्नेह से कहा, ‘‘कितनी बड़ी हो गई, राशी तू? तेरे लिए ढेरों चीजें ले आया हूं.’’

राशी कुछ नहीं बोली लेकिन मां ने कहा, ‘‘अब इस के विवाह की चिंता है. जल्दी कहीं बात बन जाती तो कर के हम जिम्मेदारी से मुक्त हो लेते.’’

मां की बात सुन कर राजन को लगा कि मां उस पर कटाक्ष कर रही हैं, फिर भी राजन ने हंस कर राशी से कहा, ‘‘कहीं पसंद किया हो तो बता दे, राशी… पिताजी का ढूंढ़नेभागने का समय बच जाएगा.’’

राशी ने पलट का जवाब दिया, ‘‘मैं तुम्हारी तरह नहीं हूं, भैया, जो घर वालों की इच्छा के खिलाफ जा कर विवाह रचा लूं.’’

बहस बढ़ती देख कर मां ने दोनों को रोका और राशी से बोलीं, ‘‘बहस बंद कर और जा भाई के लिये चायनाश्ते का प्रबंध कर.’’

सरोजनी और चंद्र प्रकाश ने राजन से उस की अमेरिका में की हुई शादी के बारे में कोई बात नहीं की. वे लोग बिलकुल नहीं चाहते थे कि इतने सालों बाद बेटा घर आया है तो कोई तकरार हो. लेकिन राजन ने खुद ही बात छेड़ कर मातापिता को अपने द्वारा लिए निर्णय से अवगत कराते हुए कहा, ‘‘मां, आप कैसे सोचती हैं कि आप लोगों की इजाजत लिए बिना मैं अपनी शादी रचा लेने का साहस कर लेता…इस से तो आप लोगों की प्रतिष्ठा और ममता का अपमान होता. मैं ने निश्चय कर लिया है कि बहन की शादी के बाद ही मैं अपने विवाह के बारे में विचार करूंगा.’’

सरोजनी और चंद्र प्रकाश को बेटे की बात से बड़ी राहत मिली. उन्हें ऐसा लगा जैसे सिर पर लदा कोई बहुत बड़ा बोझ हट गया हो.

1 माह भारत में रह कर राजन अमेरिका वापस आ गया और पहले की तरह जीवन में भागदौड़ फिर शुरू हो गई. देखते ही देखते डेढ़ वर्ष कैसे गुजर गया पता ही न चला. एक दिन मां का फोन आया कि राशी की शादी तय हो गई है. लड़के का परिवार बेहद संभ्रांत है. विवाह की तारीख तय नहीं हुई है…जैसे ही तय होगी. मैं दोबारा तुझे सूचित करूंगी. तुम कम से कम 15 दिन पहले भारत जरूर आ जाना…सारा प्रबंध तुम्हें ही करना है.

शादी की तारीख का पता चलते ही राजन भारत आने की तैयारी में लग गया. राजन ने पहले ही डौली को अपनी परिवारिक समस्याओं से अवगत करा दिया था. डौली ने भी सोचा कि जब राजन के परिवार की समस्या हल हो जाएगी तभी वह विवाह बंधन में बंधेगी.

अब जब राशी की शादी तय होने की सूचना डौली को मिली तो उस ने राजन के साथ जा कर अपनी पसंद का मेकअप का सामान, कई सुंदर साडि़यां और कुछ स्वर्णाभूषण राशी के लिए खरीदे. डौली की इच्छा थी कि वह भी भारत जाए…राशी की शादी देखे. राजन ने उस की इस इच्छा को सहज भाव से मान भी लिया.

विवाह तय होने के बाद से ही सरोजनी को बेटी के बातव्यवहार में बदलाव सा महसूस होने लगा था. हमेशा खुश रहने वाली राशी अब चुपचाप व खोईखोई सी लगती थी. शादी की बात चलते ही वह नाकभौं सिकोड़ कर चली जाती तो सरोजनी ने इसे लड़कियों का स्वाभाविक संकोच मान लिया.

राशी सगाई की रस्म के लिए भी बड़ी मुश्किल से तैयार हुई थी, जबकि इस रस्म के समय जिस ने भी राशी और विशाल को एकसाथ देखा, भूरिभूरि प्रशंसा की.

गोद भराई की रस्म के दूसरे दिन सरोजनी और चंद्र प्रकाश ने राजन को सूचना भेज दी और उस के आने की प्रतीक्षा के साथसाथ विवाह की छिटपुट तैयारी में भी लग गए.

इधर बराबर राशी को परेशान और चिंतित देख कर सरोजनी ने उस से पूछा, ‘‘क्या बात है, बेटी, आजकल तुम बहुत परेशान सी दिखती हो…तबीयत तो ठीक है?’’

मां की बात सुन कर राशी चाैंक सी गई…जैसे उस की कोई चोरी पकड़ ली गई हो, फिर भी अपने को संयत कर सहज आवाज में बोली, ‘‘नहीं, मां…कोई ऐसी बात नहीं है. बस, आजकल सिर में हलकाहलका दर्द बना रहता है…’’

‘‘तो चलो, किसी डाक्टर को दिखा कर दवा ले आते हैं,’’ मां बोली थीं, ‘‘अधिक दिनों तक सिरदर्द का बना रहना ठीक नहीं है.’’

‘‘नहीं, मां…इतना तेज दर्द नहीं है कि डाक्टर के यहां जाने या दवा लेने की जरूरत पडे़…अपनेआप ठीक हो जाएगा,’’ राशी ने मां की बात को टालते हुए कहा.

यद्यपि कई बार राशी के मन में आया कि वह अपनी समस्या से मां को अवगत करा दे, लेकिन तभी दूसरी तरफ मन विरोध भी जाहिर करता, ‘तुम्हारा सोचना तो ठीक है लेकिन यह निश्चित है कि उस के बाद तुम्हारी आकांक्षा पूर्ण न हो सकेगी,’ और मन के इस दोहरे तर्क पर राशी जहां की तहां थम जाती.

विवाह के  कुल 15 दिन शेष बचे थे. उस दिन शाम तक राजन को भी आना था. राशी को लगा कि राजन के आने से पहले उसे अपना काम कर लेना चाहिए अन्यथा भैया के आ जाने पर रुकावट पड़ सकती है. भयग्रस्त मन से ही पर दूसरे दिन दोपहर तक अपना काम पूरा कर लेने का प्रबंध राशी ने कर लिया था.

कोर्ट मैरिज के लिए उस दिन साढे़ 10 बजे के आसपास पूरे इंतजाम के साथ राशी और अरशद  अपने दोस्तों के साथ कोर्ट में पहुंचे पर संयोग कुछ ऐसा बना कि उस दिन अदालत में हड़ताल हो गई और हड़ताल कब तक चलेगी यह भी पता न चल सका. राशी निराश हो कर घर लौट आई और दुखी मन से अपने कमरे में जा कर औंधे मुंह पलंग पर पड़ गई.

राजन की फ्लाइट 9 बजे ही आ गई थी पर वह डौली का इंतजाम करने में लग गया. सब से पहले तो उस ने डौली को एक अच्छे से होटल में ठहराया क्योंकि उस ने पहले ही सोच रखा था कि डौली के भारत आने की खबर वह राशी की शादी से पहले किसी को नहीं देगा. उस के रहने और  सुरक्षा का पूर्ण प्रबंध कर राजन घर आया.

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