15 अगस्त स्पेशल: फौजी के फोल्डर से एक सैनिक की कहानी – भाग 3

‘पर उस ने ऐसा कैसे किया. मैं ने सिर्फ और सिर्फ इसी समारोह के लिए कैमरा लिया था और उस ने सब बेकार कर दिया. अब दोबारा यह समय तो नहीं आएगा. मैं ने सोचा था जब आप लोग मेरे कंधे पर स्टार लगाओगे तो उस फोटो को मैं फ्रेम करवा कर ड्राइंगरूम में सजाऊंगा, मगर इस की गलती से सब बेकार हो गया.’

‘क्या बेकार हुआ बता. जा, तू अभी अपनी वरदी पहन. महिमा, तू पापा को बुला कर ला. हम अभी तेरे कंधे पर स्टार लगाते हुए तेरे साथ फोटो खिंचवा लेते हैं. अभी हम जिंदा ही हैं, मरे नहीं, कि दोबारा फोटो न खींच सकें.’

कितना सही कहा था मां ने. जब तक जीवन है, उम्मीद नहीं मरती. मगर जो चले गए इस जीवन से, उन के मातापिता की उम्मीदों का क्या? वे क्या उम्मीद रखें और किस से रखें? आजकल हर कोई अपनी बयानबाजी में जुट कर रोज ही अखबारों व टैलीविजन पर सुर्खियां बटोरने में लगा है. कोई कहता है किस ने इन्हें फौज जौइन करने को कहा था? तो कोई कुछ और.

किसी को आर्मी जौइन करने को कह कर तो देखो, तब पता चल जाएगा. किसी दूसरे के कहने से तो कोई जा भी नहीं सकता. हम अपने देशप्रेम के जज्बे के चलते मरमिटने के लिए ही वरदी पहनते हैं. भले ही हमारे परिवार की सहमति हो या न हो. वे हमें भेजना नहीं चाहते हों, मगर हमारी जिद से उन्हें झुकना भी पड़ता है और शहीद हो जाने का दर्द भी उन्हें ही झेलना होता है. और ये रातदिन बकवास करने वालों का क्या जाता है. अपनी राजनीति चमकाते रहने के अलावा सीखा ही क्या है? क्या वे मोहित की बहन के न सूखने वाले आंसुओं को समेट उन के भाई या बेटे की जिम्मेदारी निभाने जाएंगे? जब ऐसा कुछ भी कर नहीं सकते तो उन के घावों को कुरेदते क्यों हैं?

एक फोटो पर अचानक नजर पड़ते ही राघव अतीत की यादों से बाहर आ गया. उस की उंगलियां आगे बढ़ने से रूक गईं. महिमा के केक काटने की फोेटो थी. अरे, इसी महीने तो महिमा का जन्मदिन पड़ता है. ओह, वह तो सब भूल ही गया था. यहां नैटवर्क भी बहुत कमजोर है. कभी फोन लगता है, कभी नहीं. चलो, अभी मिला कर देखता हूं, मिल गया तो ऐडवांस में ही बधाईर् दे दूंगा.

फोन एक बार में ही मिल गया. तो राघव का मुंह खिल गया, मानो कोई गड़ा हुआ खजाना हाथ लग गया हो.

‘‘हैलो मां, प्रणाम, कैसी हैं आप?’’

‘‘खुश रहो बेटा,’’ आज कितनो दिनों के बाद आवाज सुनने को मिल रही है.’’

‘‘मां, जल्दी से महिमा को फोन दो… हैप्पी बर्थडे टू यू, हैप्पी बर्थ टू डिअर सिस, हैप्पी बर्थडे टू महिमा, हैप्पी…’’

‘‘बस, कर भाई. आज मेरा जन्मदिन नहीं है और तुम्हें उसी दिन ही फोन करना होगा. मैं आज की कौल को नहीं मानती.’’

‘‘अरे, मेरी बात तो सुनो…’’ फोन कट गया. राघव ने फिर कई बार फोन लगाने की कोशिश की मगर फोन नहीं लगा.

राघव फिर अतीत में खो गया. मेरी आवाज तो मेरे घर वालों ने सुन ही ली. फोन की समस्या के चलते घर वाले मेरा फोन हमेशा लाउडस्पीकर पर लगा कर ही बातचीत करते हैं पर क्या मोहित की बहन उस की आवाज कभी सुन पाएगी? और सोमेश की मां, क्या वे अपने इकलौते बेटे की आवाज सुनने का इंतजार अपनी बेबसी के आंसुओं में डूब कर न करती होंगी?

क्या करूं? कभी सोचता हूं मैं ही कुछ बात कर लूं उन के परिवारों से. मगर फिर सोचता हूं, कहीं उन के घाव मेरी आवाज सुन कर हरे न हो जाएं. इस से अच्छा छुट्टियों में उन के घर ही हो कर आऊंगा. मगर अभी तो सारी छुट्टियां ही कैंसिल हो गई हैं. ओह, छुट्टियों से याद आया कि कल हवलदार लोकेश सिंह का जन्मदिन था और वह कैसे अपने घर वालों को फोन पर मना रहा था.

‘अरे मां, मेरी तरफ से सब को आज ही पार्टी दे दो जन्मदिन की. जब छुट्टियों में घर आऊंगा तो फिर एक बढि़या पार्टी करूंगा. मेरे बच्चों को भी स्कूल के लिए टौफियां, चौकलेट दिला देना. और हां मां, छुटकी जब ससुराल से घर आए तो इस बार उसे एक अंगूठी दिलवा देना. मैं रुपए भेज रहा हूं. हर बार यही कहती है फोन पर कि, भतीजेभतीजी दोनों हो गए पर मुझे क्या मिला. और मां, बापू को शहर ले जा कर जांच करवा देना. बिन्नी कह रही हैं कि बापू की खांसी 2 महीने से बराबर बनी हुई है…’ न जाने कितनी बकबक करे जा रहा था आखिर में एक साथी ने बोल ही दिया, ‘अरे, बस कर. सारी कथा आज ही बांच लेगा क्या?’ एक सम्मिलित ठहाके के साथ सब अपने गमों को छिपा ले गए.

अचानक उसे याद आई कि आज नाइट शिफ्ट है और ड्यूटी का समय हो गया था. वह अतीत के पन्नों से बाहर निकल आया. रात के समय बौर्डर की सभी चौकियों की जानकारी लेना, सब की उपस्थिति देखना जैसे कई कार्य उस की ड्यूटी में शामिल हैं. आज राघव आधा घंटा पहले ही तैयार हो गया था, इसलिए लैपटौप खोल कर बैठा था. उस ने दीवारघड़ी पर नजर डाली और सोचा, बाहर गाड़ी आ गई होगी. उस ने लैपटौप को शटडाउन कर दिया और टेबल पर रखी कैप उठा कर पहन ली. तभी एक तेज धमाके ने पूरी इमारत को हिला कर रख दिया.

धमाका इतना तेज था कि टेबल पर रखा सामान नीचे बिखर गया. राघव तेजी से अपनी पिस्तौल को उठा बाहर को दौड़ पड़ा. बाहर का नजारा बड़ा हृदयविदारक था. उस की गाड़ी धमाके के साथ जल रही थी. ड्राइवर और सहायक धमाके के कारण गाड़ी से उछल कर दूर गिरे पड़े थे. चारों तरफ से सैनिकों ने अपनी पोजीशन संभाल ली. कुछ सैनिक दौड़ कर घायलों को गाड़ी में डाल कर सेना के स्वास्थ्य केंद्र को चले गए. 3 घंटे की अफरातफरी के बाद यह निष्कर्ष निकला कि धमाका पड़ोसी देश की सेना द्वारा किए गए मोर्टार हमले से हुआ है. जिस में

2 सैनिक शहीद हो गए. राघव फिर सोच में डूब गया, कल यही लोकेश अपने घर वालों की आंखों में कईर् सपने दिखा रहा था आज उन्हीं आंखों को सूना कर गया. आज लोकेश शांत हो गया है, कल इस से कहा भी था, ‘अरे, बस कर, सारी कथा आज ही बांच लेगा क्या.’ लेकिन, अब उस की कथा कौन पूरी करेगा?

बड़बोला: कैसे हुई विपुल की बहन की शादी- भाग 2

‘‘सर, मुझे लगता है कि अनुभव लेने के लिए विपुल नौकरी कर रहा है. साल दो साल के बाद नौकरी छोड़ कर वह अपने व्यापार में पिता का हाथ बटाएगा.’’

‘‘मेरा अनुभव यह कहता है कि अमीर घराने के बच्चे कभी नौकरी नहीं करते हैं, पढ़ाई के बाद अपने घर के व्यापार में जुट जाते हैं. आई.ए.एस. की नौकरी या मैनेजमेंट डिगरी के बाद किसी मैनेजर के पद पर नौकरी तो समझ में आती है, लेकिन एक क्लर्क की नौकरी कोई बड़ा व्यापारी अपने बच्चों से नहीं करवाता है.’’

‘‘आप के कहने में वजन है, सर,’’ महेश बोला, ‘‘लेकिन हमें इस से क्या मतलब, अपन तो दावत का मजा लेते हैं.’’

महेश के जाने के बाद मेरी नजर रिसेप्शन पर गई तो देखा, विपुल श्वेता और सुषमा के साथ हंसहंस कर अपनी दी हुई पार्टी के मजे ले रहा था. मैं सोचने लगा कि कहीं यह दावत लड़कियों को प्रभावित करने के लिए तो नहीं कर रहा.

एक दिन आफिस से घर जाते हुए सामान खरीदने के लिए बाजार गया. शाम के समय बाजार में बहुत भीड़ रहती है, बाजार में सामान खरीदते समय मुझे एहसास हुआ कि विपुल श्वेता के साथ हंसता हुआ हाथ में हाथ डाले टहल रहा था. दोनों एकदूसरे से चिपके हुए अपने में मस्त दुनिया से बेखबर मुझे भी नहीं देख सके. 2 हंसों का जोड़ा पे्र्रम की गहराई में उतर चुका था. युवा प्रेमी को डिस्टर्ब करना मैं ने उचित नहीं समझा. मैं सामान खरीद कर घर आ गया.

घर आ कर मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि विपुल कब नवगांव जाता होगा और कैसे टाइम मैनेज करता होगा. आफिस में विपुल और श्वेता की नजदीकियां अधिक बढ़ने लगीं. चाय ब्रेक में दोनों एकसाथ चाय पीते नजर आते और लंच टाइम में एकसाथ खाना खाते. काम के बीच में विपुल झट से किसी न किसी बहाने श्वेता से चंद बातें कर आता. धीरेधीरे विपुल और श्वेता का प्रेम परवान चढ़ गया. आफिस में सब की जबान पर सिर्फ विपुल और श्वेता के प्रेम प्रसंग के चर्चे थे.

एक दिन लंच में मैं आराम कर रहा था. महेश केबिन में आ कर सामने कुरसी खींच कर बैठ गया.

‘‘सर, आप ने नई खबर सुनी?’’

‘‘मुझे पुरानी की खबर नहीं, तुम नई की बात कर रहे हो. तुम्हारी शक्ल से लगता है कि कोई सनसनीखेज खबर है.’’

‘‘सर, आप के लिए सनसनी होगी. आप आफिस आते हैं, काम कर के चले जाते हैं. आप को दीनदुनिया की कोई खबर नहीं होती है. हम तो परदा उठने की फिराक में कब से टकटकी लगाए बैठे हैं.’’

‘‘लेखकों की तरह भूमिका मत बांधो, महेश, सीधे बात पर आओ.’’

‘‘सीधी बात यह है सर कि विपुल और श्वेता का प्रेम एकदम परवान चढ़ चुका है. बस, अब तो शहनाई बजने की देरी है. सर, आप को मालूम नहीं, विपुल आजकल नवगांव न जा कर श्वेता के घर पर ही रह रहा है. हफ्ते में 1 या 2 दिन ही नवगांव जाता है. अंदर की खबर बताता हूं कि शादी की घोषणा होते ही श्वेता नौकरी छोड़ देगी. इतने अमीर घर जा रही है. नौकरी की क्या जरूरत है, सर.’’

‘‘क्या श्वेता के घर वाले एतराज नहीं करते? शादी से पहले घर आनाजाना तो आजकल आम बात है, लेकिन रात को सोना क्या वाकई हो सकता है? कहीं तुम लंबी तो नहीं छोड़ रहे हो?’’

‘‘कसम लंगोट वाले की, एकदम सच बोल रहा हूं.’’

‘कसम लंगोट वाले की,’ यह महेश का तकिया कलाम था. मैं समझ गया कि बात में कुछ सचाई तो है, ‘‘महेश, लगता है आजकल हम लोग आफिस में काम कम और इधरउधर की बातों में अधिक ध्यान दे रहे हैं,’’ मैं ने बात पलटते हुए कहा.

‘‘सर, आप ऐसी बातें मुझ से नहीं कर सकते हैं. आप को मालूम है कि सारा काम समाप्त करने के बाद ही मैं आप से गपशप करता हूं,’’ महेश मेरी बात का बुरा मान गया.

‘‘महेश, मैं तुम्हारी बात नहीं कर रहा हूं. मैं विपुल की सोच रहा हूं कि आजकल जब देखो, वह श्वेता के इर्दगिर्द ही मंडराता नजर आता है. अपना काम कब करता है?’’ मैं ने कुछ हैरान हो कर पूछा.

महेश हंसते हुए बोला, ‘‘सर, आप इस बात की फिक्र मत कीजिए. उस का काम जब तक समाप्त नहीं हो जाता, उसे शाम को घर जाने नहीं देता हूं, श्वेता के प्यार से उस के काम की रफ्तार गोली की तरह हो गई है. शाम तक सारा काम निबटा देता है.’’

चूंकि आफिस के काम में मुझे कोई शिकायत नहीं मिली, इसलिए विपुल और श्वेता के आपसी रिश्तों में मैं ने विशेष महत्त्व देना छोड़ दिया. दिन बीतते गए और विपुल और श्वेता के प्रेमप्रसंग के किस्से कुछ और अधिक सुनाई देने लगे. एक दिन लंच टाइम में मैं कौफी पी रहा था. तभी विपुल और महेश ने केबिन में प्रवेश किया.

‘‘सर, बधाई हो, विपुल की बहन की शादी है. आप का निमंत्रणपत्र,’’ महेश ने शादी का कार्ड मुझे दिया.

‘‘विपुल, बहुतबहुत बधाई हो,’’ मैं ने विपुल से हाथ मिलाते हुए कहा.

‘‘सर, सूखी बधाई से काम नहीं चलेगा. शादी में आप को अवश्य आ कर रौनक करनी है,’’ विपुल ने आग्रह किया.

‘‘जरूर शादी में रौनक करेंगे,’’ मैं ने मुसकराते हुए कहा.

शादी से 1 दिन पहले महेश ने लंच समय में कहा, ‘‘सर, कल विपुल की बहन की शादी है, पूरा स्टाफ शादी में जाएगा, कल लंच के बाद आफिस की छुट्टी. आप ने भी चलना है, कोई बहाना नहीं चलेगा.’’

‘‘देखो, महेश, शादी नवगांव में है, रात को वापस आने में देर हो सकती है, वहां से आने के लिए कोई सवारी भी नहीं मिलेगी,’’ मैं ने आशंका जताई.

‘‘सर, इस की चिंता आप मत कीजिए, वापसी का सारा प्रबंध विपुल ने कर दिया है. नवगांव के सब से अमीर परिवार में विवाह बहुत ही भव्य तरीके से हो रहा है, इसीलिए तो सारा स्टाफ जा रहा है. वहां पहुंचते ही एक चमचमाती कार हमारे और सिर्फ हमारे लिए होगी. हम उसी कार से वापस आएंगे. इसलिए आप बिलकुल चिंता न कीजिए,’’ महेश ने बहुत आराम से कहा, ‘‘ऐसी शादी देखने का मौका जीवन में केवल एक बार मिलता है, पूरे नवगांव में कारपेट बिछे होंगे, एक पुरानी हवेली में शादी का भव्य समारोह होगा.’’

विवरण सुन कर मैं ने हामी भर दी. मना किस तरह करता, आखिर इतनी भव्य शादी हम जैसे मध्यम वर्ग के लोगों को नसीब से ही देखने का मौका मिलेगा.

बिचौलिए: क्यों मिला वंदना को धोखा – भाग 2

सीमा के अत्यधिक गुस्से की जड़ में उस के अपने अतीत का अनुभव था. विनोद नाम के एक युवक से उस का प्रेमसंबंध 3 वर्षों तक चला था. कभी उस का साथ न छोड़ने का दम भरने वाला उस का वह प्रेमी अचानक हवाई जहाज में बैठ कर विदेश रवाना हो गया था. उस धोखेबाज, लालची व अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी इंसान को विदेश भेजने का खर्चा उस के भावी ससुर ने उठाया था.

यह दुखद घटना सीमा की जिंदगी में 2 वर्ष पूर्व घटी थी. वह अब 28 वर्ष की हो चली थी. विनोद की बेवफाई ने उस के दिल  को गहरा आघात पहुंचाया था. अपने सभी हितैषियों के लाख समझाने के बावजूद उस ने कभी शादी न करने का फैसला अब तक नहीं बदला था. समीर की राजेशजी की लड़की देखने जाने वाली हरकत ने उस के अपने दिल का घाव हरा कर दिया था.

वंदना को वह अपनी छोटी बहन मानती थी. अपनी तरह उसे भी धोखे का शिकार होते देख उसे समीर पर बहुत गुस्सा आ रहा था. कुछ देर बाद वंदना के आंसू थम गए. फिर उदास खामोशी ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया था. भोजनावकाश तक इस उदासी की जगह क्रोध व कड़वाहट ने ले ली थी. यह देख कर उस के तीनों सहयोगियों को काफी आश्चर्य हुआ.

‘‘मैं समीर के सामने रोनेगिड़गिड़ाने वाली नहीं,’’ वंदना ने तीखे स्वर में सब से कहा, ‘‘वह मुझ से कटना चाहता है, तो शौक से कटे. ऐसे धोखेबाज के गले मैं जबरदस्ती पड़ भी गई, तो कभी सुखी नहीं रह पाऊंगी. वह समझता क्या है खुद को?’’ वंदना के बदले मूड के कारण उसे समझानेबुझाने के बजाय उस के तीनोें सहयोगियों ने समीर को पीठ पीछे खरीखोटी सुनाने का कार्य ज्यादा उत्साह से किया. भोजनावकाश की समाप्ति से कुछ पहले वंदना ने सीमा को अकेले में ले जा कर उस से प्रार्थना की, ‘‘सीमा दीदी, मेरा एक काम करा दो.’’

‘‘मुझ से कौन सा काम कराना चाहती है तू?’’ सीमा ने उत्सुक स्वर में पूछा.

‘‘दीदी, मैं कुछ दिनोें के लिए इस कमरे में नहीं बैठना चाहती.’’

‘‘तो कहां बैठेगी तू?’’

‘‘बड़े साहब दिनेशजी की पीए छुट्टी पर गई हुई है न. आप दिनेश साहब से कह कर कुछ दिनों के लिए वहां पर मेरी बदली करा दो. मैं कुछ दिनों तक समीर की पहुंच व नजरों से दूर रहना चाहती हूं.’’

‘‘ऐसा करने से क्या होगा?’’ सीमा ने उलझनभरे स्वर में पूछा.

‘‘दीदी, समीर के सदा आगेपीछे घूमते रह कर मैं ने उसे जरूरत से ज्यादा सिर पर चढ़ा लिया है. वह मुझे प्यार करता है, यह मैं बखूबी जानती हूं, पर उस के सामने मेरे सदा बिछबिछ जाने के कारण उस की नजरों में मेरी कद्र कम हो गई है.’’ ‘‘तो तेरा यह विचार है कि अगर तू कुछ दिन उस की नजरों व पहुंच से दूर रहेगी तो समीर का तेरे प्रति आकर्षण बढ़ जाएगा?’’ ‘‘यकीनन ऐसा ही होगा, सीमा दीदी. हमारे कमरे में शादीशुदा बड़े बाबू और महेशजी के अलावा समीर की टक्कर का एक अविवाहित नवयुवक और होता तो मैं उस से ‘फ्लर्ट’ करना भी शुरू कर देती. ईर्ष्या का मारा समीर तब मेरी कद्र और ज्यादा जल्दी समझता.’’ कुछ पल सीमा खामोश रह वंदना के कहे पर सोचविचार करने के बाद गंभीर लहजे में बोली, ‘‘मैं तेरे कहे से काफी हद तक सहमत हूं, वंदना. मैं तेरी सहायता करना चाहूंगी, पर सवाल यह है कि दिनेश साहब मेरे कहने भर से तुझे अपनी पीए भला क्यों बनाएंगे?’’

‘‘दीदी, यह काम तो आप को करना ही पड़ेगा. आप उन को विश्वास में ले कर मेरी सोच और परिस्थितियों से अवगत करा सकती हैं. मैं समीर से बहुत प्यार करती हूं, सीमा दीदी. उसे खोना नहीं चाहती मैं. उस से दूर होने का सदमा बरदाशत नहीं कर पाएगा मेरा दिल,’’ वंदना अचानक भावुक हो उठी थी.

‘‘ठीक है, मैं जा कर दिनेशजी से बात करती हूं,’’ कह कर सीमा ने वंदना की पीठ थपथपाई और फिर दिनेश साहब के कक्ष की तरफ बढ़ गई. वंदना की समस्या के बारे में पूरे 10 मिनट तक दिनेश साहब सीमा की बातें बड़े ध्यान से सुनने के बाद गंभीर स्वर में बोले, ‘‘अगर समीर के मन में खोट आ गया है तो यह बहुत बुरी बात है. वंदना बड़ी अच्छी लड़की है. मैं उस की हर संभव सहायता करने को तैयार हूं. तुम बताओ कि मुझे क्या करना होगा?’’ वंदना कुछ दिन उन की पीए का कार्यभार संभाले, इस बाबत उन को राजी करने में सीमा को कोई दिक्कत नहीं आई. ‘‘वंदना की बदली के आदेश मैं अभी निकलवा देता हूं. सीमा, और क्या चाहती हो तुम मुझ से?’’

‘‘समीर, मुझे कुछ दिनों के लिए बिलकुल मत छेड़ो. तुम्हारी लड़की देखने जाने की हरकत के बाद मैं तुम्हारे व अपने प्रेमसंबंध के बारे में बिलकुल नए सिरे से सोचने को मजबूर हो गई हूं. मैं जब भी किसी फैसले पर पहुंच जाऊंगी, तब तुम से खुद संपर्क कर लूंगी,’’ वंदना की यह बात सुन कर समीर नाराज हालत में पैर पटकता उस के केबिन से निकल आया था. सीमा से वह वैसे ही नहीं बोल रहा था. महेश और ओमप्रकाश भी उस से खिंचेखिंचे से बातें करते. उस ने इन दोनों को समझाया भी था कि वह वंदना को प्यार में धोखा देने नहीं जा रहा, पर इन के शुष्क व्यवहार में कोई अंतर नहीं आया था. औफिस में वह सब से अलगथलग तना हुआ सा बना रहता. काम के 7-8 घंटे औफिस में काटना उसे भारी लगने लगे थे. चिढ़ कर उस ने सभी से बात करना बंद कर दिया था. अगले सप्ताह उस की चिंता में और बढ़ोतरी हो गई. सोमवार की शाम वंदना दिनेशजी के साथ उन के स्कूटर की पिछली सीट पर बैठ कर औफिस से गई है, यह उस ने अपनी आंखों से देखा था.

‘‘सीमा, यह वंदना दिनेश साहब के साथ कहां गई है?’’ बगल से गुजर रही सीमा से समीर ने विचलित स्वर में प्रश्न किया.‘‘मुझे नहीं मालूम, समीर. वैसे तुम ने यह सवाल क्यों किया?’’ सीमा के होंठों पर व्यंग्यभरी मुसकान उभरी.

‘‘यों ही,’’ कह कर समीर माथे पर बल डाले आगे बढ़ गया. सीमा मन ही मन मुसकरा उठी. वंदना के सिर में दर्द था, भोजनावकाश में यह उस के मुंह से सुन कर वह सीधी दिनेश साहब के कक्ष में घुस गई.

‘‘सर, आज शाम वंदना को आप अपने स्कूटर से उस के घर छोड़ देना. उस की तबीयत ठीक नहीं है,’’ उन से ऐसा कहते हुए सीमा की आंखों में उभरी चमक उन की नजरों से छिपी नहीं रही.

‘‘सीमा, तुम्हारी आंखें बता रही हैं कि तुम्हारे इस इरादे के पीछे कुछ छिपा मकसद भी है,’’ उन्होंने मुसकरा कर टिप्पणी की.

‘‘आप का अंदाजा बिलकुल ठीक है, सर. आप के ऐसा करने से समीर ईर्ष्या महसूस करेगा और फिर उसे सही राह पर जल्दी लाया जा सकेगा.’’

‘‘यानी कि तुम चाहती हो कि समीर वंदना और मेरे बीच के संबंध को ले कर गलतफहमी का शिकार हो जाए?’’ दिनेश साहब फौरन हैरानपरेशान नजर आने लगे.

Raksha Bandhan: कड़वा फल- भाग 2

सुख देने व मनोरंजन करने वाली आदतों को बदलना और छोड़ना आसान नहीं होता. मम्मीपापा ने शुरू में कुछ कोशिश की, पर घूमनेफिरने की आदतें बदलने में दोनों ही नाकाम रहे.

उन्हें घर से बाहर घूमने जाने का कोई न कोई बहाना मिल ही जाता. कभी बोरियत व तनाव दूर करने तो कभी खुशी का मौका होने के कारण वे बाहर निकल ही जाते.

मैं उन के साथ नहीं जाता, पर चिढ़ और कुढ़न के कारण मुझ से पीछे पढ़ाई भी नहीं होती. मन की शिकायतें उसे पढ़ाई में एकाग्र नहीं होने देतीं.

चढ़ाई मुश्किल होती है, ढलान पर लुढ़कना आसान. वे दोनों नहीं बदले, तो मेरा संकल्प कमजोर पड़ता गया. मैं ने भी धीरेधीरे उन के साथ हर जगह आनाजाना शुरू कर दिया.

इस कारण मुझे वक्तबेवक्त मम्मीपापा की डांट व लैक्चर सुनने को मिलते. उन की फटकार से बचने के लिए मैं उन के सामने किताब खोले रहता. वे समझते कि मैं कड़ी मेहनत कर रहा हूं, पर आधे से ज्यादा समय मेरा ध्यान पढ़ने में नहीं होता.

अपनी लापरवाही के परिणामस्वरूप मैं पढ़ाई में पिछड़ने लगा. टैस्टों में नंबर कम आने पर मम्मीपापा से खूब डांट पड़ी.

‘‘अपनी लापरवाही की वजह से कल को अगर तुम डाक्टर नहीं बन पाए, तो हमें दोष मत देना. अपना जीवन संवारने की जिम्मेदारी सिर्फ तुम्हारी है, क्योंकि अब तुम बड़े हो गए हो,’’ मारे गुस्से के मम्मी का चेहरा लाल हो गया था.

यही वह समय था जब अपने मम्मीपापा के प्रति मेरे मन में शिकायत के भाव जनमे.

‘मेरे उज्ज्वल भविष्य की खातिर मम्मीपापा अपने शौक व आदतों को कुछ समय के लिए बदल क्यों नहीं रहे हैं? सुखसुविधाओं की वस्तुएं जुटा देने से ही क्या उन के कर्तव्य पूरे हो जाएंगे? मेरे मनोभावों को समझ मेरे साथ दोस्ताना व प्यार भरा वक्त गुजारने का महत्त्व उन्हें क्यों नहीं समझ आता?’ मन में उठते ऐसे सवालों के कारण मैं रातदिन परेशान रहने लगा.

तब तक क्रैडिट कार्ड का जमाना आ गया. यह सुविधा मम्मीपापा के लिए वरदान साबित हुई. जेब में रुपए न होने पर भी वे मौजमस्ती की जिंदगी जी सकते थे.

उन की दिनचर्या व उन के व्यवहार के कारण मेरे मन में नकारात्मक ऊर्जा पैदा होती. उन से कुछ कहनासुनना बेकार जाता और घर में ख्वाहमख्वाह का तनाव अलग पैदा होता.

मैं सचमुच डाक्टर बनना चाहता था. मैं ने इस नकारात्मक ऊर्जा का उपयोग पढ़नेलिखने के लिए करना आरंभ किया. मम्मीपापा के साथ ढंग से बातें किए हुए कईकई दिन गुजर जाते. मन के रोष व शिकायतों को भुलाने के लिए मैं रात को देर तक पढ़ता. मुझे बहुत थक जाने पर ही नींद आती वरना तो मम्मीपापा के प्रति गलत ढंग के विचार मन में घूमते रह कर सोने न देते.

मेरी 12वीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षाओं के दौरान भी मम्मीपापा ने अपने घूमनेफिरने में खास कटौती नहीं की. वे मेरे पास होते भी, तो मुझे उन से खास सहारा या बल नहीं मिलता, क्योंकि मैं ने उन से अपने दिल की बातें कहना छोड़ दिया था.

बोर्ड की परीक्षाओं के बाद मैं ने कंपीटीशन की तैयारी शुरू की. अपनी आंतरिक बेचैनी को भुला कर मैं ने काफी मेहनत की.

बोर्ड की परीक्षा में मुझे 78% अंक प्राप्त हुए, लेकिन किसी भी सरकारी मैडिकल कालेज के लिए हुए कंपीटीशन की मैरिट लिस्ट में मेरा नाम नहीं आया.

मेरी निराशा रात को आंसू बन कर बहती. मम्मीपापा की निराशा कुछ दिनों के लिए उदासी के रूप में और बाद में कलेजा छलनी करने वाले वाक्यों के रूप में प्रकट हुई.

मेरा डाक्टर बनने का सपना अब प्राइवेट मैडिकल कालेज ही पूरा कर सकते थे. उन में प्रवेश पाने को डोनेशन व तगड़ी फीस की जरूरत थी. करीब 15-20 लाख रुपए से कम में डाक्टरी के कोर्स में प्रवेश लेना संभव न था.

हमारे रहनसहन का ऊंचा स्तर देख कर कोई भी यही अंदाजा लगाता कि मेरी उच्च शिक्षा पर 15-20 लाख रुपए खर्च करने की हैसियत मेरे मम्मीपापा जरूर रखते होंगे, पर यह सचाई नहीं थी. तभी मैं ने निराश और दुखी अंदाज में मम्मीपापा के सामने प्राइवेट मैडिकल कालेज में प्रवेश लेने की अपनी इच्छा जाहिर की.

पहले तो उन दोनों ने मेरे नकारापन के लिए मुझे खूब जलीकटी बातें सुनाईं. फिर गुस्सा शांत हो जाने के बाद उन्होंने जरूरत की राशि का इंतजाम करने के बारे में सोचविचार आरंभ किया. इस सिलसिले में पापा पहले अपने बैंक मैनेजर से मिले.

‘‘मिस्टर राजीव, मैं आप की सहायता करना चाहता हूं, पर नियमों के कारण मेरे हाथ बंधे हैं,’’ मैनेजर की प्रतिक्रिया बड़ी रूखी थी, ‘‘अपनी जीवन बीमा पालिसी पर आप ने पहले ही हम से लोन ले रखा है. किसी जमीनजायदाद के कागज आप के पास होते, तो हम उस के आधार पर लोन दे देते. आप को अपने बेटे को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए बहुत पहले से कुछ प्लानिंग करनी चाहिए थी. मुझे अफसोस है, मैं आप की कोई सहायता नहीं कर सकूंगा.’’

क्लब में पापा के दोस्त राजेंद्र उन के ब्रिज पार्टनर भी हैं. काफी लंबाचौड़ा व्यवसाय है उन का. पापा ने उन से भी रुपयों का इंतजाम करने की प्रार्थना की, पर बात नहीं बनी.

राजेंद्र साहब के बेटे अरुण से मुझे उन के इनकार का कारण पता चला.

ज्वर: लड़कियों के जिस्म का शौकीन ऋषि – भाग 2

थोड़ी देर के बाद मैं ज्योति का हाथ पकड़ कर नीचे आ गया. मेरा हाथ छुड़ा कर वह जाते हुए बोली, ‘‘ऋषि, एक काम करना.’’

मैं ने पूछा, ‘‘क्या?’’

‘‘छत पर पड़ी खून की बूंदों को पानी से साफ कर देना,’’ इतना कह कर वह चली गई और मैं हाथ में बालटी ले कर छत की ओर चल दिया.

ज्योति उस रात के बाद फिर मुझे दिखाई न दी. उस की छुट्टियां खत्म हो गई थीं. मैं ने कई दिन की तड़प के बाद अपने दिल को तसल्ली दी कि वह जब अगले साल गरमियों की छुट्टियां बिताने आएगी तो जीभर के उस से बात करूंगा, उसे आगोश में लूंगा, मगर मेरे लाख इंतजार के बाद वह फिर कभी गरमी की छुट्टियां बिताने के लिए हमारे गांव नहीं आई.

मैं अपनी टीनएज में एक लड़की की तरफ आकर्षित हुआ, उस के जिस्म को मैं ने हासिल किया था. मैं जब भी तनहा लेटता, मुझे लगता कि मैं किसी हसीना के जिस्म से लिपटा हुआ हूं. मेरी नसनस कामज्वर से जल उठती. मैं बेचैन हो जाता. मैं कोशिश करता कि रात में अकेला न रहूं, बस इसलिए दोस्तों के साथ देर रात तक घूमा करता.

ऐसे ही एक रात मैं पास के एक गांव की महफिल में पहुंच गया, जहां तवायफें अपने हुस्न से अजब समां बांध रही थीं. लोग उन के थिरकते कदमों की लय पर वाहवाह कर रहे थे.

मेरी नजर भी ऐसे ही लयबद्ध थिरकते एक जोड़ी पांव पर टिक गई थी. वह एक मेरी उम्र की सुंदर नैननक्श वाली तवायफ थी, जिसे लोग गुंजा के नाम से पुकार रहे थे.

जब तक गुंजा उस गांव में रही, मैं रोज उस की महफिल में हाजिर होता रहा. मेरी इस हाजिरी को यकीनन उस ने तवज्जुह दी थी और यह तवज्जुह इतनी गहरी थी कि एक रात जब वह रक्स की महफिल के बाद कमरे में आराम कर रही थी, तो मैं उस के पास पहुंच गया और उस ने मुझे देखते ही अपने पास लेटी दूसरी तवायफ को बाहर जाने का इशारा कर के मेरी ओर अपनी मरमरी बांहें फैला दीं.

जिस कामज्वर को ज्योति ने मेरे शरीर में जगाया था, उसे मैं गुंजा की बांहों में शांत करने लगा. यहां तक कि जब वह अपने गांव गई, तो मैं अपने एक दोस्त के साथ वहां भी जा पहुंचा और वहीं पर मैं ने शालू को देखा.

शालू गुंजा की छोटी बहन थी और उस से भी ज्यादा हसीन. शालू को देखने के बाद जब मैं गुंजा के साथ लेटता तो मुझे लगता कि मैं शालू के साथ लेटा हूं. शालू के प्रति मेरी आकर्षित निगाहों को शायद गुंजा और उस की मां ने समझ लिया था, इसलिए वे दोनों गाहेबगाहे मुझे शालू से दूर रहने की हिदायत देती रहती थीं.

शालू अब मेरे ख्वाबों में आने लगी थी. इसी बीच मुझे लखनऊ के एक कालेज में बीटैक में एडमिशन मिल गया. लखनऊ जाने से पहले मैं शालू को पाना चाहता था. उस की गोद में सिर रख कर सोना चाहता था. अपनी इसी सोच को लिए मैं उस रात गुंजा के घर जा पहुंचा.

एक बड़ी महफिल उस रात गुंजा के घर सजी हुई थी. मुझे देख कर गुंजा मुसकरा उठी. मेरे पास आ कर वह बोली, ‘‘आओ ऋषि, बैठो.’’

मैं ने पूछा, ‘‘गुंजा, यह महफिल, ये इतने लोग किसलिए?’’

‘‘शालू के लिए,’’ वह मुसकराई.

‘‘मैं समझा नहीं,’’ शालू का नाम आते ही मैं उतावलेपन से बोला.

‘‘आज उस की नथ उतराई है,’’ गुंजा मेरे करीब आ कर मेरी कमीज के बटन खोलते हुए बोली.

‘नथ उतराई. कोठों की इस भाषा से मैं अब तक बखूबी परिचित हो चुका था और अच्छे से इस का मतलब भी जानता था.

मैं ने एक झटके से गुंजा को अपने से परे ढकेल दिया था. जमीन पर गुंजा के गिरने की आवाज सुन कर वहां पान चबाते हुए उस की मां आ गई थीं.

जमीन पर गुंजा को गिरा देख कर वह हाथ नचा कर बोली, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’

मैं भी तनिक तेज आवाज में बोला, ‘‘मुझे शालू से दूर रहने की हिदायत दे कर तुम लोग उस की नथ उतराई की रस्म कर रहे हो.’’

‘‘हां तो… तुम्हें एतराज काक्या हक?’’ गुंजा की मां एक कोने में रखे पीकदान में पान की पीक थूकते हुए बोली.

‘‘मैं शालू को चाहता हूं.’’

‘‘तुम शालू को नहीं, बल्कि उस के जिस्म को चाहते हो, जिस की कीमत किसी ने 25,000 रुपए दी है. सौदा हो चुका है.’’

‘‘सौदा…’’ मैं तनिक रोब से बोला, ‘‘एक मासूम लड़की का सौदा कर के तुम्हें शर्म नहीं आती…’’

मेरी बात सुन कर वह अधेड़ औरत बिफर गई थी. न जाने कितनी बातों की बौछार उस ने मुझ पर कर दी. बस मुझे उस की आखिरी बात याद रही, ‘‘दफा हो जाओ यहां से, तुम्हारे जैसे लोग यहां आ कर घुटनों पर बैठ कर हमारे पैर चूमते हैं.’’

वहां से निकलते हुए मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारे पैर चूमे हमारा जूता.’’

मेरी बात सुनते ही वह दहाड़ कर बोली, ‘‘एक दिन किसी हम जैसी के पैर तू भरी महफिल में छुएगा, उस दिन मुझे याद करना.’’

वह चिल्ला रही थी. उस के वह शब्द पिघलते सीसे की तरह मेरे कानों में उतर रहे थे. मैं ने पलट कर भी नहीं देखा और तेज कदमों से वहां से निकल आया था.

लखनऊ शहर ने मेरे जवान होते जिस्म में अंगड़ाई भर दी थी. जिधर देखो उधर खूबसूरती बिखरी पड़ी थी. अब मैं 19 साल का सजीला नौजवान था, जो लखनऊ के एक मशहूर कालेज से बीटैक कर रहा था.

मैं पढ़ने में तो बचपन से ही होशियार था और इसी वजह से क्लास में मेरी धाक बैठ गई थी. लड़के और लड़कियां सब मेरी तरफ आकर्षित थे, पर मैं सिर्फ लड़कियों की तरफ आकर्षित था.

जब खूबसूरत लड़कियां स्लीवलैस टौप और स्किन टाइट जींस पहन कर खूबसूरती की गुडि़या बन कर मेरे सामने आतीं और होंठों पर मुसकान ला कर ‘हाय ऋषि’ कहतीं, तो मेरा दिल बल्लियों उछल जाता.

मेरे मन और शरीर में जो ज्वर ज्योति ने भरा था, न तो वह उतरा था और न ही गुंजा और उस की मां का दिया हुआ दंश कम हुआ था, बल्कि यों कहें तो और उफन उठा था.

वह रात : क्या था उस रात का राज – भाग 2

‘‘लेकिन, पिछले गांव में वह भी जवाब दे गई और बारिश भी अचानक तेज हो गई. अब तो आगे जंगल पड़ता है और बारिश में जोकटी (चीड़ की तेल वाली लकड़ी, जिसे पहाड़ के लोग मशाल बना कर रात में भी सफर कर लेते हैं) भी नहीं जल सकती. जंगल में बाघभालू का डर लग रहा है,’’ बात तो रामू ही कर रहा था, जो हमारी गली का चौकीदार था. बाकी के 2 लोग चुपचाप खड़े थे.

‘‘हम तुम्हें कहां रखेंगे, हमारे तो सारे कमरे सेबों से भरे पड़े हैं. हमारे अपने लिए भी जगह मुश्किल हो गई है. गांव में कहीं दूसरे घर में चले जाओ,’’ हरीश बोला.

‘‘ठीक है साहब, आप तो जानपहचान के हो. जब आप ही घर में जगह नहीं दे सकते, तो और कौन देगा?’’ रामू बहुत ही उदास हो कर कहने लगा, ‘‘अगर हो सके, तो एक टौर्च दे दीजिए. रामपुर में मैं आप के घर में दे दूंगा. कुछ तो आसरा हो जाएगा.’’

‘‘हां…हां, टौर्च ले जाओ. मैं लाता हूं,’’ कह कर हरीश भीतर गया, तो चाची भी उस के पीछेपीछे चली आईं.

दरवाजे के पास ही उन्होंने हरीश को जाते देख लिया, ‘‘क्यों रे, इतना बड़ा हो गया, पर इनसानियत नाम की कोई चीज तेरे पास है या नहीं? देख नहीं रहा, वे बेचारे किस तरह सर्दी से ठिठुर रहे हैं. गरीब क्या इनसान नहीं होते?’’

‘‘तुम भी न मां. बेमतलब दया की मूर्ति मत बना करो. अरे, ये थर्ड क्लास लोग चोरउच्चके भी तो होते हैं. इधर पापा घर में नहीं हैं और उधर तुम इन्हें घर में घुसाने की बात कर रही हो. कुछ उलटासीधा हो गया, तो मुझे मत कहना.’’

‘‘ये लोग कोई भी हों, इनसान तो हैं न. घर आए को शरण देनी है. ये मेहमान हैं और कहीं नहीं जाएंगे.

‘‘बाहर के बरामदे में एक चारपाई पड़ी है, उसे उठा लाओ और इन्हें दे दो. मैं कुछ कपड़े निकाल देती हूं,’’ कह कर चाची अपने कमरे में चली गईं और बड़ा बक्सा खोल कर कुछ पुराने कंबल और 2 दरियां निकाल कर बाहर ले आईं.

हरीश को न चाहते हुए भी मां की बात माननी पड़ी, क्योंकि वह जानता था कि अगर चारपाई नहीं लाई गई, तो वे खुद जा कर ले आएंगी. इतने अंधेरे में कहीं गिरगिरा गईं, तो फिर सभी को ?ोलना पड़ेगा.

चारपाई बरामदे में पटक कर ‘तुम्हारे मन में जो आए करो’ कहता हुआ हरीश पैर पटकता हुआ वहां से चला गया.

‘‘मुन्नी, पिछवाड़े से अंगीठी और थोड़ी सी लकड़ी उठा लाओ. देखो तो बेचारे सर्दी से कैसे ठिठुर रहे हैं,’’ बाहर खड़े तीनों के कानों में भी सारी बातचीत जा रही थी. उन्हें कुछ हौसला हुआ

और वे बारिश से बचने के लिए बरामदे में आ गए.

नीचे के कमरों में सचमुच सेब भरे पड़े थे और वहां ताले भी लगा दिए गए थे. एक कमरे में बिना छंटाई किए सेबों का ढेर लगा हुआ था, जो आज ही मजदूरों ने बाग से तोड़े थे. दूसरे कमरे में छंटे हुए सेब थे.

एक कमरे में सेबों से भरी पेटियां थीं, जो चाचा का फोन आने के बाद दिल्ली भेजी जाएंगी, पर बाहर का बरामदा तो खाली था. हां, वहां सेब भरने के बाद बचा कूड़ाकचरा जरूर पड़ा था.

चाची ने आवाज लगाई, ‘‘रामू.’’

‘‘जी, मांजी,’’ रामू, जो अपना कुरता उतार कर निचोड़ रहा था, झट बाहर आ गया. चाची ने कंबल और दरियां ऊपर से फेंक दीं, ‘‘मैं चारपाई देती हूं, पर तुम

3 जने उस एक चारपाई पर कैसे सो सकोगे?’’

‘‘नहीं मांजी, चारपाई रहने दीजिए. यहां पर बहुत सारा चिलारू (चीड़ की सूखी पत्तियां, जो सेब की पेटियों में लगाई जाती हैं) पड़ा है, इस को बिछा लेंगे. आप परेशान न हों. सुबह होते ही हम चले जाएंगे.’’

पर चाची ने चारपाई नीचे लटका ही दी, जिसे उन्होंने नीचे ला कर बाहर बरामदे में खड़ी कर के सर्दी से बचने के लिए दीवार बना लिया. रामू के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी. वह बराबर सर्दी से कांप रहा था.

तनु और मैं जलाने लायक लकड़ी, माचिस और अंगीठी उन्हें दे आए. उन्होंने हमारे लौटने का भी इंतजार नहीं किया. किसी भूखे भेडि़ए की तरह उस अंगीठी पर टूट पड़े और कुछ चिलारू जला कर उन्होंने आग सुलगा ली.

अब तक उन्होंने अपने कपड़े भी निचोड़ लिए थे और उन्हें बरामदे में खड़ी चारपाई पर फैला दिए.

हम जब तक लौट कर कमरे के अंदर आए, तब तक तो चाची खर्राटे भर रही थीं. पर मेरी नींद उड़ चुकी थी.

शायद तनु को भी नींद नहीं आ रही थी. उस ने उठ कर पानी पीया, तो मुझे भी याद आया कि मैं भी पानी पी ही लूं. हम दोनों बात करना चाह रही थीं, लेकिन चाची के जाग जाने का डर था.

BB OTT2: एल्विश यादव के पिता ने लगाई मनीषा रानी को फटकार, Kiss को लेकर कही ये बात

इन दिनों बिग बॉस ओटीटी2 काफी सुर्खियों में चल रहा है शो में हर दिन कुछ नया देखने को मिल रहा है शो दिन पर दिन सुपरहिट हो रहा है, वही बीते एपिसोड़ में फैमिली वीक था, जिसमें सभी कंटेस्टेंट के घरवालों की एंट्री हुई. शो में सबसे इमोशनल वीक यही होता है ऐसे में एल्विश यादव की आखें नम हो गई. उन्हे लगा था कि उनकी मां आएंगी शो पर, लेकिन एल्विश यादव के पिता की एंट्री हुई. उन्हे देखते ही एल्विश ने उन्हे गले लगा लिया. जिसके बाद वो रोने लगे. एल्विश के पिता सबसे मिले, लेकिन मनीषा रानी से मिलने पर एल्विश के पिता ने उन्हे फटकार लगाई.

 

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आपको बता दें, कि एल्विश के पिता ने मनीषा रानी को कुछ खास ही मैसेज दिया, उनसे कहा कि ये एक फैमली शो है. इस शो को सब परिवार एक साथ देखते है. एक दो बार तो चीजे अच्छी लगती है लेकिन बार बार वही चीज करना बोझिल लगता है, एल्विश के पिता मनीषा को बार बार किस करने पर ये बात कहते है इस पर मनीषा रानी हसंते हुए कहती है कि हम एल्विश को पसंद करते है.तो इश पर एल्विश के पिता कहते है कि वह ओपनली अपनी फीलिंग्स बयां नहीं कर रही है कि वह किसे लाइक करती है.

मनीषा को समझाते नजर आए एल्विश

एल्विश यादव अपने पिता के जाने के बाद मनीषा को फिर से समझाते है और कहते है कि ये जो बार-बार चुम्मा मांगती है ये बात घिस गई है. तो इस पर मनीषा फिर से मजाक करते हुए कहती है कि तो आप चाहते है कि मैं इससे ज्यादा मांगू. फिर एल्विश कहते है कि मेरे पापा भी बोलकर गए है चीजे लीमिट में अच्छी लगती है ज्यादा अच्छी नहीं लगता है. तो अब ये सब करना बंद कर. मनीषा बेबिका से कहती है कि सबसे ज्यादा तेरे पापा से मिलकर मजा आया. इतने में एल्विश कहते है कि सबसे खराब मेरे पापा लगे, तो मनीषा हसंते हुए ना कर देती है अब देखना ये होगा कि एल्विश के पिता के समझाने के बाद मनीषा औऱ एल्विश की मस्ती नजर आएगी या नहीं.

 

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हालांकि आपको बता दें, कि मनीषा ये बात कई बार क्लीयर कर चुकी है वह सिर्फ मस्ती -मजाक करती है वह उनको लेकर कोई सीरियस नहीं है. मुझे फ्लर्ट करना अच्छा लगता है.

Bhabhi Ji Ghar Pr Hai : क्या शो से ब्रेक लेंगी भाभी जी, शुभांगी अत्रे ने बताई वजह

भाभी जी घर पर है कई सालों से दर्शकों का खूब मनोरंजन कर रहा है ये शो कॉमेडी शो में से एक सबसे पॉपुलर शो है जिसकी लोकप्रियता बहुत है. इस शो की शुरुआत साल 2015 में हुई है तब से लेकर आजतक ये दर्शकों को हंसाने का काम कर रहा है. छोटे पर्दे से शुरु हुआ ये शो धीरे-धीरे बड़े पर्दे पर सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला शो बन गया. शो की टीआरपी भी काफी अच्छी रेटिंग है, लेकिन अब इसे लेकर खबर है कि लीड रोल में नजर आने वाली शुभांगी अत्रे शो से ब्रेक लेने जा रही है.

 

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आपको बता दें, कि कॉमेडी शो में की शुरुआत में अंगूरी भाभी की भूमिका में शिल्पा शिंदे थीं हालांकि मेकर्स से अनबन के चलते उन्होंने शो को छोड़ दिया था. बाद में इस किरदार को शुभांगी अत्रे ने निभाया और उन्होंने भी खूब पॉपुलैरिटी हासिल की.

क्या है शो की कहानी

बता दे, कि ये शो दो पडोसियों पर बना है जिसमें एक तिवारी और एक विभूति है. जो एक दूसरे की पत्नी अंगूरी और अनीता को पसंद किया करते है. शुभांगी अत्रे ने भाभी की भूमिका निभाई है जिसने हर दिल अपनी जगह बनाई है. अपने खूबसूरत लुक और बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से दर्शकों को इंप्रेस करने में कामयाब रहीं. लेकिन खबरें हैं कि एक्ट्रेस शुभांगी ने शो से ब्रेक लेने का फैसला किया है.

 

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क्यो ले रही है शुभांगी ब्रेक

एक रिपोर्ट के मुताबिक, ”शुभांगी जल्द ही शो से ब्रेक लेंगी हालांकि ये ब्रेक ज्यादा लंबा नहीं होगा और वह जल्द ही सेट पर वापस आएंगी, वह एक महीने के बाद शो में कमबैक कर सकती हगै. दरअसल एक्ट्रेस अपनी बेटी को यूएस में शिफ्ट कराने जा रही हैं. शुभांगी ने एपिसोड के अपने हिस्से की शूटिंग कर ली है और इससे पहले कि किसी को पता चलेवह सेट पर वापस भी आ जाएंगी.

एक युग: सुषमा और पंकज की लव मैरिज में किसने घोला जहर?- भाग 2

लेकिन अभी उन की आंख लगी ही थी कि किसी के कराहने की आवाज से उन की नींद टूट गई. वे घबरा कर उठ बैठीं. तुरंत बच्चों के कमरे में पहुंचीं. वहां उन्होंने देखा कि उन की प्यारी बहू सुषमा कराह रही है. उन्होंने तुरंत कमरे की बत्ती जलाई तो देखा, सुषमा बेहोश सी बिस्तर पर पड़ी है.

उन्होंने बहू को बहुत हिलायाडुलाया पर उस ने आंखें न खोलीं. इस के बाद जो दृश्य उन्होंने देखा तो उन के तो पैरों के नीचे से जमीन ही सरक गई. बहू के बगल में बिस्तर पर एक खाली शीशी पड़ी हुई थी और उस पर लिखा था, ‘जहर’. देखते ही पार्वती के मुंह से चीख निकल गई.

उन्होंने तुरंत बेटी को जगाया और स्वयं लगभग दौड़ती हुई जा कर अपने पड़ोसी को बुला लाईं. पड़ोसी की सहायता से वे बहू को अस्पताल ले गईं, जहां आकस्मिक चिकित्सा कक्ष में उस का इलाज शुरू हो गया.

इधर पंकज को बुलाने के लिए भी सूचना भेज दी गई. कुछ घंटों में ही पंकज आ पहुंचा. पार्वती सोचसोच कर परेशान थीं कि आखिर बहू ने जहर क्यों खा लिया? पंकज भी सोच में पड़ गया कि सुषमा ने जहर क्यों खाया? क्या मां या बहनों ने कुछ कहा

लेकिन ये सब लोग तो उसे बहुत प्यार करते हैं. सुषमा को कुछ हो गया तो क्या उन पर दहेज का मामला नहीं चल जाएगा? आजकल आएदिन इस तरह के किस्से होते ही रहते हैं. कई प्रश्न पार्वती और उन के बेटे के दिलोदिमाग को मथने लगे.

डाक्टरों के उपचार के समय ही सुषमा ने चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘मैं ने जहर नहीं खाया, मैं ने जहर नहीं खाया…’’

पर डाक्टरों ने उस की एक न सुनी. सुषमा के पेट का सारा पानी निकाल दिया गया. पेट से निकले हुए पानी का परीक्षण करने पर पता चला कि उस के पेट में जहर की एक बूंद भी नहीं है.

पार्वती ने बहू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटी, आखिर यह सब क्यों किया? मेरी तो जान ही निकल गई थी.’’

‘‘सुषमा, तुम ने हमें कहीं का न छोड़ा. पूरे महल्ले और मेरे दफ्तर में हमारी कितनी बदनामी हुई है. हम किसी से निगाहें मिलाने लायक नहीं रहे. आएदिन दहेज के किस्से होते हैं. डाक्टरी परीक्षण में तनिक भी कमी रह जाती तो हम सब तो जेल में पहुंच गए होते. हमारी कौन सुनता? तुम ने तो हम सब को जेल भेजने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी. अभी भी कितने लोगों को विश्वास आएगा कि तुम ने जहर नहीं खाया था?’’

पंकज के हृदय को सुषमा के इस नाटक से बहुत बड़ी ठेस लगी. उस का हृदय चूरचूर हो गया. पार्वती ने बेटे को समझाने का बहुत प्रयास किया, पर पंकज किसी तरह न माना.

पार्वती ने कहा, ‘‘बेटे, तुम बहू को अब अपने साथ ही ले जाओ.’’

उन्होंने सोचा, बेटा और बहू साथ रहेंगे तो सबकुछ अपनेआप ठीक हो जाएगा. उन का सोचना गलत था. पंकज सुषमा के इस घिनौने नाटक को भूल न सका.

इस अचानक हुए हादसे की सूचना सुषमा के पिता कन्हैया लाल को भी दी जा चुकी थी. उस की मां तो बेटी के जहर खाने का समाचार सुनते ही बेहोश हो गईं.

पिता कहने लगे, ‘‘मैं हमेशा समझाता था कि ये छोटे घर के लोग रुपएपैसे के बड़े लालची होते हैं. अरे, जब पूछा तो कहने लगे कि हमें कुछ भी नहीं चाहिए. अब अपनी फूल सी बेटी को जहर खा लेने पर मजबूर कर दिया न?’’

‘‘वह भी तो उस लड़के की दीवानी बनी हुई थी. आखिर उस लड़के में ऐसी क्या खास बात है?’’ मां ने आंसू बहाते हुए कहा.

‘‘अरे, यह सब उस पंकज की चालाकी है, जो उस ने सुषमा को अपने जाल में फंसा लिया. मैं भी एक जज हूं. छोड़ूंगा नहीं उस नालायक को. उसे हथकडि़यां न लगवाईं तो मेरा भी नाम नहीं.’’

जब कन्हैया लाल पत्नी के साथ सुषमा की ससुराल पहुंचे तो गुस्से में भर कर पंकज ने साफ कह दिया, ‘‘आप अपनी बेटी को अपने साथ ले जाइए. हम तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे.’’

‘‘हांहां, बेटी को तो हम साथ ले ही जाएंगे पर तुम्हें भी जेल की हवा खिलाए बिना नहीं छोड़ेंगे. शुक्र है कि मेरी बेटी सहीसलामत है.’’

सुषमा ने भारी मन से अपनी प्रिय सहेली को पूरी कहानी बताते हुए कहा, ‘‘जया, इस हादसे के बाद मैं पिताजी के साथ ससुराल से यहां चली आई.’’

‘‘उस के बाद पंकज से तुम्हारी भेंट हुई या नहीं?’’

‘‘नहीं जया, इस घटना के एक सप्ताह बाद पंकज मेरे घर आए थे. पिताजी उन्हें बाहर बैठक में ही मिल गए. उन्होंने वहीं खूब उलटीसीधी सुना कर पंकज को अपमानित किया. कह दिया कि अब तुम सुषमा से कभी नहीं मिल सकते. अब तो तुम्हारे पास तलाक के कागज ही पहुंचेंगे.

‘‘तब पंकज ने मेरे पिताजी से कहा कि आप मुझ से बात नहीं करना चाहते तो न करें पर मुझे सुषमा से तो एक बार बात कर लेने का अवसर दें. पर पिताजी ने कहा कि मैं तुम्हारी कोई भी बात नहीं सुनना चाहता. अब तो तुम सुषमा से कचहरी में ही मिलोगे.

‘‘इस के बाद वे भारी मन से चले गए. बाद में एक दिन उन का टैलीफोन भी आया था तो मां ने कह दिया कि आगे से टैलीफोन करने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘यह सब तो तेरे मातापिता ने किया, पर तू ने इस बीच क्या किया, यह तो तू ने बताया ही नहीं?’’

‘‘जया, मैं क्या करती, मेरी तो कुछ समझ में आया ही नहीं कि कैसे यह सब कुछ हो गया. मैं तो बस एक मूकदर्शक ही बनी रही.’’

‘‘इस का मतलब यह है कि तुम ने पंकज की ओर हाथ बढ़ाने का कोई प्रयास ही नहीं किया, जबकि पंकज ने 2 बार तुम से मिलने का प्रयास किया.’’

‘‘मैं क्या करती, पिताजी ने तो सारे रास्ते ही बंद कर दिए. उन्होंने निर्णय सुना दिया कि पंकज से मिलने या बात करने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘उन्होंने तो निर्णय कर लिया, पर क्या तू ने भी उन का निर्णय मान लिया? तेरी सूरत से तो ऐसा नहीं लगता?’’ जया ने सोचते हुए कहा.

‘‘मैं क्या करूं? मेरे मातापिता हर समय उठतेबैठते यही कहते रहते हैं कि अपने मन से विवाह करने का परिणाम देख लिया. कितनी बेरहमी से उस ने तुझे अपने घर से निकाल दिया. समाज में हमारी कितनी थूथू हुई है. पहले तो तू ने अपने से इतने नीचे खानदान में शादी की और फिर उस के बाद यह बेइज्जती. दो कौड़ी के उस लड़के की हिम्मत तो देखो. हम बड़ी धूमधाम से तेरी दूसरी शादी करेंगे. अभी तेरी उम्र ही कितनी है?’’

‘‘मातापिता ने कह दिया और तू ने सब कुछ ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया. इसी दम पर पूरे परिवार का विरोध मोल ले कर पंकज का हाथ थामा था. क्या अब तुझे पंकज सचमुच पसंद नहीं?’’

Raksha Bandhan : बड़े भैया- भाग 2

रात्रि के 11 बजे होंगे. बड़े भैया टीवी पर एक रोचक धारावाहिक देख रहे थे. तभी अचानक दरवाजे पर घंटी तो बजी ही, साथ ही कोई धड़ाधड़ बड़बड़ा भी रहा था. बड़े भैया को दहशत हुई कि कहीं कोई लुटेरा या आतंकवादी तो नहीं. धीरेधीरे सोचते हुए दरवाजे तक आए. दरवाजे में लगे शीशे में झांक कर देखा, पर अंधेरे में कुछ समझ में नहीं आया.

‘‘कौन है?’’ उन्होंने धमकाते हुए पूछा.

‘‘मैं हूं,’’ एक मिमियाता स्वर आया,  ‘‘दरवाजा खोलिए.’’ आवाज कुछ परिचित सी लगी, पर धोखा भी तो हो सकता है. सोच कर बड़े भैया ने कड़क कर पूछा, ‘‘मैं कौन?’’

‘‘सिम्मी,’’ लगा कि आवाज में जान ही न थी. बड़े भैया प्यार से उसे सिम्मी बुलाते थे. बड़े भैया ने झट से दरवाजा खोला. स्मिता हाथ में एक छोटा सूटकेस लिए खड़ी थी, ठीक किसी फिल्मी नायिका की तरह. पहले तो बड़े भैया की छाती से चिपट कर रोई और फिर सीधे अपने कमरे में चली गई. बड़े भैया ने कुछ नहीं कहा. केवल गंभीरता से सोचते रहे कि सुबह होने पर ही पूछेंगे. वैसे पूछने की आवश्यकता भी क्या है?

सवेरे वे अखबार पढ़ रहे थे. स्मिता सामने बैठी बेचैनी से प्याले, प्लेट इधरउधर करते हुए सोच रही थी कि ये बड़े भैया हैं कैसे? कोई चिंता ही नहीं… अंत में जब सब्र का बांध टूट गया तो उस ने भैया के हाथों से अखबार छीनते हुए कहा, ‘‘पूछोगे नहीं, मैं क्यों आई हूं?’’

शरारतभरी मुसकाराहट से उन्होंने कहा, ‘‘पूछने की क्या जरूरत है? पतिपत्नी में तकरार तो होती ही रहती है. सब ठीक हो जाएगा.’’ स्मिता ने क्रोध से कहा, ‘‘यह तकरार नहीं है, बड़े भैया. मैं वह घर हमेशाहमेशा के लिए छोड़ आई हूं.’’

बड़े भैया ने हंस कर कहा, ‘‘शाबाश बेटी, यह तू ने  बड़ा अच्छा किया. इस घर में तेरी बड़ी कमी महसूस होती थी. आज लौकी के कोफ्ते बनाना बहुत दिन हो गए खाए हुए.’’

‘‘बड़े भैया, आप इसे मजाक समझ रहे हैं?’’ स्मिता ने क्रोध से पूछा. उन्होंने गंभीरता से उत्तर दिया, ‘‘जिंदगी में ऐसे फैसले कभी मजाक नहीं होते. तू ने स्वयं शादी का फैसला किया. मैं ने मान लिया. अब तू हमेशाहमेशा के लिए यहां आ गई है, यह भी मान लिया. तू चिंता मत कर. यहां कोई कष्ट नहीं होगा. मेरे लिए तो बहुत अच्छा है.’’ एक बार भी तो नहीं पूछा कि झगड़ा क्यों हुआ? मानो, उन्हें कोई मतलब ही नहीं है. स्मिता तो सबकुछ उगलना चाहती थी. कब तक चुप बैठी रहेगी. अचानक वह सिसकने लगी. रोतेरोते बोली, ‘‘बड़े भैया, उन्हें बहू नहीं, एक नौकरानी चाहिए. दिनभर घर में चक्की की तरह पिसती रहती हूं, पर किसी को मेरी परवा नहीं.’’

‘‘किसी से क्या मतलब?’’ भैया ने अनजान बनते हुए पूछा.

‘‘ कहा न किसी को भी नहीं,’’ स्मिता ने चिढ़ कर कहा.

‘‘पर तू कालेज पढ़ाने तो अब भी जाती है न?’’ बड़े भैया ने पूछा.

‘‘सो तो जाती हूं,’’ स्मिता ने कहा, ‘‘पर मेरे पीछे कोई भी काम नहीं करता. सब हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं.’’

‘‘तो तू नौकरी छोड़ दे,’’ बड़े भैया ने सलाह दी.

‘‘रुपया जो कमा कर लाती हूं, रुपया भी तो चाहिए उन्हें,’’ स्मिता ने तड़क कर कहा.

‘‘और अनिमेष का क्या कहना है?’’

‘‘पहले तो मेरी ओर से कुछ बोलते भी थे, पर अब मातापिता और बहन के दवाब में उन्होंने भी साथ देना छोड़ दिया है. कहते हैं कि मैं ही परिवार में मिलजुल कर नहीं रहती. अब आप ही बताइए कि क्या मेरी अपनी कोई शख्सियत नहीं है? मेरी अपनी कोई पहचान नहीं है? क्या मुझे अपनी तरह से जीने का अधिकार नहीं है?’’ वह एक ही सांस में कह गई सबकुछ. गंभीरता से विचार करते हुए बड़े भैया ने कहा, ‘‘यह बात तो ठीक है. अगर इंसान अपनी पहचान ही भूल जाए तो तो पढ़ाईलिखाई का क्या लाभ? सच ही तेरे साथ बड़ा अन्याय हुआ है. अच्छा किया जो तू वह घर छोड़ कर चली आई हमेशाहमेशा के लिए.’’ स्मिता को समझ न आया कि बड़े भैया ताना दे रहे हैं या समर्थन कर रहे हैं. अकसर ऐसी ही दोहरी बात करते हैं. उन को समझना बड़ा मुश्किल है.

‘‘अब मैं क्या करूं?’’ स्मिता ने उलझन में पड़ कर पूछा.

‘‘करना क्या है, आराम से यहां रह और चैन की बांसुरी बजा. हां, कालेज जाना मत छोड़ना, खाली दिमाग शैतान का घर होता है,’’ भैया ने समझाते हुए कहा और फिर कुछ मुसकराते हुए बोले, ‘‘अब कुछ नाश्तावाश्ता भी मिलेगा?’’ स्मिता के तने हुए चेहरे पर मुसकान की लहर दौड़ गई. बड़े भैया कभी नहीं बदलेंगे. 7 दिन हो गए. स्मिता के खिले हुए मुखड़े पर चिंता की लकीरें उभरने लगी थीं. बड़े भैया के समर्थन और आश्रय प्रदान से उसे बड़ी तसल्ली हुई थी. पहले तो यही सोचा था कि देखते ही वे डांटेंगे और फटकार लगाएंगे, बुराभला कहेंगे, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. आखिर बड़े भैया को छोड़ कर उस का था ही कौन

‘‘क्या बात है, बड़ी परेशान लग रही है?’’ बड़े भैया ने पूछा.

‘‘कुछ तो नहीं,’’ स्मिता ने कहा.

‘‘कुछ तो है,’’ वे मुसकराए.

स्मिता ने झिझकते हुए कहा,  ‘‘आप वहां कहलवा दीजिए कि मैं यहां हूं.’’

‘‘और बड़े आराम से हूं,’’ उन्होंने जोड़ते हुए कहा, ‘‘मैं क्यों  कहूं ऐसा? पर लगता है तेरे दिल में अनिमेष के लिए कुछ जगह है, इसीलिए परेशान है.’’

स्मिता ने झल्ला कर कहा, ‘‘मुझे कोई परवा नहीं उन लोगों की. क्या उन को मेरी परवा है?’’

‘‘इसीलिए तो कहता हूं,’’ बड़े भैया ने हंस कर कहा, ‘‘जब एक बार फै सला घर छोड़ने का कर लिया तो अब उसी पर अटल रह.’’ स्मिता चुप हो गई. इतवार का दिन था. छुट्टी के हिसाब से सब काम धीरेधीरे हो रहा था. घंटी बजी तब स्मिता अपने कमरे में थी. महरी के सिवा कौन होगा? वह भी तो आराम से आएगी. बड़े भैया ने धीरेधीरे उठ कर दरवाजा खोला. ‘‘तुम?’’ बड़े भैया ने चौंक कर पूछा, ‘‘यहां क्यों आए हो?’’

‘‘स्मिता से मिलने आया हूं,’’ अनिमेष ने झेंपते हुए कहा.

‘‘वह तुम से नहीं मिलना चाहती,’’ कह कर उन्होंने तड़ाक से दरवाजा बंद करने की नाकामयाब कोशिश की.

‘‘बड़े भैया,’’ अनिमेष ने बड़े सम्मान से कहा, ‘‘आप से तो बात कर सकता हूं, या आप भी मुझ से बात नही करेंगे?’’

भैया ने सोचते हुए कहा, ‘‘हां, मैं तुम से बात कर सकता हूं. पर याद रखना, मुझे तुम मूर्ख मत समझना.’’

अनिमेष ने झुक कर उन के घुटने छूते हुए कहा, ‘‘ऐसी जुर्रत कर सकता हूं क्या?’’

‘‘ठीक है, अंदर आ जाओ.’’ स्मिता ने अनिमेष को देखा तो पास आ गई. दोनों एकदूसरे को देख रहे थे. बड़े भैया ने डांट कर कहा, ‘‘सिम्मी, तू अंदर जा. तेरा यहां कोई काम नहीं है.’’ स्मिता सहम कर अंदर चली गई. चाय मेज पर रखी थी. बड़े भैया ने चाय का प्याला भर कर अनिमेष की ओर बढ़ाया. ‘‘यहां क्यों आए हो?’’ बड़े भैया ने तीखे स्वर में प्रश्न किया.

‘‘मैं स्मिता को लेने आया हूं.’’

‘‘वह तुम्हारे साथ नहीं जाएगी,’’ बड़े भैया ने दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘वह तुम्हारा घर हमेशाहमेशा के लिए छोड़ आई है. यहां उसे कोई तकलीफ नहीं है.’’

अनिमेष ने झिझकते हुए कहा, ‘‘दरअसल, कुछ गलतफहमी हो गई है, मैं उसे दूर करने आया हूं.’’

‘‘गलतफहमी? कैसी गलतफहमी?’’ बड़े भैया ने क्रोध से कहा, ‘‘क्या तुम उसे एक नौकरानी की तरह नहीं रखते? जब तुम उसे बाहर काम करने के लिए भेजते हो तो क्या तुम्हारा और तुम्हारे घर वालों का यह कर्तव्य नहीं कि घर के कार्यों में उस का हाथ बंटाएं?’’

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