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Family Story In Hindi: अपनी जिंदगी – लोकल ट्रेन का वह सफर

Family Story In Hindi: उस लोकल ट्रेन की बोगी में ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी, इसलिए रंजना ने जल्दी से खिड़की की तरफ वाली सीट पकड़ ली थी. उसे चलती हुई ट्रेन से बाहर खेत, मैदान, पेड़पौधे, नदी, पहाड़ देखना अच्छा लगता था, पर इस बार उस की इच्छा बाहर देखने की नहीं हो रही थी. उस का मन अंदर से उदास था, इसलिए वह अनमने ढंग से सीट पर बैठ गई थी. पास ही दूसरी तरफ की सीट पर उस के मामाजी बैठे हुए थे.

ट्रेन के अंदर कभी चाय वाला, कभी मूंगफली वाला, तो कभी फल बेचने वाले आ और जा रहे थे.

रंजना इन चीजों से बेखबर थी. उस का ध्यान ट्रेन के अंदर नहीं था, इसलिए वह खयालों में खोने लगी थी. उसे अलगअलग तरह के शोर से घबराहट हो रही थी, इसलिए वह आंखें बंद कर के सोचने लगी थी.

आज से तकरीबन डेढ़ साल पहले वह अपने मामा के घर पढ़ने आई थी. हालांकि उस की मम्मी नहीं चाहती थीं कि उन की सब से लाड़ली बेटी अपने मामामामी पर बो झ बने. उस के मामामामी के कोई औलाद नहीं थी, इसलिए मामामामी के कहने पर उन के घर जाने के लिए तैयार हुई थी. उस की मामी का अकेले मन नहीं लगता था, तभी उस की मम्मी भेजने को राजी हुई थीं.

रंजना की मम्मी के राजी होने के पीछे की एक वजह यह भी थी कि वे चाहती थीं कि उन की बेटी पढ़लिख जाए. गांव में 11वीं जमात के लिए स्कूल नहीं था, जबकि मामामामी जहां रहते थे, वहां ये सब सुविधाएं थीं.

रंजना 3 भाईबहनों में सब से बड़ी थी. उस के पापाजी खेतीबारी करते थे. घर में किसी तरह की कमी नहीं थी.

मम्मी दिल पर पत्थर रख कर बेटी रंजना को भेजने को राजी हुई थीं. वैसे, वे नहीं चाहती थीं कि उन की बेटी उन से दूर रहे. पर गांव में आगे की पढ़ाईलिखाई का उचित इंतजाम नहीं था, इसलिए आगे की पढ़ाई के लिए न चाहते हुए भी वे मामामामी के घर भेजना उचित सम झी थीं.

आइसक्रीम वाले ने आइसक्रीम की आवाज लगाई. उस के मामाजी ने उस से आइसक्रीम के लिए पूछा, ‘‘रंजना, आइसक्रीम खाओगी?’’

‘‘नहीं मामाजी, मेरी इच्छा नहीं है,’’ रंजना अनिच्छा जाहिर करते हुए उस लोकल ट्रेन की खिड़की से बाहर देखने लगी थी.

रंजना के मामाजी चाय वाले से चाय खरीद कर सुड़कने लगे थे, क्योंकि वह चाय नहीं लेती थी, इसलिए वह बाहर की तरफ देख रही थी. लेकिन उस का मन बाहर भी टिक नहीं पा रहा था. अभी भीड़ उस का ध्यान मामा के गांव की गलियों में ही था. उसे रोना आ रहा था. वह किस मुंह से मम्मी से बात करेगी?

रंजना अपनेआप को कुसूरवार मान रही थी. लेकिन उस ने कोई बहुत बड़ा अपराध नहीं किया था. उस का अपराध सिर्फ यही था कि वह एक दूसरी जाति के लड़के से प्यार करने लगी थी. वह अपनी मम्मी की हिदायतों के मुताबिक खुद पर काबू नहीं रख पाई थी.

मम्मी ने घर से निकलते हुए उसे दुनियादारी के लिए सम झाया था, ‘‘अपने मामामामी का मान रखना. कभी भी कुछ गलत काम मत करना कि अपने मातापिता के साथ मामामामी को भी सिर  झुकाना पड़ जाए. बेटी की एक गलती के चलते घर की मानमर्यादा चली जाती है. इसे हमेशा याद रखना,’’ और उस का सिर चूम कर घर से विदा किया था.

लेकिन यहां रंजना एक ऐसे लड़के से प्यार कर बैठी थी, जहां उस की जाति के लोग छोटा मानते थे. पर राजेश का इस में क्या कुसूर था? उस का सिर्फ इतना ही कुसूर था कि उस ने निचले तबके में जन्म लिया था, जबकि इनसान का किसी जाति या धर्म में जन्म लेना किसी के वश में नहीं होता है. पर, राजेश एक अच्छा इनसान था.

रंजना राजेश के साथ स्कूल और कोचिंग आतीजाती थी. वह कैसे उस की तरफ खींचती चली गई थी, उसे पता भी नहीं चला था. दोनों हमउम्र होने के चलते एकदूसरे से खूब ठिठोली करते. पगडंडियों पर हंसहंस कर बातें करते. एकदूसरे का मजाक उड़ाते. बिना वजह भी खूब हंसते. बिना बात किए एक पल भी नहीं रह पाते थे. यह सब कब प्यार में बदल गया, उसे पता भी नहीं चला. फिर तो वे एकदूसरे के प्यार में पागल हो गए थे. आज उसी पागलपन ने उसे पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर कर दिया था. वह पढ़ना चाहती थी और वह यहां पढ़ने के लिए ही तो आई थी.

उस दिन रात के अंधेरे में रंजना राजेश के आगोश में थी. दोनों एकदूसरे की बांहों में चिपके हुए मस्ती में डूबे हुए थे. वे एकदूसरे के होंठों को चूम रहे थे. राजेश उस के कोमल अंगों से खेलने लगा था. दोनों के जिस्म में गरमी बढ़ने लगी थी. वे एकदूसरे में समा जाने की कोशिश कर रहे थे, तभी उस के मामा आ गए थे. यह सब उन के लिए खून खौलाने वाला था.

अचानक मामा ने उन दोनों को एकदूसरे के आगोश में लिपटे हुए रंगे हाथों पकड़ लिया था. वे काफी गुस्से में थे.

रंजना राजेश को किसी तरह भगा चुकी थी.

मामामामी को यह पसंद नहीं था कि रंजना एक निचले तबके के लड़के के प्यार में पड़ जाए और इस की चर्चा पूरे गांव में हो, इसलिए उस की मामी ने मामा को सम झाया था, ‘‘इस का यहां रहना ठीक नहीं है. पानी सिर से ऊपर जा चुका है. इस की कच्ची उम्र का पागलपन है. कहीं ऊंचनीच हो गई, तो हम लोग जीजी को क्या मुंह दिखाएंगे? हमारी बिरादरी में बदनामी होगी सो अलग. इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी.’’

सरल स्वभाव के मामा ने मामी की हां में हां मिलाई थी, क्योंकि वे मामी के आज्ञाकारी पति थे. वे उन की बातों को कभी भी टालते नहीं थे. वहीं मामी

काफी उग्र स्वभाव की थीं. उन में जातपांत, छुआछूत की सोच कूटकूट कर भरी हुई थी.

दूसरी वजह यह थी कि वे ब्राह्मण थे. इस परिवार के लोग निचले तबके से काम तो ले सकते हैं, पर प्यार के नाम पर एकदूसरे की जान के दुश्मन बन बैठते हैं. इसलिए उस के मामामामी दोनों ने फौरन फैसला किया कि उसे गांव में मम्मीपापा के पास छोड़ आएं. यही  वजह थी कि आज उस के मामा रंजना को उस के घर छोड़ने जा रहे थे.

राजेश देखने में स्मार्ट था. दोनों को स्कूल और कोचिंग आनेजाने के दौरान ही एकदूसरे से नजदीकियां बढ़ी थीं. राजेश पढ़नेलिखने में बहुत अच्छा था, जबकि रंजना गांव से आई थी. राजेश उसे पढ़ने में भी मदद करता था. उस की फर्स्ट ईयर की कोचिंग क्लासेज में परफौर्मैंस अच्छी हो चुकी थी.

रंजना का अपना गांव काफी पिछड़ा हुआ था. लेकिन यहां छोटामोटा बाजार होने के चलते लोग थोड़ीबहुत शहरी रंगढंग में ढल चुके थे. पास ही रेलवे स्टेशन था. यहां के लड़केलड़कियां लोकल ट्रेन से स्कूल और कोचिंग आतेजाते थे. ट्रेन से उतर कर कुछ दूरी गांव की पगडंडियों पर चलना पड़ता था. उन्हीं पगडंडियों के बीच उन दोनों का प्यार पनपा था. वह राजेश के साथ जीना चाहती थी. राजेश भी उसे बहुत प्यार करता था.

जैसे ही ट्रेन हिचकोले खा कर रुकी, रंजना के मामाजी ने उसे  झक झोरा, ‘‘चलो रंजना, स्टेशन आ गया. अब उतरना है,’’ सुन कर वह सकपका गई थी.

रंजना अतीत से वर्तमान में आ गई थी. दोनों तेजी से ट्रेन से उतर गए थे, क्योंकि यहां ट्रेन बहुत कम समय के लिए रुकती थी.

रंजना जल्द ही आटोरिकशा से घर पहुंच चुकी थी. उस की मम्मी अचानक आई अपनी बेटी और भाई को देख कर खुश थीं, लेकिन उन के मन में शक पैदा होने लगा था. उस के पापाजी को आने से कोई खास फर्क नहीं हुआ था. लेकिन उस की मम्मी सम झ नहीं पा रही थीं. अभी उस की स्कूल की छुट्टी के दिन भी नहीं थे, फिर वह अचानक कैसे आ गई. मामाजी जल्दी ही शाम की गाड़ी से लौट गए थे.

हालांकि रंजना के मामाजी उस के मम्मीपापा को सबकुछ बता चुके थे. यह सब सुन कर उस के घर का माहौल ही बदल गया था. उस के पापाजी ने उसे घर से बाहर निकलना बंद करवा दिया था. उस की पढ़ाईलिखाई छूट गई थी. अब वह उदास रहने लगी थी. जल्दीजल्दी उस के लिए रिश्त ढूंढ़ा जाने लगा था. काफी भागदौड़ के बाद उस की शादी तय हो गई, लेकिन उस की उदासी दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी.

कुछ दिन बीतने के बाद रंजना की उदासी में कोई सुधार नहीं हुआ. उस की मम्मी ने उसे सम झाने की कोशिश की, ‘‘हम ऊंची जाति वाले हैं. इस तरह की ओछी हरकत से हम लोगों की समाज में बदनामी होगी. हम लोगों का ऊंचा खानदान है. जल्दी ही तुम्हारी शादी हो जाएगी,’’ उस की मम्मी हिदायत दे रही थीं और उस के सिर

पर उंगलियां भी फिरा रही थीं.

वह मम्मी से गले लग कर फफकफफक कर रोने लगी थी. उस दिन उस के पापाजी घर पर नहीं थे.

‘‘मम्मी, मैं राजेश के बिना नहीं जी पाऊंगी. मैं उसे बहुत प्यार करती हूं.’’

मम्मी उस के सिर को प्यार से सहला रही थीं और सम झा रही थीं, ‘‘बेटी, अपनी बिरादरी में क्या लड़कों की कमी है? तुम्हारे लिए उस से भी अच्छा लड़का ढूंढ़ा जाएगा.’’

‘‘नहीं मम्मी, मु झे सिर्फ राजेश चाहिए,’’ उस ने रोते हुए उन्हें बताया.

उस की मम्मी अपनी बेटी के रोने  से विचलित हो गई थी. फिर भी वह  उसे ढांढ़स बंधा रही थीं, ‘‘सबकुछ  ठीक हो जाएगा. वक्त हर मर्ज की  दवा है.’’

उस दिन रंजना की मम्मी रात को अपने बिस्तर पर करवटें बदल रही थीं. वे काफी बेचैन थीं. शायद उन्हें अपनी बेटी का दुख सहा नहीं जा रहा था. उन्हें भी याद आ रहा थे, अपनी जिंदगी के बीते हुए वे सुनहरे पल, जब वे अपनी जवानी के दिनों में अपने ही गांव के पड़ोस के एक लड़के से प्यार करने लगी थीं. लेकिन वे अपने मातापिता को नहीं बता पाई थीं. मातापिता की इज्जत का खयाल कर के दिल पर पत्थर रख उन के द्वारा तय किए गए उस के पापा से ही शादी कर ली थी.

रंजना की मम्मी सोच रही थीं, ‘काश, मैं इतनी हिम्मत कर पाती. कम से कम अपनी बेटी की तरह वे भी अपनी मां से कह पातीं.’

आज भी वे अपने पहले प्यार को भुला नहीं पाई थीं. मन में कहीं न कहीं इस बात का मलाल जरूर था. क्योंकि उन का प्यार अधूरा रह गया था. वे सोच रही थीं कि अगर वे अपने प्रेमी को पा लेतीं, तो शायद उन की जिंदगी कुछ अलग होती.

आज मम्मी फैसला ले रही थीं, कुछ भी हो जाए, वे अपनी बेटी को उस रास्ते पर नहीं जाने देंगी, जिस रास्ते पर उन्होंने चल कर खुद की जिंदगी बरबाद कर ली थी. शादी तो कर ली थी, पर अपने पति से प्यार नहीं कर पाई थीं. दोनों के बीच काफी  झगड़े होते थे.

मम्मी शादी की चक्की में पिस रही थीं. उन्होंने अपनेआप को खो दिया  था. उन की अपनी पहचान कहीं बिखर गई थी.

आज वे भले ही 3 बच्चों की मां बन चुकी थीं, पर प्यार तो किसी कोने में दुबक गया था. उन की जिंदगी में नीरसता भर गई थी. ऐसे बंधनों से उन्हें कभीकभी ऊब सी होने लगती थी. उन्हें ऐसा महसूस होता था, जैसे वे अनदेखी बेडि़यों में जकड़ ली गई हैं.

बस, सुबह जागो, खाना पकाओ, घर के लोगों को खिलाओ, सब का ध्यान रखो. खुद का ध्यान भाड़ में जाए. पति के लिए व्रत करो, बेटेबेटी के लिए व्रत करो. सब के लिए बलिदान करो, सब के लिए त्याग करो. खुद के लिए कुछ भी नहीं. वही पुराने ढर्रे पर चलते रहो. क्या उन्होंने अपनी जिंदगी के बारे में यही सब सोचा था?

रंजना के पापाजी और मामाजी उस के लिए रिश्ता तय करने गए थे, बल्कि लड़के वालों को कुछ पैसे भी पहुंचाने गए थे. उस के पापाजी 2 दिन बाद

ही लौटेंगे.

पापाजी के जाने के बाद मम्मी अपनी बेटी से खुल कर बातें कर रही थीं. वे राजेश के बारे में पूरी जानकारी ले चुकी थीं. फिर खुद ही राजेश से टैलीफोन से बात भी की थी. सबकुछ जान कर, संतुष्ट होने के बाद ही उसे बुलाया था.

मम्मी हैरान, पर खुश थीं. राजेश समय से हाजिर हो गया था. मम्मी की नजर में राजेश सुंदर और होनहार लड़का था. उन्होंने राजेश से कई तरह के सवालजवाब किए थे.

अगले दिन सुबह के साढ़े 4 बज रहे थे. मम्मी ने  झक झोर कर रंजना को जगाया. उसे आधे घंटे में तैयार होने के लिए बोला. वह सम झ नहीं पाई थी कि उसे कहां जाना है और क्या करना है? वह कई बार उन से पूछ चुकी थी, पर मम्मी कोई जवाब नहीं दे रही थीं.

तभी दरवाजे पर मोटरसाइकिल रुकने की आवाज आई थी. रंजना सोच रही थी कि अभी तो उस के पापाजी के भी आने का समय नहीं है. उसे मालूम था कि उस के पापाजी दूसरे दिन ही आ पाएंगे. उस की मम्मी उस के लिए बैग पैक कर रही थीं. उस के सारे कपड़े, गहने बैग में समेट दिए थे.

रंजना ने जैसे  ही दरवाजा खोला, राजेश अंधेरे में अपनी मोटरसाइकिल के साथ खड़ा था. वह अभी भी नहीं सम झ पा रही थी कि आखिर उस की मम्मी क्या चाहती हैं? उस के छोटे भाईबहन सब सोए हुए थे.

मम्मी जो कुछ भी कर रही थीं, बहुत ही सावधानी से कर रही थी. उन्होंने राजेश को बैग पकड़ा दिया और बोलीं, ‘‘देखो, इस का खयाल रखना. इसे कभी हमारी कमी महसूस नहीं होने देना. मैं ने अपनी बेटी को बड़े नाजों  से पाला है. तुम कुछ दिन के लिए  कहीं दूर चले जाओ, जहां तुम्हें कोई देख न सके.’’

रंजना सारा माजरा सम झ चुकी थी. वह राजेश के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ गई थी. उस की मम्मी डबडबाई आंखों से सिर्फ इतना ही बोल पाई थीं, ‘‘जा बेटी, अपनी जिंदगी जी ले.’’

रंजना भी फफकफफक कर रोने लगी थी. वह मोटरसाइकिल स्टार्ट होने से पहले उतर कर अपनी मम्मी के गले लग गई थी.

रंजना की मम्मी बोलीं, ‘‘बेटी, जल्दी कर…’’ फिर उन्होंने सहारा दे कर मोटरसाइकिल पर बैठने में रंजना की मदद की थी.

राजेश मोटरसाइकिल स्टार्ट कर चल दिया था. मम्मी अंधेरे में हाथ हिलाती रहीं, जब तक कि वे दोनों उन की आंखों से ओझल नहीं हो गए थे. Family Story In Hindi

Best Hindi Kahani: नए चेहरे की तलाश – कंचन चली हीरोइन बनने

Best Hindi Kahani: पूरा हाल ही तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा. प्रैस रिपोर्टरों के कैमरे चमकने लगे. कंचन को ‘नृत्य सुंदरी’ के अवार्ड से नवाजा जा रहा था.

उसी समय भंडारी ने कंचन के पास जा कर बधाई देते हुए कहा, ‘‘मिस कंचन, मैं मुंबई से आया हूं. अगर आप फिल्मों में काम करना चाहें, तो यह रहा मेरा कार्ड. मैं अलंकार होटल में ठहरा हूं.

कंचन के पिता बैंक की नौकरी से रिटायर हो चुके थे. उन के कोई दूसरी औलाद नहीं थी, इसलिए कंचन का लालनपालन बहुत ही लाड़प्यार से हुआ था. पढ़ाईलिखाई में वह होशियार थी. डांस सीखने का भी उसे शौक था. कदकाठी की अच्छी कंचन रूपरंग में भी खूबसूरत थी.

कंचन के मन में फिल्मी हीरोइन बनने के ख्वाब पहले से ही करवट ले रहे थे. उस ने सोचा भी नहीं था कि फिल्मों में जाने का मौका उसे इतनी जल्दी मिल जाएगा. वह रातभर भंडारी का कार्ड ले कर सोई. अगले दिन दोपहर होतेहोते वह अलंकार होटल पहुंच गई.

‘‘क्या लेंगी… ठंडा या गरम?’’ भंडारी ने पूछा.

‘‘ठंडा लूंगी,’’ कंचन ने कहा.

भंडारी ने वेटर को ठंडा लाने का आर्डर दिया. इस बीच उस ने कंचन को कई एंगल से देखा.

भंडारी ने कंचन की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘मिस कंचन, मैं यहां फिल्मों के लिए नए चेहरे की तलाश में आया हूं. मुश्किल यह है कि जहां भी जाता हूं, वहां नए चेहरों की भीड़ लग जाती है.

‘‘मैं हर किसी को तो हीरोइन बना नहीं सकता, जिस में टेलैंट होगा, वही तो फिल्मों में आ सकेगा…’’

‘‘मेरे बारे में आप की क्या राय है?’’ कंचन ने शरमाते हुए भंडारी से पूछा.

भंडारी ने कहा, ‘‘तुम्हारा गोराभूरा भरा हुआ बदन है. फिगर भी अच्छी है. तुम्हारे मुसकराने पर गालों में जो ये गड्ढे बनते हैं, वे भी लाजवाब हैं. डांस में तो तुम होशियार हो ही. रही ऐक्टिंग की बात, तो ऐक्टिंग  टे्रनिंग जौइन करवा दूंगा.’’

भंडारी को लगा कि चिडि़या फंस रही है. उस ने कंचन की ओर देखते हुए फिर कहा, ‘‘मिस कंचन, मुझ पर भरोसा रखो. मैं आज रात को मुंबई जा रहा हूं. 2 दिन बाद मेरे इस पते पर आ जाना. साथ में कोई ज्यादा सामान लाने की जरूरत नहीं है. वहां मैं सारा इंतजाम कर दूंगा. अभी तुम अपने घरपरिवार या फिर यारदोस्त को भी मत बताना.’’

कंचन के ऊपर भंडारी की बातों का जादू की तरह असर हुआ. वह अभी से अपनेआप को फिल्मी हीरोइन समझने लगी थी. उस ने मन ही मन तय किया कि वह मुंबई जरूर जाएगी. रही मांबाप की बात, तो ढेर सारी दौलत आने के बाद सब ठीक हो जाएगा.

आज भंडारी को गए तीसरा दिन था. कंचन ने चुपचाप मुंबई जाने की तैयारी कर ली. स्टेशन पर पहुंचते ही उस ने भंडारी को फोन कर दिया कि वह सुबह की गाड़ी से मुंबई आ रही है. भंडारी ने उसे दादर स्टेशन पर मिलने के लिए कहा.

कंचन पहली बार मुंबई आई थी. दादर स्टेशन पर उतरते ही उसे भंडारी मिल गया. स्टेशन के बाहर निकलते ही भंडारी ने कंचन को कार में बैठाया और कार तेजी से चल दी.

भंडारी कंचन को एक आलीशन बंगले में ले गया. कंचन की आंखें भी उस बंगले को देख कर चौंधिया गईं.

भंडारी ने कहा, ‘‘मिस कंचन, आप थकी हुई हैं. नहाधो कर आराम कीजिए. मैं शाम 7 बजे आऊंगा.’’

शाम को 7 बजे से पहले ही भंडारी आ गया. उस ने कंचन को बड़े ध्यान से देखा और बोला, ‘‘मिस कंचन, वैसे तो सब ठीक है. पर तुम्हें यहां कुछ खास लोगों से मिलना होगा. पहनने को कुछ बढि़या कपड़े भी चाहिए… वैसे, मैं खरीदारी करवा दूंगा.

‘‘आज एक खास आदमी से तुम्हारी मुलाकात करानी है. मिस्टर कापडि़या फिल्म इंडस्ट्री की जानीमानी हस्तियों में से एक हैं. वे दर्जनों फिल्में बना चुके हैं. बहुत ही कामयाब फिल्मकार हैं.’’

भंडारी ने कंचन को गाड़ी में बैठाया और थोड़ी ही देर में वे समुद्र किनारे बने होटल स्टार में जा पहुंचे.

कापडि़या वहां पहले से मौजूद था. भंडारी ने कंचन का परिचय कराया. कापडि़या कंचन को देख कर बहुत खुश हुआ. एक अनछुई कली उसे मिलने वाली थी.

कापडि़या ने भंडारी से कहा, ‘‘क्या लेंगे… ठंडा या गरम?’’

भंडारी ने कहा, ‘‘कल की होने वाली हीरोइन हमारे सामने है. आज तो कुछ यादगार पार्टी हो जाए. आज का मीनू मिस कंचन की पसंद का होगा.’’

कंचन ने केवल ठंडा पीने की हामी भरी.

‘‘ठीक है, आज हम भी मिस कंचन की पसंद का ही ड्रिंक लेंगे.’’

कापडि़या ने वेटर को ठंडा सोफ्ट ड्रिंक लाने का आर्डर दिया. थोड़ी ही देर में वेटर ने टेबल पर ड्रिंक सजा दिया.

भंडारी ने गिलास में ड्रिंक डालते हुए कहा, ‘‘मिस कंचन, यह फिल्मी दुनिया है. यहां कुछ ज्यादा ही दिखावा करना पड़ता है. सामने देखो, फिल्मी हस्तियां बैठी हुई हैं. अपना मनोरंजन तो कर रही हैं, साथ ही अपने हावभाव से दूसरों को भी लुभा रही हैं.’’

कंचन ने एक बार फिर होटल में उफनते हुए मादक माहौल को देखा. वहां की बातचीत और हवा में अजीब सी गंध  तैर रही थी. तीनों लोग ठंडा पीने लगे. इसी बीच भंडारी ने कंचन के गिलास में एक पुडि़या घोल दी, जिसे कंचन नहीं देख सकी.

कापडि़या ने कंचन को तिरछी नजरों से देखा और कहा, ‘‘मिस कंचन, हम लोग फिल्मों में करोड़ों रुपए लगाते हैं. किसी नए कलाकार के लेने में रिस्क होता है. बैडरूम सीन भी लेने पड़ते हैं.

‘‘अगर नया हीरो उस सीन को करने में शरमा गया, तो अपना बेड़ा गर्क समझो, इसलिए हम बहुत सोचसमझ कर किसी नए हीरो को लेते हैं.’’

कंचन ने सोचा, ‘मुश्किल से मुझे यह मौका मिला है. अगर अपने भरोसे से इन्हें नहीं जीता, तो काम नहीं बनेगा…’

अचानक कंचन को अपना सिर भारी सा लगा. जगमगाती रोशनी नाचती सी दिखी. उस ने भंडारी से कहा, ‘‘मेरा सिर चकरा रहा है. मुझे नींद सी आ रही है. मैं अब बैठी नहीं रह सकूंगी.’’

भंडारी ने कापडि़या की ओर देखा और कहा, ‘‘चलो, हम लोग चलते हैं. कल स्क्रिप्ट पर चर्चा करेंगे.’’

भंडारी ने कंचन को सहारा दिया और होटल के बाहर खड़ी कार तक लाया. कंचन पर पुडि़या का पूरा असर हो गया था.

कंचन को साथ ले कर भंडारी कापडि़या के साथ बैठ गया. वे गाड़ी को सीधे एक कोठी पर ले गए. कंचन पूरी तरह बेसुध थी.

सुबह जब कंचन की नींद खुली, तो उस का बदन दर्द के मारे फटा जा रहा था. वह समझ गई कि उस के साथ धोखा हुआ है. अब पछतावे के सिवा वह कर भी क्या सकती थी… घर तो वापस जाने से रही. वह तकिए में मुंह छिपा कर सिसकती रही.

शाम होते ही मिस्टर कापडि़या दोबारा कमरे में आया.

‘‘हैलो मिस कंचन, कैसी हो? तुम्हारे लिए जल्द ही एक फिल्म शुरू कर रहा हूं. फिल्म के फाइनैंसर जयंत भाई आए थे. सभी बातें तय हो गई हैं. चलो, तुम्हें कुछ खरीदारी करवा दूं. हमारी नई हीरोइन जल्द ही बुलंदियों को छूने वाली है.’’

कंचन बेमन से उठी. उसे फिल्म में हीरोइन बनने का सपना बारबार खींच रहा था. कंचन ने भंडारी के बारे में पूछा, तो कापडि़या ने कहा कि वह फिल्म की लोकेशन देखने बाहर गया है. इस फिल्म की शूटिंग विदेशों में भी होगी.

कंचन जब रात को लौटी, तो उस के पास नए फैशन के कपड़े थे. वह अपनेआप को फिल्मी हीरोइन समझने लगी थी. इसी तरह कापडि़या के साथ पूरा महीना निकल गया. वह रोज रात को मिस्टर कापडि़या के साथ सोती.

एक दिन कापडि़या ने कंचन से कहा, ‘‘मिस कंचन, मैं फिल्म के सिलसिले में बाहर जा रहा हूं. इस बीच जयंत भाई आएंगे. वही फिल्मी टे्रनिंग भी दिलवाएंगे. मेरे लौटने पर फिल्म का भव्य मुहूर्त होगा.’’

जयंत भाई भी कंचन को फिल्मी ख्वाब दिखाते रहे. इस बीच न तो भंडारी लोकेशन देख कर लौटा और न ही कापडि़या अमेरिका से. जो खेल कापडि़या उस के साथ खेलता रहा था, वही खेल जयंत भाई ने भी खेला.

मुंबई आने पर कंचन पहली बार 3 दिन तक अकेली रही. दोपहर का समय था. वह चिंता में डूबी एक मैगजीन पलट रही थी कि बाहर की घंटी बजी.

कंचन ने दरवाजा खोला, तो दरवाजे पर कुछ दादाटाइप लोग खड़े थे. उन्होंने कंचन से कहा, ‘‘मैडम, यह कोठी खाली कीजिए. इस का एग्रीमैंट खत्म हो गया है… किराए पर थी.’’

‘‘मैं कहां जाऊं…? यहां तो मेरा कोई भी नहीं है. मिस्टर कापडि़या और जयंत भाई को आ जाने दीजिए.’’

‘‘कापडि़या और जयंत भाई अब कभी नहीं आएंगे.’’

‘‘और भंडारी…?’’

‘‘देखिए मैडम, भंडारी आप को कहां मिलेगा… वह तो नए चेहरे की तलाश में पूरा हिंदुस्तान घूम रहा होगा.’’

‘‘देखिए, मुझे कुछ तो समय दीजिए. यहां मेरा कोई नहीं है. अपना कुछ इंतजाम करती हूं. आप की बड़ी मेहरबानी होगी.’’

‘‘ठीक है, हम 24 घंटे का समय देते हैं. कल इसी समय आएंगे. अगर यहां से नहीं जाओगी, तो धक्के मार कर तुम्हें बाहर निकाल देंगे. यह मुंबई है मुंबई. ध्यान रखना मैडम.’’

कंचन के पैरों से जमीन खिसक गई. उसे ध्यान आया कि इस बीच मिस रीटा से उस की मुलाकात हुई थी. उस ने कहा था कि जब जरूरत हो, मुझे याद करना. रीटा का कार्ड उस के पर्स में था. उस ने फोन किया, ‘‘मैं कंचन बोल रही हूं.’’

‘ओह, कंचन, कैसी हो? बोलो, क्या बात है?’

कंचन ने रोतेरोते फोन पर सारी बात बता दी.

रीटा ने कहा, ‘मैं जानती थी कि एक दिन तुम्हारे साथ भी वही होगा, जो मेरे साथ हुआ था. ये अच्छेभले घर की लड़कियों को फिल्मी दुनिया के ख्वाब दिखाते हैं. तुम्हारी तरह मैं भी इन के चंगुल में फंस गई थी. हीरोइन तो नहीं बन सकी, लेकिन कालगर्ल जरूर बन गई.

‘मैं ने भंडारी के साथ तुम्हें पहले दिन ही देखा था. मुझे भी यही भंडारी का बच्चा हीरोइन बनाने के लिए लाया था. अब मैं घर की रही न घाट की.

‘तू ऐसा कर, मेरे पास आजा और मेरी रूम पार्टनर बन जा. शाम 7 बजे मुझे कहीं निकलना है. फोन पर फोन आते हैं. …समझ गई न, फिल्मी सिटिंग पर चलना है.

‘मेरी और तुम्हारी जैसी न जाने कितनी ही लड़कियां इस मायानगरी में आ गईं और कितनी ही आने वाली हैं. यह सिलसिला कब रुकेगा, कहा नहीं जा सकता.

‘आज भी मिस्टर भंडारी जैसे कई दलाल फिल्मी हीरोइन बनाने के लिए नए चेहरों की तलाश में हैं. मिस्टर कापडि़या और जयंत भाई भी नए चेहरों को ले कर फिल्म बना रहे हैं, लेकिन इन की फिल्म आज तक नहीं बनी.’ Best Hindi Kahani

Hindi Short Story: प्रेम गली अति संकरी

Hindi Short Story: कबीर कहते हैं, ‘कबीरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं, सीस उतारे हाथि धरे, सो पैसे घर माहिं.’ उन सस्ते दिनों में भी आशिक और महबूबा के लिए प्रेम करना खांडे की धार पर चलने के समान था. आम लोग बेशक आशिकों को बेकार आदमी समझते होंगे, जो रातदिन महबूबा की याद में टाइम खोटा करते हैं. आशिकों को मालूम नहीं कि प्रेम करते ही सारा जमाना उन के खिलाफ हो जाता है.

गालिब कहते हैं, ‘इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के.’ जिगर मुरादाबादी ने कहा है, ‘इश्क जब तक न कर चुके रुसवा, आदमी काम का नहीं होता.’ अब कौन सही है और कौन गलत, जवानी की दहलीज पर पांव रखने वाले नवयुवक क्या समझें? ये सब उन पुराने जमाने के शायरों की मिलीजुली साजिश का नतीजा था कि लोग प्रेम से दूर भागने लगे थे. मीरा बोली, ‘जो मैं जानती प्रीत करे दुख होय, नगर ढिंढोरा पीटती प्रीत न करियो कोई.’ फिर वही जमाना पलट आया है, जब बच्चों को इस नामुराद इश्क के कीड़े से दूर रहने की सलाह दी जाती है. तभी तो आज फिल्मों में गाने भी इस तरह के आ रहे हैं जैसे, ‘प्यार तू ने क्या किया’, ‘इस दिल ने किया है निकम्मा’, ‘कमबख्त इश्क है जो’.

एक कवि कहता है, ‘प्रेम गली अति संकरी, इस में दो न समाए.’ दो का अर्थ है 2 रकीब, जो एक ही महबूबा को एक ही समय में एकसाथ लाइन मारते हैं. कवि कहता है कि प्रेम नगर की गली बहुत तंग है. इसे एक समय में एक ही व्यक्ति पार कर सकता है. आशिक और महबूबा का गली में साथसाथ खड़े होना संभव नहीं बल्कि खतरे से खाली नहीं है, वर्जित भी है क्योंकि पड़ोसियों की सोच बहुत तंग है. लड़की के भाई जोरावर हैं और बाप पहलवान है.

इतनी सारी पाबंदियों के चलते दैहिक स्तर पर प्रेम का प्रदर्शन सूनी छत पर तो हो सकता है, गली में नहीं. तभी कवि जोर देता है कि प्रेम गली अति संकरी, इस में दो न समाए. लोगों का मानना है कि गलियां तो आनेजाने के लिए होती हैं. सभी लोग गलियों में ही प्रेम का इजहार करने लग जाएंगे तो आवकजावक यानी यातायात संबंधी बाधाएं उत्पन्न हो जाएंगी.

प्यार पाना या गवांना इतना उल्लासपूर्ण या त्रासद नहीं जितना प्रेम की राह में किसी अन्य का आ जाना, किसी का आना मजा किरकिरा तो करता ही है, उस के साथ प्यार किसी प्रतियोगिता से कम नहीं रह जाता और इस प्रतियोगिता में सारी बाजी पलटती हुई नजर आती है. सारी उर्दू शायरी रकीब के आसपास घूमती है. नायिका को हर समय यही डर सताता रहता है कि उस ने जो प्रेम का मायाजाल रचा है उस में कोई तीसरा आ कर टांग न अड़ाए.

असली जिंदगी में भी एक म्यान में दो तलवारें नहीं समा सकतीं. प्रेम में त्रिकोण का साहित्यिक व फिल्मी महत्त्व भी है. होता यों है कि नायकनायिका प्रेम की पींगे भर रहे होते हैं तभी जानेअनजाने कोई तीसरा आदमी कबाब में हड्डी की तरह पता नहीं कैसे और कहां से टपक पड़ता है. वैसे तो उस के होने से ही कथा में तनाव गहराता है मगर उस का होना जनता को गवारा नहीं लगता. प्रेमी को प्रेमिका से सहज भाव से प्रेम हो जाए, शादी हो जाए और फिर बच्चे हो जाएं तो सारा किस्सा ही अनरोमांटिक हो जाता है. कथा को आगे बढ़ाने के लिए कोई न कोई अवरोधक तो चाहिए ही न. बहुत कम कहानियां ऐसी होती हैं जिन में नायक व नायिका खुद एक दूसरे से उलझ जाते हैं. बात उन के अलगाव पर जा कर खत्म होती है मगर 90 फीसदी कहानियों में बाहरी दखल जरूरी है. इसी हस्तक्षेप के कारण कथा को गति मिलती है व कुछ रोचकता पैदा होती है.

प्रेम में रुकावट के लिए या तो किसी दूसरे आदमी या विलेन या क्रूर समाज की मौजूदगी होनी बहुत जरूरी है. प्रेम में जितनी बाधाएं होंगी, तड़प उतनी ही गहरी होगी और प्रेम की अनुभूति उतनी ही तीव्र होगी.

प्रेम कथा का प्लाट गहराएगा. लैलामजनूं, हीररांझा, शीरीफरहाद या रोमियोजूलियट जैसी विश्व की महान कथाओं में समाज पूरी शिद्दत के साथ प्रेमियों की राह में दीवार बन कर खड़ा हो गया था. कहीं पारिवारिक रंजिश के चलते तो कहीं विलेन की चालों के कारण 2 लोग आपस में नहीं मिल पाए तो एक बड़ी प्रेम कहानी ने जन्म लिया, जो सदियों तक लोगों को रुलाती रहती है.

कुछ कहानियों में किसी तीसरे की मौजूदगी इस कदर अनिवार्य व स्वीकार्य होती है कि प्रेमी या प्रेमिका उस की खातिर खुद को मिटाने का फैसला कर बैठता है. प्यार में यह अनचाही व बेमतलब की कुरबानी हमारी फिल्मों में सफलतापूर्वक फिट होती है मगर असल जिंदगी में ऐसे त्यागी लोग ढूंढ़े नहीं मिलेंगे.

आदमी की प्रकृति है जलन करना. इस जलन से मुक्ति पाने की कोशिश वैसे ही है जैसे अपनी परछाईं से मुक्त होना. इस जलन का एक दूसरा रूप है जब हम रिश्तों के क्षेत्र में संयुक्त स्वामित्व चाहते हैं यानी जिस से हम प्यार करते हैं उसे कोई दूसरा चाहने लगे तो हमारी ईर्ष्या चरम पर होती है. साहिर लुधियानवी ने इस जलन को क्या खूब बयान किया है, ‘तुम अगर मुझ को न चाहो, तो कोई बात नहीं, तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी…’ इस मुश्किल को आसान बनाने के लिए हमारे फिल्मी निर्देशकों ने कहानी में एक नए तरह के मोड़ को लाने की कोशिश की. नायक या नायिका को किसी दूसरे आदमी के प्रेम की छाया से मुक्त करने के लिए सहानुभूति के कारक की मदद ली गई. नया या पुराना आशिक किसी हालत का शिकार दिखाया जाने लगा. कैंसर या लापता होना या उस की अचानक मौत दिखा कर नायिका के मन में चल रहे द्वंद्व का हल निकाला गया. Hindi Short Story

Family Story In Hindi: बदलाव की आंधी – गंगाप्रसाद के घर आया कैसा तूफान

Family Story In Hindi: ‘‘मुन्ना के पापा सुनो तो, आज मुन्ना नया घर तलाशने की बात कर रहा था. काफी परेशान लग रहा था. मुझ से बोला कि मैं आप से बात कर लूं.’’

‘‘मगर, मुझ से तो कुछ नहीं बोला. बात क्या है मुन्ना की अम्मां. खुल कर बोलो. कई सालों से बिल्डिंग को ले कर समिति, किराएदार, मालिक और हाउसिंग बोर्ड के बीच लगातार मीटिंग चल रही है, यह तो मैं जानता हूं, पर आखिर में फैसला क्या हुआ?’’

‘‘वह कह रहा था कि हमारी बिल्डिंग अब बहुत पुरानी और जर्जर हो चुकी है, इसलिए बरसात के पहले सभी किराएदारों को घर खाली करने होंगे. सरकार की नई योजना के मुताबिक इसे फिर से बनाया जाएगा, पर तब तक सब को अपनीअपनी छत का इंतजाम खुद करना होगा. वह कुछ रुपयों की बात कर रहा था. जल्दी में था, इसलिए आप से मिले बिना ही चला गया.’’

गंगाप्रसाद तिवारी अब गहरी सोच में डूब गए. इतने बड़े शहर में बड़ी मुश्किल से घरपरिवार का किसी तरह से गुजारा हो रहा था. बुढ़ापे के चलते उन की अपनी नौकरी भी अब नहीं रही. ऐसे में नए सिरे से नया मकान ढूंढ़ना, उस का किराया देना नाकों चने चबाने जैसा है. गैलरी में कुरसी पर बैठेबैठे तिवारीजी यादों में खो गए थे.

उन की आंखों के सामने 30 साल पहले का मंजर किसी चलचित्र की तरह चलने लगा.

2 छोटेछोटे बच्चे और मुन्ने की मां को ले कर जब वे पहली बार इस शहर में आए थे, तब यह शहर अजनबी सा लग रहा था. पर समय के साथ वे यहीं के हो कर रह गए.

सेठ किलाचंदजी ऐंड कंपनी में मुनीम की नौकरी, छोटा सा औफिस, एक टेबल और कुरसी. मगर कारोबार करोड़ों का था, जिस के वे एकछत्र सेनापति थे.

सेठजी की ही मेहरबानी थी कि उस मुश्किल दौर में बड़ी मुश्किल से लाखों की पगड़ी का जुगाड़ कर पाए और अपने परिवार के लिए एक छोटा सा आशियाना बना पाए. दिनभर की थकान मिटाने के लिए अपने हक की छोटी सी जमीन, जहां सुकून से रात गुजर जाती थी और सुबह होते ही फिर वही रोज की आपाधापी भरी तेज रफ्तार वाली शहर की जिंदगी.

पहली बार मुन्ने की मां जब गांव से निकल कर ट्रेन में बैठी, तो उसे सबकुछ सपना सा लग रहा था. 2 रात का सफर करते हुए उसे लगा, जैसे वह विदेश जा रही हो. धीरे से वह कान में फुसफुसाई, ‘‘अजी, इस से तो अच्छा अपना गांव था. सभी अपने थे वहां. यहां तो ऐसा लगता है, जैसे हम किसी पराए देश में आ गए हों? कैसे गुजारा होगा यहां?’’

‘‘चिंता मत करो मुन्ने की अम्मां, सब ठीक हो जाएगा. जब तक मन करेगा, यहां रहेंगे, और जब घुटन होने लगेगी तो अपने गांव लौट जाएंगे. गांव का घर, खेत, खलिहान सब है. अपने बड़े भाई के जिम्मे सौंप कर आया हूं. बड़ा भाई पिता समान होता है.’’

इन 30 सालों में इस अजनबी शहर में हम ऐसे रचबस गए, मानो यही अपनी कर्मभूमि है. आज मुन्ने की मां भी गांव में जा कर बसने का नाम नहीं लेती. उसे इस शहर से प्यार हो गया है. उसे ही क्यों? खुद मेरे और दोनों बच्चों के रोमरोम में यह शहर बस गया है. माना कि अब वे थक चुके हैं, मगर अब बच्चों की पढ़ाई पूरी हो गई है. उन्हें ढंग की नौकरी मिल जाएगी तो उन के ब्याह कर देंगे और जिंदगी की गाड़ी फिर से पटरी पर अपनी रफ्तार से दौड़ने लगेगी. अचानक किसी की आवाज ने तिवारीजी की सोच भंग की. देखा तो सामने मुन्ने की मां थी.

‘‘अजी, आप किस सोच में डूबे हो? सुबह से दोपहर हो गई. चलो, अब भोजन कर लो. मुन्ना भी आ गया है. उस से पूरी बात कर लो और सब लोग मिल कर सोचो कि आगे क्या करना है? आखिर कोई हल तो निकालना ही पड़ेगा.’’

भोजन के समय तिवारीजी का पूरा परिवार एकसाथ बैठ कर सोचविचार करने लगा.

मुन्ना ने बताया, ‘‘पापा, हमारी बिल्डिंग का हाउसिंग बोर्ड द्वारा रीडवलपमैंट किया जा रहा है. सबकुछ अब फाइनल हो गया है. एग्रीमैंट के मुताबिक हमें मालिकाना अधिकार का 250 स्क्वायर फुट का फ्लैट मुफ्त में मिलेगा. मगर वह काफी छोटा पड़ेगा, इसलिए अगर कोई अलग से या मौजूदा कमरे में जोड़ कर एक और कमरा लेना चाहता हो, तो उसे ऐक्स्ट्रा कमरा मिलेगा, पर उस के लिए बाजार भाव से दाम देना होगा.’’

‘‘ठीक कहते हो मुन्ना, मुझे तो लगता है कि यदि हम गांव की कुछ जमीन बेच दें, तो हमारा मसला हल हो जाएगा और एक कमरा अलग से मिल जाएगा. ज्यादा रुपयों का इंतजाम हो जाए, तो यह बिलकुल मुमकिन है कि हम अपना एक और फ्लैट खरीद लेंगे,’’ तिवारीजी बोले.

बरसात से पहले तिवारीजी ने डवलपमैंट बोर्ड को अपना रूम सौंप दिया और पूरे परिवार के साथ अपने गांव आ गए. गांव में शुरू के दिनों में बड़े भाई और भाभी ने उन की काफी खातिरदारी की, पर जब उन्हें पूरी योजना के बारे में पता चला तो वे लोग पल्ला झाड़ने लगे.

यह बात गंगाप्रसाद तिवारी की समझ में नहीं आ रही थी. उन्हें कुछ शक हुआ. धीरेधीरे उन्होंने अपनी जगह की खोजबीन शुरू की. हकीकत का पता चलते ही उन के पैरों तले की जमीन ही सरक गई.

‘‘अजी क्या बात हैं? खुल कर बताते क्यों नहीं? दिनभर घुटते रहते हो? अगर जेठजी को हमारा यहां रहना भारी लग रहा है, तो वे हमारे हिस्से का घर, खेत और खलिहान हमें सौंप दें, हम खुद अपना बनाखा लेंगे.’’

‘‘धीरे बोलो भाग्यवान, अब यहां हमारा गुजारा नहीं हो पाएगा. हमारे साथ धोखा हुआ है. हमारे हिस्से की सारी जमीनजायदाद उस कमीने भाई ने जालसाजी से अपने नाम कर ली है.  झूठे कागजात बना कर उस ने दिखाया है कि मैं ने अपने हिस्से की सारी जमीनजायदाद उसे बेच दी है.

‘‘हम बरबाद हो गए मुन्ना की अम्मां. अब तो एक पल के लिए भी यहां कोई ठौरठिकाना नहीं है. हम से भूल यह हुई कि साल 2 साल में एकाध बार यहां आ कर अपनी जमीनजायदाद की कोई खोजखबर नहीं ली.’’

‘‘अरे, यह तो घात हो गया. अब हम कहां रहेंगे? कौन देगा हमें सहारा? कहां जाएंगे हम अपने इन दोनों बच्चों को ले कर? बच्चों को इस बात की भनक लग जाएगी, तो बड़ा अनर्थ हो जाएगा,’’ विलाप कर के मुन्ना की मां रोने लगी.

पूरा परिवार शोक में डूब गया. नहीं चाहते हुए भी तिवारीजी के मन में घुमड़ती पीड़ा की गठरी आखिर खुल ही गई थी.

इस के बाद तिवारी परिवार में कई दिनों तक वादविवाद, सोचविचार होता रहा. सुकून की रोटी जैसे उन के सब्र का इम्तिहान ले रही थी. अपने ही गांवघर में अब गंगाप्रसाद का परिवार बेगाना हो चुका था. उन्हें कोई सहारा नहीं दे रहा था. वे लोग जान चुके थे कि उन्हें लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी होगी. पर इस समय गुजरबसर के लिए छोटी सी झुग्गी भी उन के पास नहीं थी. उसी के चलते आज वे दरदर की ठोकरें खाने को मजबूर थे.

उसी गांव में निचली जाति के मधुकर नामक आदमी का अमीर दलित परिवार था. गांव में उन की अपनी बड़ी सी किराने की दुकान थी. बड़ा बेटा रामकुमार पढ़ालिखा और आधुनिक खयालात का नौजवान था. जब उसे छोटे तिवारीजी के परिवार पर हो रहे नाइंसाफी के बारे में पता चला, तो उस का खून खौल उठा, पर वह मजबूर था. गांव में जातिपाति की राजनीति से वह पूरी तरह परिचित था. एक ब्राह्मण परिवार को मदद करने का मतलब अपनी बिरादरी से पंगा लेना था. पर दूसरी तरफ उसे शहर से आए उस परिवार के प्रति लगाव भी था. उस दिन घर में उस के पिताजी ने तिवारीजी को ले कर बात छेड़ी.

‘‘जानते हो तुम लोग, हमारा वही परिवार है, जिस के पुरखे किसी जमाने में उसी तिवारीजी के यहां पुश्तों से चाकरी किया करते थे. तिवारीजी के दादाजी बड़े भले इनसान थे. जब हमारा परिवार रोटी के लिए मुहताज था, तब इस तिवारीजी के दादाजी ने आगे बढ़ कर हमें गुलामी की दास्तां से छुटकारा दे कर अपने पैरों पर खड़े होने का हौसला दिया था. उस अन्नदाता परिवार के एक सदस्य पर आज विपदा की घड़ी आई है. ऐसे में मुझे लगता है कि हमें उन के लिए कुछ करना चाहिए. आज उसी परिवार की बदौलत गांव में हमारी दुकान है और हम सुखी हैं.’’

‘‘हां बाबूजी, हमें सच का साथ देना चाहिए. मैं ने सुना है कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद जब बैंक के दरवाजे सामान्य लोगों के लिए खुले, तब बड़े तिवारीजी ने हमें राह दिखाई थी. यह उसी बदलाव के दौर का नतीजा है कि कभी दूसरों के टुकड़ों पर पलने वाला गांव का यह परिवार आज अमीर परिवारों में गिना जाता है और शान से रहता है,’’ रामकुमार ने अपनी जोरदार हुंकार भरी.

रामकुमार ताल ठोंक कर अब छोटे तिवारीजी के साथ खड़ा हो गया था. काफी सोचसमझ कर इस परिवार ने छोटे तिवारीजी से बातचीत की.

‘‘हम आप को दुकान खुलवाने और सिर पर छत के लिए जगह, जमीन, पैसाकौड़ी की हर मुमकिन मदद करने के लिए तैयार हैं. आप अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे, तो यह लड़ाई और आसान  हो जाएगी. एक दिन आप का हक  जरूर मिलेगा.’’

उस परिवार का भरोसा और साथ मिल जाने से तिवारी परिवार का हौसला बढ़ गया था. रामकुमार के सहारे अंकिता अपनी दुकानदारी को बखूबी संभालने लगी थी. इस से घर में पैसे आने लगे थे. धीरेधीरे उन के पंखों में बल आने लगा और वे अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं.

तिवारीजी की दुकानदारी का भार उन की बिटिया अंकिता के जिम्मे था, क्योंकि तिवारीजी और उन का बड़ा बेटा मुन्ना अकसर कोर्टकचहरी और शहर के फ्लैट के काम में बिजी रहते थे.

इस घटना से गांव के ब्राह्मण घरों में  जातपांत की राजनीति जन्म लेने लगी. कुंठित निचली बिरादरी के लोग भी रामकुमार और अंकिता को ले कर साजिश रचने लगे. चारों ओर तरहतरह की अफवाहें रंग  लेने लगीं, पर बापबेटे ने पूरे गांव को खरीखोटी सुनाते हुए अपने हक की लड़ाई जारी रखी. इस काम में रामकुमार तन, मन और धन से उन के साथ था. उस ने जिले के नामचीन वकील से तिवारीजी की मुलाकात कराई और उस की सलाह पर ही पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई.

छोटीमोटी इस उड़ान को भरतेभरते अंकिता और रामकुमार कब एकदूसरे को दिल दे बैठे, इस का उन्हें पता  ही नहीं चला. इस बात की भनक पूरे गांव को लग जाती है. लोग इस बेमेल प्यार को जातपांत का रंग दे कर  तिवारी और चौहान परिवार को  बदनाम करने की कोशिश करते हैं. इस काम में अंकिता के ताऊजी सब से आगे थे.

गंगाप्रसादजी के परिवार को जब  इस बात की जानकारी होती?है, तो वे राजीखुशी इस रिश्ते को स्वीकार कर लेते हैं. इतने सालों तक बड़े शहर में रहते  हुए उन की सोच भी बड़ी हो चुकी होती है. जातपांत के बजाए सम्मान, इज्जत और इनसानियत को वे तवज्जुह देना जानते थे.

जमाने के बदलते दस्तूर के साथ बदलाव की आंधी अब अपना रंग जमा चुकी थी. अंकिता ने अपना फैसला सुनाया, ‘‘बाबूजी, मैं रामकुमार से प्यार करती हूं और हम शादी के बंधन में बंध कर अपनी नई राह बनाना चाहते हैं.’’

‘‘बेटी, हम तुम्हारे फैसले का स्वागत करते हैं. हमें तुम पर पूरा भूरोसा है. अपना भलाबुरा तुम अच्छी तरह से जानती हो. इन के परिवार के हम पर बड़े उपकार हैं.’’

आखिर में दोनों परिवारों ने आपसी रजामंदी से उसी गांव में विरोधियों की छाती पर मूंग दलते हुए अंकिता और रामकुमार की शादी बड़े धूमधाम से करा दी.

एक दिन वह भी आया, जब गंगाप्रसादजी अपनी जमीनजायदाद की लड़ाई जीत गए. जालसाजी के केस में उन के बड़े भाई को जेल की हवा खाने की नौबत भी आ गई थी. Family Story In Hindi

Hindi Family Story: महक वापस लौटी – दोस्त ने की दोस्त की मदद

Hindi Family Story: सुमि को रोज 1-2 किलोमीटर पैदल चलना बेहद पसंद था. वह आज भी बस न ले कर दफ्तर के बाद अपने ही अंदाज में मजेमजे से चहलकदमी करते हुए, तो कभी जरा सा तेज चलती हुई दफ्तर से लौट रही थी कि सामने से मनोज को देख कर एकदम चौंक पड़ी.

सुमि सकपका कर पूछना चाहती थी, ‘अरे, तुम यहां इस कसबे में कब वापस आए?’

पर यह सब सुमि के मन में ही कहीं  रह गया. उस से पहले मनोज ने जोश में आ कर उस का हाथ पकड़ा और फिर तुरंत खुद ही छोड़ भी दिया.

मनोज की छुअन पा कर सुमि के बदन में जैसे कोई जादू सा छा गया हो. सुमि को लगा कि उस के दिल में जरा सी झनझनाहट हुई है, कोई गुदगुदी मची है.

ऐसा लगा जैसे सुमि बिना कुछ  बोले ही मनोज से कह उठी, ‘और मनु, कैसे हो? बोलो मनु, कितने सालों के बाद मिले हो…’

मनोज भी जैसे सुमि के मन की बात को साफसाफ पढ़ रहा था. वह आंखों से बोला था, ‘हां सुमि, मेरी जान. बस अब  जहां था, जैसा था, वहां से लौट आया, अब तुम्हारे पास ही रहूंगा.’

अब सुमि भी मन ही मन मंदमंद मुसकराने लगी. दिल ने दिल से हालचाल पूछ लिए थे. आज तो यह गुफ्तगू भी बस कमाल की हो रही थी.

पर एक सच और भी था कि मनोज को देखने की खुशी सुमि के अंगअंग में छलक रही थी. उस के गाल तक लाल हो गए थे.

मनोज में कोई कमाल का आकर्षण था. उस के पास जो भी होता उस के चुंबकीय असर में मंत्रमुग्ध हो जाता था.

सुमि को मनोज की यह आदत कालेज के जमाने से पता थी. हर कोई उस का दीवाना हुआ करता था. वह कुछ भी कहां भूली थी.

अब सुमि भी मनोज के साथ कदम से कदम मिला कर चलने लगी. दोनों चुपचाप चल रहे थे.

बस सौ कदम चले होंगे कि एक ढाबे जैसी जगह पर मनोज रुका, तो सुमि भी ठहर गई. दोनों बैंच पर आराम से बैठ गए और मनोज ने ‘2 कौफी लाना’ ऐसा  कह कर सुमि से बातचीत शुरू कर दी.

‘‘सुमि, अब मैं तुम से अलग नहीं रहना चाहता. तुम तो जानती ही हो, मेरे बौस की बरखा बेटी कैसे मुझे फंसा कर ले गई थी. मैं गरीब था और उस के जाल में ऐसा फंसा कि अब 3 साल बाद यह मान लो कि वह जाल काट कर आ गया हूं.’

यह सुन कर तो सुमि मन ही मन हंस पड़ी थी कि मनोज और किसी जाल में फंसने वाला. वह उस की नसनस से वाकिफ थी.

इसी मनोज ने कैसे अपने एक अजीज दोस्त को उस की झगड़ालू पत्नी से छुटकारा दिलाया था, वह पूरी दास्तान जानती थी. तब कितना प्रपंच किया था इस भोले से मनोज ने.

दोस्त की पत्नी बरखा बहुत खूबसूरत थी. उसे अपने मायके की दौलत और पिता के रुतबे पर ऐश करना पसंद था. वह हर समय पति को मायके के ठाठबाट और महान पिता की बातें बढ़ाचढ़ा कर सुनाया करती थी.

मनोज का दोस्त 5 साल तक यह सहन करता रहा था, पर बरखा के इस जहर से उस के कान पक गए थे. फिर एक दिन उस ने रोरो कर मनोज को आपबीती सुनाई कि वह अपने ही घर में हर रोज ताने सुनता है. बरखा को बातबात पर पिता का ओहदा, उन की दौलत, उन के कारनामों में ही सारा बह्मांड नजर आता है.

तब मनोज ने उस को एक तरकीब बताई थी और कहा था, ‘यार, तू इस जिंदगी को ऐश कर के जीना सीख. पत्नी अगर रोज तुझे रोने पर मजबूर कर रही है, तो यह ले मेरा आइडिया…’

फिर मनोज के दोस्त ने वही किया. बरखा को मनोज के बताए हुए एक शिक्षा संस्थान में नौकरी करने का सुझाव दिया और पत्नी को उकसाया कि वह अपनी कमाई उड़ा कर जी सकती है. उस को यह प्रस्ताव भी दिया कि वह घर पर नौकर रख ले और बस आराम करे.

दोस्त की मनमौजी पत्नी बरखा यही चाहती थी. वह मगन हो कर घर की चारदीवारी से बाहर क्या निकली कि उस मस्ती में डूब ही गई.

वह दुष्ट अपने पति को ताने देना ही भूल गई. अब मनोज की साजिश एक महीने में ही काम कर गई. उस संस्थान का डायरैक्टर एक नंबर का चालू था. बरखा जैसी को उस ने आसानी से फुसला लिया. बस 4 महीने लगे और  मनोज की करामात काम कर गई.

दोस्त ने अपनी पत्नी को उस के बौस के साथ पकड़ लिया और उस के पिता को वीडियो बना कर भेज दिया.

कहां तो दोस्त को पत्नी से 3 साल अपने अमीर पिता के किस्सों के ताने सुनने पड़े और कहां अब वह बदनामी नहीं करने के नाम पर उन से लाखों रुपए महीना ले रहा था.

ऐसा था यह धमाली मनोज. सुमि मन ही मन यह अतीत याद कर के अपने होंठ काटने लगी. उस समय वह मनोज के साथ ही नौकरी कर रही थी. हर घटना उस को पता थी.

ऐसा महातिकड़मी मनोज किसी की चतुराई का शिकार बनेगा, सुमि मान नहीं पा रही थी.

मगर मनोज कहता रहा, ‘‘सुमि, पता है मुंबई मे ऐश की जिंदगी के नाम पर बौस ने नई कंपनी में मुझे रखा जरूर, मगर वे बापबेटी तो मुझे नौकर समझने लगे.’’

सुमि ने तो खुद ही उस बौस की  यहां कसबे की नौकरी को तिलांजलि दे दी थी. वह यों भी कुछ सुनना नहीं चाहती थी, मगर मजबूर हो कर सुनती रही. मनोज बोलता रहा, ‘‘सुमि, जानती हो मुझ से शादी तो कर ली, पद भी दिया, मगर मेरा हाथ हमेशा खाली ही रहता था. पर्स बेचारा शरमाता रहता था. खाना पकाने, बरतन मांजने वाले नौकरों के पास भी मुझ से ज्यादा रुपया होता था.

‘‘मुझे न तो कोई हक मिला, न कोई इज्जत. मेरे नाम पर करोड़ों रुपया जमा कर दिया, एक कंपनी खोल दी, पर मैं ठनठन गोपाल.

‘‘फिर तो एक दिन इन की दुश्मन कंपनी को इन के राज बता कर एक करोड़ रुपया इनाम में लिया और यहां आ गया.’’

‘‘पर, वे तुम को खोज ही लेंगे,’’ सुमि ने चिंता जाहिर की.

यह सुन कर मनोज हंसने लगा, ‘‘सुमि, दोनों बापबेटी लंदन भाग गए हैं. उन का धंधा खत्म हो गया है. अरबों रुपए का कर्ज है उन पर. अब तो वे मुझ को नहीं पुलिस उन को खोज रही है. शायद तुम ने अखबार नहीं पढ़ा.’’

मनोज ने ऐसा कहा, तो सुमि हक्कीबक्की रह गई. उस के बाद तो मनोज ने उस को उन बापबेटी के जोरजुल्म की ऐसीऐसी कहानियां सुनाईं कि सुमि को मनोज पर दया आ गई.

घर लौटने के बाद सुमि को उस रात नींद ही नहीं आई. बारबार मनोज ही खयालों में आ जाता. वह बेचैन हो जाती.

आजकल अपने भैयाभाभी के साथ रहने वाली सुमि यों भी मस्तमौला जिंदगी ही जी रही थी. कालेज के जमाने से मनोज उस का सब से प्यारा दोस्त था, जो सौम्य और संकोची सुमि के शांत मन में शरारत के कंकड़ गिरा कर उस को खुश कर देता था.

कालेज पूरा कर के दोनों ने साथसाथ नौकरी भी शुरू कर दी. अब तो सुमि के मातापिता और भाईभाभी सब यही मानने लगे थे कि दोनों जीवनसाथी बनने का फैसला ले चुके हैं.

मगर, एक दिन मनोज अपने उसी बौस के साथ मुंबई चला गया. सुमि को अंदेशा तो हो गया था, पर कहीं उस का मन कहता जरूर कि मनोज लौट आएगा. शायद उसी के लिए आया होगा.

अब सुमि खुश थी, वरना तो उस को यही लगने लगा था कि उस की जिंदगी जंगल में खिल रहे चमेली के फूल जैसी हो गई है, जो कब खिला, कैसा खिला, उस की खुशबू कहां गई, कोई नहीं जान पाएगा.

अगले दिन सुमि को अचानक बरखा दिख गई. वह उस की तरफ गई.

‘‘अरे बरखा… तुम यहां? पहचाना कि नहीं?’’

‘‘कैसी हो? पूरे 7 साल हो गए.’’ कहां बिजी रहती हो.

‘‘तुम बताओ सुमि, तुम भी तो नहीं मिलतीं,’’ बरखा ने सवाल का जवाब सवाल से दिया.

दोनों में बहुत सारी बातें हुईं. बरखा ने बताया कि मनोज आजकल मुंबई से यहां वापस लौट आया है और उस की सहेली की बहन से शादी करने वाला है.

‘‘क्या…? किस से…?’’ यह सुन कर सुमि की आवाज कांप गई. उस को लगा कि पैरों तले जमीन खिसक गई.

‘‘अरे, वह थी न रीमा… उस की बहन… याद आया?’’

‘‘मगर, मनोज तो…’’ कहतेकहते सुमि रुक गई.

‘‘हां सुमि, वह मनोज से तकरीबन 12 साल छोटी है. पर तुम जानती हो न मनोज का जादुई अंदाज. जो भी उस से मिला, उसी का हो गया.

‘‘मेरे स्कूल के मालिक, जो आज पूरा स्कूल मुझ पर ही छोड़ कर विदेश जा बसे हैं, वे तक मनोज के खास दोस्त हैं.’’

‘‘अच्छा?’’

‘‘हांहां… सुमि पता है, मैं अपने मालिक को पसंद करने लगी थी, मगर मनोज ने ही मुझे बचाया. हां, एक बार मेरी वीडियो क्लिप भी बना दी.

‘‘मनोज ने चुप रहने के लाखों रुपए लिए, लेकिन आज मैं बहुत ही खुश हूं. पति ने दूसरी शादी रचा ली है. मैं अब आजाद हूं.’’

‘‘अच्छा…’’ सुमि न जाने कैसे यह सब सुन पा रही थी. वह तो मनोज की शादी की बात पर हैरान थी. यह मनोज फिर उस के साथ कौन सा खेल खेल रहा था.

सुमि रीमा का घर जानती थी. पास में ही था. उस के पैर रुके नहीं. चलती गई. रीमा का घर आ गया.

वहां जा कर देखा, तो रीमा की मां मिलीं. बताया कि मनोज और खुशी तो कहीं घूमने चले गए हैं.

यह सुन कर सुमि को सदमा लगा. खैर, उस को पता तो लगाना ही था कि मनोज आखिर कर क्या रहा है.

सुमि ने बरखा से दोबारा मिल कर पूरी कहानी सुना दी. बरखा यह सुन कर खुद भौंचक सी रह गई.

सुमि की यह मजबूरी उस को करुणा से भर गई थी. वह अभी इस समय तो बिलकुल समझ नहीं पा रही थी कि कैसे होगा.

खैर, उस ने फिर भी सुमि से यह वादा किया कि वह 1-2 दिन में जरूर कोई ठोस सुबूत ला कर देगी.

बरखा ने 2 दिन बाद ही एक मोबाइल संदेश भेजा, जिस में दोनों की  बातचीत चल रही थी. यह आडियो था. आवाज साफसाफ समझ में आ रही थी.

मनोज अपनी प्रेमिका से कह रहा था कि उस को पागल करार देंगे. उस के घर पर रहेंगे.

सुमि यह सुन कर कांपने लगी. फिर भी सुमि दम साध कर सुन रही थी. वह छबीली लड़की कह रही थी कि ‘मगर, उस को पागल कैसे साबित करोगे?’

‘अरे, बहुत आसान है. डाक्टर का  सर्टिफिकेट ले कर?’

‘और डाक्टर आप को यह सर्टिफिकेट क्यों देंगे?’

‘अरे, बिलकुल देंगे.’ फिक्र मत करो.

‘महिला और वह भी 33 साल की, सोचो है, न आसान उस को उल्लू बनाना, बातबात पर चिड़चिड़ापन पैदा करना कोई मुहिम तो है नहीं, बस जरा माहौल बनाना पड़ेगा.

‘बारबार डाक्टर को दिखाना पड़ेगा. कुछ ऐसा करूंगा कि 2-4 पड़ोसियों के सामने शोर मचा देगी या बरतन तोड़ेगी पागलपन के लक्षण यही तो होते हैं. मेरे लिए बहुत आसान है. वह बेचारी पागलखाने मत भेजो कह कर रोज गिड़गिड़ा कर दासी बनी रहेगी और यहां तुम आराम से रहना.’

‘मगर ऐसा धोखा आखिर क्यों? उस को कोई नुकसान पहुंचाए बगैर, इस प्रपंच के बगैर भी हम एक हो सकते  हैं न.’

‘हांहां बिलकुल, मगर कमाई के  साधन तो चाहिए न मेरी जान. उस के नाम पर मकान और दुकान है. यह मान लो कि 2-3 करोड़ का इंतजाम है.

‘सुमि ने खुद ही बताया है कि शादी करते ही यह सब और कुछ गहने उस के नाम पर हो जाएंगे. अब सोचो, यह इतनी आसानी से आज के जमाने में कहां मिल पाता है.

‘यह देखो, उस की 4 दिन पहले की तसवीर, कितनी भद्दी. अब सुमि तो बूढ़ी हो रही है. उस को सहारा चाहिए. मातापिता चल बसे हैं. भाईभाभी की  अपनी गृहस्थी है.

‘मैं ही तो हूं उस की दौलत का सच्चा रखवाला और उस का भरोसेमंद हमदर्द. मैं नहीं करूंगा तो वह कहीं और जाएगी, किसी न किसी को खोजेगी.

‘मैं तो उस को तब से जानता हूं, जब वह 17 साल की थी. सोचो, किसी और को पति बना लेगी तो मैं ही कौन सा खराब हूं.’

रिकौर्डिंग पूरी हो गई थी. सुमि को बहुत दुख हुआ, पर वह इतनी भी कमजोर नहीं थी कि फूटफूट कर रोने लगती.

सुमि का मन हुआ कि वह मनोज का  गला दबा दे, उस को पत्थर मार कर घायल कर दे. लेकिन कुछ पल बाद ही सुमि ने सोचा कि वह तो पहले से ही ऐसा था. अच्छा हुआ पहले ही पता लग गया.

कुछ देर में ही सुमि सामान्य हो गई. वह जानती थी कि उस को आगे क्या करना है. मनोज का नाम मिटा कर अपना हौसला समेट कर के एक स्वाभिमानी जिद का भरपूर मजा  उठाना है. Hindi Family Story

Hindi Kahani: गियर वाली साइकिल – विक्रम साहब की ठाठ

Hindi Kahani: ‘टनटनटन…’ साइकिल की घंटी बजती तो दफ्तर के गार्ड विक्रम साहब की साइकिल को खड़ी करने के लिए दौड़ पड़ते. विक्रम साहब की साइकिल की इज्जत और रुतबा किसी मर्सडीज कार से कम न था. विक्रम साहब ठसके से साइकिल से उतरते. अपने पाजामे में फंसाए गए रबड़ बैंड को निकाल कर उसे दुरुस्त करते, साइकिल पर टंगा झोला कंधे पर टांगते और गार्डों को मुन्नाभाई की तरह जादू की झप्पी देते हुए अपनी सीट की तरफ चल पड़ते.

विक्रम साहब एक अजीब इनसान थे. साहबी ढांचे में तो वे किसी भी एंगल से फिट नहीं बैठते थे या यों कहें कि अफसर लायक एक भी क्वालिटी नहीं थी उन में. न चाल में, न पहनावे में, न बातचीत में, न स्टेटस में. 90 हजार रुपए महीना की तनख्वाह उठाते थे विक्रम साहब, पर अपने ऊपर वे 2 हजार रुपए भी खर्च न करते थे. दाल, चावल, सब्जी, रोटी खाने के अलावा उन्होंने दुनिया में कभी कुछ नहीं खाया था.

अपने मुंह से तो यह सब वे बताते ही थे, उन के डीलडौल को देख कर लगता भी यही था कि उन्होंने रूखी रोटी और सूखी सब्जी के अलावा कभी कुछ खाया भी नहीं होगा. काग जैसा रूप था उन का, पर अपनी बोली को उन्होंने कोयल जैसी मिठास से भर दिया था. औरतों के तो वे बहुत ही प्रिय थे. मर्द होते हुए भी औरतें उन से बेझिझक अपनी निजी बातें शेयर कर सकती थीं. उन्हें कभी नहीं लगता था कि वे अपने किसी मर्द साथी से बात कर रही हैं. लगता था जैसे अपनी किसी प्रिय सखी से बातें कर रही हैं. उन्हें विक्रम साहब के चेहरे पर कभी हवस नहीं दिखती थी.

दफ्तर में 10 मर्दों के साथ 3 औरतें थीं. बाकी 7 के 7 मर्द विक्रम साहब की तरह औरतों में लोकप्रिय बनने के अनेक जतन करते, पर कोई भी कामयाब न हो पाता था. विक्रम साहब सीट पर आते ही सब से पहले डस्टर ले कर अपनी मेज साफ करने लगते थे, फिर पानी का जग ले कर वाटर कूलर की तरफ ऐसे दौड़ लगाते थे जैसे अपने गांव के कुएं से पानी भरने जा रहे हों.

चपरासी शरमाते हुए उन के पीछे दौड़ता, ‘‘साहब, आप बैठिए. मैं पानी लाता हूं.’’ विक्रम साहब उसे मीठी डांट लगाते, ‘‘नहीं, तुम भी मेरी तरह सरकारी नौकर हो. तुम को मौका नहीं मिला इसलिए तुम चपरासी बन गए. मुझे मौका मिला इसलिए मैं अफसर बन गया. इस का मतलब यह नहीं है कि तुम मुझे पानी पिलाओगे. तुम्हें सरकार ने सरकारी काम के लिए रखा है और पानी या चाय पिलाना सरकारी काम नहीं है.’’

विक्रम साहब के सामने के चारों दांत 50 की उम्र में ही उन का साथ छोड़ गए थे. लेकिन कमाल था कि अब 59 साल की उम्र में भी उन के चश्मा नहीं लगा था.

दिनभर लिखनेपढ़ने का काम था इसलिए पूरा का पूरा स्टाफ चश्मों से लैस था. एक अकेले विक्रम साहब नंगी आंखों से सूई में धागा भी डाल लेते थे. फुसरत के पलों में जब सारे लोग हंसीमजाक के मूड में होते तो विक्रम साहब से इस का राज पूछते, ‘‘सर, आप के दांत तो कब के स्वर्ग सिधार गए, पर आंखों को आप कौन सा टौनिक पिलाते हैं कि ये अभी भी टनाटन हैं?’’

विक्रम साहब सब को उलाहना देते, ‘‘मैं तुम लोगों की तरह 7 बजे सो कर नहीं उठता हूं और फिर कार या मोटरसाइकिल से भी नहीं चलता हूं. मैं दिमाग को भी बहुत कम चलाता हूं, केवल साइकिल चलाता हूं रोज 40 किलोमीटर…’’

विक्रम साहब के पास सर्टिफिकेटों को अटैस्ट कराने व करैक्टर सर्टिफिकेट बनाने के लिए नौजवानों की भीड़ लगी रहती थी. बहुत से गजटेड अफसरों के पास मुहर थी, पर वे ओरिजनल सर्टिफिकेट न होने पर किसी की फोटोकौपी भी अटैस्ट नहीं करते थे. डर था कि किसी गलत फोटोकौपी पर मुहर व दस्तखत न हो जाएं.

लेकिन विक्रम साहब के पास कोई भी आता, उन की मुहर हमेशा तैयार रहती थी उस को अटैस्ट कर देने के लिए. वे कहते थे, ‘‘मेरी शक्ल अच्छी तरह याद कर लो. जब तुम डाक्टर बन जाओगे तो मैं अपना इलाज तुम्हीं से कराऊंगा.’’ नौजवानों के वापस जाते ही वे

सब से कहते, ‘‘ये नौजवान ऐसे ही बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं. फार्म पर फार्म भरे जा रहे हैं. हम इन्हें नौकरी तो नहीं दे सकते हैं, पर कम से कम इन के सर्टिफिकेट को अटैस्ट कर के इन का मनोबल तो बढ़ा ही सकते हैं.’’ सब उन की सोच के आगे खुद को बौना महसूस कर अपनेअपने काम में बिजी होने की ऐक्टिंग करने लगते.

विक्रम साहब में गुण ठसाठस भरे हुए थे. वे कभी किसी पर नहीं हंसते थे, दुनिया के सारे जुमलों को वे खुद में दिखा कर सब का मनोरंजन करते थे. विक्रम साहब जिंदादिली की मिसाल थे. दफ्तर में हर कोई हाई ब्लडप्रैशर

की दवा, कोई शुगर की टिकिया, कोई थायराइड की टेबलेट खाखा कर अपनी जिंदगी को तेजी से मौत के मुंह में जाने से थामने की कोशिश में लगा था, पर विक्रम साहब को इन बीमारियों के बारे में जानकारी तक नहीं थी. उन्हें कभी किसी ने जुकाम भी होते नहीं देखा था. विक्रम साहब चकरघिन्नी की तरह दिनभर काम के चारों ओर चक्कर काटा करते थे. वे अपने अलावा दूसरों के काम के बोझ तले दबे रहते थे. सारा काम खत्म करने के बाद शाम 5 बजे वे लंच के लिए अपने झोले से रोटियां निकालते थे.

यों तो विक्रम साहब की कभी किसी से खिटपिट नहीं होती थी लेकिन आखिर थे तो वे इनसान ही. बड़े साहब के अडि़यल रवैए ने उन को एक बार इतना खिन्न कर दिया था कि उन्होंने अपनी सीट के एक कोने में हनुमान की मूरत रख ली थी और डंके की चोट पर ऐलान कर दिया था,

‘‘जब एक धर्म वालों को अपने धार्मिक काम पूरे करने के लिए दिन में 2-2 बार काम बंद करने की इजाजत है तो उन को क्यों नहीं? उन के यहां त्रिकाल संध्या का नियम है. वे दफ्तर नहीं छोड़ेंगे त्रिकाल संध्या के लिए, लेकिन दोपहर की संध्या के लिए वे एक घंटा कोई काम नहीं करेंगे.’’

विक्रम साहब के इस सवाल का किसी के पास कोई जवाब नहीं था. दफ्तर में धर्म के नाम पर सरकारी मुलाजिम समय का किस तरह गलत इस्तेमाल करते हैं, इस का गुस्सा सालों से लोगों के अंदर दबा पड़ा था. विक्रम साहब ने उस गुस्से को आवाज दे

दी थी. महीने के तीसों दिन रात के 8 बजे तक दफ्तर खुलता था. रोटेशन से सब की ड्यूटी लगती थी. इस में तीनों औरतों को भी बारीबारी से ड्यूटी करनी पड़ती थी.

रात 8 बजे तक और छुट्टियों में ड्यूटी करने में वे तीनों औरतें खुद को असहज पाती थीं. उन्होंने एक बार हिम्मत कर के डायरैक्टर के सामने अपनी समस्या रखी थी. डायरैक्टर साहब ने उन्हें टका सा जवाब दिया था, ‘‘जब आप ऐसी छोटीमोटी परेशानी भी नहीं उठा सकतीं तो नौकरी में आती ही क्यों हैं?’’

साथी मर्द भी उन औरतों पर तंज कसते, ‘‘जब आप को तनख्वाह मर्दों के बराबर मिल रही है तो काम आप को मर्दों से कम कैसे मिल सकता है?’’ लेकिन विक्रम साहब के आने के बाद औरतों की यह समस्या खुद ही खत्म हो गई थी. वे पता नहीं किस मिट्टी के बने थे, जो हर रोज रात के

8 बजे तक काम करते और हर छुट्टी के दिन भी दफ्तर आते थे. 6 बजते ही वे तीनों औरतोें को कहते, ‘‘आप जाएं अपने घर. आप की पहली जिम्मेदारी है आप का परिवार. आप के ऊपर दोहरी जिम्मेदारियां हैं. हमारी तरह थोड़े ही आप को घर जा कर बनाबनाया खाना मिलेगा.’’

विक्रम साहब की इस हमदर्दी से सारे दूसरे मर्द कसमसा कर रह जाते थे. विक्रम साहब न तो जवान थे, न हैंडसम और न ही रसिकमिजाज, इसलिए औरतों के प्रति उन की इस दरियादली पर कोई छींटाकशी करता तो लोगों की नजर में खुद ही झूठा साबित हो जाता.

विक्रम साहब की इस दरियादिली का फायदा धीरेधीरे किसी न किसी बहाने दूसरे मर्द साथी भी उठाने लगे थे.

विक्रम साहब जब सड़क पर साइकिल से चलते तो वे एक साधारण बुजुर्ग से नजर आते थे. कोई साइकिल चलाने वाला भरोसा भी नहीं कर सकता था कि उन के बगल में साइकिल चला रहा यह आदमी कोई बड़ा सरकारी अफसर है.

‘वर्ल्ड कार फ्री डे’ के दिन कुछ नेता व अफसर अपनीअपनी कारें एक दिन के लिए छोड़ कर साइकिल से या पैदल दफ्तर जाने की नौटंकी करते हुए अखबारों में छपने के लिए फोटो खिंचवा रहे थे. विक्रम साहब के पास कुछ लोगों के फोन भी आ रहे थे कि वे सिफारिश कर के किसी बड़े अखबार में उन के फोटो छपवा दें. विक्रम साहब अपनी साइकिल पर बैठ कर उस दिन दिनभर दौड़भाग में लगे थे,

उन लोगों के फोटो छपवाने के लिए, पर उस 59 साल के अफसर की ओर न अपना फोटो छपवाने वालों का ध्यान गया था और न छापने वालों का, जो चाहता तो लग्जरी कार भी खरीद सकता था. पर जिस ने इस धरती को बचाने की चिंता में अपने 35 साल के कैरियर में हर रोज साइकिल चलाई थी, उस ने अपनी जिंदगी के हर दिन को ‘कार फ्री डे’ बना रखा था.

विक्रम साहब के रिटायरमैंट में बहुत कम समय रह गया था. सब उदास थे खासकर औरतें. उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि विक्रम साहब के जाने के बाद उन्हें पहले की तरह 8 बजे तक और छुट्टियों में भी अपनी ड्यूटी करनी पड़ेगी. वे सब चाहती थीं कि विक्रम साहब किसी भी तरह से कौंट्रैक्ट पर दूसरे लोगों की तरह नौकरी करते रहें.

विक्रम साहब कहां मानने वाले थे. उन्होंने सभी को अपने भविष्य की योजना बता दी थी कि वे रिटायरमैंट के बाद सभी लोगों को साइकिल चलाने के फायदे बताएंगे खासकर नौजवानों को वे साइकिल चलाने के लिए बढ़ावा देंगे. विक्रम साहब ने एक बुकलैट भी तैयार कर ली थी, जिस में दुनियाभर की उन हस्तियों की तसवीरें थीं, जो रोज साइकिल से अपने काम करने की जगह पर जाती थीं. उस में उन्होंने दुनिया के उन आम लोगों को भी शामिल किया था, जो साइकिल चलाने के चलते पूरी जिंदगी सेहतमंद रहे थे.

विक्रम साहब ने अपनी खांटी तनख्वाह के पैसों में से बहुत सी रकम बुकलैट की सामग्री इकट्ठा करने व उस की हजारों प्रतियां छपवाने में खर्च कर डाली थीं. उन तीनों औरतों ने भी विक्रम साहब के रिटायरमैंट पर अपनी तरफ से उन्हें गियर वाली साइकिल गिफ्ट करने के लिए रकम जमा करनी शुरू कर दी थी. उन की दिली इच्छा थी कि विक्रम साहब रिटायरमैंट के बाद गियर वाली कार में न सही, गियर वाली साइकिल से तो जरूर चलें. Hindi Kahani

Hindi Funny Story: शोरूम का उद्घाटन

Hindi Funny Story: प्यारेलालजी मेरे बड़े अच्छे दोस्त हैं. उन की एक नई जूते की दुकान का आज सुबह उद्घाटन है. पूरे शहर में ‘प्यारे बूट हाउस’ के एक दर्जन से ज्यादा शोरूम हैं. प्यारेलालजी ने जूतेचप्पलों में जो तरक्की की, वह शायद देश की नामी कंपनियों ने भी नहीं की होगी.

प्यारेलालजी के शोरूम में बड़ेबड़े कवि, मंत्री, विधायक, सांसद आने में गर्व महसूस करते हैं, लेकिन उन्होंने एक आम आदमी की पसंद का भी ध्यान रखा है, जैसे रबड़ की चप्पलें भी वहां मिल जाती हैं.

प्यारेलालजी किसी जमाने में बहुत अमीर नहीं थे, लेकिन अपने गरीब बापू की गरीबी पर मन ही मन दुखी
रहते थे.

आज तो नए शोरूम का उद्घाटन करने के लिए उन्होंने एक फिल्मी हीरोइन को बुलवाया था, जो आड़ीतिरछी हो कर हाथों में सैंडल लिए खड़ी थी. उस को देखने के लिए हजारों लोग जमा हो गए थे. उस ने जब हवा में चुंबन फेंके, तो हजारों ने धड़ाधड़ हवाई चप्पलें खरीद लीं.

मैं भी वहां मौजूद था, लेकिन मु झ पर उस ने एक नजर भी नहीं डाली और हम दिल में अपने आ रहे बुढ़ापे को कोसते रहे.

पूरे कार्यक्रम को होतेसमेटते हुए दोपहर बीत गई. हम प्यारेलालजी के साथ बैठे थे. वे कुछ ठंडागरम कहने गए, तो हम प्यारेलालजी की पुरानी यादों में खो गए.

अपने बापू की गरीबी से प्यारेलालजी बड़े दुखी थे. बापू मजदूरी करते थे. पैरों में कांटे गड़ते, धूप लगती, पत्थर चुभते, लेकिन कभी उफ नहीं की थी.

प्यारेलालजी के बापू का एक ही मकसद था कि उन का प्यारे पढ़ जाए, बढ़ जाए, जबकि प्यारेलाल की एक ही इच्छा थी, ‘पढ़लिख कर क्यों जिंदगी बरबाद करूं? ऐसा धंधा शुरू करूं, जिस से जिंदगी मजे से कटे.’

इस बीच प्यारेलालजी आ चुके थे. मु झे कहीं खोया देख वे कह उठे, ‘‘क्यों रे गप्पू, क्या सोच रहा है?’’

‘‘यार, तेरी जिंदगी के ऊंचे हो चुके ग्राफ के बारे में सोच रहा था.’’

‘‘ऐसा मैं ने क्या कर दिया?’’

‘‘आज से 30 साल पहले तेरे पास कुछ नहीं था, पर आज सबकुछ है. दुकानें, शोरूम, हीरोइन…’’

‘‘लेकिन बापू नहीं हैं,’’ उस ने दुखी लहजे में कहा.

‘‘वह तो सच है, पर आज आप हीरोइन के साथ बढि़या लग रहे थे,’’ मैं ने चुटकी ली.

‘‘पूरे 10 लाख रुपए लिए उस ने एक घंटे के लिए.’’

‘‘10 लाख…’’ मैं ने तकरीबन चीखते हुए पूछा.

‘‘हां यार, वसूल भी हो गए.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘पूरे 2 लाख रुपए की चप्पलें बिक गईं और 8 लाख रुपए का फोकट में इश्तिहार भी हो गया,’’ प्यारेलालजी ने बाजार को पकड़ते हुए कहा.

‘‘प्यारे, ये जूतेचप्पल का आइडिया बापू को तू ने कैसे दिया? आखिर इस के पीछे का राज क्या था? थोड़ा बता तो?’’

प्यारेलालजी ने आंख मारी, फिर कहने लगा, ‘‘कहीं तू नई दुकान तो नहीं खोल लेगा…’’

‘‘बिलकुल नहीं, लेकिन तू बता तो.’’

प्यारेलालजी ने दाएंबाएं देखा और कहना शुरू किया, ‘‘तू तो जानता था कि मैं बापू की गरीबी से परेशान था. मैं ने सोचा कि क्यों न ऐसा काम करूं, जिस से मैं अमीर भी हो जाऊं और पैसा भी न लगे.’’

‘‘तो फिर क्या हुआ?’’

‘‘होना क्या था. एक दिन दिमाग में एक आइडिया आया. एक जगह शादी हो रही थी, मैं वहां से एक दर्जन जूतेचप्पल चुरा लाया.’’

‘‘चोरी की…’’

‘‘तू सुन तो…’’

‘‘वहां लोगों ने खूब गालियां दीं. मेरा मन उदास हो गया.’’

‘‘फिर…’’

‘‘फिर क्या, मैं ने दूसरी जगह शादी का घर खोजा. वहां पर खाना खाने के पहले उतारे गए जूतेचप्पलों में से हर जोड़ी का एकएक जूताचप्पल ले आया.

‘‘जब खाने के बाद लोग बाहर निकले, तो उन्हें वह रिश्तेदारों की शरारत लगी. लिहाजा, वे एकएक जूतेचप्पल को वहीं छोड़ कर चले गए. मैं उन्हें भी उठा लाया. खालिस मुनाफा था…’’

‘‘फिर क्या किया?’’

‘‘मेरा हौसला बढ़ गया. मैं ने मंदिरमसजिदों, पार्टियों, शादियों वगैरह में जाना शुरू कर दिया और मौका देख कर हर जोड़ी का एकएक जूता या चप्पल उठा कर गायब हो जाता था.

‘‘जूतेचप्पल वाले आखिर में मेरे लिए दूसरा जूता या चप्पल और छोड़ जाते थे.

देखते ही देखते घर में जूतेचप्पलों का ढेर लग गया था. उन्हें साफ और पौलिश कर के सस्ते जूतेचप्पलों की दुकान की तर्ज पर मैं ने घर से ही जूतेचप्पल बेचने शुरू कर दिए.’’

‘‘फिर…’’

‘‘मेरी सब से ज्यादा मदद की मंत्रियों और कवियों ने.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि उन कवियों और नेताओं की मीटिंग में सब से ज्यादा जूतेचप्पल फेंके जाते थे, जो अपने काम में आने लगे. इस के अलावा बाबाओं ने भी बहुत सहयोग दिया.’’

‘‘क्या मतलब…?’’

‘‘उन की सभा के बाहर स्वयंसेवक बन कर जूतेचप्पल चुरा लो या फिर वहां भगदड़ मचने पर कईकई दर्जन जूतेचप्पल मुफ्त में मिल जाते हैं.

‘‘दोस्त, बस इन्हीं जूतेचप्पलों की बदौलत मैं ने जूतेचप्पल बेचने का धंधा शुरू किया.

‘‘हमारे पूरे इलाके में डेढ़ सौ प्रतिनिधि हैं, जो जूतेचप्पल इकट्ठा करने का काम करते हैं. एक दर्जन कारीगर जूतेचप्पल ठीक करने का काम करते हैं और आज पूरे शहर में कोई हम से होड़ नहीं कर सकता है,’’ प्यारेलालजी ने अकड़ से कहा.

‘‘बिलकुल नहीं यार, लेकिन अगले शोरूम के उद्घाटन में तुम जिस खास शख्स को बुलाओ, उस का एक फोटो मेरे साथ जरूर खिंचवा देना.’’

‘‘जरूर, पर एक वादे के साथ.’’

‘‘कैसा वादा?’’

‘‘यह अंदर की बात किसी से न कहना. अपने तक ही रखना, वरना कहीं जनता, मंत्री, श्रद्धालु और नमाजी जूते पहनना ही न छोड़ दें. मेरा धंधा चौपट हो जाएगा.’’

‘‘वचन देता हूं कि मैं यह बात किसी से नहीं कहूंगा,’’ यह कह कर मैं घर लौट आया.

चूंकि मैं ने यह वादा किसी से न कहने का किया था, लिख कर बताने का नहीं. सो, मैं ने यह बात आप को लिख कर बता दी. Hindi Funny Story

Story In Hindi: सीवर का ढक्कन – जब बन गया नरक रास्ता

Story In Hindi: आज तीसरे दिन कर्फ्यू में 4 घंटे की छूट दी गई थी. इंस्पैक्टर राकेश अपनी पुलिस टीम के साथ हालात पर काबू पाने के लिए गश्त पर निकले हुए थे. रास्ते में आम लोगों से ज्यादा रैपिड ऐक्शन फोर्स के जवान नजर आ रहे थे. सड़कों के किनारे लगे अधजले, अधफटे बैनरपोस्टर दंगों की निशानदेही कर रहे थे.

अपनी गाड़ी से आगे बढ़ते हुए इंस्पैक्टर राकेश ने देखा कि एक सीवर का ढक्कन ऊपरनीचे हो रहा था. उन्होंने फौरन गाड़ी रुकवाई.

सीवर के करीब पहुंचने पर मालूम हुआ कि अंदर से कोई सीवर के ढक्कन को खोलने की कोशिश कर रहा था. इंस्पैक्टर राकेश ने जवानों से ढक्कन हटाने को कहा.

सीवर का ढक्कन खुलने के बाद जब पुलिस का एक सिपाही अंदर झांका तो दंग रह गया. वहां 2 नौजवान गंदे पानी में उकड़ू बैठे हुए थे. उन के कपड़े कीचड़ में सने हुए थे. उन के चेहरे पर मौत का खौफ साफ नजर आ रहा था.

ढक्कन खुलते ही वे दोनों नौजवान हाथ जोड़ कर रोने लगे. उन के गले से ठीक ढंग से आवाज भी नही निकल पा रही थी. उन में से एक ने किसी तरह हिम्मत कर के कहा, “सर… हमें बाहर निकालें…”

बहरहाल, कीचड़ से लथपथ और बदबू में सने हुए उन दोनों लड़कों को बाहर निकाला गया. इस बीच एंबुलैंस भी वहां आ चुकी थी.

बाहर निकलने के बाद वे दोनों लड़के गहरीगहरी सांसें लेने लगे. दोनों के पैरों को कीड़ेमकोड़ों ने काट खाया था, जिन से अभी भी खून बह रहा था. उन के शरीर के कई हिस्सों पर जोंक चिपकी हुई खून पी रही थीं और तिलचट्टे व कीड़े रेंग रहे थे. उन्हें झाड़ने या हटाने की भी ताकत उन में नहीं बची थी.

उन दोनों को जल्दीजल्दी एंबुलैंस में लिटाया गया. एंबुलैंस चलने के पहले ही एक नौजवान बोल पड़ा, “अंदर 2 जने और हैं सर…”

पुलिस टीम को यह समझते देर नहीं लगी कि सीवर में 2 और लोग फंसे हुए हैं. पुलिस का एक जवान सीवर में झांकते हुए बोला, “सर, अंदर 2 डैड बौडी नजर आ रही हैं.”

इंस्पैक्टर राकेश के मुंह से अचानक निकला, “उफ…”

बड़ी मशक्कत से उन दोनों लाशों को बाहर निकाला गया, जो पानी में फूल कर सड़ने लगी थीं. बदबू के मारे नाक में दम हो गया था.

अगले दिन जिंदा बचे उन दोनों लड़कों के बयान से मालूम हुआ कि उन में से एक का नाम महेश और दूसरे का नाम मकबूल है. मरने वाले माजिद और मनोहर थे.

उन में से एक ने बताया, “हम लोग नेताजी का भाषण सुनने आए थे. अभी भाषण शुरू भी नहीं हुआ था कि सभा स्थल के बाहर कहीं से धमाके की आवाज सुनाई पड़ी. पलक झपकते ही अफवाहों का बाजार गरम हो गया और लोगों में भगदड़ मच गई. ‘आतंकवादी हमला’ का शोर सुन कर हम लोग भी भागने लगे.

“लोग अपनी जान बचाने के लिए जिधर सुझाई दे रहा था, उधर भागे जा रहे थे. उसी भगदड़ में कुछ लोग मौके का फायदा उठा कर लूटपाट करने में मसरूफ हो गए.

“हालात की गंभीरता को देखते हुए घंटेभर में कर्फ्यू का ऐलान होने लगा.
पुलिस की गाड़ियों के सायरन चीखने लगे. साथ छूटने के डर से हम चारों ने एकदूसरे का हाथ पकड़ रखा था.

“घरों और दुकानों के दरवाजे बंद हो चुके थे. कहां जाएं, किस के घर में घुसें… कौन इस आफत में हमें पनाह देगा, यह समझ में नही आ रहा था.

“यह सोचते हुए हम चारों दोस्त भागे जा रहे थे कि तभी पीछे गली से गुजर रही पुलिस की गाड़ी से फायरिंग की आवाज आई. ऐसा लगा जैसे वह फायरिंग हम लोगों पर की गई थी.

“हम लोग हांफ भी रहे थे और कांप भी रहे थे. दौड़ने के चक्कर में हम में से किसी एक का पैर सीवर के अधखुले ढक्कन से टकराया. वह लड़खड़ा कर गिरने लगा. हाथ पकड़े होने के चलते हम चारों ही एकसाथ गिर पड़े.

“हम लोगों को तत्काल छिपने के लिए सीवर ही महफूज जगह लगा. इस तरह एक के बाद एक हम चारों लोग सीवर में उतरते चले गए और उस का ढक्कन किसी तरह से बंद कर लिया… और फिर…” इतना कह कर वह लड़का रोने लगा.

देखते ही देखते वही सीवर 2 नौजवानों की कब्रगाह जो बन गया था. Story In Hindi

Hindi Story: फोड़ा

Hindi Story, लेखक – पंकज त्रिवेदी

आंगन के चारों ओर दीवार थी. लोहे का दरवाजा खुलने की आवाज सुनाई दी. मनोज बिस्तर पर पड़ा जाग रहा था. जाड़े की बहुत घनी रात थी.

मनोज ने घड़ी में देखा. अभी तो रात के 10 बजे हैं. इस वक्त कौन होगा? ऐसा सोच कर मनोज बिस्तर से उठ गया. ठीक उसी समय बरामदे के दरवाजे पर धीरे से किसी ने दस्तक दी.

मनोज ने बत्ती जलाई. दरवाजा खोला. वह सामने खड़ी औरत का चेहरा ठीक से पहचान न पाया. घर के सामने खुला मैदान अंधकार ओढ़ कर सोया हुआ था. दूरदूर तक खेत ही खेत थे. माहौल में नमी के साथ जाड़े की फसल की खुशबू फैली हुई थी. झींगुर की आवाज के अलावा सबकुछ शांत था. मनोज को गांव के बाहर ग्राम पंचायत के पास एक सरकारी मकान मिला था.

उस औरत ने कुछ कदम आगे बढ़ कर बरामदे में पैर रखा.

‘‘अरे जीवली, तुम…?’’ मनोज ने हैरान हो कर पूछा.

जीवली की आंखों में आंसू थे. वह दरवाजे के पास ही बैठ गई.

‘‘जीवली, तुम इस समय क्यों आई? क्या हुआ?’’ मनोज ने पूछा.

जवाब देने के बदले जीवली को रोती हुई देख कर मनोज और ज्यादा हैरानी में पड़ गया.

‘‘कुछ बोलो तो सही… क्यों रो रही हो?’’ मनोज की आवाज में थोड़ी सख्ती आ गई.

जीवली ने कुछ बोले बिना ही दरवाजे को बंद कर दिया. मनोज को अचरज हुआ और मन में कहीं डर भी था. उसे कड़ाके की ठंड में भी पसीना आने लगा.

मनोज पिछले 2 साल से इस गांव में था. पूरा गांव उसे इज्जत की नजरों से देखता था. यह उस के पढ़ेलिखे और संस्कारी इनसान की पहचान थी. ग्रामसेवक के पद पर उस की उज्ज्वल छवि रही है. ऐसे समय जीवली उस के घर में आ कर दरवाजा बंद कर दे, तो पसीना निकल आएगा ही न. वह अभी भी रो रही थी.

मनोज ने हिम्मत कर के धीरे से पूछा, ‘‘जीवली, तुम क्यों रो रही हो? कुछ बात करोगी तो सम झ आएगा न? और यह दरवाजा तो खोल,’’ इतना कह कर मनोज दरवाजे की ओर मुड़ा.

उसी समय जीवली ने मनोज के पैर पकड़ लिए. मनोज रुक गया और फिर वहीं घुटनों के बल बैठ गया और बोला, ‘‘जीवली, अभी कितने बजे हैं उस का अंदाजा है तुम्हें? बाहर अंधेरा और यहां मैं अकेला हूं.

अगर किसी को पता चला न तो… जो भी काम हो जल्दी से बोल दो.’’

लालटेन के उजास में जीवली ने धीरे से चुनरी उतार दी और मनोज कुछ कदम पीछे चला गया. उसे लगा कि यह जीवली क्या करने लगी है? उसे धक्का मार कर बाहर निकालने की इच्छा हो गई, मगर वह ऐसा न कर पाया.

जीवली ने अंगिया की डोरी छोड़ दी. मनोज ने अपनी आंखें बंद कर लीं.

‘‘साहब, आप के पास मरहम है क्या? मैं यहां से जल गई हूं.’’

मनोज ने धीरे से आंखें खोलीं. जीवली के बाईं करवट पर बड़ा सा फोड़ा (फफोला) हो गया था. वह सच में जल गई थी.

मनोज को कुछ याद हो आया. उस दिन पहली ही बार जीवली पानी भरने आई थी. तब मनोज को यह सरकारी मकान मिले एक हफ्ता भी नहीं हुआ था. गांव में ज्यादा जानपहचान नहीं थी. दोपहर का समय था. खाना खा कर थोड़ा आराम कर के मनोज ने सोचा कि गांव ही घूम लिया जाए.

उस मकान के आंगन के कुएं में जीवली घड़े से बड़ी मटकी में पानी डालने के लिए नीचे झुकी, उसी समय मनोज का ध्यान उस तरफ गया. एक पल के लिए तो वह जड़ हो गया. इतनी उम्र में उस ने कई औरतें देखी थीं, मगर आज पहली बार उसे लगा कि चीथड़ों में लिपटा हुआ रत्न भी होता है.

जीवली ने तिरछी नजरों से मनोज की ओर देख लिया था. उस ने जल्दी से चुनरी ठीक से ओढ़ ली और मनोज की ओर मादक मुसकान फेंक दी, फिर धीरे से बोली, ‘‘साहब, लगन कब करना है?’’

फिर मनोज के जवाब का इंतजार किए बिना जीवली जल्दी से चली गई.

‘‘साहब, कौन सी सोच में पड़ गए? मरहम हो तो जल्दी से लगा दो न. कुछ देर में वह आएगा, तो फिर…’’

मनोज अपनी यादों से लौट आया. उस ने जल्दी से अंदर के कमरे में जा कर बरनोल ला कर फोड़े पर हलके हाथों से मरहम लगाना शुरू किया.

‘‘साहब, जल्दी लगा दो न, बहुत जलन हो रही है…’’ कह कर जीवली कराहने लगी.

मनोज का हाथ कांपने लगा. जलन के चलते बड़ा सा फोड़ा हो गया था.

उस की नजरों के सामने कुएं पर पानी भरती जीवली का ही सीन था, जिस के लिए वह बारबार तरसता था.

उसे लगा कि वह ठीक से मरहम लगा नहीं पाएगा.

उस समय जीवली ने खुद कलेजे को मजबूत कर के मनोज का हाथ पकड़ कर उंगली पर लगा मरहम फोड़े पर लगा दिया.

मनोज तो हैरान सा देखता ही रह गया. जीवली की आंखों में आंसू थे, फिर भी उस ने मनोज के सामने मुसकरा कर देखा. वैसे भी जो पीड़ा सह पाए, वही मुसकरा सकते हैं.

मनोज कुछ सम झ न पाया. उस ने पूछा, ‘‘तुम यहां कैसे जल गई?’’

‘‘उस ने दाग दिया,’’ अंगिया की डोरी बांधते हुए जीवली ने कहा.

‘‘क्यों, ऐसा भी क्या हो गया था?’’

‘‘वह दारू पी कर आया और बोला मु झे जल्दी खाना दे. खातेखाते बोला कि कल तु झे अर्जुन के खेत में खाना देने जाना है, तैयार हो कर रहना.’’

‘‘उस ने तुम से ऐसा क्यों कहा?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘उस मुए ने कहा कि अर्जुन मु झे हमेशा शराब पिलाता है, इसलिए तु झे उसे राजी करना होगा… समझ गई न?’’

‘‘बहुत घटिया आदमी है वह तो,’’ मनोज ने कहा.

‘‘आप सुनो तो सही. मैं ने उस से कहा कि कोई कामधंधा करो तो गुलामी करनी न पड़े. अर्जुन जान गया है कि तुझे दारू के बगैर चलेगा नहीं, इसलिए मु झ पर नजर डाली. तू भी कितना हलकट है कि हां कह कर चला आया,’’ इतना बोलते हुए जीवली ने अपने आंसू पोंछे.

‘‘तो इस में तुम ने क्या गलत कहा,’’ मनोज ने कहा.

‘‘बस, उस का तौर ही ऐसा है. मैं ने झट से कह दिया तो उस ने चूल्हे में से जलती हुई लकड़ी उठा ली. मैं अपना हाथ आगे बढ़ाऊं, उस से पहले तो बाईं ओर करवट पर दे मारी… फिर कहता कि अपने रूप का बहुत घमंड है न तुझे?’’

‘‘मगर इसे इनसान कहें या…?’’ मनोज बोला, ‘‘बिलकुल जाहिल आदमी है.’’

‘‘ऐसा नहीं कहते, कोई बात नहीं. वह तो जब भी दारू पी कर आता है, तब मारता है. मगर आज सुलगती लकड़ी हाथ आ गई,’’ जीवली बोली.

थोड़ी देर के बाद जीवली बाहर निकली. उस ने आसपास देखा. घना अंधेरा था.

मनोज ने धीरे से कहा, ‘‘तुम अकेली जा पाओगी कि छोड़ने आऊं?’’

‘‘नहींनहीं, मैं चली जाऊंगी.’’

‘‘वह जाहिल तुम्हें देख लेगा तो…?’’ मनोज को चिंता होने लगी.

‘‘वह तो खर्राटे मारता होगा. दारू पी कर आने के बाद कुछ देर हंगामा कर देता है. एक बार खटिया पकड़ ले, फिर खेल खल्लास,’’ जीवली ने कहा.

‘‘कुछ दिन और मरहम लगाना होगा… जीवली, सम झ रही हो न…’’ मनोज ने कहा.

‘‘साहब, मुए ने ऐसी जगह दाह लगाया है कि डाक्टर को दिखाने में भी लाज आती है,’’ जीवली ने कहा.

‘‘मेरे पास आते शर्म न आई?’’ मनोज के चेहरे पर शरारती मुसकान उभर आई.

‘‘शर्म लगे मगर क्या करूं मैं? उस दिन मैं पानी भर रही थी न, तब आप मेरे सामने कैसे टकटकी लगा कर देखते थे,’’ जीवली के ये शब्द सुनते ही मनोज झेंप गया.

‘‘मैं कल आऊंगी…’’ कहते हुए जीवली बाहर निकल गई.

अब तो जीवली का इंतजार करना मनोज को अच्छा लगता था. आज वह देर से आई. मनोज के लिए इंतजार का एकएक पल एक युग जितना लंबा लगने लगा था.

जीवली आ गई. मनोज का हाथ उस के फोड़े पर फिरता रहा.

‘‘साहब, एक बात कहूं?’’

हां, बोल…’’ मनोज ने कहा.

‘‘आप मुझे मरहम लगाते हैं, तो कुछ होता नहीं है?’’

‘‘जीवली, तुम तो शादीशुदा हो. यह तो महरम लगा कर दर्द मिटाने का काम है. तेरा घरवाला, वह जाहिल है न?’’ मनोज बोल रहा था, उस से उलट उस के मन में उथलपुथल हो रही थी.

‘‘साहब, उस मुए को तो दारू पी कर मारना ही आता है. घर की औरत पर हाथ उठाए उन में क्या होगा?’’ जीवली की बात से मनोज को अचरज हुआ.

‘‘क्यों?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘उस ने दाह दे कर मुझे फोड़ा दे दिया. छोड़ो न उस कलमुंहे का नाम…’’ फिर जीवली धीरे से बोली, ‘‘मगर आप कहें तो मैं रोज आती रहूंगी…’’ और फिर उस ने अपनी आंखें नचाईं.

‘‘ऐसा भी क्या है कि तुम उस से इतनी नाराज हो?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘साहब, उस की बात ही जाने दो न. उस दिन मु झे कहता था न कि अर्जुन के साथ रात बिताने जा. सच कहूं तो वह मरद में ही नहीं है,’’ इतना बोलते ही जीवली लाल हो गई.

‘‘क्या बात करती हो?’’ मनोज हैरान हो कर बोला.

‘‘साहब, क्या आप को कुछ नहीं होता?’’ जीवली ने पूछा.

‘‘जीवली, तुम्हारा रूप ही ऐसा है कि कोई भी आदमी पागल हो जाए. जल्दी से अपने घर जा,’’ मनोज को मानो अपनेआप पर अब भरोसा नहीं रहा था.

‘‘आप ने तो कभी ऐसा दिखने ही नहीं दिया…’’ कहते हुए जीवली ने मनोज के गले में हाथ डाल दिए.

जीवली के इस हमले के सामने मनोज पानीपानी हो गया. वह जमीन पर ही चारों खाने चित हो गया और
कुछ देर तक जीवली मस्ती करती रही.

फिर मनोज ने कहा, ‘‘तुम्हारा घरवाला मेरे पास आया था.’’

‘‘क्या…?’’ जीवली के पेट में डर की बिजली फैल गई.

‘‘हां, कल मेरे पास आ कर पैसे मांगे और कह कर गया कि साहब, जीवली आप के पास आती है, मैं जानता हूं. मु झे कोई फर्क नहीं पड़ता. मगर रोज कुछ चिल्लर का जोग करना पड़ेगा. हम दोनों की गाड़ी चलेगी.’’

मनोज ने बात कही तो जीवली के मन पर कोई असर न हुआ.

मनोज ने पूछा, ‘‘जीवली, तुम कुछ बोली नहीं?’’

‘‘मुझे पता है. मैं ने ही उसे कहा था, उस अर्जुन के पास जाने से तो…’’ इतना बोलते जीवली के मुंह पर मनोज ने अपना हाथ रख दिया और बांहों में जकड़ लिया.

ठीक उसी दिन फोड़े में से मवाद बाहर निकलने लगा था और जीवली का दर्द भी कम होने लगा था. आज वह बड़ी खुश थी. Hindi Story

Best Hindi Story: मैं ही अम्मी अब्बू भी मैं

Best Hindi Story: बासित ने आईने में अपनेआप को देखा. बालों में सफेदी आने लगी थी और आंखों के किनारे पर झुर्रियों की रेखाएं बढ़ती उम्र का अहसास करा रही थीं.

हालांकि, अभी बासित महज 39 साल का था, पर पैसा कमाने की धुन में वह ऐसा खोया कि अपनी सेहत का ध्यान नहीं रख पाया.

बासित ने 15 साल की उम्र में मुन्ने मियां की शार्गिदगी में मोटर मेकैनिक का काम सीखना शुरू किया था. दिमाग का तेज बासित जल्दी ही काफीकुछ सीखता चला गया.

मोटरसाइकिल की सर्विस करनी हो या जीपकार की कोई खराबी दूर करनी हो, बासित तुरंत ही मर्ज भांप कर उसे ठीक करने में लग जाता था, पर उस की मेहनत के बदले मुन्ने मियां उसे वाजिब पैसे नहीं देते थे, लिहाजा, बासित ने मुन्ने मियां के यहां काम छोड़ कर एक दूसरी दुकान अशरफ मोटर्स पर काम करना शुरू कर दिया.

बदले में दुकान के मालिक अशरफ मियां उसे काम सिखाने के साथसाथ 2,000 रुपए की पगार भी देते थे, जिस में से बासित 1,000 रुपए खर्चे करता और 1,000 रुपए की बचत करता था.

बासित के सिर से मांबाप का साया तभी उठ गया था, जब वह महज 13 साल का था. मांबाप दोनों एक सड़क हादसे में मारे गए थे.

बासित और आबिद 2 भाई ही बचे थे, जो अब भरी दुनिया में अकेले थे. आबिद को चाचू अपने साथ मुंबई ले गए, जबकि बासित ने यहीं रहना ठीक समझा.

बासित हर महीने बचत करता और अपने खर्चे में कटौती करता. उस के पास जब थोड़ी रकम जमा हो गई तो उस ने एक लकड़ी के खोखे में कुछ टूल्स के साथसाथ मोटर सर्विसिंग का सामान भी बिक्री के लिए रख लिया.

बासित का अच्छा बरताव, मेहनत और ग्राहक को संतोष कर पाने की अद्भुत ताकत रंग लाई थी और समय बीतने के साथ अब पैसों की आमद भी अच्छी होने लगी थी. जमा की गई रकम को बासित ने काम बढ़ाने में ही लगाया और धीरेधीरे वह शहर में एक आटोमोबाइल और स्पेयर पार्ट्स की दुकान का मालिक बन गया.

बासित की अच्छीखासी कमाई भी होने लगी थी, पर अम्मीअब्बू के न होने के चलते और पैसे कमाने की धुन में बासित को खुद की शादी का खयाल ही नहीं आया. ऐसा नहीं था कि उसे किसी साथी की जरूरत नहीं महसूस हुई, पर पैसे कमाने की धुन में वह शादी को दरकिनार करता गया, जिस का नतीजा यह हुआ कि 39 साल की उम्र में भी वह अभी अनब्याहा ही था.

मुंबई से चाचू और आबिद वीडियो काल पर हालचाल ले लेते और शादी कर लेने को कहते, पर बासित हर बार मुसकरा देता.

आज बासित अपनी दुकान पर आ कर कुरसी पर बैठा ही था कि उस के दोस्त रमेश और करीम आ गए, जो अकसर ही बासित से शादी करने को कहते थे. वे दोनों आज भी बासित से शादी कर लेने की बात
कहने लगे.

‘‘अरे, अब इस उम्र में हम से भला कौन शादी करेगा?’’ बासित के मुंह से अनायास ही निकल गया, तो इस बात को मानो करीम ने दोनों हाथों से लपक लिया.

करीम ने बासित को बताया कि लखनऊ से 70 किलोमीटर दूर हफीजपुर नाम के कसबे में रहमत नाम का एक दर्जी है, जिस की 4 बेटियां हैं और सब एक से बढ़ कर एक खूबसूरत भी हैं, पर रहमत दर्जी गरीब होने के चलते दहेज नहीं दे पा रहा है, लिहाजा उस की बेटियां अभी तक अनब्याही हैं.

‘‘अरे भाई, दहेज का क्या करना है? भला हमारे बासित के पास पैसों की क्या कमी है? चलो, हम लोग शादी का पैगाम ले कर चलते हैं,’’ रमेश खुश हो कर बोला.

बासित अपनी शादी की बात सुन कर इधरउधर देखने लगा और लड़कियों की तरह शरमा भी रहा था. रमेश और करीम सम झ गए थे कि बासित भी चाहता है कि उस की शादी करा दी जाए, इसलिए वे दोनों हफीजपुर जा कर रहमत दर्जी से मिले और निकाह की बात बताई.

रहमत दर्जी को तो जैसे मनमांगी मुराद मिल गई. उस की बड़ी बेटी सायरा 25 साल की थी, जबकि बासित की ज्यादा उम्र रहमत दर्जी के लिए थोड़ी चिंता का सबब तो थी, पर 4 बेटियों का बाप भला बासित जैसा अच्छा और पैसे वाला दामाद कहां से ला पाता, इसलिए रहमत ने सायरा की शादी बासित के साथ करने के लिए हामी भर दी.

बासित ने जब सायरा का फोटो देखा, तो उस की खूबसूरती देख कर दंग रह गया. सायरा के चेहरे का रंग एकदम साफ था. होंठों के ऊपर एक काला तिल सायरा की खूबसूरती में चार चांद लगा रहा था. नशीली और कजरारी आंखें उसे बला की खूबसूरत बनाती थीं.

बासित ने निकाह से पहले नया घर ले लिया था, जो लखनऊ के पौश इलाके गोमतीनगर में था. पूरे 4 कमरे थे इस में और घर के आगे एक छोटा सा लौन भी था, साथ ही गाड़ी पार्किंग की अच्छीखासी जगह भी थी.

निकाह के बाद सायरा इसी नए घर में आई थी. सायरा की खुशी का ठिकाना नहीं था. कहां तो दर्जी की बेटी… गरीबी में पलीबढ़ी, जहां पर पहनने को अच्छे कपड़े नहीं थे और पेटभर खाना भी नसीब नहीं होता था और कहां यह बासित का कोठीनुमा घर. अलमारी भर कर रंगबिंरगे कपड़े दिला दिए थे बासित ने. खाने को काजूबादाम के ढेरों पैकेट मेज पर सजे थे.

और रसोईघर तो देखो… खासे 2 कमरों के बराबर है… दराजों पर सुनहरे सनमाइका वाली नक्काशी है. और तो और रसोईघर में एक चिमनी भी लगी हुई है.

अब भला दालसब्जी के छौंक के बाद खांसी आने का झं झट ही नहीं.

सारा धुआं चिमनी से झर्र से बाहर और ज्यादा गरमी लगे तो बैडरूम में एसी औन कर लो.

बाथरूम में मौसम के हिसाब से गरम और ठंडा पानी नहाने के लिए और इन सब चीजों के बाद बासित जैसा शौहर मिला है, जो हर पसंदनापसंद का ध्यान रखता है. सायरा के सपनों को तो मानो पंख ही लग गए थे.

उस दिन इतवार था. बासित आज घर पर ही था. दोपहर बाद अमीनाबाद घूमने जाने का प्लान बना. सायरा ने बादामी रंग का सूट पहना, तो उस की खूबसूरती और भी दमक उठी.

बासित के साथ गाड़ी में बैठते समय कितना अच्छा महसूस हो रहा था. सायरा और बासित की कार महल्ले से बाहर निकली, तो महल्ले के मनचलों और खासकर चमन नाम के लड़के की नजरों में सायरा की खूबसूरती खटक गई.

चमन 28 साल का था जो बासित की दुकान पर ही काम करता था. उस ने दुकान के लोगों से सायरा के हुस्न के चर्चे पहले से ही सुन रखे थे, पर आज जब उस ने कार में बैठी सायरा को देख लिया, तो वह तो उस के हुस्न का दीवाना हो उठा.

चमन को यह बात बुरी लग रही थी कि इतनी खूबसूरत लड़की को तो उस की हमराह होना चाहिए, फिर यह 39 साल के बासित को कैसे मिल गई? सायरा की खूबसूरती पर मरमिटा था चमन और वह मन ही मन किसी योजना पर काम करने लगा था.

आज तो बासित पूरा अमीनाबाद ही खरीद देना चाह रहा था सायरा के लिए. बासित बस सायरा की नजरें पढ़ रहा था. बाजार में जिस सामान पर सायरा की नजरें जातीं, बासित वही चीज खरीद लेता. शौहर की मुहब्बत को देख कर मन ही मन फूली नहीं समा रही थी सायरा.

अगले दिन जब बासित अपनी दुकान पर चला गया, तब सायरा ने सोचा कि बासित उसे इतना प्यार करते हैं, उस पर इतना खर्च करते हैं, तो उस का भी तो फर्ज बनता है कि वह बासित के लिए कुछ करे, मसलन अपने कमाए हुए पैसों से बासित को कुछ तोहफे दे.

सायरा को याद आया कि जब वह अब्बू के पास मायके में थी, तब अम्मी ने उसे छोटे बच्चों के कपड़े सिलने का हुनर सिखाया था.

उसी दिन से सायरा ने आसपास के इलाके में खोज शुरू दी. कोई ऐसा दुकानदार या शोरूम वाला, जो उसे ऐसा कोई काम दे सके.

थोड़ीबहुत पूछताछ और गूगल की मदद के बाद सायरा एक ऐसे एजेंट को ढूंढ़ने में कामयाब हो गई, जो उसे बच्चों के कपड़े सिलने का काम देने पर राजी हो गया.

सायरा ने कपड़े लिए और अपने घर के एक छोटे कमरे में सिलाई मशीन रख ली और कपड़े सिलने का काम शुरू कर दिया.

इस कमरे में हमेशा ताला पड़ा रहता, क्योंकि सायरा नहीं चाहती थी कि बासित को उस के कपड़े सिलने के काम के बारे मे पता चले.

बासित को कभी पसंद नहीं आता कि पैसों की कोई कमी न होने के बावजूद सायरा कपड़े सिलने जैसा काम करे, इसलिए बासित के घर से जाने के बाद ही सायरा घर से बाहर जाती और और्डर लेकर वापस आ जाती. आनेजाने में सायरा को तकरीबन एक घंटे का समय लग जाता.

मनचला चमन, जो लगातार इस फिराक में था कि कैसे सायरा को हासिल किया जाए, उस ने अपने गुरगे बासित के घर के आसपास फैला रखे थे, जो सायरा के हर बार बाहर जाने पर नजर रखते थे.

चमन को अब अच्छा मौका मिल गया था. उस को यह पता चल गया था कि बासित के जाने के बाद सायरा कहीं जाती है. बस, फिर क्या था. उस ने मौका देख कर बासित के कान में फूंक दिया कि बासित की खूबसूरत बीवी का किसी गैर मर्द के साथ चक्कर चल रहा है और बासित की गैरहाजिरी में वह उस लड़के के साथ मजे करने जाती है.

‘‘यह क्या बकवास कर रहे हो चमन… होश में तो हो तुम…’’ बासित के भरोसे को बहुत गहरा झटका लग गया था.

शायद बासित गुस्से से मार ही बैठता चमन को, पर तुरंत ही चमन ने बासित से कहा कि उसे भरोसा नहीं है, तो आज शाम को 4 बजे अपने घर जा कर खुद देख ले.

बासित के लिए अपने पर काबू रख पाना मुश्किल हो रहा था, पर उस ने दिमाग को ठंडा रखते हुए हुए 4 बजने का इंतजार किया और 4 बजे अपने घर गया.

बासित यह देख कर चौंक गया था कि घर में सिर्फ उस का एक नौकर और नौकरानी ही हैं. पूछने पर पता चला कि सायरा कहीं बाहर गई है. बासित ने गुस्से में आ कर सायरा को फोन लगाया पर फोन नहीं उठा.

बासित का शक पक्का हो रहा था कि उस की बड़ी उम्र के चलते ही सायरा किसी गैर मर्द के प्यार में पड़ कर मजे कर रही है.

तकरीबन एक घंटे के इंतजार के बाद सायरा वापस आई, तो बासित को दरवाजे पर खड़ा देख कर ठिठक गई. बासित ने उसे घर के बाहर ही भलाबुरा कहना शुरू कर दिया. वह कुछ न कह पाई, चुपचाप अंदर आ गई.

2-3 दिन गुजर जाने के बाद भी बासित नौर्मल नहीं हुआ तो सायरा ने उसे धीमी आवाज में सम झाने की कोशिश भी की, पर बासित नहीं समझा.

बासित ने सायरा की बात तक नहीं सुनी, क्योंकि उस के दिमाग में शक की चिनगारी सुलग रही थी और इस चिनगारी को हवा देने का काम चमन लगातार कर रहा था.

चमन बासित के कान लगातार भरता रहता और बासित से कहता कि खूबसूरत औरतें नई उम्र के लड़कों को ज्यादा पसंद करती हैं. उस ने बासित के मन में अपनी बातों से सायरा के लिए इतनी नफरत पैदा कर दी कि एक दिन किसी बात पर बासित का मूड उखड़ गया और गुस्से में आ कर बासित ने सायरा के चालचलन पर सवाल उठाते हुए तलाक दे ही दिया.

गरीब घर से ताल्लुक रखने वाली सीधीसादी सायरा कोर्टकचहरी के चक्कर नहीं लगाना जानती थी. उस ने बासित को लाख सम झाने की कोशिश की, पर उस ने एक न सुनी.

हार कर बेचारी सायरा ने बासित के द्वारा तलाक दिए जाने को अपनी तकदीर मान लिया और जब शहर में अकेले जिंदगी काटना उस के लिए मुश्किल हो गया तो न चाहते हुए भी वह अपने मायके लौट आई.

चमन अपनी योजना के पहले हिस्से में तो पूरी तरह कामयाब हो चुका था यानी उस के द्वारा बासित के मन में इतनी नफरत भर दी गई थी कि आखिरकार बासित ने सायरा को तलाक दे ही दिया.

तलाक के बाद मायके में रहना किसी भी लड़की को अच्छा नहीं लगता और फिर अभी तो सायरा की 3 बहनों का निकाह भी होना बाकी था.

ऐसे में सायरा का घर आ कर बैठना किसी को नहीं सुहा रहा था. महल्ले वाले अलग बातें बना रहे थे और ये सब बातें सायरा को और भी दुखी कर रही थीं.

सायरा और बासित के तलाक के तकरीबन 7 महीने बाद चमन की योजना का दूसरा चरण शुरू हुआ.

चमन ने सायरा के अब्बू रहमत से मुलाकात की और सायरा से शादी करने की बात कही.

रहमत बहुत खुश हुए और उन्होंने इस बारे में घर के लोगों और सायरा से बात की. सभी ने सायरा को दोबारा निकाह कर लेने को कहा, पर सायरा शादी नहीं करना चाहती थी, लेकिन उस को यह भी लगा कि अब्बू के सीने पर अभी और बेटियों का बो झ है, ऐसे में एक तलाकशुदा लड़की का घर में रहना ठीक नहीं.

बारबार दोबारा शादी के लिए जोर दिए जाने के सवाल पर सायरा ने चमन से शादी के लिए हां कर दी और एक सादे समारोह में कुछ लोगों के बीच सायरा और चमन का निकाह करा दिया गया.

चमन इतनी खूबसूरत बीवी पा कर बहुत खुश था. उस के सारे ख्वाब मानो पूरे हो गए थे. वह लखनऊ से
150 किलोमीटर दूर अपने गांव मीठापुर में आ कर रहने लगा था.

चमन ने यहां अपना धंधा भी जमा लिया था और पुराने यारदोस्त भी उस से मिलनेज़ुलने लगे थे.

समय बीतने के साथ सायरा ने महसूस किया कि चमन किसी तरह का नशा करता है और प्यारमुहब्बत के पलों में अकसर ही वहशीपन की हरकतें करने लगता था.

चमन पोर्न मूवी देखने का शौकीन था. वह टीवी पर ब्लू फिल्म चला देता और सायरा को जबरदस्ती देखने पर मजबूर करता. और तो और कई बार चमन ने ब्लू फिल्म की हीरोइन जैसी हरकतें करने के लिए सायरा से कहा, पर सायरा ने ऐसा गंदा काम करने से मना किया तो चमन ने उस के साथ मारपीट की.

2 दिन के बाद फिर से चमन ने सायरा से पोर्नस्टार की तरह ही सैक्स करने को कहा और मजबूर सायरा ने ठीक वैसे ही करने की कोशिश भी की, पर वह कर न सकी. सायरा को उलटी आ गई थी.

चमन को सायरा से कोई प्यारमुहब्बत तो थी नहीं, बल्कि वह तो उस के हुस्न पर फिदा हो गया था और अब जब वह उस का शौहर था, तो सायरा के जिस्म पर अपना पूरा हक समझता था.

यहां तक कि जब सायरा के बच्चा होने वाला था और वह पूरे दिनों से थी, तब भी चमन सैक्स करना नहीं भूलता था.

समय आने पर सायरा ने एक खूबसूरत सी लड़की को जन्म दिया. लड़की जनने पर चमन के ताने और भी बढ़ गए, पर सायरा यह सोच कर चुप रही कि आज नहीं तो कल उस के शौहर को अक्ल आ ही जाएगी.

पर एक साल गुजरने के बाद भी चमन ने सायरा से जिस्मानी ताल्लुक तो खूब रखे, पर उस के मन की बातों को कभी भी इज्जत नहीं दे सका था.

एक दिन शाम को सायरा ने चमन को किसी लड़की से वीडियो काल करते हुए देख लिया. वह लड़की बिना कपड़ों के थी.

‘‘क्या मेरा शरीर तुम्हें खुश नहीं कर पाता, जो किसी बाहरी लड़की के साथ यह हरकत कर रहे हो,’’ कहते
हुए सायरा ने चमन के हाथ से मोबाइल छीन लिया.

सायरा के द्वारा मोबाइल छीनने की हरकत से चमन गुस्से में भर गया और उस ने सायरा के पीठ पर एक जोरदार लात मारी. बेचारी सायरा दर्द से दोहरी हो कर गिर गई, पर चमन का मन नहीं पसीजा.

उस दिन तो चमन ने सारी हदें पार कर दीं. उस ने सायरा के साथ जबरदस्ती करना चाहा, जबकि सायरा इस बात के लिए राजी न थी.

सायरा गिड़गिड़ाने लगी, ‘‘मैं तुम्हारी बीवी हूं, कोई रखैल नहीं,’’ पर सायरा की इस बात का चमन पर कोई असर नहीं हुआ और उस ने सायरा को अपनी मजबूत टांगों के नीचे दबा कर मनमानी कर ही ली.

सायरा रोती रही पर चमन पर कोई असर नहीं हुआ और थोड़ी देर के बाद वह बेसुध हो कर सो गया.

चमन एक वहशी जानवर था, जिस ने बासित के मन में सायरा के लिए जहर भर कर उस की गृहस्थी को तोड़ दिया और अब सायरा से मजे करना चाहता था.

सायरा अभी तक तो सहन कर रही थी, पर अब उस का भरोसा शादी और मर्द की जाति से पूरी तरह उठ
चुका था.

सायरा की जिंदगी में पहले बासित आया, जिस ने बिना सायरा की बात सुने उसे तलाक दे दिया और दूसरा
मर्द चमन आया, जो सिर्फ उसे अपनी हवस मिटाने के लिए इस्तेमाल करना चाहता था.

सायरा ने अपनी बच्ची को साथ लिया और अपने साथ हुई मारपीट की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज कराई.

सायरा इतने पर ही नहीं रुकी, बल्कि ‘महिला अबला नहीं सबला’ नामक एनजीओ से गुहार लगाई कि उसे चमन नाम के जानवर से तलाक दिलाया जाए और उस की बच्ची के खर्चे के लिए हर्जाना भी दिलवाया जाए. चमन ने उस का जीना हराम कर रखा है.

सायरा के बदन पर चोटों के निशान और पड़ोसियों की गवाही और दूसरे सुबूत जब मिल गए और पुलिस चमन को गिरफ्तार करने गई, तो चमन के होश ठिकाने आ गए. वह सायरा से माफी मांगने लगा, पर सायरा टस से मस नहीं हुई.

चमन सलाखों के पीछे था और अब सायरा की जिंदगी में शौहर नाम की चीज के लिए कोई जगह नहीं थी. अब वह अपनी बच्ची को अकेले ही पालेगी और उसे सिखाएगी कि औरत को किसी भी मर्द का का जुल्म नहीं सहन करना चाहिए.

अपनी बेटी का माथा चूमते हुए सायरा बुदबुदा उठी, ‘‘मैं तेरी अम्मी भी, अब्बू भी मैं हूं तेरा.’’

यह कहते हुए सायरा के चेहरे पर एक अलग चमक थी. Best Hindi Story

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