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बहन की ईदी : भाग 2

एकदूसरे के घर आतेजाते तसलीम और तौसीफ एकदूसरे को चाहने लगे. तसलीम खूबसूरत थी, तो तौसीफ भी कम सुंदर न था. वह कमाता भी था. इसलिए तसलीम भी तौसीफ को पसंद करने लगी थी.

घर आतेजाते तसलीम भी मुसकराते हुए तिरछी निगाहों से तौसीफ अहमद को निहारने लगी थी. एक अजीब सा आकर्षण दोनों को एकदूसरे की ओर खींचने लगा. लेकिन नजरें बेईमान थीं. वे एकदूसरे को ढूंढती थीं, निहारती भी थीं. लेकिन पकड़े जाने पर अनजान बनने का नाटक करती थीं.

धीरेधीरे स्थिति यह आ गई कि बिना एकदूजे को देखे चैन नहीं मिलता था. फिर भी व्यवहार ऐसा करते थे, जैसे उन्हें एकदूसरे से कोई मतलब नहीं.

छिपछिप कर देखने में ही दोनों एकदूसरे को हद से ज्यादा चाहने लगे. साथ ही बेहतर भविष्य बनाने के सपने भी संजोने लगे. मगर अपनेअपने दिल की बात कहने की हिम्मत दोनो में नहीं थी. तसलीम जहां नारी सुलभ लज्जा के कारण खामोश थी, तो वहीं तौसीफ अहमद यह सोच कर अपने प्यार का इजहार नहीं कर पा रहा था कि कहीं दिल की बात कहने पर तसलीम नाराज न हो जाए.

गुजरते वक्त के साथ दोनों की मूक मोहब्बत परवान चढ़ती गई. तसलीम तौसीफ को अपने दिल की बात कहने के लिए उतावली थी. नजरों ही नजरों में बात कर लेने से तौसीफ का मन नहीं भरता था. वह चाहता था कि तसलीम से अपने दिल की बात कह कर मोहब्बत का इजहार करे. लेकिन इस के लिए वह हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

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इश्क भला कब तक बेजुबान बना रह सकता था. आखिर तौसीफ के दिल ने उसे मजबूर कर ही दिया. उधर तसलीम का भी यही हाल था. वह सोच रही थी कि तौसीफ जब उस से मोहब्बत करता है तो जुबान पर क्यों नहीं ला पा रहा. कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मुझे पसंद ही न करता हो.

एक रोज तसलीम किसी काम से चाची के घर गई तो वह घर पर नहीं थीं. तौसीफ ही घर में था. उस ने पूछा, ‘‘चाची नहीं दिख रही हैं. बाहर गई हैं क्या?’’

‘‘हां, वे घर का सामान खरीदने हटिया बाजार गई हैं.’’

‘‘ठीक है, मैं शाम को आ जाऊंगी.’’ कहते हुए तसलीम मुड़ी, तभी तौसीफ सामने आ गया, ‘‘तसलीम, कुछ देर ठहरो. मैं तुम से एक बात कहना चाहता हूं.’’ तौसीफ बोला

‘‘कहो, क्या कहना चाहते हो?’’ तसलीम थोड़ा लजातेशरमाते बोली.

‘‘पहले वादा करो कि मेरी बात सुन कर नाराज नहीं होगी.’’ तौसीफ ने आग्रह किया.

‘‘ठीक है, किया वादा, अब बोलो क्या बात है?’’

‘‘तसलीम, मुझे तुम से मोहब्बत हो गई है. तुम्हारे बगैर सब कुछ सूना सा लगता है. क्या तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई जगह है? अगर हो, तो मेरी मोहब्बत कबूल कर लो.’’

‘‘तौसीफ तुम नहीं जानते कि मैं तुम्हारे मुंह से ये अल्फाज सुनने को कितनी बेकरार थी. कितनी देर लगा दी तुम ने अपनी मोहब्बत जाहिर करने में. मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं कि जितना प्यार मैं तुम से करती हूं, तुम शायद उस का आधा भी नहीं करते होगे. आई लव यू तौसीफ, आई लव यू वेरी मच.’’

इस तरह दोनों के बीच इजहारे मोहब्बत हो गया. इस के बाद तो जैसे उन की दुनिया ही बदल गई. दोनों एक साथ हाटबाजार जाने लगे, रमणीक स्थलों पर साथसाथ घूमने लगे. तौसीफ अहमद, तसलीम पर दिल खोल कर पैसा खर्च करने लगा.

वह जो भी डिमांड करती, तौसीफ उसे हंसीखुशी से पूरा करता. बातचीत करने के लिए उस ने उसे महंगा मोबाइल फोन भी खरीद कर दे दिया था. हालांकि पहले से उस के पास मोबाइल था.

एक दिन दोपहर बाद तौसीफ तसलीम के घर पहुंचा तो वह घर पर अकेली थी. अब्बू और भाई लोग दुकान पर थे. अम्मी घर का सामान खरीदने बाजार गई थी. अच्छा मौका देख तौसीफ ने तसलीम को अपनी बांहों में बांध कर उस की उन्मादी आंखों में झांका, तसलीम भी मना नहीं कर पाई.

तसलीम की मौन स्वीकृति मिलते ही तौसीफ बेकाबू हो गया. तसलीम भी नाजुक रिश्तों और सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रख कर उस की बांहों में झूल गई. तसलीम ने कोई विरोध नहीं किया तो तौसीफ आगे ही बढ़ता चला गया. फिर दोनों अलग हुए तो उन के चेहरे पर पूर्ण संतुष्टि के भाव थे.

दोनों एक बार पाप के कुंए में कूदे, तो फिर उन का उस से बाहर निकलने का मन नहीं हुआ.

गलत काम कितना भी छिपा कर किया जाए, एक न एक दिन उजागर हो ही जाता है. धीरेधीरे तौसीफ और तसलीम के अवैध संबंधों को ले कर पासपड़ोस में तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. जब इस बात की भनक तसलीम के भाई मोहम्मद जफर को लगी तो उस ने बहन को फटकार लगाई, साथ ही तौसीफ के साथ झगड़ा भी किया.

जफर ने बहन के बहकते कदमों की शिकायत अपने मातापिता से भी की. इस पर हाफिज मोहम्मद रईस तथा उस की बेगम वसीम बानो ने तसलीम को अपनी इज्जत का वास्ता दे कर समझाबुझा कर सही रास्ते पर लाने की बहुत कोशिश की, पर तसलीम के बहके कदम नहीं थमे.

घर वालों की नसीहतों का तसलीम पर कोई असर नहीं हुआ. वह तौसीफ से अपने संबंध उसी तरह बनाए रही. अलबत्ता पोल खुल जाने के डर से वे दोनों कुछ सावधान जरूर रहने लगे थे. उन दोनों को सब से ज्यादा डर मोहम्मद जफर से रहता था. वही दोनों की ताकझांक में लगा रहता था.

जिस दिन उसे पता चल जाता कि तौसीफ घर आया था, उस रोज वह तसलीम को खरीखोटी सुनाता तथा तौसीफ के साथ भी झगड़ा करता. उस ने उन दोनों को चेतावनी दे रखी थी कि जिस दिन वह दोनों को रंगेहाथ पकड़ लेगा उस दिन अनर्थ हो जाएगा.

मोहम्मद जफर की इस धमकी से तसलीम अपने भाई को अपने प्यार का रोड़ा समझने लगी थी, उस से मन ही मन नफरत करने लगी थी. तौसीफ अहमद भी मोहम्मद जफर को अपना दुश्मन समझने लगा था. वह भी अंदर ही अंदर उस से नफरत करने लगा था. जफर के कारण दोनों का मिलन नहीं हो पाता था. अत: दोनों के दिलों में नफरत की आग तीव्र होती गई.

मार्च 2020 में कोरोना महामारी का प्रकोप बढ़ा तो देश मे तालाबंदी हो गई. कानपुर शहर भी लौकडाउन हो गया. शहर का मुसलिम बाहुल्य क्षेत्र कुली बाजार हाट स्पौट घोषित कर दिया गया.

पुलिस ने गलियों को सील कर दिया, जिस से लोगों को घरों में कैद हो कर रहना पड़ा. इस का असर तसलीम और तौसीफ पर भी पड़ा. उन का मिलन पूरी तरह बंद हो गया. मिलन न होने से दोनों बेचैन रहने लगे. हालांकि मोबाइल फोन पर बतिया कर दोनों अपने दिल की लगी बुझा लेते थे.

25 मई, 2020 को ईद का त्यौहार था. प्रशासन ने सशर्त छूट दी थी. ईद का त्यौहार धूमधाम से तो नहीं मनाया जा रहा था, लेकिन घरों में लोग आजा रहे थे. तौसीफ भी ईद मिलन के बहाने तसलीम के घर पहुंचा. उस वक्त तसलीम घर में अकेली थी. उस के दोनों भाई पतंग उड़ाने चले गए थे. जबकि अम्मीअब्बू पड़ोस में ईद मिलन को गए थे.

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लगभग 2 महीने बाद आमनासामना हुआ तो दोनों एकदूसरे से लिपट गए. दोनों की आंखों में प्यार का सागर उमड़ पड़ा. इसी बीच तौसीफ की शारीरिक प्यास जाग उठी. उस ने सूना घर देख कर तसलीम से प्रणय निवेदन किया तो लजातेशरमाते तसलीम मान गई. इस के बाद दोनों बाथरूम जा पहुंचे और शारीरिक प्यास बुझाने लगे. हड़बड़ाहट में वे घर का मुख्य दरवाजा बंद करना भूल गए थे.

तसलीम और तौसीफ अभी बाथरूम में शारीरिक प्यास बुझा ही रहे थे कि तसलीम का भाई मोहम्मद जफर आ गया. उस ने दोनों को बाथरूम में आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. यह सब उस के लिए नाकाबिले बरदाश्त था. उस का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. वह गालीगलौज करते हुए तौसीफ से भिड़ गया.

तसलीम और तौसीफ को लगा कि मोहम्मद जफर आज दोनों की पोल खोल देगा और झगड़ा भी करेगा. अत: दोनों ने एकदूसरे को इशारा किया और फिर तसलीम बकरा काटने वाली छुरी ले आई. उस ने छुरी तौसीफ को थमाई और बोली, ‘‘तौसीफ, आज इसे हलाल कर ही दो. जिंदा बच गया तो पोल खोल देगा और दोनों को बदनाम कर देगा.’’

बहन का यह रूप देख कर मोहम्मद जफर घबरा गया और जान बचा कर दरवाजे की ओर भागा. तभी सामने से तौसीफ का छोटा भाई सैफ आ गया. उस ने भाई के इशारे पर उसे पकड़ लिया. दोनों भाई उसे पकड़ कर बाथरूम ले आए और फर्श पर पटक दिया. सैफ ने पैर दबोचे और तसलीम ने उस के हाथ पकड़े. इस के बाद तौसीफ अहमद ने जफर की छाती पर सवार हो कर चाकू से उस का गला रेत दिया. जफर कुछ देर तड़प कर ठंडा हो गया.

हत्या करने के बाद तौसीफ व उस का भाई सैफ घर से भाग पाते, उस के पहले ही हाफिज मोहम्मद रईस व उन की पत्नी वसीम बानो आ गई. घर के अंदर बाथरूम में जवान बेटे की खून से रंगी लाश देख कर दोनों अवाक रह गए. वसीम बानो ने बेटी से पूछताछ की तो उस ने साफसाफ बता दिया कि जफर ने उसे तौसीफ के साथ रंगेहाथों पकड़ लिया था, हम ने उसे मार डाला.

यह सुनते ही दोनों ने माथा पीट लिया. वे सोचने लगे बेटा तो मर ही गया है. अब पुलिस से सच्चाई बयां की तो परिवार के 2 बेटों के साथ बेटी भी जेल चली जाएगी.

उन लोगों ने मोहम्मद जफर की हत्या को आत्महत्या का रूप देने के लिए जफर के शव को सबमर्सिबल पंप चला कर लाश को तब तक धोया जब तक गले के घाव से रिस रहा खून बंद नहीं हो गया. उस के बाद शव को दूसरे बाथरूम में रख दिया. सारे सबूतों को मिटाने के बाद हाफिज मोहम्मद रईस ने थाना अनवरगंज पुलिस को अवसाद के चलते बेटे जफर द्वारा आत्महत्या की सूचना दी.

पुलिस ने घर वालों की बात पर विश्वास कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पुलिस को हत्या का शक हुआ. दोबारा जांच शुरू की तो हत्या का परदाफाश हो गया और कातिल पकड़े गए.

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30 मई, 2020 को थाना अनवरगंज पुलिस ने अभियुक्त तौसीफ अहमद, सैफ, हाफिज मोहम्मद रईस, वसीम बानो तथा तसलीम को कानपुर कोर्ट में पेश किया. जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

एक मुलाकात ऐसी भी: भाग 1

लेखिका- रेनू ‘अंशुल’

मौल में पहुंचे ही थे कि मिशिका को उस के फें्रड्स सामने दिख गए और वह मुझे तेजी से बायबाय कह कर उन के साथ हो ली. वह नोएडा के एमिटी कालिज से इंजीनियरिंग कर रही है. उस के सभी मित्रों को अच्छी कैंपस प्लेसमेंट मिल गई थी सो इसी खुशी में उस के ग्रुप के सभी साथी यहां पिज्जा हट में खुशियां मना रहे थे.

नोएडा का यह मशहूर जीआईपी यानी ‘गे्रट इंडिया प्लेस’ मौल युवाओं का पसंदीदा स्थान है. हम गाजियाबाद में रहते हैं. मिशिका अकेले ही रोज गाजियाबाद से कालिज आती है मगर इस तरह पार्टी आदि में जाना हो तो मैं या उस के पापा साथ आते हैं. यों अकेले तैयार हो कर बेटी को घूमनेफिरने जाने देने की हिम्मत नहीं होती. एक तो उस के पापा का जिला जज होना, पता नहीं कितने दुश्मन, कितने दोस्त, दूसरे आएदिन होने वाले हादसे, मैं तो डरी सी ही रहती हूं. क्या करूं? आखिर मां हूं न…

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बच्चे अपने मातापिता की भावनाओं को कहां समझ पाते हैं. उन्हें तो यही लगता है कि हम उन की आजादी पर रोक लगा रहे हैं. कई बार मिशिका भी बड़ी हाइपर हुई है इस बात को ले कर कि ममा, आप ने तो मुझे अभी तक बिलकुल बच्चा बना कर रखा है. अब मैं बड़ी हो गई हूं. अपना ध्यान रख सकती हूं. अब उस नादान को क्या समझाएं कि मातापिता के लिए तो बच्चे हमेशा बच्चे ही रहते हैं. चाहे वे कितने भी बड़े क्यों न हो जाएं.

हां, मेरी तरह शायद जज साहब से वह इतना कुछ नहीं कह पाती. उन की लाडली, सिर चढ़ी जो है. जो बात मनवानी होती है, मनवा ही लेती है. बात तो शायद मैं भी उस की मान ही लेती हूं लेकिन उसे बहुत कुछ समझाबुझा कर, जिस से वह मुझ से खीझ सी जाती है.

अब क्या करूं, जब मुझे इस तरह के आधुनिक तौरतरीके पसंद नहीं आते तो. मैं तो हर बार इसे ही तरजीह देती हूं कि वह अपने पापा के संग ही आए. दोनों बापबेटी के शौकमिजाज एक से हैं. कितनी ही देर मौल में घुमवा लो, दोनों में से कोई पहल नहीं करता घर चलने की. मैं भी कभीकभी बस फंस ही जाती हूं. जैसे आज वह नहीं वक्त निकाल पाए. कोर्ट में कुछ जरूरी काम था.

मैं थोड़ी देर तक यों ही एक दुकान से दूसरी दुकान में टहलती रही. खरीदारी तो वैसे भी मुझे कुछ यहां करनी नहीं होती है. वह तो मैं हमेशा अपने शहर की कुछ चुनिंदा दुकानों से ही करती हूं. सरकारी गाड़ी में अर्दलियों और सिपाहियों के संग रौब से जाओ और बस, रौब से वापस आ जाओ. सामान में कोई कमी हो तो चाहे महीने भर बाद दुकान पर पटक आओ. यहां मौल में, इतनी भीड़ में किस को किस की परवा है, कौन पहचान रहा है कि जज की बीवी शौपिंग कर रही है या कोई और. शायद इतने सालों से इसी माहौल की आदी हो गई हूं और कुछ अच्छा ही नहीं लगता.

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खैर समय तो गुजारना ही था. यों ही बेमतलब घूमते रहने से थकान सी भी होने लगी थी. घड़ी पर नजर डाली तो बस, आधा घंटा ही बीता था. सोचतेविचरते मैं मैकडोनाल्ड की तरफ आ गई. कार्य दिवस होने के बावजूद वहां इतनी भीड़ थी कि बस, लगा कालिज बंक कर के सब बच्चे यहीं आ गए हों. माहौल को देख कर मिशिका का खयाल फिर दिलोदिमाग पर छा गया कि पता नहीं, यह क्या मौलवौल में पार्टी करने का प्रचलन हो गया है. अरे, तसल्ली से घर में मित्रों को बुलाओ, खूब खिलाओपिलाओ, मौजमस्ती करो, कोई मनाही थोड़े ही है.

थोड़ी देर में ही सही, मेरा भी कौफी का नंबर आ ही गया था. कौफी और फ्रेंचफ्राइज ले कर भीड़ से बचतेबचाते मैं एक खाली सीट पर जा कर बैठ गई और अपने चारों तरफ देखती कौफी का सिप भरती जा रही थी.

तभी मेरे पास एक बड़ी स्मार्ट सी महिला आईं और खाली पड़ी सीट की ओर इशारा कर बोलीं, ‘‘क्या मैं यहां बैठ सकती हूं?’’

‘‘हांहां. क्यों नहीं…आप चाहें तो यहां बैठ सकती हैं,’’ इतना कहने के साथ ही मेरी इधरउधर की सोच पर वर्तमान ने बे्रक लगा दिया.

मैं उस संभ्रांत महिला को कौफी पीतेपीते देखती रही. उस ने कांजीवरम की भारी सी साड़ी पहन रखी थी. उसी से मेल खाता खूबसूरत सा कोई नैकलेस डाल रखा था. पर्स भी उस के हाथ में बहुत सुंदर सा था. कुल मिला कर वह हाइसोसाइटी की दिख रही थी.

मुझ से रहा नहीं गया. अटपटा सा लग रहा था कि उस के सामने मैं फे्रंचफ्राइज का मजा अकेले ही ले रही थी और वह सिर्फ कौफी ले कर बैठी थी. संकोच छोड़ मैं ने अपने चिप्स उस की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अकेले ही शौपिंग हो रही है…’’

अपने होंठों पर हलकी सी हंसी ला कर वह बोलीं, ‘‘शौपिंग नहीं, आज तो अपने बेटे के संग आई हूं. दरअसल, आज बच्चों की गेटटूगेदर है. मेरे पति रिटायर्ड आई.ए.एस. हैं. यहीं सेक्टर 30 में हमारा छोटा सा घर है. पति तो अपनी ताशमंडली में व्यस्त रहते हैं और मैं बस, कभी क्लब, कभी किटी और कभी समाज- सेवा…रिटायर होने के बाद कहीं न कहीं तो अपने को व्यस्त रखना ही पड़ता है न.’’

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‘‘आज मेरा छोटा बेटा समर्थ बोला कि ममा, मेरे संग मौल चलिए, आप को अच्छा लगेगा. सो आज यहां का कार्यक्रम बना लिया,’’ उस ने दोचार फ्रेंचफ्राइज बिना किसी झिझक के उठाते हुए बताया.

हम समझ गए थे कि हमारे बच्चे एक ही ग्रुप में हैं. थोड़ी देर में ही हम सहज हो क र बातें करने लगे. कुछ अपने परिवार के बारे में वह बता रही थीं और कुछ मैं. बीचबीच में हम खानेपीने की चीजें भी मंगाते जा रहे थे. अब किसी के संग रहने से अच्छा लगने लगा था. बातोंबातों में ही पता चला कि उन के 2 बेटे थे. छोटा समर्थ, मिशिका के संग पढ़ रहा था और बड़ा पार्थ इंजीनियरिंग के बाद पिछले साल सिविल सर्विस में सिलेक्ट हो गया था. इस समय लाल बहादुर शास्त्री एकेडमी, मसूरी में उस की टे्रनिंग चल रही थी.

मैं ने सोचा कि बापबेटा दोनों आईएएस. शुरू में ही मुझे लग गया था कि मेरी तरह यह महिला कोई ऊंची हस्ती है.

उन का बेटा आईएएस है और जल्दी ही वह उस की शादी करने की इच्छुक हैं, यह जान कर तो मेरी रुचि उन में और भी बढ़ गई. मैं तो खुद मिशिका के लिए अच्छा वर ढूंढ़ने की कोशिश में थी और एक आईएएस लड़के को अपना दामाद बनाना तो जैसे मेरे ख्वाबों में ही था.

पार्थ के बारे में जान कर मुझे सबकुछ अच्छा लगा था, लेकिन एक अड़चन थी कि वे कायस्थ थे, हमारी तरह ब्राह्मण नहीं थे जो मेरे लिए तो जमीं और आसमान को मिलाने वाली बात थी. अपनी इकलौती बेटी की गैर जाति में शादी करना मेरी सोच में कहीं दूरदूर तक नहीं था. एक तरह से तो मैं इस तरह के विवाह के बिलकुल खिलाफ थी.

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

एक मुलाकात ऐसी भी: भाग 3

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लेखिका- रेनू ‘अंशुल’

देखते ही देखते हफ्ता निकल गया. पार्टी का दिन भी आ गया. लौन में ही पार्टी का इंतजाम किया था. पहली बार मिशिका ने पार्टी का जिम्मा अपने सिर पर लिया था. बोली, ‘‘ममा, अभी परीक्षा की कोई टेंशन नहीं है, इस बार मैं देखूंगी सारा इंतजाम.’’

सुन कर पहली बार एहसास हुआ कि बेटी बड़ी हो गई है. पार्थ का खयाल एक बार फिर दिमाग में आ गया. मगर मेरी मजबूरी थी कि मैं चाह कर भी यह रिश्ता नहीं कर सकती थी. मुझे इस समय अपनी भतीजी के गुस्से में कहे शब्द याद आ रहे थे.

घर में मेहमान आने शुरू हो गए थे. मैं ने अपनी सोच को दरकिनार करने की कोशिश की और मेहमानों की आवभगत में लग गई. जज साहब के कुछ करीबी जल्दी ही आ गए थे. अत: वह उन्हें पीने व पिलाने में व्यस्त हो गए. मैं और मिशिका मेहमानों के स्वागत में लगे थे. बेटी पर बारबार नजरें जा कर ठहर जातीं क्योंकि आज वाकई वह बहुत सुंदर लग रही थी. अचानक दिल में खयाल आया कि अगर आज की पार्टी में पार्थ उसे देख ले और पसंद कर ले या उस की मम्मी ही मिशिका को अपने बेटे के लिए मांग लें तो…

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अचानक ही वह परिवार आंखों के सामने आ गया. श्रीमती सक्सेना अपने पति व दोनों बेटों के साथ चेहरे पर मुसकान लिए आती दिखाई दीं. समर्थ को तो उस दिन मौल में ही देख लिया था पर पार्थ तो उस से भी चार कदम आगे था. यह लड़का इतना हैंडसम होगा यह तो मैं ने सोचा भी नहीं था. उस पर आईएएस भी. मुझे फिर लगा कि मेरी चाहत मेरी सोच पर हावी हो गई है. फिर से मेरी चाहत जोर पकड़ने लगी कि यह लड़का तो बस, मेरा दामाद हो जाए. तभी नजदीक आ कर दोनों भाइयों ने मेरे और जज साहब के पैर छुए. मन कहीं अंदर तक उन्हें अपना मान गया.

सक्सेना दंपती तो हम बड़ों के ग्रुप में शामिल हो गए और दोनों भाई, मिशिका के फ्रेंड्स ग्रुप में.

पार्टी खूब मजेदार चली. खाना खाने के बाद सभी लोग एकएक कर जाने लगे थे. मगर सक्सेना परिवार अभी जमा हुआ था. मुझे भी उन के जाने की कहां जल्दी थी. मिशिका पार्थ के संग खड़ी कितनी अच्छी लग रही थी. मन में सचमुच ही बहुत मलाल था कि वे कायस्थ हैं.

अब तक करीब सभी मेहमान जा चुके थे. रात के 11 बज चुके थे. 30 अक्तूबर की रात, शरीर में ठंडीठंडी हवा की सिहरन सी हो उठी थी कि मिसेज सक्सेना ने, ‘‘एक कप कौफी हो जाए फिर हम भी चलेंगे,’’ कह कर अभी थोड़ा और रुकने का संकेत दिया.

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‘‘अरे, क्यों नहीं, क्यों नहीं,’’ कहते हुए वेटर को 4 कप कौफी लाने का आर्डर दे दिया.

मिशिका दोनों भाइयों को अभीअभी अंदर ले गई थी. शायद अपना शानदार कमरा दिखा रही हो. लड़कियों को अपना कमरा दिखाने का बहुत क्रेज होता है.

कौफी आ गई थी. हम चारों हंसी मजाक के साथ कौफी का मजा ले रहे थे कि वह हो गया, जो मेरी सोच में तो निरंतर चल रहा था मगर हकीकत में उस का कोई अनुमान नहीं था.

सक्सेना साहब ने विनम्रता से अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘अगर आप लोग हमें दे सकें तो अपनी मिशिका को हमारे पार्थ के लिए दे दीजिए.’’ उन के कहने के साथ ही मिसेज सक्सेना ने भी अपने दोनों हाथ जोड़ दिए.

मैं तो स्तब्ध, भौचक्की, किंकर्तव्य- विमूढ़ सी रह गई. जज साहब ने मेरी तरफ देखा. दोचार पल यों ही खामोशी में निकल गए फिर जज साहब ने कहा, ‘‘हमें यह रिश्ता मंजूर है. पार्थ हमें भी बहुत पसंद आया है और फिर आप से अच्छा और कौन मिलेगा हमें.’’

जज साहब की हां सुन कर मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इस स्थिति में अब मैं क्या करूं? न हां करने की स्थिति में थी और न ही ना करने की. फिर कुछ सोचती सी बोली, ‘‘अरे, मिशिका से भी तो पूछना होगा न…उस की भी राय जानना जरूरी है. आप को तो पता ही है कि आजकल के बच्चे…’’

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मुझे लगा कि चलो, इस बहाने कुछ तो वक्त मिलेगा सोचने का. फिर कुछ सोच कर मना कर देंगे. सही बताऊं तो भैयाभाभी, अंतरा किसी का भी सामना करने की मुझ में हिम्मत नहीं थी.

मेरी इस बात को सुन कर मिसेज सक्सेना के साथ जज साहब और सक्सेना साहब दोनों हंस पड़े. इस के पहले कि मैं कुछ कह पाती, मिसेज सक्सेना अपनी हंसी रोकती हुई बोलीं, ‘‘अच्छा, पहले यह तो बताइए, आप तो राजी हैं न…’’

‘‘मैं…मैं तो…हां, और क्या. मुझे तो बहुत खुशी होगी आप से जुड़ कर,’’ मैं इस के अलावा और क्या कह सकती थी. जब जज साहब ने इस की स्वीकृति दे दी. ‘‘मगर मिशिका…’’ मैं ने फिर इस से बचने की कोशिश की.

‘‘अरे, निशिजी, मुझे तो बस, आप की ही इजाजत चाहिए थी. बाकी सब की इजाजत तो पहले से ही है,’’ इस बार सक्सेना साहब ने जिस अंदाज में कहा, मेरा चौंकना लाजिमी था. असमंजस में पड़ी बोली, ‘‘मतलब?’’

‘‘अरे, निशि, तुम्हारी और मिसेज सक्सेना की मुलाकात मौल में इसीलिए तो कराई थी कि आप दोनों में दोस्ती हो जाए, वरना तो मैं भी जा सकता था उस दिन. मैं ने तो कोर्ट में व्यस्त होने का बहाना किया था. हम लोग काफी दिनों से योजना बना रहे थे कि तुम दोनों को कैसे मिलाया जाए. सो इत्तफाक से मिशिका की गेटटूगेदर निकल आई. हालांकि मौल में मिलवाना मुश्किल था, लेकिन बच्चों ने सब मैनेज कर लिया.’’

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जज साहब बोलते जा रहे थे और मैं आंखें फाड़े उन्हें सुने जा रही थी.

‘‘निशि, जब मौल से लौट कर तुम ने पार्थ के बारे में अपनी चाहत बताई तो मुझे लगा कि हमारा तीर निशाने पर लगा है. प्रकट में मैं ने तुम्हारी बात को तूल नहीं दिया था.

‘‘निशि, तुम्हें याद होगा कि 4 साल पहले मैं जब एक सेमिनार में अमेरिका गया था तो वहां उस में सक्सेना साहब भी मिले थे. भारत से जो खास लोग उस सेमिनार में भेजे गए थे, उन को एक ही होटल में ठहराया गया था और सक्सेना साहब का कमरा मेरे बगल में ही था.’’

दोस्ती होना तो लाजिमी ही था न. देखो, तुम्हारी और मिसेज सक्सेना की दोस्ती तो चंद घंटों में ही हो गई, जबकि हम तो पूरे 15 दिन साथ रहे थे. इसी दौरान एक बार मेरी तबीयत भी बिगड़ गई थी तो सक्सेना साहब ने ही मुझे संभाला था और वे सारी बातें यहां आने पर मैं ने तुम को बताई थीं.

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‘‘हांहां, मुझे सब याद है,’’ मैं कुछ खोईखोई सी बोली.

‘‘उन्हीं दिनों हम दोनों, एकदूसरे के बेहद करीब आ गए थे. दोस्ती के उन्हीं लम्हों में हम ने आपस में एक वचन लिया कि समय आने पर मिशिका और पार्थ की शादी कर देंगे. आज पार्थ आई.ए.एस. हो गया है. मगर दोस्ती में किए गए वादे में कहीं कोई कमी नहीं आई है. सक्सेनाजी के पास तो अब कितने अच्छेअच्छे आफर आ रहे होंगे जबकि यह जानते हैं कि मैं ने तो जिंदगी भर शोहरत और इज्जत के अलावा कुछ नहीं कमाया. मेरे पास अपनी मिशिका को उन्हें सौंपने के अलावा और कुछ देने को नहीं है.’’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

बहन की ईदी : भाग 1

उस दिन मई 2020 की 25 तारीख थी. कानपुर शहर में सादगी से ईद का त्यौहार मनाया जा रहा था. लौकडाउन के कारण बाजार, सड़कों पर ज्यादा चहलपहल तो नहीं थी. लेकिन लोग एकदूसरे के घर जा कर गले मिल रहे थे और ईद की मुबारकबाद दे रहे थे. अनवरगंज थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्षेत्रीय गश्त पर थे. दरअसल उन का थाना क्षेत्र मुसलिम बाहुल्य आबादी वाला तो था ही, संवेदनशील भी था. अधिकारियों के आदेश पर पुलिस चप्पेचप्पे पर नजर गड़ाए हुए थी.

शाम लगभग 3 बजे दिलीप कुमार बिंद क्षेत्रीय गश्त कर थाने वापस आए. अभी वह अपने कक्ष में आ कर बैठे ही थे कि उन के मोबाइल पर काल आई. उन्होंने काल रिसीव करते हुए पूछा, ‘‘मैं थाना अनवरगंज से इंसपेक्टर दिलीप कुमार. आप कौन?’’

‘‘सर, मैं कुली बाजार से मीट कारोबारी हाफिज मोहम्मद रईस बोल रहा हूं. मेरे जवान बेटे मोहम्मद जफर ने आत्महत्या कर ली है. आप जल्दी आ जाइए.’’

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थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद थकान महसूस कर रहे थे, फिर भी सूचना मिलते ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. रवाना होने से पहले उन्होंने यह सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी थी.

हाफिज मोहम्मद रईस कुली बाजार का चर्चित मीट कारोबारी था. थाने में मीट कारोबारियों की लिस्ट में उस का नामपता दर्ज था. इसलिए पुलिस को उस के घर पहुंचने में कोई परेशानी नहीं हुई. उस समय उस के घर भीड़ जुटी थी. भीड़ को हटाते हुए बिंद ने घर के अंदर प्रवेश किया. मोहम्मद जफर की लाश बाथरूम में पड़ी थी. उस के गले में गहरा घाव था, उम्र रही होगी 22 साल.

दिलीप कुमार बिंद अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल तथा सीओ (अनवरगंज) सैफुद्दीन बेग भी घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. साथ ही मृतक के घर वालों से घटना के बारे में पूछताछ की.

मृतक के पिता मोहम्मद रईस ने बताया कि उन का बेटा मोहम्मद जफर पिछले कई महीने से मानसिक रूप से बीमार था. इसी के चलते उस ने आज दोपहर बाद गले को ब्लेड से चीर कर आत्महत्या कर ली. घटना के समय वह अपनी बेगम के साथ ईद मिलन को घर से बाहर गए थे. वापस आए तो जफर की लाश बाथरूम में पड़ी देखी. उस के बाद मैं ने थाने को सूचना दी.

मृतक की मां वसीम बानो ने बताया कि वह अपनी बेटी तसलीम के साथ पड़ोस में ईद मिलन को गई थी. वापस आई तो शौहर से पता चला कि बेटे ने ब्लेड से गला चीर कर आत्महत्या कर ली है. साहब, जफर मानसिक रोगी था. इसी मानसिक अवसाद में उस ने आत्महत्या कर ली. इतना कह वह फूटफूट कर रोने लगी.

वसीम बानो की बेटी तसलीम ने पूछताछ में कई बार बयान बदले. कभी वह कहती कि मां के साथ पड़ोस में गई थी, कभी कहती वह अकेले ही सहेली के घर गई थी. भाई जफर की मौत की जानकारी उसे अम्मीजान से मिली थी. उस ने यह भी कहा कि जफर मानसिक रोगी नहीं था. वह पूरी तरह से स्वस्थ था. उस ने आत्महत्या क्यों की, उसे पता नहीं है.

चूंकि घर के सभी लोग कह रहे थे कि मोहम्मद जफर ने आत्महत्या की है और पासपड़ोस के लोग भी कोई शंका जाहिर नहीं कर रहे थे, इसलिए पुलिस अधिकारियों को लगा कि शायद मोहम्मद जफर ने आत्महत्या ही की है.

हालांकि मृतक के मांबाप, बहन के बयानों में विरोधाभास था और पुलिस अधिकारियों को कुछ संदेह भी हुआ था. फिर भी उन्होंने निरीक्षण के बाद शव को पोस्टमार्टम हाउस भिजवा दिया.

दूसरे रोज शाम 5 बजे थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद को मृतक जफर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. उन्होंने रिपोर्ट पढ़ी तो वह चौंके. रिपोर्ट के अनुसार मोहम्मद जफर की मौत अधिक खून बहने से हुई थी. उस का गला किसी तेज धार वाले औजार से काटा गया था. गले का वैसा घाव ब्लेड से संभव न था. गले के अलावा उस के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं था. न ही उस ने अल्कोहल की डोज ली थी.

थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद ने मृतक जफर की रिपोर्ट से एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल को अवगत कराया. उन्हें पहले ही परिवार के विरोधाभासी बयानों पर शक था. रिपोर्ट देखने के बाद उन्हें भी पक्का यकीन हो गया कि जफर की हत्या परिवार के ही किसी सदस्य ने की है. फिर साक्ष्य मिटा कर हत्या को आत्महत्या का रूप दिया गया है. उन्होंने सीओ (अनवरगंज) सैफुद्दीन बेग की अगुवाई में दिलीप कुमार बिंद को जफर की हत्या का रहस्य सुलझाने का आदेश दिया.

आदेश पाते ही दिलीप कुमार बिंद ने हकीकत का पता लगाने के लिए अपने क्षेत्र के एक खास खबरी को लगाया. एक दिन बाद ही उस ने थानाप्रभारी बिंद को एक चौंकाने वाली जानकारी दी. उस ने बताया कि मोहम्मद जफर न तो मानसिक रोगी था और न ही उसे कोई अन्य रोग था.

जफर की बहन तसलीम तथा पड़ोस में रहने वाले चचेरे भाई तौसीफ अहमद के बीच मोहब्बत पनप रही थी. जफर को दोनों के अवैध संबंधों की जानकारी थी और वह इस का विरोध करता था. इन्हीं नाजायज संबंधों के चलते जफर की हत्या हुई है. हत्या का रहस्य घर वालों के पेट में ही छिपा है. यदि कड़ाई से पूछताछ की जाए तो सारा भेद खुल सकता है.

दिलीप कुमार बिंद ने नाजायज रिश्तों की जानकारी सीओ सैफुद्दीन बेग को दी तो वह बिंद को साथ ले कर दोबारा मोहम्मद रईस के घर जा पहुंचे. उन्होंने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. फोरैंसिक टीम ने अपनी जांच उस बाथरूम से शुरू की, जहां मोहम्मद जफर की लाश पड़ी मिली थी.

टीम प्रभारी प्रवीण कुमार ने बाथरूम का बेंजामिन टेस्ट किया तो वहां खून की एक भी बूंद का प्रमाण नहीं दिखा. इस के बाद टीम ने मकान के दूसरे बाथरूम का बेंजामिन टेस्ट किया तो वहां खून के प्रमाण मिले.

टीम ने दोनों बाथरूम के बीच 2 जगहों पर शक के आधार पर टेस्ट किया तो वहां भी खून के प्रमाण मिले. जाहिर था शव को एक बाथरूम से दूसरे बाथरूम में लाया गया था. टीम प्रभारी प्रवीण ने मृतक के मांबाप, भाईबहन के हाथों का बेंजामिन टेस्ट किया तो खून के प्रमाण मिले.

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फोरैंसिक टीम की जांच से हत्या के पुख्ता सबूत मिले तो सीओ सैफुद्दीन बेग ने मोहम्मद रईस, उस की पत्नी वसीम बानो तथा बेटी तसलीम से अलगअलग सख्ती से पूछताछ की.

पूछताछ में मोहम्मद रईस टूट गया. उस ने बताया कि बच्चों के जेल जाने के डर से उस ने झूठ बोला था कि जफर ने आत्महत्या की है. जफर तो मर ही गया था, सच बोलता तो परिवार के 2 बेटे और बेटी जेल चले जाते.

सच यह है कि मोहम्मद जफर ने अपनी बहन तसलीम को बाथरूम में चचेरे भाई तौसीफ अहमद के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था. भेद खुलने के डर से तसलीम ने तौसीफ व उस के भाई सैफ के साथ मिल कर बकरा काटने वाले चाकू से जफर को गला रेत कर मार डाला था.

मोहम्मद रईस के टूटते ही उस की पत्नी वसीम बानो तथा बेटी तसलीम ने भी अपना जुर्म कबूल कर लिया. चूंकि हत्या में तसलीम का प्रेमी तौसीफ अहमद और उस का भाई सैफ भी शामिल था, अत: पुलिस ने उन दोनों को भी नाटकीय ढंग से पकड़ लिया.

दोनों को थाना अनवरगंज लाया गया. जब उन दोनों का सामना मोहम्मद रईस, वसीम बानो तथा तसलीम से हुआ तो वे समझ गए कि अब सच बताने में ही भलाई है. अत: उन दोनों ने सहज ही जुर्म कबूल कर लिया.

पुलिस अभी तक आलाकत्ल चाकू बरामद नहीं कर पाई थी. अत: थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद ने चाकू के संबंध में पूछताछ की तो तौसीफ ने बताया कि कत्ल करने के बाद चाकू को मकान के सीवर टैंक (मेन होल) में छिपा दिया था.

यह बात पता चलते ही दिलीप कुमार बिंद तौसीफ अहमद को घटनास्थल पर ले गए. वहां उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया. बरामदगी के बाद तौसीफ को वापस थाने लाया गया और चाकू को सीलमोहर कर दिया गया.

चूंकि सभी ने मोहम्मद जफर की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया था और आला कत्ल (चाकू) भी बरामद करा दिया था, इसलिए थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद ने भादंवि की धारा 302/201 के तहत तसलीम, तौसीफ अहमद, सैफ, वसीम बानो तथा हाफिज मोहम्मद रईस के विरुद्व रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा पांचों को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में इश्क में अंधी बहन द्वारा भाई को हलाल करने की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के अनवरगंज थाना क्षेत्र में मुसलिम बाहुल्य आबादी वाला एक मोहल्ला है कुली बाजार. इसी कुली बाजार में बड़ी मसजिद के पास हाफिज मोहम्मद रईस अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी वसीम बानो के अलावा 2 बेटे तथा बेटी तसलीम थी.

मोहम्मद रईस मीट कारोबारी थे. इस कारोबार में उन के दोनों बेटे भी हाथ बंटाते थे. कुली बाजार में उन की चर्चित मीट की दुकान थी. कुली बाजार में ही उन का अपना निजी मकान था. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

वसीम बानो की बेटी तसलीम खूबसूरत थी, तन से ही नहीं मन से भी खूबसूरत. इसलिए उसे हर कोई पसंद करता था. बचपन में जहां वह अपनी चंचलता की वजह से सब को प्यारी लगती थी, वहीं जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही वह अपने व्यवहार से सब की आंखों का तारा बनी हुई थी.

अपने मिलनसार स्वभाव की वजह से वह सब का मन मोह लेती थी. युवा जहां उस की सुंदरता के दीवाने थे, वहीं बड़ेबूढ़े उस के स्वभाव से खुश रहते थे. पढ़नेलिखने में भी वह तेज थी. उस ने जुबली इंटर कालेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर ली थी.

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तसलीम के पड़ोस में तौसीफ अहमद रहता था. रिश्ते में वह उस का चचेरा भाई था. अपने पिता के साथ वह भी मीट का कारोबार करता था. तौसीफ दिखने में स्मार्ट था. रहता भी ठाटबाट से था. तसलीम और तौसीफ रिश्ते में चचेरे भाईबहन थे और हमउम्र थे, सो उन में खूब पटती थी. दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था. दोनों परिवारों के बीच आपसी लगाव था और दुख की घड़ी में एकदूसरे की मदद को भी तत्पर रहते थे. ईद, बकरीद जैसे त्यौहार दोनों परिवार मिलजुल कर मनाते थे.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

एक मुलाकात ऐसी भी: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- एक मुलाकात ऐसी भी: भाग 1

लेखिका- रेनू ‘अंशुल’

मुझे हमेशा से ही यह अनुभव होता था कि इस के विपरीत शादियां कभी सुखद और सफल नहीं होतीं. शुरूशुरू में तो सब ठीकठाक चलता है, पर कुछ समय बाद कहीं तलाक होता है, तो कहीं जबरदस्ती रिश्तों को ढोया जाता है. यहां तक कि अपने परिवारों में होने वाली कई इस तरह की शादियों में मैं ने अपना पूरा विरोध जाहिर किया था.

ऐसा नहीं है कि जातिबिरादरी में शादियां कर के किसी तरह की टेंशन नहीं होती है या इस तरह की शादियां टूटती नहीं हैं, फिर भी काफी हद तक इन झमेलों से बचा जा सकता है और मेरे अनुभवों ने मुझे यही सिखाया है कि जब एक हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं तो यह तो समाज की सोच है जो न कभी एक हुई है और न ही होगी.

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इन सभी बातों में जज साहब और मेरे विचार एक से नहीं हैं तो औरों की क्या कहूं. कई बार उन्होंने अपनी बातों से मुझे भी समझाने की कोशिश की है, मगर मैं कभी इतने बड़े दिल की हो नहीं पाई.

पिछले साल मैं ने अपना यह विरोध अपने भैया पर थोप दिया था. जब उन्होंने बताया कि वह अंतरा यानी मेरी भतीजी की शादी एक ईसाई लड़के से तय कर रहे हैं. दोनों एकदूसरे को जहां बहुत चाहते हैं, वहीं लड़का और उस का परिवार सबकुछ बहुत बढि़या है. हम लोगों को बच्चों की खुशी के अलावा और क्या चाहिए.

तब भैया की बात सुन कर मैं ने बवंडर मचा दिया था. ‘आप ने तो भैया हद ही कर दी. बच्चों की जिदें क्या यों ही आंखें मूंद कर पूरी की जाती हैं? ईसाई लड़के से विवाह करोगे अपनी अंतरा का? चार दिन भी नहीं निभा पाएगी वह इस अलग जाति और धर्म के लड़के के संग… और फिर कर लो जो आप की मर्जी हो, मैं तो इस गलत शादी में आने से रही.’ मेरी बातों के आक्रोश ने भैया को भयभीत कर दिया और उन्होंने यह कह कर उस रिश्ते को टाल दिया कि इकलौती छोटी बहन ही शादी में शरीक नहीं होगी तो दुनिया क्या कहेगी?

उस दिन के बाद से अंतरा न अपने पापा से बात कर रही है और न मुझ से. एक दिन गुस्से में आ कर वह अपनी भड़ास निकाल गई थी, ‘‘बूआ, आप ने मेरा प्यार, मेरी जिंदगी मुझ से छीन ली. हम सब ने हमेशा आप को इतना प्यारसम्मान और स्नेह दिया, उस का यह सिला दिया आप ने. कल को आप को अपनी मिशिका की ऐसे ही किसी लड़के से शादी करनी पड़ी तब मैं देखूंगी कि कैसे आप जाति और धर्म का भेदभाव कर उस का दिल तोड़ पाती हैं.’’

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उस की आंखों में भरे हुए आंसू और अपने लिए नफरत, आज भी मुझे विचलित कर देते हैं. मुझे इस बात का एहसास बाद में हुआ कि वह उस लड़के के प्यार में इतनी दीवानी है कि उस के बिना किसी और से शादी नहीं करेगी. कभीकभी खुद पर भी बहुत गुस्सा आता है कि मैं ने इस कदर क्यों अपनी इच्छा, अपने विचार भैया पर थोपे, फिर सोचती हूं तो लगता है कि आखिर मैं ने गलत ही क्या किया. वह मेरे अपने थे, अगर अपनों को उन की गलती का एहसास करा दिया तो क्या गलत किया? अंतरा मेरी कोई दुश्मन थोड़े ही थी. खुद भैया को भी पता था कि मैं अंतरा से कितना प्यार करती हूं, पर मुझे उस समय जो सही लगा मैं ने वही किया. अब वही बातें मेरे जेहन में आ रही थीं.

मैकडोनाल्ड की उस मुलाकात ने थोड़े ही समय में दोनों मांओं के बीच एक दोस्ती का सा रिश्ता बना दिया था. अपने- अपने मोबाइल नंबर और अतेपते दे कर हम ने विदा ली थी.

रास्ते भर मैं मिशिका से अपनी इस नई बनी दोस्त की बातें करती रही और वह भी अपनी तरहतरह की बातें मुझे बताती रही. उस के दोस्त की मम्मी के संग मैं आज सारे दिन रही और बोर नहीं हुई, इस से मेरी बेटी बहुत संतुष्ट थी. बोली, ‘‘ममा, आज आप बोर नहीं हुईं. नहीं तो पिछली बार की तरह मुझे सारे रास्ते आप के भाषण सुनने पड़ते. चलो, आगे से जब भी ऐसी कोई पार्टी होगी तो मैं आंटी से कहूंगी कि वह भी आप को कंपनी देने आ जाएं. तब तो ठीक रहेगा न मम्मी. मुझे भी टेंशन नहीं रहेगी कि ममा इतनी देर क्या करेंगी.’’ उस की बात सुन कर मैं मुसकरा पड़ी थी.

घर आने के बाद तरोताजा हो कर मैं बैठी ही थी कि मेरा मोबाइल बज उठा. नंबर देखा तो आज की बनी फें्रड मिसेज सक्सेना का ही था. तुरंत रिसीव किया. ‘‘आप घर पहुंच गईं क्या, मुझे तो आप की बड़ी याद आ रही है. सोच रही हूं कि जल्दी ही किसी रोज गाजियाबाद आ कर आप से मिलूं. आप से मिल कर बातें कर के बहुत अच्छा लगा.’’

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‘‘हां, मैं भी बस, आप के बारे में ही सोच रही थी. कभीकभी किसी से अचानक मिलने पर भी ऐसा नहीं लगता कि हम जिंदगी में पहली बार मिले हैं.’’ मैं ने भी उन की बात का जवाब उन्हीं के अंदाज में दे दिया.

थोड़ी देर तक इसी तरह इधरउधर की बातें होती रहीं. फिर पता नहीं मुझे क्या हुआ कि उन्हें अपने घर अगले सप्ताह होने वाली पार्टी के लिए आमंत्रित कर दिया. मौल में श्रीमती सक्सेना से इसीलिए पार्टी में आने को नहीं कहा था कि जज साहब से पूछ कर कहूंगी पर अब जब उन्होंने यह बताया कि मसूरी से इस रविवार को 5 दिन के लिए पार्थ भी आ रहा है, तो बस, उसे देखने की इच्छा दिल में जाग उठी और बोल बैठी, ‘‘अरे, तो आप सब लोग इस रविवार को हमारे घर आइए न. एक छोटी सी पार्टी रखी है. जज साहब को अच्छा लगेगा.’’

वह भी तुरंत तैयार हो गईं. जैसे आने के लिए बिलकुल तैयार बैठी हों.

शाम को जज साहब कोर्ट से लौटे तो चाय के दौरान मैं ने सबकुछ उन्हें बता दिया और अपने दिल की चाहत भी कह बैठी, ‘‘इतना अच्छा लड़का है. आईएएस है. परिवार भी समझदार और हैसियत वाला है. कायस्थ हैं, क्या ही अच्छा होता कि हमारी तरह वह भी ब्राह्मण होते तो हाथ जोड़ कर उन से मिशिका के लिए उन का पार्थ मांग लेती.’’

मेरे स्वभाव से परिचित जज साहब ने इस बात को जरा भी तूल नहीं दिया. सामान्य भाव से बोले, ‘‘अरे, निशि, जिस रास्ते जाना नहीं, उस बारे में क्या सोचना. जब हम मिशिका के लिए लड़का ढूंढ़ने निकलेंगे तो देखना लड़कों की कोई कमी नहीं आएगी. अभी तो हमारी बेटी का इंजीनियरिंग का ही एक साल बचा है फिर उसे एमबीए भी करना है. अभी कई साल हैं उस की शादी में.’’

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मैं ने भी सोचा कि जज साहब सही तो कह रहे हैं. अपनी जाति में भी लड़कों की कोई कमी थोड़े ही है. अभी ऐसी जल्दी भी क्या है. अंतरा की तरह मिशिका का किसी गैर जाति में अफेयर थोड़े ही है, जो मैं इस विषय में सोचूं.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

एक मुलाकात ऐसी भी: भाग 4

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लेखिका- रेनू ‘अंशुल’

सक्सेना साहब ने जज साहब का हाथ अपने हाथों में ले लिया था और भावविह्वल हो कर बोले, ‘‘ऐसीवैसी कोई बात मत कीजिए जज साहब, नहीं तो मैं उठ कर चला जाऊंगा. जिंदगी में सबकुछ मिल जाता है, मगर दोस्ती, अच्छे लोग, अच्छा परिवार बहुत कम लोगों को मिल पाता है और हम लोग उन्हीं में से एक हैं कि हमें आप मिले हैं.’’

‘‘सुन रही हो निशि. तुम जाति- बिरादरी की बातें करती रहती हो, क्या इन से अच्छा तुम्हें मिशिका के लिए कुछ मिल पाएगा. अच्छे लोग, अच्छे रिश्ते, अच्छे परिवार इन सब से बढ़ कर न धर्म है न जाति है और न ही कुछ और. आज मैं ने बिना तुम्हारी इच्छा जाने इस रिश्ते को हां कर दी है क्योंकि मैं जानता हूं कि मैं सही काम कर रहा हूं और अदालत में आएदिन परिवारों के टूटनेबिखरने के मामले मैं ने सुने और निबटाए हैं, उन में रिश्ते टूटने की वजह यह शायद ही हो कि उन की जाति अलग थी या धर्म.

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मुझे माफ करना निशि, तुम्हारी बेसिरपैर की बातों के लिए मैं इतना अच्छा रिश्ता नहीं ठुकरा सकता. अच्छा लड़का सोच कर ही पार्थ से मिशिका की शादी की बात खुद तुम्हारे दिमाग में आए इस के लिए ही वह मुलाकात करवाई गई और अब यह पार्टी भी रखी गई ताकि इस ड्रामे का सुखद अंत कर दिया जाए.’’

पत्नी को काफी कुछ कह कर अंत में जज साहब ने उन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मेरे खयाल से अब तुम्हें भी समझ जाना चाहिए कि तुम्हारी सोच बहुत संकीर्ण थी. वक्त और जमाने से हट कर थी. तुम्हारे भैया तुम्हारी बात सुन कर अपनी बेटी का जीवन बिगाड़ सकते हैं, पर मैं नहीं.’’

सभी अपनीअपनी बात कह चुके थे. मिशिका और पार्थ भी अपनी स्वीकृति दे चुके थे. अब मेरी बारी थी सो मैं ने भी हाथ जोड़ कर इस रिश्ते को अपनी स्वीकृति दे दी. मिसेज सक्सेना ने उठ कर मुझे गले लगाते हुए कहा, ‘‘बधाई हो निशिजी. सबकुछ कितनी जल्दी हो गया न. अभीअभी तो हम दोस्त बने थे और अभीअभी समधिनें. उन्होंने अपने गले में पहना एक जड़ाऊ हार उतार कर तुरंत मिशिका को पहनाते हुए कहा, ‘‘आज से तुम्हारी एक नहीं, दोदो मांएं हैं.’’

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सबकुछ बहुत अच्छा लग रहा था मगर दिल में कहीं एक डर और चिंता थी, जो मुझे खुल कर खुश नहीं होने दे रही थी. क्या करूंगी, कैसे जाऊंगी भैयाभाभी के सामने. यह सोचसोच कर ही मेरी जान सूखी जा रही थी. सभी थक कर सो गए थे, मगर मेरे मन का डर और अपराधभाव मुझे सोने ही नहीं दे रहा था.

अगली सुबह काफी देर से आंखें खुल पाईं. पता नहीं कितने बजे नींद आई थी. घड़ी पर नजर पड़ी तो पूरे 10 बज रहे थे. जज साहब के कोर्ट जाने की बात दिमाग में आते ही मैं तेजी से उठी कि भाभी ने चाय के प्याले के साथ कमरे में प्रवेश किया और हंसती हुई बोलीं, ‘‘क्या निशि, इतनी बड़ी खुशखबरी है और तुम सो रही हो अब तक?’’

जिस बात के लिए मैं अब तक इतनी परेशान थी, वह इतनी आसानी से सुलझ जाएगी, मैं ने सोचा भी न था. मुझे तो अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था.

मुझे हैरान देख भाभी बोलीं, ‘‘सुबहसुबह ही ननदोईजी का फोन आ गया और फोन पर उन्होंने जब रिश्ता तय होने की बात बताई तो हम से रहा नहीं गया और आप की खुशी में खुशी मनाने चले आए. अपने जीजाजी को देखने के लिए अंतरा भी बेचैन हो रही है, शाम को वह भी यहीं आएगी. सक्सेना परिवार को भी बुला लिया है, आज का डिनर मामामामी की तरफ से शहर के सब से अच्छे होटल में…’’ भाभी बोले जा रही थीं.

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मैं हैरत में पड़ी भाभी का चेहरा पढ़ने में लगी थी. मगर वहां स्नेह व प्यार के अलावा और कुछ भी नहीं था. मेरे इतना बड़ा दुख देने के बावजूद भाभी का यह व्यवहार…कुछ समझ में नहीं आया तो मैं भाभी से लिपट कर जोरजोर से रो पड़ी.

‘‘भाभी, मैं इस लायक कहां कि आप मुझे इतना प्यार दें. मैं ने आप लोगों को अपनी गलत सोच की वजह से इतना दुख पहुंचाया, मैं तो आप को अपना मुंह भी दिखाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी. मैं कितनी बुरी हूं भाभी, कितनी बुरी…’’ मेरा रुदन तेज हुआ जा रहा था और भाभी मेरी पीठ सहलाए जा रही थीं.

‘‘मत रो निशि, मत रो. अब वह भी तुम्हारा हम से अगाध प्रेम ही तो था, वरना किसी को क्या पड़ी है, अच्छा हो या बुरा हो. तुम्हें गलत लगा, इसीलिए तुम ने रोका और हमें तुम्हारी बात सही लगी इसीलिए हम ने उसे मान लिया.’’

‘‘तुम्हारी भाभी बिलकुल सही कह रही हैं निशि. जो हो गया उसे भूल जा, और दिल खोल कर आने वाली खुशियों का इंतजार कर.’’ तभी कमरे में जज साहब के संग भैया आतेआते बोले, ‘‘मेरे मन का बोझ इतनी सहजता से उतर जाएगा, सोचा नहीं था,’’ मैं ने कृतज्ञता से जज साहब को देखा जिन्होंने अपनी समझदारी से इतनी बड़ी खुशी मुझे दे दी थी. उन्होंने मेरी आंखें पढ़ लीं और मुसकरा दिए.

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‘‘मगर अभी तो अंतरा का दुख है मेरे सामने. वह तो बहुत नाराज है अपनी बूआ से. उसे कैसे वापस पा सकूंगी मैं?’’

‘‘अरे, अपने बच्चे छोटेछोटे हैं. ज्यादा देर तक अपने बड़ों से नाराज नहीं रहते. मैं ने उसे समझाया है निशि, उस के मन में तुम्हारे लिए कोई गुस्सा नहीं है.’’ भैया बोले तो साथसाथ भाभी भी बोल पड़ीं, ‘‘और अभी सुबहसुबह ही तो फूफाजी से उस की ढेरों बातें हुई हैं और फूफाजी ने उस से वादा किया है कि अब चाहे उस की बूआ कुछ भी कहें, वह अपनी अंतरा की शादी उसी के संग कराएंगे जिसे वह पसंद करती है. पहले चर्च में अंतरा की उस ईसाई लड़के से शादी होगी, फिर मिशिका की मंडप के नीचे. बच्चे जितनी जल्दी गुस्सा हो जाते हैं, उतनी ही जल्दी मान भी जाते हैं निशि.’’

भाभी अपनी बात कह चुकीं तो मैं ने खुश हो कर तुरंत कहा, ‘‘और अब सब से पहले तैयार हो कर हम लोग वहां चलेंगे. मुझे भी तो अपने दूसरे दामाद को शाम के डिनर के लिए आमंत्रित करना है. उन से भी तो माफी मांगनी है, इस बुरी बूआ को.’’

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तुम्हारा इंतजार था

अभय अपनी यूरोप यात्रा के दौरान वेनिस गया हुआ था. वेनिस में सड़कें पानी की होती हैं, मतलब एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए कार नहीं, लांच नावों से जाना पड़ता है. वह मुरानो ग्लास फैक्टरी देखने गया था. वे लोग लाइव शो दिखाते हैं यानी ग्लास को पिघला कर कैसे उसे विभिन्न शक्लों में ढाला जाता है. अभी शो शुरू होने में कुछ वक्त बाकी था, सो, वह बाहर एक पेड़ की छाया में बैठ कर वेनिस की सुंदरता देख रहा था. ग्रैंड कैनाल में सैलानी वेनिस की विशेष नाव ‘गोंडोला’ और अभय मन ही मन सोच रहा था कि वेनिस बनाने वाले के दिमाग की दाद देनी होगी.

जुलाई का महीना था, काफी गरमी थी. तभी एक इंडियन लड़की आ कर उस के बगल में बैठ गई.

उस ने अभय से कहा, ‘‘हाय, मुझे लग रहा है कि आप इंडिया से हैं?’’

‘‘हां, मैं इंडियन हूं,’’ बोल कर अभय ने उस लड़की को एक बार गौर से ऊपर से नीचे तक देखा. मन ही मन सोच रहा था श्यामल वर्ण में भी इतना आकर्षण.

‘‘मैं, एल्मा. मैं केरल से हूं. वेनिस घूमने आई हूं,’’ लड़की बोली.

‘‘और मैं, अभय. बनारस से हूं. मैं भी एक टूर पैकेज पर आया हूं.’’

फिर एल्मा ही ने हाथ बढ़ाया और हैंड शेक कर कहा, ‘‘आप से मिल कर बहुत खुशी हुई.’’

‘‘मुझे भी. पर न जाने क्यों लग रहा है कि आप को पहले भी कहीं देखा है.’’

तब तक शो का समय हो गया था और दोनों फैक्टरी के अंदर चले गए. इस के बाद दोनों साथसाथ ही फैक्टरी घूमे. फैक्टरी से निकल कर दोनों ने फैक्टरी से जुड़ा भव्य शोरूम देखा. एक से बढ़ कर एक शीशे की कलाकृतियां और घरेलू उपयोग के सामान थे. उन्हें वहां खरीदा जा सकता था या और्डर देने पर वे लोग दिए पते पर इंश्योर्ड पार्सल कर देते थे. पर दोनों में किसी ने भी कुछ नहीं खरीदा था.

अभय ने पूछा, ‘‘क्या तुम अकेले यहां आई हो?’’

‘‘नहीं, मेरी सहेली भी साथ में है. हम तो यहां 3 दिनों से हैं. आज उस की तबीयत ठीक नहीं है तो वह नहीं निकल सकी. अब मैं यहां से सीधे होटल जाऊंगी उसी के पास.’’  एल्मा ने जवाब दिया और ‘‘ओके, बाय’’ बोल कर चली गई.

अगले दिन को वह वैटिकन सिटी में था. यह अत्यंत छोटा सा शहर जिसे एक स्वतंत्र देश का दरजा प्राप्त है और विश्वविख्यात है. यह विश्व का सब से छोटा देश है. यहीं पोप का मुख्यालय भी है. यह रोम शहर के अंदर ही दीवारों से घिरा एन्क्लेव (अंत:क्षेत्र) है. एक आइसक्रीम की दुकान पर खड़ेखड़े आइसक्रीम खा रहा था, तभी एल्मा भी वहां आ गई थी.

अभय ने कहा, ‘‘हाय एल्मा, क्या सुखद आश्चर्य है. आज फिर हम मिल गए. पर तुम आज भी अकेली हो? तुम्हारी सहेली कहां रह गई?’’

‘‘तुम ने इंडिया की न्यूज सुनी? कल मुंबई में सीरियल बम ब्लास्ट हुए हैं.

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2 सौ से ज्यादा लोग मरे हैं और सैकड़ों घायल हैं. घायलों में मेरी सहेली का भाई भी था. वह रोम चली गई है. वहां से सीधे मुंबई जाएगी.’’

‘‘ओह, हाउ सैड. पता नहीं हमारे देश को किस की नजर लग गई है. खैर, तुम वैटिकन घूम चुकी हो?’’

‘‘नहीं, अभी सेंट पीटर बैसिलिक बाकी है.’’

‘‘ओह, तुम क्रिश्चियन हो?’’ अभय ने पूछा.

‘‘हां,’’ बोली एल्मा.

‘‘पर एल्मा, मुझे क्यों बारबार लग रहा है कि पहले भी तुम्हें देख चुका हूं. एक बार से ज्यादा ही. तुम केरल में कहां रहती हो?’’

‘‘केरल मेरा नेटिव स्टेट है. पर स्कूलिंग के बाद वहां नहीं रही. मैं हैदराबाद चली आई.’’

अभय चौंक कर बोला ‘‘हैदराबाद.’’

‘‘क्यों? इस में चौंकने वाली क्या बात है? मैं ने वहीं माधापुर के नैशनल फैशन इंस्टिट्यूट से फैशन टैक्नोलौजी का कोर्स किया है और वहीं रेडीमेड कपड़े बनाने वाली कंपनी में काम भी करती हूं.’’

‘‘तभी मुझे बारबार लग रहा है कि मैं ने तुम्हें देखा है. मैं भी वहीं माधापुर के साइबर टावर्स में स्थित ओरेकल कंपनी में काम करता हूं.’’

‘‘चलो, अच्छा है, कोई परदेस में बिलकुल अपने शहर का आदमी मिलता है तो बहुत खुशी होती है.’’

अभय को तब तक कुछ याद आया तो कहा, ‘‘अब मैं बता सकता हूं कि तुम्हें मैं ने पहले कहां देखा है. वहां कोंडापुर के एक रैस्टोरैंट में जो हर संडे को 99 रुपए में बुफे ब्रेकफास्ट देता है.’’

‘‘सही कहा है तुम ने. मैं तो कोशिश करती हूं हर संडे वहां जाने की और 99 रुपए में ब्रंच (नाश्ता और दोपहर का मिलाजुला भोजन) कर लेती हूं. नाश्ते के नाम पर जीभर के जितना खानापीना हो सिर्फ 99 रुपए में हो जाता है,’’ एल्मा बोली, और हंस कर आगे कहा, ‘‘लड़कों का काम ही यही है. जहां मौका मिला, नजरें चुरा कर लड़कियों को देखने लगते हैं. डोंट माइंड, मजाक कर रही थी.’’

‘‘वैटिकन के बाद तुम्हारा क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘मैं तो यहां से इंगलैंड होते हुए इंडिया जा रही हूं. और तुम?’’

‘‘मैं तो यहां से सीधे वापस इंडिया जाऊंगा.’’

लेकिन एल्मा को अब बैसिलिक रोमन विशेषाधिकार प्राप्त चर्च देखने जाना था. वह जातेजाते बोली, ‘‘ठीक है, मैं चलती हूं. जब दोनों हैदराबाद में ही हैं तो कभी मिल भी सकते हैं. अपना खयाल रखना.’’

‘‘एक मिनट रुको, हैदराबाद में मिलने के लिए यह रख लो,’’ बोलते हुए उस ने अपना कार्ड एल्मा को दे दिया. एल्मा ने भी पर्स से अपना एक कार्ड निकाल कर अभय को दे दिया. इस के बाद दोनों ने एकदूसरे को बाय किया.

कुछ दिनों के बाद दोनों हैदराबाद में थे. एक दिन अभय ने एल्मा से फोन कर के पूछा, ‘‘संडे को क्या प्रोग्राम है? रैस्टोरैंट में ब्रंच के लिए आ रही हो?’’

‘‘वह तो आना ही है. वरना 99 रुपए में भरपेट नाश्ता और खाना दोनों कहीं नहीं मिलेगा. वह भी क्वालिटी फूड.’’

‘‘चलो, तो फिर वहीं मिलते हैं.’’

संडे को दोनों उसी रैस्टोरैंट में मिले. दोनों अपनेअपने दोस्त व रूममेट के साथ गए थे. एल्मा ने अपनी सहेली निशा से दोनों का परिचय कराया. अभय ने भी अपने दोस्त का दोनों लड़कियों से परिचय कराया. चारों एक ही टेबल पर बैठे थे. बुफे था, चारों जम के पेटपूजा कर रहे थे, साथ में बातें भी हो रही थीं.

अपने दोस्त को इंगित करते हुए अभय बोला, ‘‘मैं कोंडापुर में इस के साथ अपार्टमैंट शेयर कर रहा हूं.  और तुम?’’

‘‘मैं भी निशा के साथ माधापुर में ही एक दोरूम का अपार्टमैंट शेयर करती हूं.’’

‘‘और आज क्या कर रही हो? मूवी चलोगी? बोलो तो मैं अपने मोबाइल से 4 टिकटें यहीं से बुक कर देता हूं.’’

एल्मा ने अपनी सहेली की ओर देखा तो उस ने कहा, ‘‘चलेगा.’’

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फिर अभय ने वहीं से दोपहर 2 बजे शो की टिकटें बुक कर दीं. इस के बाद चारों अपने अपार्टमैंट गए और फिर सही समय पर सिनेमाहौल पहुंच गए थे. मूवी देखने के बाद चारों ने कैफे में कौफी पी और फिर वे अपनेअपने अपार्टमैंट के लिए चल दिए.

इस के बाद अभय और एल्मा दोनों अब अकेले भी मिलने लगे थे. उन के साथ अब उन के रूममेट नहीं होते थे. छुट्टी के दिन वे दिनभर साथ रहते, घूमतेफिरते, होटलों में जाते और मूवी देखते थे. देखतेदेखते दोनों एकदूसरे को प्यार करने लगे थे. दोनों इस स्थिति को भी समझ रहे थे कि वे अलगअलग धर्मों के मानने वाले थे.

एक दिन अभय ने एल्मा को शादी के लिए प्रोपोज भी कर दिया था. एल्मा ने कहा, ‘‘मुझे तो तुम से बेहद प्यार है और मैं पर्सनली तो इस के लिए तैयार हूं. पर हम लोगों को एकबार अपने मातापिता को भी बताना चाहिए. संभव हो वे हमारी शादी से खुश भी हों.’’

अभय बोला, ‘‘ठीक है, हम दोनों अगले संडे को उन लोगों को यहां बुला लेते हैं.’’

अगले रविवार दोनों के मातापिता हैदराबाद पहुंच गए थे. उसी दिन शाम को वे 6 लोग, अभय, एल्मा और उन के मातापिता शाम को हैदराबाद के केबीआर पार्क में मिले. दोनों के मातापिता के बीच बहस चल रही थी.

अभय के पिता ने कहा ‘‘ये अंगरेज सब से पहले केरल में ही आए थे. फिर वहां के गरीब, असहाय या पिछड़े लोगों को प्रलोभन दे कर या बहका कर धर्मपरिवर्तन करवाते थे. उन के आने के पहले तो वहां क्रिश्चियन नहीं थे. हम लोग तो सदियों से हिंदू हैं. हम को यह शादी स्वीकार है बशर्ते कि आप लोग हिंदू धर्म अपना लें. वरना हमें यह रिश्ता मंजूर नहीं है.’’

एल्मा के पिता ने अपना तर्क देते हुए कहा, ‘‘हम तो दादा, परदादा के समय से ही क्रिश्चियन हैं. हम भी यही चाहते हैं कि अभय हमारा धर्म अपना ले. वैसे भी हिंदू धर्म तो बस इंडिया और नेपाल में ही है जबकि हमारा धर्म दुनिया के अनेक देशों में प्रचलित है. अभय के क्रिश्चियन बनने के बाद ही हम एल्मा की शादी की इजाजत दे सकते हैं. वरना हमें यह शादी मंजूर नहीं है.’’

अभय और एल्मा दोनों के मातापिता अपनीअपनी बात पर अड़े थे, कोई भी झुकने को तैयार न था. बल्कि बहस अब गरम हो चली थी. दोनों अपनेअपने धर्म को अच्छा साबित करने में लगे थे.

तभी अभय ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘आप लोग बहुत बोल चुके हैं. अब कृपया शांत रहे. कुछ हम दोनों पर भी छोड़ दीजिए. आखिरी फैसला हम दोनों मिल कर करेंगे.’’

एल्मा बिलकुल खामोश थी बल्कि थोड़ी सहमी थी. सब लोग पार्क से निकल अपनेअपने घर चले गए. अगले दिन ही दोनों के मातापिता हैदराबाद से लौट गए थे.

इधर, अभय ने एल्मा से पूछा ‘‘हम दोनों के मातापिता को बिना धर्मपरिवर्तन किए यह शादी मंजूर नहीं है. मैं तो कोर्टमैरिज करने को तैयार हूं. तुम मेरा साथ दोगी?’’

‘‘मुझे तुम से प्यार है और शादी से कोई एतराज नहीं. पर बड़ी समस्या यह है कि मेरे मातापिता और मेरी छोटी बहन सभी मुझ पर आश्रित हैं. पिताजी ने काफी ख्ेत बंधक रखे हैं मेरी पढ़ाई के लिए. पिताजी ने कहा है कि अगर मैं ने अपनी मरजी से शादी की तो मुझ से उन का कोई रिश्ता नहीं रहेगा. अब मैं उन लोगों को कैसे छोड़ दूं? मेरी स्थिति समझ रहे हो न तुम?’’

‘‘तब मैं क्या समझूं? तुम्हारा फैसला?’’

‘‘मैं मजबूर हूं, मैं फिलहाल शादी नहीं कर सकती.’’

‘‘तो क्या मैं तुम्हारा इंतजार करूं?’’

एल्मा बोली, ‘‘मैं तो यह भी नहीं कहूंगी कि तुम मेरे लिए अनिश्चितता की स्थिति में रहो. तुम अपना फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हो.’’

इस के बाद दोनों जुदा हो गए. मिलनाजुलना जानेअनजाने ही कभी हो पाता था, पर फोन पर संपर्क बना हुआ था. कुछ दिनों बाद अभय ने चंडीगढ़ के पास मोहाली में एक आईटी कंपनी जौइन कर ली थी. अब एल्मा से फोन पर भी संपर्क नहीं रहा था.

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इस बीच 3 साल बीत चुके थे. अभय शिमला घूमने गया था. दिसंबर का महीना था, बर्फ तो गिर ही रही थी ऊपर से मौसम भी खराब था. जोरों की बारिश हो रही थी. वह अपने होटल के कमरे में बैठा था. रात हो चुकी थी. तभी कौलबैल बजी, तो उस ने सोचा कि वेटर होगा और कहा, ‘‘खुला है, आ जाओ.’’

दरवाजा खुलने पर जो आकृति उसे नजर आई तो कुछ पल के लिए उसे लगा कि सपना देख रहा है. पर जब वह उस के और निकट आई तो वह आश्चर्य से कुछ देर तक उसे देखता ही रहा था. भीगे कपड़ों में एल्मा सामने खड़ी थी सूटकेस लिए.

अभय बोला ‘‘तुम अचानक यहां कैसे? यहां का पता तुम्हें किस ने दिया?’’

‘‘सब बताऊंगी. मैं भीग गई हूं. पहले मुझे चेंज करने दोगे?’’

‘‘ठीक है, बाथरूम में धुला टौवेल है. जाओ, चेंज कर लो.’’

थोड़ी देर में एल्मा चेंज कर निकली, तब तक अभय ने उस के लिए कौफी मंगा दी थी. उस ने कहा ‘‘कौफी गरम है, पी लो.’’

कौफी पीते हुए एल्मा ने कहा, ‘‘मैं ने हैदराबाद के तुम्हारे रूममेट से मोहाली का पता लिया. मोहाली गई तो वहां से तुम्हारे रूममेट ने मुझे यहां का पता दिया. मैं सब छोड़ तुम्हारे पास आई हूं. मुझे पता है तुम ने अभी तक शादी नहीं की है. क्या तुम मुझे अपनाने को तैयार हो? ’’

अभय बोला, ‘‘मैं तो पहले भी तैयार था, आज भी तैयार हूं, पर तुम्हारा धर्म, तुम्हारे मातापिता और बहन?’’

‘‘मैं तो प्यार को धर्म से बड़ा मानती हूं. हम दोनों धर्म बदले बिना भी अपना रिश्ता निभा सकते हैं.’’

‘‘मैं तो तैयार हूं पर तुम्हारा परिवार?’’ अभय बोला.

एल्मा बोली, ‘‘मेरी बहन नर्सिंग कर के दुबई में नर्स है. उस ने वहीं पर लवमैरिज कर ली है. उसी ने मुझे तुम्हारे पास आने की हिम्मत दी है. मातापिता को हम दोनों बहनें पैसे भेजती रहेंगी जिस से वे अपने खेत छुड़ा लेंगे. मैं भी चंडीगढ़ की गारमैंट कंपनी में जौब कर लूंगी.’’ थोड़ी देर की खामोशी के बाद एल्मा आगे बोली, ‘‘पर पहले यह बताओ, तुम ने अभी तक शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘शादी कैसे करता? तुम्हारा इंतजार था,’’  अभय बोला.

‘‘वह तो ठीक है, पर तुम्हें यकीन था कि मैं वापस तुम्हारे पास आऊंगी.’’

‘‘मुझे अपने प्यार पर यकीन था,’’ बोल कर अभय ने एल्मा को अपनी आगोश में ले लिया.

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वार पर वार : आखिर क्या थी नमिता की कहानी ?

वार पर वार : भाग 1

नमिता एक हंसमुख और खुशमिजाज लड़की थी. उस के चेहरे की मासूमियत किसी का भी मन मोह लेती थी. उस के गुलाबी होंठ हमेशा मीठी मुसकराहट के दरिया में छोटी नाव की तरह हिचकोले खाते रहते थे. आंखों की पुतलियां सितारों की तरह नाचती रहती थीं. उस के चेहरे और बातों में ऐसा खिंचाव था, जो देखने वाले को बरबस अपनी तरफ खींच लेता था.

पर पिछले कुछ दिनों से नमिता के चेहरे की चमक धुंधली पड़ती जा रही थी. होंठों की मुसकराहट सिकुड़ कर मुरझाए फूल की तरह सिमट गई थी. आंखों की पुतलियों ने नाचना बंद कर दिया था. आंखों के नीचे काले घेरे पड़ने लगे थे.

नमिता समझ नहीं पा रही थी कि वह अपनी जिंदगी की कौन सी बेशकीमती चीज खोती जा रही थी. सबकुछ हाथ से फिसलता जा रहा था.

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नमिता के दुख की वजह क्या थी, यह वह किसी को बता नहीं पा रही थी… लोग पहले कानाफूसी में उस के बारे में बात करते रहे, फिर खुल कर बोलने लगे.

सीधे उसी से पूछते, ‘क्या हुआ है नमिता तुम्हारे साथ जो तुम ग्रहण लगे चांद की तरह चमक खोती जा रही हो?’

नमिता पूछने वाले की तरफ देखती भी नहीं थी, सिर झुका कर एक फीकी मुसकराहट के साथ बस इतना कहती थी, ‘नहीं, कुछ नहीं…’ शब्द जैसे उस का साथ छोड़ देते थे.

इस तरह के हालात कब तक चल सकते थे? नमिता किसकिस से मुंह छिपाती? अनजान लोगों से नजरें चुरा सकती थी, पर अपने घरपरिवार, परिचितों और औफिस के साथियों की निगाहों से कब तक बच सकती थी? उन की बातों का कब तक जवाब नहीं देती?

आखिर टूट ही गई एक दिन… सब के सामने नहीं… औफिस की एक साथी थी प्रीति. उम्र में उस से कुछ साल बड़ी.

एक दिन एकांत में जब उन्होंने नमिता से प्यार भरी आवाज में भरोसा देते हुए पूछा तो नमिता रोने लगी. सब्र का बांध टूट चुका था.

फालतू का पानी बह जाने के बाद जब नमिता ठीक हुई तो उस ने धीरेधीरे अपनी परेशानी की वजह को बयान कर दिया, जिसे सुन कर प्रीति हैरान रह गई थी.

नमिता स्टेनोग्राफर थी और औफिस हैड भूषण राज के साथ जुड़ी थी. भूषण राज अधेड़ उम्र का सुखी परिवार वाला शख्स था. औफिस में उस की अपनी पर्सनल असिस्टैंट थी, पर डिक्टेशन और टाइपिंग का काम वह नमिता से ही कराता था. काम कम कराता था, सामने बिठा कर बातें ज्यादा करता था. वह उसे मुसकराती नजरों से देखा करता था.

पहले नमिता भी मुसकराती थी और उस की बातों का जवाब भी देती थी, पर धीरेधीरे नमिता की समझ में आ गया कि भूषण राज की नजरों का मतलब कुछ दूसरा था, इसलिए वह सावधान हो गई.

जब वह कोई बेहूदा बात कहता तो वह अंदर से डर कर सिमट जाती, पर बाहर से अपनेआप को संभाले रहती कि सूने कमरे में कोई अनहोनी न हो जाए.

नमिता यह तो नहीं जानती थी कि भूषण राज के तहत काम करते हुए वह कितनी महफूज है या वह जिंदगी का कौन सा सुख उसे देगा या उस के घरपरिवार के लिए क्या करेगा, पर वह इतना जरूर जानती थी कि केंद्र सरकार के औफिस की यह पक्की नौकरी उस के लिए बहुत जरूरी थी. उस का 3 साल का प्रोबेशन था. 2 साल पूरे हो चुके थे. एक साल बाद उसे कन्फर्मेशन लैटर मिल जाएगा, तब उस की पक्की नौकरी हो जाएगी.

नमिता मिडिल क्लास परिवार की लड़की थी. मांबाप के अलावा घर में एक छोटा भाई और बहन थी. पापा एक प्राइवेट फर्म में अकाउंटैंट थे. सीमित आमदनी के बावजूद उन्होेंने नमिता को ऊंची पढ़ाई कराई थी.

घर में बड़ी होने के नाते नमिता अपने मांबाप की आंखों का तारा तो थी ही, साथ ही साथ उम्मीद का चिराग भी कि पढ़ाई पूरी करते ही कोई नौकरी मिल जाएगी तो घर की हालत में थोड़ा सुधार आ जाएगा. छोटे भाईबहन की पढ़ाई अच्छे ढंग से चलती रहेगी.

नमिता ने अपने मांबाप को निराश नहीं किया. बीए में दाखिला लेने के साथसाथ वह एक प्राइवेट इंस्टीट्यूट से शौर्टहैंड का कोर्स भी पूरा करती रही.

जैसे ही वह कोर्स पूरा हुआ, उस ने एसएससी का इम्तिहान दिया और आज अपनी मेहनत की बदौलत वह सरकारी नौकरी कर रही थी.

नमिता की चुप्पी ने भूषण राज की हिम्मत बढ़ा दी. उस ने और ज्यादा चारा फेंका, ‘‘अगर तुम चाहोगी तो तुम्हारे भाईबहन पढ़लिख कर अच्छी सर्विस में आ जाएंगे. मैं उन्हें आगे बढ़ने में मदद करूंगा.’’

नमिता ने अपनी निगाहें उठाईं और भूषण राज के लाललाल फूले गालों वाले चेहरे पर टिका दीं. उस की आंखों में दुनिया का सारा प्यार नमिता के लिए उमड़ रहा था. पर इस प्यार में उसे भूषण राज के खतरनाक इरादों का भी पता चल रहा था.

‘‘तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारे भाईबहन को गाइड करूंगा कि उन्हें प्रोफैशनल कोर्स करना चाहिए या सामान्य कोर्स कर के प्रतियोगी परीक्षा के जरीए लोक सेवा में आना चाहिए. मैं ने कई लोगों को गाइड किया है और आज कई लड़के ऊंची सरकारी नौकरी में हैं.’’

पर नमिता गुमसुम सी बैठी रही, उठ कर भाग नहीं सकती थी. न तो वह उसे खुल कर मना कर सकती थी, न अपने मन का दर्द किसी से कह सकती थी.

जब नमिता ने कोई जवाब नहीं दिया तो वह बोला, ‘‘अच्छा, तुम बोर हो रही होगी… एक काम करो, चलो, एक डीओ का डिक्टेशन ही ले लो.’’

नमिता जब तक अपना पैड और कलम संभालती, वह अपनी कुरसी से उठ कर खड़ा हो गया और मेज की दाहिनी तरफ आ गया और कुछ सोचने का बहाना करते हुए नमिता की कुरसी के बाएं सिरे पर आ कर खड़ा हो गया. फिर दाहिनी तरफ नमिता के बाएं कंधे पर तकरीबन झुकते हुए बोला, ‘‘हां लिखो… माई डियर…’’ फिर एक पल की चुप्पी के बाद, ‘‘नहीं, यह छोड़ो. लिखो डियर श्री…’’ फिर भूषण राज की सूई तकरीबन अटक गई और वह ‘माई डियर’ या ‘डियर श्री’ से आगे नहीं बढ़ पाया.

यह शायद नमिता की खूबसूरती या उस के बदन का कमाल था कि पलभर में ही उस की सांसें फूलने लगीं और वह नमिता की चिकनी पीठ को लालसा भरी निगाहों से ताकते हुए लंबीलंबी सांसें लेने लगा. जब वह ज्यादा बेकाबू हो गया तो कसमसाते हुए नमिता के सिर पर हाथ रख कर बोला, ‘‘हां, क्या लिखा?’’

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नमिता के शरीर में एक लिजलिजी लहर समा गई.

मजबूरी इनसान को हद से ज्यादा सब्र वाला बना देती है. नमिता के साथ भी यही हो रहा था. वह अपने बौस की ज्यादतियों का शिकार हो रही थी, पर उस का विरोध नहीं कर पा रही थी. न शब्दों से, न हरकतों से…

नतीजा यह हुआ कि भूषण राज के हाथ अब नमिता के सिर से होते हुए उस की गरदन को गुदगुदाने लगे थे और कभीकभी उस के गालों तक पहुंच जाते थे. फिर कई बार उस की पीठ को सहलाते, जैसे कुछ ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे हों. उस की ब्रा के ऊपर हाथ रोक कर उस के हुक को टटोलते हुए ऊपर से ही खोलने की कोशिश करते, पर नमिता कुछ इस तरह सिकुड़ जाती कि वह अपनी कोशिश में नाकाम हो कर कुरसी पर जा कर बैठ जाता और कहता, ‘‘निम्मी…’’ आजकल वह प्यार से उसे निम्मी कहने लगा था, ‘‘तुम कुछ हैल्प क्यों नहीं करती? तुम समझ रही हो न… मैं क्या कहना चाहता हूं?’’

पर नमिता झटके से उठ कर खड़ी हो जाती और बाहर निकल जाती.

नमिता किस मुसीबत में फंस गई थी? क्या करे, क्या न करे? वह रातदिन सोचती रहती. जब से भूषण राज ने उस की पीठ को सहलाना शुरू किया था और उस के गालों को उंगलियों के बीच फंसा कर कभी धीरे से तो कभी जोर से चिकोटी काट लेता था, तब से वह और ज्यादा डरने लगी थी.

भूषण राज जब इस तरह की हरकतें करता तो नमिता अपने शरीर को मेज पर टिका देती कि कहीं उस के हाथ उस गोलाइयों को न लपक लें. वह हर मुमकिन कोशिश करती कि भूषण राज उस के साथ कोई गलत हरकत न करने पाए, पर शिकारी भेडि़ए के पंजे अकसर उस के कोमल बदन को खरोंच देते.

एक दिन तो हद हो गई. भूषण राज ने उस के दोनों गालों पर हाथ फिराते हुए आगे की तरफ से ठोढ़ी और गरदन को सहलाना शुरू कर दिया, फिर धीरेधीरे हाथों को आगे बढ़ाते हुए उस के गालों की तरफ झुक आया. जब उस की गरम सांसें नमिता के बाएं गाल से टकराईं तो वह चौंकी, झटके से बाईं तरफ मुड़ी तो भूषण राज का मुंह सीधे उस के होंठों से जा लगा.

उस ने भूखे भेडि़ए की तरह नमिता के दोनों होंठ अपने मुंह में भर लिए. इसी हड़बड़ी में उस के हाथ नमिता की छाती को मसलने लगे. पलभर के लिए वह हैरान सी रह गई. जब उस की समझ में आया तो उस ने झटका दे कर अपनेआप को छुड़ाया और धक्का दे कर उसे पीछे किया. भूषण राज पीछे हटते हुए मेज से टकराया और गिरतेगिरते बचा.

नमिता कमरे से बाहर जा चुकी थी. अपनी सांसें काबू करने में उसे बहुत देर लगी. उस की आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया था. उस का दिल और दिमाग दोनों सुन्न से हो गए थे. कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे?

उधर भूषण राज अपनी सांसों को काबू में करते हुए मन ही मन खुश हो रहा था कि एक मंजिल उस ने हासिल कर ली थी, अब आखिरी मंजिल हासिल करने में कितनी देर लग सकती थी.

नमिता के पास अब 2 ही रास्ते बचे थे. या तो वह नौकरी छोड़ देती या भूषण राज के साथ समझौता कर उस के साथ नाजायज रिश्ता बना लेती. पहला रास्ता आसान नहीं था और दूसरा रास्ता अपनाने से न केवल बदनामी होती, बल्कि उस की जिंदगी भी तबाह हो सकती थी.

भूषण राज उस का ही नहीं, पूरे औफिस का बौस था. नमिता को अब जब भी बौस उसे अपने कमरे में बुलाता, जानबूझ कर देरी से जाती. बारबार कहने के बावजूद भी नमिता कुरसी पर नहीं बैठती, बल्कि खड़ी ही रहती, ताकि जैसे ही बौस अपनी कुरसी से उठ कर खड़ा हो और उस की तरफ बढ़े, वह दरवाजे की तरफ सरक जाए.

भूषण राज चालाक भेडि़या था. उस ने अपना पैतरा बदला. अब वह नमिता को किसी सैक्शन से कोई फाइल ले कर आने के लिए कहता. वह फाइल को ले कर आती तो कहता, ‘‘देखो, इस में एक लैटर लगा होगा… पिछले महीने हम ने मुंबई औफिस से कुछ जानकारी मांगी थी. उस का जवाब अभी तक नहीं आया है. एक रिमाइंडर बना कर लाओ… बना लोगी?’’ वह थोड़ी तेज आवाज में कहता, जैसे धमकी दे रहा हो.

नमिता जानती थी कि भूषण राज जानबूझ कर उसे तंग करने के लिए यह काम सौंप रहा था, ताकि काम न कर पाने के चलते वह उसे डांटडपट सके.

‘‘मैं कर लूंगी सर,’’ कहते हुए वह बाहर निकल गई.

भूषण राज अपनी कुटिल मुसकान के साथ मन ही मन सोच रहा था, ‘कहां तक उड़ोगी मुझ से? पंख काट कर रख दूंगा.’

नमिता ने सब्र से काम लिया. वह संबंधित अनुभाग के अधीक्षक के पास गई और अपनी समस्या बताई. कार्यालय अधीक्षक समझदार था. उस ने नमिता का रिमाइंडर तैयार करा दिया. वह खुशी खुशी फाइल के साथ रिमाइंडर ले कर भूषण राज के चैंबर में घुसी. वह किसी फाइल पर झुका हुआ था, चश्मा नाक पर लटका कर उस ने आंखें उठाईं और त्योरियां चढ़ा कर पूछा, ‘‘तो रिमाइंडर बन गया?’’

‘‘जी सर, देख लीजिए,’’ नमिता आत्मविश्वास से बोली. उस की अंगरेजी और टाइपिंग दोनों अच्छी थीं. भूषण राज ने सरसरी तौर पर लैटर को देखा और घुड़क कर बोला, ‘‘तो ऐसे बनाया जाता है रिमाइंडर? तुम्हें कोई अक्ल भी है.

‘‘यह देखो, यह फिगर गलत है. यह कौलम तो बिलकुल सही नहीं बना है. इस का प्रेजेंटेशन ठीक नहीं है… और यह कौन से फौंट में टाइप किया है… जाओ, दोबारा से बना कर लाओ, वरना समझ लो, अभी प्रोबेशन में हो.

‘‘मन लगा कर काम करो, वरना जिंदगीभर इसी ग्रेड में पड़ी रहोगी. कभी प्रमोशन नहीं मिलेगा.’’

नमिता कुछ देर तो सहमी खड़ी रही. उस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि ड्राफ्ट में क्या गलती थी. वह तकरीबन रोंआसी हो गई. 2 साल तक भूषण राज ने भले ही उस से एक पैसे का काम नहीं लिया था, पर बातें बहुत मीठी की थीं. अब अचानक उस के बरताव में आए इस बदलाव से नमिता हैरान थी.

अब यह रोज का नियम बन गया था. भूषण राज नमिता को रोज कोई न कोई मुश्किल काम बता देता. वह सही ढंग से काम कर भी देती, तब भी उस के काम में नुक्स निकालता, जोरजोर से सब के सामने उसे डांटता, उस को जलील करता.

‘‘तो यह है तुम्हारी परेशानी की वजह,’’ प्रीति ने लंबी सांस ले कर कहा, ‘‘समस्या बड़ी है… तो क्या सोचा है तुम ने? क्या तुम समझती हो कि इस तरह की लड़ाई से तुम खुद को बचा पाओगी? नामुमकिन है… मैं ने इस दफ्तर में तकरीबन 10 साल गुजारे हैं. मैं उस की एकएक हरकत से वाकिफ हूं.

‘‘मैं जब यहां आई थी, तब शादीशुदा थी. वह केवल कुंआरी लड़कियों पर नजर डालता है. 10 सालों में मैं ने बहुतकुछ देखा है… कितनी लड़कियों को मैं ने यहीं पर हालात से समझौता करते हुए देखा है, कितनी तो जबरदस्ती उस की हवस का शिकार हुई हैं.’’

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‘‘मेरे लिए यह अच्छी नौकरी और इज्जत दोनों ही जरूरी हैं. मैं दोनों में से किसी को खोना नहीं चाहती. नौकरी जाने से मेरे मांबाप, भाई और बहन की जिंदगी पर असर पड़ेगा. इज्जत खो दी, तो फिर मेरे जीने का क्या मकसद…’’ नमिता की आवाज में हताशा टपक रही थी.

प्रीति ने उस के हाथ को थामते हुए कहा, ‘‘इस तरह निराश होने से काम नहीं चलेगा. क्या तुम किसी लड़के को प्यार करती हो?’’

नमिता ने चौंकती नजरों से प्रीति को देखा. उस के इस अचानक किए गए सवाल का मतलब वह नहीं समझी, फिर सिर झुका कर बोली, ‘‘उस हद तक नहीं कि उस से शादी कर लूं. कालेज में इस तरह के प्यार हो जाते हैं, जिन का कोई गंभीर मतलब नहीं होता. बस, एकदूसरे के प्रति खिंचाव होता है. ऐसा ही पहले कुछ था… 2 लड़कों के साथ, पर अब नहीं, लेकिन आप ने क्यों पूछा?’’

‘‘यही कि शिद्दत से किसी को प्यार करने वाली लड़की के कदम जल्दी किसी और राह पर नहीं चलते. मैं ऐसा समझ रही थी, शायद तुम अपने प्यार की खातिर भूषण राज के मनमुताबिक नरमदिल नहीं हो पा रही हो, वरना रुपएपैसे के साथसाथ जवानी का मजा कौन लड़की नहीं उठाना चाहती.’’

नमिता के सीने पर जैसे किसी ने घूंसा मार दिया हो. वह कराहते हुए बोली, ‘‘तो क्या मैं भूषण राज के नीचे लेट जाती?

क्या किसी को प्यार न करने वाली लड़की इज्जतदार नहीं होती?’’ – क्रमश:

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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