एक लड़की टिकटौक वाली : भाग 2

घर वालों के बयानों से शक की कोई गुजाइश नहीं बची थी. आरिफ ही संदिग्ध लग रहा था, लेकिन वजह अभी भी साफ नहीं हो पा रही थी कि आखिर उस ने शिवानी की हत्या क्यों की? इस सवाल का जवाब उस के पकड़े जाने के बाद ही मिल सकता था.

उसी दिन शाम को मृतका शिवानी के पिता विनोद खोबियान ने एसओ रविंदर को आरिफ मोहम्मद को नामजद करते हुए एक लिखित तहरीर दी. तहरीर के आधार पर कुंडली थाने की पुलिस ने आरिफ मोहम्मद के खिलाफ धारा 302, 201 भादंवि एवं एससीएसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. इस के साथ ही आरोपी की खोजबीन शुरू हो गई. इस मामले की जांच डीएसपी वीरेंद्र सिंह को मिली थी. वीरेंद्र सिंह ने अपनी काररवाई शुरू कर दी. आरिफ मोहम्मद कुंडली थाना क्षेत्र के प्याऊ मनियारी का रहने वाला था. पुलिस ने अपना तंत्र चारों ओर बिछा दिया था. मुखबिर ने पुलिस को सूचना दी आरोपी आरिफ अपने घर में छिपा हुआ है.

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मुखबिर की सूचना पर डीएसपी वीरेंद्र सिंह ने 29 जून की दोपहर में पुलिस टीम के साथ आरिफ के घर पर दबिश दी. पुलिस टीम में थानाप्रभारी रविंदर भी शामिल थे. प्याऊ मनियारी पहुंच कर पुलिस ने आरिफ के घर को चारों ओर से घेर लिया. पुलिस को देख कर आरिफ ने भागने की कोशिश की लेकिन वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सका. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

आरिफ मोहम्मद को गिरफ्तार कर के पुलिस थाना कुंडली ले आई. डीएसपी वीरेंद्र सिंह ने आरिफ को इंट्रोगेशन रूम में ले जा कर पूछताछ शुरू की.

पुलिस के सवालों के सामने वह ज्यादा देर नहीं टिक सका. पुलिस के सवालों की बौछार से आरिफ ने घुटने टेक दिए. उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस ने पुलिस के सामने कहा कि शिवानी ने उस के साथ बेवफाई की थी, धोखा दिया था उसे. आरिफ ने बताया, उस के प्यार में लाखों रुपए पानी की तरह बहाने के बाद भी शिवानी ने मेरे प्यार का ऐसा सिला दिया कि मैं खुद को ठगा महसूस कर रहा था.

पिछले 5 दिनों से वह मुझ से बात नहीं कर रही थी. उस ने दूसरा प्रेमी ढूंढ लिया था. मैं उस से मिलने गया तो उस ने मुझे देख कर भीतर से दरवाजा बंद करने की कोशिश की. शिवानी का यह व्यवहार मुझे अच्छा नहीं लगा, मुझे गुस्सा आ गया. मैं ने उसे धक्का दे कर दरवाजा खोल दिया. वह मुझ पर भड़क गई और चिल्लाने लगी, यह देख मैं आपे से बाहर हो गया. मेरे दोनों हाथ उस की गर्दन तक पहुंच गए. मैं ने जोर से उस का गला दबा दिया. शिवानी मर गई. मैं समझ गया कि मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. दिमाग को शांत कर सोचा तो लगा, मुझे वहां से निकल जाना चाहिए.

बाद में शिवानी के मोबाइल पर श्वेता का वाट्सऐप मैसेज आया तो मैं ने शिवानी की ओर से मैसेज का जवाब दे दिया ताकि घर वालों को यकीन हो जाए कि शिवानी हरिद्वार गई है. इस के बाद आरिफ ने पूरी कहानी विस्तार से सुना दी. आरिफ से पूछताछ के बाद पुलिस ने देर शाम उसे अदालत के सामने पेश कर जेल भेज दिया. कहानी की बुनियाद कुछ इस तरह थी –

उत्तर प्रदेश के जिला बागपत के सोरपा निवासी विनोद खोबियान सालों पहले हरियाणा के जिला सोनीपत के कुंडली के प्याऊ मनियारी मोहल्ले में किराए का मकान ले कर परिवार सहित आ बसे थे. पत्नी और 2 बेटियां यही उन का घरसंसार था. दोनों बेटियों में शिवानी बड़ी, खूबसूरत और समझदार थी.  श्वेता छोटी थी.

मामूली परिवार था शिवानी का

विनोद खोबियान शहर की एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करते थे. वो इतना कमा लेते थे जिस से उन के परिवार का भरणपोषण हो जाता था. साथ ही बच्चों की जरूरतें भी पूरी हो जाती थीं. 18 साल की हो चुकी शिवानी अल्हड़पन और मदमस्त किस्म की लड़की थी. एक तो जवान ऊपर से सुंदर व चंचल, वह किसी के भी मन को भा सकती थी.

शिवानी 12वीं में पढ़ती थी. उस ने अमीरी के जो ख्वाब आंखों में संजो रखे थे, वह महंगाई के जमाने में पिता के लिए पूरे करना मुमकिन नहीं था. ख्वाब चाहे खुली आंखों से देखा गया हो या सोते में, ख्वाब ही होता है. ख्वाब पूरे करने के लिए साधन, मेहनत की जरूरत होती है. शिवानी यह बात जानती थी, इसलिए ख्वाबों को साकार करने के लिए वह लगातार कोशिशों में जुटी हुई थी. सुंदर तो वह थी ही, उस में अभिनय प्रतिभा भी थी. फिल्मी दुनिया में किस्मत आजमाने के लिए उसे मायानगरी मुंबई जाना पड़ता, जो उस के लिए मुमकिन नहीं था.

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पिछले 2-3 सालों से चाइनीज ऐप टिकटौक प्लेटफौर्म पीक पर था. लोग अपने वीडियो बना कर टिकटौक पर पोस्ट कर देते थे. इस तरह उन के अभिनय का शौक तो पूरा हो ही जाता था, फालोअर बढ़ने पर लाखों की कमाई भी होती थी.

शिवानी को यह बात पता थी. सो उस ने भी टिकटौक प्लेटफार्म पर अपने पांव जमाने शुरू कर दिए. सितारा बनने के लिए उस ने दिनरात एक कर दिया. फालोअर्स को रिझाने के लिए वह मनमोहक अदाओं के वीडियो बना कर टिकटौक पर पोस्ट करने लगी. इस से शिवानी खोबियान को तमाम लोग पसंद करने लगे. अपनी चंचल अदाओं से उस ने थोडे़ ही समय में लाखों फालोअर्स बना लिए और पैसे भी कमाने लगी. शिवानी के टिकटौक अभिनय से घर वाले परिचित थे. बेटी के इस काम से उन्हें कोई ऐतराज नहीं था. परिवार की ओर से मिले समर्थन के बाद शिवानी खुल कर टिकटौक प्लेटफार्म पर उतर आई.

टिकटौक की बदौलत आरिफ आया जिंदगी में

शिवानी खोबियान के लाखों फालोअर्स में से एक फालोअर ऐसा भी था जो अपने परिवार के साथ उसी के पड़ोस में रहता था. उस नाम था आरिफ मोहम्मद. 25 वर्षीय आरिफ मोहम्मद मध्यमवर्गीय परिवार से था. उस के पिता का खुद का छोटामोटा बिजनैस था. उसी की कमाई से परिवार का खर्च चलता था. आरिफ के भी 2 भाई और एक बहन थी. भाई बहनों में वह सब से बड़ा था. आरिफ पढ़ाई के साथसाथ पिता के व्यवसाय में भी अपना हाथ बंटाता था.

करीब 6 साल पहले विनोद खोबियान जब सपरिवार बागपत से सोनीपत आए थे तो उन्होंने कुंडली के मोहल्ला प्याऊ मनियारी में रहने के लिए मकान लिया था. आरिफ का मकान उन के पड़ोस में था. बात 4 साल पहले की है. घर से बाहर जातेआते एक दिन आरिफ की नजर शिवानी पर पड़ गई. उसे देखा तो वह देखता रह गया. वह शिवानी को तब तक देखता रहा जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई.  उस दिन के बाद से आरिफ शिवानी की एक झलक पाने के लिए अपने घर के बाहरी दरवाजे पर खड़ा हो जाता था. जब तक वह शिवानी का दीदार नहीं कर लेता था तब तक वहां से हटता नहीं था.

आरिफ शिवानी से एकतरफा प्यार करने लगा था. उस के इस प्यार में पागलपन था. वह शिवानी को अपने दिल का हाल बताने के लिए बेताब था. लेकिन उसे ऐसा कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था जिस से शिवानी तक पहुंच जाए.

आखिरकार आरिफ ने शिवानी तक पहुंचने का रास्ता बना ही लिया. जब भी वह शिवानी के पिता को देखता तो उन्हें अदब के साथ नमस्कार करता ताकि उन की निगाहों में आ जाए. पड़ोसी तो वह था ही, इसलिए वह त्यौहारों वगैरह पर विनोद खोबियान और उन के परिवार को निमंत्रित करने लगा.

इस तरह वह शिवानी तक पहुंचने में कामयाब हो गया. शिवानी के घर वाले उस के व्यवहार के कायल थे. वे लोग उसे अपने यहां जबतब चाय पर बुलाने लगे.

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इस आनेजाने से शिवानी और आरिफ के बीच नजदीकियां बनती गईं. शिवानी जल्दी ही जान गई कि आरिफ उस से एकतरफा प्यार करता है लेकिन वह प्यार के पचड़े में नहीं पड़ना चाहती थी. वह सच्चे दोस्त की तरह व्यवहार करती थी. तब शिवानी टिकटौक प्लेटफौर्म से दूर थी. वह बाद में टिकटौक स्टार बनी थी.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

एक लड़की टिकटौक वाली : भाग 1

17 वर्षीय शिवानी खोबियान 24 जून, 2020 को भी रोजाना की तरह नियत समय पर अपने ब्यूटी पार्लर टच एंड फेयर पहुंच गई थी. उस का यह पार्लर कुंडली थाने के पौश एरिया टीडीसी सिटी में था. शिवानी ने पार्लर की देखरेख के लिए अपनी छोटी बहन श्वेता के दोस्त नीरज को जौब पर रख लिया था. वह सुबह साढ़े 10 बजे तक पार्लर की साफसफाई कर के रेडी रखता था. शिवानी 11 बजे तक पार्लर आती थी.

सुंदर और गुणी शिवानी टिकटौक स्टार थी. उस के लाखों फौलोअर्स थे. दीवाने उस की मोहक अदाओं पर मर मिटे थे. कई तो उसे प्रेम निवेदन भी भेज चुके थे, लेकिन शिवानी पागल दीवानों की अनदेखी कर टिकटौक प्लेटफार्म पर वीडियो बना कर पोस्ट करती रहती थी. वह सोनीपत के कुंडली में अपने मांबाप और 3 बहनों के साथ रहती थी.

24 जून दोपहर 2 बजे की बात है. शिवानी ने ग्राहकों से फारिग हो कर पार्लर का मुख्य द्वार बंद कर दिया और टिकटौक के लिए वीडियो शूट करने लगी. उस ने वीडियो बना कर टिकटौक पर पोस्ट कर दी और फिर अपने काम में जुट गई.

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रात के 8 बज गए. लेकिन शिवानी घर नहीं लौटी तो उसे ले कर घर वालों को थोड़ी चिंता हुई. छोटी बहन श्वेता ने उस के फोन पर काल किया. लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ  था. शिवानी कभी फोन औफ नहीं रखती थी. श्वेता ने अपने फोन से उस के वाट्सऐप पर मैसेज किया, ‘‘दी, तुम कहां हो? तुम्हारा फोन औफ क्यों आ रहा है? मम्मीपापा और हम सभी तुम्हारे लिए परेशान हैं, जल्दी बताओ.’’

श्वेता के मैसेज भेजने के कुछ देर बाद शिवानी ने श्वेता के वाट्सऐप पर जवाब दिया, ‘‘श्वेता, मैं जरूरी काम से हरिद्वार जा रही हूं. 3-4 दिन बाद घर लौटूंगी, तुम लोग परेशान मत होना, तब तक मम्मीपापा का ध्यान रखना.’’

शिवानी का मैसेज पढ़ कर श्वेता ने यह बात मम्मीपापा को बता दी. सुन कर सभी ने चैन की सांस ली.

शिवानी के पिता विनोद खोबियान बेटी की ओर से इसलिए भी निश्चिंत हो गए, क्योंकि वह अकसर पार्लर से ही बाहर चली जाती थी लेकिन कहीं जाने से पहले वह घर पर बता देती थी. इस बार उस ने बाहर जाने की बात घर में नहीं बताई थी.

26 जून की सुबह साफसफाई करने नीरज 11 बजे ब्यूटी पार्लर पहुंचा. उसे शिवानी के हरिद्वार जाने की बात पता चल गई थी, इसलिए वह शिवानी के हरिद्वार से लौटने वाले दिन आया था.

दुकान खोल कर नीरज जैसे ही अंदर गया, दुकान के भीतर से  किसी चीज के सड़ने की इतनी तेज दुर्गंध आई कि वह उल्टे पांव बाहर आ गया.

उस ने सोचा कि दुकान कई दिनों से बंद थी, हो सकता है कोई चूहा मर गया हो और उसी के सड़ने की बदबू आ रही हो. फिर वह नाक पर रूमाल बांध कर दुकान के अंदर गया. दुकान के भीतर ग्राहकों के मसाज के लिए एक बैड बिछा था. कई मामलों में शिवानी बैड पर लेटा कर अपने ग्राहकों को मसाज किया करती थी. उस ने महंगे क्रीम पाउडर रखने के लिए एक बड़ी अलमारी भी रखी हुई थी.

हो गया शिवानी का कत्ल

नीरज ने फौरी तौर पर कमरे का निरीक्षण किया. अलमारी भी देख ली. उसे कहीं भी कोई ऐसी चीज नहीं मिली जिस में से दुर्गंध आ रही हो. लेकिन जब वह बैड के पास पहुंचा तो वहां से तेज बदबू आई. उसे लगा जैसे बदबू के मारे अभी उल्टी हो जाएगी. वह नाकमुंह दबा कर तेजी से बाहर निकल आया. बाहर आ कर उस ने ताजा सांस ली.

उस के बाद वह फिर दुकान के अंदर गया और बैड पर लगे कुंडे को पकड़ कर बैड का बड़ा ढक्कन उठाया. ढक्कन उठाते ही वह बुरी तरह चौंका. उस के हाथ से ढक्कन तेजी से छूट गया और वह एक बार फिर तेजी से बाहर की ओर भागा. बैड के भीतर टिकटौक स्टार और ब्यूटी पार्लर की मालकिन शिवानी खोबियान की लाश पड़ी हुई थी. बदबू उसी बैड में से आ रही थी.

शिवानी का शव देख कर नीरज के हाथपांव थरथर कांपने लगे. एक पल के लिए उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? थोड़ी देर बाद जब वह सामान्य हुआ तो उस ने सब से पहले अपनी दोस्त श्वेता को फोन कर के शिवानी दीदी की लाश के बारे में जानकारी दी और पार्लर पर आने को कहा. यह 28 जून की बात है.

शिवानी की लाश मिलने की जानकारी होते ही घर में कोहराम मच गया था. श्वेता, उस की मम्मी और पापा तथा कुछ परिचित तत्काल पार्लर पहुंच गए, जहां शिवानी की लाश बैड के अंदर पड़ी थी. मौके पर पहुंचे मृतका के पिता विनोद खोबियान ने फोन कर के घटना की जानकारी कुंडली थाने को दे दी. सूचना मिलते ही कुंडली थाने के थानेदार रविंदर पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. तब तक वहां भारी भीड़ जमा हो गई थी. पुलिस को आया देख भीड़ छंट गई.

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सभी को इस बात पर ताज्जुब हो रहा था कि शिवानी ने मैसेज से जब हरिद्वार जाने की बात कही थी तो उस की लाश बैड के भीतर कैसे आई?

थानाप्रभारी रविंदर ने भीड़ को हटाया और टीम के साथ दुकान के भीतर गए. उन्होंने सरसरी निगाह से एकएक चीज की जांचपड़ताल की. दुकान के भीतर रखे ब्यूटी प्रसाधन और अन्य चीजें अपनी जगह थीं. हत्यारे ने किसी चीज को छुआ तक नहीं था. इस से एक बात तय थी कि हत्यारे की मंशा लूटपाट करने की नहीं थी. उस का लक्ष्य सिर्फ शिवानी थी और उस ने उस के प्राण लिए थे.

शिवानी की हत्या कर के लाश को बैड के अंदर छिपाया ही नहीं गया था, बल्कि बाहर से दुकान का ताला भी बंद कर दिया गया था. इस से साफ पता लग रहा था कि इस घटना में उस का कोई जानने वाला जरूर शामिल था. एसओ रविंदर ने लाश का मुआयना किया. लाश बैड के भीतर आड़ीतिरछी पड़ी हुई थी. शरीर पर एक खरोंच तक नहीं थी. लाश से बदबू उठ रही थी, इस से अनुमान लगाया गया कि शिवानी की मौत 2 से 3 दिनों के बीच हुई होगी.

घटनास्थल और लाश का मौकामुआयना करने के बाद एसओ रविंदर ने डीएसपी वीरेंद्र सिंह और एसपी जे.एस. रंधावा को फोन कर के घटना की सूचना दे दी. थोड़ी देर बाद डीएसपी सिंह मौके पर आ गए. लाश के परीक्षण से यह बात साफ हो गई कि शिवानी की हत्या गला दबा कर की गई थी. उस के गले पर निशान मौजूद थे.

पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए नागरिक अस्पताल सोनीपत भेज दिया और आगे की कार्रवाई में जुट गई. एसओ रविंदर ने मृतका के पिता विनोद से उस की किसी से दुश्मनी अथवा लड़ाईझगड़े की बात पूछी तो उन्होंने ऐसी किसी भी बात से इनकार किया लेकिन इतना जरूर बताया कि आरिफ नाम का एक लड़का सालों से शिवानी को परेशान कर रहा था, उसी पर शक है.

पिता की बात सुन कर श्वेता को याद आया कि 26 जून की दोपहर में जब शिवानी से उस की बात हुई थी तो उस ने बताया कि आरिफ पार्लर पर आया है और परेशान कर रहा है. इस के बाद उस ने यह कहते हुए फोन काट दिया था कि वह बाद में बात करेगी. लेकिन शिवानी ने कालबैक नहीं किया. ऐसा पहली बार हुआ था कि शिवानी देर रात तक घर नहीं लौटी थी.

श्वेता ने आगे बताया कि जब उस ने शिवानी के फोन पर काल लगाई तो फोन बंद आने था. तब मैं ने उस के वाट्सऐप पर मैसेज दिया तो थोड़ी देर बाद उस के फोन से रिप्लाई आया कि जरूरी काम से हरिद्वार आई हूं. मंगलवार तक घर लौट आऊंगी.

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इंसपेक्टर रविंदर ने श्वेता की बातें बड़े गौर से सुनीं. उस की बातें सुन कर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि शिवानी की हत्या में कहीं न कहीं आरिफ का हाथ जरूर है. संभव है शिवानी की हत्या उसी ने की हो और वहां से भागते समय शिवानी का फोन अपने साथ ले गया हो. फिर घर वालों को गुमराह करने के लिए उसी फोन से शिवानी की ओर से मैसेज का जवाब दिया हो.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

नशे की लत ने बनाया हत्यारा

समाज में फैली क‌ई बुराइयों की लत लोगों में इस कदर हावी है कि उन्हें अच्छे बुरे कामों में अंतर नहीं दिखता. जुआं,सट्टा और लाटरी का खेल हो या शराब, गांजा, स्मैक का नशा हो, इनकी लत जिसे पड़ जाए, उसे इंसान से शैतान बनने में देर नहीं लगती. नशे के आदी हो चुके लोगों को यदि नशा करने नहीं मिलता,तो उसे पाने के लिए वे किसी भी हद तक चले जाते हैं. नशे की लत का शिकार हुए लोगों को अपने घर परिवार या रिश्तों की  कोई फ़िक्र नहीं होती.नशे के लिए अपने घर के वर्तन और बहु वेटियों की इज्जत तक नीलाम कर देते हैं.

एक यैसी ही घटना हाल ही में मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले में  हुई है, जिसमें नशे की आदत के चलते कर्ज में डूबे एक जीजा ने अपने सगे साले का कत्ल कर दिया.

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नरसिंहपुर जिला मुख्यालय से करीब 15 किमी दूर  छोटे से गांव भैंसा पाला में रहने वाले किसान सुरेश पटेल के पास भी 20 एकड़ ज़मीन है. अपनी जमीन पर गन्ना,धान और गेहूं जैसी फसलों का उत्पादन करने वाले सुरेश की माली हालत भी अच्छी है. सुरेश के छोटे से परिवार में  28 साल का  एक लड़का विनय और एक 25 साल की वेटी का बिबाह आज से 4 साल पहले पास के ही नबलगांव के प्रदीप कुमार लोधी के साथ हुआ था. 30 साल का प्रदीप ग्राम पंचायत में मनरेगा योजना के तहत  रोजगार सहायक की नौकरी करता था.लेकिन शराब पीने ,  और जुआं खेलने के शौक की वजह से अपनी महिने भर की पगार उसे कम पड़ने लगी थी.  प्रदीप के जब बच्चे  हो गये तो यैसे में उसकी पत्नी उसे शराब छोड़ने और दो पैसे बचाकर रखने की नसीहत देने लगी .,लेकिन प्रदीप शराब और कबाब को छोड़ने तैयार नहीं था.

गरीब मजदूरों को काम देने के लिए चलने वाली मनरेगा योजना की निगरानी के लिए नियुक्त प्रदीप ने करीब एक साल पहले फर्जी अगूंठा लगाकर मजदूरों की लाखों रुपए की मजदूरी हड़प ली थी . गांव के मजदूरों ने  इसकी शिकायत जनपद और जिला पंचायत में कर दी .जिला पंचायत के अधिकारियों ने जांच में प्रदीप को सरकारी रकम के गबन के आरोप में नौकरी से निकाल दिया. सरकारी नौकरी से निकाले जाने के बाद वह परेशान रहने लगा.

भैंसा पाला  गांव से महज 5 किमी दूर नबलगांव में रहने वाले प्रदीप लोधी के पिता एक छोटे से किसान है,जिनके पास 5-6 एकड़ जमीन  है.रोजगार सहायक के पद पर कार्यरत प्रदीप लोधी पर गबन का मामला कायम होने से जब नौकरी हाथ से चली गयी तो शराब और जुआं का शौकीन प्रदीप गांव के लोगों से कर्ज लेकर अपने शौक पूरे करने लगा. नौकरी से बहाली के लिए गबन की रकम भरने के लिए लाखों रुपए की उसे जरूरत थी. वह रात दिन इसी उधेड़बुन में लगा रहता कि  पैसों का इंतजाम किस तरह करे और नौकरी से बहाल हो जाए. एक दिन अपने दोस्त पवन के साथ शराब पी रहे प्रदीप  के शातिर दिमाग में एक आइडिया आया.

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प्रदीप का साला विनय ग्राम भैसा से लगी करीव 20 एकड कृषि भूमि का अकेला मालिक था. जिसकी कीमत आज करोड़ों रुपए है. प्रदीप ने सोचा कि यदि विनय को रास्ते से हटा दिया जाए, तो  ससुराल की 20 एकड़ जमीन में से आधा हिस्से की 10 एकड़ जमीन उसकी पत्नी को मिल  जाएगी और उसकी तंगहाली हमेशा हमेशा के लिए दूर हो जायेगी. प्रदीप ने इस काम में मदद के लिए अपने मित्र पवन को तैयार कर लिया . पवन नबलगांव में ही एक छोटी सी दुकान चलाता था. लेकिन मंहगे मोबाइल और शराब ,कबाब के शौकीन पवन के शौक उस दुकान की आमदनी से पूरे नहीं हो रहे थे. प्रदीप ने  पवन सेन को 20 लाख रूपये देने का लालच दिया तो वह इस काम के लिए जल्द ही तैयार हो गया. दोनों ने उसी रात विनय की  हत्या करने की प्लानिंग बनाई. पहले तो पवन ने अपने एक परिचित से  एक देशी कट्टा (पिस्टल)का जुगाड  किया.फिर 22 जुलाई 2020 को अचानक प्रदीप ने साले विनय को फोन करके बताया कि आज   पार्टी होगी ,तुम अपने खेत पर मिलना . चूंकि इसके पहले भी इस तरह की पार्टियां होती रहती थी, इसलिए विनय ने भी जीजा की खातिरदारी के लिए हामी भर दी.घटना वाले दिन शाम को प्रदीप और पवन मोटरसाइकिल पर सवार होकर नरसिंहपुर गये, जहां  शराब की दुकान से दो  बोतल और मीट मार्केट से मटन लेकर सीधे विनय के खेत पर बने नलकूप पर पहुंच गये.

योजना के अनुसार वहां   शराब  पीने और मीट खाने के बाद बातों के दौरान ही प्रदीप ने पहले से लोड किये गये देशी कट्टे से  गोली चला दी,जो विनय को नाक और आंख के बीच लगी.

गोली लगते ही कुछ समय वह तड़फड़ाता रहा. जब दोनों को यकीन हो गया कि विनय की मौत हो चुकी है,तो दोनों रात के अंधेरे में  ही मोटर साइकिल से अपने गांव बापस आ गये.

सुबह जब विनय की मौत की खबर ससुराल से मिली तो पत्नी को लेकर ससुराल पहुंच गया. प्रदीप ससुराल में विनय की मौत पर दुखी होने का ढोंग करता रहा और पोस्ट मार्टम से लेकर अंतिम क्रिया कर्म में शामिल रहकर पुलिस की गतिविधियों पर नजर भी रखता रहा.

कहते हैं कि कानून के लंबे हाथ अपराधी को पकड़ ही लेते हैं , इसलिए प्रदीप भी पुलिस की निगाह से बच न सका.पुलिस को गांव वालों से पूछताछ में पता चला कि वह घटना वाले दिन विनय के खेत पर दिखा था.

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विनय की मौत के बाद  प्रदीप अपनी पत्नी के साथ अपनी ससुराल में ही मौजूद था.इसलिए पुलिस ने जब उससे पूछताछ की तो पहले तो वह पूरी घटना से अनजान बना रहा.लेकिन  पुलिस थाने में बुलाकर  जब प्रदीप और पवन से कड़ाई से पूछताछ की गई तो दोनों ने विनय की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया . जमीन हड़पने और रूपए पैसों के लालच में अपने इकलौते साले  विनय की हत्या  का मास्टर माइंड विनय की बहिन का सुहाग प्रदीप लोधी ही निकला. जिसने  भी इस खुलासे को सुना, वह अबाक  रह गया.  एक भाई ने जिस बहिन को हंसी खुशी  बैंण्ड-बाजों के साथ अपने पति के घर विदा किया था, उसी पति ने अपनी पत्नी के भाई को हमेशा के लिए मौत की नींद सुला कर  दिया.

यह कहानी बताती है कि शराब और कबाब के शौक ने किस तरह दो युवकों को अपराधी बना दिया.      एक  शराबी पति के द्वारा  अपने ससुराल की जमीन पाने के लिए अपने इकलौते साले की हत्या कर दी ग‌ई .वह भी उस समय जब कि महज कुछ दिन बाद भाई बहिन के पवित्र रिश्ते को रेशम की डोर से कई जन्मों तक बांधे रखने के लिए बहिन अपनी रक्षा की कामना भाई से करते हुऐ उसे राखी बांधती है और इस रेशम की डोर से अपनी रक्षा की दीवार को मजबूत करने का भरोसा भाई से रखती है. लेकिन रक्षाबंधन आने के पहले ही लोभ की सारी हदें पार करते हुए अपनी गंदी हसरतों, नशा की लतों को पूरा करने के लिए खुद अपनी ही पत्नी के इकलौते भाई  का ही खून कर दिया.

आज भी समाज का एक बड़ा तबका दिन रात हाड़ तोड़ मेहनत,मजदूरी करके रूपए तो कमाता है, लेकिन घर पहुंचने के पहले आधे रूपयों की शराब पी जाता है. घर में बीबी , बच्चे इंतजार करते हैं कि परिवार का मुखिया राशन पानी लेकर आयेगा, लेकिन नशे में धुत ये मुखिया घर जाकर बीबी , बच्चों के साथ मारपीट करता है. नशे की लत में पड़े हुए यैसे लोग जघन्य अपराध करके जेल पहुंच जाते हैं और बीबी बच्चों को यतीम होकर रहना पड़ता है.

दरअसल यैसे लोगों को नशा परोसने में सरकार चलाने वाले नेताओं का योगदान कम नहीं है. चुनाव के बक्त वोट हासिल करने के लिए इन्हें मुफ्त में शराब , कबाब और रूपए बांटने वाले नेता ही इन्हें आगे के लिए मुफ्त खोरी की लत लगा देते हैं.

आज भी समाज में कुछ लोग जो नशे की लत से दूर हैं,वे अपना जीवन खुशियों के संग जी रहे हैं.नशे का जहर पूरे परिवार के जीवन को तहस नहस कर देता है और पूरी उम्र रुपए पैसों की तंगहाली झेलना पड़ती है.

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रिश्तों की डोर : भाग 3- सुनंदा की आंखों पर पड़ी थी पट्टी

बेटे को मन ही मन शर्मिंदगी का एहसास हुआ. मां को उस ने अपने आने की बात इस डर से नहीं बताई थी कि शायद सुनंदा तैयार न हो और सुनंदा की मम्मी ने अपनी मजबूरी जता दी.

‘‘अच्छा मां, मैं सुनंदा से पूछता हूं.’’

विनय ने सुनंदा से बात की. सुनंदा को बुखार में पड़े हुए 5 दिन हो गए थे. बहुत अधिक कमजोरी आ गई थी. विनय चाहते हुए भी उस की वैसी देखभाल नहीं कर पा रहा था जैसी होनी चाहिए थी.

सुनंदा ने भी सोचा कि कौन सा वह हमेशा के लिए रहने जा रही है. जब ठीक हो जाएगी तब वापस आ जाएगी. यह सोच कर उस ने हामी भर दी. अपने फ्लैट में ताला लगा कर विनय, सुनंदा को ले कर मां के पास रहने चला गया.

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सुनंदा का बुखार अगले कुछ दिनों में और बिगड़ गया. ब्लड टैस्ट हुए. उसे टायफायड हो गया था. मांबेटी ने सुनंदा की देखभाल में रातदिन एक कर दिया. परीक्षा होते हुए भी वानिया, सुनंदा की देखभाल में मां का पूरा साथ देती. मां बहू के सिरहाने बैठ कर उस का सिर सहलाती रहतीं, ठंडे पानी की पट्टियां करतीं. सुनंदा इस समय इतनी दयनीय स्थिति में थी कि मांबेटी अपना सारा वैमनस्य भूल कर उस की देखभाल कर रही थीं.

सुनंदा अर्धबेहोशी में सबकुछ महसूस करती. मां उसे अपने हाथ से खिलातीं, वानिया सूप, जूस व दलिया बना कर लाती. भाई भी निश्ंिचत हो कर नौकरी पर जा पा रहे थे. धीरेधीरे सुनंदा की तबीयत ठीक होने लगी. अभी कमजोरी बहुत ज्यादा थी. वानिया भाभी को सहारा दे कर कुरसी पर बिठा देती, उस का बिस्तर ठीक कर देती, स्पंज कर कपड़े बदल देती. सुनंदा की कमजोरी भी ठीक होने लगी. उसे पता था कि उस की मम्मी ने अपनी मजबूरी जता दी थी और जिस सास के साथ उस ने कभी सीधे मुंह बात नहीं की, हर समय उस का व्यवहार उस के साथ तना हुआ ही रहा, उसी सास ने अपना सारा बैरभाव भूल कर, कितने प्यार व अपनेपन से उस की देखभाल की.

सुनंदा सोचने लगी कि अगर उस की भाभी की तबीयत खराब होती तो क्या मम्मी मजबूरी जता देतीं…शायद नहीं, भाभी उन की जिम्मेदारी हैं और भाभी भी तो कितनी अच्छी हैं. उस के मातापिता का कितना खयाल करती हैं. दूसरे शहर में रहते हुए भी उस के मम्मीपापा के प्रति पूरी जिम्मेदारी समझती हैं. सुनंदा के प्रति भी उन का व्यवहार कितना प्यार भरा है पर उस ने क्या जिम्मेदारी समझी अपनी सासननद के प्रति, जोकि एक तरह से उस के ऊपर ही निर्भर थे. क्या पढ़ने वाली कुंआरी ननद के प्रति उस का कोई फर्ज नहीं था? उस की देखभाल व उस का भविष्य निर्धारित करने का जिम्मा पिता के न होने पर क्या बड़े भाईभाभी का नहीं था. वृद्ध मां आखिर किस की जिम्मेदारी हैं. उन के रवैए से परेशान हो कर ही मां ने उन्हें जाने के लिए कहा था. बीमारी के बाद बिस्तर पर लेटी सुनंदा खुद से ही सवालजवाब करती रही. जब इनसान पर परेशानियां पड़ती हैं तभी अपनों का महत्त्व समझ में आता है और आदमी की विचारधारा भी बदलती है.

सुनंदा ठीक हो गई. एक दिन सुबह नहाधो कर मां के पास बैठ गई और बोली, ‘‘मांजी, मैं अब ठीक हूं…सोचती हूं परसों से आफिस जाना शुरू कर दूं.’’

‘‘ठीक है,’’ मां संक्षिप्त सा जवाब दे कर चुप हो गईं क्योंकि उन के दिल के घाव पर पपड़ी तो जम गई थी पर घाव सूख नहीं पाया था. बीमार सास के प्रति बहू ने भले ही अपना फर्ज नहीं निभाया था पर उन्होंने अपने फर्ज का पालन किया था. उन्होंने मन ही मन सोचा कि सुनंदा अब अपने घर जाने की सोच रही है इसीलिए वह भूमिका बांध रही है. तो जाए…उन्हें एतराज भी क्या हो सकता है.

सुनंदा कोमल स्वर में बोली, ‘‘सोचती हूं…मैं आफिस चली जाती हूं…मुझे भी इतना समय नहीं मिल पाता कि सुबहशाम खाना बना सकूं इसलिए खाना बनाने वाली का प्रबंध कर देते हैं और साफसफाई करने वाली कपड़े धोने का काम भी कर लिया करेगी, उस की तनख्वाह बढ़ा देंगे.’’

‘‘नहीं, इस की जरूरत नहीं है,’’ मां सपाट स्वर में बोलीं, ‘‘मुझे इस की आदत नहीं है और मेरे पास इतने पैसे भी नहीं हैं…फिर हम मांबेटी का काम ही कितना होता है. तुम ऐसा प्रबंध अपने घर पर कर लो,’’ मां अपनी बात स्पष्ट करती हुई बोलीं.

सुनंदा ठगी सी चुप हो गई. थोड़ी देर बाद बोली, ‘‘क्या यह मेरा घर नहीं है, मांजी?’’

‘‘यह घर तुम्हारा था…तुम ने इसे अपना घर नहीं समझा…इसलिए यह सिर्फ मेरा और वानिया का है.’’

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सुनंदा मां के शब्दों से आहत तो हुई पर उसे आत्मसात करती हुई बोली, ‘‘आप का गुस्सा जायज है, मांजी. मैं आप से माफी मांगती हूं.’’

‘‘मेरे मन में तुम्हारे लिए गुस्सा, माफी, प्यार कुछ भी नहीं है…तुम अपने घर में खुश रहो, मैं अपने घर में खुश हूं.’’

‘‘मां, आप झूठ बोल रही हैं…आप हमें बहुत प्यार करती हैं पर हमारी गलतियों पर आए गुस्से ने आप के प्यार को ढक दिया है.’’

इस बात का मां से कोई जवाब नहीं दिया गया. उन की आंखों में आंसू झिलमिला गए. सुनंदा ने हिम्मत कर के मां के दोनों हाथ पकड़ लिए.

‘‘मां, मुझे अपनी गलतियों का एहसास है…सिर्फ हमारे गलत विचार ही हमारी सोच को गलत तरफ मोड़ देते हैं. मुझे माफ कर दीजिए, मैं अपने घर वापस लौटने की इजाजत चाहती हूं लेकिन इस बार आप की बेटी बन कर.’’

सुनंदा के शब्दों की कोमलता, पश्चात्ताप व ग्लानि से मां के मन का गुबार बहने लगा. उन्होंने बहू को गले लगा लिया और बोलीं, ‘‘अपने बच्चों से किस को प्यार नहीं होता सुनंदा…दिलदिमाग जुडे़ हों, अपनों पर विश्वास हो तो हर रिश्ते की बुनियाद मजबूत होती है. आपस में सहज बातचीत है तो कुछ भी खराब नहीं लगता. गलतफहमियां नहीं पनपतीं…यह तुम्हारा घर है, आज ही जा कर सामान ले आओ.’’

सुनंदा मांजी के गले लगे हुए सोच रही थी, ‘आखिर ऐसा क्या था जो उन दोनों सासबहू के बीच में से बह गया और सबकुछ पारदर्शी हो गया. शायद उस की गलत सोच, गुमान, पराएपन का भाव, अपना न समझने का भाव, उस का अहम, यही सबकुछ बह गया था.

रिश्तों की डोर : भाग 2- सुनंदा की आंखों पर पड़ी थी पट्टी

वानिया मां को दवा देने के बाद जूठे बरतन उठा कर कमरे से बाहर चली गई. मां विचारमग्न हो चुपचाप लेट कर सोचने लगीं कि दोनों अच्छा कमाते हैं, जब अपने पास समय नहीं है तो जरा भी जिम्मेदारी महसूस करें तो खाना बनाने के लिए किसी कामवाली का प्रबंध कर सकते हैं, लेकिन पैसे भी नहीं खर्च करना चाहते, समय भी नहीं है, भावना भी नहीं है. दूसरा दिन भर खटता रहे तो उस के लिए तुम्हारे पास दो मीठे बोल भी नहीं हैं.

वानिया ठीक कहती है, जब अपनी भाषा सामने वाले की समझ में नहीं आए तो उस की भाषा में उसे समझाने की कोशिश तो करनी ही चाहिए. आखिर उसे अपनी गलती और दूसरे के महत्त्व का एहसास कैसे हो? मां कई तरह से सोचती रहीं. बेटे को रहने के लिए कंपनी की ओर से अच्छाभला किराया मिलता है. यह घर उन का है, उन के पति ने बनाया था. आधा घर किराए पर उठा कर भी वह और वानिया अपनी जीविका चला सकते हैं. पति का जो थोड़ाबहुत पैसा उन के नाम जमा है वह वानिया के विवाह व शिक्षा आदि के लिए काफी है.

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ऐसा सोच कर कुछ निश्चय कर मां निश्ंचिंत हो कर सो गईं. थोड़े दिन बाद मां ठीक हो गईं. बेटेबहू का रवैया जैसा चल रहा था चलता रहा. एक दिन मौका देख कर मां बहू को सुनाते हुए बेटे से बोलीं, ‘‘विनय, तुम्हें तो कंपनी से अच्छाखासा किराया मिलता है…कहीं अपने लिए किराए का अच्छा सा फ्लैट देख लो.’’

‘‘क्यों, मां?’’ विनय अवाक् सा मां का चेहरा देखता रह गया. सुनंदा की भी त्योरियां चढ़ गईं.

‘‘बात सीधी सी है, बेटा. वानिया अब बड़ी हो रही है…उस की शादी के लिए भी पैसा चाहिए. मैं चाहती हूं कि आधा घर किराए पर दे दूं और वह पैसा वानिया की शादी के लिए जोड़ दूं, वरना तो सारा भार तुम्हारे ऊपर ही पड़ जाएगा,’’ मां कोमल स्वर में बोलीं.

सुनंदा की समझ में चुपचाप बात आ गई. विनय भी थोड़ी देर चुप खड़ा रहा फिर अपने कमरे में चला गया, लेकिन सुनंदा के दिल में उथलपुथल मच गई. अलग रहने पर इन दोनों की जिम्मेदारी भी धीरेधीरे कम हो जाएगी, फिर खत्म भी हो सकती है. साथ रहने पर वानिया की शादी उन्हें अपने स्तर के हिसाब से करनी पड़ेगी, पैसा खर्च होगा. अलग रह कर दोनों जैसा चाहे गरीबी में रहें और जैसी चाहें शादी करें, अगर चाहेंगे तो वे दोनों भी बस, शामिल हो जाएंगे. ऐसा सोच कर वह विनय के पीछे पड़ गई. विनय पहले तो नहीं माना फिर कई तर्कवितर्क के बाद मान गया.

3-4 दिन की मेहनत के बाद आखिर विनय को 2 बेडरूम का खूबसूरत सा फ्लैट मिल गया और दोनों खुशीखुशी नए फ्लैट में चले गए. वानिया तो बहुत खुश हुई पर मां का दिल टीस गया. 1-2 दिन वह थोड़ा असमंजस की दशा में रहीं फिर धीरेधीरे उन्हें भी अच्छा लगने लगा.

मकान का नीचे का हिस्सा किराए पर दे कर मांबेटी ऊपरी हिस्से में चली गईं. किरायेदार आने से जहां उन को सुरक्षा का आभास हुआ वहीं पैसा आने से आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो गई. वानिया अपनी पढ़ाई पर अच्छी तरह ध्यान दे रही थी. मां की देखभाल तो वह वैसे भी खुद ही कर रही थी.

उधर सुनंदा की खुशी चार दिन भी नहीं रही. दिन भर घर बंद रहने की वजह से कामवाली काम करे तो कैसे. पैसा होते हुए भी अपने लिए सुविधा जुटाना उन के लिए मुश्किल हो रहा था. समय के अभाव में घर अस्तव्यस्त रहता था. खाने का कोई ठिकाना नहीं था. घरबाहर संभालते- संभालते सुनंदा को 24 घंटे भी कम लगने लगे. सुनंदा पर काम का दबाव बढ़ा तो विनय भी कहां अछूता रहता. घर के कुछ काम उस के भी हिस्से में आ गए. जिस की वजह से आफिस में भी कार्यक्षमता पर असर पड़ने लगा. जहां एक तरफ मांबेटी की जीवनशैली सुधर गई वहीं दूसरी तरफ विनय और सुनंदा की जीवन- शैली गड़बड़ा गई. आराम व निश्चिंतता खत्म हो गई थी.

अति व्यस्त दिनचर्या से सुनंदा की तबीयत गड़बड़ा गई. 1-2 दिन तो किसी तरह से विनय ने देखभाल की लेकिन ज्यादा छुट्टी लेना उस के लिए मुश्किल था. थकहार कर उस ने मां को फोन किया. मजबूरी के चलते सुनंदा चुप रह गई. उस ने मां से कहा कि वह थोड़े दिन उन के पास रहने को आ जाएं.

‘‘कैसे आ सकती हूं, बेटा,’’ मां बेटे की बात सुन कर बोलीं, ‘‘तू तो जानता है कि वानिया के पेपर चल रहे हैं…इस के अलावा बच्चे उस से ट्यूशन पढ़ने आते हैं इसलिए वह मेरे साथ आ नहीं सकती और उसे अकेला छोड़ कर आना मेरे लिए संभव नहीं है.’’

‘‘सुनंदा की तबीयत खराब है, मां.’’

मां थोड़ी देर चुप रहीं, अपनी बीमारी के दौरान बेटेबहू का रवैया याद आया. दिल ने चाहा कि कोई कड़वा सा जवाब दे दें लेकिन फिर अपने को संयत कर के बोलीं, ‘‘बेटा, मजबूरी है, नहीं तो मैं आ ही जाती. सुनंदा की मम्मी को बुला लो थोड़े दिन के लिए…उन के साथ ऐसी मजबूरी नहीं है.’’

मजबूर हो कर विनय ने सुनंदा की मम्मी को फोन किया. उन्होंने भी अपनी न आ पाने की मजबूरी जता दी, ‘‘सुनंदा के पापा को छोड़ कर कैसे आ सकती हूं बेटा, उन की तबीयत भी ठीक नहीं रहती है.’’

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विनय सोच में पड़ गया. मां के पास जाने को सुनंदा तैयार नहीं होगी लेकिन अपनी मम्मी के पास चली जाएगी. यही सोच कर बोला, ‘‘ठीक है मम्मी, फिर मैं सुनंदा को आप के पास छोड़ देता हूं क्योंकि यहां दिन भर फ्लैट में अकेले कैसे रहेगी. मैं भी अब छुट्टी नहीं ले सकता हूं.’’

सुनंदा की मम्मी चुप हो गईं. बीमार बेटी की देखभाल तो करनी ही पड़ेगी. साथ में दामाद भी तो यहीं आएगा. 2 लोगों का काम बढ़ जाएगा. नौकर छुट्टी पर गया था. उन के खुद के बस का था भी नहीं.

‘‘बेटा, नौकर तो इन दिनों छुट्टी पर है…मुझ से तो अपने ही दोनों का काम मुश्किल से हो पा रहा है, तुम अपनी मां को क्यों नहीं बुला लेते,’’ कह कर उन्होंने फोन रख दिया.

क्या करे अब…एक दिन की और छुट्टी लेनी पड़ेगी. उधर मां का मन शांत नहीं हो पा रहा था इसलिए शाम होतेहोते उन्होंने बेटे को फोन कर ही दिया, ‘‘कोई इंतजाम हुआ बेटा. नहीं तो अगर सुनंदा तैयार हो तो तुम लोग थोड़े दिनों के लिए यहां आ जाओ…जब सुनंदा ठीक हो जाए तब चले जाना.’’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

प्रेम की पुड़िया में 9 दिन का राज : भाग 3

रंजीत का शव 23 जून को तड़के साढ़े 3 बजे बरामद हो गया था. उस के बाद से 25 जून शाम साढ़े 6 बजे तक वैशाली ने 6 बयान बदले. उस ने पुलिस को खूब छकाया. बारबार बयान बदल कर पुलिस को उलझाने की कोशिश करती रही.

उस ने पहला बयान 21 जून की दोपहर 12 बजे दिया था, जिस में उस ने कहा कि रंजीत और उस के प्रेम संबंध थे, जो एक साल पहले खत्म हो चुके थे. अब उस से उस की बात नहीं होती. उस ने दूसरा बयान 22 जून को रात 12 बजे दिया. मोबाइल की काल डिटेल्स आने के बाद पुलिस ने उसे दोबारा चौकी बुलाया. तब उस ने बताया कि रंजीत की मौत हो चुकी है. उस की लाश खेत में पड़ी है. उस ने आत्महत्या की है.

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तीसरा बयान 23 जून की सुबह 6 बजे दिया. जिस में उस ने कहा कि 30 जून को रंजीत की शादी थी. हम दोनों ने आत्महत्या करने का फैसला किया था. 14 जून की सुबह रंजीत ने उसे काल कर के गन्ने के खेत में बुलाया था, जहां रंजीत ने खुद को गोली मार ली थी. इस के बाद मुझे भी गोली मारनी थी, लेकिन मैं घबरा कर घर भाग आई.

उस ने चौथा बयान उस ने 24 जून की दोपहर 11 बजे दिया, जिस में कहा कि रंजीत ने मेरे खेत में पहुंचने से पहले ही आत्महत्या कर ली थी. मैं ने रंजीत के भाई को काल की थी, पर उस ने काल रिसीव नहीं की तो मैं ने अपनी मां को फोन कर के मौके पर बुला लिया और मां के साथ वहां से घर चली गई.

9 दिन अपने प्रेमी की मौत का राज सीने में दफन करने और 117 घंटे में 7 बार बयान बदलने वाली वैशाली ने आखिरकार शुक्रवार सुबह सच उगल ही दिया. थाना सिविल लाइंस के थानाप्रभारी नवल मारवाह ने वैशाली के 7वें बयान के आधार पर 11 दिन बाद रंजीत की हत्या का खुलासा कर दिया. पुलिस के अनुसार वैशाली और उस की मां ने रंजीत की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मौके से मिला तमंचा, कारतूस और सिर में मिले गोली के 2 टुकड़े, फोटोग्राफी और वीडियो फुटेज, फोरैंसिक लैब की रिपोर्ट और बैलिस्टिक एक्सपर्ट की राय जैसे सबूत मांबेटी के खिलाफ काफी थे.

पुलिस ने पूछताछ के लिए वैशाली के भाई और उस के पिता को भी हिरासत में लिया था. दोनों से पूछताछ की गई, लेकिन उन की कोई भूमिका सामने नहीं आई. फरार शुक्ला के कमरे की तलाशी के बाद पुलिस ने उस का बैंक खाता फ्रीज करा दिया.

पुलिस को गुमराह करने की कला के बारे में वैशाली ने बताया कि उस ने अभिनेता अजय देवगन की फिल्म ‘दृश्यम’ एक महीने में 5 बार देखी थी. इसी से प्रेरणा ले कर रंजीत की हत्या का राज अपने सीने में दफन करने की सोची.

फिल्म की तरह ही उन्होंने भी रंजीत की हत्या करने के बाद किया. साथ ही वैशाली ने अपनी मां व मामा को भी यही बताया था कि हो सकता है पुलिस को रंजीत की लाश मिल जाए, लेकिन उन्हें अपने बयान पर अड़े रहना है. रंजीत अपने घर एक डायरी रख कर आया था, जिस में उस ने आत्महत्या के बारे में लिख दिया था. इस से हमें उस का लाभ मिल सकता है. बस उन्हें अपनी तरफ से कोई ऐसी हरकत नहीं करनी है कि पुलिस को कोई शक हो.

वैशाली और उस की मां गुड्डी ने इस हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह कुछ इस तरह थी—

रंजीत फैक्ट्री में नौकरी करने से पहले गांव में परचून की दुकान चलाता था. वैशाली अकसर उस की दुकान सामान लेने जाती थी. दोनों का दुकान पर ही संपर्क हुआ, जो धीरेधीरे प्यार में बदल गया. इस की भनक गांव वालों के साथ दोनों के घर वालों को भी लग गई.

रंजीत वैशाली से शादी करना चाहता था. लेकिन वैशाली के घर वाले तैयार नहीं थे. इस बात को ले कर गांव में पंचायत भी हुई. इस के बाद रंजीत के घर वालों ने उस की शादी थाना छजलैट के गांव भीनकपुर की एक युवती से तय कर दी. शादी 30 जून, 2020 को होनी थी.

लेकिन रंजीत इस शादी से खुश नहीं था. इस बीच उस की और वैशाली की मोबाइल पर बातचीत जारी रही. रंजीत अपनी प्रेमिका वैशाली को जीजान से चाहता था. उस के बिना वह जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता था. उस ने वैशाली से कह दिया था कि वह शादी करेगा तो उसी से, नहीं तो जान दे देगा.

रंजीत वैशाली पर दबाव बना रहा था कि उस के साथ शादी कर ले या फिर दोनों साथसाथ आत्महत्या कर लें. रंजीत वैशाली को बारबार काल कर के टौर्चर करने लगा तो वह तंग आ गई. घटना वाले दिन रंजीत ने उसे आत्महत्या के लिए गन्ने के खेत में बुलाया था.

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योजना के मुताबिक वह खेत में पहुंच गई. कुछ ही देर में वैशाली की मां गुड्डी और उस का मुंहबोला मामा शुक्ला भी वहां आ गए. इस के बाद मामा ने पीछे से रंजीत के हाथ पकड़ कर उसे जमीन पर गिरा दिया. पहली गोली वैशाली ने रंजीत की कनपटी पर मारी. जबकि दूसरी गोली उस की मां ने रंजीत की दाहिनी आंख और नाक के बीच सटा कर मारी. मुंहबोला मामा अपने साथ तमंचा और कारतूस ले कर आया था. लेकिन दोनों गोलियां रंजीत के तमंचे से ही मारी गई थीं.

रंजीत की हत्या करते समय मांबेटी दोनों के हाथ खून से सन गए थे, जिन्हें उन्होंने खेत में ही घास से पोंछ दिया था. रंजीत की हत्या कर के तीनों घर आ गए. घर आने के बाद तीनों ने चाय पी और नाश्ता किया.

वैशाली की मां उस की शादी अपनी जाति के किसी अच्छे घर में करना चाहती थी. समझाने पर वैशाली भी मान गई थी. लेकिन रंजीत वैशाली का पीछा नहीं छोड़ रहा था. तब उस ने शुक्ला के साथ मिल कर उसे रास्ते से हटाने की योजना बनाई. 14 जून को उन्हें मौका मिल गया.

26 जून को पुलिस ने वैशाली और उस की मां गुड्डी को कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

प्रेम की पुड़िया में 9 दिन का राज : भाग 2

उसी दिन शाम को 5 बजे पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. इस रिपोर्ट ने पुलिस की सोच बदल दी. पता चला कि रंजीत के सिर में एक नहीं, 2 गोलियां मारी गई थीं, जो 3 टुकड़ों में बंट कर सिर में फंस गई थीं. इन में से एक गोली कनपटी पर तो दूसरी आंख में मारी गई थी. जाहिर है आत्महत्या करने वाला व्यक्ति खुद को 2 गोली कभी नहीं मार सकता.

निस्संदेह रंजीत को दोनों गोलियां किसी और ने मारी थीं. इस के बाद पुलिस ने हत्या वाली थ्योरी पर जांच करनी शुरू की. वैशाली की घुमावदार बातों से साफ लग रहा था कि अगर काल डिटेल्स न होती तो यह भी पता नहीं चलता कि रंजीत की लाश गन्ने के खेत में पड़ी है. हैरत की बात यह थी कि वैशाली ने इस घटना के बारे में अपने घर वालों को भी कुछ नहीं बताया था. यानी उस ने अपने प्रेमी की मौत की बात 9 दिन तक अपने सीने में दफन रखी थी.

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मंगलवार को पूरे दिन रंजीत की मौत को खुदकुशी बताने वाली सिविल लाइंस पुलिस ने देर रात मृतक के पिता भोपाल सिंह की तरफ से वैशाली, उस के पिता भूपेंद्र, मां गुड्डी, भाई विक्की और मुंहबोले मामा शुक्ला के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

मृतक के घर वाले पुलिस की अब तक की जांच से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे. रंजीत की मौत के मामले में घर वालों ने समानांतर जांच की थी, जिस ने पुलिस पड़ताल की पोल खोल कर रख दी थी. पुलिस शुरू से इस मामले को आत्महत्या मान कर चल रही थी, पुलिस ने गन्ने के उस खेत में 20-25 कदम दूर तक भी पड़ताल करना मुनासिब नहीं समझा था. बुधवार यानी 24 जून को रंजीत के घर वालों ने मामले से जुड़ी कुछ अहम चीजें ढूंढ निकाली थीं.

पुलिस ने वैशाली की बातों पर तो विश्वास किया, लेकिन रंजीत के घर वालों की बातों पर नहीं. इसलिए 24 जून की सुबह चमन सिंह, विमल और उन के पिता घर के अन्य लोगों के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. उन्होंने उसी गन्ने के खेत में खोजबीन शुरू की, जहां से रंजीत का शव मिला था.

खोजबीन में घटनास्थल से 20-25 कदम की दूरी पर एक थैली रखी मिली, जिस में 4 कारतूस रखे थे. उस के पास ही रंजीत का बनियान और जूते मिले.

यह जानकारी जब गांव में फैली तो मौके पर ग्रामीणों की भीड़ जुट गई. इस के बाद पुलिस को सूचना दी गई. सूचना मिलने पर अगवानपुर पुलिस चौकी की पुलिस पहुंच गई. पुलिस ने कारतूस, बनियान, जूते और हड्डियों के अवशेष सील कर दिए.

जबकि 23 जून को पुलिस ने गन्ने के खेत से रंजीत का शव बरामद किया था. लेकिन तब यह सामान बरामद नहीं हुआ था. जिस तरह मामले से जुड़ी अहम चीजें खोज निकाली गईं, उस से पुलिस पड़ताल पर गंभीर सवाल भी उठने लगे.

एएसपी दीपक भूकर के अनुसार रंजीत के घर वालों को 4 कारतूस मिले थे. कारतूस चमकीले हैं, जबकि 23 जून को मिला कारतूस इतना चमकीला नहीं था. शव की कुछ हड्डियां गायब थीं. पोस्टमार्टम में भी 10 फीसदी कम हड्डियां बताई गई थीं. कई दिनों तक शव जंगल में पड़ा होने से संभव है जानवरों ने शव खा लिया हो. इसी से कुछ हड्डियां इधरउधर हो गई हों.

पुलिस ने मामले की जांच को गंभीरता से लेते हुए वैशाली से फिर से पूछताछ करने का फैसला किया. वैशाली किसी थ्रिलर फिल्म जैसी कहानियां बना रही थी. 9 दिन प्रेमी की मौत का राज सीने में छिपाए रखने वाली वैशाली ने 24 घंटे पुलिस को छकाने के बाद फिर अपनी कहानी की स्क्रिप्ट बदल दी थी.

पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि गन्ने के खेत में उस के पहुंचने से पहले ही रंजीत ने खुद को गोली मार ली थी. तब उस ने रंजीत के मोबाइल से उस के भाई को काल किया था. लेकिन उस ने काल रिसीव नहीं की. फिर उस ने अपनी मां को फोन किया.

उस ने बताया कि मां से उस की करीब 9  मिनट बात हुई. वह फोन पर रो रही थी, उस की मां ने काल जारी रखी और बात करतेकरते उस के पास पहुंच गई. मां उसे ले कर घर लौट आई. पुलिस जांच में अब तक यह भी सामने आ चुका था कि रंजीत की लाश गन्ने के खेत में पड़ी होने की जानकारी वैशाली के मांबाप को भी थी.

24 जून की दोपहर पुलिस ने वैशाली की मां गुड्डी को हिरासत में ले लिया. पुलिस ने मांबेटी को आमनेसामने बैठा कर पूछताछ की. पता चला कि पिछले 7 साल से वैशाली के घर एक व्यक्ति शुक्ला रहता था, जो घटना के बाद से फरार है. उस का मोबाइल भी बंद था. वैशाली ने उसे मुंहबोला मामा बताया.

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शुरू में पुलिस जांच में वैशाली के बयान और रंजीत के घर मिली उस की पर्सनल डायरी आत्महत्या की ओर इशारा कर रहे थे. डायरी में रंजीत ने इस बात पर खेद प्रकट किया था कि उस का विवाह उस की मरजी के खिलाफ हो रहा है. डायरी में उस ने परिवार वालों को नसीहत दी थी कि छोटे भाई की शादी उस के मनमुताबिक करें. उस ने डायरी में अपनी एफडी छोटे भाई को देने की बात भी की थी. पुलिस ने इसी आधार पर आत्महत्या की कड़ी से कड़ी जोड़ने का प्रयास किया था.

वारदात की एकलौती चश्मदीद वैशाली ने प्रेमी रंजीत की मौत को ले कर अब तक जो दावे किए थे, उन में काफी विरोधाभास था. उस के रोजरोज बदल रहे बयानों ने पुलिस को चक्कर में डाल दिया था.

उस ने 105 घंटे में 6 बार अपने बयान बदले. हर बार उस का नया बयान सामने आ रहा था. पुलिस उस की इस स्वीकारोक्ति पर चौंकी, जब उस ने कहा कि गन्ने के खेत में उस ने खुद रंजीत को 2 गोलियां मारी थीं, क्योंकि वह उस पर शादी करने का दबाव बना रहा था.

वैशाली के साथ उस की मां ने भी कबूलते हुए कहा कि वह खुद और वैशाली का मामा शुक्ला वैशाली के साथ गए थे. चूंकि दोनों अलगअलग बिरादरी के थे, इसलिए शादी नहीं हो सकती थी. उस ने बहाने से वैशाली को गन्ने के खेत में बुलाया. वहां वैशाली ने मां और मामा के सामने ही 2 गोलियां मार कर रंजीत की हत्या कर दी.

हालांकि पुलिस सारी कडि़यों को आपस में जोड़ रही थी. पुलिस ने फरार आरोपी शुक्ला के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. उस की लोकेशन गोरखपुर की आ रही थी. पुलिस की एक टीम उस की तलाश में जुटी थी. यह जानकारी मिलने पर वह टीम गोरखपुर के लिए रवाना हो गई.

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दूसरी टीम वैशाली और उस की मां से लगातार पूछताछ कर रही थी. जबकि तीसरी टीम लड़की के पिता व भाई से पूछताछ में जुटी थी. चौथी टीम सबूत जुटाने में लगी थी. पुलिस को लग रहा था कि वैशाली के मामा शुक्ला की इस मामले में अहम भूमिका रही होगी.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

प्रेम की पुड़िया में 9 दिन का राज : भाग 1

जिस लड़के या लड़की की शादी हो और वह 2-4 घंटे के लिए घर से इधरउधर हो जाए तो घर वालों को उस की इतनी चिंता होने लगती है, जितनी पहले कभी नहीं हुई. होनी भी चाहिए, क्योंकि जहन में इज्जतबेइज्जती के कई सवाल जो खड़े हो जाते हैं.

लड़की के मामले में तो ऐसे सवाल सोच बन कर सिर पर हथौड़े से बजाने लगते हैं. रंजीत के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ. सुबह 5 बजे दौड़ लगाने निकला रंजीत घंटों बाद भी नहीं लौटा तो घर वालों ने सोचा कि किसी दोस्त के घर चला गया होगा. लेकिन जब वह दोपहर तक नहीं आया तो परेशान हो कर उस के मोबाइल पर काल की गई, लेकिन उस का मोबाइल स्विच्ड औफ था. इस के बाद चिंतित होना स्वाभाविक था.

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रंजीत मुरादाबाद शहर के निकटवर्ती गांव धर्मपुर शेरूआ का रहने वाला था. उस के पिता भोपाल सिंह गांव के पास स्थित प्लाइवुड की एक फैक्ट्री में ठेकेदार थे. उन के बेटों चमन सिंह और विमल में रंजीत बीच का था. भोपाल सिंह ने रंजीत को उसी प्लाइवुड फैक्ट्री में नौकरी दिला दी थी, जहां उन का ठेकेदारी का काम था.

30 जून, 2020 को चूंकि रंजीत की शादी थी, इसलिए भी चिंता की बात थी. चिंताजनक इसलिए क्योंकि गांव की ही वैशाली से उस के प्रेम संबंध थे और वह उस से शादी करना चाहता था. जबकि घर वाले उस की और वैशाली की शादी इसलिए नहीं करना चाहते थे क्योंकि वह दूसरी बिरादरी में शादी के पक्ष में नहीं थे.

रंजीत के पिता भोपाल सिंह, भाई चमन सिंह और विमल ने रंजीत को पूरे गांव में खोजा. सभी संभावित जगहों पर पता लगाया. जब कहीं से भी उस की कोई जानकारी नहीं मिली तो पिता और भाइयों को पुलिस की शरण में जाना ठीक लगा. उन्होंने थाना सिविल लाइंस की पुलिस चौकी अगवानपुर में रंजीत की गुमशुदगी दर्ज करा दी. पुलिस ने भी अपने स्तर पर रंजीत को खोजा. जब रंजीत रात को भी नहीं लौटा तो भोपाल सिंह के परिवार को लगा कि जरूर कहीं कुछ गड़बड़ है.

सोचविचार के बाद भोपाल सिंह अपने बेटों के साथ पुलिस चौकी पहुंचे. उन्होंने रंजीत और वैशाली की प्रेम कहानी के बारे में पुलिस को बता दिया. साथ ही यह भी कि रंजीत और वैशाली देरदेर तक मोबाइल पर बात किया करते थे, जिस की वजह से उस के घर वाले रंजिश रखते थे.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने वैशाली को पुलिस चौकी बुलवा लिया. वह इंटरमीडिएट तक पढ़ी थी, थोड़ी तेज भी थी.

वैशाली ने पुलिस के सामने स्वीकार किया कि रंजीत और उस के बीच प्रेम संबंध थे. दोनों शादी भी करना चाहते थे, लेकिन एक साल पहले सब कुछ खत्म हो गया था. उस ने यह भी कहा कि वह जानती है कि 30 जून को रंजीत की शादी होनी है. ऐसे में उस से बात करने का कोई मतलब नहीं है. सीधीसरल भाषा में कहूं तो मेरी उस से कोई बात नहीं होती, न होगी. इस बातचीत के बाद पुलिस ने उसे घर जाने को कह दिया.

रंजीत के घर वाले और पुलिस कई दिन तक उसे ढूंढते रहे, लेकिन उस का कोई पता नहीं चला. इस पर थानाप्रभारी नवल मारवाह ने रंजीत के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई.

जांच में पता चला कि 14 जून को उस के मोबाइल फोन पर आखिरी काल वैशाली की आई थी. इस पर 22 जून को पुलिस ने वैशाली, भूपेंद्र और भाई विक्की को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. तीनों को थाना सिविल लाइंस ला कर पूछताछ की गई.

पुलिस ने वैशाली से पूछा, ‘‘14 जून को रंजीत के मोबाइल पर आखिरी काल तुम्हारी थी, बताओ उस से क्या बात हुई थी और रंजीत कहां है?’’

‘‘काल उस ने की थी, मैं ने नहीं. मैं पहले ही बता चुकी हूं कि अब हमारे बीच ऐसा कुछ नहीं बचा था कि बात की जाए. मैं नहीं जानती कि वह कहां गया.’’

इंसपेक्टर नवल मारवाह को लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ है. उन्होंने मातहतों से कहा कि तीनों को थाने में बैठाए रखें.

इन लोगों से देर रात पूछताछ की गई. भूपेंद्र और विक्की तो कुछ नहीं बता सके, लेकिन वैशाली ने बम सा फोड़ा. उस ने बताया, ‘‘यह सही है कि 14 जून को रंजीत ने मुझे फोन किया था. उस ने मिलने के लिए मुझे गांव से करीब एक किलोमीटर दूर शुगर मिल के पीछे गन्ने के एक खेत में बुलाया था. उस ने मुझ से कहा कि 30 जून को उस की शादी है. लेकिन वह यह शादी नहीं करना चाहता.’’

वैशाली ने आगे बताया, ‘‘यह सच है कि मैं उस से प्यार करती थी. लेकिन घर वालों की मरजी के बिना शादी नहीं कर सकती थी. उस की भी यही सोच थी. दोनों की बातचीत हुई तो हम ने साथसाथ मरने का फैसला किया. रंजीत तमंचा साथ लाया था. तय हुआ कि वह पहले खुद को गोली मारेगा, बाद में मुझे. यही सोच कर उस ने खुद को गोली मार ली. उस का बहता खून देख कर मैं डर गई और वहां से भाग आई.’’

वैशाली ने यह भी बताया कि रंजीत ने उसे बताया था कि आत्महत्या की बात वह डायरी में लिख कर आया है. साथ ही यह भी कि उस की लाश गन्ने के उसी खेत में पड़ी है. यह बात चौंकाने वाली थी, क्योंकि जिस रंजीत को पुलिस खोज रही थी, उस की लाश गन्ने के खेत में पड़ी थी.

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23 जून को तड़के साढ़े 3 बजे सिविल लाइंस पुलिस ने वैशाली की निशानदेही पर गन्ने के खेत से रंजीत का शव बरामद कर लिया. 9 दिन पुराना शव कंकालनुमा बन गया था. एक एक्सीडेंट के बाद रंजीत की एक बाजू में रौड डाली गई थी. उस रौड और कपड़ों से उस के घर वालों ने बता दिया कि लाश रंजीत की ही है.

फोरैंसिक टीम पुलिस के साथ आई थी. उस ने जरूरी सबूतों के साथसाथ घटनास्थल से 315 बोर का लोडेड तमंचा, एक खोखा और मृतक का मोबाइल फोन बरामद किया. प्राथमिक काररवाई के बाद पुलिस ने रंजीत के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

रंजीत के घर वाले उस की हत्या को सोचीसमझी साजिश बता रहे थे, जबकि पुलिस उसे आत्महत्या मान रही थी. इस में पेच यह था कि 14 जून को घटना से पहले वैशाली और रंजीत के बीच 54 मिनट तक बात हुई थी. ऐसी स्थिति में इसे साजिश नहीं माना जा सकता था. हालांकि इस के बाद ही रंजीत गायब हुआ था.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

रिश्तों की डोर : सुनंदा की आंखों पर पड़ी थी पट्टी

रिश्तों की डोर : भाग 1- सुनंदा की आंखों पर पड़ी थी पट्टी

‘क्यों होता है कोई ऐसा… क्या रिश्तों से जुड़ने के लिए समय का होना ही जरूरी है, धन का होना ही जरूरी है… ऐसा होता तो कुछ समय पहले जब इक्कादुक्का औरतें नौकरी करती थीं, उन के पास तो समय ही समय था, तो सभी अपनों को बांध पातीं, सभी अच्छी होतीं. लेकिन ऐसा नहीं होता था, तब भी औरतें घर तोड़ने वाली होती थीं, कर्कश होती थीं. रिश्तों को जोड़ने के लिए आप का स्वागत वाला भाव, मीठी वाणी, खुला दिलोदिमाग, उस समय का महत्त्व जो आप अपनों के साथ बिताते हो, मधुर मुसकान जरूरी होती है,’ वानिया बड़बड़ा रही थी.

मां क्या कहें बेटी को. इकलौते भाईभाभी का रूखा सा व्यवहार वानिया को अकसर सहन नहीं होता तो वह जबतब मां के सामने बड़बड़ाती थी. जब बेटे की शादी हुई थी तब नई बहू के अडि़यल स्वभाव से मां परेशान होतीं तो यही बेटी मां को समझाती थी. शायद उसे विश्वास था कि समय के साथ भाभी बदल जाएगी, लेकिन कुछ लोग कभी नहीं बदलते…फिर बुनियादी स्वभाव तो कभी नहीं बदलता.

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करे भी क्या वानिया, पहले भाई ऐसे नहीं थे. वानिया अपने भाई विनय से कम से कम 10 साल छोटी थी और जब वह लगभग 10 साल की थी तब पापा उसे व मां को 20 साल के भाई के सहारे छोड़ कर दुनिया से चल बसे थे.

पापा के गले से झूलने वाली उम्र में वानिया ने पापा को खो दिया था. वह अचानक खामोश व खोईखोई सी रहने लगी. लेकिन भाई जरूर 20 साल की उम्र में 40 के हो गए थे. भाई ने मां व वानिया को ऐसे संभाला कि मांबेटी दोनों ही पति व पिता के जाने का गम भूल गईं.

विनय उस समय इंजीनियरिंग कर रहा था. इंजीनियरिंग करने के बाद उस ने गुड़गांव से एम.बी.ए. किया और वहीं उस की नौकरी लग गई. वह मां व वानिया को भी अपने साथ गुड़गांव ले गया था और वहीं फ्लैट ले कर रहने लगा. जिस साल वानिया के भाई की नौकरी लगी उस साल उस ने 10वीं का इम्तहान दिया था.

12वीं में 95 प्रतिशत अंक लाने पर वानिया ने अपने भाई से अद्भुत सी चीज मांगी और वह थी भाभी, क्योंकि मां के कई बार कहने पर भी उस के भाई विनय शादी की बात को टाल रहे थे पर छोटी बहन की मांग को वह नहीं ठुकरा सके.

विनय ने मां को सुनंदा के बारे में बताया, जिस ने उस के साथ एम.बी.ए. किया था और अब वह भी एक प्रतिष्ठित कंपनी में मैनेजर थी. मां को भला क्या आपत्ति हो सकती थी. धूमधाम से विनय और सुनंदा का विवाह हो गया. भाभी के रूप में सलोनी लंबीछरहरी सुनंदा को देख वानिया और मां दोनों निहाल हो गईं.

विवाह की धूमधाम खत्म हो गई. सभी लोग विदा हो गए. सुनंदा ने भी नौकरी पर जाना शुरू कर दिया. मां चाहती थीं कि सुनंदा कम से कम कुछ दिन की तो छुट्टियां ले लेती तो उन का भी बहू का चाव पूरा हो जाता, लेकिन फिर उन्होंने मन को यह सोच कर समझा लिया कि आखिर इतने उच्च पद पर कार्यरत लड़की की कई दूसरी जिम्मेदारियां भी तो होती हैं.

शुरुआत में मां व वानिया, सुनंदा को जरा भी कष्ट नहीं होने देतीं, लेकिन बहू उन्हें जरा भी भाव नहीं देती थी. दोनों ही इस बात को महसूस करते हुए भी महसूस नहीं करना चाहती थीं. उन्हें तो बस, सुनंदा को प्यार करने व उस के लिए कुछ भी करने में मजा आता था. अब धीरेधीरे नई बहू व भाभी का चाव खत्म होने लगा तो सुनंदा की अकड़ उन्हें खलने लगी. सुबह की चाय से ले कर रात के खाने तक मां जो कुछ भी बहू के लिए शौक से करती थीं अब मजबूरी लगने लगी.

वानिया के लिए बड़े भाई पिता समान थे. वह उन के आसपास मंडराती रहती लेकिन सुनंदा को यह फूटी आंख न सुहाता. उन के कमरे में जब कभी वानिया आ जाती तो सुनंदा का चेहरा गुस्से से तन जाता. उस के चेहरे को भांप कर वानिया वहां से चली जाती. सुनंदा का दर्प हर समय उस की बातों व व्यवहार में झलकता रहता. वह खुद से ज्यादा योग्य व स्मार्ट किसी को समझती ही नहीं थी. मां या वानिया किसी की तारीफ करतीं तो वह झट उस की कमी की तरफ उंगली उठा देती या मुंह बिचका देती. अपने इस स्वभाव की वजह से सुनंदा हर किसी के दिल में अपने लिए ईर्ष्या के भाव पैदा कर देती.

सुनंदा के साथ अपने वैवाहिक जीवन का सामंजस्य बिठाने की कोशिश में विनय, मां व बहन से दूर होने लगा. धीरेधीरे भाईबहन और मांबेटे के बीच संवादहीनता की स्थिति आने लगी. भाई भी मां व वानिया के जन्मदिन पर कोई महंगा सा उपहार दे कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मानने लगा.

मां बीमार होतीं तो बेटे की ओर से एक बार डाक्टर व दवाइयों की औपचारिकता पूरी कर दी जाती. उस के बाद यह भी नहीं पूछा जाता कि अब तबीयत कैसी है. इन दिनों भी मां की तबीयत ठीक नहीं चल रही थी. भाई मां को एक बार डाक्टर को दिखा कर दवाइयां ले आए थे. उस के बाद उन को इतनी फुरसत भी नहीं थी कि सुबहशाम 5 मिनट मां के पास बैठ कर, कोमल स्वर में उन का हालचाल पूछ पाते.

वानिया ही किसी तरह अपनी कालिज की पढ़ाई के साथ मां की देखभाल करती और सब को खाना भी पका कर खिलाती. रात भर मां का बुखार देखती, दवा देती और उस घड़ी को कोसती जब उस ने भाई से भाभी की मांग की थी और सुनंदा जैसी भाभी इस घर में आई थीं.

बोला यही जाता है कि प्यार देने पर ही प्यार मिलता है पर वानिया सोचती कुछ लोग सुनंदा भाभी जैसे भी होते हैं जिन के सामने प्यार की, मीठे बोलों की, भावनाओं की, मीठे एहसास की कीमत नहीं होती, बल्कि ऐसे लोग उन्हें मूर्ख लगते हैं.

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‘‘मां, तुम कुछ बोलती क्यों नहीं. भाभी के नौकरी करने का यह मतलब तो नहीं कि घर और तुम्हारी तरफ से वह इस कदर लापरवाह हो जाएं. आखिर यह घर और तुम उन की जिम्मेदारी हो,’’ एक दिन वानिया भन्ना कर बोली.

‘‘किसी दूसरे घर की लड़की को क्या कहना है वानिया, जब अपना बेटा ही परिवार व पत्नी के बीच संतुलन नहीं रख पा रहा है.’’

‘‘भैया भी तो कितने बदल गए हैं मां, फिर भी इस तरह सीधा व समर्पित रह कर काम नहीं चलता. जब दूसरा तुम्हारी भाषा नहीं समझता तो जरूरी है कि उसे उस की भाषा में बात समझाई जाए,’’ वानिया गुस्से में बोली.

‘‘उसे समय भी तो नहीं है न,’’ मां बात को टालने और वानिया को शांत करने की गरज से बोलीं. तभी से वानिया यही सब बड़बड़ा रही थी. उस के ऊपर काम का भार बहुत हो गया था. वह कालिज जाती, किचन में काम करती, मां की भी देखभाल करती, पढ़ाई भी करती, शाम को ट्यूशन भी लेती थी क्योंकि जब से भाभी आई थीं, जेबखर्च के लिए उस को भाई के आगे हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता था.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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