अधूरा प्यार : जुबेदा ने अशोक के सामने कैसी शर्त रखी- भाग 1

Romantic Story in Hindi: मैं हैदराबाद में रहता था, पर उन दिनों लंदन घूमने गया था. वहां विश्वविख्यात मैडम तुसाद म्यूजियम देखने भी गया. यहां दुनिया भर की नामीगिरामी हस्तियों की मोम की मूर्तियां बनी हैं. हमारे देश के महात्मा गांधी, अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन की भी मोम की मूर्तियां थीं. मैं ने गांधीजी की मूर्ति को प्रणाम किया. फिर मैं दूसरी ओर बनी बच्चन और उन्हीं की बगल में बनी ऐश्वर्या की मूर्ति की ओर गया. उस समय तक वे उन की बहू नहीं बनी थीं. मैं उन दोनों की मूर्तियों से हाथ मिलाते हुए फोटो लेना चाहता था. मैं ने देखा कि एक खूबसूरत लड़की भी लगभग मेरे साथसाथ चल रही है. वह भारतीय मूल की नहीं थी, पर एशियाईर् जरूर लग रही थी. मैं ने साहस कर उस से अंगरेजी में कहा, ‘‘क्या आप इन 2 मूर्तियों के साथ मेरा फोटो खींच देंगी?’’

उस ने कहा, ‘‘श्योर, क्यों नहीं? पर इस के बाद आप को भी इन दोनों के साथ मेरा फोटो खींचना होगा.’’

‘‘श्योर. पर आप तो भारतीय नहीं लगतीं?’’

‘‘तो क्या हुआ. मेरा नाम जुबेदा है और मैं दुबई से हूं,’’ उस ने कहा.

‘‘और मेरा नाम अशोक है. मैं हैदराबाद से हूं,’’ कह मैं ने अपना सैल फोन उसे फोटो खींचने दे दिया.

मेरा फोटो खींचने के बाद उस ने भी अपना सैल फोन मुझे दे दिया. मैं ने भी उस का फोटो बिग बी और ऐश्वर्या राय के साथ खींच कर फोन उसे दे दिया.

जुबेदा ने कहा, ‘‘व्हाट ए सरप्राइज. मेरा जन्म भी हैदराबाद में ही हुआ था. उन दिनों दुबई में उतने अच्छे अस्पताल नहीं थे. अत: पिताजी ने मां की डिलीवरी वहीं कराई थी. इतना ही नहीं, एक बार बचपन में मैं बीमार पड़ी थी तो करीब 2 हफ्ते उसी अस्पताल में ऐडमिट रही थी जहां मेरा जन्म हुआ था.’’

‘‘व्हाट ए प्लीजैंट सरप्राइज,’’ मैं ने कहा.

अब तक हम दोनों थोड़ा सहज हो चुके थे. इस के बाद हम दोनों मर्लिन मुनरो की मूर्ति के पास गए. मैं ने जुबेदा को एक फोटो मर्लिन के साथ लेने को कहा तो वह बोली, ‘‘यह लड़की तो इंडियन नहीं है? फिर तुम क्यों इस के साथ फोटो लेना चाहते हो?’’

इस पर हम दोनों हंस पड़े. फिर उस ने कहा, ‘‘क्यों न इस के सामने हम दोनों एक सैल्फी ले लें?’’

उस ने अपने ही फोन से सैल्फी ले कर मेरे फोन पर भेज दी.

मैडम तुसाद म्यूजियम से निकल कर मैं ने पूछा, ‘‘अब आगे का क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘क्यों न हम लंदन व्हील पर बैठ कर लंदन का नजारा देखें?’’ वह बोली.

मैं भी उस की बात से सहमत था. इस पर बैठ कर पूरे लंदन शहर की खूबसूरती का मजा लेंगे. दरअसल, यह थेम्स नदी के ऊपर बना एक बड़ा सा व्हील है. यह इतना धीरेधीरे घूमता है कि इस पर बैठने पर यह एहसास ही नहीं होता कि घूम रहा है. नीचे थेम्स नदी पर दर्जनों क्रूज चलते रहते हैं. फिर हम दोनों ने टिकट से कर व्हील पर बैठ कर पूरे लंदन शहर को देखा. व्हील की सैर पूरी कर जब हम नीचे उतरे तब जुबेदा ने कहा, ‘‘अब जोर से भूख लगी है…पहले पेट पूजा करनी होगी.’’

मैं ने उस से पूछा कि उसे कौन सा खाना चाहिए तो उस ने कहा, ‘‘बेशक इंडियन,’’ और फिर हंस पड़ी.

मैं ने फोन पर इंटरनैट से सब से नजदीक के इंडियन होटल का पता लगाया. फिर टैक्सी कर सीधे वहां जा पहुंचे और दोनों ने पेट भर कर खाना खाया. अब तक शाम के 5 बज गए थे. दोनों ही काफी थक चुके थे. और घूमना आज संभव नहीं था तो दोनों ने तय किया कि अपनेअपने होटल लौट जाएं.

मैं ने जुबेदा से जब पूछा कि वह कहां रुकी है तो वह बोली, ‘‘मैं तो हाइड पार्क के पास वेस्मिंस्टर होटल में रुकी हूं. और तुम?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘जुबेदा, आज तो तुम एक के बाद एक सरप्राइज दिए जा रही हो.’’

‘‘वह कैसे?’’ ‘‘मैं भी वहीं रुका हूं,’’ मैं ने कहा.

जुबेदा बोली ‘‘अशोक, इतना सब महज इत्तफाक ही है… और क्या कहा जा सकता इसे?’’

‘‘इत्तफाक भी हो सकता है या कुछ और भी.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘नहीं. बस ऐसे ही. कोई खास मतलब नहीं… चलो टैक्सी ले कर होटल ही चलते हैं,’’ मैं बोला. इस से आगे चाह कर भी नहीं बोल सका था, क्योंकि मैं जानता था कि यह जिस देश की है वहां के लोग कंजर्वेटिव होते हैं.

हम दोनों होटल लौट आए थे. थोड़ी देर आराम करने के बाद मैं ने स्नान किया. कुछ देर टीवी देख कर फिर मैं नीचे होटल के डिनर रूम में गया. मैं ने देखा कि जुबेदा एक कोने में टेबल पर अकेले ही बैठी है. मुझे देख कर उस ने मुझे अपनी टेबल पर ही आने का इशारा किया. मुझे भी अच्छा लगा कि उस का साथ एक बार फिर मिल गया. डिनर के बाद चलने लगे तो उस ने अपने ही कमरे में चलने को कहा. भला मुझे क्यों आपत्ति होती.

सफेद परदे के पीछे: भाग 1

‘‘देखीतुम ने अपने गुरू घंटाल की काली करतूतें? बाबा कृष्ण करीम… अरे, मुझे तो यह हमेशा ही योगी कम और भोगी ज्यादा लगता था… और लो, आज साबित भी हो गया… हर टीवी चैनल पर इस की रासलीला के चर्चे हो रहे हैं…’’ घर में घुसते ही देवेश ने पत्नी मिताली की तरफ कटाक्ष का तीर छोड़ा.

‘तुम्हें आज पता चला है… मैं तो वर्षों से यह राज जानती हूं… सिर्फ जानती ही नहीं, बल्कि भुक्तभोगी भी हूं…’ मन ही मन सोच कर मिताली को मितली सी आ गई. घिनौनी यादों के इस वमन में कितना सुकून था, यह देवेश महसूस नहीं कर पाया. उस ने फटाफट जूतेमोजे उतारे और टीवी औन कर के सोफे पर पसर गया.

‘‘एक और बाबा पर गिरी गाज… नाबालिग ने लगाया धार्मिक गुरु पर यौन दुराचार का आरोप… आरोपी फरार… पुलिस ने किया बाबा कृष्ण करीम का आश्रम सीज…’’ लगभग हर चैनल पर यही ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी. रसोई में चाय बनाती मिताली के कान उधर ही लगे हुए थे. देवेश को चाय का प्याला थमा वह बिस्तर पर लेट गई.

आज मिताली अपनेआप को बेहद हलका महसूस कर रही थी. एक बड़ा बोझ जिसे वह पिछले कई सालों से अपने दिलोदिमाग पर ढो रही थी वह अनायास उतर गया था. अब उसे यकीनन उस भयावह फोन कौल से आजादी मिल जाएगी जो उस की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ाए थी, जिस के चलते हर इनकमिंग फोन कौल पर उस का दिल उछल कर हलक में आ जाता था.

आंखें बंद होते ही मिताली की पलकों के पीछे एक दूसरी ही दुनिया सजीव हो उठी. चुपचाप से खड़े लमहे मिताली के इर्दगिर्द लिपट गए जैसे धुंध एकाएक आ कर पेड़ोंपहाड़ों से लिपट जाती है और वे वहां होते हुए भी अदृश्य हो जाते हैं. ठीक उसी तरह मिताली भी अपने आसपास की दुनिया से ओझल हो गई. परछाइयों की इस दुनिया में उस के साथ सुदीप है… बाबा का आश्रम… और सेवा के नाम पर जिस्म से होने वाला खिलवाड़ है…

सुदीप से उस की दोस्ती कालेज के समय से ही थी. इसे दोस्ती न कह कर प्यार कहें तो शायद ज्यादा उपयुक्त होगा. उन का कालेज शहर के बाहरी कोने पर था और कालेज से कुछ ही दूरी पर बाबा कृष्ण करीम का आश्रम था. हरेभरे पेड़ों से घिरा यह आश्रम देखने में बहुत ही रहस्यमय लगता था. दोनों अकसर एकांत की तलाश में उस तरफ निकल जाते थे. इस आश्रम का ऊंचा और भव्य मुख्यद्वार मिताली को सम्मोहित कर लेता था. वह इसे भीतर से देखना चाहती थी, लेकिन आश्रम में सिर्फ बाबा के भक्तों को ही प्रवेश की अनुमति थी.

मिताली अकसर सुदीप से अपने मन की बात कहती थी. एक दिन सुदीप ने उस से आश्रम के अंदर ले जाने का वादा किया जिसे बहुत जल्दी उस ने पूरा भी किया.

हुआ यों था कि रिश्ते में सुदीप की भाभी सुमन बाबा की भक्त थी और अकसर वहां आश्रम में सेवा के लिए जाती थी. उसी के साथ सुदीप मिताली को ले कर आश्रम गया.

आश्रम के दरवाजे पर सुरक्षा व्यवस्था बहुत सख्त थी. कई चरणों में जांच से गुजरने के बाद वे अब एक बड़े से चौगान में थे. मिताली हर तरफ आंखें फाड़फाड़ कर देख रही थी. आश्रम के बहुत बड़े भाग में ताजा सब्जियां लगी थीं. एक हिस्से में फलदार पेड़ भी थे. बहुत से भक्त जिन्हें सेवादार कहा जाता है, वहां निष्काम सेवा में जुटे थे. कुछ लोग सब्जियां तोड़ कर ला रहे थे और कुछ उन्हें तोलतोल कर वजन के अनुसार अलगअलग पैक कर रहे थे. कुछ लोग फलों को भी इसी तरह से पैक कर रहे थे. सुमन ने बताया कि ये फल और सब्जियां बाबा के भक्त ही प्रसादस्वरूप खरीद कर ले जाते हैं. सुमन स्वयं भी अपने घर के लिए फलसब्जियां यहीं से खरीद कर ले जाती है.

सजा के बाद सजा : भाग 1

‘तमाम गवाहों और सुबूतों के मद्देनजर यह अदालत मुलजिम विनय को दफा 376 के तहत कुसूरवार मानती है और उसे मुजरिम करार देते हुए 10 साल की सजा सुनाती है…’

बलात्कार पीडि़ता की उम्र 18 साल से कम थी, शायद 6 महीने कम. लिहाजा, नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार करने के जुर्म में सजा 10 साल की दी गई.

जज साहब को कौन समझाए और वे समझ भी रहे होंगे, तो फायदा क्या है? जो कानून की किताब कहती है, उसी के हिसाब से चलना है उन्हें.

आजकल के माहौल में बहुत सी लड़कियां 15-16 साल की उम्र में घर से भाग रही हैं. वे 14-15 साल की उम्र में ही बालिग हो जाती हैं. उन्हें पूरी जानकारी होती है और उन में जवानी भी उफान मारने लगती है.

18 साल में बालिग मानना तो कानून की भूल है. इसे सुधारना बहुत जरूरी है. 18 साल से पहले यानी कानून की नजर में नाबालिग लड़कियां आप को शहर के पार्कों, सिनेमाघरों, रैस्टोरैंटों, होटल के बंद कमरों में सबकुछ करते हुए मिल जाएंगी.

बात किसी पर कीचड़ उछालने की नहीं है, मौजूदा तकनीकों और माहौल के चलते समय से पहले बालिग होने की है.

यही बात लड़कों पर भी लागू होती है. 21 साल से पहले वे वेश्याओं और महल्ले की आंटियों के साथसाथ पढ़ने वाली लड़कियों और बेहूदा किताबों व फिल्मों से सीख कर समय से पहले ही बालिग हो जाते हैं.

सजा सुनते ही विनय के होश उड़ गए. एक सरकारी मुलाजिम, पत्नी, जवान होती बेटी और नौकरी तलाश करते बेटे के पिता का तो सबकुछ जैसे खत्म हो गया. नौकरी गई. समाज में थूथू हुई. अब बेटी की शादी कैसे होगी? बेटे के भविष्य का क्या होगा?

लेकिन विनय के हाथ में क्या था सिवाय खुद को लुटते देखने के. बच्चों का शर्म से चेहरा उतर गया. पत्नी ने रोते हुए हिम्मत दी, लेकिन क्या होना है? वकील ने तो बड़ी अदालत में अपील करने के लिए कह दिया, लेकिन पैसे कहां से आएंगे?

जिस दिन केस बना था, उस दिन से ले कर आज तक विनय को यह उम्मीद थी कि एक न एक दिन सच सामने आएगा और वे बाइज्जत बरी होंगे. पर अदालत के फैसले के बाद तो मानो सारे दरवाजे बंद हो गए.

पुलिस ने जिस दिन विनय को गिरफ्तार किया था, उस दिन शहरभर के अखबारों में यह मुद्दा खूब छपा था.

पत्नी ने कहा था, ‘मैं बच्चों को ले कर मायके जा रही हूं. अब यहां किस मुंह से रहेंगे. आप की अपील के पैसे वकील साहब को दे दिए हैं. मैं बीचबीच में आती रहूंगी.’

पत्नी रोते हुए उदास हो कर चली गई थी. उस लड़की ने सबकुछ बरबाद कर दिया.

विनय की बेटी की सहेली थी. घर आतीजाती रहती थी. वह विनय को अंकल कहा करती थी और अजीब निगाहों से देखा करती थी.

विनय ने उसे कई बार आवारा किस्म के लड़कों के साथ घूमते देखा था. महल्ले में उस लड़की के बारे में तरहतरह की बातें होने लगी थीं.

उन्होंने अपनी बेटी से कहा भी था कि वह अपनी इस सहेली से दूरी बना कर रखे, लेकिन उलटा बेटी ने सुना दिया था.

वह बोली थी, ‘पापा, अब तो कोऐजुकेशन का जमाना है. लड़के और लड़कियां साथ में पढ़ते हैं. अगर वह किसी लड़के के साथ काम से गई भी होगी, तो इस में लोगों को क्या तकलीफ है? लोग अभी भी पुराने जमाने में जी रहे हैं.’

पत्नी ने भी उन्हें समझाया था, ‘वह लड़की क्या करती है, इस से हमें क्या लेनादेना? उस का कोई भाई भी नहीं है. हमारी बेटी की सहेली है.

‘बच्चे हैं… थोड़ीबहुत मौजमस्ती, हंसीमजाक कर लिया, तो क्या हो गया. अब हमारा जमाना नहीं रहा. बेटियों को पढ़ालिखा रहे हैं, तो उन्हें आजादी भी मिलनी चाहिए.’

यह सुन कर विनय चुप रहे. क्या करते? क्या कहते? लेकिन वे जानते थे कि कमरे में बंद हो कर बच्चे उलटीसीधी किताबें पढ़ते हैं. इंटरनैट पर फालतू चीजें देखते हैं. कभी सीडी ला कर फिल्म देखते हैं. लेकिन इन सब चीजों के लिए बच्चों को खासकर जवान होती बेटियों को कैसे टोकें? कैसे समझाएं?

एक बार धोखे से डीवीडी में सीडी फंसी रह गई थी. बेटी भूल गई होगी या उसे अंदाजा नहीं होगा कि पिता उस के कमरे में आ कर देख लेंगे. बेटी कालेज चली गई. उन्होंने देखा. ब्लू फिल्म की सीडी थी.

उन्होंने अपनी पत्नी को भी बुला कर दिखाया और गुस्से में कहा था, ‘देखो, यह पढ़ाई होती है बंद कमरा कर के.’

पत्नी ने कहा था, ‘इसे वैसा ही छोड़ दो, ताकि बेटी को शक न हो कि हम

ने देख लिया है. मैं अपने तरीके से समझा दूंगी.’

विनय चुप रहे. अब पत्नी ने क्या समझाया? उस का क्या असर पड़ा? पड़ा भी या नहीं? बस, इतना ही पता चला कि बेटी ने शर्मिंदगी से ‘सौरी’ कहा और यह भी कहा कि उस के

कमरे में जा कर जासूसी करने की क्या जरूरत थी?

खैर, दिन गुजरते रहे. विनय की अपील इस बात पर रद्द हो गई कि एक तो नाबालिग, ऊपर से अनुसूचित जाति की लड़की. सजा बरकरार रही. सारी उम्मीदें टूट गईं. सबकुछ खत्म हो गया. जो लोग किसी न किसी केस में सजा भोग रहे थे, वे विनय से गंदे मजाक करते.

‘इस उम्र में भी गजब की जवानी भरी है बुढ़ऊ में. अपनी बेटी की सहेली को ही निबटा दिया…’

पहले तो विनय को ऐसी बातें तीर की तरह चुभती थीं, फिर आदत पड़ गई. धीरेधीरे लोगों को याद रहा, तो सिर्फ यह कि यह शख्स बलात्कार के केस में सजा काट रहा है. फिर जेल, जेल के नियम, जेल में सख्ती, सजा भोगतेभोगते बचे समय में सब अपने दुखदर्द एकदूसरे को सुनाते रहते. कभी घरपरिवार की पिछली बातें, कभी अपराध करने की वजह.

विनय जब भी खुद को बेकुसूर बताते, साथी मुजरिम हंसने लगते. उन्हें यकीन नहीं होता था. वे कहते कि चलो पुलिस झूठी, अदालत भी झूठी, फिर एक नाबालिग लड़की तुम पर बलात्कार का आरोप क्यों लगाएगी? वह अपनी खुद की जिंदगी क्यों बरबाद करेगी? यह कहो कि हो गई गलती. मजे के चक्कर में फंस गए.

आज का इंसान ऐसा क्यों : जिंदगी का है फलसफा – भाग 3

‘‘कहते हैं मैं सौरभ से रुपए मांग कर उन्हें दे दूं. तुम्हीं बताओ, विजय, मैं सौरभ से भी ऐसी आशा क्यों करूं कि वह उस रिश्तेदार का पेट भरे जिस का पेट करोड़ों हजम कर के भी नहीं भरा? अरे, हम बापबेटे कोई इतने बड़े पैसे वाले तो हैं नहीं जो कहीं से लाखों निकाल कर उन्हें दे देंगे.’’

स्तब्ध रह गया मैं. मेरा मित्र जरा सा परेशान हो गया अपनी सुनातेसुनाते. वास्तव में हैरानी थी मुझे.

‘‘मैं ने हाथ जोड़ कर माफी मांगी ली भाई साहब से. कहते हैं मैं मर जाऊंगा तो भी नहीं आएंगे. अब क्या करूं मैं? न आएं, अब मरने से पहले उन की मदद कर मैं अपना परिवार तो सड़क पर लाने से रहा…और मरने के बाद कौन आया कौन नहीं मेरी बला से. मैं देखने तो नहीं आऊंगा कि मेरे मरने पर कौन रोया कौन नहीं.’’

मित्र का हाथ अपनी हथेली में भींच लिया मैं ने. क्या गलत कह रहा है मेरा मित्र. भाई का स्वार्थ वह कहां तक ढोए और क्यों. सदा सादगी में रहा मेरा यह मित्र. लगभग 4-5 साल हम एकदूसरे के पड़ोसी रहे हैं. उन की पत्नी घर का एकएक काम अपने हाथ से करती थीं. कोई फुजूलखर्ची नहीं, कोई शानोशौकत नहीं. भाई साहब अकसर परिवार सहित तब आते थे जब जहाज पकड़ना होता था. कभी गोआ के लिए कभी ऊटी के लिए.

दिल्ली पालम एअरपोर्ट से वह हर साल उड़ानें भरते. हमें हैरानी होती थी, इन के पास इतने पैसे कहां से आते हैं. दूसरा भाई इतना सादा और हम जैसा ही मध्यवर्गीय, जिस की तनख्वाह 20 तारीख को ही आखिरी सांसें लेने लगती है. सच है, जो इंसान औरों के बल पर ऐश करता रहा उसे एक दिन तो जमीन पर आना ही था. और आया भी ऐसा कि उसी से मदद भी मांग रहा है जिस का अधिकार भी उस ने छोड़ा नहीं.

‘‘यह नरक नहीं तो और क्या है? मैं उन का सगा भाई हूं और मेरा स्नेह भी उन्हें दरकार नहीं. मेरा बेटा उन का सम्मान नहीं करता. मेरी पत्नी भी उन की तरफ पीठ कर लेती है. मेरे बाद सब समाप्त हो जाएगा, जानता हूं. कंगाल पिता का साथ बेटे भी कब तक देंगे. कल जिस इंसान ने सब को जूती के नीचे रखा आज उसी की ही जीवन शैली ने उसे कहां ला पटका. मेरे हाथ खड़े हैं, मैं जहां कल था आज भी वहीं हूं. न कल हवा में उड़ता था और न ही आज उड़ सकता हूं…आज तो खैर उड़ने का वक्त भी नहीं बचा.’’

कुछ छू गया मन को. मृत्यु की आंखों में हर पल झांकने वाला मेरा मित्र अपने जीवन का निचोड़ मेरे सामने परोस रहा था. सोम के शब्द याद आने लगे मुझे. हर इंसान का अपनाअपना सच होता है लेकिन कोई सच ऐसा भी होता है जो लगभग सब पर लागू होता है. जमीन से टूटा इंसान जब जमीन पर गिरता है. तब वह औरों पर दोष लगाता है. सदा अपना ही हित सोचने वाला जब सब से कट जाता है तब उन रिश्तों को कोसता है जिन का इस्तेमाल उस ने सदा अपने फायदे के लिए किया. रिश्तों में आज हम जो भी बीज डाल देंगे उसी का फल तो कल खाना पडे़गा…फिर पछताना कैसा और किसी पर दोषारोपण भी क्यों करना.

‘‘मैं तो समझता हूं वह इंसान नसीब वाला है जो अपना मन किसी के आगे खोल कर रख सकता है और ऐसा वही कर पाएगा जिस के मन में छिपाने जैसा कुछ नहीं. सीधासादा साफसुथरा जीवन जीने वाला इंसान छिपाएगा भी क्या. तुम मुझे जानते हो, विश्वास कर सकते हो. मैं जो भी इस पल कह रहा हूं सच होगा क्योंकि अंदर भी वही है जो बाहर है.’’

मैं उस के चेहरे की तृप्त और मीठी मुसकान देख कर सहज अनुमान लगा सकता था कि वह अपने जीवन से नाराज नहीं है. उस का सादा सा घर जहां जरूरत का सारा सामान है, वही उस का साम्राज्य है. वैभव से सुख नहीं मिलता, इस का जीताजागता उदाहरण मेरे समक्ष था. भाभी के तन पर सादे से कपड़े और माथे पर कोई बल नहीं, कोई खीज या कोई संताप नहीं. सुखदुख हमारे ही भीतर है. हमारे ही मन और दिमाग की उपज.

सामर्थ्य के अनुसार ही इंसान चाह करे और जो मिला उसी को कुदरत का प्रसाद समझ कर ग्रहण करे इसी में सुख है. नहीं तो इच्छाओं की राह तो हमारे जीवन से भी कहीं ज्यादा लंबी है. दुखी होने को हजार बहाने हैं हमारे पास. जब चाहो दुखी और परेशान हो लो. अपने ही हाथ में तो है सब.

‘‘हमारी हर भावना ऐसी होनी चाहिए जो पारदर्शी हो. पर ऐसा होता नहीं. हमारे मन में कुछ होता है होंठोें पर कुछ. सामने वाले से बात करते हुए अकसर हम बडे़ अच्छे अभिनेता बन जाते हैं. मन में आग भड़कती है और हम होंठों से फूल बरसाते हैं, क्योंकि वह मुझ से आगे निकल गया. उस का घर मेरे घर से बड़ा हो गया यही तो सब से बड़ा रोना है. अपनी खुशी से खुश होना इंसान को याद ही नहीं रहा.’’

फिर से सोम की कही बातें याद आने लगीं मुझे. उस ने भी तो यही निचोड़ निकाला था उस दिन. हर इंसान अभिनेता बनता जा रहा है, जो शिष्टाचार के नाम पर आप से बात करता है और नपातुला उत्तर ही चाहता है, क्योंकि वास्तव में आप को सुनना उस की इच्छा और चाहत में शामिल ही नहीं होता.

विडंबना भी तो यही है कि आज का इंसान प्यार पाना तो चाहता है लेकिन प्यार करना नहीं, खुश रहना तो चाहता है खुशी देना उसे याद ही नहीं, अपने अधिकार के प्रति तो पूरा जागरूक है पर दूसरे के अधिकार का हनन उस ने कबकब किया उसे पता ही नहीं. अपनी पीड़ा पीड़ा और दूसरे की पीड़ा तमाशा, अपना खून खून दूसरे का खून पानी. कहीं कोई कमी नहीं फिर भी एक अंधी दौड़ में शामिल है आज का आदमी. थक जाता है, अवसाद में चला जाता है, जो पास है उस का सुख लेना भी आखिर क्यों भूल गया है आज का इंसान.

आज का इंसान ऐसा क्यों : जिंदगी का है फलसफा – भाग 1

‘‘कहिए सोमजी, क्या हाल है? भई क्या लिखते हैं आप…बहुत तारीफ हो रही है आप की रचनाओं की. आप अपनी रचनाओं का कोई संग्रह क्यों नहीं निकलवाते. देखिए, आप ने मेरे साथ भी वफा नहीं की. मैं ने मांगा भी था आप से कि कुछ दीजिए न अपना पढ़ने को…’’

‘‘बिना पढ़े ही इतनी तारीफ कर रहे हैं आप साहब, पढ़ लेंगे तो क्या करेंगे…डर गया हूं आप से इसीलिए कभी कुछ दिया नहीं. वैसे मेरे देने न देने से क्या अंतर पड़ने वाला है. पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं. आप कहीं से भी उठा कर पढ़ सकते हैं. मैं ने वफा नहीं की ऐसा क्यों कह रहे हैं?’’

‘‘इतना समय किस के पास होता है जो पत्रिका उठा कर पढ़ी जाए…’’

‘‘तो आप जब भी मिलते हैं इतनी चापलूसी किस लिए करते रहते हैं. मुझ पर आरोप क्यों कि मैं ने अपना कुछ पढ़ने को नहीं दिया. पढ़ने वाला कहीं भी समय निकाल लेता है, वह किसी की कमजोर नस का सहारा ले कर अपनी बात शुरू नहीं करता.’’

इतना बोल कर सोम आगे निकल गए और मैं हक्काबक्का सा उन के प्रशंसक का मुंह देखता रहा. उस के बाद यह सोच कर स्वयं भी उन के पीछे लपका कि पुस्तक मेले में वह कहीं खो न जाएं.

‘‘सोमजी, आप ने उस आदमी से इस तरह बात क्यों की?’’

‘‘वह आदमी है ही इस लायक. बनावटी बातों से बहुत घबराहट होती है मुझे.’’

‘‘वह तो आप का प्रशंसक है.’’

‘‘प्रशंसक नहीं है, सिर्फ बात करने के लिए विषय पकड़ता है. जब भी मिलता है यही उलाहना देता है कि मैं ने उसे कुछ पढ़ने को नहीं दिया जबकि सत्य यह है कि उस के पास पत्रिका हो तो भी उठा कर देखता तक नहीं.’’

‘‘आप को उस का न पढ़ना बुरा लगता है?’’

‘‘क्यों भई, लाखों लोग मुझे पढ़ते हैं…एक वह न पढ़े तो मैं क्यों बुरा मानूं. पढ़ना एक शौक है विजय जिस में कोई जबरदस्ती नहीं चल सकती. जिसे पढ़ने की लत हो वह खाना खाते भी पढ़ लेता है और जिसे नहीं पढ़ना उसे किताबों के ढेर में फेंक दो तो भी वह पढ़ेगा नहीं.

‘‘उस का बेटा इस साल फाइनल में है. मेरे हाथ में उस की एसाइनमेंट है. इसलिए जब भी मिलता है प्रशंसा का चारा मेरे आगे डालने लगता है, जो मेरे गले में फांस जैसा फंस जाता है. बेवकूफ हूं क्या मैं? क्या मुझे समझ में नहीं आता कि वह कितना दिखावा कर रहा है. झूठ क्यों बोलना?

‘‘मैं ने तो उसे नहीं कहा कि मेरी तारीफ करो. जब उस ने मेरा लिखा कभी पढ़ा ही नहीं तो झूठी तारीफ भी क्यों करनी. पढ़ कर चाहे बुराई ही करो वह मुझे मंजूर है. जरूरी नहीं मेरा लिखा सब को पसंद ही आए. सब का अपनाअपना दृष्टिकोण है जीवन को नापने का. जोजो मैं ने अपने जीवन में पाया वहवह मेरा सच है. जो तुम जीवन से सीखोगे वही तुम्हारा भी सच होगा. जरूरी तो नहीं न तुम्हारा और मेरा सच एक ही हो.’’

सोमजी अपनी ही रौ में बहते हुए कहते भी गए और अपनी मनपसंद पुस्तकें भी चुनते गए. सच ही तो कह रहे हैं सोमजी…किसी के भी व्यवहार का सच वह कितनी जल्दी पकड़ लेते हैं. मैं ने उन से कहा तो हंस पडे़.

‘‘अरे, नहीं विजय, किसी का भी व्यवहार झट से पकड़ लेना आसान नहीं है. आज का इंसान बहुत समझदार हो गया है. किस की कौन सी नस पर हाथ रख कर अपना कौन सा काम निकालना है उसे अच्छी तरह आता है. और मुझ जैसा भावुक मूर्ख इस का शिकार अकसर हो जाता है.’’

सोमजी, खरीद कर लाई कुछ किताबें उलटतेपलटते हुए मुसकराने लगे. बड़ी गहरी होती है उन की मुसकान. अपनी मनपसंद पुस्तक में कुछ मिल गया था उन्हें. मेरी ओर देख कर बोले, ‘‘विजय, कुछ बातें सिर्फ कहने के लिए ही कही जाती हैं. उन का कोई अर्थ नहीं होता. जैसे कि किसी ने आप से आप का हाथ पकड़ कर आप का हालचाल पूछा. उसे आप की सेहत से कुछ भी लेनादेना नहीं होता. बस, एक शिष्टाचार है. सिर्फ इसलिए पूछा कि सवाल पूछना था. पूछने वाले के शब्दों में कोई गहराई नहीं होती.

‘‘एक सतही सा सवाल है कि आप कैसे हैं. आप कल चाहे किसी भयानक बीमारी से मर ही क्यों न जाएं लेकिन आज आप को सिर्फ यही उत्तर देना है कि आप अच्छे हैं. अपनी बीमारी का दुखड़ा रोना आज का शिष्टाचार नहीं है. अपने मन की बात खुल कर करना आज का शिष्टाचार है ही नहीं. आप के मन में भावनाओं का ज्वारभाटा तूफानी वेग से उमड़घुमड़ रहा हो लेकिन आज का शिष्टाचार, यही सिखाता है कि बस, चुप रह जाओ. एक बनावटी सी…नकली सी मुसकान चेहरे पर लाओ और अपनी पीड़ा अपने तक ही रखतेरखते हंसते हुए कहो, ‘मैं अच्छा हूं.’

‘‘उस आदमी को न तो मेरी रचनाओं से कुछ लेनादेना है न ही मेरी लेखनी से. उस के हाथ अगर अपना कुछ लिखा दे दूंगा तो हो सकता है कह दे, उसे पढ़ने का शौक ही नहीं है. मैं ने बेकार ही तकलीफ की, क्योंकि शिष्टाचार है इसलिए जब भी मिलता है यही एक उलाहना देता है कि मैं ने उसे कुछ दिया नहीं जिसे वह पढ़ पाता.’’

बड़े गौर से मैं सोमजी का चेहरा पढ़ता रहा. सच ही तो कह रहे हैं सोम. वास्तव में आज का युग वह नहीं रहा जो हमारे बचपन और हमारी जवानी में था. हमारे बचपन में वह था जिस की जड़ें आज भी गहरी समाई हैं हमारी चेतना में. शब्दों में गहराई थी. हां का मतलब हां ही होता था और ना का मतलब सिर्फ ना. आज जरूरी नहीं हां का मतलब हां ही हो. शिष्टाचारवश किसी का हां कह देना वास्तव में ना भी हो सकता है. शब्दों में गहराई है कहां जिन में जरा सी ईमानदारी नजर आए. एक ओढ़ा हुआ जीवन सभी जी रहे हैं. शब्दों का नाता सिर्फ जीभ से है सत्य से नहीं.

हफ्ता भर ही बीता उस वाकया को कि मुझे किसी काम से दिल्ली जाना पड़ा. मेरे एक मित्र बीमार थे…उन्हीं ने बुला भेजा था. कैंसर की आखिरी स्टेज पर हैं वह. कब समय आ जाए नहीं जानते इसलिए मिलना चाहते थे. उन के परिवार से 2-4 दिन वास्ता पड़ा मेरा. मौत के कगार पर खड़ा मेरा मित्र किसी भी कोण से दुखी हो ऐसा नहीं लगा मुझे.

‘‘कहिए सोमजी, क्या हाल है? भई क्या लिखते हैं आप…बहुत तारीफ हो रही है आप की रचनाओं की. आप अपनी रचनाओं का कोई संग्रह क्यों नहीं निकलवाते.

शादीशुदा जोड़े के लिए 9 बैडरूम सीक्रेट

शादीशुदा जिंदगी में प्यार के रंग भरने में बैडरूम की अहम भूमिका होती है. ज्यादातर आराम के लिए पतिपत्नी बैडरूम को ही चुनते हैं. इसलिए बीचबीच में बैडरूम में थोड़ा सा बदलाव कर रोमांटिक जीवन को लंबे समय तक बरकरार रख सकते हैं.

1. दीवारों पर कलर:

बैडरूम में दीवारों के रंग का भी अपना अलग महत्त्व होता है. मुहब्बत के रंग को गाढ़ा करने के लिए अपनी दीवारों पर हलके गुलाबी रंग, आसमानी हलके हरे रंगों का प्रयोग करें, क्योंकि रंग भी अपनी भाषा बोलते हैं. रोमांस में प्यार का भाव जगाते हैं रंग.

2. लुभावनी तसवीरें लगाएं:

बैडरूम में अच्छी और रोमांटिक तसवीर लगाएं. बीभत्स, ऊर्जाहीन, शेर, दौड़ते घोड़े आदि की तसवीरें न लगाएं. बर्ड, हंस, गुलाब के फूलों की तसवीरें लगाएं. इस तरह की तसवीरें आप के जीवन को रोमांस और मुहब्बत से भर देंगी.

3. लाइट:

रोमांस जगाने के लिए रोशनी की अहम भूमिका होती है. बैडरूम में गुलाबी हलके आसमानी रंग की लाइट का प्रयोग करें. लाइट बैडरूम में डायरैक्ट नहीं, बल्कि इनडायरैक्ट पड़नी चाहिए. लैंपशेड, कौर्नर लाइट का भी प्रयोग किया जा सकता है. इस से बैडरूम में मादकता और मुहब्बत का समावेश होता है. कमरे में जितनी कम लाइट होती है, एकदूसरे के प्रति आकर्षण उतना ही गहरा होता है.

4. खुशबू:

मुहब्बत और रोमांस को बरकरार रखने के लिए कई तरह की खुशबुओं का प्रयोग किया जा सकता है. लैवेंडर, मोगरा, चंदन आदि की खुशबू से पतिपत्नी का मूड बन जाता है. कमरे में गुलदस्ते रखें. रोमांस बढ़ाने के लिए अरोमा कैंडल जलाएं. खुशबू इनसान के अंदर कई तरह के भाव पैदा करती है. कैंडल की लाइट न केवल बैडरूम को सौंदर्य प्रदान करती है, बल्कि एकदूसरे को रोमांस के लिए भी उकसाती है.

5. बिस्तर:

मन और मूड को बनाने में बिस्तर का बहुत बड़ा योगदान होता है. गद्दे चुभने वाले न हों, बैड की आवाज आप को डिस्टर्ब न करे. बैडशीट का रंग और कोमलता दोनों मुहब्बत को, रोमांस को भड़काने वाले होने चाहिए.

6. डिस्टर्बैंस न हो:

बैडरूम के बाहर कोई ऐसी बेल न लगाएं जो आप को बारबार डिस्टर्ब करे. अलार्म क्लौक, मोबाइल, सिंगिंग खिलौने आदि दूर रखें. बैडरूम को ऐसा बनाएं ताकि आप अपने पार्टनर को कंफर्टेबल फील करा सकें.

7 . फ्रूट्स:

अंगूर, केला, स्ट्राबैरी, सेब, चीकू आदि की खुशबू मादक होती है. ऐसे में अगर आप ऐसे फ्रूट्स रखते हैं, खाते हैं तो इस का असर आप के रोमांस पर भी पड़ता है.

8. बैडरूम को सजा कर रखें:

रोमांस, मुहब्बत के लिए पार्क, बगीचा, समुद्री किनारा, खुला आसमान आदि प्रेमियों को आकर्षित करते हैं. अत: बैडरूम को वैसा ही लुक देने की कोशिश करें. परदे ऐसे लगवाएं जिन से आसमान नजर आए. हलके रंग के परदे ही लगाएं. हलकी रोशनी ही कमरे में आए ताकि आप का मूड ज्यादा से ज्यादा रोमांटिक बने.

9. बैडरूम को रोमांटिक लुक दें:

अपने बैडरूम में आर्टिफिशियल फाउंटेन, बड़े पेड़ या चित्र लगाएं. बैड, सोफा, अलमारी आदि की जगह बदलती रहें ताकि आप के पार्टनर को रूम पुराना न लगे. मुहब्बत, रोमांस का बैडरूम से मजबूत रिश्ता होता है, जो जीवन में नयापन लाते रहते हैं.

क्या महिला कंडोम सुरक्षित है? कृपया बताएं

सवाल

मैं 24 वर्षीय शादीशुदा महिला हूं. मेरी शादी हाल ही में हुई है. हम फिलहाल बच्चा नहीं चाहते. गर्भनिरोध के लिए पति कंडोम का इस्तेमाल करते हैं. सैक्स को आनंददायक बनाने के लिए यों तो बाजार में कई प्रकारों व फ्लेवर्स में कंडोम्स उपलब्ध हैं पर मैं ने महिला कंडोम के बारे में भी सुना है. क्या यह सुरक्षित है और सैक्स को मजेदार बनाता है?

जवाब

पुरुष कंडोम की तरह महिला कंडोम भी गर्भनिरोध का आसान व सस्ता विकल्प है. महिला कंडोम न सिर्फ प्रैगनैंसी को रोकने में सक्षम है बल्कि यह सैक्स के पलों को भी रोमांचक बनाता है.

महिला कंडोम ‘टी’ शेप में होता है, जिसे वैजाइना में इंसर्ट करना होता है. शुरूशुरू में यह प्रक्रिया जटिल जरूर लग सकती है पर इस का इस्तेमाल बेहद आसान है और यह सैक्स को आनंददायक बनाता है. यह पूरी तरह सुरक्षित भी है. इस की डबल कोटिंग मेल स्पर्म को आसानी से सोख लेती है.

वैजाइना में इंसर्ट के दौरान इस की आंतरिक रिंग थोड़ी लचीली हो जाती है और बाहरी रिंग वैजाइना से 1 इंच बाहर रहती है. सैक्स के दौरान इस कंडोम की बाहरी रिंग वैजाइना की बाहरी त्वचा को गजब का उत्तेजित करती है और सैक्स के पलों को मजेदार बनाती है.

इसे सैक्स से कुछ घंटे पहले भी लगाया जा सकता है. सब से अच्छी बात यह है कि कंडोम लगाए हुए बाथरूम भी जाया जा सकता है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

महिला इंसपेक्टर का खूनी इश्क

30 जनवरी, 2018 की बात है. झारखंड के जिला हजारीबाग के थाना बड़ा बाजार के थानाप्रभारी नथुनी प्रसाद शाम के समय अपने औफिस में बैठे थे तभी एक व्यक्ति उन के पास आया. थानाप्रभारी ने उसे कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए आने का कारण पूछा तो उस ने बताया, ‘‘सर, मेरा नाम विनोद पाठक है. मैं जयप्रभा नगर कालोनी में किराए के मकान में बीवीबच्चों के साथ रहता हूं. आज मेरी बीवी अन्नू पाठक सुबह किसी काम से बाहर गई थी. वह अभी तक नहीं लौटी है. मैं ने अपने स्तर पर उसे सब जगह तलाशा लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. मैं बहुत परेशान हूं, प्लीज मेरी मदद कीजिए.’’

‘‘क्या? बीवी कहीं चली गई?’’ नथुनी प्रसाद आश्चर्य से बोले, ‘‘पर कहां चली गई?’’

‘‘नहीं जानता सर, कहां चली गई.’’ विनोद बोला.

‘‘कहीं पत्नी से झगड़ा वगैरह तो नहीं हुआ था. जिस से वह नाराज हो कर कहीं चली गई.’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘नहीं सर, ऐसी कोई बात नहीं है. मेरे और पत्नी के बीच कोई झगड़ा नहीं हुआ था.’’ विनोद ने बताया.

‘‘एक काम करिए. पत्नी की गुमशुदगी की एक तहरीर लिख कर दे दीजिए. मैं दिखवाता हूं कि मामला क्या है?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘मैं एक दरख्वास्त लिख कर लाया हूं सर.’’ थानाप्रभारी की ओर एक पेपर बढ़ाते हुए वह बोला.

थानाप्रभारी ने उस की दी हुई दरख्वास्त पर एक नजर डाली और वह मुंशी को गुमशुदगी दर्ज कराने के लिए दे दी. इस के बाद उन्होंने विनोद को आश्वस्त कर घर जाने के लिए कह दिया.

पत्नी की गुमशुदगी की सूचना दे कर विनोद पाठक जैसे ही थाने से निकल कर कुछ दूर गया होगा. तभी एक गोरीचिट्ठी, बेहद खूबसूरत लड़की जिस की उम्र यही कोई 16-17 साल के करीब रही होगी. थानाप्रभारी के पास पहुंची. उस के साथ मोहल्ले के कई संभ्रांत लोग भी थे.

उस लड़की ने अपना नाम कीर्ति पाठक पुत्री विनोद पाठक निवासी जयप्रभा नगर बताया. उस ने थानाप्रभारी नथुनी प्रसाद को बताया कि उस की मां अन्नू पाठक आज सुबह से घर से गायब है. उन का अब तक कहीं पता नहीं चला है. उसे आशंका है कि कहीं उस के पापा विनोद पाठक ने ही मां के साथ कोई अनहोनी न कर दी हो.

कीर्ति के मुंह से इतना सुनते ही थानाप्रभारी उस लड़की की तरफ गौर से देखने लगे. क्योंकि अभी कुछ देर पहले ही उस के पिता भी पत्नी की गुमशुदगी लिखाने आए थे. अब बेटी ही पिता पर मां को गायब करने का शक कर रही है. इस से यह मामला तो बड़ा गंभीर और पेचीदा लगने लगा.

थानाप्रभारी ने कीर्ति से पिता पर लगाए जाने वाले आरोप की वजह पूछी तो उस ने विस्तार से मां और पिता के बीच के संबंधों के बारे में और उन के बीच सालों से चले आ रहे झगड़े के बारे में बता दिया. कीर्ति की बात सुन कर थानाप्रभारी चौंक गए कि एक महिला पुलिस इंसपेक्टर के साथ बने अवैध संबंधों की वजह से विनोद पाठक अपनी पत्नी को मारतापीटता था.

थानाप्रभारी ने एसआई श्याम कुमार को विनोद पाठक के घर मामले की जांच के लिए भेज दिया. एसआई श्याम कुमार जांच के लिए विनोद पाठक के यहां पहुंच गए. उन्होंने विनोद के बच्चों के अलावा पड़ोसियों से भी पूछताछ की.

प्रारंभिक जांच कर के एसआई श्याम कुमार ने थानाप्रभारी को बता दिया कि विनोद पाठक की पत्नी अन्नू पाठक वास्तव में गायब है. इस के अलावा विनोद पाठक भी थाने में सूचना देने के बाद से लापता है. उस का मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ आ रहा है.

अगले दिन 31 जनवरी की सुबह 10-11 बजे के करीब थानाप्रभारी नथुनी प्रसाद विनोद पाठक के घर पहुंच गए. पुलिस को देख कर मोहल्ले के लोग वहां जमा हो गए. अन्नू के साथसाथ विनोद पाठक घर पर नहीं था. घर में उन के तीनों बच्चे कीर्ति, वाणी और वंश ही थे. पूछने पर बच्चों ने पुलिस को बताया कि पापा बीती रात से ही घर नहीं लौटे हैं.

यह जान कर थानाप्रभारी को विनोद पर ही शक हो गया कि जरूर पत्नी के गायब होने में उस का हाथ रहा होगा. तभी वह फरार है. जैसे ही वह उस के घर में घुसे तभी हल्कीहल्की बदबू आती हुई महसूस हुई. पुलिस ने घर का कोनाकोना छान मारा लेकिन बदबू कहां से आ रही थी पता नहीं चला. एक कमरे में दरवाजे पर ताला लटका मिला.

पुलिस ने कीर्ति से तालाबंद होने की वजह पूछी तो उस ने बताया कि वह कमरा मां का है. उस में मां रहती हैं. जब से वह गायब हैं तब से उस कमरे पर नया ताला लगा है. पापा ने उसे बताया था कि अन्नू मायके जाते समय कमरे में ताला लगा कर चाबी अपने साथ ले गई है.

कीर्ति की यह बात थानाप्रभारी के गले नहीं उतरी क्योंकि जब घर में पहले से सभी कमरों के ताले और उस की 2-2 चाबियां थीं तो मां ने नया ताला क्यों खरीदा. शंका होने पर उन्होंने उस कमरे का ताला तोड़ने के निर्देश साथ आए पुलिसकर्मियों को दिए.

ताला टूटने के बाद पुलिस जैसे ही कमरे में घुसी तो महसूस हुआ कि बदबू इसी कमरे से आ रही है. पुलिस कमरे में वह चीज ढूंढने लगी जहां से वह बदबू आ रही थी. ढूंढतेढूढते पुलिस जैसे ही दीवान के करीब पहुंची तो बदबू और तेज हो गई. मतलब साफ था कि बदबू दीवान के भीतर से आ रही थी. पुलिस ने दीवान को खोला तो भीतर का नजारा देख कर आंखें फटी की फटी रह गईं.

दीवान में काफी खून फैला था जो सूख चुका था. वहां एक काले रंग की पौलीथिन थैली और एक प्लास्टिक का बोरा रखा था. उन पर भी खून लगा था जो सूख चुका था. थानाप्रभारी को समझते देर न लगी कि विनोद ने पत्नी की हत्या कर के उस की लाश दीवान में छिपा दी है.

उन्होंने प्लास्टिक का बोरा खुलवाया तो खोलते ही सब के होश उड़ गए. काली पौलीथिन में अन्नू का कटा हुआ सिर और बोरे में धड़ था. उस के हाथों को पीछे की ओर कर के प्लास्टिक की रस्सी से बांध दिया गया था. उस के पैर घुटनों से मोड़ कर पेट से बांध दिए थे.

पिछले 2 दिनों से रहस्यमय तरीके से गायब अन्नू पाठक की उस के ही बेडरूम में लाश पाए जाने के बाद रहस्य से परदा उठ गया. मां की लाश मिलते ही तीनों बच्चे दहाड़ें मार कर रोने लगे. उन के रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी भी वहां आ गए, बच्चों को ढांढ़स बंधाने लगे. विनोद का अभी कुछ पता नहीं था कि वह कहां है.

अन्नू पाठक की लाश बरामद किए जाने की सूचना थानाप्रभारी ने डीएसपी चंदनवत्स और एसपी अनीश गुप्ता को दे दी. कुछ ही देर बाद एसपी और डीएसपी भी मौके पर पहुंच गए थे.

तलाशी के दौरान पुलिस को रसोई घर में रखी डस्टबिन से एक चाकू बरामद हुआ. चाकू के ऊपर खून लगा हुआ था, जो सूख चुका था. लग रहा था कि शायद इसी चाकू से अन्नू की हत्या की गई होगी. पुलिस ने चाकू अपने कब्जे में लिया. अन्नू की हत्या की सूचना उस के मायके वालों को भी दे दी गई थी. फिर जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दी.

अगले दिन यानी पहली फरवरी, 2018 को थानाप्रभारी ने अन्नू के घर पहुंच कर उस की बड़ी बेटी कीर्ति से विस्तार से पूछताछ की. कीर्ति ने कहा कि उस के पापा उसे और मम्मी को पिछले 5 सालों से प्रताडि़त करते चले आ रहे हैं. जिस मंजू ठाकुर नाम की महिला से उन के गलत संबंध हैं वह इसी शहर में पुलिस इंसपेक्टर है. थानाप्रभारी ने यह जानकारी एसपी अनीश गुप्ता को दे दी.

कीर्ति ने जिस हौसले के साथ अपने पिता के चरित्र पर आरोप लगाया था. वह ऐसे ही नहीं लगाया था. उस के पास प्रत्यक्ष तौर पर कई प्रमाण भी थे. इंसपेक्टर मंजू ठाकुर के उस के पापा विनोद पाठक से वर्ष 2013 से संबंध थे. वह उस के पापा से मिलने अकसर घर आती रहती थी.

यही नहीं कई बार तो अन्नू के रहते हुए मंजू ठाकुर विनोद के साथ उस के बिस्तर पर एक साथ सोए भी थे. इस से नाराज हो कर अन्नू अपने मायके रांची चली जाती थी और महीनों वहीं रुक जाती थी. बच्चों के विरोध करने पर विनोद उन्हें निर्दयतापूर्वक पीटता था.

केस में महिला पुलिस इंसपेक्टर मंजू ठाकुर का नाम सामने आने की जानकारी मीडिया वालों को हुई तो मीडिया ने इस मामले को खूब उछाला. इंसपेक्टर मंजू ठाकुर के खिलाफ पुलिस को ठोस सबूत नहीं मिले थे. इसलिए एसपी अनीश गुप्ता ने डीएसपी चंदन वत्स को उस पर नजर रखने के निर्देश दिए.

उधर पुलिस विनोद पाठक को भी सरगर्मी से तलाश रही थी. 6 दिन बीत जाने के बाद भी विनोद पाठक की गिरफ्तारी नहीं हुई और न ही मंजू ठाकुर के खिलाफ पुलिस ने कोई एक्शन लिया था. इस कारण लोग पुलिस का विरोध करने पर उतर आए थे.

4 फरवरी, 2018 की रात हजारीबाग स्टेडियम से झंडा चौक तक एंजेल्स हाईस्कूल, डीपीएस, होली क्रौस वीटीआई, डीएवी पब्लिक स्कूल,संत रोबर्ट बालिका विद्यालय सहित अन्य कई स्कूलों के सैकड़ों छात्रछात्राओं, शिक्षकों ने कैंडल जुलूस निकाला. सदर विधायक मनीष जायसवाल, उपमहापौर आनंद देव, ब्रजकिशोर जायसवाल सहित कई गणमान्य लोग भी जुलूस में शामिल रहे.

6 फरवरी को जदयू के वरिष्ठ नेता बटेश्वर प्रसाद मेहता न्याय दिलाने के लिए एसपी अनीश गुप्ता से मिले. उन्होंने हत्या के आरोपी को गिरफ्तार करने की मांग की. एसपी से मिले प्रतिनिधिमंडल में जिला सचिव कृष्णा सिंह, नगर महासचिव सतीश कुमार सिन्हा, दीपक कुमार मेहता आदि शामिल थे.

घटना के विरोध में स्कूलों के अलावा विभिन्न सामाजिक संगठन भी उतर आए. उन्होंने कैंडल मार्च निकाल कर मृतका को श्रद्धांजलि दी और दोषी को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग की.

इस बीच डीएसपी चंदनवत्स और थानाप्रभारी नथुनी प्रसाद घटना की जांच में जुटे रहे. उधर पुलिस ने मंजू ठाकुर और विनोद ठाकुर के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स की जांच करने पर पता चला कि घटना वाले दिन दोनों के बीच 32 बार बातचीत हुई थी. पुलिस के लिए विनोद या मंजू ठाकुर से पूछताछ करने का यह अच्छा आधार था.

इसी साक्ष्य के आधार पर डीएसपी ने 6 फरवरी को पीटीसी इंसपेक्टर मंजू ठाकुर को गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ के लिए उसे थाने लाया गया. पूछताछ में पहले तो वह अन्नू की बेटी कीर्ति  द्वारा उस पर लगाए गए सभी आरोपों को सिरे से नकारती रही. चूंकि मंजू खुद कानून की मंजी हुई खिलाड़ी थी. वह कानून की एकएक बारीकी को अच्छी तरह जानती थी. इसलिए अपने बचाव में वह सभी हथकंडों को इस्तेमाल करती रही.

लेकिन डीएसपी चंदन वत्स भी उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ करते रहे. आखिर वह उन के सवालों के घेरे में फंसती चली गई. अंत में उस ने कानून के आगे घुटने टेक दिए और अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. फिर उस ने अपने प्रेमसंबंधों से ले कर अन्नू पाठक की हत्या तक की जो कहानी बताई वह बड़ी दिलचस्प निकली.

45 वर्षीय विनोद पाठक मूलरूप से झारखंड राज्य के हजारीबाग का रहने वाला था. वह हजारीबाग के थाना बड़ा बाजार स्थित पौश कलोनी जयप्रभा नगर में एक किराए के मकान में परिवार के साथ रहता था. उस का परिवार खुशहाल था.

परिवार खुशहाल क्यों न हो, विनोद पाठक भारतीय खनन विभाग-कोल विभाग के सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट (सीएमपीडीआई) की हजारीबाग जिले की बड़कागांव शाखा में हेड क्लर्क के पद पर नौकरी करता था. वहां उस की अच्छीखासी तनख्वाह थी.

खानेपीने और अन्य खर्च के बावजूद वह अपनी तनख्वाह में से प्रति माह अच्छी रकम बचा लेता था. नौकरी करने के साथसाथ वह एक योग संस्था का जिलाध्यक्ष भी था. विनोद जीवन की नैया बड़े मजे से खे रहा था.

बात सन 2013 की है. विनोद पाठक पतंजलि योग पीठ, हरिद्वार गया था. वहीं पर उस की मुलाकात हजारीबाग जिले के पीटीसी की इंसपेक्टर मंजू ठाकुर से हुई. मंजू ठाकुर पतंजलि योग पीठ के काम से वहां गई हुई थी. दरअसल, इंसपेक्टर मंजू ठाकुर बाबा रामदेव के प्रोडक्ट से इतनी प्रभावित थी कि उस ने उस की एजेंसी ले ली थी.

बातचीत के दौरान जब यह पता चला कि दोनों एक ही प्रांत के ही नहीं बल्कि एक ही जिले के रहने वाले हैं तो उन की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा. वैसे भी दूर परदेश में अपने इलाके का कोई मिल जाए तो अपनेपन सा लगता है. इतना ही नहीं उस से दिल का रिश्ता जुड़ जाता है. ऐसा ही कुछ उन के साथ भी हुआ था.

एक ही मुलाकात और एक ही बातचीत में वे एकदूसरे से घुलमिल गए. उन्होंने अपनेअपने पेशे के बारे में भी बता दिया था. उस के बाद काफी देर तक एकदूसरे से बातचीत करते रहे. पतंजलि योग पीठ से वापस लौटते समय दोनों ने अपने फोन नंबर एकदूसरे को दे दिए थे.

मंजू और विनोद दोनों ही सरकारी पेशे से जुड़े हुए थे और हमउम्र थे. मंजू बात करने में काफी चतुर और मृदुभाषी किस्म की औरत थी. विनोद जब से मंजू से मिला था. उस की ओर आकर्षित हुए जा रहा था. इस बात को वह खुद भी नहीं समझ पा रहा था. जब तक दिन में एक-दो बार उस से बात नहीं कर लेता या उस से मिल नहीं लेता था उस के दिल को चैन नहीं मिलता था.

जबकि विनोद जानता था कि उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बच्चे भी हैं. इतना ही नहीं बेटी भी सयानी हो चुकी है. पत्नी को जब ये बात पता चलेगी तो घर मे वह कितना कोहराम मचाएगी. फिर बच्चे भी उस के बारे में क्या सोचेंगे.

यह सोच कर कुछ पल के लिए उस के कदम जड़ गए थे लेकिन दिल की पुकार के आगे वह नतमस्तक हो गया और मंजू को पाने की हसरत में वह अपने बीवीबच्चों को भूल गया.

मंजू का सान्निध्य पाने के लिए विनोद उस का व्यवसाय पार्टनर बन गया और मटवारी में औफिस और दुकान खोल ली. विनोद ने सोचा कि अब उस पर न तो किसी को शक होगा और न ही कोई उंगली उठा पाएगा.

मंजू भी विनोद पर मर मिटी थी. जबकि वह भी शादीशुदा थी. उस ने भी विनोद से अपने प्यार का इजहार कर दिया था. उस के बाद दोनों भारत स्वाभिमान ट्रस्ट से जुड़ कर काम करते रहे. मंजू कंपनी की ओर से राजस्थान टूर पर गई थी. तब विनोद भी उस के साथ था.

मंजू का विनोद के दिल के साथसाथ उस के परिवार पर भी दबदबा बन गया था. वह जब चाहे तब बिजनैस के बहाने विनोद के घर आ धमकती थी. उस के साथ घंटों बैठे गप्पें लड़ाती और ठहाके मारती. अन्नू कोई दूध पीती बच्ची तो थी नहीं जो  पति की इन हरकतों को न समझती. बात 1-2 दिन की या फिर कभीकभार की होती तो चल सकती थी लेकिन यहां तो लगभग रोज ही वह विनोद के पास चली आती थी.

अन्नू को मंजू का रोजरोज उस के घर आना बरदाश्त से बाहर हो गया था. अब पानी सिर के ऊपर से बह रहा था. जब सब्र का बांध टूट गया तो एक दिन अन्नू पति विनोद से पूछ ही बैठी, ‘‘मैं तुम से एक बात पूछना चाहती हूं पूछ सकती हूं क्या?’’

‘‘हां…हां… क्यों नहीं, बिलकुल पूछ सकती हो. तुम्हारा तो अधिकार है.’’ विनोद संजीदगी के साथ बोला.

‘‘तो ठीक है ये बताइए कि ये पुलिस वाली मंजू यहां रोजरोज क्यों आती है?’’

‘‘बिजनेस के सिलसिले में और क्या?’’ पति ने बताया.

‘‘लेकिन उस का यहां रोजरोज का आना, मुझे पसंद नहीं है. बड़ी बेटी कीर्ति भी नाराज होती है.’’ अन्नू बोली.

‘‘ये कैसी बेतुकी बातें कर रही हो तुम?’’ विनोद पत्नी के ऊपर नाराज हुआ, ‘‘वो यहां आती हैं तो बिजनैस के बारे में बात करने के लिए ही आती हैं. कोई गप्पें लड़ाने के लिए नहीं और तुम क्या समझती हो कि मैं उन के साथ बैठे क्या कोई गुलछर्रे उड़ाता हूं. समझी तुम ने उन के बारे में आज तो कह दिया आइंदा फिर ऐसा मत कहना. नहीं तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. मैं उन की बेइज्जती बरदाश्त नहीं कर सकता.’’

झल्लाता हुआ विनोद पत्नी से नजरें चुराते कमरे से बाहर निकल गया. जैसे उस की चोरी पत्नी ने पकड़ ली हो. बाहर निकल कर विनोद ने एक लंबी सांस ली. वह समझ गया कि मंजू को ले कर पत्नी को शक हो गया है.

जिस दिन से अन्नू ने मंजू ठाकुर को ले कर पति विनोद को टोका था उस दिन से पतिपत्नी के रिश्तों में थोड़ी खटास आ गई. विनोद को पत्नी की यह बात बुरी लगी थी कि उस ने मंजू के बारे में उस से पूछ ने की हिम्मत कैसे की. यह पूछ कर उस ने बहुत बड़ी भूल की है. इस भूल का उसे दंड जरूर मिलेगा.

उस दिन के बाद विनोद ने रोजाना ही मंजू को घर बुलाना शुरू कर दिया. इतना ही नहीं अब वह मंजू को अलग कमरे में बुला कर एकांत में बात करता.

यह देख कर अन्नू को गुस्सा आता. यह सब उस की बरदाश्त से बाहर होता जा रहा था. अन्नू ने इस का पुरजोर विरोध शुरू कर दिया. नतीजा विनोद पत्नी की पिटाई करने लगा. अपने सिंदूर का बंटवारा होते हुए अन्नू नहीं देख सकती थी इसलिए वह बच्चों को ले कर मायके रांची चली जाती थी.

जब गुस्सा शांत होता तो लौट कर घर आ जाती. इस तरह अन्नू कई बार मायके जा चुकी थी. लेकिन विनोद पर इस का कोई असर नहीं पड़ा था बल्कि पत्नी के आने के बाद उसे और ज्यादा आजादी मिल जाती थी. वह मंजू के साथ बिना किसी डर के गुलछर्रे उड़ाता.

धीरेधीरे विनोद और मंजू के अनैतिक संबंधों की जानकारी अन्नू के पूरे नातेरिश्तेदारों तक फैल गई थी. विनोद की चारों ओर बदनामी हो रही थी. उसे शक हो गया था कि अन्नू ही उस की बदनामी करा रही है. इसलिए अब वह उस पर पहले से ज्यादा सितम ढाने लगा.

पत्नी के साथसाथ वह बच्चों की भी पिटाई करने लगा. वह अपनी बड़ी बेटी कीर्ति को ज्यादा मारता था. क्योंकि कीर्ति भी मंजू का विरोध करती थी. वह अपनी मां का पक्ष लेती थी.

बच्चों को बेदर्दी से पिटता देख अन्नू की जैसे जान ही निकल जाती थी. अन्नू ने एक दिन दुखी हो कर मंजू को फोन कर के कहा, ‘‘तुम दोनों अगर शादी करना चाहते हो तो कर लो. मैं कुछ नहीं बोलूंगी. तुम्हारे रास्ते से मैं हमेशा के लिए हट जाऊंगी. लेकिन मेरे बच्चों को मत सताओ.’’

अन्नू की याचना इतनी दर्दभरी थी कि उस की आंखों से आंसू टपकने लगे. लेकिन मंजू पर उस की याचना का रत्ती भर भी असर नहीं हुआ था. बल्कि वह भी तो यही चाहती थी कि अन्नू उस के रास्ते से हमेशाहमेशा के लिए हट जाए.

उसी समय मंजू की दिमाग में एक विचार आया कि क्यों न अन्नू को रास्ते से हटा दिया जाए. एक दिन मंजू ने विनोद को विश्वास में ले कर उकसाया कि अन्नू को रास्ते से हटा दो. ताकि हमें फिर किसी का डर नहीं रहे.

प्रेम में अंधे विनोद को प्रेमिका मंजू की बातें जंच गईं. पत्नी को रास्ते से हटाने के लिए वह उपाय सोचने लगा. तब मंजू ने उसे टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले सच्ची घटनाओं पर आधारित क्राइम सीरियल देखने की सलाह दी और कहा कि वहां से नएनए आइडिया मिल जाएंगे.

उस दिन के बाद से विनोद ड्यूटी से जब भी घर आता, नाश्ता वगैरह कर के टीवी पर क्राइम स्टोरी पर आधारित सीरियल देखने बैठ जाता. सीरियल से वह अपराध की उन बारीकियों को समझने की कोशिश करता था कि कैसे अपराधी अपराध कर के पुलिस के चंगुल से बच निकलने की कोशिश करते हैं.

योजना के अनुसार उस ने 20 जनवरी, 2018 को ही अन्नू पाठक को मार कर लाश को ठिकाने लगाने का मन बना लिया था. इस के लिए उस ने 16 जनवरी को पूरी योजना तैयार कर ली.

विनोद ने हत्या के लिए एक चाकू खरीदा और फुटपाथ से काले रंग की एक पोलीथिन थैली व रस्सी. यहां तक कि उस के घर के सभी तालों की 2-2 चाबियां थीं. इस के बावजूद भी उस ने एक नया ताला भी खरीदा. ताकि लाश को कमरे में बंद कर के यह अफवाह उड़ा देगा कि अन्नू नाराज हो कर घर पर ताला बंद करके मायके चली गई.

योजना के अनुसार, विनोद ने अपने तीनों मोबाइल फोन 20 जनवरी को स्विच्ड औफ कर दिए थे. वह नए नंबर से मंजू से बात करता था. ताकि किसी को शक न हो. मंजू से विनोद की आखिरी बात पीसीओ से 2 दिन पहले यानी 27 जनवरी को हुई थी.

28 जनवरी, 2018 को मंजू ठाकुर को ले कर अन्नू और विनोद में जम कर विवाद हुआ. योजनानुसार 29 को विनोद सवा 10 बजे सुबह अपने औफिस में हाजिरी लगा कर वापस घर आ गया. यह उस ने इसलिए किया ताकि 29 जनवरी को उस का औफिस में रहने का सबूत बन जाए.

जब वह घर आया तो उस समय तीनों बच्चे स्कूल गए हुए थे. तब बिना किसी गलती के उस ने पत्नी को पीटना शुरू कर दिया. पति की बेरहमी पिटाई से अन्नू टूट चुकी थी. वह जान रही थी कि इस समय पति के सिर पर इश्क का ऐसा भूत सवार है कि उन्हें फिलहाल अच्छेबुरे का ज्ञान नहीं रह गया है. पराई औरत के चलते वह अपने ही हाथों घर में आग लगाने पर लगे हैं. ऐसे में उन से कुछ भी कहना बेअसर होगा. लिहाजा वह कुछ नहीं बोली.

पत्नी की पिटाई करने के बाद विनोद कहीं चला गया. करीब सवा 12 बजे वह लौट कर घर आया. उस समय अन्नू मंजू से बात कर रही थी. पति के लौटने का अन्नू को पता नहीं चला. विनोद कान लगा कर पत्नी द्वारा फोन पर की जा रही बातचीत को सुनता रहा.

उस बातचीत से वह यह बात समझ गया कि अन्नू इस समय मंजू से बात कर रही है. उस समय अन्नू मंजू से पति की शिकायत कर रही थी. अपनी शिकायत सुन कर विनोद अपना आपा खो बैठा. फिर क्या था उस ने अन्नू के पीछे जा कर एक हाथ से उस का मुंह बंद किया और दूसरे हाथ से तेज धार वाले चाकू से गला रेत दिया.

खून का फव्वारा फूट पड़ा और अन्नू फर्श पर गिर कर तड़पने लगी. कुछ ही देर में वह शांत हो गई. इस के बाद प्रेमिका मंजू ठाकुर को फोन कर विनोद ने पत्नी की हत्या करने की जानकारी दे दी. यह सुन कर मंजू पहले तो घबरा गई फिर बाद में खुश भी हुई कि अब हमारे बीच का अन्नू नाम का कांटा सदा के लिए निकल गया.

मंजू ने उसे सलाह दी कि वह वहां पर कोई भी सबूत न छोड़े. उस का सिर धड़ से काट कर अलग कर दे. सिर और धड़ दोनों को 2 अलगअलग पौलीथिन की थैलियों में भर कर उसे दीवान में छिपा दे.

मति के मारे विनोद ने वैसा ही किया. जैसा उस की प्रेमिका इंसपेक्टर मंजू ने करने को कहा. कमरा बंद कर के वह सबूत मिटाने में जुट गया. उसे डर था कि जल्दी से लाश ठिकाने नहीं लगाई और सबूत नहीं मिटाए तो बच्चों के स्कूल से घर आने पर सारा भेद खुल जाएगा.

सबूत मिटाने और लाश ठिकाने लगाने में उसे ढाई घंटे से ज्यादा लगे. सिर और धड़ को अलगअलग कर के पौलीथिन थैली और प्लास्टिक बैग में पैक कर दीवान के बौक्स में डाल दिया. फिर कमरे में नया ताला लगा कर चाबी अपनी जेब में रख कर दोबारा औफिस चला गया. शाम 4 बजे तीनों बच्चे स्कूल से घर लौटे तो कमरे पर ताला बंद देख हैरान रह गए. कीर्ति पड़ोस में आंटी के यहां मां के बारे में पता लगाने गई. लेकिन वहां से कुछ पता नहीं चला.

बच्चे जब स्कूल गए थे तो उन की मां अन्नू घर में ही थी. अचानक कहां चली गई ये सोच कर वे परेशान हो गए. शाम करीब 5 बजे विनोद जब ड्यूटी से घर लौटा तो कीर्ति ने उससे मां के बारे में पूछा, इधरउधर का बहाना बनाते हुए विनोद ने कहा कि बेटा तुम्हारी मां नाराज हो कर अपने मायके चली गई है.

तब कीर्ति ने अपनी ननिहाल फोन किया तो पता चला कि उस की मां वहां आई ही नहीं है. ये सुन कर कीर्ति का माठा ठनक गया. उसे लगने लगा कि कहीं पापा ने मां के साथ कोई अनहोनी घटना तो न कर दी. कीर्ति बारबार पिता से मां के बारे में पूछ ने लगी तो विनोद घबरा गया. उसे लगा कि कहीं भेद न खुल जाए, तभी उस के दिमाग में आया कि क्यों न इसे भी मार दे न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी.

ये सोच कर विनोद उसे पकड़ने के लिए उस की ओर लपका. लेकिन पिता की बुरी मंशा भांप कर कीर्ति तेजी से भाग कर पड़ोस वाली आंटी के घर चली गई. जबकि उस के छोटे भाईबहन घर में भीगी बिल्ली बने दुबके रहे. कीर्ति रात को भी अपने घर नहीं आई. विनोद रात में उसी दीवान पर सोया जिस में अन्नू की लाश छिपा रखी थी.

बहरहाल, 18 फरवरी, 2018 को पुलिस ने फरार विनोद पाठक को कोडरमा के रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया. विनोद ने अपने औफिस के सिक्योरिटी सुपरवाइजर को फोन कर के कहा था कि वह अपनी कार से उस के पास आ जाए. उसे अभी डोभी जाना है. तब सुपरवाइजर अपनी इंडिगो कार ले कर विनोद के घर पहुंच गया था.

आरोपी विनोद ने पुलिस को बताया कि हत्या करने के बाद वह अपने ही औफिस के सिक्योरिटी सुपरवाइजर की इंडिगो कार से डोभी तक गया था. इस मामले में सिक्योरिटी सुपरवाइजर और उस की पत्नी से भी पुलिस ने पूछताछ की.

विनोद पाठक ने यह भी कबूल किया कि पत्नी की हत्या करने के बाद वह सीधा प्रेमिका मंजू ठाकुर के पास खून से लथपथ पहुंचा था और हत्या के बारे में पूरी जानकारी दी. पुलिसिया पूछताछ में मंजू ने यह भी बताया था कि अन्नू का सिर से धड़ अलग करने का आइडिया उस ने ही दिया था.

मंजू ने विनोद पाठक को हत्या करने के बाद अलगअलग जगहों पर लाश छिपाने का तरीका भी बताया था. घटना के बाद मंजू ठाकुर और विनोद पाठक के बीच 32 बार फोन पर बातचीत हुई थी. मंजू विनोद के कौन्टेक्ट में लगातार रही.

वह नए नंबर से मंजू से बात करता था ताकि किसी को शक न हो. मंजू से विनोद की आखिरी बात पीसीओ से 27 जनवरी को हुई थी. पुलिस इस बात की जांच भी कर रही है कि विनोद जिस वक्त अपनी पत्नी की गला रेत कर हत्या कर रहा था, तब किस शख्स ने उस की मदद की.

पुलिस ने आरोपी इंसपेक्टर मंजू ठाकुर और विनोद कुमार को सीजेएम की अदालत में पेश किया. अदालत ने दोनों को जेपी केंद्रीय कारागार भेज दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

रफू की हुई ओढ़नी : घूमर वाली मेघा – भाग 1

एक बार फिर गांव की ओढ़नी ने शहर में परचम लहराने की ठान ली. गांव के स्कूल में 12वीं तक पढ़ी मेघा का जब इंजीनियरिंग में चयन हुआ तो घर भर में खुशी की लहर दौड़ गई थी. देश के प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान में ऐडमिशन मिलना कोई कम बड़ी बात है क्या?

“लेकिन यह ओढ़नी शहर के आकाश में लहराना नहीं जानती, कहीं झाड़कांटों में उलझ कर फट गई तो?”

“हवाओं को तय करने दो. इस के बंधन खोल कर इसे आजाद कर दो, देखें अटती है या फटती है…”

“लेकिन एक बार फटने के बाद क्या? फिर से सिलना आसान है क्या? और अगर सिल भी गई तो रहीमजी वाले प्रेम के धागे की तरह क्या जोड़ दिखेगा नहीं? जबजब दिखेगा तबतब क्या सालेगा नहीं?”

“तो क्या किया जाए? कटने से बचाने के लिए क्या पतंग को उड़ाना छोड़ दें?”

न जाने कितनी ही चर्चाएं थीं जो इन दिनों गांव की चौपाल पर चलती थी.

सब के अपनेअपने मत थे. कोई मेघा के पक्ष में तो कोई उस के खिलाफ. हरकोई चाहता तो था कि मेघा को उड़ने के लिए आकाश मिले लेकिन यह भी कि उस आकाश में बाज न उड़ रहे हों. अब भला यह कैसे संभव है कि रसगुल्ला तो खाएं लेकिन चाशनी में हाथ न डूबें.

“संभव तो यह भी है कि रसगुल्ले को कांटे से उठा कर खाया जाए.”

कोई मेघा की नकल कर हंसता. मेघा भी इसी तरह अटपटे सवालों के चटपटे जवाब देने वाली लड़की है. हर मुश्किल का हल बिना घबराए या हड़बड़ाए निकालने वाली. कभी ओढ़नी फट भी गई ना, तो इतनी सफाई से रफू करेगी कि किसी को आभास तक नहीं होगा. मेघा के बारे में सब का यही खयाल था.

लेकिन न जाने क्यों, खुद मेघा को अपने ऊपर भरोसा नहीं हो पा रहा था पर आसमान नापने के लिए पर तो खोलने ही पडते हैं ना… मेघा भी अब उड़ान के लिए तैयार हो चुकी थी.

मेघा कालेज के कैंपस में चाचा के साथ घुसी तो लाज के मारे जमीन में गड़ गई. चाचाभतीजी दोनों एकदूसरे से निगाहें चुराते आगे बढ़ रहे थे. मेघा को लगा मानों कई जोड़ी आंखें उस के दुपट्टे पर टंक गई है. उस ने अपने कुरते के ढलते कंधे को दुरुस्त किया और सहमी सी चाचा के पीछे हो ली.

इस बीच मेघा ने जरा सा निगाह ऊपर उठा कर इधरउधर देखने की कोशिश की लेकिन आंखें कई टखनों से होती हुईं खुली जांघ तक का सफर तय कर के वापस उस तक लौट आईं.

उस ने अपने स्मार्टफोन की तरफ देखा जो खुद उस की तरह ही किसी भी कोण से स्मार्ट नहीं लग रहा था. हर तीसरे हाथ में पकड़ा हुआ कटे सेब के निशान वाला फोन उसे अपने डब्बे को पर्स में छिपाने की सलाह दे रहा था जिसे उस ने बिना किसी प्रतिरोध के स्वीकार कर लिया था.

कालेज की औपचारिकताएं पूरी करने और होस्टल में कमरा अलौट होने की तसल्ली करने के बाद चाचा उसे भविष्य के लिए शुभकामनाएं दे कर वापस लौट गए. अब मेघा को अपना भविष्य खुद ही बनाना था. गंवई पसीने की खुशबू को शहर के परफ्यूम में घोलने का सपना उसे अपने दम पर ही पूरा करना था.

कालेज का पहला दिन. मेघा बड़े मन से तैयार हुई. लेकिन कहां जानती थी कि जिस ड्रैस को उस के कस्बे में नए जमाने की मौडर्न ड्रैस कह कर उसे आधुनिका का तमगा दिया जाता था वही कुरता और प्लाजो यहां उसे बहनजी का उपनाम दिला देंगे. मेघा आंसू पी कर रह गई. लेकिन सिलसिला यहीं नहीं थमा था.

उस के बालों में लगे नारियल तेल की महक, हर कुरते के साथ दुपट्टा रखने की आदत, पांवों में पहनी हुई चप्पलें आदि उसे भीड़ से अलग करते थे. और तो और खाने की टेबल पर भी सब उसे चम्मच की बजाय हाथ से चावल खाते हुए कनखियों से देख कर हंसा करते थे.

“आदिमानव…” किसी ने जब पीछे से विशेषण उछाला तो मेघा को समझते देर नहीं लगी कि यह उसी के लिए है.

“यह सब बाहरी दिखावा है मेघा। तुम्हें इस में नहीं उलझना है,” स्टेशन पर ट्रैन में बैठाते समय पिता ने यही तो सीख की पोटली बांध कर उस के कंधे पर धरी थी.

‘पोटली तो भारी नहीं थी, फिर कंधे क्यों दुखने लगे?’ मेघा सोचने लगी.

हर छात्र की तरह मेघा का सामना भी सीनियर छात्रों द्वारा ली जाने वाली रैगिंग से हुआ. होस्टल के एक कमरे में जब नई आई लड़कियों को रेवड़ की तरह भरा जा रहा था तब मेघा का गला सूखने लगा.

“तो क्या किया जाए इस नई मुरगी के साथ?” छात्राओं से घिरी मेघा ने सुना तो कई बार देखी गई फिल्म ‘थ्री इडियट’ से कौपी आईडिया और डायलौग न जाने तालू के कौन से कोने में हिस्से में चिपक गए.

“भई, दुपट्टे बड़े प्यारे होते हैं इस के. चलो रानी, दुपट्टे से जुड़े कुछ गीतों पर नाच के दिखा दो. और हां, डांस प्योर देसी हो समझी?” गैंग की लीडर ने कहा तो मेघा जड़ सी हो गई.

एक सीनियर ने बांह पकड़ कर उसे बीच में धकेल दिया. मेघा के पांव फिर भी नहीं चले.

“देखो रानी, जब तक नाचोगी नहीं, जाओगी नहीं. खड़ी रहो रात भर,” धमकी सुन कर मेघा ने निगाहें ऊपर उठाईं.

“ओह, कहां फंसा दिया,” मेघा की आंखों में बेबसी ठहर गई.

‘अब घूमर के अलावा कोई बचाव नहीं,’ सोच कर मेघा ने अपने चिंदीचिंदी आत्मविश्वास को समेटा और अपने दुपट्टे को गले से उतार कर कमर पर बांध लिया.

‘हवा में उड़ता जाए, मेरा लाल दुपट्टा मलमल का…’, ‘इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा…’, ‘लाल दुपट्टा उड़ गया रे बैरी हवा के झौंके से…’ जैसे कई फिल्मी गीतों पर मेघा ने घूमर नाच किया तो सब के मुंह उस के मिक्स ऐंड मैच को देख कर खुले के खुले रह गए. फिरकी की तरह घूमती उस की देह खुद चकरी हो गई थी.

लड़कियां उत्तेजित हो कर सीटियां बजाने लगीं. उस के बाद वह ‘घूमर वाली लड़की’ के नाम से जानी जाने लगी.

खुशी का गम : पति ने किया खिलवाड़ – भाग 1

Family Story in Hindi: मेरे बेटे आकाश की आज शादी है. घर मेहमानों से भरा पड़ा है. हर तरफ शादी की तैयारियां चल रही हैं. यद्यपि मैं इस घर का मुखिया हूं, लेकिन अपने ही घर में मेरी हैसियत सिर्फ एक मूकदर्शक की बन कर रह गई है. आज मेरे पास न पैसा है न परिवार में कोई प्रतिष्ठा. चूंकि घर के नौकरों से ले कर रिश्तेदारों तक को इस बात की जानकारी है, इसलिए सभी मुझ से बहुत रूखे ढंग से पेश आते हैं. बहुत अपमानजनक है यह सब लेकिन मैं क्या करूं? अपने ही घर में उस अपमानजनक स्थिति के लिए मैं खुद ही तो जिम्मेदार हूं. फिर मैं किसे दोष दूं? क्या खुशी, मेरी पत्नी इस के लिए जिम्मेदार है? अंदर से एक हूक  सी उठी. और इसी के साथ मन ने कहा, ‘उस ने तो तुम्हें पति का पूरा सम्मान दिया, पूरा आदर दिया, लेकिन तुम शायद उस के प्यार, उस के समर्पण के हकदार नहीं थे.’

खुशी एक बहुत कुशल गृहिणी है जिस ने कई सालों तक मुझे पत्नी का निश्छल प्यार और समर्पण दिया. पर मैं ही नादान था जो उस की अच्छाइयां कभी समझ नहीं पाया. मैं हमेशा उस की आलोचना करता रहा. उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करता रहा. अपने प्रति उस के लगाव को हमेशा मैं ने ढोंग समझा.

मैं सारा जीवन मौजमस्ती करता रहा और वह मेरी ऐयाशियों को घुटघुट कर सहती रही, मेरे अपमान व अवमाननापूर्ण व्यवहार को सहती रही. वह एक सीधीसादी सुशील महिला थी और उस का संसार सिर्फ मैं और उस का बेटा आकाश थे. वह हम दोनों के चेहरों पर मुसकराहट देखने के लिए कुछ भी करने को हमेशा तैयार रहती थी लेकिन मैं अपने प्रति उस की उस अटूट चाहत को कभी समझ न पाया.

मैं कब विगत दिनों की खट्टीमीठी यादों की लहरों में बहता चला गया. मुझे पता भी नहीं चला था.

उन दिनों मैं कालिज में नयानया आया था. वरिष्ठ छात्र रैगिंग कर रहे थे. एक दिन मैं कालिज में अभी घुसा ही था कि एक दूध की तरह गोरी, अति आकर्षक नैननक्श वाली लड़की कुछ घबराई और परेशान सी मेरे पास आई और सकुचाते हुए मुझ से बोली, ‘आप बी.ए. प्रथम वर्ष में हैं न, मैं भी बी.ए. प्रथम वर्ष में हूं. वह जो सामने छात्रों का झुंड बैठा है, उन लोगों ने मुझ से कहा है कि मैं आप का हाथ थामे इस मैदान का चक्कर लगाऊं. अब वे सीनियर हैं, उन की बात नहीं मानी तो नाहक मुझे परेशान करेंगे.’

‘हां, हां, मेरा हाथ आप शौक से थामिए, चाहें तो जिंदगी भर थामे रहिए. बंदे को कोई परेशानी नहीं होगी. तो चलें, चक्कर लगाएं.’

मेरी इस चुटकी पर शर्म से सिंदूरी होते उस कोमल चेहरे को मैं देखता रह गया था. मैं अब तक कई लड़कियों के संपर्क में आ चुका था लेकिन इतनी शर्माती, सकुचाती सुंदरता की प्रतिमूर्ति को मैं ने पहली बार इतने करीब से देखा था.

उस के मुलायम हाथ को थामे मैं ने पूरे मैदान का चक्कर लगाया था और फिर ताली बजाते छात्रों के दल के सामने आ कर मैं ने उस का कांपता हाथ छोड़ दिया था कि तभी उस ने नजरें जमीन में गड़ा कर मुझ से कहा था, ‘आई लव यू’, और यह कहते ही वह सुबकसुबक कर रो पड़ी थी और मैं मुसकराता हुआ उसे छोड़ कर क्लास में चला गया था.

बाद में मुझे पता चला था कि उस सुंदर लड़की का नाम खुशी था और वह एक प्रतिष्ठित धनाढ्य परिवार की लड़की थी. उस दिन के बाद जब कभी भी मेरा उस से सामना होता, मुझ से नजरें मिलते ही वह घबरा कर अपनी पलकें झुका लेती और मेरे सामने से हट जाती. उस की इस अदा ने मुझे उस का दीवाना बना दिया था. मैं क्लास में कोशिश करता कि उस के ठीक सामने बैठूं. मैं उस का परिचय पाने और दोस्ती करने के लिए बेताब हो उठा था.

मेरे चाचाजी की लड़की नेहा, जो मेरी ही क्लास में थी, वह खुशी की बहुत अच्छी सहेली थी. मैं ने नेहा के सामने खुशी से दोस्ती करने की इच्छा जाहिर की और नेहा ने एक दिन मुझ से उस की दोस्ती करा दी थी. धीरेधीरे हमारी दोस्ती बढ़ गई और खुशी मेरे बहुत करीब आ गई थी.

मैं जैसेजैसे खुशी के करीब आता जा रहा था, वैसेवैसे मुझे निराशा हाथ लगती जा रही थी. मैं स्वभाव से बेहद बातूनी, जिंदादिल, मस्तमौला किस्म का युवक था लेकिन खुशी अपने नाम के विपरीत एक बेहद भावुक किस्म की गंभीर लड़की थी.

कुछ ही समय में वह मेरे बहुत करीब आ चुकी थी और मैं उस की जिंदगी का आधारस्तंभ बन गया था, लेकिन मैं उस के नीरस स्वभाव से ऊबने लगा था. वह मितभाषी थी, जब भी मेरे पास रहती, होंठ सिले रहती. जहां मैं हर वक्त खुल कर हंसता रहता था, वहीं वह हर वक्त गंभीरता का आवरण ओढे़ रहती.

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