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पीछा : भाग 3

लेखक- अंजुम फारुख

शेख मजीद बोला, ‘‘इंसपेक्टर साहब, आप के आने से 10 मिनट पहले अफजाल बेग ने दरवाजे पर दस्तक दी थी. मैं ने अपनी जगह बैठेबैठे उसे अंदर आने की इजाजत दे दी. मैं समझा था कि वेटर होगा. अफजाल बेग अंदर दाखिल होते ही चाकू लहराता हुआ मेरी ओर बढ़ा. संयोग से आप ने मुझे पहले ही सचेत कर दिया था, इसलिए मैं पिस्तौल हाथ में लिए बैठा था.’’

‘‘बेचारा अफजाल.’’ सबइंसपेक्टर सलीम की आवाज में दुख और अफसोस था.

‘‘आप उसे बेचारा कह रहे हैं..?’’ शेख मजीद ने सबइंसपेक्टर सलीम को घूर कर देखा और कहा, ‘‘क्या मतलब है आप का?’’

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‘‘मेरा मतलब है, हमें यहां आने में देर हो गई वरना हम उसे बचा लेते.’’

सबइंसपेक्टर सलीम ने रहस्यमय अंदाज में कहा, ‘‘लेकिन इस का कातिल कानून की गिरफ्त से बच नहीं सकता.’’

शेख मजीद ने नागवारी से कहा, ‘‘मैं आप को बता चुका हूं कि यह आदमी मुझे कत्ल करने के लिए चाकू लहराता हुआ मेरी ओर लपका था. मैं ने अपनी सुरक्षा के तहत इस पर गोली चला दी. यह कत्ल नहीं, बचाव का कदम था.’’

इंसपेक्टर जावेद कुछ बेचैनी महसूस कर रहा था. वह कोई बात कहना चाहता था कि सबइंसपेक्टर सलीम ने हाथ उठा कर उसे रोक दिया और बोला, ‘‘सर, हमें बताया गया है कि मकतूल अफजाल बेग पिछले 2 महीनों से शेख मजीद का पीछा कर रहा था. मेरा सुझाव है कि यह मामला जरा उलट कर के तो देखें. यह भी संभव है कि शेख मजीद ही अफजाल बेग का पीछा कर रहा हो.’’

इंसपेक्टर जावेद ने सहमति के अंदाज में अपना सिर हिलाया. शेख मजीद का चेहरा सफेद पड़ गया.

सबइंसपेक्टर सलीम ने मजीद से कहा, ‘‘संभव है कि वे पत्र तुम्हें अफजाल बेग ने भेजे हों. लेकिन यह संभावना ज्यादा ठीक लगती है कि पत्रों का चक्कर तुम्हारी अपनी कारस्तानी हो. क्योंकि मैं समझता हूं कि अफजाल बेग तुम्हारा पीछा नहीं कर रहा था, बल्कि तुम उस का पीछा कर रहे थे.’’

‘‘क्या बकवास है?’’ शेख मजीद के गले से गुर्राहट निकली, ‘‘अगर वे पत्र मैं ने खुद लिखे होते तो मुझे पुलिस की मदद लेने की क्या जरूरत थी.’’

‘‘मैं बताता हूं,’’ सबइंसपेक्टर सलीम ने उस के चेहरे पर अपनी नजरें जमा दीं, ‘‘20 अगस्त को तुम ने स्ट्रीट लेन में साफिया नाम की एक लड़की का कत्ल किया था.

उस लड़की ने तुम्हें धोखा दिया होगा, बेवफाई की होगी या उस से तुम्हारी दुश्मनी रही होगी, इसलिए तुम उस का कत्ल करने को मजबूर हो गए होगे. अफजाल बेग ने तुम्हें कत्ल करते या उस गली से निकलते देख लिया होगा.’’

शेख मजीद गुस्से से सबइंसपेक्टर सलीम को घूरने लगा. उस की बड़ीबड़ी सुर्ख आंखें स्थिर सी हो गई थीं.

सबइंसपेक्टर सलीम ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘संभव है, अफजाल बेग ने तुम्हें हत्या करते न देखा हो, लेकिन तुम समझे कि वह तुम्हें देख चुका है, इसलिए तुम ने उस का पीछा करना शुरू कर दिया. शाम के समाचार पत्रों में साफिया के कत्ल की खबर छपी थी और अफजाल बेग का उस में ऐसा कोई बयान नहीं था कि यह कत्ल उस के सामने हुआ है. लेकिन तुम इस संबंध में अपने दिमाग से शक न निकाल सके.

‘‘तुम्हें यह डर सताने लगा कि कभी न कभी अफजाल बेग पुलिस को सूचना अवश्य देगा, इसलिए उस का जिंदा रहना तुम्हारे लिए खतरनाक था. जब तुम्हें मालूम हुआ कि अफजाल बेग देश की सैर करने जा रहा है तो तुम ने भी एक योजना बना ली. तुम ने खुद अपने नाम से पत्र भेजे और देश भर में उस का पीछा करना शुरू कर दिया.

‘‘तुम शक्की आदमी हो, तुम्हें ख्वाब में भी अफजाल बेग दिखाई देता होगा. तुम ऐसी स्थिति पैदा करना चाहते थे कि अगर वह तुम्हारे हाथों मारा जाए तो तुम उस कत्ल को अपने बचाव की कोशिश साबित कर सको.’’

‘‘दिलचस्प कहानी है.’’ शेख मजीद ने कुटिल स्वर में कहा, ‘‘अगर मैं ने किसी लड़की का कत्ल किया होता तो क्या तुम्हें अफजाल बेग तक पहुंचने का मौका देता, क्योंकि तुम्हारे अनुसार वह मेरे अपराध का चश्मदीद गवाह था.’’

‘‘तुम्हें थोड़ाबहुत तो खतरा मोल लेना ही था.’’ सबइंसपेक्टर सलीम ने कहा, ‘‘लेकिन तुम्हारे लिए सब से ज्यादा खतरनाक बात यह थी कि कहीं अफजाल बेग तुम्हें पहचान न ले. उस का पीछा करते समय तुम ने इस बात का खयाल रखा था कि उस के सामने न आने पाओ.

‘‘तुम बराबर उसे कत्ल करने का मौका तलाशते रहे. लेकिन तुम्हें शायद यह मालूम नहीं था कि अफजाल बेग की दूर की नजर बहुत कमजोर थी. उस ने तुम्हें गली में नहीं देखा होगा. अगर देखा भी होगा तो पहचाना नहीं होगा.’’

शेख मजीद ने खुद को संभालते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे पास इस इलजाम का कोई ठोस सबूत है?’’

सबइंसपेक्टर सलीम ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने लाश को छुआ तो नहीं…’’

‘‘नहीं.’’ शेख मजीद बोला.

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‘‘बहुत अच्छे. अब मैं तुम्हें बताता हूं कि यह सब कुछ कैसे हुआ?’’ सबइंसपेक्टर सलीम ने उस की आंखों में आंखें डाल दीं, ‘‘तुम ने किसी तरह अफजाल बेग को अपने कमरे में बुलाया और उसे कुरसी पेश की. फिर जैसे ही वह कुरसी पर बैठा, तुम ने उस पर गोली चला दी और उस के हाथ में चाकू पकड़ा दिया.’’

शेख मजीद जोर से चीखा, ‘‘नहीं, यह झूठ है.’’ उस के होंठों तथा माथे पर तनाव की लकीरें खिंच गई थीं.

सबइंसपेक्टर सलीम ने इंसपेक्टर जावेद से कहा, ‘‘सर, याद करें जब अफजाल बेग थाने में आया था तो उस ने कुरसी पर बैठते समय अपने पतलून की दोनों मोरी ऊपर खींच ली थीं. बिलकुल यही बात यहां भी दिखाई दे रही है और…’’

फिर उस ने वाक्य को पूरा किए बिना उछल कर शेख मजीद की कलाई पकड़ ली. शेख मजीद मेज पर पड़ा पिस्तौल उठाने की कोशिश कर रहा था.

सबइंसपेक्टर सलीम ने शेख मजीद की कलाई मरोड़ते हुए कहा, ‘‘तुम खतरनाक आदमी हो, तुम्हें आजाद नहीं छोड़ा जा सकता. वैसे अगर तुम पिस्तौल उठाने में सफल हो जाते तो भी मेरा कुछ न बिगड़ता. इंसपेक्टर जावेद तुम्हें पहले ही शूट कर देते. लेकिन यह सजा तुम्हारे लिए ठीक नहीं होती. इस तरह अफजाल बेग को इंसाफ नहीं मिलता.’’

इंसपेक्टर जावेद ने कहा, ‘‘हां, अब तुम अफजाल बेग की हत्या करने की बात स्वीकार करोगे, फिर तुम्हें इसलामाबाद भेज दिया जाएगा. वहां साफिया नाम की लड़की और अफजाल बेग की हत्या के आरोप में तुम पर मुकदमा चलेगा. तुम्हारा बचना नामुमकिन है.’’ इंसपेक्टर जावेद की बात सुन कर शेख मजीद का चेहरा धुआंधुआं हो गया और उस का सिर झुक गया.

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प्रस्तुति: कलीम उल्लाह

पीछा : भाग 2

लेखक- अंजुम फारुख

शेख मजीद थाने से चला गया. फोन पर बात करने के बाद इंसपेक्टर जावेद ने सबइंसपेक्टर जाकिर से कहा, ‘‘आप तत्काल रौयल होटल चले जाएं. वह मोटा आदमी अफजाल बेग होटल की लौबी में बैठा हुआ है. आप उसे यहां ले आएं. अभीअभी मेरी उस होटल के मैनेजर से बात हुई है.’’

आधे घंटे बाद सबइंसपेक्टर जाकिर, अफजाल बेग नाम के उस आदमी को अपने साथ ले आया, जो देखने में मोटा और गोलमटोल सा था. उस ने स्टील के फ्रेम वाला चश्मा लगा रखा था. उस के शरीर पर कीमती कपड़े थे, जो बहुत ढीलेढाले थे.

इंसपेक्टर जावेद ने उसे कुरसी पर बैठने का इशारा किया. उस ने कुरसी पर बैठने से पहले अपनी पतलून की दोनों मोरी ऊपर खींची ताकि आराम से बैठ सके. अफजाल बेग ने इंसपेक्टर जावेद से पूछा कि उसे यहां क्यों बुलाया गया है.

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इंसपेक्टर जावेद, शेख मजीद द्वारा दिए गए पत्रों से तिथिवार उन स्थानों की सूची बना चुका था, जहांजहां मजीद गया था. वह अफजाल बेग से बोला कि आप इन तिथियों को क्वेटा, कराची, हैदराबाद, मुलतान और लाहौर गए थे.

‘‘जी हां,’’ अफजाल बेग की आंखें आश्चर्य से फैल गईं.

‘‘क्या आप बता सकते हैं कि आप ने ये सफर किस उद्देश्य से किए?’’ सबइंसपेक्टर सलीम ने उस से पूछा.

अफजाल बेग के दोनों हाथ उस की तोंद पर थे. वह बिलकुल शांत भाव से कुरसी पर बैठा था. लेकिन जब वह बोला तो उस के स्वर में थोड़ी सी लड़खड़ाहट थी, ‘‘सर, मैं इसलामाबाद की अफजाल ऐंड कंपनी का मालिक हूं. यह फर्म मेरे सहयोगी अच्छी तरह चला रहे हैं. मैं ने शादी नहीं की है, इसलिए मुझ पर परिवार की कोई जिम्मेदारी नहीं है. अत: मैं आजकल अपने देश की सैर करने के लिए निकला हूं. क्या अपने देश की सैर करना कोई अपराध है?’’

‘‘बिलकुल नहीं जी. लेकिन हमें शिकायत मिली है कि आप एक युवक का पीछा कर रहे हैं.’’ सबइंसपेक्टर सलीम, जोकि एक जासूस भी था, ने उस का चेहरा गौर से देखते हुए पूछा.

‘‘पीछा..? नहीं सर, मैं किसी का पीछा नहीं कर रहा हूं. क्या उस युवक ने कोई वजह बताई है कि मैं उस का पीछा क्यों कर रहा हूं. मेरे पास रुपएपैसे की कोई कमी नहीं है. मुझे किसी का पीछा करने की क्या जरूरत है?’’  वह हलकी सी नाराजगी के साथ बोला.

सबइंसपेक्टर जावेद भी अफजाल बेग का बारीकी से निरीक्षण कर रहा था. उस ने शेख मजीद द्वारा दिए गए पत्रों में से एक पत्र निकाल कर उस की ओर बढ़ा दिया और उस के चश्मे के शीशों को घूरता हुआ बोला, ‘‘आप ने यह पत्र उसे क्यों भेजा था?’’

‘‘यह पत्र मैं ने नहीं भेजा, आप को गलतफहमी हुई है.’’ अफजाल बेग के स्वर में आत्मविश्वास था.

वह खड़ा हो कर थोड़ा सा आगे झुका, फिर बोला, ‘‘आप ने बेवजह मेरा समय बरबाद किया. अब मुझे इजाजत दीजिए.’’

इंसपेक्टर जावेद ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की. वह दरवाजे की तरफ बढ़ गया.

अफजाल बेग के जाने के बाद इंसपेक्टर जावेद, सबइंसपेक्टर सलीम से बोला, ‘‘आप इस मामले में क्या कहते हैं?’’

‘‘मैं इसे इत्तफाक समझने के लिए तैयार नहीं हूं. कोई आदमी मात्र इत्तफाकन पूरे देश में किसी का पीछा नहीं कर सकता.’’ सबइंसपेक्टर सलीम ने कहा.

‘‘पत्रों की धमकियों से स्पष्ट होता है कि यह कत्ल आदि का मामला है.’’ सबइंसपेक्टर जाकिर बोला.

‘‘मेरा भी यही खयाल है.’’ इंसपेक्टर जावेद ने कहा, ‘‘मैं इसलामाबाद पुलिस को ईमेल कर रहा हूं. संभव है, हमें वहां से शेख मजीद या अफजाल के बारे में कोई अच्छी सूचना मिल जाए.’’

‘‘एक बात खासतौर से मालूम करना.’’ सबइंसपेक्टर सलीम ने मेज पर पड़े पत्रों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘20 अगस्त को इसलामाबाद की किसी गली में कोई कत्ल तो नहीं हुआ था.’’

ईमेल का जवाब 2 घंटे बाद ही आ गया. उस में लिखा था— अफजाल बेग एक बहुत बड़ी व्यापारिक कंपनी का मालिक है. उस की उम्र 53 साल है. वह स्टील के फ्रेम वाला चश्मा लगाता है और अविवाहित है. उस की कंपनी काफी उन्नति कर चुकी है. कारोबार की देखभाल अब उस के कर्मचारी करते हैं. आजकल वह देश भ्रमण पर निकला है. पुलिस के पास उस के खिलाफ कोई शिकायत नहीं है.

शेख मजीद का इसलामाबाद में टेक्सटाइल्स का कारोबार है. वह अकसर अपने कारोबार के सिलसिले में एक जगह से दूसरी जगह आताजाता रहता है. उस की उम्र 27 साल है. उस के पास काफी पैसा है. वह इधरउधर पैसे खर्च करता रहता है. मजीद के खिलाफ भी इसलामाबाद पुलिस के पास कोई शिकायत नहीं है.

20 अगस्त को दोपहर ढाई बजे स्ट्रीट लेन में साफिया नामक एक लड़की का कत्ल कर दिया गया था. उस घटना का न तो कोई चश्मदीद गवाह मिला और न ही कातिल का पता चल पाया.

अफजाल बेग और शेख मजीद का इस मामले से कोई संबंध नजर नहीं आता. अगर आप को कुछ पता चला हो तो सूचना दें.

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तभी शेख मजीद का फोन आ गया. उस की आवाज लरज रही थी, ‘‘मुझे अभीअभी एक पत्र और मिला है. उस में सिर्फ इतना लिखा है ‘आखिर तुम ने पुलिस को बता ही दिया.’ अब बताइए, क्या करूं?’’

‘‘मजीद साहब, आप वह पत्र संभाल कर रखिए और यह बताइए कि आप ने इसलामाबाद में स्ट्रीट लेन का नाम सुना है?’’ इंसपेक्टर जावेद ने पूछा.

‘‘जी हां, स्ट्रीट लेन वहां की एक गली है. वहीं के एक गैराज में मैं अपनी कार खड़ी करता हूं. स्ट्रीट लेन से तो मैं रोजाना गुजरता हूं.’’ शेख मजीद ने फोन पर कहा.

‘‘क्या 20 अगस्त को भी आप वहां से गुजरे थे? याद कर के बताइए.’’

‘‘एक मिनट…हां, याद आया. पहला पत्र मिलने से एक दिन पहले की बात है. मैं उधर से ढाई बजे के करीब गुजरा था.’’

इंसपेक्टर जावेद ने कहा, ‘‘ओह! अब समझ में आया कि अफजाल बेग आप का पीछा क्यों कर रहा है. आप होटल के कमरे से बाहर मत निकलिएगा. मैं आ रहा हूं.’’

रौयल होटल के अहाते में कार मोड़ते ही इंसपेक्टर जावेद और सबइंसपेक्टर सलीम को किसी गड़बड़ का अहसास हो गया. होटल के अंदर से किसी की चीखें सुनाई दे रही थीं. बहुत से लोग होटल के प्रवेशद्वार पर एकत्र हो गए थे. वेटर आदि कर्मचारी भी भीड़ में शामिल थे. होटल के मैनेजर ने इंसपेक्टर जावेद से कहा, ‘‘अच्छा हुआ, आप आ गए इंसपेक्टर साहब. कमरा नंबर 77 में एक आदमी का कत्ल कर दिया गया है.’’

पुलिस इंसपेक्टर जावेद, होटल का मैनेजर और सबइंसपेक्टर सलीम लोगों को एक तरफ हटाते हुए आगे बढ़ गए.

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कमरा नंबर 77 में शेख मजीद मौजूद था. वह उन्हें देखते ही उठ खड़ा हुआ. उस के चेहरे से बदहवासी झलक रही थी. मजीद के ठीक सामने कालीन पर अफजाल बेग औंधा पड़ा हुआ था. उस की पतलून की दोनों मोरी ऊपर उठी हुई थी.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

पीछा : भाग 1

लेखक- अंजुम फारुख

इंसपेक्टर जावेद पेशावर के एक थाने में अपने 2 सहयोगियों सबइंसपेक्टर सलीम और सबइंसपेक्टर जाकिर के साथ बैठा किसी केस पर बातें कर रहा था, तभी एक युवक थाने में दाखिल हुआ. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. वह बहुत परेशान दिखाई दे रहा था. इंसपेक्टर जावेद ने युवक से पूछा, ‘‘कहिए जनाब, मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं.’’

युवक बोला, ‘‘जी, मेरा नाम शेख मजीद है. मैं इसलामाबाद में रहता हूं और मेरा टेक्सटाइल्स का कारोबार है. मैं अपने कारोबार के सिलसिले में अकसर एक जगह से दूसरी जगह आताजाता हूं.’’

‘‘वो तो ठीक है, मजीब साहब. आप पहले अपनी समस्या बताएं.’’ सबइंसपेक्टर जाकिर ने शेख मजीद से पूछा.

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शेख मजीद कुरसी पर बैठते हुए बोला, ‘‘मैं इसी पौइंट पर आ रहा हूं. मैं जहां कहीं भी आताजाता हूं, एक आदमी मेरा पीछा करता रहता है.’’

सबइंसपेक्टर सलीम ने कागजकलम संभाल लिया था, वह शेख मजीद से बोला, ‘‘उस का हुलिया बताइए?’’

‘‘वह छोटे कद का गोलमटोल सा आदमी है और स्टील के फ्रेम का चश्मा लगाता है. वह पिछले 2 महीने से किसी भूत की तरह मेरा पीछा कर रहा है. मुझे उस से बचा लीजिए इंसपेक्टर साहब.’’

शेख मजीद की बातें सुन कर इंसपेक्टर जावेद ने कहा, ‘‘आप बिलकुल परेशान मत होइए. सब ठीक हो जाएगा. आप अपनी बात जारी रखें.’’

शेख मजीद बोला, ‘‘इंसपेक्टर साहब, अगर वह आदमी सिर्फ मेरा पीछा कर रहा होता, तो मुझे ज्यादा परेशानी नहीं होती. लेकिन मेरा पीछा करने के साथसाथ उस के पत्रों का सिलसिला भी जारी है. मेरा खयाल है, वह कोई बहुत खतरनाक आदमी है और कभी भी मौका पा कर मुझे नुकसान पहुंचा सकता है.’’

‘‘आप शुरू से पूरी बात बताएं.’’

‘‘सर, इस मामले की शुरुआत तब हुई, जब मैं एक दिन अपने मकान की दूसरी मंजिल पर बैठा मोबाइल फोन पर किसी से बात कर रहा था. अचानक एक पत्थर खिड़की का शीशा तोड़ता हुआ मेरी मेज के निकट आ गिरा. मैं ने घबरा कर पत्थर की ओर देखा, तो मेरी नजरें उस से चिपक कर रह गईं. क्योंकि पत्थर के साथ कागज की एक पर्ची भी बंधी थी.’’ फिर शेख मजीद ने अपनी जेब से वह पर्ची निकाल कर इंसपेक्टर जावेद की ओर बढ़ा दी.

इंसपेक्टर जावेद ने पर्ची को बहुत गौर से देखा. पर्ची किसी सस्ती नोटबुक से फाड़ी गई थी और उस के अक्षरों को किसी समाचार पत्र से काटकाट कर शब्दों का रूप दिया गया था. पर्ची में सिलवटें पड़ी हुई थीं. उस पर्ची पर दिनांक 20 अगस्त भी अंकित था, जो समाचार पत्र से काट कर चिपकाया गया था.

पर्ची पर लिखा था ‘कल तुम ने गली में जो कुछ देखा है, उसे भूल जाओ. तुम्हारी याद्दाश्त तुम्हारे लिए हानि की वजह बन सकती है. मैं तुम्हारी निगरानी करता रहूंगा.’

उस पर्ची को देखने के बाद इंसपेक्टर जावेद ने उसे दोनों सबइंसपेक्टरों की ओर बढ़ा दिया.

सबइंसपेक्टरों ने पूछा, ‘‘मजीद साहब, आप ने गली में क्या देखा था?’’

‘‘कुछ नहीं, मैं ने कुछ देखा हो तभी न. इसीलिए पत्र का मतलब मेरी समझ में नहीं आया.’’ शेख मजीद बोला, ‘‘पहले मुझे लगा था कि किसी बच्चे की शरारत होगी. मगर जब मैं ने खिड़की से झांक कर बाहर देखा तो कोई बच्चा नजर नहीं आया. हां, गली में एक युवक और युवती जरूर आपस में बातें कर रहे थे.

‘‘उन से कुछ ही दूरी पर एक पुलिस वाला टहलता हुआ जा रहा था और एक खंभे के पास छोटे कद का एक गोलमटोल सा आदमी खड़ा था. उस ने स्टील के फ्रेम का चश्मा लगा रखा था. उस के हाथ में चहलकदमी करने वाली छड़ी थी. मेरी निगाहें उसी आदमी पर जम कर रह गईं.’’

शेख मजीद कुछ देर के लिए रुका, फिर बोला, ‘‘उस आदमी का चेहरा मेरे दिलोदिमाग में इस तरह बैठ गया कि मुझे घबराहट होने लगी. मुझे लगा कि मैं खतरे में हूं, इसलिए मुझे यह शहर छोड़ देना चाहिए. इसी के मद्देनजर मैं ने हवाई जहाज से क्वेटा जाने की सीट बुक करवा ली.

‘‘अगले दिन मैं हवाई जहाज में सवार हुआ और अपनी सीट पर सो गया. एयरपोर्ट पर हवाई जहाज से उतरते समय मैं ने देखा कि वह गोलमटोल सा आदमी भी उतर रहा है. यह देखते ही मेरी सांस रुक गई. पहले तो मैं ने समझा कि यह इत्तफाक हो सकता है, लेकिन जब दूसरे दिन होटल के कमरे में दरवाजे के नीचे से एक पत्र फेंका गया तो मुझे कुछ सोचना पड़ा.’’

शेख मजीद ने वह पत्र इंसपेक्टर जावेद की ओर बढ़ा दिया. यह पत्र भी अखबार से अक्षरों को काट कर, फिर कागज पर चिपका कर तैयार किया गया था. पत्र में लिखा था ‘खामोशी में ही भलाई है.’

इंसपेक्टर जावेद उस पत्र को मेज पर रख कर बोला, ‘‘आप अपनी बात जारी रखें, मजीद साहब.’’

‘‘इस वाक्य ने मुझे बुरी तरह डरा दिया था.’’ शेख मजीद बोला, ‘‘मैं जल्दीजल्दी होटल बदलता रहा. क्या बताऊं कहांकहां भटकता फिरा. मैं ने कराची के एक होटल में कमरा ले लिया. वहां एक हफ्ता आराम से रहा. मैं ने समझा था कि मुझे उस आदमी से छुटकारा मिल गया.

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‘‘लेकिन यह मेरी गलतफहमी थी. जल्द ही मुझे कुरियर से एक पत्र मिला. यह पत्र भी पहले के 2 पत्रों जैसा था. उस में लिखा था ‘याद रखो, तुम्हें वह सब भूलना है.’ उस पत्र से मैं दहल गया.’’

शेख मजीद कुछ क्षण के लिए रुका, फिर इंसपेक्टर जावेद की ओर देखते हुए आगे बोला, ‘‘उसी दिन डाइनिंग हाल में नाश्ते के समय वह आदमी मुझे फिर दिखाई दिया. वह मेरी मेज से 10 फुट दूर एक मेज पर बैठा था. मेरे बैठते ही वह उठ कर बाहर जाने लगा. मैं ने उस आदमी के बारे में पूछा कि वह कौन है तो पता चला कि उस का नाम अफजाल है और वह कमरा नंबर 402 में ठहरा हुआ है.

‘‘नाश्ता करने के बाद मैं रिसैप्शन पर गया और कस्टमर्स का रजिस्टर देखा. मुझे पता चला कि उस ने 10 मिनट पहले होटल छोड़ दिया है.’’ शेख मजीद अपनी कहानी सुना रहा था या दर्द बयां कर रहा था, उस के चेहरे से समझना मुश्किल था.

‘‘मजीद साहब, इन पत्रों को ले कर आप ने पुलिस से संपर्क तो किया होगा.’’ इंसपेक्टर जावेद ने पूछा.

‘‘नहीं.’’ शेख मजीद ने कहा.

‘‘क्यों?’’ सबइंसपेक्टर सलीम ने उस के चेहरे पर नजरें गड़ा दीं.

‘‘मैं इन पत्रों को उस आदमी का पागलपन समझ रहा था. मैं सोच रहा था कि वह एक दिलचस्प खेल खेल रहा है कि क्या मैं उस से पीछा छुड़ा पाता हूं या नहीं. इसलिए मैं ने तब पुलिस से संपर्क नहीं किया. लेकिन जब देखा कि मामला गंभीर हो रहा है तो मैं ने आज थाने की शरण ली.’’

शेख मजीद ने आगे बताया, ‘‘उस के बाद मैं हैदराबाद, मुलतान और लाहौर गया. हर जगह हर शहर में उस आदमी की शक्ल दिखाई दी. कई बार तो मैं जिस होटल में ठहरता था, वह वहां भी नजर आ जाता था. यही नहीं, उस के द्वारा भेजे जाने वाले पत्रों का सिलसिला भी जारी रहा.

‘‘कई पत्रों में सिर्फ उस दिन की तारीख लिखी होती. मैं चाहता था कि उस आदमी से मिल कर साफसाफ बात कर लूं. लेकिन फिर मैं ने सोचा कि अगर उस ने पत्रों के बारे में इनकार कर दिया तो मैं क्या कर लूंगा. इसी तरह अगर उस ने पीछा करने की बात भी नकार दी तो क्या होगा. शेख मजीद की बात जारी थी.

उस ने कहा, ‘‘कल मैं यहां (पेशावर) के रौयल होटल में ठहरा. मुझे यहां भी अपने कमरे में पहले जैसा एक पत्र मिला, जिस में लिखा था, ‘तुम दुनिया के किसी भी कोने में चले जाओ, मेरी नजरों से छिप नहीं सकते.’ ऐसी स्थिति में मुझे आप के पास आना पड़ा.’’

‘‘क्या तुम्हें अफजाल बेग होटल में दिखाई दिया?’’ सबइंसपेक्टर जाकिर ने शेख मजीद से पूछा.

‘‘अभी तक मैं ने उसे रौयल होटल में नहीं देखा है, लेकिन मैं ने एक वेटर से मालूम किया है कि अफजाल बेग नाम का आदमी वहीं ठहरा है. आप मेहरबानी कर के मुझे उस आदमी से बचाएं.’’ शेख मजीद ने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए निवेदन किया.

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‘‘ठीक है, हम देखते हैं, आप की क्या मदद की जा सकती है.’’ इंसपेक्टर जावेद ने कहा और फोन उठा कर कहीं बात करने लगा.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

चाइल्ड पॉर्नोग्राफी का संजाल

छत्तीसगढ़ राजधानी रायपुर सहित प्रदेश के शहरों में लगातार “चाइल्ड पोर्नोग्राफी” के मामलों मैं आश्चर्यजनक रूप से तेजी देखी जा रही है. पुलिस द्वारा भी लगातार कार्रवाई की जा रही है. छत्तीसगढ़ के रायपुर में चाइल्ड पोर्नोग्राफी का एक और वीडियो अपलोड किया गया . इस पर गोल बाजार थाना, रायपुर पुलिस ने प्राथमिक रपट दर्ज की है. खास बात यह कि इस दफा वीडियो वाईफाई के जरिये अपलोड किया जा रहा है. परिणाम स्वरूप आरोपियों की तलाश करने में पुलिस के पसीने निकल रहे हैं . छत्तीसगढ़ की राजधानी  रायपुर में “चाइल्ड पोर्नोग्राफी” के अब तलक बारह प्रकरण दर्ज हो चुके हैं, जिसमें से दस कथित आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार करके कड़ी कार्रवाई की है.

छत्तीसगढ़ में चाइल्ड पोर्नोग्राफी का संजाल कुछ इस तरह फैला है कि आरोपी  लगातार हाईटेक टेक्नोलॉजी का उपयोग कर वीडियो अपलोड कर रहे है. खास तकनीक की बात यह है कि इसमें कभी वीडियो शेयर कर तो कभी वाईफाई का इस्तेमाल कर वीडियो को सोशल मीडिया पर अपलोड किया जा रहा है. परिणाम स्वरूप अपराधियों को पता लगाने में पुलिस हलाकान परेशान ज्यादा होती है.

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हमारे पुलिस सूत्रों के अनुसार छत्तीसगढ़ में 30 से ज्यादा मामलों में गिरफ्तारी ऐसे मामलों में की गई है. उपरोक्त मामले में बंजारी मार्केट के एक युवक ने इंटरनेट कनेक्शन से अश्लील वीडियो सोशल मीडिया में पोस्ट किया . इसे कई लोगों को फॉरवर्ड भी किया गया. इसमें एक “बालिका” की अश्लील क्लिपिंग है. चाइल्ड पोर्नोग्राफी के मामले में  प्रदेश में कार्रवाई की जा रही है. पुलिस  प्रदेश में 30 से ज्यादा मामलों में गिरफ्तारी भी कर चुकी है.

यहां यह जानना जरूरी होगा कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने छत्तीसगढ़ पुलिस को 80 पोर्न वीडियो की रिपोर्ट भेजी थी,जो सोशल मीडिया में वायरल हुई थी. इन 80 वीडियो को राज्य के नंबर से पोस्ट किया गया था. इसमें 12 मोबाइल नंबर रायपुर के थे, जबकि 40 मोबाइल नंबर दूसरे राज्य के पाए गए उन्हें संबंधित राज्यों की पुलिस को भेज दिया गया है. पुलिस जहां इस मामले में गम भी दिखाई देती है वही उसके सामने चुनौतियां दोहरी हो जाती हैं जब समाज में जागरूकता की कमी के कारण कानून के भय के ना होने के कारण निरंतर चाइल्ड पोर्नोग्राफी जारी दिखाई देती है.

किशोरों की संदिग्ध भूमिका

छत्तीसगढ़ की राजधानी में एक छात्र को अश्लील वीडियो अपलोड करने के आरोप में पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया  है. उसने  एक बच्चे की अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड की थी. जिसे बहुतेरे लोगो द्वारा देखा और शेयर किया गया. बताया जा रहा है की पुलिस ने यह कार्रवाई नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो से मिली जानकारी के आधार पर की है.

पुलिस द्वारा बताए गए तथ्यों के अनुसार, टाटीबंध, राय पुर निवासी युवक रवि कुमार ( बदला हुआ नाम)   खरोरा स्थित एमिटी यूनिवर्सिटी में बीबीए द्वितीय वर्ष का छात्र है.उसने  एक बच्चे का अश्लील वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड किया था.जो काफी वायरल हुआ था.

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एनसीआरबी की टीम ऐसे लोगों पर नजर रखे हुए थी और उनके आईपी अड्रेस ट्रैक कर रही थी. टीम ने प्रदेश में लगभग 40 लोगों को चिन्हित किया है जिन्होंने पोर्नोग्राफी को वायरल किया है. गिरफ्तार युवक के फ़ोन के आईपी एड्रेस से ही उसके लोकेशन का पता लगाकर उसे गिरफ्तार किया गया. अब पुलिस बाकी के मामलों की भी छानबीन कर रही है. इस तरह कुल मिलाकर के युवाओं का इसमें शामिल होना उनकी वर्कर संदिग्ध भूमिका का सामने आना दोनों ही चिंता का सबब है.

सोशल मीडिया का दुरुपयोग जारी आहे

दरअसल, जबसे सोशल मीडिया का आगाज हुआ है चाइल्ड पॉर्नोग्राफी के मामलों में तेजी आ गई है जिसे रोक पाना पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने है.

छत्तीसगढ़ की रायपुर पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म में अश्लील वीडियो  अपलोड करने वाले एक आरोपी को  गिरफ्तार किया है. आरोपी पर यह कार्रवाई एनसीआरबी (NCRB) से मिले मोबाइल नंबर के आधार पर रायपुर की कोतवाली पुलिस ने की है.आरोपी का नाम पुलिस अधिकारियों द्वारा कैलाशपुरी निवासी प्रकाश राज (बदला हुआ नाम) है. आरोपी ने  सोशल मीडियो में वीडियो अपलोड किया था.

यह है पूरा मामला

एनसीआरबी ने सोशल मीडिया में अश्लील वीडियो अपलोड करने वाले मोबाइल नंबर धारको की डिटेल सभी प्रदेशों को भेजी थी. छत्तीसगढ़ पुलिस को 80 मोबाइल नंबरों का पता चला था, जिससे सोशल मीडिया में अश्लील वीडियो अपलोड किया गया था. प्रदेश में इन नंबरों के आधार पर 11वीं कार्रवाई हुई है.  गिरफ्त में आए आरोपी ने बच्चे का अश्लील वीडियो  सोशल मीडिया में अपलोड किया था. चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर सामाजिक कार्यकर्ता इंजीनियर रमाकांत श्रीवास विश्लेषण करते हुए बताते हैं कि किशोर जो युवा होने की दहलीज पर पांव रखने की अवस्था मैं होते हैं उन्हें ऐसे समय में उन्हें शिक्षित एवं कानून की जानकारी देना अनिवार्य है. सरकार को चाहिए कि पाठ्यक्रम में सोशल मीडिया और अन्य महत्वपूर्ण मसले पर विधि सम्मत सामग्री शामिल करें. अन्यथा युवा वर्ग यह गलती करता रहेगा और समाज में चाइल्ड पोर्नोग्राफी जैसा नासूर बना रहेगा.

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क्यों, आखिर क्यों : भाग 3- मां की ममता सिर्फ बच्चे को देखती है

हमारे पड़ोस में ही निर्मल परिवार रहता है जिन की बड़ी बेटी प्रियंका  करिश्मा की खास सहेली है. दोनों एकसाथ 7वीं कक्षा में पढ़ती हैं.

पता चला कि प्रियंका ने मिट्टी का तेल छिड़क कर खुद को जलाने की कोशिश की थी जिस में उस का 80 प्रतिशत बदन आग की लपेट में आ गया था. मेरा दिमाग सुन्न हो गया. मेरी नजरों के सामने प्रियंका का चेहरा उभर आया. इतनी कम उम्र और इतना भयानक कदम…? इतना सारा साहस उस फू ल सी बच्ची ने कहां से पाया होगा? न जाने किस पीड़ादायी अनुभव से वह गुजर रही होगी जिस से छुटकारा पाने के लिए उस ने यह अंतिम कदम उठाया होगा? लगातार रोए जा रही करिश्मा को बड़ी मुश्किल से चुप करा कर उसे स्कूल के गेट तक छोड़ दिया. फिर मैं प्रियंका को देखने अस्पताल के लिए चल पड़ी.

अस्पताल के गेट पर ही मुझे मेरी एक अन्य पड़ोसिन ईराजी मिल गईं. उन से जो हकीकत पता चली उसे जान कर तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए, कल्पना से परे एक हकीकत जिसे सुन कर पत्थर दिल इनसान का भी कलेजा फट जाएगा.

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प्रियंका की मम्मी को एक के बाद एक कर के 4 बेटियां हुईं. जाहिर है, इस के पीछे बेटा पाने की भारतीय मानसिकता काम कर रही होगी. धिक्कार है ऐसी घटिया सोच के साथ जीने वाले लोगों को…मेरे समग्र बदन में नफरत की तेज लहर दौड़ गई.

उन की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं चल रही थी. इस महंगाई के दौर में 4 बेटियां और आने वाली 5वीं संतान की, सही ढंग से परवरिश कर पाना उन के लिए मुश्किल था. ऐसे में राजनजी के किसी मित्र ने उन की चौथी बेटी सोनिया को गोद लेने का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने मान लिया. क्या सोच कर उन्होंने ऐसा निर्णय किया यह तो वही जानें लेकिन प्रियंका इस बात के लिए हरगिज तैयार नहीं थी. उस ने साफ शब्दों में मम्मीपापा से कह दिया था कि यदि उन्होंने सोनिया को किसी और को सौंपने की बात सोची भी  तो वह उन्हें माफ नहीं करेगी.

प्रियंका बेहद समझदार और संवेदनशील बच्ची थी. वह उम्र से कुछ पहले ही पुख्ता हो चुकी थी. घर के उदासीन माहौल ने उसे कुछ अधिक ही संजीदा बना दिया था. बचपन की अल्हड़ता और मासूमियत, जो इस उम्र में आमतौर पर पाई जाती है, उस के वजूद से कब की गायब हो चुकी थी.

अपने को आग की लपटों के हवाले करने से पहले उस ने अपने हृदय की सारी पीड़ा शब्दों के माध्यम से बेजान कागज के पन्ने पर उड़ेल दी थी, अपने खून से लिखी उस चिट्ठी ने सब का दिल दहला दिया :

‘‘श्रद्धेय मम्मीपापा,

अब मुझे माफ कर दीजिए, मैं आप सब को छोड़ कर जा रही हूं. वैसे मैं आप के कंधों से अपनी जिम्मेदारी का कुछ बोझ हलका किए जा रही हूं ताकि आप के कमजोर कंधे सोनिया का बोझ उठाने में सक्षम बन सकें. अपनी तीनों बहनों को मैं अपनी जान से भी ज्यादा चाहती हूं. किसी को भी परिवार से अलग होते हुए मैं नहीं देख पाऊंगी. सोनिया न रहे उस से अच्छा है कि मैं ही न रहूं…अलविदा.’’

आप की लाड़ली बेटी,
प्रियंका.’’

4 दिन तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करती हुई प्रियंका आखिर हार गई और जिंदगी का दामन छोड़ कर वह मौत के आगोश में हमेशा के लिए समा गई पर वह मर कर भी एक मिसाल बन गई. उस की कुरबानी ने हमारे परंपरागत, दकियानूसी समाज पर हमेशा के लिए कलंक का टीका लगा दिया, जिसे अपने खून से भी हम कभी न मिटा पाएंगे.

प्रियंका की मौत के ठीक एक हफ्ते बाद मेरे भतीजे तेजस ने भी बेहोशी की हालत में ही दम तोड़ दिया. तेजस हमारे परिवार का एकमात्र जीवन ज्योति था, जो अपनी उज्ज्वल कीर्ति द्वारा हमारे परिवार को समृद्धि के उच्च शिखर पर पहुंचाता. हमारे समाज के फलक पर रोशन होने वाला सूर्य अचानक ही अस्त हो गया फिर कभी उदित न होने के लिए.

दिनरात मेरी नजर के सामने उन दोनों के हंसते हुए मासूम चेहरे छाए रहते. हर पल अपनेआप से मैं एक ही सवाल करती, क्यों? आखिर क्यों ऐसा होता है जिसे हम चाह कर भी स्वीकार नहीं कर पाते? उन की मौत क्या हमारे समाज के लिए संशोधन का विषय नहीं?

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दादीमां की पीढ़ी से ले कर प्रियंका के बीच कितने सालों का अंतराल है? दादीमां 85 वर्ष की हो चली हैं. तेजस सिर्फ 20 वसंत ही देख पाया और प्रियंका सिर्फ 12. इस लंबे अंतराल में क्या परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं थी?

दादीमां औरत थीं फिर भी मानती थीं कि संसार पुरुष से ही चलता है. हर नीतिनियम, रीतिरिवाज सिर्फ पुरुष के दम से है फिर मालती का पति तो पुरुष है. उस का यह मानना लाजमी ही था कि जो पुरुष बेटा न पैदा कर पाए वह नामर्द होता है. प्रियंका के मातापिता भी तो इसी मानसिकता का शिकार हैं कि वंश की शान और नाम आगे बढ़ाने के लिए बेटा जरूरी है. क्या सोनिया की जगह अगर उन्होंने बेटा पैदा किया होता तो उसे किसी और की गोद में डालने की बात सोच सकते थे? या उस के बाद और बच्चा पैदा करने की जरूरत को स्वीकार कर पाते? नहीं, कभी नहीं….

भला हो मालती का जिस ने मेरी आंखें खोल दीं वरना जानेअनजाने मैं भी इन तमाम लोगों की तरह ही सोचती रह जाती. अपनी कुंठित मान्यताओं के भंवर से बाहर निकालने वाली मालती का मैं जितना शुक्रिया अदा करूं कम ही है.

तेजस की अकाल मौत ने दादी मां को यह सोचने पर मजबूर किया कि जिस कुलदीपक की चाह में उन्होंने अतीत में एक मासूम बच्ची के साथ अन्याय किया था उस कुलदीपक की जीवन ज्योति को अकाल ही बुझा कर नियति ने उन की करनी की सजा दी थी.

प्रियंका भी पुकारपुकार कर पूछ रही है, हर नारी और हर पुरुष यही सोचे और चाहे कि उन के घर बेटा ही पैदा हो तो भविष्य में कहां से लाएंगे हम वह कोख जो बेटे को पैदा करती है?

क्यों, आखिर क्यों : भाग 2- मां की ममता सिर्फ बच्चे को देखती है

डोरबेल बजने पर जब मैं ने दरवाजा खोला तो दरवाजे के बाहर मालती को खड़ा पाया. उसे सामने देख कर मेरा सारा गुस्सा हवा हो गया क्योंकि उस की सूजी हुई आंखें और चेहरे पर उंगलियों के निशान देख कर मैं समझ गई कि वह फिर अपने पति के जुल्म का शिकार हुई होगी.

‘‘क्या हुआ, मालती? तुम्हारे चेहरे पर हवाइयां क्यों उड़ रही हैं?’’ लगातार रो रही मालती उत्तर देने की स्थिति में कहां थी. मैं ने भी उसे रोने दिया.

मालती ने रोना बंद कर बताना शुरू किया, ‘‘भाभी, मैं तुम से माफी मांगती हूं. बंसी ने मुझे इतना पीटा कि मैं 3 दिन तक बिस्तर से उठ नहीं पाई.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’ मुझे रहरह कर उस के पति पर गुस्सा आ रहा था. मन कर रहा था कि उसे पुलिस के हवाले कर दूं. पर अभी तो अस्पताल जाना ज्यादा जरूरी है.

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‘‘मालती, मेरे खयाल से तुम काफी थकी हुई लग रही हो. थोड़ी देर आराम कर लो. मुझे अभी अस्पताल जाना है,’’ मैं ने उसे संक्षेप में सब बता दिया और बोली, ‘‘मेरे लौटने तक तुम्हें यहीं रुकना पड़ेगा. हम बाद में बात करेंगे…करिश्मा स्कूल से आए तो उस के लिए नाश्ता बना देना.’’

मैं अस्पताल पहुंची. मुझे देखते ही अंजलि मेरे कंधे से लग कर बेतहाशा रोने लगी. मेरी भी आंखें छलछला आईं. मेडिकल कालिज का मेधावी छात्र, लेकिन पिछले 6 महीनों से दूरदर्शन के एक मशहूर धारावाहिक में प्रमुख किरदार निभा रहा था. अभी तो उस के कैरियर की शुरुआत हुई थी, लोग उसे जानने, पहचानने और सराहने लगे थे कि शूटिंग से लौटते वक्त लोकल टे्रन से गिर कर ब्रेन हैमरेज का शिकार हो गया. मां, पिताजी और मैं भाभी को संभालतेसंभालते खुद भी हिम्मत हारने लगे थे. सभी एकदूसरे को ढाढ़स बंधाने का असफल प्रयास कर रहे थे.

काफी रात हो चुकी थी. बच्चोें के कारण मुझे बेमन से घर जाना पड़ा. मालती की गोद में ऋचा तथा होम वर्क के दिए गए गणित के समीकरण को सुलझाने का प्रयास करती हुई करिश्मा को देख मेरी आंखें भर आईं.

मैं निढाल सी सोफे पर लेट गई. मेरे दिल और दिमाग पर तेजस की घटना की गहरी छाप पड़ी थी. थोड़े समय बाद जब कुछ सामान्य हुई तो यह सोच कर कि आज जितने हादसों से साक्षात्कार हो जाए अच्छा होगा, कम से कम, कल का सूरज आशाओं की कुछ किरणें हमारे उदास आंचल में डालने को आ जाए. यही सोच कर मैं ने मालती से उस की दर्दनाक व्यथा सुनी.

‘‘भाभी, मैं चौथी बार पेट से हूं. बंसी मेरे पीछे पड़ गया है कि मैं जांच करवा लूं और लड़की हो तो गर्भपात करा दूं. मैं इस के लिए तैयार नहीं हूं, इस बात पर वह मुझे मारतापीटता और धमकाता है कि अगर इस बार लड़की हुई तो मुझे घर से निकाल देगा, वह जबरदस्ती मुझे सरकारी अस्पताल भी ले गया था लेकिन डाक्टर ने उसे खूब डांटा, धमकाया कि औरत पर जुल्म करेगा, जांच के लिए जबरदस्ती करेगा तो पुलिस में सौंप दूंगी क्योंकि गर्भपरीक्षण कानूनी अपराध होता है. मैं ने तो उसे साफ बोल दिया कि वह मुझे मार भी डालेगा तो भी मैं गर्भपात नहीं कराऊंगी.’’

‘‘तो क्या तुम यों ही मार खाती रहोगी? इस तरह तो तुम मर जाओगी.’’

‘‘नहीं, भाभी, मैं ने उस को बोल दिया कि बेटा हुआ तो तुम्हारा नसीब वरना मैं अपनी चारों बच्चियों को ले कर कहीं चली जाऊंगी. हाथपैर सलामत रहे तो काम कहीं भी मिलेगा, वैसे भी बंसी तो सिर्फ नाम का पति है, वह कहां बाप होने का धर्म निभाता है? उस को भी तो मैं ही पालती हूं. मैं मां हूं और मां की नजर सिर्फ अपने बच्चे को देखती है, बेटी, बेटे का भेद नहीं. फिर लड़का या लड़की पैदा करना क्या मेरे हाथ में है?’’

कितनी कड़वी मगर सच्ची बात कह दी इस अनपढ़ औरत ने. एक मां अपने बच्चे के लिए बड़ी से बड़ी कुरबानी दे सकती है पर शायद यह पुरुष प्रधान भारतीय समाज की मानसिकता है कि वंश को आगे बढ़ाने के लिए और अर्थी को कांधा देने के लिए बेटे की जरूरत होती है…अत: अगर परिवार में बेटा न हो तो परिवार को अधूरा माना जाता है.

मेरी दादी मां क्यों औरत की कदर करना नहीं जानतीं? वह क्यों भूल गईं कि वह खुद भी एक औरत ही हैं? दादी की याद आते ही मेरा हृदय कड़वाहट से भर उठा. लेकिन अगले ही पल मेरे मन ने मुझे टोका कि तू खुद भी संकुचित मानसिकता में दादी मां से कम है क्या? अगर मालती चौथी बार मां बनने वाली है तो तेरे उदर में भी तो तीसरा बच्चा पल रहा है. तीसरी बार गर्भधारण के पीछे तेरा कौन सा गणित काम कर रहा है…? 2 बेटियों की मां बन कर तू खुश नहीं? क्या जानेअनजाने तेरे मन में भी बेटा पाने की लालसा नहीं पनप रही?

मैं सिर से पैर तक कांप उठी. यह मैं क्या करने जा रही हूं? दादी को कोसने से मेरा यह अपराधबोध क्या कम हो जाएगा? नहीं, कदापि नहीं. उसी वक्त मैं ने फैसला ले लिया कि तीसरे बच्चे के बाद मैं आपरेशन करवा लूंगी. यह फैसला करते ही मेरे दिमाग की तंग नसें धीरेधीरे सामान्य होती चली गईं.

चैन से सो रही मालती के चेहरे पर निर्दोष मुसकान खेल रही थी. जल्द ही मैं भी नींद के आगोश में समा गई. सुबह जब आंख खुली तब मैं अपने को हलका महसूस कर रही थी.

मालती पहले ही उठ कर घर के कामों को पूरा कर रही थी. उस ने करिश्मा को नाश्ता बना कर दे दिया था और वह स्कूल जाने को तैयार थी.

मैं ने करिश्मा के कपोल चूमते हुए उसे विश किया तो लगा कि वह कुछ बुझीबुझी सी थी.

‘‘क्यों बेटी, क्या आप की तबीयत ठीक नहीं?’’

‘‘नहीं मम्मी, ऐसी कोई बात नहीं.’’

‘‘मम्मी आप के चेहरे की हर रेखा पढ़ सकती है, बेटा, जरूर कोई बात है… मुझ से नहीं कहोगी?’’ सोफे पर बैठ कर मैं ने उसे अपनी गोद में खींच लिया.

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ममता भरा स्पर्श पा कर उस की आंखें भर आईं. मैं ने सोचा शायद पढ़ाई में कोई मुश्किल सवाल रहा होगा, जिस का हल वह नहीं ढूंढ़ पा रही होगी.

‘‘बेटा, क्या मैं आप की कोई मदद कर सकती हूं?’’

‘‘नो, थैंक्स मम्मा,’’ उस के शब्द गले में ही अटक गए.

‘‘चलो, मैं प्रियंका को फोन कर देती हूं. वह आप की समस्या का कोई हल ढूंढ़ पाएगी, क्या उस से झगड़ा हुआ है?’’ मैं फोन की ओर बढ़ी, ‘‘उसे मैं कह देती हूं कि वह जल्दी आ जाए ताकि मैं आप दोनों को स्कूल में ड्राप कर दूं.’’

‘‘मम्मा,’’ वह चीख उठी, ‘‘प्रियंका अभी नहीं आ सकेगी.’’

‘‘क्यों…?’’ मुझे धक्का लगा.

‘‘सौरी, मम्मा,’’ वह धीरे से बोली, ‘‘प्रियंका लाइफ लाइन अस्पताल में है.’’

आश्चर्य का इतना तेज झटका मैं ने महसूस किया कि मैं संभल नहीं पाई, ‘‘क्या हुआ है उसे?’’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

क्यों, आखिर क्यों : भाग 1- मां की ममता सिर्फ बच्चे को देखती है

आज लगातार 7वें दिन भी जब मालती काम पर नहीं आई तो मेरा गुस्सा सातवां आसमान छू गया, खुद से बड़बड़ाती हुई बोली, ‘क्या समझती है वह अपनेआप को? उसे नौकरानी नहीं, घर की सदस्य समझा है. शायद इसीलिए वह मुझे नजरअंदाज कर रही है…आने दो उसे…इस बार मैं फैसला कर के ही रहूंगी…यदि वह काम करना चाहे तो सही ढंग से करे वरना…’ अधिक गुस्से के चलते मैं सही ढंग से सोच भी नहीं पा रही थी.

मालती बेहद विश्वासपात्र औरत है. उस के भरोसे घर छोड़ कर आंख मूंद कर मैं कहीं भी आजा सकती हूं. मेरी बच्चियों का अपनी औलाद की तरह ही वह खयाल रखती है. फिर यह सोच कर मेरा हृदय उस के प्रति थोड़ा पसीजा कि कोई न कोई उस की मजबूरी जरूर रही होगी वरना इस से पहले उस ने बिना सूचित किए कभी लंबी छुट्टी नहीं ली.

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मेरे मन ने मुझे उलाहना दिया, ‘राधिका, ज्यादा उदार मत बन. तू भी तो नौकरी करती है. घर और दफ्तर के कार्यों के बीच सामंजस्य बनाए रखने की हरसंभव कोशिश करती है. कई बार मजबूरियां तेरे भी पांव में बेडि़यां डाल कर तेरे कर्तव्य की राह को रोकती हैं…पर तू तो अपनी मजबूरियों की दुहाई दे कर दफ्तर के कार्य की अवहेलना कभी नहीं करती?’

दफ्तर से याद आया कि मालती के कारण मेरी भी 7 दिन की छुट्टी हो गई है. बौस क्या सोचेंगे? पहले 2 दिन, फिर 4 और अब 7 दिन के अवकाश की अरजी भेज कर क्या मैं अपनी निर्णय न ले पाने की कमजोरी जाहिर नहीं कर रही हूं?

तभी धड़ाम की आवाज के साथ ऋचा की चीख सुन कर मैं चौंक गई. मैं बेडरूम की ओर भागी. डेढ़ साल की ऋचा बिस्तर से औंधेमुंह जमीन पर गिर पड़ी थी. मैं ने जल्दीजल्दी उसे बांहों में उठाया और डे्रसिंग टेबल की ओर लपकी. जमीन से टकरा कर ऋचा के माथे की कोमल त्वचा पर गुमड़ उभर आया था. दर्द से रो रही ऋचा के घाव पर मरहम लगाया और उसे चुप कराने के लिए अपनी छाती से लगा लिया. मां की ममता के रसपान से सराबोर हो कर धीरेधीरे वह नींद के आगोश में समा गई.

फिर मुझे मालती की याद आ गई जिस की सीख की वजह से ही तो मैं अपनी दोनों बेटियों को स्तनपान का अधिकार दे पाई थी वरना मैं ने तो अपना फिगर बनाए रखने की दीवानगी में बच्चियों को अपनी छाती से लगाया ही न होता…सोच कर मेरी आंखों से 2 बूंदें कब फिसल पड़ीं, मैं जान न पाई.

ऋचा को बिस्तर पर लिटा कर मैं अपने काम में उलझ गई. हाथों के बीच तालमेल बनाती हुई मेरी विचारधारा भी तेजी से आगे बढ़ने लगी.

मां से ही जाना था कि जब मेरा जन्म हुआ था तब मां के सिर पर कहर टूट पड़ा था. रंग से तनिक सांवली थीं. अत: दादीजी को जब पता चला कि बेटी पैदा हुई है तो यह कह कर देखने नहीं गईं कि लड़की भी अपनी मां जैसी काली होगी, उसे क्या देखना? चाचीजी ने जा कर दादी को बताया, ‘मांजी, बच्ची एकदम गोरीचिट्टी, बहुत ही सुंदर है, बिलकुल आप पर गई है…सच…आप उसे देखेंगी तो अपनेआप को भूल जाएंगी.’

‘फिर भी वह है तो लड़की की जात…घर आएगी तब देख लूंगी,’ दादी ने घोषणा की थी.

मेरे भैया उम्र में मुझ से 3 साल बड़े थे…सांवले थे तो क्या? आगे चल कर वंश का नाम बढ़ाने वाले थे…अत: उन का सांवला होना क्षम्य था.

ज्योंज्यों मैं बड़ी होती गई, त्योंत्यों मेरी और भैया की परवरिश में भेदभाव किया जाने लगा. उन के लिए दूध, फल, मेवा, मिठाई सबकुछ और मेरे लिए सिर्फ दालचावल. यह दादी की सख्त हिदायत थी. वह मानती थीं कि लड़कियां बड़ी सख्त जान होती हैं, ऐसे ही बड़ी हो जाती हैं. लड़के नाजुक होते हैं, उन की परवरिश में कोई कमी नहीं होनी चाहिए. आखिर वही हमारे परिवार की शान में चार चांद लगाते हैं. बेटियां तो पराया धन होती हैं… कितना भी खिलाओपिलाओ, पढ़ाओ- लिखाओ…दूसरे घर की शोभा और वंश को आगे बढ़ाती हैं.

मम्मी और चाचीजी दोनों ही गांव की उच्चतर माध्यमिक पाठशाला में शिक्षिका थीं. वे सुबह 11 बजे जातीं और शाम साढ़े 6 बजे लौटतीं. मेरी देखभाल के लिए कल्याणी को नियुक्त किया गया था, लेकिन दादी उस से घर का काम करवातीं. बहुत छोटी थी तब भी मुझे एक कोने में पड़ा रहने दिया जाता. कई बार कपड़े गीले होते…पर कल्याणी को काम से इतनी फुर्सत ही नहीं मिलती कि वह मेरे गीले कपड़े बदल दे. एक बार इसी वजह से मैं गंभीर रूप से बीमार भी हो गई थी. बुखार का दिमाग पर असर हो गया था. मौत के मुंह से मुश्किल से बहार आई थी.

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इस हादसे की बदौलत ही मम्मी को पता चला था कि दादी के राज में मेरे साथ क्या अन्याय किया जा रहा था. तब मां दादी से नजरें बचा कर एक कोने में छिप कर खूब रोई थीं…पापा 1 महीने के दौरे पर से जब लौटे तब मां ने उन्हें सबकुछ बता दिया. अपनी बच्ची के प्रति मां द्वारा किए गए अन्याय ने उन्हें बहुत दुख पहुंचाया था किंतु मम्मीपापा के संस्कारों ने उन्हें दादी के खिलाफ कुछ भी करने की इजाजत नहीं दी.

कुछ समय बाद पता चला कि मां ने सूरत के केंद्रीय विद्यालय में अर्जी दी थी. साक्षात्कार के बाद उन का चयन हो जाने पर पापा ने भी अपना तबादला सूरत करवा लिया. मैं मम्मी के साथ उन के स्कूल जाने लगी और भैया अन्य स्कूल में.

दादी मां द्वारा खींची गई बेटेबेटी की भेद रेखा ने मुझे इतना विद्रोही बना दिया था कि मैं अपने को लड़का ही समझने लगी थी. शहर में आ कर मैं ने मर्दाना पहनावा अपना लिया. मेरी मित्रता भी लड़कों से अधिक रही.

मम्मी कहतीं, ‘बेटी, तुम लड़की बन कर इस संसार में पैदा हुई हो और चाह कर भी इस हकीकत को झुठला नहीं सकतीं. मेरी बच्ची, इस भ्रम से बाहर आओ और दुनिया को एक औरत की नजर से देखो. तुम्हें पता चल जाएगा कि दुनिया कितनी सुंदर है. सच, दादी की उस एक गलती की सजा तुम अपनेआप को न दो, अभी तो ठीक है, लेकिन शादी के बाद तुम्हारे यही रंगढंग रहे तो मुझे डर है कि पुन: तुम्हें कहीं मायका न अपनाना पड़े.’

मम्मी के लाख समझाने के बावजूद मैं चाह कर भी अपनेआप को बदल नहीं पाती. सौभाग्य से मुझे वेदांत मिले जिन्हें सिर्फ मुझ से प्यार है, मेरी जिद से उन्हें कोई सरोकार नहीं. उन्होंने कभी मेरे लाइफ स्टाइल पर एतराज जाहिर नहीं किया.

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टेलीफोन की घंटी कानों में पड़ते ही मैं फिर वर्तमान में आ पहुंची. दूसरी तरफ अंजलि भाभी थीं. उन्होंने बताया कि तेजस लोकल टे्रन से गिर गया था. इलाज के लिए उसे अस्पताल में दाखिल करवाया गया है. मैं ने उसी वक्त वेदांत को एवं आलोक भैया को फोन द्वारा सूचित तो कर दिया लेकिन मैं अजीब उलझन में पड़ गई. न तो मैं ऋचा को अकेली छोड़ कर जा सकती थी और न ही उसे अस्पताल ले जाना मेरे लिए ठीक रहता. अब क्या करूं…एक बार फिर मुझे मालती की याद आ गई…उफ, इस औरत का मैं क्या करूं?

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

खून में डूबा सोच का सवाल

क्यों, आखिर क्यों : मां की ममता सिर्फ बच्चे को देखती है

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