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जिलाधीश – पुलिस अधीक्षक के नाम फर्जी “फेसबुक आइडी” सावधान!

छत्तीसगढ़ में आजकल आईएएस और आईपीएस अफसरों की फर्जी “फेसबुक” आईडी बनाकर ठगी की जा रही है और इस जाल में आसपास के परिचित फंसकर लूट जा रहे हैं. ठग कितने शातिर होते हैं और दूर की सोचते हैं यह आज आपको यह रिपोर्ट पढ़कर जानकारी मिलेगी की जिलाधीश और पुलिस अधीक्षक जैसे वरिष्ठ एवं प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारियों के नाम पर किस तरह फर्जी फेसबुक आईडी बन जाती है और उनके चिर परिचित समर्थकों को ठग किस तरह ठग रहे हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस जाल में फंसने वाले लोगों को न्याय नहीं मिल पा रहा. वहीं प्रशासनिक अधिकारी भी ठगों को पकड़वा पाने में अभी तक असफल ही सिद्ध हुए हैं. छत्तीसगढ़ के रायपुर, बिलासपुर कोरबा, रायगढ़ व अन्य नगरों के शीर्ष अधिकारी यह बात जगजाहिर कर चुके हैं कि उनके फोटो व आईडी का फर्जी इस्तेमाल किया जा रहा है सावधान..!

रायगढ़ जिलाधीश भीम सिंह ने हाल ही में स्वयं फेसबुक में अपने चिर परिचित सभी को आगाह किया कि उनके नाम से एक फर्जी आईडी अस्तित्व में है! और लोगों को फोन करके 20 20 हजार रुपए मांगे गए हैं उन्होंने लिखा कि सभी सावधान रहें और ठगों के जाल में न फंसे.

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मामले में रायगढ़ के नायब तहसीलदार ने कोतवाली पुलिस से लिखित शिकायत की है. पुलिस ने “अज्ञात  ठग” के खिलाफ 419 व आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. कलेक्टर भीम सिंह ने भी फेसबुक में पोस्ट कर फर्जी आईडी से पैसे मांगने की जानकारी देते हुए सावधान रहने को कहा मगर जानकार बताते हैं कि कब ऊपर हाथ डालना अथवा उन्हें पकड़ पाना पुलिस के लिए बेहद टेढ़ी खीर है.

इस संदर्भ में पुलिस अधीक्षक संतोष कुमार सिंह का कहना है कि इसमें यूपी, बिहार  गैंग के सक्रिय होने की आशंका है. सारा माजरा अंतर प्रांतीय ठगों का है.

पुलिस अधीक्षक बन गया शिकार!

कोरबा जिला में पदस्थ पुलिस अधीक्षक  आईपीएस अभिषेक मीणा की फेसबुक आईडी से हूबहू फर्जी आईडी बनाकर उनकी फ्रेंड लिस्ट में जुड़े लोगों से जरूरत बताकर रुपए की मांग की जाने लगी. ठगों की हिमाकत देखिए!इसके लिए 10-20 हजार रुपए एकाउंट में ट्रांजेक्शन करवाया जा रहा  था. फ्रेंड लिस्ट में शामिल लोगों को जब पुलिस अधीक्षक मीणा द्वारा इस तरह फेसबुक के जरिए पैसे मांगने का पोस्ट देखकर  कई लोगों ने इसकी सत्यता जानने के लिए संपर्क किया. तब  मीणा को इसकी जानकारी हुई और उन्होंने फेसबुक पर फर्जी आईडी की स्क्रीन शॉट के साथ इस संबंध में अपनी ओर से सार्वजनिक सूचना दी.उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा -” किसी ने प्रोफाइल पिक लगातार मेरे नाम पर फेक आईडी बनाई है धोखाधड़ी से सावधान रहना हम कार्रवाई करेंगे.”

दरअसल, छत्तीसगढ़ में ठगों की हिमाकत इस हद तक पहुंच गई है कि गणमान्य लोगों को छोड़कर सीधे आईएएस-आईपीएस की फर्जी आईडी से धोखाधड़ी की जा रही है. फेसबुक की प्रोफाइल से पिक्चर व नाम का इस्तेमाल करके फर्जी आईडी बनाने और ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले  सामने आ रहे हैं. शुरुआत में ठगों ने आमजन व व्यापारी वर्ग के फर्जी आईडी बनाकर धोखाधड़ी करते थे लेकिन अब आईएएस-आईपीएस की फर्जी आईडी बना रहे हैं.प्रदेश में इससे पहले कई आईएएस-आईपीएस के फेसबुक पर फर्जी आईडी बनने का मामला सामने आ चुका है.  कोरबा जिले में इससे पहले पाली जनपद सीईओ की फेसबुक पर फर्जी आईडी बनाने का मामला भी सामने आ चुका है.

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हमारे संवाददाता ने जब अभिषेक मीणा से बात की तो उन्होंने कहा जांच कर आरोपियों को पकड़ा जाएगा  पुलिस अधीक्षक अभिषेक मीणा ने बताया उन्हें काफी लोगों ने मैसेज करके बताया कि आपके नाम से फेसबुक आईडी पर पैसा मांगा जा रहा है, सच है या फेक यह पूछा. तब मुझे इसका पता चला. उन्होंने कहा इसकी जांच की जाएगी. आरोपियों को पकड़ा जाएगा. इस तरह के ऑनलाइन ठगी से बचने के लिए लोगों को सतर्क रहना होगा.

कमिश्नर भी बने, ठगों के शिकार!

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर संभाग के संभाग आयुक्त डॉ संजय अलंग विगत समय जब जिलाधीश बिलासपुर हुआ करते थे उनके नाम पर भी ठगों ने एक फर्जी आईडी बना ली थी. जानकार सूत्रों के अनुसार कलेक्टर रहे डॉ. संजय अलंग का फर्जी  फेसबुक अकाउंट फेसबुक अकाउंट बनाकर लोगों से हजारों रूपए उगाही करने का मामला सामने आया. जालसाज ने कलेक्टर के नाम का फर्जी फेसबुक अकाउंट  बना बिलासपुर के दो युवकों को पहले तो अपना दोस्त बना लिया.

फिर उनसे रकम वसूल करने का प्रयास करने लगे. अज्ञात आरोपी ने अपना बैंक अकाउंट नंबर भी लोगों को दिया .शिकायत पहुंचने पर संजय अलग  ने साइबर सेल के माध्यम से आईडी ब्लॉक करने व जांच प्रारंभ करवाई. मगर बताया जा रहा है कि अभी तक ठग पुलिस के कानून के जद से बाहर है.

इस संदर्भ में एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि दरअसल ठगों का मनोविज्ञान यह है कि बड़े नेता और आईएएस आईपीएस अधिकारियों के नाम पर फर्जी फेसबुक आईडी बनाकर इसलिए ठगी की जाती है की बहुत सारे लोग इन नामों और पदों को देखकर पैसे  दे देते हैं. जबकि होना यह चाहिए कि उन्हें यह समझ होनी चाहिए इतने बड़े अधिकारी भला दस बीस हजार, रूपए किसी से क्यों मांगेंगे? लोग बड़े अधिकारियों से संपर्क बनाने मित्रता साधने के नाम पर फेसबुक की मित्रता आसानी से स्वीकार कर लेते हैं फर्जी आईडी  बनाने वाले  लोगों से रकम की भी मांग कर ठगी का जाल फैलाया गया. है शहर के दो युवकों से आरोपी ठग ने यह कहते हुए 20-20 हजार रुपए की मांग की है कि उन्हें यह पैसा दूसरे दिन वापस कर दिया जाएगा. मगर उनकी सतर्कता काम आई और वे बच गए आपसे भी यही आग्रह है कि किसी भी तरह के पैसे की मांग पर आप 10 बार सोचे.

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लूट : अमानत में खयानत

रूपए पैसे ऐसी आकर्षक चीज है जिस के खातिर इंसान की नियत डोल जाती है. जाने कितने किस्से और हकीकत हमारी आंखों के आगे गुजरते जाते हैं. मगर हम उन्हें उन्हें भूल बिसार कर अपने दैनंदिन कार्यों में लग जाते हैं… अक्सर धोखा खा जाते हैं.क्योंकि  रूपए की सार संभाल के संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि इस मामले में कभी भी किसी  दूसरे पर पूरी तरह विश्वास नहीं किया जा सकता. थोड़ी भी चूक हुई या फिर नियत बद हुई की रूपया गायब!

आइए.. आज आपको ऐसे ही कुछ घटनाओं से रूबरू कराएं. जिन्हें पढ़ समझ कर आप शायद जीवन में आगे कभी धोखा ना खाएं.

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पहली घटना-

राजधानी रायपुर में एक बड़े शोरूम के विश्वस्त कर्मचारी सदैव बैंक जाकर पैसे जमा करता था. एक दिन  मिलीभगत कर लूट की घटना अंजाम दी गई और पुलिस विवेचना में अंतत: शख्स को जेल जाना पड़ा.

दूसरी घटना-

न्यायधानी बिलासपुर में एक वकील का कंप्यूटर ऑपरेटर जो कि पैसों की भी देख रेख, लेनदेन किया करता था. एक दिन लूट की बात कह कर लाखों रुपए के  लूट  जाने की कहानी गढ़ी और अंततः जेल गया.

तीसरी घटना-

कोरबा जिला के कटघोरा में जनपद पंचायत के एक बाबू ने  अधिकारी का लाखों रुपया ठगने के बहाने लूट की घटना की रिपोर्ट लिखाई. विवेचना के पश्चात अंततः वही दोषी सिद्ध हुआ और जेल गया.

15 घंटे में हो गया खुलासा

छत्तीसगढ़ के कोरबा में प्राइवेट कोल कंपनी में हुई लूट को पुलिस ने 15 घंटे में खुलासा कर  पुलिस ने बताया यह एक मनगढ़ंत घटना थी. 4 अक्टूबर को देर रात पुलिस ने कंपनी के ही असिस्टेंट कैशियर को गिरफ्तार कर उसके घर से 10.5 लाख रुपए बरामद कर लिए. पुलिस इस मामले में अन्य दो आरोपियों की तलाश कर रही है. वस्तुत: असिस्टेंट कैशियर ने ही लूट की झूठी साजिश रची थी.

सैनिक कोल कंपनी द्वारा कर्मचारियों को वेतन बांटने के लिए सदेव के भांति रुपए रखे थे जिस पर नियत खराब हो गई थी.

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दरअसल,  कोरबा के दीपका के एसईसीएल गेवरा परियोजना क्षेत्र स्थित सैनिक माइनिंग कोल ट्रांसपोर्ट कंपनी के दफ्तर में कर्मचारियों को वेतन बांटने के लिए रुपए रखे थे. 3 अक्टूबर 2020 शनिवार रात नकाबपोश बदमाश ऑफिस में चोरी करने घुसे. गार्ड ने देख लिया तो उसे और ड्राइवर को मारपीट कर बंधक बनाया.इसके बाद कथित रूप से 31 लाख रुपए की लूटकर फरार हो गए.

पुलिस को पहले से ही कर्मचारियों पर संदेह हो गया था.

ऐसे में रुपयों की जानकारी रखने वाले कर्मचारियों से पूछताछ शुरू की गई. इसमें असिस्टेंट कैशियर जे एल प्रसाद भी शामिल था. संदेह होने पर पुलिस ने सख्ती से उससे पूछताछ की तो वैश्य समाज उसने मनगढ़ंत लूट की सच्चाई कबूल कर ली.आरोपी कैशियर ने बताया कि उसने पहले ही 10.5 लाख रुपए गायब कर लिए थे.

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परिचितों से लूट कराने  के लिए   उन्हें रकम 31 लाख बताई थी.

पूछताछ में आरोपी असिस्टेंट कैशियर ने बताया कि उसने अपने परिचितों को लूट की साजिश में शामिल किया. इसके लिए कंपनी में रखी रकम 31 लाख रुपए ही बताई. आरोपी जेएल प्रसाद कंपनी में बीस सालों से काम कर रहा था.

कुछ सच भी, कुछ मिथ्या भी!

लूट की ऐसी मनगढ़ंत घटनाओं में यह भी देखा गया है कि लोग बीस पच्चीस वर्षों से सेवा अनवरत रूप से देते आ रहे थे. मगर परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि उन्होंने अमानत में खयानत कर डाली और अपने वर्षों की साख की पूंजी को दांव पर लगा दिया. वहीं यह भी देखा गया है कि अक्सर कुछ परिस्थितियां ऐसी बन जाती है जिनमें कर्तव्यनिष्ठ ईमानदार कर्मचारियों को झूठे मामलों में फंसाया भी जाता है. मगर अंततः कोर्ट कचहरी और पुलिस विवेचना में सच्चाई सामने आ जाती है.

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उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.के. शुक्ला बताते हैं कि ऐसे मामलों में अक्सर आरोपी पुलिस विवेचना के समय ही पकड़ लिया जाता है. क्योंकि वह कोई पेशेवर  अपराधी नहीं होता, पैसों की लालच में अथवा आवश्यकता के कारण वह यह भूल करता है.और अपनी साख तो गंवाता ही है जेल जाकर अपना जीवन भी बर्बाद कर लेता है.

पुलिस अधिकारी शशि भूषण सिंह ने बताया कि दरअसल, ऐसे मामलों में देखा गया है कि कर्मचारी के सामने जब रूपए पैसे की किल्लत आती है तो वह जहां काम करता है उस संस्थान के रूपयों पर उसकी नियत खराब हो जाती है.

लुटेरी दुल्हनों से सावधान

प्रायश्चित : सुधीर के व्यवहार से हैरान थी सुधि

लुटेरी दुल्हनों से सावधान : भाग 2

सब से बड़ी चूक शिवनारायण शर्मा जैसे पकी उम्र के सयाने लोग यह करते हैं कि कौशल प्रसाद शर्मा जैसे बिचौलियों पर आंख बंद कर भरोसा कर लेते हैं, क्योंकि वह हर इलाके के 1-2 नामी लोगों को जानता-पहचानता है और ऐसे बात करता है मानो हजारों शादियां करा चुका हो.

दूसरी गलती लड़की वालों के बारे में पूरी और पुख्ता जानकारियां हासिल न करने की मानी जाएगी. चूंकि मकान है,

इसलिए वे लोग भी हमारे जैसे होंगे जैसी सोच की कीमत उस वक्त चुकानी पड़ती है, जब लड़की वाले अच्छाखासा मालमत्ता समेट कर रफूचक्कर हो चुके होते हैं.

यह बात सच है कि लड़की वालों से बतौर सुबूत उन के मकान की रजिस्ट्री तो नहीं मांगी जा सकती, लेकिन कभी चुपचाप आ कर पड़ोस में पूछताछ की होती तो यह तो पता चल ही जाता कि ये लोग नएनए आए हैं और जिस मकान को अपना बता रहे हैं, वह किराए का है तो शक बढ़ता है.

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एक और गलती लाखों रुपए के लेनदेन की ऐसे मामलों में अकसर होती है. लड़की वालों की लच्छेदार बातों में फंस कर लड़के वाले गहने और पैसे लड़की वालों को दे देते हैं, जो उन का असल मकसद भी होता है. इस के पूरे होने के बाद वे मिलेेंगे तो यह सोचना ही बेमानी है.

ये भी कम नहीं

हर समाज और जाति की एक बड़ी परेशानी इन दिनों मनपसंद लड़की का न मिल पाना है, क्योंकि रिश्तेदारियों में अब दूरियां बढ़ रही हैं और बिचौलियों ने शादीब्याह तय कराने को एक बड़ा धंधा बना लिया है, जो हर्ज की एकलौती बात इस लिहाज से है कि धंधे में कोई किसी की गारंटी नहीं लेता. हर किसी को अपने हिस्से की रकम और कमीशन से मतलब रहता है.

कौशल प्रसाद शर्मा जैसे लोग तो अकेले ही इस धंधे को करते हैं, इसलिए 2-4 को ठग पाते हैं, लेकिन इन दिनों शादी कराने वालों की बाढ़ सी आई हुई है. जब से मोबाइल फोन लोगों के हाथ में आया है, तब से ठगी का यह धंधा औनलाइन भी फलनेफूलने लगा है. शादी कराने वाली कई एजेंसियां, मैरिज ब्यूरो और मैट्रीमोनियल साइटें अरबों रुपए का कारोबार कर रही हैं, जबकि खुद इन के भरोसेमंद होने की कोई गारंटी नहीं होती.

13 नवंबर, 2019 को ही मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में साइबर पुलिस ने एक ऐसे गिरोह का परदाफाश किया था, जो कई राज्यों में कुंआरे नौजवानों को मनपसंद शादी का लालच दे कर उन्हें चूना लगा रहा था.

जबलपुर के ही संजय सिंह नाम के नौजवान की रिपोर्ट पर जब पुलिस ने इस गिरोह के सरगना बिहार के मनोहरलाल यादव को गिरफ्तार किया तो कई चाैंका देने वाली बातें सामने आईं.

मनोहरलाल यादव ने अपनी एक चेली के साथ मिल कर कई मैट्रीमोनियल वैबसाइट बना रखी थीं, जिन के नाम बड़े ही लुभावने होते थे. मसलन, जीवन जोड़ी, मैट्रीमोनी आल, बैस्ट मैट्रीमोनियल वगैरह. ये दोनों पहले कुंआरे लड़कों से बातचीत करते थे, फिर अच्छी लड़की दिलाने के नाम पर 5,000 रुपए रजिस्ट्रेशन फीस जमा कराते थे.

असली खेल इस के बाद शुरू होता था, जब कुंआरों को कई खूबसूरत लड़कियों की तसवीरें और बायोडाटा दिखा कर उन्हें फांसा जाता था. इस गिरोह में कुछ लड़कियां भी शामिल थीं. फोटो पसंद आ जाने के बाद लड़कियों के फोन नंबर लड़कों को दे दिए जाते थे और वे इन लड़कियों से सीधे बात करने लगते थे.

बातचीत में ये लड़कियां अपने घरपरिवार की माली हालत और गरीबी का रोना रोती थीं. कई लड़के  झांसे में आ कर उन के बताए गए बैंक खाते में पैसा जमा करा देते थे, जिस से लड़की शादी करने के लिए तैयार हो जाए.

ऐसा ही संजय के साथ हुआ था. गिरोह की एक लड़की ने कोई 7 लाख रुपए उस से ऐंठ लिए और फिर जब उस का फोन बंद आने लगा तो संजय का माथा ठनका और उस ने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी.

चूंकि ऐसी कई शिकायतें लगातार मिल रही थीं, इसलिए पुलिस ने फुरती से कार्यवाही की और मनोहरलाल यादव को धर दबोचा, तो उस ने जुर्म कबूल कर लिया. कई नौजवान तो ऐसे भी थे, जिन्होंने ठगे जाने के बाद भी मारे शर्म और जगहंसाई के डर से रिपोर्ट ही दर्ज नहीं कराई थी.

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इन से ऐसे बचें

क्या लुटेरी दुलहनों से बचा जा सकता है? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ना जरूरी है कि पहले ऐसी कुछ वारदात पर एक नजर डाली जाए, जिस से सम झ आए कि कैसेकैसे लोग इन के चंगुल में फंस कर पैसा और इज्जत गंवा बैठते हैं.

केस नंबर 1 : 18 दिसंबर, 2019 को हरिद्वार के रुड़की में हरियाणा के पानीपत के एक विधुर ने अपनी मौसी की बताई जरूरतमंद लड़की से शादी की थी. मंदिर में शादी के बाद पतिपत्नी हरिद्वार के एक होटल में ठहरे.

रात के तकरीबन 2 बजे पति के सो जाने के बाद दुलहन 5 लाख रुपए के गहने और 50 हजार रुपए नकद ले कर फरार हो गई.

सुबह उठने के बाद दूल्हे को इस बात का पता चला तो उस ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई.

केस नंबर 2 : एक लुटेरी दुलहन 23 दिसंबर, 2019 को उत्तर प्रदेश के बरेली से गिरफ्तार की गई. इस मामले में 30 साला दुलहन ममता उर्फ अंजलि उर्फ सीमा की शादी त्रिलोक सिंह यादव से हरियाणा के फरीदाबाद के गांव हथेली में 13 नवंबर, 2019 को हुई थी.

शादी के कुछ दिन बाद ही यह ठगिनी ससुराल वालों को नशीली चीज खिला कर लाखों के जेवरात और नकदी ले कर फरार हो गई थी.

पकड़े जाने के बाद सीमा ने बताया कि वह बिहार के खगडि़या की रहने वाली है और इसी तरह पहले भी शादियां कर लोगों को लूट चुकी है.

इस काम को एक पूरा गिरोह अंजाम देता था. सीमा के बयान की बिना पर उस औरत को भी गिरफ्तार कर लिया गया, जो हर शादी में उस की भाभी का रोल अदा करती थी.

केस नंबर 3 : एक और मामला उत्तर प्रदेश के बदायूं का है. प्रवीण नाम के नौजवान की शादी आजमगढ़ की रहने वाली एक लड़की से हुई थी. दुलहन ससुराल आई और पहली ही रात सब को खाना खिलाया.

इस खाने में उस ने नशीली चीज मिला दी थी, जिस से घर के सारे लोग बेहोश हो गए और रात को वह नकदी और जेवर ले कर चंपत हो गई.

केस नंबर 4 : 10 अक्तूबर, 2019 को इंदौर पुलिस ने एक ऐसे गिरोह का परदाफाश किया था, जिस के निशाने पर जैन समाज के नौजवान रहते थे.

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इस गिरोह में 4 मर्द और 2 लड़कियां थीं. इन्होंने तकरीबन 2 दर्जन शादियां की थीं और हर बार ससुराल से नकदी व जेवरात ले कर फरार हो गए थे. बाद में यह पैसा गिरोह के सदस्य बांट लेते थे.

गिरोह का मुखिया अनिल वाटकीय नाम का शख्स था, जो जैन लड़कों को फंसाता था.

गौरतलब है कि जैन समाज में शादी लायक लड़कों को लड़कियां नहीं मिल रही हैं, इसलिए इस गिरोह ने 2 लड़कियों रितु राठौर और सपना को ट्रेनिंग दी थी. शादी के बाद तयशुदा प्लान के मुताबिक ये दोनों मौका मिलते ही ससुराल से माल ले कर फरार हो जाती थीं.

लुटेरी दुल्हनों से सावधान : भाग 1

5 दिसंबर, 2019 को मध्य प्रदेश के महाकौशल इलाके के गाडरवारा में गांव सिरसीरी से एक बरात गाजेबाजे के साथ भोपाल आई थी, जिस का दूल्हा रूपेश था और दुलहन का नाम था रागिनी.

रूपेश और रागिनी की शादी ब्राह्मण समाज के एक बिचौलिए कौशल प्रसाद शर्मा ने तय कराई थी, जो भोपाल के नजदीक रायसेन जिले के उदयपुरा के रहने वाले थे.

शादी की बातचीत तकरीबन 3 महीने पहले शुरू हुई थी और रूपेश रागिनी को भोपाल में उस के घर आ कर पसंद भी कर गया था. तब रागिनी के पिता नंदकिशोर शर्मा ने अपने होने वाले दामाद की खूब खातिरदारी की थी.

धीरेधीरे बात आगे बढ़ी तो शादी की तारीख भी 5 दिसंबर, 2019 तय हो गई.

नंदकिशोर शर्मा भोपाल के महामाई का बाग इलाके में रहते थे. रूपेश महामाई का बाग इलाके में 1-2 बार आया भी और जब शादी तय हो गई तो उस के पिता शिवनारायण शर्मा भी घर वालों समेत रीतिरिवाज पूरे करने आए.

इन मुलाकातों के दौरान बिचौलिया कौशल प्रसाद शर्मा मौजूद रहे और बातचीत आगे बढ़ाने में दोनों पक्षों की मदद करते रहे. नंदकिशोर शर्मा शादी पक्की करने सिरसीरी गए थे, तब उन्होंने रूपेश को सोने की एक अंगूठी और कपड़े दिए थे. बाकी रस्में भोपाल में पूरी होना तय हुआ था.

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सगाई की रस्म में शिवनारायण शर्मा ने अपनी होने वाली बहू को तोहफे की शक्ल में 5 तोले सोने की चूडि़यां, आधा तोले सोने की अंगूठी, साड़ी और चांदी की पायलें दी थीं.

शादी नंदकिशोर शर्मा के घर के पास अवधपुरी सी सैक्टर से होना तय हुई थी. दोनों पक्षों ने जब खानेपीने का हिसाब लगाया, तो वह तकरीबन 4 लाख रुपए निकल रहा था.

11 नवंबर, 2019 को जब नंदकिशोर शर्मा शादी का कार्ड देने सिरसीरी गांव पहुंचे, तब यह तय हुआ कि इस प्रीतिभोज का खर्च दोनों पक्ष मिल कर उठाएंगे, इसलिए शिवनारायण शर्मा ने अपने हिस्से के 2 लाख रुपए नकद नंदकिशोर शर्मा को दे दिए. फिर यह सोचते हुए वे बेफिक्र हो गए कि अब बरात के आनेजाने के सिवा कोई खास खर्च नहीं करना है. लिहाजा, वे बेटे की शादी की तैयारियों में जुट गए.

शादी के कार्ड सभी जानपहचान वालों और नातेरिश्तेदारों में बांट दिए गए थे और जिन लोगों को भोपाल बरात में ले जाना था, उन्हें फोन पर निजी तौर पर तैयार रहने को कह दिया गया था.

8 लाख रुपए का चूना

रूपेश की तो खुशी का ठिकाना नहीं था. उस के दिलोदिमाग में रागिनी रचबस गई थी. 5 दिसंबर, 2019 को वह तरहतरह के सपने देखता हुआ बरातियों समेत भोपाल आया था. रास्तेभर बराती खूब मौजमस्ती करते रहे थे.

भोपाल आ कर रूपेश के पिता ने रास्ता पूछने के लिए रागिनी के घर फोन किया तो नंदकिशोर शर्मा का फोन स्विच औफ आ रहा था. उन्होंने लड़की वालों के और भी कुछ नंबर लगाए, तो वे सभी बंद मिले. और तो और कौशल प्रसाद शर्मा का भी फोन नंबर बंद मिला तो वे किसी अनहोनी से घबरा उठे.

बरातियों से भरी बस जैसेतैसे पता पूछतेपूछते शादी वाले घर 284, सैक्टर सी, अवधपुरी पहुंची तो वहां कौए उड़ रहे थे यानी सन्नाटा पसरा था. मंडप, शहनाई, बैंडबाजे का कहीं दूरदूर तक नामोनिशान नहीं था. खैर, घर पर बस रुकी तो बराती एकएक कर उतरने लगे, लेकिन सभी चौंके हुए थे कि आखिर माजरा क्या है. कहां तो रास्तेभर यह सोचते हुए आए थे कि भोपाल में जनवासे में पहुंच कर पहले नहाएंगेधोएंगे और फिर गरमागरम नाश्ता करेंगे, पर यहां तो दरवाजे पर ताला  झूल रहा था.

बरातियों को बातों में मशगूल छोड़ कर शिवनारायण शर्मा मकान के पास पहुंचे. पूछने पर मकान मालिक तारांचद जैन ने जो जवाब दिया, उसे सुन कर उन के पैरों तले जमीन खिसक गई.

ताराचंद जैन ने उन्हें बताया कि नंदकिशोर शर्मा तो तकरीबन एक महीना पहले ही मकान खाली कर गए हैं. कहां गए हैं, यह पूछने पर उन्होंने कहा कि पता नहीं.

इतना सुनना था कि शिवनारायण शर्मा को गश सा आ गया. वे सम झ गए कि उन के साथ जिंदगी का सब से बड़ा धोखा हुआ है. जैसेतैसे उन्होंने खुद को संभाला और बरात वाली बस की तरफ नजर डाली तो उन्हें अपनी इज्जत के चिथड़े उड़ते नजर आए. उन्हें लगा कि सब जानपहचान वाले और नातेरिश्तेदार उन की हालत और बेवकूफी पर हंस रहे हैं और जो हमदर्दी दिखा रहे हैं, वह भी किसी मजाक से कम नहीं है.

बात को संभालने हुए उन्होंने बरातियों से यह बहाना बना दिया कि लड़की वालों के यहां गमी हो गई है, इसलिए शादी अभी नहीं, बल्कि बाद में कभी होगी. हालफिलहाल तो वे नईनई रिश्तेदारी निभाने गमी में शामिल होने जा रहे हैं, इसलिए बाकी लोग इसी बस से वापस चले जाएं.

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बात थी ही ऐसी, इसलिए रंग में भंग पड़ता देख थकेहारे और गमजदा बराती वापस लौट गए. रह गया था वह हिसाबकिताब, जो बापबेटे मिल कर लगा रहे थे कि 2 लाख नकद और 2 लाख रुपए के ही जेवर तो लड़की वाले ले उड़े और 4-5 लाख रुपए अलग से खर्च हो गए.

शिवनारायण शर्मा ने  झूठी उम्मीद के साथ नंदकिशोर शर्मा और कौशल प्रसाद शर्मा को कई बार मोबाइल फोन लगाया, लेकिन वह नहीं उठा तो नहीं उठा.

कुछ और संभलने के बाद उन्होंने तय किया कि इस धोखाधड़ी की रिपोर्ट लिखाना जरूरी है, सो वे सीधे अवधपुरी थाने जा पहुंचे और मौजूदा थाना इंचार्ज अजय नागर को अपने साथ हुए धोखे की रिपोर्ट लिखाई.

अब पछताए होत का

जो होना था वह हो चुका था, लेकिन ऐसे मामले धड़ल्ले से उजागर होने लगे हैं तो सोचा जाना लाजिम है कि गड़बड़ कहां होती है. लड़के और लड़की वालों ने एकदूसरे के घर देख लिए थे और बिचौलिए पर भरोसा करते हुए नेगदस्तूर वगैरह भी कर दिए थे. कहीं किसी शक की गुंजाइश थी ही नहीं, लेकिन लड़के वालों के नजरिए से देखें तो चूक तो उन से भी हुई थी.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

प्रायश्चित : भाग 3

कहते समय सुधि की आंखों में आंसुओं की बाढ़ सी आ गई थी और वह सुधीर के पलंग के पास बैठ कर उन्हें निहारने लगी…फिर डाक्टर की बातें सुनने लगी.

‘‘सुधिजी, जब यह हमारे पास आए थे तब बहुत ही कमजोर थे. हमेशा थकेथके से रहते थे…बुखार भी रहता था. सांस भी मुश्किल से लेते थे. पहले हम लोगों ने इन की बौडी देखी जिस पर लाललाल चकत्ते से पडे़ थे. इन का टी.एल.सी., डी.एल.सी. करवाया, एक्सरे करवाया और बोनमैरो टेस्ट करवाया, हां, लंबर पंक्चर भी करवाया है…स्पाईनल कार्ड में से फ्ल्यूड निकाला था.’’

‘‘इतने सारे टेस्ट हुए हैं सुधीर के और इन्होंने मुझे हवा भी नहीं लगने दी?’’

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‘‘मैडम सुधि, आप के पति बडे़ साहसी हैं. जब हम ने इन्हें बताया कि आप को माईलाइट एक्यूट ब्लड कैंसर यानी कि एक्यूट ल्यूकीमिया है तब रत्ती भर भी इन के चेहरे पर शिकन नहीं पड़ी और न ही चिंतित हुए बल्कि यह कहने लगे कि अब मुझे बहुत कुछ करना है अपनी पत्नी और बेटों के लिए. कमाल का स्वभाव है आप के पति का,’’ कहते समय डा. वर्मा की निगाहें भी सुधीर के चेहरे पर टिकी हुई थीं.

सुधीर की आंखों की दोनों कोर गीली हो रही थीं और लग रहा था कि आंखें हजारहजार बातें कहना चाह  रही हों लेकिन जिंदगी हाथों की मुट्ठी से रेत की तरह खिसक रही थी. शायद जीवन काल के कुछ ही घंटे बचे थे. बीचबीच में आई.सी.यू. के दरवाजे की ओर भी देख रहे थे. सुधीर का पीला जर्द चेहरा देखने का साहस सुधि की आंखें नहीं जुटा पा रही थीं.

आंखों से बहते आंसुओं को पोंछते हुए जब सुधि ने सुधीर का हाथ पकड़ा तो उन्होंने आक्सीजन ट्यूब हटा कर धीमे से कहा, ‘‘सुधि, आई लव यू.’’

सुधि बच्चों की तरह फफक पड़ी. मुंह से निकला, ‘‘सुधीर, आई लव यू टू,’’ और सुधीर के हाथों को सहलाती रही. उसे लगा उस की भंवर में फंसी नाव जो कुछ घड़ी, कुछ लम्हे आराम से बह रही थी अब ठीक किनारे पर आ कर डूब गई है.

उस अस्पताल में जब सुधीर ने उसे कस कर पकड़ा और कहा, ‘प्लीज, मुझे छोड़ कर अभी मत जाना,’ एकाएक उसे अस्पताल की वह उमस भरी, घुटन भरी रात याद आ गई जब अगम की डिलीवरी होने वाली थी, वह दर्द से तड़प रही थी, कराह रही थी, प्रसव वेदना तीव्र थी. सुधि ने रोते हुए सुधीर से कहा था, ‘प्लीज, तुम आज रात अस्पताल में रुक जाओ, घर मत जाओ.’

लेकिन सुधीर ने स्पष्ट रूखे स्वर में कहा था, ‘मैं…मैं अस्पताल में नहीं रुक सकता. हैं तो मम्मीपापा और सर्वेंट…जब जरूरत पड़ेगी ये लोग मुझे बुला लेंगे.’

उस दिन के बाद से सुधि ने अपनी पीड़ा, अपना दर्द अपनी परछाईं तक को व्यक्त नहीं किया, सुधीर तो दूर की बात थे.

अभी 2 माह पहले तक सुधि को लगता था कि यह पति का घर, पति का आंगन उस के लिए अनजाना है, बेगाना है, इसे घर कहना बेईमानी है. लेकिन इधर 2 माह से यह आंगन, यह मकान घर का रूप ले बैठा है.

और वह भी प्यार, त्याग की सुगंध से सुवासित हो गए हैं. एक समझौते वाले जीवन को अभी उस ने आदर्श जीवन की तरह जीना शुरू ही किया है, लेकिन इस महके आंगन में वीरानियां, सन्नाटों ने बंजारों की भांति डेरा डाल लिया. हाय, क्या लाभ है मेरी इतनी योग्यताओं का, इतनी अधिक सुंदरता का, इतनी उच्च शिक्षा का जब मेरी तकदीर में ही सदाबहार वन के स्थान पर कीचड़ ही कीचड़ है.

सुधीर की दशा पलपल बिगड़ रही थी. खून की बोतलें लगातार चढ़ रही थीं. आक्सीजन भी दी जा रही थी. सब को पता था कि काले बादल अब मौत ही ले कर आएंगे फिर भी डाक्टर लोग बचाने का प्रयास कर रहे थे, दोनों बेटे पिता के बेड के पास खडे़ हुए कभी अपने पिता को, कभी अपनी मां सुधि को देख रहे थे जिस ने रोरो कर आंखें सुजा ली थीं और अस्तव्यस्त दशा में बैठी थी. बीचबीच में साहस के, हिम्मत के दो शब्द बोल भी रही थी :

‘‘न…न…सुधीर, तुम रोओ मत. तुम ठीक हो जाओगे. लेकिन सचसच बताओ, तुम ने मुझे क्यों नहीं बताया? यह पहाड़ जैसा दुख तुम अकेले ही झेलते रहे और तुम्हारे इन बेटों ने भी मुझे कानोंकान खबर नहीं लगने दी.

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‘‘यह बहुत गलत किया है तुम लोगों ने. मैं जीवन भर इस बात से तड़पती रहूंगी. सुधीर, औरत के लिए सब से बड़ा पुण्य है अपने पति की सेवा करना और आप ने मुझे उस सेवा से वंचित रखा. यह…यह अच्छा नहीं किया.’’

सुधि फिर फूटफूट कर रोने लगी. ब्लड की बोतल चढ़ रही थी. आक्सीजन दी जा रही थी लेकिन सुधीर मुंह से आक्सीजन कैप हटा कर धीरे से बोले, ‘‘मैं अपने पापों का प्रायश्चित कर रहा था क्योंकि तुम्हारे जैसी नेक पत्नी को मैं ने बहुत दुख दिए, बहुत प्रताड़ित किया,’’ और फिर कैप लगा ली. बच्चों ने पापा को खूब प्यार किया, सुधि ने सुधीर के माथे पर हाथ फेरा, फिर उन के सीने पर सिर रख कर बोली, ‘‘लेकिन सुधीर, तुम ने ऐसा प्रायश्चित किया कि मुझे 2 महीनों में इतना सुख, इतना प्यार दे दिया जो पति अपनी पत्नी को 20 सालों में भी नहीं देते हैं.’’

एकाएक सुधीर की सांसें रुक सी गईं. डाक्टर ने चेस्ट दबा कर सांस दिलवानी शुरू की, लेकिन सब बेकार.

आकाश में हजारों मौत की काली घटाएं पंख फैलाए डराने लगीं…

मरने से पहले सुधीर को एक बार फिर खून की उलटी आई, नाक से भी निरंतर खून बहने लगा…फिर सांस आनी बंद हो गई.

असहाय, बेबस, बेचारी पत्नी और दोनों बेटे सुधीर की जिंदगी नहीं बचा पाए. खैर, सुधीर की आंखों में लिखा हुआ शब्द आसानी से पढ़ा जा रहा था : प्रायश्चित…प्रायश्चित…प्रायश्चित.

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प्रायश्चित : भाग 2

जब-जब सुधीर ने उसे खाने-पीने पर, कपड़े पहनने पर, उस की पसंद पर अपमानित किया उसे यही लगा कि पंख फैलाए मौत उस के सिर पर मंडरा रही है. एक बार तो सुधीर ने क्लब जाने के लिए बच्चों और सुधि को तैयार होने के लिए कहा तो आज्ञानुसार सुधि ने बच्चे तैयार किए और स्वयं भी लालकाली चौड़ी बार्डर वाली साड़ी पहन ली लेकिन जल्दीजल्दी में वह चप्पलें बदलना भूल गई. जैसे ही वह कार में बैठने लगी सुधीर की निगाह चप्पलों पर पड़ गई. देखते ही पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया, ‘यह…यह क्या है पांव में. अरे, इतनी भी तमीज नहीं है कि क्लब जाना है तो ढंग की चप्पलें पहन लो. मुझे शर्म आती है यह सोच कर कि मैं ने तुम से शादी  की है. बिलकुल गंवार हो, कोई भी तुम्हें पढ़ीलिखी नहीं कहेगा.’   सुधीर के शब्दों से सुधि इतनी अधिक छिल गई थी जैसे छिलछिल कर खीरा हरे से सफेद हो जाता है.

उसी समय वह ड्रेसिंग रूम में गई, आंखें पोंछी, चप्पलें बदलीं फिर कार में बैठी. उस समय दिल में आया था कि वह जाने के लिए मना कर दे, लेकिन उस के संस्कारों ने, उस के कोमल, सहनशील स्वाभिमान ने उसे ऐसा नहीं करने दिया.

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आज कह रहे हैं कि सुधि, तुम अब स्मार्ट बन कर रहने लगी हो, लेकिन मैं अब टूर में बहुत व्यस्त हूं पर तुम्हें घुमानेफिराने ले जाना चाहता हूं. सुधि ने सोचा कि सुधीर को यह क्या हो गया. अजीबअजीब सी बातें करते हैं. जितने दिन भी घर में रहते हैं कभी बाहर घुमाने, कभी बाहर खाना खिलाने ले जाते हैं. पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ. इस परिवर्तन से सुधि का दिमाग लट्टू की तरह घूम गया. सोने से दिन, चांदी सी रातें अब उस के नसीब में कैसे हो गईं? कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है?  वही है सुधि जिस के पांव के नीचे काली सड़क, सिर के ऊपर मंडराते काले बादल और मन में घोर अंधेरा पसरा रहता था…अब हर तरफ उजाला ही उजाला है.

लेकिन इस उजाले पर उस का विश्वास पारे सा चंचल हो रहा था. रात भर विचारों के जाल में फंसी सुधि ने सुबहसुबह जब सुधीर को चाय दी, तो उसे उन की देह गरम लगी. मन हवा के झोंके से हिलते पत्ते सा कांपा, क्योंकि मन तो प्रश्नों के मेले में पहले ही भटका हुआ था. सुधीर ने जब बाहर पिकनिक पर जाने के लिए कहा, तो सुधि तुरंत बोली, ‘‘आप को बुखार है. आज आप बाहर तो क्या आफिस भी नहीं जाएंगे.’’

जबरदस्ती की मुसकान होंठों पर बिखेरते हुए सुधीर बोले, ‘‘अरे, कुछ नहीं होता है इतनी हरारत से. आफिस तो मुझे जाना ही पड़ेगा.’’

‘‘कतई नहीं जाने दूंगी आफिस. चलिए, अभी अस्पताल चलिए…’’ और वह जल्दी से सुधीर के कपडे़ ले आई. सुधीर ने अलमारी खोल कर दवा खाई फिर आंखें बंद कर के लेट गए.

लेकिन सुधि के जिद करने पर वह कपड़े बदलने लगे…सुधीर की पीठ, बांहों पर लाललाल चकत्ते देख कर सुधि घबरा गई. सुधीर के चेहरे पर पलपल लहरों सी परिस्थितियां बदल रही थीं, कमजोरी के कारण धीरेधीरे काम कर रहे थे.

एकाएक सुधीर का पीला पड़ता हुआ चेहरा और नाक से बहता हुआ खून देख कर सुधि ने तुरंत डाक्टर को फोन किया, लेकिन सुधीर ने रोक कर कहा, ‘‘चलो, अस्पताल चलते हैं.’’

‘‘अरे, कुछ नाश्ता तो कर लो.’’

‘‘नहीं, मुझे भूख नहीं है,’’ फिर रुक कर बोले, ‘‘क्या बनाया है?’’

‘‘दलिया बना देती हूं. अभी तो कुछ भी नहीं बनाया है.’’

‘‘हां, बना दो. तुम बहुत टेस्टी दलिया बनाती हो.’’

धीरेधीरे तैयार हो कर सुधीर ने बनाई हुई वसीयत, जिस पर दोनों के हस्ताक्षर थे और बच्चों के फिक्स्ड डिपाजिट के पेपर्स सुधि को पकड़ा दिए.

कांपने लगे सुधि के हाथ. पेपर्स देते समय सुधीर के मसूड़ों से खून बहने लगा फिर उन्हें खून की उलटी आई, तो फौरन सुधि उन्हें अस्पताल ले गई.

अस्पताल में घुसते ही डा. वर्मा ने कहा, ‘‘सुधीरजी, हो गई न फिर गंभीर हालत. मैं ने आप को कल शाम ही घर जाने के लिए मना किया था, लेकिन आप तो 2 महीने से मेरी बात ही नहीं सुन रहे हैं. जिस दिन…’’

वाक्य बीच में सुधि ने रोक दिया, ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं डा. वर्मा? क्या सुधीर इसी अस्पताल में 2 महीने से रह रहे थे.’’

‘‘हां…कभीकभी 1-2 दिन के लिए घर चले जाते हैं.’’

डा. वर्मा की बातें और सुधीर की गंभीर दशा पर सुधि को यकीन ही नहीं हो रहा था. उसे लगा कि वह कल्पना लोक में विचर रही है या कोई फिल्म देख रही है… क्यों रह रहे हैं सुधीर अस्पताल में? इन्हें क्या बीमारी है?

‘‘इन्हें एक्यूट माईलाइट ल्यूकीमिया हो गया है.’’

‘‘कब से?’’

‘‘बस, 2 महीने से और तभी से यह यहीं रहते हैं. साथ में एक इन का मित्र भी कभीकभी आ जाता है.’’

‘‘लेकिन यह तो टूर पर रहते हैं?’’

‘‘क्या कहा, टूर…इन की तो लास्ट स्टेज चल रही है. बोनमैरो फेल्योर हो चुका है और लंबर पंक्चर भी हो चुका है. अब तो इन के लिए आप दुआ ही करें. पता नहीं कब क्या हो जाए.’’

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‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि रेड ब्लड सेल्स बनने बंद हो गए हैं. सफेद बहुत ज्यादा बढ़ गए हैं.’’

सुन कर सुधि को लगा मानो चारों ओर अंधकार ही अंधकार छा गया है. और वह घिर गई है समस्या की अभेद्य दीवारों से. महाशून्य की एक ऊंची दीवार उस के चारों ओर घिर गई है.

वह दौड़ कर डा. वर्मा के पास गई और बोली, ‘‘डा. साहब, आप को कैसे पता लगा कि इन्हें ब्लड कैंसर है…क्या किया आप ने? कहीं गलत टेस्टिंग तो नहीं हो गई है, आप झूठ बोल रहे हैं, इन्हें ब्लड कैंसर नहीं हो सकता…’’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

प्रायश्चित : भाग 1

यह हो क्या गया है सुधीर का जो चेहरा सुबह की ओस की तरह दमकता था अब वह सूखे नारियल सा मुरझाया रहने लगा है और फौआरों सी उछल कर आसमान छूने वाली उन की वह हंसी भी अब गायब सी हो गई है.

कहां पहले उन के मुंह से एकएक शब्द मईजून की तपती धूप की तरह निकलते थे और अब बर्फ की तरह ठंडे शब्द बोलते हैं. बस, इसी तरह सुधि सुबह से शाम तक अपने पति सुधीर के बारे में सोचती रहती.

आज ही देखो, कितने प्यार से मेरे गालों को थपथपाते हुए बोले, ‘‘सुधि, अब बच्चे बडे़ हो गए हैं, तुम्हारा घर में मन नहीं लगता होगा तो सर्विस ज्वाइन कर लो.’’

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पहले तो कभी इस तरह नहीं बोले. बड़े आश्चर्य से वह सुधीर की ओर देखती रही और चक्रवात में फंसे हुए तिनके की तरह सोचती रही.

उसे लगा कि जैसे समुद्र के किनारे पर बड़ीबड़ी चट्टानों में ठहरा हुआ पानी सूरज के प्रकाश से चमक उठता है उसी तरह से सुधीर की आंखों में भी आंसू की बूंदें चमक रही थीं.

फिर सुधि ने हलकी आवाज में कहा, ‘‘अरे, आप को आज हो क्या गया है जो सर्विस करने के लिए कह रहे हो, पहले तो आप ने क्रोध में आ कर मेरी लगी हुई नौकरी छुड़वा दी कि आप जैसे इंजीनियर की पत्नी के नौकरी करने से आप की बदनामी होती है और आज आप फिर नौकरी करने के लिए कह रहे हैं.’’

मुंह का कौर खत्म कर के सुधीर बोले, ‘‘डार्लिंग, उस समय बच्चे बहुत छोटे थे, उन को तुम्हारी बहुत जरूरत थी.  अब दोनों बच्चे बाहर हैं, इंजीनियरिंग पढ़ रहे हैं, तुम बोर होती हो, तभी मैं ने सर्विस के लिए कहा है.’’

‘‘कैसी बातें करते हैं आप. अब मुझे किसी भी अच्छे स्कूल में नौकरी नहीं मिलेगी और छोटेमोटे स्कूल में मैं कभी भी नौकरी नहीं करूंगी,’’ कहते हुए सुधि खाना खा कर हाथ धोने लगी.

‘‘ठीक है, जैसा तुम चाहो करो…मैं तो नौकरी के लिए इसलिए भी कह रहा था क्योंकि अब मैं टूर पर बहुत रहता हूं. सुनो, अगर चाहो तो साहित्य सृजन शुरू कर दो.’’

बेझिझक, बेबाक हो कर सुधि ने उत्तर दिया, ‘‘वह तो मैं कर ही रही हूं और पत्रपत्रिकाओं में छप भी रहा है,’’ कहते हुए सुधि की निगाहें झुकी हुई थीं, जैसे उस ने कोई चोरी की है.

सुधीर के प्यार भरे संबोधन को सुन कर सुधि को लगा जैसे रात की गूंगी खामोशी को सुबह की आवाज मिल गई. उस के मन के अंधेरों में हजारों दीपक जल उठे, लेकिन उस प्रकाश में भी सुधि अतीत का इतिहास पढ़ने लगी.

कैसे भूल सकती है वह जवानी की वे रातें जब वह चांदनी के हिंडोले को टकटकी लगाए देखती थी, रोती थी जारजार. एकएक शब्द सुधीर का जलते हुए अंगारे सा उसे बाहर से अंदर तक जला देता था. ‘क्या तुम्हें खाने का भी ढंग नहीं आता, जो चावल हाथ से खाती हो.’

कभी झल्ला कर कहते, ‘ओह, हद हो गई है…जब भी कहीं जाती हो गंवार औरतों की तरह चटक रंग की साड़ी पहन लेती हो. किसी दिन बाजार चलो, मैं अच्छी साडि़यां खरीदवा दूंगा.’

एक दिन तो सुधीर ने सीमा ही लांघ दी, ‘मैं जब भी किसी मित्र को घर बुलाता हूं, एक तो खाना बेढंगा बनाती हो फिर कपडे़  भी वही अपने मायके के चटकीले, भड़कीले पहन लेती हो. मिसेज मिश्रा, मिसेज वर्मा को देखो, सब कितने स्टाइलिश कपडे़ पहनती हैं…तुम्हारे ऐसे रंगढंग देख कर तो मन करता है कि किसी मित्र को कभी घर न बुलाऊं.’

उन बातों से वह आज तक जली हुई है, लेकिन अब सुधीर की आदतें कैसे बदल गई हैं…अब तो चाशनी में पगे शब्दों को इस्तेमाल करते हैं. मेरी हर बात का बहुत खयाल रखते हैं. इधर 1 महीने के अंदर अपनी पसंद के ढेरों कपड़े और जेवर दिलवाए हैं, हालांकि खुद नहीं खाते हैं, लेकिन मुझे होटलों में खिलाते हैं.

और तो और, मेरी तबीयत खराब होने पर अपने दोस्त को डिनर भी होटल में दिया  था. लगता है आर्ट आफ लिविंग की क्लासेज अटैंड कर ली हैं. ताज्जुब है कि बेटों के और मेरे बैंक में अलग खाते खुलवा कर फिक्स्ड डिपाजिट में रुपए जमा कर दिए हैं. कहीं कुछ अशुभ तो नहीं घटने वाला है…कहीं इन्हें कुछ हो तो नहीं गया है.

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सोचते हुए सुधि सुधीर के पास जा कर उन्हें प्यार करने लगी. फिर दिमाग ने कहा कि 7 दिन बाद टूर से आए हैं, सोने दो.

हमेशा विचारों के तानेबाने में ऐसे ही उस रात घड़ी ने 3 बजा दिए और आंखें बारबार सुधीर के चेहरे को निहार रही थीं. एकाएक उसे लगा सुधीर के चेहरे की रौनक उड़नछू हो गई है, आंखों के नीचे स्याह गड्ढे भी पड़ गए हैं.

और एक ही झटके में उन के स्वभाव में कठोरता का स्थान कोमलता ने और कटुता का स्थान विनम्रता ने ले लिया है.

जो पति उसे कोयले का ढेर लगता था, अब ढेर में पड़ा हुआ हीरा लगने लगा है. शादी के बाद 20 सालों तक सुधि के दुख के अंगारों से दिल की शमा पिघल- पिघल कर आंखों से गिरती रही है, टप… टप…

एक खौफ, एक कर्कशता, एक अपमान, सुधीर के साथ से उसे एकएक बूंद कड़वे नीम के रस सा पीने को मिलता रहा है.

वह पीती भी रही है, क्योंकि वह एक अच्छी मां और आदर्श पत्नी के रूप में जीती रही है. पढ़ीलिखी है, एम.ए., बी.एड. तक. पिताजी भी प्रोफेसर थे और मां इंटरमीडिएट कालिज में टीचर थीं.

लेकिन शादी बेमेल हुई थी. सुधीर के पिताजी चीफ इंजीनियर थे और सुधीर स्वयं एक इंजीनियर. दोनों परिवारों के स्टैंडर्ड आफ लिविंग में बहुत असमानता थी. किस्मत का खेल कि अखबार के विज्ञापन से रिश्ता तय होना था, हुआ. सुधि ने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि सबकुछ होते हुए भी सुधीर के क्रूर व्यवहार और अहंकारवश उस के पांव के नीचे हमेशा तपती जमीन रहेगी और सिर पर निष्ठुर आफताब.

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

8 नवंबर की शाम : जिंदगी के माने बदल गए

आज 8 नवंबर, 2017 है. मुग्धा औफिस नहीं गई. मन नहीं हुआ. बस, यों ही. अपने फ्लैट की बालकनी से बाहर देखते हुए एक जनसैलाब सा दिखता है मुग्धा को. पर उस के मन में तो एक स्थायी सा अकेलापन बस गया है जिसे मुंबई की दिनभर की चहलपहल, रोशनीभरी रातें भी खत्म नहीं कर पातीं. कहने के लिए तो मुंबई रोमांच, ग्लैमर, फैशन, हमेशा शान वाली जगह समझी जाती है पर मुग्धा को यहां बहुत अकेलापन महसूस होता है. जनवरी में मुग्धा लखनऊ से यहां मुंबई नई नौकरी पर आई थी. यह वन बैडरूम फ्लैट उसे औफिस की तरफ से ही मिला है. आने के समय वह इस नई दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए, जीवन फिर से जीने के लिए जितनी उत्साहित थी, अब उतनी ही स्वयं को अकेला महसूस करने लगी है. बिल्ंिडग में किसी को किसी से लेनादेना है नहीं. अपने फ्लोर पर बाकी 3 फ्लैट्स के निवासी उसे लिफ्ट में ही आतेजाते दिखते हैं. किसी ने कभी पूछा ही नहीं कि नई हो? अकेली हो? कोई जरूरत तो नहीं? मुग्धा ने फिर स्वयं को अलमारी पर बने शीशे में देखा.

वह 40 साल की है, पर लगती नहीं है, वह यह जानती है. वह सुंदर, स्मार्ट, उच्च पद पर आसीन है. पिछली 8 नवंबर का सच सामने आने पर, सबकुछ भूलने के लिए उस ने यह जौब जौइन किया है. मुग्धा को लगा, उसे आज औफिस चले ही जाना चाहिए था. क्या करेगी पूरा दिन घर पर रह कर, औफिस में काम में सब भूली रहती, अच्छा होता. वह फिर बालकनी में रखी चेयर पर आ कर बैठ गई. राधा बाई सुबह आती थी, खाना भी बना कर रख जाती थी. आज उस का मन नहीं हुआ है कुछ खाने का, सब ज्यों का त्यों रखा है. थकीथकी सी आंखों को बंद कर के उसे राहत तो मिली पर बंद आंखों में बीते 15 साल किसी फिल्म की तरह घूम गए.

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सरकारी अधिकारी संजय से विवाह कर, बेटे शाश्वत की मां बन वह अपने सुखी, वैवाहिक जीवन का पूर्णरूप से आनंद उठा रही थी. वह खुद भी लखनऊ में अच्छे जौब पर थी. सबकुछ अच्छा चल रहा था. पर पिछले साल की नोटबंदी की घोषणा ने उस के घरौंदे को तहसनहस कर दिया था. नोटबंदी की घोषणा होते ही उस के सामने कितने कड़वे सच के परदे उठते चले गए थे. उसे याद है, 8 नवंबर, 2016 की शाम वह संजय और शाश्वत के साथ डिनर कर रही थी. टीवी चल रहा था. नोटबंदी की खबर से संजय के चेहरे का रंग उड़ गया था. शाश्वत देहरादून में बोर्डिंग में रहता था. 2 दिनों पहले ही वह घर आया था. खबर चौंकाने वाली थी.

आर्थिकरूप से घर की स्थिति खासी मजबूत थी, पर संजय की बेचैनी मुग्धा को बहुत खटकी थी. संजय ने जल्दी से कार की चाबी उठाई थी, कहा था, ‘कुछ काम है, अभी आ रहा हूं.’ ‘तुम्हें क्या हुआ, इतने परेशान क्यों हो?’

‘बस, कुछ काम है.’

मुग्धा को सारी सचाई बाद में पता चली थी. संजय के सलोनी नाम की युवती से अवैध संबंध थे. सलोनी के रहने, बाकी खर्चों का प्रबंध संजय ही करता था. संजय के पास काफी कालाधन था जो उस ने सलोनी के फ्लैट में ही छिपाया हुआ था. उस ने ईमानदार, सिद्धांतप्रिय मुग्धा को कभी अपने इस कालेधन की जानकारी नहीं दी थी. वह जानता था कि मुग्धा यह बरदाश्त नहीं करेगी.

उस दिन संजय सीधे सलोनी के पास पहुंचा था. सलोनी को उस पैसे को खर्च करने के लिए मना किया था. सलोनी सिर्फ दौलत, ऐशोआराम के लिए संजय से चिपकी हुई थी. संजय का पैसा वह अपने घर भी भेजती रहती थी. संजय कालेधन को ठिकाने लगाने में व्यस्त हो गया. सलोनी को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी थी. उस ने संजय से छिपा कर 2-3 एजेंट्स से बात भी कर ली थी जो कमीशन ले कर रुपए जमा करवाने और बदलवाने के लिए तैयार हो गए थे. उन में से एक सीबीआई का एजेंट था. सलोनी की मूर्खता से संजय और सलोनी को गिरफ्तार कर लिया गया था.

दोनों का प्रेमसंबंध मुगधा के सामने आ चुका था. इस पूरी घटना से मुग्धा शारीरिक और मानसिक रूप से इतनी आहत हुई थी कि वह सब से रिश्ता तोड़ कर यहां मुंबई में नई नौकरी ढूंढ़ कर शिफ्ट हो गई थी. उस के मातापिता थे नहीं, भाईभाभी और सासससुर ने जब पतिपत्नी संबंधों और पत्नीधर्म पर उपदेश दिए तो उसे बड़ी कोफ्त हुई थी. एक तो भ्रष्ट पति, उस पर धोखेबाज, बेवफा भी, नहीं सहन कर पा रही थी वह. शाश्वत समझदार था, सब समझ गया था. मुग्धा बेटे के संपर्क में रहती थी. संजय से तलाक लेने के लिए उस ने अपने वकील से पेपर्स तैयार करवाने के लिए कह दिया था.

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वह आज की औरत थी, पति के प्रति पूरी तरह समर्पित रहने पर भी उस का दिल टूटा था. वह बेईमान, धोखेबाज पति के साथ जीवन नहीं बिता सकती थी. आज नोटबंदी की शाम को एक साल हो गया है. नोटबंदी की शाम उस के जीवन में बड़ा तूफान ले कर आई थी. पर अब वह दुखी नहीं होगी. बहुत रो चुकी, बहुत तड़प चुकी. अब वह परिवार बिखरने का दुख ही नहीं मनाती रहेगी. नई जगह है, नया जीवन, नए दोस्त बनाएगी. दोस्त? औफिस में तो या बहुत यंग सहयोगी हैं या बहुत सीनियर. मेरी उम्र के जो लोग हैं वे अपने काम के बाद घर भागने के लिए उत्साहित रहते हैं. मुंबई में अधिकांश लोगों को औफिस से घर आनेजाने में 2-3 घंटे तो लगते ही हैं. उस के साथ कौन और क्यों, कब समय बिताए. पुराने दोस्तों से फोन पर बात करती है तो जब जिक्र संजय और सलोनी पर पहुंच जाए तब वह फोन रख देती है. नए दोस्त बनाने हैं, जीवन फिर से जीना है. वह पुरानी यादों से चिपके रह कर अपना जीवन खराब करने वालों में से नहीं है.

आज फिर 8 नवंबर की शाम है लेकिन वर्ष है 2017. संजय से मिले धोखे को एक साल हुआ है. आज से ही कोई दोस्त क्यों न ढूंढ़ा जाए. वह अपने फोन पर कभी कुछ, कभी कुछ करती रही. अचानक उंगलियां ठिठक गईं. मन में एक शरारती सा खयाल आया तो होंठों पर एक मुसकान उभर आई. वह टिंडर ऐप डाउनलोड करने लगी, एक डेटिंग ऐप. यह सही रहेगा, उस ने स्वयं में नवयौवना सा उत्साह महसूस किया. यह ऐप 2012 में लौंच हुई थी. उसे याद आया उस ने संजय के मुंह से भी सुना था, संजय ने मजाक किया था, ‘बढि़या ऐप शुरू हुई है. अकेले लोगों के लिए अच्छी है. आजकल कोई किसी भी बात के लिए परेशान नहीं हो सकता. टैक्नोलौजी के पास हर बात का इलाज है.’

मुग्धा ने तब इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. वह अपने परिवार, काम में खुश थी. डेटिंग ऐप के बारे में जानने की उसे कहां जरूरत थी. अब तो अकेलापन दूर करना है, यही सही. अब वह देख रही थी, पहला स्वाइपिंग ऐप जहां उसे दूसरे यूजर्स के फोटो में चुनाव के लिए स्वाइपिंग मोशन यूज करना है. अच्छे लग रहे मैच के लिए राइट स्वाइप, आगे बढ़ने के लिए लैफ्ट. मुग्धा के चेहरे पर एक अरसे बार मुसकराहट थी. वह एक के बाद एक फोटो देखती गई. एक फोटो पर उंगली ठहर गई, चेहरे पर कुछ था जो उस की नजरें ठहर गईं. उसी की उम्र का अभय, यह मेरा दोस्त बनेगा? बात कर के देखती हूं, नुकसान तो कुछ है नहीं. मुग्धा ने ही संपर्क किया. बात आगे बढ़ी. दोनों ने एकदूसरे में रुचि दिखाई. फोन नंबर का आदानप्रदान भी हो गया.

अभय का फोन भी आ गया. उस ने अपना पूरा परिचय बहुत ही शालीनता से मुग्धा को दोबारा दिया, बताया कि वह भी तलाकशुदा है, परेल में उस का औफिस है, अकेला रहता है. अभय के सुझाव पर दोनों ने मिलने की जगह तय कर ली. बौंबे कैंटीन जाने का यह मुग्धा का पहला मौका था. शनिवार की शाम वह अच्छी तरह से तैयार हुई. ढीला सा व्हाइट टौप पर छोटा प्रिंट, ब्लैक जींस में वह काफी स्मार्ट लग रही थी. बौंबे कैंटीन के बाहर ही हाथ में फूल लिए अभय खड़ा था. दोनों ने बहुत ही शालीनता से, मुसकराते हुए एकदूसरे को ‘हाय’ कहा.

मुग्धा की आकर्षक मुसकराहट अभय के दिल में अपनी खास जगह बनाती चली गई. अब तक वे दोनों फोन पर काफी बातें कर चुके थे, बौंबे कैंटीन के इंटीरियर पर नजर डालते हुए मुग्धा ने कहा, ‘‘काफी अलग सी जगह है न.’’ ‘‘मैं यहां अकसर आता हूं, मेरे औफिस से पास ही है,’’ अभय ने कहा. उसी समय एक वेटर मैन्यू कार्ड दे गया तो मुग्धा बोली, ‘‘फिर तो आज आप ही और्डर कीजिए क्योंकि यहां के खाने में आप को अंदाजा भी होगा.’’

‘‘ठीक है, फिर आज मेरी पसंद का खाना खाना.’’ मुग्धा को अंदाजा हो गया था, वहां के वेटर्स अभय को अच्छी तरह पहचानते थे. अभय का सहज, सरल व्यक्तित्व मुग्धा को प्रभावित कर गया था. अभय उसे बहुत अच्छा लगा था. खाना सचमुच जायकेदार था. मुग्धा ने दिल से अभय की पसंद के खाने की तारीफ की. दोनों फिर इस टिंडर ऐप की बात पर हंसने लगे थे.

अभय ने कहा, ‘‘जानती हो, मुग्धा, पहले मैं ऐसी ऐप्स को मूर्खतापूर्ण चीजें समझता था. उस दिन मैं पहली बार ही यह ऐप देख रहा था और पहली बार ही तुम से बात हो गई,’’ फिर उस के स्वर में अचानक उदासी का पुट आ गया, ‘‘जीवन में अकेलापन तो बहुत अखरता है. देखने में तो मुंबई में खूब चहलपहल है, कोई कोना खाली नहीं, भीड़ ही भीड़, पर मन इस भीड़ में भी कितना तनहा रहता है.’’ ‘‘हां, सही कह रहे हो,’’ मुग्धा ने भी गंभीरतापूर्वक कहा.

उस के बाद दोनों अपने जीवन के अनुभव एकदूसरे से बांटते चले गए. अभय की पत्नी नीला विदेश में पलीबढ़ी थी. विदेश में ही एक फंक्शन में दोनों मिले थे. पर नीला भारतीय माहौल में स्वयं को जरा भी ढाल नहीं पाई. अभय अपने मातापिता की इकलौती संतान था. वह उन्हें छोड़ कर विदेश में नहीं बसना चाहता था. अभय और नीला की बेटी थी, रिनी. नीला उसे भी अपने साथ ले गई थी. अभय के मातापिता का अब देहांत हो चुका था. वह अब अकेला था.

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मुग्धा की कहानी सुन कर अभय ने माहौल को हलका करते हुए कहा, ‘‘मतलब, पिछले साल नोटबंदी ने सिर्फ आर्थिकरूप से ही नहीं, भावनात्मक, पारिवारिक रूप से भी लोगों के जीवन को प्रभावित किया था. वैसे अच्छा ही हुआ न, नोटबंदी का तमाशा न होता तो तुम्हें संजय की बेवफाई का पता भी न चलता.’’ ‘‘हां, यह तो है,’’ मुग्धा मुसकरा दी.

‘‘पहले मुझे भी नोटबंदी के नाटक पर बहुत गुस्सा आया था पर अब तुम से मिलने के बाद सारा गुस्सा खत्म हो गया है. एक बड़ा फायदा तो यह हुआ कि हम आज यों मिले. वरना तुम लखनऊ में ही रह रही होतीं, मैं यहां अकेला घूम रहा होता.’’ मुग्धा हंस पड़ी, ‘‘एक नोटबंदी कारण हो गया और दूसरी यह डेटिंग ऐप. कभी सोचा भी नहीं था कि किसी से कभी ऐसे मिलूंगी और दिल खुशी से भर उठेगा. कई महीनों की उदासी जैसे आज दूर हुई है.’’ बिल मुग्धा ने देने की जिद की, जिसे अभय ने बिलकुल नहीं माना. मुग्धा ने कहा, ‘‘ठीक है, अगली बार नहीं मानूंगी.’’

‘‘देखते हैं,’’ अभय मुसकरा दिया, फिर पूछा, ‘‘कोई मूवी देखें?’’ ‘‘हां, ठीक है.’’ मुग्धा का तनमन आज बहुत दिनों बाद खिलाखिला सा था. दोनों का दिल इस ताजीताजी खुशबू से भरी दोस्ती को सहर्ष स्वीकार कर चुका था. अभय ने अपनी कार स्टार्ट कर गाना लगा दिया था, ‘‘अजनबी तुम जानेपहचाने से लगते हो, यह बड़ी अजीब सी बात है, फिर भी जाने क्यों, अजनबी…’’ मुग्धा ने सीट बैल्ट बांध, सिर सीट पर टिका लिया था.

मुग्धा गाने के बोल में खोई सोच रही थी, इतने दिनों की मानसिक यंत्रणा, अकेलेपन के बाद वह जो आज आगे बढ़ रही थी, उसे लेशमात्र भी संकोच नहीं है. अभय के साथ जीवन का सफर कहां तक होगा, यह तो अभी नहीं पता, वक्त ही बताएगा. पर आशा है कि अच्छा ही होगा. और अगर नहीं भी होगा, तो कोई बात नहीं. वह किसी बात का शोक नहीं मनाएगी. उसे खुश रहना है. वह आज के बारे में सोचना चाहती है, बस. और आज नए बने सौम्य, सहज दोस्त का साथ मन को सुकून पहुंचा रहा था. वह खुश थी. अभय को अपनी तरफ देखते पाया तो दोनों ने एकसाथ कहा, ‘‘यह गाना अच्छा है न.’’ दोनों हंस पड़े थे.

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