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लाइकेन : भाग 2

गीता को काम करते हुए 2 महीने ही हुए थे. देवरदेवरानी बच्चों के साथ आए. सुबहसुबह हौल में पूरा परिवार इकट्ठा धमाचौकड़ी मचा रहा था, तभी गीता दाखिल हुई. देवर सोफे पर लेटे थे, हड़बड़ा कर उठ बैठे. मैं आंखों से उन्हें मना कर रही थी तब तक उन्होंने हाथ जोड़ कर उसे नमस्ते कर दिया. सब अपनी हंसी दबाए बैठे रहे. बाद में तो बच्चों ने जम कर उन की खिंचाई की.

ऐसे तो गीता पर दोनों वक्त खाना बनाने के साथसाथ सुबह नाश्ते की भी जिम्मेदारी थी, लेकिन इन्हें साढ़े 8 बजे निकलना होता और दीपू की स्कूल बस तो 8 बजे ही आ जाती थी. इसी कारण सुबह मुझे रसोई में घुसना पड़ता. गीता ने सब्जी काट कर मुझे पकड़ाई और आटा निकालने गई तब तक मैं ने एकतरफ सब्जी छौंकी, दूसरी तरफ चाय चढ़ा दी.

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‘‘आज फिर उस ने मारपीट की,’’ गीता बोली.

‘‘बच्चों ने?’’ मैं ने सहजता से पूछा.

‘‘नहीं, मेरे आदमी ने, पुलिस पकड़ कर ले गई.’’

‘‘क्या, अब क्या होगा?’’ मेरे स्वर में चिेंता थी.

‘‘होगा क्या, मालिक जाएंगे छुड़ाने. साल में 3 बार का यही धंधा है.’’ गूंधे आटे को मुट्ठी से और चोट दे कर मुलायम करती हुई उस ने बेफिक्री से कहा.

‘‘मालिक कौन?’’

‘‘वही, जिन के यहां रहती हूं.’’

‘‘किराए में रहती हो?’’

‘‘हां, यही समझ लीजिए. उन के दोनों बच्चों की देखभाल, घर का काम, खानाकपड़ा सब करती हूं.’’

‘‘तब उन की बीवी क्या करती है?’’ मैं ने चिढ़ते हुए पूछा.

‘‘नहीं है. 5 साल पहले मर गई. शुरूशुरू में गांव से बूढ़ी मां आई थी, मन नहीं लगा. तब से मैं ही संभाल रही हूं.’’

हमें दिल्ली आए 2 साल हो गए थे. बेटे का नामांकन एनआईटी वारंगल में हो गया था. बेटी यहीं एमकौम कर रही थी. हम लोगों को गीता की आदत सी हो गई थी, धीरेधीरे उस ने घर की पूरी जिम्मेदारी जो संभाल ली थी. उस की बेटी बड़ी हो गई थी, वह अपने घर का काम कर लेती थी.

जीवन में पहली बार कामवाली का ऐसा सुख मिला था. मैं अपने एनजीओ को पूरा समय दे पा रही थी.

रात का खाना निबटा कर किचन समेटा और सोने ही जा रही थी कि फोन आया, ‘‘आंटी, 20-30 हजार रुपए चाहिए.’’

‘‘30 हजार रुपए?’’ मैं ने चौंकते हुए पूछा. कम से कम 20 हजार रुपए तो देना ही होगा. प्लीज आंटी, बहुत जरूरी हैं. मालिक को दिल का दौरा पड़ा है. उन को अस्पताल में भरती करवा कर आ रही हूं. एक सप्ताह के  अंदर औपरेशन होगा.

‘‘ठीक है, देखती हूं,’’ कह कर मैं ने फोन काटा. राकेश से बिना पूछे मैं उसे आश्वस्त नहीं कर सकती थी. हालांकि 5 हजार के हिसाब से 3-4 महीने में ही पैसा चुकता कर देगी. पहले भी एकदो बार वह 4-5 हजार रुपए ले गई थी. कभी बच्चे के ऐडमिशन के लिए या किसी शादीब्याह में जाने के लिए. लेकिन 4-5 दिनों के अंदर ही लौटा जाती थी. राकेश पहले तो 20 हजार रुपए पर थोड़ा झिझके, मेरे समझाने पर 10 हजार रुपए देने को तैयार हुए. अपने पैसों में से छिपा कर 10 हजार रुपए मिला कर मैं ने दूसरे दिन उसे बुलवा कर पूरे 20 हजार रुपए दे दिए.

गीता तो आज पहचान में ही नहीं आ रही थी. शृंगारविहीन, कुम्हलाया चेहरा, पपड़ी पड़े होंठ, बिना कंघी किए बाल, सूजी आंखें. लगता था रातभर सोई नहीं थी. उस का ऐसा रूप पहली बार देख रही थी मैं. थोड़ा आश्चर्य भी हुआ, माना कि मकानमालिक अच्छा है, इन लोगों का खयाल भी रखता है, फिर भी है तो पराया ही. उस के लिए इतनी चिंता. उस दिन जब पति जेल गया तो यह बिलकुल सामान्य थी मानो कुछ हुआ ही न हो.

बहरहाल, 15 दिनों के लिए उस ने ही एक बाई ढूंढ़ कर लगा दी थी. मैं ने गीता को एक महीने की छुट्टी दे दी. महीनेभर बाद पुरानी गीता लौट आई. वही मुसकराता चेहरा, वही साजशृंगार.

‘‘कैसे हैं तुम्हारे मकानमालिक?’’

‘‘हां आंटी, अब ठीक हैं. कल से काम पर जाने लगे हैं. शुक्र है, सबकुछ समय रहते हो गया. मालिक के दोस्त का मैडिकल कालेज में कोई रिश्तेदार है, उस ने बहुत सहायता की वरना इतनी जल्दी औपरेशन कहां हो पाता.’’

‘‘तुम ने तो बहुत किया उस के लिए. पैसे से ले कर देखभाल, सेवासुश्रूषा तक. इतना तो अपने भी नहीं करते. उस के घर से कोई आया था?’’ न चाहते हुए भी मेरे स्वर में थोड़ा व्यंग्य आ गया था.

अचानक उस का हंसता चेहरा मुरझा गया. वह चुपचाप उठ कर अपने काम में लग गई. पोंछा लगातेलगाते मेरे पास आ कर बैठ गई, ‘‘आंटी, अब आप से क्या छिपाऊं. मैं मालिक के ही साथ रहती हूं.’’ इस बात को कहने के लिए इतनी देर में उस ने अपने को मानसिकरूप से तैयार किया था.

इन 3 सालों में इस सच का अंदाजा कुछकुछ मुझे हो ही गया था.

‘‘शादी कर ली है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘फिर तुम्हारा पति?’’

‘‘वो भी वहीं रहता है. मालिक की मां जब गांव चली गई, मैं ने उन का काम करना शुरू किया. पहले चौकाबरतन, फिर खाना बनाना. मैं बहुत कष्ट में थी. अच्छे खातेपीते घर की लड़की हूं. मायके में जमीनजायदाद है. पिताजी की गांव में किराने की दुकान है.

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‘‘लड़का दिल्ली में नौकरी करता है. इसी बात पर शादी हो गई. 3 बच्चे हो गए. यहां आने पर असलियत पता चली. तीन कमाता तेरह पी जाता है. घर में एक पैसा भी नहीं देता. ऊपर से रात में पिटाई करता. बच्चे भूख से बिलबिलाते थे. अंत में घर के पास में ही बन रही सोसायटी में ठेकेदारी में काम करने लगी. वहां भी स्थिति अच्छी नहीं थी. पूरे 8 घंटे काम, ठेकेदार की गंदी हरकतें, भद्दी गालियां. मिस्त्री का घिनौना स्पर्श, फिर भी पैसे मिल रहे थे, बच्चे पल रहे थे.

‘‘एक दिन मेरी बेटी किसी काम से हमारे पास आई. एक मजदूर उस का हाथ पकड़ने लगा. मैं ने गुस्से में पास रखे डंडे से उस के हाथ पर जोर से मारा. हंगामा हो गया. उसी वक्त मालिक वहां से गुजर रहे थे. उन्होंने सब को डांटडपट कर भगाया. मैं लगातार रोए जा रही थी.

‘‘यहां क्यों काम करती हो?’’

‘‘क्या करूं? बच्चे खाएंगे क्या?’’

‘‘खाना बनाना आता है?’’

‘‘बचपन से तो वही करती आई हूं. करम फूट गए थे जो यहां आई.’’

‘‘कल सुबह स्कूल के बगल वाले मकान में आना, चावला मैनेजर का नाम पूछोगी, कोई भी बता देगा.’’

‘‘दूसरे दिन सुबह जो गई, तो वहीं की रह गई. पूरे दिन काम कर के रात का खाना बना कर लौट आती थी. बच्चे बगल वाले सरकारी स्कूल में जाते थे. उन्हें दिन का खाना वहां मिल जाता था. शाम को मालिक कहते कि बच्चों को यहीं बुला कर खिला दिया करो.

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‘‘उस रोज खाना बना कर मैं बरतन मांज रही थी कि बेटी दौड़ती हुई आई, ‘अम्मा, बाबू को पुलिस पकड़ कर ले गई. बिलावल के साथ मारपीट कर रहा था.’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

लाइकेन : भाग 1

पटना से दिल्ली की द्वारका कालोनी के इस घर में शिफ्ट हुए 8 दिन हो गए थे. घर पूरी तरह सैट हो कर चमक रहा था. लेकिन मैं अस्तव्यस्त, बेरौनक हुई जा रही थी. वजह वही जो हर तबादले के बाद झेलती आई हूं. अच्छी कामवाली मिल नहीं पा रही थी. कुछ मुझे पसंद नहीं आ रही थीं, कुछ को मेरा ‘एक घर एक बाई’ वाला फार्मूला रास नहीं आ रहा था.

‘‘नहीं जी, एक घर से कैसे पेट भरेगा? 5 जगह काम करती हूं तो 5 जगह चायनाश्ता, तीजत्योहार में कपड़े, गिफ्ट वगैरह मिलते हैं.’’

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‘हुंह, एक घर के काम का समय तो इन्हें एक घर से दूसरे घर जाने में ही निकल जाता है, यह उन्हें नहीं दिखता. ऊपर से 5 जगह दौड़ने में पैर घिसते हैं, थकान होती है, 5 जगह बातें सुननी पड़ती हैं, वह नहीं,’ कुढ़ती हुई मैं बुदबुदाई.

शादी के बाद जब मैं आई थी तो इन बाइयों ने उस वक्त भी मेरी नाक में दम कर रखा था. एक तो उम्र कम, फिर साफसफाई की बीमारी. वे हम से हैंडल ही नहीं हो पातीं.

‘‘आज वहां जल्दी जाना है. कल आप के यहां देर से आऊंगी. उन के यहां सामान ज्यादा है. बस, सामनेसामने पोंछा लगाना पड़ता है. आप के खाली घर में तो सफाई करने में ही थक जाती हूं. आप बरतन देखदेख कर जमवाती हैं. अरोड़ा मैम तो सोई रहती हैं, मैं सारा काम निबटा आती हूं.’’

सुनसुन कर मैं परेशान हो जाती. मैं तो अरोड़ा मैडम नहीं बन सकती. उस दिन उन के यहां गई थी. किचन का सिंक सड़ांध मार रहा था. जिस कप में चाय लाई, वह भी चिपचिपा था. मुझ से तो चाय पी ही नहीं गई.

फिर उन का भेदिये जैसा सवाल, ‘जमुना आप के यहां बरतन जमाती है? कपड़े मशीन में डालती है? शाम को किचन व हौल में पोंछा लगाती है?’ ‘हां’ बोलने पर जमुना शाम को मुंह फुलाए घुसती, ‘आप ने अरोड़ा मैडम को क्या बतलाया, अब वे भी सब काम करवाएंगी. अगर गलती से ना बोलो तब वे मैडम नाराज, ‘आप पैसा ज्यादा दे कर यहां का रेट बिगाड़ रही हैं.’

थक कर मैं ने एक अलग कामवाली रखने का निर्णय लिया. इस के लिए भले ही मुझे दोगुना या तीनगुना पैसे देने पड़े. अपने दूसरे खर्चों में मैं कटौती कर लूंगी.

इतवार की सुबह थी. सब अलसाए से सो रहे थे. मैं झाड़ू लगा रही थी कि तभी दरवाजे की घंटी बजी.

‘‘बिट्टू, दरवाजा खोलो, दूध वाला होगा.’’

साहबजादे कुनमुनाते हुए उठे और दिन होता तो मजाल था वह उठ जाए. वह तो अभी काम के ओवरलोड की वजह से मैं फुलचार्ज रहती थी. कभी भी किसी पर फट सकती थी, इसी कारण सब डरे रहते.

‘‘मम्मा, अनूप अंकल आए हैं.’’

अनूप, इन का ड्राइवर. आज इस वक्त, कहीं इन्हें आज भी तो नहीं जाना है. मेरा नाश्ता भी नहीं बना. इसी उधेड़बुन में बाहर आई.

‘‘नमस्ते मैडम, यह गीता है. काम ढूंढ़ रही है. बिहार की ही है, पास की ही बस्ती में रहती है.’’

अनूप ने ‘बिहार की ही है’ पर जोर देते हुए कहा. जैसे बिहार का नाम सुनते ही मैं किसी को भी सिरआंखों पर बैठा लूंगी.

‘‘नमस्ते आंटी,’’ आवाज सुन कर मैं ने उस की तरफ देखा, लंबी, छरहरी, सांवली सी, बड़ीबड़ी आंखों में हलका काजल, संवरी भौंहें, करीने से कढ़े बाल, सुंदर व कीमती सूट पहने 25-26 साल की लड़की मुसकराती हुई खड़ी थी.

‘यह कामवाली है,’ मैं ने मन ही मन सोचा और तब मुझे ध्यान आया कि मैं एक फटीचर नाइटी में अब तक हाथ में झाड़ू लिए खड़ी थी.

हड़बड़ा कर मैं ने झाड़ू नीचे पटकी. शुक्र है कि अनूप ने मुझ से पहले बात कर ली, नहीं तो ये तो मुझे बाई ही समझ बैठती.

अनूप को विदा कर गीता को भीतर बुलाया. रसोई में चाय उबल रही थी. उस के लिए भी थोड़ा पानी डाला. एक कप इन्हें कमरे में दे आई, 2 कप चाय उसे लाने को कह मैं सोफे पर बैठ गई.

‘‘एक ही घर में काम करना होगा,’’ मैं ने अपनी शर्त सुनाई.

‘‘हां जी, मैं तो एक घर से ज्यादा कर भी नहीं सकती. अपने घर का भी तो काम रहता है. वो तो क्या है कि  बाहर निकलने से थोड़ा मन भी बदल जाता है और थोड़ी कमाई भी हो जाती है,’’ बिलकुल दिल्ली वाले अंदाज में उस ने जवाब दिया.

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‘‘शादी हो गई?’’

‘‘और क्या, 3 बच्चे हैं.’’

‘‘क्या, 3 बच्चे! कब हुई शादी, कितनी उम्र है तुम्हारी?’’

‘‘आंटी, हमारे यहां बेटी को 16 साल से ज्यादा कोई नहीं रखता. बहुत शिकायत होती है. मेरी शादी 15 वर्ष में हुई. 17 में गौना. 18 में बेटी. 2-2 साल के अंदर

2 और बेटे. 10 साल की बेटी है मेरी. यहां शहरों में 30-30 साल तक सब लड़की को घर में बैठाए रखते हैं,’’ कहती हुई उस ने ऐसा मुंह बनाया जैसे किसी ने उस के मुंह में पूरा नीबू निचोड़ दिया हो.

संयोग से उसी वक्त मेरी 17 वर्षीय बेटी धीगड़ी सी कानों में ईयर फोन लगाए गुनगुनाती हुई बाथरूम से बाहर निकली. उसे अभी इस वक्त गीता के सामने हाफपैंट और टौप में देख कर मैं ही बुरी तरह सकपका गई. शीघ्रता से बात खत्म कर के मैं ने उसे काम समझाया और बाथरूम में जा घुसी. इस लड़की की सजधज ने तो हमारे अंदर भी एक हीनभावना भर दी. पता नहीं काम कैसे करवाऊंगी.

जितनी उत्कृष्ट थी उस की साजसज्जा उतना ही उत्कृष्ट था उस का पहनावा. गजब की पसंद थी उस की. साड़ी हो या सलवारकमीज, एक बार नजर ठहर ही जाती थी. घर का पूरा काम करने के बाद भी मजाल है कि उस की साड़ी की एक भी मांग इधरउधर हो जाए. उस के कारण मुझे अपनेआप को बहुत बदलना पड़ा.

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बच्चे मजाक भी करते, ‘‘पापा 26 साल में मां की आदत नहीं सुधार पाए लेकिन गीता ने 36 दिनों में ही उन्हें सुधार दिया, जय हो गीता की.’’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

कातिल बीवी : भाग 3

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

उमेश कुछ कह पाता, रिशु पलटी. दरवाजा बंद किया और अंदर से कुंडी भी चढ़ा दी. उमेश समझ गया कि रिशु क्या चाहती है. उस ने भी मन बना लिया. जो होगा, देखा जाएगा.

रिशु आ कर उस के बगल में बैठ गई. उस ने साफ शब्दों में दिल की बात कह दी, ‘‘जब से तुम्हें देखा, मन के साथ तन भी विचलित है. मुझे तुम से प्यार हो गया है.’’

‘‘भाभी, यह क्या कह रही हो. तुम किसी की पत्नी हो और मैं किसी का दोस्त.’’ उमेश ने तर्क दिया.

‘‘उस से पहले मैं एक औरत हूं, जो स्वयं अधूरी है और तुम एक मर्द, जो पराई औरत का आमंत्रण पा कर आए हो.’’

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अपनी बात कहने के साथ रिशु ने उस के सीने पर हाथ रख दिया, ‘‘जरा देखूं तो, तुम घबरा तो नहीं रहे हो.’’

रिशु का स्पर्श पा कर उमेश के बदन में करंट सा दौड़ने लगा. उस ने उसे बांहों में भर लिया. बाहर दोपहर का सन्नाटा था. ऐसे में वासना में डूबी 2 देह एकदूसरे में गुंथ गईं. कमरे में सांसों की सरगम गूंजने लगी. यह सब तभी थमा जब दोनों तृप्त हो गए.

अवैध संबंधों का खेल एक बार शुरू हुआ तो वक्त के साथ बढ़ता ही गया. रिशु थी ही इतनी मादक कि उमेश उसे पाने का लोभ छोड़ नहीं पाता था. जिस दिन अशोक की बोलेरो कार की बुकिंग होती, रिशु फोन कर उमेश को घर बुला लेती और रंगरेलियां मनाती.

अशोक कुमार इस सब से बेखबर था कि बीवी घर में क्या गुल खिला रही है. दरअसल, रिशु को पति से संतुष्टि नहीं मिल पाती थी. वह उन औरतों में से थी जिन्हें हर रात पति का साथ चाहिए होता है. वह पति से निराश हुई तो उस ने उमेश को कामनाओं का साथी बना लिया. उस का मानना था कि वह बदचलन हो कर कोई गुनाह नहीं कर रही है.

लेकिन अवैध रिश्ते को कब तक छिपाए रखा जा सकता है. उमेश का चोरीछिपे अशोक के घर आना, लोगों से छिपा न रह सका. इसे ले कर किसी ने अशोक के कान भर दिए. उस ने बीवी से जवाबतलब किया तो रिशु ने त्रियाचरित्र दिखाते हुए उलटे उस पर ही आक्षेप लगाना शुरू कर दिया कि वह उस पर लांछन लगा रहा है.

अशोक जानता था कि बिना आग धुंआ नहीं उठता है. अत: वह उमेश के घर पहुंच गया. उस ने गहरी नजर से उमेश को देखा, ‘‘आजकल बहुत पर निकल आए हैं तुम्हारे.’’

‘‘मैं ने क्या किया है भाई, जो आप की त्यौरी चढ़ी हुई है.’’ उमेश ने पूछा.

अशोक सख्त लहजे में बोला, ‘‘मेरी गैरहाजिरी में मेरे घर क्यों जाते हो?’’

‘‘नहीं तो, एकदो बार भाभी ने कुछ सामान मंगाया था, सामान देने जरूर गया था.’’

‘‘कान खोल कर सुन लो, आइंदा तुम्हें हमारे घर जाने की कोई जरूरत नहीं है.’’ कह कर अशोक तमतमाया हुआ बाहर निकल गया.

अशोक यही सोच रहा था कि उस ने उमेश को समझा दिया है और अब सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन यह सोचना उस की भूल थी.

उमेश ने रिशु को मोबाइल पर फोन कर के बता दिया कि अशोक ने उसे चेतावनी दी है. अब वह उस से मिलने नहीं आएगा.

कुछ दिन दोनों नहीं मिले. फिर दोनों ने नया रास्ता खोज लिया. दोनों घर के बाहर मिलने लगे. लेकिन एक शाम अशोक ने दोनों को गांव के बाहर प्रमोद की ट्यूबवैल वाली कोठरी में रंगेहाथ पकड़ लिया.

उमेश तो भाग निकला. लेकिन रिशु की उस ने जम कर पिटाई की. रिशु ने गलती के लिए माफी मांग ली.

रिशु ने रंगेहाथ पकड़े जाने के बाद माफी जरूर मांग ली थी, लेकिन उस ने पति को मिटाने का निश्चय भी कर लिया था. उस ने अपने इरादों से उमेश को भी अवगत करा दिया था.

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एक दिन मौका मिलने पर दोनों ने सिर से सिर जोड़ कर अशोक को ठिकाने लगाने की योजना बनाई और उचित समय का इंतजार करने लगे.

बन गई भूमिका हत्या की

24 जुलाई, 2020 की शाम अशोक कुमार ने पत्नी रिशु को बताया कि उसे जाफराबाद कस्बा में एक मुसलिम भाई की शादी में शामिल होेने जाना है. रात 11 बजे से पहले लौट आएगा.

रिशु ने इस की जानकारी उमेश को दे दी और कहा अच्छा मौका है, काम तमाम कर दो. इस पर उमेश ने अपनी योजना तैयार कर ली. रात 8 बजे अशोक अपनी बोलेरो कार से जफराबाद जाने के लिए निकला. तभी योजना के तहत उमेश ने तिधरा मोड़ पर हाथ दे कर उसे रोक लिया और बोला, ‘‘भाई जाफराबाद तक छोड़ दो, मुझे एक जरूरी काम है.’’

अशोक की इच्छा उसे गाड़ी पर बिठाने की नहीं थी, पर पुराना दोस्त था सो इनकार भी नहीं कर सका और बिठा लिया.

उमेश ने अपनी लच्छेदार बातों से अशोक को मूड बनाने के लिए राजी कर लिया. उमेश ने जफराबाद के ठेके पर कार रुकवा कर शराब, पानी, गिलास व नमकीन लिया. फिर दोनों ने गाड़ी में बैठ कर शराब पी.

चालाकी से उमेश ने अशोक के गिलास में नशीला पदार्थ मिला दिया, जिस से कुछ देर बाद वह बेहोश हो कर गाड़ी की पिछली सीट पर लुढ़क गया.

उमेश ड्राइवर था ही, सो वह बोलेरो को महमदपुर गांव के पास लाया और सड़क किनारे खेत में खड़ी कर दी. इस के बाद उस ने कार से लोहे की रौड निकाली और अशोक के सिर पर कई प्रहार किए. अशोक का सिर फट गया. अधिक खून बहने से उस की मौत हो गई.

अशोक की हत्या के बाद उस ने गमछे से हाथ व माथे का खून पोंछा. शराब की खाली बोतल, गिलास व नमकीन के खाली पैकेट कार के बाहर फेंके. फिर रौड व गमछे को गन्ने के खेत में छिपा कर फरार हो गया.

25 जुलाई की सुबह कुछ ग्रामीणों ने खेत में खड़ी बोलेरो में लाश देखी, तब पुलिस को सूचना दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी जगदीश कुशवाहा मौके पर पहुंचे और शव को कब्जे में ले कर जांच शुरू की. जांच में अवैध रिश्तों में हुई हत्या का परदाफाश हुआ.

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27 जुलाई, 2020 को थाना खुटहन पुलिस ने अभियुक्त उमेश तथा रिशु को जौनपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कातिल बीवी : भाग 2

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

खुल गई कलई

थाने पर जब उमेश से अशोक उर्फ दीपक की हत्या के संबंध में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया. उस ने कहा कि अशोक उस का दोस्त था, दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी. उस ने अशोक की हत्या नहीं की.

उमेश ने बरगलाने का प्रयास किया तो पुलिस ने उस के साथ सख्ती की. इस से वह टूट गया. उस ने हत्या का अपराध कबूल कर लिया. उमेश के टूटते ही रिशु भी लाइन पर आ गई. उस ने पति की हत्या की बात मान ली.

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उमेश ने बताया कि रिशु से उस के नाजायज संबंध थे. अशोक इन संबंधों का विरोध करता था और बाधक बनने लगा था. उस ने रिशु को भी प्रताडि़त करना शुरू कर दिया था. इस पर हम दोनों ने अशोक को ठिकाने लगाने की योजना बनाई और उसे मौत के घाट उतार दिया.

चूंकि उमेश व रिशु ने हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया था, अत: थानाप्रभारी जगदीश कुशवाहा ने अज्ञात में दर्ज हत्या के केस में उमेश व रिशु को नामजद कर के उन पर भादंवि की धारा 302/120बी लगा दीं. दोनों को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस जांच में अवैध रिश्तों की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

जौनपुर जिले के खुटहन थाना क्षेत्र में बड़ी जनसंख्या वाला गांव है- तिधरा. यहां सप्ताह में 2 दिन बाजार लगता है. अशोक कुमार उर्फ दीपक बरनवाल इसी तिधरा में रहता था. वैसे वह खेता सराय कस्बे का मूल निवासी था, लेकिन शादी के बाद ससुराल में रहने लगा था.

उस ने तिधरा बाजार में एक मकान खरीद लिया था और उसी में परिवार सहित रहता था. उस के परिवार में पत्नी रिशु के अलावा 2 बच्चे थे, बेटा राहुल तथा बेटी आरती.

अशोक कुमार किराना व्यवसाई था. मकान के भूतल पर उस की किराने की दुकान थी. अशोक के कुशल व्यवहार से दुकान पर ग्राहकों की भीड़ जुटी रहती थी. बाजार वाले दिन भीड़ कुछ ज्यादा होती थी, सो उस की पत्नी रिशु को भी दुकान पर बैठना पड़ता था. वह रुपयों का लेनदेन करती थी.

दुकान की कमाई से अशोक ने एक बोलेरो कार खरीद ली थी. इसे वह बुकिंग पर स्वयं चलाता था. इस से उसे अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी. कुल मिला कर उस की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

अशोक की पत्नी रिशु पढ़ीलिखी, सुंदर और चंचल स्वभाव की महिला थी. उस ने ब्यूटीशियन का कोर्स कर घर में ही ब्यूटीपार्लर खोल लिया था.

शुरू में तो उस का यह काम फीका रहा, लेकिन बाद में ठीकठाक चलने लगा था, इस के मद्देनजर उस ने एक युवती को भी नौकरी पर रख लिया. वह बुकिंग पर भी जाने लगी थी.

पतिपत्नी की कमाई से घर की आर्थिक स्थिति तो मजबूत हुई थी, लेकिन दोनों के बीच दूरियां आ गई थीं. एक छत के नीचे रहते हुए भी दोनों पतिपत्नी का रिश्ता नहीं निभा पा रहे थे. अशोक दिन भर किराने की दुकान चलाता था. शाम तक वह इतना थक जाता था कि खाना खाते ही पलंग पर पसर जाता और खर्राटे भरने लगता. पति के खर्राटे रिशु को शूल की तरह चुभते थे.

रिशु 2 बच्चों की मां जरूर थी, पर उस की कामेच्छाएं प्रबल थीं. वह हर रात पति का साथ चाहती थी, जो उसे नहीं मिल पा रहा था. एक रोज अशोक की बोलेरो कार की बुकिंग किसी बारात में थी, पर उस की तबियत खराब थी. वह परेशान था कि बारात की बुकिंग कैसे निपटाए.

तभी उसे उमेश की याद आई. उमेश तिधरा में ही रहता था और कुशल ड्राइवर था. दोनों में दोस्ती थी. कभी किसी बारात या कहीं और मिलते तो शराब पार्टी कर लेते थे. उमेश भी शादी समारोहों वगैरह में गाड़ी ले कर जाता था.

खुद घर बुलाई मौत

अशोक ने मोबाइल पर उमेश से बात की तो वह खाली था. अशोक ने उमेश को बुला कर बात की और बोलेरो उसे सौंप कर बुकिंग पर भेज दिया. दूसरे रोज सुबह 10 बजे उमेश अशोक के घर पहुंचा और कार खड़ी कर चाबी तथा रुपयों का हिसाब अशोक को सौंप दिया. अशोक ने मेहनताने के रूप में 300 रुपए उमेश को दे दिए.

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हिसाब हो गया तो अशोक ने पत्नी को आवाज दी, ‘‘सुनती हो, तुम्हारा देवर आया है, पानी तो ले आओ.’’

रिशु पानी ले कर बैठक में पहुंची, तो उस के होठों पर मुसकान थी. उमेश ने एकदो बार दूर से रिशु को देखा था, आमनासामना पहली बार हो रहा था.

रिशु ने पानी उस की तरफ बढ़ाया, उमेश ने पानी पीने के लिए हाथ बढ़ाया, तो अनायास ही उस का हाथ रिशु के हाथ को छू गया.

वह सकपकाया, तभी दोनो की नजरें मिलीं. रिशु के होंठों पर मुसकराहट थी, जबकि आंखों में कामुक शरारत नाच रही थी. उमेश भी हड़बड़ाहट में मुसकरा दिया और उस के मुंह से निकला, ‘‘शुक्रिया भाभी.’’

पहली ही नजर में उमेश और रिशु एकदूसरे के आकर्षण में बंध गए. उमेश जहां गबरू जवान था, वहीं रिशु भी खूबसूरती में कम नहीं थी. दोनों ने एकदूसरे को दिल में बसा लिया. 3-4 दिन तक उमेश कशमकश में पड़ा रहा कि वह रिशु से मिलने जाए या न जाए. क्योंकि अशोक उस का दोस्त था और रिशु उस की पत्नी.

लेकिन रिशु का आमंत्रण उस के जेहन को मथ रहा था. आखिर एक दिन दोपहर में वह अशोक के घर पहुंच ही गया. संयोग से उस रोज अशोक किसी काम से जौनपुर गया हुआ था. चारों तरफ सन्नाटा पसरा था. ऐसे में उमेश को देखने वाला भी कोई नहीं था.

उस ने घर के दरवाजे पर दस्तक दी, तो दरवाजा रिशु ने ही खोला. फिर चहक कर बोली, ‘‘देवरजी आप! बड़ी देर कर दी मेहरबां आतेआते. जानते हो, मैं हर रोज तुम्हारी राह देखती थी.’’

‘‘ऐसी कौन सी बात थी, जो आप को मेरा इंतजार था?’’ उमेश ने उस के मन की थाह ली.

‘‘पहले अंदर तो आओ.’’ रिशु ने बेहिचक उस का हाथ थामा और अंदर खींच लिया. फिर उसे पलंग पर बिठा कर पूछा, ‘‘पानी लाऊं?’’

‘‘नहीं, प्यास नहीं है.’’ उमेश बोला.

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रिशु ने नैन मटकाए, ‘‘देवरजी, झूठ मत बोलो. प्यास नहीं होती, तो सुनसान दोपहर में भाभी के पास क्यों आते?’’ कहने के साथ उस ने नैनों की कटार चला दी.

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कातिल बीवी : भाग 1

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

महमदपुर गांव के कुछ लोग सुबहसुबह घूमने निकले तो उन्होंने इमामपुर मार्ग पर खेत में एक बोलेरो खड़ी देखी. उन्हें आश्चर्य हुआ कि बोलेरो सड़क किनारे खड़ी करने के बजाय खेत के बीच में क्यों खड़ी की गई. मन में शंका हुई तो वे उत्सुकतावश उस कार के पास गए.

वहां उन्होंने जो देखा, उस से उन की घिग्घी बंध गई. बोलेरो के अंदर एक युवक की लाश पड़ी थी. लाश देख कर वे गांव की ओर भागे. रास्ते में उन्हें जो भी मिला, उसे बताया फिर गांव पहुंच कर यह बात सब को बता दी.

गांव में कोहराम सा मच गया, जरा सी देर में खेत पर भीड़ उमड़ पड़ी. इसी बीच किसी ने मोबाइल से यह खबर थाना खुटहन पुलिस को दे दी. यह बात 25 जुलाई, 2020 की सुबह 8 बजे की है.

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सुबहसवेरे हत्या की सूचना पा कर खुटहन थानाप्रभारी जगदीश कुशवाहा का मन कसैला हो गया. उन्होंने मर्डर की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी और पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उस समय वहां गांव वालों की भीड़ जुटी थी.

भीड़ को हटा कर पुलिस वहां पहुंची, जहां बोलेरो खड़ी थी. कार का दरवाजा खुला था. पिछली सीट पर एक युवक की लाश पड़ी थी. लाश को उन्होंने कार से बाहर निकलवाया और शिनाख्त कराने की कोशिश की.

गनीमत यह रही कि लोगों ने लाश को देखते ही पहचान लिया. उन्होंने थानाप्रभारी जगदीश कुशवाहा को बताया कि लाश अशोक कुमार उर्फ दीपक बरनवाल की है, जो पड़ोस के गांव तिधरा में रहता है और किराना व्यवसाई है.

अशोक की हत्या किसी भारी चीज से सिर पर प्रहार कर के की गई थी, जिस से उस का सिर फट गया था. उस की उम्र 40 के आसपास थी. शरीर से वह हृष्टपुष्ट था. कार के पास ही शराब की खाली बोतल, प्लास्टिक के 2 गिलास और नमकीन के 2 खाली पैकेट पड़े थे. पुलिस ने इस सामान को जाब्ते की काररवाई में शामिल कर के सुरक्षित कर लिया. मृतक के घर उस की हत्या की सूचना भिजवा दी.

मृतक की पत्नी रिशु को पति की हत्या की सूचना मिली तो वह घटनास्थल पर आ गई और पति के शव से लिपट कर रोने लगी. थानाप्रभारी कुशवाहा ने उसे धैर्य बंधा कर शव से दूर किया. रिशु को साथ आई महिलाओं ने संभाला.

थानाप्रभारी जगदीश कुशवाहा अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी अशोक कुमार, एएसपी त्रिभुवन सिंह तथा सीओ जितेंद्र कुमार दुबे भी वहां आ गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम तथा डौग स्क्वायड को भी बुलवा लिया.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. फोरैंसिक टीम ने कार और घटनास्थल की जांच कर साक्ष्य जुटाए. खोजी कुत्ता शव को सूंघ कर भौंकते हुए कुछ दूर गया और गन्ने के खेत के पास जा कर भौंकने लगा.

इस पर टीम ने गन्ने के खेत की सघन तलाशी ली. खेत के अंदर खून सनी लोहे की रौड व खून सना गमछा मिला. टीम ने अनुमान लगाया कि संभवत: उसी रौड से मृतक की हत्या की गई होगी और गमछे से चेहरे का खून पोंछा गया होगा. सबूत के तौर पर टीम ने रौड तथा गमछे को सुरक्षित कर लिया.

कुछ नहीं बताया रिशु ने

मौकाएवारदात पर पुलिस अधिकारियों ने मृतक के कपड़ों की जामातलाशी कराई तो उस की पैंट की जेब से एक पर्स बरामद हुआ, जिस में ड्राइविंग लाइसैंस और कुछ रुपए थे. दूसरी जेब से उस का मोबाइल फोन मिला. पुलिस ने पर्स व मोबाइल फोन सुरक्षित कर लिया. बोलेरो कार को थाने भिजवा दिया गया.

घटनास्थल पर मृतक अशोक की पत्नी रिशु मौजूद थी. पुलिस अधिकारियों ने पूछताछ की तो उस ने बताया कि अशोक कल रात 8 बजे घर से बोलेरो कार ले कर निकले थे. पूछने पर उन्होंने बताया था कि वह कस्बा जाफराबाद में एक बारात में जा रहे हैं. रात 11 बजे के पहले लौट आएंगे. लेकिन वह वापस घर नहीं आए. किसी ने उन की हत्या कर दी. आज सुबह 10 बजे जब पुलिस से सूचना मिली तब वह यहां आई.

‘‘तुम्हारे पति की किसी से रंजिश या लेनदेन का कोई झगड़ा तो नहीं था?’’ पुलिस अधिकारियों ने पूछा.

‘‘सर, उन की न तो किसी से रंजिश थी और न ही किसी से लेनदेन था. वह अपनी किराने की दुकान चलाते थे. सरल स्वभाव की वजह से उन की पासपड़ोस के गांवों तक जानपहचान थी. पता नहीं किस ने उन की हत्या कर दी.’’

‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’ एएसपी त्रिभुवन सिंह ने रिशु से पूछा.

‘‘सर, हमें किसी पर शक नहीं है. हम नाम ले कर किसी को झूठमूठ नहीं फंसाना चाहते.’’

घटनास्थल का निरीक्षण व पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतक का शव पोस्टमार्टम के लिए जौनपुर के जिला अस्पताल भिजवा दिया. साथ ही अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज करा दिया गया.

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एसपी अशोक कुमार ने इस ब्लाइंड मर्डर का रहस्य खोलने के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया. इस टीम में थानाप्रभारी जगदीश कुशवाहा, सीओ (शाहगंज) जितेंद्र कुमार दुबे, एसआई मनोज सिंह, भूपत राम, कांस्टेबल करतार सिंह, जयदेव मिश्रा, महिला सिपाही राखी यादव, पूनम तथा सर्विलांस टीम को सम्मिलित किया गया. टीम की कमान एएसपी त्रिभुवन सिंह को सौंपी गई.

गठित पुलिस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का निरीक्षण कर के पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन किया. फिर मृतक की पत्नी रिशु तथा उस के पड़ोसियों से पूछताछ की. रिशु ने तो अपना रटारटाया बयान ही दिया. लेकिन पड़ोेसियोंं ने पुलिस को जानकारी दी कि रिशु मनचली औरत है.

उस के घर उमेश का आनाजाना था, जो अशोक को अच्छा नहीं लगता था. वह इस का विरोध करता था.

उमेश को ले कर अशोक व रिशु में झगड़ा भी होता था. अशोक की हत्या का रहस्य रिशु के पेट में ही छिपा हो सकता है.

रिशु रडार पर आई तो पुलिस टीम ने उस से दोबारा कड़ाई से पूछताछ की. साथ ही उस का मोबाइल भी ले लिया.

पुलिस टीम ने उस का फोन खंगाला तो पता चला कि घटना वाली रात वह 2 मोबाइल नंबरों पर सक्रिय थी. जिन में एक नंबर उस के पति अशोक का था, जबकि दूसरा नंबर ड्राइवर उमेश का था जो तिधरा का ही रहने वाला था.

पुलिस टीम ने उमेश के घर दबिश दी तो उस के घर पर ताला लटका मिला. इस से उस पर पुलिस का शक और भी बढ़ गया. पुलिस टीम ने उसे पकड़ने के लिए जाल बिछाया और 26 जुलाई की दोपहर उसे तिधरा मोड़ से गिरफ्तार कर लिया. उसे थाना खुटहन लाया गया. इसी बीच रिशु को भी हिरासत में ले लिया गया था.

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कातिल बीवी

केलिकुंचिका : भाग 3

कोलकाता के जरमन कौन्सुलेट से दुर्गा और बेटे शलभ को वीजा भी मिल गया. वह जरमनी के हीडेलबर्ग यूनिवर्सिटी गई.

जरमनी पहुंच कर दुर्गा को बिलकुल अलग माहौल मिला. जरमनी के लगभग एक दर्जन से ज्यादा शीर्ष विश्वविद्यालयों हीडेलबर्ग, एलएम यूनिवर्सिटी म्यूनिक, वुर्जबर्ग यूनिवर्सिटी, टुएबिनजेन यूनिवर्सिटी आदि में संस्कृत की पढ़ाई होती है. उसे देख कर खुशी हुई कि जरमनी के अतिरिक्त अन्य यूरोपियन देश और अमेरिका के विद्यार्थी भी संस्कृत पढ़ते हैं. वे जानना चाहते हैं कि भारत के प्राचीन इतिहास व विचार किस तरह इन ग्रंथों में छिपे हैं. भारत में संस्कृत की डिगरी तो नौकरी के लिए बटोरी जाती है लेकिन जरमनी में लोग अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए संस्कृत पढ़ने आते हैं. इन विद्यार्थियों में हर उम्र के बच्चे, किशोर, युवा और प्रौढ़ होते हैं. दुर्गा ने देखा कि इन में कुछ नौकरीपेशा यहां तक कि डाक्टर भी हैं. दुर्गा को पता चला कि अमेरिका और ब्रिटेन में जरमन टीचर संस्कृत पढ़ाते हैं. हम अपनी प्राचीन संस्कृति और भाषा की समृद्ध विरासत को सहेजने में सफल नहीं रहे हैं. यहां का माहौल देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि जरमन लोग ही शायद भविष्य में संस्कृत के संरक्षक हों. वे दूसरी लेटिन व रोमन भाषाओं को भी संरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं.

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दुर्गा का बेटा शलभ भी अब बड़ा हो रहा था. वह जरमन के अतिरिक्त हिंदी, इंगलिश और संस्कृत भी सीख रहा था. दुर्गा ने कुछ प्राचीन पुस्तकों, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतलम, गीता और वेद के जरमन अनुवाद भी देखे और कुछ पढ़े भी. जरमन विद्वानों का कहना है कि भारत के वेदों में बहुतकुछ छिपा है जिन से वे काफी सीख सकते हैं. सामान्य बातें और सामान्य ज्ञान से ले कर विज्ञान के बारे में भी वेद से सीखा जा सकता है.

जरमनी आने पर भी दुर्गा हमेशा अपनी सहेली माधुरी के संपर्क में रही थी. उस ने माधुरी को कुछ पैसे भी लौटा दिए थे जिस के चलते माधुरी थोड़ा नाराज भी हुई थी. माधुरी से ही दुर्गा को मालूम हुआ कि उस की दीदी अमोलिका और पापा दीनानाथ अब नहीं रहे. अमोलिका का बेटा बंटी कुछ साल नानी के साथ रहा था, बाद में वह अपने पापा जतिन के पास चला गया. उस की नानी भी उसी के साथ रहती थी. बंटी 16 साल का हो चुका था और कालेज में पढ़ रहा था. इधर, दुर्गा का बेटा शलभ 15 साल का हो गया था. वह भी अगले साल कालेज में चला जाएगा. दुर्गा के निमंत्रण पर माधुरी जरमनी आई थी. वह करीब एक महीने यहां रही. दुर्गा ने उसे बर्लिन, बोन, म्युनिक, फ्रैंकफर्ट, कौंलोन आदि जगहें घुमाईं. माधुरी इंडिया लौट गई.

दुर्गा से यूनिवर्सिटी की ओर से वेद पढ़ाने को कहा गया. उस से वेद के कुछ अध्यायों व श्लोकों का समुचित विश्लेषण करने को कहा गया. दुर्गा ने वेदों का अध्ययन किया था, इसलिए उसे पढ़ाने में कोई परेशानी नहीं हुई. उस के पढ़ाने के तरीके की विद्यार्थियों और शिक्षकों ने खूब प्रशंसा की. दुर्गा अब यूनिवर्सिटी में प्रतिष्ठित हो चुकी थी, बल्कि उसे अन्य पश्चिमी देशों में भी कभीकभी पढ़ाने जाना होता था.

5 वर्षों बाद शलभ फिजिक्स से ग्रेजुएशन कर चुका था. उसे न्यूक्लिअर फिजिक्स में आगे की पढ़ाई करनी थी. पीजी में ऐडमिशन से पहले उस ने मां से इंडिया जाने की पेशकश की तो दुर्गा ने उस की बात मान ली. दुर्गा ने उस के जन्म की सचाई अब उसे बता दी थी. सच जान कर उसे अपनी मां पर गर्व हुआ. अकेले ही काफी दुख झेल कर, अपने साहस के बलबूते पर मां खुद को और मुझे सम्मानजनक स्थिति में लाई थी. शलभ को अपनी मां पर गर्व हो रहा था. हालांकि वह किसी संबंधी के यहां नहीं जाना चाहता था लेकिन दुर्गा ने उसे अपने पिता जतिन और नानी से मिलने को कहा. माधुरी ने दुर्गा को जतिन का ठिकाना बता दिया था. जतिन आजकल नागपुर के पास वैस्टर्न कोलफील्ड में कार्यरत था.

इंडिया आ कर शलभ ने पहले देश के विभिन्न ऐतिहासिक व प्राचीन नगरों का भ्रमण किया. बाद में वह पिता से मिलने नागपुर गया. उस दिन रविवार था, जतिन और नानी दोनों घर पर ही थे. डोरबैल बजाने पर जतिन ने दरवाजा खोला. शलभ ने उस के पैर छुए. जतिन बोला, ‘‘मैं ने तुम को पहचाना नहीं.’’ शलभ बोला, ‘‘मैं एक जरमन नागरिक हूं. भारत घूमने आया हूं. मैं अंदर आ सकता हूं. मेरी मां ने मुझे आप से मिलने के लिए कहा है.’’

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शलभ का चेहरा एकदम अपनी मां से मिलता था. तब तक उस की नानी भी आई तो उस ने नानी के भी पैर छू कर प्रणाम किया. जतिन और नानी दोनों शलभ को बड़े गौर से देख रहे थे. शलभ ने देखा कि शोकेस पर उस की मौसी और मां दोनों की फोटो पर माला पड़ी हुई है. शलभ ने दोनों तसवीरों की ओर संकेत करते हुए पूछा, ‘‘ये महिलाएं कौन हैं?’’

जतिन ने बताया, ‘‘एक मेरी पत्नी अमोलिका, दूसरी उन की छोटी बहन दुर्गा है, अब दोनों इस दुनिया में नहीं हैं.’’

‘‘एस तुत मिर लाइट,’’ शलभ बोला. ‘‘मैं समझा नहीं,’’ जतिन ने कहा.

‘‘आई एम सौरी, यही पहले मैं ने जरमन भाषा में कहा था,’’ शलभ बोला. ‘‘अरे वाह, कितनी भाषाएं जानते हो,’’ जतिन ने हैरानी जताई.

‘‘सब मेरी मां की देन है,’’ शलभ ने कहा. फिर दुर्गा की फोटो को दिखाते हुए शलभ बोला, ‘‘तो ये आप की केलिकुंचिका हैं.’’

‘‘व्हाट?’’ ‘‘केलिकुंचिका यानी साली, सिस्टर इन लौ.’’

‘‘यह कौन सी भाषा है…जरमन?’’ ‘‘जी नहीं, संस्कृत.’’

‘‘तो तुम संस्कृत भी जानते हो?’’ ‘‘जी, आप की केलिकुंचिका संस्कृत की विदुषी हैं, उन्हीं ने मुझे संस्कृत भी सिखाई है.’’

‘‘वह तो बहुत पहले मर चुकी है.’’ ‘‘आप के लिए मृत होंगी.’’

‘‘व्हाट? हम लोगों ने उसे ढूढ़ने की बहुत कोशिश की थी, पर वह नहीं मिली. आखिर में हम ने उसे मृत मान लिया.’’ ‘‘अच्छा, तो अब चलता हूं, कल दिल्ली से मेरी फ्लाइट है.’’

शलभ ने उठ कर दोनों के पैर छुए और बाहर निकल गया. ‘‘अरे, जरा रुको तो सही, हमारी बात तो सुनते जाओ, शलभ…’’

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वे दोनों उसे पुकारते रहे, पर उस ने एक बार भी मुड़ कर उन की तरफ नहीं देखा.

केलिकुंचिका : भाग 2

अभी तक दुर्गा और जतिन दोनों अस्पताल से घर भी नहीं लौटे थे. दोनों की समझ में नहीं आ रहा था कि आने वाले भीषण तूफान से कैसे निबटा जाए. कुछ पलों का आनंद इतनी बड़ी मुसीबत बन जाएगा, उन्होंने इस की कल्पना भी नहीं की थी. दोनों सोच रहे थे कि आज नहीं तो कल अमोलिका को यह बात तो पता चलेगी ही, तब उस के सामने कैसे मुंह दिखाएंगे.

घर पहुंच कर दुर्गा बंटी के लिए दूध बना कर ले गई. उस ने दूध की बोतल अमोलिका को दी. वह बहुत गंभीर थी. दुर्गा वापस जाने को मुड़ी ही थी कि अमोलिका ने उसे हाथ पकड़ कर रोक लिया. पहले तो वह सोच रही थी कि सारा गुस्सा अभी के अभी उतार दे, पर उस ने बात बदलते हुए पूछा, ‘‘अब तो तुम्हारा एमए भी पूरा हो गया है. अगले महीने तुम्हारा कौन्वोकेशन भी है.’’ दुर्गा बोली, ‘‘हां.’’

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‘‘आगे के लिए क्या सोचा है? और तुम ने संस्कृत ही क्यों चुनी? इनफैक्ट संस्कृत की तो यहां कोई कद्र नहीं है.’’ ‘‘आजकल जरमनी में लोग संस्कृत में रुचि ले रहे हैं. बीए करने के बाद मैं एक साल स्कूल में पार्टटाइम संस्कृत टीचर थी. मैं ने जरमनी की एक यूनिवर्सिटी में संस्कृत ट्यूटर के लिए आवेदन दिया था. मैं ने जरमन भाषा का भी एक शौर्टटर्म कोर्स किया है. मुझे उम्मीद है कि जरमनी से जल्दी ही बुलावा आएगा.’’

‘‘कब तक जाने की संभावना है?’’ ‘‘कुछ पक्का नहीं कह सकती हूं, पर 6 महीने या सालभर लग सकता है. उन्होंने कहा है कि अभी तुरंत वैकेंसी नहीं है, होने पर सूचित करेंगे.’’

‘‘तब तक तुम्हारा ये बच्चा…’’ अमोलिका के मुंह से अचानक यह सुनना दुर्गा के लिए अनपेक्षित था. इस अप्रत्याशित प्रश्न के लिए वह तैयार नहीं थी. उसे चुप देख कर अमोलिका ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आई दीदी के यहां आ कर यह सब गुल खिलाने में. वैसे तो मैं समझ सकती हूं तेरे पेट में किस का अंश है, फिर भी मैं तेरे मुंह से सुनना चाहती हूं.’’

दुर्गा सिर नीचे किए रो रही थी, कुछ बोल नहीं पा रही थी. अमोलिका ने ही फिर कड़क कर कहा, ‘‘यह किस का काम है? बंटी के सिर पर हाथ रख कर कसम खा तू, किस का काम है यह?’’ दुर्गा फिर चुप रही. तब अमोलिका ने ही कहा, ‘‘जतिन का ही दुष्कर्म है न यह? सच बता तुझे बंटी की कसम.’’

‘‘तुम्हारी खामोशी को मैं तुम्हारी स्वीकृति समझ रही हूं. बाकी मैं जतिन से समझ लूंगी.’’ दुर्गा वहां से चली गई. अमोलिका ने अपनी मां को फोन कर कहा, ‘‘मां, मैं कुछ दिनों के लिए वहां आ कर तुम लोगों के साथ रहना चाहती हूं.’’

मां ने कहा, ‘‘बेटा, यह तेरा घर है. जब चाहे आओ और जितने दिन चाहो आराम से रहो.’’ उस रात अमोलिका और जतिन में काफी कहासुनी हुई. उस ने जतिन से कहा, ‘‘तुम्हारे दुष्कर्म के बाद मुझे तुम से घिन हो रही है. मुझे नहीं लगता, मैं यहां और रह पाऊंगी.’’

जतिन के माफी मांगने और मना करने के बावजूद दूसरे दिन अमोलिका दुर्गा के साथ पीहर आ गई. उस ने मेघाताबुरू की कहानी मां को बताई. उस की मां भी बहुत क्रोधित हुईं और उन्होंने दुर्गा से कहा, ‘‘अरे, तू अपनी सगी बहन के घर में आग लगा बैठी.’’ दुर्गा के पास कोई जवाब न था. वह चुप रही. मां ने कहा, ‘‘मैं तेरी जैसी कुलटा को अपने घर में नहीं रख सकती. तू निकल जा मेरे घर से. हम लोग तुम्हारा मुंह नहीं देखना चाहते.’’

उस रात दुर्गा को नींद नहीं आ रही थी. वह रात में एक बैग ले कर दरवाजा खोल कर घर से निकलना ही चाहती थी कि अमोलिका जग उठी. उस ने कहा, ‘‘कहां जा रही हो?’’ दुर्गा बोली, ‘‘कुछ सोचा नहीं है, या तो आत्महत्या करूंगी या फिर सब से दूर कहीं चली जाऊंगी.’’

‘‘एक पाप तो तूने पहले ही किया, दूसरा पाप आत्महत्या करने का होगा.’’ ‘‘तो मैं क्या करूं?’’

‘‘तू एबौर्शन करा ले, उस के बाद आगे की जिंदगी का रास्ता साफ हो जाएगा.’’

‘‘एबौर्शन कराना भी तो एक पाप ही होगा.’’ ‘‘तू अभी चुपचाप घर में बैठ. कुछ दिनों में हम सब लोग मिलजुल कर बात कर कोई समाधान ढूंढ़ लेंगे.’’

दुर्गा ने महसूस किया कि उस के मातापिता दोनों ने ही उस से बोलचाल बंद कर दी है. वह तो अमोलिका की गुनाहगार थी, फिर भी दीदी कभीकभी उस से बात कर लेती थीं. उस को अंदर से ग्लानि थी कि उस की एक छोटी सी भूल की सजा दीदी और बंटी को भी मिल रही है. 2 दिनों बाद ही दुर्गा अचानक घर छोड़ कर कहीं चली गई. उस ने अपना कोई अतापता किसी को नहीं बताया. दुर्गा अपने साथ पढ़ी एक सहेली माधुरी के यहां कोलकाता आ गई. दोनों ने 12वीं तक साथ पढ़ाई की थी. उस ने उसे अपनी कहानी बताई और कहा, ‘‘प्लीज, मेरा पता किसी को मत बताना. मुझे कुछ दिनों के लिए पनाह दे, फिर मैं कहीं दूरदराज चली जाऊंगी.’’

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माधुरी अविवाहित थी और नौकरी करती थी. वह बोली, ‘‘तू कहीं नहीं जाएगी. तू जब तक चाहे यहां रह सकती है. तू तो जानती ही है कि इस दुनिया में मेरा अपना निकटसंबंधी कोई नहीं है. तू यहीं रह, तू मां बनेगी और मैं मौसी.’’

वहीं दुर्गा ने एक बालक को जन्म दिया. उस ने वहीं रह कर इग्नू से 2 साल का मास्टर इन वैदिक स्टडीज का कोर्स किया. इसी बीच, उस ने झारखंड में धनबाद के निकट काको मठ और महाराष्ट्र में नासिक के निकट वेद पाठशालाओं में वहां के संतों व गुरुजनों से भी वेद पर विशेष चर्चा कर वेद के बारे में अपना ज्ञान बढ़ाया. माधुरी ने उस से कहा, ‘‘तुम वेदों को इतना महत्त्व क्यों दे रही हो? मैं ने तो सुना है कि वेद स्त्रियों के लिए

नहीं हैं.’’ दुर्गा बोली, ‘‘तू उस की छोड़, क्लासिकल भाषाओं के अच्छे जानकारों की जरूरत हमेशा रहेगी. हर युग

में उन्हें नए ढंग से पढ़ा और समझा जाता है.’’ जब तक दुर्गा माधुरी के साथ रही, उस ने दुर्गा की आर्थिक सहायता भी की. कुछ पैसे दुर्गा ट्यूशन पढ़ा कर भी कमा लेती थी. इस बीच, दुर्गा का बेटा शलभ 2 साल का हो चुका था. तभी जरमनी से संस्कृत टीचर के लिए उस का बुलावा आ गया.

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केलिकुंचिका : भाग 1

दीनानाथजी बालकनी में बैठे चाय पी रहे थे. वे 5वीं मंजिल के अपने अपार्टमैंट में रोज शाम को इसी समय चाय पीते और नीचे बच्चों को खेलते देखा करते थे. उन की पत्नी भी अकसर उन के साथ बैठ कर चाय पिया करती थीं. पर अभी वे किचन में महरी से कुछ काम करा रही थीं. तभी बगल में स्टूल पर रखा उन का मोबाइल फोन बजा. उन्होंने देखा कि उन की बड़ी बेटी अमोलिका का फोन था. दीनानाथ बोले, ‘‘हां बेटा, बोलो, क्या हाल है?’’

अमोलिका बोली, ‘‘ठीक हूं पापा. आप कैसे हैं? मम्मी से बात करनी है.’’ ‘‘मैं ठीक हूं बेटा. एक मिनट होल्ड करना, मम्मी को बुलाता हूं,’’ कह कर उन्होंने पत्नी को बुलाया.

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उन की पत्नी बोलीं, ‘‘अमोल बेटा, कैसी तबीयत है तेरी? अभी तो डिलीवरी में एक महीना बाकी है न?’’ ‘‘वह तो है, पर डाक्टर ने कहा है कि कुछ कौंप्लिकेशन है, बैडरैस्ट करना है. तुम तो जानती हो जतिन ने लवमैरिज की है मुझ से अपने मातापिता की मरजी के खिलाफ. ससुराल से किसी प्रकार की सहायता नहीं मिलने वाली है. तुम 2-3 महीने के लिए यहां आ जातीं, तो बड़ा सहारा मिलता.’’

‘‘मैं समझ सकती हूं बेटा, पर तेरे पापा दिल के मरीज हैं. एक हार्टअटैक झेल चुके हैं. ऐसे में उन्हें अकेला छोड़ना ठीक नहीं होगा.’’ ‘‘तो तुम दुर्गा को भेज सकती हो न? उस के फाइनल एग्जाम्स भी हो चुके हैं.’’

‘‘ठीक है. मैं उस से पूछ कर तुम्हें फोन करती हूं. अभी वह घर पर नहीं है.’’

दुर्गा अमोलिका की छोटी बहन थी. वह संस्कृत में एमए कर रही थी. अमोलिका की शादी एक माइनिंग इंजीनियर जतिन से हुई थी. उस की पोस्ंिटग झारखंड और ओडिशा के बौर्डर पर मेघाताबुरू में एक लोहे की खदान में थी. वह खदान जंगल और पहाड़ों के बीच में थी, हालांकि वहां सारी सुविधाएं थीं. बड़ा सा बंगला, नौकरचाकर, जीप आदि. कंपनी का एक अस्पताल भी था जहां सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध थीं. फिर भी अमोलिका को बैडरैस्ट के चलते कोई अपना, जो चौबीसों घंटे उस के साथ रहे, चाहिए था. अमोलिका के मातापिता ने छोटी बेटी दुर्गा से इस बारे में बात की. दुर्गा बोली कि ऐसे में दीदी का अकेले रहना ठीक नहीं है. वह अमोलिका के यहां जाने को तैयार हो गई. उस के जीजा जतिन खुद आ कर उसे मेघाताबुरू ले गए.

दुर्गा के वहां पहुंचने के 2 हफ्ते बाद ही अमोलिका को पेट दर्द हुआ. उसे अस्पताल ले जाया गया. डाक्टर ने उसे भरती होने की सलाह दी और कहा कि किसी भी समय डिलीवरी हो सकती है. अमोलिका ने भरती होने के तीसरे दिन एक बेटे को जन्म दिया. पर बेटे को जौंडिस हो गया था, डाक्टर ने बच्चे को एक सप्ताह तक अस्पताल में रखने की सलाह दी. जतिन और दुर्गा प्रतिदिन विजिटिंग आवर्स में अस्पताल आते और खानेपीने का सामान दे जाते थे. एक दिन जतिन ने जीप को कुछ जरूरी सामान, दवा आदि लेने के लिए शहर भेज दिया था. दुर्गा मोटरसाइकिल पर ही उस के साथ अस्पताल आई थी. उस दिन मौसम खराब था. अस्पताल से लौटते समय बारिश होने लगी. दोनों बुरी तरह भीग गए थे. दुर्गा मोटरसाइकिल से उतर कर गेट का ताला खोल रही थी. उस के गीले कपड़े उस के बदन से चिपके हुए थे जिस के चलते उस के अंगों की रेखाएं स्पष्ट झलक रही थीं. जतिन के मन में तरंगें उठने लगी थीं.

ताला खुलने पर दोनों अंदर गए. बिजली गुल थी. दुर्गा सीधे बाथरूम में गीले कपड़े बदलने चली गई. इस बात से अनजान जतिन तौलिया लेने के लिए बाथरूम में गया. वह रैक पर से तौलिया उठाना चाहता था. दुर्गा साड़ी खोल कर पेटीकोट व ब्लाउज में थी. उस ने नहाने की सोच कर हैंडशावर हाथ में ले रखा था. उस ने दरवाजा थोड़ा खुला छोड़ दिया था ताकि कुछ रोशनी अंदर आ सके. अचानक किसी की उपस्थिति महसूस होने पर उस ने पूछा, ‘‘अरे आप, जीजू, अभी क्यों आए? निकलिए, मैं बंद कर लेती हूं.’’ इतना कह कर उस ने खेलखेल में हैंडशावर से जतिन को गीला कर दिया. जतिन बोलता रहा, ‘‘यह क्या कर रही हो? मुझे पता नहीं था कि तुम अंदर हो़’’

‘‘मुझे भी पता नहीं, अंधेरे में पानी किधर जा रहा है,’’ और वह हंसने लगी. ‘‘रुको, मैं बताता हूं पानी किधर छोड़ा है तुम ने. यह रहा मैं और यह रही तुम,’’ इतना बोल कर जतिन ने उसे बांहों में भर लिया. दुर्गा को भी लगा कि उस का गीला बदन तप रहा है.

‘‘क्या कर रहे हैं आप? छोडि़ए मुझे.’’ ‘‘अभी कहां कुछ किया है मैं ने?’’

दुर्गा को अपने भुजबंधन में लिए हुए ही एक चुंबन उस के होंठों पर जड़ दिया जतिन ने. इस के बाद तपिश खत्म होने पर ही अलग हुए वे दोनों. दुर्गा बोली, ‘‘जो भी हुआ, वह हरगिज नहीं होना चाहिए था. क्षणिक आवेश में आ कर हम दोनों ने अपनी सीमाएं तोड़ डालीं. जरा सोचिए, दीदी को जब कभी यह बात मालूम होगी तो उस पर क्या गुजरेगी.’’

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जतिन बोला, ‘‘अब जाने दो, जो हुआ सो हुआ. उसे बदला तो नहीं जा सकता. ठीक तो मैं भी नहीं समझता हूं, पर बेहतर होगा अमोलिका को इस बारे में कुछ भी पता न चले.’’

इस घटना के एक सप्ताह बाद अमोलिका भी अस्पताल से घर आई. उस का बेटा बंटी ठीक हो गया था. घर में सभी खुश थे. दुर्गा भी मौसी बन कर प्रसन्न थी. वह अपनी दीदी और भतीजे की देखभाल अच्छी तरह कर रही थी. जतिन ने शानदार पार्टी दी थी. अमोलिका के मातापिता भी आए थे. एक सप्ताह रह कर वे लौट गए. लगभग 2 महीने तक सबकुछ सामान्य रहा. दुर्गा की तबीयत ठीक नहीं रह रही थी. अमोलिका ने जतिन से कहा, ‘‘इसे थोड़ा डाक्टर को दिखा लाओ.’’

दुर्गा को अपने अंदर कुछ बदलाव महसूस होने लगा था. पीरियड मिस होने से वह अंदर से डरी हुई थी. जतिन दुर्गा को ले कर अस्पताल गया. वहां लेडी डाक्टर ने चैक कर कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है, सबकुछ नौर्मल है. दुर्गा मां बनने वाली है. जतिन और दुर्गा एकदूसरे को आश्चर्य से देख रहे थे. पर डाक्टर के सामने बनावटी मुसकराहट दिखाते रहे ताकि डाक्टर को सबकुछ नौर्मल लगे.

छोटे से माइनिंग वाले शहर में सभी अफसर एकदूसरे को अच्छी तरह जानतेपहचानते थे. थोड़ी ही देर में डाक्टर ने अमोलिका को फोन कर कहा, ‘‘मुबारक हो, शाम को मैं आ रही हूं, मिठाई खिलाना.’’ ‘‘श्योर, दरअसल हम लोगों ने जिस दिन पार्टी दी थी आप छुट्टी ले कर बाहर गई थीं.’’

‘‘वह तो ठीक है, मैं तुम्हारी मौसी बनने की खुशी में मिठाई मांग रही हूं. ठीक है, शाम को डबल मिठाई खा लूंगी.’’ डाक्टर से बात करने के बाद अमोलिका के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगीं. उस के मन में संदेह हुआ क्योंकि दुर्गा और जतिन के अलावा घर में तीसरा और कोई नहीं था, कहीं यह बच्चा जतिन का न हो. उसे अपनी बहन पर क्रोध आ रहा था. साथ ही, उसे नफरत भी हो रही थी.

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