मैत्री ने अपने बेटे की मृत्यु की दुखभरी त्रासदी फेसबुक पर पोस्ट कर दी, अपनी तकलीफ और जीवन गुजारने की यथास्थिति भी लिख दी.
उमंग ने पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी, ‘जो कुछ आप के जीवन में घटित हुआ, उस के प्रति संवेदना प्रकट करने में शब्दकोश छोटा पड़ जाएगा. जीवन कहीं नहीं रुका है, कभी नहीं रुकता है. हर मनुष्य का जीवन केवल एक बार और अंतिम बार रुकता है, केवल खुद की मौत पर.’
इसी तरह की अनेक पोस्ट लगातार आती रहतीं, मैत्री के ठहरे हुए जीवन में कुछ हलचल होने लगी.
एक बार उमंग ने हृदयरोग के एक अस्पताल की दीवारों के चित्र पोस्ट किए जहां दिल के चित्र के पास लिखा था, ‘हंसोहंसो, दिल की बीमारियों में कभी न फंसो.’
ये भी पढ़ें- तलाक : जाहिरा को शादाब ने क्यों छोड़ दिया
एक दिन उमंग ने लिखा, ‘मैडम, जीवनभर सुवास की याद में आंसू बहाने से कुछ नहीं मिलेगा. अच्छा यह है कि गरीब, जरूरतमंद और अनाथ बच्चों के लिए कोई काम हाथ में लिया जाए. खुद का समय भी निकल जाएगा और संतोष भी मिलेगा.’
यह सुझाव मैत्री को बहुत अच्छा लगा. नकुल से जब उस ने इस बारे में चर्चा की तो उस ने भी उत्साह व रुचि दिखाई.
जब मैत्री का सकारात्मक संकेत मिला तो उमंग ने उसे बताया कि वे खुद सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग, प्रधान कार्यालय, जयपुर में बड़े अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं. वे उस की हर तरह से मदद करेंगे.
उमंग ने पालनहार योजना, मूकबधिर विद्यालय, विकलांगता विद्यालय, मंदबुद्धि छात्रगृह आदि योजनाओं का साहित्य ईमेल कर दिया. साथ ही, यह भी मार्गदर्शन कर दिया कि किस तरह एनजीओ बना कर सरकारी संस्थाओं से आर्थिक सहयोग ले कर ऐसे संस्थान का संचालन किया जा सकता है.
उमंग ने बताया कि सुवास की स्मृति को कैसे यादगार बनाया जा सकता है. एक पंफ्लेट सुवास की स्मृति में छपवा कर अपना मंतव्य स्पष्ट किया जाए कि एनजीओ का मकसद निस्वार्थ भाव से कमजोर, गरीब, लाचार बच्चों को शिक्षित करने का है.
उमंग से मैत्री को सारा मार्गदर्शन फोन और सोशल मीडिया पर मिल रहा था. वे लगातार मैत्री को उत्साहित कर रहे थे.
मैत्री ने अपनी एक टीम बनाई, एनजीओ बनाया. मैत्री की निस्वार्थ भावना को देखते हुए उसे आर्थिक सहायता भी मिलती गई. उमंग के सहयोग से सरकारी अनुदान भी जल्दी ही मिलने लगा.
शहर में खुल गया विकलांग बच्चों के लिए एक अच्छा विद्यालय. मैत्री को इस काम में बहुत संतोष महसूस होने लगा. उस की व्यस्तता भी बढ़ गई. हर निस्वार्थ सेवा में उसे खुशी मिलने लगी. किसी का सहारा बनने में कितना सुख मिलता है, मैत्री को उस का एहसास हो रहा था. मैत्री पिछले 5 वर्षों से विकलांग विद्यालय को कामयाबी के साथ चला रही थी.
उमंग के लगातार सहयोग और मार्गदर्शन से विकलांग छात्र विद्यालय दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा था.
अभी तक कोई ऐसा मौका नहीं आया जब मैत्री की उमंग से आमनेसामने मुलाकात हुई हो. मैत्री मन ही मन उमंग के प्रति एहसानमंद होने का अनुभव करती थी.
कुछ दिनों से उमंग से उस की बात हो रही थी. संदर्भ था विद्यालय का 5वां स्थापना दिवस समारोहपूर्वक मनाने का. मैत्री चाहती थी उक्त आयोजन में सामाजिक न्याय विभाग के निदेशक, विभाग के मंत्री तथा जयपुर के प्रख्यात समाजसेवी मुख्य अतिथियों के रूप में मौजूद रहें. इस काम के लिए भी उमंग के सहयोग की मौखिक स्वीकृति मिल गई थी. औपचारिक रूप से संस्था प्रधान के रूप में मैत्री को निमंत्रण देने हेतु खुद को जयपुर जाना पड़ रहा है. कल सवेरे ही उमंग ने मैत्री से कहा था, ‘जयपुर आ जाइए, सारी व्यवस्था हो जाएगी.’
5 वर्षों से जिस व्यक्ति से फेसबुक पर संपर्क है, वह किसी सरकारी विभाग के जिम्मेदार अधिकारी के रूप में कार्य कर रहा है. और पगपग पर उस का सहयोग कर रहा है, उस का शिष्टाचारवश भी अतिथि को ठहराने का दायित्व तो बनता ही है.
ये भी पढ़ें- पिंजरे वाली मुनिया : बेटी के सपनों को पूरा करने की कहानी
इसी बात पर आज सवेरे नकुल भड़क गया था. कहा था कि फेसबुकिया मित्र के यहां कहां ठहरोगी. मैत्री इतना तो समझती है कि सामान्य शिष्टाचार और आग्रह में अंतर होता है. सो, उस ने यही कहा था कि यह एक मित्र का आत्मीय आग्रह भी हो सकता है.
मैत्री खुद समझदार है, इतना तो जानती है कि महानगर कल्चर में किसी के घर रुक कर उस को परेशानी में डालना ठीक नहीं होता.
मैत्री का मन नकुल की छोटी सोच तथा स्त्रियों के प्रति जो धारणा उस ने प्रकट की, उस को ले कर खट्टा हुआ था. अपने ठहरने के विषय में तो विनम्रतापूर्वक उमंग को मना कर ही चुकी थी. बिना पूरी बात सुने नकुल का भड़कना तथा उमंग के लिए गलत धारणा बना लेना उसे सही नहीं लगता था.
रेलगाड़ी आखिरकार गंतव्य स्टेशन पर पहुंच कर रुक गई और मैत्री की विचारशृंखला टूटी. वह टैक्सी कर स्टेशन से सीधे पति नकुल के बताए गैस्टहाउस में जा ठहरी.
पोलो विक्ट्री के नजदीकी गैस्टहाउस में नहाधो कर, तैयार हो कर मैत्री अब उमंग के कार्यालय में पहुंच गई. आगे के निमंत्रण इत्यादि उमंग खुद साथ रह कर मंत्रीजी तथा निदेशक महोदय आदि को दिलवाएंगे.
प्रधान कार्यालय के एक कक्ष के बाहर तख्ती लगी थी, उपनिदेशक, उमंग कुमार. कक्ष के भीतर प्रवेश करते ही हतप्रभ होने की बारी मैत्री की थी. यू के खुद दोनों पांवों से विकलांग हैं तथा दोनों बैसाखियां उन की घूमती हुई कुरसी के पास पड़ी हैं.
उमंग ने उत्साहपूर्वक अभिवादन करते हुए मैत्री को कुरसी पर बैठने को कहा.
ये भी पढ़ें- दूसरा भगवान : डाक्टर रंजन को खाली करना पड़ा क्लिनिक
मैत्री को क्षणभर के लिए लगा कि उस का मस्तिष्क भी रिवौल्ंिवग कुरसी की तरह घूम रहा है. 5 वर्ष की फेसबुकिया मित्रता में उमंग ने कभी यह नहीं बताया कि वे विकलांग हैं. उन की फोटो प्रोफाइल में एक भी चित्र ऐसा नहीं है जिस से उन के विकलांग होने का पता चले. क्षणभर के लिए मैत्री को लगा कि फेसबुकिया मित्रों पर नकुल की टिप्पणी सही हो रही है. मैत्री की तन्मयता भंग हुई. उमंग प्रसन्नतापूर्वक बातें करते हुए उसे सभी वीआईपी के पास ले गए. कमोबेश सारी औपचारिकताएं पूरी हो गईं. सभी ने मैत्री के निस्वार्थ कार्य की प्रशंसा की तथा उस के वार्षिक कार्यक्रम में शतप्रतिशत उपस्थित रहने का आश्वासन भी दिया.
माता-पिता दोनों सुवास के साथ गए. कोटा में सप्ताहभर रुक कर अच्छे कोचिंग सैंटर की फीस भर कर बेटे को दाखिला दिलवाया. अच्छे होस्टल में उस के रहने-खाने की व्यवस्था की गई. पतिपत्नी ने बेटे को कोई तकलीफ न हो, सो, एक बैंक खाते का एटीएम कार्ड भी उसे दे दिया.
बेटे सुवास को छोड़ कर जब वे वापस लौट रहे थे तो दोनों का मन भारी था. मैत्री की आंखें भी भर आईं. जब सुवास साथ था, तो उस के कितने बड़ेबड़े सपने थे. जितने बड़े सपने उतनी बड़ी बातें. पूरी यात्रा उस की बातों में कितनी सहज हो गई थी.
ये भी पढ़ें- जिंदगी बदगुमां नहीं : जिंदगी भी अजब रंग दिखाती है
नकुल और मैत्री का दर्द तो एक ही था, बेटे से बिछुड़ने का दर्द, जिस के लिए वे मानसिक रूप से तैयार नहीं थे. फिर भी नकुल ने सामान्य होने का अभिनय करते हुए मैत्री को समझाया था, ‘देखो मैत्री, कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. बच्चों को योग्य बनाना हो तो मांबाप को यह दर्द सहना ही पड़ता है. इस दर्द को सहने के लिए हमें पक्षियों का जीवन समझना पड़ेगा.
‘जिस दिन पक्षियों के बच्चे उड़ना सीख जाते हैं, बिना किसी देर के उड़ जाते हैं. फिर लौट कर नहीं आते. मनुष्यों में कम से कम यह तो संतोष की बात है कि उड़ना सीख कर भी बच्चे मांबाप के पास आते हैं, आ सकते हैं.’
मैत्री ने भी अपने मन को समझाया. कुछ खो कर कुछ पाना है. आखिर सुवास को जीवन में कुछ बन कर दिखाना है तो उसे कुछ दर्द तो बरदाश्त करना ही पड़ेगा.
कमोबेश मातापिता हर शाम फोन पर सुवास की खबर ले लिया करते थे. सुवास के खाने को ले कर दोनों चिंतित रहते. मैस और होटल का खाना कितना भी अच्छा क्यों न हो, घर के खाने की बराबरी तो नहीं कर सकता और वह संतुष्टि भी नहीं मिलती.
पतिपत्नी दोनों ही माह में एक बार कोटा शहर चले जाते थे. कोटा की हर गली में कुकुरमुत्तों की तरह होस्टल, मैस, ढाबे और कोचिंग सैंटरों की भरमार है. हर रास्ते पर किशोर उम्र के लड़के और लड़कियां सपनों को अरमान की तरह पीठ पर किताबों के नोट्स का बोझ उठाए घूमतेफिरते, चहचहाते, बतियाते दिख जाते.
जगहजगह कामयाब छात्रों के बड़ेबड़े होर्डिंग कोचिंग सैंटर का प्रचार करते दिखाई पड़ते. उन बच्चों का हिसाब किसी के पास नहीं था जो संख्या में 95 प्रतिशत थे और कामयाब नहीं हो पाए थे.
टैलीफोन पर बात करते हुए मैत्री अपने बेटे सुवास से हर छोटीछोटी बात पूछती रहती. दिनमहीने गुजरते गए. सावन का महीना आ गया. चारों तरफ बरसात की झमाझम और हरियाली का सुहावना दृश्य धरती पर छा गया.
ऐसे मौसम में सुवास मां से पकौड़े बनवाया करता. मैत्री का बहुत
मन हो रहा था अपने बेटे को पकौड़े खिलाने का. शाम को उस के पति नकुल ने भी जब पकौड़े बनाने की मांग की तो मैत्री ने कह दिया, ‘बच्चा तो यहां है नहीं. उस के बगैर उस की पसंद की चीज खाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है.’ तब नकुल ने भी उस की बात मान ली थी.
मैत्री की स्मृतिशृंखला का तारतम्य टूटा, क्योंकि रेलगाड़ी को शायद सिगनल नहीं मिला था और वह स्टेशन से बहुत दूर कहीं अंधेरे में खड़ी हो गई थी.
ऐसा ही कोई दिन उगा था जब बरसात रातभर अपना कहर बरपा कर खामोश हुई थी. नदीनाले उफान पर थे. अचानक घबराया हुआ रोंआसा नकुल घर आया. साथ में दफ्तर के कई फ्रैंड्स और अड़ोसीपड़ोसी भी इकट्ठा होने लगे.
मैत्री कुछ समझ नहीं पा रही थी. चारों तरफ उदास चेहरों पर खामोशी पसरी थी. घर से दूर बाहर कहीं कोई बतिया रहा था. उस के शब्द मैत्री के कानों में पड़े तो वह दहाड़ मार कर चीखी और बेहोश हो गई.
कोई बता रहा था, कोटा में सुवास अपने मित्रों के साथ किसी जलप्रपात पर पिकनिक मनाने गया था. वहां तेज बहाव में पांव फिसल गया और पानी में डूबने से उस की मृत्यु हो गई है.
हंसतेखेलते किशोर उम्र के एकलौते बेटे की लाश जब घर आई, मातापिता दोनों का बुरा हाल था. मैत्री को लगा, उस की आंखों के आगे घनघोर अंधेरा छा रहा है, जैसे किसी ने ऊंचे पर्वत की चोटी पर से उसे धक्का दे दिया हो और वह गहरी खाई में जा गिरी हो.
ये भी पढ़ें- किसना : जिस्म बेचकर बना दी बेटी की जिंदगी
मैत्री की फुलवारी उजड़ गई. बगिया थी पर सुवास चली गई. यह सदमा इतना गहरा था कि वह कौमा में चली गई. लगभग 15 दिनों तक बेहोशी की हालत में अस्पताल में भरती रही.
रिश्तेदारों की अपनी समयसीमा थी. कहते हैं कंधा देने वाला श्मशान तक कंधा देता है, शव के साथ वह जलने से रहा.
सुवास की मौत को लगभग 3 माह हो गए पर अभी तक मैत्री सामान्य नहीं हो पाई. घर के भीतर मातमी सन्नाटा छाया था. नकुल का समय तो दफ्तर में कट जाता. यों तो वह भी कम दुखी नहीं था पर उसे लगता था जो चीज जानी थी वह जा चुकी है. कितना भी करो, सुवास वापस कभी लौट कर नहीं आएगा. अब तो किसी भी तरह मैत्री के जीवन को पटरी पर लाना उस की प्राथमिकता है.
इसी क्रम में उस को सूझा कि अकेले आदमी के लिए मोबाइल बिजी रहने व समय गुजारने का बहुत बड़ा साधन हो सकता है. एक दिन नकुल ने एक अच्छा मोबाइल ला कर मैत्री को दे दिया.
पहले मैत्री ने कोई रुचि नहीं दिखाई, लेकिन नकुल को यकीन था कि यह एक ऐसा यंत्र है जिस की एक बार सनक चढ़ने पर आदमी इस को छोड़ता नहीं है. उस ने बड़ी मानमनुहार कर उस को समझाया. इस में दोस्तों का एक बहुत बड़ा संसार है जहां आदमी कभी अकेला महसूस नहीं करता बल्कि अपनी रुचि के लोगों से जुड़ने पर खुशी मिलती है.
नकुल के बारबार अपील करने? और यह कहने पर कि फौरीतौर पर देख लो, अच्छा न लगे, तो एकतरफ पटक देना, मैत्री ने गरदन हिला दी. तब नकुल ने सारे फंक्शंस फेसबुक, व्हाट्सऐप, हाइक व गूगल सर्च का शुरुआती परिचय उसे दे दिया.
कुछ दिनों तक तो मोबाइल वैसे ही पड़ा रहा. धीरेधीरे मैत्री को लगने लगा कि नकुल बड़ा मन कर के लाया है, उस का मान रखने के लिए ही इस का इस्तेमाल किया जाए.
एक बार मैत्री ने मोबाइल को इस्तेमाल में क्या लिया कि वह इतनी ऐक्सपर्ट होती चली गई कि उस की उंगलियां अब मोबाइल पर हर समय थिरकती रहतीं.
फेसबुक के मित्रता संसार में एक दिन उस का परिचय उमंग कुमार यानी मिस्टर यू के से होता है.
अकसर मैत्री अपने दिवंगत बेटे सुवास को ले कर कुछ न कुछ पोस्ट करती रहती थी. फीलिंग सैड, फीलिंग अनहैप्पी, बिगैस्ट मिजरी औफ माय लाइफ आदिआदि.
ये भी पढ़ें- तलाक : जाहिरा को शादाब ने क्यों छोड़ दिया
निराशा के इस अंधकार में आशा की किरण की तरह उमंग के पोस्ट, लेख, टिप्पणियां, सकारात्मक, सारगर्भित, आशावादी दृष्टिकोण से ओतप्रोत हुआ करते थे. नकुल को लगा मैत्री का यह मोबाइलफ्रैंडली उसे सामान्य होने में सहयोग दे रहा है. उस का सोचना सही भी था.
फेसबुक पर उमंग के साथ उस की मित्रता गहरी होती चली गई. मैत्री को एहसास हुआ कि यह एक अजीब संसार है जहां आप से हजारों मील दूर अनजान व्यक्ति भी किस तरह आप के दुख में भागीदार बनता है. इतना ही नहीं, वह कैसे आप का सहायक बन कर समस्याओं का समाधान सुझाता है.
गाड़ी प्लेटफौर्म छोड़ चुकी थी. मैत्री अपने मोबाइल पर इंटरनैट की दुनिया में बिजी हो गई. फेसबुक और उस पर फैले मित्रता के संसार. विचारमग्न हो गई मैत्री. मित्र जिन्हें कभी देखा नहीं, जिन से कभी मिले नहीं, वे सोशल मीडिया के जरिए जीवन में कितने गहरे तक प्रवेश कर गए हैं. फेसबुक पर बने मित्रों में एक हैं उमंग कुमार. सकारात्मक, रचनात्मक, उमंग, उत्साह और जोश से सराबोर. जैसा नाम वैसा गुण. अंगरेजी में कह लीजिए मिस्टर यू के.
मैत्री के फेसबुकिया मित्रों में सब से घनिष्ठ मित्र हैं यू के. मैत्री अपना मोबाइल ले कर विचारों में खो जाती है. कितनी प्यारी, कितनी अलग दुनिया है वह, जहां आप ने जिस को कभी नहीं देखा हो, उस से कभी न मिले हों, वह भी आप का घनिष्ठ मित्र हो सकता है.
ये भी पढ़ें- आस्था : कुंभ में स्नान करने का क्या मिला फल
मैत्री मोबाइल पर उंगलियां थिरकाती हुई याद करती है अतीत को, जब गाड़ी की सीट पर बैठा व्यक्ति यात्रा के दौरान कोई अखबार या पत्रिका पढ़ता नजर आता था. लेकिन आज मोबाइल और इंटरनैट ने कई चीजों को एकसाथ अप्रासंगिक कर दिया, मसलन घड़ी, अखबार, पत्रपत्रिकाएं, यहां तक कि अपने आसपास बैठे या रहने वाले लोगों से भी दूर किसी नई दुनिया में प्रवेश करा दिया. मोबाइल की दुनिया में खोए रहने वाले लोगों के करीबी इस यंत्र से जलने लगे हैं.
अपनी आज की यात्रा की तैयारी करते हुए जब सवेरे मैत्री को उस का पति नकुल समझा रहा था कि जयपुर जा कर वह किस से संपर्क करे, कहां रुकेगी आदि, तब मैत्री ने पति को बताया कि वे कतई चिंता न करें. फेसबुकिया मित्र उमंग का मैसेज आ गया है कि बेफिक्र हो कर जयपुर चली आएं, आगे वे सब संभाल लेंगे.
मैत्री के पति काफी गुस्सा हो गए थे. क्याक्या नहीं कह गए. फेसबुक की मित्रता फेसबुक तक ही सीमित रखनी चाहिए. विशेषकर महिलाओं को कुछ ज्यादा ही सावधानी रखनी चाहिए. झूठे नामों से कई फर्जी अकाउंट फेसबुक पर खुले होते हैं. फेसबुक की हायहैलो फेसबुक तक ही सीमित रखनी चाहिए. महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. भू्रण से ले कर वृद्धावस्था तक. न जाने पुरुष कब, किस रूप में स्त्री को धोखा देदे. जिस व्यक्ति को कभी देखा ही नहीं, उस पर यकीन नहीं करना चाहिए.
मैत्री को लगा कि पति, जिन को वह खुले विचारों का पुरुष समझ रही थी, की आधुनिकता का मुलम्मा उतरने लगा है.
मैत्री ने इतना ही कहा था कि जो व्यक्ति 5 वर्षों से उस की सहायता कर रहा है, जिस के सारे पोस्ट सकारात्मक होते हैं, ऐसे व्यक्ति पर अविश्वास करना जायज नहीं है.
जब पतिपत्नी के बीच बहस बढ़ रही थी तो मैत्री कह उठी थी, ‘मैं कोई दूध पीती बच्ची नहीं हूं. अधेड़ महिला हूं. पढ़ीलिखी हूं, मुझे कौन खा जाएगा? मैं अपनी रक्षा करने में सक्षम हूं.’
नकुल खामोश तो हो गया था पर यह बताना नहीं चूका कि मैत्री के ठहरने की व्यवस्था उन्होंने पोलो विक्ट्री के पास अपने विभाग के गैस्टहाउस में कर दी है.
जब मैत्री ने नहले पर दहला मार दिया कि ज्यादा ही डर लग रहा हो तो वे भी साथ चल सकते हैं, तब नकुल कुछ देर के लिए खामोश हो गया. वह बात को बद?लने की नीयत से बोला, ‘तुम तो बिना वजह नाराज हो गई. मेरा मतलब है सावधानी रखना.’
कहने को तो बात खत्म हो गई पर विचारमंथन चल रहा है. ट्रेन जिस गति से आगे भाग रही है, मैत्री की विचारशृंखला अतीत की ओर भाग रही है.
बारबार अड़चन बनता नकुल का चेहरा बीच में आ रहा है. तमतमाया, तल्ख चेहरा और उस के चेहरे का यह रूप आज मैत्री को भीतर तक झकझोर गया था.
मैत्री नकुल की बात से पूरी तरह सहमत नहीं थी. उस का बात कहने का लहजा मैत्री को भीतर तक झकझोर गया. होने को तो क्या नहीं हो सकता. जो बातें वे पुरुषों के बारे में फेसबुक के संदर्भ में कर रहे थे महिलाओं के बारे में भी हो सकती हैं.
ये भी पढ़ें- दूसरी भूल : अनीता की क्या थी भूल
बात छोटी सी थी, उस ने तो केवल यही कहा था कि फेसबुक मित्र ने उस के जयपुर में ठहरने की व्यवस्था के लिए कहा था. मैत्री ने इस के लिए हामी तो नहीं भरी थी. नकुल का चेहरा कैसा हो गया था, पुरुष की अहंवादी मानसिकता और अधिकारवादी चेष्टा का प्रतीक बन कर.
मैत्री इन विचारों को झटक कर आज की घटना से अलग होने की कोशिश करती है. लगता है गाड़ी सरक कर किसी स्टेशन पर विश्राम कर रही है. प्लेटफौर्म पर रोशनी और चहलपहल है.
लगभग 25-30 वर्ष पहले मैत्री के जीवन की गाड़ी दांपत्य जीवन में प्रवेश कर नकुलरूपी प्लेटफौर्म पर रुकी थी.
मैत्री ने विवाह के बाद महसूस किया कि पुरुष के बगैर स्त्री आधीअधूरी है. दांपत्य जीवन के सुख ने उस को भावविभोर कर दिया. प्यारा सा पति नकुल और शादी के बाद तीसरे स्टेशन के रूप में प्यारा सा मासूम बच्चा आ गया. रेलगाड़ी चलने लगी थी.
नकुल की अच्छीखासी सरकारी नौकरी और मैत्री की गोद में सुंदर, प्यारा मासूम बच्चा. दिन पंख लगा कर उड़ रहे थे. सारसंभाल से बच्चा बड़ा हो रहा है. हर व्यक्ति अपनी यात्रा पर चल पड़ता है. एक दिन पता लगता है एकाएक बचपन छिटक कर कहीं अलग हो गया. सांस लेतेलेते पता लगता है कि कीमती यौवन भी जाने कहां पीछा छुड़ा कर चला गया.
देखते ही देखते मैत्री का बेटा सुवास 15 वर्ष का किशोर हो गया. किशोर बच्चों की तरह आकाश में उड़ान भरने के सपने ले कर. एक दिन मातापिता के आगे उस ने मंशा जाहिर कर दी, ‘मेरे सारे फ्रैंड आईआईटी की कोचिंग लेने कोटा जा रहे हैं. मैं भी उन के साथ कोटा जाना चाहता हूं. मैं खूब मन लगा कर पढ़ाई करूंगा. आईआईटी ऐंट्रैंस क्वालिफाई करूंगा. फिर किसी के सामने मुझे नौकरी के लिए भीख नहीं मांगनी पड़ेगी. कैंपस से प्लेसमैंट हो जाएगा और भारीभरकम सैलरी पैकेज मिलेगा.’
बेटे सुवास का सोचना कतई गलत नहीं था. इस देश का युवा किशोरमन बेरोजगारी से कितना डरा हुआ है. बच्चे भी इस सत्य को जान गए हैं कि अच्छी नौकरियों में ऊपर का 5 प्रतिशत, शेष 50-60 प्रतिशत मजदूरी कार्य में. जो दोनों के लायक नहीं हैं, वे बेरोजगारों की बढ़ती जमात का हिस्सा हैं.
ये भी पढ़ें- जिंदगी बदगुमां नहीं : जिंदगी भी अजब रंग दिखाती है
पिता की नौकरी बहुत बड़ी तो नहीं, पर छोटी भी नहीं थी. परिवार में कुल जमा 3 प्राणी थे. सो, बेटे की ऐसी सोच देख कर नकुल और मैत्री प्रसन्न हो गए. आननफानन सपनों को पंख लग गए.
(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)
समय बीतता रहा. धीरेधीरे दोनों के प्यार की खुशबू स्कूलकालेज के साथसाथ गांव की गलियों में फैलने लगी. एक कान से दूसरे कान होती हुई यह बात रामप्रसाद के कानों तक पहुंची तो वह सन्न रह गया.
उस ने बेटी को डांटने के बजाए प्यार से समझाया, ‘‘सुलेखा, जब तक तेरा बचपन रहा, मैं ने तुझ पर कोई पाबंदी नहीं लगाई. लेकिन अब तू सयानी हो गई है, इसलिए अंकित के साथ चोरीछिपे बतियाना छोड़ दे. तुझे और अंकित को ले कर लोग तरहतरह की बातें करने लगे हैं. इसलिए मेरी इज्जत की खातिर तू उस का साथ छोड़ दे. इसी में हम सब की भलाई है.’’
ये भी पढ़ें- घर में दफ्न 4 लाशें
‘‘पापा, लोग यूं ही बातें बनाते हैं. हमारे बीच कोई गलत संबंध नहीं हैं. मैं अंकित से पढ़ाई के बारे में बातचीत कर लेती हूं.’’ सुलेखा ने झूठ बोला.
रामप्रसाद ने सुलेखा की बातों पर विश्वास कर लिया. इस के बाद कुछ रोज सुलेखा अंकित से कटी रही. हालांकि चोरीछिपे दोनों मोबाइल पर बतिया लेते थे. उस के बाद वह पुराने ढर्रे पर आ गई.
एक दिन सुलेखा घर में अकेली थी, तभी अंकित आ गया. उसे देखते ही सुलेखा चहक उठी. सूना घर देख कर अंकित ने उसे अपने आगोश में भर लिया, ‘‘लगता है, तुझे मेरा ही इंतजार था.’’
‘‘क्यों, तुम्हें मेरा इंतजार नहीं रहता क्या?’’ सुलेखा ने आंखें नचाते हुए कहा, ‘‘छोड़ो मुझे, दरवाजा खुला है.’’
अंकित को लगा मौका अच्छा है. सुलेखा भी मूड में थी. उस ने फौरन दरवाजा बंद किया और लौट कर जैसे ही सुलेखा का हाथ पकड़ा, वह अमरबेल की तरह उस से लिपट गई. फिर दोनों सुधबुध खो बैठे.
अवैध संबंधों का सिलसिला इसी तरह चलता रहा. लेकिन यह रिश्ता कब तक छिपा रहता. एक दिन सुलेखा की मां सीता अपनी बड़ी बेटी बरखा के साथ पड़ोसी के घर गई थी. कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम था. एकांत मिलते ही दोनों एकदूसरे की बांहों में समा गए. उसी समय अचानक सीता आ गई.
सुलेखा और अंकित को आलिंगनबद्ध देख कर सीता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. अंकित को खरीखोटी सुनाते हुए वह उसे थप्पड़ जड़ कर बोली, ‘‘आस्तीन के सांप, मैं ने तुझे बेटा समझा था. तुझ पर भरोसा किया था, लेकिन तूने मेरी ही इज्जत पर डाका डाल दिया.’’
अंकित सिर झुकाए वहां से चला गया तो सीता सुलेखा पर टूट पड़ी. उसे लातघूंसों से मारते हुए बोली, ‘‘आज के बाद अगर तू कभी अंकित से मिली तो मुझ से बुरा कोई न होगा.’’
सीता देवी ने सुलेखा के गलत राह पर जाने की जानकारी पति रामप्रसाद व बेटे सनी कुमार को दी तो उन दोनों ने सुलेखा को मारापीटा तथा घर से बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी.
जब पाबंदियां सुलेखा को बेचैन करने लगीं तब उस ने अंकित की चचेरी बहन आरती का सहारा लिया. चूंकि आरती सुलेखा की सहेली थी, सो वह उस की मदद को राजी हो गई. आरती अपने फोन पर अंकित और सुलेखा की बात कराने लगी. मां या बहन बरखा जब कभी सुलेखा का फोन चैक करतीं तो पता चलता कि फोन पर आरती से बात हुई थी.
सुलेखा का चाचा राजीव उर्फ राजी गांव का दबंग आदमी था. जब उसे पता चला कि उस की भतीजी सुलेखा गैरजाति के लड़के अंकित के प्यार में दीवानी है तो उसे बहुत बुरा लगा. उस ने अंकित और उस के घर वालों से मारपीट की. साथ ही हिदायत दी कि वह सुलेखा से दूर रहे वरना अंजाम ठीक नहीं होगा. राजीव ने सुलेखा को भी प्रताडि़त किया तथा उस पर पाबंदी बढ़ा दी.
अंकित और सुलेखा प्यार के उस मुकाम पर पहुंच चुके थे, जहां से वापस लौटना नामुमकिन था. पाबंदी के बावजूद वे एकदूसरे से मिल लेते थे. ऐसे ही एक रोज जब अंकित की मुलाकात सुलेखा से हुई तो वह बोला, ‘‘सुलेखा, तुम्हारी जुदाई मुझ से बरदाश्त नहीं होती और घर वाले मिलने में बाधक बने हुए हैं. इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम मेरे साथ भाग चलो. हम दोनों कहीं दूर जा कर अपना आशियाना बना लेंगे.’’
ये भी पढ़ें- फिरौती में पति
अंकित की बात सुन कर सुलेखा गंभीर हो गई, ‘‘तुम्हारे साथ भागने से मेरे परिवार की बदनामी होगी. मेरी एक गलती चाचा, पापा और परिवार पर भारी पड़ेगी. मेरी सगी बहन बरखा व चचेरी बहनें भी कुंवारी रह जाएंगी. इस के लिए मजबूर मत करो.’’
‘‘सोच लो सुलेखा, यह हमारी जिंदगी का सवाल है. मैं तुम्हें कुछ वक्त देता हूं. इतना जान लो कि तुम मुझे नहीं मिली तो मैं कुछ भी कर गुजरूंगा.’’ अंकित ने कहा और चला गया.
पर इस के पहले कि सुलेखा कुछ निर्णय कर पाती, मार्च के अंतिम सप्ताह में देश में लौकडाउन की घोषणा हो गई. ऐसी स्थिति में घर से भागना खतरे से खाली न था, अत: अंकित ने इंतजार करना ही उचित समझा.
इधर न जाने कैसे सुलेखा के चाचा राजीव उर्फ राजी को यह पता चल गया कि अंकित और सुलेखा घर से भागने की फिराक में हैं.
इस के पहले कि सुलेखा घर से भागे और उस के परिवार पर दाग लगे, राजीव ने दोनों को ही मिटाने की ठान ली. इस के बाद उस ने अपने भाई रामप्रसाद, बेटे सौरभ कुमार और भतीजे सनी के साथ एक योजना बनाई.
योजना के तहत सौरभ ने 30 मार्च, 2020 की शाम 7 बजे सुलेखा के प्रेमी अंकित को फोन कर के अपनी दुकान पर बुलाया. जब अंकित दुकान पर पहुंचा तो वह दुकान बंद कर रहा था.
सौरभ अंकित को सुलेखा के संबंध में कुछ जरूरी बात करने के बहाने गांव के बाहर अपने गेहूं के खेत पर ले गया. वहां राजीव, रामप्रसाद और सनी पहले से घात लगाए बैठे थे. अंकित के पहुंचते ही उन सब ने मिल कर उसे दबोच लिया और मुंह दबा कर मार डाला.
अंकित को मौत की नींद सुलाने के बाद राजीव अपने भतीजे सनी के साथ घर पहुंचा. सुलेखा उस समय अपनी बहन बरखा के साथ बतिया रही थी. उन दोनों ने सुलेखा से बात की और फिर अंकित और सुलेखा को आमनेसामने बैठा कर बात करने और कोई ठोस निर्णय लेने की बात कही.
सुलेखा इस के लिए राजी हो गई. इस के बाद वे उसे बहला कर गेहूं के खेत पर ले आए. सुलेखा ने पूछा, ‘‘अंकित कहां है?’’
‘‘वह वहां पड़ा सो रहा है. उसे जगा कर बात करो.’’ राजीव के होठों पर कुटिल मुसकान तैर रही थी.
चंद कदम चल कर सुलेखा अंकित के पास पहुंची और उसे हिलायाडुलाया, पर वह तो मर चुका था. सुलेखा को समझते देर नहीं लगी कि घर वालों ने उस के प्रेमी अंकित को मार डाला है. अब वे उसे भी नहीं छोडेंगे.
वह बदहवास हालत में घर की ओर भागी. लेकिन अभी वह खेत की मेड़ भी पार नहीं कर पाई थी कि रामप्रसाद और सौरभ ने उसे सामने से घेर लिया, ‘‘भागती कहां है कुलच्छिनी. अब तुझे भी नहीं छोडेंगे.’’
इसी के साथ रामप्रसाद, राजीव, सनी और सौरभ ने मिल कर सुलेखा को जमीन पर पटक दिया. फिर रामप्रसाद ने मुंह दबा कर बेटी की सांसें बंद कर दीं. हत्या करने के बाद उन लोगों ने बारीबारी से दोनों के शव अंकित के ही कुएं में डाल दिए. ऐसा उन्होंने इसलिए किया ताकि लोगों को लगे कि दोनों ने आत्महत्या की है.
इधर जब अंकित देर रात तक घर नहीं लौटा तो उस के घर वालों ने उस की खोज शुरू की. अंकित को खोजते हुए उस की मां दिलीप कुमारी रामप्रसाद के घर गई तो उस ने इलजाम लगाया कि अंकित उस की बेटी को भगा ले गया है.
ये भी पढ़ें- वरदी वाले की बीवी : भाग 1
दिलीप कुमारी ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने की बात कही तो रामप्रसाद अपने बेटे सनी कुमार, भाई राजीव व भतीजे सौरभ के साथ घर से गायब हो गया.
दिलीप कुमारी रिपोर्ट लिखाने गई थी, पर पुलिस ने उस की रिपोर्ट दर्ज नहीं की. 2 अप्रैल, 2020 को घटना का खुलासा तब हुआ जब सुदामा नाम का मजदूर पानी लेने कुएं पर गया. पुलिस ने 8 अप्रैल, 2020 को अभियुक्त राजीव उर्फ राजी, सौरभ कुमार, रामप्रसाद तथा सनी से पूछताछ के बाद इटावा कोर्ट में पेश किया, जहां से चारों को जिला जेल भेज दिया गया.
– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)
थाने में पुलिस ने आरती को प्रताडि़त कर पूछताछ शुरू की. दरअसल पुलिस चाहती थी कि आरती यह स्वीकार कर ले कि प्रेमी युगल की हत्या अंकित के घर वालों ने की है. इस बीच आरती के पिता और भाई थाने पहुंच गए तो उन दोनों को भी जम कर पीटा गया. जब आरती नहीं टूटी तो पुलिस उसे उस के घर छोड़ गई.
आरती एवं उस के घर वालों ने एसएसपी आकाश तोमर से प्रताड़ना की शिकायत की. इस पर एसएसपी ने थानाप्रभारी बलिराज शाही को फटकार लगाई, साथ ही सीओ से भी बात की. उन्होंने कहा कि वह केस को वर्कआउट करें, लेकिन किसी को अनावश्यक प्रताडि़त न करें.
ये भी पढ़ें- वरदी वाले की बीवी : भाग 1
एसएसपी की हिदायत के बाद पुलिस टीम ने जांच आगे बढ़ाते हुए मृतका सुलेखा के पिता, भाई, चाचा और चचेरे भाई पर शिकंजा कस दिया. पुलिस टीम ने उन के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगा दिए. साथ ही उन की टोह के लिए मुखबिरों को भी लगा दिया. यही नहीं, पुलिस ने घर जा कर मृतका सुलेखा की बहन बरखा से भी मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की.
बरखा ने बताया कि पिता, चाचा व भाई सुलेखा को बहलाफुसला कर गेहूं के खेत पर ले गए थे. उस के बाद वह घर वापस नहीं आई.
बरखा के बयान से स्पष्ट हो गया कि सुलेखा व उस के प्रेमी अंकित की हत्या उस के घर वालों ने ही की थी, अत: पुलिस ने सुलेखा के पिता रामप्रसाद, भाई सनी कुमार, चाचा राजीव उर्फ राजी तथा चचेरे भाई सौरभ को गिरफ्तार करने के लिए कई जगह ताबड़तोड़ दबिश डालीं, लेकिन वे लोग पुलिस के हत्थे नहीं चढ़े. हालांकि उन की लोकेशन भरथना के आसपास के गांवों की मिल रही थी.
7 अप्रैल की सुबह करीब 6 बजे पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि इटावा कन्नौज हाइवे पर स्थित झिझुआ मोड़ गेट के पास रामप्रसाद अपने भाई राजीव, बेटे सनी और भतीजे सौरभ के साथ मौजूद है.
यह सूचना मिलते ही पुलिस टीम झिझुआ मोड़ गेट के पास पहुंच गई और घेराबंदी कर चारों को गिरफ्तार कर लिया. उन सभी को थाना भरथना लाया गया.
थाने में उन से सुलेखा और अंकित की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो वे टूट गए. उन चारों से गहन पूछताछ के बाद पता चला कि प्रेमी युगल की हत्या का मास्टरमाइंड सुलेखा का चाचा राजीव उर्फ राजी था. उस ने ही पूरा षडयंत्र रचा था और घर के अन्य लोगों को उकसाया था.
चूंकि हत्यारोपियों ने जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थानाप्रभारी बलिराज शाही ने मृतका के पिता प्रदीप शाक्य की ओर से भादंवि की धारा 302, 120बी के तहत रामप्रसाद, राजीव उर्फ राजी, सनी कुमार तथा सौरभ कुमार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस जांच में नादान प्रेमियों की हत्या की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.
उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना भरथना क्षेत्र में एक गांव है दिवरासई. इसी गांव में रामप्रसाद अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी सीता के अलावा 2 बेटे सनी और मनी तथा 4 बेटियां थीं. जिन में सुलेखा तीसरे नंबर की थी. रामप्रसाद के पास 10 बीघा जमीन थी.
रामप्रसाद का एक अन्य भाई राजीव प्रसाद था, जिसे गांव के लोग राजी कहते थे. दोनों भाइयों के बीच जमीन व मकान का बंटवारा हो चुका था. राजीव दबंग था, पढ़ालिखा भी. किसानी के साथ वह किराने की दुकान भी चलाता था. दुकान पर उस का बेटा सौरभ बैठता था. उस की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.
सुलेखा और बरखा के अलावा सभी बहनों की शादी हो चुकी थी. बरखा 11वीं कक्षा में पढ़ती थी. घर के कामों के साथसाथ वह पढ़ती भी थी.
रामप्रसाद के पड़ोस में प्रदीप कुमार शाक्य का मकान था. उस के परिवार में पत्नी दिलीप कुमारी के अलावा 2 बेटे अमन और अंकित थे. प्रदीप कुमार शाक्य खेतीकिसानी के अलावा गल्ले का व्यवसाय भी करता था. इस से उसे अच्छी कमाई हो जाती थी. उन का 17 वर्षीय बेटा अंकित 11वीं में पढ़ रहा था. पढ़ाई के साथसाथ वह पिता के गल्ले के काम में हाथ बंटाता था.
रामप्रसाद व प्रदीप कुमार हालांकि अलगअलग जातिबिरादरी के थे, लेकिन पड़ोसी होने के नाते दोनों परिवारों में मधुर संबंध थे. एकदूसरे के सुखदुख में बराबर शरीक होते थे. सुलेखा और अंकित हमउम्र थे. बचपन से ही दोनों साथ खेलेबढ़े थे. उन में खूब पटती थी.
दोनों अब जवानी की दहलीज पर कदम रख चुके थे. इसलिए वे साथसाथ खेल तो नहीं पाते थे पर आंखों से एकदूसरे को मूक संदेश देने लगे थे. अंकित की शरारत पर सुलेखा शरमा जाती तो अंकित उसे छूते ही मदहोशी के आलम में पहुंच जाता था. हकीकत यह थी कि सुलेखा उस के दिल की गहराइयों तक समा चुकी थी. वह रातदिन उसी के ख्वाब देखता था.
सुलेखा और अंकित एक ही कालेज में पढ़ते थे. सुलेखा अंकित की चचेरी बहन आरती के साथ कालेज जाती थी. वह उस की प्रिय सहेली थी और उसी की कक्षा में पढ़ती थी. एक दिन सुलेखा कालेज जा रही थी तभी अंकित उसे रास्ते में मिल गया.
अंकित ने इशारे से उसे पेड़ की ओट में बुलाया. दोनों की आंखें चार हुईं और दिल धड़कने लगे. अंकित ने अनायास ही सुलेखा का हाथ थामते हुए कहा, ‘‘सुलेखा, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं. तुम्हारा खूबसूरत चेहरा हर समय मेरी आंखों के सामने घूमता रहता है.’’
सुलेखा नजरें नीची कर के मंदमंद मुसकराती हुई पैर के अंगूठे से मिट्टी खुरचती रही. उस की खामोशी से अंकित को उस के दिल की बात पता चल गई. वह समझ गया कि जो हाल उस का है, वही सुलेखा का भी है.
अंकित ने उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘कुछ तो बोलो, मैं तुम्हारा जवाब सुनने को बेचैन हूं. अगर तुम्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगी तो मुझे डांट दो. लेकिन एक बात जान लो सुलेखा कि अगर तुम ने इनकार किया तो तुम्हारी कसम मैं जान दे दूंगा. तुम्हारे बिना अब मैं जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता.’’
सुलेखा ने आंखें फाड़ कर अंकित को देखा और मुसकराते हुए बोली, ‘‘अंकित, मैं भी तुम्हें उतना ही प्यार करती हूं जितना तुम मुझे करते हो. मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रही थी कि तुम मुझ से यह बात कहो, लेकिन तुम तो निरे बुद्धू हो.’’ अपनी बात कह कर वह घर की तरफ चल दी.
जवाब में अंकित ने कहा, ‘‘सुलेखा, सचमुच मैं बुद्धू हूं, डरपोक हूं. तभी तो सब कुछ जानते हुए भी तुम्हारे सामने नहीं आ पाता था.’’
ये भी पढ़ें- घर में दफ्न 4 लाशें
इस के बाद अंकित और सुलेखा का प्यार परवान चढ़ने लगा. सुलेखा और अंकित घर से कालेज जाने को निकलते लेकिन वे कालेज न जा कर बागबगीचे में बैठ कर प्यारभरी बातें करते. एकदूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ा तो दोनों शारीरिक मिलन के लिए लालायित रहने लगे. और एक दिन उन की यह हसरत भी पूरी हो गई.
(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)
इटावा जिले के दिवरासई गांव का रहने वाला मेवाराम यादव अपनी गेहूं की पकी फसल काट रहा था. साथ में कई मजदूर भी कटाई कर रहे थे. दोपहर करीब 12 बजे प्यास लगी तो मेवाराम ने मजदूर सुदामा को पानी लाने प्रदीप कुमार के कुएं पर भेजा.
सुदामा कुएं पर पहुंचा तो उसे कुएं से बदबू आती महसूस हुई. जिज्ञासावश उस ने कुएं में झांका तो उस के मुंह से चीख निकल गई. कुएं में लाश पड़ी थी.
सुदामा की चीख सुन कर मेवाराम और मजदूर भी कुएं के पास पहुंच गए. इस के बाद तो पूरे गांव में शोर मच गया. यह बात 2 अप्रैल, 2020 की है.
ये भी पढ़ें- घर में दफ्न 4 लाशें
अपने कुएं में लाश पड़ी होने की जानकारी प्रदीप कुमार शाक्य को हुई तो उस का माथा ठनका. क्योंकि उस का 17 वर्षीय बेटा अंकित 30 मार्च की शाम 7 बजे घर से निकला था और वापस नहीं लौटा था. उस ने घर वालों के साथ गांव का कोनाकोना छान मारा था, लेकिन अंकित का कुछ भी पता नहीं चला. वह बेटे की गुमशुदगी दर्ज कराने पुलिस के पास भी गया था लेकिन पुलिस ने उसे टरका दिया था.
प्रदीप के मन में तमाम आशंकाओं के बादल उमड़ने लगे. इन्हीं आशंकाओं के बीच उस ने पत्नी दिलीप कुमारी तथा घर के अन्य लोगों को साथ लिया और खेत पर स्थित अपने कुएं पर जा पहुंचा.
उस समय वहां दरजनों लोग थे, जो कुएं में झांकझांक कर लाश को देख रहे थे. प्रदीप कुमार और उस के घर के अन्य लोगों ने भी कुएं में झांक कर लाश देखी, पर यह सुनिश्चित कर पाना मुश्किल था कि लाश किस की है. इस बीच गांव के चौकीदार ने भरथना थाने में फोन कर यह जानकारी दे दी.
सूचना पाते ही थानाप्रभारी बलिराज शाही पुलिस टीम के साथ दिवरासई गांव स्थित उस कुएं पर पहुंच गए, जहां लाश पड़ी थी. गांव के 2 युवकों सूरज और राजू को कुएं में उतारा गया. दोनों अच्छे तैराक थे. कुएं में उतरते ही सूरज चिल्लाया, ‘‘सर, कुएं में एक नहीं 2 लाशें हैं.’’ यह सुन कर पुलिस के साथसाथ गांव वालों की भी सांसें अटक गईं.
उन युवकों के सहयोग से पुलिस ने रस्सी के सहारे खींच कर दोनों शव कुएं से बाहर निकलवाए. शवों को देख कर वहां मौजूद लोगों ने उन की शिनाख्त कर ली. एक शव प्रदीप कुमार शाक्य के बेटे अंकित का था और दूसरा 16 वर्षीया सुलेखा का, जो गांव के ही रामप्रसाद की बेटी थी.
रामप्रसाद तथा उस के घर का कोई सदस्य वहां मौजूद नहीं था. थानाप्रभारी ने उस के घर सूचना भिजवाई. पर सूचना के बाद भी उस के घर से कोई नहीं आया.
घटनास्थल पर मौजूद प्रदीप कुमार व उस की पत्नी दिलीप कुमारी अपने 17 वर्षीय बेटे अंकित के शव को देख कर दहाड़ें मार कर रो रहे थे. परिवार के अन्य लोगों का भी रोरो कर बुरा हाल था. इसी बीच थानाप्रभारी बलिराज शाही ने कुएं से युवकयुवती के शव मिलने की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. कुछ ही देर में एसएसपी आकाश तोमर तथा सीओ (भरथना) आलोक प्रसाद आ गए.
पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया, फिर मृतक के घर वालों तथा अन्य लोगों से घटना के संबंध में जानकारी जुटाई. जिस से पता चला कि अंकित और सुलेखा एक ही कालेज में पढ़ते थे, दोनों के बीच प्रेम संबंध थे. दोनों के घर वाले इस का विरोध करते थे. 2 दिन पहले ही दोनों देर शाम घर से निकले थे.
जामातलाशी में उन के पास से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला. पुलिस अधिकारियों को यह जान कर आश्चर्य हुआ कि सुलेखा के घर वाले वहां नहीं आए थे. लोगों ने बताया कि मृतका के घर पर केवल महिलाएं हैं. पुरुष फरार हैं. सूचना के बावजूद घर की महिलाएं भी मृतका का शव देखने नहीं आईं, यह बात पुलिस की समझ से बाहर थी.
इस से पुलिस अधिकारियों को लगा कि यह मामला औनर किलिंग का हो सकता है. अंकित की मां दिलीप कुमारी भी चीखचीख कर कह रही थी कि उस के बेटे की हत्या सुलेखा के घर वालों ने की है. हत्या कर के शव कुएं में फेंक दिया ताकि लोग समझें कि दोनों ने आत्महत्या की है.
मामला हत्या का था या आत्महत्या का, यह बात तो पोस्टमार्टम के बाद ही पता चल सकती थी. पुलिस ने अंकित व सुलेखा के शव पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल इटावा भिजवा दिए.
3 अप्रैल, 2020 को 3 डाक्टरों के पैनल ने दोनों शवों का पोस्टमार्टम किया. थानाप्रभारी ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ी तो चौंके. क्योंकि मामला आत्महत्या का नहीं, हत्या का था. उन की मौत पानी में डूबने से नहीं बल्कि दम घुटने से हुई थी. थानाप्रभारी ने यह जानकारी एसएसपी आकाश तोमर को दे दी.
एसएसपी ने प्रेमी युगल हत्याकांड को गंभीरता से लिया और कातिलों को पकड़ने के लिए सीओ आलोक प्रसाद की निगरानी में एक विशेष पुलिस टीम का गठन कर दिया. इस टीम में थानाप्रभारी बलिराज शाही, एसआई अनिल कुमार, महिला सिपाही सरिता सिंह, एसओजी प्रभारी सत्येंद्र सिंह तथा सर्विलांस प्रभारी बेचैन सिंह को शामिल किया गया.
पुलिस टीम ने सब से पहले मृतक अंकित के घर वालों से पूछताछ की. मृतक की मां दिलीप कुमारी ने बताया कि 30 मार्च को 7 बजे अंकित के मोबाइल पर एक काल आई थी. उस ने काल रिसीव कर बात की फिर घर से चला गया. उस के बाद वापस नहीं लौटा. 2 दिन बाद उस की लाश मिली. उस ने अंकित की हत्या का आरोप सुलेखा के घर वालों पर लगाया.
अंकित का मोबाइल घर पर ही था, जिसे वह चार्जिंग पर लगा गया था. पुलिस टीम ने मोबाइल अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस ने जब उस का मोबाइल खंगाला तो पता चला कि उस के मोबाइल पर अंतिम काल 30 मार्च की शाम 7 बजे आई थी. पुलिस ने उस नंबर की जानकारी जुटाई तो पता चला वह नंबर सुलेखा के चचेरे भाई सौरभ का है. पर सौरभ सहित घर के अन्य सदस्य फरार थे.
पुलिस टीम सुलेखा के घर पहुंची तो उस की मां सीता देवी और बहनें फूटफूट कर रोने लगीं. उन्होंने बताया कि सुलेखा की हत्या अंकित के घर वालों ने की है. घर के पुरुष बदनामी और पुलिस के डर से फरार हो गए हैं.
सीता देवी ने यह बात स्वीकार की कि सुलेखा अंकित से प्यार करती थी और परिवार के लोग विरोध करते थे. सुलेखा का मोबाइल फोन भी घर पर ही था. पुलिस ने उस का मोबाइल अपने पास सुरक्षित रख लिया.
प्रेमी युगल की हत्या का इलजाम दोनों परिवार एकदूसरे पर लगा रहे थे. पुलिस परेशान थी कि आखिर अंकित और सुलेखा का कातिल कौन सा परिवार है. इस का पता लगाने के लिए पुलिस ने सुलेखा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला कि सुलेखा 2 नंबरों पर दिन में कईकई बार बात करती थी. इन में एक नंबर अंकित का था और दूसरा अंकित की चचेरी बहन आरती का था, जो उस की सहेली थी और उस के साथ ही पढ़ती थी. पुलिस को लगा कि आरती से सच्चाई पता चल सकती है.
ये भी पढ़ें- वरदी वाले की बीवी : भाग 1
4 अप्रैल की रात 11 बजे पुलिस टीम अंकित के चाचा रामकुमार के घर पहुंची और पूछताछ के बहाने उस की बेटी आरती को जीप में बिठा लिया. घर वालों ने रात में बेटी को थाने ले जाने का विरोध किया तो पुलिस ने कहा कि उस से कुछ पूछताछ करनी है.
शिशिर ने सोचा था राम उस की गरीबी दूर करेगा, पैसे कमा कर अमेरिका से भेजेगा, बुढ़ापे की लाठी बनेगा. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. उलटे, उसे फोन पर बेटे से धमकियां मिलतीं, ‘पापा, इस मकान को बेच दो. मैं तुम्हें नई कालोनी में बढि़या प्लैट खरीद दूंगा. मेरा हिस्सा मुझे दे दो वरना…’ ‘नहीं, मैं यहीं ठीक हूं.’
मुन्ना ने समझाया, ‘यह बेवकूफी हरगिज न करना. तेरे सिर पर से छत भी जाएगी और तू सड़क पर
आ जाएगा.’ राम के इस व्यवहार से सब का मन दुखी होता, पर आखिर विकल्प क्या था?
ऐसे दुख की घड़ी में शिशिर को पदम की बड़ी याद आती. काश, वह यहां होता. कितना स्वार्थी था शिशिर जो शिखंडी बेटे के जाने के बाद उस की सुध भी न ली. आज आत्मग्लानि से वह बेटे का सामना नहीं कर पा रहा है. क्या हुआ इन 20-22 बरसों में जानने की उत्कंठा तो थी परंतु जबान जैसे तालू से चिपक गई थी उस की. आज बेटा सामने है तो खुशी तो है पर कहेपूछे किस मुंह से?
जब से पदम ने घर में कदम रखा है, मुन्ना और रेवा बच्चों की तरह खुश हैं जैसे किसी खोए खिलौने को पा लिया है, पर शिशिर अपनी सोच और व्यवहार से नजरें चुरा रहा है. आज सब ने सुबहसुबह दूधजलेबी खाई थी. नाश्ते के बीच पदम ने पूछा, ‘‘मां, राम भैया कहां हैं?’’
‘‘अमेरिका में,’’ मां ने जवाब दिया था. ‘‘वहां क्या करते हैं?’’
‘‘पता नहीं, बेटा. फोन आता रहता है. आज इतवार है, देखना फोन जरूर आएगा.’’ ‘‘चलो, यह भी अच्छा हुआ जो पढ़लिख कर वे नौकरी कर रहे हैं,’’ पदम ने ठंडी प्रतिक्रिया दी.
‘‘छोड़, यह बता तू ने क्या पढ़ाई की है?’’ ‘‘मैं ने एनीमेशन इंजीनियरिंग की है यानी सौफ्टवेयर इंजीनियर हूं.’’
‘‘वाह, क्या बात है. तू तो बड़ा लायक निकला, सब ने खुशी व्यक्त की थी.’’ ‘‘हां, यहां नोएडा में एक कंपनी में नौकरी भी मिल गई है. कल से जाना है.’’
‘‘बहुत खूब,’’ मुन्ना बाबू ने उस की पीठ थपथपाई. ‘‘भैया का फोन आएगा तब मैं भी बात करूंगा.’’
सब ने सुनी थी उस की बात पर ‘राम प्रकरण’ को छेड़ना इस वक्त किसी को भला नहीं लग रहा था. तभी फोन की घंटी बजी.
शिशिर बाबू ने फोन उठाया, जानते थे उसी का होगा. पदम दूसरे कमरे में रखे पैरलेल लाइन पर बापबेटे की बातें सुन रहा था. ‘‘पापा, वह मकान का क्या हुआ? कोई कस्टमर मिला?’’
‘‘तुझ से मैं ने पहले भी कहा है, मैं यह मकान नहीं बेचूंगा.’’ बापबेटे में बहस छिड़ गई. बीच में पदम बोला, ‘‘भैया, मकान की बात क्यों करते हो?’’
राम चौंका, ‘‘भई, बीच में तू कौन?’’ ‘‘मैं आप का छोटा भाई पदम हूं. आज ही आया हूं.’’
‘‘मेरा कोई भाई नहीं है. पता नहीं पापा किसकिस को घर में घुसा लेते हैं. बुढ़ापे में पापा का दिमाग सठिया गया है. भाई, तू जो भी हो, मुझे परायों से बात नहीं करनी.’’ ‘‘बूढ़ा होगा तू, मैं अब तेरी परवा नहीं करता. जैसे तू मेरा बेटा
है वैसे पदम भी है. बोल, क्या कहना है?’’ शिशिर बाबू तेज आवाज में बोले.
‘‘मैं अगले महीने इंडिया आ रहा हूं. मकान तो मैं बेचूंगा जरूर,’’ राम ने फिर धमकी दी. गुस्से में शिशिर ने फोन पटक दिया. सब उन की हिम्मत देख हैरान थे.
मुन्ना उन्हें देख मुसकराया, ‘‘आज
दूसरा कंधा मिल गया है तो शिशिर में ताकत आ गई है. अच्छा जवाब दिया राम को.’’
‘‘अरे, बाजार से सामान ले आओ, मैं ने लिस्ट बना ली है,’’ रेवा ने माहौल बदलने की गरज से बात बदली. ‘‘हां, लाओ लिस्ट,’’ वे भी इस वक्त बात को छोड़ना चाहते थे.
‘‘पापा, मैं भी साथ आता हूं,’’ पदम साथ हो लिया. दरअसल, शिशिर बाबू बेटे से अकेले में बातें करना चाहते थे. शायद पदम भी यही चाहता था.
‘‘भैया के साथ क्या प्रौब्लम है?’’ पदम ने पूछा. उन्होंने सारी कहानी बेटे को सुना दी. ‘‘बेटा, मैं तो यहां तेरी कहानी सुनने आया हूं. वैसे यह बता इन 22 बरसों में क्या बीता, मेरा मन सब जानने को उत्सुक है.’’
‘‘पापा, मैं बता दूं कि भाई की सोच मुझ से छिपी नहीं है. मैं सारा हैंडिल कर लूंगा, भाई को तो चुटकी में मनाऊंगा. बस, मैं चाहता हूं कि हम सब मिल कर प्यार से रहें. मैं यहां आप लोगों के लिए आया हूं, रिश्ते जोड़ने आया हूं, तोड़ने नहीं. भैया या किसी और से भी.’’ पिता ने बेटे की परिपक्वता और सकारात्मक सोच को मन से सराहा.
ये भी पढ़ें- फरेब : जिस्म के लिए मालिक और पति ने दिया धोखा
‘‘पापा, मैं अपने बारे में क्या बताऊं, शुरू के 6 वर्षों में जो भोगा दुखदर्द उफ, उस का विवरण आप सुन न पाएंगे. सो, उसे छोड़ो. ‘‘जब मैं 12 वर्ष का हुआ तो एक दिन मैं ने देखा कि एक सरदारजी मुझ से बारबार मेरे बारे में पूछते हैं. मैं जान गया कि यह व्यक्ति मेरी कमजोरी और साहसिक सोच से प्रभावित है.
‘‘बस, एक रोज उस की गाड़ी में बैठ कर उस की कोठी पर चला गया. लगा, सुख की दुनिया में आ गया हूं.’’ ‘‘सरदारजी ने मुझ से सब से पहले कहा, ‘यहां तुम पूर्ण सुरक्षित हो, तुम्हें तुम्हारा टोला छू भी नहीं सकता.
‘‘वे एक व्यापारी थे. पर रहते अकेले थे. घर में नौकरचाकर थे और वो, बस.’’ ‘‘वहां मैं ने पाया न कोई मुझे हिज्जू कहता है, न ही मेरे चेहरेमोहरे को ले कर कोई ताना कसा जाता है.
‘‘मेरा स्कूल में ऐडमिशन हो गया. मैं पढ़ता गया जब 12वीं की तो उन के एक डाक्टर मित्र ने मुझ से पूछा, ‘बेटा, आप ठीक हो सकते हो किंतु आप को कुछ महीने मुंबई में गुजारने होंगे. क्या तुम तैयार हो?’ ‘‘डाक्टर साहब मुझे अपने साथ मुंबई ले गए. जहां सालभर मैं उन की देखरेख में रहा. सालभर में मैं ने महसूस किया कि मेरे चेहरे के पीछे एक पुरुष चेहरा छिपा है, मन में आत्मविश्वास आ गया था.
‘‘मैं काफी बदल गया था. लोग मुझ से बात करना पसंद करते थे. मैं ने महसूस किया जिंदगी बदगुमां नहीं है. कई बार मुझे लगता कि मैं वापस अपने घर दिल्ली आ जाऊं पर मैं ने सरदारजी से वादा किया था, ‘मैं मम्मीपापा के पास कुछ बन कर ही जाऊंगा.’
‘‘उस गौडफादर को मैं कभी नहीं भूलूंगा. मैं ने एनीमेशन इंजीनियरिंग की और कंप्यूटर पर कार्टून बनाने का काम करने लगा. ‘‘आज भी याद है सरदारजी की बात, ‘बेटा, जीवन एक युद्ध है. इसे हमें जीतना ही है. और जो जीतता है वही सिकंदर है.’
ये भी पढ़ें- दूसरा भगवान : डाक्टर रंजन को खाली करना पड़ा क्लिनिक
‘‘उन का वह बातबात पर प्यार से समझाना आज तक याद है. पापा, जन्म तो आप ने मुझे दिया पर इस जीवन को तराशा सरदारजी ने. वे न मिलते तो मैं मिट्टी के ढेले सा मिट्टी में समा जाता.’’ सब सुन कर पिता की आंखें छलछला गईं. उन्होंने आसमान की तरफ देखा. ढेरों सितारें भी बेटे की कहानी सुन रहे थे और वहीं से शायद कह रहे थे, वैल डन पदम, सैल्यूट है तेरे जज्बे को.
दिल्ली की आउटररिंग रोड पर भागते आटो में बैठा पदम उतावला हो रहा था, घर कब आएगा? कब सब से मिलूंगा.
आटो से बाहर झांका, सुबह का झुटपुटा निखरने लगा था. एअरपोर्ट से उस का घर 18 किलोमीटर होगा. यहां से उस के घर की दूरी एक घंटे में पूरी हो जाएगी और फिर वह अपने घर पर होगा. पूरे 22 बरस बाद लौटा है पदम. उसे मलकागंज का भैरोंगली चौराहा, घर के पास बना पार्क और उस के पास बरगद का मोटा पेड़ सब याद है. इन सब के सामने वह अचानक खड़ा होगा, कितना रोमांचक होगा. नहीं जानता, वक्त के साथ सबकुछ बदल गया हो. हो सकता है मम्मीपापा, भैया कहीं और शिफ्ट हो गए हों. उस ने 2 दशक से उन की खोजखबर नहीं ली. आंखें बंद कर के वह घर आने का इंतजार करने लगा.
22 बरस पहले की यादों की पोटली खुली और एक ढीठ बच्चा ‘छोटा पदम’ सामने खड़ा हुआ. हाथ में बैटबौल और खेल का मैदान, यही थी उस छोटे पदम की पहचान. कुशाग्रबुद्धि का था पदम. सारा महल्ला उसे ‘मलकागंज का गावस्कर’ के नाम से जानता था. एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाला यह बच्चा टीचर्स का भी लाड़ला था. किंतु वह अपनी मां को ले कर हैरान था. जहां जाता, मां साथ जाती. 9 बरस के पदम को मम्मी स्कूल के गेट तक छोड़ कर आती और वापसी में उसे वहीं खड़ी मिलती. यहां तक कि पार्क में जितनी देर वह बैटिंगफील्ंिडग करता, वहीं बैंच पर बैठ कर खेल खत्म होने का इंतजार करती.
ये भी पढ़ें- तलाक : जाहिरा को शादाब ने क्यों छोड़ दिया
मां के इस व्यवहार से वह कई बार खीझ जाता, ‘मम्मी, मैं कोई बच्चा हूं जो खो जाऊंगा? आप हर समय मेरे पीछे घूमती रहती हो. मेरे सारे दोस्त पूरे महल्ले में अकेले घूमते हैं, उन की मांएं तो उन के साथ नहीं आतीं. फिर मेरे साथ यह तुम्हारा पीछेपीछे आना क्यों?’
मम्मी आंखों में आंसू भर कर कहती, ‘बस, कुछ साल बाद तू अकेला ही घूमेगा, मेरी जरूरत नहीं होगी.’ मां की यह बात उस की समझ से परे थी.
‘‘बाबूजी, आप तो दिल्ली निवासी हो?’’ आटो वाले सरदारजी ने उस की सोच पर शब्दकंकरी फेंकी. उस ने चौंक कर वर्तमान को पकड़ा, ‘‘हां, नहीं, मुझे दिल्ली छोड़े बहुत बरस हो गए.’’
‘‘बाबूजी, आप विदेश में रहते हो?’’ हां, यहां बस किसी से मिलने आया हूं.’’
‘‘अच्छा,’’ कह कर सरदारजी ने आटो की स्पीड बढ़ा दी. सच ही तो है…वह तो परदेसी बन गया था. याद आया 22 बरस पहले का वह मनहूस दिन. उस दिन क्रिकेट का मैच था. पार्क में सारे बच्चों को इकट्ठा होना था.
पदम को घर में छोड़ कर मम्मी बाजार चली गई थी. बाहर से ताला लगा था. पदम पार्क में जाने के लिए छटपटा रहा था कि तभी उस के दोस्त अनिल ने खिड़की से आवाज दी, ‘यार, तू यहां घर में बैठा है और हम सब तेरा पार्क में इंतजार कर रहे हैं.’ ‘कैसे आऊं, मम्मी बाहर से ताला लगा गई हैं.’
‘छत से कूद कर आ जा.’ ‘ठीक है.’
पड़ोस की छतों को पार करता पदम पहुंच गया पार्क में. उसे देखते ही सारे दोस्त खुशी से चिल्लाए, ‘आ गया, हमारा गावस्कर, आ गया. अब आएगा मैच का मजा.’ बस, फिर क्या था, जम गया मैदान में. बल्ला घूमा और 30 रन बटोर कर आ गया. आउट हो कर वह बैंच पर आ कर बैठा ही था कि अचानक पता नहीं कहां से एक व्यक्ति उस के पास आ बैठा. उस ने बड़ी आत्मीयता से उस के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘बेटा, क्रिकेट बहुत बढि़या खेलते हो. लो, इसी खुशी में चौकलेट खाओ. और उस ने हथेली फैला दी. पदम ने चौकलेट उठा कर मुंह में डाल ली. उस के बाद पता नहीं क्या हुआ?
होश आया तो महसूस हुआ कि वह अपनों के बीच नहीं है. जगह और आसपास बैठे लोग सब अनजाने हैं. वह किसी बदबूदार कमरे में गंदी सी जगह पर था. सड़ांध से उस का जी मिचला गया था. कुशाग्रबुद्धि का पदम समझ गया था उसे अगवा कर लिया गया है. लेकिन क्यों? उस ने सुना था कि पैसे वालों के बच्चों को अगवा किया जाता है. बदले में पैसा मांगा जाता है. सब जानते हैं कि उस के पिता एक साधारण से टीचर हैं. वे भला इन लोगों को पैसा कहां से देंगे? वह भी जानता है कि घर में बमुश्किल रोटीदाल चल पाती है. फिर उसे उठा कर इन लोगों को क्या मिलेगा? उस की समझ से परे था. वह घबरा कर रोने लगा था. 2 गुंडा टाइप मुश्टडों ने उसे घूरा, ‘चौप्प, साला भूखा है, तभी रो रहा है. वहीं बैठा रह.’
‘मुझे पापा के पास जाना है.’ ‘खबरदार, जो उस मास्टर का नाम लिया. बैठा रह यहीं पर.’
पदम वहीं बैठा रहा बदबूदार दरी पर. उसे उबकाई आ गई, सारी दरी उलटी से भर गई. सिर भन्ना गया उस का.
शाम होतेहोते उसे कहीं और शिफ्ट कर दिया गया. फिर तो हर 10-12 दिनों बाद उसे किसी और जगह भेज दिया जाता. 4 महीने में 10 जगहें बदली गईं. वह अकेला नहीं था, 3 बच्चे और थे उस के साथ. इस बीच न जाने कितनी ही रातें उस ने आंखों में बिताई थीं और कितनी बार वह मम्मीपापा को याद कर के रोया था. यहां उसे अपनों का चेहरा तो दिखा ही नहीं, सारे बेगाने थे.
ये भी पढ़ें- पिंजरे वाली मुनिया : बेटी के सपनों को पूरा करने की कहानी
इंदौर, उदयपुर, जयपुर, शेखावटी न जाने कहांकहां उस को रखा गया. इन शहरों के गांवों में उसे रखा जाता जहां सिर्फ तकलीफ, बेज्जती और नफरत ही मिलती थी जिसे उस का बालमन स्वीकार नहीं करता था. इन सब से वह थक चुका था. तीव्रबुद्धि का पदम जानता था कि यह भागमभाग, पुलिस से बचने के लिए है. गंदे काम कराए जाते. गलती करने पर लातघूंसे, गाली और उत्पीड़न किया जाता था. रोटी की जगह यही सब मिलता था.
जब टोले वालों को ज्यादा गुस्सा आता तो उसे शौचालय में बंद कर दिया जाता. टोले के मुखिया की उसे सख्त हिदायत थी कि अपना असली नाम व शहर किसी को मत बताना और नाम तो हरगिज नहीं. टोले वालों ने उस को नया नाम दिया था पम्मी.
उदयपुर के गांव में उसे ट्रेनिंग दी गई. चोरी करना, जेब काटना, उठाईगीरी और लोगों को झांसा दे कर उन की कीमती चीजों को साफ करना. ये सब काम करने का उस का मन न करता, किंतु इसे न करने का विकल्प न था.
सुबहसवेरे होटल से लाई पावभाजी खा कर उसे व उस के साथियों
को रेलवेस्टेशन भीड़भाड़ वाले बजारों या रेडलाइट पर छोड़ दिया जाता. शाम को टोले का एक आदमी उन्हें इकट्ठा करता और पैदल वापस ले आता. याद है उसे, एक रोज उस ने अपने एक दोस्त से पूछा, ‘ये हम से गलत काम क्यों कराते हैं?’
‘अबे साले, हिज्जू से और क्या कराएंगे. हम हिजड़ों को यही सब करना पड़ता है.’ ‘ये हिज्जूहिजड़ा क्या होता है?’
‘तुझे नहीं पता, हम सब हिजड़े ही तो हैं. तू, मैं, कमल, दीपू सब हिजड़े हैं.’ ‘मतलब.’
‘हम सब न लड़का हैं न लड़की, हम तो बीच के हैं.’ वह बच्चा बड़ी देर तक विद्रूप हंसी हंसता रहा था, साथ में गंदे इशारे भी करता रहा था.
पदम को आज भी याद है, ये सब देख कर उसे भरी सर्दी में पसीना आ गया था. तनबदन में आग सी लग गई थी. यह क्या है? ऐसा क्यों हो रहा है? जिन लोगों के बीच वह पल रहा है वह हिजड़ों की मंडली है? कुशाग्रबुद्धि के पदम को काफीकुछ समझ में आ गया था. समझ गया था कि वह ऐसे चक्रवात में फंस गया है जहां से निकलना आसान नहीं है. उस रात उसे बड़े डरावने सपने आते रहे. अब तक तो आंखें बंद करता था तो मम्मी, पापा, राम भैया और मुन्ना अंकल सपनों में रहते थे पर उस दिन के बाद उसे डरावने सपने ही आते. वह चौंक कर आंखें खोल देता था.
ये भी पढ़ें- दूसरा भगवान : डाक्टर रंजन को खाली करना पड़ा क्लिनिक
बस, इस सब के साथ एक आस थी, हो सकता है पापा या भैया उसे ढूंढ़ते हुए कहीं स्टेशन या शहर की रेडलाइट पर मिल जाएं. पर ऐसा कभी नहीं हुआ. वह यह सब सहतेसहते पत्थर हो गया था. दुख, घुटन, बेजारी, गाली, तिरस्कार, उस के जीवन के पर्याय हो गए थे. कई बार दुख की पराकाष्ठा होती तो जी करता रेल की पटरी पर लेट कर अपने जीवन का अंत कर ले. दूसरे ही पल सोचता, नहीं, मेरा जीवन इतना सस्ता नहीं है. वह 12 बरस का हो गया था. अब उसे अपने शरीर में कसाव और बेचैनी महसूस होती थी. लेकिन कौन उसे बताता कि यह सब उस के साथ क्यों हो रहा है? खुले आसमान के नीचे बैठ कर अपनी बेनामी मजबूरी पर उसे आंसू बहाना अच्छा नहीं लगता था.