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प्यार में इतना जोखिम क्यों

5 अगस्त, 2020 को बिहार के जिले सुपौल में नाजायज रिश्तों के चलते कुछ लोगों ने एक औरत और मर्द को जम कर पीटा. फिर स्थानीय लोगों और पंचायत में समाज के सामने उन दोनों के हाथपैर बांध कर मर्द के सिर के आधे बाल और मूंछें मुंड़वा दी गईं. औरत को भी आधा गंजा कर दिया गया.

पुलिस तफतीश के मुताबिक पीड़ित मर्द का अपने पड़ोस की ही एक औरत के घर पहले से आनाजाना था. इस बात की जानकारी आसपड़ोस के लोगों को भी थी. उस औरत का पति गांव से बाहर रह कर मजदूरी करता था और पिछले 8 महीने से घर नहीं आया था. उस रात भी वह गैरमर्द उस औरत के घर में था. आसपास के लोगों ने इकट्ठा हो कर उन दोनों को रंगे हाथ पकड़ लिया. इस के बाद स्थानीय जन प्रतिनिधियों और लोगों के सामने उन से जबरदस्ती माफीनामा भी लिखवाया गया.

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इसी तरह कुछ 29 सितंबर, 2020 को बरेली कालेज में आपत्तिजनक हालत में पकड़े गए एक जोड़े से भी उन के मातापिता को बुला कर माफीनामा लिखवाया गया.

दरअसल, बरेली कालेज में नवीन भवन के पीछे एक लड़का और एक लड़की आपत्तिजनक हालत में पकड़े गए थे. अनुशासन समिति ने उन दोनों को पकड़ कर कालेज बैरियर के पास ले जा कर पूछताछ की तो पता चला कि वे दोनों बाहरी हैं. बाद में चीफ प्रौक्टर ने दोनों के मातापिता को बुलाया और उन से माफीनामा लिखवाया.

इसी तरह हमें अकसर 2 प्यार करने वालों पर लोगों का गुस्सा टूटता दिख जाता है. सिर्फ गुस्सा ही नहीं कई बार तो औनर किलिंग, मर्डर और सरेआम फांसी पर लटका देने की घटनाएं भी सामने आती हैं. कभी पत्थरों से पीटा जाता है तो कभी उन के पूरे खानदान को समाज से बाहर कर दिया जाता है. आखिर प्यार में इतना जोखिम क्यों है? प्यार करने वालों को इतनी ज्यादती क्यों सहनी पड़ती है?

तथाकथित धर्मगुरुओं की चिढ़

प्यार करने वाले लोग अकसर धर्म, जाति, ऊंचनीच वगैरह की परवाह किए बगैर आर्यसमाजी शादी कर या कोर्ट मैरिज कर निबट जाते हैं. इस से तथाकथित धर्मगुरुओं को अपनी साख गिरती हुई महसूस होती है. उन्हें लगता है जैसे इस तरह के 2-4 उदाहरण भी समाज में कामयाब हो गए तो धर्म की दुकान बंद हो सकती है. वजह यह कि आम जनता, जो बेवकूफों की तरह इन के कहने पर रीतिरिवाजों में रुपए और समय लुटाती रहती है और इन की जेबें भरती रहती है, कहीं वह अच्छी सीख न ले ले.

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धर्म और भेदभाव फैला कर अपनी चांदी करने वाले धर्मगुरुओं को अपनी हुकूमत खो देने का डर होता है, इसलिए वे हमेशा लोगों की सोच को कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं.

धर्मगुरुओं ने हमेशा से खुद को सब से ऊपर रखा है. मूढ़ लोगों के लिए उन का आदेश पत्थर की लकीर हो जाती है. स्वर्गनरक, पापपुण्य का डर दिखा कर वे अपनी जेबें भरते हैं. गैर जाति में प्यार और शादी को सामाजिक अपराध घोषित करना और प्रेमियों को सजा देने के लिए उकसाना उन का ऐसा ही एक ढकोसला है. ऐसी सामाजिक व्यवस्था फैलाने के पीछे का उन का मकसद लोगों के बीच डर पैदा करना है, ताकि लोग प्यार करने से पहले सौ बार सोचें. उन्हें पता चले कि ऐसा करने पर समाज द्वारा हुक्कापानी बंद होने का जोखिम उठाना पड़ सकता है.

बदला भी वजह

कई बार इनसान अपने जीवनसाथी को छोड़ कर किसी और के प्यार की गिरफ्त में आ जाता है. ऐसे में आप के पति या पत्नी का भरोसा टूटता है. आप के लिए उस के दिल में जो प्यार और यकीन होता है, वह खत्म हो जाता है. रिश्ते दरकने लगते हैं. दिल में एक फांस सी चुभ जाती है और जब तक वह आप से बदला न ले ले उस के दिल को चैन नहीं पड़ता. तभी तो अकसर देखा जाता है कि पति या पत्नी ने अपने जीवनसाथी के प्रेमी या प्रेमिका को चाकू से गोद डाला या जहर दे कर मौत की नींद सुला दिया.

जीवनसाथी की बेवफाई का दर्द इतना गहरा होता है और गुस्से की ज्वाला इतनी भयानक होती है कि उसे बुझाने के लिए इनसान जीवनसाथी या उस के प्रेमीप्रेमिका को बहुत बुरी मौत देने से नहीं घबराता. वह जानता है कि उसे जेल हो जाएगी, मगर फिर भी वह बदले की भावना पर कंट्रोल नहीं रख पाता, इसलिए याद रखिए कि नाजायज रिश्ते वाले प्यार का नतीजा बहुत बुरा होता है.

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साठ पार का प्यार : भाग 3

आजकल समीर का ध्यान घर के नौकरचाकरों से हट कर सुहानी पर केंद्रित हो गया था. इसलिए घर में काम करने वाले राहत महसूस कर रहे थे.

बच्चों के साथ भी सुहानी का जुड़ाव अच्छा था बिलकुल दोस्तों जैसा. फोन पर बच्चों से बात करती तो कोई पता नहीं लगा सकता कि बच्चों से बात कर रही है या हमउम्र से. जबकि समीर बच्चों के साथ फोन पर बातचीत में गंभीरता ओढ़े रहते. बच्चे भी उन से सिर्फ मतलब की बात करते, फिर गप मम्मी से ही मारते.

अगले दिन सुहानी ने ऐलान किया कि उस की मित्रमंडली पिकनिक जा रही है. शाम को लौटने में थोड़ी देर हो जाएगी. समीर चाहे तो पूरे दिन का अपना कोई प्रोग्राम बना सकते हैं.

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‘‘तुम पूरे दिन के लिए चली जाओगी, तो मैं क्या करूंगा पूरे दिन अकेले?’’ समीर आश्चर्य से बोले.

‘‘अब क्या करूं डियर, खुद से प्यार करना है तो मेहनत तो करनी ही पड़ेगी न. यों घर में रह कर मैं खुद को सजा

नहीं दे सकती. तुम्हें तो घर में बैठना पसंद है, पिकनिक जाना, पिक्चर देखना, घूमनाफिरना तुम्हें अच्छा नहीं लगता. इसलिए मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती. पर मैं खुद से प्यार करने लगी हूं, इसलिए खुद की खुशी के लिए जो मुझे पसंद है वह तो मैं करूंगी. अभी तो हमारा शहर से बाहर जाने का प्रोग्राम भी बन रहा है कुछ दिनों का. यह सब तो अब चलता ही रहेगा. तुम अकेले रहने की आदत अब डाल ही लो.

‘‘और फिर, मैं जब खुद खुश रहूंगी तभी तो तुम से…’’ सुहानी ने बात फिर से अधूरी छोड़ दी. समीर के दिल की धड़कन तेज हो गई. सुहानी आजकल तीर सीधे उन के दिल पर छोड़ने लगी थी. अब अकसर यही होने लगा. सुहानी का प्रोग्राम कभी कहीं और कभी कहीं का बन जाता. वह दिनोंदिन और भी खुश होती दिखाई दे रही थी.

कभीकभी समीर को लगता, कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं. कहीं सुहानी इस उम्र में हाथ से तो नहीं निकली जा रही. आम कुरतासलवार और साड़ी पहनने वाली सुहानी इन दिनों अपने कपड़ों में भी तरहतरह के प्रयोग करने लगी थी. कभी कुरती के साथ लहंगा, कभी पैंट्स, कभी प्लाजो, कभी फ्लेयर्स, जो भी शालीन फैशन था अपनाने लगी थी. उस की दोस्ती कालोनी की अपने से कम उम्र की महिलाओं से होने लगी थी. बहू से उस की बातें मेकअप, फैशन, नई फिल्मों, हीरोहीरोइनों व क्रिकेटरों को ले कर होतीं. यह नहीं कि ‘हमारे जमाने में ये होता था…हमारे जमाने में वो होता था.’

खुद से प्यार करना इतना अच्छा होता है क्या? समीर बारबार सोचने के लिए मजबूर हो जाते. सुहानी खुद से प्यार कर के इतनी बदल सकती है तो वे खुद क्यों नहीं.

सुबह नाश्ते में सुहानी समीर के टोस्ट पर मक्खन की मोटी परत लगा रही थी, ‘‘अरे, यह क्या कर रही हो सुहानी. खुद तो सूखा टोस्ट खाती हो और मेरे टोस्ट पर इतना मक्खन लगा रही हो. कितना वजन बढ़ गया है मेरा. तुम नहीं चाहतीं कि मेरा वजन कम हो. कल से फल, दूध, दही, दलिया वगैरह दिया करो, ये घीमक्खन आदि सब बंद.’’

‘‘क्यों?’’ सुहानी हैरानी से बोली हालांकि अंदर से वह खुश हुई जा रही थी, ‘‘तुम्हें तो टोस्ट पर जब तक ज्यादा मक्खन न लगे, मजा नहीं आता, बिना घी की छौंक लगे दाल हजम नहीं होती. परांठा भी एक दिन छोड़ कर देशी घी या मक्खन में बनना चाहिए. पूरीकचौड़ी, पकौड़े भी तुम्हें बहुत पसंद हैं अभी भी.’’

‘‘मैं ने कह दिया न कि अब सब बंद. जो मैं कह रहा हूं वही करो,’’ समीर दिखावटी गुस्से में बोले.

खाने के बाद सुहानी स्वीटडिश ले आई. समीर को खाने के बाद मीठा जरूर चाहिए था. इस के अलावा भी उन्हें मीठा बहुत पसंद था.

‘‘अरे, तुम यह मीठा बनाना जरा कम करो सुहानी. क्यों बनाती हो इतना मीठा, बना देती हो, फिर खाना पड़ता है,’’ समीर सारा दोष उस के सिर पर मढ़ते हुए बोले.

‘‘हां, पर तुम्हें पसंद है, तभी बनाती हूं. नहीं बनाती हूं तो तुम गुड़ या चीनी ही खा जाते हो. पर मीठा तुम्हें जरूर चाहिए खाने के बाद,’’ सुहानी अपनी मुसकान छिपाते हुए बोली, ‘‘तुम्हारे लिए ही बनाती हूं, मैं तो खाती भी नहीं हूं.’’

‘‘वही तो, तुम तो चाहती हो कि तुम दुबलीपतली रहो और मैं फैल कर एक क्ंिवटल का हो जाऊं.’’

सुहानी हतप्रभ हो समीर को देखती रह गई. समीर आगे बोले, ‘‘ऐसे क्या देख रही हो, कल से रोज का मीठा बंद. देखा नहीं था पिछली बार शुगर नौर्मल लिमिट को क्रौस कर गई थी. पर तुम्हें मेरी सेहत का जरा भी खयाल नहीं. और होगा भी कैसे, तुम्हें अपने सैरसपाटे, पिकनिक, सहेलियों से फुरसत मिले तब तो. हां, कभीकभार की बात अलग है.’’

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सुहानी अपलक समीर को देखती  रह गई. चित भी मेरी पट भी  मेरी. ‘‘ठीक है,’’ वह स्वीटडिश उठाती हुई बोली, ‘‘जैसा तुम कहो. मुझे तो खुद के बाद तुम से ही प्यार करना है.’’ सुहानी तिरछी नजर से समीर को देख रही थी, समीर घायल होतेहोते बचे.

‘खानपान और दिनचर्या पर कंट्रोल रखना पति या पत्नी पर एकदूसरे की बस की बात नहीं होती. जबरदस्ती करने या टोकाटाकी करने से झगड़ा होने का पूरापूरा अंदेशा रहता है. यह तभी हो सकता है जब खुद अंदर से ही सोच आ जाए,’ सुहानी ने यह सोचा.

एक दिन समीर से मिलने 2 आदमी आए. समीर अंदर आए, सुहानी से चाय बनाने के लिए कहा. थोड़ी देर बाद दोनों आदमी चले गए.

‘‘कौन थे ये, पहले तो कभी नहीं देखा इन्हें?’’ सुहानी बोली.

‘‘यहां एक संस्था है गोकुल,’’ समीर बोले, ‘‘जो विकलांग लोगों के लिए काम करती है. ये दोनों उसी संस्था के लिए काम करते हैं. मैं सोचता हूं सुहानी, गोकुल संस्था मैं भी जौइन कर लूं. समय भी अच्छा बीतेगा, बिजी भी रहूंगा और एक नेक काम भी होगा. क्यों, तुम क्या कहती हो?’’ समीर ने सुहानी की तरफ देखा.

‘‘मैं क्या कहूंगी, जो तुम ने सोचा, ठीक ही सोचा होगा,’’ सुहानी बोली और मन ही मन सोचा, ‘घर में भी सुखशांति रहेगी, काम वाले भी आराम से काम करेंगे.’

दूसरे दिन जब सुहानी जौगिंग के

लिए तैयार हो कर कमरे से बाहर

आई तो लौबी में समीर को ट्रैक सूट व जूतों से लैस पाया. वह खुशी से भीगी आंखों से समीर को देखती रह गई. वह तो यही सोच रही थी कि समीर अभी भी बिस्तर पर गुड़मुड़ सो रहे होंगे. उस ने ध्यान भी नहीं दिया कि कब समीर उठ कर दूसरे बाथरूम में जा कर तैयार हो कर आ गए.

‘‘समीर तुम? आज इतनी जल्दी कैसे उठ गए?’’ सुहानी करीब आ कर खड़ी हो गई, ‘‘कहां जा रहे हो?’’

‘‘लव इन सिक्सटीज डियर,’’ समीर उसी के अंदाज में उस के गालों पर चिकौटी काट कर होंठों को उंगली से सहलाते हुए बोले, ‘‘मैं ने सोचा कि तुम ही क्यों, मैं क्यों नहीं प्यार कर सकता सिक्सटी में खुद से. खुद से प्यार करूंगा, तभी तो तुम से…’’ कह कर समीर बहकने का नाटक करते हुए उस की तरफ झुक गए.

‘‘ऊं हूं,’’ सुहानी पीछे हटती हुई बोली, ‘‘मुझ से अभी नहीं. पहले खुद से तो ठीक से प्यार करना सीख लो. लेकिन सोच लो, प्यार की डगर बहुत कठिन होती है, फिसलनभरी होती है. बहुत हिम्मत, सब्र व लगन के साथ आगे बढ़ना पड़ता है. फिर चाहे प्यार खुद से करना हो या दूसरे से. कर पाओगे? बीच राह में हिम्मत तो नहीं हार जाओगे?’’

‘‘अब प्यार किया तो डरना क्या, ओखली में सिर दे दिया तो मूसल से क्या डरना. औरऔर…’’

‘‘बस, बस. बहुत हो गए मुहावरे,’’ सुहानी हंसती हुई बोली.

‘‘ओके डार्लिंग, मैं चला,’’ कह कर समीर 2 उंगलियों से स्टाइल से बाय कहते हुए बाहर निकल गए.

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अपनी जीत पर मन ही मन मुसकराती सुहानी ने मेन दरवाजे की चाबी घुमाई और दौड़ती हुई समीर की बगल में जा कर कदमताल करती हुई दौड़ने लगी. सुबह का खूबसूरत समां था. पक्षियों का दिलकश कलरव था और सिक्सटीज की उम्र में खुद से प्यार करने का कुछ अलग ही मजा था.

साठ पार का प्यार : भाग 2

सोचते सोचते सुहानी पार्क में पहुंच गई. रोज वह पास की ही सड़क पर वाक कर लेती थी, पर उस दिन वह घर से थोड़ी दूर पार्क में चली गई थी. वहां हर तरह, हर उम्र के स्त्रीपुरुष थे. कोई दौड़ रहा था, कोई चल रहा था, कोई कसरत कर रहा था.

सुहानी थोड़ी देर बैंच पर बैठ गई.  बस, उसी दिन से सुहानी के  दिमाग में एक तरकीब आई समीर को बदलने की. बोलने से तो समीर कभी नहीं मानेंगे, उसे पता था. देखते हैं आगेआगे होता है क्या. सुहानी होंठों ही होंठों में मुसकराई और फिर उठ कर चलने लगी. इस तरह से पूरा घंटा पार्क में बिता कर वह घर वापस आ गई.

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‘‘आज तो बहुत देर कर दी, रोज तो आधे घंटे में वापस आ जाती थी,’’ समीर उस के चेहरे को देख कर घूरते हुए बोले.

‘‘आज से पार्क जाना शुरू कर दिया है,’’ सुहानी एक मस्त अंगड़ाई सी ले कर कुरसी पर बैठ कर जूते के फीते खोलती हुई बोली, ‘‘मजा आ गया आज तो, वहां तो बहुत लोग आते हैं हर उम्र के.’’ वह मजे से एक आंख दबा कर आगे बोली, ‘‘फोर्टीज से ले कर सिक्सटीज तक के. इस से ऊपर के भी आते हैं. जल्दी ही नए दोस्त बन जाएंगे, फिर जौगिंग का अपना ही मजा आएगा.’’

वह जूते उठा कर कमरे में चली गई. ‘क्या कह गई थी सुहानी’ समीर उस की कही बात पर मन ही मन अटकलें लगाने लगे. सुहानी यों भी हंसमुख थी. सेहत ठीक थी. बिजी रहने से उस की मानसिक सेहत भी अच्छी रहती थी. पर उस दिन से तो वह और भी खुश व मस्त रहने लगी थी. हर समय गुनगुनाती, हंसतीखिलखिलाती सुहानी को देख कर समीर का ध्यान दूसरी बातों से हट कर सुहानी पर ही केंद्रित हुआ जा रहा था.

वे समझ नहीं पा रहे थे कि सुहानी में इतना बदलाव कैसे आया. सुहानी को दोपहर में खाना खाने के बाद सोने की आदत थी. पर एक दिन सोने के बजाय वह साड़ी प्रैस करने लगी.

‘‘सुहानी, तुम कहीं जा रही हो?’’

‘‘हां,’’ सुहानी साड़ी उठा कर कमरे में तैयार होने चली गई. तैयार हो कर वह जब बाहर निकली तो समीर उसे देख कर चौंक गए.

सुहानी ने यों तो अपनी उम्र को बांध ही रखा था. पर आज तो आलम कुछ अलग ही था. आज तो सुहानी को देख कर उन का दिल भी कुछ खास अंदाज में धड़क गया. स्टाइलिश साड़ी और स्टाइलिश ब्लाउज.

‘‘यह साड़ी कब खरीदी,’’ समीर साड़ी को घूरते हुए बोले, ‘‘मेरे साथ तो कभी नहीं ली?’’

‘‘खरीदी कहां डियर, तुम मुझे इतना चटख रंग कहां लेने देते. वह तो जब पिछली बार पुणे गई थी तो भाभी ने जबरदस्ती दिला दी थी.’’

‘‘तो तुम ने दिखाई क्यों नहीं अभी तक?’’

‘‘मैं ने सोचा कहीं तुम्हें पसंद नहीं आई तो तुम मुझे इस का ब्लाउज भी नहीं सिलवाने दोगे. आज मेरी एक सहेली के घर पर सारी सहेलियां इकट्ठी हो रही हैं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बस, ऐसे ही. हंगामा पार्टी है.’’

‘‘हंगामा पार्टी? क्या मतलब? बर्थडे पार्टी, रिसैप्शन पार्टी, मैरिज पार्टी, रिटायरमैंट पार्टी तो सुनी हैं. आजकल के युवाओं की तथाकथित ब्रेकअप पार्टी के बारे में भी पढ़ा है, लेकिन यह हंगामा पार्टी क्या होती है?’’

‘‘मतलब,’’ सुहानी किसी नवयौवना की तरह पलकें झपकाती हुई बोली, ‘‘लव इन सिक्सटीज डियर. तेज म्यूजिक पर डांस करेंगे, मस्ती करेंगे, गाना गाएंगे और…’’

‘‘और?’’

‘‘और उस के बाद केक काटेंगे खाएंगेपिएंगे, बस,’’ कहती हुई सुहानी ने हथेलियां एकदूसरे पर झाड़ दीं.

‘‘मैं यहां अकेला बैठा रहूं और तुम अपनी सहेलियों के साथ हंगामा पार्टी करो,’’ समीर झुंझला कर बोले.

‘‘लव इन सिक्सटीज डियर. मजबूरी है, खुद से प्यार करना सीख रही हूं. यह कोई आसान बात नहीं. जब खुद से प्यार करूंगी तभी तो तुम से…’’ सुहानी ने बात अधूरी छोड़ दी और अपना सिर समीर के कंधों पर टिका कर, मदभरी नजरों से समीर की आंखों में देखने लगी. फिर जानलेवा मुसकराहट समीर पर डाल कर सुहानी बाहर निकल गई.

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‘बहकने का पूरा सामान है आजकल सुहानी के पास. यह क्या हो गया सुहानी को,’ समीर सोच रहे थे, आखिर इस के पीछे रहस्य क्या है.

सुहानी के मिशन को लगभग एक  हफ्ता हो गया था. एक दिन  समीर सुबह नहाधो कर अखबार पढ़ने बैठे ही थे कि अचानक बैडरूम से तेज म्यूजिक की आवाज सुन कर चौंक गए. वे उठ कर बैडरूम की तरफ भागे. उन्होंने बैडरूम का भिड़ा दरवाजा थोड़ा सा खोल कर अंदर झांका. सुहानी अंदर नहाने के लिए घुसी थी पर अंदर का दृश्य देख कर उन का दिल किया कि सिर पर हाथ रख कर वहीं बैठ जाएं.

सुहानी तेज म्यूजिक पर जोरजोर से नृत्य कर रही थी. जैसे भी उस से हो पा रहा था, वह हाथपैर मार रही थी. उन्होंने अंदर जा कर म्यूजिक औफ कर दिया.

‘‘यह क्या कर रही हो सुहानी, हाथपैर तोड़ने का इरादा है क्या? तुम तो नहाने जा रही थी?’’

‘‘हां, पर मेरा दिल किया कि थोड़ी देर नाच लूं. उस दिन हंगामा पार्टी में खूब नाचे थे. थोड़ा पसीना निकलेगा, फिर सुस्ता कर नहा लूंगी,’’ सुहानी म्यूजिक औन करती हुई आगे बोली, ‘‘आओ न, तुम भी नाचो.’’ वह समीर को खींचने लगी.

‘‘अरेरेरे, यह क्या कर रही हो, ये सब वाहियात बातें मुझ से नहीं होतीं? तुम्हीं करो. मुझे वैसे भी डांस करना कहां आता है.’’

‘‘डांस न सही, थिरक तो सकते ही हो समीर. थिरकना तो सब को आता है. आओ न, कोशिश तो करो. देखो, कितना मजा आता है…’’

वह आंखों में सारे रहस्यभर कर, चुहलभरे अंदाज में भौंहों को नचा कर आगे बोली, ‘‘तुम्हारी सुरा और सुंदरी से भी ज्यादा मजा है थिरकने में. कर के तो देखो. जिस्म के अंग खुल जाएंगे, दिमाग की तनी नसें ढीली पड़ जाएंगी…’’

उस ने समीर का हाथ खींचा और जबरदस्ती साथ में डांस करने लगी. अपने हाथों से पकड़पकड़ कर उन के हाथपैर इधरउधर फेंकने लगी. कभी गोल चक्कर घुमा देती, कभी कमर और हाथ पकड़ कर दो कदम आगे, दो कदम पीछे डांस करने लगती.

करतेकरते समीर को भी लगा, कुछ मजा आ रहा है. बदन भी थोड़ाबहुत संगीतमय हो रहा था, सुरताल पर सही थिरकने लगा था. वे भी कोशिश करने लगे. थोड़ी देर तो सुहानी जबरदस्ती करती रही, पर थोड़ी देर बाद वे हलकीफुलकी कोशिश खुद भी करने लगे. सुहानी को इतना मस्त देख कर उन का दिल भी कर रहा था कि वे खुद भी उस की मस्ती में डूब जाएं.

थोड़ी देर बाद वे थक कर बैठ गए. सुहानी ने म्यूजिक औफ कर दिया.

‘‘क्यों, मजा आया न…’’

समीर को भी लग रहा था. बदन के सारे सैल्स जैसे खुल कर ढीले पड़ गए हों और वे खुद को बहुत खुश व जिस्म में आराम महसूस कर रहे थे.

सुहानी थोड़ी देर सुस्ता कर नहाने चली गई और समीर बैठ कर अखबार पढ़ने लगे.

‘बकवास, कितना बोर अखबार है, रोज एकजैसी खबरें. चाहे आधे घंटे में खत्म कर लो, चाहे 2 घंटे तक चाटते रहो. मैटर नहीं बदलने वाला, वही रहेगा,’ यह बड़बड़ाते समीर ने अखबार एक तरफ पटका और सुहानी के विषय में सोचने लगे.

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‘मजे तो सुहानी ले रही है जिंदगी के. उसे देख कर लगता ही नहीं कि वह जीवन के 59 वसंत देख चुकी है.’

फिट है, तो जो पहनती है उस पर फबता भी है. सुंदर लगती है, तो उस का आत्मविश्वास भी बना रहता है खुद पर. सेहत अच्छी है, तो हर तरह के मनोरंजन में हिस्सा भी लेती है. घर के सारे काम भी कर लेती है. सामाजिक कामों में सक्रिय रहती है और अपनी सखीसहेलियों के साथ मस्ती भी कर लेती है.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

साठ पार का प्यार : भाग 1

सुबह सुबह रजाई से मुंह ढांपे समीर  काफी देर तक जब पत्नी के उठाने का और गरमागरम चाय के कप का इंतजार करतेकरते थक गए तो रजाई से धीरे से मुंह निकाल कर बाहर झांका, ‘अभी तक कहां है सुहानी’ तो जो कुछ नजर आया, उस पर यकीन करना मुश्किल हो गया.

उलटेसीधे गाउन पर 2-3 स्वेटर पहने, मुंह और सिर भी शौल से लपेटे रहने वाली सुहानी आज गुलाबी रंग का चुस्त ट्रैक सूट पहने, ड्रैसिंग मिरर के सामने खुद को कई एंगल से निहारनिहार कर खुश हो रही थी.

‘‘यह क्या कर रही हो सुहानी,’’ समीर हैरानी से पलकें झपकाते हुए बोले.

‘‘ओह, उठ गए तुम. मैं जौगिंग पर जा रही हूं.’’ वह ‘जौगिंग’ शब्द पर जोर डालती हुई मीठी मुसकराहट के साथ आगे बोली, ‘‘मैं ने चाय पी ली, तुम्हारी रखी है, गरम कर के पी लेना.’’

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‘‘लेकिन तुम इतने कम कपड़े पहन कर कहां जा रही हो, सर्दी लग जाएगी. वाक पर तो रोज ही जाती हो, आज यह जौगिंग की क्या सूझी,’’ समीर उठ कर बैठते हुए बोले. उन्हें सामने खड़ी सुहानी पर अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था.

‘‘डार्लिंग,’’ सुहानी प्यार से उन के गालों पर हलकी सी चिकौटी काटती, दिलकश मुसकराहट बिखेरती हुई बोली, ‘‘पहले सारे किस्सेकहानियों में फोर्टीज की बात होती थी, अब सिक्सटीज की बात होती है. सुना नहीं, ‘लव इन सिक्सटीज?’ ’’

वह थोड़ा सा उन से सट कर बैठती हुई आगे बोली, ‘‘मैं ने सोचा, लव दूसरे से करना जरूरी है क्या, क्यों न खुद से ही शुरुआत की जाए. पहले खुद से, फिर तुम से,’’ उस ने रोमांटिक अंदाज में समीर के होंठों पर उंगली फेरने के साथ उन की आंखों में झांका.

समीर को गले से थूक निगलना पड़ा. 64 साल की उम्र में भी बांछें खिल गईं. मन ही मन सोचने लगे, ‘वैसे तो हाथ ही नहीं आती है…अब उम्र हो गई है, ये है, वो है. बिगड़ी घोड़ी सी बिदक जाती है. आज क्या हो गया.’

‘‘लेकिन इतने कम कपड़ों में तुम्हें ठंड नहीं लगेगी,’’ बुढ़ापे में चिंता स्वाभाविक थी.

‘‘अंदर से सारा इंतजाम किया हुआ है,’’ वह अंदर पहने कपड़े दिखाती हुई बोली, ‘‘ठंड नहीं लगेगी. अब तुम भी रजाई फेंक कर उठ जाओ और चाय गरम कर के पीलो,’’ उस ने फिर एक बार समीर के होंठों को हौले से छूने के साथ मस्तीभरी नजरों से देखा.

समीर को लगा कि शायद सुहानी कहीं मस्ती में उन के होंठों को चूम ही न ले. पर सुहानी का इतना नेक इरादा न था. वह उठ खड़ी हुई.

उस ने एकदो बार अपनी ही जगह पर खड़े हो कर जूते फटकारे. थोड़ी उछलीकूदी.

‘‘यह क्या कर रही हो?’’ समीर की हैरानी अभी भी कम नहीं हो रही थी.

‘‘बौडी को वार्मअप कर रही हूं डियर,’’ कह कर, तीरे नजर उन पर डाल कर, उन्हें खुश करती, 2 उंगलियों से बाय करती, बलखाती हुई सुहानी बाहर निकल गई.

समीर बेवकूफों की तरह थोड़ी देर वैसे ही बैठ कर उस भिड़े दरवाजे को देखते रहे जो अचानक लगे धक्के से अभी भी हिल रहा था. फिर हकीकत में वे रजाई फेंक कर उठ खड़े हो गए.

सड़क पर सुहानी हलकी चाल से दौड़ रही थी. उस का पहला दिन था. एक तय चाल से वाक करना और हलकी चाल से दौड़ना, दोनों बातें अलग थीं. अधिक थकान न हो, इसलिए वह बहुत एहतियात बरत रही थी. समीर को रिटायर हुए 4 साल हो गए थे. रिटायर होने के बाद भी 2 साल तक वे छिटपुट इधरउधर जौब करते रहे, पर 2 साल से पूरी तरह घर पर ही थे. समीर को सेहत का पाठ पढ़ातेपढ़ाते सुहानी थक चुकी थी. समीर सेहत के मामले में लापरवाह थे.

सुहानी अपनी सेहत का पूरा खयाल  रखती थी, रोज वाक पर जाती  थी, खाने में परहेज करती थी. पर समीर के पास हर बात के लिए कारण ही कारण थे. कभी नौकरी की व्यस्तता का बहाना, फिर कभी रिटायरमैंट के

बाद कुछ समय आराम करने का बहाना. 2 साल से हर तरह से खाली होने के बावजूद समीर को सुबह की सैर पर ले जाना टेढ़ी खीर था. वे आलसी इंसान थे. आराम से उठो, सब तरह का खाना खाओपियो, ऐश करो.

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समीर का बढ़ता वजन, बढ़ता पेट देख कर सुहानी को चिंता होती. उन का बढ़ता ब्लडप्रैशर, कभीकभी शुगर का बढ़ना उस की पेशानी में बल डाल देता. वह सोच में पड़ जाती कि कैसे समीर को अपनी सेहत पर ध्यान देने की आदत डाले, कैसे समझाए समीर को, कैसे उन का आलसीपन दूर करे.

इसी कशमकश में डूबतीउतराती सुहानी की नजर एक दिन पत्रिका में छपे एक लेख ‘लव इन सिक्सटीज’ पर पड़ी. वाह, कितना रोमांचक और रोमैंटिक टाइटल है. उस लेख को पढ़ कर पलभर के लिए उसे भी रोमांच हो आया. उस का दिल किया कि थोड़ा रोमांस वह भी कर ले समीर से. पर समीर के थुलथुलेपन को देख कर उस का सारा रोमांस काफूर हो गया.

बात सिर्फ सेहत के प्रति लापरवाही की होती, तो भी एक बात थी, पर घर में दिनभर खाली रहने के चलते समीर को हर छोटीछोटी बात पर टोकने की आदत पड़ गई थी. घर में काम वाली, धोबी, प्रैसवाला, माली सभी समीर के इस रवैए से परेशान रहने लगे थे.

‘ठीक से काम नहीं करती हो तुम, पोंछा ऐसे लगाते हैं क्या, बरतन भी कितने गंदे धोती हो. प्रैस कितनी गंदी कर के लाता है यह प्रैसवाला, लगता है बिना प्रैस किए ही तह कर दिए कपड़े.’’ कभी माली के पीछे पड़ जाते, ‘‘कुछ काम नहीं करता यह माली, बस आता है और फेरी लगा कर चला जाता है. तुम भी इसे देखती नहीं हो…’’

कभी सुहानी के ही पीछे पड़ जाते, ‘‘तुम कामवाली को गरम पानी क्यों देती हो काम करने के लिए? गीजर चला कर बरतन धोती है, गरम पानी से पोंछा लगाती है. उस से बिजली का बिल बढ़ता है. कामवाली को सर्दी की वजह से आने में देर हो जाती तो समीर की भुनभुनाहट शुरू हो जाती. रोज देर से आने लगी है, तुम इसे कुछ कहती क्यों नहीं, लगता है इस ने सुबह कहीं काम पकड़ लिया है?’’

पोंछा लगा कर कामवाली कमरे का पंखा चला देती तो वे हर कमरे का पंखा बंद कर के बड़बड़ाते रहते, ‘मैं तो नौकर हूं न, पंखे बंद करना मेरा काम है. सर्दी हो या गरमी, इसे पंखे जरूर चलाने हैं.’

माली से जब वे अपने हिसाब से काम कराने लगते तो उसे कुछ समझ नहीं आता और वह भाग खड़ा होता. जब सुहानी कई बार फोन कर के मिन्नतें करती तब जा कर वह आता. कामवाली डांट खा कर जबतब छुट्टी कर लेती. प्रैसवाला कईकई दिनों के लिए गायब हो जाता. सुहानी को काम करने वालों को रोकना मुश्किल हो रहा था. पर समीर थे कि अपने निठल्लेपन से बाज नहीं आ रहे थे.

काम वाले जबतब सुहानी से साहब की शिकायत करते रहते. सुहानी समीर को कई बार समझाती, ‘इन के पीछे क्यों पड़े रहते हो समीर. तुम अपने काम से काम रखा करो. इन सब को जैसे मैं इतने सालों से हैंडिल कर रही थी, अब भी कर लूंगी. तुम्हारे ऐसे रवैए से ये सब किसी दिन भाग खड़े होंगे.’

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पर समीर को तो लगता कि सब सुहानी को बेवकूफ बनाते हैं. उन के कानों पर जूं न रेंगती. उन के पास तो वक्त ही वक्त था इन सब बातों पर ध्यान देने के लिए. सुहानी कई कामों में लगी रहती. कई सामाजिक कामों से भी उस ने खुद को जोड़ रखा था. वह एक लेडीज क्लब की मैंबर भी थी. उसे समीर की इन बेकार की बातों से उलझन होती. वह चाहती, समीर भी अपनी नियमित दिनचर्या बनाएं, ताकि उन की सेहत भी ठीक रहे और वे किसी सामाजिक संस्था से भी जुड़ें जिस से व्यस्त रहें और से उन की मानसिक सेहत भी ठीक रहे.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

पराया माल हड़पने के चक्कर में : भाग 2

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‘‘ठीक है, उसे दिल्ली जा कर ही उठा लो. एक टीम को फौरन दिल्ली रवाना कर दो.’’ अंशुमान भोमिया ने आदेशात्मक स्वर में कहा.

इस से पहले कि मीटिंग बरखास्त होती, एसपी ने एएसपी अनंत कुमार शर्मा को निर्देश देते हुए कहा, ‘‘भुवनेश की गैरमौजूदगी में जो भी कैफे चला रहा है, उसे और भुवनेश के घर वालों को फौरन तलब करो.’’

जब पुलिस टीमें मृतक दुर्गेश के व्यावसायिक क्रियाकलापों, प्रौपर्टी तथा परिचितों का दायरा खंगाल रही थीं, उसी दौरान पुलिस की नजरों से सोशल मीडिया पर वायरल होता एक मैसेज गुजरा, जिस में भुवनेश सफाई देता नजर आ रहा था कि उस का इस मामले से कोई लेनादेना नहीं है. आखिर दुर्गेश की हत्या में उस का नाम क्यों उछाला जा रहा है?

हत्यारे ने दी सोशल मीडिया पर सफाई

इस से पहले कि पुलिस इस मामले को ठीक से समझ पाती, अगले दिन यानी 11 अगस्त को डीएसपी शिव भगवान गोदारा के पास एक फोन आया. फोन करने वाले आदमी ने अपना नाम भुवनेश बताते हुए पूछा, ‘‘साहब, इस मामले में मेरा नाम क्यों घसीटा जा रहा है? आखिर मुझ पर बेवजह क्यों शक किया जा रहा है, जबकि मैं तो दिल्ली में हूं.’’

उस का कहना था कि वह अगले दिन कोटा पहुंच जाएगा. डीएसपी गोदारा ने जब यह बात अंशुमान भोमिया को बताई तो एक पल के लिए वह भी चौंके, लेकिन अगले ही पल उन के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई. उन्होंने कहा, ‘‘गोदारा, यह कहावत गलत नहीं है कि अपराध अपराधी के सिर पर चढ़ कर बोलता है. अपराधी ने खुद ही हमें भटकने से बचा लिया. यही है हमारा शिकार. तुरंत इस फोन का लोकेशन ट्रेस करवाओ ताकि पता चल सके कि फोन कहां से किया गया था.’’

पुलिस ने जब भुवनेश के पिता और उस के बाघा कैफे का कारोबार संभालने वाले निशांत से भुवनेश के बारे में पूछताछ की तो थोड़ी हीलाहवाली के बाद उस ने बताया, ‘‘साहब, वह दिल्ली जाने की बात कह रहे थे. दिल्ली में उन की ससुराल भी है. शायद वहीं गए हों.’’

पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो उस ने हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘सर, मंगलवार शाम तक तो वह मेरे साथ ही थे, लेकिन उस के बाद मैं ने उन्हें नहीं देखा.’’

भुवनेश के पत्नी के साथ दिल्ली जाने की तसदीक हो चुकी थी. अंशुमान भोमिया थानाप्रभारी रामखिलाड़ी मीणा को दिल्ली जाने का निर्देश भी दे चुके थे. लिहाजा उन्होंने निशांत को हिरासत में ले कर उसे लौकअप में बंद किया और दिल्ली के लिए रवाना हो गए.

रामखिलाड़ी मीणा पुलिस टीम के साथ 12 अगस्त शनिवार की सुबह दिल्ली पहुंच गए. उन्होंने भुवनेश की ससुराल में फोन किया तो फोन उस के बजाय उस की पत्नी भावना ने उठाया. मीणा ने जब भुवनेश से बात कराने को कहा तो उस ने यह कहते हुए फोन रख दिया कि वह अभी सो रहे हैं.

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भावना द्वारा पुलिस को दिए गए दोटूक जवाब से भिन्नाए मीणा फौरन उस की ससुराल पहुंच गए. भावना ने उन से झूठ बोला था कि भुवनेश सो रहा है, जबकि वह वहां था ही नहीं.

पुलिस ने भावना को लिया हिरासत में

भावना के झूठ पर गुस्से से उबलते हुए मीणा उस पर बरस पड़े, ‘‘इस का मतलब है कि भुवनेश ने ही दुर्गेश को गोली मारी है और इस साजिश में तुम भी उस की साथी हो.’’

मीणा ने संदिग्ध मानते हुए भावना को हिरासत में लिया तो वह जबरदस्त विरोध पर उतर आई. उस ने दराज से प्रिस्क्रिप्शन निकाल कर दिखाते हुए कहा, ‘‘देख लीजिए, हम लोग तो 9 अगस्त से यहीं पर हैं. यहां आ कर वह बीमार पड़ गए. उन का इलाज चल रहा है. यह पर्चियां भी हैं डाक्टर की.’’

मीणा ने उन पर्चियों की तरफ निगाह उठा कर भी नहीं देखी. एक पल में ही सारा माजरा समझ चुके मीणा ने कहा, ‘‘तो फिर तुम्हारा बीमार पति यहां से गायब क्यों है? तुम ने पुलिस को बहकाने की कोशिश क्यों की? तुम्हारे पति का मोबाइल यहां है तो वह कहां हैं? पुलिस से यह लुकाछिपी नहीं चलेगी.’’

मीणा भुवनेश की पत्नी भावना को ले कर कोटा पहुंचने तक अंशुमान भोमिया निशांत से पूरी कहानी उगलवा चुके थे.

इस हत्याकांड की जड़ में स्टेशन रोड स्थित दुर्गेश मालवीय की 10 करोड़ कीमत की बेशकीमती इमारत थी, जिस में भुवनेश बाघा कैफे चला रहा था. इस कैफे से उसे ढाईतीन लाख रुपए महीने की अच्छीखासी कमाई हो रही थी. कैफे का हिसाबकिताब भुवनेश का भरोसेमंद निशांत संभालता था. भुवनेश उसे 6 हजार रुपए महीना वेतन देता था. निशांत स्टूडेंट था. उस के लिए यह रकम काफी थी. इतने से पढ़ाई का और उस का खर्च निकल जाता था. उसे कभी कुछ और जरूरत होती तो भुवनेश मना नहीं करता था.

पिछले एक साल से भुवनेश काफी परेशान था. वजह थी कैफे की इमारत खाली करने के लिए बढ़ते दबाव की. जबकि इस कैफे से उसे अच्छीखासी कमाई हो रही थी. बात सिर्फ उस फ्लोर को खाली करने की ही नहीं थी, भुवनेश का इरादा उस पूरी इमारत को हड़पने का था.

जब दबाव ज्यादा बढ़ा तो भुवनेश ने दुर्गेश को यह कह कर बहला दिया कि वह अगस्त में ग्राउंड फ्लोर खाली कर देगा. दुर्गेश को टालने के लिए अब तक वह मोहलत मांगता आ रहा था. उस का इरादा उस जगह को खाली करने का कतई नहीं था.

दबंग प्रवृत्ति के भुवनेश ने इमारत खाली करने के बजाय उस में टाइल्स लगवाने का काम शुरू कर दिया. दुर्गेश ने उस के इरादे देखे तो वह बुरी तरह भड़क उठा और उस ने तत्काल बिल्डिंग खाली करने को कह दिया. यह जुलाई के अंतिम सप्ताह की बात है. निशांत पलपल की स्थिति से वाकिफ था. बिल्डिंग खाली करने का मतलब था, रोजीरोटी का जरिया खत्म हो जाना, जो उसे कतई मंजूर नहीं था. निशांत भुवनेश के सुखदुख का साथी था. एक दिन उस ने भुवनेश से पूछा, ‘‘अब क्या करोगे भाईसाहब?’’

भुवनेश ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘तू फिक्र मत कर. कुछ ऐसा करेंगे कि सांप भी मर जाएगा और लाठी भी न टूटेगी. बस, तुझे मेरा साथ देना होगा.’’

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निशांत की इतनी मजाल नहीं थी कि उस के कहे को टाल दे. उस ने छाती चौड़ी कर के कहा, ‘‘आप कह कर तो देखें भाईसाहब, आप के लिए तो मैं जान दे सकता हूं.’’

‘‘जान देने की नहीं, लेने की बात कर.’’ भुवनेश ने कुटिल मुसकराहट के साथ निशांत का कंधा थपथपाते हुए कहा. बस इस के बाद दुर्गेश की हत्या की योजना बन गई.

दुर्गेश की जान लेने का मंसूबा बना कर भुवनेश ने पहले सुपारी देने के लिए अंडरवर्ल्ड को खंगाला. इस के लिए उस ने शूटर मुकेश खंगार उर्फ बच्चा और नंदू से संपर्क किया. लेकिन उन के द्वारा मांगी गई मोटी रकम की वजह से बात नहीं बनी. आखिर उस ने खुद ही दुर्गेश की हत्या का मन बना लिया.

इस काम में निशांत कदमदरकदम उस का साथ देता रहा. घर पर पिता से कहा कि तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए वह ससुराल जा कर इलाज कराएगा. इस के बाद भुवनेश पत्नी को ले कर मंगलवार 8 अगस्त को दिल्ली चला गया और दिल्ली के एक अस्पताल में भरती हो गया. यह सिर्फ एक दिखावा था.

इस तरह दिया गया हत्या को अंजाम

बुधवार 9 अगस्त की रात को भुवनेश कोटा आ गया. दिल्ली जाते समय वह अपना स्कूटर स्टेशन की पार्किंग में छोड़ गया था. वापसी में पार्किंग से स्कूटर ले कर वह घर पहुंचा और पिता को खबर न हो, इस तरह पिछवाड़े से घर में घुसा और चुपचाप अपने कमरे में जा कर सो गया.

अगले दिन गुरुवार 10 अगस्त की दोपहर को वह पीछे के रास्ते से घर से निकला और निशांत से मिला. भुवनेश के कहने पर निशांत घर से भुवनेश के पिता का स्कूटर ले आया. दोनों ने साथसाथ रेकी की. भुवनेश दुर्गेश की शाम की रोजमर्रा की बैठक के बारे में सब कुछ जानता था. लिहाजा उस ने रास्ते में लगे सीसीटीवी कैमरों की लोकेशन देखी और उसी के हिसाब से आनेजाने का रास्ता चुना. उस ने वारदात का समय भी ऐसा चुना, जिस से वारदात के बाद तुरंत ट्रेन से भाग सके.

इस में वह कामयाब भी हो गया. लेकिन जैसा कि हर अपराधी कोई न कोई गलती करता है. उसी तरह उस ने भी की और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे मैसेज को ले कर खामोश रहने के बजाय सफाई देने के लिए पुलिस को फोन कर दिया कि वह तो दिल्ली के अस्पताल में भरती था, वह कैसेदुर्गेश की हत्या कर सकता है?

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इस से वह तकनीकी जांच में फंस गया, क्योंकि जिस समय वह फोन कर के सफाई दे रहा था, उस समय उस के मोबाइल की लोकेशन कोटा की थी. इस मामले में एसपी अंशुमान भोमिया का अंदेशा सही निकला. उस की योजना की रहीबची बखिया दिल्ली से लौटी पुलिस टीम ने उधेड़ दी. हत्याकांड के ढाई महीने बीतने के बाद भी अभी भुवनेश पुलिस की गिरफ्त से बाहर है. निशांत न्यायिक हिरासत में है. भुवनेश की पत्नी भावना भी अभी संदेह के बाहर नहीं है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

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पराया माल हड़पने के चक्कर में

पराया माल हड़पने के चक्कर में : भाग 1

गुरुवार 10 अगस्त की रात के करीब 10 बजे कोटा रेलवे स्टेशन पर रोज की तरह अच्छीखासी गहमागहमी थी. अजमेर से जयपुर होती हुई कोटा पहुंचने वाली जबलपुर एक्सप्रेस निर्धारित समय से लगभग आधा घंटा देरी से पहुंची थी, इसलिए बाहर निकलती सवारियों, दुपहिया, तिपहिया वाहनों और कारों की आवाजाही के कोलाहल में ठीक से कुछ भी सुनाई देना मुश्किल हो रहा था. स्टेशन के बाहरी क्षेत्र को बजरिया कहते हैं, उसी से सटा डडवाड़ा रिहायशी इलाका है.

डडवाड़ा के रहने वाले प्रौपर्टी व्यवसाई दुर्गेश मालवीय रोज के इस शोरगुल के अभ्यस्त थे. उस समय वह स्टेशन के बाहर बने सुलभ कौंप्लेक्स के पास लगी बेंचों में से एक पर बैठे अपने करीबी दोस्त मंगेश कुमावत के साथ बातों में मशगूल थे. दुर्गेश भाजपा संगठन के स्थानीय पदाधिकारी थे और मंगेश कार्यकर्ता. उन के बीच पार्टी को ले कर ही बातें हो रही थीं.

दोनों आगेपीछे की बेचों पर बैठे थे. पलभर के लिए मंगेश स्टेशन से निकलती भीड़ को देखने लगे, तभी 2 धमाके हुए और दुर्गेश मालवीय चीख कर बेंच से नीचे लुढ़क गए. मंगेश ने मुंह घुमा कर देखा तो उन्हें एक हेलमेटधारी तेजी से बाईं ओर की कासिम गली की तरफ भागता नजर आया. उस ने मुंह पर रूमाल बांध रखा था. मंगेश ने पलट कर दुर्गेश की तरफ देखा तो उस की आंखें फटी रह गईं.

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दुर्गेश बेंच के नीचे गिरा छटपटा रहा था. उस की कनपटी से तेजी से खून बह रहा था. निस्संदेह पिछली बेंच पर बैठा दुर्गेश किसी शूटर की गोली का शिकार हुआ था. उस ने तुरंत दुर्गेश को संभालने की कोशिश की. इस बीच इलाके के तमाम लोग वहां आ गए थे.

घायल दुर्गेश को डाक्टरों ने मृत घोषित किया

दुर्गेश की हालत बहुत नाजुक थी. मंगेश ने अन्य लोगों की मदद से दुर्गेश को तुरंत एमबीएस अस्पताल पहुंचाया. इस घटना से वहां अफरातफरी सी मच गई थी, जिस से पूरा ट्रैफिक अस्तव्यस्त हो गया था. लोगों ने पुलिस को खबर की तो अतिरिक्त एडिशनल एसपी अनंत कुमार, डीएसपी शिव भगवान गोदारा और थाना भीममंडी के थानाप्रभारी रामखिलाड़ी  मीणा पहले घटनास्थल पर पहुंचे, उस के बाद अस्पताल. एसपी अंशुमान भोमिया को भी घटना की खबर मिल चुकी थी. वह भी अस्पताल पहुंच गए थे.

दुर्गेश के घर वालों को भी मामले की जानकारी मिल चुकी थी. वे भी अस्पताल आ गए थे. उन के रोनेधोने से अस्पताल का माहौल मातमी हो गया था. क्योंकि डाक्टर दुर्गेश को मृत घोषित कर चुके थे. थानाप्रभारी रामखिलाड़ी मीणा ने घटनास्थल का निरीक्षण कर वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की. लेकिन इस के अलावा कोई कुछ नहीं बता सका कि घटना इतनी जल्दी में घटी थी कि हत्यारे को कोई देख नहीं सका.

इस पूछताछ में पता चला कि दुर्गेश का प्रौपर्टी को ले कर किसी से विवाद चल रहा था. लेकिन बताने वालों के आतंकित चेहरों को देख कर साफ लग रहा था कि वे कुछ और भी जानते हैं.  पुलिस ने प्राथमिक काररवाई में आसपास के सीसीटीवी कैमरे भी खंगाले और वीडियो फुटेज भी लिए, ताकि सभी सबूतों की कड़ी से कड़ी जोड़ कर देखा जा सके.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि हत्यारे ने दुर्गेश के सिर में 2 गोलियां मारी थीं. खास बात यह थी कि जिस तरह से टारगेट बना कर गोलियां दागी गई थीं, वह किसी शार्प शूटर का ही काम हो सकता था. गोलियां काफी नजदीक से चलाई गई थीं और दुर्गेश की मृत्यु घटनास्थल पर ही हो गई थी.

प्रौपर्टी को ले कर विवाद सामने आया

देर रात रिपोर्ट दर्ज करवाते हुए दुर्गेश के बड़े भाई ओमप्रकाश मालवीय ने आशंका जताई थी कि दुर्गेश का एक भूखंड आकाशवाणी कालोनी में है, जिस पर कुछ लोगों ने कब्जा कर रखा है. उसे ले कर मृतक का उन लोगों से विवाद चल रहा था. इस की शिकायत संबंधित थाने में भी दर्ज करवाई गई थी. ओमप्रकाश का कहना था कि मंगेश हत्यारे के पीछे भागा भी, लेकिन वह हाथ नहीं आया.

एसपी अंशुमान भोमिया ने हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने के लिए प्रशिक्षु आरपीएस सीमा चौहान के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में एएसपी अनंत कुमार, डीएसपी शिव भगवान गोदारा, सीओ राजेश मेश्राम, थानाप्रभारी रामखिलाड़ी मीणा, शिवराज गुर्जर, हरीश भारती, विजय शंकर शर्मा, लोकेंद्र पालीवाल, महावीर सिंह और एसआई राजेश व दिनेश त्यागी को शामिल किया गया.

इस टीम में 6 थानाप्रभारियों के अलावा 15 जवान भी शामिल किए गए थे. हत्याकांड के खुलासे के लिए गठित पुलिस टीमों को स्टेशन तथा शहर के अन्य इलाकों में पूछताछ के लिए सक्रिय करने के बाद देर रात एसपी अंशुमान भोमिया ने एएसपी अनंत कुमार के साथ इस हत्याकांड के विभिन्न पहलुओं पर बात की.

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पुलिस को शक था कि शूटर से कराई है हत्या

अंशुमान भोमिया का कहना था कि यह कैसे संभव है कि कोई शख्स भीड़भाड़ वाले इलाके में, जहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, इतना बेखौफ हो कर सधे अंदाज में एक आदमी को गोली मार कर भाग जाए? निस्संदेह वह कोई शातिर शूटर रहा होगा. हत्यारे ने जिस तरह अपने आप को सीसीटीवी कैमरों से बचाए रखा, जाहिर है कि उस ने या तो वारदात से पहले वहां की रैकी की होगी या फिर वह वहां के चप्पेचप्पे से वाकिफ था.

एक क्षण रुक कर उन्होंने आगे कहा, ‘‘हत्यारा जरूर मृतक का करीबी रहा होगा, जिसे उस की रोज की गतिविधियों की खबर थी. उसे पता था कि रात के 8-9 बजे के बीच दुर्गेश की वहां बैठक होती है.’’

भोमिया साहब ने आगे कहा, ‘‘घटनास्थल पर जद्दोजहद के कोई निशान नहीं मिले, जिस से यह मान लिया जाता कि वहां कोई झगड़ा हुआ था, जिसे छिपाया जा रहा है. यह मामला लूटपाट का भी नहीं है. वारदात का अकेला प्रत्यक्षदर्शी मंगेश कुमावत नहीं, सैकड़ों लोग हैं, जिन्होंने हत्यारे को दुर्गेश पर गोली चलाते देखा है. मुझे लगता है कि यह मामला सीधेसीधे रंजिश का है. ऐसी रंजिश, जिस में आदमी मरने या मारने पर उतारू हो जाता है.’’

‘‘लेकिन सर, रंजिश तो और भी कई तरीकों से निकाली जा सकती है. यह तो बड़े हौसले और दबंगई से अंजाम दिया गया कारनामा है. कोई शख्स भीड़ भरे इलाके में आया और अपने टारगेट को निशाना बना कर चलता बना.’’

एक पल रुक कर अनंत कुमार ने आगे कहा, ‘‘सर, यहां मृतक के दोस्त मंगेश के बारे में उन के भाई ओमप्रकाश मालवीय का बयान गलत है कि वह हत्यारे के पीछे भागे थे. क्योंकि उस स्थिति में तो उसे घायल दुर्गेश को संभालना चाहिए था.’’

‘‘बिलकुल सही कह रहे हो.’’ अंशुमान भोमिया ने संजीदा हो कर कहा, ‘‘तो फिर रंजिश की वजह जानने की कोशिश करनी होगी और जैसा कि मृतक का कारोबार यानी प्रौपर्टी का धंधा था, जरूर कोई वजह इसी से जुड़ी हो सकती है. हमें दो बातों पर ध्यान देना होगा. पहला, यह कि मृतक की संपत्ति कहांकहां है और दूसरे जैसा कि उस के बड़े भाई ओमप्रकाश मालवीय का कहना है कि वारदात संपत्ति को ले कर हो सकती है तो मृतक की ऐसी कौन सी प्रौपर्टी थी, जिसे ले कर दुर्गेश के किसी के साथ फसादी रिश्ते बन गए थे. ऐसी कड़वाहट पैदा हो गई थी कि नौबत यहां तक आ पहुंची.’’

पुलिस ने पता लगा लिया हत्यारे का

इस से पहले कि मीटिंग समाप्त होती, प्रशिक्षु आरपीएस सीमा चौहान ने वहां पहुंच कर जो कुछ बताया, वह एसपी अंशुमान भोमिया के अंदेशे को सही ठहराने वाला था. सीमा चौहान ने तफ्सील से खुलासा करते हुए कहा, ‘‘सर, हम ने मुकेश खंगार उर्फ बच्चा को हिरासत में लिया है. उस ने एक चौंकाने वाली बात बताई है. उस का कहना है कि उसे इस मर्डर की योजना की खबर पहले से थी. उस के अनुसार, भुवनेश शर्मा ने उस से संपर्क साधने की कोशिश की थी. लिहाजा भुवनेश ने दुर्गेश के लिए उन शूटरों को सुपारी दी होगी.’’

इस खुलासे ने अंशुमान भोमिया को हैरानी में डाल दिया था. उन्होंने पूछा, ‘‘कौन भुवनेश?’’

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सीमा चौहान ने बताया, ‘‘सर, दुर्गेश की सब से बड़ी प्रौपर्टी स्टेशन रोड स्थित तिमंजिला इमारत है, जिस की कीमत करोड़ों में बताई जाती है. इस इमारत का ग्राउंड फ्लोर दुर्गेश ने पूनम कालोनी में रहने वाले भुवनेश शर्मा को किराए पर दे रखा था. भुवनेश इस हिस्से में पिछले 5 सालों से बाघा कैफे चला रहा है. सुना है, भुवनेश को कैफे से हर महीने ढाईतीन लाख की कमाई होती है.

लेकिन पिछले साल दुर्गेश ने भुवनेश को ग्राउंड फ्लोर खाली करने को कह दिया था. काफी हीलाहवाली के बाद तय हुआ कि वह अगस्त में इमारत खाली कर देगा. लेकिन अगस्त की शुरुआत में दुर्गेश ने जब भुवनेश को ग्राउंड फ्लोर में टाइल्स लगवाते देखा तो उस का माथा ठनका. इस से पहले कि दुर्गेश उस से फ्लोर खाली करने को कहता, भुवनेश उसे नहीं मिला. पता चला कि वह अपनी पत्नी के साथ दिल्ली गया हुआ था.’’

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शर्तों वाला प्यार: भाग 2

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उस की मौत अधिक खून बहने व सिर की हड्डी टूटने से हुई थी. दुष्कर्म की आशंका के चलते 2 स्लाइडें भी बनाई गईं.

पुलिस को मृतका का मोबाइल फोन न तो घटनास्थल से मिला था और न ही घर वालों ने उस की जानकारी दी थी. पुलिस ने इस बारे में मृतका की मां शिवदेवी तथा उस की बेटियों से पूछताछ की.

शिवदेवी ने कहा कि अन्नपूर्णा के पास मोबाइल नहीं था. लेकिन जब उस की बेटियों से अलग से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि उस के पास मोबाइल था.

अगर उस के पास मोबाइल था, तो शिवदेवी ने क्यों मना किया, यह बात पुलिस की समझ से परे थी. लिहाजा पुलिस ने जब अपने तेवर सख्त किए तो घर वालों से पुलिस ने 3 मोबाइल फोन बरामद किए.

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पुलिस ने जब तीनों फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो एक फोन की डिटेल्स से पता चला कि अन्नपूर्णा हरिओम के अलावा कई अन्य युवकों से भी बात करती थी. काल डिटेल्स के आधार पर पुलिस ने 3 युवकों को पूछताछ के लिए उठाया.

इन में एक सोनू था, जो मृतका का पड़ोसी था. जांचपड़ताल से पता चला कि सोनू और अन्नपूर्णा के बीच प्रेमसंबंध थे. सोनू का उस के घर भी आनाजाना था.

सोनू अन्नपूर्णा पर खूब खर्चा करता था, यह पता चलते ही पुलिस ने 2 युवकों को तो छोड़ दिया पर सोनू से सख्ती से पूछताछ की. सोनू ने अन्नपूर्णा के साथ अपने प्रेमसंबंधों को तो स्वीकर किया लेकिन हत्या से साफ इनकार कर दिया. पुलिस ने उसे हिदायत दे कर थाने से भेज दिया.

पुलिस अधिकारियों को औनर किलिंग का भी शक था. उन का शक यूं ही नहीं था. उस के कई कारण थे. पहला कारण तो यह था कि परिजनों द्वारा बेटी की खोजबीन करना तो दूर पुलिस को सूचना तक नहीं दी थी. दूसरा कारण हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराने में आनाकानी करना था और तीसरा कारण मोबाइल के लिए झूठ बोलना था.

हत्या के रहस्य को उजागर करने के लिए पुलिस ने मृतका की मां शिवदेवी, बुआ सुमन तथा बहन प्रियंका, प्रगति व नेहा से अलगअलग पूछताछ की. इन सभी के बयानों में विरोधाभास तो था, लेकिन हत्या की गुत्थी फिर भी नहीं सुलझ पाई. पड़ोसियों से भी पूछताछ की गई, पर पुलिस ऐसा कोई सबूत हासिल नहीं कर सकी, जिस से हत्या की गुत्थी सुलझ पाती.

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हत्याकांड का खुलासा करने के लिए पुलिस अधिकारियों ने जब बेंजीडीन टेस्ट कराने का निश्चय किया. बेंजीडीन टेस्ट से खून के उन धब्बों का पता चल जाता है, जो मिट गए हों या धोपोंछ कर मिटा दिए गए हों. इस टेस्ट में एक महीने बाद तक खून के निशान का पता चल जाता है. अन्नपूर्णा की हत्या हुए एक सप्ताह बीत गया था. अत: बेंजीडीन टेस्ट से खुलासा संभव था.

29 अप्रैल, 2019 को एसपी (पश्चिम) संजीव कुमार सुमन थाना बिठूर पहुंचे. थाने पर उन्होंने बेंजीडीन टेस्ट के लिए फोरेंसिक टीम को भी बुलवा लिया. इस के बाद थानाप्रभारी विनोद कुमार सिंह ने मृतका के घर वालों को थाने बुलवा लिया. थाने में फोरैंसिक टीम ने मृतका के मातापिता, भाई व बड़ी बहन पर टेस्ट किया तो रिपोर्ट पौजिटिव आई.

हत्या का शक परिवार वालों पर गहराया तो पुलिस अधिकारियों ने राकेश, उस की पत्नी शिवदेवी, बेटी प्रियंका तथा बेटे अमित को एक ही कमरे में आमनेसामने बिठा कर कहा कि तुम लोगों के खिलाफ हत्या का सबूत मिल गया है. बेंजीडीन टेस्ट में तुम लोगों के हाथों में मृतका के खून के रक्तकण मिले हैं. इसलिए तुम लोग सच बता दो कि तुम ने अन्नपूर्णा की हत्या क्यों की?

बेटी की हत्या के आरोप में अपने परिवार को फंसता देख राकेश हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘साहब, मैं ने या मेरे परिवार के किसी सदस्य ने अन्नपूर्णा की हत्या नहीं की. हम सब निर्दोष हैं. रही बात बेंजीडीन टेस्ट की तो अन्नपूर्णा की लाश उठाते समय हाथों में खून लग गया होगा. मेरी पत्नी व बेटी ने भी रोते समय अन्नपूर्णा के सिर पर हाथ रखा होगा, जिस से खून लग गया होगा.’’

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चुनावों की वजह से लटक गई जांच

पुलिस अधिकारियों को लगा कि राकेश जो कह रहा है, वह सच भी हो सकता है. अत: उन्होंने उन सभी को गिरफ्तार करने के बजाए थाने से घर भेज दिया. पुलिस जांच को आगे बढ़ाती उस के पहले ही लोकसभा चुनाव का आगाज हो गया.

पुलिस चुनाव की वजह से व्यस्त हो गई. जिस से जांच एकदम ढीली पड़ गई. या यूं कहें कि अन्नपूर्णा हत्याकांड की जांच ठंडे बस्ते में चली गई. लगभग डेढ़ माह तक पुलिस चुनावी चक्कर में व्यस्त रही.

चुनाव निपट जाने के बाद पुलिस अधिकारियों को अन्नपूर्णा हत्याकांड की फिर से याद आई. पुलिस अधिकारियों ने एक बार फिर समूचे घटनाक्रम पर विचारविमर्श किया. साथ ही जांच रिपोर्ट का अध्ययन किया गया. इस के बाद पुलिस इस निष्कर्ष  पर पहुंची कि अन्नपूर्णा की हत्या औनर किलिंग का मामला नहीं है. उस की हत्या प्रेमसंबंधों में की गई थी.

अन्नपूर्णा के 2 युवकों से घनिष्ठ संबंध थे. एक ट्रांसपोर्टर हरिओम, जिस के दफ्तर में वह काम करती थी और दूसरा उस का पड़ोसी सोनू, जिस का उस के घर आनाजाना था. दोनों के प्यार के चर्चे भी आम थे. पुलिस अधिकारियों का मानना था कि हरिओम और सोनू में से कोई एक है जिस ने प्यार के प्रतिशोध में अन्नपूर्णा की हत्या की है.

पुलिस ने सब से पहले हरिओम को थाने बुलवाया और उस से करीब 4 घंटे तक सख्ती से पूछताछ की. लेकिन हरिओम ने हत्या का जुर्म नहीं कबूला. पुलिस को लगा कि हरिओम कातिल नहीं है तो उसे जाने दिया गया.

इस के बाद पुलिस ने सोनू को थाने बुलवाया और उस से भी कई राउंड में सख्ती से पूछताछ की गई. लेकिन सोनू टस से मस नहीं हुआ. सोनू को 3 दिन तक थाने में रखा गया और हर रोज सख्ती से पूछताछ की गई. पर सोनू ने हत्या का जुर्म नहीं कबूला. मजबूरन उसे भी थाने से घर भेज दिया गया.

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लाख कोशिशों के बाद भी पुलिस को सफलता नहीं मिल रही थी. अंतत: पुलिस ने खुफिया तंत्र का सहारा लिया. थानाप्रभारी विनोद कुमार सिंह ने नारामऊ, मंधना और बिठूर क्षेत्र में अपने खास मुखबिर लगा दिए और खुद भी खोजबीन में लग गए.

2 अगस्त, 2019 की सुबह करीब 10 बजे एक मुखबिर ने थानाप्रभारी को अन्नपूर्णा हत्याकांड के बारे में जो जानकारी दी उसे सुन कर उन के चेहरे पर मुसकान तैर आई. मुखबिर ने बताया कि अन्नपूर्णा के प्रेमी सोनू ने उस की हत्या अपने 2 अन्य साथियों के साथ मिल कर की थी. इन में उस का एक दोस्त नारामऊ गांव का विनीत है. जबकि दूसरे का नाम शिवम है. वह रामादेवीपुरम, पचौर रोड मंधना में रहता है.’’

मुखबिर की बात सुनने के बाद थानाप्रभारी विनोद कुमार सिंह ने सोनू के दोस्त विनीत व शुभम को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब उन दोनों से अन्नपूर्णा की हत्या के संबंध में सख्ती से पूछताछ की गई तो दोनों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उन दोनों ने बताया कि अन्नपूर्णा की हत्या उस के प्रेमी सोनू ने ही की थी. उन्होंने तो दोस्ती में उस का साथ दिया था.

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14 अप्रैल को मंधना स्थित गेस्ट हाउस में पहले गोद भराई की रस्म पूरी हुई फिर देर शाम धूमधाम से तिलक समारोह संपन्न हुआ. इस समारोह में हरिओम और सोनू भी शामिल हुए. समारोह के दौरान सोनू ने अन्नपूर्णा से मिलने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वह मिल न सकी.

राकेश के घर में शादी की चहलपहल शुरू हो गई थी. रिश्तेनातेदारों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था. घर में मंडप गड़ चुका था और मंडप के नीचे ढोलक की थाप पर मंगल गीत गाए जाने लगे थे.

इधर ज्योंज्यों शादी की तारीख नजदीक आती जा रही थी, त्योंत्यों सोनू की बेचैनी बढ़ रही थी. उसे अन्नपूर्णा की बेवफाई पर गुस्सा भी आ रहा था. आखिर जब उस की बेचैनी ज्यादा बढ़ी तो उस ने अन्नपूर्णा से आखिरी बार आरपार की बात करने का निश्चय किया.

उस ने इस बाबत अपने दोस्त विनीत और शुभम से बात की तो दोनों उस का साथ देने को राजी हो गए. विनीत नारामऊ में रहता था और उस की मोबाइल शौप थी. जबकि शुभम पंचोर रोड पर रहता था. दोनों को जब भी पैसों की जरूरत पड़ती, सोनू उन की मदद कर देता था. जिस से वह उस के अहसान तले दबे थे.

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16 अप्रैल, 2019 की रात 8 बजे सोनू मोटरसाइकिल से अन्नपूर्णा के घर के पास पहुंचा. उस के साथ उस के दोस्त विनीत और शुभम भी थे. सोनू ने मोटरसाइकिल सड़क किनारे ठेली लगा कर अंडे बेचने वाले के पास खड़ी कर दी. फिर उस ने विनीत को समझाबुझा कर अन्नपूर्णा को बुलाने भेजा.

विनीत अन्नपूर्णा के घर पहुंचा तो संयोग से वह उसे घर के बाहर ही मिल गई. विनीत ने उसे सोनू का संदेश दे कर साथ चलने को कहा. लेकिन अन्नपूर्णा ने साथ जाने और सोनू से बात करने से साफ इनकार कर दिया. इस पर विनीत ने अपने फोन पर अन्नपूर्णा की बात सोनू से कराई.

अन्नपूर्णा ने सोनू से फोन पर बात की और मिलने से साफ इनकार कर दिया. इस पर सोनू ने उस से कहा कि वह आखिरी बार उस से मिलना चाहता है. साथ ही धमकी भी दी कि यदि वह उस से मिलने न आई तो वह शादी वाले दिन ही उस के घर पर आत्महत्या कर लेगा.

प्रेमी बन गया कातिल

अन्नपूर्णा सोनू की धमकी से डर गई और उस से आखिरी बार मिलने को राजी हो गई. अन्नपूर्णा विनीत के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर सोनू के पास पहुंची. सोनू अन्नपूर्णा और अपने दोनों दोस्तों के साथ मोटरसाइकिल से दलहन अनुसंधान केंद्र के पास लिंक रोड पर पहुंच गया. वहां उस ने मोटरसाइकिल रोक दी. तब तक रात के 9 बज चुके थे और लिंक रोड पर सन्नाटा पसरा था.

विनीत और शुभम तो मोटरसाइकिल से उतर कर किनारे खड़े हो गए. जबकि सोनू अन्नपूर्णा से बतियाने लगा. बातचीत के दौरान सोनू बोला, ‘‘अन्नपूर्णा तुम ने मेरे साथ बेवफाई क्यों की? प्यार मुझसे किया और शादी किसी और से कर रही हो, ऐसा नहीं हो सकता. मैं ने तुम पर लाखों रुपए खर्च किए हैं. उपहार में ज्वैलरी दी है. या तो तुम मेरे रुपए ज्वैलरी वापस कर दो या फिर मुझ से शादी करो.’’

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सोनू की बात सुन कर अन्नपूर्णा गुस्से में बोली, ‘‘सोनू, रुपए ज्वैलरी दे कर तुम ने मुझ पर कोई एहसान नहीं किया है. उस के बदले तुम ने मेरे शरीर का भी तो शोषण किया था. अब हिसाबकिताब बराबर. मेरा रास्ता अलग और तुम्हारा रास्ता अलग.’’

‘‘अन्नू, अभी हिसाबकिताब बरबार नहीं हुआ है. तुम मेरी दुलहन नहीं हुई तो मैं तुम्हें किसी और की दुलहन नहीं बनने दूंगा.’’ इतना कह कर सोनू ने मोटरसाइकिल से लोहे की रौड निकाली जिसे वह साथ लाया था और अन्नपूर्णा के सिर पर भरपूर प्रहार कर दिया. अन्नपूर्णा जमीन पर बिछ गई. इस के बाद उस ने 2-3 प्रहार और किए.

इसी बीच उस की नजर ईंट पर पड़ी. उस ने ईंट से प्रहार कर उस का सिर मुंह, कुचल डाला. उस ने हाथ व कमर पर भी प्रहार किए. अन्नपूर्णा कुछ देर तड़पी फिर सदा के लिए शांत हो गई. सोनू का रौद्र रूप देख कर विनीत और शिवम डर गए. इस के बाद सोनू दोस्तों के साथ घटनास्थल से भाग गया.

इधर सुबह 8 बजे दलहन अनुसंधान केंद्र के सुरक्षाकर्मी के.पी. सिंह ने लिंक रोड के किनारे एक युवती की लाश पड़ी देखी तो यह सूचना थाना बिठूर पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही बिठूर थानाप्रभारी विनोद कुमार सिंह घटनास्थल पहुंचे और जांच शुरू कर दी.

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लेकिन पुलिस जांच में उलझ गई. आखिर 3 महीने बाद अन्नपूर्णा की हत्या का खुलासा हुआ और कातिल पकड़े गए. अभियुक्तों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन की निशानदेही पर लोहे की रौड, खूनसनी ईंट तथा सोनू की मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली.

3 अगस्त, 2019 को पुलिस ने अभियुक्त सोनू, विनीत व शुभम को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया जहां से उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

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