समाधान

लेखक- शकुंतला शर्मा

 

‘‘मैं ने पहचाना नहीं आप को,’’ असीम के मुंह से निकला.

‘‘अजी जनाब, पहचानोगे भी कैसे…खैर मेरा नाम रूपेश है, रूपेश मनकड़. मैं इंडियन बैंक में प्रबंधक हूं,’’ आगुंतक ने अपना परिचय देते हुए कहा.

‘‘आप से मिल कर बड़ी खुशी हुई. कहिए, आप की क्या सेवा करूं?’’ दरवाजे पर खड़ेखड़े ही असीम बोला.

‘‘यदि आप अंदर आने की अनुमति दें तो विस्तार से सभी बातें हो जाएंगी.’’

‘‘हांहां आइए, क्यों नहीं,’’ झेंपते हुए असीम बोला, ‘‘इस अशिष्टता के लिए माफ करें.’’

ड्राइंगरूम में आ कर वे दोनों सोफे पर आमनेसामने बैठ गए.

‘‘कहिए, क्या लेंगे, चाय या फिर कोई ठंडा पेय?’’

‘‘नहींनहीं, कुछ नहीं, बस आप का थोड़ा सा समय लूंगा.’’

‘‘कहिए.’’

‘‘कुछ दिन पहले आप के बड़े भाई साहब मिले थे. हम दोनों ही ‘सिकंदराबाद क्लब’ के सदस्य थे और कभीकभी साथसाथ गोल्फ भी खेल लेते…’’

‘‘अच्छा…यह तो बहुत ही अच्छी बात है कि आप से उन की मुलाकात हो जाती है वरना वह तो इतने व्यस्त रहते हैं कि हम से मिले महीनों हो जाते हैं,’’ असीम ने शिकायती लहजे में कहा.

‘‘डाक्टरों की जीवनशैली तो होती ही ऐसी है, पर सच मानिए उन्हें आप की बहुत चिंता रहती है. बातोंबातों में उन्होंने बताया कि 3 साल पहले आप की पत्नी का आकस्मिक निधन हो गया था. आप का 4 साल का एक बेटा भी है…’’

ये भी पढ़ें- पुराने नोट

‘‘जी हां, वह दिन मुझे आज भी याद है. मेरी पत्नी आभा का जन्मदिन था. टैंक चौराहे के पास सड़क पार करते समय पुलिस की जीप उसे टक्कर मारती निकल गई थी. मेरा पुत्र अनुनय उस की गोद में था. उसे भी हलकी सी खरोंचें आई थीं, पर आभा तो ऐसी गिरी कि फिर उठी ही नहीं…’’

‘‘मुझे बहुत दुख है, आप की पत्नी के असमय निधन का, पर मैं यहां किसी और ही कारण से आया हूं.’’

‘‘हांहां, कहिए न,’’ असीम अतीत को बिसारते बोला.

‘‘जी, बात यह है कि मेरी ममेरी बहन मीता ऐसी ही हालत में विवाह के ठीक 2 माह बाद अपना पति खो बैठी थी. मैं ने सोचा यदि आप दोनों एकदूसरे का हाथ थाम लें तो जीवन में पहले जैसी खुशियां पुन: लौट सकती हैं,’’ कह कर रूपेश तो चुप हो गया, मगर असीम को किंकर्तव्यविमूढ़ कर गया.

‘‘देखिए रूपेश बाबू, मैं ने तो दूसरे विवाह के संबंध में कभी कुछ सोचा ही नहीं. पहले भी कई प्रस्ताव आए पर मैं ने अस्वीकार कर दिए. मैं नहीं चाहता कि मेरे पुत्र पर सौतेली मां का साया पड़े,’’ कहते हुए असीम ने अपना मंतव्य स्पष्ट किया.

‘‘मैं अपनी बहन की तारीफ केवल इसलिए नहीं कर रहा हूं कि मैं उस का भाई हूं बल्कि इसलिए कि उस का स्वभाव इतना मोहक है कि वह परायों को भी अपना बना ले. फिर भी मैं आप पर कोई जोर नहीं डालना चाहता. आप दोनों एकदूसरे से मिल लीजिए, जानसमझ लीजिए. यदि आप दोनों को लगे कि आप एकदूसरे का दुखसुख बांट सकते हैं, तभी हम बात आगे बढ़ाएंगे,’’ कहते हुए रूपेश ने अपनी जेब से एक कागज निकाल कर असीम को थमा दिया, जिस में मीता का जीवनपरिचय था. मीता नव विज्ञान विद्यालय में भौतिकी की व्याख्याता थी.

फिर रूपेश एक प्याला चाय पी कर असीम से विदा लेते हुए बोला, ‘‘आप जब चाहें मुझ से फोन पर संपर्क कर सकते हैं,’’ कह कर वह चला गया.

इस मामले में ज्यादा सोचविचार के लिए असीम के पास समय नहीं था. उसे तैयार हो कर कार्यालय पहुंचना था, इस जल्दी में वह रूपेश और उस की बहन मीता की बात पूरी तरह भूल गया.

कार्यालय पहुंचते ही ‘नीलिमा’ उस के सामने पड़ गई. हालांकि वह उस से बच कर निकल जाना चाहता था.

‘‘कहिए महाशय, कहां रहते हैं आजकल? आज सुबह पूरे आधे घंटे तक बस स्टाप पर लाइन में खड़ी आप का इंतजार करती रही,’’ नीलिमा ने शिकायती लहजे में कहा.

‘‘यानी मुझ में और बस में कोई अंतर ही नहीं है…’’ कहते हुए असीम मुसकराया.

‘‘है, बहुत बड़ा अंतर है. बस तो फिर भी ठीक समय पर आ गई थी पर श्रीमान असीम नहीं पधारे थे.’’

‘‘बहुत नाराज हो? चलो, आज सारी नाराजगी दूर कर दूंगा. आज अच्छी सी एक फिल्म देखेंगे और रात का खाना भी अच्छे से एक रेस्तरां में…’’ असीम बोला.

‘‘नहीं, आज नहीं. इंदौर से मेरे मांपिताजी आए हुए हैं. 3 दिन तक यहीं रुकेंगे. उन के जाने के बाद ही मैं तुम्हारे साथ कहीं जा पाऊंगी.’’

‘‘अरे वाह, तुम तो अपने पति और सासससुर तक की परवा नहीं करतीं फिर मांपिताजी…’’ असीम ने व्यंग्य में कहा.

‘‘मांपिताजी की परवा करनी पड़ती है. तुम तो जानते ही हो कि देर से जाने पर सवालों की झड़ी लगा देंगे. परिवार के सम्मान और समाज की दुहाई देंगे. फिर 3 दिन की ही तो बात है, क्यों खिटपिट मोल लेना. पति और सासससुर भी कहतेसुनते रहते हैं, पर सदा साथ ही रहना है, लिहाजा, मैं चिंता नहीं करती,’’ कहती हुई नीलिमा हंसी.

‘‘पता नहीं, तुम्हारे तर्क तो बहुत ही विचित्र होते हैं. पर नीलू आज शाम की चाय साथ पिएंगे, तुम से जरूरी बात करनी है,’’ असीम बोला.

‘‘नहीं, तुम्हारे साथ चाय पी तो मेरी बस निकल जाएगी. दोपहर का भोजन साथ लेंगे. आज तुम्हारे लिए विशेष पकवान लाई हूं.’’

‘‘ठीक है, आशा करता हूं उस समय कोई मीटिंग न चल रही हो.’’

‘‘देर हो भी गई तो मैं इंतजार करूंगी,’’ कहती हुई नीलिमा अपने केबिन की ओर बढ़ गई.

कार्यालय की व्यस्तता में असीम भोजन की बात भूल ही गया था पर भोजनावकाश में दूसरों को जाते देख उसे नीलिमा की याद आई तो वह लपक कर कैंटीन में जा पहुंचा.

‘‘यह देखो, गुलाबजामुन और मलाईकोफ्ता…’’ नीलिमा अपना टिफिन खोलते हुए बोली.’’

‘‘मेरे मुंह में तो देख कर ही पानी आ रहा है. मैं तो आज केवल डबलरोटी और अचार लाया हूं. समय ही नहीं मिला,’’ असीम कोफ्ते के साथ रोटी खाते हुए बोला.

‘‘ऐसा क्या करते रहते हो जो अपने लिए कुछ बना कर भी नहीं ला सकते? सच कहूं, तुम्हें कैंटिन के भोजन की आदत पड़ गई है.’’

‘‘तुम जो ले आती हो रोजाना कुछ न कुछ…पर सुनो, आज बहुत ही अजीब बात हुई. एक अजनबी आ टपका. रूपेश नाम था उस का, उम्र में मुझ से 1-2 साल का अंतर होगा. कहने लगा, मेरे भाई डाक्टर उत्तम से उस का अच्छा परिचय है,’’ असीम ने बताया.

‘‘अरे, तो कह देते तुम्हें कार्यालय जाने को देर हो रही है.’’

‘‘बात इतनी ही नहीं थी नीलू, वह अपनी ममेरी बहन का विवाह प्रस्ताव लाया था. विवाह के कुछ माह बाद ही बेचारी के पति का निधन हो गया था.’’

‘‘तुम ने कहा नहीं कि दोबारा से ऐसा साहस न करें.’’

‘‘नहीं, मैं ने ऐसा कुछ नहीं कहा बल्कि मैं ने तो कह दिया कि विवाह प्रस्ताव पर विचार करूंगा.’’

‘‘देखो असीम, फिर से वही प्रकरण दोहराने से क्या फायदा है. मैं ने कहा था न कि तुम ने दूसरे विवाह की बात भी की तो मैं आत्महत्या कर लूंगी,’’ कहती हुई नीलिमा तैश में आ गई.

‘‘हां, याद है. पिछली बार तुम ने नींद की गोलियां भी खा ली थीं. मैं ने भी तुम से कहा था कि ऐसी हरकतें मुझे पसंद नहीं हैं. तुम्हारा पति है, बच्चे हैं भरापूरा परिवार है. हम मित्र हैं, इस का मतलब यह तो नहीं कि तुम इतनी स्वार्थी हो जाओ कि मेरा जीना ही मुश्किल कर दो…’’ कहते हुए असीम का स्वर इतना ऊंचा हो गया कि कैंटीन में मौजूद लोग उन्हीं को देखने लगे.

‘‘मैं सब के सामने तमाशा करना नहीं चाहती, पर तुम मेरे हो और मेरे ही रहोगे. यदि तुम ने किसी और से विवाह करने का साहस किया तो मुझ से बुरा कोई न होगा,’’ कहती हुई नीलिमा अपना टिफिन बंद कर के चली गई और असीम हक्काबक्का सा शून्य में ताकता बैठा रह गया.

‘‘क्या हुआ मित्र? आज तो नीलिमाजी बहुत गुस्से में थीं?’’ तभी कुछ दूर बैठा भोजन कर रहा उस का मित्र सोमेंद्र उस के सामने आ बैठा.

‘‘वही पुराना राग सोमेंद्र, मैं उस से अपना परिवार छोड़ कर विवाह करने को कहता हूं तो परिवार और समाज की दुहाई देने लगती है, पर मेरे विवाह की बात सुन कर बिफरी हुई शेरनी की तरह भड़क उठती है,’’ असीम दुखी स्वर में बोला.

‘‘बहुत ही विचित्र स्त्री है मित्र, पर तुम भी कम विचित्र नहीं हो,’’ सोमेंद्र गंभीर स्वर में बोला.

‘‘वह कैसे?’’ कहता हुआ असीम वहां से उठ कर अपने कक्ष की ओर जाने लगा.

‘‘उस के कारण तुम्हारी कितनी बदनामी हो रही है, क्या तुम नहीं जानते? अपने हर विवाह प्रस्ताव पर उस से चर्चा करना क्या जरूरी है? ऐसी दोस्ती जो जंजाल बन जाए, शत्रुता से भी ज्यादा घातक होती है…’’ सोमेंद्र ने समझाया.

ये भी पढ़ें- चाहत

‘‘शायद तुम ठीक कह रहे हो, तुम ने तो मुझे कई बार समझाया भी पर मैं ही अपनी कमजोरी पर नियंत्रण नहीं कर पाया,’’ कहता हुआ असीम मन ही मन कुछ निर्णय ले अपने कार्य में व्यस्त हो गया.

उस के बाद घटनाचक्र इतनी तेजी से घूमा कि स्वयं असीम भी हक्काबक्का रह गया.

रूपेश ने न केवल उसे मीता से मिलवाया बल्कि उसे समझाबुझा कर विवाह के लिए तैयार भी कर लिया.

विवाह समारोह के दिन शहनाई के स्वरों के बीच जब असीम मित्रों व संबंधियों की बधाइयां स्वीकार कर रहा था, उसे रूपेश और नीलिमा आते दिखाई दिए. एक क्षण को तो वह सिहर उठा कि न जाने नीलिमा क्या तमाशा खड़ा कर दे.

‘‘असीम बाबू, इन से मिलिए यह है मेरी पत्नी नीलिमा. आप के ही कार्यालय में कार्य करती है. आप तो इन से अच्छी तरह परिचित होंगे ही, अलबत्ता मैं रूपेश नहीं सर्वेश हूं. मैं ने आप से थोड़ा झूठ बोला अवश्य था, पर अपने परिवार की सुखशांति बचाने के लिए. आशा है आप माफ कर देंगे,’’ रूपेश बोला.

‘‘कैसी बातें कर रहे हैं आप, माफी तो मुझे मांगनी चाहिए. आप की सुखी गृहस्थी में मेरे कारण ही तो भूचाल आया था,’’ असीम धीरे से बोला.

ये भी पढ़ें- एतराज

‘‘आप व्यर्थ ही स्वयं को दोषी ठहरा रहे हैं, असीम बाबू. हमारे पारिवारिक जीवन में तो ऐसे अनगिनत भूचाल आते रहे हैं, पर अपनी संतान के भविष्य के लिए मैं ने हर भूचाल का डट कर सामना किया है. इस में आप का कोई दोष नहीं है. अपना ही सिक्का जब खोटा हो तो परखने वाले का क्या दोष?’’ कहते हुए सर्वेश ने बधाई दे कर अपना चेहरा घुमा लिया. असीम भी नहीं देख पाया था कि उस की आंखें डबडबा आई थीं. वह नीलिमा पर हकारत भरी नजर डाल कर अन्य मेहमानों के स्वागत में व्यस्त हो गया.

नारी की बारी

लेखक-लाज ठाकुर

चौथी अटैची का नंबर आतेआते लीना का पारा उतर कर थोड़ा  नीचे आ गया था, सो उसे खोल कर उस में रखे अपने कपड़ों को निकाल कर उन्हें बेड पर फेंका और अलमारी खोल कर उस में रखे कपड़ों को अटैची में भरना शुरू कर दिया.

‘‘कहीं जा रही हो क्या?’’ होंठों पर शहद घोल कर मैं ने पूछा, ‘‘देखो, कल रात की बात को भूल जाओ. ज्यादा गुस्सा सेहत के लिए ठीक नहीं होता.’’

लीना ने गरदन को कुछ इस अंदाज में झटका जैसे मदारी के कहने पर बंदरिया मायके जाने को मना करती है.

‘‘अच्छा, यह बताओ, इस घर को छोड़ कर तुम कहां जाओगी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं नहीं…तुम जा रहे हो,’’ लीना जल कर बोली.

‘‘मैं जा रहा हूं, पर कहां?’’ मेरा मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘यह तुम जानो…मगर घर छोड़ कर अब तुम्हें जाना ही पड़ेगा.’’

‘‘यह क्या कह रही हो? मैं भला अपना घर छोड़ कर क्यों जाऊं?’’

‘‘क्योंकि अब एक छत के नीचे हम दोनों एकसाथ नहीं रह सकते,’’ लीना ने फैसला सुनाया.

बात मामूली सी थी. कल रात खाना खाते हुए मैं ने लीना को सब्जी में थोड़ा सा नमक डालने को कहा था. लीना टेलीविजन पर अपना पसंदीदा धारा- वाहिक देख रही थी. वह उस में इतना खोई हुई थी कि मुझे नमक के लिए कई बार कहना पड़ा. अपने मनोरंजन में विघ्न लीना को गवारा न हुआ. वह एक झटके में टेलीविजन के सामने से उठी, किचन में गई और नमकदानी ला कर उस का सारा नमक मेरी सब्जी व दाल की कटोरियों में उलट कर नमकदानी मेज पर पटक दी.

‘और भी जो कुछ मंगवाना है उस की सूची बोलते जाओ,’ लीना अपने कूल्हों पर हाथ रख तन कर खड़ी हो गई.

ये भी पढ़ें- अनकही व्यथा

‘अब यह दालसब्जी मेरे सिर पर डाल दो,’ मुझे भी गुस्सा आ गया था, ‘टेलीविजन पर आने वाले किसी भी धारावाहिक का एक भी दृश्य मिस होते ही तुम्हारा पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है.’

‘तुम्हें भी तो मुझे डिस्टर्ब करने में मजा आता है. जरा सा उठ कर रसोई से नमक उठा लाते तो क्या हाथपांव में मोच आ जाती या घिस कर छोटे हो जाते?’ लीना की आवाज ऊंची हो गई.

‘टीवी ही तो देख रही थीं न, कौन सा कशीदा काढ़ रही थीं,’ मैं भी उबल पड़ा, ‘दिन ढला नहीं और तुम्हारा टीवी चला नहीं.’

‘तुम को तो बस, मेरे टेली-विजन देखने से चिढ़ है. रातदिन टीवी का ताना देते रहते हो. जरा देर के लिए टीवी खोला नहीं कि तुम्हारे पेट  में मरोड़ होने लगती है,’ कह कर लीना एक झटके से मुड़ी और टीवी का स्विच आफ कर बेडरूम में घुस कर धड़ाम से दरवाजा बंद कर लिया.

अब शेरनी की मांद में जाने की हिम्मत भला मुझ में कहां. बेडरूम में सोने के बजाय ड्राइंगरूम के एक सोफे पर रात गुजारने में ही मैं ने अपनी भलाई समझी.

जब जरा आंख लगी तो बेडरूम में अटैचियों की उठापटक से आंख खुल गई. मैं उठा और लीना के पास जा पहुंचा.

‘‘बताओबताओ, भला मैं अपना घर छोड़ कर क्यों जाऊं?’’ मैं ने अपना सवाल दोहराया.

‘‘क्योंकि अब मैं और तुम एक टीवी के सामने…मेरा मतलब…एक छत के नीचे नहीं रह सकते,’’ लीना ने अटैची बंद करते हुए कहा, ‘‘यह अपनी अटैची उठाओ और यहां से चलते बनो.’’

‘‘भला आज तक किसी पति ने घर छोड़ा है जो मैं छोड़ कर जाऊं. घर से पत्नी ही जाती है…चाहे अपने मायके जाए या भाई के घर,’’ मैं ने लीना के लहजे की नकल उतारी.

‘‘वह जमाने लद गए जब पत्नियां घर छोड़ कर जाती थीं. आज के टीवी धारावाहिकों ने औरतों की आंखें खोल दी हैं. हमें पता चल गया है कि हमारे क्या अधिकार हैं. पति की तरह हम पत्नियों को भी अपनी मरजी से जिंदगी जीने का हक है. पति को घर से  बेदखल करने का हमें पूरा-पूरा हक है.’’

लीना के इस टीवी ज्ञान को देख कर कुछ सोच पाता कि उस की आवाज ‘कपड़े इस अटैची में रख दिए हैं,’ फिर से कानों में गूंजने लगी, ‘‘अपना टूथब्रश और शेविंग का सामान बाथरूम से उठा लो और फौरन यह घर खाली कर के चलते बनो वरना 10 मिनट बाद पुलिस आ कर तुम को घर से निकाल देगी.’’

‘‘अरे वाह, यह क्या जबरदस्ती है. मेरे ही घर से मुझे तुम कैसे निकाल सकती हो?’’ मैं ने तर्क रखा.

‘‘पति जब पत्नी को पहने हुए कपड़ों में घर से निकाल सकता है तो पत्नी उसे क्यों नहीं निकाल सकती? मैं तो तुम्हें कपड़ों से भरी अटैची दे रही हूं.’’

तभी बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई. साथ ही किसी ने बाहर का दरवाजा खटखटाया.

‘‘लो, पहुंच गई पुलिस,’’ लीना चहक उठी और आगे बढ़ कर दरवाजा खोला.

दरवाजे से लीना के भैया बलदेव और ताऊजी कमरे में दाखिल हुए. उन के पीछे मेरी माताजी भी थीं. सभी के चेहरों पर घबराहट छाई हुई थी.

‘‘तुम्हारे पड़ोसी गोपालजी ने मुझे फोन कर के बताया है कि कल रात से तुम दोनों के बीच कुछ खटपट चल रही है,’’ लीना के भैया बोले.

‘‘मुझ से रहा न गया. मैं मनोज की माताजी को भी साथ ले कर आया हूं,’’ ताऊजी ने उखड़े स्वर में कहा.

‘‘मनोज बेटे, क्या बात हुई? यह घर का सारा सामान कैसे बिखरा पड़ा है?’’ माताजी ने मेरी बांह हिलाई.

‘‘मम्मीजी, इन से क्या पूछती हैं, मैं बतलाती हूं. यह सदा के लिए घर छोड़ कर जा रहे हैं.’’

‘‘लड़के, तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया. घर में थोड़ाबहुत लड़ाईझगड़ा हुआ तो क्या तुम घर छोड़ कर भाग जाओगे?’’ मां ने मुझे लताड़ा.

‘‘मां, मैं घर छोड़ कर नहीं भाग रहा बल्कि लीना मुझे घर से निकाल रही है.’’

‘‘लीना तुम्हें घर से निकाल रही है?’’ तीनों ने सम्मिलित स्वर में पूछा.

‘‘लड़की, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?’’ ताऊजी गुर्राए.

‘‘मेरा दिमाग ठीक है,’’ लीना ने ढिठाई से कहा, ‘‘आप जैसे बूढ़ों ने ही हम लड़कियों की ब्रेन वाश्ंिग कर रखी थी कि ससुराल में लड़की की डोली जाती है और वहां से उस की अरथी निकलती है. आज इस का जादू टूट चुका है.’’

ये भी पढ़ें- नौटंकीबाज पत्नी

‘‘क्या अनापशनाप बके जा रही है,’’ भैया बलदेव का स्वर क्रोध से कांप रहा था, ‘‘न लाज न शरम जो मुंह में आता है बोले जा रही है. बस, अब यह ड्रामा खत्म करो.’’

‘‘भैया, अब तो ऐसे ड्रामे हर उस पति के घर में होंगे जो बीवी को पैर की जूती समझते हैं. हम नारियों की बुद्धि तो आप जैसे अपनों ने भ्रष्ट कर रखी थी,’’ लीना भैया पर बरसी, ‘‘भला हो इन टेलीविजन धारावाहिकों के निर्माताओं का, जिन्होंने अपने धारावाहिकों से हम नारियों की आंखें खोल दी हैं. हम औरतों को भी अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने का हक है.’’

‘‘ओ निर्लज्ज, कुछ शरम कर,’’ ताऊजी चिलाए, ‘‘क्यों खानदान की नाक कटवाने पर तुली है.’’

‘‘ताऊजी, आप को तो अपनी

इस बेटी पर गुमान होना चाहिए जो इतना बोल्ड कदम उठा कर पति के घर में तिलतिल कर मरती लड़कियों को एक राह दिखा रही है. पति को उसी के घर से किक आउट करने का मेरा यह कारनामा दुनिया के सामने जब आएगा तो सैकड़ोंहजारों मजलूम बहुआें की जिंदगी की धारा ही बदल जाएगी,’’ लीना ने गरदन अकड़ाई.

‘‘बसबस, अब एक भी शब्द और मुंह से निकाला तो…’’ ताऊजी गुस्से से कांपने लगे थे. मां बोलीं, ‘‘भाई साहब, आप हमारे घर के मामले में न बोलें. अपनी बेटी को मैं समझाती हूं,’’ फिर मां ममता भरे स्वर में लीना से बोलीं, ‘‘मेरी अच्छी बेटी, अगर मनोज से कुछ भूल हो गई है तो उस की तरफ से मैं तुम से माफी मांगती हूं… गुस्सा थूक दे मेरी समझदार बेटी… हमारे घर को बरबाद मत कर.’’

माताजी ने लीना के सिर पर प्यार से हाथ फेरना चाहा तो लीना बिदक कर दूर हट गई.

‘‘बसबस, रहने दीजिए. मुझे अच्छी तरह से पता चल गया है कि सासूजी लोग कितनी मीठी छुरी होती हैं. बहू लाख सोने की बन जाए पर सास को तो उस में खोट ही खोट नजर आता है,’’ लीना ने कड़वे स्वर में कहा, ‘‘आप की बहू आप के बेटे को घर से निकाल रही है तो कैसे आप के शब्दों से शहद टपक रहा है. अगर यही काम आप का बेटा करता तो आप उस की पीठ ठोंकतीं.’’

‘‘बसबस, बहुत हो चुका,’’ मां के इस अपमान से मेरा खून खौल उठा, ‘‘मैं घर छोड़ कर जा रहा हूं…और मैं अपना यह टेलीविजन भी अपने साथ ले कर जा रहा हूं,’’ मैं ने टेलीविजन से केबल का तार अलग करते हुए कहा, ‘‘न तो यह टेलीविजन तुम्हें दहेज में मिला है न स्त्री धन के तौर पर दिया गया है.’’

‘‘अरेअरे, यह क्या गजब ढा रहे हैं आप,’’ लीना ने जल्दी से टेलीविजन के ऊपर हाथ टिका दिया, ‘‘भला मैं इतनी जल्दी टीवी वाले प्रेमी का इंतजाम कैसे कर सकती हूं, मेरा मतलब नए टीवी का इंतजाम कैसे कर सकती हूं.’’

ये भी पढ़ें- चाहत

‘‘तो?’’ मैं ने लीना के चेहरे पर आंखें गड़ा दीं.

‘‘जब तक टीवी का प्रबंध नहीं हो जाता, आप इस घर में मेरे साथ रह सकते हैं,’’ लीना ने प्यार भरी नजरों से मुझे देखा.

काश

लेखक- सुधा गुप्ता

भाग-1

लगभग साल भर बाद जब मीरा मायके आई थी, दोनों छोटे भाई आपस में नाराज चल रहे थे, अपनीअपनी सफाई दोनों देते रहते थे. मीरा दोनों की ही सुनती रहती. अपना पक्ष दोनों ही उस के सामने रखते और यही प्रमाणित करते कि उसी के साथ सब से अधिक अन्याय किया गया है. घर की जिम्मेदारी में जितना वह पिसा है उतना दूसरा नहीं.

दोनों भाइयों में बोलचाल न जाने कब से बंद थी. जब भी मिलते तो ऐसे मिलते जैसे अभी एकदूसरे का गला ही पकड़ लेंगे.

छोटा अपनी व्यथाकथा सुना रहा था और उसी संदर्भ में उस ने यह शब्द कहे थे. यही शब्द मीरा ने बड़े भाई के मुंह से भी सुने थे. अवाक थी मीरा कि जराजरा सी बात का बखेड़ा कर दोनों ही जलतेभुनते जा रहे हैं.

मीरा सोचने लगी कितना आसान है यह कहना कि मर गया मेरा भाई. अरे, जिन के मर जाते हैं, कभी उन से पूछा होता कि उन पर क्या बीतती है? क्या वास्तव में मनुष्य ऐसा सोच सकता है कि उसे कभी किसी की जरूरत नहीं पड़ेगी?

जहां तक उस का विचार है मनुष्य को किसी दूसरे की जरूरत मृत्युपर्यंत पड़ती है. चार आदमी श्मशान तक ले जाने को उसे तब भी चाहिए. तब यह कहना कितना निरर्थक है कि उसे कभी किसी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.

मायके आने का मीरा का सारा उत्साह ठंडा पड़ता जा रहा था. वह कभी मायके में किसी बात पर दखल नहीं देती थी क्योंकि किसी भी एक के पक्ष में कुछ बोलना, दूसरे को नाराज कर सकता था और सचाई क्या है, उसे क्या पता. वह निर्णय कैसे और क्यों ले सकती है कि सच्चा कौन है और झूठा कौन? किस की तरफ से झगड़े की पहल होती है और कौन ज्यादा या कम सहनशील है?

‘मैं हर वक्त के तनाव से दुखी आ गई हूं. पता नहीं मेरे घर को किस की नजर लग गई है. मेरे बच्चे तो ऐसे नहीं थे. कभीकभी सोचती हूं मेरी तीनों बेटियां ही होतीं तो कितना अच्छा होता. ब्याह कर भेज देती, कभीकभी आतीं और जो मेरी सामर्थ्य होती देदिला कर विदा कर देती. कम से कम यह चखचख तो न होती,’ कहती मां भी अपना पक्ष सामने रखतीं.

भारी मन से मीरा मां को समझाती रहती, ‘छोड़ो मां, आजकल हर घर में यही आग लगी है. भाईभाई साथ रहते ही नहीं. किसी में भी सहनशीलता नहीं है. कोई किसी दूसरे को सहन नहीं करता. मनुष्य बस, खुद तक ही सीमित हो कर रह गया है. जोड़ने की मानसि-कता किसी में नहीं रही, हर कोई तोड़ने में ही विश्वास करता है और आरोप सामने वाले पर लगाता है कि उसे उस ने अलग किया है.

ये भी पढ़ें- एतराज

‘सदियों से भाईभाई लड़ते आए हैं जिस का उदाह-रण हमारे ग्रंथों में कूटकूट कर भरा है. भाईभाई में अधिकार की जंग न होती तो महा-भारत कभी न होता. सुग्रीव और बालि भी तो इसी अधि-कार की जंग की कथा सुनाते हैं न.’

‘अरे, छोड़ो भी मां. क्या तुम नहीं जानतीं कि रामायण में भाई ने ही भाई का वध कराया था. किसी नियम के भंग हो जाने की सजा मृत्युदंड थी और मजबूरीवश भाई को नियम भंग करने पर प्राणदंड दिया था.’

‘क्या कह रही हो, मीरा?’

‘मैं सच कह रही हूं. गं्रथों पर न जाओ. उन में तो न जाने क्याक्या है. तुम बस, मस्त रहा करो. दोनों आपस में निबटते रहेंगे, तुम दुखी मत हुआ करो. सब ठीक हो जाएगा.’

मीरा कई तरह से मां को बहलाने का प्रयास करती रहती, परंतु सचाई यह थी कि स्वयं वह भी असहज सी हो गई थी. शांति के चंद दिन गुजारने वह मायके आई थी, परंतु अशांति ने उस की भी सांस बेजार कर रखी थी. भोजन को सब साथसाथ बैठते तो सही मगर बातचीत न करते. मीरा ही इधरउधर

की बातें कर माहौल को सहज बनाने का प्रयास करती रहती. एक शीतयुद्ध और तनाव हर पल महसूस होता रहता.

चार दिन से ज्यादा वह कभी मायके में न रहती थी. 5वें दिन वह वापस चली आई. उस के अपने बच्चे भी जवान हो चुके थे. दोनों कभी किसी बात पर झगड़ पड़ते तो उसे अपना मायका याद आ जाता. क्या यह भी भविष्य में इसी तरह लड़ा करेंगे? ऐसा सोच कर भी उसे बहुत दुख होता. मांबाप की पीड़ा कैसी असहनीय होगी उस का अनुमान उसे सहज ही हो जाता. किसी शायर का लिखा एक शेर उसे अकसर याद आता:

‘मेरे बाप पर क्या बीतती होगी, तब समझा मैं जब मेरी राहे गलत पर मेरा बेटा निकला.’

अपनी मां को हजार बहानों से बहलाती मीरा तब पूरी ईमानदारी से महसूस करने लगती कि किसी को नसीहत देना कितना आसान है परंतु जब अपने कलेजे पर लगती है तभी पीड़ा की गहराई महसूस की जा सकती है.

एक दिन उस के पास छोटे भाई का पत्र आया कि वह अलग अपने घर में रहना चाहता है, जल्दी ही वह चला जाएगा तो मीरा परेशान हो गई कि क्या तिनकातिनका जोड़ मां ने बिखर जाने को घर बनाया था?

पत्र में लिखा था कि घर में रह कर उस की पत्नी को बहुत सहन करना पड़ रहा है. वह बेवजह अपना परिवार दुखी नहीं करना चाहता. वह समझाना चाहती ही थी कि पता चला वह अपने नए घर में चला भी गया है, मगर एक धक्का था यह मीरा के लिए, लेकिन उस ने मन को समझा लिया.

‘तो क्या हुआ? अपने ही घर में गया है न. एक दिन तो उसे अपने घर में जाना ही था, मगर इस तरह नाराज हो कर बड़े भाई और मांबाप को कुसूरवार ठहरा कर जाने की क्या जरूरत थी? खुशीखुशी जाता तो सब को भी खुशी ही होती न,’ मां ने फोन पर बताया.

फोन कर के वह मां का हालचाल पूछने का उपक्रम मात्र करती, क्योंकि हालचाल अच्छा नहीं है, यह तो वह जानती ही थी. छोटा भाई घर आताजाता ही नहीं यह सुन कर उसे और ज्यादा दुख होता. पिता की हालत दिनबदिन बिगड़ने लगी थी.

कभी साल भर से पहले वह मायके नहीं जाती थी, परंतु पिता को देखने जाना पड़ा. भाई के घर छोड़ कर जाने के बाद वह एकएक दिन गिन रहे थे.

उसे भाई पर क्रोध आता. जी चाहता कि कान पकड़ कर खींच लाए, मगर सभी के स्वाभिमान उन के अपने कद से भी कहीं ऊंचे हो चुके थे. जो बचपन में इतने घुलमिल कर रहते थे, वह एकदूसरे की शक्ल भी देखना पसंद नहीं करते थे.

मीरा उन की बातें सुनती तो उसे हैरानी होती.

साल भर में मात्र चार दिन को आई बहन के साथ भी कभी ऐसा व्यवहार कर देते कि उसे रोना आ जाता और स्वयं ही छोटी सी बात का बतंगड़ बना देने से न चूकते. दूसरे से उम्मीद बहुत करते परंतु स्वयं कहां चूक गए, स्वयं क्या गलती कर दी, सोचते ही नहीं.

किसे क्या समझाती वह. दोनों ही समझदार और उच्च पद पर आसीन थे और यह भी तो एक शाश्वत सचाई है कि नुक्ताचीनी कोई भी सहन नहीं करता. अपनी गलती कोई कभी नहीं मानता. एक खूनी के पास भी खून करने के ठोस कारण होते हैं. एक डाकू भी अपनी सफाई में हजार दलीलें देता है. फिर उस के दोनों भाई तो सभ्य समाज के सभ्य प्राणी थे. दोनों के पास ही अपनी सफाई में कहने को बहुतकुछ था.

समय बीतने लगा. 2 साल बीतने को आए. छोटा भाई घर आता ही न था, पिता की हालत बद से बदतर होती जा रही थी.

ये भी पढ़ें- आ बैल मुझे मार

इसी बीच बड़े भाई के बच्चे का एक उत्सव था जिस पर सभी को बुलाया गया. मीरा भी मायके गई थी. पिता और मां परेशान थे, वे कहने लगे, ‘सारा खानदान एकसाथ भोजन करेगा और अपना भाई आएगा ही नहीं?’

‘कोई बात नहीं, मैं और बड़े भैया बुलाने चले जाएंगे,’ मीरा ने आश्वासन दिया. दोनों बुलाने गए. औपचारिक बातचीत के बाद मुद्दे की बात पर चले आए, ‘2 दिन बाद उत्सव है. तुम परिवार सहित घर आओ.’

‘आज फुरसत मिली है इसे मेरे घर आने की. पूछ इस से, सारे शहर को बुला लिया और 2 साल हो गए मुझे घर से आए, पर इसे आज मेरी याद आई,’ छोटे भाई ने बड़े भाई की ओर मुखातिब हो मीरा से कहा.

‘यह तो मेरा इंतजार कर रहा था. कहता था मेरे साथ जाएगा. अब दुनिया को तमाशा मत दिखाना. बच्चे का उत्सव है, फुजूल की बहस मत करना और समय पर पहुंच जाना.’

‘देखो दीदी, जहां तक बच्चे का सवाल है, इस के बच्चे मुझे मेरे बच्चों जैसे ही प्यारे हैं, मगर जहां तक आने का सवाल है, मैं नहीं आऊंगा.’

दोनों भाइयों में पुन: बहस छिड़ गई. मीरा बीचबचाव न करती तो एकदूसरे से पुन: भिड़ गए होते. वह घर वापस चली आई. मां और पिताजी भी सुन कर नाराज हो गए.

पुत्रों द्वारा समयसमय पर किए गए अपमान उन्हें बड़ी गहराई से याद आने लगे. दोनों भाइयों को सुरक्षित रूप से संयुक्त रखने के चक्कर में कई बार उन का पलड़ा इधरउधर हलकाभारी पड़ता रहा था, जिस पर बड़ा भाई भी नाराज हो उठा था, ‘आप सदा उसी का पक्ष लेती रहती हैं. वह बहुत प्यारा है आप को.’

‘मां को दोनों बच्चे एक से प्यारे होते हैं. तुम्हारे भी तो दोनों बच्चे कभीकभी जिद करते हैं. तो क्या तुम मनाने की कोशिश नहीं करते? क्या एक को काट कर फेंक सकते हो? अब अगर मनाने का वक्त आया है तो प्यार से दोनों को ही मान जाना चाहिए था,’ मीरा ने दलील दी थी.

ये भी पढ़ें- अधूरा समर्पण

दूसरे दिन अकेली मीरा भाई को मनाने दोबारा गई, उत्सव से एक दिन पहले एक बार फिर गई. अंतत: वह घर चला आया. पिता और मां से शिकवेगिले किए. गरमागरमी भी हुई, मगर नतीजा सुखद रहा.      -क्रमश:

क्यों और कैसे

लेखक-अपर्णा यादव

अगस्त के पहले सप्ताह में मैं कश्मीर के लिए रवाना हो गया. मुझे आज भी याद है कि जम्मू से बस पकड़ कर जब मैं कश्मीर पहुंचा तो वहां जोरदार बारिश हो रही थी. मुझे लेने आई कार में बैठ कर जब मैं प्रयोगशाला पहुंचा तो वहां गेट पर भीगते गोरखा संतरी ने दरवाजा खोला था. मेरे रहने के लिए वहीं पास के एक पुराने बंगले में इंतजाम किया गया था. मैं यात्रा से थका था, अत: जल्दी ही खाना खा कर सो गया.

अगले दिन सुबह उठ कर मैं ने पहले उस जगह का जायजा लिया. एक सेवादार ने बताया कि इस पूरी प्रयोगशाला में 5 लोग हैं. वह स्वयं रामसिंह, नेपाली संतरी रामकाजी थापा, खानसामा बिलाल अहमद, प्रयोगशाला में सहायक राजेंद्र और शाहबानो, जो साफसफाई एवं कपड़े धोने में मदद करती थी.

कंपनी का जड़ीबूटियों का अपना बगीचा था. मैं ने काम शुरू करने से पहले एक बार पूरे बगीचे का जायजा लेने का निश्चय किया. तैयार हो कर मैं ने राजेंद्र को साथ लिया और बगीचे की ओर चल पड़ा.

‘‘चलो, कंपनी को याद तो आया कि उस की कश्मीर में भी एक प्रयोगशाला है,’’ राजेंद्र हाथ ऊपर करते हुए बोला.

‘‘ऐसा क्यों कह रहे हो तुम?’’ मैं ने पूछा.

‘‘सर, 4 साल में यहां आने वाले आप पहले वैज्ञानिक हैं, वरना हम लोग ही यहां रहते हैं,’’ एक गाइड की तरह जानकारी देते हुए राजेंद्र बोला.

हम जिस पगडंडी पर चल रहे थे उस के दोनों ओर छोटीछोटी झाडि़यां थीं. बंगले से बागान की दूरी लगभग 400 गज की थी. बगीचे में पहुंच कर हम टहलने लगे. दोनों ही अपनेअपने खयालों में खोए थे कि अचानक राजेंद्र की बुदबुदाने की आवाज सुन कर मेरा ध्यान उस की ओर गया. उस ने अपने हाथ में गले का तावीज पकड़ा हुआ था और आसमान की ओर देख कर कुछ बुदबुदा रहा था. उस की इस हरकत से मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ पर कुछ सोच कर मैं चुप रहा. थोड़ी देर में वह सामान्य हुआ तो मेरी ओर देख कर बोला, ‘‘चलें, सर.’’

ये भी पढ़ें- खुशामद का कलाकंद: क्या आप में है ये हुनर

‘‘तुम क्या कर रहे थे?’’ मैं नेपूछा.

‘‘चूंकि सर आप को कुछ समय यहीं रहना है, इसलिए आप को भी चौकन्ना कर देता हूं,’’ उस ने धीरे से रहस्य-मयी आवाज में कहा.

मैं ने हैरत भरे स्वर में पूछा, ‘‘चौकन्ना? किस चीज से?’’

‘‘वह बागान के बीचोंबीच जो कब्र है, एक अभिशप्त व्यक्ति की है,’’ राजेंद्र की उंगली की दिशा में मैं ने देखा कि वह एक मिट्टी और पत्थर का बना चबूतरा है और उस के इर्दगिर्द घास जमी है. राजेंद्र फिर बोला, ‘‘सर, रात में तो इस बगीचे के आसपास भी मत फटकिएगा, खतरा हो सकता है. दिन में भी जब इस के पास से गुजरें तो इसे याद कर सम्मान दीजिए, नहीं तो मुसीबत में फंस जाएंगे.’’

अब तक मुझे गुस्सा आ चुका था. बड़ी मुश्किल से अपने गुस्से पर काबू रखते हुए मैं ने राजेंद्र से कहा, ‘‘विज्ञान पढ़े व्यक्ति के मुंह से ऐसी बातें सुन कर आश्चर्य होता है. यह बातें वाहियात हैं और मुझे इन में विश्वास नहीं बल्कि मुझे इन बातों पर विश्वास करने वालों से भी सख्त चिढ़ होती है.’’

‘‘आप नए हैं, सर,’’ राजेंद्र पूरे विश्वास से बोला, ‘‘आप को शायद किसी ने नहीं बताया कि यहां इस बगीचे में 2 वैज्ञानिकों की रहस्यमय तरीके से मौत हो चुकी है. इसलिए पिछले 4 साल से यहां कोई आने को तैयार नहीं था. वे दोनों वैज्ञानिक भी इन बातों पर विश्वास नहीं करते थे. आप को कुछ मालूम नहीं था, इसलिए आप को यहां भेज दिया गया.’’

मैं ने और कुछ बोलना उचित नहीं समझा. बात वहीं समाप्त हो गई और हम अपनेअपने विचारों में खोए चुपचाप वापस बंगले पर आ गए.

सोमवार से अपने प्रयोग करने की तैयारी में व्यस्त हो कर मैं इस बात को लगभग भूल सा गया. रविवार को मैं शहर कुछ जरूरत का सामान लाने गया था. वापस आतेआते शाम हो गई.

रात को सेवादार रामसिंह खाना लगाने लगा तो मुझे कब्र वाली बात याद आई. मैं ने एकाएक उस से पूछा, ‘‘रामसिंह, तुम बगीचे की कब्र के बारे में क्या जानते हो?’’

रामसिंह एकदम सकपका गया. दाल का डोंगा उस के हाथ से छूटतेछूटते बचा. दीवार पर टंगी किसी तसवीर को देखते हुए वह बोला, ‘‘तो आप ने इस बारे में सुन ही लिया. हुंह मैं तो कभी उधर गया नहीं.’’

‘‘उन 2 वैज्ञानिकों की मौत के बारे में तुम क्या जानते हो?’’

मेरी आंखों में देखते हुए रामसिंह बोला, ‘‘सुना था कि बगीचे के बीचोंबीच कब्र के पास उन की लाशें मिली थीं. शरीर से पूरा खून चूस लिया गया था. कहीं कोई निशान नहीं थे.’’

‘‘पोस्टमार्टम में क्या रिपोर्ट आई?’’

‘‘किसी ने इस की जरूरत नहीं समझी. पुलिस ने हम सभी के बयान ले कर फाइल बंद कर दी.’’

खाना खा कर मैं सोने के लिए चला गया. मुझे नींद नहीं आ रही थी. मेरा वैज्ञानिक वाला उत्सुक मन इस राज को खोलना चाहता था. मुझे जाने क्यों ऐसा महसूस हुआ कि यहां रहते हुए मुझे कुछ खतरा हो सकता है. किसी शक्ति से नहीं बल्कि किसी व्यक्ति से.

मेरा कमरा बंगले की पहली मंजिल पर था. नीचे आगे की ओर बहुत बड़ा दालान था, जिस में फूलों के पेड़पौधे थे. पीछे की तरफ रसोईघर और सेवादारों के कमरे थे. नीचे एक बड़ा ड्राइंगरूम और एक बार था. मौसम अच्छा था. अत: कमरे से मैं बाहर आ गया. चांदनी रात थी इसलिए बत्ती जलाने की आवश्यकता मुझे नहीं लगी.

मेरी नजर सामने गेट पर गई. वहां से किसी के फुसफुसाने की आवाज आई, फिर कुछ हरकत हुई. ध्यान से देखने पर लगा कि थापा किसी से बात कर रहा है. तुरंत ही मैं ने देखा कि रामसिंह पत्थर के बने रास्ते पर चलता हुआ पीछे की तरफ चला गया.

रात के अंधेरे में हिलतेडुलते लोगों को देख कर उत्सुकता जागी तो पीछे छज्जे पर चला आया और देखा, रामसिंह ने एक दरवाजा खटखटाया. कोई बाहर आया. देखने में मुझे राजेंद्र जैसा लगा. रामसिंह जोरजोर से कुछ बोल रहा था. हवा के झोंके के साथ उड़ते हुए कुछ शब्द मेरे कानों से टकराए, ‘मना कर… कमीना.’

उस के बाद मुझे कुछ सुनाई नहीं पड़ा. थोड़ी देर बाद रामसिंह अपने कमरे में चला गया. सारी बत्तियां बंद हो गईं और एक अजीब सी शांति छा गई. मैं कुछ निष्कर्ष नहीं निकाल पाया. अगले दिन बाकी सब से बातचीत कर पता करने का निश्चय कर मैं सो गया.

सुबह जल्दी तैयार हो कर मैं ने राजेंद्र को साथ लिया और जड़ीबूटियां जमा करने के लिए बगीचे की ओर चल पड़ा. रात की घटना के बारे में कौतूहल होते हुए भी मैं ने उस से कुछ नहीं पूछा. हम दोनों काफी देर से चुप थे. चुप्पी तोड़ते हुए मैं ने पूछा, ‘‘यहां आसपास कोई गांव नहीं है?’’

राजेंद्र ने धीरे से कहा, ‘‘यहां से सब से समीप गांव 5 मील दूर है.’’

आज वह काफी गुमसुम सा था. फिर भी कब्र के नजदीक पहुंचने पर वह अपनी तावीज वाली काररवाई करना नहीं भूला.

जल्दी से सर्वेक्षण कर मैं ने राजेंद्र को निर्देश दिए कि किस जड़ीबूटी की टहनी, किस के पत्ते, जड़ या फूल तोड़ने हैं और बगीचे के एक कोने में उसे काम करता छोड़ मैं कब्र की ओर निकल पड़ा.

मैं कब्र के समीप पहुंचा. आसपास देखा. कब्र टूटीफूटी थी. उस के चारों ओर गहरी घास थी पर कब्र का ऊपरी हिस्सा बिलकुल साफ था. बड़े रास्ते से कब्र की तरफ आने वाला रास्ता भी ताजा इस्तेमाल किया लगता था. कब्र के पास से घास में एक पतली रेखा पास के एक बड़े बरगद के पेड़ तक जा रही थी मानो 1-2 बार कब्र से चल कर कोई पेड़ तक गया हो. मुझे यह सबकुछ ठीक नहीं लग रहा था. कुछ न कुछ जरूर गड़बड़ था जो मेरे दिमाग में नहीं आ रहा था.

तभी कंधे पर बैग रखे राजेंद्र मुझे आता हुआ दिखाई दिया. पास आने पर वह धीरे से बोला, ‘‘आप मेरी बात नहीं मान रहे हैं. आप मुसीबत में फंसने वाले हैं.’’

उस की बात को अनसुनी कर मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि यहां कोई आताजाता है?’’ साथ ही मैं ने घास में रास्ते की तरफ इशारा किया.

रहस्यमयी सी आवाज में राजेंद्र बोला, ‘‘यकीनन, मैं ने आप को पहले भी बताया था कि इधर कौन रहता है. वही घूमताफिरता है.’’

मैं ने उस से और कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं समझी. वापस प्रयोग- शाला में जा कर काम निबटाया. दोपहर के 2 बज गए थे. राजेंद्र को भेज कर मैं ने खाना खाया फिर आराम करने कमरे की तरफ चल दिया.

ये भी पढ़ें- सलाहकार: कैसे अपनों ने शुचिता का फायदा उठाया

आरामकुरसी पर बैठ कर मैं गाना सुनने लगा. सहसा मेरे दिमाग में आया कि शनिवार को जब मैं बगीचे में गया था तो कब्र के ऊपर घास थी. इस का मतलब इस बीच किसी ने वह घास साफ की है. इस विचार ने मुझे इतना परेशान नहीं किया जितना कि इस बात ने कि जिस ने यह किया तो क्यों किया? बगीचे में बाहर का कोई आदमी आ नहीं सकता था. आबादी भी यहां से काफी दूर थी. हो न हो, इन्हीं 5 लोगों में से कोई है पर कौन और क्यों? इसी उधेड़बुन में मेरी आंख लग गई. आंख खुली तो शाम के 5 बज चुके थे.

चाय पी कर मैं ने बिलाल अहमद, शाहबानो और थापा से कब्र के बारे में पूछताछ की. उन्होंने भी रामसिंह वाली बात दोहराई. मैं ने एक खास बात देखी कि शाहबानो बला की खूबसूरत युवती थी. अपने यौवन को ढांपने की कोई खास कोशिश उस ने नहीं की थी. एक और खास बात यह थी कि मुझे सभी लोग थापा से कटेकटे से लगे. खैर, उन को भेज कर मैं ने राजेंद्र को बुला लिया.

‘‘क्या कलपरसों इन में से कोई बगीचे में गया था?’’ मैं ने राजेंद्र के आते ही पूछा.

‘‘नहीं, सर,’’ तुरंत उस ने जवाब दिया. मुझे सोचते देख वह फिर से बोला, ‘‘शायद आप उस कब्र की घास के बारे में पूछना चाहते हैं. मैं आप को पहले ही बता चुका हूं कि वहां रात को वह अभिशप्त आत्मा घूमती है. यह उस का काम है.’’

भूतप्रेत के अस्तित्व पर बहस करने का मेरा मन नहीं था इसलिए मैं ने राजेंद्र को भेज दिया पर मेरे दिमाग में यह बात बैठ गई कि उस ने बिना पूछे ही कब्र की घास के बारे में बताया था.

अगले रोज हम थोड़ी देर से बगीचे की ओर रवाना हुए. राजेंद्र आवश्यकता से अधिक तेज चल रहा था और बगीचे तक पहुंचतेपहुंचते वह मुझ से करीब 200 गज आगे हो गया था.

बगीचे में घुसते ही मुझे राजेंद्र की भयंकर चीख सुनाई दी. वह चिल्लाया, ‘‘सर, यहां, इधर आइए.’’

मैं दौड़ते हुए उस के पास पहुंचा. कब्र के सामने रास्ते पर कोई व्यक्ति पड़ा था और राजेंद्र उस पर झुका हुआ था. पास जा कर देखा तो मैं चौंक गया. गिरा हुआ व्यक्ति बिलाल अहमद था. उस की आंखें बाहर निकली हुई थीं. शरीर पूरा चिपक गया था मानो सारा खून चूस लिया गया हो.

इस घटना से मुझे गहरा झटका लगा. पुलिस की काररवाई खत्म होतेहोते शाम हो गई थी. सब का बयान यही था कि बिलाल सैर के लिए बगीचे में जाना चाहता था. सब ने उसे रोका भी था पर वह नहीं माना.

मैं ने फोन कर के कंपनी में बता दिया था. पुलिस दारोगा से एफ.आई.आर. की एक प्रति ले ली थी. साथ ही बता दिया था कि पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने पर मुझे दिखा दें.

इतना होने पर पुलिस दल लाश के साथ वापस लौट गया. मैं ने रामसिंह को चाय के लिए कहा और आरामकुरसी पर बैठ कर सारी घटना पर विचार करने लगा. ऐसा लग रहा था मानो दिमाग की गति रुक गई हो. रामसिंह चाय ले कर आया तो मुझे एकाएक विचार कौंधा.

‘‘सुबह नाश्ता किस ने बनाया था?’’

‘‘शाहबानो ने.’’ मैं ने तुरंत शाहबानो को बुला भेजा. इस पूरी घटना में मुझे एक बात बिलकुल नहीं हजम हो रही थी-बिलाल का रात में बगीचे में सैर के लिए जाना. कहीं कुछ गड़बड़ जरूर थी.

शाहबानो आई तो देखा उस के चेहरे पर गम या चिंता का कोई निशान नहीं था.

‘‘क्या आज नाश्ता तुम ने बनाया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हां, जनाब. वह तो रात कह कर गए थे कि सुबह देर से उठेंगे,’’ शाहबानो बोली. उस की आंखें मेरी आंखों में मेरे मन में उस के लिए उठने वाले भावों को ढूंढ़ रही थीं.

‘‘वह से मतलब?’’ मैं ने पूछा.

‘‘बिलाल अहमद, मेरे होने वाले शौहर. 3 साल से रिश्ता तय था.’’

उस के इस जवाब ने मुझे चौंका दिया. मैं इस बात से पूरी तरह अनजान था. किसी ने बताने की जरूरत भी नहीं समझी थी.

‘‘3 साल से निकाह क्यों नहीं हुआ?’’ अपने को संभालते हुए मैं ने पूछा.

‘‘मेरा ही मन नहीं था,’’ आंखें मटकाते हुए और इशारों से खुला आमंत्रण देते हुए उस ने कहा, ‘‘जब जरूरत वैसे ही पूरी हो जाए तो उस से बंध कर रहने से क्या फायदा.’’

शाहबानो चली गई थी. एक बात साफ थी कि बिलाल अहमद से उसे कोई लगाव नहीं था. मुझे यकीन हो चला था कि कहीं न कहीं इस सब में वह एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है. दिन भर की थकान से मैं जल्दी खाना खा कर सो गया.

दरवाजे को जोरजोर से खटखटाने की आवाज सुन कर मेरी नींद खुली. आवाज से पता चला कि राजेंद्र है. घड़ी देखी तो सुबह के 8 बजे थे. दरवाजा खोला तो सामने राजेंद्र खड़ा था. वह डरा हुआ लग रहा था.

‘‘सर, रामसिंह रात से गायब है,’’ घबराए स्वर में राजेंद्र बोला.

कुछ अनहोनी की आशंका से मेरा दिल धक् से रह गया. मैं ने फटाफट कपड़े पहने और राजेंद्र को साथ ले कर बगीचे की तरफ चल पड़ा. मुझे जैसी आशंका थी रामसिंह की लाश बिलकुल उसी अवस्था में उसी जगह पड़ी मिली जहां कल बिलाल अहमद की लाश पड़ी थी.

‘‘सर, मैं कह रहा हूं आप भी वापस चले जाइए वरना मुसीबत में फंस जाएंगे,’’ लगभग चेतावनी वाले स्वर में राजेंद्र ने कहा. मैं ने उस की बात को नजरअंदाज कर दिया.

बंगले पर पहुंच कर मैं ने एक बार फिर कंपनी में फोन किया. थोड़ी देर में पुलिस पहुंच गई. आज मैं ने राजेंद्र को उन के साथ बगीचे तक भेज दिया. शाहबानो चाय ले कर आई. वह कुछ हद तक खुश नजर आ रही थी. अब तक मैं निश्चय कर चुका था कि मैं इस सब के बारे में सचाई जान कर ही रहूंगा. दोपहर तक पुलिस अपनी काररवाई कर वापस चली गई. दारोगा ने पूछने पर बताया कि बिलाल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट कल सुबह तक आ जाएगी.

हर पहलू पर विचार करने के बाद मेरा पूरा शक राजेंद्र पर गया. शाहबानो मुझे एक महत्त्वपूर्ण और कमजोर कड़ी लगी. मैं ने एक योजना बनाई और उस पर अमल के लिए तैयार हो गया. यद्यपि इस में मुझे बहुत खतरा था पर मेरा निश्चय दृढ़ था.

मैं ने शाहबानो को बुलाया. इधरउधर की बातों के बीच मैं ने उस से प्रणय निवेदन किया तो वह फौरन मान गई. मेरी योजना थी कि प्रणय के अंतरंग क्षणों में उस से इस बारे में पूछूंगा.

पर मैं उस समय चौंका जब वह बोली, ‘‘रात 10 बजे बगीचे के बीचोंबीच मिलना. यहां कोई देख सकता है.’’

मैं ने उस से वादा किया तो वह चली गई. मैं ने सोचा कि जब शाहबानो को पता था कि उस जगह पर 2 दिन में 2 मौतें हो चुकी हैं तो उस ने मुझे वहां क्यों बुलाया. मुझे यकीन हो गया कि मैं मंजिल के काफी करीब हूं. इस में संभावित खतरे का मुझे एहसास भी था.

ये भी पढ़ें- कहर : दोस्त ने अजीत की पत्नी के साथ लिया मजा

मैं ने ठंडे दिमाग से जब पूरी कहानी को सोचा तो एक धुंधली तसवीर मेरे जेहन में बन गई और मैं ने अपने स्तर पर योजना की पूरी तैयारी कर ली.

ठीक 9 बजे मैं कमरे से बगीचे की ओर निकला. मेरी जेब में रिवाल्वर था. चांदनी रात थी. 20 गज तक साफ दिखता था. मैं धीरेधीरे बगीचे की ओर चला. बगीचे में पहुंच कर जैसे ही मैं बीच वाले हिस्से की तरफ बढ़ा मेरा दिल हर कदम के साथ और जोर से धड़कने लगा.

अचानक मेरे पैर में तीखी चुभन हुई. नीचे एक झाड़ी की टहनी थी. मैं ने उसे उठा कर ध्यान से देखा तो मेरे चेहरे पर मुसकान फैल गई. मैं ने उसे रास्ते के किनारे पर रख दिया. जेब से निकाल कर एक गोली खाई और थोड़ा आगे चल कर लड़खड़ाने का नाटक करने लगा. तभी मुझे शाहबानो नजर आई. वह हंस रही थी. मैं उस के पास पहुंचतेपहुंचते उस की बांहों में गिर गया और अपनी आंखें बंद कर लीं.

मुझे शाहबानो की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘आप भी सो जाइए, जनाब.’’

‘‘शाबाश, मेरी जान. असली कांटा गया,’’ राजेंद्र कब्र के पास वाले पेड़ की ओट से निकलते हुए बोला, ‘‘चलो, तार लगाते हैं.’’

मुझे लगा कि किसी तार को पैर के तलवे पर टेप किया जा रहा है.

‘‘चलो, आन कर के आओ,’’ बानो बोली.

समय आ गया था. मैं तुरंत उठ बैठा और राजेंद्र को पीछे से दबोच कर रिवाल्वर उस की कनपटी पर लगा दी. थापा ने झाड़ी में से कूद कर शाहबानो को काबू में कर लिया. राजेंद्र ने भागने का प्रयास करना चाहा पर रिवाल्वर का जवाब उस के पास नहीं था. दोनों को थापा की मदद से बंगले में ला कर उन्हें दिया और पुलिस को फोन कर दिया.

थोड़ी देर में सब साफ हो गया. सारी कहानी लगभग वैसी ही निकली जैसी कि मुझे आशंका थी. राजेंद्र की नजर कंपनी की इस बड़ी जमीन पर थी. उस ने अपनी योजना में बाकी चारों सेवादारों का हिस्सा तय कर उन्हें भी शामिल कर लिया था.

राजेंद्र ने सब से पहले बगीचे में मौजूद कब्र का फायदा उठाया और अभिशप्त आत्मा की एक मनगढ़ंत कहानी रची. उस का इरादा था कि कंपनी का कोई वैज्ञानिक वहां काम न कर पाए ताकि कंपनी निराश हो कर वह जमीन कौडि़यों के भाव बेचे और वह खरीद ले या समय के साथ इस पर कब्जा कर ले. उस ने यहां आने वाले कंपनी के हर आदमी को मारने की योजना बनाई क्योंकि उस की सोच यह थी कि सिर्फ डराने से शक हो सकता है. यदि मार दिया जाए तो ज्यादा कहानियां भी नहीं बनानी पड़ेंगी और खौफ भी ज्यादा पैदा होगा.

इस कारनामे को अंजाम देने के लिए राजेंद्र ने अपनी वनस्पतिशास्त्र की जानकारी काम में ली. हत्या के लिए बानो को मोहरा बनाया जाता. वह अपने जवानी के जाल में फंसा कर व्यक्ति को बगीचे में बुलाती. एक विशेष प्रकार की झाड़ी, जिस के कांटे जूतों में भी घुस सकते थे, की टहनियां रास्ते में डाल दी जातीं. उस के कांटे से पौधे का जहर शरीर में पहुंच जाता और व्यक्ति बेहोश हो जाता था. बरगद के पेड़ के पीछे जमीन में गड़ी बैटरियों से हलका करंट व्यक्ति को लगातार दिया जाता. इस से 2-3 घंटे में पूरा खून सूख जाता. करंट हलका होने से त्वचा न तो काली पड़ती थी न झुलसती थी.

पहले दिन बगीचे में टहलते हुए मैं ने जहरीली झाडि़यां देखी थीं. इस प्रकार की झाडि़यों से बचने के लिए मैं जब भी बगीचे में जाता तो विषरोधक गोलियां ले कर जाता था.

राजेंद्र के लिए समस्या तब शुरू हुई जब उस में और शाहबानों में प्रेम हो गया जबकि शाहबानो का रिश्ता बिलाल अहमद से तय हो चुका था. वह बारबार दोनों के बीच में आने लगा और झगड़ने लगा.

राजेंद्र ने मेरे आने के पहले दिन बिलाल को मारने की योजना बनाई ताकि मैं भी डर से भाग जाऊं. पर इस बार थापा ने साथ देने से इनकार किया. अब तक शायद उस का जमीर जाग उठा था. इसी के चलते मेरे आने के पहले दिन रामसिंह और थापा में झड़प हुई थी. ऐन मौके पर थापा के पलटने से इस काम को रविवार को अंजाम दिया गया. बिलाल की मौत के बाद रामसिंह ने अपना हिस्सा बढ़ाने की मांग की. अगली रात राजेंद्र ने उस की भी हत्या कर दी. बिलाल और रामसिंह दोनों बानो के बुलाने पर वासना के आवेश में बगीचे में गए थे.

मेरे आने के बाद राजेंद्र ने 4 साल से खराब पड़े तार और बैटरियों को बिलाल को मारने के लिए ठीक किया था, इसलिए कब्र मुझे साफ दिखाई दी थी. थापा पर मुझे यकीन था. शाम को ही मैं ने उसे योजना में शामिल कर लिया था. वह अंधेरा होते ही बगीचे में जा कर बैठ गया था.

राजेंद्र और शाहबानो को मैं ने पुलिस के हवाले कर दिया. कंपनी को सब बताने के बावजूद मुझे वापस बुला लिया गया. कुछ समय बाद मुझे पता चला कि गवाही और सुबूत के अभाव में दोनों बरी हो गए.     द्य

परिवर्तन

लेखक- खुशीराम पेटवाल

‘‘पर कवि, भगवान तो है ही न.’’

‘‘मैं तुम्हें पहले भी कई बार कह चुकी हूं कि अपना भगवान अपने पास रखो,’’ कवि झुंझला कर बोली, ‘‘वह तुम्हारा है, सिर्फ तुम्हारा. तुम्हारी पत्नी होने के नाते वह मेरा भी है, यह तुम्हारी धारणा गलत है. मैं तुम से कई बार कह चुकी हूं कि तुम्हारा भगवान मंदिरों में ही ठीक लगता है जहां वह मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर इनसानों की दया पर निर्भर है. तुम्हें शायद याद नहीं, यही गुजरात है जहां के सोमनाथ मंदिर को महमूद गजनवी ने लूटा था. वह भी एक इनसान था और उस के हाथों पिटा तुम्हारा भगवान. सर्वशक्तिमान हो कर भी कुछ न कर सका. लुटवा दी सारी संपदा, तुड़वा दी अपनी मूरत.’’

‘‘कवि, तुम बातों को सहज रूप में नहीं लेती हो. तुम्हें तो जो तर्क की कसौटी पर सही लगता है उसे ही तुम सही मानती हो. तुम ईश्वर का अस्तित्व वैज्ञानिक धरातल पर तलाशती हो. पर इतना जरूर कहूंगा कि कोई ऐसी एक ताकत जरूर है जो इस संसार को गतिमान कर रही है.’’

‘‘यह तो प्रकृति है जो यहां पहले से ही मौजूद है. ये सब अनादि काल से ऐसा ही चल रहा है.’’

‘‘ठीक है, तो इन में जीवन का संचार कौन कर रहा है?’’

‘‘कौन से क्या मतलब? जीवन का संचार सूर्य से है. सूर्य से ही ऊर्जा मिलती है. गहरे अर्थों में जाओ तो हाइड्रोजन हीलियम में बदलती है और बदलाव से ऊर्जा मिलती है जो सूर्य के अंदर मौजूद है और ऊर्जा से ही यह सारा संसार चलता है.’’

‘‘पर तुम्हारा सूर्य भी तो किसी ने बनाया होगा?’’

‘‘तुम प्रश्न तो गढ़ते हो पर यह क्यों नहीं मानते कि ये चीजें पहले से ही यहां मौजूद हैं जो निरंतर विकास की अवस्था से गुजरते हुए, अनादि काल से बिना किसी भगवान के सहारे यहां तक पहुंची हैं और आगे भी इसी तरह कुदरती बदलावों के साथ चलती रहेंगी.

‘‘भगवान न कभी था, न है और न होगा. बस, उस के नाम पर धंधा करने वाले लोग एक ढोल बजा कर, भगवान है…भगवान है का शोर इसलिए मचा रहे हैं ताकि वे अपनी गलतियों को ढक सकें. कुछ गलत हो गया तो ‘भगवान की ऐसी ही इच्छा थी.’ जो नहीं जानते उस के लिए ‘भगवान ही जानें.’ कुछ बस में नहीं हुआ तो ‘भगवान’ को आगे कर दिया. कमजोर प्राणी ही भगवान की शरण ढूंढ़ता है.

‘‘हेमंत, तुम भगवान के प्रति इतनी आस्था मत रखा करो. तुम्हें खुद पर विश्वास नहीं है इसलिए तुम अपने टेस्टों में फेल होते हो. मेहनत नहीं कर पाते तो दोष भगवान के माथे मढ़ते हो.’’

ये भी पढ़ें- सूना गला

‘‘रहने दो कवि, मैं मानता हूं कि मुझ में कहीं कोई कमी है. मैं तुम्हारे आगे हथियार डालता हूं. वैसे इस समय मैं सोने के मूड में हूं क्योंकि सारी रात राहुल ने सोने नहीं दिया है. कान दर्द बताता रहा.’’

‘‘यह कान दर्द भी तुम्हारे भगवान ने दिया होगा. यह क्यों नहीं कहते कि रात को स्टार मूवीज की गरमागरम फिल्म देख रहे थे और बहाना राहुल का बना रहे हो. इस में भी तुम्हारा कोई दोष नहीं क्योंकि भगवान के प्रति आस्था रखने वाले झूठ का सहारा तो लेते ही हैं.’’

‘‘कवि, राहुल उठ गया है उसे ले लो तो मैं थोड़ी देर तक दिल्ली में चल रही गणतंत्रदिवस परेड देख लूं.’’

राहुल को पालने में लिटा कर कवि उस के लिए दूध बनाने रसोईघर में घुसी. दूध बनाने के बाद बोतल से राहुल को दूध पिलाने लगी. घड़ी की टनटन की आवाज के साथ उस ने देखा तो  साढ़े 8 बज गए थे. वह सोचने लगी कि आया भी अभी तक नहीं आई. जाने कब आएगी. आती तो मुझे फुरसत मिलती इस राहुल से.

राहुल की आंखों में कवि की गोद में आने का आग्रह था, पर वह इस लालच में कभी पड़ी ही नहीं. उसे डर था कि यदि बच्चे को मां की गोद में रहने की आदत पड़ गई तो उस के लिए बड़ी दिक्कत हो जाएगी. राहुल हाथपैर हिलाहिला कर दूध पीता रहा.

कवि हेमंत के लिए चाय बना कर उसे प्याले में उड़ेलने लगी. यह क्या, चाय बाहर क्यों गिर रही है? मुझे किस ने धक्का दिया? कहीं मुझे चक्कर तो नहीं आ रहा है? राहुल पालने में जोरजोर से क्यों झूल रहा है? उसे कौन झुला रहा है और ये बरतन हिलते हुए दूसरी तरफ क्यों जा रहे हैं? ओह नो, भूकंप…

कवि घबराई हुई राहुल पर झपटी. उसे गोद में ले कर बेडरूम में भागी, हेमंत उठो, ‘‘भूकंप. गिरजा को लो.’’

शायद हेमंत भी स्थिति को समझ गया था. वह तेजी से गिरजा को गोदी में ले कर भागा. दोनों अपनीअपनी गोद में बच्चों को ले कर सीढि़यों की तरफ भागे. कवि ने देखा कि हेमंत 5-6 सीढि़यां ही उतर पाया था कि अचानक वह सीढि़यों के साथ नीचे गिरता चला गया. कवि के मुंह से चीख निकली, ‘‘हेमंत, बचो,’’ पर यह क्या मैं भी…और मेरे ऊपर भी दीवार भयानक ढंग से नीचे आ रही थी. कवि को बस, उस समय यही लगा था कि सारी बिल्ंिडग नीचे धंस रही है.

अचानक कवि जागी उसे लगा कि सिर और पैर में तेज दर्द है. सिर पर हाथ फिरा कर देखा तो कुछ चिपचिपा सा लगा. पैर में भी चोट आई थी. ‘मैं कहां हूं,’ कवि ने खुद से पूछा तो उसे याद आया कि वह तो राहुल को ले कर नीचे की ओर भागी थी…राहुल, वह कहां है?

अपने अगलबगल टटोला तो उस से थोड़ी ही दूरी पर राहुल पड़ा था. वह शायद सो रहा था. कवि ने उसे उठाया. सिर से पैर तक उस के अंगों को टटोल कर देखा. अचानक उस के मुंह से निकला, मेरे बच्चे, ‘तुम ठीक तो हो.’ और इस के बाद कवि उसे बेतहाशा चूमने लगी. यह बच्चे के जीवित रहने की खुशी थी जो प्यार बन कर उस के समूचे बदन को चूम रही थी. उस ने टटोल कर देखा तो बच्चे का अंगप्रत्यंग सलामत था. उस के बदन पर कहीं खरोंच तक न थी. मां के शरीर का स्पर्श पा कर राहुल जाग गया और उस के मुंह से निकला, ‘मां…’

कवि ने उसे अपने सीने से चिपका लिया. उस की आंखों से आंसू टपकने लगे. अचानक उसे गिरजा का खयाल आया और किसी अनहोनी की आशंका से वह सिहर गई. ‘गिरजा…’ वह तो हेमंत के हाथों में थी. हेमंत सीढि़यों सहित नीचे जा गिरा था. वह कहां है, जिंदा भी है या…

और एक अज्ञात भय से

कवि कांप गई. जोर  से चिल्लाई, ‘‘हेमंत…हे…मं…त… गिरजा… गि… र… जा…हे…मं….त…’’

वह देर तक चिल्लाती रही. उस के साथ राहुल भी रोता रहा. चिल्लातेचिल्लाते उस का गला रुंध गया. थक कर वह चुप हो गई. जाने कहां हैं? कहां दबे पड़े हैं. इसी ढेर के नीचे…मेरे नीचे भी तो शायद यह छत है और मेरे ऊपर? हाथ से टटोल कर देखा तो कुछेक हाथ ऊपर एक दीवार को टिका पाया. मैं कहां दबी पड़ी हूं…अंधेरे में केवल टटोल सकती हूं.

राहुल रो रहा था. उसे शायद भूख लग आई थी. उस के मुंह में अपना स्तन दे कर कवि ने ऊपर की ओर देखा तो दीवार के एक छोटे से छेद से रोशनी छन कर भीतर आ रही थी. जितनी रोशनी अंदर आ रही थी उस से वह अपने इस नए घर को देख तो सकती ही थी.

सिर की तरफ एक 3-4 फुट ऊंची सीमेंट की कालम है. नीचे भी टेढ़े ढंग से दीवार है. इस तरह कुल 3 फुट की ऊंचाई की जगह और 2 हाथ चौड़ाई की जगह. जहां वह बैठ सकती है और किसी तरह पैर सिकोड़ कर लेट सकती है.

कवि अपने वर्तमान को समझने का प्रयास करती हुई यह नहीं जान पाई कि इस स्थिति में रहते हुए उसे कितने दिन गुजरे हैं. जो भी हो, यहां से तो निकलना ही होगा. कैसे निकलूं? कोई हो तो उसे आवाज दूं और वह जोर से चिल्लाई, ‘‘बचाओ… बचाओ…कोई है, कोई तो सुने.’’

काफी देर तक कवि चिल्लाती रही. बाहरी दुनिया को बताने की कोशिश की कि वह जिंदा है, मगर बेकार. कोई हो तो सुने. जब पूरा भुज शहर ही भूकंप की चपेट में जमीन से आ लगा है तो किसे पड़ी है कि वह उस की सुनेगा.

राहुल अपनी मां की चीखें सुन कर कुछ देर तक रोता रहा और फिर सो गया. कवि ने उसे पास से देखा. कितना प्यारा बच्चा है. कितना गोलमटोल, हाथपैर हिलाते हुए उस का राहुल कितना अच्छा लगता है. कवि के मन ने उस से ही प्रश्न पूछा, ‘तू ने अपने बेटे को इतने करीब से देखा ही कब है जो तुझे यह एहसास होता जो आज हो रहा है. तू तो हमेशा अपनी नौकरी नाम की गृहस्थी में ही व्यस्त रही है.’

सहसा कवि के दिमाग में प्रश्न कौंधा कि सातमंजिला इमारत ढह गई और मैं चौथी मंजिल वाली अपने दूध- पीते बेटे राहुल के साथ बिलकुल ठीकठीक जिंदा हूं. यह कैसे संभव हुआ? क्या इस के पीछे हेमंत का ईश्वर है या परिस्थितियों ने मुझे बचा लिया क्योंकि तब मैं दीवार के किनारे तक ही पहुंच पाई थी. फिर भी उस के कमजोर मन ने बेटी और पति के जिंदा रहने की दुआ तो मांगी थी. कवि को पहली बार पता चला कि कमजोर समय में लोग भगवान को क्यों याद करते हैं. शायद इसलिए कि उन के पास दूसरा कोई उपाय नहीं होता. मायूस हो कर ईश्वर को याद करते हैं. काम बन गया तो ठीक, नहीं बना तो ठीक.

मैं अपने और बच्चे के बचाव के लिए जब तक चिल्ला सकती थी चिल्लाती रही कि शायद शोर सुन कर कोई तो आवाज दे. अगलबगल दबे मेरी तरह जिंदा इनसान या फिर ऊपर बचाव वाला, कोई.

धीरेधीरे छेद से रोशनी कम होतीदेख कर कवि को लगा कि रात होने वाली है. वह सोचने लगी कि अंधेरा अकेला नहीं आता. वह अपने साथ लाता है तरहतरह के डर. डर चोरों का, डर अकेले होने का, डर इस खंडहर में सोने का, डर इस दीवार के गिरने का और सब से बड़ा डर खुद पर से विश्वास उठ जाने का.

कवि अपने बच्चे राहुल को सीने से लगाए हेमंत की पंक्तियां गुनगुनाने लगी, ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर न हो…’ पहली बार इन पंक्तियों को गुनगुनाते हुए कवि को ऐसा लगा जैसे उस के साथ कोई है. कोई ताकत उस के भीतर आ गई है. इस गाने में कितनी शक्ति है आज इसे वह महसूस कर रही है. और वह बड़ी देर तक बारबार इन पंक्तियों को गुनगुनाती रही.

राहुल भूख के मारे कुलबुलाने लगा. उस के मुंह में उस ने अपना स्तन दे दिया. उसे आश्चर्य इस बात का था कि उस के स्तनों में इतना दूध कहां से आ गया जबकि उस ने अपने बच्चे को दूध बहुत कम पिलाया है. वह तो जानबूझ कर पहले माह से ही बच्चे को ऊपर का दूध पिलाने पर आमादा थी पर हेमंत के बहुत आग्रह पर उस ने राहुल को पहले माह ही दूध पिलाया था. उस के बाद एकाध बार से ज्यादा उस ने राहुल को कभी दूध पिलाया हो यह उसे याद नहीं. सुंदरता को कायम रखने के चक्कर में बच्चे को दूध पिलाने में आनाकानी करती रही. जब 3 महीने से राहुल बिलकुल भी उस का दूध नहीं पी रहा है तो आज उस की छाती  से दूध कैसे उतर रहा है? और उस के मुंह का स्पर्श एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रहा है. राहुल से हट कर जब उस का ध्यान गिरजा की तरफ गया तो मन में एक हूक सी उठी कि गिरजा को भी उस ने दूध कब पिलाया है. 1-2 महीने ही. बेचारी बच्ची, जाने कैसे बड़ी हो गई. मैं भी कैसी अभागिन मां हूं जो अपने सुख के चक्कर में अपने बच्चों को उन के सुख से वंचित रखा.

अपने बारे में सोचतेसोचते कवि कब सो गई उसे पता ही नहीं चला. जब जागी तो अपने चारों ओर अंधेरा देख कर सोचा अभी रात बाकी है. अब उसे सब से ऊपरी मंजिल पर रहने वाले हर्ष की याद आई. उस बेचारे की तो टांग भी टूटी हुई थी और बीवी भी बीमार थी. जाने अब कहां होगा वह परिवार. 7वीं मंजिल जब नीचे आई होगी तो वे कहां होंगे? यहीं कहीं मेरे ऊपर दबे होंगे. हर्ष तो बैड सहित ही नीचे आ गया होगा. वह जरूर बच गया होगा. छठी मंजिल वाली ऊषा का क्या हुआ होगा? अकेली लड़की, कोई नातेरिश्तेदार भी नहीं. पता नहीं जिंदा भी है या फिर…

बड़ी सुंदर है. हेमंत अकसर उस की तारीफ करता है. कहता है  कि क्या सुंदर कसे बदन की मलिका है यह लड़की. नितंब के अनुपात में ही छातियां. पतली कमर, कुल मिला कर विश्व सुंदरी वाला माप. उसे इस आफत की घड़ी में भी हेमंत की बातें याद कर हंसी आ गई कि क्या दिलफेंक इनसान है उस का पति.

यों तो वह मेरी तारीफ करते नहीं थकता. कहता है, ‘कवि, तुम सांचे में ढली हो. तुम्हारी ये आंखें मुझे हमेशा अपने पास बुलाती हैं. तुम्हारे ये रसीले होंठ बिना लाली के ही लाल हैं.’ और मेरे होंठों पर उस के अधीर चुंबन की सरसराहट दौड़ गई. ये मर्द होते ही ऐसे हैं जो जेहन में ऊषा जैसी औरत को रखेंगे और क्रिया करेंगे बीवी के साथ घर में…पर हेमंत वाकई मुझे प्यार करता है.

ये भी पढ़ें- शायद बर्फ पिघल जाए

अचानक राहुल कुलबुलाया तो कवि की तंद्रा टूट गई. उसे भूख लग आई है. यह सोच उस ने राहुल के मुंह में अपना स्तन दे दिया और प्यार से बच्चे को थपथपाने लगी.

उस छोटी सी जगह में छेद के रास्ते बाहर से रोशनी का आना कवि को बड़ा सुखद लगा. रोशनी से ही तो जीवन है. जीवन की हलचल है. जीवन का संचार है. रात भर के लिए मौत के आगोश में दबे लोगों के लिए सूरज नया जीवन ले कर आता है. आज भी वह फिर आया है.

अचानक बाहर हलकी सी खटखट हुई. कोई है. किसी को अपनी मौजूदगी का अहसास कराने के लिए कवि फिर चिल्लाने लगी, ‘‘कोई है…कोई है…अरे, कोई तो मुझे बचा लो.’’ पर उसे लगा कि उस की आवाज बाहर नहीं जा रही है. चिल्लातेचिल्लाते वह थक गई. राहुल भी दहशत के मारे रोने लगा. जब कवि थक गई और बाहर से किसी तरह का कोई संकेत नहीं मिला तो वह सोचने लगी, देश भर में भुज में आए भूकंप की खबर फैल गई होगी. बचाव व राहत दल वाले आ चुके होंगे. शायद सेना के लोग हों.  पर मेरा अपार्टमेंट तो मुख्य सड़क से काफी दूर है. इसलिए क्या मेरे यहां तक सहायता पहुंचने में देरी हो रही है क्योंकि राहत व बचाव कार्य पहले सड़क के किनारे वाले अपार्टमेंट में ही तो होगा. बीच में कितने अपार्टमेंट हैं. शायद सभी गिरे पड़े हों. हे भगवान, राहत वालों को यहां जरूर भेजना, लेकिन जब कम रोशनी होने लगी तो भगवान पर से विश्वास उठने के साथ ही उस का दिल भी डूबने लगा.

इस छोटी सी जगह पर जहां बैठना मुश्किल है कवि ने अपने और राहुल के लिए थोड़ी सी जगह साफ कर दी है. कंकड़ बीन लिए हैं. नीचे रेत है और आज उसे थोड़ी ठंड भी लग रही है. राहुल भूख के मारे रोने लगा क्योंकि उस की भूख अब उस के दूध से शांत नहीं हो पा रही है. क्या करूं? इस अंधेरे में, इस मौत के घर में मेरे स्तनों में दूध के अलावा उसे देने को है भी क्या.

उम्मीद के सहारे जिंदा कवि के स्तनों में दूध न पा कर राहुल ने अपने मसूड़े स्तनों में गड़ा दिए तो भी वह प्यार से उसे देखती रही और सोचती रही, कल तुझे कुछ न कुछ जरूर मिलेगा. कल हम बाहर जरूर जाएंगे मेरे बच्चे.

इतने दिनों बाद पहली बार कवि को अपनी मां की याद आई कि उस ने क्यों नहीं तब उन की सलाह को माना था, मां ने मना किया था कि अपार्टमेंट में मकान न ले, पर मैं ही अपनी जिद पर अड़ी रही. शहर दूरदूर तक देखा जा सकेगा. रात को उस की बालकनी में खड़े हो कर सारे भुज को देखना कितना अच्छा लगता था. वाकई कितना प्यारा, कितना सुंदर, रात के प्रकाश में जग-मगाता भुज. अब हेमंत को कहूंगी कि कोठीनुमा मकान ढूंढ़ेंगे. कवि मुसकराई और उस की आंखें मुंद गईं.

राहुल के चिल्लाने से कवि की नींद टूट गई. स्तनों में दूध नहीं था इसलिए एक बेबस मां की तरह उस ने उसे चिल्लाने दिया. थोड़ी देर में सूरज की रोशनी छेद के रास्ते भीतर आई. रोशनी के साथ ही मेरे भीतर जीवन का संचार हो गया. आशा बलवती हो गई. शायद आज कोई आए. मैं चिल्लाने लगी. राहुल भी मां को चिल्लाता देख कर रोने लगा. जब कवि चिल्लातेचिल्लाते थक गई तो उस ने राहुल की तरफ देखा. वह दोनों हाथों से मुंह में रेत डाल रहा था. ‘‘मिट्टी नो राहुल, नो,’’ कवि के मुंह से वही चिरपरिचित आवाज निकली. जब भी राहुल पार्क में खेलता तो मुंह में मिट्टी डाल लेता था.

विपरीत परिस्थितियां देख कर कवि ने खामोश रहना ही ठीक समझा. वह राहुल को उसी तरह मिट्टी के साथ खातेखेलते अपलक देखती रही. उस ने सोचा, मेरे बच्चे, रेत खाना भी तेरे नसीब में लिखा था.

कवि ने बच्चे को उठा कर अपनी छाती पर बैठा लिया. वह खेलने लगा. उस की नाक व मुंह पर रेत लगी देख कवि ने अपनी साड़ी से उस के मुंह की रेत झाड़ी तो राहुल मुसकरा दिया जिसे देख कर वह कुछ पल को दुखदर्द भूल गई. अतीत में अपनी व्यस्तता और बच्चे के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को याद कर कवि भावुक हो उठी. उसे पहली बार एहसास हुआ कि जिस आधुनिक खयाल में वह जी रही थी उस में उस ने पाया कम, खोया अधिक है. वह तो ऐसी अभागी मां है जो अपने बच्चे को आज तक एक बार नहला भी न सकी है. हे ईश्वर, मेरे राहुल को बचाना. यह कवि नहीं भीतर बैठी मां के मन से निकली आवाज थी और उस ने राहुल को जोर से अपनी छाती से भींच लिया.

रात फिर घिर आई. कवि का दायां पैर आज तेज दर्द कर रहा था. शायद घुटने में भीतर चोट लगी है. थोड़ी सूजन भी है. सिर में भी हलका दर्द है. उस ने अपने पैर को दबाया, थोड़ा आगेपीछे चलाया जितना कि उस जगह चलाया जा सकता था. दर्द कम नहीं हो रहा पर यह सोच कर कि इसे तो सहना ही है. कवि ने अपने को हालात के हवाले छोड़ दिया.

पिछले 3 दिनों से कवि को प्यास ही नहीं लगी पर अब पानी की जरूरत महसूस हो रही है. भूख तो नहीं है पर प्यास से गला सूखा जा रहा है. क्या करूं? यों ही इसे भी सहना होगा. कवि ने थूक घूंटा तो कुछ राहत महसूस हुई. अब जबजब प्यास लगेगी थूक ही गले के नीचे उतारूंगी.

प्यास तो राहुल को भी लग रही होगी, कवि ने बच्चे की तरफ देख कर सोचा कि यदि दूध होता तब तो जरूरत नहीं थी पर बिना दूध के जाने कैसे जी पाएगा. राहुल को तो इस की ज्यादा जरूरत होगी.

फिर से सुबह का धुंधलका भीतर आ गया. आज कवि को शौच महसूस हो रही है. क्या करना होगा? राहुल तो 3-4 बार यहीं कर भी चुका है. उसे कवि ने रेत से ढक दिया है. यहां इन हालात में तो यही करना होगा.

अचानक लगा कि बाहर धमधम की आवाज हो रही है. लगता है कोई है. ‘बचाओ…बचाओ…मुझे यहां से बचाओ.’ कवि के चिल्लाने के साथ ही राहुल का रोना भी शुरू हो गया. कवि घंटों चिल्लाती रही. इस प्रयास में उस की आवाज भी फट गई पर सब व्यर्थ.

इस घर में अब फिर से रात ढल आई है. राहुल रेत खा कर सो गया है. वह अब हिलडुल भी कम रहा है. उस के रोने में भी वह ताकत नहीं है. उस की आवाज मंद पड़ती जा रही है. बेटे की यह दशा देख कर बेबस कवि सोचने लगी कि कैसे वह राहुल को दम तोड़ते हुए देख सकती है. वह एक मां है और सबकुछ बरदाश्त कर सकती है पर अपने सामने भूख से मरते बच्चे को तो नहीं देख सकती क्योंकि वह तो एक मां है. जीवन में पहली बार कवि ने ईश्वर को याद कर मनौती मानी कि भगवान, तुम मुझे और मेरे बच्चे को इस संकट से जीवित बचा लो. मैं तो सारे तीर्थ जा कर मत्था टेकूंगी.

कवि की जब आंख खुली तो सुबह का उजाला भीतर प्रवेश कर चुका था. राहुल अभी सो रहा है. जाने कैसे जिंदा है. 5-6 दिन हो गए हैं. इन 5-6 दिनों में हर पल कवि को मरना पड़ा है. वह  मरमर कर जीती रही है. वह एक दूध पीते बच्चे के साथ कैसे इतने दिनों से जिंदा है? इस प्रश्न का उत्तर कवि का मन ढूंढ़ ही रहा था कि अचानक बाहर शोर हुआ. लग रहा है कोई ऊपर है. कोई खोद रहा है.

कवि पूरी ताकत से चिल्लाई, ‘‘मैं यहां हूं, हम यहां हैं.’’ चिल्लातेचिल्लाते फेफड़े थक गए. फिर भी उस का चिल्लाना जारी रहा.

रोते हुए राहुल को थपथपाते हुए कवि बोली, ‘‘चुप हो जा मेरे बच्चे कोई है शायद. आर्मी वाले हों और जीवन पाने की खुशी में कवि राहुल को जोर से भींच कर उसे चूमने लगी. ऊपर से 2 आंखों  ने भीतर झांका तो कवि चिल्लाई और एक बार फिर बेटे को अपने में इस तरह छिपा लिया कि उसे एक खरोंच तक न लगे. ऊपर की दीवार तोड़ी जा रही थी. दो हाथ भीतर आए.

ये भी पढ़ें- तपस्या

‘‘बच्चे को दो,’’ कई दिनों बाद इनसानी स्वर सुनने को मिला. कवि के उत्साह का ठिकाना न रहा. उस ने राहुल को उन 2 हाथों में थमा दिया.

भगवान यहां भी मूकदर्शक बना रहा. आखिर, इनसान की सहायता में इनसान के 2 हाथ ही आगे बढ़े और थोड़ी देर बाद कवि भी बाहर आ गई.

आर्मी वालों में शोर हुआ, ‘संभल कर,’ ‘‘सावधान’, ‘हुर्रे’. किसी ने किसी की पीठ थपथपाई. ‘बकअप’ और सब में जीवन का अद्भुत संचार हो गया. धन्यवाद, धन्यवाद आर्मी वालो.      द्य

पुराने नोट

लेखक- सुरेश सौरभ

‘‘यह बुढि़या भी बड़ी अजीब थी. जाने कहांकहां का… जाने क्यों ये चिथड़ेगुदड़े संभाल कर रखे हुए थी,’’ भुनभुनाते हुए सुमन अपनी मर चुकी सास के पुराने बक्से की सफाई कर रही थी.

तभी सुमन की नजर बक्से के एक कोने में मुड़ेतुड़े एक तकिए पर पड़ी जिस के किनारे की उखड़ी सिलाई से 500 का एक पुराना नोट बत्तीसी दिखाता सा झांक रहा था.

सुमन ने बड़ी हैरत से उस तकिए को उठाया, हिलायाडुलाया, फिर किसी अनहोनी के डर से जल्दीजल्दी उस तकिए की सिलाई उधेड़ने लगी.

अब सुमन के सामने 1000-500 के पुराने नोटों का ढेर था. वह फटी आंखों से उसे हैरानी से देखे जा रही थी. थोड़ी देर तक उस का दिमाग शून्य पर अटक गया, फिर उस की चेतना लौटी.

सुमन ने फौरन आवाज लगाई, ‘‘अरे भोलू के पापा, जल्दी आओ… जरा सुनो तो…’’

‘‘क्या आफत आ गई. अभी खाना दे कर गई है और पुकारने लगी है. यह औरत जरा भी सुकून से खाना नहीं खाने देती है,’’ पति झुंझलाया.

‘‘अरे, जल्दी आओ,’’ सुमन ने दोबारा कहा.’

ये भी पढ़ें- चाहत

‘‘पता नहीं, कोई सांपबिच्छू तो नहीं है…’’ बड़बड़ाता हुआ पति वहां पहुंचा. सुमन सिर पर हाथ रखे अपने सामने 1000-500 के पुराने नोटों के ढेर को बड़ी हैरानी से देख रही थी.

पति ने यह नजारा देखा तो उस के भी होश उड़ गए. सारा गुस्सा ठंडा हो गया. फिर अटकतेअटकते वह बोला, ‘‘यह सब क्या है सुमन…’’

‘‘तुम्हारी मां ने बड़े अरमान से हमारी गरीबी दूर करने के लिए ये पैसे जोड़जोड़ कर अपने तकिए में रखे थे. लेकिन 2 साल पहले बेचारी मरते समय यह राज हमें न बता पाई. दिल में यही अरमान रहे होंगे कि बहू, बेटे और उन के बच्चों की इन रुपयों से गरीबी दूर हो जाएगी. पर हाय रे नोटबंदी का दानव मेरी सासू मां के सारे अरमानों को खा गया.’’

यह देख पति भारी मन से बोला, ‘‘अम्मां को मैं ही दवादारू के लिए थोड़ेबहुत पैसे देता रहता था, पर मुझे क्या पता था कि वे हमारी गरीबी दूर के लिए पैसे जोड़ रही थीं.’’

सुमन डबडबाई आंखों से बोली, ‘‘सचमुच अम्मां का दिल बहुत बड़ा था.’’

पति ने कहा, ‘‘हां, शायद हम लोगों से भी

ज्यादा बड़ा…’’

सुमन बोली, ‘‘आप सही कहते हो.’’

अब वहां वे दोनों फूटफूट कर रोने लगे, जिसे सिर्फ घर की दीवारें ही सुन पा रही थीं.

ये भी पढ़ें- एतराज

नरेंद्र मोदी की सरकार ने सोचा था कि वह नोटबंदी से अमीरों का काला धन निकालेगी, पर यहां तो गोराचिट्टा धन एक रात में काला हो गया था.   द्य

चाहत

लेखक- जसविंदर शर्मा

यह सुन कर मैं पसोपेश में पड़ गया कि अपनी पत्नी को साथ ले कर जाना ठीक रहेगा कि नहीं. रमण हमारे इलाके का ही है. उस का गांव मेरे गांव से 3 किलोमीटर दूर है. इधर कई साल से हमारा मिलनाबोलना तकरीबन बंद ही था. अब मैं प्रमोशन ले कर उस के औफिस में उस के शहर में आ गया तो हमारे संबंध फिर से गहरे होने लगे थे. पिछले 20 सालों में हमारे बीच बात ही कुछ ऐसी हो गई थी कि हम एकदूसरे को अपना मुंह दिखाना नहीं चाहते थे.

रमण और मैं 10वीं क्लास तक एक ही स्कूल में पढ़े थे. यह तो लाजिम ही था कि हमें एक ही कालेज में दाखिला लेना था, क्योंकि 30 मील के दायरे में वहां कोई दूसरा कालेज तो था नहीं. हम दोनों रोजाना बस से शहर जाते थे.

रमण अघोषित रूप से हमारा रिंग लीडर था. वह हम से भी ज्यादा दिलेर, मुंहफट और जल्दी से गले पड़ने वाला लड़का था.

पढ़ाई में वह फिसड्डी था, पर शरीर हट्टाकट्टा था उस का, रंग बेहद गोरा.

बचपन से ही मुझे कहानीकविता लिखने का चसका लग गया था. मजे की बात यह थी कि जिस लड़की सुमन के प्रति मैं आकर्षित हुआ था, रमण भी उसी पर डोरे डालने लगा था. हमारी क्लास में सुमन सब से खूबसूरत लड़की थी.

हम लोग तो सारे पीरियड अटैंड करते, मगर रमण पर तो एक ही धुन सवार रहती कि किसी तरह जल्दी से कालेज की कोई लड़की पट जाए. अपनी क्लास की सुमन पर तो वह बुरी तरह फिदा था. खैर, हर वक्त पीछे पड़े रहने के चलते सुमन का मन किसी तरह पिघल ही गया था.

सुमन रमण के साथ कैफे जाने लगी थी. इस कच्ची उम्र में एक ही ललक होती है कि विपरीत लिंग से किसी तरह दोस्ती हो जाए. आशिकी के क्या माने होते हैं, इस की समझ कहां होती है. रमण में यह दीवानगी हद तक थी.

एक दिन लोकल अखबार में मेरी कहानी छपी. कालेज के इंगलिश के लैक्चरर सेठ सर ने सारी क्लास के सामने मुझे खड़ा कर के मेरी तारीफ की.

ये भी पढ़ें- कृष्णिमा

मैं तो सुमन की तरफ अपलक देख रहा था, वहीं सुमन भी मेरी तरफ ही देख रही थी. उस समय उस की आंखों में जो अद्भुत चमक थी, वह मैं कई दिनों तक भुला नहीं पाया था. पता नहीं क्यों उस लड़की पर मेरा दिल अटक गया था, जबकि मुझे पता था कि वह मेरे दोस्त रमण के साथ कैफे जाती है. रमण सब के सामने ये किस्से बढ़ाचढ़ा कर बताता रहता था.

सुमन से अकेले मिलने के कई और मौके भी मिले थे मुझे. कालेज के टूर के दौरान एक थिएटर देखने का मौका मिला था हमें. चांस की बात थी कि सुमन मेरे साथ वाली कुरसी पर थी. हाल में अंधेरा था. मैं ने हिम्मत कर के उस का हाथ अपने हाथ में ले लिया तो बड़ी देर तक उस का हाथ मेरे हाथ में रहा.

रमण से गहरी दोस्ती होने के बावजूद बरसों तक मैं ने रमण से सुमन के प्रति अपना प्यार छिपाए रखा. डर था कि क्या पता रमण क्या कर बैठे. कहीं कालेज आना न छोड़ दे. सुमन के मामले में वह बहुत संजीदा था.

एक दिन किसी बात पर रमण से मेरी तकरार हो गई. मैं ने कहा, ‘क्या हर वक्त ‘मेरी सुमन’, ‘मेरी सुमन’ की रट लगाता रहता है. यों ही तू इम्तिहान में कम नंबर लाता रहेगा तो वह किसी और के साथ चली जाएगी.’

रमण दहाड़ा, ‘मेरे सिवा वह किसी और के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती.’

मैं ने अनमना हो कर यों ही कह दिया, ‘कल मैं तेरे सामने सुमन के साथ इसी कैफे में इसी टेबल पर कौफी पीता मिलूंगा.’

हम दोनों में शर्त लग गई.

मैं रातभर सो नहीं पाया. सुमन ने अगर मेरे साथ चलने से मना कर दिया तो रमण के सामने मेरी किरकिरी होगी. मेरा दिल भी टूट जाएगा. मगर मुझे सुमन पर भरोसा था कि वह मेरा दिल रखेगी.

दूसरे दिन सुमन मुझे लाइब्रेरी से बाहर आती हुई अकेली मिल गई. मैं ने हिम्मत कर के उस से कहा कि आज मेरा उसे कौफी पिलाने का मन कर

रहा है.

मेरे उत्साह के आगे वह मना न कर सकी. वह मेरे साथ चल दी. थोड़ी देर बाद रमण भी वहां पहुंच गया. उस का चेहरा उतरा हुआ था. खैर, कुछ दिनों बाद वह बात आईगई हो गई.

सुमन और मेरे बीच कुछ है या हो सकता है, रमण ने इस बारे में कभी कल्पना भी नहीं की थी और उसे कभी इस बात की भनक तक नहीं लगी.

कालेज में छात्र यूनियन के चुनावों के दौरान खूब हुड़दंग हुआ. रमण ने चुनाव जीतने के लिए दिनरात एक कर दिया. वह तो चुनाव रणनीति बनाने में ही बिजी रहा. वह जीत भी गया.

चुनाव प्रचार के दौरान मुझे सुमन के साथ कुछ पल गुजारने का मौका मिला. न वह अपने दिल की बात कह पाई और न

ही मेरे मुंह से ऐसा कुछ निकला. दोनों सोचते रहे कि पहल

कौन करे.

जब कभी कहीं अकेले सुमन के साथ बैठने का मौका मिलता तो हम ज्यादातर खामोश ही

बैठे रहते.

एक दिन तो रमण ने कह ही दिया था कि तुम दोनों गूंगों की अपनी ही

कोई भाषा है. सचमुच सच्चे प्यार में चुप रह कर ही दिल से सारी बातें करनी होती हैं.

मैं एमए की पढ़ाई करने के लिए यूनिवर्सिटी चला गया. रमण ने बीए कर के घर में खेती में ध्यान देना शुरू कर दिया. साथ में नौकरी के लिए तैयारी करता रहता.

मैं महीनेभर बाद गांव आता तो फटाफट रमण से मिलने उस के गांव में चल देता. वह मुझे सुमन की खबरें देता.

रमण को जल्दी ही अस्थायी तौर पर सरकारी नौकरी मिल गई. सुमन भी वहीं थी. सुमन के पिता को हार्टअटैक हुआ था, इसीलिए सुमन को जौब की सख्त जरूरत थी.

काफी अरसा हो गया था. सुमन से मेरी कोई मुलाकात नहीं हुई. मौका पा कर मैं उस के कसबे में चक्कर लगाता, उस कैफे में कई बार जाता, मगर मुझे सुमन का कोई अतापता न मिलता.

मेरी हालत उस बदकिस्मत मुसाफिर की तरह थी, जिस की बस उसे छोड़ कर चली गई थी और बस में उस का सामान भी रह गया था.

संकोच के मारे मैं रमण से सुमन के बारे में ज्यादा पूछताछ नहीं कर सकता था. रमण के आगे मैं गिड़गिड़ाना नहीं चाहता था. मुझे उम्मीद थी कि अगर मेरा प्यार सच्चा हुआ तो सुमन मुझे जरूर मिलेगी.

सुमन को तो उस की जौब में पक्का कर दिया गया. उस में काम के प्रति लगन थी. रमण को 6 महीने बाद निकाल दिया गया.

रमण को जब नौकरी से निकाला गया, तब वह जिंदगी और सुमन के बारे में संजीदा हुआ. उस के इस जुनून से मैं एक बार तो घबरा गया.

अब तक वह सुमन को शर्तिया तौर पर अपना मानता था, मगर अब उसे लगने लगा था कि अगर उसे ढंग की नौकरी नहीं मिली तो सुमन भी उसे नहीं मिलेगी.

इसी दौरान मैं ने सुमन से उस के औफिस जा कर मिलना शुरू कर दिया था. मैं उसे साहित्य के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियां बताता. उसे खास पत्रिकाओं में छपी अपनी रोमांटिक कविताएं दिखाता.

रमण ने सुमन को बहुत ही गंभीरता से लेना शुरू कर दिया था. रमण मुझे कई कहानियां सुनाता कि आज उस ने सुमन के साथ फलां होटल में लंच किया और आज वे किसी दूसरे शहर घूमने गए. सुमन के साथ अपने अंतरंग पलों का बखान वह मजे ले कर करता.

पहले रमण का सुमन के प्रति लापरवाही वाला रुख मुझे आश्वस्त कर देता था कि सुमन मुझे भी चाहती है, मगर अब रमण सच में सुमन से प्यार करने लगा था. ऐसे में मेरी उलझनें बढ़ने लगी थीं.

फिर एक अनुभाग में मुझे और रमण को नियुक्ति मिली. रमण खुश था कि अब वह सुमन को प्रपोज करेगा तो वह न नहीं कहेगी. मैं चुप रहता.

मैं सोचने लगा कि अब अगर कुछ उलटफेर हो तभी मेरी और सुमन में नजदीकियां बढ़ सकती हैं. हमारा औफिस सभी विभागों के बिल पास करता था. यहां प्रमोशन के चांस बहुत थे. मैं विभागीय परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया.

एक दिन मैं और रमण साथ बैठे थे, तभी अंदर से रमण के लिए बुलावा

आ गया.

5 मिनट बाद रमण मुसकराता हुआ बाहर आया. उस ने मुझे अंदर जाने को कहा. अंदर जिला शिक्षा अधिकारी बैठे थे. वे मुझे अच्छी तरह से जानते थे. मेरे बौस ने ही सारी बात बताई, ‘बेटा, वैसे तो मुझे यह बात सीधे तौर पर तुम से नहीं करनी चाहिए. कौशल साहब को तो आप जानते ही हैं. मैं इन से कह बैठा कि हमारे औफिस में 2 लड़कों ने जौइन किया है. इन की बेटी बहुत सुंदर और होनहार है. ये करोड़पति हैं. बहुत जमीन है इन की शहर के साथ.

‘ये चाहते हैं कि तुम इन की बेटी को देख लो, पसंद कर लो और अपने घर वालों से सलाह कर लो.

‘रमण से भी पूछा था, मगर उस ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया. अब तुम्हें मौका मिल रहा है.’

रमण से मैं हर बार उन्नीस ही पड़ता था. बारबार कुदरत हमारा मुकाबला करवा रही थी. एक तरफ सुमन थी और दूसरी तरफ करोड़ों की जायदाद.

घरजमाई बनने के लिए मैं तैयार नहीं था और सुमन से इतने सालों से किया गया प्रेम…

फिर पता चला कि शिक्षा अधिकारी ने रमण के मांबाप को राजी कर लिया है. रमण ने अपना रास्ता चुन लिया था. सुमन से सारे कसमेवादे तोड़ कर वह अपने अमीर ससुराल चला गया था. मैं प्रमोशन पा कर दिल्ली चला गया था.

सुमन का रमण के प्रति मोह भंग हो गया था. सुमन ने एक दूसरी नौकरी ले ली थी और 2 साल तक मुझे उस का कोई अतापता नहीं मिला.

बहन की शादी के बाद मैं भी अखबारों में अपनी शादी के लिए इश्तिहार देने लगा था. सुमन को मैं ने बहुत ढूंढ़ा. इस के लिए मैं ने करोड़पति भावी ससुर का औफर ठुकरा दिया था. वह सुमन भी अब न जाने कहां गुम हो गई थी. उस ने मुझे हमेशा सस्पैंस में ही रखा. मैं ने कभी उसे साफसाफ नहीं कहा कि मैं क्या चाहता हूं और वह पगली मेरे प्यार की शिद्दत नहीं जान पाई.

ये भी पढ़ें- सूनी मांग का दर्द

अखबारों के इश्तिहार के जवाब में मुझे एक दिन सुमन की मां द्वारा भेजा हुआ सुमन का फोटो और बायोडाटा मिला. मैं तो निहाल हो गया. मुझे लगा कि मुझे खोई हुई मंजिल मिल गई है. मैं तो सरपट भागा. मेरे घर वाले हैरान थे कि कहां तो मैं लड़कियों में इतने नुक्स निकालता था और अब इस लड़की के पीछे दीवाना हो गया हूं.

शादी के बाद भी लोग पूछते रहते थे कि क्या तुम्हारी शादी लव मैरिज थी या अरैंज्ड तो मैं ठीक से जवाब नहीं दे पाता था. मैं तो मुसकरा कर कहता था कि सुमन से ही पूछ लो.

सुमन से शादी के बाद रमण के बारे में मैं ने कभी उस से कोई बात नहीं की. सुमन ने भी कभी भूले से रमण का नाम नहीं लिया.

वैसे, रमण सुंदर और स्मार्ट था. सुमन कुछ देर के लिए उस के जिस्मानी खिंचाव में बंध गई थी. रमण ने उस के मन को कभी नहीं छुआ.

जब रमण ने सुमन को बताया होगा कि उस के मांबाप उस की सुमन से शादी के लिए राजी नहीं हो रहे हैं तो सुमन ने कैसे रिएक्ट किया होगा.

रमण ने यह तो शायद नहीं बताया होगा कि करोड़पति बाप की एकलौती बेटी से शादी करने के लिए वह सुमन को ठुकरा रहा है. मगर जिस लहजे में रमण ने बात की होगी, सुमन सबकुछ समझ गई होगी. तभी तो वह दूसरी नौकरी के बहाने गायब हो गई.

इन 2 सालों में सुमन ने मेरे और रमण के बारे में कितना सोचाविचारा होगा. रमण से हर लिहाज में मैं पहले रैंक पर रहा, मगर सुंदरता में वह मुझ से आगे था.

आज रमण के बेटे की सगाई का समाचार पा कर मैं सोच में था कि रमण के घर जाएं या नहीं.

सुमन ने सुना तो जाने में कोई खास दिलचस्पी भी नहीं दिखाई. उसे यकीन था कि अब रमण का सामना करने में उसे कोई झेंप या असहजता नहीं होगी. इतने सालों से रमण अपने ससुराल में ही रह रहा था. सासससुर मर चुके थे. इतनी लंबीचौड़ी जमीन शहर के साथ ही जुट गई थी. खुले खेतों के बीच रमण की आलीशान कोठी थी. खुली छत पर पार्टी चल रही थी.

रमण ने सुमन को देख कर भी अनदेखा कर दिया. एक औपचारिक सी नमस्ते हुई. अब मैं रमण का बौस था, रमण के बेटे और होने वाली बहू को पूरे औफिस की तरफ से उपहार मैं ने सुमन के हाथों ही दिलवाया.

पहली बार रमण ने हमें हैरानी से देखा था, जब मैं और सुमन उस के घर के बाहर कार से साथसाथ उतरे थे. वह समझ गया था कि हम मियांबीवी हैं.

दूर तक फैले खेतों को देख कर मेरे मन में आया कि ये सब मेरे हो सकते थे, अगर उस दिन मैं जिला शिक्षा अधिकारी की बात मान लेता.

ये भी पढ़ें- वसीयत

उस शाम सारी महफिल में सुमन सब से ज्यादा खूबसूरत लग रही थी. शायद उसे देख कर रमण के मन में भी आया होगा कि अगर वह दहेज के लालच में न पड़ता तो सुमन उस की हो सकती थी. चलो, जिस की जो चाहत थी, उसे मिल गई थी.

एतराज

लेखक- अशरफ खान

अभी जमाल बैठा प्रिंसिपल साहब से बातें कर ही रहा था कि एक 10-11 साल का बच्चा वहां आया और उसे कहने लगा, ‘‘जमींदार साहब ने आप को बुलाया है.’’

यह सुन कर जमाल ने हैरानी से प्रिंसिपल साहब की तरफ देखा.

‘‘इस गांव के जमींदार बड़े ही मिलनसार इनसान हैं… जब मैं भी यहां नयानया आया था तब मुझे भी उन्होंने बुलाया था. कभीकभार वे खुद भी यहां आते रहते हैं… चले जाइए,’’ प्रिंसिपल साहब ने कहा तो जमाल उठ कर खड़ा हो गया.

जब जमाल जमींदार साहब के यहां पहुंचा तो वे बड़ी गर्मजोशी से मिले. सुर्ख सफेद रंगत, रोबीली आवाज के मालिक, देखने में कोई खानदानी रईस लगते थे. उन्होंने इशारा किया तो जमाल भी बैठ गया.

‘‘मुझे यह जान कर खुशी हुई कि आप उर्दू के टीचर हैं, वरना आजकल तो कहीं उर्दू का टीचर नहीं होता, तो कहीं पढ़ने वाले छात्र नहीं होते…’’

जमींदार साहब काफी देर तक उर्दू से जुड़ी बातें करते रहे, फिर जैसे उन्हें कुछ याद आया, ‘‘अजी… अरे अजीजा… देखो तो कौन आया है…’’ उन्होंने अंदर की तरफ मुंह कर के आवाज दी.

एक अधेड़ उम्र की औरत बाहर आईं. वे शायद उन की बेगम थीं.

‘‘ये नए मास्टर साहब हैं जमाल. हमारे गांव के स्कूल में उर्दू पढ़ाएंगे,’’ यह सुन कर जमींदार साहब की बेगम ने खुशी का इजहार किया, फिर जमाल से पूछा, ‘‘घर में और कौनकौन हैं?’’

जमाल ने कम शब्दों में अपने बारे में बताया.

‘‘अरे, कुछ चायनाश्ता लाओ…’’ जमींदार साहब ने कहा.

‘‘नहीं, इस की कोई जरूरत नहीं है,’’ जमाल बोला.

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है… आप के प्रिंसिपल साहब भी कभीकभार यहां आते रहते हैं और हमारी मेहमाननवाजी का हिस्सा बनते हैं.’’

ये भी पढ़ें- हमारे मुन्ना भाई एमबीबीएस

‘‘जी, उन्होंने ऐसा बताया था,’’ जमाल ने कहा.

कुछ देर बाद वे चायनाश्ता ले कर आ गईं… जमाल ने चाय पी और उठ कर खड़ा हो गया, ‘‘अच्छा, अब मुझे इजाजत दीजिए.’’

‘‘हां, आते रहना.’’

जमाल दरवाजे के पास था. उन लोगों ने आपस में खुसुरफुसुर की और जमींदार साहब ने उसे आवाज दी, ‘‘अरे बेटा, सुनो… आज रात का खाना तुम हमारे साथ यहीं पर खाना.’’

‘‘नहीं… नहीं… आप परेशान न हों. चची को परेशानी होगी,’’ जमाल ने जमींदार साहब की बेगम को चची कह कर मना करना चाहा.

‘‘अरे, इस में परेशान होने की क्या बात है… तुम मेरे बेटे जैसे ही हो.’’

जमाल रात के खाने पर आने का वादा कर के चला गया.

जब जमाल रात को खाने पर दोबारा वहां पहुंचा तो जमींदार साहब और उन की बेगम उस के पास बैठे हुए थे. इधरउधर की बातें कर रहे थे. इतने में अंदर जाने वाले दरवाजे पर दस्तक हुई…

चची ने दरवाजे की तरफ देखा और उठ कर चली गईं… लौटीं तो उन के हाथ में खाने की टे्र थी.

जमाल का खाना खाने में दिल नहीं लग रहा था. रहरह कर उस की बेचैनी बढ़ती जा रही थी… आखिर दरवाजे की उस ओर कौन था? बहरहाल, किसी तरह खाना खाया और थोड़ी देर के बाद वह वहां से चला आया.

उस दिन रविवार था. जमाल बैठा बोर हो रहा था.

‘क्यों न जमींदार साहब की तरफ चला जाया जाए,’ उस ने सोचा.

जमाल तेज कदमों से लौन पार करता हुआ अंदर जा रहा था. उस की आहट पा कर एक लड़की हड़बड़ा कर खड़ी हो गई… वह क्यारियों में पानी दे रही थी. जमाल उसे गौर से देखता रहा. वह सफेद कपड़ों में थी. वह भी उसे देखती रही.

‘‘जमींदार साहब हैं क्या?’’ जमाल ने पूछा तो कोई जवाब दिए बगैर वह अंदर चली गई.

कुछ देर बाद जमींदार साहब अखबार लिए बाहर आए, ‘‘आओ बेटा, आओ…’’

जमाल उन के साथ अंदर दाखिल हो गया. उन के हाथ में संडे मैगजीन का पन्ना था. उन्होंने जमाल के सामने वह अखबार रखते हुए कहा, ‘‘देखो, इस में मेरी बहू की गजल छपी है…’’

जमाल ने गजल को सरसरी नजरों से देखा, फिर नीचे नजर दौड़ाई तो लिखा था, शबीना अदीब.

जमाल को उस लड़की के सफेद लिबास का खयाल आया. उस ने जमींदार साहब की आंखों में देखा. शायद वे उस की नजरों का मतलब समझ गए थे. उन्होंने नजरें झुका लीं और फिर उन्होंने जोकुछ बताया था, वह यह था:

शबीना जमींदार साहब की छोटी बहन हसीना की बेटी थी. शबीना की पैदाइश के वक्त हसीना की मौत हो गई थी और बाप ने दूसरा निकाह कर लिया था. सौतेली मां का शबीना के साथ कैसा बरताव होगा, यह सोच कर जमींदार साहब ने उसे अपने पास रख लिया था.

अदीब जमींदार साहब का बेटा था. शबीना और अदीब ने अपना बचपन एकसाथ गुजारा था, तितलियां पकड़ी थीं और जब दोनों ने जवानी की दहलीज पार की तो उन का रिश्ता पक्का कर दिया गया था.

उन की नईनई शादी हुई थी. अदीब ने आर्मी जौइन की थी. कोई जाने की इजाजत नहीं दे रहा था, लेकिन वह सब को मायूसी के अंधेरे में छोड़ कर चला गया. एक दिन वह वतन की हिफाजत करतेकरते शहीद हो गया.

शबीना पर गमों का पहाड़ टूट पड़ा. आंसू थे कि थमने का नाम नहीं ले रहे थे. फिर उस ने खुद को पत्थर बना लिया और कलम उठा ली, अपना दर्द कागज पर उतारने के लिए या अदीब का नाम जिंदा रखने के लिए.

अब जमाल अकसर जमींदार साहब के यहां जाता था. दिल में होता कि शबीना के दीदार हो जाएं… उस की एक झलक देख ले… लेकिन, वह उसे दोबारा नजर नहीं आई.

एक दिन जमाल उन के यहां बैठा हुआ था. जमींदार साहब किसी काम से शहर गए हुए थे. जमाल और उन की बेगम थे. वह बात का सिरा ढूंढ़ रहा था. आज जमाल उन से अपने दिल की बात कह देना चाहता था.

ये भी पढ़ें- एक बहानेबाज संस्कृति

‘‘चची, आप मुझे अपना बेटा बना लीजिए,’’ जमाल ने हिम्मत जुटाई.

‘‘यह भी कोई कहने की बात है…

तू तो है ही मेरा बेटा…’’ उन्होंने हंस

कर कहा.

‘‘चची, मुझे अपने अदीब की जगह दे दीजिए. मेरा मतलब है कि शबीना का हाथ मेरे हाथ…’’ जमाल का इतना कहना था कि उन्होंने जमाल की आंखों में देखा.

‘‘अगर आप को कोई एतराज न

हो तो…’’

‘‘मुझे एतराज है,’’ इस से पहले कि वे कोई जवाब देतीं, इस आवाज के

साथ शबीना खड़ी थी, किसी शेरनी की तरह बिफरी हुई… फटीफटी आंखों से देखती हुई…

‘‘आप ने ऐसा कैसे सोच लिया… अदीब की यादें मेरे साथ हैं. वे मेरे जीने का सहारा हैं… मैं यह साथ कैसे छोड़ सकती हूं… मैं शबीना अदीब थी, शबीना अदीब हूं… शबीना अदीब रहूंगी. यही मेरी पहचान है… मैं इसी पहचान के साथ ही जीना चाहती हूं…’’ अपना फैसला सुना कर वह अंदर कमरे में जा चुकी थी.

जमाल ने चची की आंखों में देखा तो उन्होंने नजरें झुका लीं. जमाल उठ कर बाहर चला आया.

ये भी पढ़ें- क्यों दूर चले गए

कुछ दिनों के बाद जमाल शहर जाने वाली बस के इंतजार में बसस्टैंड पर खड़ा था. इतने में एक बस वहां आ कर रुकी. उस ने अलविदा कहती नजरों से गांव की तरफ देखा और बस में सवार हो गया. उस ने नौकरी छोड़ दी थी.   द्य

आ बैल मुझे मार

लेखक- रंजीत कुमार मिश्र

बात शायद आप की भी समझ में नहीं आ रही है. दरअसल, हम अपनी ही बात कर रहे हैं. चलिए, आप को पूरा किस्सा सुना देते हैं.

तकरीबन 2 हफ्ते पहले हम अपनी खटारा मोटरसाइकिल पर शहर से बाहर रहने वाले एक दोस्त से मिल कर वापस लौट रहे थे. शाम हो गई थी और अंधेरा भी घिर आया था. हम जल्दी घर पहुंचने के चक्कर में खूब तेज मोटरसाइकिल चला रहे थे.

अचानक हम ने सड़क के किनारे एक आदमी को पड़े देखा. पहले तो हमें लगा कि कोई नशेड़ी है जो सरेआम नाली में पड़ा है, लेकिन नजदीक पहुंचने पर हमें उस के आसपास खून भी दिखा. लगता था कि किसी ने उस को अपनी गाड़ी से टक्कर लगने के बाद किनारे लगा दिया था.

पहले तो हम ने भी खिसकने की सोची. यह भी दिमाग में आया कि इस लफड़े में पड़ना ठीक नहीं, लेकिन ऐन वक्त पर दिमाग ने खिसकने से रोक दिया.

हम ने उस आदमी को उठा कर अच्छी तरह से किनारे कर दिया. उस के सिर में गहरी चोट लगी थी. खून रुक नहीं रहा था. शायद उस के हाथ की हड्डी भी टूट गई थी.

गनीमत यह थी कि वह आदमी जिंदा था और धीरेधीरे उस की सांसें चल रही थीं. हम ने भी उसे बचाने की ठान ली और आतीजाती गाडि़यों को रुकने के लिए हाथ देने लगे.

बहुत कोशिश की, पर कोई गाड़ी  नहीं रुकी. परेशान हो कर जैसे ही हम ने हाथ देना बंद किया, वैसे ही एक टैक्सी हमारे पास आ कर रुकी. शायद वह भी हमारी तरह अपने खालीपन से परेशान था. जो भी हो, उस ने हमें बताया कि शहर तक जाने के लिए वह दोगुना किराया लेगा और मुरदे के लिए तिगुना.

हम ने बड़े सब्र के साथ बताया कि यह मुरदा नहीं, जिंदा है और हमारी यह पूरी कोशिश होगी कि इसे बचाया जा सके. हम ने उस से यह भी कहा कि वह जख्मी को टैक्सी में ले कर चले, जबकि हम अपनी खटारा मोटरसाइकिल से पीछेपीछे आएंगे. हमारे लाख समझाने पर भी टैक्सी वाला उसे अकेले टैक्सी में ले जाने को तैयार नहीं हुआ.

ये भी पढ़ें- लाइसेंस

अब हम ने सिर पर कफन बांध

लिया था, सो खटारा मोटरसाइकिल

को अच्छी तरह से तालों से बंद किया और टैक्सी में बैठ गए. थोड़ी देर

में जख्मी को साथ ले कर सरकारी अस्पताल पहुंच गए.

बड़ी मुश्किल से हम वहां डाक्टर ढूंढ़ पाए, पर उस ने भी जख्मी को भरती करने से साफ इनकार कर दिया. हम से कहा गया कि यह पुलिस केस है. पुलिस को बुला कर लाओ, तब देखेंगे.

हम ने फोन मांगा, तो डाक्टर ने फोन खराब होने का बहाना बना दिया. तब हम ने थाने का रास्ता पूछा.

जब हम थाने पहुंचे तो पूरा थाना खाली पड़ा था. महज एक सिपाही

कोने में खड़ा था. हम ने उसे जल्दीजल्दी पूरा हाल बताया और साथ में चलने

को कहा.

वह थोड़ी देर कुछ सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘देखिए, थोड़ी देर रुक जाइए. अभी साहब लोग अंदर वाले कमरे में बिजी हैं, क्योंकि एक मुजरिम से पूछताछ हो रही है. वे आ जाएंगे, तभी कोई फैसला लेंगे.’’

हम अभी उसे आदमी की जान की कीमत समझाने की कोशिश कर ही रहे थे कि अंदर वाले कमरे से 3-4 पुलिस वाले पसीना पोंछते हुए बाहर आए. उन के चेहरे से लग रहा था कि वे मुजरिम से अपने तरीके से पूछताछ कर के निकले हैं.

हम वरदी पर सब से ज्यादा सितारे लगाए एक पुलिस वाले के पास फुदक कर पहुंचे और अपनी बात कहने की कोशिश की. ठीक से बात शुरू होने से पहले ही उस ने एक जोर की उबासी ली और हम से कहा कि अपनी रामकहानी जा कर हवलदार को सुनाओ और रिपोर्ट भी लिखवा दो. उस के बाद देखा जाएगा कि क्या किया जा सकता है.

हम भाग कर हवलदार साहब के पास गए और जख्मी का इलाज कराने की अपील की.

हवलदार ने पूछा, ‘‘आप का क्या लगता है वह?’’

‘‘जी, कुछ नहीं.’’

‘‘तो मरे क्यों जा रहे हैं आप? देखते नहीं, हम कितना थक कर आ रहे हैं.

2 मिनट का हमारा आराम भी आप से बरदाश्त नहीं होता क्या?’’

‘‘देखिए हवलदार साहब, आप का यह आराम उस बेचारे की जान भी ले सकता?है. आप समझते क्यों नहीं…’’

‘‘आप क्यों नहीं समझते. मरनाजीना तो लगा रहता है. जिस को जितनी सांसें मिली हैं, उतनी ही ले पाएगा.

‘‘और आप से किस ने कहा था कि मौका ए वारदात से उसे हिलाने के लिए. बड़े समझदार बने फिरते हैं, सारा सुबूत मिटा दिया. गाड़ी का नंबर भी नोट नहीं किया. अब कैसे पता चलेगा कि उसे कौन साइड मार कर गया था. पता लग जाता तो केस बनाते.’’

हम भी तैश में आ गए, ‘‘आप को सुबूतों की पड़ी है, जबकि यहां किसी भले आदमी की जान पर बनी है. आप की ड्यूटी यह है कि पहले उसे बचाएं. सारे कानून आम आदमी की सहूलियत के लिए बनाए गए हैं, न कि उसे तंग करने के लिए.’’

‘‘अच्छा, तो अब आप ही हम पर तोहमत लगा रहे हैं कि हम आप को तंग कर रहे हैं.’’

‘‘जी नहीं, हमारी ऐसी मजाल कहां कि हम आप को…’’

‘‘अच्छाअच्छा चलेंगे. जहां आप ले चलिएगा, वहां भी चलेंगे. बस, जरा यहां साहब का राउंड आने वाला है, उस को थोड़ा निबटा लें. उस के बाद चलते हैं. तब तक आप हमें कहानी सुनाइए कि क्या हुआ था और आप उसे कहां से ले कर आए हैं?’’

‘‘जी, हम उसे हाईवे पर सुलतानपुर चौक के पास से ले कर आए हैं और…’’

‘‘रुकिएरुकिए, क्या कहा आप ने? सुलतानपुर चौक. अरे, तो आप यहां हमारा टाइम क्यों खराब कर रहे हैं? वह इलाका तो सुलतानपुर थाने में आता है. आप को वहीं जाना चाहिए था.’’

‘‘लेकिन, वह यहां के अस्पताल में भरती होने जा रहा है. आप एफआईआर तो लिखिए.’’

‘‘अरे साहब, आप भी न… देखिए तो, कितनी मेहनत से आज कई एफआईआर की किताबें कवर लगा कर तैयार की हैं, राउंड के लिए. आप इसे खराब क्यों करना चाहते हैं?’’ इतना कह कर हवलदार एक सिपाही की ओर मुंह कर के फिर चिल्लाया, ‘‘अबे गोपाल, आज रमुआ नहीं आया था क्या रे? देख तो ठीक से झाड़ू तक नहीं लगी दिखती है. डीसीपी साहब देखेंगे तो क्या सोचेंगे कि हम लोग कितने गंदे रहते हैं.’’

हमें खीज तो बहुत आ रही थी, मगर क्या कर सकते थे? मन मार कर सब्र किए उन की अपनी वरदी के लिए वफादारी को देखते रहे. हम भी कुछ देर तक कोशिश करते रहे शांत रहने की, लेकिन उन के रवैए से हमारा खून खौलने लगा और हम भड़क उठे, ‘‘आप का यह राउंड किसी की जान से ज्यादा जरूरी है क्या?

‘‘अगर राउंड के समय डीसीपी साहब को सैल्यूट मारने वाले 2 आदमी कम हो जाएंगे तो क्या भूकंप आ जाएगा? आप भी कामचोर हैं. जनता के पैसे से तनख्वाह ले कर भी काम करने में लापरवाही करते हैं.’’

दारोगा बाबू को इस पर गुस्सा आ गया और वे चिल्ला कर बोले, ‘‘अबे धनीराम, बंद कर इसे हवालात के अंदर. इतनी देर से चबरचबर किए जा रहा है. डाल दे इस पर सुबूत मिटाने का इलजाम. और अगर गाड़ी ठोंकने वाला न पकड़ा जाए, तो बाद में वह इलजाम भी इसी पर डाल देना. हमें हमारा काम सिखाता है. 2 दिन अंदर रहेगा, तो सारी हेकड़ी हवा हो जाएगी.’’

सचमुच हमारी हेकड़ी इतने में ही हवा होने लगी. कहां तो किसी की जान बचाने के लिए मैडल मिलने की उम्मीद कर रहे थे और कहां हथकड़ी पहनने की नौबत आ गई.

हम ने घिघियाते हुए कहा, ‘‘हेंहेंहें… आप भी साहब, बस यों ही नाराज हो जाते हैं. हम लोग तो सेवक हैं आप के. गुस्सा थूक दीजिए और जब मरजी आए चलिए, न मरजी आए तो न चलिए. रिपोर्ट भी मत लिखिए, मरने दीजिए उस को यों ही… हम चलते हैं, नमस्ते.’’

हम जान बचा कर भागने की फिराक में थे कि अगर अपनी जान बची, तभी तो दूसरों को बचाने की कोशिश कर सकेंगे. इतने में डीसीपी साहब थाने में दाखिल हो गए.

हुआ यह कि डीसीपी साहब ने हम से आने की वजह पूछ ली. खुन्नस तो खाए हुए थे ही, सो हम ने झटपट पूरी कहानी सुना दी.

उन्होंने पूरे थाने को जम कर लताड़ा और दारोगा बाबू को हमारे साथ जाने को कहा. सुलतानपुर थाने को भी खबर कर अस्पताल पहुंचने का निर्देश देने को कहा. अभी उन का जनता और पुलिस के संबंधों पर लैक्चर चल ही रहा था कि हम चुपके से सरक गए.

हम दारोगा बाबू और हवलदारजी के साथ अस्पताल पहुंचे, जहां वह घायल बेचारा एक कोने में बेहोश पड़ा था.

हम चलने लगे तो दारोगा ने कहा, ‘‘कहां चल दिए आप? अभी तो आप ने मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाला है. उस का डंक नहीं भुगतेंगे?

‘‘अब यह मामला कानून के लंबे हाथों में पहुंच गया है, तो सरकारी हो गया. आप का काम तो अभी शुरू ही हुआ है.

‘‘आप बैठिए इधर ही, इसे होश में आने के बाद इस का बयान लिया जाएगा. तब तक आप अपना बयान लिखवा कर टाइम पास कीजिए. उस के बाद ही हम मिल कर सोचेंगे कि आप का क्या करना है.

‘‘अगर गाड़ी वाला गलती से पकड़ा गया, तो समझिए कि आप को कोर्ट में हर पेशी पर गवाही के लिए आना होगा. आज की दुनिया में भलाई करना इतना आसान थोड़े ही रह गया है.’’

‘‘मेरे बाप की तोबा हवलदार साहब, अगर मैं ने दोबारा कभी ऐसी गलती की तो… अभी तो मुझे यहां से जाने दीजिए, बालबच्चों वाला आदमी हूं. बाद में जब बुलाइएगा, तभी मैं हाजिर हो जाऊंगा,’’ कहते हुए हमारा दिमाग चकराने लगा.

ये भी पढ़ें- अजनबी मुहाफिज

इतनी देर में ही डाक्टर साहब बाहर निकल आए और आते ही उन्होंने ऐलान किया कि मरीज को होश आ गया है. कोई एक पुलिस वाला जा कर उस का बयान ले सकता है.

दारोगा बाबू हवलदार साहब को हमारे ऊपर निगाह रखने की हिदायत दे कर अंदर चले गए.

उस आदमी का अंदर बयान चल रहा था और बाहर बैठे हम सोच रहे थे कि वह अपनी जान बचाने के लिए किस तरह से हमारा शुक्रगुजार होगा. कहीं लखपति या करोड़पति हुआ, तो अपने वारेन्यारे हो जाएंगे.

20-25 मिनट बाद दारोगा बाबू वापस आए और हमें घूरते हुए हवलदार से बोले, ‘‘धनीराम, हथकड़ी डाल इसे और घसीटते हुए थाने ले चल. वहां इस के हलक में डंडा डाल कर उगलवाएंगे कि इस जख्मी के 50,000 रुपए इस ने कहां छिपा रखे हैं.

‘‘उस ने बयान दिया है कि किसी ने उसे पीछे से गाड़ी ठोंक दी थी और उस के पैसे भी गायब हैं.

‘‘मैं ने इस का हुलिया बताया, तो उस ने कहा कि ऐसा ही कोई आदमी टक्कर के बाद सड़क पर उसे टटोल रहा था. खुद को बहुत चालाक समझता है.

‘‘यह सोचता है कि इसे बचाने

की इतनी ऐक्टिंग करने से हम पुलिस वाले इस पर शक नहीं करेंगे. बेवकूफ समझता है यह हम को. ले चल इसे, करते हैं खातिरदारी इस की.’’

ये भी पढ़ें- ट्रस्ट एक प्रयास

देखते ही देखते हमारे हाथों में हथकड़ी पड़ गई और हम अपने सदाचार का मातम मनाते हुए पुलिस वालों के पीछे चल पड़े.

अधूरा समर्पण

लेखक- कुमार गौरव अजीतेंदु

सुष्मिता के मांबाप के चेहरे पर संतोष था कि उन की बेटी का रिश्ता एक अच्छे घर में होने जा रहा है. सुष्मिता और सागर ने एकदूसरे की आंखों में देखा और मुसकराए. इस के बाद वे सुंदर सपनों के दरिया में डूबते चले गए.

सुष्मिता अपने महल्ले के सरकारी इंटर स्कूल में गैस्ट टीचर थी और उस के पिता सिविल इंजीनियर. उन्होंने अपने एक परिचित ठेकेदार के बेटे सागर

से, जो एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छे पद पर था, सुष्मिता का रिश्ता तय कर दिया.

सुष्मिता और सागर जब मिले तो उन्हें आपसी विचारों में बहुत मेल लगा, सो उन्होंने भी खुशीखुशी रिश्ते के लिए हामी भर दी.

सगाई के साथ ही उन दोनों के रिश्ते को एक सामाजिक बंधन मिल चुका था. कंपनी के काम से सागर को सालभर के लिए विदेश जाना था, इसलिए शादी की तारीख अगले साल तय होनी थी.

सुष्मिता से काम खत्म होते ही लौटने की बात कह कर सागर परदेश को उड़ चला. सुष्मिता ने सागर का रुमाल यह कहते हुए अपने पास रख लिया कि इस में तुम्हारी खुशबू बसी है.

एक शाम सुष्मिता अपनी छत पर टहल रही थी और हमेशा की तरह सागर वीडियो काल पर उस से बातें कर रहा था. जब बातों का सिलसिला ज्यादा हो गया तो सुष्मिता ने सागर को अगले दिन बात करने के लिए कहा. इस के थोड़ी देर बाद सुष्मिता ने काल काट दी.

इस के बाद जब सुष्मिता नीचे जाने के लिए पलटी तो अचानक उस की आंखें अपने पड़ोसी लड़के निशांत से मिल गईं जो अपनी छत पर खड़ा उन दोनों को बातें करता हुआ न जाने कब से देख रहा था.

सुष्मिता निशांत को पड़ोस के रिश्ते से राखी बांध चुकी थी, इसलिए वह थोड़ा सकुचा गई और बोली, ‘‘अरे निशांत भैया, आप कब आए? मैं ने तो ध्यान ही नहीं दिया.’’

‘‘जब से तुम यहां आई हो, मैं भी तब से छत पर ही हूं,’’ निशांत ने अपनी परतदार हंसी के साथ कहा.

सुष्मिता ने आंखें नीची कर लीं और सीढि़यों की ओर चल पड़ी. वह निशांत की नजर को अकसर भांपती थी कि उस में उस के लिए कुछ और ही भाव आते हैं.

एक और शाम जब सुष्मिता अकेली ही छत पर टहल रही थी कि तभी निशांत भी अपनी छत पर आया.

‘‘निशांत भैया, कैसे हैं आप? कम दिखते हैं…’’ निशांत उस के मुंह से ऐसी बात सुन कर थोड़ा चौंका लेकिन फिर उस के मन में भी लड्डू फूटने लगे.

ये भी पढ़ें-  कम्मो

निशांत तो खुद सुष्मिता से बात

करने को बेचैन रहता था. सो, वह छत की बाउंड्री के पास सुष्मिता के करीब आ गया और बोला, ‘‘मैं तो रोज इस समय यहां आता हूं… तुम ही बिजी

रहती हो.’’

‘‘वह तो है…’’ सुष्मिता मस्ती भरी आवाज में बोली, ‘‘क्या करूं भैया, अब जब से पढ़ाने जाने लगी हूं, समय और भी कम मिलता है.’’

इस के बाद उन दोनों के बीच इधरउधर की बातें होने लगीं.

कुछ दिनों बाद एक रोज सुष्मिता घर में अकेली थी. सारे लोग किसी रिश्तेदार के यहां गए हुए थे. सुष्मिता की चचेरी बहन सुनीति उस के साथ सोने के

लिए आने वाली थी. शाम के गहराते साए सुष्मिता को डरा रहे थे. उस ने कई बार सुनीति को मैसेज कर दिया था कि जल्दी आना.

खाना बनाने की तैयारी कर रही सुष्मिता को छत पर सूख रहे कपड़ों का खयाल आया तो वह भाग कर ऊपर आई. कपड़ों को समेटने के बाद उसे अपनी एक समीज गायब मिली. उस

ने आसपास देखा तो पाया कि वह समीज निशांत की छत पर कोने में पड़ी थी.

सुष्मिता पहले तो हिचकी लेकिन फिर आसपास देख कर निशांत की छत पर कूद गई. वह निशांत के आने से पहले वहां से भाग जाना चाहती थी मगर जैसे ही वह अपनी समीज उठा कर मुड़ी, निशांत उसे मुसकराता खड़ा मिला. सुष्मिता ने एक असहज मुसकराहट उस की ओर फेंकी.

निशांत बोला, ‘‘उड़ कर आ गई होगी यहां यह…’’

‘‘हां भैया, हवा तेज थी आज…’’ सुष्मिता वहां से निकलने के मूड में थी लेकिन निशांत उस के आगे दीवार से लग कर खड़ा हो गया और बतियाने लगा. तब तक शाम पूरी तरह चारों ओर छा चुकी थी.

सुष्मिता ने कहा, ‘‘भैया, अब मैं चलती हूं.’’

‘‘हां, मच्छर काट रहे मुझे भी यहां…’’ निशांत ने अपने पैरों पर थपकी देते हुए कहा, ‘‘अच्छा जरा 2 मिनट नीचे आओ न… मैं ने एक नया सौफ्टवेयर डाउनलोड किया है… बहुत मजेदार चीजें हैं उस में… तुम को भी दिखाता हूं.’’

न चाहते हुए भी सुष्मिता निशांत के साथ सीढि़यों से उतर आई. उस के मन में एक अजीब सा डर समाया हुआ था.

निशांत ने लैपटौप औन किया और उसे दिखाने लगा. सुष्मिता का ध्यान जल्दी से वहां से निकलने पर था. तभी उस ने गौर किया कि निशांत के घर में बहुत शांति है.

‘‘सब लोग कहां गए हैं?’’ सुष्मिता ने निशांत से पूछा.

निशांत ने जवाब दिया, ‘‘यहां भी सारे लोग शहर से गए हुए हैं… कल तक आएंगे.’’

सुष्मिता का दिल धक से रह गया. उस ने कहा, ‘‘भैया, अब मैं निकलती हूं… मुझे खाना भी बनाना है.’’

सुष्मिता का इतना कहना था कि निशांत ने उस का हाथ पकड़ लिया.

‘‘यह क्या कर रहे हैं भैया?’’ सुष्मिता ने निशांत से पूछा. उसे निशांत से किसी ऐसी हरकत का डर तो बरसों से थी लेकिन आज उसे करते देख कर

वह अपनी आंखों पर भरोसा नहीं कर पा रही थी.

निशांत ने सुष्मिता की कमर में हाथ डाल कर उसे अपनी ओर खींचा और उस के हाथों में थमी समीज उस से ले कर टेबल पर रखते हुए बोला, ‘‘सागर की तसवीरों में रोज नईनई लड़की होती… तो तुम उस को एकदम पैकेट वाला खाना खिलाने के चक्कर में क्यों हो? तुम भी थोड़ी जूठी हो जाओ. किसी को पता नहीं चलेगा.’’

सुष्मिता का दिल जोर से धड़कने लगा. निशांत ने उस के मन में दबे उसी शक के बिंदु को छू दिया था जिस के बारे में वह दिनरात सोचसोच कर चिंतित होती थी.

क्या सही है और क्या गलत, यह सोचतेसोचते बहुत देर हो गई. तूफान कमरे में आ चुका था. बिस्तर पर देह

की जरूरत और मन की घबराहटों के नीचे दबी सुष्मिता एकटक दरवाजे के पास पड़े अपने और निशांत के कपड़ों

को देखती रही. निशांत की गरम, तेज सांसें सुष्मिता की बेचैन सांसों में मिलती

चली गईं.

सबकुछ शांत होने के बाद सुष्मिता ने अपनी आंखों के कोरों के गीलेपन को पोंछा और अपने कपड़ों और खुद को समेट कर वहां से चल पड़ी. निशांत ने भी उस से नजरें मिलाने की कोशिश

नहीं की.

कलैंडर के पन्ने आगे पलटते रहे. सुष्मिता और निशांत के बीच भाईबहन का रिश्ता अब केवल सामाजिक मुखौटा मात्र ही रह गया था. ऊपर अपने कमरे में अकेला सोने वाला निशांत आराम से सुष्मिता को रात में बुला लेता और वह भी खुशीखुशी अपनी छत फांद कर उस के पास चली जाती.

आएदिन सुष्मिता के अंदर जाने वाला इच्छाओं का रस आखिरकार एक रोज अपनी भीतरी कारगुजारियों का संकेत देने के लिए उस के मुंह से उलटी के रूप में बाहर आ कर सब को संदेशा भेज बैठा.

सुष्मिता के मांबाप सन्न रह गए. घर में जोरदार हंगामा हुआ. इस के बाद सुष्मिता की हाइमनोप्लास्टी करा कर सागर के आते ही उसे ब्याह कर विदा कर दिया गया.

सुहागरात में चादर पर सुष्मिता से छिटके लाल छींटों ने सागर को भी पूरी तरह आश्वस्त कर दिया. दोनों की जिंदगी शुरू हो गई. सुष्मिता का भी मन सागर के साथ संतुष्ट था क्योंकि निशांत के पास तो वह खुद को शारीरिक सुख देने और सागर से अनचाहा बदला लेने के लिए जाती थी.

धीरेधीरे 2 साल बीत गए लेकिन सुष्मिता और सागर के घर नया सदस्य नहीं आया. उन्होंने डाक्टर से जांच कराई. सागर में किसी तरह की कोई कमी नहीं निकली. इस के बाद बारी सुष्मिता की रिपोर्ट की थी.

डाक्टर ने दोनों को अपने केबिन में बुलाया और उलाहना सा देते हुए कहा, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता मिस्टर सागर कि जब आप लोगों को बच्चा चाहिए

था तो आखिर आप ने अपना पहला बच्चा गिराया क्यों? बच्चा गिराना कोई खेल नहीं है.

ये भी पढ़ें- कच्चे पंखों की फड़फड़ाहट

‘‘अगर ऐसा कराने वाला डाक्टर अनुभवी नहीं हो तो आगे चल कर पेट से होने में दिक्कत आती ही है. आप की पत्नी के साथ भी यही हुआ है.’’

सागर हैरान रह गया और सुष्मिता को तो ऐसा लगा मानो उसे किसी ने अंदर से खाली कर दिया हो. सागर ने टूटी सी नजर उस पर डाली और डाक्टर की बातें सुनता रहा.

वहां से लौट कर आने के बाद सागर चुपचाप पलंग पर बैठ गया. अब तक की जिंदगी में सागर से बेहिसाब प्यार पा कर उस के प्रति श्रद्धा से लबालब हो चुकी सुष्मिता ने उस के पैर पकड़ लिए और रोरो कर सारी बात बताई. सागर के चेहरे पर हारी सी मुसकान खेल उठी. वह उठ कर दूसरे कमरे में चला गया.

उन दोनों को वहीं बैठेबैठे रात हो गई. सुष्मिता जानती थी कि इस सब

की जड़ वही है इसलिए पहल भी उसे ही करनी होगी. थोड़ी देर बाद वह सागर

के पास गई. वह दीवार की ओर मुंह किए बैठा था. अपने आंसुओं को किसी तरह रोक कर सुष्मिता ने उस के कंधे पर हाथ रखा.

सागर ने उस की ओर देखा और भरी आंखें लिए बोल उठा, ‘‘तुम भरोसा करो या न करो लेकिन तुम्हारे लिए मैं ने काजल की कोठरी में भी खुद को बेदाग रखा और तुम केवल शक के बहकावे

में आ कर खुद को कीचड़ में धकेल बैठी.’’

सुष्मिता फूटफूट कर रोए जा रही थी. सागर कहता रहा, ‘‘यह मत समझना कि मैं तुम्हारी देह को अनछुआ न पा कर तुम्हें ताना मार रहा हूं, बल्कि सच तो यह है कि पतिपत्नी का संबंध तन के साथसाथ मन का भी होता है और तन को मन से अलग रखना हर किसी के बस में नहीं होता.

‘‘तुम्हारा मन अगर तन से खुद को बचा पाया है तो मेरा दिल आज भी तुम्हारे लिए दरवाजे खोल कर बैठा है, वरना मुझे तुम्हारा अधूरा समर्पण नहीं चाहिए. फैसला तुम्हारे हाथ में है सुष्मिता. अगर तुम्हें मुझ से कभी भी प्यार मिला हो तो तुम को उसी प्यार का वास्ता, अब दोबारा मुझे किसी भुलावे में मत रखना.’’

सुष्मिता ने सागर के सिर पर हाथ फेरा और वापस अपने कमरे में आ गई. उस की आंखों के सामने सागर के साथ बिताई रातें घूमने लगीं जब वह निशांत को महसूस करते हुए सागर को अपने सीने से लगाती थी. उस के मन ने उसे धिक्कारना शुरू कर दिया.

विचारों के ज्वारभाटा में वह सारी रात ऊपरनीचे होती रही. भोर खिलने लगी थी, इसलिए उस ने अपने आंसू पोंछे और फैसला कर लिया.

सुष्मिता ने अपना सामान बांधा और सागर के पास पहुंची. सागर ने सवालिया निगाहों से उस की ओर देखा.

सुष्मिता ने सागर का माथा चूमा और सागर की जेब से उस का वही रुमाल निकाल लिया जो उस ने शादी से पहले उस के परदेश जाते समय निशानी के रूप में अपने पास रखा था.

सुष्मिता ने वह रूमाल अपने बैग में डाला और बोली, ‘‘मुझे माफ मत करना सागर… मैं तुम्हारी गुनाहगार हूं… मैं तुम्हारे लायक नहीं थी… मैं जा रही हूं… अपनी नई जिंदगी शुरू करो… और हां, इतना भरोसा दिलाती हूं कि अब तुम्हारे इस रुमाल को अपनी बची जिंदगी में दोबारा बदनाम नहीं होने दूंगी.’’

ये भी पढ़ें- जिंदगी…

सागर ने अपनी पलकें तो बंद कर लीं लेकिन उन से आंसू नहीं रुक पाए. सुष्मिता भी अपनी आंखों के बहाव को रोकते हुए तेजी से मुड़ी और दरवाजे की ओर चल पड़ी.                          द्य

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें