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खट्टा-मीठा : भाग 3

अम्मां का चेहरा असंतुष्ट हो उठा. रश्मि किसी तरह पैरों में चप्पल डाल कर दफ्तर के लिए रवाना हुई. तेज चले तो 9 बजे वाली बस अब भी मिल सकती है.

आज शाम रश्मि जल्दी नहीं निकल सकी. 4 बजे साहब ने बुला कर जो टारक योजना समझानी शुरू की तो 5 बजने पर भी नहीं रुके.

‘‘मेरी बस निकल जाएगी, साहब,’’ उस ने झिझकते हुए कहा.

‘‘ओह, मैं तो भूल ही गया,’’ बौस ने चौंक कर घड़ी देखी.

‘‘जी, कोई बात नहीं,’’ रश्मि ने मुसकराने का प्रयास किया.

दफ्तर से निकलते ही टारक योजना दिमाग से निकल गई और रात को क्या भोजन बनाए इस की चिंता ने आ घेरा. जाते हुए सब्जी भी खरीदनी है. बस आने पर धक्कामुक्की कर के चढ़ी पर वह बीच रास्ते में खराब हो गई. रश्मि मन ही मन गालियां देने लगी. दूसरी बस ले कर घर पहुंचतेपहुंचते 7 बज गए. दूर से ही छत के ऊपर छज्जे पर खड़ा स्वरूप दिख गया. छुपनछुपाई खेल रहा था बच्चों के संग. बहुत ही खतरनाक स्थिति में खड़ा था. गलती से भी थोड़ा और खिसक आया तो सीधे नीचे आ गिरेगा. रश्मि का तो कलेजा मुंह को आ गया.

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‘‘स्वरूप,’’ उस ने कठोर स्वर में आवाज दी, ‘‘जल्दी नीचे उतर आओ.’’

‘‘अभी आया, मां,’’ कह कर स्वरूप दीवार फांद कर छत के दूसरी ओर गायब हो गया. अभी तक स्कूल के कपड़े भी नहीं बदले थे. सफेद कमीज व निकर पर दिनभर की गर्द जमा हो गई थी. बाल अस्तव्यस्त और हाथपांव धूल में सने थे. रश्मि का खून खौलने लगा. अम्मां दिन भर क्या करती रहती हैं. लगता है सारा दिन धूप में खेलता रहा है. हजार बार कहा है उसे छत के ऊपर न जाने दिया करें.

‘‘अम्मां,’’ अभी रश्मि ने आवाज ही दी थी कि सास फूट पड़ीं, ‘‘तेरा बेटा मुझ से नहीं संभलता. कल ही किसी क्रेच में इस का बंदोबस्त कर दे. सारा दिन इस के पीछे दौड़दौड़ कर मेरे पैरों में दर्द हो गया. कोई कहना नहीं मानता. स्कूल से लौट कर न नहाया, न कपड़े बदले, न ही ठीक से खाना खाया. ऊधम मचाने में लगा है. तू अपनी आंखों से देख क्या हाल बनाया है. मैं ने छत पर जाने से रोका तो मुझे धक्का मार कर निकल गया.’’

‘‘है कहां वह? अभी तक आया नहीं नीचे,’’ क्रोध से आगबबूला होती रश्मि स्वयं ही छत पर चली.

‘‘क्या बात है? नीचे क्यों नहीं आए?’’ ऊपर पहुंच कर उस ने स्वरूप को झिंझोड़ा.

‘‘बस, अपनी पारी दे कर आ रहा था मां.’’

मां के क्रोध से बेखबर स्वरूप की मासूमियत रश्मि के क्रोध को पिघलाने लगी, ‘‘चलो नीचे. दादी का कहा क्यों नहीं माना?’’

‘‘मुझे अच्छा नहीं लगता,’’ स्वरूप ने मुंह फुलाया, ‘‘इधर मत कूदो, कागज मत फैलाओ. कमरे में बौल से मत खेलो, गंदे पांव ले कर सोफे पर मत चढ़ो.’’

रश्मि की समझ में न आया किस पर क्रोध करे. बच्चे को बचपना करने से कैसे रोका जा सकता है? सास की भी उम्र बढ़ रही है, ऐसे में सहनशीलता कम होना स्वाभाविक है.

‘‘दादी तुम से बड़ी हैं स्वरूप. तुम्हें बहुत प्यार करती हैं. उन का कहना मानना चाहिए.’’

‘‘फिर मुझे आइसक्रीम क्यों नहीं खाने देतीं?’’

रश्मि थकावट महसूस करने लगी. कब तक नासमझ रहेगा स्वरूप.

‘‘आ गए लाट साहब,’’ पोते को देखते ही दादी का गुस्सा भड़क उठा, ‘‘तुम ने अभी तक इसे कुछ भी नहीं कहा? अरे, मैं कहती हूं इतना सिर न चढ़ाओ,’’ अपने प्रति दोषारोपण होते देख रश्मि का शांत होता क्रोध फिर उबल पड़ा.

‘‘चलो, कपड़े बदल कर हाथमुंह धोओ.’’

‘‘मैं नहीं धोऊंगा,’’ स्वरूप ने अड़ कर कहा.

‘‘क्या?’’ रश्मि जोर से चिल्लाई.

‘‘बस, मैं न कहती थी तुम्हारा लाड़प्यार इसे जरूर बिगाड़ेगा. लो, अब भुगतो,’’ सास ने निसंदेह उसे उकसाने के लिए नहीं कहा था पर रश्मि ने तड़ाक से एक चांटा बेटे के कोमल गाल पर जड़ दिया.

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स्वरूप जोर से रो पड़ा, ‘‘नहीं बदलूंगा कपड़े. जाओ, कभी नहीं बदलूंगा,’’ कह कर दूर जा कर खड़ा हो गया.

‘‘हांहां, कपड़े क्यों बदलोगे, सारा दिन आवारा बच्चों के साथ मटरगश्ती के सिवा क्या करोगे? देख रश्मि, असली बात तो मैं भूल गई, जा कर देख बौल मार कर ड्रेसिंग टेबल का शीशा तोड़ डाला है.’’

रश्मि को अब अचानक सास के ऊपर क्रोध आने लगा. थकीमांदी लौटी हूं और घर में घुसते ही राग अलापना शुरू कर दिया. गुस्से में उस ने स्वरूप के गाल पर 2 चांटे और जड़ दिए.

रश्मि क्रोध से और भड़की. पुत्र को खींच कर खड़ा किया और तड़ातड़ पीटना शुरू कर दिया.

‘‘सारी उम्र मुझे तंग करने के लिए ही पैदा हुआ था? बाकी 2 तो मर गए, तू भी मर क्यों न गया?’’

‘‘क्या पागल हो गई है रश्मि. बच्चे ने शरारत की, 2 थप्पड़ लगा दिए बस. अब गाली क्यों दे रही है? क्या पीटपीट कर इसे मार डालेगी?’’

क्रोध, ग्लानि और अवसाद ने रश्मि को तोड़ कर रख दिया था. कमरे में आ कर वह फफकफफक कर रो पड़ी. यह क्या किया उस ने. जान से भी प्रिय एकमात्र पुत्र के लिए ऐसी अशुभ बातें उस के मुंह से कैसे निकलीं?

‘‘जोश को समय पर लगाम दिया कर. जो मुंह में आता है वही बकने लगती है,’’ इकलौता पोता रश्मि की सास को भी कम प्रिय न था, ‘‘अरे, मैं सारा दिन सहती हूं इस की शरारतें और तू ने सुन कर ही पीटना शुरू कर दिया,’’ रश्मि की सास देर तक उसे कोसती रही. रश्मि के आंसू थम ही नहीं रहे थे. रहरह कर किसी अज्ञात आशंका से हृदय डूबता जा रहा था.

तभी एक कोमल स्पर्श पा कर रश्मि ने आंखें खोलीं. जाने स्वरूप कब आंगन से उठ आया था और यत्न से उस के आंसू पोंछ रहा था, ‘‘मत रोओ, मां. कोई मां की बद्दुआ लगती थोड़ी है.’’

रश्मि ने खींच कर पुत्र को हृदय से लगा लिया. कौन सिखाता है इसे इस तरह बोलना. समय से पहले ही संवेदनशील हो गया. फिर अभीअभी जो नासमझी कर रहा था वह क्या था?

जो हो, नासमझ, समझदार या परिपक्व, रश्मि के हृदय का टुकड़ा हर स्थिति में अतुलनीय है. पुत्र को बांहों में भींच कर रश्मि सुख का अनुभव कर रही थी.

खट्टा-मीठा : भाग 2

रश्मि की बोलती बंद हो गई. समय से पहले क्यों इतना समझदार हो गया स्वरूप? रात का भोजन देख कर नन्हे स्वरूप के मस्तिष्क से छोटी बहन वाला विषय निकल गया. पर रश्मि जानती है यह भूलना और याद आना चलता ही रहेगा. हो सकता है बड़ा होने पर रश्मि स्वरूप को बहन न होने का सही कारण बता भी दे लेकिन जब तक वह इसी तरह जीने का आदी नहीं हो जाता, रश्मि को इस प्रसंग का सामना करना ही होगा.

मनपसंद व्यंजन पा कर स्वरूप चटखारे लेले कर खा रहा था, ‘‘कितना अच्छा खाना है. सलाद भी बहुत अच्छा है. मां, आप रोज जल्दी घर आ जाया करो.’’

रश्मि का मन कमजोर पड़ने लगा. मन हुआ कल ही त्यागपत्र भेज दे, नहीं चाहिए यह दो कौड़ी की नौकरी, जिस के कारण उस के लाड़ले को मनपसंद खाना भी नसीब नहीं होता.

‘‘चलो मां, लूडो खेलते हैं,’’ स्वरूप हाथमुंह धो आया था.

‘‘थोड़ी देर तक पिता के संग खेलो, मैं चौका संभाल कर आती हूं,’’ रश्मि ने बरतन समेटते हुए कहा.

ऐसा नहीं कि केवल सतीश की तनख्वाह से गृहस्थी नहीं चलेगी लेकिन घर में स्वयं उस की तनख्वाह का महत्त्व भी कम नहीं. रोज तरहतरह का खाना, स्वरूप के लिए विभिन्न शौकिया खर्चे, उस के कानवैंट स्कूल का खर्चा आदि मिला कर कोई कम रुपयों की जरूरत नहीं पड़ती. अभी तो अपना मकान भी नहीं. फिर वास्तविकता यह है कि प्रतिदिन हर समय मां घर में दिखेगी तो मां के प्रति उस का आकर्षण कम हो जाएगा. इसी तरह रोज ही अच्छा भोजन मिलेगा तो उस भोजन का महत्त्व भी उस के लिए कम हो जाएगा. जैसेजैसे स्वरूप बड़ा होगा उस की अपनी दुनिया विकसित होती जाएगी. मां के आंचल से निकल कर पढ़ाई- लिखाई, खेलकूद और दोस्तों में व्यस्त हो जाएगा. उस समय रश्मि अकेली पड़ जाएगी. इस से यही बेहतर है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ेगा.

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सब काम निबटा कर रश्मि की आंखें थकावट से बोझिल होने लगीं. निद्रित पुत्र के ऊपर चादर डाल कर वह सतीश की ओर मुड़ी.

‘‘कभी मेरा भी ध्यान कर लिया करो. हमेशा बेटे में ही रमी रहती हो,’’ सतीश ने रश्मि का हाथ थामा.

‘‘जरा याद करो तुम्हारी मां ने भी कभी तुम्हारा इतना ही ध्यान रखा था,’’ रश्मि ने शरारत से कहा.

‘‘वह उम्र तो गई, अब तो हमें तुम्हारा ध्यान चाहिए.’’

‘‘अच्छा, यह लो ध्यान,’’ रश्मि पति से लिपट गई.

सुबह उठ कर, सब को चाय दे कर रश्मि ने स्वरूप के स्कूल का टिफिन तैयार किया. फिर दूध गरम कर के उसे उठाने चली.

‘‘ऊं, ऊं, अभी नहीं,’’ स्वरूप ने चादर तान ली.

‘‘नहीं बेटा, और नहीं सोते. देखो, सुबह हो गई है.’’

‘‘नहीं, बस मुझे सोना है,’’ स्वरूप ने अड़ कर कहा.

आखिर 15 मिनट तक समझाने- बुझाने के बाद उस ने बेमन से बिस्तर छोड़ा. पर ब्रश करने, कपड़े पहनने व दूध पीने के बीच वह बारबार जा कर फिर से चादर ओढ़ कर लेट जाता और मनाने के बाद ही उठता. अंत में बैग कंधे पर डाले सतीश का हाथ पकड़े वह बस स्टाप की ओर रवाना हुआ तो रश्मि ने चैन की सांस ली. बिस्तर संवारना है, खाना बनाना, नाश्ता बनाना, नहाना फिर तैयार हो कर दफ्तर जाना है. रश्मि झटपट हाथ चलाने लगी. कपड़ों का ढेर बड़ा होता जा रहा है. 2 दिन से समय ही नहीं मिल रहा. आज शाम को आ कर अवश्य धोएगी.

‘‘कभी तो आंगन में झाड़ू लगा दिया कर रश्मि,’’ सब्जी छौंकते हुए रश्मि के कान में सास की आवाज पड़ी. कमरों के सामने अहाते के भीतर लंबाचौड़ा आंगन है, पक्के फर्श वाला. झाड़ू लगाने में 15-20 मिनट लग जाना मामूली बात है.

‘‘आप ही बताओ अम्मां, किस समय लगाऊं?’’

‘‘अब यह भी कोई समस्या है? जो दफ्तर जाती हैं क्या वे झाड़ू नहीं लगातीं?’’

रश्मि चुप हो गई. बहस में कुछ नहीं रखा. सब्जी में पानी डाल कर वह कपड़े निकालने लगी.

मांजी अब भी बोले जा रही थीं, ‘‘करने वाले बहुत कुछ करते हैं. स्वेटर बनाते हैं, पापड़बड़ी अचार, डालते हैं, कशीदाकारी करते हैं…’’

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बदन पर पानी डालते हुए रश्मि सोच रही थी, ‘आज जा कर सब से पहले मार्च के महीने का ड्यूटी चार्ट बनाना है.’

‘‘अम्मां, जमादार आए तो उसे 2 रुपए दे कर आंगन में झाड़ू लगवा लेना,’’ रश्मि ने सास को आवाज दी.

‘‘सुन, मेरे लिए एक जोड़ी चप्पल ले आना.’’

‘‘ठीक है, अम्मां,’’ कंघी कर के रश्मि ने लिपस्टिक लगाई.

‘‘वह सामने अंगूठे और पीछे पट्टी वाली चप्पल.’’

रश्मि ने भौंहें सिकोड़ीं, सास किसी खास डिजाइन के बारे में कह रही थीं.

‘‘अरे, वैसी ही जैसी स्वीटी की नानी ने पहनी थी, हलके पीले से रंग की.’’

‘‘अम्मां, मैं शाम को समझ लूंगी और कल चप्पल ला दूंगी.’’

रश्मि टिफिन पैक करने लगी. परांठा भी पैक कर लिया. नाश्ता करने का समय नहीं था.

‘‘मेरे ब्लाउज के जो बटन टूटे थे, लगा दिए हैं?’’

‘‘ओह,’’ रश्मि को याद आया, ‘‘शाम को लगा दूंगी.’’खट्टा-मीठा

सौफ्टवेयर इंजीनियर की मौत- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

लेखक- निखिल

इसी दिन पुलिस ने गिरफ्तार एएसआई और बर्खास्त होमगार्ड जवानों को पूछताछ और बयान लेने के बाद अदालत में पेश किया. अदालत ने तीनों को 31 अक्तूबर को जेल भेज दिया.

चूंकि इस दौरान बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहे थे. इसलिए पुलिस की पिटाई से इंजीनियर आशुतोष की मौत के मामले को चुनाव आयोग ने गंभीरता से लिया. आयोग ने एक नवंबर को भागलपुर की प्रमंडलीय आयुक्त वंदना किन्नी को इस मामले की जांच करने के आदेश दिए. उन्हें अपनी रिपोर्ट एक सप्ताह में चुनाव आयोग को सौंपने को कहा गया.

सिर्फ आश्वासन

चुनाव आयोग के निर्देश पर प्रमंडलीय आयुक्त वंदना किन्नी ने 2 नवंबर को ही बिहपुर पहुंच कर मामले की जांच शुरू कर दी.

उन्होंने एसपी स्वप्नाजी मेश्राम और एसडीपीओ दिलीप कुमार की मौजूदगी में थाने में पुलिसकर्मियों से आशुतोष के साथ हुई घटना के बारे में पूछताछ की.

उन्होंने कहा कि आरोपी थानाध्यक्ष को जल्दी ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा और उस की बर्खास्तगी का प्रस्ताव सरकार को भेजा जाएगा.

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एसपी ने उन्हें बताया कि फरार आरोपी थानेदार की संपत्ति की कुर्की के लिए अदालत में प्रार्थनापत्र लगाया गया है. वंदना किन्नी ने उसी दिन भागलपुर डीएम के साथ मड़वा गांव जा कर मृतक इंजीनियर आशुतोष के घर वालों को सांत्वना दी और उन से घटना के बारे में जानकारी ली.

3 नवंबर को अदालत के आदेश पर बिहपुर के निलंबित थानेदार रंजीत कुमार के मुंगेर स्थित मकान की कुर्की कर ली गई. एसआईटी ने एसडीपीओ दिलीप कुमार के नेतृत्व में थानेदार के मकान से सारा सामान जब्त कर लिया.

इस के अलावा एक और आरोपी जहांगीर को भी एसआईटी ने गिरफ्तार कर लिया. जहांगीर बिहपुर पुलिस थाने की जीप का निजी चालक था. आरोप है कि थानेदार के कहने पर उस ने भी आशुतोष की बेरहमी से पिटाई की थी.

आश्वासनों का अंबार

उसी दिन केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने आशुतोष के घर वालों से मुलाकात कर शोक संवेदना जताई. उन्होंने कहा कि दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा.

यह घटना हृदयविदारक है. इस मामले में उन्होंने पीडि़त परिवार को 50 लाख रुपए मुआवजा दिलाने और आशुतोष की पत्नी को सरकारी नौकरी दिलाने की बात भी कही.

प्रमंडलीय आयुक्त वंदना किन्नी मामले की जांच के लिए 6 नवंबर को दोबारा बिहपुर पहुंची. उन्होंने एनएच 31 पर महंथ चौक पर दुकानदारों और प्रत्यक्षदर्शियों से 24 अक्तूबर को आशुतोष के साथ हुई घटना के बारे में पूछताछ की.

इस के बाद वह बिहपुर थाना इलाके के ही कोरचक्का गांव पहुंची. इसी गांव के देवेंद्र सिंह से साइड में चलने की बात पर आशुतोष की उस दिन झड़प हुई थी. इसी झड़प के दौरान बिहपुर थानेदार रंजीत वहां पहुंच गया और आशुतोष को धमकाने के बाद पीटते हुए थाने ले गया था.

आयुक्त को देवेंद्र गांव में नहीं मिला. वह नेपाल गया हुआ था. बाद में आयुक्त वंदना किन्नी ने नवगछिया में एसपी से इस मामले की जांचपड़ताल के बारे में पूछा.

भागलपुर के जिलाधिकारी प्रवीण कुमार की अनुशंसा पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार पांडेय ने 9 नवंबर को आशुतोष की मौत के मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए.

इस मामले की जांच नवगछिया सिविल कोर्ट के एसीजेएम-3 प्रमोद कुमार पांडेय को सौंपी गई. उन्हें एक महीने में जांच पूरी कर रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में जिला एवं सत्र न्यायाधीश को सौंपने को कहा गया.

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नवगछिया एसपी स्वप्नाजी मेश्राम ने बिहपुर के निलंबित थानेदार रंजीत कुमार की बर्खास्तगी की अनुशंसा डीआईजी से की. एसपी की अनुशंसा पर थानेदार की बर्खास्तगी की काररवाई विभागीय स्तर पर शुरू हो गई.

इंजीनियर आशुतोष के पिता अजय पाठक गोड्डा कालेज में प्रोफेसर थे. आशुतोष के दादा प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य और स्वतंत्रता सेनानी थे. उन के मातापिता का निधन हो चुका था. गोड्डा में आशुतोष का ननिहाल है. उन्होंने गोड्डा से ही पढ़ाई की थी. वह अच्छे क्रिकेटर भी थे.

सौफ्टवेयर इंजीनियर की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कई शहरों में नौकरी की. कई साल तक वह बेंगलुरु में नौकरी करते रहे. लौकडाउन होने पर वे बेंगलुरु छोड़ कर अपने गांव आ गए और भागलपुर में नौकरी करने लगे थे.

अभी तक आंसू बहा रही है स्नेहा

आशुतोष की शादी करीब 3 साल पहले स्नेहा से हुई थी. उन के 2 साल की एक बेटी है. उस के ससुर कटिहार पुलिस में दरोगा हैं.

कथा लिखे जाने तक आरोपी थानेदार रंजीत कुमार की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. वह पुलिस की पकड़ से बच कर अपने दांवपेच लगाने में जुटा था.

माना यह जा रहा था वह पुलिस से कितनी भी आंख मिचौली करे, एक न एक दिन उसे अपने किए की सजा जरूर मिलेगी. नेताओं और अफसरों के वादे के बावजूद मृतक आशुतोष के घर वालों को न तो कोई आर्थिक मदद मिली थी और न ही आश्रित को नौकरी.

आशुतोष की मौत से स्नेहा की मांग का सिंदूर उजड़ गया. 2 साल की मासूम बेटी मारवी के सिर से पिता का साया छिन गया. पति की मौत के गम से स्नेहा अभी उबर नहीं पा रही है. वह रात को सोते हुए उठ बैठती है और उस दिन की घटना को याद कर आंसू बहाती है.

बहरहाल, इस घटना से बिहार पुलिस का अमानवीय चेहरा उजागर हुआ है. पुलिस पहले ही बदनाम रही है, इस घटना ने आम लोगों में पुलिस का भरोसा कम किया है. देश में जहां रोजाना नए कानून बन रहे हैं. शिकायतों के लिए सरकार और अफसर हैं. इंसाफ देने के लिए अदालतें है. संविधान ने लोगों को कई तरह की आजादी और अधिकार दिए हैं.

फिर भी इस तरह की हो रही घटनाएं देशवासियों का सिर शर्म से झुकाने को मजबूर कर देती हैं.

सौफ्टवेयर इंजीनियर की मौत- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

लेखक- निखिल

इंजीनियर आशुतोष की मौत को ले कर सोशल मीडिया पर जस्टिस फौर आशुतोष कैंपेन शुरू हो गया. इस में सांसद, विधायक से ले कर बिहार और झारखंड तक के लोग जुड़ गए. आशुतोष के ननिहाल गोड्डा से ले कर उन के गांव मड़वा तक के लोग सोशल मीडिया के जरिए बिहपुर के थानेदार और उस की टीम के पुलिस वालों को फांसी देने की मांग करने लगे.

लोगों का कहना था कि थानेदार रंजीत कुमार पहले भी बेवजह लोगों की पिटाई करते थे. एसपी से लोगों ने शिकायतें भी की थीं, लेकिन कभी काररवाई नहीं हुई. इस से थानेदार के अत्याचार बढ़ते गए.

बिहपुर पुलिस थाने में पहले से ही सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं. इन कैमरों में पूरी घटना कैद हो गई थी. इसलिए इन की फुटेज जब्त कर अधिकारियों ने उन की जांच शुरू कर दी.

प्रारंभिक जांच में इंजीनियर आशुतोष की मौत पुलिस की पिटाई से होने की बात ही सामने आई. जांच में एसआईटी को बिहपुर थाने में एक प्रार्थनापत्र और थाने की डायरी में एक एंट्री मिली. प्रार्थनापत्र आशुतोष के रिश्तेदार संजय पाठक की ओर से बिहपुर थानाध्यक्ष के नाम था. इस में लिखा था कि वह आशुतोष को थाने से सहीसलामत ले जा रहे हैं. पुलिस स्टेशन की डायरी में इस प्रार्थनापत्र की एंट्री की गई थी.

पुलिस की बर्बर पिटाई से इंजीनियर की मौत का मामला तूल पकड़ता जा रहा था. विभिन्न संगठनों के लोग जिला प्रशासन को आंदोलन की चेतावनी देने लगे. लोगों के गुस्से को देखते हुए डीआईजी सुजीत कुमार ने इस मामले की मौनिटरिंग की कमान संभाल ली. उन्होंने नवगछिया एसपी को थानेदार सहित अन्य आरोपी पुलिस वालों की जल्द से जल्द गिरफ्तारी करने को कहा.

अधिकारियों के झूठे आश्वासन

डीआईजी ने इस मामले में नवगछिया जिला पुलिस की मदद के लिए भागलपुर साइबर सेल के प्रभारी और एक तकनीकी विशेषज्ञ को डेपुटेशन पर अगले आदेश तक बिहपुर लगा दिया.

28 अक्तूबर को मड़वा और भ्रमरपुर गांव के लोगों ने आशुतोष की आत्मा की शांति के लिए कैंडल मार्च निकाला. लोगों ने मामले की न्यायिक जांच कराने, दोषी पुलिस वालों की गिरफ्तारी और उन्हें बर्खास्त करने के अलावा मृतक के परिवार को सरकारी नौकरी देने की मांग की.

आरोपी थानेदार और उस के साथी पुलिस वालों की तलाश में एसआईटी ने कई जगह छापे मारे. साइबर सेल के पुलिस अधिकारियों ने आरोपी पुलिस वालों की मोबाइल लोकेशन की टोह ली, लेकिन सुराग नहीं मिला.

लोगों के आक्रोश को देखते हुए नवगछिया एसपी ने भागलपुर के डीएम को पत्र लिख कर मामले की न्यायिक जांच कराने का अनुरोध किया. भागलपुर डीएम प्रवीण कुमार ने इस के लिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश को पत्र लिख कर आग्रह किया.

एसपी ने इंजीनियर आशुतोष की पिटाई में थानेदार का साथ देने वाले 2 होमगार्ड जवानों की सेवाएं समाप्त करने के लिए भागलपुर डीएम को पत्र लिखा. इस के आधार पर डीएम ने दोनों आरोपी होमगार्ड जवानों की सेवा समाप्त कर दी.

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प्रारंभिक जांच में सामने आया था कि आशुतोष की बर्बरता से पिटाई करने में थानेदार के अलावा पुलिस जीप का निजी चालक जहांगीर, एक एएसआई शिवबालक प्रसाद और 2 होमगार्ड जवान राजू पासवान व मनोज कुमार चौधरी आदि शामिल थे.

एसआईटी भी कुछ नहीं कर पाई

इस मामले में लगातार हो रहे लोगों के प्रदर्शनों को देखते हुए एसआईटी के अधिकारी आरोपी पुलिस वालों की तलाश में रोजाना छापे मार रहे थे, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चल रहा था. इस से लोग यह कहने लगे कि पुलिस अपने साथियों का बचाव कर रही है.

लोगों के दबाव में भागदौड़ के बाद पुलिस ने आशुतोष की मौत के मामले में 30 अक्तूबर को बिहपुर थाने के एएसआई शिवबालक प्रसाद और बर्खास्त किए गए दोनों होमगार्ड जवान राजू पासवान व मनोज कुमार को गिरफ्तार कर लिया. आरोपी एएसआई पटना जिले के पुनपुन थाना इलाके के पोथही गांव का रहने वाला था.

इसी दिन मड़वा गांव के लोगों ने नवगछिया एसपी स्वप्नाजी मेश्राम से मुलाकात कर आरोपी थानेदार की गिरफ्तारी नहीं होने पर गुस्सा जताया और ज्ञापन दिया. इस में आरोपी पुलिस वालों पर सख्त काररवाई और पीडि़त परिवार को 25 लाख रुपए मुआवजे के अलावा आश्रित को सरकारी नौकरी दिलाने की मांग की. लोगों के आक्रोश को देखते हुए बिहपुर पुलिस थाने पर अर्धसैनिक बल तैनात कर दिया गया.

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31 अक्तूबर को पुलिस को इंजीनियर आशुतोष की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. इस में उन्हें अंदरूनी चोटें लगने की बात कही गई थी. इस रिपोर्ट से यह बात तय हो गई कि पुलिस ने आशुतोष की बेरहमी से पिटाई की थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद डीआईजी सुजीत कुमार ने बिहपुर थाने पहुंच कर एकएक बिंदु पर मातहत अफसरों से चर्चा की.

सौफ्टवेयर इंजीनियर की मौत- भाग 1

सौजन्य-मनोहर कहानियां

लेखक- निखिल

जहां थानेदार रंजीत कुमार जैसे खूंखार पुलिस वाले हों, वहां की पुलिस की बदनामी स्वाभाविक ही है. आश्चर्य की बात यह है कि जहां की पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी अपने एक थानेदार को पकड़ने में अक्षम हैं, सारे साधनों के बाद, वहां की जनता का क्या हाल होगा. क्या वाकई रंजीत को पकड़ने की…

बिहार में एक बड़ा जिला है भागलपुर. इसी जिले के बिहपुर इलाके में एक गांव है मड़वा. इस गांव के रहने वाले

आशुतोष पाठक सौफ्टवेयर इंजीनियर थे. इंजीनियरिंग करने के बाद वह बेंगलुरु जा कर नौकरी करने लगे.

इसी साल लौकडाउन में वह बेंगलुरु से नौकरी छोड़ आए. बाद में उन्होंने अपने ही जिला मुख्यालय भागलपुर में नौकरी कर ली, लेकिन गांव से उन का मोह नहीं छूटा था. इसलिए जब भी मौका मिलता, परिवार के साथ गांव चले जाते.

इसी 24 अक्तूबर की बात है. उस दिन दुर्गाष्टमी थी. वह दुर्गा पूजा के लिए परिवार के साथ भागलपुर से गांव आ गए थे. दोपहर करीब साढ़े 3 बजे वह अपनी पत्नी स्नेहा और 2 साल की बेटी मारवी के साथ भ्रमरपुर दुर्गा मंदिर में पूजा कर बाइक से गांव जा रहे थे.

एनएच 31 पर महंथ चौक के पास आशुतोष की साइड में चलने की बात पर एक आदमी से झड़प हो गई. पढ़ेलिखे आशुतोष बाइक रोक कर उस आदमी को समझा रहे थे, लेकिन वह आदमी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था.

झड़प होते देख आसपास के लोग एकत्र हो गए. उन लोगों ने भी उस आदमी को समझाया.

समझाईबुझाई चल रही थी कि बिहपुर के थानेदार रंजीत कुमार पुलिस की जीप से उधर से निकले. उन्होंने भीड़ देख कर गाड़ी रोक ली. रंजीत ने आशुतोष और उन से झगड़ा कर रहे आदमी से झगड़ने का कारण पूछा.

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रंजीत कुकर बन कूदा बीच में

थानेदार रंजीत कुमार पूरी बात सुन कर आशुतोष की गलती बता कर उसे धमकाने लगे. थानेदार ने आशुतोष से बाइक के कागजात मांगे. उन्होंने कागजात दिखा दिए. इसी दौरान किसी बात पर आशुतोष से थानेदार की बहस हो गई.

उन्हें बहस करते देख कर थानेदार रंजीत कुमार आगबबूला हो गए. उन्होंने पत्नी और बेटी के सामने ही सरेआम आशुतोष की पिटाई शुरू कर दी. आशुतोष कहते रहे कि थानेदार साहब, आप यह गलत कर रहे हो. मैं पढ़ालिखा इंसान हूं. सौफ्टवेयर इंजीनियर हूं.

आशुतोष की बात पर थानेदार का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उन्होंने अपने जीप चालक और साथ में मौजूद पुलिस वालों से कहा कि इसे जीप में डालो और थाने ले चलो.

थानेदार साहब का हुकम था. पुलिस वालों ने आशुतोष को जबरन जीप में डाला और थाने की ओर चल दिए. आशुतोष की पत्नी स्नेहा पाठक थानेदार और पुलिस वालों के आगे हाथ जोड़ कर अपने पति को छोड़ने की गुहार लगाती रही. आशुतोष की 2 साल की बेटी रोतीबिलखती रही, लेकिन पुलिस वालों का कलेजा नहीं पसीजा. वहां मौजूद लोगों की भी हिम्मत नहीं हुई कि थानेदार का विरोध करें.

बिहपुर थाने ले जा कर थानेदार ने आशुतोष के कपड़े उतरवा दिए. उन को डंडों से बेरहमी से पीटा गया. इतने पर भी थानेदार रंजीत का गुस्सा शांत नहीं हुआ, तो पुलिस वालों से जूतों से उन की जम कर पिटाई कराई. फिर शौचालय में बंद कर खूब पिटाई की गई.

आशुतोष खून से लथपथ हो गए. उन की नाक और शरीर से कई जगह खून बहने लगा.

इस बीच स्नेहा ने फोन कर मड़वा गांव में अपने घर वालों को सारी बात बता दी. गांव से आशुतोष के घरवाले बिहपुर थाने आ गए. थानेदार ने उन से भी बदसलूकी की और उन्हें आशुतोष से नहीं मिलने दिया.

घर वाले थानेदार के सामने गुहार लगाते रहे, लेकिन उस ने किसी की नहीं सुनी. पुलिस वालों की पिटाई से शाम करीब 7 बजे आशुतोष मरणासन्न हो गए, तब उन्हें घर वालों को सौंप दिया गया. सौंपने से पहले एक कागज पर यह भी लिखवा लिया गया कि हम आशुतोष को सहीसलामत थाने से ले जा रहे हैं.

आशुतोष की हालत खराब थी. पुलिस वालों ने उन्हें बुरी तरह पीटा था. डंडों, जूतों और बेल्ट के साथ थप्पड़घूंसों से भी पिटाई की गई थी. जगहजगह चोटें लगने से उन के शरीर से खून रिस रहा था.

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जिंदगी की जंग हार गए आशुतोष

घर वाले उन्हें बिहपुर के ही निजी अस्पताल में ले गए. डाक्टरों ने प्राथमिक इलाज के बाद गंभीर हालत देख कर उन्हें भागलपुर के जवाहर लाल नेहरू मैडिकल कालेज एंड अस्पताल में रैफर कर दिया. अस्पताल में दूसरे दिन इलाज के दौरान उन की मौत हो गई. वे करीब 33 साल के थे. आशुतोष की मौत का पता चलने पर बिहपुर थानेदार और उस के साथी पुलिस वाले थाने से फरार हो गए.

उस दिन दशहरा था. बिहार में विधानसभा के चुनाव भी हो रहे थे. सौफ्टवेयर इंजीनियर आशुतोष पाठक की मौत से लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. दोपहर करीब 12 बजे लोगों ने आशुतोष की लाश महंथ चौक पर रख कर एनएच 31 जाम कर दिया और पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगे.

पता चलने पर पुलिस और प्रशासन के अफसर मौके पर पहुंचे और उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन लोगों ने डीएम को मौके पर बुलाने, मृतक के आश्रितों को नौकरी, मुआवजा, दोषी पुलिस वालों को गिरफ्तार करने की मांग की.

इस दौरान लोगों ने नवगछिया डीएसपी और एसडीपीओ से धक्कामुक्की भी की. कई घंटों की समझाइश और आश्वासन के बाद शाम 5 बजे लोग शांत हुए और शव का पोस्टमार्टम कराने की सहमति दी.

बाद में 3 डाक्टरों के मैडिकल बोर्ड से शव का पोस्टमार्टम कराया गया. इसकी वीडियोग्राफी भी कराई गई. पोस्टमार्टम कराने के बाद शव उन के घरवालों को सौंप दिया गया.

मृतक आशुतोष के चाचा प्रफुल्ल पाठक ने झंडापुर ओपी थाने में बिहपुर थानाप्रभारी रंजीत कुमार, पुलिस जीप के निजी चालक, बिहपुर थाने में मौजूद पुलिस वालों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.

इस घटना से बिहार पुलिस का अमानवीय चेहरा सामने आ गया था. विधानसभा चुनाव का माहौल था. पूरे इलाके के लोगों में आक्रोश था. इसलिए मुख्यमंत्री ने डीजीपी को घटना की जांच कराने के निर्देश दिए. जिला प्रशासन ने भी मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए.

बिहार के राज्य मानवाधिकार आयोग ने भी इस मामले में शिकायत दर्ज कर ली. घटना की गंभीरता को देखते हुए नवगछिया की एसपी स्वप्नाजी मेश्राम ने आरोपी थानाप्रभारी रंजीत कुमार को निलंबित कर दिया.

सिर्फ जांच ही जांच

एसपी ने मामले की जांच के लिए एसडीपीओ दिलीप कुमार के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किया. एफएसएल टीम ने बिहपुर थाने से घटना के साक्ष्य जुटाए. इस के लिए पिटाई में इस्तेमाल डंडे, हथियारों के बट, शौचालय के दरवाजे का रौड, फर्श, पुलिस थाने की जीप आदि से सैंपल एकत्र किए गए.

सौफ्टवेयर इंजीनियर की मौत

स्टेशन की वह रात : भाग 2

शायद 12-15 दिन हो गए हैं. पहली ट्रेन छोड़ने के बाद मैं भटकती रही और फिर देर शाम सड़क से गुजरते ट्रक वालों ने मुझे आगे छोड़ने की पेशकश की. ‘‘कोई रास्ता न देख वह ट्रक में चढ़ गई. फिर चलते ट्रक में मेरे साथ वह सब हुआ, बारबार हुआ, जिस का टीवी न्यूज वाले ढिंढोरा पीटते रहते हैं. जब एक बार ट्रक वालों का मन भर जाता तो मुझे सड़क किनारे फेंक देते. कुछ देर बाद दूसरे उठा लेते. ‘‘मुझे खुद भी याद नहीं कि अब तक कितनों ने मेरे साथ हैवानियत की है. अब मुझे सड़क से डर लगता है. रेलवे स्टेशन पर भीड़ रहती है, कोई मुझे उठा कर नहीं ले जा सकता है, इसलिए अब मैं स्टेशन पर हूं. ‘‘रास्ते में किसी औरत ने बताया था कि मैं कुरुक्षेत्र जाऊं, वहां धार्मिक मेले में बड़े दानी लोग आए हुए हैं. मेरा भला होगा. किसी से पूछ कर बिना टिकट मैं कुरुक्षेत्र से गुजरने वाली ट्रेन में चढ़ गई, स्टेशन चूक गया सो कुरुक्षेत्र के बजाय अंबाला पहुंच गई.

हालत खराब होने की वजह से तब से मैं इसी बड़े स्टेशन पर पड़ी हूं.’’ रश्मि के चुप होने पर हैरानी से सबकुछ सुन रहे तेजा ने दिमाग को झकझोरा. सख्त दिखने वाले तेजा ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें पटना जाने वाली ट्रेन का टिकट खरीद कर दूंगा, साथ में खाना खाने लायक पैसे भी दूंगा. तुम अपने घर लौट जाओ.’’ लेकिन रश्मि तैयार नहीं हुई. उस ने कहा, ‘‘अब घर और समाज में कोई मुझे नहीं अपनाएगा.’’ तेजा अब रश्मि पर हक से बोलने लगा, ‘‘बेशक, लोग तुम पर ताने मारें, पर तुम अपने बच्चों के लिए घर लौट जाओ. उन मासूमों का इस दुनिया में कोई पराया ध्यान नहीं रखेगा और तुम्हारा पति तो पहले ही नशेड़ी है.’’ रश्मि ने कहा, ‘‘मैं ऐसी गलती कर चुकी हूं, जहां से कभी वापसी नहीं हो सकती है.’’ तेजा ने रश्मि से कहा, ‘‘तुम पहले कुछ खा लो, फिर डाक्टर से दवा ले लो, ताकि तुम्हारे शरीर में कुछ जान आ सके.’’ तेजा की बात सुन कर अब तक मन की बात बताने वाली रश्मि का चेहरा और अंदाज बदल गया. उस ने धीमी आवाज में अपना फैसला साफ कर देने वाली बात कही,

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‘‘मैं रेलवे स्टेशन के बाहर नहीं जाऊंगी, चाहे तुम पैसे दो या मत दो.’’ यह बात कहने का अंदाज देख कर तेजा समझ गया कि इस औरत का भरोसा सब से उठ चुका है, जो दरिंदगी इस के साथ की गई है, उस ने दिल में डर बैठा दिया है, इसलिए वह अब उस पर भी भरोसा नहीं करेगी. तेजा ने कहा, ‘‘अगर तुम कुछ दिन और स्टेशन पर पड़ी रही तो शायद मर जाओगी.’’ लेकिन रश्मि पर इस का भी खास असर नहीं हुआ. उस ने मुरदा से हो चुके चेहरे को और ढीला छोड़ते हुए कहा, ‘‘मैं बेशक मर जाऊं, लेकिन स्टेशन से बाहर नहीं जाऊंगी. न ही वापस अपने घर जाऊंगी.’’ तेजा ने मन में सोचा कि वह बुरी तरह फंस गया है, इस हालत में इसे छोड़ कर गया तो यह फिर गलत लोगों के हाथ पड़ जाएगी या फिर कुछ दिनों बाद मरने की हालत में पहुंच जाएगी. लेकिन साथ ही उसे यह एहसास भी हुआ कि वह खुद कौन सा चीफ मिनिस्टर है, जो अचानक से इस औरत की जिंदगी को वाकई जिंदा कर देगा? अंदर एक कोने में यह डर भी था कि कहीं उसे आधी रात को बेवकूफ तो नहीं बनाया जा रहा है? बैठेबैठे एक दौर बीत चुका था. तेजा की ट्रेन का वक्त नजदीक आ रहा था. खड़ूस तेजा का दिमाग कन्फ्यूज हो कर तेजी से घूम रहा था. मन में यह भी आ रहा था कि अगर औरत सच बोल रही है तो बरबादी की जिम्मेदार वह खुद ही है. इस तरह घर छोड़ कर भागेगी तो ऐसा ही अंजाम होगा. लेकिन उसे वह वक्त भी याद आया जब झगड़ कर तेजा खुद घर छोड़ कर दिल्ली के एक आश्रम में चला गया था. घर से संन्यासी बनने की ठान कर निकला था, लेकिन 4-5 दिन बाद सुबह 3 बजे चुपचाप आश्रम छोड़ कर वापस घर का रास्ता पकड़ लिया. घर लौटने पर मातापिता और पड़ोसियों ने उस की गरदन नहीं पकड़ी, बल्कि राहत की सांस ली थी. तेजा के मन में आया कि क्या दुनिया है कि घर से भागा एक लड़का वापस आ जाए तो सब को चैन, लेकिन एक औरत के लिए वही सब करना पाप… तेजा की नजर बारबार घड़ी पर जा रही थी.

लग रहा था, वक्त ने रफ्तार बढ़ा ली है. उस की टे्रन के आने की घोषणा हो चुकी थी. लेकिन रश्मि का सच और उस की जिद जान कर तेजा उस के लिए कुछ भी कर पाने की हालत में नहीं था. बिना सोचे तेजा के मुंह से अचानक शब्द निकले, ‘‘मुझे अब जाना होगा रश्मि. ट्रेन आ रही है.’’ तेजा ने जेब से पर्स निकाला. उसे ध्यान नहीं कितने नोट निकले, लेकिन रश्मि को थमा दिए और बैंच से खड़ा हो गया. ‘‘अपना ध्यान रखना,’’ बोल कर तेजा आगे बढ़ने लगा. तेजा को जाते देख रश्मि के चेहरे पर फिर से कुछ बड़ा खो देने के भाव थे. कई दिन से पत्थर बनी उस की आंखें नम हो गईं. पुल पर पलट कर तेजा ने अंधेरे कोने में नजरें दौड़ाईं. ऐसा लग रहा था मानो बैंच के साथ रश्मि की मूर्ति हमेशा से वहीं चिपकी हुई है. तेजा के पैर आगे बढ़ते जा रहे थे. रेलवे स्टेशन की तमाम चिल्लपौं से दूर उस का दिमाग खोया हुआ था, उसे भी नहीं मालूम कहां. एक सन्नाटा पसरा हुआ था. पीछे से धक्का मारते हुए एक आदमी ने कहा, ‘‘नहीं चढ़ना है तो रास्ते से हट जाओ.’’ तेजा जागा और देखा कि उस की ट्रेन सामने है, वह अनजाने में चलते हुए ठीक अपनी बोगी के सामने पहुंच गया है, लेकिन ऊपर चढ़ने के बजाय गेट के बाहर पैर जम गए हैं, इसलिए पीछे से बाकी मुसाफिर उस पर गुस्से में चिल्ला रहे हैं. तेजा हड़बड़ाहट में तेजी से अंदर चढ़ गया. चंद पलों में सीटी बजी और बिजली से चलने वाली ट्रेन के पहियों ने फर्राटा भर दिया. इस से पहले कि ट्रेन पूरी रफ्तार पकड़ पाती, तेजा ने बैग के साथ गेट से छलांग लगा दी. कालेज जाते वक्त रोजाना सरकारी बस के सफर का तजरबा था, इसलिए इंजन की दिशा में दौड़ता रहा वरना स्टेशन पर खड़े लोग तेजा के गिरने के डर में आंखें तकरीबन बंद कर चुके थे.

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स्टेशन की वह रात : भाग 3

कम से कम 30-40 मीटर दौड़ते रहने पर तेजा के लड़खड़ाते पैर संतुलन में आ पाए. तेज सांसें छोड़ता हुआ तेजा रुका और चमकती आंखों के साथ वापस मुड़ा. तेजा को अंदाजा था कि पठानकोट में जाट रैजीमैंट के कैंप पहुंच कर मामा से मदद मिलने की गुंजाइश कम है. मामी और उन के घर वालों का असर फौजी मामा को लाचार बना चुका था, इसलिए वहां जाने में वक्त बरबाद कर नाउम्मीद होने से बेहतर है कि रश्मि और उस के बच्चों को मिलाया जाए. मांबच्चों का मिलन हो जाएगा तो बाकी सब भाड़ में जाएं. तेजा ने फोन निकाल कर दिल्ली के न्यूज चैनल में काम करने वाले दोस्त गौरव को मिला दिया. मालूम था, रात के 2 बजे हैं, गौरव के फोन रिसीव करने के चांस कम हैं, लेकिन फोन को स्पीकर पर लगा कर वह टिकट काउंटर की तरफ बढ़ चला. कोई जवाब नहीं मिला, लेकिन तेजा को कोई परवाह नहीं. रीडायल बटन दबा दिया. घंटी बज रही थी. देर रात होने की वजह से काउंटर खाली था. अंदर टिकट बाबू और एक मैडमजी बातों में मस्त थे. तेजा ने कहा, ‘‘पटना के लिए टे्रन कब मिलेगी?’’ बातचीत के मधुर सफर में खोए टिकट बाबू को यह सवाल घोर बेइज्जती लगा. पहले नजरों से नफरत के बाण चलाए, फिर जबान खोली, ‘‘एक घंटे बाद सुपरफास्ट ट्रेन है. जम्मू से आ रही है, सीधी हावड़ा जाएगी. बीच में दिल्लीपटना जैसे बड़े स्टेशनों पर रुकती है. सीट भी दिलवा दूंगा. अंदर मस्तमस्त बिस्तर मिलेगा, साथ में गरमागरम खाना. लेकिन टिकट खरीदने के लिए औकात चाहिए, अब बोल खरीदेगा टिकट?

‘‘वैसे, सुबह 8 बजे दिल्ली तक पैसेंजर ट्रेन है. वहां से पटना के लिए मिल जाएगी, चल भाग अभी. ये बिहार वाले शांति से चार बात भी नहीं करने देते हैं. हां, तो सपना… मैं क्या कह रहा था?’’ ‘अरे भैया, रात को 2 बजे भी सोने नहीं देते हो, 5-7 दिन की छुट्टी मिलती हैं. समझा करो यार,’ नींद में ऊंघ रहे गौरव ने फोन पर जवाब दिया. ‘‘गौरव, तुम फोन पर बने रहो,’’ तेजा ने स्पीकर बंद कर मुसकराते हुए टिकट बाबू से कहा, ‘‘2 टिकट दे दीजिए,’’ और उस ने डैबिट कार्ड आगे बढ़ा दिया. टिकट बाबू ने तेजा की सूरत को घूरते हुए कार्ड ले लिया. बुनियादी जानकारी पूछी और बटन दबा दिया. 2 टिकट निकाल कर तेजा को थमा दी. टिकट और डैबिट कार्ड ले कर तेजा तेज कदमों से रश्मि की तरफ चल पड़ा. तेजा ने चलते हुए एक सांस में रश्मि की पूरी कहानी फोन पर गौरव को बता दी. गौरव पटना का ही रहने वाला था. दोनों जोधपुर के मिलिटरी स्कूल में एकसाथ पढ़ते थे, क्योंकि दोनों के पिता फौज में वहीं तैनात थे. हालांकि गौरव तेजा से कई क्लास सीनियर था, लेकिन दोनों की खूब जमती थी.

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फोन पर गौरव ने कहा, ‘तेजा इतने दिनों बाद फोन किया वह भी रात के 2 बजे. और यह किस के लिए पागल हुआ जा रहा है. अरे भाई, ऐसे कितने ही लोग रोज बरबाद होते हैं. कितनों को घर पहुंचाएगा तू.’ तेजा ने मजबूत आवाज में कहा, ‘‘गौरव भाई, मैं उसे ले कर पटना आ रहा हूं. समझो, अब मसला पर्सनल है. कुछ देर में तुम्हें उस के घर का अतापता सब मैसेज कर रहा हूं. मुझे इस औरत को उस के बच्चों से मिलाना है. इतना ही नहीं, उस का घर भी बसना चाहिए. तुम अपने विधायक भाई को बोलो या थानेदार को. बस, यह होना चाहिए.’’ गौरव समझ गया कि तेजा के दिमाग में धुन चढ़ गई है. अब यह कुछ नहीं मानेगा या समझेगा. उस ने तेजा को कहा, ‘मैं कल ही दिल्ली से छुट्टी ले कर पटना आया था. तू मुझे उस औरत की जानकारी मैसेज कर. मैं लल्लन भैया से बात करता हूं. अब तू ने कहा है तो निबटाते हैं मसला यार.’ लल्लन भैया 2 दफा विधायक रह चुके थे. गौरव उन की रिश्तेदारी में था. रश्मि अंधेरे की तरफ मुंह किए उसी बैंच पर पत्थर बनी बैठी थी. तेजा ने पहुंच कर कहा, ‘‘तुम्हें स्टेशन से बाहर नहीं जाना है. ट्रेन में मेरे साथ सफर करना है. मैं तुम्हें ले कर पटना जाऊंगा. अगर तुम्हारे बच्चों से मिला कर तुम्हारा संसार नहीं बसा सका, तो जो तुम्हें करना है उस के बाद भी कर सकती हो. चलो उठो, प्लेटफार्म बदलना है.’’ तेजा की इस अंदाज में वापसी देख कर रश्मि सकपका गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है. तेजा की बातें सुन कर वह कल्पना करने की कोशिश कर रही थी कि क्या उस की जिंदगी फिर से खिल सकती है? ‘‘मेरा पति और लोग मुझे जीने नहीं देंगे बाबू,’’ रश्मि ने तेजा से कहा. ‘‘वह सब मुझ पर छोड़ दो,’’ तेजा ने जवाब दिया. जब ट्रेन आई और दोनों उस में चढ़े तो अजीब नजारा था. अंदर के मुसाफिर रश्मि को घूर कर देख रहे थे और रश्मि आलीशान ट्रेन के अंदर हर चीज को घूर रही थी. तेजा उस का हाथ पकड़ कर सीट तक ले गया. प्लेटफार्म पर खरीदा गया खानेपीने का सामान उसे थमा दिया और कहा, ‘‘अब कुछ खा लो.’’ थोड़ी देर में ट्रेन ने सीटी बजा दी और दौड़ चली. पूरे सफर में तेजा और गौरव की फोन पर बातचीत चलती रही. रश्मि इस दौरान लेटेलेटे कभी अचेत सी हो कर सो जाती, तो कभी शीशे की खिड़की के पार नजरें गड़ाए देखती रहती. पटना स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो रश्मि का भाई, मां उस के 2 छोटेछोटे बच्चों के साथ खड़े थे.

उन के साथ गौरव और लल्लन भैया के 2 आदमी भी थे. ट्रेन से उतर कर रश्मि को समझ नहीं आ रहा था, वह बच्ची बन कर अपनी मां से लिपट कर रोए या रोते हुए ‘मम्मीमम्मी’ बोल कर उस की तरफ आ रहे बच्चों को छाती से चिपका ले. तेजा के सामने वक्त ठहर गया था. उस के मन में सुकून और प्यार की बयार बह रही थी. गौरव तेजा को देखे जा रहा था. लल्लन भैया के दोनों लोग पूरे नजारे पर नजरें गड़ाए हुए थे. बूढ़ी मां, रश्मि, दोनों बच्चे एकदूसरे में खो गए. दूर देहात से आए रश्मि के बड़े भाई को भी खुद पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी. जब रश्मि ने पति के बरताव और घर के हालात के बारे में भाई को बताया था तब उस ने जरूरी कदम नहीं उठाया. उसी का नतीजा छोटी बहन और 2 छोटेछोटे मासूम बच्चों को भुगतना पड़ा. लेकिन अब बड़े भाई ने मन मजबूत कर लिया था. गौरव ने तेजा को बताया कि लल्लन भैया ने रश्मि के आदमी को उठवा लिया है. अब वह नशा मुक्ति केंद्र में बंद है. नशे की हालत में उस का बरताव देख लल्लन भैया भी गरम हो गए थे. 2 थप्पड़ जड़ दिए उसे और बोले कि ऐसे आदमी के पास कोई कैसे रह सकता है? लल्लन भैया ने अपने चमचों से कह दिया था कि रश्मि के ससुराल और मायके वालों से पूरा सच पता करें. सच यही निकला कि रश्मि गलत औरत नहीं थी, लेकिन पति बिगड़ैल निकला. कामचोर, नशेड़ी और दूसरों की सीख मानने वाला. उस हालत में रश्मि को 2 ही रास्ते सूझे, एक तो गले में फंदा लगा ले या फिर घर से भाग जाए.

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लेकिन अब बच्चों के चेहरे देख कर उस के अंदर की ताकत जाग गई थी. उस ने मन ही मन फैसला किया, अब बच्चों के लिए जिएगी. आदमी सही रास्ते पर आया तो ठीक है, वरना बच्चों को खुद पालेगी. बड़े भैया ने बीच में आ कर रश्मि से कहा कि फिलहाल वह मायके में चले. वह और मां उन का ध्यान रखेंगे. गौरव ने कहा, ‘‘रश्मि की सेहत ठीक होने पर उसे लल्लन भैया के दोस्त के स्कूल में नौकरी लगवा देंगे. वह वहां अपने बच्चों को भी पढ़ा सकती है. उस के बिगड़ैल पति को सुधारने की जिम्मेदारी अब लल्लन भैया ने ले ली है. जब वह इनसान बन जाएगा, तब उसे सब बता दिया जाएगा.’’ स्टेशन के बाहर रश्मि का सामान एक जीप में लदा था. यह जीप लल्लन भैया की थी. रश्मि के भाई ने हाथ जोड़ कर तेजा को शुक्रिया कहा. बच्चों के साथ रश्मि और उस के भाई और मां जीप में बैठ गए. दोनों लोग भी गाड़ी में लद लिए. चमचों को और्डर था कि रश्मि को उस के गांव तक सहीसलामत छोड़ कर आएं. जीप तेज धुआं छोड़ते हुए आगे बढ़ चली. गौरव ने तेजा को झकझोरते हुए कहा, ‘‘चलो भैया, अब तो हम मिल कर पटना दर्शन करते हैं.’’

पति बना हैवान

स्टेशन की वह रात

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