परवरिश : सोचने पर क्यों विवश हुई सुजाता – भाग 3

दीदी की समस्या अपनों से थी जिस में मैं कुछ नहीं कर सकती थी. अक्षत मेरी सुनने वाला भी नहीं था. फिर भी मैं ने एक बार अक्षत से बात करने की सोची. मैं 2-4 दिन वहां रही. मेरे सामने सबकुछ ठीक ही रहा. लेकिन छोटीछोटी बातों में भी मैं ने बहुत कुछ महसूस कर लिया. कच्चे पड़ते रिश्तों के धागों की तिड़कन, रिश्तों में आता ठंडापन, बहुत कुछ.

एक दिन मैं ने अक्षत को मौका देख कर पास बुलाया, ‘कुछ कहना चाहती हूं अक्षत तुम से.’

‘कहिए, मौसी…’ अक्षत ने बिना किसी लागलपेट के नितांत लापरवाही से कहा.

‘कुछ निजी सवाल करूंगी…बुरा तो नहीं मानोगे?’ मैं अंदर से थोड़ा घबरा भी रही थी कि कहीं ऐसा न हो कि होम करते हाथ जल जाएं.

‘क्या…’ अक्षत की प्रश्न भरी नजरें मेरे चेहरे पर टिक गईं. मेरी समझ में नहीं आया, कहां से बात शुरू करूं, ‘क्या कुछ ठीक नहीं चल रहा है घर में?’ मेरे मुंह से फिसल गया.

‘क्या ठीक नहीं चल रहा है…’ अक्षत की त्यौरियां चढ़ गईं.

‘अपनी मां को नहीं जानते, अक्षत, दीदी अपने जीवन की कमियों के बारे में बात भी करती हैं कभी, वह तो हमेशा ही अपनेआप को संपूर्ण दिखाना चाहती हैं.’

‘हां, चाहे उस के लिए घर वालों को कितनी भी घुटन क्यों न हो?’

‘कैसी बात करते हो अक्षत…तुम अपनी मां के बारे में बात कर रहे हो…’

‘जानता हूं, मौसी…जीवन भर मां सब पर हुक्म चलाती रहीं…अब मां चाहती हैं कि बहूबेटे की गृहस्थी भी उन के अनुसार ही चले, बहू को भी वह वैसे ही अंकुश में रखें जैसे हम सब को रखती थीं…उन की किसी के साथ बन ही नहीं सकती,’ अक्षत गुस्से में बोला.

‘अक्षत, क्या मैं दीदी को नहीं जानती, कितना संघर्ष किया है उन्होेंने जीवन में, सभी नातेरिश्ते भी निभाए, तुम्हारे पापा को भी देखा, तुम्हें उन के संघर्ष  को समझना चाहिए. यह नहीं कि बीवी ने कुछ बोला और तुम ने आंख मूंद कर विश्वास कर लिया,’ मैं हिम्मत कर के कह गई.

‘मैं इस बारे में अधिक बहस नहीं करना चाहता, मौसी, और मैं आंख मूंद कर क्यों विश्वास करूंगा? क्या मैं मां का स्वभाव नहीं जानता…’ कह कर अक्षत उठ गया.

अक्षत चला गया लेकिन मेरे दिल में एक सूनापन छोड़ गया. अक्षत का व्यवहार देख कर मैं ने राहुल और नियोनिका की तरफ से अपना मन और भी मजबूत कर लिया. कैसा बदल जाता है बेटा शादी के बाद…और मेरा बेटा तो पहले से ही बदला बदलाया है. बस, अंतर इतना है कि दीदी के साथ जीजाजी का साथ नहीं है.

‘दीदी, कुछ दिन मेरे पास रहने आ जाओ…’ मैं ने आते समय दीदी को गले लगा कर सांत्वना दी. उन के घाव पर तो मरहम भी काम नहीं कर रहा था, क्योंकि घाव अपनों ने दिए थे. परायों का मरहम क्या काम करता.

घर पहुंची तो 2 दिन घर ठीकठाक करने में लग गए. अगले दिन राहुल व नियोनिका वापस लौट आए. मैं अनायास ही राहुल के व्यवहार में अक्षत को ढूंढ़ने लग गई, लेकिन अभी तो राहुल ही बदला हुआ नजर आ रहा था. पता नहीं कितने दिन का है यह बदलाव.

मुझ से हर बात पर लड़ने और विद्रोह करने वाला राहुल, बीवी के सामने अचानक इतना आज्ञाकारी कैसे हो गया. राहुल मुझ से और अपने पापा से प्यार और इज्जत से बात करता. नियोनिका नई लड़की थी, जैसा राहुल को देखती वैसा ही करती.

मैं शाम की चाय बना रही थी. राहुल और नियोनिका लान में बैठे थे. तब तक उस के पापा लान में चले गए. एक कुर्सी खाली पड़ी थी फिर भी राहुल ने उठ कर पापा की तरफ अपनी कुर्सी बढ़ा दी. मैं अंदर से देख रही थी. चाय की ट्रे ले कर मैं बाहर आ गई. राहुल की ही तरह नियोनिका ने भी उठ कर मेरी तरफ अपनी कुर्सी बढ़ा दी. राहुल ने उठ कर मेरे हाथ से चाय की ट्रे ले ली.

कहीं अंदर तक मन भीग गया. बात बड़ी छोटी सी थी पर अपने राहुल से इस तरह के व्यवहार की उम्मीद नहीं की थी. नौकरी के बाद उस में थोड़ाबहुत बदलाव आया तो था लेकिन विवाह के बाद? दीदी कहती हैं, अक्षत अब वह अक्षत नहीं रहा और इधर राहुल भी वह राहुल नहीं रहा है. बदलाव तो दोनों में आया पर एकदूसरे के विपरीत, ऐसा क्यों? तभी राहुल मुझे कंधों से पकड़ कर बिठाता हुआ बोला.

‘बहुत कर लिया मम्मी, आप ने काम…अब अपनी जिम्मेदारी नियोनिका को दो और आप तो बस, इस की मदद करो. और बैठ कर राज करो. पापा के साथ ज्यादा वक्त बिताओ, घूमने जाओ. एक समय होता है जब मातापिता बच्चों के लिए करते हैं…फिर एक समय आता है जब बच्चे मातापिता के लिए करते हैं. आप दोनों ने बहुत किया, अब हमारा समय है,’ मैं अपलक राहुल का चेहरा देखती रह गई.

राहुल ने मुझे कुर्सी पर बिठा दिया. नियोनिका ने अपने पापा और मुझे चाय का कप पकड़ा दिया. सभी बातें करते हुए चाय पी रहे थे और मैं अपनेआप में गुम सोच रही थी कि किशोरावस्था में आवश्यकता से अधिक नियंत्रण ने शायद अक्षत की आक्रामकता को, गुस्से को, मातापिता के अनुशासन के प्रति उस उम्र के स्वाभाविक विद्रोह को बाहर नहीं निकलने दिया, यहां तक कि जीजाजी भी दीदी से दबते रहे. अक्षत को दीदी से शिकायत भी हुई तो उस ने अपने अंदर दबा ली. चिंगारी अंदर दबी रही और बहू की शिकायतों ने उसे शोलों में बदल दिया और किशोरावस्था की उन मासूम सी शिकायतों को इतना कठोर रूप दे दिया.

कितना कहती थी मैं दीदी से तब कि बच्चों पर आवश्यकता से अधिक नियंत्रण ठीक नहीं है. बंधन और अनुशासन में फर्क होता है पर दीदी किसी की कहां सुनती थीं. बचपन बुनियाद है और किशोरावस्था दीवारें, जिस पर युवावस्था की छत पड़ती है और शेष जीवन जिस में इनसान हंसता या रोता है. यही कारण था शायद अक्षत के आज के इस व्यवहार का, जबकि राहुल ने उस उम्र की सारी भड़ास उसी उम्र में निकाल दी, जिस से उस के दिलोदिमाग में मातापिता के लिए कोई ग्रंथि नहीं पनपने पाई बल्कि उस ने मातापिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझा और शायद कहीं पर अपनी गलतियों को भी.

‘‘मम्मी, क्या सोच रही हैं…’’ राहुल ने मुझे हिलाया तो मेरी तंद्रा टूटी. मैं अतीत से निकल कर वर्तमान में आ गई, ‘‘चलिए, हम सब रात का शो देखते हैं… और बाहर ही डिनर करेंगे,’’ नियोनिका को सब का एकसाथ जाना पसंद हो न हो पर राहुल ने यह बात पूरे आत्मविश्वास से कही. मैं ने खुशी से उस का गाल थपथपा दिया.

‘‘अरे, हम तो अपने जमाने में खूब गए पिक्चर देखने…अब तुम्हारा समय है…जाओ…मैं भी तो देखूं, कितने प्यारे लगते हैं मेरे बच्चे साथसाथ चलते हुए,’’ कह कर मैं ने उन दोनों को जबरन उठा दिया. हमारे बच्चे कार में बैठ रहे थे और हम दोनों उन को ममता भरी निगाहों से निहार रहे थे.

‘‘अपना राहुल कितना बदल गया है, है न?’’ मैं इन के पास खिंच आई.

‘‘हां…’’ यह मेरा गाल थपक कर बोले, ‘‘मैं तो तुम से पहले ही कहता था कि तुम किशोरावस्था में उस का व्यवहार देख कर भविष्य की बात मत सोचो. हमारा पालनपोषण का तरीका, हमारे दिए संस्कार उस के भविष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करेंगे. अब देखो, राहुल का अपना आत्मविश्वास ही है जिस से वह अपने तरीके से व्यवहार करता है. वह किसी दबाव में न आ कर स्वाभाविक तरीके से रहता है.

मातापिता की इज्जत करता है, इसीलिए नियोनिका को कुछ समझाना नहीं पड़ता. राहुल उस से कोई जबरदस्ती नहीं करता, लेकिन जैसा वह करता है वैसा ही नियोनिका भी करने की कोशिश करती है, वरना जब तुम्हारा बेटा ही तुम्हें आदर नहीं देगा, तुम्हारे वजूद को महत्त्व नहीं देगा तो बहू से कैसे उम्मीद कर सकते हैं. और इस की बुनियाद बहुत पहले किशोरावस्था में ही पड़ चुकी होती है. यदि उस उम्र में मातापिता की बच्चों के साथ संवाद- हीनता की स्थिति रहती है तो वही स्थिति बाद में विकट हो जाती है.’’ यह बोले तो इन की बात का विश्वास मुझे अंदर ही अंदर हो रहा था.

पुरुषों को क्यों भाता है गैर महिलाओं का छूना?

Society News in Hindi: इस में कोई दोराय नहीं कि विपरीत सैक्स के प्रति आकर्षण स्त्रीपुरुष दोनों को ही होता है. लेकिन हाल ही में एक अध्ययन के बाद यह बात सामने आई है कि स्त्रीपुरुष में शारीरिक स्पर्श को ले कर कितनी समानताएं हैं. इस शोध का दिलचस्प तथ्य यह है कि स्त्री हो या पुरुष उसे दूसरों का स्पर्श कितना सुखकर लगता है. यानी स्त्रीपुरुष को यदि कोई गैर व्यक्ति छूता है तो वह शरीर के किनकिन जगहों को छूने की अनुमति देते हैं और शरीर के किन जगहों को छूने से असहज होते हैं.

अनजान महिलाओं का छूना

अध्ययनकर्ताओं ने इस के निष्कर्षों को जानने व समझने के लिए 2 बौडी माप बनाए, जिन में अलगअलग नतीजे बताए गए.

अध्ययन में यह बात सामने आई कि एक महिला अपने पुरुष पार्टनर को पूरे शरीर को छूने की अनुमति देती है.

मगर इस में हैरान करने वाली बात यह सामने आई है कि पुरुषों को अपनी महिला पार्टनर का छूना असहज करता है, मगर कोई गैर अथवा अनजान महिला का छूना खूब भाता है.

छू लो एक बार

इस अध्ययन का सब से दिलचस्प तथ्य यह भी रहा है कि पुरुष जहां अपने जानकारों, दोस्तों, परिवार के लोगों द्वारा छूने से असहज हो जाते हैं, वहीं महिलाएं इस की अनुमति दे देती हैं. हां, महिलाएं अनजान लोगों चाहे वह स्त्री हो या पुरुष की निकटता में असहज महसूस करती हैं.

पुरुषों को अनजान महिलाओं का स्पर्श इतना भाता है कि वे उन्हें खुद छूने का आमंत्रण देते हैं.

जिंदगी की तलाश में : कैसे बदला कृष्ण का जीवन

शाम गहराने लगी थी, मगर बाहर के अंधेरे से घोर अंधेरा कृष्ण के भीतर छाने लगा था. अपने चेहरे को हथेलियों से ढके, आंखें मूंदे उस ने मोबाइल के ईयरफोन कान में ठूंस कर सुनीता की आवाज दबाने की नाकाम कोशिश में अपना सारा ध्यान गाने पर लगा दिया था, ‘जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए…’

गाना खत्म होतेहोते कृष्ण की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली. उस के जी में आया कि वह अपने हालात पर खूब फूटफूट कर रोए… मगर उस से ऐसा नहीं हो सका और अंदर की हूक आंखों से आंसू बन कर बहती रही.

कृष्ण ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की जिंदगी इस मोड़ पर आ कर खड़ी हो जाएगी, जहां वह कहीं का नहीं रहेगा… काश, वह उस नर्स के इश्क में न फंसा होता… काश… उस ने घर वालों की बात मानी होती… काश… उस ने अपने और अपने परिवार के बारे में सोचा होता… काश… काश… काश… मगर अब क्या हो सकता था… जिंदगी इसी काश में उलझ कर रह गई थी.

कृष्ण को अच्छी तरह याद है कि पिता की अचानक हुई मौत के बाद उन की जगह पर उस की नौकरी लगते ही उस के जैसे पंख उग आए थे. जवानी का जोश और मुफ्त में मिली पिताजी की जगह रेलवे की नौकरी के बाद दोस्तीयारी में पैसे उड़ाना, मोटरसाइकिल पर सजसंवर कर इधर से उधर चक्कर काटना, मौका मिलते ही दोस्तों के साथ मौजमस्ती मारना… बस, यही उस का रोज का काम बन गया था. तब न उसे दोनों बहनों के ब्याह की चिंता थी और न विधवा मां की सेहत की फिक्र.

एक दिन दोस्तों के साथ पिकनिक पर भीग जाने पर कृष्ण को बुखार चढ़ गया था. अस्पताल में नर्स से सूई लगवाते हुए उस की नजरों से घायल हो कर कृष्ण उस का दीवाना हो उठा था, जब नर्स ने अपने मदभरे नैनों में ढेर सारा प्यार समेटे हुए पूछा था, ‘‘सूई से डरते तो नहीं हो? आप को सूई लगानी है.’’

कृष्ण उस नर्स की हिरनी सी बड़ीबड़ी आंखों को बस देखता रह गया था. सफेद पोशाक में गोलमटोल चेहरे वाली नर्स की उन आंखों ने जैसे उसे अपने अंदर समा लिया था. उसे लगा था, जैसे खुशबू से सराबोर हवा ने उसे मदहोश कर दिया हो, जैसे पहाड़ों पर घटाएं बरसने को उमड़ पड़ी हों…

नर्स ने बांह ऊंची करने के लिए कृष्ण का हाथ अपने कोमल हाथों में लिया, तो वह कंपकंपा कर बोला था, ‘‘डर तो लगता है, पर आप लगाएंगी तो लगवा लूंगा.’’

इतना कहते हुए नर्स ने शर्ट की बांह ऊपर चढ़ा दी थी. नर्स ने हौले से सूई लगा कर कृष्ण की आंखों में झांकते हुए पूछा था, ‘‘दर्द तो नहीं हुआ?’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं.’’

‘‘आप का नाम क्या है?’’

‘‘कृष्ण.’’

‘‘मतलब कृष्ण कन्हैया हैं आप… गोपियों के कन्हैया…’’ नर्स ने इंजैक्शन की जगह को रुई से रगड़ते हुए मुसकरा कर कहा था.

कृष्ण अपने घर चला आया था. शरीर का बुखार तो अब उतर चुका था, मगर नर्स के इश्क का बुखार उस पर इस कदर हावी हो गया था कि आंखें बंद करते ही नर्स की बड़ीबड़ी हिरनी सी आंखें नजर आती थीं.

बुखार उतरने के बाद भी कृष्ण कई बार अस्पताल के चक्कर लगा आता. नर्स से किसी न किसी बहाने दुआसलाम कर आता. नर्स भी उस से मुसकरा कर बात करती.

उसी दौरान क्रिसमस पर हिम्मत कर कृष्ण ने नर्स को रास्ते में रोक कर ‘मैरी क्रिसमस’ कह कर लाल गुलाबों का गुलदस्ता थमा दिया था. नर्स

ने भी मुसकरा कर उस का तोहफा कबूल कर लिया था.

बस, फिर वे दोनों मिलने लगे थे. प्यार हो चुका था, इजहार हो चुका था. घर में क्या हो रहा है, कृष्ण को कुछ परवाह न थी. वह उस नर्स को मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा कर घूमता… उस के प्यार में झूमता, मस्ताता बस.

उधर ब्याह लायक बहनें कृष्ण के इस आवारापन की हरकतों को देख कर मजबूरन मां को संभालने की खातिर अपना घर बसाने की सोच भी न पाती थीं. अगर उन्होंने ब्याह रचा लिया, तो दिल की मरीज विधवा मां को कौन संभालेगा? बस, इसी एक बड़े सवाल ने उन्हें कुंआरी रहने पर मजबूर कर दिया था. वे दोनों घर में ही ब्यूटीपार्लर खोल कर रोजीरोटी कमाने लगी थीं.

फिर अचानक ही नर्स का तबादला और उसी के चलते ही कृष्ण का घर से और दूर हो जाना… वह कईकई दिन घर से 200 किलोमीटर दूर अपने प्यार के नशे में चूर पड़ा रहता.

और एक दिन जैसे बिजली गिरी थी कृष्ण पर. नर्स के घर का दरवाजा बिना खटखटाए घनघोर घटाओं में भीगता वह अचानक अंदर दाखिल हुआ था, तो सामने का नजारा देख कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी. वह नर्स किसी और मर्द के साथ बिस्तर पर थी.

कृष्ण को यह सब देख कर ऐसा लगा था, जैसे किसी ने उस के दिल में छुरा भोंक दिया हो, जैसे सारा आसमान घूमने लगा हो… उसे लगा था कि वह खून से लथपथ हो कर वीरान रेगिस्तान में अकेला घायल खड़ा हो और तमाम चीलकौए उसे नोंच खाने को उस पर मंडरा रहे हों… कितने वादे… कितनी कसमें खाई थीं… कैसे कहती थी वह नर्स, ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती कृष्ण… मैं मर जाऊंगी, जो तुम मेरे न हुए…’

कृष्ण को लगा था कि जमीन फट जाए और वह उस में समा जाए… जैसे नर्स के क्वार्टर की दीवारें आग से भभक उठी हों, वैसे ही नफरत की आग में भभक उठा था कृष्ण.

कृष्ण नर्स को कुछ कह पाता, उस से पहले ही नर्स ने उस से रूखी आवाज में कहा था, ‘‘बेवकूफ इनसान, तुम को इतना भी नहीं पता कि किसी लड़की के घर का दरवाजा खटखटा कर अंदर आना चाहिए…’’ फिर गुर्राते हुए नफरत भरे अंदाज में उस ने घूरते हुए कृष्ण से कहा था, ‘‘ऐसे घूर कर क्या देख रहे हो मुझे? ये नए डाक्टर साहब हैं. मेरे नए फ्रैंड… अभी एक हफ्ता पहले ही डिस्पैंसरी में पोस्टिंग हुआ है…’’

कृष्ण मुट्ठी भींचे सब सुनता रहा था. जी में आया कि नर्स का गला ही घोंट दे, मगर वह कुछ और कहती, उस से पहले ही वह मुड़ कर मोटरसाइकिल स्टार्ट कर निकल पड़ा था तेज रफ्तार से घर की ओर… जैसे वह जल्दी से जल्दी दूर… बहुत दूर भाग जाना चाहता हो… जैसे नर्स की आवाज उस का पीछा कर रही हो और वह

उसे सुनना नहीं चाहता हो… वह टूट गया था अंदर ही अंदर.

इसी तरह उदासी और तनहाई में दिन रगड़रगड़ कर बीत रहे थे कि एक दिन अचानक ही कृष्ण के कानों में किसी की दिल भेद देने वाली रुलाई सुनाई पड़ी.

‘अरे, यह तो सुनीता के रोने की आवाज है,’ कृष्ण पहचान गया था. सुनीता, उस की पड़ोसन… मजबूर, बेसहारा सी, मगर निहायत ही खूबसूरत, जिसे उस का पति रोज शराब पी कर बिना बात मारता है और वह उस की मार खाती जाती है. आखिर जाए भी तो कहां… उस का इस दुनिया में कोई नहीं… मामा ने मामी की रोजरोज की चिकचिक से तंग आ कर उसे एक बेरोजगार शराबी से ब्याह कर मानो अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली थी.

कृष्ण, जो अपने प्यार में नाकाम हो कर टूट चुका था, न जाने क्यों अचानक ही उठ कर सुनीता के घर की ओर लपका. वह  रोजरोज सुनीता को यों पिटते नहीं देख सकता.

कृष्ण ने दरवाजा खोल कर पिटती सुनीता को हाथ से पकड़ा ही था कि वह उस के सीने से इस कदर लिपट पड़ी, जैसे कोई बच्चा मार के डर से लिपट जाता है.

‘‘बचा लो इस राक्षस से, वरना मुझे यह मार ही डालेगा…’’ सुनीता कृष्ण से लिपट कर फूट पड़ी थी. पता नहीं, कृष्ण के टूटे दिल को सुनीता के यों सीने से लग जाने से कितना सुकून मिला था. उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया था.

‘‘मैं तुम्हें इस तरह पिटता नहीं देख सकता सुनीता…’’

‘‘अबे हट, बड़ा आया सुनीता का आशिक. तू होता कौन है इसे बचाने वाला…?’’ कहते हुए सुनीता के पति ने कृष्ण को जोर का धक्का दे दिया और खुद कमरे में रखी हौकी उठा कर कृष्ण के ऊपर लपका. अगर पड़ोसी न बचाते, तो वह नशे में कृष्ण के सिर पर हौकी दे मारता.

मगर अब सुनीता कृष्ण के सामने आ खड़ी थी उसे बचाने के लिए. सारा महल्ला तमाशा देख रहा था.

सुनीता के पति ने तमाम महल्ले वालों के सामने चीखचीख कर कहा, ‘‘आशिक बनता है इस का… कब से चल रहा है तुम्हारा चक्कर… रख सकता है हमेशा के लिए इसे… चार दिन ऐश करेगा और छोड़ देगा… इतना ही मर्द है तो ले जा हमेशा के लिए और रख ले अपनी बीवी बना कर… मुझे इस की जरूरत भी नहीं…’’

सुनीता और सारा महल्ला खामोश हो कर कृष्ण के जवाब का इंतजार करने लगे. सुनीता उस से लिपटी कांप रही थी. कृष्ण के जवाब के इंतजार में उस का दिल जोरजोर से धड़कने लगा था.

‘‘हां, बना लूंगा अपनी बीवी… एक औरत पर हाथ उठाते, भूखीप्यासी रखते, जुल्म करते शर्म नहीं आती… बड़ा मर्द बनता है… देख, कैसा मारा है इसे…’’ कृष्ण ने जेब से रूमाल निकाल कर सुनीता के होंठों से बहता खून पोंछ दिया.

सुनीता कृष्ण के सीने से लगी आंखों में आंसू लिए बस उसे ही देखती रह गई, जैसे कहना चाह रही हो, ‘मेरे लिए इतना रहम… आखिर क्यों? मैं तो शादीशुदा और एक बच्ची की मां… फिर भी…’

किसी ने पुलिस को भी फोन कर दिया. फिर क्या, पुलिस के सामने ही सुनीता ने कृष्ण को और कृष्ण ने सुनीता को स्वीकार कर लिया. महिला थाने में रिपोर्ट, फिर फैमिली कोर्ट से आसानी से तलाक हो गया.

पता नहीं, कृष्ण ने अपने पहले प्यार को भुलाने के लिए या सुनीता पर इनसानियत के नाते तरस खा कर उसे घर वालों, महल्ले वालों और रिश्तेदारों की परवाह किए बगैर अपना लिया था… फिर किराए का अलग मकान… सुनीता की बेटी का नए स्कूल में दाखिला और लोन पर ली गई नई कार…

शायद अपने पहले प्यार को भुलाने की कोशिश में कृष्ण ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था और सुनीता उसे और उस के द्वारा मुहैया कराए गए ऐशोआराम पा कर निहाल हो गई थी.

उधर, कृष्ण सुनीता की बांहों में पड़ा उस की रेशमी जुल्फों से खेलता और नर्स के साथ बिताए पलों को सुनीता के साथ दोहराने की कोशिश करता. पड़ोस में रहने के चलते शायद सुनीता उस के पहले प्यार के बारे में सबकुछ जानती थी.

कृष्ण को न बूढ़ी मां की चिंता थी, न दोनों बहनों के प्रति फर्ज का भान. हां, कभी सुनीता को उस ने मांबहनों के साथ रहने के लिए दबाव दिया था, तो सुनीता ने दोटूक शब्दों में कह दिया था, ‘‘मैं उस महल्ले में तुम्हारी मांबहनों के साथ कभी नहीं रह सकती. लोग तुम्हारे और नर्स के किस्से छेड़ेंगे, जो मुझ से कभी बरदाश्त नहीं होगा…’’

समय के साथसाथ कृष्ण का अपने पहले प्यार को भुलाने और जोश में आ कर सुनीता को अपनाने की गलतियों का अहसास होने लगा.

सुनीता ऐशोआराम की आदी हो गई. वह कृष्ण के उस पर किए गए उपकार को भी भूल गई और एक लड़के को जन्म देने के बाद तो उस के बरताव में न जाने कैसा बदलाव आया कि कृष्ण अपने किए पर पछताने लगा.

कभीकभार मां के पास रुक जाने, दोस्तयारों के पास देर हो जाने पर सुनीता उसे इतना भलाबुरा कहने लगी कि उस का जी करता उसे जहर ही दे दे. वह अकसर नर्स को ले कर ताना मारने लगी. न समय पर नाश्ता, न समय पर खाना… कृष्ण के लेट घर आने पर खुद खा कर बेटी को ले कर सो जाना उस का स्वभाव बन गया.

सुनीता तो अब नर्स और कृष्ण के पहले प्यार को ले कर ताना मारती रहती थी. ज्यादा कुछ बोलने पर वह दोटूक कह देती थी, ‘‘नर्स ने धोखा दिया तुम्हें इस चक्कर में मुझे अपना लिया, वरना इतने बदनाम आदमी से कौन रचाता ब्याह? मुझे अपना कर कोई अहसान नहीं कर दिया तुम ने… अभी भी मुझे क्या पता कहांकहां जाते हो… किसकिस के साथ गुलछर्रे उड़ाते हो…’’

तब काटो तो खून नहीं वाली हालत हो जाती थी कृष्ण की. वह चीख पड़ता, ‘‘हां… उड़ाता हूं… खूब उड़ाता हूं गुलछर्रे… तेरी इच्छा है तो तू भी उड़ा ले…’’ और निकल जाता कार ले कर दूर जंगलों में.

एक दिन कृष्ण तेज बुखार से तपता जब नजदीकी डिस्पैंसरी में इलाज कराने पहुंचा, तो सन्न रह गया. हाथ

में इंजैक्शन लिए उस की वही नर्स खड़ी थी.

कृष्ण ने उस के हाथ से परची छीन ली. नर्स ने आसपास देखा. दोपहर के डेढ़ बजे का समय था. मरीज जा चुके थे. उस के और कृष्ण के अलावा वहां कोई नहीं था.

नर्स ने कृष्ण के हाथ से दोबारा परची ली और कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं आप के पैर पड़ती हूं. मुझ से बहुत बड़ी भूल हुई, जो मैं ने आप को…’’

बाकी शब्द नर्स के गले में अटक कर रह गए. कान पकड़ कर आंखों में आंसू भरे वह कृष्ण के कदमों में झुक गई.

कृष्ण का गुस्सा नर्स को यों गिड़गिड़ाते देख बुखार की गरमी से जैसे पिघल गया. उस ने बुखार से तपते अपने हाथों से उठाते हुए पहली बार नर्स को उस के नाम से पुकारा, ‘‘बस भी करो मारिया. मैं अब…’’

कहतेकहते रुक गया कृष्ण और अपनी बांहें खोल कर मारिया के सामने कर दीं.

‘‘पास ही स्टाफ क्वार्टर है, मैं उसी में रहती हूं. अभी एक हफ्ता पहले ही ट्रांसफर हुआ है यहां. आप को देखने की कितनी तमन्ना थी… आज पूरी हो गई. प्लीज आना… ए 41 नंबर है र्क्वाटर का,’’ कहते हुए मारिया ने आंसुओं से भरी आंखों से कृष्ण को इंजैक्शन लगा दिया.

घर आ कर कृष्ण निढाल सा पलंग पर पड़ गया. आंखों में मारिया की आंसुओं भरी आंखें और फूल

सा कुम्हलाया चेहरा था. आसमान में बादलों की गड़गड़ाहट के साथ तेज चमकती बिजली थी. कृष्ण पलंग पर आंखें मूंदे यों ही पड़ा रहा और आज के दिन के बारे में सोचता रहा…

सुनीता ने एक बार भी कृष्ण से तबीयत खराब होने के बावजूद खानेपीने, दवा वगैरह के बारे में नहीं पूछा. बस, नए दिलाए हुए मोबाइल फोन से वह चिपकी रही.

आज तीसरा दिन था. बुखार अभी भी महसूस हो रहा था, मगर रविवार के दिन डाक्टर कम ही मिलता है, फिर भी कृष्ण किसी तरह उठा और डिस्पैंसरी की ओर चल दिया. उस की सोच के मुताबिक डाक्टर नहीं आया था. मारिया ही डिस्पैंसरी संभाल रही थी.

कृष्ण को देखते ही मारिया गुलाब के फूल सी खिल उठी, ‘‘ओह कृष्ण… अब कैसा है आप का तबीयत?’’

केरल की होने के चलते मारिया के हिंदी के उच्चारण कुछ बिगड़े हुए होते थे. उस ने कृष्ण की कलाई को अपने नरम हाथों से पकड़ कर नब्ज टटोलने की कोशिश की ही थी कि तभी कृष्ण ने हाथ खींच लिया.

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘अभी तक नाराज हो…’’ कहते हुए मारिया ने कृष्ण को अपनी बांहों में भर लिया. कृष्ण को लगा जैसे वह कोयले की तरह धूधू कर जल उठा हो. जैसे उसे 104 डिगरी बुखार हो गया हो. तभी मारिया ने मौका पा कर अपने पंजों पर खड़े हो उस के होंठों पर अपने धधकते होंठ रख दिए.

मारिया की आंखों में नशा उतरने लगा था. डिस्पैंसरी खाली थी. खाली डिस्पैंसरी के एक खाली कमरे की हवा मारिया की गरम सांसों से गरम हो चली थी.

‘‘कृष्ण, मुझे माफ कर दो. देखो न, आप की मारिया आप से अपने प्यार की भीख मांग रही है. अभी भी वही आग, वही कसक और वही प्यार बाकी है मारिया में… एक बार, सिर्फ एक बार…’’

कृष्ण, जो मारिया का साथ पा कर कुछ पल को अपने होश खो बैठा था, ने मारिया को दूर धकेल दिया और बोला, ‘‘मुझे तुम से घिन आ रही है. तुम प्यार के नाम पर कलंक हो. मैं तुम से प्यार नहीं, बल्कि नफरत करता हूं. मुझे कभी अपनी सूरत भी मत दिखाना…’’

इतना कहता हुआ कृष्ण डिस्पैंसरी से बाहर चला गया था. मारिया ‘धम्म’ से कुरसी पर बैठ गई.

कृष्ण नफरत से भरा भनभनाता सीधे अपने घर की तरफ निकल पड़ा था. उसे लग रहा था जैसे उस के चारों ओर आग जल रही हो, जिस में वह जला जा रहा हो… मारिया ने जैसे उस के अंदर आग भर दी थी… प्यार की नहीं, नफरत की आग. बस, उसी आग में जलता जब घर पहुंचा तो वहां का नजारा देख हैरान रह गया.

घर के दरवाजे पर सुनीता का पहला पति सुनीता का हाथ अपने हाथों में लिए उस से कह रहा था, ‘‘चिंता मत करो, मैं जल्दी आऊंगा…’’ फिर कृष्ण को देख कर वह नजरें झुकाए हुए चुपचाप वहां से खिसक लिया.

कृष्ण ने सुनीता के गाल पर एक करारा तमाचा जड़ दिया और बोला, ‘‘मक्कार… धोखेबाज… बता, कब से चल रहा है यह सब?’’

सुनीता गाल को सहलाते हुए कृष्ण पर चिल्लाई, ‘‘जब से तुम्हारा नर्स के साथ चक्कर चल रहा है. कहां से आ रहे हो? मारिया से मिल कर न? अपने गरीबान में झांक लो, तब मुझे कुछ कहना. वे आएंगे… तुम उन्हें रोक भी नहीं सकते… उन की बेटी मेरे पास है… क्या कर लोगे तुम?’’

कृष्ण को लगा कि वह चक्कर खा कर वहीं गिर पड़ेगा. उस ने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था. इतना बड़ा धोखा.

कृष्ण चल पड़ा था अपने घर की ओर. मांबहनों के पास. टूटे कदम और बोझिल मन लिए. जा कर ‘धम्म’ के पलंग पर पड़ गया था. उसे लगा जैसे वह न घर का रहा न घाट का… न मांबहनों का हो पाया और न मारिया या सुनीता का… आखिर उसे उस के भटकने की सजा जो मिल गई थी.

कृष्ण की आंखों में आंसू थे. सुनीता की गूंजती आवाज दबाने के लिए उस ने मोबाइल फोन के ईयरफोन कानों में ठूंस लिए थे, ‘जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए… जब ये सोचा तो घबरा गए… आ गए, हम कहां आ गए…’

 

पहल: क्या शीला अपने मान-सम्मान की रक्षा कर पाई? – भाग 3

‘‘तेरे यार सब तो भाग गए.’’ पिंटू चुटकी बजाते हुए व्यंग्य से बोला, ‘‘तू कौन सा तीर मार लेगी, अयं?’’

‘‘किन्नरों को मामूली न समझियो,’’ शकीला ताली पीटती हुई अदा से खिलखिलाई, ‘‘हमारे 2 किन्नरों ने तो महाभारत का किस्सा ही बदल डाला था. एक थे शिखंडी महाराज, दूसरे बिरहनला (बृहन्नला).’’

ये नोंकझोंक चल ही रही थी कि तभी उस हिस्से में बूटपौलिश वाला एक लड़का हवा के झौंके की तरह आ पहुंचा. दसेक साल की उम्र. काला स्याह बदन. बाईं कलाई में पौलिश वाला बक्सा झुलाए, दाएं हाथ से ठोस ब्रश को बक्से पर ठकठकाता, ‘‘पौलिश साब.’’

‘‘तू कहां से आ टपका रे? चल फूट यहां से,’’ अतुल ने रिवौल्वर उस की ओर तान दिया. लड़का तनिक भी न घबराया. पूरा माजरा भांपते एक पल भी नहीं लगा उसे. खीखी करता खीसें निपोर बैठा, ‘‘समझा साब, कोई शूटिंग चल रहेला इधर. अपुन डिस्टप नहीं करेगा साब. थोड़ा शूटिंग देखने को मांगता. बिंदास…’’

‘‘इस को रहने दो बड़े भाई,’’ पिंटू ने मसका लगाया, ‘‘तुम लगते ही हीरो जैसे हो.’’

शकीला के रसीले बतरस और पौलिश वाले लड़के के आगमन से तीनों का ध्यान शीला की ओर से कुछ देर के लिए हट गया. शीला के भीतर एक बवंडर जन्म लेने लगा. कैसा हादसा होने जा रहा है यह? इन की नीयत गंदी है, यह तो स्पष्ट हो चुका है, पार्टी के नाम पर अगवा करने की कुत्सित योजना. उफ.

इस तरह की विषम परिस्थितियों में अकेली लड़की के लिए बचाव के क्या विकल्प हो सकते हैं भला? सहायता के लिए ‘बचाओ, बचाओ’ की गुहार लगाने पर सचमुच कोई दौड़ा चला आएगा? डब्बे में बैठे यात्रियों का पलायन तो देख ही रही है वह. फिर? इन निर्मम, नृशंस और संवेदनहीन युवकों के आगे हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने से भी कोई लाभ होने वाला नहीं. इन के लिए तो हर स्त्री सिर्फ मादा भर ही है. हर रिश्तेनाते से परे. सिर्फ मादा.

शीला सतर्क नजरों से पूरी स्थिति का जायजा लेती है. डब्बे में शकीला और पौलिश वाला लड़का ही रह गए थे. भावावेश में शकीला की ओर देखती है वह. तभी आंखों के आगे धुंध छाने लगती है, ‘अरे, बृहन्नला के भीतर से यह किस की आकृति फूट रही है? अर्जुन, हां, अर्जुन ही हैं जो कह रहे हैं, नारी सशक्तीकरण की सारी बातें पाखंड हैं री. पुरुषवादी समाज नारियों को कभी भी सशक्त नहीं होने देगा. सशक्त होना है तो नारियों को बिना किसी की उंगली थामे स्वयं ही पहल करनी होगी.’

शीला अजीब से रोमांच से सिहर उठती है. नजरें वहां से हट कर पौलिश वाले लड़के पर टिक जाती हैं. पौलिश वाले लड़के का चेहरा भी एक नई आकृति में ढलने लगता है, ‘बचपन में लौटा शम्बूक. होंठों पर आत्मविश्वास भरी निश्छल हंसी, ‘ब्राह्मणवादी, पुरुषवर्चस्ववादी व्यवस्था’ ने नारियों व दलितों को कभी भी सम्मान नहीं दिया. अपने सम्मान की रक्षा के लिए तुम्हारे पास एक ही विकल्प है, पहल. एक बार मजबूत पहल कर लो, पूरा रुख बदल जाएगा.’

शीला असाधारण रूप से शांत हो गई. भीतर का झंझावात थम गया. आसानी से तो हार नहीं मानने वाली वह. मन ही मन एक निर्णय लिया. तीनों युवक शकीला के किसी मादक चुटकुले पर होहो कर के हंस रहे थे कि अचानक जैसे वह पल ठहर गया हो. एकदम स्थिर. शीला ने दाहिनी हथेली को मजबूत मुट्ठी की शक्ल में बांधा और भीतर की सारी ताकत लगा कर मुट्ठी को पास खड़े यादव की दोनों जांघों के संधिस्थल पर दे मारा.

उसी ठहरे हुए स्थिर पल में शकीला के भीतर छिपे अर्जुन ने ढोलक को लंबे रूप में थामा और पूरी शक्ति लगा कर चमड़े के हिस्से वाले भाग से पिंटू के माथे पर इतनी जोर से प्रहार किया कि ढोलक चमड़े को फाड़ती उस की गरदन में फंस गई. और उसी ठहरे हुए स्थिर पल में पौलिश वाले लड़के के भीतर छिपे शंबूक ने दांतों पर दांत जमा कर हाथ के सख्त ब्रश को अतुल की कलाई पर फेंक मारा. इतना सटीक निशाना कि रिवौल्वर छिटक कर न जाने कहां बिला गया और ओहआह करता वह फर्श पर लुढ़क कर तड़पने लगा.

पलक झपकते आसपास के डब्बों से आए यात्रियों की खासी भीड़ जुट गई वहां और लोग तीनों पर लातघूंसे बरसाते हुए फनफना रहे थे, ‘‘हम लोगों के रहते एक मासूम कोमल लड़की से छेड़खानी करने का साहस कैसे हुआ रे?’’

प्यार की राह में : क्या पूरा हुआ अंशुला- सुनंदा का प्यार – भाग 3

मैं अपना वादा नहीं निभा पाया. मैं तुम से शादी नहीं कर सकता हूं. मैं अपने मातापिता का दिल दुखा कर तुम्हें खुशी नहीं दे पाऊंगा. ‘अगर मैं ने तुम से शादी की, तो मेरी मां अपनी जान दे देंगी. मैं अपनी मां की मौत की वजह नहीं बनना चाहता. तुम अपना ध्यान रखना. यूपीएससी की तैयारी मन लगा कर करना. मुझे उम्मीद है कि तुम एक अच्छी आईएएस साबित होगी. किसी काबिल लड़के से शादी कर के जिंदगी में आगे बढ़ जाना.’ खत पढ़ते हुए सुनंदा की आंखों से लगातार आंसू बहने लगे. आंसुओं से खत भी भीग गया. सुनंदा के खत पढ़ने के बाद वह औरत बोली,

‘‘अब रोना बंद करो और अंशुल को भुला कर अपनी जिंदगी में आगे बढ़ो.’’ इतना कह कर जब वह औरत मुड़ कर अपनी कार की तरफ जाने लगी, सुनंदा ने पीछे से आवाज लगाई, ‘‘शालिनी दीदी…’’ इतना सुन कर उस औरत के कदम थम गए और वह पीछे मुड़ी. वह कुछ कहती, इस से पहले सुनंदा बोली, ‘‘मैं आप को पहचान गई हूं दीदी. मैं ने जरूर आप को कभी नहीं देखा, लेकिन जिस तरह अंशुल के शब्दों से, बातों से आप मेरी आकृति पहचान गईं, ठीक वैसे ही मैं ने भी आप की छवि पा ली. ‘‘यहां से जाने से पहले बस इतना बता दीजिए कि अंशुल कैसा है और कहां है? मैं आप से वादा करती हूं कि मैं कभी भी उस से मिलने की कोशिश नहीं करूंगी.’’ सुनंदा के इतना कहते ही शालिनी की आंखें भर आईं और वे लंबी सांस लेते हुए बोलीं, ‘‘सुनंदा… सच तो यह है कि अंशुल तुम से बेइंतहा प्यार करता था और तुम से ही शादी करना चाहता था, लेकिन जब उस ने मम्मीपापा को तुम्हारे बारे में बताया, तो वे दोनों ही इस शादी के लिए राजी नहीं हुए.

‘‘मम्मी ने अंशुल को धमकी दी कि अगर वह तुम से शादी करेगा, तो वे अपनी जान दे देंगी. हार कर अंशुल ने मम्मी से वादा किया कि न तो वह तुम से बात करेगा और न शादी, लेकिन बात यहां पर खत्म नहीं हुई. अंशुल के वादा करते ही मम्मीपापा ने उस से बिना पूछे उस की शादी तय कर दी. अंशुल इस शादी के लिए तैयार नहीं था, लेकिन मम्मी ने जिद पकड़ ली और अंशुल शादी के लिए मान गया. ‘‘शादी के ठीक एक रात पहले अंशुल ने मुझे यह चिट्ठी दी और कहा कि मैं यह चिट्ठी तुम तक पहुंचा दूं.

मुझे नहीं पता था कि उस की शादी का जोड़ा उस का कफन बन जाएगा और शादी का जश्न मातम में बदल जाएगा. ‘‘अंशुल ने इस बेरहम दुनिया को अलविदा कहने के लिए अपनी ही शादी का दिन चुना. बरात निकलने से पहले अंशुल ने जहर खा लिया और लाख कोशिशों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका.’’ इतना कह कर शालिनी तेज कदमों से चल कर कार में जा बैठी और वहां से चली गई. सुनंदा जिंदा लाश सी वहीं खड़ी रही. ‘‘मैडमजी, आप की अदरकइलायची वाली चाय….’’ औफिस बौय के ऐसा कहने पर सुनंदा की तंद्रा भंग हुई. आज पूरे 7 साल के बाद सुनंदा फिर उसी शहर में थी, जहां से उस ने अपनी पढ़ाई पूरी की थी और आज वह एसपी बन गई है. अंशुल आज भी सुनंदा के दिल में उस की धड़कन बन कर जिंदा है और वह अपनी जिंदगी के रास्ते पर बिना किसी हमराही के अकेले चल रही है.

एयरपोर्ट पर स्पॉट हुईं ऋतिक रोशन की गर्लफ्रेंड सबा अजाद, ट्रोलर्स ने कहा ‘बुड्ढी’

ऋतिक रोशन (Hrithik Roshan) इन दिनों अपनी आने फिल्म ‘फाइटर’ को लेकर खूब सुर्खियां बटोर रहे हैं. इसी बीच वे अपनी गर्लफ्रेंड (Girlfriend) सबा अजाद ( Saba Azad) के साथ छुट्टियां मनाने निकल पड़े हैं. जहां दोनों एक साथ एयरपोर्ट पर स्पॉट हुए. दोनों की पैपराजी ने एक साथ कई फोटोज क्लिक की है, लेकिन यहां सबा अजाद को ट्रोलर्स (Troller) का निशाना बनना पड़ा. क्लिक की हुई तस्वीरों को देख लोग सबा अजाद को ट्रोल करने लगे हैं.

 

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आपको बता दें कि नए साल पर ऋतिक रोशन और उनकी गर्लफ्रेंड वेकेशन पर निकल चुके हैं. ये कपल एक साथ एयरपोर्ट पर नजर आए. यहां की दोनों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. इन तस्वीरों में ऋतिक रोशन ने जींस और टी-शर्ट के साथ जैकेट पहन हुआ था तो वहीं, सबा आजाद ने ट्राउजर और टी-शर्ट के साथ जैकेट पहना था. दोनों काफी कूल लुक में नजर आ रहे थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता है कि कोई सेलिब्रिटी ट्रोलर्स के निशाने पर ना आएं.

दरअसल, एयरपोर्ट पर क्लिक की फोटोज में सबा अजाद को लोग बुढ्ढी कह कर ट्रोल कर रहे हैं. उनकी तस्वीरों को देख फैंस तरह-तरह के कमेंट करने लगे हैं. अक्सर ही सोशल मीडिया पर ऋतिक रोशन और सबा आजाद की उम्र में अंतर को लेकर निशाना बनाया जाता है. लोग उन्हें बाप-बेटी की जोड़ी तक कह देते हैं.

 

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कपल हमेशा ही हर पार्टी में एक साथ नजर आते हैं. दोनों की उम्र में 11 साल का एज गैप है और दोनों काफी लंबे समय से एक दूसरे को डेट कर रहे हैं. बता दें, इससे पहले ऋतिक रोशन ने सुजैन खान के साथ शादी की थी और दो बेटे हैं. हालांकि, ऋतिक रोशन और सुजैन खान का तलाक हो गया था.

शहीद – देशभक्ति का जनून – भाग 2

मैं वापस बैरक के भीतर घुसा तो देखा कि घायल शाहदीप का पूरा शरीर कांप रहा था.

मैं उस के करीब पहुंचा ही था कि उस का शरीर लहराते हुए मेरी ओर गिर पड़ा. मैं ने उसे अपनी बांहों में संभाल कर सामने बने चबूतरे पर लिटा दिया. वह लंबीलंबी सांसें लेने लगा.

उस की उखड़ी हुई सांसें कुछ नियंत्रित हुईं तो मैं ने पूछा, ‘‘बताओ, क्या कहना चाहते हो?’’

‘‘सिर्फ इतना कि मैं ने आप का कर्ज चुका दिया है.’’

‘‘कैसा कर्ज? मैं कुछ समझा नहीं.’’

‘‘अगर मैं चाहता तो आप मुझे मार भी डालते तो भी मेरे यहां आने का राज कभी मुझ से न उगलवा पाते. मैं यह भी जानता था कि देशभक्ति के जनून में आप मुझे मार डालेंगे किंतु यदि ऐसा हो जाता तो फिर जिंदगी भर आप अपने को माफ नहीं कर पाते.’’

‘‘फौजी तो अपने दुश्मनों को मारते ही रहते हैं, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है,’’ मैं ने अचकचाते हुए कहा.

‘‘लेकिन एक बाप को फर्क पड़ता है. अपने बेटे की हत्या करने के बाद वह भला चैन से कैसे जी सकता है?’’ शाहदीप के होंठों पर दर्द भरी मुसकान तैर गई.

‘‘कैसा बाप और कैसा बेटा. तुम कहना क्या चाहते हो?’’ मेरा स्वर कड़ा हो गया.

शाहदीप ने अपनी बड़ीबड़ी आंखें मेरे चेहरे पर टिका दीं और बोला, ‘‘ब्रिगेडियर दीपक कुमार सिंह, यही लिखा है न आप की नेम प्लेट पर? सचसच बताइए कि आप ने मुझे पहचाना या नहीं?’’

मेरा सर्वांग कांप उठा. मेरी ही तरह मेरे खून ने भी अपने खून को पहचान लिया था. हम बापबेटों ने जिंदगी में पहली बार एकदूसरे को देखा था किंतु रिश्ते बदल गए थे. हम दुश्मनों की भांति एकदूसरे के सामने खड़े थे. मेरे अंदर भावनाओं का समुद्र उमड़ने लगा था. मैं बहुत कुछ कहना चाहता था किंतु जड़ हो कर रह गया.

‘‘डैडी, आप को पुत्रहत्या के दोष से बचा कर मैं पुत्रधर्म के ऋण से उऋण हो चुका हूं. आज के बाद जब भी हमारी मुलाकात होगी आप अपने सामने पाकिस्तानी सेना के जांबाज और वफादार अफसर को पाएंगे, जो कट जाएगा लेकिन झुकेगा नहीं,’’ शाहदीप ने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा.

‘‘इस का मतलब तुम ने जानबूझ कर अपना राज खोला है,’’ बहुत मुश्किलों से मेरे मुंह से स्वर फूटा.

‘‘मैं कायर नहीं हूं. मैं आप की सौगंध खा कर वादा करता हूं कि जिस देश का नमक खाया है उस के साथ नमकहरामी नहीं करूंगा,’’ शाहदीप की आंखें आत्मविश्वास से जगमगा उठीं.

शाहदीप के स्वर मेरे कानों में पिघले शीशे की भांति दहक उठे. मैं एक फौजी था अत: अपने बेटे को अपनी फौज के साथ गद्दारी करने के लिए नहीं कह सकता था किंतु जो वह कह रहा था उस की भी इजाजत कभी नहीं दे सकता था. अत: उसे समझाते हुए बोला, ‘‘बेटा, तुम इस समय हिंदुस्तानी फौज की हिरासत में हो इसलिए कोई दुस्साहस करने की कोशिश मत करना. ऐसा करना तुम्हारे लिए खतरनाक हो सकता है.’’

‘‘दुस्साहस तो फौजी का सब से बड़ा हथियार होता है, उसे मैं कैसे छोड़ सकता हूं. आप अपना फर्ज पूरा कीजिएगा मैं अपना फर्ज पूरा करूंगा,’’ शाहदीप निर्णायक स्वर में बोला.

मैं दर्द भरे स्वर में बोला, ‘‘बेटा, तुम्हारे पास समय बहुत कम है. मेहरबानी कर के तुम इतना बता दो कि तुम्हारी मां इस समय कहां है और यहां आने से पहले क्या तुम मेरे बारे में जानते थे?’’

‘‘साल भर पहले मां का इंतकाल हो गया. वह बताया करती थीं कि मेरे सारे पूर्वज सेना में रहे हैं. मैं भी उन की तरह बहादुर बनना चाहता था इसलिए फौज में भरती हो गया था. अपने अंतिम दिनों में मां ने आप का नाम भी बता दिया था. मैं जानता था कि आप भारतीय फौज में हैं किंतु यह नहीं जानता था कि आप से इस तरह मुलाकात होगी,’’ बोलतेबोलते पहली बार शाहदीप का स्वर भीग उठा था.

मैं भी अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पा रहा था. अत: शाहदीप को अपना खयाल रखने के लिए कह कर तेजी से वहां से चला आया.

‘‘सर, वह क्या कह रहा था?’’ बाहर निकलते ही कैप्टन बोस ने पूछा.

‘‘कह रहा था कि मैं ने आप की मदद की है इसलिए मेरी मदद कीजिए, और मुझे यहां से निकल जाने दीजिए,’’ मेरे मुंह से अनजाने में ही निकल गया.

मैं चुपचाप अपने कक्ष में आ गया. बाहर खड़े संतरी से मैं ने कह दिया था कि किसी को भी भीतर न आने दिया जाए. इस समय मैं दुनिया से दूर अकेले में अपनी यादों के साथ अपना दर्द बांटना चाहता था.

कुरसी पर बैठ उस की पुश्त से पीठ टिकाए आंखें बंद कीं तो अतीत की कुछ धुंधली तसवीर दिखाई पड़ने लगी.

उस शाम थेम्स नदी के किनारे मैं अकेला टहल रहा था. अचानक एक अंगरेज नवयुवक दौड़ता हुआ आया और मुझ से टकरा गया. इस से पहले कि मैं कुछ कह पाता उस ने अत्यंत शालीनता से मुझ से माफी मांगी और आगे बढ़ गया. अचानक मेरी छठी इंद्री जाग उठी. मैं ने अपनी जेब पर हाथ मारा तो मेरा पर्स गायब था.

‘पकड़ोपकड़ो, वह बदमाश मेरा पर्स लिए जा रहा है,’ चिल्लाते हुए मैं उस के पीछे दौड़ा.

मेरी आवाज सुन उस ने अपनी गति कुछ और तेज कर दी. तभी सामने से आ रही एक लड़की ने अपना पैर उस के पैरों में फंसा दिया. वह अंगरेज मुंह के बल गिर पड़ा. मेरे लिए इतना काफी था. पलक झपकते ही मैं ने उसे दबोच कर अपना पर्स छीन लिया. पर्स में 500 पाउंड के अलावा कुछ जरूरी कागजात भी थे. पर्स खोल कर मैं उन्हें देखने लगा. इस बीच मौका पा कर वह बदमाश भाग लिया. मैं उसे पकड़ने के लिए दोबारा उस के पीछे दौड़ा.

‘छोड़ो, जाने दो उसे,’ उस लड़की ने लगभग चिल्लाते हुए कहा था.

‘महाभारत’ फेम एक्टर बनें एक बार फिर पिता, पत्नी रुचिका कपूर ने दिखाई नन्ही परी की झलक

नए साल में टीवी इंडस्ट्री (Tv Industry) के लिए एक खुश खबरी सामने आई है. जी हां, टीवी एक्टर (Tv Actor) अर्जुन यानी एक्टर शहीर शेख (Shaheer Sheikh) के घर गुड़ न्यूज (Good News) आई है. जिसने फैंस का दिन बना दिया है. शहीर शेख और रुचिका कपूर (Ruchikaa Kapoor) ने नए साल के मौके पर दूसरी बार माता-पिता बनने की खबर दी है.

 

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आपको बता दें कि शहीर शेख और रुचिका दूसरे बार पेरेंट्स बन गए हैं. दोनों ने अपने घर में एक नन्हीं परी का स्वागत किया है. बता दें, कि शहीर शेख और रुचिका पहली बार साल 2021 में माता-पिता बने थे. तब भी एक्टर ने एक प्यारी सी बेटी का अपनी लाइफ में वेलकम किया था.


रुचिका ने साल 2024 के शुरू होने से चंद घंटे पहले अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक खूबसूरत फोटो शेयर की, जिसमें उनकी दोनों बेटियां दिखीं. इस फोटो ने पहले तो फैंस को कंफ्यूज कर दिया, लेकिन रुचिका कपूर के कैप्शन ने सबको खुश कर दिया. इस फोटो में रुचिका और शहीर की दोनों बेटियां एक साथ नजर आ रही हैं, लेकिन दोनों का चेहरा कैमरे में नजर नहीं आ रहा. कपल की बेटियां बेड पर लेटी हुई हैं और उनका चेहरा एक दूसरे से टच है. दोनों ही एक दूसरे पर प्यार लुटाती हुई दिख रही हैं.

फोटो को शेयर करते हुए रुचिका ने लिखा, ‘बहन होने की अगली सबसे अच्छी बात यह है कि वास्तव में कुछ भी नहीं है. कुछ भी तुलना नहीं की जा सकती है. राम-लक्ष्मण की जोड़ी. अनाया और कुदरत.’ इस कैप्शन के जरिए रुचिका ने बता दिया है कि उन्होंने अपनी दूसरी बेटी का नाम कुदरत रखा है, जो काफी खूबसूरत है. वहीं, अब कपल को टीवी इंडस्ट्री के सेलेब्स समेत फैंस से खूब सारी बधाई मिल रही है.


बताते चले कि शहीर शेख और रुचिका अपनी पर्सनल लाइफ को काफी सीक्रेट रखते हैं. दोनों ने लोगों की नजरों से बचते हुए 19 अक्टूबर 2020 को गुपचुप शादी की थी. शहीर ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट शेयर कर अपनी शादी की न्यूज दी थी. कपल ने अपनी बेटियों को भी सोशल मीडिया से दूर रखा है.

Bigg Boss 17: अंकिता ने सुशांत की आखिरी फोटो का किया जिक्र, कहीं ये इमोशनल बात

रिएलटी शो बिग बॉस 17 (Bigg Boss 17)  हर बार की तरह धमाकेदार शो साबित हो रहा है शो में हर दिन कुछ नया बवाल होता नजर आता है. वही शो में अंकिता लोखंडे (Ankita Lokhande) मीडिया की सुर्खियों में नजर आ रही है. इस शो में वे अपनी लाइफ से जुड़े कई राज खोलती हुई नजर आ रही है. इतना ही नहीं, कई बार वो अपने एक्स बॉयफ्रेंड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) के बारें में भी बात करती है. वही, अब उन्होंने सुशांत के आखिरी पलों को याद किया है और बताया है कि उनकी हालत कैसी हो गई थी.


आपको बता दें कि बिग बॉस 17 के लेटेस्ट एपिसोड में अंकिता लोखंडे  मुनव्वर फारूकी के साथ सुशांत सिंह राजपूत को याद करते दिखीं. इस दौरान अंकिता ने मुनव्वर को बताया कि जब मैंने सुशांत के निधन के बाद उसकी आखिरी तस्वीर देखी तो सब कुछ खत्म हो गया. उसने बहुत सारी फिल्में की और वो भी खत्म हो गईं. अंकिता ने बताया कि वह तस्वीर को वायरल होते हुए देखकर नाराज हो गई थीं. अंकिता ने खुलासा किया, ‘मैं सुन्न हो गई थीं. मेरे हाथ पांव ठंडे पड़ रहे थे. ऐसा लग रहा था कि मानो वह सो रहा हो. मैं बस उस तस्वीर को देखती रह गई और सोचने लगी कि उसके दिमाग में कितना कुछ था. मैं उसे बहुत अच्छे से जानती थी. उसके दिमाग में बहुत कुछ रहा होगा लेकिन सब गायब हो गया. तब तुम कुछ भी नहीं हो, तुम सिर्फ एक शरीर हो.’

इसके आगे अंकिता ने सुशांत के परिवार की तारीफ करते हुए कहती है कि, ‘उसका परिवार बिहार में था. उनकी एक बहन अमेरिका में थी, दूसरी चंडीगढ़ में थी, और उनके पिता पटना और दिल्ली में थे. बहुत बहुत पढ़ा-लिखा परिवार. बहुत बुद्धिमान लोग है.’ अंकिता ने आखिर में यह भी बताया कि सुशांत बहुत इंटेलिजेंट था. वह आईआईटी का स्टूडेंट रहा था.


इससे पहले भी अंकिता लोखंडे ने शो पर उन दिनों को याद किया था, जब वह सुशांत के साथ रिलेशनशिप में थी और बताया था कि जब वह दूसरी एक्ट्रेसस के साथ इंटीमेट सीन किया करते थे तो उन्हे काफी बुरा लगता था. अंकिता ने बताया था कि पीके और शुद्ध देसी रोमांस में सुशांत के रोमांटिक सीन्स देखने के बाद वह घर जाकर काफी रोई थीं. अंकिता ने खुलासा किया था कि इस दौरान सुशांत ने उनसे माफी मांगी थी.

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