माफिया से माननीय बनने का खूनी सफर: भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- सुनील वर्मा

सन 2002 में बृजेश सिंह और मुख्तार अंसारी के बीच कोयले की ठेकेदारी को ले कर भयानक गोलीबारी और लड़ाई हुई, जिस में मुख्तार गैंग के 3 लोग मारे गए और खुद बृजेश सिंह भी जख्मी हो गया. इस लड़ाई के बाद बृजेश सिंह के मरने की अफवाह फैल गई. इस खबर को लोगों ने सच भी मान लिया, क्योंकि महीनों तक किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई और ब्रजेश को किसी ने नहीं देखा.

बृजेश के मरने की खबर ने मुख्तार गैंग को और ज्यादा ताकतवर बना दिया और फिर से चौतरफा उस का वर्चस्व हो गया.

2002 में अचानक कई महीनों बाद बृजेश तब सामने आया जब उत्तर प्रदेश में चले रहे चुनाव में गाजीपुर से बीजेपी के उम्मीदवार कृष्णानंद राय मुख्तार के भाई अफजाल अंसारी के खिलाफ जबरदस्त तरीके से ताल ठोंक रहे थे.

बृजेश को मिला राजनैतिक संरक्षण

बृजेश सिंह एकाएक सामने आया और कृष्णानंद राय को समर्थन दे कर लोगों से उन के पक्ष में मतदान की अपील की. वास्तविकता तो यह थी कि बृजेश को राजनीतिक संरक्षण की जरूरत थी. कृष्णानंद राय यूपी से ले कर केंद्र की सियासत तक में जबरदस्त रसूख रखने वाले नेता थे.

इसी राजनीतिक संरक्षण के लिए बृजेश ने कृष्णानंद राय से हाथ मिला कर उन्हें चुनाव में अपना समर्थन दिया था. फलस्वरूप बृजेश की अपील पर इलाके की ठाकुर लौबी राय के पक्ष में खड़ी हो गई.

इस चुनाव में कृष्णानंद राय ने मुख्तार के भाई को हरा दिया. इस के बाद तो हालात ये हो गए कि अब गाजीपुर-मऊ इलाके में पूरी राजनीति हिंदू-मुसलिम के बीच बंट गई. जिस कारण इलाके में सांप्रदायिक लड़ाइयां होने लगीं. ऐसे ही एक मामले में मुख्तार गिरफ्तार हो गया.

मुख्तार अंसारी बृजेश की चोट से अकसर लगातार कमजोर हो रहा था. इसीलिए बृजेश का काला कारोबार संभालने वाले कई लोग मुख्तार गैंग के निशाने पर आ गए. बृजेश का राइट हैंड कहे जाने वाला अजय खलनायक भी उन में से एक था. जिस पर मुख्तार अंसारी ने जानलेवा हमला करा दिया.

मुख्तार अंसारी किसी भी हाल में बृजेश को कमजोर करना चाहता था, इसीलिए उस ने बृजेश सिंह के चचेरे भाई सतीश सिंह की दिनदहाड़े हत्या करवा दी. सतीश की हत्या से पूरा पूर्वांचल दहल गया और इलाके के लोगों में खौफ पैदा हो गया.

सतीश की हत्या को उस वक्त अंजाम दिया गया, जब वह वाराणसी के चौबेपुर में एक दुकान पर चाय पी रहा था. उसी वक्त बाइक पर सवार हो कर पहुंचे 4 लोगों ने उस पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं. जिस की वजह से उस की मौके पर ही मौत हो गई थी.

मुख्तार के साथ चल रही गैंगवार के बीच अपराध जगत में माफिया डौन बन चुका बृजेश सिंह धीरेधीरे अपना कारोबार भी बढ़ाता जा रहा था. पूर्वांचल के साथ उस ने पश्चिम बंगाल, मुंबई, बिहार, और उड़ीसा में अपना ठेकेदारी व शराब कारोबार का जाल फैला दिया था. हालांकि बृजेश तब तक इतना बड़ा अपराधी बन चुका था कि वह अधिकांशत: भूमिगत ही रहता था.

इसी दौर में एक गैंग और तेजी से उभर रहा था, जो त्रिभुवन सिंह के पिता के हत्यारोपी मकनू सिंह और साधू सिंह का गैंग था. बृजेश सिंह के साथी त्रिभुवन सिंह का भाई हैडकांस्टेबल राजेंद्र सिंह वाराणसी पुलिस लाइन में तैनात था. अक्तूबर, 1988 में साधू सिंह ने कांस्टेबल राजेंद्र को मौत की नींद सुला दिया. जिस के बाद हत्या के इस मामले में कैंट थाने पर साधू सिंह के अलावा मुख्तार अंसारी और गाजीपुर निवासी भीम सिंह को भी नामजद किया गया.

त्रिभुवन के भाई की हत्या का बदला लेने के लिए बृजेश सिंह और त्रिभुवन सिंह ने पुलिस वाला बन कर गाजीपुर के एक अस्पताल में इलाज करा रहे साधू सिंह को गोलियों से भून डाला. इसी कारण बृजेश का गिरोह उस वक्त इस हत्याकांड की वजह से पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया.

अगलेे भाग में पढ़ें- यूपी सरकार ने रखा ईनाम

माफिया से माननीय बनने का खूनी सफर: भाग 5

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- सुनील वर्मा

बृजेश सिंह का राजनीतिक रसूख और धमक ही कहेंगे कि पिछले 12 साल में उस पर लगे सारे मुकदमे तेजी से हो रही सुनवाई के बाद हटते जा रहे हैं. ज्यादातर मामलों में उस के खिलाफ गवाही देने वाले मुकर गए या कुछ में पुलिस की कमजोर पैरवी और सबूत की कमजोरी के कारण एक के बाद एक मामले तेजी से खत्म होते जा रहे हैं.

चंद छोटे मामलों को छोड़ दें तो उस के खिलाफ चल रहे अधिकांश गंभीर और बड़े मामले अब खत्म हो चुके हैं. कुछ छोटे मामलों की सुनवाई भी अपने अंतिम चरण में है.

लेकिन इस के बावजूद बृजेश सिंह अभी जेल से बाहर नहीं आना चाहता क्योंकि मुख्तार गैंग से दुश्मनी के कारण जान का खतरा अभी भी बरकरार है.

बृजेश सिंह और मुख्तार अंसारी भले ही सलाखों के पीछे हों, लेकिन दोनों की दुश्मनी अभी खत्म नहीं हुई है. दोनों ही अपने भविष्य के लिए एकदूसरे का खात्मा चाहते हैं.

सन 2015 में बृजेश सिंह की एमएलसी पत्नी अन्नपूर्णा सिंह और भतीजे विधायक सुशील सिंह ने आरोप लगाया था कि मुख्तार अंसारी ने सेंट्रल जेल में लंबू शर्मा नाम के व्यक्ति को भेज कर बृजेश सिंह की जेल में ही हत्या कराने की साजिश रची थी.

इस के 3 दिन पहले भी बादशाह नाम के व्यक्ति को बनारस सेंट्रल जेल में बृजेश सिंह से मिलने के लिए भेजा गया था.  हालांकि इस मामले में बृजेश सिंह के परिजनों की शिकायत के बावजूद पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया था.

बृजेश सिंह के बारे में कहा जाता है कि सियासत में एंट्री के लिए ही उस ने खुद को दिल्ली पुलिस के हाथों गिरफ्तार करवाया था. एक अपराधी भले ही कितना भी ताकतवर और रसूख वाला क्यों न हो, लेकिन अंतत: उस का अंत बुरा ही होता है. इसीलिए बृजेश सिंह ने बहुत पहले ही माफिया से माननीय बन कर अपने जीवन को नई दिशा देने की योजना पर काम शुरू कर दिया था.

माफिया से बना माननीय

हालांकि सियासत बृजेश सिंह के खून में रचीबसी थी. स्वर्गवासी पिता खुद इलाके में राजनीति करते थे. भले ही बृजेश का आपराधिक इतिहास उस के पूर्वांचल के बाहुबली होने की छवि की पुष्टि करता है, लेकिन इस के साथ अगर राजनीति में उस के दखल की ओर देखें तो वाराणसी-चंदौली में उस के परिवार का पुराना राजनीतिक प्रभाव साफ नजर आता है.

वाराणसी की एमएलसी सीट पर बृजेश और उस का परिवार पिछली 4 बार से जीतता आ रहा है. पहले 2 बार बृजेश के बड़े भाई उदयनाथ सिंह इस क्षेत्र से एमएलसी रहे. बृजेश के बड़े भाई उदयनाथ सिंह उर्फ चुलबुल का 2018 में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था. चुलबुल सिंह को पंचायत चुनावों का चाणक्य माना जाता था.

पूर्वांचल की राजनीति के जानकार मानते हैं कि चुलबुल सिंह ही वह शख्स थे, जिन्होंने पूरे परिवार का राजनीतिक रसूख कायम किया और पूर्वांचल के तमाम बाहुबली क्षत्रिय नेता इस परिवार के संपर्क में आए. उन्हीं की राजनीतिक धमक के कारण सियासत से बृजेश सिंह को जीवनदान मिलता रहा.

चुलबुल सिंह के लंबे समय तक बीमार रहने के कारण बाद में बृजेश की पत्नी अन्नपूर्णा सिंह और उस के बाद मार्च 2016 में खुद बृजेश सिंह वाराणसी से एमएलसी बन कर राज्य की विधानसभा में दाखिल हो गया.

निर्दलीय चुनाव लड़ने के बावजूद उस ने रिकौर्ड मतों से जीत हासिल की थी. जिस के बाद माफिया से माननीय बनने का उस का सपना साकार हो चुका है. बृजेश सिंह ने एमएलसी बनने के बाद जब विधानसभा पहुंच कर एमएलसी पद की शपथ ली थी तो राजा भैया, धनंजय सिंह जैसे यूपी के कई क्षत्रिय बाहुबली नेता उस की वेलकम पार्टी में मौजूद थे.

सन 2017 में बृजेश सिंह भारतीय समाज पार्टी से सैयदराजा विधानसभा सीट (चंदौली) से चुनावी समर में उतरा, लेकिन उसे हार का सामना करना पड़ा था.

फिलहाल जेल में बंद बृजेश के परिवार के औपचारिक राजनीतिक चेहरे के तौर पर पहचाने जाने वाले उस के भतीजे सुशील सिंह लगातार तीसरी बार चंदौली से विधायक चुने जा चुके हैं. कभी कृष्णानंद राय से ले कर राजनाथ सिंह जैसे भाजपा नेताओं के करीबी माने जाने वाले बृजेश के भतीजे सुशील भी अब औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो चुके हैं.

लेकिन राजनीति से इतर जो बात बृजेश को दूसरे बाहुबलियों से अलग करती है वह है अपराध के साथसाथ लगभग फिल्मी तरीके से फैला उस के व्यापार का सिंडिकेट.

पूर्वांचल के साथसाथ बिहार, झारखंड और मुंबई तक फैले बृजेश के व्यापारिक कनेक्शन उसे आर्थिक तौर पर पूर्वांचल के सब से मजबूत माफिया नेताओं में से एक बनाते हैं.

बृजेश ने अपना व्यापार लोहे के स्क्रैप से शुरू किया था. उस के बाद उस ने पहले कोयले के धंधे में पांव जमाया और फिर आजमगढ़ से शराब का व्यापार शुरू किया. बलिया, भदोही, बनारस से ले कर झारखंड, छत्तीसगढ़ तक अपने धंधे को फैलाया. इस के बाद वह जमीन और रियल एस्टेट में आया और अब उस का रेत के खनन का व्यापार भी चल रहा है.

अकसर मीडिया में ऐसी खबरें आती रहती हैं कि बृजेश सिंह वाराणसी सेंट्रल जेल में मिलने के लिए आने वाले मुलाकातियों से मिलने के लिए दरबार लगाता है.

पूर्वांचल के लोगों में इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में बृजेश सिंह अपने दामन पर लगे अपराध के दागों से मुक्ति पा कर सांसद बनने और लोकसभा में जाने की लालसा पाले हुए है. क्योंकि ऐसा होगा तभी बृजेश सिंह का समूचे पूर्वांचल पर कब्जा और अपने कारोबार को बढ़ाने का सपना साकार होगा.

माफिया से माननीय बनने का खूनी सफर: भाग 4

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- सुनील वर्मा

लेकिन बृजेश सिंह ने जब मुंबई के जेजे अस्पताल में एक बड़ा गोलीकांड किया तो वह पूर्वाचंल के सब से खतरनाक माफिया डौन के रूप में स्थापित हो गया.

दरअसल, सितंबर 1992 की एक रात 20 से ज्यादा लोग डाक्टर के लिबास में अचानक बंबई (मुंबई) के जेजे अस्पताल के वार्ड नंबर 18 में घुस आए और बिस्तर पर लेटे शैलेश हलदरकर को गोलियों से छलनी कर दिया. हलदरकर बंबई के अरुण गवली गैंग का सदस्य था और उस की हत्या दाऊद इब्राहीम के रिश्तेदार इस्माइल पारकर की हत्या का बदला लेने के लिए उसी के इशारे पर की गई थी.

इस घटना में वार्ड की पहरेदारी कर रहे मुंबई पुलिस के 2 हवलदार भी मारे गए थे. जेजे अस्पताल शूटआउट में पहली बार एके 47 का इस्तेमाल कर 500 से ज्यादा गोलियां चलाई गई थीं.

यह सवाल जेहन में उठना लाजिमी है कि पूर्वांचल का एक डौन आखिर मुंबई कैसे पहुंचा और उस की दोस्ती आज एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी के रूप में कुख्यात दाऊद इब्राहीम से कैसे हो गई.

दाऊद से हुई दोस्ती

हुआ यूं कि 90 के दशक में जब बृजेश सिंह मुख्तार अंसारी के गैंग पर हमले के बाद छिपता फिर रहा था तो वह पुलिस और मुख्तार के गैंग से बचने के लिए मुंबई चला गया. मुंबई में उस की दाऊद के करीबी सुभाष ठाकुर से मुलाकात हुई. सुभाष के माध्यम से वह दाऊद से मिला. दाऊद के जीजा इब्राहिम कासकर की हत्या हो चुकी थी. दाऊद उस का बदला लेने के लिए कसमसा रहा था. उस ने सुभाष ठाकुर को इस की सुपारी दे दी.

इसी काम के लिए बृजेश का गैंग सुभाष ठाकुर व उस के साथियों के साथ 12 फरवरी, 1992 को डाक्टर बन कर जेजे अस्पताल पहुंचा, जहां डाक्टर बन कर उन्होंने पुलिस पहरे के बीच गवली गैंग के शैलेश हलदरकर समेत वहां तैनात पुलिसकर्मियों को मार दिया.

बृजेश की इस शातिराना चाल को देख कर दाऊद बृजेश के दिमाग का लोहा मान गया. इस के बाद दोनों बेहद करीब आ गए.

लेकिन 1993 में हुए मुंबई बम ब्लास्ट के बाद बृजेश के दाऊद से मतभेद हो गए. बृजेश सिंह मुंबई को दहलाने की दाऊद की योजना से पूरी तरह अनजान था. इस ब्लास्ट में हजारों बेगुनाह मारे गए और सैकड़ों लोग घायल हुए.

इस वारदात से बृजेश सिंह को गहरा आघात लगा. दाऊद के इस कदम के बाद दोनों के बीच एक दीवार खड़ी हो गई. माना जाता है कि इसके बाद दोनों एकदूसरे के दुश्मन बन गए.

हालांकि मुंबई ब्लास्ट के पहले ही दाऊद ने देश छोड़ दिया था, लेकिन बृजेश दाऊद को मारने का प्लान बनाने लगा. जिस के लिए उस ने कई बार भेष बदल कर दाऊद तक पहुंचने की कोशिश भी की, लेकिन अपने मनसूबे में सफल नहीं हो पाया.

इस घटना के बाद बृजेश को ‘देशभक्त डौन’, ‘हिंदू डौन’ और पूरब का रौबिनहुड के नाम से जाना जाने लगा.

बहरहाल जेजे हौस्पिटल शूटआउट में कई लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन बृजेश फरार हो गया. अलबत्ता उस पर टाडा के तहत मुकदमा चला और सितंबर 2008 में सबूतों की कमी के कारण छूट गया. लेकिन इस मामले ने बृजेश को पूर्वांचल के एक गैंगस्टर से पूरे देश में एक बड़े डौन के तौर पर स्थापित कर दिया.

बृजेश सिंह पर अब तक चल रहे बड़े मुकदमों में 2001 का गाजीपुर का उसरी चट्टी कांड भी गिना जाता है. इस मामले में बृजेश और मुख्तार की सीधी गैंगवार में 2 लोगों की हत्या हुई थी, जिस में मुख्तार अंसारी घायल हो गया था. घटना के बाद बृजेश के खिलाफ मुकदमा लिखवाते हुए मुख्तार ने उस की गाडि़यों के काफिले पर अचानक हमला करने, उस के गनर की हत्या करने का आरोप लगाया था. इस घटना के बाद बृजेश काफी साल तक फरार रहा.

इसी बीच 2003 में बृजेश सिंह का नाम बिहार के कोल माफिया सूर्यदेव सिंह के बेटे राजीव रंजन सिंह के अपहरण और हत्याकांड में बतौर मास्टरमाइंड सामने आया.

बृजेश सिंह एक के बाद एक जघन्य हत्याकांड और रंगदारी वसूलने के कारण इतना कुख्यात हो चुका था कि कई राज्यों की पुलिस उस के पीछे पड़ चुकी थी. हालांकि इस बीच बृजेश भेष बदल कर इस राज्य से उस राज्य में छिप कर रहता रहा और वहीं से अपने गिरोह के संपर्क में रह कर अपने काले धंधों को संचालित करता रहा.

कई बार जब लंबे समय तक उस की गतिविधियां सुनाई नहीं पड़तीं तो यह भी अफवाह उड़ती कि उस की मौत हो चुकी है. लेकिन जल्द ही उस के अगले कारनामे से उन अफवाहों पर धूल पड़ जाती थी.

यूपी सरकार ने रखा ईनाम

सूर्यदेव सिंह के बेटे के अपहरण व हत्या के मामले में फरारी के बाद बृजेश लंबे समय तक उड़ीसा के भुवनेश्वर में अरुण कुमार बन कर रहा. बृजेश सिंह के आपराधिक इतिहास को देखते हुए तत्कालीन यूपी सरकार ने उस की गिरफ्तारी या सुराग बताने वाले के लिए 5 लाख रुपए का ईनाम घोषित कर दिया था.

दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल भी लंबे समय से उस की गिरफ्तारी के प्रयास में लगी थी. स्पैशल सेल को सन 2008 में बृजेश के भेष बदल कर भुवनेश्वर में छिपे होने की जानकारी मिल गई. यहीं से स्पैशल सेल ने उसे गिरफ्तार किया. जिस के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस बृजेश सिंह को उस के खिलाफ दर्ज मामलों में सुनवाई के लिए यूपी ले गई

जहां से अलगअलग अदालतों में उस की पेशी होती रही.

दिलचस्प बात यह है कि बृजेश की गिरफ्तारी के एक साल बाद सन 2009 में उस के गिरोह की कमान संभालने वाले त्रिभुवन सिंह ने भी एसटीएफ के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. उस के ऊपर भी 5 लाख का ईनाम था.

वैसे इस बात की हमेशा चर्चा रही कि बृजेश का राजनीतिक रसूख इतना बढ़ चुका था कि उस के भीतर अपराध की राह छोड़ कर राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा जोर मारने लगी थी. इसी कारण दिल्ली पुलिस के जरिए उस की गिरफ्तारी को प्रायोजित कहा जाने लगा.

कहा जाता है कि बडे़ से बड़ा अपराध करने के बाद भी बृजेश सिंह केवल इसलिए पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ता था, क्योंकि वह हाईप्रोफाइल हो कर भी लो प्रोफाइल बन कर रहता था. मीडिया से बात नहीं करता था और मोबाइल फोन व सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करता था.

अपने 3 दशक लंबे आपराधिक जीवन में 30 से ज्यादा संगीन आपराधिक मुकदमों में नामजद बृजेश सिंह पर मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल औफ आर्गनाइज्ड क्राइम ऐक्ट), टाडा (टेररिस्ट ऐंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज ऐक्ट) और गैंगस्टर एक्ट के अलावा हत्या, अपहरण, हत्या का प्रयास, हत्या की साजिश रचने से ले कर, दंगाबवाल भड़काने, सरकारी कर्मचारी को इरादतन चोट पहुंचाने, झूठे सरकारी कागजात बनवाने, जबरन वसूली करने और धोखाधड़ी से जमीन हड़पने तक के मुकदमे लग चुके थे.

अगले भाग में पढ़ेंमाफिया से बना माननीय

मूंछ: दारा और रिनी की शादी के बदले मिली मौत

Serial Story: मूंछ पार्ट 1

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

दारा नाम था उस का. लंबा शरीर और चौड़ा सीना. देखने में ऐसा लगता था मानो अभी अखाड़े से आ रहा हो. चेहरे पर हमेशा एक मुसकराहट बनी रहती थी.

दारा की मां बचपन में मर गई थीं. गांव में बाबूजी ही बचे थे. वे ग्राम प्रधान का ट्रैक्टर चलाते थे, पर हमेशा यही चाहते थे कि उन का लड़का दारा पुलिस में सिपाही हो जाए, तो सारे गांव का ही नाम रोशन हो जाए और… फिर तो प्रधान भी उन्हें घुड़की नहीं दे पाएगा और उन का जितना भी पैसा दबा कर रखा है, वह सब सूद समेत वापस कर देगा.

पर बेटा गांव में रह जाता तो वह भी मजदूर बन कर ही रह जाता, इसलिए दारा जैसे ही 10 साल का हुआ, वैसे ही उस के बाबूजी ने उसे शहर में उस के मामा के पास भेज दिया और उन से ताकीद की कि हर महीने खर्चापानी उन के पास आता रहेगा. वे बस इतना करें कि दारा को पढ़ालिखा कर किसी तरह पुलिस में भरती करा दें.

दारा के मामा एक ईंटभट्ठे पर काम करते थे. उन्होंने दारा से खूब मेहनत भी कराई थी और उसे यह भी अहसास करा दिया था कि अगर वह दौड़ में आगे रहेगा, तो पुलिस में भरती हो पाएगा, क्योंकि पुलिस में भरती होने के लिए दौड़ पक्की होनी चाहिए, इसलिए दारा खूब दौड़ लगाता, जिम में जा कर पसीना भी बहाता. भरती की प्रक्रिया में भाग भी लिया, पर इस बेरोजगारी के दौर में सरकारी नौकरी पाना इतना आसान नहीं था.

दारा 20 साल को हो चुका था. वह पुलिस में भरती नहीं हो सका, तो अपनी जीविका चलाने के लिए उस ने एक मौल में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर ली.

यह नौकरी भी दारा को इसलिए मिल पाई थी, क्योंकि उस का शरीर लंबाचौड़ा तो था ही, साथ ही उस की लंबीलंबी तलवारकट मूछें उसे और भी रोबीला बनाती थीं.

वैसे तो आजकल शहरों में सभी नौजवानों में दाढ़ीमूंछ बढ़ाने का शौक चला हुआ था, पर दारा को तो मूंछें बड़ी रखने का शौक था और इस के लिए वह बहुत मेहनत भी करता था. बड़ी मूंछों को शैंपू करना और तेलक्रीम लगा कर उन्हें चमकीली बनाए रखना और अपनी मूंछों को सही रखने के लिए पूरे 5 किलोमीटर दूर एक खास सैलून में  जाया करता था.

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मौल में नौकरी मिलना भी खुशी की बात थी. 12 घंटे काम करना था. काम क्या था, बस मौल के अंदरबाहर आतेजाते लोगों पर नजर रखो और साफसुथरी वरदी पहन कर खड़े रहो. 2 बार चाय भी मिलती थी मुफ्त में.

दारा मौल के बाहर खड़ा हो कर पूरी निगरानी रखता और मौल के काउंटर पर रहने वाली एक लड़की रिनी को अपनी प्यारभरी नजरों से घूरा करता.

अगर गोरा होना ही खूबसूरती है, तो वह लड़की बहुत खूबसूरत थी, लंबा शरीर, पतली कमर और कंधे तक झूलते हुए बाल. रिनी डियो का इस्तेमाल खूब करती थी और अपने पीछे खुशबू का एक झोंका छोड़ जाती.

रिनी जब भी मौल में घुसती, तो दारा उस के बदन की खुशबू लेने के लिए बेताब रहता और उस के आटोरिकशा से उतरते ही उसे देख कर तन कर खड़ा हो जाता और रिनी भी उसे देख कर मुसकरा देती.

मौल के गेट पर खड़े दारा के 2 ही पसंदीदा काम थे, एक तो रिनी को ताकते रहना और दूसरा अपनी तलवारकट बड़ी और घनी मूंछों पर ताव देते रहना. दारा की ये बड़ी मूंछें उसे लोगों में एक अलग ही पहचान दिलाती थीं.

‘मौल में रिनी हर आने वाले ग्राहक का बिल काटते हुए मुसकराते हुए बात करती?है, जैसे वह उस का सगा वाला ही हो. शायद यह उस के काम की मजबूरी भी हो सकती है… जैसे मेरा मन भी बैठने को करता है, पर एक सिक्योरिटी गार्ड को तो तन कर खड़ा रहना पड़ता है… घंटों तक… अरे, यह नौकरी तो पुलिस की नौकरी से भी मुश्किल है.’

‘अकसर खड़ेखड़े अपनेआप से बातें किया करता था दारा.

‘वह तो भला हो मौल में आने वाले परिवारों और उन के साथ आए छोटे बच्चों का… कितनी खुशी से आ कर पूरे मौल में घूमतेफिरते हैं… और पूरा मौल ही खरीद डालने की कोशिश में रहते हैं… मेरी शादी होगी तो मैं भी कम से कम 5 बच्चे पैदा करूंगा और उन के लिए खूब सामान खरीदा करूंगा…’

‘‘शादी हो गई है क्या तुम्हारी?’’ चाय देने आए लड़के ने दारा की तंद्रा तोड़ते  हुए पूछा.

‘‘शादी… अभी तो नहीं.’’

‘‘अरे, फिर इतना काहे खोएखोए हो… खुश भी रहो… मजा लो  जिंदगी का.’’

और उस दिन वास्तव में दारा को जिंदगी का मजा मिल ही गया, जब मौल बंद होने के बाद रिनी ने दारा से उसे उस के घर तक छोड़ आने को कहा.

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‘‘दरअसल… दारा, जब मैं अपने महल्ले में पहुंचती हूं, तब वहां नुक्कड़ पर कुछ आवारा लड़के खड़े रहते हैं जो  मुझे छेड़ते हैं, इसलिए मैं चाहती हूं  कि तुम मेरे साथ चलो तो मैं महफूज महसूस करूंगी.’’

रिनी की इस गुजारिश को दारा नहीं टाल सका, क्योंकि जहां किसी लड़की की हिफाजत होती, वहां दारा किसी बौडीगार्ड की तरह अपना किरदार निभाने से पीछे नहीं हटता था.

एक आटोरिकशा को रोक कर दोनों उस में सवार हो गए. दारा रिनी की खुशबू को अपने जेहन में महसूस कर सकता था, कनखियों से रिनी को देख रहा था.

शहर के कई इलाकों से गुजरता हुआ आटोरिकशा रिनी के घर की तरफ जा रहा था, रिनी जाति से ईसाई थी और उस के पापा ने मां से तलाक ले लिया था. उस की मां ने ही उसे पालपोस कर बड़ा किया है. घर में वह एकलौती कमाने वाली है और अब मां बीमार रहती हैं, इसलिए मां की सारी जिम्मेदारी उसी पर है. यह सारी जानकारी रिनी ने दारा को रास्ते में दी.

दारा ने भी उसे अपने बारे में बताया कि उस की मां तो इस दुनिया में नहीं हैं, गांव में सिर्फ उस के बाबूजी ही रहते हैं.

‘‘अरे वाह, आज तुम से बातों में पता ही नहीं चला कि रास्ता कब खत्म हो गया और अब आ गए हो तो चाय पी कर ही जाना,’’ रिनी ने कहा.

Serial Story: मूंछ पार्ट 2

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

रिनी की इस बात को दारा टाल नहीं सका और वह उस के साथ उस के घर चला गया.

रिनी के घर में एक ही छोटा सा कमरा था. एक कोने में रिनी की बीमार मां लेटी हुई थीं. दारा ने उन्हें नमस्ते किया और उन का हालचाल पूछा.

पहले तो रिनी की मां की आंखों में दारा की तलवारकट मूंछों को देख कर कई सवाल आए, पर जब रिनी ने बताया कि दारा भी उस के साथ ही काम करता है, तो उन की आंखों में निश्चिंतता के भाव आए.

दारा एक बार रिनी के घर क्या गया, फिर तो दोनों में नजदीकियां बढ़ने लगीं. रिनी दारा के लिए अच्छा खाना बना कर लाती, तो कभी दारा अपना लंच भी रिनी के साथ शेयर करता.

एक दिन दारा रिनी के लिए बाटीचोखा बना कर लाया, जो उस ने अपने मामा से बनाना सीखा था.रिनी अपनी उंगलियां चाटती रह  गई थी.

‘‘अरे, कैसे बना लिया तुम ने इतना टेस्टी खाना… मुझे भी इस की रेसिपी जाननी है,’’ रिनी ने चहकते हुए कहा.

‘‘क्या है मैडम कि इस को बनाने में कई छोटीछोटी चीजों की जरूरत पड़ती है और अगर आप को सच में ही इसे बनाना सीखना है, तो आप को इसे बनता

हुआ देखना होगा और उस के लिए आप को हमारे घर चलना होगा और तब ही आप इस को बनाना सीख पाएंगी.’’

दारा पहले से ही रिनी का यकीन जीत चुका था, इसलिए रिनी को उस के साथ जाने में कोई दिक्कत नहीं हुई.

एक दिन काम के बाद दोनों आटोरिकशा में बैठ कर दारा के घर की तरफ निकल लिए, पर रास्ते में तेज बारिश शुरू हो गई और पूरे रास्ते बारिश होती रही.

दारा के घर की गली के अंदर आटोरिकशा का जाना मुमकिन नहीं था, इसलिए दोनों वहीं उतर गए. कुछ दूरी पर ही दारा का कमरा था. चूंकि बारिश अभी तेज थी और रुकने के कोई आसार नहीं नजर आ रहे थे, इसलिए दारा और रिनी ने पैदल चलना जारी रखा और भीगते हुए वे दोनों दारा के कमरे पर पहुंच गए.

कमरे पर पहुंचने के बाद दारा ने रिनी को सिर पोंछने के लिए तौलिया दिया. रिनी अपने बालों को झटक कर पोंछने लगी, उस का गोरा बदन पानी में भीगने के बाद और भी चमक उठा था. रिनी जब तौलिए को अपने बदन पर रगड़ती, तो जवान दारा का मन मचल उठता.

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दारा ने उपलों की आग जलाई और हाथ सेंकने लगा. रिनी भी उस के पास आ कर बैठ गई. उस की खुशबू दारा को मदहोश कर रही थी, फिर भी उस ने बाटी बनाने की तैयारी शुरू कर दी. इतने में रिनी को पता नहीं क्या सूझा कि उस ने दारा का हाथ पकड़ लिया.

‘‘पता है दारा… मुझे तुम्हारे जैसे मर्द की तलाश थी, जो शरीर से मजबूत होने के साथसाथ मेरा ध्यान रखने वाला भी हो,’’ रिनी एक ही सांस में मन की बात कह गई थी.

रिनी की छुअन ने दारा के जवान जिस्म में आग लगा दी. उस ने रिनी को बांहों में भर लिया और उस के होंठों को चूमने लगा. दोनों अमरबेल की लता की तरह एकदूसरे से लिपट गए. बाहर उपलों की आग तेजी से जल रही थी और 2 जवान दिल अपने दिलों की आग को बुझाने में लगे हुए थे.

एक बार दोनों के बीच शर्म की दीवार गिरी, फिर तो दोनों के बीच कई बार शारीरिक संबंध बने, जिस का नतीजा यह हुआ कि रिनी पेट से हो गई.

‘‘सुनो दारा… अब हमें शादी कर लेनी चाहिए, क्योंकि मैं पेट से हो गई हूं.’’

उस की ये बात सुन कर दारा थोड़ा चौंक गया, क्योंकि अभी तक तो उस ने शादी के बारे में सोचा नहीं था और फिर गांव में बाबूजी दूसरे धर्म की लड़की से शादी की इजाजत तो कभी नहीं देंगे और दारा का घूमनाफिरना भले ही रिनी जैसे मौडर्न लड़की के साथ हो, पर अपने जीवनसाथी के तौर पर तो दारा ने गांव की सीधीसादी लड़की के बारे में ही सोचा था.

‘‘पर, मैं तुम से शादी नहीं कर सकता, क्योंकि मैं दूसरी जाति का हूं और मेरे गांव में तुम से शादी की इजाजत कभी नहीं मिलेगी,’’ दारा ने कहा.

उस की यह बात सुन कर रिनी को बहुत दुख हुआ. वह परेशान हो उठी.

‘‘तो यह तुम ने मेरे शरीर को छूने से पहले क्यों नहीं सोचा था. तुम्हारी वे जातिवादी बातें तब कहां चली गई थीं, जब मेरे होेंठों से अपने होंठों को जोड़ते थे तुम… मैं तुम्हारे बच्चे को ले कर कहां जाऊं?’’ गुस्से में थी रिनी.

ऐसा नहीं था कि दारा रिनी को प्यार नहीं करता था, पर दूसरे धर्म की रिनी से शादी करने की बात बाबूजी को बता कर वह उन के मन पर कुठाराघात नहीं करना चाहता था.

रिनी ने तो दारा से प्यार किया था और उस के प्यार की निशानी उस के पेट में बच्चे के रूप में पल रही थी, आजकल शहर में महिला सशक्तीकरण पर बहुत जोर दिया जा रहा था, जिसे देख और सुन कर रिनी ने भी अपने साथ हुए सुलूक को ले कर आवाज उठानी चाही और वह ‘करीम भाई’ नाम के एक आदमी से जा कर मिली.

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ऐसे तो करीम भाई एक छोटेमोटे नेता थे, पर उन पर कई मर्डर के भी आरोप थे और उन की इमेज एक आपराधिक रिकौर्ड वाले दबंग नेता की भी थी, जो गरीब और बेसहारा लोगों की मदद करने से पीछे नहीं हटता था.

करीम भाई ने रिनी को पूरी मदद करने का भरोसा दिया और दारा को अपने ठिकाने पर बुलाया और समझाया. पहले तो दारा की लंबी तलवारकट मूंछों की बहुत तारीफ की और फिर बाद में उसे समझाया कि किसी लड़की को प्यार में धोखा देना अच्छी बात नहीं है, इसलिए वह चुपचाप रिनी से शादी कर ले, नहीं तो अंजाम बहुत बुरा होगा.

करीम भाई की छिपी हुई धमकी को दारा अच्छी तरह समझ गया था. वह शादी करने को राजी तो हुआ, पर उस नेअपने बाबूजी को इस शादी की सूचना नहीं देने का फैसला किया और दोनों ने चर्च में जा कर शादी कर ली.

Serial Story: मूंछ पार्ट 3

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

शादी के बाद दारा और रिनी खुश थे, रिनी ने मौल की जौब छोड़ दी और घर में ही रहने लगी. एक बेहतर भविष्य के सपने उस की आंखों में तैर रहे थे.

अभी उन की शादी हुए 15 दिन ही हुए थे कि दारा के पास उस के गांव के प्रधान का फोन आया. उन्होंने बताया कि दारा के बाबूजी की मौत हो गई है.

दारा यह खबर सुन कर परेशान हो उठा. गांव जा कर उसे बाबूजी की अंत्येष्टि करनी होगी और उस के बाद पता नहीं वहां कितना समय लग जाए, यह सोच कर आननफानन में वह रिनी को अपने साथ ले कर गांव की तरफ रवाना हो गया.

दारा का गांव शहर से तकरीबन 400 किलोमीटर दूर था. वह शाम को चला था, तो गांव पहुंचते उसे अगला दिन हो गया.

बस से उतर कर रिनी और दारा गांव तक पहुंचाने वाली सड़क पर तेजी से बढ़ने लगे. गांव के कुछ निठल्ले लड़के, जो अपनेआप को पूरे गांव का ठेकेदार समझते थे, उन्होंने जब एक नई शहरी लड़की को गांव में देखा. तो उस पर फिकरे कसने लगे. उन में से एक, जो सब का मुखिया लग रहा था, वह बोला, ‘‘दोस्तो, यह रसभरी तो अभी पूरी तरह पकी नहीं है… बड़ी गदर है… इस का रस चूसने में बड़ा मजा आएगा.’’

रिनी सन्न रह गई थी. दारा ने यह सुना, तो उस का माथा ठनक गया था. उस की मुट्ठियां भिंच गईं, पर रिनी ने मौके की नजाकत देख कर दारा को अपनी तरफ खींचा और आगे की ओर चलने लगी.

रिनी उन लोगों के भद्दे कमैंट्स पर ध्यान न कर के सिर झुकाए दारा का हाथ पकड़ कर चलती रही.

‘‘अरे, बड़ी जल्दी है तुम लोगों को गांव में जाने की… अरे ओए… तुम्हीं लोगों से कह रहे हैं… ओ तलवारकट मूंछ वाले… जरा बताते तो जाओ… कहां जा रहे हो? किस के यहां जा रहे हो?’’ एक निठल्ले ने पूछा.

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‘‘जी, हमारे पिता का नाम पूरनलाल है और उन का स्वर्गवास हो गया है… हम उन की क्रिया के लिए गांव में आए हैं,’’ दुखी मन से सीधा जवाब दिया दारा ने. इतना कह कर दारा और रिनी वहां से चल दिए.

‘‘अरे… यह पूरनवा का लौंडा है… शहर जा कर कैसा गबरू हो गया है. साला मूंछ तो हम ठाकुरों जैसी रखा है… शहर में नौकरी कर के अपनी औकात भूल गया है… कोई बात नहीं… हम इस को इस की असली औकात बताते हैं,’’ बलवंत नाम का वह लड़का अपनी जेब से मोबाइल निकाल कर इधरउधर फोन मिलाने लगा.

दारा के घर पर गांव वाले इकट्ठा थे, कुछेक रिश्तेदार भी थे, जो लोग दारा को पहचान पाए, वे उस से लिपट कर रोने लगे.

पिता की मृत देह देख कर दारा का सब्र जवाब दे गया. वह पिता की देह से लिपट कर रोने लगा. रिश्तेदारों ने हिम्मत दी, पर आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

‘‘अब कुछ नहीं बचा है बेटा… जितनी देर ये देह पड़ी रहेगी, उतनी देर पूरन की आत्मा फड़फड़ाएगी… इसलिए अब इसे जल्दी से जल्दी फूंकने का इंतजाम करो.’’

गांव वालों ने पहले से ही तैयारी कर रखी थी. मृत देह को श्मशान ले चलने की तैयारी होने लगी.

बाप की अर्थी को जैसे ही दारा ने कंधा लगाया, बलवंत गांव के लड़कों के साथ वहां आ गया और दारा को देख कर कहने लगा, ‘‘क्या रे… शहर जा कर तू औकात भूल गया… हम ठाकुरों जैसी मूंछें रखता है. तू क्या समझता है कि लंबाचौड़ा शरीर पा कर तू भी ठाकुर हो जाएगा… और ये तलवार जैसी मूंछें रख लेगा, तो हम लोग डर जाएंगे…’’

‘‘बाबूजी… हमें पिता की क्रिया कर लेने दो, फिर आप जो कहोगे हम मान लेंगे,’’ दारा ने कहा.

‘‘वह तो हम अपनेआप मनवा ही लेंगे…’’ एक मुस्टंडे ने पीछे खड़ी रिनी की ओर देख कर कहा.

‘‘पर, तेरी मूंछ तो छोटी और नीचे की ओर होनी चाहिए… तू ने ये तलवारकट मूंछें रख कर हम लोगों की बेइज्जती की है. उस की सजा तो तुझे भुगतनी होगी,’’ इतना कह कर उस लड़के ने दारा के सिर पर एक डंडा मारा, दूसरा डंडा और फिर तीसरा चौथा… 5वां…

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दारा ने बहुत प्रयास किया कि वह पिता की अर्थी को अपने कंधे से न गिरने दे, पर वह नाकाम रहा और दारा के कंधे से उस के बाप की अर्थी एक ओर गिर गई और दूसरी ओर दारा का शरीर निढाल हो कर गिरने लगा.

‘‘अरे ओ बिरजू… जरा अपना उस्तरा निकाल और काट ले इस की ये तलवारकट मूंछें,’’ वह लड़का चीख रहा था.

दारा के सिर से तेजी से खून निकल रहा था. उस की मुंदती हुई आंखें देख पा रही थीं कि बिरजू नाम का वह आदमी उस्तरा ले कर उस की ओर बढ़ रहा है और कुछ लोग रिनी को अपने कंधे पर उठा कर ले जा रहे हैं.

घर के बाहर अब 2 लाशें पड़ी हुई थीं, एक ओर दारा के पिता की लाश, तो दूसरी ओर दारा की लाश… जिस पर अब मूंछ का कोई नामोनिशान नहीं था…

Crime Story: भयंकर साजिश

Crime Story: भयंकर साजिश- पार्ट 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

रोनी लिशी ने तेची मीना से प्रेम विवाह किया था, दोनों की एक बेटी भी हुई. जब मीना दूसरी बार गर्भवती हुई तो रोनी की जिंदगी में चुमी ताया आ गई. बड़े बाप के बेटे और बिजनैसमेन ने चुमी से गुपचुप शादी कर ली और पत्नी मीना को रास्ते से हटाने के लिए ऐसी साजिश रची कि…

अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर 5 नवंबर के बाद से कई दिनों तक ‘हत्यारों को फांसी दो.. जस्टिस फौर

मीना…’ के नारों से गूंजती रही. जिस के लिए जस्टिस मांगा जा रहा था, उस का नाम था तेची मीना लिशी, उम्र 28 वर्ष. तेची की हत्या हुई थी पर खुलासा कई दिन बाद हुआ. उस की हत्या का खुलासा होने के बाद से सामाजिक संगठनों में आक्रोश की आग सुलगने लगी थी. सामाजिक संगठन तेची मीना लिशी को न्याय दिलाने के लिए कभी कैंडिल मार्च तो कभी शांतिपूर्ण जुलूस निकाल कर इस हत्याकांड के आरोपियों को कठोर दंड देने की मांग कर रहे थे.

कोई मामूली शख्सियत नहीं थी. वह मिस अरुणाचल नाम की एक बड़ी संस्था में लेखा और वित्त विभाग की सचिव थी. वह प्रदेश के एक बड़े बिजनैसमैन रोनी लिशी की पत्नी थी. उस के ससुर लेगी लिशी कांग्रेस और भाजपा जैसी बड़ी पार्टियों में रहे थे. वह ईटानगर से 3 बार विधायक व एक बार मंत्री रह चुके थे.

अरुणाचल प्रदेश पूर्वोत्तर के उन राज्यों में से है, जहां अपराध की वारदातें बहुत कम होती हैं और साजिश कर के हत्या की वारदात को अंजाम देने के मामले तो अपवाद ही होते हैं. लेकिन नौर्थ ईस्ट के इस छोटे से खूबसूरत राज्य की राजधानी ईटानगर में 5 नवंबर को एक ऐसी वारदात हुई, जिस के बाद पूरे ईटानगर के शांत माहौल को गर्म कर दिया. क्योंकि इस वारदात को इस तरह की साजिश के तहत अंजाम दिया गया था कि पिछले 2 दशकों में इस राज्य के लोगों ने इस तरह के अपराध की कोई वारदात न देखी थी न सुनी थी.

राजधानी ईटानगर के विधायक रहे लेगी लिशी के रसूख और शहर के सब से पौश इलाके नाहारलागुन के सेक्टर-1 में बने उन के आवास लेगी कौंप्लेक्स को शहर का हर बांशिदा जानता था.

5 नवंबर की दोपहर करीब साढ़े 12 बजे लेगी लिशी की बहू तेची मीना लिशी अपनी इनोवा एसयूवी कार में घर से निकली थी. मीना की गाड़ी को 2 दिन पहले ही नियुक्त हुआ ड्राइवर दाथांग सुयांग चला रहा था. गाड़ी ईटानगर से कारसिंगा की तरफ जा रही थी. दरअसल, मीना को उस के पति रोनी लिशी ने सड़क बनाने के लिए अधिग्रहीत अपनी जमीन के मुआवजे के लिए कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने हेतु संबंधित सरकारी विभाग में जानकारी लेने भेजा था.

चूंकि मीना 7 महीने की गर्भवती थी, इसलिए रोनी ने 2 दिन पहले ही पत्नी की गाड़ी चलाने के लिए एक ड्राइवर रखा था. हालांकि मीना पहले अपनी सैंट्रो कार खुद चला कर अपने दफ्तर जाती थी. लेकिन 7 महीने की गर्भवती होने के कारण मीना के पति लिशी लेगी ने मीना के लिए अपनी बहन के घर पर खड़ी अपनी इनोवा कार मंगवा ली थी और उस के लिए 2 दिन पहले ही एक एक ड्राइवर दाथांग सुयांग को नियुक्त कर दिया था.

दोपहर करीब साढ़े 12 बजे ड्राइवर दाथांग सुयांग इनोवा कार से मीना को ले कर कारसिंगा रोड पर शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर ही चला था कि उस की कार जब कूड़ा डंपिंग जोन के पास बने मंदिर के पास पहुंची तो दुर्घटनाग्रस्त हो कर खाईं में लुढ़क गई.

मीना की मौत

किसी तरह दाथांग सुयांग तो बाहर निकल आया, लेकिन उस ने देखा कि बीच की सीट पर पड़ी मीना मृतप्राय थी. हैरानी यह थी कि ड्राइवर दाथांग किसी तरह दरवाजा खोल कर गाड़ी से बाहर निकल आया था और पूरी तरह से कुछ लोगों ने देखा कि गाड़ी के भीतर एक महिला खून से लथपथ घायल अवस्था में पड़ी है तो उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम को दुर्घटना की सूचना दे दी. साथ ही मीना को पास के अस्पताल भिजवा दिया.

जिस स्थान पर ये दुर्घटना हुई थी, वह इलाका राजधानी ईटानगर के बांदरदेवा पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आता था. जब पता चला कि एक्सीडेंट हुई कार में पूर्व विधायक लेगी लिशी की पुत्रवधू मीना सवार थी तो खुद थानाप्रभारी गोशम ताशा पुलिस टीम को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

इंसपेक्टर गोशम यह देख कर हैरान थे कि गाड़ी का ड्राइवर दाथांग सुयांग एकदम सहीसलामत था. उसे खरोंच तक नहीं आई थी. सड़क से 3 मीटर नीचे खाई में लुढ़की गाड़ी भी एकदम सहीसलामत थी. उस के न तो शीशे टूटे थे, न ही गाड़ी कहीं से डैमेज हुई थी. वहां मौजूद लोगों ने बताया कि गाड़ी की बीच वाली सीट पर बैठी मीना बुरी तरह खून से लथपथ थी और उस के सिर, कंधों व गरदन पर काफी चोटें आई थीं.

पुलिस के आने से पहले ही लोगों ने मीना को पास के एक अस्पताल भिजवा दिया था. इंसपेक्टर गोशाम ने दुघर्टना को पूर्व विधायक लेगी लिशी की पुत्रवधू से जुड़ा होने के कारण नाहारलागुन के सीओ रिक कामसी के अलावा ईटानगर कैपिटल रीजन के एसपी जिमी चिराम को भी दुर्घटना की जानकारी दे दी थी, जो सूचना मिलने के कुछ देर बाद घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस ने यह सूचना पूर्व विधायक लेगी लिशी और उन की पति रोनी लिशी को दे दी थी. उन्हीं की सूचना से यह जानकारी पा कर कारसिंगा में रहने वाले मीना के मातापिता, भाईबहन व अन्य रिश्तेदार भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

एसपी जिमी चिराम ने जब घटनास्थल का निरीक्षण किया तो पहली ही नजर में उन्हें दुर्घटना संदिग्ध लगी. इसलिए फोरैंसिकटीम ने गाड़ी व घटनास्थल का निरीक्षण कर ऐसे साक्ष्य एकत्र करने शुरू कर दिए, जिस से पता चल सके कि दुर्घटना किन कारणों से हुई.

ड्राइवर दाथांग सुयांग घटनास्थल पर ही मौजूद था, इसीलिए पूछताछ की शुरुआत उसी से हुई. दाथांग ने बताया कि गाड़ी के ब्रेक फेल हो गए थे, जिस से गाड़ी संतुलन खो कर खाईं में लुढ़क गई और मालकिन मीना बुरी तरह जख्मी हो गईं. लेकिन पुलिस यह देख कर हैरान थी कि दाथांग एकदम सहीसलामत था, उसे खरोंच तक नहीं आई थी.

मीना का बयान लेने के लिए पुलिस की एक टीम अस्पताल भेजी गई थी, लेकिन वहां पता चला कि अस्पताल पहुंचने से पहले ही उस की मौत हो गई थी. अस्पताल में मीना के परिजन, जिन में मायके व ससुराल के लोग भी शामिल थे, भी अस्पताल पहुंच चुके थे जिस से वहां का माहौल परिजनों के मार्मिक विलाप के कारण बेहद गमगीन हो गया था.

पुलिस टीम ने दुर्घटना में घायल हुई मीना के शरीर पर आई चोटों की फोटोग्राफी कराई. एसपी जिमी चिराम ने ये फोटो देखे तो पूरी तरह साफ हो गया कि दुर्घटना का यह मामला सिर्फ दिखाने के लिए था.

मीना के मातापिता व रिश्तेदारों के साथ पूर्व विधायक लिशी लेगी भी अस्पताल से दुर्घटनास्थल पर पहुंच गए थे. गाड़ी और उस का ड्राइवर जिस तरह सहीसलामत थे और मीना की दुर्घटना में जो हालत हुई थी, उसे देख कर उन्होंने भी यहीं आशंका जताई कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि मीना को दुर्घटना में इतनी गंभीर चोटें लगी हों.

मीना के पिता तेची काक ने एसपी जिमी चिराम को एकांत में ले जा कर जो कुछ बताया, उस ने अचानक दुर्घटना के इस मामले को नया रंग दे दिया. इस के बाद तो पुलिस की जांच करने का तरीका ही बदल गया. पुलिस ने उसी दिन मीना का शव पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

अगले भाग में पढ़ें-  ड्राइवर ने बताया गाड़ी का ब्रेक फेल हो गया था

Crime Story: भयंकर साजिश- पार्ट 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

ड्राइवर ने बताया ब्रेक फेल होना

ड्राइवर दाथांग ने चूंकि बताया था कि गाड़ी के ब्रेक फेल होने के कारण वह असंतुलित हो कर खाई में गिरी थी. इसीलिए पुलिस ने पुलिस लाइन से मोटर इंजीनियर एक्सपर्ट को मौके पर बुलवा लिया. उन्होंने जांचपड़ताल की तो यह देख कर दंग रह गए कि गाड़ी के ब्रेक एकदम सहीसलामत थे.

इस के बाद 2 दिन पहले ही मीना की गाड़ी पर ड्राइवर की नौकरी करने आए दाथांग की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. साथ ही उस के मोबाइल को भी अपने कब्जे में ले लिया गया.

नाहरलगुन पुलिस स्टेशन में उसी दिन इंसपेक्टर गोशाम ने भादंसं की धारा 279/304 (ए) आईपीसी के तहत लापरवाही से गाड़ी चला कर दुर्घटना करने का मामला दर्ज करवा दिया और जांच का काम स्वयं शुरू किया.

दाथांग सुयांग से कड़ी पूछताछ की जाने लगी. उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाली गईं. पूछताछ में पता चला कि नया मोबाइल व नंबर उस के मालिक लिशी रोनी ने ही उसे खरीद कर दिया था.

3 दिन पहले एक्टिव हुए इस नंबर की काल डिटेल्स खंगालते हुए पुलिस ने उन लोगों को चैक करना शुरू कर दिया, जिन्होंने इस नंबर पर काल की थी या इस नंबर से उन के नंबर पर काल किए गए थे.

अगली सुबह मीना के शव को पोस्टमार्टम के बाद उन के घरवालों को सौंप दिया गया. पूरे ईटानगर में मीना की संदिग्ध मौत की खबर जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी. मीना के ससुर लेगी लिशी एक बड़ी राजनीतिक हस्ती थे. खुद मीना भी सामाजिक संस्थाओं से जुड़ी थी. इसलिए शवयात्रा में मीना के घर वालों के अलावा बड़ी संख्या में राजनीतिक व सामाजिक संगठनों के लोग शामिल हुए.

इधर पुलिस को मिली पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि मीना की जांघ, हथेली, सिर और गरदन पर किसी भारी चीज से प्रहार हुआ था और वहां गहरे कट के निशान थे, बायां हाथ सूजा हुआ था. मैडिकल जांच करने वाले विशेषज्ञों और गाड़ी का मुआयना करने वाले एक्सपर्ट ने साफ कर दिया था कि दुर्घटना में इस तरह की चोट नहीं आ सकती.

दुर्घटना के बाद मीना के ससुर पूर्व विधायक लेगी लिशी ने भी दुर्घटना के संदिग्ध हालात के मामले की गहनता से सही जांच के लिए कहा था. पुलिस को इस मामले में शुरुआती जांच से ही जिस तरह से गहरी साजिश और इस में कई लोगों के शामिल होने के सबूत मिले थे.

उसी के मद्देनजर आईजीपी (कानून एवं व्यवस्था) चुखू अपा ने ईटानगर कैपिटल रीजन के एसपी जिमी चिराम के नेतृत्व में इस मामले का खुलासा करने के लिए एक बड़ी टीम का गठन कर दिया.

इस टीम में नाहारलागुन सर्किल के सीओ रिक कामसी व जांच अधिकारी इंसपेक्टर गोशाम के अलावा इंसपेक्टर मिनली गेई, खिकसी यांगफो व तिराप जिले के एसपी कारदक रिबा तथा खोंसा पुलिस थाने के इंसपेक्टर वांगोई कामुहा को शामिल किया गया. इस टीम को बंट कर काम करना था.

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पुलिस की टीमों ने इस दौरान मीना के घर से ले कर घटनास्थल तक पहुंचने के तक जिन मार्गों से गाड़ी गुजरी थी, उन सभी रास्तों के सीसीटीवी फुटेज चैक करने शुरू कर दिए. इस के अलावा पुलिस ने घटनास्थल के एक किलोमीटर के दायरे में सड़क किनारे बनी दुकानों व रेहड़ी वालों से पूछताछ करनी शुरू कर दी.

पुलिस ने छानबीन शुरू की तो उसे जल्द ही चश्मदीद के रूप में कुछ राहगीर व रेहड़ी वाले मिल गए, जिन्होंने कार के ब्रेक फेल होने की ड्राइवर दाथांग सुयांग की कहानी को झूठा साबित कर दिया.

एक चश्मदीद ने कार नीचे गिरने के बाद 50 मीटर की दूरी से देखा था कि उस का ड्राइवर गाड़ी से बाहर निकला था और पिछली सीट पर पड़ी महिला को बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था. जबकि कारसिंगा ब्लौक बिंदु पर सड़क किनारे सब्जी बेचने वाले एक रेहड़ी वाले ने बताया कि उस के सामने से कार सामान्य गति से गुजरी थी, इस से यह कहना गलत था कि उस के ब्रेक फेल हुए होंगे.

तब तक पुलिस को ड्राइवर दाथांग की संदिग्ध गतिविधियों के कुछ दूसरे साक्ष्य भी मिल गए थे. इसीलिए 6 नंवबर की सुबह उसे आधिकारिक रूप से गिरफ्तार कर के कड़ी पूछताछ शुरू कर दी गई.

मुंह खोलना पड़ा ड्राइवर दाथांग को ड्राइवर दाथांग ने शुरू में तो एक ही रट लगाए रखी कि गाड़ी के ब्रेक नहीं लगे थे. लेकिन जब पुलिस ने उस के खिलाफ एकत्र सारे सबूत एकएक कर के उस के सामने रखने शुरू किए तो वह जल्द ही टूट गया. उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. दाथांग के मुंह खोलते ही साजिश के तहत मीना की हत्या की एक सनसनीखेज कहानी सामने आई.

पुलिस को एक बार अपराध का सिरा हाथ लग जाए तो उस के अंतिम छोर तक पहुंचने में ज्यादा देर नहीं लगती. पुलिस ने उसी दिन शाम तक ताबड़तोड़ छापेमारी करते हुए तिरप जिले से दाथांग सुयांग के साथ मीना की हत्या की साजिश में शामिल रहे 3 सहआरोपियों कपवांग लेटी लोवांग (40) के साथ ताने खोयांग (33) और दामित्र खोयांग (29) को गिरफ्तार कर लिया.

कपवांग पूर्वोत्तर भारत के एक विद्रोही गुट एनएससीएन (यू) का सक्रिय कार्यकर्ता रह चुका था. उसी ने मीना की हत्या की सुपारी ली थी. हैरानी की बात यह थी कि मीना की हत्या की सुपारी उस के पति रोनी लिशी ने ही दी थी.

कपवांग रोनी का पुराना जानकार था. उसी ने सुपारी लेने के बाद हत्यारों का इंतजाम किया था. बाद में पूरी योजना के तहत इस वारदात को इस तरह अंजाम दिया गया ताकि यह हत्या एक दुर्घटना लगे.

पुलिस ने पूछताछ के लिए आरोपियों को अदालत से रिमांड पर ले लिया. उस के बाद उन के बयानों की तस्दीक की जाने लगी. क्योंकि हत्या का आरोप मृतका के पति और एक प्रभावशाली पूर्व विधायक के बेटे पर था. इसलिए पुलिस आरोपों को प्रमाणित करने के लिए साक्ष्य एकत्र कर लेना चाहती थी.

इस दौरान जब यह बात सार्वजनिक हो गई कि मीना की हत्या उस के पति रोनी ने ही भाड़े के हत्यारों से करवाई है तो राजनीतिक व सामाजिक संगठनों ने धरने, प्रदर्शन व कैंडिल मार्च के जरिए पुलिस पर दबाव बनाना शुरू कर दिया.

परिवार के लोग भी अब पूरी तरह रोनी के खिलाफ बोलने लगे. तब तक पुलिस ने कई साक्ष्य एकत्र कर लिए थे. जिस के बाद 10 नवंबर को रोनी लेशी को भी गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन पुलिस को इस हत्याकांड की जो थ्योरी अब तक पता चली थी, उस के मुताबिक उसे मामले में 2 अन्य लोगों की तलाश थी. उस के लिए साक्ष्य एकत्र करने का काम शुरू कर दिया गया.

आखिरकार 18 नवंबर को पुलिस ने रोनी की प्रेमिका व दूसरी पत्नी चुमी ताया (26) व उस की कंपनी में काम करने वाले मैनेजर विजय बिस्वास (30) को भी हत्याकांड की साजिश में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.

इन सभी की गिरफ्तारी के बाद जांच अधिकारी ने दुर्घटना के इस मामले को हत्या व साजिश की धाराएं लगा कर हत्या में परिवर्तित कर दिया. इस के बाद मीना हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, उस ने पूर्वोत्तर के खूबसूरत राज्य अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर शहर के लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया.

लोग सोच रहे थे कि एक इंसान केवल दूसरी लड़की से शादी करने के लिए अपनी पहली पत्नी की बेरहमी से हत्या करा सकता है, जिस से न सिर्फ उस ने प्रेम विवाह किया था बल्कि जिस के पेट में उस का बच्चा भी पल रहा था.

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रोनी लिशी एक संपन्न परिवार का युवक था. परिवार में 2 छोटे भाई व एक बहन थी. पिता लेगी लिशी प्रतिष्ठित राजनीतिक व्यक्ति होने के साथ अथाह संपत्ति के मालिक थे. उन्होंने सभी बच्चों के नाम पर संपत्तियां खरीदी हुई थीं. रोनी कोई अशिक्षित भी नहीं था. उस ने इंजीनियरिंग की थी.

कालेज में पढ़ते हुए हुआ प्यार

पिता लेगी लिशी ने रोनी को 2 कंपनियां खुलवा कर दी थीं. ईटानगर में उन की पहली कंपनी लिशी वन होम मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड थी, जिस की स्थापना उन्होंने 2012 में की थी. जबकि 3 साल पहले रोनी ने अपनी बेटी के नाम पर यामिको ग्लोबल इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड के नाम से दूसरी कंपनी शुरू की थी. उस की प्रेमिका व दूसरी पत्नी चुमी ताया इसी कंपनी में काम करती थी.

रोनी व मीना की दोस्ती 2008 में कालेज में पढ़ाई के दौरान हुई थी, जो बाद में प्यार में बदल गई. मीना कारसिंगा में रहने वाले एक मध्यमवर्गीय परिवार की बेहद खूबसूरत व घरेलू लड़की थी. मीना की इसी खूबसूरती पर रोनी मर मिटा था और उस से प्यार करने लगा था.

बाद में दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया था. मीना चूंकि मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की थी, इसलिए पहले उस के घर वाले संकोच करते रहे कि रोनी एक संपन्न व बड़े परिवार का लड़का है. कहीं ऐसा न हो कि उस के परिवार वाले शादी के लिए राजी न हों.

क्योंकि उन की हैसियत रोनी के परिवार के सामने कुछ भी नहीं थी. ऐसा न हो कि दोनों की शादी बेमेल संबंध बन जाए और मीना को बाद में परेशानी उठानी पड़े. लेकिन मीना व रोनी के कई बार समझाने के बाद परिवार की झिझक दूर हुई और दोनों के मिलन का रास्ता साफ हो गया.

लिहाजा सन 2012 में दोनों परिवारों की सहमति से रोनी और मीना ने शादी कर ली. शादी के 2 साल बाद 2014 में दोनों के प्यार की निशानी के रूप में एक बेटी हुई, जिस का नाम लेसी यामिको रखा गया.

साल 2017 में अचानक मीना के परिजनों को पता चला कि रोनी ने मीना को तलाक देने के लिए अदालत में अरजी दी है. यह पता चला तो परिवार के लोग बेचैन हो गए. क्योंकि जिस लड़की से विवाह करने के लिए रोनी उन के सामने मिन्नतें कर रहा था, वह उसी को तलाक क्यों देना चाह रहा था, यह उन की समझ से परे था. पूरा मामला जानने के लिए मीना के घर वाले रोनी के पास पहुंचे.

अगले भाग में पढ़ें-  साजिश का पहला कदम क्या अपनाया

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