Crime Story: जंगल में चोरी के लिए- पार्ट 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- शैलेंद्र कुमार ‘शैल’ 

खूबसूरत और जवान युवती दारू के ठीहे पर हो और बवाल न हो, ऐसा संभव नहीं. दिलफेंक युवक दारू पीने कम, रीमा के गदराए बदन को घूरने ज्यादा आते थे. रीमा को ले कर वहां अकसर मारपीट होती थी. पुलिस को शक था कि कहीं इन्हीं में से उस का कोई पुराना आशिक तो नहीं, जिस ने इस दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया हो. पुलिस ने इस दृष्टिकोण को भी जांच में शामिल कर लिया था.

उलझी जिंदगी की चौंकाने वाली कहानी

इस के साथ ही पुलिस को जांच में रीमा से जुड़ी एक और चौंकाने वाली बात पता चली. रीमा की 3 शादियां हुई थीं. पहली शादी के 15 दिनों बाद ही रीमा विधवा हो गई थी. उस के पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. उस के बाद रीमा मायके आ गई और वहीं रहने लगी थी. सफेद साड़ी में लिपटी जवान बेटी को देख कर पिता रामरक्षा परेशान रहते थे. वह सोचते थे कि इतना लंबा जीवन बेटी कैसे काटेगी. ठीकठाक वरघर देख कर उस की गृहस्थी फिर से बस जाए तो अच्छा है.

रिश्तेदारों के माध्यम से रामरक्षा ने महराजगंज के बेलवा काजी के रहने वाले रविंद्र गौड़ से बेटी का दूसरा ब्याह कर दिया. विवाह से पहले उन्होंने बेटी की पिछली जिंदगी के बारे में सब कुछ साफसाफ बता दिया था, ताकि पिछली जिंदगी नासूर न बने.

लेकिन होनी को भला कौन टाल सकता है, शादी के कुछ महीनों बाद रीमा फिर ससुराल से हमेशा के लिए मायके लौट आई. पता चला कि दूसरा पति रविंद्र गौड़ अव्वल दर्जे का दारूबाज था. दारू हलक से नीचे उतरने के बाद नशे में धुत हो कर वह रीमा को बिना वजह बुरी तरह मारतापीटता था.

पति के अत्याचारों से तंग आ कर वह पति का घर हमेशा के लिए छोड़ कर मायके आ कर रहने लगी थी.

पत्नी के इस कदम से रविंद्र परेशान था. वह नहीं चाहता था रीमा मायके में जा कर रहे, वह चाहता था कि जो हुआ उसे भुला कर रीमा घर लौट आए. लेकिन रीमा पति की बात मानने के लिए कतई तैयार नहीं थी, वह ससुराल आने के लिए तैयार नहीं हुई.

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इस बात को ले कर शंकर टोला गांव में पंचायत बुलाई गई. पंचायत में गांव वालों के साथसाथ रीमा, रीमा के घर वाले, बगल के गांव जैनपुर टोला मोहम्मद बरवा का अनरजीत और पति रविंद्र मौजूद था. पंचायत के सामने रविंद्र ने पत्नी रीमा के सामने घर वापस आने का प्रस्ताव रखा. लेकिन रीमा ने पति का प्रस्ताव नामंजूर कर दिया.

रीमा की बातों से हमदर्दी दिखाते अनरजीत बीचबीच में उछल कर बोलता रहा. अनरजीत की बातों से नाराज रविंद्र ने उसे ललकारा कि बहुत हमदर्द बनते हो तो क्यों नहीं उस से ब्याह कर लेते?

रविंद्र की बातों को अनरजीत ने दिल पर ले लिया और भरी पंचायत में रविंद्र की ललकार चुनौती के रूप में ले ली. उस ने पंचायत के बीच कह दिया कि यदि रीमा राजी हो तो वह उस से ब्याह करने के लिए तैयार है. रीमा ने हामी भर दी. पंचायत वहीं खत्म हो गई. उस दिन के बाद से रीमा और अनरजीत लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे.

बाद में दोनों ने दुर्गा मंदिर बांसस्थान में गंधर्व विवाह कर लिया. इस बिंदु को भी पुलिस ने अपनी जांच में शामिल कर लिया.

पुलिस ने रविंद्र गौड़ से पूछताछ की. लेकिन इस हत्याकांड में उस का कोई हाथ नजर नहीं आया. डेढ़ महीना बीत जाने के बावजूद भी पुलिस जहां से चली थी, फिर वहीं आ कर खड़ी हो गई थी. त्रिकोण कहानी में उल्लिखित बातों का कोई सूत्र नहीं मिला था.

मतलब साफ था अनरजीत और रीमा हत्याकांड में उन की जिंदगी से जुड़ी घटना का कहीं इन्वौल्वमेंट नहीं था. पुलिस यह सोचसोच कर परेशान थी कि आखिर दोहरे हत्याकांड को किस ने और क्यों अंजाम दिया था? पुलिस अभी तक हत्या का मोटिव भी पता नहीं लगा सकी थी.

पुलिस उलझी अंधविश्वास में

इस बीच कहानी में उस समय एक नया मोड़ आ गया, जब मृतका की चाची सीमा के शरीर पर तथाकथित अदृश्य शक्ति ने सवारी कर सभी को चौंका देने वाली बात कही. सीमा बोली, ‘‘मैं रीमा की आत्मा हूं. मुझे पता है कि मेरी और अनरजीत की हत्या किस ने की है?’’

फिर उस ने गांव के 5 लोगों के नाम बताए. सीमा के बताए नामों के आधार पर पुलिस ने पांचों लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. ऐसा करना पुलिस की मजबूरी थी. हत्यारों का अभी तक पता नहीं चला था. पुलिस का तर्क था कि हो सकता है कातिल इन्हीं में से कोई हो.

पुलिस पांचों लोगों से पूरी रात सख्ती से पूछताछ करती रही. लेकिन यहां भी नतीजा शून्य रहा, पूछताछ बेनतीजा निकली.

पांचों आरोपियों का हत्या में कहीं हाथ नहीं मिला तो उन्हें हिदायत दे कर छोड़ दिया गया. पुलिस घटना की तह में जाने के लिए सर्विलांस की मदद ले रही थी. पुलिस मृतकों के फोन की काल डिटेल्स भी निकाल कर कई बार अध्ययन कर चुकी थी. साथ ही मुखबिरों की भी मदद ले रही थी.

पहली अक्तूबर, 2020 को एक मुखबिर ने पुलिस को ऐसी सूचना दी, जिसे सुन कर पुलिस चौंक गई. मुखबिर ने पुलिस को बताया कि घटना से कुछ दिनों पहले लकड़ी तस्कर रहमुद्दीन उर्फ रामदीन का अनरजीत से रुपयों को ले कर विवाद हुआ था. रामदीन उसे देख लेने की धमकी दे कर चला गया था.

मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने अपनी जांच लकड़ी तस्कर रामदीन उर्फ रहमुद्दीन की ओर मोड़ दी. छानबीन के दौरान पता चला कि घटना से महीने भर पहले चोरी से जंगल से सागौन की कीमती लकडि़यां कटवा कर रात के समय ले जाते हुए रामदीन को पुलिस ने धर दबोचा था और गाड़ी सहित लकडि़यां जब्त कर ली थीं.

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रामदीन गाड़ी छुड़ाने के लिए अनरजीत के पास कर्ज मांगने आया था. वह उस के सामने गिड़गिड़ाया भी था, लेकिन अनरजीत ने रुपए देने से इंकार कर दिया था.

महत्त्वपूर्ण सुराग

अनरजीत और रामदीन दोनों पुराने दोस्त थे. वह जानता था कि अनरजीत के पास लाखों रुपए की रकम जमा रहती है. यह रकम वह अपने घर पर ही रखता है. फिर भी मदद करने से इंकार कर रहा है. यह बात रामदीन को चुभ गई थी. छानबीन में पाया गया अनरजीत और रामदीन के बीच वाकई में विवाद हुआ था. इस से शक की सुई रामदीन की ओर घूम गई थी. शक के आधार पर पुलिस ने 5 अक्तूबर, 2020 को रामदीन उर्फ रहमुद्दीन को हिरासत में ले लिया.

पूछताछ में रामदीन ने अपना जुर्म कबूल लिया. पता चला कि रुपयों के लिए उसी ने अनरजीत और उस की पत्नी रीमा की हत्या की थी.

2 महीने से रहस्य बने दोहरे हत्याकांड का पटाक्षेप हो गया. उसी दिन शाम को सीओ कपिलदेव मिश्र ने गुलरिहा थाने में प्रैसवार्ता बुला कर आरोपी रामदीन उर्फ रहमुद्दीन को पेश किया. पत्रकारों के सामने आरोपी रामदीन ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. पूछताछ करने पर अनरजीत और रीमा की हत्या की कहानी ऐसे सामने आई—

अगले भाग में पढ़ें- अनरजीत का हमप्याला था रामदीन

Crime Story: जंगल में चोरी के लिए- पार्ट 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- शैलेंद्र कुमार ‘शैल’ 

40 वर्षीय अनरजीत मूलरूप से गोरखपुर के गुलरिहा थानाक्षेत्र के जैनपुर टोला मोहम्मद बरवा का रहने वाला था. उस के परिवार में मांबाप के अलावा पत्नी संगीता और 2 बेटे थे. अनरजीत ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था, लेकिन मेहनती बहुत था. एक साथ वह कई काम करता था. उस का मुख्य काम रसोई गैस सप्लाई का था. वह गुलरिहा स्थित एक गैस एजेंसी का सब से विश्वासपात्र डिलिवरीमैन था.

वह दिन भर में करीब 10-12 गाड़ी यानी करीब 450 सिलेंडर डिलीवर कर लेता था. शाम तक उस के पास करीब 3 लाख रुपए से ज्यादा की रकम जमा हो जाती थी. यह अनरजीत का रोज का काम था.

इस के साथ ही उस ने अपने घर पर किराने की दुकान भी खोल रखी थी. दुकान उस की पत्नी संगीता चलाती थी. इसी आमदनी से उस ने काफी रुपए बैंक बैलेंस कर लिए थे. वह दोनों बेटों की अच्छी शिक्षा पर पैसे खर्च करता था. बाद के दिनों में उस ने किराए पर चलाने के लिए एक सवारी गाड़ी खरीद ली थी. उस से भी उसे अच्छा मुनाफा हो जाया करता था. कुल मिला कर अनरजीत के घर में रुपयों की कोई कमी नहीं थी. उस का एक ही सपना था कि दोनों बेटे पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़े हो जाएं.

पता नहीं उस की गृहस्थी को किस की बुरी नजर लगी कि सब कुछ चिंदीचिंदी बिखर गया. एक पत्नी के जीवित रहते हुए उस ने शान में आ कर दूसरी शादी कर ली. दूसरी शादी करते ही पहली पत्नी संगीता और अनरजीत के बीच में झगड़ा शुरू हो गया.

संगीता अपनी सौतन रीमा को साथ रखने के लिए कतई तैयार नहीं थी. उस ने पति से साफ कह दिया था कि इसे जहां मन हो, ले जा कर रखो. लेकिन मैं इसे अपने घर में नहीं रहने दूंगी. हार मान कर अनरजीत ने रीमा के मायके शंकर टोला गांव के बाहर जमीन खरीद कर 2 कमरों वाला टिन का मकान बनवा कर रीमा के साथ रहना शुरू कर दिया.

अनरजीत ने भले ही रीमा से गंधर्व विवाह कर लिया था, लेकिन उस ने पहली पत्नी संगीता और बच्चों की देखरेख की जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा था. इस में रीमा की भी रजामंदी थी. पति के इस निर्णय से वह बेहद खुश थी. बल्कि वह तो यहां तक चाहती थी कि वह संगीता के साथ उसी घर में जा कर रहे, जबकि संगीता को यह मंजूर नहीं था. घर में शांति बनी रहे, इसीलिए अनरजीत ने ऐसा किया था.

अनरजीत का हमप्याला था रामदीन

खैर, अनरजीत के शंकर टोला में रहते हुए उस के कई दोस्त बन गए थे, जिस में जंगल डुमरी नंबर- 2, टोला सकलदीपपुर का रहने वाला रामदीन उर्फ रहमुद्दीन उस का हमप्याला था. रामदीन की पैठ अनरजीत के घर के अंदर तक थी. इसलिए वह उस के हर राज को जानता था.

रामदीन लकड़ी का कारोबारी था. जंगल से चोरी से सागौन और अन्य कीमती लकडि़यां काट कर बेचना उस का मुख्य धंधा था.

ऐसा नहीं था कि वह अकेला ही इस काम को अंजाम देता था. इस काम को वह जंगल के अधिकारियों की मिलीभगत से अंजाम देता था. बदले में वह उन्हें मोटी रकम खिलाता था. इसीलिए उस का धंधा रात के अंधेरे में चलता था.

3 अगस्त, 2020 को रामदीन रात के अंधेरे में जंगल से सागौन की बेशकीमती लकडि़यां काट कर चोरी से अपनी गाड़ी पर लाद कर ले जा रहा था. तभी पुलिस ने पकड़ कर उस की गाड़ी सीज कर दी. गाड़ी सीज करने से रामदीन बुरी तरह परेशान हो गया. उस का धंधा बंद हो गया. वह जल्द से जल्द अपनी गाड़ी छुड़ाना चाहता था लेकिन पैसे नहीं होने से वह गाड़ी नहीं छुड़ा पाया.

ऐसे में उसे दोस्त अनरजीत की याद आई. वह उस के पास पहुंचा और अपनी समस्या बता कर उस से एक लाख रुपए कर्ज मांगा. अनरजीत ने रुपए देने से मना किया तो वह दोनों हाथ जोड़ कर उस के सामने गिड़गिड़ाया, मिन्नतें कीं, लेकिन अनरजीत ने रुपए देने से मना कर दिया.

रामदीन जान रहा था कि अनरजीत झूठ बोल रहा है. पैसे होते हुए भी वह देने से मना कर रहा है. उसे अनरजीत का यह व्यवहार काफी नागवार लगा. उसी पल उस के दिमाग में एक खतरनाक योजना ने जन्म लिया.

रामदीन जानता था कि रात के समय अनरजीत के पास लाखों रुपए जमा रहते हैं. क्यों न उस रकम को ही हासिल कर लिया जाए. लेकिन रुपए हासिल करना आसान नहीं था. रुपए कैसे हासिल करने हैं, उस ने यह योजना भी बना ली.

योजना के मुताबिक 5 अगस्त, 2020 की रात 11 बजे रामदीन अनरजीत के घर पहुंचा. उस समय अनरजीत और उस की पत्नी रीमा गहरी नींद में सो रहे थे. दरवाजा भिड़ा हुआ था. जैसे ही उस ने हाथ लगाया दरवाजा भीतर की ओर खुल गया. कमरे में घुसने से पहले उस ने बाहर की ओर देखा. दूरदूर तक कोई दिखाई नहीं दिया तो वह दबे पांव कमरे में घुस गया.

अनरजीत और रीमा दोनों तख्त पर सो रहे थे. अनरजीत को देखते ही रामदीन को गुस्सा आ गया. गुस्से में रामदीन ने अपने पास लाई नुकीली हथौड़ी से नींद में सो रहे अनरजीत के सिर पर जोरदार वार किया. फिर उस पर चाकू से वार किया. अनरजीत नीचे फर्श पर गिर कर मौत के आगोश में समा गया. फिर उस ने रीमा की गरदन पर पास में रखे फावड़े से वार किया, जिस से उस की भी मौत हो गई.

दोनों को मौत के घाट उतारने के बाद रामदीन ने घर की अलमारी को खंगाला.  लेकिन अलमारी से उसे 30 हजार रुपए ही मिले. उस ने सोचा था कि घर में रखे लाखों रुपए हाथ लगेंगे तो सब काम बन जाएगा. लेकिन सब उल्टा हो गया. रुपयों के चक्कर में उस ने 2 जान ले ली थी. फिर जो उस के हाथ आया, उसे ले कर वहां से फरार हो गया.

आखिरकार मुखबिर की सूचना पर 2 महीने बाद पुलिस को घटना का परदाफाश करने में कामयाबी मिल गई. पुलिस ने आरोपी रामदीन से कत्ल में प्रयुक्त नुकीली हथौड़ी और धारदार चाकू बरामद कर लिया. विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने रामदीन उर्फ रहमुद्दीन को कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे मंडलीय कारागार गोरखपुर भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया था. आरोपी रामदीन उर्फ रहमुद्दीन अपने किए का नतीजा सलाखों के पीछे भुगत रहा है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Serial Story: दस्विदानिया भाग 1

दीपक उत्तरी बिहार के छोटे से शहर वैशाली का रहने वाला था. वैशाली पटना से लगभग 30 किलोमीटर दूर है. 1982 में गंगा नदी पर गांधी सेतु बन जाने के बाद वैशाली से पटना आनाजाना आसान हो गया था. वैशाली की अपनी एक अलग ऐतिहासिक पहचान भी है.

दीपक इसी वैशाली के एनएनएस कालेज से बीएससी कर रहा था. उस की मां का देहांत बचपन में ही हो चुका था. उस के पिता रामलाल की कपड़े की दुकान थी. दुकान न छोटी थी न बड़ी. आमदनी बस इतनी थी कि बापबेटे का गुजारा हो जाता था. बचत तो न के बराबर थी. वैशाली में ही एक छोटा सा पुश्तैनी मकान था. और कोई संपत्ति नहीं थी. दीपक तो पटना जा कर पढ़ना चाहता था, पर पिता की कम आमदनी के चलते ऐसा नहीं हो सका.

दीपक अभी फाइनल ईयर में ही था कि अचानक दिल के दौरे से उस के पिता भी चल बसे. उस ने किसी तरह पढ़ाई पूरी की. वह दुकान पर नहीं बैठना चाहता था. अब उसे नौकरी की तलाश थी. उस ने तो इंडियन सिविल सर्विस के सपने देखे थे या फिर बिहार लोक सेवा आयोग के द्वारा राज्य सरकार के अधिकारी के. पर अब तो उसे नौकरी तुरंत चाहिए थी.

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दीपक ने भारतीय वायुसेना में एअरमैन की नियुक्ति का विज्ञापन पढ़ा, तो आवेदन कर दिया. उसे लिखित, इंटरव्यू और मैडिकल टैस्ट सभी में सफलता मिली. उस ने वायुसेना के टैक्नीकल ट्रेड में एअरमैन का पद जौइन कर लिया. ट्रेनिंग के बाद उस की पोस्टिंग पठानकोट एअरबेस में हुई. ट्रेनिंग के दौरान ही वह सीनियर अधिकारियों की प्रशंसा का पात्र बन गया. पोस्टिंग के बाद एअरबेस पर उस की कार्यकुशलता से सीनियर अधिकारी बहुत खुश थे.

वायुसेना के रसियन प्लेन को बीचबीच में मैंटेनैंस के लिए रूस जाना पड़ता था. दीपक के अफसर ने उसे बताया कि उसे भी जल्दी रूस जाना होगा. वह यह सुन कर बहुत खुश हुआ. उस ने जल्दीजल्दी कुछ आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले रसियन शब्द और वाक्य सीख लिए. अपने एक दोस्त, जो 2 बार रूस जा चुका था से हैवी रसियन ओवरकोट भी उधार ले लिया. रूस की जबरदस्त ठंड के लिए यह जरूरी था.

1 महीने के अंदर ही दीपक को एक रसियन प्लेन के साथ बेलारूस की राजधानी मिंस्क जाना पड़ा. उस जहाज का कारखाना वहीं था. तब तक सोवियत संघ का बंटवारा हो चुका था और बेलारूस एक अलग राष्ट्र बन गया था.

अपने दोस्तों की सलाह पर उस ने भारत से कुछ चीजें जो रूसियों को बेहद पसंद थीं रख लीं. ये स्थानीय लोगों को मित्र बनाने में काम आती थीं. चूंकि जहाज अपना ही था, इसलिए वजन की सीमा नहीं थी. उस ने टूथपेस्ट, परफ्यूम, सुगंधित दार्जिलिंग चायपत्ती, ब्रैंडेड कौस्मैटिक आदि साथ रख लिए.

‘‘लेडीज कौस्मैटिक वहां की लड़कियों को इंप्रैस करने में बहुत काम आएंगे,’’ ऐसा चलते समय दोस्तों ने कहा था.

मिंस्क में लैंड करने के बाद दीपक का सामना जोरदार ठंड से हुआ. मार्च के मध्य में भी न्यूनतम तापमान शून्य से थोड़ा नीचे था. मिंस्क में उस के कम से कम 2 सप्ताह रुकने की संभावना थी. खैर, उस के मित्र का ओवरकोट प्लेन से निकलते ही काम आया.

दीपक के साथ पायलट, कोपायलट, इंजीनियर और क्रू  मैंबर्स भी थे. दीपक को एक होटल में एक सहकर्मी के साथ रूम शेयर करना था. वह दोस्त पहले भी मिंस्क आ चुका था. उस ने दीपक को रसियन से दोस्ती के टिप्स भी दिए.

अगले दिन से दीपक को कारखाना जाना था. उस की टीम को एक इंस्ट्रक्टर जहाज के कलपुरजों, रखरखाव के बारे में रूसी भाषा में समझाता था. साथ में एक लड़की इंटरप्रेटर उसे अंगरेजी में अनुवाद कर समझाती थी.

नताशा नाम था उस लड़की का. बला की खूबसूरत थी वह. उम्र 20 साल के आसपास होगी. गोरा रंग तो वहां सभी का होता है, पर नताशा में कुछ विशेष आकर्षण था जो जबरन किसी को उस की तारीफ करने को मजबूर कर देता. सुंदर चेहरा, बड़ीबड़ी नीली आंखें, सुनहरे बाल और छरहरे बदन को दीपक ने पहली बार इतने करीब से देखा था.

दीपक की नजरें बारबार नताशा पर जा टिकती थीं. जब कभी नताशा उस की ओर देखती दीपक अपनी निगाहें फेर लेता. वह धीमे से मुसकरा देती. जब वह सुबहसुबह मिलती तो दीपक हाथ मिला कर रूसी भाषा में गुड मौर्निंग यानी दोबरोय उत्रो बोलता और कुछ देर तक उस का हाथ पकड़े रहता.

नताशा मुसकरा कर गुड मौर्निंग कह आगे बोलती कि प्रस्तिते पजालास्ता ऐक्सक्यूज मी, प्लीज, हाथ तो छोड़ो. तब दीपक झेंप कर जल्दी से उस का हाथ छोड़ देता.

उस की हरकत पर उस के साथी और इंस्ट्रक्टर भी हंस पड़ते थे. लंच के समय कारखाने की कैंटीन में दीपक, नताशा और इंस्ट्रक्टर एक ही टेबल पर बैठते थे. 1 सप्ताह में वे कुछ फ्रैंक हो गए थे. इस में इंडिया से साथ लाए गिफ्ट आइटम्स की अहम भूमिका थी.

नताशा के साथ अब कुछ पर्सनल बातें भी होने लगी थीं. उस ने दीपक को बताया कि रूसी लोग इंडियंस को बहुत पसंद करते हैं. उस के मातापिता का डिवोर्स बहुत पहले हो चुका था और कुछ अरसा पहले मां का भी देहांत हो गया था. उस के पिता चेर्नोबिल न्यूक्लियर प्लांट में काम करते थे और वह उन से मिलती रहती थी.

लगभग 10 दिन बाद दीपक को पता चला कि प्लेन को क्लीयरैंस मिलने में अभी 10 दिन और लगेंगे. एक दिन दीपक ने इंस्ट्रक्टर से कहा कि उस की मास्को देखने की इच्छा है.

इंस्ट्रक्टर ने कहा, ‘‘ओचिन खराशो (बहुत अच्छा) शनिवार को नताशा भी किसी काम से मास्को जा रही है. तुम भी उसी की फ्लाइट से चले जाओ. मात्र 1 घंटे की फ्लाइट है.’’

‘‘स्पासिबा (थैंक्स) गुड आइडिया,’’ दीपक बोला और फिर उसी समय नताशा से फोन पर अपनी इच्छा बताई तो वह बोली नेत प्रौब्लेमा (नो प्रौब्लम).

दीपक बहुत खुश हुआ. उस ने अपने दोस्त से मास्को यात्रा की चर्चा करते हुए पूछा, ‘‘अगर मुझे किसी रूसी लड़की के कपड़ों की तारीफ करनी हो तो क्या कहना चाहिए?’’

जवाब में दोस्त ने उसे एक रूसी शब्द बताया. शनिवार को दीपक और नताशा मास्को पहुंचे. दोनों होटल में आसपास के कमरों में रुके. नताशा ने उसे क्रेमलिन, बोलशोई थिएटर, बैले डांस, रसियन सर्कस आदि दिखाए.

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1 अप्रैल की सुबह दोनों मिले. उसी दिन शाम को उन्हें मिंस्क लौटना था. नताशा नीले रंग के लौंग फ्रौक में थी, कमर पर सुनहरे रंग की बैल्टनुमा डोरी बंधी थी, जिस के दोनों छोरों पर पीले गुलाब के फूलों की तरह झालर लटक रही थी. फ्रौक का कपड़ा पारदर्शी तो नहीं था, पर पतला था जिस के चलते उस के अंत:वस्त्र कुछ झलक रहे थे. वह दीपक के कमरे में सोफे पर बैठी थी.

दीपक बोला, ‘‘दोबरोय उत्रो. तिह क्रासावित्सा (यू आर लुकिंग ब्यूटीफुल).’’

‘‘स्पासिबा (धन्यवाद).’’

वह नताशा की ओर देख कर बोला ‘‘ओचिन खराशो तृसिकी.’’

‘‘व्हाट? तुम ने कैसे देखा?’’

‘‘अपनी दोनों आंखों से.’’

‘‘तुम्हारी आंखें मुझ में बस यही देख रही थीं?’’

फिर अचानक नताशा सोफे से उठ खड़ी हुई और बोली, ‘‘मैं इंडियंस की इज्जत करती हूं.’’

‘‘दा (यस).’’

‘‘व्हाट दा. मैं तुम्हें अच्छा आदमी समझती थी. मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी,’’ और फिर बिना दीपक की ओर देखे कमरे से तेजी से निकल गई.

दीपक को मानो लकवा मार गया. वह नताशा के कमरे के दरवाजे की जितनी बार बैल बजाता एक ही बात सुनने को मिलती कि चले जाओ. मैं तुम से बात नहीं करना चाहती हूं.

उसी दिन शाम की फ्लाइट से दोनों मिंस्क लौट आए. पर नताशा ने अपनी सीट अलग ले ली थी. दोनों में कोई बात नहीं हुई.

अगले दिन लंच के समय कारखाने की कैंटीन में दीपक, उस का मित्र, नताशा और इंस्ट्रक्टर एक टेबल पर बैठे थे. दीपक बारबार नताशा की ओर देख रहा था पर नताशा उसे नजरअंदाज कर देती. दीपक ने इंस्ट्रक्टर के कान में धीरे से कुछ कहा तो इंस्ट्रक्टर ने नताशा से धीरे से कुछ कहा.

नताशा से कुछ बात कर इंस्ट्रक्टर ने दीपक से पूछा, ‘‘तुम ने नताशा से कोई गंदी बात की थी? वह बहुत नाराज है तुम से.’’

‘‘मैं ने तो ऐसी कोई बात नहीं की थी,’’ बोल कर दीपक ने जो आखिरी बात नताशा को कही थी उसे दोहरा दिया.

इंस्ट्रक्टर ने भी सिर पीटते हुए कहा, ‘‘बेवकूफ यह तुम ने क्या कह दिया? इस का मतलब समझते हो?’’

‘‘हां, तुम्हारी ड्रैस बहुत अच्छी है?’’

‘‘नेत (नो), इस का अर्थ तुम्हारी पैंटी बहुत अच्छी है, होता है बेवकूफ.’’

तब दीपक अपने मित्र की ओर सवालिया आंखों से देखने लगा. फिर कहा, ‘‘तुम ने ही सिखाया था यह शब्द मुझे.’’

नताशा भी आश्चर्य से उस की तरफ देखने लगी थी. दोस्त भी अपनी सफाई में बोला, ‘‘अरे यार मैं ने तो यों ही बता दिया था. मुझे लेडीज ड्रैस का यही एक शब्द आता था. मुझे क्या पता था कि तू नताशा को बोलने जा रहा है. आई एम सौरी.’’

फिर नताशा की ओर देख कर बोला, ‘‘आई एम सौरी नताशा. मेरी वजह से यह गड़बड़ हुई है. दरअसल, दीपक ने तुम्हारी ड्रैस की तारीफ करनी चाही होगी… यह बेचारा बेकुसूर है.’’

यह सुन कर सभी एकसाथ हंस पड़े.

दीपक ने नताशा से कहा, ‘‘ईजवीनीते (सौरी) नताशा. मैं ने जानबूझ कर उस समय ऐसा नहीं कहा था.’’

‘‘ईजवीनीते. प्रस्तिते (सौरी, ऐक्सक्यूज मी). हम दोनों गलतफहमी के शिकार हुए.’’

इंस्ट्रक्टर बोला, ‘‘चलो इसे भी एक अप्रैल फूल जोक समझ कर भूल जाओ.’’

इस के बाद नताशा और दीपक में मित्रता और गहरी हो चली. दोनों शालीनतापूर्वक अपनी दोस्ती निभा रहे थे. दीपक तो इस रिश्ते को धीरेधीरे दोस्ती से आगे ले जाना चाहता था, पर कुछ संकोच से, कुछ दोस्ती टूटने के भय से और कुछ समय के अभाव से मन की बात जबान पर नहीं ला रहा था.

इसी बीच दीपक के इंडिया लौटने का दिन भी आ गया था. एअरपोर्ट पर नताशा दीपक को बिदा करने आई थी. उस ने आंखों में छलक आए आंसू छिपाने के लिए रंगीन चश्मा पहन लिया. दीपक को पहली बार महसूस हुआ जैसे वह भी मन की कुछ बात चाह कर भी नहीं कर पा रही है. दीपक के चेहरे की उदासी किसी से छिपी नहीं थी.

‘‘दस्विदानिया, (गुड बाई), होप टु सी यू अगेन,’’ बोल कर दोनों गले मिले.

Serial Story: दस्विदानिया भाग 2

दीपक भारत लौट आया. नताशा से उस का संपर्क फोन से लगातार बना हुआ था. इसी बीच डिपार्टमैंटल परीक्षा और इंटरव्यू द्वारा दीपक को वायुसेना में कमीशन मिल गया. वह अफसर बन गया. हालांकि उस के ऊपर कोई बंदिश नहीं थी, उस के मातापिता गुजर चुके थे, फिर भी अभी तक उस ने शादी नहीं की थी.

इस बीच नताशा ने उसे बताया कि उस के पापा भी चल बसे. उन्हें कैंसर था. संदेह था कि चेर्नोबिल न्यूक्लियर प्लांट में हुई भयानक दुर्घटना के बाद कुछ लोगों में रैडिएशन की मात्रा काफी बढ़ गई थी. शायद उन के कैंसर की यही वजह रही होगी.

पिता की बीमारी में नताशा महीनों उन के साथ रही थी. इसलिए उस ने नौकरी भी छोड़ दी थी. फिलहाल कोई नौकरी नहीं थी और पिता के घर का कर्ज भी चुकाना था. वह एक नाइट क्लब में डांस कर और मसाज पार्लर जौइन कर काम चला रही थी. उस ने दीपक से इस बारे में कुछ नहीं कहा था, पर बराबर संपर्क बना हुआ था.

लगभग 2 साल बाद दीपक दिल्ली एअरपोर्ट पर था. अचानक उस की नजर नताशा पर पड़ी. वह दौड़ कर उस के पास गया और बोला, ‘‘नताशा, अचानक तुम यहां? मुझे खबर क्यों नहीं की?’’

नताशा भी अकस्मात उसे देख कर घबरा उठी. फिर अपनेआप को कुछ सहज कर कहा, ‘‘मुझे भी अचानक यहां आना पड़ा. समय नहीं मिल सका बात करने के लिए…तुम यहां कैसे?’’

‘‘मैं अभी एक घरेलू उड़ान से यहां आया हूं. खैर, चलो कहीं बैठ कर कौफी पीते हैं. बाकी बातें वहीं होंगी.’’

दोनों एअरपोर्ट के रेस्तरां में बैठे कौफी पी रहे थे. दीपक ने फिर पूछा, ‘‘अब बताओ यहां किस लिए आई हो?’’

नताशा खामोश थी. फिर कौफी की चुसकी लेते हुए बोली, ‘‘एक जरूरी काम से किसी से मिलना है. 2 दिन बाद लौट जाऊंगी.’’

‘‘ठीक है पर क्या काम है, किस से मिलना है, मुझे नहीं बताओगी? क्या मैं भी तुम्हारे साथ चल सकता हूं?’’

‘‘नहीं, मुझे वहां अकेले ही जाना होगा.’’

‘‘चलो, मैं तुम्हें ड्रौप कर दूंगा.’’

‘‘नेत, स्पासिबा (नो, थैंक्स). मेरी कार बाहर खड़ी होगी.’’

‘‘कार को वापस भेज देंगे. कम से कम कुछ देर तक तो तुम्हारे साथ ऐंजौय कर लूंगा.’’

‘‘क्यों मेरे पीछे पड़े हो?’’ बोल कर नताशा उठ कर जाने लगी.

दीपक ने उस का हाथ पकड़ कर रोका और कहा, ‘‘ठीक है, तुम जाओ, मगर मुझ से नाराजगी का कारण बताती जाओ.’’

नताशा तो रुक गई, पर अपने आंसुओं को गालों पर गिरने से न रोक सकी.

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दीपक के द्वारा बारबार पूछे जाने पर वह रो पड़ी और फिर उस ने अपनी पूरी कहानी बताई, ‘‘मैं तुम से क्या कहती? अभी तक तो मैं सिर्फ डांस या मसाज करती आई थी पर मैं पिता का घर किसी भी कीमत पर बचाना चाहती हूं. मैं ने एक ऐस्कौर्ट एजेंसी जौइन कर ली है. शायद आने वाले 2 दिन मुझे किसी बड़े बिजनैसमैन के साथ ही गुजारने पड़ेंगे. तुम समझ रहे हो न मैं क्या कहना चाहती हूं? ’’

‘‘हां, मैं समझ सकता हूं. तुम्हें किस ने हायर किया है, मुझे बता सकती हो?’’

‘‘नो, सौरी. हो सकता है जो नाम मैं जानती हूं वह गलत हो. मैं ने भी उसे अपना सही नाम नहीं बताया है. वैसे भी इस प्रोफैशन की बात किसी तीसरे आदमी को हम नहीं बताते हैं. मैं बस इतना जानती हूं कि मुझे 3 दिनों के लिए 4000 डौलर मिले हैं.’’

‘‘तुम उसे फोन करो, उसे पैसे वापस कर देंगे.’’

‘‘नहीं, यह आसान नहीं है. वह मेरी एजेंसी का पुराना भरोसे वाला ग्राहक है.’’

कुछ देर सोचने के बाद दीपक ने कहा ‘‘एक आइडिया है, उम्मीद है काम कर जाएगा. उस का फोन नंबर तो होगा तुम्हारे पास?’’

‘‘नहीं, मुझे होटल का नंबर और रूम नंबर पता है.’’

‘‘गुड, तुम उसे फोन लगाओ और कहो कि तुम्हें कस्टम वालों ने पकड़ लिया है. तुम्हारे पर्स में कुछ ड्रग्स मिले. तुम्हें खुद पता नहीं कि कहां से ड्रग्स पर्स में आ गए और अब वही तुम्हारी सहायता कर सकता है.’’

नताशा ने फोन कर उस बिजनैसमैन से बात कर वैसा ही कहा.

उधर से वह फोन पर गुस्सा हो कर नताशा से बोला, ‘‘यू इडियट, तुम ने मेरे या

इस होटल के बारे में कस्टम औफिसर को क्या बताया है?’’

‘‘सर, मैं ने तो अभी तक कुछ नहीं बताया है… पर परदेश में बस आप का ही सहारा है. आप कुछ कोशिश करें तो मामला रफादफा हो जाएगा. मैं अपने डौलर तो साथ लाई नहीं हूं.’’

‘‘मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता हूं. खबरदार दोबारा फोन करने की कोशिश की.

अब तुम जानो और तुम्हारा काम… भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारे 4000 डौलर,’’ और उस ने फोन काट दिया.

बिजनैसमैन की बातें सुन कर दोनों एकसाथ खुशी से उछल पड़े. नताशा बोली, ‘‘अब तो मेरे डौलर भी बच गए. पापा के घर का काफी कर्ज चुका सकती हूं. मेरा रिटर्न टिकट तो 2 दिन बाद का है. फिर भी मैं कोशिश करती हूं कि आज रात की फ्लाइट मिल जाए,’’ कह वह रसियन एअरलाइन एरोफ्लोट के काउंटर की तरफ बढ़ी.

दीपक ने उसे रोक कर कहा, ‘‘रुको, इस की कोई जरूरत नहीं है. तुम अभी मेरे साथ चलो. कम से कम 2 दिन तो मेरा साथ दो.’’

दीपक ने नताशा को एक होटल में ठहराया. काफी देर दोनों बातें करते रहे. दोनोें एकदूसरे का दुखसुख समझ रहे थे. रात में डिनर के बाद दीपक चलने लगा. उसे गले से लगाते हुए होंठों पर ऊंगली फेरते हुए बोला, ‘‘नताशा, या लुवलुवा (आई लव यू). कल सुबह फिर मिलते हैं. दोबरोय नोचि (गुड नाइट).’’

‘‘आई लव यू टू,’’ दीपक के बालों को सहलाते हुए नताशा ने कहा.

अगले दिन जब दीपक नताशा से मिलने आया तो वह स्कारलेट कलर के सुंदर लौंग फ्रौक में बैठी थी. बिलकुल उसी तरह जैसे मास्को के होटल में मिली थी.

दीपक बोला, ‘‘दोबरोय उत्रो. क्रासावित्सा (गुड मौर्निंग, ब्यूटीफुल).’’

‘‘कौन ब्यूटीफुल है मैं या तृसिकी?’’ वह हंसते हुए बोली ‘‘दोनों.’’

‘‘यू नौटी बौय,’’ बोल कर नताशा दीपक से सट कर खड़ी हो गई.

दीपक ने उसे अपनी बांहों में ले कर कहा, ‘‘अब तुम कहीं नहीं जाओगी. मैं तुम से शादी करना चाहता हूं. मैं कल ही अपनी शादी के लिए औफिस में अर्जी दे दूंगा.’’

‘‘आई लव यू दीपक, पर मुझे कल जाने दो. मैं ने पिता की निशानी बचाने के लिए अपनी अस्मिता दांव पर लगा दी… मुझे अपने देश जा कर सबकुछ ठीक करने के लिए मुझे कुछ समय दो.’’

अगले दिन नताशा एरोफ्लोट की फ्लाइट से मास्को जा रही थी. दीपक उसे छोड़ने दिल्ली एअरपोर्ट आया था. उस के चेहरे पर उदासी देख कर वह बोली, ‘‘उम्मीद है फिर जल्दी मिलेंगे. डौंट गैट अपसैट. बाय, टेक केयर, दस्विदानिया,’’ और वह एरोफ्लोट की काउंटर पर चैक इन करने बढ़ गई. दोनों हाथ हिला कर एकदूसरे से बिदा ले रहे थे.

कुछ दिनों बाद दीपक ने अपने सीनियर से शादी की अर्जी दे कर इजाजत मांगने की बात की तो सीनियर ने कहा, ‘‘सेना का कोई भी सिपाही किसी विदेशी से शादी नहीं कर सकता है, तुम्हें पता है कि नहीं?’’

‘‘सर, पता है, इसीलिए तो पहले मैं इस की इजाजत लेना चाहता हूं.’’

‘‘और तुम सोचते हो तुम्हें इजाजत मिल जाएगी? यह सेना के नियमों के विरुद्ध है, तुम्हें इस की इजाजत कोईर् भी नहीं दे सकता है.’’

‘‘सर, हम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं. मैं शादी उसी से करूंगा.’’

‘‘बेवकूफी नहीं करो, अपने देश में क्या लड़कियों की कमी है?’’

‘‘बेशक नहीं है सर, पर प्यार तो एक से ही किया है मैं ने, सिर्फ नताशा से.’’

‘‘तुम अपना और मेरा समय बरबाद कर रहे हो. तुम्हारा कमीशन पूरा होने में कितना वक्त बाकी है अभी?’’

‘‘सर, अभी तो करीब 12 साल बाकी हैं.’’

‘‘तब 2 ही उपाय हैं या तो 12 साल इंतजार करो या फिर नताशा को अपनी नागरिकता छोड़ने को कहो. और कोई उपाय नहीं है.’’

‘‘अगर मैं त्यागपत्र देना चाहूं तो?’’

‘‘वह भी स्वीकार नहीं होगा. देश और सेना के प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य बनता है जो प्यार से ज्यादा जरूरी है, याद रखना.’’

‘‘यस सर, मैं अपनी ड्यूटी भी निभाऊंगा… मैं कमीशन पूरा होने तक इंतजार करूंगा,’’ कह वह सोचने लगा कि पता नहीं नताशा इतने लंबे समय तक मेरी प्रतीक्षा करेगी या नहीं. फिर सोचा कि नताशा को सभी बातें बता दे.

दीपक ने जब नताशा से बात की तो उस ने कहा, ‘‘12 साल क्या मैं कयामत तक तुम्हारा इंतजार कर सकती हूं… तुम बेशक देश के प्रति अपना फर्ज निभाओ. मैं इंतजार कर लूंगी.’’

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Serial Story: दस्विदानिया भाग 3

नताशा से बात कर दीपक को खुशी हुई. दोनों में प्यारभरी बातें होती रहती थीं. वे बराबर एकदूसरे के संपर्क में रहते. धीरेधीरे समय बीतता जा रहा था. करीब 2 साल बाद एक बार नताशा दीपक से मिलने इंडिया आई थी. दीपक ने महसूस किया उस के चेहरे पर पहले जैसी चमक नहीं थी. स्वास्थ्य भी कुछ गिरा सा लग रहा था.

दीपक के पूछने पर उस ने कहा, ‘‘कोई खास बात नहीं है, सफर की थकावट और थोड़ा सिरदर्द है.’’

दोनों में मर्यादित प्रेम संबंध बना हुआ था. एक दिन बाद नताशा ने लौटते समय कहा, ‘‘इंतजार का समय 2 साल कम हो गया.’’

‘‘हां, बाकी भी कट जाएगा.’’

बेलारूस लौटने के बाद से नताशा का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था. कभी जोर से सिरदर्द, कभी बुखार तो कभी नाक से खून बहता. सारे टैस्ट किए गए तो पता चला कि उसे ब्लड कैंसर है. डाक्टर ने बताया कि फिलहाल दवा लेती रहो, पर 2 साल के अंदर कुछ भी हो सकता है. नताशा अपनी जिंदगी से निराश हो चली थी. एक तरफ अकेलापन तो दूसरी ओर जानलेवा बीमारी. फिर भी उस ने दीपक को कुछ नहीं बताया.

इधर कुछ महीने बाद दीपक को 3-4 दिनों से तेज बुखार था.

वह अपने एअरफोर्स के अस्पताल में दिखाने गया. उस समय फ्लाइट लैफ्टिनैंट डाक्टर ईशा ड्यूटी पर थीं. चैकअप किया तो दीपक को 103 डिग्री से ज्यादा ही फीवर था.

डाक्टर बोली, ‘‘तुम्हें एडमिट होना होगा. आज फीवर का चौथा दिन है…कुछ ब्लड टैस्ट करूंगी.’’

दीपक अस्पताल में भरती था. टैस्ट से पता चला कि उसे टाईफाइड है.

डा. ईशा ने पूछा, ‘‘तुम्हारे घर में और कौनकौन हैं, आई मीन वाइफ, बच्चे?’’

‘‘मैं बैचलर हूं डाक्टर… वैसे भी और कोई नहीं है मेरा.’’

‘‘डौंट वरी, हम लोग हैं न,’’ डाक्टर उस की नब्ज देखते हुए बोलीं.

बीचबीच में कभीकभी दीपक का खुबार 103 से 104 डिग्री तक हो जाता तो वह नताशानताशा पुकारता. डा. ईशा के पूछने पर उस ने नताशा के बारे में बता दिया. डाक्टर ने नताशा का फोन नंबर ले कर उसे फोन कर दिया. 2 दिन बाद नताशा दीपक से मिलने पहुंच गई. उस दिन दीपक का फीवर कम था. नताशा उस के कैबिन में दीपक के बालों को सहला रही थी.

तभी डा. ईशा ने प्रवेश किया. बोलीं, ‘‘आई एम सौरी, मैं बाद में आ जाती हूं. बस रूटीन चैकअप करना है. आज इन्हें कुछ आराम है.’’

दीपक बोला, ‘‘नहीं डाक्टर, आप को जाने की जरूरत नहीं है. आप अपना काम कर लें… अब नताशा आ गई है, तो मैं ठीक हो जाऊंगा.’’

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डा. ईशा ने नताशा से पूछा, ‘‘तुम इंडिया कितने दिनों के लिए आई हो?’’

‘‘ज्यादा से ज्यादा 2 दिन तक रुक सकती हूं.’’

‘‘ठीक है, इन का बुखार उतरना शुरू हो गया है. उम्मीद है कल तक कुछ और आराम मिलेगा.’’

डाक्टर के जाने के बाद दीपक ने नताशा से पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? थकीथकी लग रही हो?’’

‘‘नहीं, मैं बिलकुल ठीक हूं. तुम आराम करो. मैं अभी चलती हूं. फिर आऊंगी शाम को विजिटिंग आवर्स में.’’

नताशा डा. ईशा से मिलने उन के कैबिन में गई तो डा. ईशा बोलीं, ‘‘आप लंच मेरे साथ लेंगी… मेरे क्वार्टर में आ जाना, मैं वेट करूंगी.’’

लंच के बाद नताशा डा. ईशा से बैठी बातें कर रही थी. डा. ईशा ने कहा, ‘‘क्या बात है, इंडियन खाना पसंद नहीं आया? तुम ने तो कुछ खाया ही नहीं. तुम्हें तो इंडियन खाने की आदत डालनी होगी.’’

‘‘नहीं, खाना बहुत अच्छा था. मैं ने भरपेट खा लिया है.’’

‘‘दीपक तुम्हें बहुत चाहते हैं… तुम्हारे लिए लंबा इंतजार करने को तैयार हैं.’’

उसी समय नताशा के सिर में जोर का दर्द हुआ और नाक से खून रिसने लगा. डा. ईशा उसे सहारा दे कर वाशबेसिन तक ले गई, फिर बैड पर आराम करने के लिए लिटा दिया और पूछा, ‘‘तुम्हें क्या तकलीफ है और ऐसा कितने दिनों से हो रहा है?’’

नताशा ने अपने बैग से दवा खाई और अपनी पूरी बीमारी विस्तार से बता दी. फिर अपनी फाइल और रिपोर्ट उन्हें दिखा कर कहा, ‘‘अब मेरी जिंदगी कुछ ही महीनों की बची है. डाक्टर ने कहा है कि ज्यादा से ज्यादा 1 साल. मैं चाहती हूं आप दीपक को धीरेधीरे समझाएं… हो सकता है मैं इस के बाद अब उस से मिल न सकूं, क्योंकि लंबी यात्रा के लायक नहीं रहूंगी.’’

अगले दिन दीपक को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. वह अपने क्वार्टर में नताशा के साथ था. नताशा को अगले दिन जाना था. दीपक बोला, ‘‘मैं तो एअरफोर्स में हूं, मेरा विदेश जाना संभव नहीं है. तुम्हीं मिलने आ जाया करो. मुझे बहुत अच्छा लगता है तुम से मिल कर.’’

‘‘अच्छा तो मुझे भी लगता है, पर मुझे लगता है तुम्हारी देखभाल करने वाला कोई यहां होना चाहिए. मेरे इंतजार में कहीं तुम्हारे स्वास्थ्य पर बुरा असर न पड़े.’’

‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा. मैं वेट कर लूंगा.’’

नताशा जा रही थी. दीपक से बिदा लेते समय उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. डाक्टर ने दीपक को एअरपोर्ट जाने से मना कर दिया था.

नताशा बोली, ‘‘दस्विदानिया, दोस्त.’’

डा. ईशा नताशा के साथ एअरपोर्ट आई थीं.

नताशा बोली, ‘‘डाक्टर, अब मैं दीपक से मिलने नहीं आ सकती हूं…आप समझ ही रही हैं न… मैं ने दीपक से कुछ नहीं कहा है. पर आप उसे सच बता दीजिएगा.’’

नताशा चली गई. डा. ईशा ने उस की बीमारी के बारे में दीपक को बता दिया. वह बहुत दुखी हुआ. डा. ईशा दीपक से अकसर मिलने आतीं और उसे समझातीं. लगभग 6 महीने बाद नताशा का आखिरी फोन उसे मिला. वह अस्पताल में अंतिम सांसें गिन रही थी.

नताशा ने कहा, ‘‘सौरी दोस्त, मैं अब और तुम्हारा इंतजार नहीं कर सकती हूं. किसी भी पल आखिरी सांस ले सकती हूं. टेक केयर औफ योरसैल्फ. दस्विदानिया, प्राश्चे नवसेदगा (गुड बाय सदा के लिए).’’

करीब आधे घंटे के बाद नताशा की मृत्यु की खबर दीपक को मिली. वह बहुत दुखी हुआ. उस की आंखों से भी लगातार आंसू बह रहे थे. डा. ईशा दीपक को सांत्वना दे रही थी.

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बीमारी के बाद दीपक और ईशा दोनों अकसर मिलने लगे थे. एक दिन दोनों साथ बैठे थे. दीपक थोड़ा सहज हो चला था. वह बोला, ‘‘अकेलापन काटने को दौड़ता है.’’

‘‘आप देश के बहादुर सैनिक हो. अपना मनोबल बनाए रखो. ड्यूटी के बाद कुछ अन्य कार्यों में अपनेआप को व्यस्त रखो.’’

‘‘मैं नताशा को भुला नहीं पा रहा हूं.’’

‘‘यादें इतनी आसानी से नहीं भूलतीं, पर कभीकभी यादों को हाशिए पर रख कर जिंदगी में आगे बढ़ना होता है. मैं भी उसे कहां भूल सकी हूं.’’

‘‘किसे?’’

‘‘फ्लाइंग अफसर राकेश से मेरी शादी तय हुई थी. हम दोनों एकदूसरे को चाहते भी थे, पर एक टैस्ट फ्लाइट के क्रैश होने से वह नहीं रहा.’’

‘‘उफ , सो सौरी.’’

कुछ दिन बाद क्लब में डा. ईशा और दीपक एक सीनियर अफसर स्क्वाड्रन लीडर उमेश के साथ बैठे थे. उमेश ने कहा, ‘‘तुम दोनों की कहानी मिलतीजुलती है. क्यों न तुम दोनों एक हो कर एकदूसरे के सुखदुख में साथ दो.’’

डा. ईशा और दीपक एकदूसरे को देखने लगे. उमेश ने महसूस किया कि दोनों की आंखों से स्वीकृति का भाव साफ छलक रहा है.

Crime Story: अतीक अहमद खूंखार डौन की बेबसी

अतीक अहमद खूंखार डौन की बेबसी: भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

अतीक अहमद सपा के मुलायम सिंह जैसे बड़े नेताओं की शह पर बारबार विधायक बना और मनमाने अपराध करता, कराता रहा. जिस के बल पर उस ने अरबों की संपत्ति बनाई. लेकिन योगी सरकार ने उस के पर कतर दिए हैं. उत्तर प्रदेश सरकार उसे रखने के लिए भले ही साबरमती जेल को हर तीसरे महीने 3 लाख रुपए दे रही है, लेकिन अब वह शायद ही…

उत्तर प्रदेश के माफिया डौन अतीक अहमद की 300 करोड़ की 27 से अधिक संपत्तियों पर योगी सरकार ने बुलडोजर चलवा दिया है. जबकि अतीक अहमद इस समय गुजरात के अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद है.

 यह माफिया डौन 5-5 बार उत्तर प्रदेश विधानसभा का इलाहाबाद पश्चिमी सीट से चुनाव जीत कर विधायक, तो एक बार इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से सांसद रह चुका है. अतीक अहमद पर इस समय हत्या, अपहरण, वसूली, मारपीट सहित 188 मुकदमे दर्ज हैं. जून, 2019 से अतीक अहमद गुजरात के अहमदाबाद की साबरमती जेल में हाई सिक्युरिटी जोन में बंद है.

 माफिया डौन अतीक अहमद का इतना आतंक है कि उत्तर प्रदेश की 4-4 जेलें उसे संभाल नहीं सकीं. इन जेलों के जेलरों ने स्वयं सरकार से कहा कि हम इस डौन को नहीं संभाल सकते.

 इस का कारण यह था कि अतीक जब उत्तर प्रदेश के जिला देवरिया की जेल में बंद था, तब उस ने अपने गुंडों से लखनऊ के एक बिल्डर मोहित जायसवाल को जेल में बुला कर बहुत मारापीटा था और उस से उस की प्रौपर्टी के कागजों पर दस्तखत करा लिए थे.

 अतीक अहमद ने अपना आतंक फैलाने के लिए इस मारपीट का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया था, जिस से लोगों में उस की दहशत बनी रहे. इस वीडियो को देखने के बाद राज्य में हड़कंप मचा तो अतीक अहमद को देवरिया की जेल से बरेली जेल भेजा गया. पर बरेली जेल के जेलर ने स्पष्ट कह दिया कि इस आदमी को वह नहीं संभाल सकते.

 लोकसभा के चुनाव सामने थे. अतीक को कड़ी सुरक्षा में रखना जरूरी था. इसलिए इस के बाद उसे इलाहाबाद की नैनी जेल में शिफ्ट किया गया. उधर देवरिया जेल कांड का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. कोर्ट ने सीबीआई को मुकदमा दर्ज कर जांच के आदेश दिए.

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 सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अतीक अहमद, उस के बेटे के अलावा 4 सहयोगियों सहित 10-12 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ. जब अतीक के सारे कारनामों की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल, 2019 को यूपी सरकार को अतीक अहमद को राज्य के बाहर किसी अन्य राज्य की जेल में शिफ्ट करने का आदेश दिया.

atiq-ahmad

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भेजा गुजरात

 सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 3 जून, 2019 को उत्तर प्रदेश सरकार ने गुजरात सरकार के नाम 3 लाख रुपए का ड्राफ्ट जमा करा कर अतीक को फ्लाइट से अहमदाबाद भेजा. फिलहाल वह गुजरात के अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद है.

 यह 3 लाख रुपए का ड्राफ्ट अतीक अहमद को जेल में रखने का मात्र 3 महीने का खर्च था. उस के बाद हर 3 महीने पर अतीक अहमद को अहमदाबाद की जेल में रखने का खर्च उत्तर प्रदेश का कारागार विभाग गुजरात सरकार को भेजता है.

 पिछले 40 सालों में अतीक अहमद ने अपनी धाक राजनीतिक पहुंच के बल पर ऐसी बनाई है कि उस के सामने कोई आंख मिला कर बात करने का साहस नहीं कर सकता. 5 फुट 6 इंच की ऊंचाई और जबरदस्त शरीर वाले अतीक अहमद की आंखें ही इतनी खूंखार हैं कि किसी को उस के सामने देख कर बात करने का साहस ही नहीं होता.

अतीक अहमद के सामने जो भी सीना तान कर आया, उस की हत्या करा दी गई. उस पर 6 से अधिक हत्या के मामले चल रहे हैं. इस डौन के गैंग में 120 से भी अधिक शूटर हैं. पुलिस ने अतीक अहमद के गैंग का नाम आईएस (इंटर स्टेट) 227 रखा है. इस के गैंग का मुख्य कारोबार इलाहाबाद और आसपास के इलाके में फैला है. अतीक अहमद ने साबित कर दिया है कि पुलिस गुलाम है और सरकार के नेता वोट के लालच में कुछ भी कर सकते हैं. किसी भी डौन को नेता बना सकते हैं. अतीक अहमद की कहानी में मोड़ 1979 से आया.

10 अगस्त, 1962 को पैदा हुए अतीक अहमद के पिता इलाहाबाद में तांगा चलाते थे. इलाहाबाद के मोहल्ला चकिया के रहने वाले फारुक तांगे वाले के रूप में मशहूर पिता के संघर्ष को अतीक ने करीब से देखा था. हाईस्कूल में फेल हो जाने के बाद उस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. 17 साल की उम्र में उस पर कत्ल का पहला इल्जाम लगा था. उस के बाद वह अपराध की दुनिया में कूद पड़ा.

 यह तब की बात है, जब इलाहाबाद में नए कालेज बन रहे थे, उद्योग लग रहे थे. जिस की वजह से खूब ठेके बंट रहे थे. तभी कुछ नए लड़कों में अमीर बनने का ऐसा चस्का लगा कि वे अमीर बनने के लिए कुछ भी करने को तैयार थे. कुछ भी यानी हत्या, अपहरण और रंगदारी की वसूली.

 अमीर बनने का चस्का अतीक को भी लग चुका था. 17 साल की उम्र में ही उस पर एक कत्ल का इल्जाम लग चुका था, जिस की वजह से लोगों में उस की दहशत बैठ गई थी. उस का भी धंधा चल निकला. वह ठेके लेने लगा, रंगदारी वसूली जाने लगी.

 उस समय इलाहाबाद का डौन चांदबाबा था. पुराने शहर में उस का ऐसा खौफ था कि उस के सामने किसी की बोलने की हिम्मत नहीं होती थी. चौक और रानीमंडी के उस के इलाके में पुलिस भी जाने से डरती थी. कहा जाता है कि उस के इलाके में अगर कोई खाकी वर्दी वाला चला जाता था तो बिना पिटे नहीं आता था.

 तब तक अतीक 20-22 साल का ठीकठाक गुंडा माना जाने लगा था. चांदबाबा का खौफ खत्म करने के लिए नेता और पुलिस एक खौफ को खत्म करने के लिए दूसरे खौफ को शह दे रहे थे. इसी का नतीजा था कि अतीक बड़े गुंडे के रूप में उभरने लगा. परिणाम यह निकला कि वह चांदबाबा से ज्यादा पुलिस के लिए खतरा बनता गया.

अतीक ने बना लिया अपना गैंग

 अतीक अहमद ने इलाहाबाद में अपना गैंग बना लिया था. अपने इसी गैंग की मदद से वह इलाहाबाद के लिए ही नहीं, अगलबगल के कस्बों के लिए भी आतंक का पर्याय बन गया था. केवल गैंग बना लेना ही बहादुरी नहीं होती, गैंग का खर्च, उन के मुकदमों का खर्च, हथियार खरीदने के लिए पैसे आदि की भी व्यवस्था करनी होती है. इस के लिए अतीक गैंग की मदद से इलाहाबाद के व्यापारियों का अपहरण कर फिरौती तो वसूलता ही था, शहर में रंगदारी भी वसूली जाने लगी थी.

 इस तरह अतीक अहमद पुलिस के लिए चांदबाबा से भी ज्यादा खतरनाक बन गया था. पुलिस उसे और उस के गैंग के लड़कों को गलीगली खोज रही थी.

 आखिर एक दिन पुलिस बिना लिखापढ़ी के अतीक को उठा ले गई. उसे कहां ले जाया गया, कुछ पता नहीं था. यह सन 1986 की बात है.

उस समय राज्य में वीर बहादुर सिंह की सरकार थी तो केंद्र में राजीव गांधी की. अतीक को पुलिस कहां ले गई, इस की किसी को खबर नहीं थी. सभी को लगा कि अब उस का खेल खत्म हो चुका है.

काफी खोजबीन की गई. जब कहीं उस का कुछ पता नहीं चला तो इलाहाबाद के ही एक कांग्रेसी सांसद को सूचना दी गई. कहा जाता है कि वह सांसद राजीव गांधी के बहुत करीबी थे. उन्होंने राजीव गांधी से बात की. दिल्ली से लखनऊ फोन आया और लखनऊ से इलाहाबाद.

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उस के बाद पुलिस ने उसे छोड़ दिया. लेकिन ऐसे ही नहीं. अतीक भेष बदल कर अपने एक साथी के साथ बुलेट से कचहरी पहुंचा. उस ने एक पुराने मामले की जमानत तुड़वा कर आत्मसमर्पण कर दिया और जेल चला गया. उस के जेल जाते ही पुलिस उस पर टूट पड़ी. उस पर एनएसए लगा दिया. इस से लोगों को लगा कि अतीक बरबाद हो गया है.

एक साल बाद वह जेल से बाहर आ गया. उसे कांग्रेसी सांसद का साथ मिल ही रहा था, जिस की वजह से वह जिंदा बचा था. इस बात से अतीक को पता चल गया था कि उसे अब राजनीति ही बचा सकती है. फिर उस ने किया भी यही.

1989 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव होना था. अतीक अहमद ने इलाहाबाद पश्चिमी सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पर्चा भर दिया. सामने उम्मीदवार के रूप में था चांदबाबा. चांदबाबा और अतीक में अब तक कई बार गैंगवार हो चुकी थी.

अपराध जगत में अतीक की तरक्की चांदबाबा को खल रही थी. चांदबाबा के आतंक से छुटकारा पाने के लिए आम लोगोें ने ही नहीं, पुलिस और राजनीतिक पार्टियों ने भी अतीक अहमद का समर्थन किया. परिणामस्वरूप चांदबाबा चुनाव हार गया. इस तरह अतीक अहमद पहली बार विधायक बन गया.

विधायक चुने जाने के कुछ ही महीनों बाद अतीक अहमद ने चांदबाबा की भरे बाजार हत्या करा दी. इस के बाद चांदबाबा के पूरे गैंग का सफाया हो गया. कुछ मारे गए तो कुछ भाग गए. जो बचे वे अतीक के साथ मिल गए.

 अब इलाहाबाद पर एकलौते डौन अतीक अहमद का राज हो गया. अतीक अहमद ने अपना एक पूरा गैंग बना लिया. उसे राजनीतिक सपोर्ट भी मिल रहा था. विधायक बनने के बाद तो व्यापारियों का अपहरण, रंगदारी की वसूली, सरकारी ठेके लेना अतीक अहमद का धंधा बन गया.

 अतीक अहमद का इलाहाबाद में ऐसा आतंक छा गया था कि इलाहाबाद पश्चिमी सीट से लोग चुनाव में विधायकी का टिकट लेने से खुद ही मना कर देते थे.

राजनीति में आने के बाद ज्यादातर अपराधी धीरेधीरे अपराध करना छोड़ देते हैं, पर अतीक के मामले में इस का उल्टा था. अतीक भले ही नेता बन गया था, लेकिन उस ने अपनी माफिया वाली छवि नहीं बदली.

सफेदपोश बनने के बाद उस के द्वारा किए जाने वाले अपराध और बढ़ गए थे. राजनीति की आड़ में वह अपना आपराधिक साम्राज्य और मजबूत करता रहा. यही वजह है कि उस पर दर्ज होने वाले ज्यादातर आपराधिक मुकदमे विधायक, सांसद रहते हुए ही दर्ज हुए.

वह अपने विरोधियों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ता था. कोई एक अपराध नहीं था उस का. 1999 में चांदबाबा की हत्या, 2002 में नस्सन की हत्या, 2004 में मुरली मनोहर जोशी के करीबी बताए जाने वाले भाजपा नेता अशरफ की हत्या, 2005 में राजू पाल की हत्या उस के खाते में दर्ज हुईं.

जो भी अतीक के खिलाफ सिर उठाता था, वह मारा जाता था. इलाहाबाद के कसारी मसारी, बेली गांव, चकिया, मरियाडीह और धूमनगंज इलाके में उस की अक्सर गैंगवार होती रहती थी.

 विधायक बनने के बाद अतीक ने अपराध करना और बढ़ा दिया था. 1991 और 1993 के विधानसभा के चुनाव में भी अतीक अहमद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधायक चुना गया.

1996 के विधानसभा के चुनाव में मुलायम सिंह ने अतीक अहमद को अपनी समाजवादी पार्टी से टिकट दिया. इस तरह चौथी बार अतीक अहमद समाजवादी पार्टी से फिर विधायक चुना गया.

बाद में किसी वजह से अतीक अहमद के समाजवादी पार्टी से संबंध बिगड़ गए तो 1999 में अतीक अहमद अपना दल में शामिल हो गया. सोनेलाल पटेल द्वारा बनाई गई पार्टी अपना दल में अतीक अहमद 1999 से 2003 तक इलाहाबाद का पार्टी का जिला अध्यक्ष रहा. 1999 में उस ने अपना दल से चुनाव लड़ा, परंतु हार गया. उस के बाद 2003 में फिर एक बार अपना दल के टिकट से अतीक अहमद पांचवीं बार विधायक बना.

विदेशी गाडि़यों और हथियारों का शौक

जिस सांसद ने अतीक पर हाथ रखा था, वह इलाहाबाद के बड़े कारोबारी थे. कहते हैं कि उस समय शहर में सिर्फ उन्हीं के पास निसान और मर्सिडीज जैसी विदेशी गाडि़यां थीं. लेकिन जल्दी ही अतीक को भी इस का चस्का लग गया. विधायक बनने के कुछ ही दिनों बाद उस ने भी विदेशी गाड़ी खरीद ली. जल्दी ही उस का नाम सांसद से भी बड़ा हो गया.

सांसद को यह बात इतनी नागवार गुजरी कि उन्होंने विदेशी गाडि़यां रखनी ही छोड़ दीं. गाडि़यों के बाद नंबर था हथियारों का. इस तरह के आदमी को तो वैसे भी हथियारों की जरूरत होती है. उस ने विदेशी हथियार खरीदने शुरू किए. उस ने विदेशी गाडि़यों का तो पूरा काफिला ही खड़ा कर दिया था.  अतीक किया तक ही सीमित नहीं रहना चाहता था. इसलिए वह विरोधियों को खत्म कर देता था.

अतीक अहमद का एक रहस्य और भी दिलचस्प है. वह चुनाव के दौरान चंदा किसी को फोन कर के या डराधमका कर नहीं मांगता था. वह शहर के पौश इलाके में बैनर लगवा देता था कि आप का प्रतिनिधि आप से सहयोग की अपेक्षा रखता है. इस के बाद लोग खुद ही अतीक के औफिस में चंदा पहुंचा देते थे.

अगर अतीक को अपने गुर्गों को कोई संदेश देना होता तो वह बाकायदा अखबारों में विज्ञापन निकलवा देता कि क्या करना है और क्या नहीं करना.

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी. 2004 में लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई. मुलायम सिंह को बाहुबली नेताओं की जरूरत थी. मुलायम सिंह के कहने पर अतीक अहमद फिर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गया तो इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से सपा ने अतीक अहमद को उम्मीदवार बनाया. अतीक अहमद चुनाव जीत गया और सांसद बन गया.

अगले भाग में पढ़ें-  अतीक अहमद एक बार फिर हुआ गिरफ्तार

अतीक अहमद खूंखार डौन की बेबसी: भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

अतीक अहमद के सांसद बन जाने पर इलाहाबाद पश्चिमी विधानसभा की सीट खाली हो गई. इस पर अतीक अहमद ने अपने भाई अशरफ को चुनाव लड़ाया. अशरफ के सामने एक समय अतीक अहमद का ही दाहिना हाथ रहे राजू पाल को बहुजन समाज पार्टी ने उम्मीदवार बनाया. उस समय राजू पाल पर 25 मुकदमे दर्ज थे. इस चुनाव में अतीक का भाई अशरफ 4 हजार वोटों से चुनाव हार गया और राजू पाल चुनाव जीत गया.

राजू पाल की यह जीत अतीक अहमद से हजम नहीं हुई और परिणाम आने के महीने भर बाद यानी नवंबर, 2004 में राजू पाल के औफिस के पास बमबाजी और फायरिंग हुई. दिसंबर में उस की गाड़ी पर फायरिंग हुई. पर इन दोनों हमलों मे वह बच गया.

25 जनवरी, 2005 को राजू पाल की कार पर एक बार फिर हमला हुआ. इस में राजू पाल को कई गोलियां लगीं. हमलावर फरार हो गए. गोलीबारी में घायल राजू पाल के साथी उसे टैंपो से अस्पताल ले जा रहे थे तो हमलावरों को लगा कि राजू पाल अभी जिंदा है तो उस पर दोबारा हमला किया गया. इस बार उस पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई गईं. जब तक राजू जीवनज्योति अस्पताल पहुंचता, उस की मौत हो चुकी थी. उसे 19 गोलियां लगी थीं.

इस हत्या का एक कारुणिक पहलू यह था कि हत्या के 9 दिन पहले ही राजू पाल की शादी हुई थी. उस की पत्नी पूजा पाल ने अतीक, उस के भाई अशरफ, फरहान और आबिद समेत कई लोगों पर नामजद हत्या का मुकदमा दर्ज कराया.

एक विधायक की हत्या के बाद भी अतीक सत्ताधारी सपा में बने रहा. इस हत्या के बाद बसपा के समर्थकों ने इलाहाबाद शहर में जम कर हंगामा किया और खूब तोड़फोड़ की.

2005 में इलाहाबाद पश्चिमी सीट पर फिर उपचुनाव हुआ, जिस में राजू पाल की पत्नी पूजा पाल को बसपा की ओर से टिकट दिया गया. इस बार भी पूजा के सामने अतीक का भाई अशरफ ही था. उस समय तक पूजा के हाथ की मेहंदी भी नहीं उतरी थी.

कहा जाता है कि चुनाव प्रचार के दौरान पूजा मंच से अपने हाथ दिखा कर रोने लगती थी. लेकिन पूजा को जनता का समर्थन नहीं मिला और वह चुनाव हार गई.

अतीक का टूटा किला

इस बार अतीक का भाई अशरफ चुनाव जीत गया. ऐसा शायद अतीक के खौफ के कारण हुआ था. इस तरह एक बार फिर अतीक की धाक जम गई. वह खुद सांसद था ही, भाई भी विधायक हो गया था. उसी समय उस पर सब से ज्यादा आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए.

अतीक अहमद पर 83 से अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज हो चुके थे. परंतु हैरानी की बात यह थी कि उत्तर प्रदेश पुलिस अतीक अहमद को गिरफ्तार करने के बारे में सोच भी नहीं रही थी.

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2007 के विधानसभा के चुनाव में एक बार फिर इलाहाबाद पश्चिमी सीट पर बसपा ने राजू पाल की पत्नी पूजा पाल को चुनाव में उतारा. इस बार भी सामने अतीक का भाई अशरफ ही उम्मीदवार था. इस बार पहली दफा इलाहाबाद पश्चिमी  का अतीक अहमद का किला टूटा. पूजा पाल चुनाव जीत गई.

उत्तर प्रदेश में मायावती की पूर्ण बहुमत से सरकार बनी तो मायावती ने अतीक अहमद को पहला टारगेट बनाया. मायावती के जहन में गेस्टहाउस कांड के जख्म हरे थे. इस मामले में बसपा सरकार के रहते मुलायम सिंह के इशारे पर अतीक ने गेस्टहाउस में ठहरी मायावती को बेइज्जत किया था.

एक के बाद एक कर सारे मामले खुलने लगे और मायावती सरकार ने एक ही दिन में अतीक अहमद पर सौ से अधिक मामले दर्ज करा कर औपरेशन अतीक शुरू कर दिया. अतीक भूमिगत हो गया तो उसे मोस्टवांटेड घोषित कर दिया गया और उस पर 20 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया गया.

देश के इतिहास में एक सांसद मोस्टवांटेड घोषित हो गया हो और उस पर 20 हजार रुपए का इनाम घोषित किया गया हो, यह शायद देश का पहला मामला था. इस से पार्टी की बदनामी होने लगी तो मुलायम सिंह ने उसे पार्टी से बाहर कर दिया.

गिरफ्तारी के डर से अतीक फरार था. उस के घर, औफिस सहित 5 संपत्ति को कोर्ट के आदेश पर कुर्क कर लिया गया.

माफिया से माननीय बनने का खूनी सफर: भाग 5

जिस इलाहाबाद में अतीक की तूती बोलती थी, पूजा पाल ने चुनाव जीतते ही बसपा सरकार में उस की नाक में ऐसा दम किया कि जिस सीट से वह 5 बार विधायक बना था, उस सीट को ही नहीं, उसे इलाहाबाद जिले को ही छोड़ कर भागना पड़ा.

अतीक अहमद समझ गया था कि उत्तर प्रदेश पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करना खतरे से खाली नहीं होगा, इसलिए उस ने दिल्ली पुलिस के सामने योजना के तहत आत्मसमर्पण कर दिया. अतीक अहमद को उत्तर प्रदेश पुलिस दिल्ली से इलाहाबाद ले आई. अतीक के बुरे दिन शुरू हो चुके थे. पुलिस और विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने अतीक की ड्रीम निर्माण परियोजना अलीना सिटी को अवैध घोषित कर ध्वस्त कर दिया.

औपरेशन अतीक के ही तहत 5 जुलाई, 2007 को राजू पाल हत्याकांड के मुख्य गवाह उमेश पाल ने अतीक के खिलाफ धूमनगंज थाने में अपहरण और जबरन बयान दिलाने का मुकदमा दर्ज कराया.

इस के बाद 4 अन्य गवाहों की ओर से भी उस के खिलाफ मामले दर्ज कराए गए. 2 महीने में ही अतीक के खिलाफ इलाहाबाद, कौशांबी और चित्रकूट में कई मुकदमे दर्ज हो गए. पर सपा की सरकार बनते ही उस के दिन बहुरने लगे.

2012 का साल था. अतीक अहमद जेल में था और विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी थी. उस ने जेल में रहते हुए ही अपना दल की ओर से अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की. चुनाव का पर्चा दाखिल करने के बाद अतीक अहमद ने जमानत पर छूटने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की. उसे जमानत मिल गई और वह जेल से बाहर आ गया.

बहुजन समाज पार्टी ने एक बार फिर पूजा पाल को अतीक के सामने खड़ा किया. संयोग से इस बार भी अतीक चुनाव हार गया. वह चुनाव भले ही हार गया, पर उस का अपराध का कारखाना बंद नहीं हुआ.

मुलायम सिंह ने एक बार फिर उसे अपनी पार्टी में सहारा दिया. इस बार उसे श्रावस्ती जिले से टिकट दिया गया. इस चुनाव में भी अतीक अहमद हार गया.

2016 में फिर एक बार मुलायम सिंह ने कानपुर कैंट से उसे उम्मीदवार बनाया. इस चुनाव का फार्म भरने के लिए अतीक 5 सौ गाडि़यों का काफिला ले कर कानपुर पहुंचा. जबकि वह खुद 8 करोड़ की विदेशी कार हमर में सवार था.

पूरे कानपुर में अतीक के इस काफिले ने चक्का जाम कर दिया था. मीडिया में उस के खिलाफ खूब लिखा गया. तब तक समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव बन गए थे. उन्होंने अतीक अहमद को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

एक बार फिर हुआ गिरफ्तार

फरवरी, 2017 में पुलिस ने उसे इलाहाबाद कालेज में तोड़फोड़ करने के आरोप में गिरफ्तार किया. उस के बाद से वह जेल में ही है. अतीक पर अब तक लगभग 250 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं. मायावती के शासनकाल में एक ही दिन में उस पर 100 मुकदमे दर्ज हुए थे. बाद में जिन्हें हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था. अधिकतर मामलों में सबूत के अभाव और गवाहों के मुकरने से अतीक बरी हो गया था.

अतीक भले ही आतंक का पर्याय है, वह नेकदिल भी है. उस के पास जो भी मदद के लिए जाता है, वह खाली हाथ नहीं लौटता.

उस पर 35 मुकदमे अभी भी चल रहे हैं. इन में कुछ अदालत में पैंडिंग हैं तो कुछ की अभी जांच ही पूरी नहीं हुई है. मजे की बात यह है कि अभी तक उसे किसी भी मामले में सजा नहीं हुई है. यह सब देख कर यही लगता है कि अतीक की जिंदगी कभी इस जेल में तो कभी उस जेल में कटती रहेगी. लेकिन विकास दुबे कांड के बाद योगी सरकार अतीक के आर्थिक साग्राज्य को पूरी तरह से ध्वस्त करने में लगी है.

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2017 में उत्तर प्रदेश में जब से भाजपा के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी है, तब से अतीक अहमद पर शिकंजा कसता गया. गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद योगी सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश के तमाम डौनों पर काररवाई करने की छूट दे देने से अब सरकार और पुलिस अतीक अहमद के गुंडों और उस की संपत्ति के पीछे पड़ गई है. रोज उस की कोई न कोई संपत्ति तोड़ी जा रही है.

 ढह गया अतीक अहमद का किला

कभी प्रयागराज में अतीक के नाम की तूती बोतली थी. लोग उस का नाम सुन कर कांपने लगते थे. पर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार आते ही प्रदेश के माफिया डौनों की तो जैसे शामत आ गई है.

इन्हीं माफिया डौनों में प्रदेश के सब से कुख्यात माफिया डौन अतीक अहमद की अरबों की संपत्ति कुर्क कर के ढहा दी गई है या फिर सील कर दी गई है.

अगले भाग में पढ़ें- अतीक का बेटा उमर रेंज का सब से बड़ा इनामी अपराधी बना

अतीक अहमद खूंखार डौन की बेबसी: भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

जिलाधिकारी के आदेश पर पहले प्रशासन ने प्रयागराज स्थित अतीक अहमद की अरबों की कीमत की कुल 37 संपत्तियां कुर्क कीं. उस के बाद प्रयागराज विकास प्राधिकरण (पीडीए) ने इन संपत्तियों को गिराना शुरू किया.

सब से पहले 5 सितंबर को सिविल लाइंस स्थित अतीक के साढ़ू इमरान का मद्रास होटल गिराया गया. इस के बाद 7 सितंबर को नवाब यूसुफ रोड पर अतीक का गोदाम, 9 सितंबर को झूंसी स्थित कटका गांव में बने कोल्डस्टोरेज को गिराया गया.

इसे गिराने में 2 दिन लगे. करीब 10 हजार वर्गमीटर में बने इस कोल्डस्टोरेज का निर्माण अवैध रूप से कराया गया था. प्राधिकरण से इस का नक्शा भी पास नहीं कराया गया था. यह कोल्डस्टोरेज अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन के नाम था, जिस की कीमत करीब 30 करोड़ रुपए थी.

10 सितंबर को अतीक के करीबी असद की करेली के बाजूपुर गांव में की गई प्लौटिंग को जमींदोज किया गया. इस के बाद 11 सितंबर को मेहंदौरी में अतीक के चचेरे भाई हमजा की संपत्तियों पर बुलडोजर चला.

12 सितंबर को सिविल लाइंस में हाईकोर्ट हनुमान मंदिर के पास स्थित अतीक के दोमंजिला व्यावसायिक भवन को ध्वस्त किया गया. 13 सितंबर को लूकरगंज में अतीक द्वारा कराए गए अवैध निर्माण को हटाया गया.

20 सितंबर को करबला स्थित कार्यालय के एक हिस्से से अतिक्रमण हटाया गया. थाना खुल्दाबाद क्षेत्र के करबला स्थित अतीक का यह औफिस पुलिस द्वारा कुछ दिनों पहले ही गैंगस्टर ऐक्ट के तहत कुर्क किया गया था. पीडीए ने कार्यालय का जो हिस्सा तोड़ा था, वह बिना नक्शा पास कराए ही बनवाया गया था.

22 सितंबर को अब तक की सब से बड़ी काररवाई करते हुए चकिया स्थित अतीक के आलीशान आशियाने को गिराया गया. करीब 3 हजार वर्गमीटर में बने इस आवास को गिराने के लिए 4 जेसीबी लगाई गई थीं. करीब साढ़े 5 घंटे में अतीक का किले जैसा मकान गिरा दिया गया. प्रशासन वहां इतना पुलिस बल ले कर आया था कि किसी की विरोध करने की हिम्मत नहीं हुई.

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इस के अलावा प्रयागराज से सटे कौशांबी जिले के पिपरी थाना क्षेत्र के रहीमाबाद में अतीक अहमद ने करोड़ों रुपए के खेत खरीदे थे. पास ही एयरपोर्ट और कई बड़े शैक्षणिक संस्थान होने की वजह से अतीक की यह जमीन काफी महंगी है.

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इस जमीन को खेती वाली दर्शाया गया था. जिलाधिकारी के आदेश पर इस जमीन को भी कुर्क करने की तैयारी चल रही है. इस के अलावा अतीक का एक मकान प्रयागराज के नीमसराय की आवासीय योजना में भी है. यह मकान अतीक अहमद के ही नाम है.

इस मकान को भी कुर्क किया जा चुका है. यह सारी काररवाई इसलिए की जा रही है, क्योंकि अतीक ने यह सारी संपत्ति आपराधिक और समाज विरोधी कृत्यों के जरिए अर्जित की थी.

इतना ही नहीं, अतीक अहमद के ड्रीम प्रोजेक्ट अलीना सिटी पर भी 10 सालों बाद एक बार फिर प्रशासन की बड़ी काररवाई हुई है. अलीना सिटी में बने दरजनों अर्धनिर्मित मकानोें को गिरा दिया गया है. प्रयागराज शहर के करेली स्थित अतीक अहमद और उस के करीबियों के हजारों बीघे जमीन पर फैले अलीना सिटी प्रोजेक्ट पर प्रशासन ने कड़ी काररवाई की है.

10 साल पहले शुरू हुई अलीना सिटी के पूरे निर्माण को मायावती सरकार में ध्वस्त कर दिया गया था. सपा सरकार में एक बार फिर अतीक ने अपनी जमीनों पर कब्जा कर के निर्माण कार्य शुरू किया. योगी सरकार बनने के बाद एक बार फिर अलीना सिटी पर जांच शुरू हुई. जांच में अलीना सिटी विवादित पाई गई तो इसे गिरा दिया गया.

यह सारी काररवाई केवल अतीक अहमद पर ही नहीं हो रही है. उस के गुर्गों की सपत्तियों को भी कुर्क कर के गिराया जा रहा है. प्रशासन की काररवाई से अतीक ही नहीं उस के गैंग के तमाम अपराधी परेशान हैं.

मजे की बात यह है कि पीडीए ने अतीक और उस के गुर्गों के खिलाफ जो काररवाई की है, प्रशासन उस में आए खर्च को अतीक एंड कंपनी से वसूलने की तैयारी कर रहा है.

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अब तक की सारी काररवाइयों का हिसाब तैयार किया जा रह है. एक मजदूर की एक दिन की मजदूरी लगभग 5 सौ रुपए है. जेसीबी का प्रति घंटे का किराया एक हजार रुपए है. हिसाब बन जाने के बाद अतीक अहमद और उस के गुर्गों को रकम जमा कराने का नोटिस भेजा जाएगा.

अतीक का बेटा और भाई

अतीक अहमद के बड़े बेटे मोहम्मद उमर जो कानून की पढ़ाई कर रहा है, पर सीबीआई ने 2 लाख रुपए का इनाम घोषित किया है. इस तरह अतीक का बेटा उमर रेंज का सब से बड़ा इनामी अपराधी बन गया है. साबीआई द्वारा 2 लाख का इनाम घोषित करने से अतीक सहित उस का पूरा परिवार परेशान है. घर में एक साथ दोदो इनामी होने की वजह से आए दिन एसटीएफ और क्राइम ब्रांच का छापा पड़ता रहता है, जिस से परिवार को काफी परेशानी होती है.

पूर्व सांसद अतीक अहमद के भाई अशरफ और बेटे उमर तक पहुंचने के लिए एसटीएफ और क्राइम ब्रांच जगहजगह छापेमारी करती रहती है.

अतीक के भाई अशरफ पर पुलिस ने एक लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा है. अतीक अहमद के बेटे उमर पर आरोप है कि देवरिया जेल में बंद अतीक ने जब लखनऊ के प्रौपर्टी डीलर मोहित अग्रवाल की पिटाई कर के जबरन प्रौपर्टी के पेपर साइन कराए थे और धाक जमाने के लिए इस पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किया था.  इस मामले में उस का बेटा भी शामिल था. उमर अतीक अहमद के सांसद का चुनाव लड़ते समय चुनाव प्रचार के दौरान पहली बार सब के सामने आया था. उस पर मोहित अग्रवाल से करोड़ों रुपए की जमीन और कंपनियों को जबरदस्ती अपने नाम कराने का आरोप है. काफी दिनों तक वह मेरठ के नौचंदी इलाके के भवानीनगर में रहने वाली अपनी बुआ के यहां छिपा रहा. एसटीएफ को जब इस की जानकारी हुई तो वहां छापा मारा गया. पर उमर को इस बात की भनक लग चुकी थी, जिस से वह फरार हो गया था.  एक लाख के इनामी अतीक के भाई पूर्व विधायक अशरफ की किसान नेता की हत्या, झलवा में एक सीमेंट व्यवसाई के साथ बेरहमी से मारपीट, अल्कमा हत्याकांड, विधायक राजू पाल हत्याकांड, रंगदारी के लिए धमकी समेत अन्य कई मुकदमों में पुलिस को तलाश है. अशरफ के घर की 4 बार कुर्की हो चुकी है. अशरफ की गिरफ्तारी पर अगस्त, 2017 को पहली बार 5 हजार, फिर 15 हजार, उस के बाद 50 हजार और अब एक लाख रुपए का इनाम घोषित किया गया है.

राजनीति की विषबेल: भाग 3

सौजन्य:  मनोहर कहानियां

विपिन शर्मा मोदी नगर सौंदा रोड का रहने वाला था, जबकि अर्पण चौधरी गांव खुशहाल, गुलावठी का रहने वाला था. विपिन और अर्पण मोदीनगर में एक साथ पढ़े थे, उन की पुरानी दोस्ती थी. दोनों ही सुपारी ले कर हत्या करने के पेशे से जुड़े थे.

विपिन मनोज के साथ जितेंद्र को भी जानता था. इसी कारण साजिश करने वालों और सुपारी किलर की कडि़यां आपस में जुड़ गई थीं. विपिन अपनी बहन के साथ दिल्ली के अशोक नगर में रहता था. दोनों जितेंद्र को पहले से जानते थे.

जितेंद्र से उन्होंने इस काम के लिए 5 लाख मांगे. लेकिन बाद में सौदेबाजी करने के बाद 2 लाख रुपए में हत्या करने की बात तय हो गई. जितेंद्र ने विपिन तथा अर्पण को 50 हजार रुपए एडवांस दे दिए और  कहा कि जल्द ही मनोज के हाथों इस काम को करने के लिए हथियार उन तक भिजवा देगा.

जितेंद्र ने दोनों को नरेश त्यागी की फोटो दे दी साथ ही यह भी बता दिया कि वह हर सुबह साढ़े 5 बजे से 6 बजे के बीच लोहिया नगर के औफिसर पार्क में घूमने के लिए जाता है. उस ने एक दिन सुबह के वक्त दोनों को अपने साथ कार में ले जा कर नरेश त्यागी को दिखा भी दिया.

हत्यारों तक पहुंचाए हथियार

जितेंद्र ने मनोज के जरिए दोनों को एक .30 बोर का पिस्तौल तथा एक तमंचा और कुछ कारतूस भिजवा दिए थे. साथ ही जितेंद्र ने बता दिया कि काम होने के बाद वे उस से संपर्क न करें बल्कि मनोज को मैसेज भेज कर काम होने की बात बता दें. उन की बाकी की डेढ़ लाख की रकम उन्हें पुहंचा दी जाएगी.

9 अक्तूबर, 2020 को हत्या करने का दिन मुकर्रर हो गया. साजिश के मुताबिक अपने को सेफ करने के लिए 2 दिन पहले ही जितेंद्र त्यागी गिरीश त्यागी को ले कर लखनऊ चला गया, ताकि वारदात के वक्त उस की मौजूदगी घटनास्थल से दूर रहे.

इधर, विपिन और अर्पण ने 9 अक्तूबर, 2020 की सुबह लोहिया नगर जा कर नरेश की हत्या कर दी. वारदात के बाद उस ने मनोज को फोन करके काम होने की इत्तिला दे दी थी. हत्या करने के बाद दोनों स्कूटी से ही राजनगर एक्सेंटशन होते हुए दिल्ली चले गए.

पुलिस बेहद गोपनीय ढंग से काम करते हुए विपिन के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकाल कर मनोज व जितेंद्र के संपर्क तक पहुंची.

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जितेंद्र की घटना वाले दिन लखनऊ में गिरीश के साथ मौजूदगी से साफ होने लगा कि नरेश त्यागी हत्याकांड की साजिश में दोनों की मिलभगत हो सकती है. इस के बाद जब पुलिस ने जितेंद्र के परिवार पर दबाव बनाया तो उसे पुलिस के सामने पेश होना पड़ा.

दरअसल, जितेंद्र को यह गलतफहमी थी कि उस के खिलाफ पुलिस के पास कोई सबूत नहीं है. इसी खुशफहमी का शिकार हो कर वह पुलिस के सामने आया था. लेकिन जब पुलिस ने अपने हथकंडों का इस्तेमाल कर उस से पूछताछ की तो उस ने पूरी साजिश का खुलासा कर दिया.

इधर जितेंद्र की गिरफ्तारी की खबर सुन कर विपिन और अर्पण घबरा गए. उन्होंने मनोज से फोन पर संपर्क किया और बाकी रकम की मांग की. वे चाहते थे कि पुलिस की पकड़ में आने से पहले पैसा ले कर उत्तराखंड में कहीं जा कर छिप जाएं .

20 नवंबर को मनोज से संपर्क कर विपिन तथा अर्पण रुपए लेने के लिए जब गाजियाबाद आ रहे थे, तभी उन्हें पुलिस ने दबोच लिया. उन से पूछताछ के बाद मनोज को भी पकड़ लिया गया. बाद में तीनों ने जितेंद्र के साथ रची गई नरेश त्यागी हत्याकांड की पूरी कहानी का खुलासा कर दिया.

सभी अभियुक्तों से पूछताछ के बाद जांच अधिकारी कृष्णगोपाल शर्मा ने उन्हें सक्षम न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. लेकिन पुलिस गिरीश त्यागी के सामने नहीं आने के कारण अभी इस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है कि गिरीश त्यागी के हाथ वाकई अपने मामा नरेश त्यागी की हत्याकांड के खून के छींटों से सने हैं.

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पुलिस फिलहाल गिरीश त्यागी को अभी तक पकड़े गए आरोपियों के बयान के आधार पर आरोपी मान कर उस की सरगर्मी से तलाश कर रही है.

—कहानी पुलिस की जांच, अभियुक्तों के बयान व जनसूत्रों पर आधारित

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