मनीत का आत्मघाती कदम : भाग 1

4 जून, 2020 की शाम 7 बजे 24 वर्षीय सिपाही मनीत प्रताप सिंह ड्यूटी कर के जब वापस अपने कमरे पर लौटा तो वह अकेला नहीं था, बल्कि उस के साथ उस की खूबसूरत और कमसिन प्रेमिका संध्या भी थी.

उस के साथ संध्या को देख कर मनीत के दोनों दोस्त सिपाही जमील खान और सिपाही अनिल कुमार गौतम हौले से मुस्कराए तो वह भी मुसकरा दिया और संध्या को ले कर कमरे में चला गया.

वे तीनों दोस्त मुरादाबाद के कटघर थाने की आदर्श नगर कालोनी में स्थित कमल गुलशन के मकान में किराए पर रहते थे. वे तीनों रूम पार्टनर थे और एक ही कमरे में रहते थे. जिन में जमील खान और अनिल गौतम कटघर थाने में तैनात थे और मनीत पुलिस लाइन में आमद था. वैसे मनीत सिंह मूलरूप से बुलंदशहर के कोतवाली थाने के रसूलपुर का रहने वाला था. उस की जौइनिंग 2018 बैच की थी. हालफिलहाल उस की ड्यूटी मुरादाबाद (देहात) विधानसभा से विधायक हाजी इकराम कुरैशी की सुरक्षा में चल रही थी.

बहरहाल, संध्या को ले कर पहुंचे मनीत ने वर्दी बदल कर सादे कपड़े पहन लिए और दोनों दोस्तों से कहा कि वह संध्या को ले कर शहर घूमने जा रहा है. लौटने में उसे देर हो सकती है. आप दोनों अपना खाना बना कर खा लेना. हम घूम कर वापस लौटने के बाद अपना खाना बना लेंगे.

ये भी पढ़ें- फिरौती वसूलने साथ आये पति पत्नी

इतना कह कर उस ने बरामदे में खड़ी बाइक बाहर निकाली और संध्या को पीछे बिठा कर निकल गया.

करीब 3 घंटे दोनों बाहर घूमे और रात 10 बजे के करीब कमरे पर लौटे. चूंकि कमरा एक ही था. वहां संध्या रुकी हुई थी इसलिए मनीत के दोनों दोस्त उन्हें कमरे में छोड़ कर छत पर सोने चले गए.

मनीत घर आ कर दुकान से 2 बड़े पैकेट मैगी और 1 लीटर वाली कोल्डड्रिंक की एक बोतल ले आया. संध्या ने मैगी बनाई और 2 कटोरियों में मैगी ले कर कमरे में आई, जहां मनीत उस का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. फिर मनीत ने पहले से ला कर रखी कोल्डड्रिंक स्टील के 2 खाली गिलासों में भर कर एक गिलास संध्या की ओर बढ़ा दिया और दूसरा गिलास खुद लिया.

दोनों ने मैगी खा कर कोल्डड्रिंक पी. थोड़ी भूख शांत हुई. मनीत और संध्या दोनों एकदूसरे के हाथों को थामे और आंखों में आंखें डाले नीचे फर्श पर चादर बिछा कर बैठे थे. एकदूसरे को करीब पा कर वे दोनों बेहद खुश थे. खुश होते भी क्यों नहीं, एक होने में उन के बीच में बस एक रात की दूरी थी.

अगले दिन यानी 5 जून, 2020 को दोनों कोर्टमैरिज करने वाले थे. मैरिज के बाद दोनों जनमजनम के लिए एकदूसरे के हो जाने वाले थे.

कहते हैं, आग और फूस पासपास हो, तो वहां अकसर आग लग ही जाती है. मनीत और संध्या सामाजिक मानमर्यादाओं की सीमाएं लांघते हुए जिस्मानी रिश्तों से एक हो चुके थे, इसीलिए संध्या प्रेमी मनीत पर शादी के लिए दबाव बनाए हुए थी.

दबाव में आ कर ही उस ने संध्या से शादी के लिए हामी भरी थी और उसे कमरे पर बुलाया था. खानेपीने के बाद नीचे फर्श पर बिछे चादर पर दोनों बैठे हुए थे. मनीत संध्या की हथेली थामे उस की झील सी गहरी आंखों में डूबता जा रहा था.

संध्या के मखमली स्पर्श से मनीत का रोमरोम खिल उठा था. वे दोनों मर्यादाओं में बंधे थे, भविष्य के सपनों को ले कर दोनों देर तक बातें करते रहे. इस बीच मनीत फोन पर अपने घर वालों से अपनी शादी के सिलसिले में बात भी करता रहा.

फोन पर बात करतेकरते मनीत अचानक से गंभीर हो गया और नीचे फर्श से उठ कर बैड पर बैठ गया. तो संध्या भी नीचे से उठ कर बैड पर बैठ गई और उस की गोद में अपना सिर रख कर बिस्तर पर पसर गई.

‘‘क्या हुआ? अचानक से गंभीर क्यों हो गए?’’ संध्या ने मनीत की आंखो में आंखें डाल कर सवाल किया.

‘‘कुछ नहीं, बस ऐसे ही…’’ कहतेकहते मनीत रुक गया.

‘‘मुझ से कोई भूल हो गई है क्या या मैं ने कुछ ऐसावैसा कह दिया, जिस से तुम्हें बुरा लग गया. अगर ऐसा है तो मुझे माफ कर दो. सौरी बाबा आइ एम वैरी सौरी.’’ दोनों कान पकड़ते हुए संध्या बोली.

‘‘तुम क्यों सौरी कह रही हो?’’ कान से संध्या का हाथ हटाते हुए उस ने आगे कहा, ‘‘मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं है और न ही तुम ने कुछ कहा है. सौरी तो उन्हें बोलना चाहिए जो हमारे प्यार के दुश्मन हैं. माफी तो उन्हें मांगनी चाहिए, जो हमें एक होने से रोकते हैं. लेकिन संध्या तुम चिंता मत करना, हमें एक होने से कोई नहीं रोक सकता. चाहे हमें जमाने से ही क्यों न लड़ना पडे. हम लड़ेंगे और एक भी होंगे. मनीत ने कभी हारना नहीं सीखा है. दुश्मन चाहे हमारे अपने ही क्यों न हों, मोहब्बत की जंग हम उन से जीत के रहेंगे.’’

‘‘घर वालों से तुम्हारी बात हुई है क्या? उन्होंने तुम्हें कुछ कहा है?’’

‘‘वे हमारी शादी के खिलाफ हैं. कहते हैं ये शादी नहीं होने देंगे.’’

‘‘तो फिर क्या होगा?’’

ये भी पढ़ें- 2 किरदारों का चरित्र

‘‘होगा क्या, मैं ने जो निश्चय किया है, वही होगा. मेरा निश्चय पत्थर पर खींची लकीर जैसा है, उसे कोई भी नहीं मिटा सकता.’’

कहते हुए मनीत ने बैड पर पड़ी कारबाइन दोनों हाथों से उठाई, उसे देखा. संध्या कुछ समझ पाती इस से पहले मनीत ने कारबाइन अपने सीने से सटा कर उस का ट्रिगर दबा दिया. कारबाइन से निकली गोली मनीत के दिल और फेफड़े को चीरती हुई शरीर के पार निकल गई. मनीत बिस्तर से नीचे फर्श पर धड़ाम से जा गिरा.

मनीत ने आत्महत्या कर ली थी. गोलियों की तड़तड़ाहट सुन कर मकान की छत पर सो रहे जमील और अनिल दौड़ेभागे नीचे कमरे में पहुंचे. कमरे का दृश्य देख कर दोनों हैरान रह गए. मनीत खून में डूबा बिलकुल शांत पड़ा था. उस से 2 कदम दूर खड़ी संध्या थरथर कांप रही थी. उस के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था.

उस के मुंह से कोई बोल नहीं फूट रहा था. जिस यार की बांहों में थोड़ी देर पहले वह झूल रही थी. जिन हाथों से अपने मांग में सिंदूर भरने के ख्वाब देख रही थी, वह सब रेत के मकान की तरह भरभरा कर ढह गया था.

बदहवास संध्या मनीत को देखे जा रही थी. जमील और अनिल कमरे के अंदर दाखिल हुए तो संध्या डर गई, ‘‘मैं ने नहीं मारा इन्हें…मैं ने नहीं मारा.’’ कहती चली गई.

‘‘ये सब कैसे हुआ संध्या?’’ अनिल ने सवाल किया.

‘‘थोड़ी देर पहले मनीत ने फोन पर अपने घर वालों से बात की. उस के बाद न जाने ऐसा क्या हुआ, वह एकदम से गंभीर हो गया. जब मैं ने पूछा कि क्या बात है, तुम अचानक से क्यों गंभीर हो गए तो उस ने बताया उस के घर वाले शादी के खिलाफ हैं, वे शादी करने पर ऐतराज जता रहे हैं. उस के बाद मैं कुछ समझ पाती कि मनीत ने खुद को गोली मार ली.’’ कह कर संध्या बिलखबिलख कर रोने लगी.

संध्या के कथनानुसार, मनीत ने खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी. उसी वक्त जमील ने फोन कर के थानेदार (कटघर) विकास कुमार, सीओ (कटघर) पूनम सिरोही, एसपी (सिटी) अमित कुमार आनंद, एसएसपी अमित पाठक और आईजी रमित शर्मा को घटना की सूचना दी थी.

ये भी पढ़ें- हिमानी का याराना: भाग 1

चूंकि मामला विभाग से जुड़ा हुआ था, इसलिए सूचना मिलते ही कुछ ही देर में एसओ (कटघर) विकास कुमार, सीओ (कटघर) पूनम सिरोही और एसपी (सिटी) अमित कुमार आनंद घटनास्थल पहुंच गए थे.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

महंगा इनाम : भाग 2- क्या शालिनी को मिल पाया अपना इनाम

वह बेचैनी से पहलू बदलते हुए बोला, ‘‘मैं बिना किसी जांच के उन मांबेटी को धोखेबाज कहना नहीं चाहता. लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि वह मामले को बढ़ाचढ़ा कर पेश कर रही हों.’’

‘‘मेरे विचार में यह कुछ अधिक मुश्किल काम नहीं है,’’ मैं ने कहा, ‘‘2-4 दिनों लड़की पर नजर रखी जाए. होशियारी से उस का पीछा किया जाए तो पता चल जाएगा कि वह कहीं बोलती है या नहीं?’’

अर्पित गले को साफ करते हुए बोला, ‘‘यही तो समस्या है कि मैं तुम्हें 4 दिन तो क्या, 2 दिन का समय भी नहीं दे सकता. असल में मुझे विश्वास था कि यह मामला कोर्ट में नहीं जाएगा. इसलिए अंतिम क्षणों तक मैं ने किसी डिक्टेटिव या खोजी की तलाश शुरू नहीं की. इस बुधवार को 10 बजे अदालत में इस दावे की सुनवाई होनी है. हो सकता है पहली ही पेशी में निर्णय भी हो जाए.’’

इस का मतलब था कि मेरे पास केवल एक दिन का समय था, जिस में मुझे कोई ऐसा सबूत तलाश करना था, जिस की वजह से दावेदार अपना दावा वापस लेने पर विवश हो जाए.

ये भी पढ़ें- धोखा : काश शशि इतना समझ पाती

‘‘सौरी मिस्टर अर्पित, एक दिन में भला क्या हो सकता है?’’ मैं ने कहा.

‘‘इस परिस्थिति में अगर कोई समझौता हो भी जाए तो वह भी मेरे लिए जीत की तरह ही होगा,’’ अर्पित ने कहा, ‘‘मैं कह चुका हूं कि मुझे अपनी गलती की भरपाई करने पर कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन इतनी सी बात पर मैं अपनी कुल संपत्ति का एक चौथाई उन मांबेटी को नहीं दे सकता.’’

एक बार फिर मेरी सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गई. मतलब अर्पित की कुल संपत्ति का एक चौथाई 100 करोड़ था. इस का मतलब था कि अर्पित मेरे अनुमान से कहीं अधिक धनवान था. संभवत: उन मांबेटी को अंदाजा था कि वह कितना मोटा आसामी है. तभी उन्होंने ज्यादा गहराई तक दांत गड़ाने का प्रोग्राम बनाया था.

आखिर मैं ने अपनी पूरी कोशिश करने की हामी भरते हुए उसे अपनी फीस के बारे में बताया तो उस ने कहा, ‘‘मैं केवल एक ही दिन के लिए तुम्हारी सेवाएं ले रहा हूं और इस का भुगतान पेशगी दे रहा हूं. अगर तुम कोई सबूत तलाश करने में कामयाब हो गईं तो मैं सारे खर्चों के अलावा तुम्हें 5 लाख रुपए का इनाम दूंगा. अगर तुम असफल रहीं तो मेरे कानूनी सलाहकार इस मसले से अपने हिसाब से निपटेंगे.’’

बातचीत के बाद मैं लौट आई. सब से पहले मैं ने उन मांबेटी के बारे में सूचना इकट्ठी की. बेटी का नाम रूपा सरकार था और मां का नाम सुषमा सरकार. वे द्वारका के सिंगल बैडरूम के छोटे से फ्लैट में रह रही थीं. मैं ने अपनी गाड़ी एक ऐसी जगह पार्क की, जहां से मैं उन के फ्लैट पर नजर रख सकती थी.

अर्पित मुझे उन के नाम और ठिकाने से अधिक कुछ नहीं बता सका था. मैं ने अपने तौर पर जानकारियां एकत्र करने की कोशिश की तो पता चला कि सुषमा सरकार यानी मां और रूपा सरकार किसी न किसी तरह के दावे कर के माल बटोरने में लगी रहती थीं. अगर मामला केवल उस औरत का होता तो शायद मैं उसे दे दिला कर राजी करने की कोशिश करती, लेकिन मसला उस की बेटी के अजीबोगरीब और अविश्वसनीय नुकसान का था. मैं ने उस डाक्टर से बात की, जो उस का इलाज कर रहा था. ऐसा मालूम होता था कि उस ने भी मांबेटी के दावे को सही साबित करने की बात को अपनी प्रेस्टीज का मसला बना लिया था.

9 बजे तक मैं अपनी कार में बैठेबैठे न्यूजपेपर पढ़ती रही. जब थक गई तो मैं ने गाड़ी से निकल कर हाथपांव सीधे किए और बिल्डिंग के चारों ओर एक चक्कर लगाया. मांबेटी के ग्राउंड फ्लोर स्थित फ्लैट का नंबर 7 था. उस के पीछे की तरफ एक पुरानी सी मारुति कार खड़ी थी, जिस पर लगे चंद निशानों से पता चल रहा था कि हाल ही उस का मामूली एक्सीडेंट हुआ है.

फ्लैट नंबर 7 में झांकने का मेरा प्रयास सफल नहीं हो सका. खिड़कियां बंद थीं और उन पर परदे पड़े हुए थे. अंदर तेज आवाज में म्युजिक बज रहा था. अंतत: मायूस हो कर मैं दोबारा अपनी कार में जा बैठी.

आखिर 10 बजे मांबेटी फ्लैट से बाहर निकलीं और गाड़ी में बैठ कर बाजार की ओर चल दीं. उन्होंने एकदूसरे से बिलकुल भी बात नहीं की. मैं ने उचित दूरी बना कर उन का पीछा करना शुरू कर दिया.

पहले दोनों एक बहुत अच्छे डिपार्टमेंटल स्टोर पर रुकीं और अंदर जा कर आधे घंटे तक बिना किसी मकसद के घूमती रहीं. उन्होंने महंगे फर्नीचर से ले कर मंगनी की अंगूठी तक का जायजा लिया. वे यकीनन उस दौलत को खर्च करने के तरीके सोच रही थीं, जो उन के ख्याल में उन्हें छप्पर फाड़ कर मिलने वाली थी. वे एकदम साधारण जीवन व्यतीत कर रही थीं, लेकिन उन की पसंद ऊंची लगती थी.

कुछ देर की आवारागर्दी के बाद आखिरकार वे एक ब्यूटीपार्लर में जा घुसीं. वे रिसैप्शन पर रुकीं तो मैं पीछे मुडे़ बिना सुषमा की आवाज सुन रही थी. मोटी सुषमा बाल सैट कराने के लिए एक कुरसी पर जा बैठी, जबकि दुबलीपतली रूपा वेटिंग रूम में बैठ गई. मुझे कुछ उम्मीद नजर आई कि संभवत: मुझे भाग्य आजमाने का अवसर मिलने वाला है.

मैं ने रिसैप्शन पर मौजूद लड़की से अपने बाल शैंपू और सैट कराने की बात की तो उस ने बताया कि करीब 10 मिनट बाद हेयर डे्रसर फ्री हो जाएगी.

मैं वेटिंग रूम में रूपा के सामने जा बैठी. वह सच्चे प्रेमप्रसंग प्रकाशित करने वाली एक पत्रिका के पृष्ठों पर नजरें जमाए बैठी थी. मैं ने भी मेज पर पड़ी 2-3 मैगजीनें उलटपलट कर देखने के बाद साधारण लहजे में कहा, ‘‘ऐसी जगहों पर हमेशा पुरानी मैगजीनें ही पड़ी रहती हैं.’’

रूपा ने मैगजीन से नजर हटा कर मेरी तरफ देखा, लेकिन बोली कुछ नहीं. मैं ने मुसकराते हुए मित्रवत लहजे में कहा, ‘‘तुम्हें शायद कोई अच्छी मैगजीन मिल गई है.’’

ये भी पढ़ें- बदला : सुगंधा ने कैसे लिया रमेश से बदला

उस ने इनकार में सिर हिलाया तो मैं ने जल्दी से पूछा, ‘‘किसी खास ब्यूटीशियन के साथ अपाइंटमेंट है क्या?’’

उस ने कोई जवाब नहीं दिया और दोबारा उसी मैगजीन पर नजरें जमा कर बैठ गई. इतने में एक ब्यूटीशियन ने फ्री हो कर मुझे बुला लिया. जब इंसान को फास्ट सर्विस की कोई खास जरूरत नहीं होती तो उसे अनचाहे ही फास्ट सर्विस मिल जाती है.

मैं कुरसी पर जा बैठी. हेयरड्रेसर ने मेरे चारों ओर काला कपड़ा लपेटा और मैं ने शैंपू के लिए सिंक पर सिर झुका लिया. जब मेरे बाल संवारे जा रहे थे तो मैं ने ठंडी सांस ले कर कहा, ‘‘मैं ने किसी इतनी नौजवान लड़की को इतना रफटफ रहते हुए नहीं देखा.’’

हेयर ड्रेसर समझ गई कि मेरा इशारा किस ओर था. वह सिर घुमा कर रूपा की ओर देखते हुए बोली, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘मैं इस लड़की से दोस्ताना तरीके से बात करना चाहती थी. लेकिन उस ने कोई जवाब नहीं दिया. एक शब्द भी नहीं बोली.’’

हेयरड्रेसर मेरी ओर झुकते हुए बोली, ‘‘दरअसल, वह बेचारी बोल नहीं सकती. 2 महीने पहले एक अमीर आदमी ने अपनी कार से इन मांबेटी की कार में टक्कर मार दी थी. तब से इस बेचारी की बोलने की शक्ति चली गई है.’’

‘‘ओह… यह तो बड़ी अफसोसजनक बात है. मुझे यह बात मालूम नहीं थी?’’ मैं ने जल्दी से कहा. इस बीच सुषमा मुझ से कुछ दूर दूसरी कुरसी पर बाल सैट कराते हुए तेज रफ्तार से ब्यूटीशियन से बातें कर रही थी. ऐसा जान पड़ता था कि जैसे उसे आसपास का कुछ पता ही नहीं था.

‘‘मां की कमर में भी चोट आई थी,’’ ब्यूटीशियन ने कहा, ‘‘ये अमीर लोग समझते हैं, जो चाहे कर गुजरें, इन्हें कोई पूछने वाला नहीं.’’

इस का मतलब था कि इन लोगों की कहानी को और लोग भी जानते थे और कुछ लोगों की हमदर्दियां भी इन के साथ थीं. मेरे बाल सैट हो चुके तो मेरे पास वहां ठहरने का कोई बहाना नहीं रहा.

मैं ब्यूटीपार्लर से निकल आई और सामने सड़क किनारे एक बैंच पर बैठ गई. सड़क लगभग सुनसान थी. मैं सुबह 5 बजे की उठी थी. नींद मेरी आंखों में उतरने की कोशिश कर रही थी. मैं ने अपना सिर बैंच की बैक से टिका कर आंखें बंद कर लीं. कुछ देर में मुझे एक अजीबोगरीब सुखद अहसास हुआ. लेकिन उस अहसास का मैं ज्यादा देर आनंद नहीं उठा सकी.

‘‘शालिनी…’’ किसी की आवाज ने मुझे चौंका दिया. मैं हड़बड़ा कर सीधी हो गई.

एक घबराया हुआ सा युवक मेरे ऊपर थोड़ा सा झुका हुआ खड़ा था. उस की आंखों में शरारत साफ झलक रही थी. मुझे सड़क किनारे की एक बैंच पर ऊंघते देख कर संभवत: वह बहुत ही खुश हो रहा था.

ये भी पढ़ें- Short Story : लालच – रंजीता के साथ आखिर क्या हुआ

मुझे केवल शालिनी के नाम से संबोधित कर के शायद उसे तसल्ली नहीं हुई थी. उस ने मेरा पूरा नाम लिया, ‘‘शालिनी चौहान…?’’ लेकिन यह मेरा शादी से पहले का नाम था. अब तो मुझे अपने पति से अलग हुए भी जमाना गुजर गया था. मैं हैरान हुए बिना न रह सकी कि यह कौन है, जो इस तरह मेरा नाम ले रहा है.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

फिरौती वसूलने साथ आये पति पत्नी

‘हेलो’

‘हेलो’ फोन आने पर गोंडा जिले के रहने वाले बीड़ी कारोबारी हरी गुप्ता ने कहा.

फोन पर धमकाते हुए एक महिला की आवाज आती है “आवाज न आ रही हो तो बताओ, आवाज न आ रही हो तो बताओ, आपका लड़का किडनैप हो चुका है.”

हरी गुप्ता ‘अच्छा, तो क्या करना पड़ेगा?’

महिला : 4 करोड़ की व्यवस्था करो, हम शाम तक फोन करेंगे. ज्यादा दिमाग लगाने की कोशिश न करना. जो करोगे हमको सब पता चल जाएगा, अभी तक सब ठीक है वरना कानपुर वाला मैटर तो जानते हो न..?

ये भी पढ़ें- 2 किरदारों का चरित्र : भाग 1

हरी गुप्ता : हां… कौन कानपुर वाला..?

महिला :  विकास दुबे वाला… जानते ही हो पुलिस किसका कितना साथ देती है… पुलिस के पास जाना चाहो तो जाओ…मै मना नहीं कर रही है.. बस आपका लड़का आपको नहीं मिलेगा.

हरी गुप्ता : हमें हमारा लड़का चाहिए बस.

महिला : आपको अपना लड़का चाहिए ? दो तीन घंटे बाद मैं फोन करूंगी… बस हां या न में जवाब देना…. और अगर आपने कुछ भी कदम उठाने की कोशिश की तो लड़के की उम्मीद छोड़ दीजिए.

हरी गुप्ता :  जी जी… नहीं हम कोई कदम नहीं उठाएंगे.

हरी गुप्ता : ‘जी ठीक है’. फोन सुनने के बाद हरी गुप्ता के पैरो के नीचे से जमीन खिसक गई. बच्चे के ना मिलने से परेशान हरी गुप्ता की आंखों के सामने बच्चे के अपहरण करने का पूरा घटनाक्रम  घूम गया. किस तरह कुछ ही घण्टे पहले उनकी आंखों के सामने से 8 साल के बेटे का अपहरण हो गया था.

मास्क देने के बहाने हुआ अपहरण

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 200 किलोमीटर दूर गोंडा जिले में करनैलगंज कोतवाली क्षेत्र में गाड़ी बाजार में रहने वाले बीड़ी कारोबारी राजेश गुप्ता के घर पर गुरुवार 23 जुलाई 2020 की दोपहर अल्ट्रो कार से कुछ लोग आते है. राजेश गुप्ता के घर के सामने उनके बेटे हरि गुप्ता अपने 8 साल के बेटे आयुष उर्फ नामो के साथ खड़े थे. उन लोगो ने हरी गुप्ता से उनका मोबाइल नम्बर मंगा और खुद को स्वास्थ्य विभाग का कर्मचारी बता कर कहा कि ‘किसी को गाड़ी तक भेज दीजिये मास्क दे दे’.

यह बात सुनकर 8 साल का आयुष उनके साथ चला गया. जब कुछ देर आयुष नही वापस आया तब उसकि खोजबीन की गई. वँहा लगे सीसीटीवी में देखा गया कि आयुष को उसी मास्क देने वाली कार में बैठा कर ले जाया गया है. कुछ देर तो गाड़ी दिखती है पर फिर कच्चे रास्ते मे उतर जाती है जंहा से वो दिखना बन्द हो जाती है. शाम को करीब 4 बजे हरिगुप्ता के मोबाइल पर फोन आने के बाद पता चलता है कि आयुष का अपहरण कर लीया गया है और अपहरण करने वाले 4 करोड़ की फिरौती मांग रहे है.

एसटीएफ ने संभाली कमान

हरी गुप्ता और उनका परिवार उहापोह के बाद पूरी जानकारी करनैलगंज थाने की पुलिस को देता है. अपहरण की बात पता चलते ही राजधानी लखनऊ तक पुलिस विभाग को इसकी सूचना मिलती है. पुलिस विभाग ने अपहरण करने वालो का पता लगाने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स को लगाती है. इसके बाद पुलिस 17 घण्टो की कड़ी मेहनत के बाद बच्चे को सकुशल बरामद करने में सफल हो जाती है.

यूपी एडीजी (कानून-व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने बताया कि पुलिस कार्रवाई में दो बदमाश उमेश यादव और दीपू कश्यप घायल हुए हैं. सूरज पांडेय, छवि पांडेय को गिरफ्तार किया गया है. घटना में एक ऑल्टो गाड़ी बरामद की गई है. अपराधियों से पिस्टल और दो तमंचे भी बरामद हुए हैं. घायल बदमाशों का इलाज चल रहा है. पुलिस की ओर से बदमाशों का मेडिकल कराया जाएगा और आगे की कार्रवाई की जाएगी. जो अन्य लोग शामिल होंगे उनके विरुद्ध भी कार्रवाई होगी.

पति पत्नी है मुख्य आरोपी

अपहरण की इस घटना में मुख्य आरोपी के रूप में सूरज पांडये और उसकी पत्नी छवि पांडये का नाम लिया जा रहा है. पुलिस के अनुसार छवि की जिम्मेदारी फोन करके फिरौती मांगने की थीं. इस घटना में सूरज पांडे पुत्र राजेंद्र पांडे निवासी शाहपुर थाना परसपुर गोंडा, सूरज का भाई राज, उमेश यादव पुत्र रमाशंकर यादव निवासी सकरोड़ा पूर्वी थाना करनैलगंज गोंडा, दीपू कश्यप पुत्र राम नरेश कश्यप निवासी सोनवारा थाना करनैलगंज गोंडा  शामिल थे.

ये भी पढ़ें- हिमानी का याराना: भाग 1

अनाड़ी निकली छवि

छवि पाण्डेय सूरज पाण्डेय की पत्नी है. छवि भी इस किडनैपिंग केस में शामिल थी. उसने ही बच्चे के कारोबारी पिता को फिरौती के लिए फोन किया था. उसने फोन करके चार करोड़ रुपये की फिरौती मांगी थी.

फिरौती की कॉल रिकॉर्डिंग से पुलिस को यह पता लगा की अपराधी पेशेवर नहीं है.  बच्चे का अपहरण करने वाले बदमाशो ने जब फिरौती के लिए जब कारोबारी को फोन आया तो उन्होंने इस कॉल को अपने मोबाइल पर रिकॉर्ड कर लिया. फिरौती की कॉल रिकॉर्डिंग पुलिस को दी. पुलिस ने जब इसे सुना तो उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि किडनैपर्स कोई प्रोफेशनल नहीं हैं. छवि फोन पर कारोबारी से बात हुए अटक भी रही थी. छवि और कारोबारी के बीच हुई बातचीत के वायरल ऑडियो में छवि ने फिरौती के लिए कारोबारी को धमकी दी. अपहरणकर्ता ने कहा कि पुलिस के पास जाना चाहो तो जाओ लेकिन फिर आपका लड़का नहीं मिलेगा. उसने ये भी कहा कि फिरौती का जवाब हां या ना में ही मिलना चाहिए.

छवि का पति सूरज पांडे  राजेंद्र पांडे का पुत्र है और शाहपुर थाना परसपुर, जनपद गोंडा का रहने वाला है. जानकारी के मुताबिक छवि उन्नाव की है लेकिन उसकी शादी सूरज के साथ हुई है, तबसे वे गोंडा में ही रह रहे हैं.

तीसरे आरोपी का नाम उमेश यादव है जो रमाशंकर यादव का बेटा है और सकरोड़ा पूर्वी थाना करनैलगंज जनपद गोंडा का रहने वाला है. चौथा आरोपी दीपू कश्यप है जो राम नरेश कश्यप का बेटा है और सोनवारा, थाना करनैलगंज, जनपद गोंडा का निवासी है. पुलिस ने सभी को पकड़ लिया है.

ये भी पढ़ें- इश्किया आग : भाग 1

उस की गली में : भाग 3 – हुस्न और हवस की कहानी

मास्टरनी जुलेखा उसी स्कूल में पढ़ाती थी. एक दिन वह स्कूल से निकल कर तांगे में बैठी तो घोड़ा बिदक कर भागा. विलायत अली फौरन तांगे के पीछे भागा.

कुछ दूर दौड़ कर वह उस पर चढ़ गया. तांगा एक पुलिया से टकराया और नहर में गिर गया. जुलेखा पानी के तेज बहाव में बहने लगी. बड़ी मुश्किल से विलायत ने उसे बचा कर बाहर निकाला.

इस कोशिश में उसे चोटें भी लगीं. उसे अस्पताल में भरती करना पड़ा. जुलेखा उस की देखरेख के लिए रोज अस्पताल जाती थी. वहीं से यह मुहब्बत शुरू हुई. इस के 4-5 महीने बाद अचानक जुलेखा ने शादी कर ली.

शादी के बाद विलायत अली पागल सा हो गया. यह भी पता चला था कि चोरी वाले दिन सेठ अहद का एक नौकर विलायत को उस के घर से बुला कर ले गया था.

ये भी पढ़ें- मेघनाद : कुछ ऐसा ही था उस का व्यक्तितव

सेठ अहद ने ही उस पर चोरी का इलजाम लगाया था. थाने में लिखाई गई रिपोर्ट में सेठ अहद ने लिखवाया था कि विलायत उस के घर काम मांगने आया था. सेठ ने चोरी का जो टाइम रिपोर्ट में लिखाया था, उस वक्त वह अपने दोस्तों के साथ पान की दुकान पर था. उस वक्त सुबह के 10 बजे थे.

वक्त बहुत कम था. डीएसपी साहब के दिए टाइम में 2 घंटे बीत चुके थे. मैं ने सेठ अहद और मास्टरनी के पति नजीर से मिलने का फैसला किया.

रवाना होते समय मैं ने बलराज से पूछा, ‘‘अगर तुम्हारे दिमाग में कोई प्लान हो तो बताओ, मिल कर काम करते हैं.’’ उस ने तीखे लहजे में कहा, ‘‘नवाज खां, मेरे और तुम्हारे रास्ते अलगअलग हैं. इसलिए तुम अपनी राह जाओ.’’

मैं ने पहले ही 3-4 टीमें बना कर विलायत की तलाश में भेज दी थीं. सेठ अहद की लोहे के सामान बेचने की दुकान थी. 40-45 साल का दुबलापतला आदमी था. पता चला कि वह रंगीनमिजाज था. उस ने दुकान पर एक जवान खूबसूरत लड़की रख रखी थी.

मैं ने अहद से पूछताछ की तो उस ने वही बातें बताईं, जो मुझे पहले से पता थीं. कोई काम की बात पता न चलने पर मैं ने उसे शहर न छोड़ने की हिदायत दी. उस पर नजर रखने के लिए मैं ने सादा लिबास में एक सिपाही की ड्यूटी लगा दी. इस के बाद मैं चपरासी नजीर के यहां पहुंचा.

दरवाजा उस की खूबसूरत बीवी जुलेखा ने खोला. मुझे देख कर वह सहम गई. मैं ने तेज लहजे में पूछा, ‘‘तेरा शौहर कहां है?’’

‘‘जी…जी, वह अभी औफिस से नहीं आए हैं.’’ मैं ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘देख लड़की, अगर अपनी खैर चाहती है तो विलायत अली के बारे में सब कुछ सचसच बता दे, वरना तेरा अंजाम बहुत बुरा होगा.’’ मेरी डांट से उस का चेहरा पीला पड़ गया.

वह डर गई और चेहरा हाथों से छिपा कर फूटफूट कर रो पड़ी. रोतेरोते ही बोली, ‘‘थानेदार साहब, अगर मैं ने कुछ भी बोल दिया तो वह मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा. जान से मार देगा.’’

मैं गरजा, ‘‘कोई तुझे हाथ नहीं लगा सकता. यह कानूनी मामला है. हम तेरी पूरी मदद करेंगे.’’ मेरी बात पर उस के अंदर जैसे कुछ हिम्मत आई. अपनी बात कहने के लिए मुंह खोलने ही वाली थी कि तभी बाहरी दरवाजे से साइकिल का अगला पहिया अंदर आया और तेज आवाज आई, ‘‘ले साइकिल पकड़, कहां मर गई कमीनी?’’

इस आवाज पर वह डर गई. वह दरवाजे की तरफ जाने को हुई, लेकिन उस के उठने से पहले ही एक सिपाही ने आगे बढ़ कर साइकिल पकड़ ली. यह उस का पति नजीर था. अंदर का हाल देख कर वह हैरान रह गया. मुझे सलाम कर के बोला, ‘‘साहब, यह क्या हो रहा है?’’

मैं ने उस से तेज लहजे में पूछा, ‘‘कितनी तनख्वाह है तेरी?’’

‘‘जी 20 हजार रुपए.’’

‘‘क्या स्मगलिंग करता है, कहां से पैसा कमा कर इतना अच्छा घर खरीदा?’’

‘‘नहीं जनाब, कैसी बातें कर रहे हैं? मैं ईमानदार, शरीफ आदमी हूं.’’

उस ने इतना ही कहा था कि मैं ने एक जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर मारा. वह उछल कर साइकिल पर गिरा. उस की कमीज पकड़ कर मैं उसी कमरे में ले गया, जहां उस की बीवी बैठी थी.

बीवी के सामने हुई बेइज्जती से वह गुस्से से पगला सा गया. उस ने लपक कर सब्जी काटने वाली छुरी उठा ली और तेजी से घुमा कर मुझ पर वार कर दिया. लेकिन छुरी मेरे पेट से 2 इंच फासले से निकल गई. मैं बच गया. मैं ने लपक कर उस की कलाई थाम ली और एक लात उस के पेट पर मारी. वह धड़ाम से गिरा. इस के बाद एएसआई ने उस पर लातघूंसों की बारिश कर दी.

मुझे लगा कि जुलेखा के सिर से शौहर के डर का भूत उतर गया है तो मैं ने कहा, ‘‘देख लड़की, अब किसी से डरने की जरूरत नहीं है. बिना डर के सब कुछ बता दे.’’

ये भी पढ़ें- चिंता : आखिर क्या था लता की चिंताओं कारण?

‘‘इंसपेक्टर साहब, मुझे और मेरी मां को तो कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा?’’

मैं ने उसे भरोसा दिया और मदद का वायदा किया. मैं उसे दूसरे कमरे में ले गया.

वहां उस ने बताया, ‘‘साहब, मुझ पर बड़ा जुल्म हुआ है, मुझे बुरी तरह लूटा गया है. मैं ने यह जुल्म अपनी मां की खातिर बरदाश्त किया. आज से कोई 9 महीने पहले की बात है. मैं स्कूल में पढ़ाती थी. उसी स्कूल का एक कलर्क पता नहीं मुझ से क्यों दुश्मनी रखता था.

उस की वजह से मेरी 4-5 माह की तनख्वाह रुकी हुई थी. मेरी एक सहेली ने मुझे नेताजी गनपतलाल से मिलने की सलाह दी. ‘‘मैं उस से मिलने गई. मैं ने सारी विपदा कही. वह मुझ से बहुत अच्छे से मिला और उस ने मेरा काम करवाने का वायदा किया. इसी सिलसिले में मैं उस से मिलती रही. उसी बीच उस की नीयत मुझ पर खराब हो गई.

उस ने मुझे इस तरह अपने जाल में फंसाया कि मुझे अपनी बरबादी साफ नजर आने लगी. मैं होशियार हो गई. जब उसे अंदाजा हुआ कि मैं उस के हाथ नहीं आऊंगी तो उस ने पैंतरा बदला. एक दिन उस ने कहा, ‘जुलेखा, मैं तुम से ब्याह करना चाहता हूं.’

‘‘मैं ने तुरंत इनकार कर दिया. उसे ताज्जुब हुआ कि इतने मशहूर और रईस आदमी से मैं ने शादी से इनकार कर दिया. वह गुस्से में पागल हो गया. मुझे धमकी देने लगा कि वह मुझे ऐसी सजा देगा कि मैं उम्र भर तड़पती रहूंगी. शादी से पहले नजीर उस के यहां चमचागिरी करता था.

एक बार उस ने मुझ से बेहूदा मजाक किया तो मैं ने उसी समय उसे एक थप्पड़ जड़ दिया. ‘‘इस घटना के कुछ दिनों बाद नजीर मेरी मां के पास मेरा रिश्ता मांगने पहुंचा. मां ने मेरी शादी उस के साथ करने से मना कर दिया. इस के बाद एक औरत मेरी मां के पास नजीर के लिए मेरा रिश्ता मांगने आई.

मां ने फिर इनकार कर दिया. इस के बाद दूसरी औरत रिश्ता मांगने आई. मां ने उसे भी डांट कर भगा दिया.

‘‘दूसरे दिन मेरे छोटे भाई को उस के हौस्टल से किसी ने अगवा कर लिया. जब हमें पता चला कि इस के पीछे गनपतलाल का हाथ है तो हम रिपोर्ट दर्ज कराने थाने पहुंचे. लेकिन उस के खिलाफ रिपोर्ट नहीं लिखी गई. हमें डराधमका कर थाने से भगा दिया गया.

उसी रात गनपतलाल की तरफ से एक खत मिला, जिस में लिखा था, ‘तुम्हारा भाई वापस हौस्टल पहुंच गया है. ध्यान रखो, अगली बार गायब होगा तो हौस्टल में नहीं, मुरदाखाने में मिलेगा.’

‘‘उस रात मैं और मेरी मां बहुत रोईं. इस के बाद बेबस और मजबूर हो कर मुझे नजीर से शादी करनी पड़ी. तब से मैं बड़ी जिल्लत के साथ जी रही हूं. मेरी मां से भी नजीर बड़ा बुरा व्यवहार करता है. पिछले दिनों उस ने उन्हें कांच का गिलास फेंक कर मारा था.’’ इतना कह कर वह सिसकने लगी. उस की दुखभरी दास्तान सुन कर मेरा भी दिल भर आया. मैं ने पूछा, ‘‘यह कुल्फी वाले विलायत का क्या किस्सा है?’’

ये भी पढ़ें- Short Story : मोक्ष -क्या केशव को अपना पाई हरीरी?

जुलेखा बोली, ‘‘साहब, मैं नादान बच्ची नहीं, पढ़ीलिखी समझदार हूं. विलायत से मैं ने कभी शादी के बारे में सोचा तक नहीं था, पर अब मुझे लग रहा है कि वह गनपतलाल व नजीर से बेहतर इंसान था. उस ने जान पर खेल कर मेरी जिंदगी बचाई थी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

उस की गली में : भाग 2 – हुस्न और हवस की कहानी

यह मामला बड़े अफसरों तक पहुंच चुका था. मैं फटाफट थाने पहुंच गया. मैं सीधे उस कमरे में पहुंचा, जहां विलायत अली को सुलाया गया था. मैं ने देखा, कंबल, बिस्तर सब वैसा ही पड़ा था. कमरे की दीवार में करीब डेढ़ फुट का सुराख था.

जो सिपाही ड्यूटी पर था, उस से बात की तो उस ने बताया कि किसी वक्त उस की आंख लग गई और वह फरार हो गया. एकदम से मुझे खयाल आया कि कहीं बलराज ने ही तो नहीं मुलजिम को फरार करा दिया.

इस की वजह यह थी कि केस मेरे पास आने से उस की बेइज्जती हुई थी. थाने में 4-5 सिपाही उस के पक्के चमचे थे. मैं ने विलायत को लौकअप के बजाय अलग कमरे में सुलाया था.

जाहिर है, उस के फरार होने से मेरी ही बदनामी होनी थी. मुलजिम तो दीवार तोड़ कर जा नहीं सकता था. मुझे यकीन हो गया कि उसे भगाने में बलराज की ही साजिश थी. मैं विलायत अली के घर पहुंचा. उस के बूढ़े बाप ने दरवाजा खोला. मुझे देख कर वह कांपने लगा.

ये भी पढ़ें- पाखंड का अंत : कैसे किया बिंदु ने बाबा का खुलासा

मांबहन भी बाहर आ गईं. सभी बुरी तरह से डरे हुए थे. मां ने पूछा, ‘‘थानेदार साहब, मेरा पुत्तर तो अच्छा है न?’’

उस की बात का जवाब दिए बिना मैं ने फौरन घर की तलाशी ली. पर विलायत अली वहां नहीं था. मैं ने उस की मां से कहा, ‘‘तेरे पुत्तर को मेरी मेहरबानी रास नहीं आई. वह थाने से फरार हो गया है. सचसच बता दे कि वह कहां छिप सकता है? इसी में उस की खैर है.’’

‘‘मुझे नहीं मालूम वह कहां है. पर मैं तुम से कुछ नहीं छिपाऊंगी. उस की पूरी कहानी बताए देती हूं. साहब मेरा बेटा विलायत स्कूल के सामने ठेली लगा कर कुल्फी बेचता था.

पता नहीं कैसे स्कूल की एक मास्टरनी सुलेखा का दिल उस पर आ गया. कुछ दिन तो यह सब चला, फिर उस मास्टरनी ने सब कुछ भुला कर किसी और से शादी कर ली.

‘‘इस से मेरे बेटे को इतनी ठेस पहुंची कि वह फकीरों की तरह मारामारा फिरने लगा. उस ने अपना कामधंधा सब छोड़ दिया. सुबह को घर से जाता तो शाम को ही घर आता.

4-5 दिन पहले पुलिस उसे चोरी के आरोप में पकड़ ले गई. साहब, मैं दावे से कह सकती हूं कि मेरा बेटा चोरी हरगिज नहीं कर सकता. मुझे तो इस में उस मास्टरनी की ही साजिश लगती है.’’

उस की बात सुन कर मैं बाहर आ गया. मेरा इरादा मास्टरनी के घर जाने का था. मास्टरनी की गली में नुक्कड़ पर पान की दुकान थी. वहीं पर मैं ने जीप रुकवा ली.

पान वाला मुझे जानता था. मैं ने उस से विलायत अली और मास्टरनी के बारे में पूछा तो उस ने मास्टरनी के बारे में मुझे ढेर सारी जानकारी दी. मैं पान वाले की दुकान पर खड़ा था, तभी मास्टरनी के घर से एक आदमी साइकिल ले कर निकला.

पता चला कि वह उस मास्टरनी का पति नजीर था, जो इनकम टैक्स विभाग में चपरासी था. उस के पीछेपीछे मास्टरनी भी दरवाजे तक आ गई. मैं देख कर हैरान रह गया कि अदने और साधारण से आदमी से खूबसूरती की मल्लिका मास्टरनी ने शादी कैसे कर ली?

और तो और, वह उम्र में भी उस से काफी बड़ा था. उस की पहली बीवी मर चुकी थी. यह मकान उस ने 4-5 महीने पहले ही लिया था. इस से पहले वह एक कमरे में किराए पर रहता था. चपरासी की नौकरी में उस ने इतना आलीशान मकान कैसे खरीद लिया, इस बात की मुझे हैरानी हो रही थी. अभी मैं सोच ही रहा था कि गनपतलाल लपक कर मेरे पास आया.

मैं उसे अच्छी तरह से जानता था. उस का अपनी पार्टी में अच्छा रसूख था. हाथ मिला कर वह मुझ से घर चलने का अनुरोध करने लगा. मैं ने उस से कहा कि मैं नजीर के बारे में मालूम करने आया था. इस पर उस ने कहा, ‘‘फिर तो आप मेरे साथ चलिए. उस के बारे में मुझ से ज्यादा कौन बता सकता है.’’

मेरा मकसद विलायत तक पहुंचना था. सोचा कि शायद गनपतलाल से ही उस के बारे में कोई जानकारी मिल जाए, इसलिए मैं उस के साथ उस की कोठी में चला गया. मेरे पूछने पर उस ने बताया, ‘‘नजीर काफी तेज बंदा है. वह मेरे पास अकसर आताजाता रहता है.

इनकम टैक्स में चपरासी है, पर उस की काफी पैठ है. शायद उस ने अभी कोई लंबा हाथ मारा है, जो कोठी खरीद ली है. खान साहब, इस की बीवी बड़ी खूबसूरत है. पता नहीं इस ने क्या चक्कर चलाया कि उस ने इस से शादी कर ली.’’ मैं ने पूछा, ‘‘आप इस की बीवी के बारे में कुछ जानते हों तो बताएं.’’

वह कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘खान साहब, मैं उस की मां को ही बुलवा लेता हूं. आप जो चाहें, उसी से पूछ लेना.’’ कह कर उस ने अपने एक आदमी को कुछ कह कर भेज दिया. करीब 10 मिनट में उस का आदमी एक बूढ़ी औरत को बुला लाया.

वह औरत डरीसहमी थी. उस के माथे पर पट्टी बंधी थी. मैं ने पूछा, ‘‘अम्मा, कल रात एक मुलजिम थाने से फरार हुआ है. मैं ने सुना है कि तुम्हारी बेटी का उस से नाम जोड़ा जाता रहा है.’’

ये भी पढ़ें- नचनिया : वो हो गया नाचने वाली का दीवाना

मेरी इस बात से उस का चेहरा उतर गया, वह दुखी हो कर बोली, ‘‘साहब, मेरी बेटी का उस से कोई ताल्लुक नहीं था, वह लड़का ही उस के पीछे पड़ा था. अब शादी के बाद वह बात भी खत्म हो गई,’’

उस की बात से मैं संतुष्ट नहीं था. इसलिए वहां से 12 बजे के करीब मैं थाने आ गया. थाने में सब के मुंह पर हवाइयां उड़ रही थीं. मैं डीएसपी साहब के कमरे में पहुंचा. बलराज मुंह फुलाए एक कोने में खड़ा था. डीएसपी साहब काफी गुस्से में थे. मेरे सैल्यूट के जवाब में बोले, ‘‘क्या रिपोर्ट है नवाज?’’

मैं ने कहा, ‘‘सर, सुबह से उसी कोशिश में लगा हुआ हूं, पर अभी कुछ पता नहीं चला.’’

‘‘नवाज खां, कोशिश नहीं, मुझे रिजल्ट चाहिए और मुलजिम मिलना चाहिए. तुम्हें पता नहीं कि यहां क्या हुआ? आधे घंटे पहले थाने के सामने 2 हजार आदमी जमा हो गए थे.

वे मांग कर रहे थे कि पुलिस के जुल्म से जो आदमी मरा है, उस की मौत की जिम्मेदार पुलिस है. मरने वाले की लाश हमें दो.’’ डीएसपी साहब ने गुस्से में कहा.

बलराज तीखे स्वर में बोला, ‘‘यह सब नवाज खान की नरमी की वजह से हुआ.’’

‘‘खामोश रहो,’’ मैं डीएसपी साहब की मौजूदगी में चिल्ला पड़ा, ‘‘यह मेरी नरमी की वजह से नहीं, तुम्हारी सख्ती का नतीजा है. तुम ने उसे जानवरों की तरह मारा.

तुम ने उस से पैसे वसूल किए. तुम्हारे मातहत ने उस की मांबहन को तंग किया. सिर्फ तुम्हारी वजह से वह छत से कूद कर खुदकुशी कर रहा था. गनीमत समझो कि टाहम पर पहुंच कर मैं ने उसे बचा लिया, वरना तुम्हारी तो बेल्ट उतर चुकी होती.’’ मेरा गुस्सा देख कर बलराज चुप हो गया. इस बार डीएसपी साहब नरमी से बोले, ‘‘देखो, आपस में अंगुलियां उठाने से कोई फायदा नहीं. यह हमारी इज्जत का सवाल बन गया है. कुछ सियासी लोग मामले को हवा दे रहे हैं. इस वक्त साढ़े 12 बजे हैं.

कल सुबह साढ़े 10 बजे तक मुलजिम मिल जाना चाहिए. हमारे पास 22 घंटे हैं. उसे ढूंढ़ कर लाना तुम दोनों की जिम्मेदारी है. इस बारे में जो मदद चाहिए, वह मिलेगी. एसपी साहब भी कौन्टैक्ट में हैं.’’

मैं अपने कमरे में गया. एएसआई विलायत अली के 4 दोस्तों को पकड़ लाया था, पर उन से कोई खास बात मालूम नहीं हो सकी थी. बस यही पता चला कि विलायत स्कूल के सामने कुल्फी बेचता था.

ये भी पढ़ें- मेघनाद : कुछ ऐसा ही था उस का व्यक्तितव

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

उस की गली में : भाग 1 – हुस्न और हवस की कहानी

बगल वाले कमरे में इंसपेक्टर बलराज एक मुलजिम की जम कर पिटाई कर रहा था. उस की पिटाई से मुलजिम जोरजोर चीख रहा था, ‘‘साहब, मैं ने कुछ नहीं किया. मुझे माफ कर दो, मैं बेकसूर हूं.’’

वह एक शहरी थाना था. वहां मेरे अलावा दूसरा इंसपेक्टर बलराज था. थाने में ही डीएसपी का भी औफिस था. इंसपेक्टर बलराज बेहद सख्त था.

गाली उस के मुंह से बातबात में निकलती थी. कई मुलजिम तो डर के मारे झूठे इलाजम को भी अपने  सिर ले लेते थे. लेकिन मुझे वह ‘बाऊजी थानेदार’ कह कर पुकारता था, लेकिन पीठ पीछे मेरा मजाक उड़ाता था.

ये भी पढ़ें- Short Story : लालच – रंजीता के साथ आखिर क्या हुआ

जिस मुलजिम की वह पिटाई कर रहा था, उस की आवाज आई, ‘‘साहब, बहुत जोर से पेशाब लगा है. मुझे जाने दीजिए.’’ पता नहीं क्यों मुलजिम की आवाज में मुझे एक अजीब सा दर्द महसूस हुआ. सर्दियों के दिन थे, शाम भी होने वाली थी.

मैं ने खिड़की पर पड़ी चिक से देखा, 2 सिपाही सहारा दे कर उस मुलजिम को छत पर बने पेशाबखाने ले जा रहे थे. उस की हालत देख कर ही लग रहा था कि उस की जम कर खातिरदारी की गई थी.

पुलिस भाषा में पिटाई को खातिरदारी कहते हैं. मैं खाली बैठा था, टहलता हुआ बाहर चला गया. अचानक मुझे छत पर धमाचौकड़ी की आवाज आती महसूस हुई.

ऊपर कौन भाग रहा है, जानने के लिए मैं छत पर चला गया. छत कोई 20 फुट ऊंची थी. ऊपर पहुंच कर मैं ने मुलजिम को मुंडेर की ओर भागते देखा. उसे पकड़ने के चक्कर में एक सिपाही गिर पड़ा था. मैं समझ गया कि मुलजिम पुलिस से छूट कर छत से नीचे छलांग लगाना चाहता है.

मैं तेजी से उस की तरफ दौड़ा. तब तक वह मुंडेर पर पांव रख चुका था, वह छलांग लगाता, उस के पहले ही मैं ने पीछे से उसे पकड़ लिया. नीचे सड़क पर लोगों का आनाजाना चालू था.

मैं उसे घसीटता हुआ पीछे ले आया. सड़क के लोग घबरा कर ऊपर देख रहे थे. वह जोरों से चीख रहा था, ‘‘मुझे छोड़ दो, मुझे मर जाने दो.’’

वह जैसे पागल हो रहा था. दोनों सिपाहियों ने मुश्किल से उसे काबू में किया. देखतेदेखते छत और सड़क पर मजमा लग गया. जैसे ही उसे नीचे लाया गया, गुस्से से पागल हो कर इंसपेक्टर बलराज उस पर टूट पड़ा. मुलजिम की मां और बहन थाने में बैठी थीं.

वे रोने लगीं. पिटतेपिटते मुलजिम बेहोश हो गया, पर बलराज के हाथ नहीं रुक रहे थे. मैं ने किसी तरह बलराज को रोका.

मुलजिम का नाम विलायत अली था. वह शहर का ही रहने वाला था. उस की मां और बहन हाथ जोड़ कर रोते हुए मुझ से कह रही थीं कि विलायत बेकसूर है. दोनों लोगों के घरों में काम कर के गुजारा करती हैं. बलराज ने उन से 5 सौ रुपए मांगे थे.

घर के जेवर, बरतन आदि बेच कर उन्होंने रुपए दे दिए थे. इस के बावजूद भी वह विलायत को नहीं छोड़ रहे. अब वह और पैसे मांग रहे हैं. वे और पैसे कहां से लाएं.

बलराज विलायत अली के खिलाफ फरारी का नया मामला दर्ज कर रहा था, जबकि 20 फुट ऊंची उस बिल्डिंग से किसी मरेकुचे आदमी का कूदना असंभव लगता था.

सही में तो जुल्म से घबरा कर खुदकुशी का मामला बनना चाहिए था. मैं सबकुछ देख और समझ रहा था. अगर मैं कुछ कहता तो बलराज और नाराज हो जाता. इसलिए मैं चुप रहा.

विलायत की मां और बहन ने जो बातें बताई थीं, उस से साफ लग रहा था कि उसे जबरदस्ती फंसाया जा रहा था. मुझे यहां आए अभी एक महीना ही हुआ था.

मैं अपने कमरे में पहुंचा तो वहां विलायत की मां बेहोश पड़ी थी, बहन रो रही थी. बहन हाथ जोड़ कर बोली, ‘‘थानेदार साहब, मेरी मां और भाई को उस जालिम से बचा लीजिए. आप जहां कहेंगे, जिस के पास कहेंगे, मैं चली जाऊंगी. बस मेरे भाई पर रहम करें.’’

उस की बात सुन कर मैं चौंका. उस की बातों से लगा, उसे कोई कहीं भेजना चाहता था? वजह साफ थी, लड़की जवान थी. देखने में भी अच्छी थी. मैं ने पूछा, ‘‘किसी ने तुम से कहीं चलने को कहा था क्या?’’

‘‘हां, कल एक सिपाही ने थानेदार के घर जा कर भाई की जमानत की बात करने को कहा था.’’

‘‘क्या तुम उस के यहां गई थी, फिर क्या हुआ?’’

‘‘हां, मैं गई थी उस सिपाही के साथ. मेरी मां भी साथ थी. उस ने हमें बहुत डरायाधमकाया. इस के बाद उस सिपाही की नीयत खराब हो गई. उस ने मां को कोई फार्म लाने के लिए बाहर जाने को कहा तो मैं उस की मंशा समझ कर मां के साथ बाहर चली गई.’’

ये भी पढ़ें- बेरुखी : पति को क्यों दिया ऐश्वर्या ने धोखा

उस की बात सुन कर मुझे उस पुलिस वाले पर बहुत गुस्सा आया. अब तक उस की बूढ़ी मां होश में आ चुकी थी. मैं ने उन दोनों को तसल्ली दी. इस के बाद मैं एक निर्णय ले कर डीएसपी साहब के पास जा कर बोला, ‘‘जनाब, विलायत का केस मैं हैंडल करना चाहता हूं.

बलराज के पास वक्त नहीं है, जिस की वजह से वह इस केस पर ठीक से ध्यान नहीं दे पा रहे हैं.’’

‘‘नवाज, यह कोई खास मामला नहीं है. उसी के पास रहने दो. ऐसा करने से आपस में खटास पैदा हो सकती है.’’

मुझे उन से इस जवाब की उम्मीद नहीं थी. मैं समझ गया कि बलराज मुझ से पहले डीएसपी साहब से मिल कर गया है. मैं कुरसी से उठ ही रहा था कि डीएसपी साहब के फोन की घंटी बज उठी.

बीच में उठ कर जाना ठीक नहीं था, इसलिए मैं बैठ गया. करीब 10 मिनट बात होती रही. डीएसपी साहब फोन पर बड़े अदब से बात कर रहे थे. बातचीत से लग रहा था कि फोन शायद एसपी या डीआईजी का था. फोन पर बात खत्म होते ही डीएसपी साहब ने चेहरे का पसीना पोंछने के बाद कहा, ‘‘नवाज खां, यह केस तुम हैंडल करो. बलराज से सारा रिकौर्ड ले लो.’’ उन्होंने कहा कि थाने की छत पर जो तमाशा हुआ, उसे देखने के लिए सड़क पर चल रहे लोग जमा हो गए थे.

ट्रैफिक जाम हो गया था. उस भीड़ में किसी मंत्री की गाड़ी थी. उस के पीछे एक जीप में प्रैस वाले थे. उन लोगों ने उस हाथापाई की फोटो खींच ली थी.

इस घटना से मंत्रीजी बेहद नाराज हो गए. उन्होंने सारा मामला खुद देखा था. इस थाने के मारपीट के पहले भी 1-2 मामले उछले थे. उन्होंने ही डीआईजी साहब से कहा है कि इस केस की सख्ती से जांच की जाए और जिस की वजह से यह सब हुआ है, उस के खिलाफ सख्ती से काररवाई की जाए.

मैं चलने लगा तो उन्होंने मुझ से इसंपेक्टर बलराज को भेजने को कहा. मैं ने बलराज को उन का मैसेज दे दिया. विलायत अली की हालत काफी खराब थी.

मैं ने करीब के क्लीनिक से डाक्टर बुला कर उसे दवा दिलवाई और हल्दी मिला दूध दे कर उसे लौकअप के बजाय कमरे में सुला कर क्वार्टर पर चला आया. उस की निगरानी के लिए एक सिपाही की ड्यूटी लगा दी थी.

ये भी पढ़ें- पाखंड का अंत : कैसे किया बिंदु ने बाबा का खुलासा

अगले दिन सवेरेसवेरे एक सिपाही ने मेरा दरवाजा खटखटाया और खबर दी कि मुलजिम विलायत अली जेल से फरार हो गया है. मैं सोच में पड़ गया. उस की हालत ऐसी नहीं थी कि वह भाग जाता. उसे काफी अंदरूनी चोटें लगी थीं.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

2 किरदारों का चरित्र : भाग 3

एक दिन उस ने पति को रानी से बात करते सुन लिया. उस रात इस बात को ले कर दोनों के बीच खूब झगड़ा हुआ था. उस ने खुल कर पति से कह दिया कि वह अपने जीते जी सिंदूर का बंटवारा नहीं कर सकती है. उस औरत से अपने संबंध तोड़ ले, वरना इस का परिणाम बहुत बुरा हो सकता है.

रानी को ले दोनों के बीच घर में एक बार जो संग्राम छिड़ा तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा था. पत्नी के लाख मना करने के बावजूद संदीप रानी से अलग होने का नाम ही नहीं ले रहा था. उस ने साफ तौर पर पत्नी से कह दिया था कि चाहे जो हो जाए, वह रानी का साथ नहीं छोड़ सकता. पति का दोटूक जवाब सुन कर प्रियंका ठगी रह गई थी, पर हार मानने वालों में से वह नहीं थी.

एक छत के नीचे दोनों किसी अजनबी की तरह रह रहे थे. दोनों के बीच धीरेधीरे मतभेद बढ़ता गया. प्यार की जगह नफरत का साम्राज्य बढ़ता गया. यहां तक कि उन के बीच बातें भी बंद हो गई थीं. प्रियंका ने पति से तलाक लेने के लिए अपने वकील के जरिए पारिवारिक न्यायालय में भरणपोषण की एक याचिका दायर करा दी थी. उस ने याचिका में दोनों बेटियों की परवरिश के लिए गुजारा भत्ता के लिए 14 हजार रुपए महीने के खर्चे और 25 लाख का दावा किया था.

ये भी पढ़ें- हम खो जाएंगे : भाग 2

भले ही उन के बीच बातचीत होनी बंद हो गई थी, पर इतना जरुर था कि वह घर की जरूरतों को पूरी करता था. बेटियों को भरपूर प्यार देने में कोताही नहीं करता था.

प्रियंका के भी बहक गए कदम

इसी बीच प्रियंका के जीवन में एक नए किरदार ने एंट्री ली. प्रियंका की बड़ी बेटी रिया बोनांजा स्कूल में पढ़ती थी. बेटी को स्कूल पहुंचाने प्रियंका ही जाती थी. जातेआते रास्ते में सगमनिया के रहने वाले अनूप कुमार सिंह (21 साल) से उस का परिचय हो गया. वह भी अपने भाई की बेटी को स्कूल पहुंचाने जाता था.

अनूप देखता था कि वह जब भी उस से मिलता था प्रियंका उदास और दुखी रहती थी. एक दिन बातोंबातों में अनूप ने उस के हर घड़ी उदास रहने की बात पूछ ली.

प्रियंका की दुखती रग पर पहली बार किसी ने हाथ रखा था. वह भावुक हो गई और अपने घर की कहानी उसे सुना बैठी. उस की कारुणिक कथा सुन कर अनूप का मन द्रवित हो उठा.

बातों से उस ने उसे सहारा दिया तो प्रियंका अपने से 9 साल छोटे अनूप की ओर अनायास ही खिंची चली गई. अनूप से बात कर के उस के मन को शांति मिलती थी और खुद को काफी हलका महसूस करती थी.

धीरेधीरे दोनों के बीच दोस्ती ने प्यार का रूप ले लिया था. पति के ड्यूटी चले जाने के बाद प्रियंका प्रेमी अनूप को अपने कमरे पर बुलाती और दिन भर रंगरलियां मनाती थी.

बात घटना से 15 दिन पहले 16 मई, 2020 की है. उस दिन संदीप ड्यूटी से छुट्टी ले कर जल्दी घर वापस लौट आया था. घर में एक अजनबी युवक को पत्नी के साथ देख कर उस का खून खौल उठा. भले ही पतिपत्नी के बीच अनबन चल रही थी. लेकिन प्रियंका अभी भी उस की पत्नी थी. पत्नी को किसी और की बांहों में देख कर कोई भी पुरुष आपा खो सकता था. संदीप भी आपा खो चुका था. उस ने जम कर दोनों पर लातघूंसे बरसाए.

अनूप किसी तरह अपनी जान बचा कर वहां से भाग गया लेकिन प्रियंका की तो शामत आ चुकी थी. संदीप ने अपना सारा गुस्सा उस पर उतार दिया था. पति द्वारा प्रेमी की पिटाई करना प्रियंका को अच्छा नहीं लगा था.

प्रियंका और उस के प्रेमी ने रची साजिश

फिर क्या था? दोनों ने संदीप को रास्ते से हटाने की योजना बना ली. अपनी योजना में अनूप ने अपने जिगरी यार सनी कुमार (20 साल) को थोड़ा पैसों का लालच दे कर मिला लिया, जो उसी के गांव का रहने वाला था.

उस दिन के बाद घटना से 3 दिन पहले 28, 29 और 30 मई तक अनूप और सनी दोनों ने मिल कर संदीप की रेकी की. उन्होंने पता लगा लिया कि संदीप घर से कब निकलता है? घर वापस कब लौटता है? किसकिस से मिलता है?

वैसे भी प्रियंका ने पति की सारी गतिविधियों के बारे में उसे विस्तार से बता दिया था. बस योजना को अंजाम देना था.

प्रियंका और उस के प्रेमी अनूप ने योजना ऐसी बनाई थी कि संदीप की मौत हत्या नहीं वरन स्वाभाविक मौत लगे ताकि किसी का उन पर शक न जाए. यानी सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

योजना के अनुसार, 31 मई, 2020 की रात 11 बजे प्रियंका ने अनूप को फोन कर के बता दिया कि उस ने घर का मुख्यद्वार खोल दिया है. अनूप अपने दोस्त सनी के साथ प्रियंका के घर पहुंचा. उस ने सनी से बाहर ही रह कर देखभाल करने को कहा. फिर वह चुपके से आ कर घर की सीढि़यों के नीचे छिप गया और प्रियंका को अपने आने की सूचना फोन पर दे दी.

सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था. संदीप को अपना फोन ले कर छत पर जाने के करीब डेढ़ घंटे बाद रात साढ़े 12 बजे प्रियंका और उस का प्रेमी अनूप दबे पांव छत पर पहुंचे. संदीप फोन पर रानी से बात करने में मशगूल था. उस ने जैसे ही दोनों को एक साथ अपनी ओर आते देखा, वहां से भागना चाहा. तब तक दोनों ने झपट्टा मार कर उसे अपने काबू में ले लिया.

ये भी पढ़ें- हिमानी का याराना: भाग 1

प्रियंका ने उस के हाथ से फोन छीन कर अपने कब्जे में ले लिया. फिर दोनों ने मिल कर संदीप को छत से नीचे गिरा दिया. संदीप के नीचे गिरते ही अनूप सीढि़यों से तेजी से नीचे आया और प्रियंका फोन ले कर अपने कमरे में चली गई ताकि किसी को शक न हो. फिर वह तेजी से वहां पहुंच गया, जहां संदीप दर्द के मारे कराह रहा था. लेकिन अभी वह जिंदा था.

प्लानिंग से की थी हत्या

तब तक प्रियंका भी वहां पहुंच गई थी. उस समय सनी वहां मौजूद नहीं था. अनूप और प्रियंका दोनों मिल कर उसे वहां से घसीटते हुए कुछ और दूर लाए, जहां एक बड़ा पत्थर मौजूद था. फिर प्रियंका की आंखों के सामने अनूप ने वह पत्थर उठा कर संदीप के सिर पर जोरदार वार किया.

संदीप के मुंह से एक दर्दनाक चीख निकली और वह मौत की आगोश में समा गया. उस के बाद उसे स्वाभाविक मौत का रूप देने के लिए उस के पास उस का मोबाइल फोन रख दिया. फिर अपने फोन से सनी को फोन कर उसे मौके पर बुलाया ताकि वह अनूप को वहां से घर ले जा सके.

अनूप के मौके से जाने के बाद प्रियंका अपने कमरे में वापस लौट आई. उस ने यही सोचा था कि थोड़ी देर बाद वह पति को ढूंढते हुए छत पर जाएगी. जब वहां उस का पति नहीं मिलेगा तो साक्ष्य के तौर पर मकान मालिक को ले कर पति को ढूंढेगी ताकि किसी को उस पर शक न हो और वह बेदाग बच जाए.

योजना के अनुसार प्रियंका ने वही किया. पहले पति को ढूंढने का नाटक किया. जब उस का पता नहीं चला तो 2 बजे रात में मकान मालिक कैलाश गुप्ता को नींद से जगा कर अचानक पति के गायब होने की जानकारी दे उसे ढुंढवाने में उन से मदद मांगी.

कैलाश गुप्ता ने प्रियंका के साथ पूरा घर छान मारा, लेकिन संदीप का कहीं पता नहीं चला था. जब वे दोनों उसे तलाशते हुए मकान के पीछे गए तो वहां संदीप की लाश मिली.

कहते हैं, कातिल लाख शातिर क्यों न हो, वह कोई न कोई गलती कर बैठता है. प्रियंका और उस के प्रेमी अनूप से भी एक गलती हो चुकी थी. कानून के शातिर खिलाडि़यों ने जांच कर उसी गलती की डोर पकड़ ली और पटवारी संदीप सिंह की मौत की गुत्थी सुलझा दी.

वह गलती थी संदीप के शरीर को मौके से करीब 15 फीट दूर घसीट कर ले आना और फोन का सुरक्षित पाया जाना.

जिद्दी प्रियंका थोड़ी सूझबूझ और धैर्य से काम लेती तो शायद उस के रिश्ते सुधर सकते थे. उस का सुहाग भी जिंदा रहता और बेटियां पिता के प्यार से महरूम भी न होतीं, लेकिन उस के गुस्से की सनक ने उसी के हाथों उस के परिवार में आग लगा दी और भरापूरा आशियाना जल कर खाक हो गया.

ये भी पढ़ें- इश्किया आग : भाग 1

खैर कथा लिखे जाने तक प्रियंका सिंह, अनूप कुमार सिंह और सनी कुमार तीनों गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए, जहां वे सलाखों के पीछे कैद अपने गुनाहों की सजा काट रहे थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

2 किरदारों का चरित्र : भाग 2

घटना वाली रात प्रियंका ने 2 अलगअलग फोन नंबरों पर बात की थी. एक काल रात करीब 11 बजे की थी और दूसरी काल दूसरे नंबर पर रात डेढ़ बजे के आसपास की थी. ये कौन हो सकते हैं, इस का पता तो प्रियंका से पूछताछ करने पर ही चल सकता था.

पुलिस ने दोनों नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर शक के आधार पर प्रियंका के नंबर को सर्विलांस पर लगवा दिया. उधर दोनों नंबरों की डिटेल्स पुलिस के हाथ लग चुकी थी. उन दोनों नंबरों में एक नंबर अनूप कुमार सिंह का था और दूसरा नंबर सनी कुमार सिंह का. दोनों एक ही मोहल्ले सगमनिया के रहने वाले थे.

वैज्ञानिक साक्ष्यों और काल डिटेल्स के आधार पर पुलिस ने पटवारी संदीप सिंह की मौत की गुत्थी करीबकरीब सुलझा ली थी. साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका था पति की मौत में पत्नी का हाथ है.

इसी बीच एक चौंकाने वाली बात पुलिस को पता चली. प्रियंका ने अपने नंबर से अनूप को फोन किया था. सर्विलांस पर लगे उस के नंबर पर हुई बातचीत को साइबर सेल प्रभारी दीपेश पटेल ने सुन लिया था. प्रियंका अनूप से कह रही थी कि पुलिस को उस पर शक हो गया है. अब क्या होगा? अब तो हम पकड़े जा सकते हैं.

ये भी पढ़ें- जब मुरदे ने दे दी खुद की गवाही : अपराधी चाहे जितनी चालाकियां कर ले, कानून से नहीं बच सकता

इस के बाद प्रियंका के बचने की कोई गुंजाइश नहीं बची थी. 5 जून को दोपहर इंसपेक्टर मोहित सक्सेना पूरी टीम के साथ संतोषी माता मंदिर स्थित कैलाश गुप्ता के घर पहुंचे, जहां प्रियंका रहती थी. उस समय घर पर संदीप के घर वाले और पत्नी प्रियंका मौजूद थी. सामने खड़ी पुलिस को देख कर प्रियंका के चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक आईं. उसी वक्त इंसपेक्टर मोहित सक्सेना ने कहा, ‘‘आप का खेल खत्म हुआ, प्रियंका. अब हमारे साथ चलिए.’’

‘‘क…कहां चलें? आप के कहने का क्या मतलब है?’’ हकलाती हुई प्रियंका ने पूछा.

‘‘थाने चल कर सब पता चल जाएगा. अरेस्ट हर सरला.’’ इंसपेक्टर सक्सेना ने साथ आई दोनों महिला सिपाहियों सरला शर्मा और प्रियंका चतुर्वेदी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया.

पुलिस प्रियंका सिंह को गिरफ्तार कर के थाने ले आई. उस के गिरफ्तार होने की सूचना उन्होंने एसपी रियाज इकबाल, एएसपी गौरव सिंह सोलंकी और सीएसपी विजय को दे दी थी.

प्रियंका ने कबूला गुनाह

सूचना मिलते ही पूछताछ करने के लिए एसपी इकबाल थाने पहुंच गए. प्रियंका कोई हार्डकोर क्रिमिनल तो थी नहीं कि घंटों पुलिस को यहांवहां घुमाती. पुलिस को देखते ही उस की हालत पतली हो गई थी. फिर क्या था. उस ने आसानी से अपना जुर्म कबूल करते हुए कहा कि उसी ने अपने प्रेमी अनूप कुमार सिंह और उस के दोस्त सनी के साथ मिल कर पति की हत्या कराई थी. अगर वो उसे नहीं मरवाती तो पति अपनी प्रेमिका के साथ मिल कर उस की हत्या करवा देता.

प्रियंका का सनसनीखेज बयान सुन कर पुलिस चौंकी. दोनों ही नैतिक पतन चरित्र वाले किरदार थे. दोनों के ही चरित्र मैले हो चुके थे. मैले चरित्र वाले पति और पत्नी दोनों एकदूसरे के जानी दुश्मन बने हुए थे. आगे की कहानी प्रियंका पुलिस के सामने परत दर परत खोलती चली गई. पूछताछ के बाद पटवारी की हत्या की कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

कहते हैं, जोडि़यां ऊपर से बन कर आती हैं, यहां तो सिर्फ फेरे लेते हैं 7 वचनों के बंधन में बंधने के लिए. संदीप और प्रियंका के साथ भी ऐसा ही हुआ था. सामान्य कदकाठी और सुदर नैननक्श वाली प्रियंका के गोरे बदन पर संदीप की जब पहली बार नजर पड़ी थी, वह अपलक उसे निहारता रह गया था.

दोनों की मुलाकात एक शादी की पार्टी में हुई थी. जहांजहां प्रियंका जाती, उस की हसरत भरी निगाहें उस का पीछा करती रहतीं. इस बात से बेखबर अल्हड़ प्रियंका मदमस्त बिंदास हो कर पार्टी का लुत्फ उठाती रही.

प्रियंका पहली ही नजर में संदीप के दिल में मुकाम कर गई थी. पार्टी में जब तक वह रहा, उस की नजरें सिर्फ प्रियंका पर टिकी हुई थीं. जब पार्टी समाप्त हुई तभी वह अपने घर वापस लौटा. तब वह गांव में रह रहा था और वहीं से अपनी बाइक से ड्यूटी करने सगौनी जाया करता था. ये 6 साल पहले की बात है.

प्रियंका के इश्क में संदीप इस कदर डूब चुका था कि उसे इस के अलावा कुछ भी नहीं सूझ रहा था. उस दिन के बाद से संदीप प्रियंका की तलाश में जुट गया था. आखिरकार उस की मेहनत रंग लाई और उस ने उसे ढूंढ ही लिया.

दरअसल, संदीप जिस दोस्त की पार्टी में शरीक हुआ था, उसी से प्रियंका का हुलिया बता कर उस के बारे में पूछ लिया था. दोस्त ने ही उस लड़की का नाम प्रियंका बताया था. वह भी सतना की रहने वाली थी.

संदीप को भा गई थी प्रियंका

संदीप दोस्त के जरिए प्रियंका से मिलने पहली बार उस के घर पहुंच गया था. प्रियंका के घर वालों से उस के दोस्त ने ही संदीप का परिचय करवाया था. बातोंबातों में प्रियंका के घरवालों ने जाना कि संदीप सरकारी नौकरी करता है. वह चकबंदी विभाग में पटवारी के पद पर कार्यरत है.

ये भी पढ़ें- अपराधी आगे आगे, पुलिस पीछे पीछे

खैर, संदीप को देख कर प्रियंका चकित रह गई थी. वह वही लड़का था, जो उस दिन पार्टी में उसे ही घूर रहा था और आज उस के घर तक पहुंच गया था. यह देख कर वह नतमस्तक थी. ऐसा नहीं था कि वह पार्टी में इतना बेसुध थी कि उसे कुछ दिख नहीं रहा था बल्कि वो संदीप की नजरों पर अपनी नजरें गड़ाए बैठी थी. वह देख रही थी कि संदीप की नजरें बड़ी शिद्दत उसे देख रही थीं. यह देख कर वह मन ही मन मुसकराए जा रही थी.

प्रियंका अपने घर में सब से बड़ी थी. उस से 2 छोटे भाईबहन और थे. प्रियंका ग्रैजुएशन कर चुकी थी. ग्रैजुएशन करने के बाद खाली समय में उस ने कंप्यूटर कोर्स करना शुरू कर दिया था.

काफी खुशमिजाज और खुले विचारों वाली वह आधुनिक युवती थी. एक लड़की को कितनी मर्यादा में रहना चाहिए, वह अच्छी तरह जानती थी और उसी मर्यादा के दायरे में रहती थी. उस दिन के बाद संदीप को जब भी मौका मिलता था, अंकल आंटी से मिलने के बहाने प्रियंका के घर आ जाया करता था.

घर पहुंचते ही उस की नजरें प्रियंका की खोज में जुट जाती थीं. जब तक वह उसे देख नहीं लेता था, उस के मन को सुकून नहीं मिलता था.

प्रियंका संदीप की नजरों को पहचानती थी. वह उस से बेहद मोहब्बत करता था. वह भी चुपकेचुपके संदीप से प्यार करने लगी थी और अपने दिल के कोरे कागज पर अपने महबूब संदीप का नाम लिख लिया था.

मौका देख कर दोनों एकदूसरे से अपने प्यार का इजहार भी कर चुके थे. इश्क के रथ पर सवार मोहब्बत के शहजादे खुले आसमान में पंख फैलाए ऊंचीऊंची कुलांचे भर रहे थे. जल्द ही दोनों ने एक होने का फैसला कर लिया था.

दोनों ने की थी कोर्टमैरिज

फिर क्या था संदीप और प्रियंका ने घर वालों की मरजी के खिलाफ कोर्ट मैरिज कर ली. संदीप के घर वालों ने प्रियंका को अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर लिया था, लेकिन प्रियंका के घर वालों ने बेटी से अपने संबंध हमेशा के लिए तोड़ लिए थे. प्रियंका को पा कर संदीप बेहद खुश था. खुश भला क्यों न हो, उस के मन की मुराद जो पूरी हुई थी.

आहिस्ताआहिस्ता दोनों के जीवन की गाड़ी पटरी पर चल रही थी. रिया और प्रिया नाम के 2 फूल उन की बगिया में खिल चुके थे. दोनों बेटियों को पा कर उन के जीवन की सारी मुरादें पूरी हो गई थीं. उन का जीवन खुशी से बीत रहा था. पता नहीं दोनों के खुशहाल जीवन में किस की बुरी नजर लगी कि उन के घर से सुख और चैन दोनों काफूर हो गए थे. कल तक एकदूसरे के बिना न रह पाने वाले प्रेमी से पतिपत्नी बने आज एकदूसरे के खून के प्यासे बन गए थे.

धीरेधीरे संदीप के सिर से प्रियंका के इश्क का भूत उतर चुका था. उस की जिंदगी में एक नई युवती दखल दे चुकी थी. दरअसल, हुआ यूं कि संदीप जहां नौकरी करता था, उसी के साथ रीवा जिले की रहने वाली रानी (परिवर्तित नाम) नाम की एक कुंवारी युवती भी पदस्थ थी. वह भी पटवारी थी. दोनों में गहरी दोस्ती थी. उस का दिल रानी पर आ गया था.

संदीप की जिंदगी में आई रानी

शाम को छुट्टी मिलते ही संदीप घर वापस लौट आता था. रात को खाना खाने के बाद वह अपना फोन ले कर छत पर चला जाता था. वहां इत्मीनान से घंटों तक रानी से बातें करता. देर रात 12-1 बजे के करीब कमरे में लौटता. ये संदीप का रोजाना का रुटीन बन चुका था. शुरू के दिनों में प्रियंका यही समझती रही कि औफिस के किसी साथी से जरूरी बात करते होंगे.

ये भी पढ़ें- हम खो जाएंगे : भाग 2

लेकिन जब महीनों तक यही रुटीन बन गया था तो प्रियंका को पति पर कुछ शक हुआ. उसे लगा कि दाल में कुछ काला है. यह बात दिमाग में आने के बाद से प्रियंका ने पति पर अपनी नजर पैनी कर दी थी. पति फोन ले कर जब भी रात में छत पर पहुंचता था, बिल्ली के मानिंद वह भी दबेपांव उस के पीछेपीछे हो लेती थी. आखिरकार उस की मेहनत रंग लाई.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

2 किरदारों का चरित्र : भाग 1

32 वर्षीय संदीप सिंह अपने परिवार सहित सतना जिले के कोलगवां थाना क्षेत्र के संतोषी माता मंदिर कालोनी में कैलाश गुप्ता के मकान में किराए पर रहता था. उस के परिवार में पत्नी प्रियंका सिंह और 2 बेटियां थीं. हालांकि संदीप मूलरूप से महादेवा बिहरा क्रमांक-1, सतना का रहने वाला था.

चूंकि वह पेशे से पटवारी था और सगौनी तहसील में पदस्थ था, गांव से नौकरी जानेआने में उसे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था, इसीलिए उस ने शहर में किराए का कमरा ले लिया था ताकि नौकरी पर आराम से आजा सके.

ऐसा नहीं था कि संदीप का पत्नी और बच्चों के अलावा कोई और नहीं था. उस के मांबाप गांव में अपने पुश्तैनी मकान में अन्य बच्चों के परिवार के साथ रहते थे. वह भी सरकारी नौकरी से रिटायर्ड थे. इसलिए गांव में रहते थे. संदीप का जब भी मांबाप से मिलने का मन करता था, वह महीने में एकदो बार गांव जा कर उन से मिल कर उसी दिन वापस लौट आता था.  ऐसे में संदीप और उस के परिवार की जिंदगी मजे से कट रही थी.

ये भी पढ़ें- हिमानी का याराना

बात 31 मई, 2020 की है. संदीप और उस का परिवार रात 10 बजे खाना खा कर फारिग हुए तो प्रियंका बरतनों को साफ करने किचन में चली गई. उस ने दोनों बेटियों को खिलापिला कर पहले ही सुला दिया था. संदीप की पुरानी आदत थी कि वह रात का खाना खाने के बाद कम से कम एकडेढ़ घंटे टहलता जरूर था.

उस रात भी खाना खाने के बाद संदीप अपना फोन ले कर मकान की छत पर टहलने गया. वह ग्राउंड फ्लोर पर रहता था. उस समय रात के 11 बज रहे थे. प्रियंका जब किचन की साफसफाई कर के फारिग हुई तो दीवार घड़ी पर नजर दौड़ाई.

घड़ी में उस समय रात के 12 बज रहे थे. अकसर यही समय हो जाया करता था उसे किचन से फारिग होतेहोते.

दिन भर के कामों और 2-2 बच्चों की देखभाल करतेकरते प्रियंका बुरी तरह थक जाती थी. इस रात भी वह बुरी तरह थक गई थी. किचन से फारिग हो कर जैसे ही वह बिस्तर पर लेटी, उस की आंखें लग गईं. दु:स्वप्न देख अचानक प्रियंका की नींद टूटी तो वह बिस्तर पर उठ कर बैठ गई. उस ने दीवार घड़ी पर नजर डाली, उस समय रात के 2 बज चुके थे. पति संदीप बिस्तर पर नहीं था.

पति को बिस्तर पर न पा कर प्रियंका हैरान रह गई. उस ने सोचा इतनी रात गए वह छत पर क्या रह रहे होंगे. वह पति को बुलाने छत पर गई तो देखा, पति छत पर नहीं थे. यह देख कर प्रियंका हैरान रह गई कि पति कमरे में नहीं हैं और छत पर भी नहीं हैं तो कहां चले गए. उस ने सोचा कहीं ऐसा तो नहीं कि टहलतेटहलते छत से नीचे गिर गए हों.

अपनी तसल्ली के लिए उस ने ऊपर छत से नीचे झांक कर देखा, लेकिन नीचे भी कुछ नहीं दिखाई दिया. यह सोच कर प्रियंका और भी हैरान थी कि रहस्यमय ढंग से पति कहां गायब हो गए. उस ने ऊपर से नीचे तक सब जगह देख लिया था. संदीप का कहीं पता नहीं चला तो वह बुरी तरह घबरा गई और मकान मालिक कैलाश गुप्ता को नींद से जगा कर पति के अचानक गायब हो जाने की बात बताई.

प्रियंका की बात सुन क र मकान मालिक गुप्ता की नींद उड़ गई थी कि वह अचानक से घर से कहां गायब हो सकता है? बड़ी हैरान कर देने वाली बात थी यह. मकान मालिक भी प्रियंका के साथ संदीप को ढूंढने में जुट गए.

नीचे से ऊपर तक एक बार फिर से दोनों ने संदीप को तलाशा, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. फिर दोनों उसे ढूंढते हुए मकान के पीछे यह सोच कर गए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि छत के ऊपर से नीचे जा गिरा हो. टौर्च की रोशनी में दीवार से करीब 5-6 फीट दूरी छान मारी, फिर भी संदीप का कहीं पता नहीं चला. उधर प्रियंका पति को ढूंढतेढूंढते कुछ आगे बढ़ गई थी.

तभी अचानक प्रियंका के मुंह से जोर से चिल्लाने की आवाज आई. चिल्लाने की आवाज सुन कर कैलाश गुप्ता डर गए और उसी ओर दौड़े, जिस ओर से आवाज आई थी. देखा जमीन पर संदीप का शव पड़ा था. उस के सिर से खून बह रहा था. उस की लाश के पास खून से सना एक पत्थर पड़ा था. पास में ही उस का मोबाइल पड़ा था. प्रियंका पति के पास बैठ कर विलाप कर रही थी.

मामला बड़ा संदिग्ध लग रहा था. छत से गिर कर संदीप की मौत हुई थी, यही कह कर प्रियंका विलाप करती रही. पटवारी संदीप की छत से गिर कर मौत की खबर सुन कर पासपड़ोस के लोग रात में ही मौके पर जुटने लगे थे. प्रियंका ने ससुर छोटेलाल सिंह को फोन कर के पति के छत से गिर कर मौत हो जाने की सूचना दे दी थी. बेटे के मौत की खबर जैसे ही घर वालों को मिली, घर में कोहराम मच गया. सहसा किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि संदीप अब इस दुनिया में नहीं रहा.

संदीप की मौत की खबर मिलते ही छोटेलाल बेटों के साथ घटनास्थल पहुंचे. उस समय सुबह के 10 बज चुके थे. संदीप की लाश देख कर किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि उस की मौत छत से गिर कर हुई है. इसी बीच किसी ने घटना की सूचना कोलगवां थाने को दे दी.

घटना की सूचना पा कर कोलगवां थाने के इंसपेक्टर मोहित सक्सेना अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. उन की टीम में एसआई शैलेंद्र सिंह, डी.आर. शर्मा, कांस्टेबल आर. बृजेश सिंह, देवेंद्र सेन और पुष्पेंद्र बागरी शामिल थे.

इंसपेक्टर मोहित सक्सेना ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. लाश के पास एक बड़ा पत्थर खून से सना पड़ा था. वहीं लाश के पास ही मृतक का मोबाइल फोन गिरा पड़ा था. जो बिल्कुल सहीसलामत था. मोबाइल पर खरोंच तक नहीं आई थी.

उस के बाद इंसपेक्टर सक्सेना ने मौके पर मौजूद मृतक की पत्नी प्रियंका, जिस का रोरो कर हाल बुरा हो रहा था और पिता छोटेलाल सिंह के बयान लिए. पत्नी प्रियंका ने छत से गिर कर पति की मौत होना बताया था.

ये भी पढ़ें- इश्किया आग : भाग 1

लाश की पोजिशन और घटनास्थल देख कर पता नहीं क्यों इंसपेक्टर सक्सेना मृतक की पत्नी का बयान पचा नहीं पा रहे थे. सब से आश्चर्य वाली बात तो ये थी मृतक करीब 28-30 फीट की ऊंचाई से जमीन पर गिरा था और उस की मौत हो गई थी. लेकिन उस के मोबाइल फोन पर खरोंच तक नहीं आई थी. ऐसे कैसे हो सकता था? यह बात उन के गले नहीं उतर रही थी.

उसी समय उन्होंने एसपी रियाज इकबाल, एएसपी गौरव सिंह सोलंकी, सीएसपी विजय प्रताप और एफएसएल टीम प्रभारी डा. महेंद्र सिंह को फोन कर के सूचना दे दी थी.

सूचना मिलने के थोड़ी देर बाद मौके पर सारे पुलिस अधिकारी पहुंच चुके थे. पुलिस अधिकारियों ने मौके का बारीकी से मुआयना किया. उन्हें भी पटवारी संदीप सिंह की मौत छत से गिरने से हुई हो, ऐसा नहीं लग रहा था. बल्कि यह हत्या का मामला लग रहा था. लेकिन यह बात पुलिस ने अपने तक ही सीमित रखी ताकि किसी को शक न हो, नहीं तो कातिल मौके का लाभ उठा कर फरार हो सकता था.

बहरहाल, पुलिस ने लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिया और मौके से मृतक का मोबाइल फोन और खून सना पत्थर बतौर साक्ष्य अपने कब्जे में ले कर पुलिस थाने लौट आई थी.

पुलिस ने पटवारी संदीप सिंह की संदिग्ध मौत की जांच शुरू कर दी. फिलहाल न तो मृतक की पत्नी प्रियंका ने और न ही पिता छोटेलाल सिंह ने हत्या की कोई तहरीर पुलिस को दी.

पुलिस ने घटना को रीक्रिएट किया

2 जून, 2020 को एसपी रियाज इकबाल, एएसपी गौरव सिंह सोलंकी, सीएसपी विजय प्रताप, इंस्पेक्टर मनोज सक्सेना और एफएसएल प्रभारी डा. महेंद्र सिंह घटनास्थल पर पहुंचे और घटना का रीक्रिएशन किया. पुलिस अधिकारियों ने मृतक संदीप के वजन के बराबर एक डमी तैयार की और वह डमी उसी छत से धक्का दे कर नीचे गिराई. डमी दीवार से 5 फीट की दूरी पर जा कर गिरी. यह क्रिया उन्होंने 3 बार की थी. तीनों बार डमी 5 फीट की दूरी पर जा कर गिरी थी. जबकि संदीप की लाश दीवार से 15 फीट की दूरी पर मिली थी.

यह कैसे संभव हो सकता है. यह सोच कर पुलिस अधिकारियों का माथा ठनक गया. वैज्ञानिक तर्कों से भी यह सिद्ध हो गया कि संदीप की मौत छत से गिरने से नहीं बल्कि एक साजिश के तहत उस की हत्या की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी सिर में गहरी चोट के कारण मौत होने का उल्लेख था.

ये भी पढ़ें- जब मुरदे ने दे दी खुद की गवाही : अपराधी चाहे जितनी चालाकियां कर ले, कानून से नहीं बच सकता

अब तक की जांचपड़ताल से यह सिद्ध हो चुका था कि पटवारी संदीप सिंह की हत्या की गई थी. पुलिस को आश्चर्य तब हुआ जब मृतक संदीप सिंह और उस की पत्नी प्रियंका के फोन का काल डिटेल्स निकलवा कर अध्ययन किया गया.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

2 किरदारों का चरित्र

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें