चार बीवियों का पति : भाग 2

रजनी के पास अपने पति की हत्या कराने का आधार तो था, लेकिन बिना सबूत के उस पर हाथ डालना उचित नहीं था. इसलिए पुलिस ने रजनी का मोबाइल नंबर हासिल कर के उस की डिटेल्स निकलवा ली. पुलिस टीम ने जांच को आगे बढाया तो एक और आशंका हुई कि हो ना हो गांव के ही किसी शख्स ने हत्यारों को नीटू के गांव में होने की सूचना दी हो.

क्योंकि आमतौर पर नीटू गांव में कम ही आता था और अगर आता भी था तो केवल एक रात के लिए. एक आंशका ये भी थी कि संभवत: नीटू की हत्या के तार दिल्ली से जुड़े हों. दिल्ली में या तो उस की किसी से कोई दुश्मनी रही होगी या लेनदेन का विवाद.

इसलिए पुलिस की एक टीम ने परिवार वालों से जानकारी ले कर दिल्ली स्थित नीटू के 2 मकानों पर दबिश दी तो पता चला विकास उर्फ नीटू ने एक नहीं बल्कि 4 शादियां की थीं.

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दिल्ली में नीटू के घर में रहने वाले किराएदारों और उस की प्लेसमेंट एजेंसी में काम करने वाले कर्मचारियों से पता चला कि नीटू रंगीनमिजाज इंसान था और अपनी अय्याशियों के कारण महिलाओं से एक के बाद एक शादी करता रहा था.

लेकिन पुलिस को किसी से भी नीटू की अन्य पत्नियों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल सकी. इसी बीच अचानक मामले में एक नया मोड़ आया. 22 मई को 2 महिलाएं बड़ौत थाने पहुंच कर जांच अधिकारी अजय शर्मा से मिलीं. पता चला कि उन में से एक महिला विकास की दूसरे नंबर की पत्नी शिखा थी और दूसरी कविता जो उस की वर्तमान व चौथे नंबर की पत्नी थी.

उन दोनों ने बताया कि नीटू की पहली पत्नी रजनी ने 2018 में भी एक बार नीटू को मरवाने की साजिश रची थी. ये बात खुद नीटू ने उन से कही थी. शिखा और कविता से जरूरी पूछताछ के बाद पुलिस ने रजनी के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स की पड़ताल के बाद पता चला कि जिस रात नीटू की हत्या की गई उसी रात रजनी के मोबाइल पर 9 बजे से 10 बजे के बीच एक ही नंबर से 2 काल आई थीं. जब इन काल्स के बारे में पता किया गया तो जानकारी मिली कि जिस नंबर से काल आईं वह शाहपुर बडौली में रहने वाले नीटू के दोस्त और पुराने पार्टनर सुधीर उर्फ लीलू का था.

आखिर ऐसी कौन सी बात थी कि इतनी रात में लीलू ने नीटू की पत्नी को 2 बार फोन किए. कहीं ऐसा तो नहीं कि लीलू ही वो शख्स हो, जिस ने कातिलों को नीटू के उस रात गांव में होने की जानकारी दी हो.

संदेह के घेरे में रजनी और लीलू

पुलिस को जैसे ही लीलू पर शक हुआ उस के मोबाइल की कुंडली खंगाली गई. पता चला उस रात कत्ल से पहले लीलू की 2 अंजान नंबरों पर भी बात हुई थी. वे दोनों नंबर गांव के किसी व्यक्ति के नहीं थे, लेकिन दोनों नंबरों की लोकेशन गांव में ही थी.

गुत्थियां काफी उलझी हुई थीं, जिन्हें सुलझाने के लिए पुलिस ने सुधीर व नीटू की पहली पत्नी को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया.

पुलिस ने जब उन के सामने मोबाइल फोन की डिटेल्स सामने रख कर पूछताछ शुरू की तो बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. नीटू हत्याकांड की गुत्थी खुद ब खुद सुलझती चली गई. जिस के बाद पुलिस ने मुखबिरों का जाल बिछा कर 25 जून को बावली गांव की पट्टी देशू निवासी रोहित उर्फ पुष्पेंद्र को गिरफ्तार कर लिया. पता चला उसी ने बावली गांव के रहने वाले अपने 2 साथियों सचिन और रवि उर्फ दीवाना के साथ मिल कर नीटू की गोली मार कर हत्या की थी.

पुलिस ने जब रजनी, सुधीर उर्फ लीलू तथा रोहित से पूछताछ की तो नीटू की हत्या के पीछे उस के रिश्तों की उलझन की कहानी कुछ इस तरह सामने आई.

विकास ने जिन दिनों दिल्ली में प्लेसमेंट एजेंसी खोली थी, वह उन दिनों दिल्ली के निहाल विहार में रजनी के घर में किराए का कमरा ले कर रहता था. 2009 में दोनों की यहीं पर जानपहचान हुई थी.

नीटू अय्याश रंगीनमिजाज जवान था, वह अकेला रहता था और उसे एक औरत के जिस्म की जरूरत थी. धीरेधीरे उस ने रजनी से दोस्ती कर ली. रजनी को भी नीटू अच्छा लगा. धीरेधीरे दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई और दोनों के बीच रिश्ते भी बन गए.

लेकिन कुछ समय बाद जब रजनी के परिवार वालों को दोनों के रिश्तों की भनक लगी तो उन्होंने रजनी से शादी करने का दबाव डाला. फलस्वरूप नीटू को रजनी से शादी करनी पड़ी. इस के बाद नीटू ने रजनी के परिवार वाला मकान छोड़ दिया.

चूंकि इस दौरान उस का कामधंधा काफी जम गया था और कमाई अच्छी हो रही थी, इसलिए उस ने नांगलोई में एक प्लौट ले कर उस पर मकान बनवा लिया था. रजनी को ले कर नीटू उसी मकान में रहने लगा.

दोनों की जिंदगी ठीक गुजर रही थी. रजनी और नीटू के 2 बेटे हुए . लेकिन रजनी नीटू की एक बुरी आदत से अंजान थी. प्लेसमेंट के धंधे से होने वाली अच्छीखासी कमाई थी. जब पैसा आया तो अय्याशी का शौक लग गया. इसी के चलते प्लेसमेंट औफिस में धंधा करने वाली लड़कियों को बुला कर अय्याशी करने लगा. जब इंसान के पास इफरात में दौलत आती है तो कई को शराब की लत लग जाती है. औफिस में पीना पिलाना नीटू की रोजमर्रा की आदत बन गई. रजनी को नीटू की अय्याशियों का पता तब चला, जब नीटू के गांव का ही रहने वाला सुधीर उर्फ लीलू नीटू के साथ धंधे में उस का पार्टनर बना. रजनी बच्चों के साथ अक्सर नीटू के गांव भी जाती थी. गांव के दोस्त रजनी को नीटू की पत्नी होने के कारण भाभी कह कर बुलाते थे.

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नीटू ने लीलू को अपने ही घर में रहने के लिए एक कमरा दे दिया था. इसीलिए घर में रहतेरहते लीलू को रजनी से काफी लगाव हो गया था. उसे यह देखकर बुरा लगता कि 2 बच्चों का पिता बन जाने और घर में अच्छीखासी पत्नी होने के बावजूद नीटू अपनी कमाई बाजारू औरतों पर लुटाता है.

रजनी से हमदर्दी के कारण एक दिन लीलू ने रजनी को नीटू की अय्याशियों के बारे में बता दिया. नीटू की बेवफाई और अय्याशियों के बारे में पता चलने के बाद रजनी ने उस पर निगाह रखनी शुरू कर दी और एकदो बार उसे औफिस में अय्याशी करते पकड़ भी लिया. इस के बाद रजनी व नीटू में अक्सर झगड़ा होने लगा.

नीटू की अय्याशी अब घर में कलह का कारण बन गई. इस दौरान नीटू ने इफरात में होने वाली आमदनी से निहाल विहार में ही एक और प्लौट खरीद कर उस पर भी एक मकान बना लिया था. उस ने उसी मकान को अपनी अय्याशी का नया अड्डा बना लिया. 2 बच्चों को जन्म देने के बाद रजनी का शरीर ढलने लगा था. उस में नीटू को अब वो आकर्षण नहीं दिखता था जो उसे रजनी की तरफ खींचता था.

बात बढ़ती गई

नीटू की अय्याशी की लत के कारण रजनी से उस की खटपट व झगड़े इस कदर बढ़ गए कि एक दिन रजनी दोनों बच्चों को छोड़ कर अपने मायके चली गई. दरअसल उन के बीच हुए इस अलगाव की वजह थी शिखा नाम की नीटू की प्रेमिका जिस के बारे में उसे पता चला था कि नीटू उस से शादी करने वाला है.

जब रजनी उसे छोड़ कर अपने मायके चली गई तो नीटू का रास्ता साफ हो गया, लिहाजा उस ने शिखा से शादी कर ली. शिखा के परिवार वालों ने नीटू के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. साथ ही उन्होंने अपनी तहरीर में आरोप लगाया कि उन की बेटी नाबालिग है. लेकिन शिखा ने अदालत में इस बात का प्रमाण दे दिया कि वह बालिग है.

इस पर अदालत ने उसे बालिग मान कर न सिर्फ नीटू के खिलाफ दर्ज मुकदमे को खारिज कर दिया बल्कि उस की शादी को भी वैध करार दिया.

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इस दौरान नीटू के दोनों बच्चे गांव में उस के मातापिता के पास रहने लगे थे. तब तक नीटू ने परिवार के अलावा गांव वालों को इस बात की भनक नहीं लगने दी थी कि उस ने रजनी को छोड़ कर दूसरी लड़की से शादी कर ली है. चूंकि रजनी उस के बच्चों की मां थी इसलिए नीटू कभीकभी उसे बच्चों से मिलाने के लिए अपने साथ गांव ले जाता था.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

चार बीवियों का पति : भाग 1

दिल्ली से सटे बागपत जिले में एक गांव है शाहपुर बडौली. विकास तोमर उर्फ नीटू (32) यहीं का रहने वाला था. उस के पिता किसान थे. 5 भाइयों में नीटू चौथे नंबर का था. 3 भाई उस से बड़े थे. जबकि एक छोटा था. नीटू ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था. इंटर तक पढ़ाई करने के बाद वह दिल्ली चला आया था. करीब 12 साल पहले वह जब दिल्ली आया था तो उस के पास 2 जोड़ी कपड़े और पांव में एक जोड़ी जूते थे.

नीटू ने एक प्लेसमेंट एजेंसी की मदद से एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. लेकिन जब उसे पहले महीने की सैलरी मिली तो वह आधी थी. पता चला आधी सैलरी कमीशन के रूप में प्लेसमेंट एजेंसी ने अपने पास रख ली.

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नीटू ने उस फैक्ट्री में 5 महीने तक नौकरी की. लेकिन हर महीने सैलरी में से एक फिक्स रकम प्लेसमेंट एजेंसी कमीशन के रूप में काट लेती थी. अगर नीटू विरोध करता तो प्लेसमेंट एजेंसी उसे नौकरी से निकालने की धमकी देती.

नीटू को लगा कि नौकरी से तो अच्छा है कि प्लेसमेंट एजेंसी खोल लो और दूसरों की कमाई पर खुद ऐश करो.

लेकिन प्लेसमेंट एजेंसी यानी कि लोगों को नौकरी दिलाने का कारोबार चलता कैसे है. इस सवाल का जवाब पाने के लिए नीटू ने नांगलोई की एक प्लेसमेंट एजेंसी में करीब 6 महीने तक पहले औफिस बौय फिर सुपरवाइजर की नौकरी की.

नौकरी करना तो एक बहाना था ताकि गुजरबसर और खानेखर्चे का इंतजाम होता रहे. असल बात तो यह थी कि नीटू प्लेसमेंट एजेंसी के धंधे के गुर सीखना चाहता था. आखिरकार 7-8 महीने की नौकरी के दौरान नीटू ने प्लेसमेंट एजेंसी चलाने के गुर सीख लिए.

इस के बाद उस ने अपने परिवार से आर्थिक मदद ली और नांगलोई के निहाल विहार में ही एक दुकान ले कर प्लेसमेंट एजेंसी का दफ्तर खोल लिया. पास के ही एक मकान में उस ने रहने के लिए कमरा भी ले लिया.

प्लेसमेंट एजेंसी चलाने के लिए जरूरी लाइसैंस तथा कानूनी औपचारिकता भी उस ने पूरी कर लीं. संयोग से उस का धंधा चल निकला. देखतेदेखते नीटू लाखों में खेलने लगा. लेकिन दिक्कत यह थी कि वह अकेला पड़ जाता था. उस के पास कोई भरोसे का आदमी नहीं था.

लेकिन जल्द ही उस की ये परेशानी भी दूर हो गई. उसी के गांव में रहने वाला सुधीर जिसे गांव में सब प्यार से लीलू कहते थे, उस के साथ काम करने के लिए तैयार हो गया.

नीटू ने लीलू को अपने साथ रख लिया और तय किया कि वह उसे सैलरी नहीं देगा बल्कि जो भी कमाई होगी, उस में से एक चौथाई का हिस्सा उसे मिलेगा. इस के बाद तो कुदरत ने नीटू का ऐसा हाथ पकड़ा कि देखते ही देखते उस का धंधा तेजी से चल निकला और उस के ऊपर पैसे की बारिश होने लगी.

अचानक हुई हत्या

नीटू के एक बड़े भाई की पिछले साल एक दुर्घटना में मौत हो गई थी. 22 जून, 2020 को उस की बरसी थी. भाई की बरसी पर घर में होने वाले हवनपूजा और दूसरे रीतिरिवाजों को पूरा करने के लिए नीटू गांव में अपने परिवार के पास आया हुआ था. वैसे भी कोरोना वायरस की वजह से लगे लौकडाउन के बाद कामधंधे ठप पड़े थे. इसलिए नीटू ने सोचा कि जब पूजापाठ के लिए गांव आया हूं तो क्यों न घर में छोटेमोटे बिगड़े पड़े कामों को सुधार लिया जाए.

घर से थोड़ी दूरी पर बने घेर (पशुओं का बाड़ा और बैठक) में 19 जून को नीटू ने बोरिंग कराने का काम शुरू कराया था. सुबह से शाम हो गई थी. काम अभी भी बाकी था. रात के करीब साढ़े 8 बज चुके थे. नीटू का छोटा भाई बबलू और बड़ा भाई अजीत घेर में उस के पास बैठे गपशप कर रहे थे. तभी अचानक एक पल्सर बाइक तेजी से घेर के बाहर आकर रुकी.

बाइक पर 3 लोग सवार थे, जिन में से 2 गाड़ी से उतरे और घेर के अंदर आ गए. तीनों भाई दरवाजे से 8-10 कदम की दूरी पर पड़ी अलगअलग चारपाइयों पर बैठे थे. उन्होंने सोचा बाइक से उतरे लड़के शायद कुछ पूछना चाहते होंगे.

दोनों लड़कों ने कुर्ता और जींस पहन रखी थी. मुंह पर मास्क की तरह गमछे बांधे हुए थे. क्षण भर में दोनों लड़के नीटू की चारपाई के पास पहुंचे. इस से पहले कि नीटू या उस के भाई कुछ पूछते अचानक दोनों युवकों ने कुर्ते के नीचे हाथ डाल कर तमंचे निकाले और एक के बाद एक 2 गोलियां चलाईं, जिस में से एक गोली नीटू की छाती में लगी दूसरी उस की कनपटी पर. गोली चलते ही दोनों भाइयों के पांव तले की जमीन खिसक गई. जान बचाने के लिए वे चीखते हुए घेर के भीतर की तरफ भागे.

मुश्किल से 3 या 4 मिनट लगे होंगे. जब हमलावरों को इत्मीनान हो गया कि नीटू की मौत हो चुकी है तो वे जिस बाइक से आए थे, दौड़ते हुए उसी पर जा बैठे और आखों से ओझल हो गए.

गोली चलने और चीखपुकार सुन कर गांव के लोग एकत्र हो गए. सारा माजरा पता चला तो नीटू के परिवार के लोग भी घटनास्थल पर पहुंच गए. देखते देखते पूरा गांव नीटू के घेर के अहाते के बाहर एकत्र हो गया.

गांव के लोग इस बात पर हैरान थे कि हमलावरों ने 3 भाइयों में से केवल नीटू को ही गोलियों का निशाना क्यों बनाया. नीटू तो वैसे भी गांव में नहीं रहता था फिर उस की किसी से ऐसी क्या दुश्मनी थी कि उस की हत्या कर दी गई.

इस दौरान गांव के प्रधान ने इस वारदात की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी थी. वहां से यह सूचना बड़ौत थाने की पुलिस को दी गई.

लौकडाउन का दौर चल रहा था. लिहाजा पुलिस भी लौकडाउन का पालन कराने के लिए सड़कों पर ही थी. बड़ौत थानाप्रभारी अजय शर्मा को जैसे ही शाहपुर बडौली में एक व्यक्ति की गोली मार कर हत्या करने की सूचना मिली तो वह एसएसआई धीरेंद्र सिंह तथा अपनी पुलिस टीम के साथ बडौली गांव में पहुंच गए.

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सूचना मिलने के करीब एक घंटे के भीतर बड़ौत इलाके के सीओ आलोक सिंह, एडीशनल एसपी अनित कुमार तथा एसपी अजय कुमार सिंह भी घटनास्थल पर आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. चश्मदीद के तौर पर 2 ही लोग थे नीटू के भाई अजीत व बबलू. दोनों न अक्षरश: पुलिस के सामने वह घटनाक्रम बयान कर दिया जो हुआ था. लेकिन वारदात को किस ने अंजाम दिया, नीटू की हत्या क्यों हुई, क्या उस की किसी से दुश्मनी थी. कातिल कौन हो सकता है, जैसे पुलिस के सवालों के जवाब परिवार का कोई भी शख्स नहीं दे पाया. वजह यह कि नीटू की हत्या खुद उन के लिए भी एक पहेली की तरह ही थी.

हत्या का कारण पता नहीं चला

बहरहाल पुलिस को तत्काल नीटू की हत्या के मामले में कोई अहम जानकारी नहीं मिल सकी. इसलिए रात में ही शव को पोस्टमार्टम के लिए बागपत के सरकारी अस्पताल भिजवा दिया गया. नीटू की हत्या का मामला बड़ौत कोतवाली में भादंसं की धारा 302, 452, 506 और दफा 34 के तहत दर्ज कर लिया गया.

एसपी अजय कुमार ने एएसपी अनित कुमार सिंह की निगरानी में एक पुलिस टीम गठित करने का आदेश दिया. सीओ आलोक सिंह के नेतृत्व में गठित इस टीम में बड़ौत थानाप्रभारी अजय शर्मा के अलावा एसएसआई धीरेंद्र सिंह, कांस्टेबल विशाल कुमार, हरीश, देवेश कसाना, रोहित भाटी, अजीत के अलावा महिला उपनिरीक्षक साक्षी सिंह तथा महिला कांस्टेबल तनु को भी शामिल किया गया.

पुलिस ने गांव में कुछ मुखबिर भी तैनात कर दिए ताकि लोगों के बीच चल रही चर्चाओं की जानकारी मिल सके.

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शुरुआती जांच के बाद यह बात सामने आई कि संभव है इस वारदात को नीटू की पहली पत्नी रजनी ने अंजाम दिया हो. पता चला नीटू ने अपनी पत्नी को कई सालों से छोड़ रखा था. वह दिल्ली में अपने मायके में रहती थी, लेकिन उसके दोनों बच्चे गांव में नीटू के घरवालों के पास रहते थे. साथ ही पुलिस को यह भी पता चला कि जिस रात नीटू की हत्या हुई उसी रात सूचना मिलने के बाद नीटू की पहली पत्नी रजनी रात को करीब 1 बजे गांव पहुंच गई थी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

आ अब लौट चलें : भाग 3

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

दिनेश की आटा मिल भी बंद हो गई. वह भारी मन से साइकिल खड़ी कर के अपने कमरे में गया तो फुलवा उसे देख कर ही समझ गई कि दिनेश कुछ परेशान है.

‘‘क्या बात है जी… आज मुंह लटकाए आ रहे हो… किसी से लडाईझगड़ा हो गया क्या?‘‘ फुलवा न पूछा.

‘‘नहीं रे फुलवा… सुना है, पूरी दुनिया में कोई भयानक बीमारी फैल रही है. लोग मर रहे हैं… इसलिए सरकार ने सारे उद्योग, सभी  कामकाज को पूरी तरह से बंद करने का निर्णय लिया है. और ये सब तब तक बंद रहेगा, जब तक यह बीमारी पूरी तरह से खत्म नहीं हो जाती,” दुखी मन से दिनेश ने कहा.

‘‘सबकुछ बंद… पर, ऐसा कैसे हो जाएगा… और काम नहीं होगा तो हमें पैसा कहां से मिलेगा… और… और हम खाएंगे क्या… हमें तो लगता है कि कोई मजाक किया है तुम से,‘‘ फुलवा ने चौंक कर कहा.

पर, ये तो कोई मजाक नहीं था… धीरेधीरे सबकुछ बंद होने की खबर फुलवा को भी पता चल गई और उस को भी मानना पड़ गया कि हां, सबकुछ वास्तव में ही बंद हो गया है.

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महल्ले में सारे मजदूर अपनेअपने घरों में ही बैठे थे और उस बीमारी को कोस रहे थे, जिस ने आ कर उन सब की जिंदगी पर ही एक सवालिया निशान लगा दिया था.

सभी के साथ ही दिनेश का भी दम घुटता था घर में… खाने का सामान और राशन भी धीरेधीरे खत्म हो रहा था. जब ज्यादा परेशानी आई तो दिनेश को अपना गांव याद आया.

‘‘फुलवा, मैं तो कहता हूं कि चलो अपने गांव लौट चलते हैं…”

लेकिन, गांव जाने का नाम सुनते ही फुलवा पूछ बैठी, ‘‘गांव… गांव जा कर क्या करेंगे? यहां जमीजमाई गृहस्थी है… इसे छोड़ कर कहां जाएंगे.”

‘‘यहां शहर में भी अब क्या रखा है… मालिक पगार नहीं दे रहा… अब हम यहां कितने दिन खाएंगे… और क्या खाएंगे… गांव में हमारी जमीन का एक टुकड़ा है… छोटा भाई उस पर खेती करता है… उसी पर हम भी कुछ उगा लेंगे और आराम से रहेंगे… कम से कम मरेंगे तो नहीं,‘‘ परेशान भाव से दिनेश ने कहा.

शहर में लौकडाउन था. सबकुछ ठप हो गया था. बहुत सारे मजदूर अपने गांव को चल पड़े थे. सरकारी तंत्र भी इन मजदूरों के पलायन को व्यवस्थित और सुरक्षित कर पाने में पूरी तरह नाकाम रहा था, इसलिए कई मजदूरों के जत्थे पैदल ही अपने गांव की ओर चल पड़े थे और इस दौरान उन मजदूरों के साथ कई दुखद हादसे भी हो चुके थे.

पर, शहर में काम न होने के कारण किसी भी हालत में दिनेश को यहां रहना रास नहीं आ रहा था. वह बस अपने गांव पहुंच जाना चाहता था. कम से कम गांव पहुंच कर जिंदा तो रह सकेगा वह.

और इसी सोच को लिए वह जब भी फुलवा से बात करता तो वह भी इसी शहर में रहने की बात पर अड़ जाती और दोनों में मनमुटाव की नौबत आ जाती.

दिनेश ने भी शहर में ही रह कर लौकडाउन के खुलने का इंतजार किया, पर हालात दिनबदिन खराब ही होते दिख रहे थे. रोजगार बंद हो गए थे और खानेपीने की चीजें भी महंगी हो रही थीं.

काम पर जाने के लिए बड़े अरमानों से लाई गई साइकिल भी अब धूल खा रही थी. महल्ले में चारों तरफ मरघट जैसा सन्नाटा सा छाया रहता था. महल्ले के कई लोग भी अपनेअपने गांव को चले गए थे और उन्हें गांव को जाता देख दिनेश को भी अपने गांव की याद सताती, पर फुलवा की जिद के आगे वह मजबूर था और मन मसोस कर रह जाता.

अब दिनेश के चेहरे पर  पहले वाली चमक नहीं रही, पगार पहले से ही बंद हो गई थी और घर के हालात भी खराब हो गए थे. फुलवा से भी ज्यादा ठिठोली नहीं करता था दिनेश.

कुछ दिन और बीते गए और उस की उदासी का कारण गांव न जा पाना है. इस कारण को फुलवा जान गई, तो उस ने अपनी जिद छोड़ने की सोची, ‘‘सुनोजी, हमें लगता है कि अब हम को भी गांव ही लौट जाना चाहिए. हमारे वास्ते शहर में अब कुछ नहीं बचा है. गांव जा कर कम से कम अपनी जिंदगी तो बचा सकेंगे हम.’’

फुलवा की ये बातें सुन कर दिनेश खुशी से झूम उठा. फुलवा को बांहों में भर कर दिनेश बोला, ‘‘हां फुलवा, मुझे पूरा यकीन था कि तुम जरूर मन जाओगी. हम कल ही सुबहसवेरे गांव की ओर निकल जाएंगे,” दिनेश चहकते हुए कह रहा था.

‘‘पर, ट्रेनें, बसें वगैरह सब तो बंद हैं… फिर हम जाएंगे कैसे?‘‘ फुलवा ने वाजिब सवाल किया.

‘‘अरे, उस की चिंता तू क्यों करती है? मेरे बहुत से साथी तो अपने परिवार के साथ पैदल ही गांव लौट गए हैं. जब वे पैदल जा सकते हैं, तो मैं और तुम साइकिल से क्यों नहीं…?‘‘ दिनेश ने साइकिल की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘‘साइकिल से कैसे गांव जाएंगे?‘‘ फुलवा चौंकी.

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‘‘अरे तू चिंता मत कर… मैं अपना सारा सामान मकान मालिक की गाड़ी के गैराज में रख दूंगा. जब स्थिति सामान्य हो जाएगी तो यहां आ कर सामान ले जाऊंगा… फिलहाल तो मैं और तुम साइकिल पर गाना गाते हुए चले चलेंगे गांव की तरफ.”

दिनेश ने समाधान बता दिया.

‘‘ठीक है, फिर हमें अभी से सामान रखने की तैयारी शुरू करनी होगी,” फुलवा ने कहा.

दोनों पतिपत्नी ने अपना हर सामान रखना शुरू कर दिया था और शाम तक सारा सामान मकान मालिक के गैराज में सुरक्षित रखवा दिया गया और हालात सामान्य होने पर सामान हटा लेने की बात भी दिनेश ने मकान मालिक को बता दी.

दिनेश ने शाम को अपनी साइकिल साफ कर दी थी और खापी कर दोनों जल्दी सो गए, क्योंकि अगली सुबह ही उन्हें गांव के लिए निकलना था.

सुबह उठ कर नहाधो कर दोनों तैयार हो गए. फुलवा ने एक छोटा सा कंधे पर लटकाने वाला बैग जरूर साथ ले लिया था.

एक ओर फुलवा का मन भारी हो रहा था, तो वहीं दूसरी ओर दिनेश खुश हो रहा था कि अब उसे शहर की नौकरी में किसी की डांट नहीं खानी पड़ेगी.

दोनों ही कमरे से उतर कर नीचे पहुंचे, जहां साइकिल खड़ी होती थी, पर साइकिल तो वहां से नदारद थी.

दिनेश ने चौंकते हुए इधरउधर खोजा, पर साइकिल वहां नहीं थी. साइकिल के खड़े होने की जगह पर ईंट के एक छोटे टुकड़े से दबा कर परचानुमा कागज जरूर रखा था.

फुलवा ने उसे खोला और पढ़ने लगी, “दोस्त दिनेश, उस दिन मेरे मांगने पर तुम ने मुझे साइकिल तो नहीं दी… मैं ने भी उस बात का बुरा नहीं माना था… पर, सही माने में आज मुझे इस साइकिल की जरूरत उस दिन से भी ज्यादा आ पड़ी है…

“तुम तो शहर के हालात बखूबी जानते ही हो… अब यहां रहना बहुत मुश्किल लग रहा है… तुम यह भी जानते हो कि मेरा एक दिव्यांग बेटा भी है और गांव में उस की मां अकेली हमारी राह देख रही है.

“एक दिव्यांग बेटे को उस की मां से मिलाने के लिए मेरा गांव जाना बहुत जरूरी है. मेरे पास गांव जाने का कोई और साधन न होने के कारण मैं तुम्हारी साइकिल चुरा कर ले जा रहा हूं. वापस कर पाऊंगा या नहीं, यह तो मैं नहीं जानता. पर उम्मीद है कि तुम मुझे माफ कर सकोगे…

“तुम्हारी तरह किस्मत का मारा तुम्हारा पड़ोसी मनोज”

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परचानुमा कागज पढ़ कर फुलवा और दिनेश की आंखों में आंसू आ गए.

बस फर्क खुशी और दुख के आंसुओं का था…

आ अब लौट चलें : भाग 2

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

अगले ही दिन से फुलवा ने काम करना शुरू कर दिया. वह दिनेश के काम पर जाने के बाद घर से निकली और पूरे महल्ले में अपने काम का नमूना ले कर सब को दिखा आई और साथ में यह बताना भी नहीं भूली कि जिस किसी को कढ़ाई आदि करवानी हो, तो इतने पैसे के साथ उस से बात करें.

खूबसूरती बहुत से कठिन कामों को भी आसान बना देती है. फुलवा खूबसूरत होने के साथसाथ व्यवहार में भी अच्छी थी. जल्द ही फुलवा के काम को लोगों ने पसंद किया. काम के और्डर भी आने लगे और आमदनी भी अच्छी होने लगी.

थोड़ीबहुत दिनेश की कमाई से बचा कर और बाकी अपनी कमाई से अब वे दोनों इस हालत में आ गए थे कि एक नई साइकिल खरीद सकें.

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और वह दिन भी आ गया, जब दिनेश और फुलवा ने पैसे गिने और साइकिल लेने के लिए मार्केट की ओर चल दिए.

आज फुलवा के चेहरे पर खुशी का रंग देखते ही बनता था. उस की गुलाबी साड़ी उस के चेहरे की आभा के आगे फीकी लग रही थी.

‘‘तभी तो राह आतेजाते लोग फुलवा को ही देख रहे हैं,” मन ही मन बुदबुदा रहा था दिनेश.

अपने मनपसंद रंग वाली साइकिल खरीद कर दिनेश बहुत ही खुश हो रहा था. उस ने साइकिल में घंटी भी लगवाई.

‘‘शहरों में घंटी सुनता ही कौन है… पर, हम जब मौज में होंगे तो इसी को बजा लिया करेंगे…

“और हां… वो गद्दी जरा मोटे फोम वाली लगाना भैया, ताकि कोई परेशानी न हो हमें… और एक कैरियर भी लगा देना पीछे… कभीकभी कुछ सामान ही रखना हो तो रख लो और आराम से चलते बनो.”

दिनेश कभी फुलवा को निहार रहा था, तो कभी अपनी नईनवेली साइकिल को.

पहले सोचा कि फुलवा को आगे वाले डंडे पर बिठा कर कोई गाना गाते हुए चल दें… लेकिन, फिर कुछ अच्छा नहीं लगा, तो पीछे कैरियर पर ही बिठा लिए और रास्ते भर गाना गाते और घंटी बजाते घर चला आया.

महल्ले में सब ही दिनेश को देखे जा रहे थे और दिनेश अपनी नई साइकिल के नशे में ही अकड़ा जा रहा था.

उस का आंगन कई किराएदारों का साझा आंगन था और बहुत गुंजाइश इस बात की भी थी कि निकलतेबैठते कोई जलन के कारण दिनेश की नई साइकिल को खरोंच ही मार दे.

हालांकि फुलवा ने रास्ते में ही बुरी नजर से बचने के लिए काला धागा खरीद कर बांध दिया था साइकिल के हैंडल पर, फिर भी सुरक्षा अपनाने में क्या जाता है, इसलिए दिनेश ने अपनी साइकिल को सब से अलग एक कमरे के पिछवाड़े वाले हिस्से में खड़ा करना शुरू कर दिया.

दिनेश जब साइकिल खड़ी कर के आ रहा था तो सामने फुलवा खड़ी मुसकरा रही थी. दिनेश के मन में भी अपनी पत्नी के लिए प्यार उमड़ आया और मस्ती भरी निगाहों से उस से बोला, ‘‘अरे फुलवा, आज तो नई साइकिल आई है… तो आज कुछ खट्टामीठा होना चाहिए.‘‘

‘‘खट्टामीठा… क्या मतलब है तुम्हारा, मैं कुछ समझी नहीं.‘‘

‘‘कुछ ऐसा काम करो, जो जबान का स्वाद खट्टा कर के भी मन को भा जाए और मीठा का मतलब जब तुम मुझे देखो और मैं तुम्हे देखूं और हम लोगों का मुंह अपनेआप मीठा हो जाए,‘‘ कह कर दिनेश ने फुलवा की तरफ आंख मारी, ‘‘धत्त… बेशर्म कहीं के.‘‘ और इतना कह कर फुलवा पीछे की ओर मुड़ी तो दिनेश ने अपने दोनों हाथों से उस के सीने को भींच लिया और बेतहाशा प्यार करने लगा.

दिनेश के हाथ फुलवा की गरदन पर फिसल रहे थे. उस की इन हरकतों से फुलवा भी जोश में आ गई और कमरे में 2 जिस्मों के दहकने की आवाजें साफ सुनाई देने लगीं. कुछ ही देर बाद कमरे का बढ़ा हुआ ताप धीरेधीरे ठंडा हो गया.

सुबह हुई तो नई साइकिल उठा कर दिनेश मिल की तरफ चला गया. जाते समय बड़ी शान से फुलवा से टाटा बायबाय करते हुए गया.

साइकिल के आ जाने से अब सबकुछ सही था. न ही दिनेश को किसी की डांट सुननी और न ही किसी सवारी का इंतजार करना पड़ता. और इधर फुलवा को भी इधरउधर से काम मिल जाता, जिस से कामकाज की गाड़ी अब पटरी पर चल रही थी.

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अपने काम पर जाने से पहले अपनी साइकिल को रगड़ कर पोंछना दिनेश के रोज के कामों में शामिल हो गया था और उस के इस तरह ध्यान रखने से मानो साइकिल भी खुश हो कर उसे धन्यवाद कहती थी.

एक तो महल्ले में फुलवा की जवानी और उस के भड़काऊ कपड़ों की चर्चा पहले से ही थी, फिर उस के काम के हुनर को देख कर महल्ले के लोग उस का लोहा मान गए थे और अब फुलवा ने अपने पति को जो नई साइकिल दिलवा दी. अब महल्ले में दिनेश की साइकिल चर्चा और जलन का केंद्र बनी हुई थी.

रविवार वाले दिन उसी के महल्ले का एक लड़का मनोज दिनेश से बोला, ‘‘अरे भाई दिनेश, आज तो तुम्हें काम पर जाना नहीं है. मुझे थोड़ा तुम्हारी साइकिल की जरूरत है… अगर मिल जाती तो बड़ी मेहरबानी होती.”

साइकिल मांगने की बात पर दिनेश का मूड थोड़ा उखड़ गया. उस की आवाज में तल्खी सी आ गई, ‘‘क्यों…? मेरी साइकिल की भला तुम्हें क्या जरूरत आ पड़ी.”

‘‘गोदाम तक जा कर सिलेंडर लाना है. बस यों गया और यों आया,‘‘ मनोज ने विनम्रता से कहा.

‘‘नहीं भाई… मुझे भी आज जरा फुलवा को ले कर अस्पताल तक जाना है, इसलिए साइकिल तो मैं नहीं दे पाऊंगा.‘‘

दिनेश के इस तरह मना कर देने से मनोज को काफी निराशा हुई और वह मुंह लटका कर वहां से चला गया.

‘‘हुंह… साइकिल न हो गई मानो कोई ठेला हो गया, जिस पर सिलेंडर लाद देंगे… अरे, इतना भारी सिलेंडर मेरी साइकिल के कैरियर को न पिचका देगा भला… महल्ले में और लोग भी तो हैं उन की साइकिल मांगो जा कर,‘‘ मन ही मन बुदबुदा रहा था दिनेश.

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बस कुछ इसी तरह से कट रही थी फुलवा और दिनेश की जिंदगी. अपनी ही दुनिया में मस्त. जिंदगी के हर पल का मजा उठाते हुए, पर इन की खुशियों को एक झटका सा तब लगा, जब एक दिन अचानक देश के प्रधानमंत्री ने टीवी पर आ कर पूरे देश में लौकडाउन का ऐलान कर दिया. लौकडाउन अर्थात सब कामधाम बंद, सारी दुकानें, साप्ताहिक बाजार सब बंद, सारे कारखाने बंद…

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

आ अब लौट चलें : भाग 1

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

यों तो फुलवा और दिनेश की शादी हुए 3 साल हो गए थे, पर दिनेश को लगता था जैसे उस के ब्याह को अभी कुछ ही रोज हुए हैं.

फुलवा को निहारते रहने के बाद भी उस का मन नहीं अघाता था. काम पर जाने से पहले फुलवा से मन भर के बातें करता और काम से जब घर लौटता तो फुलवा भी अपने पति के इंतजार में होंठों पर लाली और मांग में सिंदूर भर कर एक मधुर मुसकराहट के साथ दिनेश का स्वागत करती तो दिनेश की तबीयत हरी हो जाती.

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दिनेश फुलवा को अपनी बांहों में भर लेता और उसे पागलों की तरह चूमने लगता, फुलवा भी उस का साथ देती, पर कभीकभी दिनेश का यह बहुत उतावलापन फुलवा को अखरने लगता था, वह दिनेश को पीछे धकेल देती और चाय बनाने का बहाना कर के अपना पीछा छुड़ा लेती, पर फिर भी दिनेश उस के पीछेपीछे पहुंच जाता.

‘‘अरे फुलवा, हम जानते हैं कि तुम तो यहां पाउडर, क्रीम लगा कर बैठी हो और हम आए हैं बाहर से धूलगरदा में सन कर और पसीना में लथपथ हो कर… तभी तो तुम हमारी बांहों में आने से कतरा जाती हो…

‘‘अरे, पर हम भी क्या करें, जब तक तुम को बांहों में कस कर नहीं भर लेते हैं… और दोचार चुम्मा नहीं ले लेते हैं, तब तक हमारे कलेजे में भी ठंडक नहीं पड़ती है.”

‘‘अरे नहीं ना… ऐसी तो कोई बात नहीं है… अपना मरद तो हर हाल में अच्छा लगता है… उस के बदन की महक तो हमेशा ही अच्छी लगती है… अरे, हम तो इस मारे जल्दी से हट जाते हैं कि आप थकेहारे आए हो काम से तो हम आप के लिए कुछ चायनाश्ता बना दें चल कर.”

फुलवा की इन प्यार भरी बातों का दिनेश के पास कोई जवाब नहीं होता, बदले में वह सिर्फ मुसकरा कर रह जाता.

दिनेश का फुलवा के लिए प्यार बेवजह नहीं था, फुलवा थी ही ऐसी…

लंबा शरीर, सुतवां चेहरा, सांवला रंग और गांव में मेहनत करने के कारण उस का अंगअंग कसा हुआ  था, ऐसा लगता था कि उस के शरीर को किसी ढांचे में ढाल कर बनाया गया है.

फुलवा जब से अपने शहर के महल्ले में ब्याहने के बाद आई थी, तब ही से महल्ले के मनचले उस की एक झलक पाने के लिए बेचैन रहते थे, जिस का बहुत बड़ा कारण था फुलवा का पहनावा.

फुलवा अपनी गहरी नाभि के नीचे लहंगा पहनती और उस के दो इंच ऊपर सीने पर कसी हुई चोली, और इस पहनावे में जब वह नीचे टंकी पर पानी लेने जाती तो महल्ले के मनचले सारा कामधाम छोड़ कर उसे एकटक निहारते रहते.

ऐसा नहीं था कि दिनेश को इस बात की भनक नहीं थी कि महल्ले में फुलवा के पहनावे और उस की खूबसूरती के चर्चे हैं और इसीलिए वह जब एक दिन काम से घर आया तो फुलवा के लिए एक साड़ी ले आया और रोमांटिक अंदाज में बोला, ‘‘देखो फुलवा, अब शहर में तुम रहने आई हो, इसलिए अब ये गांव वाले कपडे़ तुम पर अच्छे नहीं लगते… और वैसे भी इन कपड़ों में लड़के तुम्हारे अंगों को घूरते हैं. यह मुझे अच्छा नहीं लगता है, इसलिए अब तुम ये साड़ी पहना करो.”

दिनेश की ये प्यारभरी भेंट देख कर फुलवा बहुत खुश हुई और तुरंत ही साड़ी को अपने बदन पर रख कर देखने लगी और दिनेश को खुश होते हुए एक चुंबन दे दिया.

दिनेश शहर की एक आटा मिल में मुंशीगीरी करता था. मिल उस के कमरे से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर थी, इसलिए उसे रोज या तो बस या फिर टैंपो का सहारा लेना पड़ता था, जो कि खर्चीला तो था ही, साथ ही साथ सवारी पकड़ने के लिए उसे मुख्य सड़क तक आना पड़ता था. इन सब में दिनेश का डेढ़ घंटा व्यर्थ जाता था और फिर भी कभीकभी देर हो जाने पर अपने से सीनियर अधिकारी की डांट भी सुननी पड़ती थी.

एक दिन आटा मिल में दिनेश जब थोड़ी देरी से पंहुचा तो उसे अधिकारी की ऐसी डांट मिली कि मन ही मन उस ने फैसला कर लिया कि अब वह इस शहर में नहीं रहेगा और गांव में जा कर जो थोडीबहुत खेती है, वही देखेगा और आराम से अपने छप्पर के नीचे सोया करेगा. किसी कमबख्त की डांट तो नहीं सुननी पड़ेगी और घर आ कर उस ने अपने मन की बात पत्नी फुलवा को बताई.

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फुलवा ने ठंडे दिमाग से उस की बात सुनी, पर वह 3 साल पहले ही गांव से आई थी. लिहाजा, गांव में होने वाली परेशानियां उस से छिपी नहीं थीं और न ही स्वयं फुलवा ही गांव में रहना चाहती थी. उसे तो शहर की जिंदगी ही अच्छी लगती थी.

फुलवा ने दिनेश को समझाते हुए कहा, ‘‘अब अगर आप थोड़ा सा लेट हो गए, आप से बडे़ अधिकारी ने कुछ कह भी दिया तो इस में शहर छोड़ कर भागने जैसी कौन सी बात है. गांव में हमारे बाबूजी कहा करते थे कि अगर कोई समस्या हो, तो उस की जड़ में जाना चाहिए… समाधान वहीं छिपा होता है…

“और आप की समस्या है कि आप देर से मिल मेें पहुंचत हो… अब अगर आप रोजरोज देर से पहुंचोगे तो डांट तो पड़ेगी ही न… कुछ ऐसा क्यों नहीं करते, जिस से आप मिल में समय पर पहुंच जाओ.”

‘‘क्या करूं फुलवा… सवारी पकड़ने के चक्कर में देर हो जाती है… कभी तो बस देर से आती है, तो कभी इतनी भरी होती है कि मैं उस में बैठने की हिम्मत नहीं कर पाता हूं,” दिनेश ने लाचारी से कहा.

‘‘तो तुम अपनी सवारी क्यों नहीं खरीद लेते,” फुलवा ने उपाय सुझाया.

‘‘क्या मतलब… हम बस, ट्रक खरीद लें क्या…?” यह सुन कर दिनेश चौंक पड़ा.

‘‘नहीं… बस, ट्रक नहीं, अपनी सवारी… मैं तो साइकिल वगैरह की बात कर रही थी.”

‘‘हां… साइकिल ठीक रहेगी… आराम से जब मन हुआ चल दिए… घंटी बजा कर और छुट्टी में भी न किसी सवारी का मुंह देखना और न ही लेट हो जाने के डर से डांट सुनने का डर.‘‘

एक पल को तो ऐसा सोच चहक उठा था दिनेश… पर, अगले ही पल मायूस हो गया.

‘‘पर फुलवा, एक अच्छी साइकिल 3 से 4 हजार रुपए में आती है… और तुम तो जानती हो कि हमारी तनख्वाह ही 5 हजार रुपए है… हम अगर साइकिल ले भी लेंगे तो तुम को क्या खिलाएंगे,‘‘ दिनेश ने मुंह लटका कर कहा.

‘‘हां, समस्या तो है, पर हम अपने गांव में अम्मां से जूट के बोरे पर बहुत अच्छी कढ़ाई करना सीखे हैं… सुना है, शहर में इस काम की बहुत मांग है. हम यहां महल्ले में अगलबगल के लोगों से काम लाएंगे और उस से हमारी आमदनी भी होगी और पहचान भी बनेगी.

“और जब हम और तुम दोनों मिल कर कमाएंगे तो साइकिल के लिए पैसा जल्दी जुट जाएगा न…‘‘ फुलवा ने खुशी से अपनी आंखें घुमाते हुए कहा.

आधेअधूरे मन से दिनेश ने अपनी रजामंदी दे दी.

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दरअसल, गांव की जिंदगी किस्सों और फिल्मों के लिए तो बहुत अच्छी है, पर जिन्होंने गांव की गरीबी देखी है, भुखमरी और अकाल देखा है, उन के दिल से पूछिए और इसीलिए फुलवा बिलकुल भी गांव नहीं जाना चाहती थी और इसीलिए वह दिनेश को मनाए रखने के लिए सारे प्रयास कर रही थी, भले ही इस के लिए उसे खुद भी काम करना पड़ जाए.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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चार बीवियों का पति

ये कैसी सजा

  • नाबालिगों को पेड़ से बांधकर दी सजा की पिटाई..
  • आपत्तिजनक स्थिति में मिले नाबालिक..
  • ग्रामीणों ने की लड़के की जमकर पिटाई..
  • दोनों नाबालिगों को पेड़ से बांधकर दी सजा..
  • घंटों बांधकर रकहा दोनों को की बेइज्जती और पिटाई..
  • जानकारी लगाने पर पुलिस मौके पर दोनों को छुड़ाया..
  • बांधकर बुलाई पंचायत परिवार में हुआ आपसी समझौता..
  • माडा थाना क्षेत्र सितुल गांव की घटना..
  • वीडियो सोशल मीडिया पर हुआ वॉयरल..

मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के सितुल गांव में 2 नाबालिगों को पेड़ से बांधकर सज़ा देने का मामला सामने आया है. जहां नाबालिग लड़के और लड़की को कई घंटो तक पेड़ से बांधकर पीटा गया. उक्त घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वॉयरल हुआ है.

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जानकारी के अनुसार नाबालिक लड़के और लड़की को गांव वालों ने एक नदी के किनारे आपत्तिजनक स्थिति में देखा, जिसके बाद उन्हें उन दोनों को पकड़कर ग्रामीणों ने एक पेड़ में बांध कर कई घंटो तक रखा और पिटाई भी की. और फिर पंचायत बुलाई गई.

मामले की जानकारी पुलिस को लगी तो वह मौके पर पहुंची और पेड़ से बंधे नाबालिगों को छुड़ाया, जहां पुलिस दोनों नाबालिक लड़के-लड़की को थाने ले गये. बाद मे दोनों के परिवारजनों की आपसी सहमति से समझौता/सुलह हो गया और पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया.

नाबालिगों से पेड़ मे बांधकर इस तरह की क्रूरतम सजा देने की उक्त घटना का वीडियो सोशल मीडिया में वॉयरल हो गया है. जिसपर कई सवाल खड़े हो रहे हैं.

मामला चाहे जो भी हो पर इतना तो तय है कि आज़ाद भारत में तालिबानी सज़ा का प्रावधान नहीं है बाबजूद इसके लोगों ने कानून को हाथ में लेकर इस तरह के जघन्य अपराध को अंजाम दिया.

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मामले में पुलिस भी मौके पर पहुंच गई और दोनों को छुड़ाया भी बाबजूद इसके पुलिस ने तालिबानी सजा देने वालों पर कोई कार्यवाही नहीं की यह एक बड़ा सवाल है.

यहां मामला दो नाबालिगों का है जहां लोगों ने कानून अपने हाथ में लेकर दोनों को पेड़ से बांधकर पीटा जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है. हालांकि अब इस मामले में पुलिस प्रशासन को चाहिए कि सजा देने वालों पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही करे.

मनगढ़ंत अपराध का दंड

अपराध अपराध होता है. मगर उसके भी रंग अनोखे होते हैं कभी हम कल्पना भी नहीं कर सकते की अपराध कैसे कैसे रंग रूप में हमारे आसपास घटित होते हैं. अगर आप में थोड़ी भी समझदारी है तो अपराध के रंगों को देखकर आप जीवन में कुछ ऐसी गांठ बांध सकते हैं जो आपको आजीवन अपराध से मुक्त व्यापार सुरक्षित रखेगा.

है ना यह अजीब बात! आज हम आपको इस लेख में मनगढ़ंत अपराध के रंग दिखाने जा रहे हैं.

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में यह खबर आग की तरह फैल गई कि खमतराई के पास एक शख्स से 10 लाख  रुपए की लूट हो गई है. कोरोना वायरस के इस समय काल में इस अपराध की तीखी प्रतिक्रिया हुई और लोग तरह तरह की बातें करने लगे. इधर पुलिस  परेशान थी और उसके ऊपर एक जिम्मेदारी थी कि किसी भी तरह इस केस को डिटेक्ट करके दिखाएं.

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और आपको आश्चर्य होगा 12 घंटे के भीतर पुलिस ने इस लूट के मामले का पर्दाफाश कर दिया. और यह सनसनीखेज तथ्य सामने आया कि यह पूरी लूट की घटना मनगढ़ंत थी यानी प्रार्थी ने पूरे प्लान के साथ लूट की घटना की कहानी बनाई और पुलिस के सामने मानो प्लेट में सज़ा कर रख दी.

क्या और कैसे हुआ इस लूट कांड में, यह सब आपको हम बताएं उसके पहले ऐसे ही कुछ  अपराध की बानगी आपके समक्ष प्रस्तुत है-

पहला  मामला- दुर्ग शहर में  20 वर्ष की एक युवती घर से गायब हो गई. परिजनों को फोन आया मिनी का अपहरण कर लिया गया है. घर परिवार और शहर में हंगामा खड़ा हो गया पुलिस जांच में जुट गई जब मामला पर से पर्दा उठा तो यह तथ्य सामने आया कि युवती ने अपने अपहरण की मनगढ़ंत कहानी बनाई थी उसकी मंशा अपने पिता से 10 लाख  रुपए वसूली का था.

दूसरा मामला- रायपुर जिला के तिल्दा में शख्स ने थाने में यह रिपोर्ट दर्ज कराई कि उसके यहां ताला तोड़कर सोना चांदी नकद सहित 15 लाख रुपए की चोरी हो गई है. पुलिस ने जब जांच पड़ताल की तो यह तथ्य सामने आ गया कि मामला पूरी तरह से मनगढ़ंत था.

तीसरा मामला- कोरबा नगर में एक युवती थाने पहुंची और नगर के एक व्यक्ति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई कि यह मुझे उठा ले गया और मेरे साथ बलात्कार किया. पुलिस जांच में यह तथ्य सामने आ गया की ऐसी कोई घटना घटित नहीं हुई है और मामला पूरी तरह मनगढ़ंत है.

लाखों की लूट का सच

आगे, राजधानी रायपुर के खमतराई थाना अंतर्गत लूट की सच्चाई की कहानी  नीचे प्रस्तुत है-

पुलिस ने पूरी जांच के बाद इस मामले में प्रार्थी कुलेश्वर साहू से जब कड़ाई से पूछताछ की तो उसने पूरी कहानी पुलिस के सामने उगल दी. खुलासे के बाद इस मामले में पुलिस ने कुलेश्वर के भांजे और उसके दोस्त को भी अब गिरफ्तार कर लिया है.

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खमतराई पुलिस के सनसनीखेज खुलासे के अनुसार  लकड़ी कारोबारी भरत पटेल के यहां मुंशी का काम करने वाले कुलेश्वर साहू  ने  8 अगस्त को टिम्बर मार्केट के व्यापारियों कें यहा से साढ़े दस लाख रुपये वसूली कर लौट रहा था. तभी डीआरएम ऑफिस के सामने ओवरब्रिज पर दो बाइक सवार युवक आकर उससे पैसा छीनकर फरार हो गए . पीड़ित ने पुलिस को पूछताछ में जो लूट की घटना की कहानी बताई  तो पुलिस को पहले ही नजर में मामला अविश्वसनीय प्रतीत हुआ. पुलिस के पास पहुंचे प्रार्थी कुलेश्वर साहू पर पुलिस को यकीन नहीं हो रहा था. अगर मामले की पड़ताल करना उसकी जिम्मेदारी थी सो जांच के दौरान पुलिस जब प्रार्थी के घर पहुंची तो अचानक उसका पड़ोसी अपना मोबाइल मांगने आ गया . पुलिस को शक गहरा हो गया  जब उसने किसी भी  मोबाइल लेने की बात से इनकार कर दिया. उसके संदिग्ध व्यवहार को देखकर पुलिस को शक हुआ और जब जांच की तो मामला परत दर परत खुलता चला गया.

पुलिस की पूछताछ मे कुलेश्वर साहू ने अंततः स्वीकार कर लिया.

दरअसल, पड़ोसी के मोबाइल का इस्तेमाल कुलेश्वर साहू ने लूट में शामिल अपने भांजे को कॉल करने के लिए किया था. कुलेश्वर ने दुर्ग जिला के पाटन के रहने वाले अपने भांजे और उसके दोस्त के साथ मिलकर इस लूट की वारदात की योजना बनाई थी. पुलिस ने उसके भांजे के पास से लूटी गई रकम बरामद कर तीनो को गिरफ्तार कर लिया और अब मनगढ़ंत लूट का किस्सा गढ़ने वाले तीनों शख्स रायपुर के सेंट्रल जेल में हवा खा रहे हैं.

मनगढ़ंत अपराधों के संदर्भ में पुलिस अधिकारी विवेक शर्मा बताते हैं दरअसल, ऐसे अपराधों के पीछे मानसिकता यह होती है कि कानून की आंखों में धूल झोंक कर रातों रात मालामाल हो जाएं. मगर वे नहीं जानते आज अनुसंधान में ऐसी ऐसी विधियां इजाद हो गई है की अपराधी का बचना नामुमकिन है और मनगढ़ंत अपराध के लिए भारतीय दंड विधान की धारा में सख्ती बरतते हुए दंडनीय है. अतः कभी भी ऐसा अपराध करने की हिमाकत नहीं करनी चाहिए. उच्च न्यायालय के अधिवक्ता डॉ उत्पल अग्रवाल के अनुसार ऐसे अपराधों में आरोपी को न्यायालय 3 से 7 वर्ष तक की सजा दिया करती है. क्योंकि यह माना जाता है ऐसे अपराध कारित करने वाले आरोपी कथित रूप से समाज के लिए खतरनाक है.

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