एक मुलाकात : क्या हालात के साथ समझौते का नाम ही जिंदगी है

नेहा ने होटल की बालकनी में कुरसी पर बैठ अभी चाय का पहला घूंट भरा ही था कि उस की आंखें खुली की खुली रह गईं. बगल वाले कमरे की बालकनी में एक पुरुष रेलिंग पकडे़ हुए खड़ा था जो पीछे से देखने में बिलकुल अनुराग जैसा लग रहा था. वही 5 फुट 8 इंच लंबाई, छरहरा गठा बदन.

नेहा सोचने लगी, ‘अनुराग कैसे हो सकता है. उस का यहां क्या काम होगा?’ विचारों के इस झंझावात को झटक कर नेहा शांत सड़क के उस पार झील में तैरती नावों को देखने लगी. दूसरे पल नेहा ने देखा कि झील की ओर देखना बंद कर वह व्यक्ति पलटा और कमरे में जाने के लिए जैसे ही मुड़ा कि नेहा को देख कर ठिठक गया और अब गौर से उसे देखने लगा.

‘‘अरे, अनुराग, तुम यहां कैसे?’’ नेहा के मुंह से अचानक ही बोल फूट पड़े और आंखें अनुराग पर जमी रहीं. अनुराग भी भौचक था, उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि उस की नेहा इतने सालों बाद उसे इस तरह मिलेगी. वह भी उस शहर में जहां उन के जीवन में प्रथम प्रेम का अंकुर फूटा था.

दोनों अपनीअपनी बालकनी में खड़े अपलक एकदूसरे को देखते रहे. आंखों में आश्चर्य, दिल में अचानक मिलने का आनंद और खुशी, उस पर नैनीताल की ठंडी और मस्त हवा दोनों को ही अजीब सी चेतनता व स्फूर्ति से सराबोर कर रही थी.

अनुराग ने नेहा के प्रश्न का उत्तर मुसकराते हुए दिया, ‘‘अरे, यही बात तो मैं तुम से पूछ रहा हूं कि तुम 30 साल बाद अचानक नैनीताल में कैसे दिख रही हो?’’

उस समय दोनों एकदूसरे से मिल कर 30 साल के लंबे अंतराल को कुछ पल में ही पाट लेना चाहते थे. अत: अनुराग अपने कमरे के पीछे से ही नेहा के कमरे में चले आए. अनुराग को इस तरह अपने पास आता देख नेहा के दिल में खुशी की लहरें उठने लगीं. लंबेलंबे कदमों से चलते हुए नेहा अनुराग को बड़े सम्मान के साथ अपनी बालकनी में ले आई.

‘‘नेहा, इतने सालों बाद भी तुम वैसी ही सुंदर लग रही हो,’’ अनुराग उस के चेहरे को गौर से देखते हुए बोले, ‘‘सच, तुम बिलकुल भी नहीं बदली हो. हां, चेहरे पर थोड़ी परिपक्वता जरूर आ गई है और कुछ बाल सफेद हो गए हैं, बस.’’

‘‘अनुराग, मेरे पति आकाश भी यही कहते हैं. सुनो, तुम भी तो वैसे ही स्मार्ट और डायनैमिक लग रहे हो. लगता है, कोई बड़े अफसर बन गए हो.’’

‘‘नेहा, तुम ने ठीक ही पहचाना. मैं लखनऊ में डी.आई.जी. के पद पर कार्यरत हूं. हलद्वानी किसी काम से आया था तो सोचा नैनीताल घूम लूं, पर यह बताओ कि तुम्हारा नैनीताल कैसे आना हुआ?’’

‘‘मैं यहां एक डिगरी कालिज में प्रैक्टिकल परीक्षा लेने आई हूं. वैसे मैं बरेली में हूं और वहां के एक डिगरी कालिज में रसायन शास्त्र की प्रोफेसर हूं. पति साथ नहीं आए तो मुझे अकेले आना पड़ा. अभी तक तो मेरा रुकने का इरादा नहीं था पर अब तुम मिले हो तो अपना कार्यक्रम तो बदलना ही पडे़गा. वैसे अनुराग, तुम्हारा क्या प्रोग्राम है?’’

अनुराग ने हंसते हुए कहा, ‘‘नेहा, जिंदगी में सब कार्यक्रम धरे के धरे रह जाते हैं, वक्त जो चाहता है वही होता है. हम दोनों ने उस समय अपने जीवन के कितने कार्र्यक्रम बनाए थे पर आज देखो, एक भी हकीकत में नहीं बदल सका… नेहा, मैं आज तक यह समझ नहीं सका कि तुम्हारे पापा अचानक तुम्हारी पढ़ाई बीच में ही छुड़वा कर बरेली क्यों ले गए? तुम ने बी.एससी. फाइनल भी यहां से नहीं किया?’’

नेहा कुछ गंभीर हो कर बोली, ‘‘अनुराग, मेरे पापा उस उम्र में  ही मुझ से जीवन का लक्ष्य निर्धारित करवाना चाहते थे. वह नहीं चाहते थे कि पढ़ाई की उम्र में मैं प्रेम के चक्कर में पड़ूं और शादी कर के बच्चे पालने की मशीन बन जाऊं. बस, इसी कारण पापा मुझे बरेली ले गए और एम.एससी. करवाया, पीएच.डी. करवाई फिर शादी की. मेरे पति बरेली कालिज में ही गणित के विभागाध्यक्ष हैं.’’

‘‘नेहा, कितने बच्चे हैं तुम्हारे?’’

‘‘2 बेटे हैं. बड़ा बेटा इंगलैंड में डाक्टर है और वहीं अपने परिवार के साथ रहता है. दूसरा अमेरिका में इंजीनियर है. अब तो हम दोनों पतिपत्नी अकेले ही रहते हैं, पढ़ते हैं, पढ़ाते है.’’

‘‘अनुराग, अब तक मैं अपने बारे में ही बताए जा रही हूं, तुम भी अपने बारे में कुछ बताओ.’’

‘‘नेहा, तुम्हारी तरह ही मेरा भी पारिवारिक जीवन है. मेरे भी 2 बच्चे हैं. एक लड़का आई.ए.एस. अधिकारी है और दूसरा दिल्ली में एम्स में डाक्टर है. अब तो मैं और मेरी पत्नी अंशिका ही घर में रहते हैं.’’

इतना कह कर अनुराग गौर से नेहा को देखने लगा.

‘‘ऐसे क्या देख रहे हो अनुराग?’’ नेहा बोली, ‘‘अब सबकुछ समय की धारा के साथ बह गया है. जो प्रेम सत्य था, वही मन की कोठरी में संजो कर रखा है और उस पर ताला लगा लिया है.’’

‘‘नेहा…सच, तुम से अलग हो कर वर्षों तक मेरे अंतर्मन में उथलपुथल होती रही थी लेकिन धीरेधीरे मैं ने प्रेम को समझा जो ज्ञान है, निरपेक्ष है और स्वयं में निर्भर नहीं है.’’

‘‘अनुराग, तुम ठीक कह रहे हो,’’ नेहा बोली, ‘‘कभी भी सच्चे प्रेम में कोई लोभ, मोह और प्रतिदान नहीं होता है. यही कारण है कि हमारा सच्चा प्रेम मरा नहीं. आज भी हम एकदूसरे को चाहते हैं लेकिन देह के आकर्षण से मुक्त हो कर.’’

अनुराग कमरे में घुसते बादलों को पहले तो देखता रहा फिर उन्हें अपनी मुट्ठी में बंद करने लगा. यह देख नेहा हंस पड़ी और बोली, ‘‘यह क्या कर रहे हो बच्चों की तरह?’’

‘‘नेहा, तुम्हारी हंसी में आज भी वह खनक बरकरार है जो मुझे कभी जीने की पे्ररणा देती थी और जिस के बलबूते पर मैं आज तक हर मुश्किल जीतता रहा हूं.’’

नेहा थोड़ी देर तक शांत रही, फिर बेबाकी से बोल पड़ी, ‘‘अनुराग, इतनी तारीफ ठीक नहीं और वह भी पराई स्त्री की. चलो, कुछ और बात करो.’’

‘‘नेहा, एक कप चाय और पियोगी.’’

‘‘हां, चल जाएगी.’’

अनुराग ने कमरे से फोन किया तो कुछ ही देर में चाय आ गई. चाय के साथ खाने के लिए नेहा ने अपने साथ लाई हुई मठरियां निकालीं और दोनों खाने लगे. कुछ देर बाद बातों का सिलसिला बंद करते हुए अनुराग बोले, ‘‘अच्छा, चलो अब फ्लैट पर चलें.’’

नेहा तैयार हो कर जैसे ही बाहर निकली, कमरे में ताला लगाते हुए अनुराग उस की ओर अपलक देखने लगा. नेहा ने टोका, ‘‘अनुराग, गलत बात…मुझे घूर कर देखने की जरूरत नहीं है, फटाफट ताला लगाइए और चलिए.’’

उस ने ताला लगाया और फ्लैट की ओर चल दिया.

बातें करतेकरते दोनों तल्लीताल पार कर फ्लैट पर आ गए और उस ओर बढ़ गए जिधर झील के किनारे रेलिंग बनी हुई थी. दोनों रेलिंग के पास खड़े हो कर झील को देखते रहे.

कतार में तैर रही बतखों की ओर इशारा करते हुए अनुराग ने कहा, ‘‘देखो…देखो, नेहा, तुम ने भी कभी इसी तरह तैरते हुए बतखों को दाना डाला था जैसे ये लड़कियां डाल रही हैं और तब ठीक ऐसे ही तुम्हारे पास भी बतखें आ रही थीं, लेकिन तुम ने शायद उन को पकड़ने की कोशिश की थी…’’

‘‘हां अनुराग, ज्यों ही मैं बतख पकड़ने के लिए झुकी थी कि अचानक झील में गिर गई और तुम ने अपनी जान की परवा न कर मुझे बचा लिया था. तुम बहुत बहादुर हो अनुराग. तुम ने मुझे नया जीवन दिया और मैं तुम्हें बिना बताए ही नैनीताल छोड़ कर चली गई, इस का मुझे आज तक दुख है.’’

‘‘चलो, तुम्हें सबकुछ याद तो है,’’ अनुराग बोला, ‘‘इतने वर्षों से मैं तो यही सोच रहा था कि तुम ने जीवन की किताब से मेरा पन्ना ही फाड़ दिया है.’’

‘‘अनुराग, मेरे जीवन की हर सांस में तुम्हारी खुशबू है. कैसे भूल सकती हूं तुम्हें? हां, कर्तव्य कर्म के घेरे में जीवन इतना बंध जाता है कि चाहते हुए भी अतीत को किसी खिड़की से नहीं झांका जा सकता,’’  एक लंबी सांस लेते हुए नेहा बोली.

‘‘खैर, छोड़ो पुरानी बातों को, जख्म कुरेदने से रिसते ही रहते हैं और मैं ने  जख्मों पर वक्त का मरहम लगा लिया है,’’ अनुराग की गंभीर बातें सुन कर नेहा भी गंभीर हो गई.

‘यह अनुराग कुछ भी भूला नहीं है,’ नेहा मन में सोचने लगी, पुरुष हो कर भी इतना भावुक है. मुझे इसे समझाना पड़ेगा, इस के मन में बंधी गांठों को खोलना पडे़गा.’

नेहा पत्थर की बैंच पर बैठी कुछ समय के लिए शांत, मौन, बुत सी हो गई तो अनुराग ने छेड़ते हुए कहा, ‘‘क्या मेरी बातें बुरी लगीं? तुम तो बेहद गंभीर हो गईं. मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था नेहा. सौरी.’’

‘‘अनुराग, यौवनावस्था एक चंचल, तेज गति से बहने वाली नदी की तरह होती है. इस दौर में लड़केलड़कियों में गलतसही की परख कम होती है. अत: प्रेम के पागलपन में अंधे हो कर कई बार दोनों ऐसे गलत कदम उठा लेते हैं जिन्हें हमारा समाज अनुचित मानता है. और यह तो तुम जानते ही हो कि हम भी पढ़ाईलिखाई छोड़ कर

हर शनिवाररविवार खूब घूमतेफिरते थे. नैनीताल का वह कौन सा स्थान है जहां हम नहीं घूमे थे. यही नहीं जिस उद्देश्य के लिए हम मातापिता से दूर थे, वह भी भूल गए थे. यदि हम अलग न हुए होते तो यह सच है कि न तुम कुछ बन पाते और न मैं कुछ बन पाती,’’ कहते हुए नेहा के चेहरे पर अनुभवों के चिह्न अंकित हो गए.

‘‘हां, नेहा तुम बिलकुल ठीक कह रही हो. यदि कच्ची उम्र में हम ने शादी कर ली होती तो तुम बच्चे पालती रहतीं और मैं कहीं क्लर्क बन गया होता,’’ कह कर अनुराग उठ खड़ा हुआ.

नेहा भी उठ गई और दोनों फ्लैट से सड़क की ओर आ गए जो तल्लीताल की ओर जाती है. चारों ओर पहाडि़यां ही पहाडि़यां और बीच में झील किसी सजी हुई थाल सी लग रही थी.

नेहा और अनुराग के बीच कुछ पल के लिए बातों का सिलसिला थम गया था. दोनों चुपचाप चलते रहे. खामोशी को तोड़ते हुए अनुराग बोला, ‘‘अरे, नेहा, मैं तो यह पूछना भूल ही गया कि खाना तुम किस होटल में खाओगी?’’

‘‘भूल गए, मैं हमेशा एंबेसी होटल में ही खाती थी,’’ नेहा बोली.

अपनेअपने परिवार की बातें करते हुए दोनों चल रहे थे. जब दोनों होटल के सामने पहुंचे तो अनुराग नेहा का हाथ पकड़ कर सीढि़यां चढ़ने लगा.

‘‘यह क्या कर रहे हो, अनुराग. मैं स्वयं ही सीढि़यां चढ़ जाऊंगी. प्लीज, मेरा हाथ छोड़ दो, यह सब अब अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘सौरी,’’ कह कर अनुराग ने हाथ छोड़ दिया.

दोनों एक मेज पर आमनेसामने बैठ गए तो बैरा पानी के गिलास और मीनू रख गया.

खाने का आर्डर अनुराग ने ही दिया. खाना देख कर नेहा मुसकरा पड़ी और बोली, ‘‘अरे, तुम्हें तो याद है कि मैं क्या पसंद करती हूं, वही सब मंगाया है जो हम 25 साल पहले इसी तरह इसी होटल में बैठ कर खाते थे,’’ हंसती हुई नेहा बोली, ‘‘और इसी होटल में हमारा प्रेम पकड़ा गया था. खाना खाते समय ही पापा ने हमें देख लिया था. हो सकता है आज भी न जाने किस विद्यार्थी की आंखें हम लोगों को देख रही हों. तभी तो तुम्हारा हाथ पकड़ना मुझे अच्छा नहीं लगा. देखो, मैं एक प्रोफेसर हूं, मुझे अपना एक आदर्श रूप विद्यार्थियों के सामने पेश करना पड़ता है क्योंकि बातें अफवाहों का रूप ले लेती हैं और जीवन भर की सचरित्रता की तसवीर भद्दी हो जाती है.’’

मुसकरा कर अनुराग बोला, ‘‘तुम ठीक कहती हो नेहा, छोटीछोटी बातों का ध्यान रखना जरूरी है.’’

‘‘हां, अनुराग, हम जीवन में सुख तभी प्राप्त कर सकते हैं जब सच्चे प्यार, त्याग और विश्वास को आंचल में समेटे रखें, छोटीछोटी बातों पर सावधानी बरतें. अब देखो न, मेरे पति मुझे अपने से भी ज्यादा प्यार करते हैं क्योंकि मेरा अतीत और वर्तमान दोनों उन के सामने खुली किताब है. मैं ने शाम को ही आकाश को फोन पर सबकुछ बता दिया और वह निश्ंिचत हो गए वरना बहुत घबरा रहे थे.’’

बातों के साथसाथ खाने का सिलसिला खत्म हुआ तो अनुराग बैरे को बिल दे कर बाहर आ गए.

अनुराग और नेहा चुपचाप होटल की ओर चल रहे थे, लेकिन नेहा के दिमाग में उस समय भी कई सुंदर विचार फुदक रहे थे.  वह चौंकी तब जब अनुराग ने कहा, ‘‘अरे, होटल आ गया नेहा, तुम आगे कहां जा रही हो?’’

‘‘ओह, वैरी सौरी. मैं तो आगे ही बढ़ गई थी.’’

‘‘कुछ न कुछ सोच रही होगी शायद…’’

‘‘हां, एक नई कहानी का प्लाट दिमाग में घूम रहा था. दूसरे, नैनीताल की रात कितनी सुंदर होती है यह भी सोच रही थी.’’

‘‘अच्छा है, तुम अपने को व्यस्त रखती हो. साहित्य सृजन रचनात्मक क्रिया है, इस में सार्थकता और उद्देश्य के साथसाथ लक्ष्य भी होता है…’’ होटल की सीढि़यां चढ़ते हुए अनुराग बोला. बात को बीच में ही काटते हुए नेहा बोली, ‘‘यह सब लिखने की प्रेरणा आकाश देते हैं.’’

नेहा अपने कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर जाने लगी तो अनुराग ने पूछा, ‘‘क्या अभी से सो जाओगी? अभी तो 11 बजे हैं?’’

‘‘नहीं अनुराग, कल के लिए कुछ पढ़ना है. वैसे भी आज बातें बहुत कर लीं. अच्छी रही हम लोगों की मुलाकात, ओ. के. गुड नाइट, अनुराग.’’ और एक मीठी मुलाकात की महक बसाए दोनों अपनेअपने कमरों में चले गए.

नेहा अपने कमरे में पढ़ने में लीन हो गई लेकिन अनुराग एक बेचैनी सी महसूस कर रहा था कि वह जिस नेहा को एक असहाय, कमजोर नारी समझ रहा था वह आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की जीतीजागती प्रतिरूप है. एक वह है जो अपनी पत्नी में हमेशा नेहा का रूप देखने का प्रयास करता रहा. सदैव उद्वेलित, अव्यवस्थित रहा. काश, वह भी समझ लेता कि परिस्थितियों के साथ समझौते का नाम ही जीवन है. नेहा ने ठीक ही कहा था, ‘अनुराग, हमें किसी भी भावना का, किसी भी विचार का दमन नहीं करना चाहिए, वरन कुछ परिस्थितियों को अपने अनुकूल और कुछ स्वयं को उन के अनुकूल करना चाहिए तभी हमारे साथ रहने वाले सभी सुखी रहते हैं.’

Holi 2024 सतरंगी रंग: कैसा था पायल का जीवन- भाग 1

पायल ने उस दिन सुबह से ही घर में हंगामा खड़ा कर रखा था. वह तेजतेज चिल्ला कर बोले जा रही थी, ‘‘भाई को बचपन से इंगलिश के प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया है. चलो, मु झे हिंदी मीडियम में पढ़ाया तो कोई बात नहीं, लेकिन अब मैं जो करना चाहती हूं, सब कान खोल कर सुन लो, वह मैं कर के ही रहूंगी.’’

‘‘मगर, तू ठहरी लड़की. तु झे यहीं रह कर जो करना है कर, वह ठहरा लड़का,’’ दादी की यह बात सुन कर पायल उन्हें चुप कराते हुए बोली, ‘‘दादी, आप तो चुप ही रहिए. जमाना कहां से कहां चला गया और आप की घिसीपिटी सोच अभी तक नहीं बदली.’’

पायल एकबारगी दादी को इतना सब बोल तो गई, पर अचानक उसे लगा कि उस ने दादी को कुछ ज्यादा ही बोल दिया है, इसलिए वह मन में पछतावा करते हुए दादी के गले में हाथ डाल कर बोली, ‘‘अरे मेरी प्यारी दादी, सौरी,’’ फिर उस ने अपने दोनों कान पकड़ लिए थे.

दादी के गाल सहलाते हुए पायल बोली, ‘‘जमाना बहुत बदल गया है दादी. अब लड़कियां वे सब काम कर रही हैं, जो पहले सिर्फ लड़के करते थे. दादी, आज हम सब को भी अपनी सोच बदलने की जरूरत है.’’

गांव में कहीं भी कोई भी रूढि़वादी बातें करता, तो पायल उस से उल झ जाती. कई बार तो घर में ही किसी न किसी से किसी न किसी बात पर उस की कहासुनी हो जाती.

इस के बाद पायल अपने होस्टल चली गई. वहां वह अपनी 12वीं जमात की तैयारी में जुटी हुई थी. कुछ महीने बाद ही उस के इम्तिहान शुरू होने वाले थे. उस दिन वह बैठीबैठी सोच रही थी, ‘मैं अपनी जिद पर इतनी दूर पढ़ने आई हूं. मम्मीपापा ने मु झ पर भरोसा कर के ही परदेश में पढ़ने भेजा है. मु झे कुछ तो ऐसा कर के दिखाना चाहिए, जिस से मेरे मम्मीपापा का सिर गर्व से ऊंचा हो सके,’ अभी वह यह सब सोच ही रही थी कि उस के घर से फोन आ गया. उस ने  झट से मोबाइल उठाया और बोल उठी, ‘‘मैं अभी आप सब को याद ही कर रही थी.’’

पर यह क्या, उधर से तो कोई और ही बोल रहा था. किसी अनजान शख्स की आवाज सुन कर पायल घबरा गई.

‘‘अरे, आप कौन बोल रहे हैं?’’ उस के इतना पूछने पर उधर से आवाज आई, ‘हम तुम्हारे पड़ोसी मदन चाचा बोल रहे हैं. तुम्हारी मम्मी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई है, तुम तुरंत यहां आ जाओ.’

पायल घबराते हुए मदन चाचा से पूछ बैठी, ‘‘आखिर हुआ क्या है मेरी मां को?’’

जवाब में मदन चाचा ने बस इतना ही कहा, ‘अरे बिटिया, तुम बस जल्दी से घर आ जाओ.’

पायल फिर कुछ परेशान सा होते हुए बोली, ‘‘चाचा, मेरी पापा से बात तो कराओ.’’

इस पर मदन चाचा ने कहा, ‘पापा अभी यहां नहीं हैं. वे डाक्टर साहब को लेने गए हैं.’

मोबाइल फोन अपनी जेब में रखते हुए पायल ने जल्दी से बैग में 3-4 जोड़ी कपड़े डाले और फटाफट चल पड़ी रेलवे स्टेशन की ओर. उस के मन में तरहतरह की बातें आ रही थीं. रास्ते में वह थोड़ीथोड़ी देर में अपने पापा व चाचा के मोबाइल पर काल करती रही, पर कोई भी उस की काल नहीं उठा रहा था. इस से उस के मन की बेचैनी और भी बढ़ती जा रही थी.

घर के दरवाजे पर काफी भीड़ देख कर पायल की बेचैनी और भी बढ़ गई. वह आपे से बाहर हो गई. उस के कदमों की रफ्तार और भी तेज हो गई. वह एक ही सांस में अपने घर तक पहुंच गई.

पायल ने देखा कि उस की मां को जमीन पर लिटा कर रखा गया था. उन के चारों ओर गांव की कई औरतें बैठी हुई थीं.

इतना देखते ही वह दहाड़ें मारमार कर रोने लगी. वह अपनी दादी से चिपक कर फूटफूट कर रो पड़ी. वह उन से पूछती जाती, ‘‘मां को क्या हो गया… मेरी मां कहां चली गईं मु झे छोड़ कर.’’

पायल दादी के सामने सवालों की  झड़ी लगाती चली जा रही थी, पर दादी के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था.

रूपा चाची ने पायल को चुप कराते हुए कहा, ‘‘चुप हो जा पायल बेटी,’ और फिर वे खुद भी फूटफूट कर रोने लगीं.

रूपा चाची रोतेरोते ही बोलीं, ‘‘अचानक ही सबकुछ हो गया. पता ही नहीं चला कि क्या हुआ था दीदी को. डाक्टर ने आ कर देखा तो बताया कि इन की तो सांस ही बंद हो चुकी है.’’

उस समय पायल को रहरह कर अपनी मां की सभी बातें याद आ रही थीं और रोना भी आ रहा था.

वहां मौजूद सभी औरतें आपस में बातें कर रही थीं कि पायल की मां बहुत ही सौभाग्यशाली थीं, जो वे सुहागिन हो कर अपने पति के कंधे पर सवार हो कर जाएंगी.

ये सब बातें पायल भी सुन रही थी. वह मन ही मन सोचने लगी, ‘इन औरतों को भी कुछ न कुछ बकवास करने को चाहिए. मेरी मां चली गईं और इन सब को उन के सौभाग्य की बातें सू झ रही हैं.’

थोड़ी ही देर में पायल की मां को नहलाधुला कर उन का खूब साजशृंगार किया गया और फिर उन्हें श्मशान घाट ले जाया गया.

मां की मौत के कुछ दिनों बाद से ही पायल के रिश्तेदारों ने उस की दादी से कहना शुरू कर दिया कि अभी सुकेश की उम्र ही क्या है? अभी तो 45 भी पार नहीं किया है उस ने और यह सब हो गया. वह अकेले बेचारा कैसे गुजारेगा अपनी इतनी लंबी जिंदगी? अब उस की दूसरी शादी कर देनी चाहिए.

पायल की दादी को भी लगने लगा था कि सभी ठीक ही तो कह रहे हैं. पायल से भी अपने पापा की उदासी देखी नहीं जा रही थी.

पायल कुछ दिन घर में रह कर होस्टल वापस चली गई. वहां जा कर वह इम्तिहानों की तैयारी में जुट गई.

कुछ महीने बाद ही दादी ने एक बड़ी उम्र की लड़की देख कर पायल के पापा की शादी तय कर दी. शादी की सूचना पायल को भी भेज दी गई.

पायल को जब यह खबर मिली तो वह खुश हुई और सोचने लगी कि मां के जाने के बाद पापा सचमुच अकेले हो गए थे. अब दूसरी शादी हो जाने से उन का अकेलापन दूर हो जाएगा.

पायल इम्तिहान दे कर शादी के समय घर आ गई. उस के पापा की शादी सारे रस्मोरिवाज के साथ बड़ी धूमधाम से हुई. घर में नई दुलहन का स्वागत भी बड़े जोरशोर से हुआ. पायल खुश थी, क्योंकि वह नए खयालों वाली लड़की थी. उसे घिसेपिटे रीतिरिवाज और रूढि़यों से चिढ़ थी.

कुछ समय बाद पायल फिर से अपने होस्टल वापस चली गई और वहां जा कर अपनी पढ़ाई में मसरूफ हो गई.

पर यह क्या, अभी कुछ महीने ही बीते होंगे कि अचानक एक दिन पायल के पास घर से फोन आ गया. पता चला कि उस के चाचाजी सख्त बीमार हैं. उसे जल्द घर आने को कहा गया.

चाचाजी की बीमारी की खबर सुनते ही पायल के दिमाग में तरहतरह के खयाल आने लगे. वह सोचने लगी, ‘अब चाचाजी को क्या हुआ? अभी तो मैं उन्हें अच्छाखासा छोड़ कर आई थी.’

पायल मन में उल झन लिए होस्टल से निकल कर रेलवे स्टेशन पहुंची, फिर बस पकड़ कर अपने गांव पहुंची. आज फिर उस ने दूर से दरवाजे पर भीड़ लगी देखी, तो किसी अनहोनी के डर से?घबरा गई. जब वह घर के नजदीक पहुंची तो उस ने देखा कि उस के मदन चाचा की लाश जमीन पर रखी थी और उस की चाची दहाड़ें मारमार कर रो रही थीं.

खोटी झांझरें : पंडित जी की पूजा

दालान में पंडितजी बड़े भैया को सामान लिखवा रहे थे, ‘‘ढाई मीटर कपड़ा, एक पसेरी शुद्ध घी, 5 मन लकड़ी, थोड़ी चंदन की लकड़ी, 3 लोटे, 13-13 नग, गीता, तुलसी की माला. तौलिए और खाट वगैरह तो होगी ही बड़े भैया, अगर एक शाल रामसिया की देह के ऊपर डालोगे तो अच्छा रहेगा… आखिरकार बिरादरी में चौधरी खानदान की इज्जत का सवाल है.’’ बड़े भैया ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘मगर पंडितजी, इस में तो बहुत खर्च हो जाएगा. कुछ कम पैसों में सारे काम पूरे करवा दीजिए. आखिर अभी तेरहवीं का भोज भी तो करना पड़ेगा.’’

पंडितजी का चमकता चेहरा कुछ बुझने सा लगा. वे बोले, ‘‘जैसा आप ठीक समझें बड़े भैया. आप तो चौधरी घराने के बड़े बेटे ठहरे, आप को क्या कमी.’’ बड़े भैया ने कुछ मायूसी से जवाब दिया, ‘‘आप को तो पता ही है कि रामसिया मेरे मंझले चाचा का एकलौता बेटा था. पुरखों का कमाया हुआ घर में क्या कुछ नहीं था, पर वह बचपन से बिगड़ गया. ‘‘बिना बाप का बेटा मां के लाड़ और बुरी संगत में पड़ कर बचपन से ही शराब और जुए में बरबाद होता गया,

जिस से धीरेधीरे सारी जायदाद खत्म हो गई. ‘‘अब ऐसे वक्त बूढ़ी चाची से रुपया तो मांगा नहीं जा सकता. अपनी जेब से ही खर्चा करना होगा.’’ पंडितजी ऊपर से मातमी सूरत बना रहे थे, पर मन ही मन हिसाब लगाते जा रहे थे कि कहां से, किस तरह से रुपया, दान वगैरह ऐंठा जा सकता है. वे बोले, ‘‘बड़े भैया, आप कुछ भी कहें, हाथी मरता भी है तो सवा लाख का होता ही है.’’ बड़े भैया ने अपने नौकर को बुलाया और कहा, ‘‘पंडितजी को माधव शाह की दुकान पर ले जाओ.

उस से कहना कि मेरे उधार खाते में हिसाब लिख कर, जो भी जरूरी सामान हो दे दे. ‘‘तुम खुद ही लेते आना, ताकि पंडितजी को कोई कष्ट न हो. तब तक मैं दूसरे इंतजाम देखता हूं.’’ बाहर वाले दालान में आदमी और अंदर वाले दालान में औरतें जमा थीं. बीच में कोठा पड़ता था, जहां से लोग आजा रहे थे. कुछ बच्चे भी वहीं बैठ कर अपनीअपनी तरह से बातें कर रहे थे.

अंदर दालान के एक ओर रामसिया की देह बर्फ की सिल्लियों पर रखी हुई थी. बहनों और बहनोइयों का इंतजार किया जा रहा था. बूढ़ी मां एक कोने में देह के सिरहाने बैठी जारजार रो रही थीं. कभीकभी बड़बड़ाना जारी कर देतीं, ‘‘अरी कुलच्छिनी, खा लिया मेरे बेटे को. अब मैं कैसे जी पाऊंगी… मेरा लाड़ला, मेरा रामसिया… रे, तू कहां चला गया.

तेरे बदले मुझे क्यों न मौत आ गई,’’ और वे सिर और छाती पीटना शुरू कर देतीं. महल्ले, बिरादरी की औरतों से भी एक मां का यह बिलखना देखा न जा रहा था. वे भी साथसाथ सुबकती जाती थीं और हमदर्दी जताती जा रही थीं. दूसरे कोने में रामसिया की पत्नी रामसुंदरी बेजान मूरत बनी बैठी थी. उस की आंखों के आंसू सूख चुके थे. जैसे सोचनेसमझने की ताकत ही बाकी न रही हो. न तो उसे रोना आ रहा था और न ही वह यह सोच पा रही थी कि वह विधवा हो चुकी है.

रामसुंदरी को बीते दिन याद आ रहे थे, जिस में उस ने सुहागिन होने का सुख जाना ही न था. बीते हुए दिन आंखों के सामने घूम रहे थे. इस घर में जब रामसुंदरी दुलहन बन कर आई थी, वह दिन उसे आज भी अच्छी तरह याद है. घूंघट के अंदर से वह आवाजें सुन रही थी. कोई औरत कह रही थी, ‘‘मझले चौधरी आज जिंदा होते तो खुशी से फूले न समाते कि कैसी हीरे की कनी सी बहू पाई है. सचमुच रामसिया तो मजनूं बन जाएगा.’’ रूपरंग में सभी बहुओं में बढ़चढ़ कर है,’’

शायद यह बड़ी चौधरानी यानी उस की बड़ी खास होगी, उस ने मन ही मन अंदाज लगाया था. सुना था, उस के 3 भाई थे. बड़े और छोटे अभी भी अच्छे ओहदों पर मुलाजिम थे. उस के अपने मंझले ससुर रियासत के दरबार में मुलाजिम थे. वे 9 साल के बेटे रामसिया और 4 बेटियों को पीछे छोड़ कर जवानी में ही चल बसे थे. मां से रामसुंदरी ने ब्याह से पहले यही सब सुन रखा था.

जब गोदभराई के वक्त उस की सास एक जोड़ी चांदी की खूबसूरत झांझरें उस के पैरों में पहनाने लगी थीं, तो वे बोली थीं, ‘‘बहू, इन झांझरों की शक्ल में मैं अपनी सास की दी हुई धरोहर तुम्हें सौंपती हूं. इन घुंघरुओं से निकलने वाली आवाज की तरह ही तुम्हारी जिंदगी में भी झंकार गूंजती रहे. मेरे लाड़ले को अपने बस में कर के बगिया हरीभरी कर देना.’’

रामसुंदरी तब सास के चरण छूने को उन के पैरों पर झुक गई थी. सांझ ढलने तक रामसुंदरी की 2 शादीशुदा और 2 कुंआरी ननदें दूसरी औरतों के साथ हंसीठिठोली करते हुए रस्में पूरी कराती रहीं. वे जब फूलों से सजे पलंग पर उसे बैठा कर चल दीं, तो अनजाने ही मन में डर के साथसाथ पति से पहले मिलन के खयाल से वह चंचल हो उठी. चूडि़यां जब झनझन बज उठतीं तो वह अपनेआप से शरमा जाती. रामसुंदरी ने गजब की देह पाई थी. जितनी वह सुंदर थी, उतनी ही मादक भी. उस के उभार देखने लायक थे. आज अपनी सुहागरात पर वह शर्म के मारे लाल हो गई थी. देह में अजीब सा रोमांच भर गया था. तभी दरवाजे पर आहट हुई. रामसुंदरी की सांसें ऊपरनीचे होने लगीं.

आज वह कली से फूल जो बनने वाली थी. घूंघट की ओट से पति को आते देखा तो और भी सिकुड़सिमट कर बैठ गई. तभी आवाज आई, ‘‘क्या गठरी सी बनी बैठी है. चल, यह दारू की बोतल पकड़ और गिलास में डाल कर मुझे पिला.’’ रामसुंदरी चौंक कर हैरानी से देखने लगी और सोचा, ‘तो क्या यही हैं चौधरी खानदान के चिराग? जो सपने मैं देख रही थी, क्या वे सब झूठे थे?’

उस रात रामसिया शराब पीता रहा और बड़बड़ाता रहा, ‘‘चल री पैर दबा मेरे. क्या नाम है तेरा? रामसुंदरी या रामप्यारी? खैर, क्या फर्क पड़ता है… मुझे तो काम से मतलब है… नाम कुछ भी हो.’’ शराब की बदबू रामसुंदरी से सहन नहीं होती थी, लेकिन वह मजबूर थी. रामसिया की याद आते ही रामसुंदरी का अल्हड़ मन कसैला हो उठता. जहां तक हो सकता, वह रामसिया की परछाईं से भी बचती रहती. इसी तरह उस की जिंदगी गुजरने लगी. जबजब दोनों ननदों के ब्याह की बात होती, तो रामसिया की बुरी आदतों के चलते रिश्ता टल जाता. कोई कहता, ‘भाई कुछ करता तो है नहीं, शराबी भाई से कैसे निभेगी?’ तो कोई कुछ कह कर टाल देता. एक जगह बात कुछ जमी, तो उन लोगों में से एक ने साफसाफ कह दिया,

‘‘भाई से तो कुछ उम्मीद नहीं है, पिता की जायदाद में बेटी का जो हिस्सा है, अंदाज से उतने जेवर उसे दे देना. हम ब्याह करने को तैयार हैं.’’ रामसुंदरी के जेठ, जिन्हें सभी बड़े भैया कहा करते थे, ने ही बात तय करवाई. यह उम्मीद ले कर कि सुंदरी बहू अपने रूप के बल पर बिगड़ैल बेटे को बांध कर रख सकेगी और बुरी आदतें छुड़वा सकेगी. रामसुंदरी को सोनेचांदी के जेवरों से मढ़ कर मंझली चाची ब्याह लाई थीं. परंतु कुछ सुधार न देख और बहू को बेटे से दूरदूर अलगअलग देख कर उन का सारा गुस्सा रामसुंदरी पर ही उतरता. बातबात में वे बहू को डांटतीं, फटकारतीं.

अब जब बेटी की शादी पर गहनों की बात आई, तो उन्होंने रामसुंदरी के 3-4 गहने उतरवा लिए. कुछ नकद जमापूंजी थी, सो वह बरातियों के स्वागतसत्कार व दूसरे खर्चों में लग गई. जब विदाई हुई, तो रामसुंदरी थकान से चूर कमरे में ही एक कोने में गठरी सी बन कर लेट गई. कुछ ही देर सोई होगी कि रामसिया शराब पी कर आ गया. रिश्तेदारों के बीच शोर मचाता हुआ वह कमरे में आ गया. तब एक ही पल में रामसुंदरी चौकन्नी हो उठी और पास में पड़ी लंबीचौड़ी दरी में लिपट कर आननफानन छिप गई, ताकि कोई यह न जान सके कि वह कहां है. रामसिया ने बहुत ढूंढ़ा. रामसुंदरी को सांस लेने में भी घुटन होने लगी. फिर भी वह बाहर नहीं निकली.

न जाने क्यों वह रामसिया की शराबी बिगड़ैल सूरत को ‘पति परमेश्वर’ का दर्जा न दे पाती थी. फिर रामसिया खर्राटे भरता पलंग पर औंधा सो गया. दबे कदमों से बाहर आते ही रामसुंदरी को देख उस की सास बुरी तरह झुंझलाई, ‘‘क्यों री, कहां छिपी बैठी थी? रामसिया की गरज नहीं सुनाई दी तुझे. यही हैं सुहागिनों के लच्छन?’’ दिन बीतते रहे, चौथी ननद के ब्याह के समय हवेली भी गिरवी रखी गई. रामसुंदरी के पैरों में बस वही झांझरें बची रहीं, बाकी सब गहने एकएक कर के शराब की भेंट चढ़ते गए. रामसुंदरी को सिर्फ लगाव था तो इन्हीं झांझरों से.

आखिर उस के ब्याह की निशानी जो थी. जब पति बिना शराब पिए घर में आता तो मानमनुहार करती और अपना फर्ज निभाती. तीजत्योहार पर अपने सुहाग की निशानी यानी झांझरें जरूर पैरों में पहनती. पहनने से पहले उन्हें खूब चमका कर साफ करती. सारा दिन हंसीखुशी से बीतता. लेकिन शाम ढले रामसिया फिर शराब पी कर आ जाता. दालान से ही उस की ऊंची आवाज सुन कर वह घबरा उठती.

झांझरें बज न उठें, इसलिए जल्दी से उन्हें उतार कर संदूकची में मलमल के कपड़े में लपेट कर रख देती और कहीं किसी कोने में छिप आती. रामसिया शोर मचाता रहता. इसी तरह उन झांझरों से जैसे उस का एक गहरा रिश्ता जुड़ गया. पिछली रात रामसिया घर से निकला तो लौटा ही नहीं. लौटी तो सिर्फ उस की देह, जो एक ट्रक से बुरी तरह कुचली हुई थी.

पुलिस के पूछने पर लोगों ने यही कहा कि शराब पी कर डगमगाता हुआ रामसिया सामने से आते हुए ट्रक के बीचोंबीच घुस गया. शायद उसे तब दीनदुनिया की खबर नहीं थी. जिस ने सुना, दौड़ा आया. सभी मातम मना रहे थे. रामसुंदरी तो जैसे रोरो कर सब से यही पूछ रही थी कि मेरा कुसूर क्या है? आज जैसे उस के लिए सभी मुजरिम थे. चाहे उस की मां हो, सास या ननदें. अपने साथ किए छल से उस का दिल फटा जा रहा था. अचानक रामसुंदरी चौंक उठी.

उस की सास दहाड़ें मारमार कर रो रही थीं, ‘‘मेरा लंबाचौड़ा गबरू जवान बेटा चला गया और यह मनहूस ज्यों की त्यों बैठी है, दो बूंद आंसू भी न बहा सकी, उस के लिए. मैं ही क्यों न चली गई तेरे साथ, ओ मेरे राजा बेटा रे…’’ तभी बड़े भैया आए और बोले, ‘‘चाची, तुम्हें तो पता ही है, मुझ पर कितनी जिम्मेदारियां हैं. जो बन सकेगा, मैं करूंगा ही… फिर भी कुछ रुपए दे देती तो ठीक रहता.’’ सुन कर रामसिया की मां दुखी आवाज में बोली, ‘‘एक वही झांझरें बची हैं बेटा,

जो बहू को गोदभराई में दी थीं, सो ले जा कर बेच दे. अब आखिरी काम में कोई कमी न रखना,’’ फिर आह भर कर वह अपनेआप से कहने लगी, ‘‘मुझ दुखियारी को यह दिन देखना था.’’ चाची का इशारा पा कर 2 औरतें उठीं. वे रामसुंदरी को उठा कर भीतर की ओर चल दीं, जहां संदूकची में झांझरें रखी थीं. रामसुंदरी ने चाबी कमर से निकाल कर संदूकची का ताला खोल दिया.

ढक्कन खोला तो देखा, संदूकची खाली पड़ी है. घबरा कर उस ने लाल मलमल का कपड़ा उठा कर हाथ में ले लिया और संदूकची पलट दी. अचानक ही कपड़े में से शराब की बदबू का भभका उठा और रामसुंदरी के सामने सारी बात साफ कर गया. कल दोपहर को जब वह सो रही थी, तब शायद रामसिया ने चाबी पार कर दी थी और झांझरें बेच कर शराब की शक्ल में मौत खरीद लाया था. तभी तो वह कल शराबखाने में आधी रात तक बैठा रहा था. रामसुंदरी की झांझरें भी आज खोटी निकल गईं. उसे लगा कि अब वह सचमुच ही अनाथ और विधवा हो गई है. रामसुंदरी दहाड़ें मारमार कर रोने लगी, ‘‘हाय रे, मैं लुट गई… बरबाद हो गई… मेरी झांझरें खोटी थीं रे

मजाक: वर्मा साहब गए पानी में

इसी महीने की 30 तारीख को अपने महल्ले के वर्मा साहब रिटायर हो कर गले में अपने भार से ज्यादा भारी फूलों की मालाएं लादे साहब के बगल में पसरे गाड़ी में आए, तो पूरे महल्ले ने दांतों तले उंगलियां दबा लीं. गले में फूलों की मालाएं डाले उस वक्त उन के बगल में उन के साहब उन के पद वाले लग रहे थे, तो वे अपने साहब के पद वाले.

तब उन्होंने अपने गले की मालाएं बड़ी कस कर पकड़ी हुई थीं.वर्मा साहब को उस वक्त चिंता थी तो बस यही कि कहीं उन के साहब उन के गले से माला निकाल कर अपने गले में न डाल लें. जब उन के साहब उन की गले की माला ठीक करने लगते, तो उन्हें लगता जैसे वे उन के गले से माला छीनने की कोशिश कर रहे हों.बहुत शातिर हैं वर्मा साहब के साहब.

सभी के फायदे को यों डकार जाते हैं कि किसी को उस की हवा भी नहीं लगने देते. जितने को हवा लगती है, उतने का साहब हाथ साफ करने के बाद धो भी चुके होते हैं. ये मालाओं का मोह होता ही ऐसा है कमबख्त. जिस के गले में एक बार जैसेकैसे पड़ गईं, उस के बाद उन्हें बचाना बहुत मुश्किल होता है.तब महल्ले वाले वर्मा साहब के गले में उन के भार से ज्यादा भारी मालाएं देख कर इशारों ही इशारों में एकदूसरे से बातें करने लगे,

‘अरे, हम तो वर्मा साहब को यों ही समझते थे कि वे औफिस में क्लास थ्री हैं, पर ये तो इस वक्त साहब के भी बाप लग रहे हैं. हम ने तो सोचा था कि ये रिटायरमैंट वाले दिन भी रोज की तरह पैदल ही घर आएंगे, जैसे रोज आया करते थे,

पर…’महल्ले वाले उन को महल्ले की दाल समझते हों तो समझते रहें, पर वे पकौड़े से कम नहीं, वह भी बेसन वाले नहीं, पनीर वाले. ये तो अपने वर्मा साहब का भला हो कि… जो बाहर को कोई उन के पद जितना ऊंचा मुलाजिम होता,

तो सारे महल्ले को नाकों चने चबवाया करता दिन में 10-10 बार.जैसे ही वर्मा साहब अपने घर के बाहर सड़क पर अपने दफ्तर की गाड़ी से अपनी परवाह किए बिना अपने गले की मालाओं को संभालते उतरे, तो उन की बीवी ने उन की आरती यों उतारी जैसे बलि के बकरे की बलि देने से पहले पुजारी उस की आरती उतारता है.उस के बाद बड़ी देर तक वर्मा साहब के घर में चहलपहल रही.

कुछ देर बाद उन के औफिस वाले खापी कर उन को हाथ जोड़ उन के आगे की बची जिंदगी को शुभकामनाओं में लपेट कर हमदर्दी देते दुम दबाए चलते बने. उस के बाद भी बड़ी देर तक उन के यहां खूब पार्टी उड़ती रही. महल्ले वालों ने डट कर खाया.

उन्होंने भी जो 30 साल तक औफिस में डट कर अपने हिस्से का खाया था, उस में से दिल खोल कर महल्ले वालों को डट कर खिलाया, ताकि औफिस में खाए के पाप को महल्ले वालों के सिर पर भी थोड़ाबहुत डाला जा सके.बड़ी देर तक वर्मा साहब दिल खोल कर अपने औफिस के वे किस्से भी अपने साथ बैठों को कौफी पीते सुनाते रहे, जो उन्होंने बौस के डर के मारे आज तक खुद को भी न सुनाए थे.

मुझे पता था कि कल तक जो ऊंट औफिस में हर काम करवाने वाले को अपने नीचे ले कर ही रखता था, कल से वही ऊंट पहाड़ के नीचे आने वाला नहीं, जब तक जिंदा रहेगा, अब तब तक पहाड़ के नीचे ही रहेगा.आखिरकार जब पार्टी खत्म हुई, तो वर्मा साहब के सब यारदोस्त खापी कर अपनेअपने घर निकल गए, तब उन की बीवी ने उन को समझाते हुए कहा,

‘‘देखोजी, अब ध्यान से सुनो. कान खोल कर सुनो. अब तुम रिटायर पति हो, औफिस वाले पति नहीं…’’‘‘तो क्या हो गया? पति तो हूं न?’’‘‘तो अब हो यह गया कि अपने गले से सारी मालाएं निकाल कर अपनी सामने वाली तसवीर पर डाल दो और यह पकड़ो लिस्ट…’’

‘‘काहे की लिस्ट? तुम्हें पता नहीं कि मैं लिस्ट लेता नहीं, लिस्ट देता रहा हूं…’’‘‘डियर पति, घर के कामों की. लिस्ट देने वाले दिन बीत गए अब. बहुत धमाचौकड़ी कर ली औफिस में.

अब से तुम्हारा औफिस यह होगा और ड्यूटी टाइम 11 से 4 नहीं, बल्कि सुबह 5 बजे से रात को 10 बजे तक रहेगा. जिस दिन काम ज्यादा हुआ, उस दिन रात के 12 भी बज सकते हैं.’’

‘‘मतलब कि ओवर टाइम?’’ वर्मा साहब को काटो तो खून नहीं.‘‘जी हां, ओवर टाइम. पर उस की न छुट्टी, न अलग से पैमेंट. अब तुम्हें कल से ये सारे काम करने हैं. लिस्ट गले में डाल लो, ताकि याद करने में आसानी रहे.’’बीवी ने उन्हें 2 फुट लंबी घर के कामों की लिस्ट थमाई,

तो उन्हें उन के पैर के नीचे से उन्हीं के नाम की रजिस्ट्री हुई जमीन सरकती लगी.‘‘कुछ देर आराम कर लो. दोस्तों से गपें मार कर थक गए होंगे. 30 साल तक बहुत करवा ली सब से अपनी सेवा, अब कल से तुम मेरी सेवा करोगे. पता नहीं फिर अगले जन्म में मुझे तुम से अपनी सेवा करवाने का मौका मिले या न मिले,’’ वर्मा साहब की बीवी ने कहा और सोने चली गई.

तब वर्मा साहब कभी अपने हाथ में बीवी द्वारा थमाई गई कामों की लिस्ट देखते, तो कभी अपनी तसवीर पर अपने गले से उतार कर चढ़ाई गई फूलों की मालाएं. जब उन का रोना निकल आया, तो वे अपनेआप से बोले, ‘‘जरा इन फूलों की खुशबू तो खत्म होने देती,’’

पर उन के सिवा उन की सुनने वाला वहां था ही कौन, जो ऐसा होने देता.सुबह ज्यों ही वर्मा साहब की बीवी ने बांग दी तो वे उछल कर नहीं, छल कर जागे.

फटाफट घर के कामों की लिस्ट देखी. सब से ऊपर वाला काम बीवी के बांग देते ही होना था, सो बेचारे अधजगे ही करने लगे.10 बजे के आसपास मैं ने भी सोचा, ‘चलो, वर्मा साहब के दर्शन कर लेते हैं. बेचारे औफिस जाने को फड़फड़ा रहे होंगे…’मैं उन के घर गया उन की रिटायरमैंट के बाद की जिंदगी का लाइव देखने. उस वक्त वे कमरे में झाड़ू लगा रहे थे. उन्होंने मुझे देखा, तो वे झाड़ू कोने की ओर फेंकते हुए ठिठके तो मैं ने उन से हंसते हुए कहा,

‘‘शरमाओ मत वर्मा साहब. यही होना है अब तो जब तक जिंदा हैं. इसी बहाने अब थोड़ीबहुत एक्सरसाइज भी हो जाया करेगी… और रिटायरमैंट के बाद हर मर्द को देरसवेर कुशल गृहिणी होना ही पड़ता है.’’‘‘पर यार…’’ वे कोने से झाड़ू उठा कर मुझे पकड़ाने की कोशिश करने लगे, तो मैं ने कहा,

‘‘मैं अपने घर में कर के आ गया हूं वर्मा साहब. सोचा, अब आप का भी हालचाल पूछ आऊं. इस बहाने मुझे जरा आराम भी मिल जाएगा. उस के बाद तो…’’‘‘रिटायरमैंट के बाद क्या यह सब के साथ होता है यार?’’ वर्मा साहब ने रुंधे गले पूछा, तो मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘हां, अपने महल्ले में तो तकरीबन हर क्लास वन से ले कर क्लास फोर रिटायरी के साथ यही हो रहा है…’’‘‘मतलब…?’’‘‘सब समझ जाओगे वर्मा साहब. 2-4 दिन और ठहरो,’’ मैं ने कहा, तो उन्होंने चैन की इतनी लंबी सांस ली कि उस वक्त वे मेरे नाक की सारी हवा भी खींच ले गए जालिम कहीं के

इलाज का बहाना, दैहिक शोषण जारी

शहर हो या गांव चिकित्सा के नाम पर झाड़-फूंक ओझा गिरी और कभी चिकित्सा,  कभी ज्योतिष के नाम पर महिलाओं का दैहिक शोषण करने वाले नर पिशाच कम नहीं है. यह एक ऐसा पेशा बन चुका है जिसकी आड़ में अक्सर महिलाऔ के साथ यौन शोषण होता रहता है. ऐसी ही घटनाएं छत्तीसगढ़ के जिला कोरबा और जिला चांपा जांजगीर में घटित हुई है.

चांपा जांजगीर जिला के बम्हनीडीह थाना क्षेत्र के ग्राम पीपरदा में बद्री पटेल 30 वर्ष से अधिक समय से आसपास के लोगों का इलाज करता आ रहा था. इलाज के नाम पर झाड़-फूंक करना और मनोवैज्ञानिक ढंग से अशिक्षित गरीब आवाम को मूर्ख बनाना  पैसे ऐठना उसका काम था. इसके साथ ही इलाज के दरमियान मानसिक रूप से टूट चुके लोगों की आस्था और विश्वास का लाभ उठा वह महिलाओं, लड़कियों के साथ यौन शोषण करने लगा.

मामले पर से पर्दा 18 जून 2019 को उठा,जब चांपा जांजगीर जिला के नगरदा थाना की एक युवती इलाज के लिए बद्री पटेल के पिपरदा स्थित आवास पर पहुंची. युवती प्रभा ( काल्पनिक नाम ) अपने परिजनों के साथ पहुंची तो तो बद्री पटेल के घर पर इलाज कराने वालों की भीड़ जुटी हुई थी आस -पास के अनेक लोग जो की अधिकांश ग्रामीण अंचल के ही थे और जो चिकित्सकों बड़े -बड़े डॉक्टरों की फीस अदा करने में लाचार से यहां आए हुए थे.

प्रभा और उसके परिवार वालों ने सुना था बद्री पटेल लंबे समय से इलाज करता चला आ रहा है और उसके पास ऐसी दैविय शक्ति है कि झाड़-फूंक कर जो भी चीज देता है उसका सेवन करने से रोगी स्वस्थ हो जाता है. प्रभा को डौक्टरों ने किडनी प्रॉब्लम बताया था जो बहुत खर्च मांगता था और उसका मध्यवर्गीय परिवार किडनी के इलाज का लाखों रुपए खर्च करने बखत नहीं रखता था. सो बडी बड़ी आशा विश्वास लेकर बद्री पटेल के आवास पहुंचा था.

पूर्व मैं आ चुके मरीजों का यथा इलाज करके बद्री पटेल ने प्रभा की ओर रुख किया और पूछा – तुम्हें कैसा लग रहा है?

प्रभा  जैसा जवाब डौक्टरों को देती थी वैसा ही बताया बहुत कमजोरी हो गई है…

परिजनों ने भी बद्री पटेल को बताया डॉक्टर बता रहे हैं किडनी प्रौब्लम है… हम लोग बड़ा नाम सुनकर आपके पास आए हैं.

बद्री पटेल ने प्रभा की आंखें, नब्ज देखने के बाद घोषणा की-चिंता की कोई बात नहीं… मे इस लड़की को ठीक कर दूंगा.

उसके परिजनों ने यह सुना तो उनके चेहरे खिल उठे. बद्री पटेल बोला-मुझे इसके लिए साधना करनी होगी कुछ समय लड़की के साथ कमरे में एकांत में रहना होगा. यह ठीक हो जाएगी.

बद्री पटेल से प्रभावित परिजनों ने तत्काल स्वीकृति दे दी. वहीं पास के कमरे में प्रभा को ले गया और कमरा बंद कर दिया और उसके बाद उसने अपना असली चेहरा दिखाना प्रारंभ कर दिया. प्रभा को इलाज के नाम पर बहला फुसलाया और ठीक करने का आश्वासन देते हुए उसके कपड़े उतारने लगा.थोड़ी ही देर में वह समझ गई कि बुड्ढे की नीयत ठीक नहीं है तो उसने प्रतिकार किया. यह देख बद्री बोला तुम्हें इलाज कराना है कि नहीं…. प्रभा सहम गई इधर बद्री पटेल ने फिर प्रभा के कपड़े उतारने प्रारंभ कर दिए प्रभा ने विरोध किया तो उसका मुंह दबा दिया टीवी शुरू कर दिया ताकि शोर बाहर ना पहुंचे. प्रभा के लाख मना करने के बाद भी बद्री पटेल ने प्रभा का बलात्कार किया और आश्वस्त करता हुआ बोला,- देखो… लड़की यह इलाज की शुरुआत है जो हुआ किसी को नहीं बताना….

मगर जैसे ही प्रभा परिजनों के बीच पहुंची उसने साथ आई अपनी भाभी से सारी घटना रोते हुए बता दी. बद्री पटेल के हाथ पांव फूल गए इधर परिजनों ने उसे बहुत गालियां दी और थाना पहुंच थाना प्रभारी राजेश श्रीवास्तव से पूरी घटना को विस्तार पूर्वक बताया. पुलिस ने बद्री पटेल को तत्काल हिरासत में ले लिया और प्रभा की चिकित्सालीय जांच कराई गई. बम्हनीडीह थाना प्रभारी राजेश श्रीवास्तव ने हमारे संवाददाता को बताया- बुजुर्ग बद्री लंबे अरसे से झाड़ फूंक और इलाज कर रहा था. उसकी कुछ शिकायतें और भी मिली थी मगर सबूतों के अभाव में कभी एक्शन नहीं लिया गया. लड़की किडनी प्रॉब्लम से जूझ रही है उसके परिजनों ने साहस का परिचय देते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई और पुलिस ने इलाज के नाम पर यौन शोषण करने वाले शख्स बद्री पटेल को जेल के सीखचों के पीछे भेज दिया है.

ऐसी ही घटना कोरबा जिला के कटघोरा थाना अंतर्गत ग्राम घरीपाखना में घटित हुई जहां एक झाड़ फूंक करने वाले बाबा बजरंगी दास ने झाड़-फूंक के नाम पर 6 वर्षों तक महिला के साथ अनाचार किया और जब महिला की नौकरी छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिला में लग गई तो उसकी नजर महिला की 16 वर्षीय लड़की पर गई जो कोरबा के हौस्टल में रहते हुए पढ़ाई कर रही थी. बजरंगी दास ने परिचय का लाभ उठाते हुए रमा  (काल्पनिक नाम)को अपने घर घुमाने के नाम पर ले गया और उसे डरा धमकाकर शारीरिक शोषण किया. महिला के घर लौटने पर रमा ने मां को सारी आपबीती बताई पीड़ित महिला बेटी को लेकर थाना कटघोरा पहुंची तो जांच के नाम पर उसे लौटा दिया अंततः महिला ने पुलिस अधीक्षक जिलाधीश से मिलकर संपूर्ण घटनाक्रम से अवगत कराया तब जाकर मामला दर्ज हुआ और बजरंगी को पुलिस ने गिरफ्त में ले लिया.

बेवफाई: नैना को कैसे हुआ अपनी गलती का अहसास

नैना रसोईघर में रात का खाना पकाने की तैयारी कर रही थी. उस के मोबाइल फोन पर काल आ रहा था. रिंगटोन नहीं बजे, इसलिए उस ने मोबाइल फोन को साइलैंट मोड पर रखा था. वह नहीं चाहती थी कि उस के पति मुकेश को काल करने वाले के बारे में पता चले.

नैना ने मोबाइल फोन उठा कर देखा तो पाया कि उस का आशिक दीपक काल कर रहा था. हालांकि वह अभी उसे कुछ दिन तक काल करने से मना कर चुकी थी, फिर भी उस का बारबार काल आ रहा था. वह मुकेश के डर से कई दिनों से उस का काल नहीं रिसीव कर पा रही थी.

मुकेश कई सालों से गुजरात में प्राइवेट नौकरी कर रहा था. वह 3 महीने पहले घर वापस आ चुका था. कोरोना के वायरस से जितना लोगों को नुकसान नहीं हो रहा था, उस से ज्यादा नैना के लिए उस के पति की घर वापसी से आफत आई हुई थी. वह अपने आशिक दीपक से बात नहीं कर पा रही थी.

जब मुकेश कमाने के लिए गुजरात चला गया था, तो वह लंबे समय तक घर नहीं आ पाया था. वह पैसा मोबाइल से ही ट्रांसफर कर देता था. ऐसे में उसे अकेले ही घर में अकेले जिंदगी गुजारनी पड़ रही थी.

घर में नैना की एकमात्र सास थीं, जो काफी बूढ़ी हो चुकी थीं. वे अकसर बीमार रहती थीं. घर में 2 छोटेछोटे बच्चे होने के चलते उसे ही बाजार से सब्जी और घर के लिए जरूरी सामान लाना पड़ रहा था.

उस दिन दीपक शहर से पढ़ाई कर अपने बाइक से गांव की ओर लौट रहा था, तो नैना पैदल ही भारी थैले उठा कर पास के बाजार से वापस आ रही थी. तभी दीपक की नजर नैना पर पड़ी थी. वह पहले से नैना को जानता था, लेकिन उस से कभी भी बात करने का मौका नहीं मिला था.

नैना को देखते ही दीपक पहचान गया था, इसलिए वह बड़े प्यार से बोला था, ‘भाभीजी, आइए बैठ जाइए. अभी आटोरिकशा नहीं मिल पाएगा. वैसे, आप मुकेश भाई साहब की घरवाली हो न?’

‘हां…’ नैना सिर्फ इतना ही बोल पाई थी. वह दीपक के बारे में नहीं जानती थी, लेकिन उसे अंदाजा था कि इस रास्ते पर जाने वाला कोई न कोई उस के गांव का ही होगा, क्योंकि यह रास्ता सिर्फ उस के गांव की ओर जाता था.

‘बैठिए, आप को घर तक छोड़ देता हूं,’ दीपक उसे ऊपर से नीचे तक देख कर बोला था. दीपक की उस के ब्लाउज से झांकते उभारों पर नजर पड़ी, तो उस का जोश बढ़ने लगा था. वह उसे एकटक देखने लगा था.

दीपक ने थैले को पीछे बाइक पर बांध दिया था, इसलिए सीट पर थोड़ी सी जगह बच पाई थी. यही वजह थी कि नैना को दीपक से चिपक कर बैठना पड़ा था, इसलिए दीपक को उस के उभारों का दबाव महसूस हो रहा था.

वैसे, नैना को भी अच्छा लग रहा था कि इतनी दूर भारी थैले के साथ पैदल चलने से वह बच गई थी.

बाइक से उतारने के बाद दीपक ने नैना का मोबाइल नंबर मांग लिया था. वह न चाहते हुए भी अपना मोबाइल नंबर देने से इनकार नहीं कर सकी थी.

दीपक ने 1-2 बार हालचाल के बहाने नैना से बातचीत शुरू की और कुछ दिन में ही हंसीमजाक पर भी उतर आया था. धीरेधीरे मोबाइल फोन से बातचीत होने के चलते उन दोनों में खुल कर बातें होने लगी थीं.

थोड़े दिनों के बाद उन दोनों के बीच बातचीत इतनी हद तक बढ़ गई थी कि जब नैना की सास गहरी नींद में सो जाती थीं, तो वह दीपक को चुपके से बुला कर कई बार मजे ले चुकी थी. अब वह दीपक के बगैर नहीं रह पा रही थी.

लेकिन कोरोना काल के दौरान नैना का पति मुकेश काम छोड़ कर घर वापस आ गया था. तब से वह नौकरी पर लौटने का नाम ही नहीं ले रहा था, जबकि दीपक नैना से नहीं मिलने के चलते काफी बेताब था और कई बार फोन कर चुका था.

अभी नैना रसोईघर में खाना बनाने की तैयारी कर रही थी और मुकेश अपने कमरे में टैलीविजन पर पुराना क्रिकेट मैच शो देखने में बिजी था, इसलिए उसे दीपक का काल उठाने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई थी. वह मोबाइल कानों से लगा कर धीरे से बोली, ‘‘हैलो…’’

दूसरी तरफ से दीपक बोला, ‘नैना डार्लिंग, क्या हालचाल है?’

‘‘सब ठीकठाक है. तुम अपना हाल बताओ…’’

‘तुम मुझ से बात भी नहीं कर रही हो. जब से तुम्हारा पति आया है, तुम एक बार भी नहीं मिली हो. कब तक तुम्हारा पति घर पर कुंडली मार कर बैठा रहेगा?

‘मैं तुम से मिलने के लिए बेचैन हो रहा हूं. अब मेरा मन नहीं मान रहा है. मैं तुम्हारे सुंदर हुस्न का दीदार करना चाहता हूं. तुम मिलने का कोई इंतजाम करो, वरना मैं तुम्हारे घर पहुंच जाऊंगा.’

‘‘ऐसा बिलकुल भी मत करना, वरना हम दोनों कहीं के नहीं रहेंगे. मेरी बात ध्यान से सुनो. मैं 1-2 दिन के लिए अपने पति को कहीं भेजने का उपाय सोचती हूं, फिर तुम्हें बुला लूंगी. तब सारे अरमान पूरे कर लेना,’’ नैना ने इतना कह कर फोन काट दिया.

नैना का शातिर दिमाग काम नहीं कर पा रहा था कि आखिर वह अपने पति को कहां भेजे? उसे कोई तरकीब नजर नहीं आ रही थी.

आज जब नैना बिस्तर पर सोने गई, तो मुकेश से बोली, ‘‘आप कब तक घर में बैठे रहेंगे? कोरोना महामारी धीरेधीरे कम हो रही है. अब कमाने के लिए बाहर जाइए. आखिर घर का खर्चा कैसे चलेगा?

‘‘आप तकरीबन 3 महीने से घर बैठे हुए हैं. घर के सारे रुपए और सामान खत्म हो गया है. ऐसे बैठे रहेंगे, तो भोजन का इंतजाम कहां से होगा?’’

मुकेश तुनक कर बोला, ‘‘देखो, मैं ने बहुत दिनों तक बाहर नौकरी कर ली. अब मैं सोचता हूं कि क्यों न घर पर ही कोई धंधा कर लूं. इस से तुम्हारे और बच्चों के साथ रहने का भरपूर मौका भी मिलेगा. बाहर प्राइवेट नौकरी करने में कितनी परेशानी है, यह मैं ही जानता हूं.’’

‘‘वह सब तो ठीक है, लेकिन घर पर कौन सा धंधा करने वाले हो? धंधा करने के लिए मोटी रकम की जरूरत होती है. बिना पैसे के तो धंधा हो नहीं सकता है. क्या उस धंधे से हम लोगों का गुजारा हो जाएगा? यह सब विचार कर लेना भी जरूरी है.’’

‘‘हां, वह सब तो ठीक है, उसी पर तो मैं सोचविचार कर रहा हूं,’’ मुकेश ने चिंता जाहिर करते हुए जवाब दिया.

‘‘और दूसरी बात यह है कि आप बाहर रहते हो, तो मैं अपनी बिरादरी की औरतों में गर्व से कहती हूं कि मेरा आदमी बाहर नौकरी करता है. आप जब घर में रहने लगोगे, तो दूसरे पतियों की तरह घर की मुरगी दाल बराबर हो जाओगे.

‘‘आप की गांव में इज्जत कम हो जाएगी और यह मुझे अच्छा नहीं लगेगा,’’ कहते हुए नैना मुकेश के सीने से चिपक गई.

मुकेश नैना को अपनी बांहों में कसते हुए सोचने लगा कि यह सही कह रही है. वह अपना धंधा करने के लिए सोच तो जरूर रहा था, लेकिन अभी तय नहीं कर पा रहा था कि किस धंधे को किया जाए? कोई भी धंधा करने में काफी रुपए की जरूरत होती है और उस के पास जमापूंजी भी नहीं थी.

इसी बीच नैना नकली गुस्सा जाहिर करते हुए बोली, ‘‘आप को जो करना है, वही कीजिए,’’ फिर उस ने मुंह फेरा और चादर ओढ़ कर सो गई.

अगले दिन मुकेश बाहर से घूमघाम कर आया, तो उस ने नैना को बताया, ‘‘मैं दोबारा गुजरात जा रहा हूं. आज मैं ने अपने फैक्टरी मालिक से बात की थी. वह मुझे काम देने को तैयार हो गया है. वह कह रहा था कि काम शुरू हो गया है.

‘‘सभी कामगारों को फोन कर के बुलाया जा रहा है. इतना ही नहीं, मेरा मालिक मुझे कुछ पैसे बढ़ा कर भी देने के लिए राजी हो गया है.’’

‘‘यह तो अच्छी बात है… लेकिन जाना कब है?’’

‘‘मुझे आज ही निकलना पड़ेगा, वरना फिर ट्रेन 2 दिन बाद ही मिलेगी…’’

यह सब सुन कर नैना मन ही मन बहुत खुश हुई. अब वह अपने पति को गुजरात भेजने की तैयारी करने लगी. वह खुशीखुशी रसोईघर में जा कर रास्ते के लिए भोजन तैयार कर देना चाहती थी.

जब नैना रसोईघर की तरफ जाने के लिए मुड़ी, तो मुकेश ने प्यार से उस की कलाई पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया और मनुहार करते हुए बोला, ‘‘छोड़ो खानापीना. वह तो रास्ते में मिल ही जाएगा, लेकिन तुम्हारा साथ तो नहीं मिलेगा न, इसलिए जाने से पहले मैं कुछ घंटे तुम्हारे साथ बिता लेना चाहता हूं…’’

यह कहते हुए मुकेश ने नैना को बिस्तर पर लिटा दिया. वह भी उस के आगोश में समा गई. आज उसे अपने पति पर काफी प्यार आ रहा था. वह अंदर से बहुत खुश थी. खुशी से उस की आंखों से आंसू छलक पड़े.

मुकेश उस के आंसुओं को पोंछते हुए बोला, ‘‘तुम तो अभी से ही दुखी होने लगी. कहो तो मैं नहीं जाता हूं…’’

नैना ने अपने हाथों को मुकेश के होंठों पर रख दिया और प्यार से बोली, ‘‘आप भले ही मुझ से दूर जा रहे हो, लेकिन आप का दिल मेरे पास रहेगा…’’ फिर वे दोनों एकदूसरे से कस कर लिपट गए.

नैना के दिमाग में अपने आशिक दीपक की मर्दानगी का खेल भी चल रहा था.

एक फिल्म ने मेरी जिंदगी बदल दी – अभय वर्मा

इम्तिहानों में फेल होने के बाद मायूस हो चुके पानीपत, हरियाणा के अभय वर्मा संजय लीला भंसाली की फिल्म  ‘रामलीला: गोलियों की रासलीला’ देखने पहुंच गए. इस फिल्म को देख कर उन्हें ऐक्टर बनने की प्रेरणा मिली.

 

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इस के बाद अभय वर्मा मुंबई पहुंचे, जद्दोजेहद की और महज 5 साल के अंतराल में उन्होंने अमिताभ बच्चन, आमिर खान व आलिया भट्ट के साथ विज्ञापन फिल्में कीं, तो वहीं मनोज बाजपेयी के साथ वैब सीरीज ‘द फैमिलीमैन’ भी की.

अभय वर्मा वैब सीरीज ‘मरजी’ में भी नजर आ चुके हैं. इतना ही नहीं, वे संजय लीला भंसाली के साथ फिल्म ‘मन बैरागी’ भी कर चुके हैं. वे फिल्म ‘सफेद’ को ले कर भी चर्चा में रहे हैं. इस फिल्म में उन्होंने किन्नर का किरदार निभाया है.

पेश हैं, अभय वर्मा से हुई बातचीत के खास अंश :

आप ने कब सोचा कि फिल्मों में काम किया जाए?

मेरी तो शुरुआत नाकामी से हुई. मैं 2 इम्तिहान में फेल होने के बाद परेशान था, तब अपना गम भूलने के लिए पानीपत में ही संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘रामलीला : गोलियों की रासलीला’ देखने पहुंच गया था. इस फिल्म को देखते हुए मुझे खुशी और सुकून मिला.

मैं थिएटर के अंदर फेलियर के तौर पर गया था, पर जब वहां से बाहर निकला तो विनर था. मैं 2 घंटे में इतना ऐंटरटेन और खुश हो गया था कि मेरे दिमाग में आया कि मुझे भी यही करना चाहिए और लोगों में खुशियां बांटनी चाहिए.

जब आप ने अपने मातापिता को इस फैसले के बारे में बताया, तब उन्होंने क्या कहा था?

उन्होंने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा था कि तू ने जो राह चुनी है, वह आसान नही है. पर जो काम आप दिल से करना चाहें, वही काम करना चाहिए, क्योंकि उसी में आप खुश रह सकते हैं.

क्या आप को लगता है कि सिनेमा से समाज में बदलाव आता है?

बिलकुल आता है. आप के सामने जो यह 25 साल का पानीपत जैसे छोटे शहर का लड़का बैठा हुआ है, वह सब से बड़ा उदाहरण है कि सिनेमा जिंदगियां बदलता है.

जब आप ने अपने सपने को पूरा करने के लिए मुंबई में भागदौड़ शुरू की, तो किस तरह के अनुभव हुए?

जब मैं मुंबई आया, तो मुझे बहुत अच्छे और बहुत बुरे लोग मिले. यहां मुझे ढेर सारे लोग ऐसे मिले, जो मुझे बढ़ावा देने के बजाय मेरा हौसला गिरा रहे थे. कई लोगों ने मुझ से सवाल किया कि मुझे इंगलिश अच्छी क्यों नहीं आती. यहां पर ज्यादातर लोगों ने मेरे सपनों की रोशनी को कम करने की कोशिश की.

पर मैं तो यह मान कर चलता हूं कि दुनिया में अच्छेबुरे हर तरह के लोग होते हैं. लोगों की दुत्कार और रिजैक्शन से मेरे अंदर बहुत बदलाव आया है. यही मेरी सब से बड़ी पूंजी है.

क्या यह मान लिया जाए कि आज के समय में कास्टिंग एजेंसियां कलाकार की क्रिएटिविटी में बाधा बनती हैं?

बाधा तो नहीं कहूंगा, क्योंकि वे लोग भी बेचारे काम करते हैं. उन के पास तो हर दिन हजारों लोग अपने सपने ले कर पहुंचते हैं, जिन में से गिनती के लोगों के सपने पूरे हो पाते हैं.

 

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मैं तो उन लोगों का शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने मुझे आडिशन का मौका दिया, क्योंकि वही हमारा ‘गेटवे औफ इंडिया, होता है. हम गेटवे औफ इंडिया पैदल आते हैं और उस के बाहर समुद्र है, जिस में हम कूद जाते हैं.

यह गेटवे औफ इंडिया ही हमारा कास्टिंग डायरैक्टर है, इसलिए मेरे अंदर दिल से कास्टिंग डायरैक्टर के प्रति इज्जत है.

आप को अपना पहला ब्रेक कब मिला था?

ईमानदारी से कहूं, तो मुंबई आना ही मेरे लिए सब से बड़ा ब्रेक था. लोग हमेशा जद्दोजेहद और कामयाबी को ले कर कन्फ्यूज होते रहते हैं. ये दोनों अलगअलग चीजें होती हैं.

मेरे लिए जद्दोजेहद उस वक्त थी, जब मैं मुंबई में नहीं, बल्कि पानीपत में था और अपने सपने को ले कर एक कदम नहीं चल पा रहा था.

अब तक आप ने क्याक्या काम किया है?

मैं ने अमिताभ बच्चन, आमिर खान, आलिया भट्ट, मनोज बाजपेयी, संजय लीला भंसाली जैसे दिग्गजों के साथ काम किया और इन के साथ काम करते हुए बहुतकुछ सीखा है. मैं ने ‘मरजी’, ‘द फैमिलीमैन’ में काम किया है. मुझे दर्शकों का भरपूर प्यार मिला है. दर्शकों का प्यार ही कलाकार की सब से बड़ी कमाई होती है.

फिल्म ‘सफेद’ से जुड़ने की कोई खास वजह?

कहानी और अपना किरदार पढ़ कर पहले तो मैं डर गया था. मुझे किन्नर का किरदार जो निभाना था. फिर मेरे मन में खयाल आया कि अभय वर्मा ने जिस सपने को देखते हुए पानीपत से मुंबई तक का जो सफर तय किया है, तो क्या वह डरने के लिए आया है? बस, फिर मैं ने इस फिल्म को करने की हामी भर दी.

आप ने संजय लीला भंसाली के साथ फिल्म ‘मन बैरागी’ की थी. उस के क्या अनुभव रहे?

संजय लीला भंसाली के साथ काम करना हर कलाकार का एक सपना होता है. पहली मुलाकात में उन्होंने मेरे माथे और नाक पर हाथ रख कर कहा था कि अदाकारी सिर्फ आंखों से होती है. उन की यह सीख मैं ने उसी दिन से गांठ बांध रखी है.

आप नया क्या कर रहे हैं?

मैं 2 फिल्में कर रहा हूं. एक फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’ है, जिस में आजादी के दौर के सभी नायकों को ले कर कहानी बनी है. दूसरी फिल्म के बारे में अभी कुछ नहीं बता सकता.

छोटे घर में कैसे करें पार्टनर से प्यार, जानें यहां

बड़े शहरों में सब से बड़ी समस्या आवास की होती है. 2 कमरों के छोटे से फ्लैट में पतिपत्नी, बच्चे और सासससुर रहते हैं. ऐसे में पतिपत्नी एकांत का नितांत अभाव महसूस करते हैं. एकांत न मिल पाने के कारण वे सैक्स संबंध नहीं बना पाते या फिर उन का भरपूर आनंद नहीं उठा पाते क्योंकि यदि संबंध बनाने का मौका मिलता है तो भी सब कुछ जल्दीजल्दी में करना पड़ता है. संबंध बनाने से पूर्व जो तैयारी यानी फोरप्ले जरूरी होता है, वे उसे नहीं कर पाते. इस स्थिति में खासकर पत्नी चरमसुख की स्थिति में नहीं पहुंच पाती है. पतिपत्नी को डर लगा रहता है कि कहीं बच्चे न जाग जाएं, सासससुर न उठ जाएं. मैरिज काउंसलर दीप्ति सिन्हा का कहना है, ‘‘संबंध बनाने के लिए एकांत न मिलने के कारण महिलाएं चिड़चिड़ी, झगड़ालू और उदासीन हो जाती हैं और फिर धीरेधीरे दांपत्य जीवन में दरार पड़नी शुरू हो जाती है, यह दरार अनेक समस्याएं खड़ी कर देती है. कभीकभी तो नौबत हत्या या आत्महत्या तक की आ जाती है.’’

कही अनकही

विकासपुरी की रहने वाली सीमा के विवाह को 5 वर्ष हो गए हैं. इस दौरान उस के 3 बच्चे हो गए. तीनों बच्चों की देखभाल, सासससुर की सेवाटहल और घर का काम करतेकरते शाम होतेहोते वह पूरी तरह थक जाती है. सीमा का कहना है कि उस के तीनों बच्चे पति के साथ ही बड़े बैड पर सोते हैं. सीमा पलंग के पास ही नीचे जमीन पर बिस्तर लगा कर सोती है. उसे हर वक्त यही डर लगा रहता है कि सैक्स करते समय कोई बच्चा उठ कर उन्हें देख न ले. परिणामस्वरूप वह सैक्स का पूर्ण आनंद नहीं उठा पाती. इस के असर से वह निराशा से घिरने लगी हैं. ढंग से कपड़े पहनने, सजनेसंवरने का उस का मन ही नहीं करता. फिर वह सजेसंवरे भी किसलिए? स्थिति यह हो गई है कि अब पतिपत्नी दोनों में मनमुटाव रहता है.

खानपान का असर

मांसमछली, शराब आदि का सेवन करने वाले पतियों की सैक्स की अधिक इच्छा होती है और इसीलिए वे न समय देखते हैं और न माहौल, पत्नी पर भूखे भेडि़ए की तरह टूट पड़ते हैं. संबंध बनाने से पहले फोरप्ले की बात तो दूर, वे यह भी नहीं देखते हैं कि बच्चे सोए हैं या जाग रहे हैं अथवा मांबाप ने देख लिया तो वे क्या सोचेंगे. ऐसे में कई बार पत्नी को सासससुर के सामने शर्म महसूस होती है. मांबाप अपने बेटे को कुछ न कह कर बहू को ही सैक्स के लिए उतावली मान बैठते हैं.

संयुक्त परिवार का दबाव

हमारे समाज में विवाह 2 प्राणियों का ही संबंध नहीं, बल्कि 2 परिवारों का संबंध भी होता है. लेकिन मौजूदा हालत में पतिपत्नी अकेले ही अपने बच्चों के साथ रहना पसंद करते हैं. यह उन की मजबूरी भी है, लेकिन यदि पत्नी को परिस्थितिवश सासससुर के साथ छोटे से आशियाने में 2-3 बच्चों के साथ रहना पड़े तो वह कई बार मानसिक दबाव महसूस करती है. सासससुर से शर्म और बातबात पर उन की टोकाटोकी से परेशान बहू पति के लिए खुद को न तो तैयार कर पाती है और न ही एकांत ही ढूंढ़ पाती है. मनोरोगचिकित्सक डाक्टर दिनेश के अनुसार, ‘‘कई बार मेरे पास ऐसे केस आते हैं कि शादी के बाद बच्चे जल्दीजल्दी हो गए. पत्नी उन की देखभाल में लगी रहती है और पति के प्रति उदासीन हो जाती है. इस के चलते पति भी कटाकटा सा रहने लगता है.’’

समय निकालना जरूरी

सैक्स ऐक्स्पर्ट डा. अशोक के अनुसार, ‘‘वास्तव में सैक्स के लिए उम्र की सीमा निर्धारित नहीं होती है कि आप 35 या 40 साल के हो गए हैं. छोटा घर है, बच्चे हैं, सैक्स ऐंजौय नहीं कर सकते. घरगृहस्थी और बच्चों की देखभाल के बाद यदि पतिपत्नी अपने लिए समय निकाल कर शारीरिक संबंध नहीं बनाएंगे तो आगे चल कर उन्हें कई परेशानियां हो सकती हैं. ‘‘डिप्रैशन के अलावा हारमोंस का स्राव भी धीरेधीरे कम हो जाता है. ऐसी स्थिति में अचानक संबंध बनाने पर पत्नी को तकलीफ होती है. फिर निरंतर तनाव बने रहने पर कभीकभी ऐसी स्थिति बन जाती है कि पत्नी को हिस्टीरिया के दौरे तक पड़ने लगते हैं.’’

मन की बात

जनकपुरी की रहने वाली काजल और राजेश ने लव मैरिज की है. उन की शादी को 7 साल हुए हैं. इन 7 सालों में 3 बच्चे भी हो गए. पहला बच्चा 3 साल का है. उस के बाद 2 बेटियां डेढ़ साल और 7 महीने की हैं. काजल कहती हैं, ‘‘हम शादी के शुरुआती दिनों से ही बहुत झगड़ते आ रहे हैं. वजह है राजेश का प्लान कर के साथ नहीं चलना. राजेश ने कहा था कि वे अपने मातापिता के लिए पड़ोस में ही मकान खरीद लेंगे. छोटे से 2 कमरों के मकान में हम ढंग से नहीं रह पाते हैं. मैं राजेश से अपने मन की बात नहीं कर पाती.

‘‘बस, यही डर लगा रहता है कि कहीं सासूमां कुछ कह न दें. जबकि मन की बात करने का मौका पतिपत्नी दोनों को ही मिलना चाहिए.’’ अगर आप भी इस समस्या से गुजर रहे हैं तो निम्न उपाय अपना कर शारीरिक संबंधों का पूर्ण आनंद उठा सकते हैं-

बच्चों को चाचा, मामा के पास भेजें. उन के बच्चों के लिए कोई भेंट भेजें. ऐसा उस समय करें जब सासससुर कहीं शादीविवाह में बाहर गए हों. यदि मांबाप को फिल्म देखने या पिकनिक मनाने भेज रहे हों तो बच्चों को भी उन के साथ भेज दें.

अगर आप का कोई मित्र छुट्टी पर अपने घर जा रहा हो तो उस के घर की देखभाल के लिए रात में पतिपत्नी वहां रहें और सैक्स ऐंजौय करें. बदले में मित्र के घर लौटने से पहले घर को सजासंवार कर अच्छा सा खाना बना कर उन के लिए रखें.

संबंध बनाने के लिए यह जरूरी नहीं है कि फोरप्ले ठीक सैक्स से पहले हो. उसे बारबार थोड़ेथोड़े समय में जब भी जहां भी समय मिले किया जा सकता है. इस से सैक्स के समय दोनों पूरी तरह तैयार होंगे. सुबह जब बच्चे स्कूल जा चुके हों तब मातापिता को सुबह घूमने जाने के लिए प्रेरित करें.

सैक्स का समय बदलें. नयापन मिलेगा.

पत्नी के साथ हर 15 दिन बाद कहीं डेट पर जाएं. यानी गैस्टहाउस या होटल में जा कर रहें और सैक्स ऐंजौय करें.

गरमी का मौसम हो तो पत्नी को देर रात छत पर बने कमरे में ले जाएं.

बरसात की रात में भी पत्नी को छत पर बने कमरे में ले जा कर बरसात की फुहारों का आनंद लेते हुए सैक्स एंजौय करें.

सुबह बच्चों के स्कूल जाने के बाद, रात में छत पर और किसी दिन यदि आप औफिस से जल्दी घर आते हैं और बच्चे स्कूल से नहीं आए हैं, मातापिता पड़ोस में गए हैं, तब भी आप सैक्स ऐंजौय कर सकते हैं. हां, इस के लिए आप पत्नी को पहले से ही तैयार कर लें.

खाने की इन 4 चीजों से बढ़ सकता है स्पर्म काउंट, पढ़ें खबर

बिजी लाइफ और जिंदगी की भागदौर में खानपान में गड़बड़ी, अकसर हम लाइफ में स्वास्थ संबंधी समस्या से दो चार करा ही देती हैं. कुछ समस्या ऐसी भी होती है जो सेहत के साथ साथ आपको मानसिक रूप भी काफी कमजोर कर देती है. प्रजनन क्षमता प्रभावित होना इन्ही कुछ समस्याओं में से एक है. इसलिए आपका अपने खान-पान पर विशेष ध्‍यान रखना बहुत जरूरी है जिससे आपके स्‍पर्म काउंट बेहतर हो. स्‍वस्‍थ बच्‍चे के लिए महिला और पुरूष दोनों को अपनी डाइट में कुछ जरूरी कुछ ऐसे खाने को शामिल करने की आवश्‍यकता है. इसलिए आज हम आपके लिए लेकर आए है खाने के कुछ टिप्स जिसे अपनी डाइट में शामिल कर सकते है.

संतरा और टमाटर

विटामिन सी आपके अच्‍छे स्‍पर्म बनाने में मदद करता है. संतरा ऐसा फल है, जिसमें कि विटामिन सी की भरपूर मात्रा पाई जाती है इसलिए यदि आप बच्‍चे की प्‍लानिंग कर रहे हों, तो संतरे और अन्‍य खट्टे फलों का सेवन करें. इससे स्‍पर्म कांउट बढ़ाने में मदद मिलती है. इसके अलाव, आप टमाटर का सेवन भी कर सकते हैं, इसमें लाइकोपीन नामक एंजाइम मौजूद होता है. लाइकोपीन स्‍पर्म बढ़ाने और फर्टिलिटी बढ़ाने में सहायक होता है. अध्‍ययनों के मुताबिक, टमाटर के रस का नियमित सेवन करने से पुरुषों में बांझपन की समस्‍या को दूर करने के साथ स्‍पर्म काउंट को बढ़ाने में मदद मिलती है.

ब्रौकली

अधिकतर डाइटिंग और वजन कम करने का प्रयास करने वाले लोग ब्रौकली का सेवन करते हैं. लेकिन क्‍या आप जानते हैं ब्रौकली का सेवन कई बीमारियों को दूर करने में मदद करने के साथ गर्भवती महिलाओं और बच्‍चे की प्‍लानिंग कर रहे महिला व पुरूषों के लिए भी फायदेमंद माना जाता है. ब्रौकली में विटामिन बी1, बी2, बी3, बी6, विटामिन सी, विटामिन के, आयरन, मैग्‍नीशियम, जिंक जैसे कई पोषक तत्‍व पाये जाते हैं, जो त्‍वचा को स्‍वस्‍थ और इम्‍युनिटी पावर बढ़ाने में मदद करते हैं. इसमें मौजूद विटामिन सी और जिंक महिलाओं की प्रजनन क्षमता और पुरूषों में स्‍पर्म काउंट बढ़ाने में मददगार होते हैं.

कद्दू के बीज

जानकर हैरानी होगी लेकिन कद्दू के बीज प्रजनन क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं. इसके लिए आप कद्दू के बीजों को कच्‍चा या फिर खाने के साथ मिलाकर खा सकते हैं. कद्दू के बीजों में  अमीनो एसिड और फाइटोस्‍टेरौल होता है, जो कि महिला और पुरूषों में प्रजनन क्षमता को बढ़ाने में सहायक है. अध्‍ययनों से पता चलता है कद्दू के बीजों का सेवन से शरीर में टेस्‍टोस्‍टेरोन, शुक्राणुओं की संख्‍या को बढ़ाया जा सकता है.

केला

केले स्‍वास्‍थ्‍य के लिए काफी हेल्‍दी माना जाता है. इसलिए बहुत से लोग रोलाना बनाना शेक बनाकर पीते हैं. यह आपके वजन को कम करने के साथ पाचन को बेहतर और भूख को शांत करने में मददगार है. इसमें ऐसे पोषक तत्‍व पाये जाते हैं, जो कि आपकी प्रजनन क्षमता को बढ़ाने में भी सहायक हैं. जी हां केले विटामिन बी6 की कमी को दूर कर स्‍पर्म बनाने में मददगार है. क्‍योंकि इस विटामिन की कमी से स्‍पर्म बनने में रूकावट आती है. इसके अलावा, इसमें ब्रोमिलेन एंजाइम भी स्‍पर्म बढ़ाने में मदद करता है. ऐसे में आप रोजाना बनाना शेक बनाकर या 1 या 2 केले का सेवन कर सकते हैं.

खान पान की ये चार चीजें आपके लिए फायदेमंद तो है लेकिन इसको इस्तेमाल करने से पहले अगर आप डाक्टर से सलाह लेंगे तो अच्छा होगा.

मेरी पत्नी का वजन बढ़ नहीं रहा है, इलाज बताएं?

सवाल-

मेरी पत्नी का वजन 40 किलो है. हमारे 2 बच्चे हैं. उस का वजन बढ़ नहीं रहा है. इलाज बताएं?

जवाब-

जल्दीजल्दी बच्चे होने से औरत के शरीर में कमजोरी आ जाती है, इसीलिए सलाह दी जाती है कि एक से दूसरे बच्चे के बीच कम से कम 5 साल का अंतर होना चाहिए.

कई बार टीबी जैसी घातक बीमारी होने के चलते भी इस तरह की परेशानी आ सकती है. वे खाने में दालसब्जी, फलदूध का सेवन ज्यादा करें. थोड़ीबहुत कसरत करने से भी वजन बढ़ सकता है.

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