टौमी : भाग 1- प्यार और स्नेह की अनोखी दास्तान

आज 8 सालों के अपने संरक्षक टौमी की यादें दिल को मसोस रही हैं. आंसू थम नहीं रहे हैं. इन 8 सालों में टौमी मेरा सबकुछ बन गया था. एक ऐसा साथी जिस पर मैं पूरी तरह निर्भर रहने लगी थी. टौमी ने तो अपना पूरा जीवन मुझ पर न्योछावर कर दिया था. सालभर का भी तो नहीं था, जब वह मेरे पास आया था मेरा वाचडौग बन कर. और तब से वह वाचडौग ही नहीं, मेरे संरक्षक, विश्वासपात्र साथी के रूप में हर क्षण मेरे साथ रहा. 20 साल पहले की घटना आज भी जरा से खटके से ताजी हो जाती है, हालांकि उस समय यह आवाज खटके की आवाज से कहीं भारी लगी थी. और लगती भी क्यों न, बम विस्फोट की आवाज न होते हुए भी गोली की आवाज उस समय बम विस्फोट जैसी ही लगी थी.

रीटा के शरीर में उस आवाज की याद से झुरझुरी सी दौड़ गई. वसंत का बड़ा अच्छा दिन था. सड़क के दोनों ओर खड़े पेड़ नईनईर् पत्तियों से सज गए थे. क्रैब ऐप्पल्स के पेड़ों पर फूलों की बहार अपनी छटा दिखा रही थी. शीत ऋतु में जमी बर्फ के पहाड़ देख जहां शरीर में झुरझुरी पैदा हो जाती थी वहीं उस दिन वसंत की कुनकुनी धूप शरीर के अंगों को सहती बड़ी सुखदायक लग रही थी.

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इस सुहावने मौसम में रीटा के होंठ एक बहुत पुराना गीत गुनगुना उठे थे. हालांकि गीत कुनकुनी धूप का नहीं, सावन की फुहार का था. और हो भी क्यों न, सावन की फुहार…रीटा 18 वर्ष की ही तो थी. उस अवस्था में इसी रस की फुहार के सपने ही तो सभी लड़कियां देखती हैं. गीत गुनगुना उठी, ‘ओ सजन, बरखा बहार आई, रस की फुहार लाई, अंखियों में प्यार लाई…,’ शायद यह उम्र का तकाजा था कि मन कहीं से कहीं भटक रहा था.

जहां गीत को याद कर रीटा मुसकरा उठी वहीं उस दिन की याद कर उस का बदन सिहर उठा. वह कालेज के दूसरे साल में पढ़ रही थी. छुट्टियों में उस ने एक दुकान पर पार्टटाइम नौकरी कर ली. दुकान में उस समय वह अकेली थी. कोई ग्राहक नहीं था, सो वह गुनगुनाती हुई शैल्फ पर सामान लगा रही थी कि अचानक हलके से खटके से उस का ध्यान भंग हुआ. सोचा कि कोई ग्राहक आया है, वह उठ कर कैश काउंटर के पास गई. रीटा ने पूछने के लिए मुंह ऊपर उठा कर खोला ही था कि क्या चाहिए? उस ने देखा ग्राहक का मास्क से ढका चेहरा और उस की अपनी ओर तनी पिस्तौल की नली. इस आकस्मिक दृश्य व व्यवहार से बौखला गई वह. फिर शीघ्र ही संभल गई. पिस्तौलधारी के आदेश पर उस ने उसे कैश काउंटर से सारे डौलर तो दे दिए पर साथ ही, उस की आंख बचा पुलिस के लिए अलार्म बजाने का प्रयत्न भी किया. अपने अनाड़ीपन में उस का यह प्रयत्न पिस्तौलधारी की नजर से अनदेखा न रह पाया और उस ने गोली दाग दी.

जब उसे होश आया, दुकान का मालिक रोरो कर कह रहा था, ‘‘रीटा, मैं ने कहा था कि यदि कभी भी ऐसी परिस्थिति आए तो चुपचाप पैसा दे देना. अपने को किसी खतरे में मत डालना. पैसा जीवन से बढ़ कर नहीं है. यह तुम ने क्या कर लिया?’’ रीटा ने सांत्वना देने के लिए उठ कर बैठने का प्रयत्न किया पर यह क्या, रीटा अचंभे में पड़ गई क्योंकि वह उठ नहीं पा रही थी.

रीटा अतीत में खोई हुई थी. उसे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने में कई महीने लगे थे. अब तक रीटा ने इस तथ्य को पूरी तरह आत्मसात कर लिया था कि अब पूरा जीवन इसी विकलांगता के साथ ही उसे जीना है, चाहे निरर्थक जिए या अब इस जीवन को कोई सार्थकता प्रदान करे. और फिर वह अपने पुराने सपने को पूरा करने में लग गई. हालांकि डेढ़दोसाल जब वह अपने मातापिता के साथ रही, वह उन पर तथा भाईबहन पर पूरी तरह निर्भर रही. पर उस के बाद सोच में पड़ गई कि कब तक वह सब पर निर्भर रहेगी. इस विकलांगता में भी उसे आत्मनिर्भर बनना है. इसी दिशा में उस ने टोरंटो यूनिवर्सिटी में अपने पहले के कोर्स खत्म कर के अपनी ग्रेजुएशन पूरी की. फिर उस ने एरिजोना जाने की ठान ली क्योंकि वहां का मौसम पूरे साल अच्छा रहता है. उस के स्वास्थ्य के लिए एरिजोना का मौसम उपयुक्त था.

रीटा के लिए एक विशेष कारवैन बना दी गई थी जिस में वह सफर कर सके, फिर भी उसे किसी ऐसे की जरूरत तो थी ही जो उसे ड्राइव कर सके. घर से बाहर क्या, घर के अंदर भी वह अकेले समय नहीं बिता पा रही थी. वह सोच में पड़ गई थी कि मातापिता तो नहीं, पर क्या भाईबहन में कभी न कभी आगे चल कर उस के प्रति रोष की भावना नहीं उभरेगी. रीटा इस स्थिति से बचना चाहती थी. इसलिए उस ने एरिजोना जा कर स्वतंत्ररूप से अपनी पढ़ाई पूरी करने का निर्णय लिया था.

तकरीबन 3 साल बाद जब वह टोरंटो लौटी तब तक वह काफी आत्मनिर्भर हो चुकी थी. परिवार का प्यार तो उस के साथ हरदम रहा. मातापिता उम्र के इस दौर में स्वयं ही धीरेधीरे अक्षम हो रहे थे. सो, उन्हें यह देख कर खुशी ही हुई कि रीटा ने अपने जीवन को एक नए ढर्रे पर अच्छी तरह चलाने का गुर सीख लिया है. उस ने पत्रकारिता तथा मैनेजमैंट में डिगरी हासिल कर ली और टोरंटो के एक अखबार में नौकरी भी कर ली है. अब वह आर्थिक रूप से भी किसी पर निर्भर नहीं रही.

टोरंटो में रीटा ने सैंट लौरेंस में फ्लैट किराए पर ले लिया क्योंकि यह उस के काम करने के स्थान से बिलकुल पास था. वह अपनी इलैक्ट्रिक व्हीलचेयर में आसानी से कुछ ही मिनटों में वहां पहुंच सकती थी. साथ ही, यह स्थान ऐसा था कि उसे यहां हर तरह की सुविधा थी. यह मार्केट नैशनल ज्योग्राफिक में दुनिया की सब से अच्छी मार्केट बताई गई है. साथ ही यहां से मैसी मौल, एयर कनाडा सैंटर, थिएटर, पार्क आदि मनोरंजन की जगहें भी पासपास थीं. सो, यह स्थान हर तरह से सुविधाजनक था.

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हालांकि सबकुछ ठीकठाक ही चलने लगा था, यहां मैं बहुत चीजें कर सकती थी लेकिन वास्तव में, कम से कम स्वयं खुद से, मैं कुछ भी नहीं कर रही थी.

पर जब से टौमी आया, सबकुछ बदल सा गया. लंबे समय तक, इस दुर्घटना के बाद मैं अपनी हरेक बात को शूटिंग से पहले और शूटिंग के बाद के कठघरे में रखती थी पर टौमी के आने बाद अब हरेक बात टौमी से पहले और टौमी के आने के बाद के संदर्भ में होने लगी.

टौमी के आने से पहले मैं कभी भी शौपिंग, या किसी भी काम के लिए, यहां तक कि अपनी व्हीलचेयर पर जरा सा घूमने के लिए भी, अकेले नहीं जाती थी. मेरी बिल्ंिडग में ही पूरे हफ्ते चौबीसों घंटे खुलने वाला ग्रोसरी स्टोर है, वहां भी मैं कभी अकेले नहीं गई. घर में अकेले ही पड़ी रहती थी. हां, मेरे पास एक अफ्रीकन ग्रे तोता रौकी जरूर था जिसे अपने जैसे किसी और पक्षी का साथ न होने की वजह से इंसानी साथ की बहुत जरूरत थी. हालांकि रौकी बहुत प्यारा था पर मेरी अवस्था के मुताबिक, अच्छा पालतू पक्षी नहीं था. वह मेरी देखभाल करने वाली नर्सों को काट लिया करता था, सो वे उस से भयभीत रहती थीं. स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उसे काफी देखभाल की जरूरत थी और मैं उस की देखभाल अच्छी तरह नहीं कर सकती थी. आखिरकार वह एक दिन स्वयं ही अपने कंधे पर किए गए घाव की सर्जरी के दौरान चल बसा. उस की अकाल मृत्यु के दुख ने मुझे, लोगों के कहने पर भी किसी और पक्षी को रखने का मन नहीं बनाने दिया.

6 महीने बाद एक दिन एक मित्र ने कहा कि क्यों नहीं मैं एक सर्विस डौग के बारे में सोचती. हालांकि कुछ समय पहले भी मैं ने इस दिशा में सोचा था और कैलिफोर्निया की एक संस्था, जो कुत्तों को प्रशिक्षित करती है, से बात भी की थी, पर उन के विचार से मेरी पक्षाघात, लकवा की स्थिति इतनी गंभीर है कि कुत्ता मुझ से जुड़ नहीं पाएगा क्योंकि मुझ में उसे खिलानेपिलाने या सहलाने तक की क्षमता नहीं है. सो, मैं ने इस दिशा में सोचना ही छोड़ दिया था.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

पति की सुपारी

50 करोड़ की आग

50 करोड़ की आग : भाग 3

कुछ देर तक वह फूलों की क्यारी में बैठा रहा. फिर उठ कर लड़खड़ाते कदमों से लौन से निकलने लगा. उस के दिमाग पर धुंध छाई हुई थी और वह बारबार सिर झटक रहा था. थोड़ी देर के लिए वह एक पेड़ के तने से टेक लगा कर बैठ गया.

वह घंटी की आवाज थी, जो बहुत दूर से आती महसूस हो रही थी. वह आंखें खोल कर आवाज की दिशा में देखने लगा. वह फायर ब्रिगेड की गाड़ी की घंटी की आवाज थी जो मोड़ घूम कर उसी सड़क पर आ चुकी थी.

विक्रम सिर झटकता हुआ संभल कर बैठ गया. कुछ देर वह फायर ब्रिगेड की आवाज सुनता रहा, फिर रेंगता हुआ झाडि़यों की ओर बढ़ने लगा. मकान के पीछे की ओर कांटों वाली झाडि़यों की बाड़ पार करते हुए उस के हाथ जख्मी हो गए. उस ने होंठ दांतों तले दबा लिया. ठीक उसी समय फायर इंजन ललिता हाउस के सामने आ कर रुका, विक्रम उठ कर लड़खड़ाते कदमों से दूर हटने लगा.

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मडप हालांकि उस के लिए अजनबी था. लेकिन एक जगह ऐसी थी जहां उसे शरण मिल सकती थी. वह लड़खड़ाते हुए चलता रहा, उस का रुख शहर के सब से बड़े पुलिस अफसर मोहित के घर की ओर था.

अंधेरी गलियों में छिपतेछिपाते मोहित के घर तक पहुंचने में उसे 45 मिनट लगे. उस ने दरवाजे पर घंटी का बटन दबा दिया और दीवार से टेक लगा कर खड़ा हो गया.

मोहित उस समय बिस्तर पर कुछ कागजात फैलाए बैठा था. उन में उस की स्वर्गवासी पत्नी का वसीयतनामा, बैंक की स्लिपें और ललिता हाउस के बीमा के कागजात थे.

वह हिसाब लगा रहा था कि मकान के बीमा के सिलसिले में उस ने अब तक कितना प्रीमियम अदा किया था. उसे बीमा कंपनी से 50 करोड़ की धनराशि में से उस के अदा किए गए प्रीमियम और बाकी खर्चे काट कर उसे क्या बचेगा.

घंटी की आवाज सुन कर मोहित चौंका. उस ने घड़ी देखी 4 बजकर 10 मिनट हुए थे. वह कागजात और पेन बिस्तर पर छोड़ कर उठा और जैसे ही बाहरी दरवाजा खोला, विक्रम को देख बुरी तरह उछल पड़ा.

‘‘माई गौड, तुम…’’ कहने के साथ मोहित ने दरवाजा बंद करने की कोशिश की, लेकिन इस बीच विक्रम दरवाजे में पैर फंसा चुका था.

‘‘दरवाजा खोलो, मुझे अंदर आने दो मोहित.’’ विक्रम ने थके हुए स्वर में कहा.

‘‘तुम यहां क्यों आए हो?’’ मोहित उस के पैर को ठोकर मारते हुए बोला, ‘‘मेरा तुम से कोई संबंध नहीं और न ही मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकता हूं. चले जाओ यहां से. अपने साथ तुम मुझे भी फंसाओगे.’’

विक्रम ने अचानक पिस्तौल निकाल लिया और उस की पसलियों पर गड़ाते हुए गुर्राया, ‘‘मुझे अंदर आने दो.’’

पिस्तौल देख कर मोहित की आंखों में डर उभरा और उस ने दरवाजा खोल दिया. डर से उस के हाथ और टांगें कांपने लगी थीं.

‘‘इजी विक्रम,’’ वह थरथराते लहजे में बोला, ‘‘मेरी बात सुनो, भावावेश में आने की आवश्यकता नहीं है. परिस्थिति को समझने की कोशिश करो.’’

विक्रम उसे देखता हुआ अंदर दाखिल हो गया. मोहित ने दरवाजा बंद कर दिया, मगर उस का हाथ अभी तक दरवाजे के हैंडिल पर था. डर के मारे उस के हाथ कांप रहे थे.

‘‘तुम मुझ से क्या चाहते हो विक्रम?’’ उस की बातों में भय झलक रहा था, ‘‘मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?’’

‘‘मुझे सिर के लिए एक रुमाल और एक चादर चाहिए,’’ विक्रम बोला.

‘‘क्यों नहीं, तुम्हें जिस चीज की जरूरत हो, मैं देने को तैयार हूं.’’

‘‘इस के अलावा तुम मुझे अपनी गाड़ी में थाणे छोड़ कर आओगे,’’ विक्रम ने कहा.

मोहित को सीने में सांस रुकती हुई महसूस हुई, ‘‘देखो विक्रम…’’ वह शुष्क होंठों पर जुबान फेरते हुए बोला, ‘‘परिस्थिति को समझने की कोशिश करो. मेरे लिए तुम्हें थाणे ले जाना संभव नहीं है. मैं यहां का इंचार्ज हूं. किसी प्रकार का रिस्क नहीं ले सकता.अगर किसी ने मुझे तुम्हारे साथ देख लिया तो न सिर्फ सारे किएधरे पर पानी फिर जाएगा बल्कि तुम्हारे साथ मैं भी जेल…..’’

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‘‘बंद करो बकवास,’’ विक्रम ने उसे पिस्तौल की नाल से टोहका दिया, ‘‘मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है. अगर तुम ने मना किया तो…’’

‘‘ठीक है विक्रम, ठीक है,’’ मोहित हाथ उठाते हुए बोला, ‘‘मैं तुम्हारी मदद करने को तैयार हूं, लेकिन इस तरह चीखने की जरूरत नहीं है.’’

‘‘तकलीफ मेरी बरदाश्त से बाहर हो रही है,’’ विक्रम ने लड़खड़ाते हुए कहा, ‘‘मुझे डाक्टरी मदद की जरुरत है. इस से पहले कि मेरा दम निकल जाए, मुझे थाणे ले चलो, जल्दी करो, गाड़ी निकालो.’’

‘‘एक मिनट मैं कपड़े तो बदल लूं,’’ मोहित बोला.

‘‘नहीं, उस की जरूरत नहीं है, मेरे लिए एकएक पल कीमती है गाड़ी निकालो.’’ विक्रम चीखा. मोहित को उस का हुक्म मानना पड़ा. विक्रम उसे दोबारा कमरे में जाने का मौका नहीं देना चाहता था.

रात के सन्नाटे में मोहित की कार थाणे की ओर जाने वाली सड़क पर दौड़ रही थी. विक्रम पैसेंजर सीट पर बैठा हुआ था. उस ने मोहित का ओवरकोट और पुराना हैट पहन रखा था. जो उस के सिर की जली हुई त्वचा पर काफी तकलीफ दे रहा था.

कार को लगने वाले झटकों से विक्रम दाएंबाएं झूल रहा था. स्टीयरिंग पर मोहित की पकड़ काफी मजबूत थी, उस की गर्दन पर पसीने की धार बह रही थी. वह बारबार कनखियों से विक्रम की ओर देख रहा था.

‘‘बारबार मेरी तरफ क्या देख रहे हो?’’ विक्रम ने एक बार उसे अपनी तरफ देखते पा कर कहा, ‘‘मैं अभी जिंदा हूं, मरा नहीं हूं. सामने देख कर गाड़ी चलाओ, कहीं गाड़ी को टकरा मत देना, इंचार्ज साहब.’’

मोहित ने कोई जवाब नहीं दिया, वह सामने सड़क पर देखने लगा. भटान सुरंग से एक किलोमीटर पहले उस ने गाड़ी रोक ली.

‘‘विक्रम प्लीज, मुझे थाणे जाने पर मजबूर मत करो. मैं किसी किस्म का खतरा मोल नहीं ले सकता.’’

‘‘मुझे जल्द से जल्द किसी अच्छे डाक्टर के पास पहुंचना है.’’ विक्रम जख्मी होंठों पर जुबान फेरते हुए बोला, ‘‘और तुम मुझे यहां इस वीराने में छोड़ने के बजाए थाणे ले चलोगे, क्योंकि मेरी इस हालत के जिम्मेदार भी तुम हो. गाड़ी स्टार्ट करो.’’ विक्रम दर्द पर काबू पाने के लिए सीट पर आगेपीछे झूलने लगा.

‘‘गाड़ी स्टार्ट करो’’ वह गला फाड़ कर चिल्लाया.

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मोहित ने तुरंत गाड़ी स्टार्ट कर दी. उस की टांगें और हाथ बुरी तरह कांप रहे थे, जिस से उस के लिए गाड़ी पर कंट्रोल रखना काफी मुश्किल हो रहा था, लेकिन वह जैसेतैसे गाड़ी चला रहा था.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

50 करोड़ की आग : भाग 4

लोनावाला पहुंच कर उस ने गाड़ी सिटरस होटल के अंदर मोड़ दी. मनमोहन इसी होटल में ठहरा हुआ था. वह चंद पल स्टीयरिंग व्हील के सामने बैठा रहा, फिर विक्रम की ओर मुड़ कर बोला, ‘‘देखो विक्रम, हम यहां पहुंच गए हैं. तुम कोई ऐसी हरकत नहीं करोगे, जिस से मुझे या तुम्हें पछताना पड़े.

‘‘मैं एक जिम्मेदार आदमी हूं. मेरे 3 बेटे हैं जो हौस्टल में रहते हैं. मैं समझता हूं तुम एक अच्छा आदमी होने का सबूत दोगे और मुझे किसी किस्म का नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं करोगे. वैसे भी तुम मुझे नुकसान पहुंचाओगे ही क्यों?’’

‘‘इसलिए कि तुम कमीने आदमी हो.’’ विक्रम ने होंठ चबाते हुए कहा, ‘‘मेरी यह हालत देख कर भी तुम ने घर का दरवाजा बंद करने की कोशिश की थी. तुम इतने बेगैरत हो कि मरते हुए आदमी के हलक में पानी की बूंद भी नहीं डाल सकते. अगर मेरे पास पिस्तौल न होता तो तुम कभी मेरी मदद नहीं करते.’’

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‘‘मेरे सब से छोटे बेटे की उम्र 5 साल है’’ मोहित घिघियाया, ‘‘क्या तुम 5 साल के बच्चे के सिर से उस के बाप का साया छीन सकते हो? विक्रम तुम जो कहोगे, मैं करने को तैयार हूं.’’

‘‘तुम झूठ बोलते हो,’’ विक्रम दहाड़ा, ‘‘मैं जानता हूं तुम्हारी कोई औलाद नहीं है. तुम्हारी बीवी कई साल पहले मर गई थी. तुम ने ललिता हाउस के बीमा की रकम हासिल करने के लिए इमारत को आग लगवाई है, क्योंकि तुम जानते हो कि चंद माह बाद तुम्हें इस मकान का कुछ भी नहीं मिलेगा.

‘‘मुझे शक है कि तुम्हारी बीवी भी अपनी मौत नहीं मरी होगी. उस की दौलत पर कब्जा करने के लिए तुम ने उस की हत्या ही की होगी. बहरहाल, मैं इस समय तुम से किसी किस्म की बहस करने के मूड में नहीं हूं, मनमोहन को बुला कर लाओ, मैं कार में बैठा हूं.’’

मोहित छलांग लगा कर कार से उतर गया और तेजतेज कदमों से होटल में दाखिल हो गया. उस की वापसी में चंद मिनट से अधिक का समय नहीं लगा. उस के साथ मनमोहन और श्याम भी थे. मनमोहन ने कार का दरवाजा खोल कर जब अंदर झांका तो विक्रम के जख्मी होंठों पर मंद मुसकान आ गई.

‘‘खूब… बहुत खूब!’’ मनमोहन सीटी बजाते हुए बोला.

‘‘ओहो!’’ श्याम ने कहा, ‘‘लगता है यह सीधे मोर्चे से आ रहा है.’’

‘‘अगर तुम उस मकान को जा कर देखोगे तो मुझे भूल जाओगे,’’ विक्रम ने कहा.

‘‘तुम बेहोश होने की तैयारी तो नहीं कर रहे हो विक्रम?’’ श्याम आगे झुकते हुए बोला.

विक्रम आगेपीछे झूल रहा था. उस की आंखें बंद थीं, फिर एकाएक उस का सिर डैशबोर्ड से टकराया और वह दाईं ओर झूल गया.

दोबारा होश आने पर उस ने खुद को ऐसे कमरे में पाया, जिस की दीवारों पर मकड़ी के जाले लटके हुए थे. छत पर मद्धिम रोशनी का बल्ब झूल रहा था. उसी पल मनमोहन की आवाज उस के कानों से टकराई जो डाक्टर को संबोधित करते हुए कह रहा था, ‘‘सुनो डाक्टर, यह मरना नहीं चाहिए. इसे हर हालत में जिंदा रखना है क्योंकि लाश को ठिकाने लगाना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा. इसलिए इस की दोनों टांगें और दोनोंं हाथ भी काटने पड़ें तो कोई बात नहीं.’’

‘‘मैं इसे बचाने की कोशिश करूंगा,’’ डाक्टर की आवाज सुनाई दी, ‘‘नौजवान है, इसे खुद भी जिंदा रहने की ख्वाहिश होगी.’’

‘‘अब तुम जाओ मोहित, इसे हम संभाल लेंगे.’’ मनमोहन ने कहा.

‘‘मुझ से बहुत बड़ी बेवकूफी हो गई,’’ मोहित ने जवाब दिया, ‘‘तुम लोगों पर भरोसा कर के मैं ने अपना मानसम्मान, अपनी जिंदगी सब दांव पर लगा रखी है. अगर यह मर गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे. बहरहाल, मैं जा रहा हूं.’’

विक्रम की आंखें बंद थीं. उस ने मोहित के जाते कदमों की आवाज सुनी और एकाएक गहरीगहरी सांस लेने लगा.

मोहित जब वहां से निकला तो दिन की रोशनी छा चुकी थी. सुबह की ताजा हवा में उस ने लंबीलंबी सांस ली और कार में बैठ गया.

कार तेज गति से हाइवे पर दौड़ रही थी. मोहित के चेहरे पर सुकून था. अब उसे विक्रम की ओर से कोई चिंता नहीं थी. मरे तो मर जाए. उसे यकीन था कि मनमोहन और श्याम उसे संभाल लेंगे. वह मन ही मन ललिता हाउस और उस के बीमा की रकम के बारे में सोचने लगा, 50 करोड़ बड़ी रकम थी. वह बाकी की जिंदगी आराम से गुजार सकता था.

मोहित को यकीन था कि बीमा कंपनी का स्थानीय एजेंट भी सूचना पा कर मकान के मलबे के पास पहुंच गया होगा. स्थानीय एजेंट से उस का अच्छा परिचय था. वह अपने संबंधों के आधार पर उसे मजबूर कर सकता था कि दुर्घटना की जांच रिपोर्ट जल्द से जल्द पूरी कर के कंपनी को भेज दे ताकि क्लेम की अदायगी में देर न लगे.

जब उस ने कार हाइवे से ललिता हाउस की तरफ मोड़ी तो धूप फैल चुकी थी. फैक्ट्री एरिया से आगे निकलते ही उस ने कार का रुख अपने घर की ओर मोड़ दिया. उस ने सोचा था कि कपड़े बदल कर ललिता हाउस की तरफ जाएगा.

मोहित भविष्य की योजनाएं बनाता हुआ घर पहुंच गया. कार रोक कर वह नीचे उतरा और आगे बढ़ कर जैसे ही दरवाजे पर हाथ रखा तो चौंका. दरवाजा हलके से दबाव से खुल गया. अचानक उसे याद आया कि विक्रम के साथ जाते हुए उस ने दरवाजा लौक नहीं किया था.

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वह होंठ सिकोड़े धीमे सुर में सीटी बजाता हुआ अपने बैडरूम में दाखिल हुआ लेकिन पहला कदम रखते ही वह इस तरह रुक गया जैसे जमीन ने उस के पैर पकड़ लिए हों. उस का दिल उछल कर हलक में आ गया और सीने में सांस रुकता हुआ महसूस होने लगा.

कमरे में उस का एक मातहत इंसपेक्टर, एक सबइंसपेक्टर और 2 कांस्टेबल के अलावा बीमा कंपनी का एजेंट भी मौजूद था, जिस के हाथ में वे तमाम कागजात नजर आ रहे थे, जिन्हें वह रखा छोड़ गया था.

‘‘हैलो बौस,’’ इंसपेक्टर उस की ओर देखते हुए मुसकराया, ‘‘रात आप के मकान को आग लगने के बाद हम ने कई बार फोन कर के संपर्क करना चाहा मगर कामयाब न हो सके. मैं ने सोचा संभव है आप घर पर मौजूद न हों, लगभग एक घंटे पहले मिस्टर ठाकुर…’’ उस ने बीमा कंपनी के एजेंट की ओर इशारा किया, ‘‘मिस्टर ठाकुर भी आग लगने की सूचना पा कर ललिता हाउस पहुंच गए थे. यह फौरी तौर पर आप से मिलना चाहते थे.

इस बार भी फोन पर संपर्क नहीं हो पाया तो हम स्वयं यहां चले आए और यहां आप के बिस्तर पर बिखरे हुए ये कागजात…’’ उस ने ठाकुर के हाथ में पकड़े कागजात की तरफ इशारा करते हुए वाक्य अधूरा छोड़ दिया.

‘‘यह तुम्हारी ही हैंड राइटिंग है न मिस्टर मोहित?’’ ठाकुर ने सवालिया निगाहों से उस की ओर देखा.

‘‘हां.’’ आवाज मोहित के हलक से फंसीफंसी सी निकली.

‘‘इस सिलसिले में हम आप से कुछ पूछना चाहेंगे बौस.’’ इंसपेक्टर बोला.

उस के होंठों पर रहस्यमयी मुस्कान थी, ‘‘और मेरा खयाल है, यह बातचीत पुलिस स्टेशन पहुंच कर ही होना चाहिए, वहां एसपी साहब भी इंतजार कर रहे हैं, चलिए बौस.’’

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औफिसर इंचार्ज मोहित सिर झुकाए अपने मातहतों के आगेआगे चल दिया. वह जान गया था कि उस का खेल खत्म हो चुका है.

50 करोड़ की आग : भाग 1

उस कमरे में 3 लोग थे, मनमोहन, श्याम और विक्रम. मनमोहन मोटा जरूर था, लेकिन उस का दिमाग बहुत तेज था. वैसे उस का मोटापा एक तरह से उस की पर्सनैलिटी पर भी सूट करता था और पेशे पर भी. वह आपराधिक कामों की पेशगी ले कर काम कराता था, लेकिन छोटेमोटे नहीं, बड़ेबड़े. हालांकि खूंखार दिखने वाला मनमोहन खुद कोई अपराध नहीं करता था.

श्याम उस का सहयोगी भी था और ड्राइवर भी. हाल ही में मनमोहन ने छोटे शहर मडप के सब से बड़े पुलिस अफसर मोहित से 2 करोड़ की डील की थी. काम था बंद पड़ी एक पुरानी इमारत को इस तरह आग लगाने का कि सब कुछ जल कर खाक हो जाए.

इस काम के लिए उस ने विक्रम को चुना था. वह ऐसे कामों का मास्टर था. दोनों के बीच इस काम का सौदा 50 लाख रुपए में तय हुआ था. 10 लाख उसे दे भी दिए गए थे. लेकिन किन्हीं कारणों से विक्रम यह काम नहीं कर पाया था, उस का पहला प्रयास ही विफल रहा था.

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फिलहाल विक्रम मनमोहन के सामने बैठा था. हाथ में रिवौल्वर थामे मनमोहन उसे गालियां देते हुए लानतमलामत कर रहा था, जबकि विक्रम सफाई देते हुए कह रहा था कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह किसी काम में हाथ डाले और वह न हो. वह कभी फेल नहीं होता. जबकि मनमोहन बता रहा था कि पुलिस अफसर मोहित का फोन आया था. उस ने बताया कि बिल्डिंग जस की तस खड़ी है.

काफी जद्दोजहद के बाद तय हुआ कि मौके पर जा कर बिल्डिंग को देखा जाए. मनमोहन, श्याम और विक्रम कार से मडप के लिए रवाना हो गए. कार श्याम चला रहा था. चलने से पहले मनमोहन ने मोहित को फोन कर के रास्ते में मिलने को कह दिया था.

कार सड़क पर दौड़ रही थी. अपने काम का मंथन करते हुए विक्रम खिड़की से बाहर अंधेरे में देख रहा था. थोड़ीथोड़ी दूरी पर सड़क के दोनों ओर फैक्ट्रियों की रोशनी दिख रही थी.

मनमोहन अब भी गुस्से में था और विक्रम को गालियां बक रहा था. 20 मिनट की दूरी तय करने के बाद कार शिवगंगा वाटर पार्क की ओर मुड़ गई. थोड़ा आगे जा कर घने पेड़ों वाला जंगल था.

वहां पहुंच कर श्याम ने कार को हलका सा झटका दिया तो पेड़ों के झुरमुट में से एक मानवीय साया निकला और कार के पास आ गया. उस ने बेतकल्लुफी से कार का दरवाजा खोला और अंदर आ कर बैठ गया. यह मोहित था जो सादे कपड़ों में था. कार आगे बढ़ गई.

‘‘मेरा खयाल है, तुम इसी तरह काम करते हो?’’ मोहित ने विक्रम की ओर देख कर कहा, ‘‘मैं पुलिस स्टेशन में बैठा सूखता रहा और तुम लोगों का दूरदूर तक कोई पता नहीं था. क्या हुआ, कहां मर गए थे तुम लोग?’’

‘‘गुस्से की जरूरत नहीं है, सब ठीक हो जाएगा.’’ मनमोहन बोला.

‘‘सब कुछ प्लानिंग के अनुसार हुआ था,’’ मोहित मनमोहन की तरफ देख कर हाथ पर हाथ मारते हुए बोला, ‘‘पौने 11 बजे शहर के उत्तरी इलाके में आग लगने की सूचना मिलते ही तमाम फायर इंजन उस तरफ चले गए थे. वहां झाडि़यों में आग लगी थी. यह सब फायर इंजनों को व्यस्त रखने के लिए किया गया था ताकि दूसरी तरफ हम इस अवसर का लाभ उठा सकें, लेकिन 2 घंटे बाद भी ललिता हाउस में आग लगने की सूचना नहीं मिली. मैं ने इस काम के लिए तुम्हें 2 करोड़ रुपए देने की पेशकश की थी, एडवांस भी दिए, लेकिन तुम लोग बिलकुल नाकारा साबित हुए. आखिर चाहते क्या हो तुम लोग?’’

‘‘इसे देख रहे हो?’’ मनमोहन ने विक्रम की ओर इशारा किया, ‘‘यह हमारा फायर एक्सपर्ट है, जिस की वजह से आज हमें नाकामी का मुंह देखना पड़ा.’’

‘‘मैं ने हर काम बड़ी ऐहतियात से किया था. लेकिन कहीं कोई न कोई गड़बड़ हो गई होगी. इस में मेरा कोई कुसूर नहीं है.’’ विक्रम ने एक बार फिर अपनी सफाई दी.

‘‘सुनो विक्रम, मैं इस कस्बे का औफिसर इंचार्ज हूं. मैं किसी किस्म की गड़बड़ी या गलती को सहन नहीं कर सकता.’’

‘‘मैं तुम्हारा यह काम करूंगा.’’ विक्रम ने उसे शांत करने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘यकीन रखो, इस बार कोई गड़बड़ नहीं होगी.’’

‘‘श्याम, गाड़ी ललिता हाउस की ओर मोड़ दो.’’

‘‘उसी तरफ जा रहा हूं,’’ कहते हुए श्याम ने गाड़ी एक दूसरी सड़क पर मोड़ दी.

कुछ देर बाद गाड़ी ललिता हाउस के सामने रुक गई. विक्रम दरवाजा खोल कर नीचे उतर गया.

‘‘हम 10 मिनट में वापस आएंगे,’’ मनमोहन ने दरवाजा बंद करते हुए कहा, ‘‘इस दौरान पता लगाओ,क्या गड़बड़ हुई थी.’’

गाड़ी आगे बढ़ गई. विक्रम कंधे उचका कर रह गया. फिर वह ललिता हाउस की ओर देखने लगा. उस के हिसाब से इस पुरानी पर आलीशान इमारत को अब तक राख के ढेर में बदल जाना चाहिए था. लेकिन इमारत जस की तस खड़ी थी. उसे हैरत थी कि बिल्डिंग में आग क्यों नहीं लगी.

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विक्रम अंधेरे लौन को पार करते हुए 50 लाख रुपए के बारे में सोच रहा था, जो बिल्डिंग के जलने की स्थिति में उसे मिलने थे.

विक्रम खिड़की पर चढ़ कर बहुत खामोशी से ललिता हाउस के अंदर कूद गया. यह खिड़की वह उस वक्त खुली छोड़ गया था, जब पहली बार यहां आया था. लाइब्रेरी रूम से निकल कर वह गैलरी में आ गया और टौर्च की रोशनी में आगे बढ़ने लगा.

गैलरी में बिछे पुराने कालीन से अब भी नेफ्थलीन की हलकी सी बू उठ रही थी. वह टौर्च की रोशनी में उस फ्यूज का निरीक्षण करने लगा जो खिड़की के रास्ते बाहर कूदने से पहले उस ने लगाया था. फ्यूज जल चुका था और वहां राख की छोटी सी ढेरी नजर आ रही थी.

राख की इस ढेरी के नीचे उस ने कालीन को छू कर देखा. वह बिलकुल शुष्क था. विक्रम अपना सिर पीटते हुए खिड़की की ओर चल दिया. कुछ देर बाद वह ललिता हाउस से निकल कर सड़क के दूसरी ओर पेड़ों के अंधेरे में छिप गया और मनमोहन वगैरह की वापसी का इंतजार करने लगा.

अंधेरे की चादर में लिपटी उस इमारत की ओर देखते हुए वह सोच रहा था कि यह बिल्डिंग उस का भाग्य बदल सकती है.

कार के इंजन की आवाज उसे ख्वाबों की दुनिया से बाहर ले आई. कार सड़क पर रुकते ही विक्रम पेड़ों की ओट से निकल कर सामने आ गया.

‘‘क्या रहा विक्रम?’’ मनमोहन ने खिड़की पर झुकते हुए पूछा.

‘‘मेरा अंदाजा सही निकला, वाकई गड़बड़ी हो गई थी.’’ विक्रम ने बहुत धीमे लहजे में कहा.

‘‘कोई कहानी सुनाने वाले हो क्या?’’ मनमोहन ने उसे गुस्से से घूरा. मोहित के कहने पर विक्रम कार में बैठ गया ताकि आराम से बात हो सके.

‘‘अपनी बकवास बंद रखो मनमोहन, जो कुछ कहनासुनना है जल्दी से कहो और यहां से निकल चलो.’’ कहते हुए मोहित ने सड़क पर इधरउधर देखा, ‘‘मेरे अंदाजे के मुताबिक ड्यूटी कांस्टेबल गश्त करते हुए इस ओर आने वाला होगा.’’

‘‘यह इस इलाके का पुलिस इंचार्ज है, जो एक मामूली कांस्टेबल से डरता है.’’  मनमोहन ने उस का मजाक उड़ाया.

‘‘मुझ से बड़ी गलती हो गई जो इस काम के लिए तुम लोगों से बात कर बैठा.’’ मोहित नागवारी से बोला, ‘‘बहरहाल, क्या गड़बड़ी हुई थी?’’

‘‘मैं ने 2 घंटे का फ्यूज लगाया था, जबकि वक्त ज्यादा होने की वजह से इस दौरान नेफ्थलीन हवा में उड़ गया.’’ विक्रम ने जवाब दिया.

‘‘क्या हवा में उड़ गया?’’ श्याम ने सवालिया निगाहों से उस की ओर देखा.

‘‘हमारा यह फायर एक्सपर्ट साइंस का स्टूडेंट है, बातचीत में बड़े कठिन शब्दों का प्रयोग करता है, जो दूसरों के सिर से गुजर जाते हैं. तुम्हें तो किसी होटल में बरतन धोने का काम करना चाहिए था विक्रम.’’ मनमोहन ने आखिरी शब्द विक्रम को संबोधित करते हुए कहे.

‘‘सवाल यह है कि अब क्या किया जाए?’’ मोहित ने दखल देते हुए कहा.

‘‘सुनो विक्रम, तुम इमारत में वापस जाओगे और आग लगाने के बाद उस वक्त तक बाहर नहीं निकलोगे जब तक शोले तुम्हारे कद से ऊपर न उठने लगें.’’ मनमोहन ने विक्रम को आदेश सा दिया.

‘‘हां, सुन लिया,’’ विक्रम की आवाज गुस्से से कांप रही थी, ‘‘सुन लिया है मैं ने.’’

‘‘अब तुम न कोई फ्यूज इस्तेमाल करोगे और न कोई ऐसी चीज जो हवा में उड़ जाए. आग अपने हाथ से लगाओगे, समझे.’’ मनमोहन बोला.

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विक्रम को उतार कर कार झटके से आगे बढ़ गई और मोहित पीछे मुड़ कर विक्रम को देखने लगा जो अब भी सड़क पर खड़ा था.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

50 करोड़ की आग : भाग 2

मोहित मडप का पुलिस इंचार्ज था. ललिता हाउस उस की ही मिल्कियत थी, जो कई साल पहले उस की पत्नी की मृत्यु के बाद उसे विरासत में मिली थी. उस की पत्नी ने मरने से कुछ साल पहले 50 करोड़ में ललिता हाउस का बीमा करवाया था, जिस का प्रीमियम अब मोहित भर रहा था. लेकिन आमदनी सीमित होने की वजह से उस के लिए प्रीमियम की अदायगी जारी रखना मुश्किल हो रहा था.

वैसे भी 60 साल पुराना ललिता हाउस उस की जरूरत से कहीं ज्यादा बड़ा था. लंबे समय से देखभाल न होने की वजह से इमारत की हालत भी खराब हो गई थी. चंद महीने पहले उस ने ललिता हाउस को बेचने की कोशिश की तो पता चला कोई भी इस इमारत के 20 करोड़ से ज्यादा देने को तैयार नहीं था.

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फिर 6 सप्ताह पहले जब उस ने अखबार में यह खबर पढ़ी कि बीमा कंपनी बीमाशुदा पुरानी इमारतों की मौजूदा हालत का पुनर्निरीक्षण कर के उन की बीमा की रकम का दोबारा निर्धारण करेगी तो मोहित चौंका. उसे विश्वास था कि उस के मकान की हालत देखने के बाद बीमा कंपनी उस की पौलिसी खत्म कर देगी और इस तरह उसे बड़ी रकम से वंचित होना पड़ेगा. यह सब सोच कर उस ने ललिता हाउस को आग लगाने का फैसला कर लिया और इस के लिए 2 करोड़ की रकम के बदले मनमोहन की सेवाएं ले लीं.

मनमोहन या उस के साथियों का मडप से कोई संबंध नहीं था. इस तरह उन पर किसी किस्म का शक भी नहीं किया जा सकता था. मोहित को विश्वास था कि इमारत जलने के बाद ज्यादा से ज्यादा 2 सप्ताह में बीमा कंपनी अपनी जांच पूरी कर के उसे 50 करोड़ की अदायगी कर देगी. फिर वह पुलिस की नौकरी छोड़ कर गोवा या कहीं और चला जाएगा.

मकान को आग लगाने के लिए मोहित ने बड़ी उम्दा प्लानिंग की थी लेकिन पहली ही स्टेज पर गड़बड़ हो गई थी. अब वह बारबार पीछे मुड़ कर देखते हुए विक्रम की कामयाबी की दुआएं मांग रहा था.

कार निगाहों से ओझल हो चुकी थी. विक्रम ने हाथ से चेहरा पोंछते हुए मनमोहन को 2-4 गालियां दीं और सड़क पार कर के ललिता हाउस के लौन में दाखिल हो गया. रात के 3 बजने वाले थे, हर तरफ गहरा सन्नाटा और अंधेरा था.

अचानक झाडि़यों में से किसी पक्षी के फड़फड़ाने की आवाज से वह बुरी तरह उछल पड़ा. उस के मुंह से चीख निकलतेनिकलते रह गई. वह अपने दिल की धड़कनों पर काबू पाने की कोशिश करते हुए एक बार फिर मनमोहन की शान में कसीदे पढ़ने लगा.

ललिता हाउस में दाखिल होते ही वह होशियार हो गया. बिना नीचे रुके वह ऊपर वाली मंजिल पर चला गया, जहां पिछली बार उस ने ज्वलनशील पदार्थ नेफ्थलीन के 2 डिब्बे रखे थे.

दोनों डिब्बे उठा कर वह नीचे ले आया, फिर सारी खिड़कियों, दरवाजों के परदे उतार कर उन्हें चौड़ी गैलरी के आखिरी सिरे पर स्थित लाउंज में ढेर कर दिया. वहां का फर्नीचर बाबा आदम के जमाने का था. उस ने फर्नीचर पर चढ़े कपड़े के सारे कवर उतार कर उन के ऊपर डाल दिए.

उस ने मेजें और कुर्सियां भी कपड़ों के ढेर के पास जमा कर दीं. फटे पुराने कालीन भी उस जगह पहुंचा दिए. फिर नेफ्थलीन का एक डिब्बा खोल कर कपड़ों के उस ढेर और फर्नीचर पर ज्वलनशील पदार्थ छिड़कने लगा.

खिड़कियों और दरवाजों पर भी उस ने ज्वलनशील पदार्थ छिड़क दिया. इस भागदौड़ में उस का जिस्म पसीने से भीग गया था. नेफ्थलीन की गंध दिमाग में चढ़ी जा रही थी. अपने अब तक के काम का निरीक्षण कर के उस ने निश्चिंत होने वाले अंदाज में सिर हिलाया.

इधरउधर निगाह दौड़ाने पर उसे लगभग 4 फीट लंबा बांस का एक टुकड़ा मिल गया. उस ने ढेर पर से एक परदा उठा कर फाड़ा और कपड़े का एक टुकड़ा बांस के सिरे पर लपेटने लगा. फिर उसे नेफ्थलीन में कुछ इस तरह गीला किया कि तरल पदार्थ नीचे टपकने लगा.

जेब से माचिस निकालते हुए वह गहरी नजरों से गैलरी का निरीक्षण करने लगा. गैलरी लगभग 35 फीट लंबी थी. वह अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहा था कि इस ढेर को आग लगाने के बाद कितनी देर में गैलरी के सिरे वाली खिड़की तक पहुंच पाएगा. चांस कम है, यह सोचते हुए उस ने लाउंज की एक खिड़की खोल दी और माचिस जला कर बांस के सिरे पर लिपटे ज्वलनशील पदार्थ में डूबे कपड़े को दिखा दी.

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मशाल भड़क उठी. वह कुछ क्षण तक अपने और खिड़की के बीच की दूरी का अंदाजा लगाता रहा. फिर मशाल को पूरी ताकत के साथ कपड़ों के ढेर की ओर उछाल दिया. मशाल ठीक कपड़ों के ढेर के ऊपर गिरी. एक क्षण को कुछ भी नहीं हुआ. विक्रम जलती हुई मशाल को देखते हुए खिड़की से छलांग लगाने को तैयार खड़ा था. उसे हैरत थी कि फर्नीचर और कपड़ों के ढेर पर फैले ज्वलनशील पदार्थ ने आग क्यों नहीं पकड़ी.

लेकिन फिर अचानक भक की आवाज हुई और कपड़ों का ढेर आतिशबाजी की तरह उड़ गया. शोलों में लिपटे हुए भारी परदे चारों ओर उड़ते हुए नजर आ रहे थे. एक जलता हुआ परदा उस के सिर के ऊपर से होता हुआ खिड़की के बाहर चला गया. एक परदे ने विक्रम को अपनी लपेट में लेने की कोशिश की.

विक्रम अपने आप को बचाने के लिए फर्श पर गिर गया. बचाव के बावजूद परदे का एक कोना उस के सिर पर लिपट गया था. उस ने हाथ मार कर परदा एक तरफ झटक दिया. उस के बाल जल गए थे, उस ने उठना चाहा लेकिन उस का पैर रपट गया और वह धड़ाम से नीचे गिर गया.

उस का सिर जोरों से फर्श से टकराया तो उसे अपनी आंखों के सामने नीलीपीली चिंगारियां सी निकलती दिखाई दीं. और फिर उस का दिमाग अंधेरे में डूबता चला गया.

होश में आते ही वह बुरी तरह बदहवास हो गया, उस के सिर के नीचे कालीन सुलग रहा था. सिर के आधे से ज्यादा बाल जल चुके थे और 1-2 जगह से खाल भी जल गई थी. वह बुरी तरह सिर पटकने लगा. फिर खांसता हुआ उठ खड़ा हुआ, लेकिन दूसरे ही क्षण उसे फिर गिरना पड़ा. अगर उसे एक पल की भी देर हो जाती तो कुरसी से टूटी हवा में जलती हुई लकड़ी उस के सिर पर लगती.

हाल में धुंआ भर चुका था. हर तरफ आग ही आग नजर आ रही थी. वह कालीन पर रेंगता हुआ पास के दरवाजे की ओर बढ़ने लगा. उस के हाथों की खाल भी बुरी तरह जल चुकी थी. चेहरे पर भी 1-2 जगह जख्म आए थे. उसे लग रहा था, जैसे वह यहां से नहीं निकल पाएगा.

दरवाजे के पास पहुंच कर उस ने जोर से टक्कर मारी, दरवाजा खुल गया और वह कलाबाजी खाता हुआ बाहर लौन में आ गिरा. ठीक उसी क्षण एक जोरदार धमाका हुआ और ललिता हाउस की छत का एक सिरा नीचे गिर गया. विक्रम ने बदहवासी में अपनी जगह से छलांग लगा दी और दूर फूलों की क्यारी में जा कर गिरा.

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विक्रम फूलों की क्यारी में पड़ा गहरीगहरी सांस ले रहा था. पीठ पर जलन महसूस हो रही थी. उस ने गरदन घुमा कर पीछे देखा और दूसरे ही क्षण उछल पड़ा. उस के कोट में आग लगी हुई थी, जिस से उस की त्वचा भी जल गई थी. उस ने जल्दी से कोट उतार दिया और पीठ को उस जगह सहलाने लगा, जहां तेज जलन महसूस हो रही थी.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

अंतर्भास : कुमुद की इच्छा क्या पूरी हो पाई

अंतर्भास : भाग 3- कुमुद की इच्छा क्या पूरी हो पाई

कंप्यूटर के सामने चुप और उदास बैठा रहा. कुछ बोला नहीं. कुछ देर के मौन के बाद उस ने कहा, ‘‘बरखुरदार… मैं ने तुम से ज्यादा दुनिया देखी है. जयेंद्र जो एकएक पैसा दांत से पकड़ता है, तुम्हारी कुमुद पर फिदा हो गया था. कुमुद ने उस से नौकरी के लिए कहा तो एक अफसर की बेटी की शादी में मुफ्त टैंट लगा शादी का पूरा इंतजाम किया. बदले में कुमुद के लिए उस अफसर से उस ने सरकारी दफ्तर में कंप्यूटर क्लर्क की नौकरी मांग ली. इस तरह कुमुद को वहां फिट करवा दिया.  इस अहसान के बदले कुमुद की मां से अपने लिए उस का हाथ मांग लिया. जयेंद्र कहां गलत है इस में? सौदों की दुनिया में हर कोई नफा का सौदा करना चाहता है. तुम ठहरे नासमझ और कल्पनाओं की दुनिया में जीने वाले.’’

इतना कह कर वह बेशर्मी से मुसकराया और बोला, ‘‘जिस दिन तुम कुमुद केलिए कंप्यूटर ले जा रहे थे, उस दिन मैं तुम से कहना चाहता था कि कुमुद तुम्हारे हाथ नहीं आएगी, बेकार उस पर अपना वक्त और पैसा बहा रहे हो पर तुम्हें बुरा लगेगा, इसलिए चुप रह गया था. आखिर तुम हमारे साइबर कैफे को पुलिस से बचाने में मेरी मदद करते हो, मैं तुम्हें नाराज क्यों करता?’’

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‘‘तुम्हारी इस सिलसिले में कुमुद से कभी बात हुई क्या?’’ मैं ने कुछ सोच कर पूछा. मैं जानना चाहता था, आखिर कुमुद ने उस बदसूरत आदमी को क्यों पसंद कर लिया, जबकि मैं अपनेआप को उस से हजार गुना बेहतर समझता हूं.

‘‘वह तुम्हें सिर्फ एक अच्छा दोस्त मानती है. तुम्हारी इज्जत करती है. एक भला और सही आदमी मानती है. पढ़ालिखा और समझदार व्यक्ति भी मानती है. पर इस का मतलब यह तो नहीं कि वह तुम्हें अपना जीवनसाथी भी मान ले? वह जानती है कि तुम्हारा अर्थतंत्र टूटा हुआ है. तुम इस शहर को छोड़ कर कहीं बाहर जाने का जोखिम नहीं लेना चाहते. कुछ नया और अच्छा करने का हौसला तुम में नहीं है. आजकल पैसा बनाने के लिए आदमी क्या नहीं कर रहा? गलाकाट प्रतिस्पर्धा का जमाना है मित्र. लोग अपने हित के लिए दूसरे का गला बेहिचक काट रहे हैं.’’

मैं कसमसाता चुप बना रहा तो कंप्यूटर मालिक कुछ संभल कर फिर बोला, ‘‘चींटियां वहीं जाती हैं जहां गुड़ होता है. जरा सोच कर देखो, उस का फैसला कहां गलत है? तुम्हारे साथ जुड़ कर उसे क्या वह सबकुछ मिलता जो जयेंद्र से जुड़ कर मिला है…सरकारी नौकरी, 10 लाख उस के नाम बैंक में जमा. अच्छा- खासा सारी सुखसुविधाओं से युक्त मकान…तुम उसे क्या दे पाते यह सब?’’

उस दिन अचानक कुमुद मेरे चबूतरे पर चढ़ आई. उस के स्वागत में मुसकरा कर खड़ा हो गया, ‘‘आओ, कुमुद…अब तो तुम ने इधर आना ही छोड़ दिया,’’ स्वर में शिकायत भी उभर आई.

‘‘नौकरी की व्यस्तता समझिए इसे और कुछ नई जिम्मेदारियां भी,’’ उस का इशारा संभवत: अपने विवाह की तरफ था. उस के बैठने के लिए भीतर से कुरसी ले आया.

‘‘चाय पीना पसंद करोगी मेरे साथ?’’ मुसकरा रहा था. पता नहीं चेहरे पर व्यंग्य था या रोष.

‘‘चाय पीना ही पसंद नहीं करती बल्कि आप से बातचीत करना भी बहुत पसंद करती हूं पर आज चाय आप नहीं, मैं बनाऊंगी आप के किचन में चल कर,’’ वह बेहिचक घर में आई. उसे किचन बताना पड़ा. सारा सामान चाय के लिए निकाल कर उस के सामने रखना पड़ा.

चाय के दौरान उस ने सधे स्वर में कहा, ‘‘मेरी एक बात मानेंगे?’’

‘‘तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं तुम्हारी किसी बात को इनकार नहीं कर सकता,’’ मैं ने सिर झुका लिया.

‘‘हां, इस का एहसास है मुझे. इसी विश्वास के बल पर आज आई हूं आप से कुछ कहने के लिए,’’ उस ने कहा.

‘‘कहो,’’ मैं ने उस की तरफ देखा.

‘‘अपने अफसर को राजी किया है. वह आप को अखबार के कारण जानता है. हालांकि हिचक रहा था, अखबार में काम करते हो, कहीं सरकारी दफ्तर के जो ऊंचेनीचे काम होते हैं उन की पोल तुम कभी अखबार में न खोल डालो. पर मैं ने उन्हें तुम्हारी तरफ से विश्वास दिला दिया है कि तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे, चुपचाप अपनी नौकरी करोगे.’’

‘‘मतलब यह कि तुम ने मेरी नौकरी की बात पक्की कर ली वहां. वह भी बिना मुझ से पूछे? बिना यह सूचना दिए कि मुझे वह नौकरी रास भी आएगी या नहीं? मैं कर भी पाऊंगा या नहीं? निभा भी सकूंगा सरकारी दफ्तरों के भ्रष्टाचार के साथ या नहीं?’’ मैं सवाल पर सवाल दागता चला था.

‘‘हां, बिना आप से पूछे. बिना आप को सूचित किए ही यह बात कर ली मैं ने, और मुझे इस के लिए उस अफसर को थोड़ीबहुत छूटें भी देनी पड़ीं, इतनी नहीं कि मेरी अस्मिता पर आंच आती पर किसी से हंसबोल लेना, दिखावटी थोड़ाबहुत फ्लर्ट कर लेना…अपना काम निकालने के लिए बुरा नहीं मान पाई मैं… और वह भी अपने इतने अच्छे दोस्त के लिए, अपनी दोस्ती के लिए इतना तो कर ही सकती थी न मैं,’’ वह मुसकरा रही थी. फिर बोली, ‘‘मेरा मन कह रहा था कि मैं तुम से कहूंगी तो तुम मना नहीं करोगे. मैं जानती हूं तुम्हारे मन को…और न जाने क्यों, इतना  हक भी मानती हूं तुम पर अपना कि मैं कहूंगी तो तुम मेरी बात मानोगे ही.’’

चुप रह गया मैं और दंग भी. अपलक उस के मुसकराते और गर्व से चमकते चेहरे की तरफ देखता रहा.

‘‘सरकारी दफ्तरों में हर काम गलत नहीं होता जनाब, हर आदमी भ्रष्ट नहीं होता. ऐसे बहुत से लोग हैं जो पूरी ईमानदारी और मेहनत से अपना काम करते हैं. इतने दिन काम कर के मैं भी कुछ समझ पाई हूं उस तिलिस्म में घुस कर,’’ वह बोलती जा रही थी.

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‘‘क्या करना होगा मुझे?’’ मैं ने उस से पूछा.

‘‘टे्रजरी दफ्तर में तमाम बिल कंप्यूटरों पर तैयार होते हैं. वेतन बिल, पेंशन बिल, सरकारी खर्चों के लेनदेन के हिसाबकिताब…उन की टे्रनिंग चलेगी आप की 6 महीने…उस के बाद स्थायी पद दिया जाएगा. शुरू में 10 हजार रुपए मिलेंगे, इस के बाद क्षमता के आधार पर संविदा पर नियुक्ति की जाएगी.’’

‘‘संविदा का मतलब हुआ, अगर काम ठीक से नहीं कर पाया तो बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा,’’ मैं ने शंका जाहिर की. ‘‘हमेशा हर काम को करने से पहले आप उस के बुरे पक्ष के बारे में ही क्यों सोचते हैं? यह क्यों नहीं मानते कि 6 महीने की टे्रनिंग में आप जैसा प्रतिभावान और होनहार व्यक्ति बहुतकुछ सीख लेगा और संविदा पर ही सही, अच्छा काम कर के अफसरों को अपनी उपयोगिता सिद्ध करा देगा…आप की 2 हजार रुपए की नौकरी से तो यह हजारगुनी बेहतर नौकरी रहेगी…अगर नहीं कर पाएंगे तो अखबार तो आप के लिए हमेशा रहेंगे. पत्रकारिता आप को आती है, वह कहीं भी कर लेंगे आप…परेशान क्यों हैं?’’

उम्मीद नहीं थी कि कुमुद इतनी समझदार और संवेदनशील होगी. मैं चकित, अचंभित उस के चेहरे को देखता रह गया, उसे इनकार करता तो किस मुंह से और क्यों?

अंतर्भास : भाग 2- कुमुद की इच्छा क्या पूरी हो पाई

‘‘कुमुद, तुम ने अंगरेजी विषय ही क्यों चुना एम.ए. के लिए?’’ एक दिन उस से पूछा. वह हिंदी और अंगरेजी के उपन्यास समान रूप से ले जा कर पढ़ने लगी थी.

‘‘कई कारण हैं. एक तो यह कि यहां के महिला महाविद्यालय में प्राचार्या ने वचन दिया है कि यदि एम.ए. में मेरी प्रथम श्रेणी आई तो बी.ए. की कक्षाओं को पढ़ाने के लिए फिलहाल वह मुझे रख लेंगी. दूसरा कारण, अपने महाविद्यालय में अंगरेजी के जो विभागाध्यक्ष हैं वह मुझे बहुत मानने लगे हैं. कह रहे थे, शोध करा देंगे. यदि पीएच.डी. करने का अवसर मिल गया तो एक प्रकार से मेरी शिक्षा पूरी हो जाएगी और कहीं ठीकठाक जगह नौकरी मिल जाएगी. तीसरा कारण, अंगरेजी पढ़ी लड़की को नौकरी आसानी से मिल जाती है.’’

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‘‘असली कारण तो तुम ने बताया ही नहीं,’’ भेद भरी मुसकान के साथ मैं बोला.

‘‘कौन सा?’’ उस की आंखों में भी शरारत थी.

‘‘अंगरेजी पढ़ी लड़की को अच्छा घर और वर भी मिल जाता है,’’ कह कर मैं हंस दिया. झेंप गई वह.

कुमुद कंप्यूटर सीखने जाने लगी थी. कई बार वह फीस के बारे में पूछ चुकी थी, पर उसे फीस न संस्थान मालिक ने बताई, न मैं ने. वह पढ़ती रही. काफी सीख भी गई.

एक दिन बोली, ‘‘अगर कहीं से आप सेकंड हैंड कंप्यूटर दिलवा दें तो मैं घर पर कुछ जौब वर्क कर सकती हूं.’’

अगले दिन अपने संस्थान से ही एक नया असंबल किया हुआ कंप्यूटर ले कर उस के घर पहुंच गया, ‘‘तुम्हारे जन्मदिन का तोहफा, कुमुद.’’

वह एकदम खिल सी गई, ‘‘आप को कैसे पता चला कि आज मेरा जन्मदिन है?’’

‘‘कंप्यूटर संस्थान में तुम ने अपना फार्म भरा था, उस में तुम्हारा बायोडाटा देखा था.’’

‘‘आप सचमुच जासूस किस्म के व्यक्ति हैं…क्राइम रिपोर्टर हैं, कहीं कोई क्राइम तो नहीं करेंगे?’’ वह हंसतीहंसती एकदम चुप हो गई थी क्योंकि उस की मां वहां आ गई थीं. उस ने कंप्यूटर अपनी मां को दिखाया. फिर मेरे लिए चाय बनाने चली गई.

कुमुद की मां वहां रह गई थीं. संकोच भरे स्वर में कुछ हिचकती सी बोलीं, ‘‘आप की बहुत तारीफ करती है कुमुद. सचमुच आप ने उसे बहुत सहारा दिया है. हम आप का अहसान हमेशा मानेंगे.’’

मैं समझ रहा था, यह किसी अन्य बात को कहने की भूमिका है. यों ही कोई किसी की प्रशंसा नहीं करता. हर बात, हर व्यवहार आदमी बहुत चालाकी से, अपने मतलब के अनुसार करता है. अखबारी दुनिया में रहने से आदमी को अच्छी तरह समझने लगा हूं. पहले यह समझ नहीं थी.

कुछ रुक कर चेहरा झुकाए हुए वह बोलीं, ‘‘कुमुद जहां बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाती है, आप की गली वाले जयेंद्रजी के घर…’’ इतना कहती हुई वह हिचकीं फिर बोलीं, ‘‘एक दिन वह यहां आए थे… बड़े आदमी हैं…आप भी जानते होंगे उन्हें…2 बच्चे हैं. पत्नी की बीमारी से मृत्यु हो गई है. मुझे कुछ खास उम्र नहीं लगी उन की…बस, शक्लसूरल जरा अच्छी नहीं है पर पैसे वाले आदमी की शक्लसूरत कहां देखी जाती है…कुमुद का हाथ मांग रहे थे…कह रहे थे कि बच्चे कुमुद से बहुत हिलमिल गए हैं…अगर कुमुद राजी हो जाए तो वह उस से शादी कर लेंगे…इस बारे में आप की क्या राय है?’’

मैं सन्नाटे में आ गया था. लगा, जैसे किसी ने चहकती चिडि़यों वाले बेर के विशाल पेड़ पर पूरी ताकत से बांस जड़ दिया है और सारी चिडि़यां एकाएक फुर्र हो गई हैं. बाहरभीतर का सारा चहकता शोर एकदम थम गया है. मैं भौचक्का उन की तरफ ताकता रह गया. मन हुआ, कंप्यूटर उठा ले जाऊं और कुमुद चाय ले कर आए उस से पहले ही इस घर से बाहर निकल जाऊं, पर ऐसा किया नहीं. काठ बना ज्यों का त्यों बैठा रहा.

कुमुद चहकती चिडि़या की तरह खुश थी. उसे कंटीला ही सही एक ऊंचा बेर का वृक्ष मिल गया था. वह बेखौफ उस घने वृक्ष पर अपना घोंसला बना सकती थी.

घर आ कर सारी स्थितियों पर मैं ने गंभीरता से सोचाविचारा. कुमुद ने मेरी अपेक्षा जयेंद्र को क्यों पसंद किया? मैं अपनी असफलता पर बहुत दुखी ही नहीं, एक तरह से अपनेआप से क्षुब्ध और असंतुष्ट भी था. एक बार को मन हुआ कि बाजार से सल्फास की गोलियां ले आऊं और रात को खा कर सो जाऊं. फिर लगा कि यह तो कायरता होगी. आखिर इतना पढ़ालिखा हूं, समझ है, क्या इस तरह की बातें मुझे सोचनी चाहिए? इस में कुमुद का दोष कहां है? उस ने जो किया, जो सोचा, उस में उस की गलती कहां है? कोई भी चतुर और समझदार लड़की यही करती जो उस ने किया. आखिर जयेंद्र की तुलना में वह मुझे क्यों चुनती?

फिर मैं ने अपने मन की बात उस से कभी खुल कर कही भी नहीं. हो सकता है, वह सिर्फ एक दोस्त के रूप में ही मुझे देखतीमानती और समझती रही हो. जरूरी कहां है कि जो दोस्त है, उसे वह अपने जीवन का साथी भी बनाए? क्यों बनाए? सिर्फ दोस्त भी तो मान सकती है. कभी उस ने अपना ऐसा मन भी जाहिर नहीं किया कि वह मुझे इस रूप में पसंद करती है. फिर कुमुद के इस फैसले से मैं खिन्न क्यों हूं? गुस्से से क्यों भभक रहा हूं?

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गलती खुद मुझ से हुई है. अगर दोस्ती से आगे बढ़ कर उसे चाहने लगा था तो मुझे उस से अपने मन की बात कहनी चाहिए थी. चूक उस से नहीं, मुझ से हुई है. उस से कहा क्यों नहीं? संकोच था, झिझक थी कि अगर इनकार कर दिया तो? और इनकार करने के कारण भी थे… 2 हजार की अखबार में क्राइम रिपोर्टर की मामूली नौकरी. 3 कमरों का साधारण घर. किराए पर उठी 3 दुकानें. मेरी आर्थिक हैसियत क्या है?

मन की बात कहने पर अगर वह इनकार कर देती तो बहुत संभव था, मैं अपनेआप को रिजेक्टिड मान कर क्रोध में भड़क उठता और कोई गलत फैसला कर बैठता.

कुमुद मुझे बहुत अच्छी लगती है. मैं उस का बहुत सम्मान करता हूं. अच्छी दोस्त है वह मेरी. उस की एक झलक पाने के लिए, उस की एक मुसकान देखने के लिए, उस के गालों पर प्रीति जिंटा जैसे डिंपलों को देखने के लिए, मैं चकोर बना उस की ओर ताकता रहता हूं.

‘‘क्यों, चिडि़या हाथ नहीं आई?’’ कंप्यूटर संस्थान के मालिक ने मेरी स्थिति से असली मामला भांप लिया.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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