Crime Story: 3 करोड़ के सोने की लूट- भाग 1

सौजन्य: मनोहर कहानियां

इसी साल 15 मार्च की बात है. दोपहर के तकरीबन डेढ़ बजे का समय था. राजस्थान के हनुमानगढ़ शहर में टाउन बस स्टैंड पर स्थित मणप्पुरम गोल्ड लोन शाखा में लंच का समय था. कर्मचारी गपशप कर रहे थे.

वैसे तो इस औफिस में 5 कर्मचारी हैं, लेकिन उस समय असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह शेखावत सहित केवल 3 कर्मचारी ही औफिस में थे. एक महिला कर्मचारी किसी काम से रेलवे जंक्शन गई थी और एक महिला कर्मचारी औफिस आने के बाद तबीयत खराब होने की बात कह कर घर चली गई थी.

मणप्पुरम कंपनी सोने के जेवरों पर लोन देने का काम करती है. सालों पुरानी इस कंपनी के पूरे देश में लगभग हर जिला मुख्यालय पर कईकई ब्रांच औफिस हैं. कंपनी के लगभग सभी औफिसों में सोने के जेवर और नकदी रहती है, लेकिन सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं होते. यही कारण है कि हर साल देश भर में इस कंपनी के 5-7 औफिसों में लूट की वारदात होती है.

इन में कुछ वारदातों में अपराधी पकड़े जाते हैं और कुछ में नहीं. पकड़े गए अपराधियों से भी माल की आधीअधूरी बरामदगी ही होती है. बिहार के 2-3 कुख्यात गिरोह तो केवल गोल्ड लोन वाली कंपनियों में ही लूट की वारदात करते हैं.

कंपनी की हनुमानगढ़ शाखा में भी सुरक्षा के कोई खास इंतजाम नहीं थे. सुरक्षा के नाम पर कर्मचारी औफिस समय में चैनल गेट बंद रखते थे. कोई ग्राहक आता, तो गेट खोल देते और उस के जाने के बाद बंद कर देते थे.

उस दिन भी कर्मचारियों ने औफिस का चैनल गेट बंद कर ताला लगा रखा था. दोपहर करीब पौने 2 बजे 2 युवक बैंक के चैनल गेट पर पहुंचे. उन्होंने गेट खुलवाने के लिए बाहर लगी घंटी बजाई. युवकों ने अपने चेहरे ढके हुए थे. एक युवक के पास पिट्ठू बैग था.

घंटी की आवाज सुन कर औफिस के अंदर से एक कर्मचारी मोबाइल पर बातें करते हुए आया. उस ने 2 युवकों को बाहर खड़ा देखा, तो ग्राहक समझ कर उन से बिना कुछ पूछताछ किए चैनल गेट का ताला खोल दिया.

चैनल गेट खुलते ही दोनों युवक औफिस के अंदर घुस गए. अंदर आते ही दोनों ने अपने कपड़ों में छिपा कर लाई पिस्तौल निकाल ली. औफिस में मौजूद तीनों कर्मचारियों पर पिस्तौल तान कर बदमाशों ने जान से मारने की धमकी दी और सोने के बारे में पूछा.

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पिस्तौल देख कर कर्मचारी घबरा गए. उन्होंने सोने के जेवर लौकर में रखे होने की बात कही, तो बदमाशों ने गोली चलाने की धमकी दी. इस पर असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह ने लौकर खोल कर नीचे की दराज में रखे सोने के जेवरों के पैकेट लुटेरों के हवाले कर दिए.

लुटेरों ने लौकर में रखी नकदी भी निकाल ली. एक बदमाश ने जेवर और नकदी अपने कंधे पर लटके बैग में भर लिए. इस के बाद दोनों बदमाश कर्मचारियों को धमकी देते हुए चैनल गेट खोल कर तेजी से निकल गए.

बदमाशों को इस वारदात को अंजाम देने में मुश्किल से 4 मिनट लगे थे. लुटेरों के डर से औफिस के कर्मचारी कुछ देर सहमे से अंदर ही खड़े रहे. बाद में वे औफिस से बाहर निकले और आसपास के लोगों को बताया. बाद में पुलिस को सूचना दी.

सूचना मिलने के कुछ ही देर बाद हनुमानगढ़ एसपी प्रीति जैन, डीएसपी प्रशांत कौशिक, टाउन सीआई लक्ष्मण सिंह राठौड़ और जंक्शन सीआई नरेश गेरा आदि मौके पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने मौकामुआयना कर कंपनी की शाखा के कर्मचारियों और आसपास के लोगों से पूछताछ की.

पूछताछ में पता चला कि औफिस में सायरन लगा होने के बावजूद कर्मचारियों ने वारदात के दौरान या तुरंत बाद उसे नहीं बजाया. अलार्म नहीं बजाने पर एसपी ने कर्मचारियों को फटकार लगाई और 3 बार अलार्म बजा कर उस की जांच भी की.

शाखा के कर्मचारियों ने बताया कि बदमाश सोने के जेवर और कैश ले गए. कितना सोना ले गए, यह रिकौर्ड देखने के बाद बता सकेंगे. उन्होंने नकदी करीब एक लाख रुपए बताई.

आसपास के लोगों से पुलिस को पता चला कि कंपनी की गोल्ड लोन शाखा के सामने टाउन जंक्शन रोड पर एक ट्रक की ओट में एक बाइक सवार खड़ा था. वारदात के बाद दोनों नकाबपोश युवक उस बाइक सवार के साथ फरार हो गए.

पुलिस अधिकारियों ने शहर के सभी मार्गों पर नाकेबंदी करा दी. लुटेरों का पता लगाने के लिए गोल्ड लोन शाखा के बाहर और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. औफिस के चैनल गेट के पास लगे कैमरे में दोनों बदमाश नजर आ गए, लेकिन उन के चेहरे ढके होने से पहचान नहीं हो सकी. ये बदमाश दोपहर 1.47 बजे औफिस में घुसे और 1.51 बजे बाहर निकल गए थे.

गोल्ड लोन शाखा में लूट की वारदात होने की सूचना पूरे शहर में फैल गई. इस से वे लोग बड़ी संख्या में मौके पर पहुंच गए, जिन्होंने अपने जेवर गिरवी रख कर कंपनी से लोन ले रखा था. पुलिस अधिकारियों ने इन लोगों को यह कह कर वापस भेजा कि अभी जांच चल रही है. लूटे गए जेवरों का रिकौर्ड मिलने पर ही कुछ पता चल सकेगा.

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वारदात के तुरंत बाद हालांकि यह पता नहीं चला कि कितना सोना और कितना कैश लूटा गया है. फिर भी एसपी प्रीति जैन ने वारदात को गंभीरता से लेते हुए अधिकारियों की टीम बना कर लुटेरों का पता लगाने के निर्देश दिए.

दूसरे दिन 16 मार्च को पुलिस अधिकारी जांचपड़ताल में जुटे रहे. सीसीटीवी फुटेज के आधार पर लुटेरों की खोजबीन चलती रही. अधिकारियों ने एक बार फिर गोल्ड लोन शाखा के औफिस पहुंच कर कर्मचारियों से पूछताछ की ताकि लुटेरों के बारे में कोई सुराग मिल सके, लेकिन ऐसी कोई बात पता नहीं चली, जिस से लुटेरों का पता लगाया जाता. कंपनी के कर्मचारियों ने वारदात के करीब 32 घंटे बाद 16 मार्च की रात लगभग साढ़े 9 बजे हनुमानगढ़ टाउन पुलिस थाने पहुंच कर केस दर्ज कराया.

मणप्पुरम गोल्ड लोन हनुमानगढ़ टाउन की ब्रांच मैनेजर भावना मेघवाल ने पुलिस में दर्ज कराई रिपोर्ट में बताया कि लुटेरे सोने के जेवरों के 290 पैकेट और एक लाख 7 हजार 951 रुपए नकद ले गए.

लूटे गए सोने के जेवरों का अनुमानित वजन 6 किलो से ज्यादा बताया गया. इन जेवरों में सोने की अंगूठी, कान की बाली, झुमके, कंगन, टौप्स आदि थे.

अगले भाग में पढ़ें- पुलिस ने जेवरों की लूट का खुलासा किया

Crime Story: 3 करोड़ के सोने की लूट- भाग 2

सौजन्य: मनोहर कहानियां

हालांकि पुलिस ने शाखा मैनेजर की ओर से दी गई रिपोर्ट दर्ज कर ली, लेकिन पुलिस अधिकारियों के मन में कई सवाल भी गहरा गए थे.

लूटे गए 6 किलो सोने की कीमत मौजूदा समय में करीब 3 करोड़ रुपए थी. कंपनी के अधिकारियों की ओर से करीब 30 घंटे तक रिकौर्ड का मिलान करने के बाद इतना सोना लूटे जाने की बात पुलिस अधिकारियों के गले नहीं उतरी.

पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कराने आई कंपनी की ब्रांच मैनेजर रायसिंहनगर निवासी भावना मेघवाल और दूसरे स्टाफ से थाने में काफी देर तक पूछताछ की. इस में पता चला कि वारदात के समय लौकर में सोने के जेवरों के करीब 1300 पैकेट थे. असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह ने इन में से नीचे की दराज में रखे 290 पैकेट ही निकाल कर लुटेरों को दिए थे. जेवरों के बाकी लगभग एक हजार पैकेट जो ऊपर की दराज में थे, बच गए थे.

सुरक्षित बच गए जेवरों के पैकेटों में जीपीएस ट्रैकर भी लगा हुआ था जबकि लुटेरों के हाथ लगे जेवरों के पैकेटों में जीपीएस ट्रैकर नहीं था. इसलिए पुलिस अधिकारियों के दिमाग में संदेह पैदा हुआ कि आखिर लुटेरों को नीचे की दराज से ही जेवरों के पैकेट क्यों निकाल कर दिए गए.

लुटेरों को बिना जीपीएस ट्रैकर वाले सोने के जेवरों के पैकेट निकाल कर देने के बारे में पुलिस ने असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह ने सवाल किए, तो उस ने बताया कि ऐसा घबराहट और हड़बड़ाहट में हुआ. पुलिस की पूछताछ में एक बार वह उखड़ भी गया और कहा कि उसे 6 हजार रुपए तनख्वाह मिलती है. इतनी सी तनख्वाह के लिए क्या मैं अपनी जान दांव पर लगा देता? तीसरे दिन 17 मार्च को एडिशनल एसपी जस्साराम बोस और डीएसपी प्रशांत कौशिक ने एक बार फिर गोल्ड लोन शाखा का बारीकी से मुआयना किया और कर्मचारियों से पूछताछ की.

इस के अलावा पुलिस की टीमें सीसीटीवी में नजर आए बदमाशों का सुराग लगाने और संदिग्ध बदमाशों से पूछताछ में जुटी रही. साइबर एक्सपर्ट की टीम लुटेरों के भागने की दिशा में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देख कर रूट चार्ट बनाने में लगी रहीं. 6 किलो सोने के जेवरों की लूट के मामले में पुलिस हर एंगल से बारीकी से जांचपड़ताल करती रही. कुछ ऐसी बातें थी, जिन से पुलिस अधिकारियों का शक गोल्ड लोन शाखा के कर्मचारियों पर हो रहा था.

इस में वारदात के करीब 32 घंटे बाद रिपोर्ट दर्ज कराना, मुंह पर कपड़ा बांध कर आए दोनों युवकों को बिना कोई पूछताछ किए चैनल गेट खोल कर औफिस के अंदर प्रवेश दे देना, असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह की ओर से लुटेरों को बिना जीपीएस ट्रैकर वाले सोने के जैवरों के पैकेट देना, संदेह को बढ़ावा दे रहे थे.

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वारदात के दौरान या तुरंत बाद कर्मचारियों की ओर से अलार्म नहीं बजाना आदि भी ऐसे बिंदु थे, जो कंपनी के कर्मचारियों को शक के दायरे में खड़ा कर रहे थे. इसलिए पुलिस की एक टीम गोल्ड लोन शाखा के कर्मचारियों की कुंडली खंगालने में जुट गई.

पुलिस ने 20 मार्च को 3 लोगों को गिरफ्तार कर सोने के जेवरों की लूट का खुलासा कर दिया. लूट का मास्टरमाइंड मणप्पुरम गोल्ड लोन शाखा का असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह शेखावत निकला.

पुलिस ने संजय सिंह सहित मदन सोनी और पवन जाट को गिरफ्तार कर लिया. इन में संजय सिंह सीकर जिले की श्रीमाधोपुर तहसील के जालपाली गांव का रहने वाला था. मदन सोनी हनुमानगढ़ टाउन में नाथावाली थेढ़ी वार्ड नंबर 8 और संजय जाट रावतसर के निरवाल का निवासी था. इन लोगों से पूछताछ में जो कहानी उभकर सामने आई, वह इस प्रकार है—

असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह ने कंपनी की इस शाखा में काफी घोटाला कर रखा था. उस ने फरजी आईडी से कंपनी की इस शाखा में खाते खोल कर सोने के जेवर गिरवी रखे बगैर ही दूसरे कई नामों से लोन उठा रखा था. यह घोटाला वह काफी दिनों से कर रहा था, लेकिन कंपनी को पता नहीं चल सका था. पिछले दिनों कंपनी ने संजय सिंह का तबादला गुजरात कर दिया था. तबादला होने के बावजूद संजय रिलीव नहीं हो रहा था. उसे डर था कि हनुमानगढ़ शाखा से रिलीव होने पर कंपनी का हिसाबकिताब देते समय उस का घोटाला सामने आ जाएगा. इस घोटाले को दबाने के लिए संजय ने मदन सोनी के साथ मिल कर अपनी ही शाखा में लूट की योजना बनाई. हनुमानगढ़ टाउन का रहने वाला मदन सोनी सोने का मूल्यांकन करता था.

संजय ने लूट के लिए बदमाशों का इंतजाम करने की जिम्मेदारी मदन सोनी को सौंप दी. मदन सोनी ने इस काम के लिए अपने परिचित डिप्टी उर्फ अनमोल मेघवाल से संपर्क किया.

डिप्टी उर्फ अनमोल हरियाणा के सिरसा जिले के बेहरवाला खुर्द ऐलनाबाद का रहने वाला था. मदन सोनी ने अनमोल को अपनी योजना बताई. इस पर अनमोल ने लूटे जाने वाले सोने में बराबर का हिस्सा लेने की बात कही. मदन ने इस पर हामी भर ली.

लूटे जाने वाले सोने के बंटवारे की बात तय हो जाने पर अनमोल ने इस काम के लिए अपने परिचित बदमाश तलवाड़ा के बेहरवाला कलां निवासी सोनू, रावतसर के निरवाल गांव निवासी पवन जाट और अपने ही गांव बेहरा वालां खुर्द के रहने वाले भीम को तैयार किया.

इन में सोनू के सोपू गैंग और पवन के बीकानेर की 007 गैंग से तार जुड़े हुए थे. ये दोनों इन अपराधी गिरोह के सक्रिय बदमाश थे. सोनू के खिलाफ हत्या का प्रयास के अलावा आर्म्स ऐक्ट के मुकदमे दर्ज थे.

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इन लोगों ने वारदात के लिए हनुमानगढ़ के संडे मार्केट से मोटरसाइकिल खरीदी. ऐलनाबाद और तलवाड़ा से हथियार जुटाए गए. अनमोल, पवन, सोनू और भीम 12 मार्च को हनुमानगढ़ आ गए. संजय सिंह और मदन सोनी ने इन बदमाशों के ठहरने के लिए पहले ही 2 अलगअलग होटलों का इंतजाम कर रखा था.

हनुमानगढ़ पहुंचने पर संजय सिंह और मदन सोनी ने लूट की अपनी पूरी योजना बता कर उन्हें सारी बातें समझा दीं. चारों बदमाशों ने मणप्पुरम गोल्ड लोन शाखा की 2 दिन तक बाहर से रैकी कर वारदात करने और भागने के रास्ते देख लिए.

अगले भाग में पढ़ें-  फुटेज के आधार पर पुलिस ने बदमाशों से पूछताछ की

Crime Story: 3 करोड़ के सोने की लूट- भाग 3

सौजन्य: मनोहर कहानियां

बाद में सभी ने मिल कर लूट की योजना को अंतिम रूप दिया. यह तय किया गया कि वारदात 15 मार्च को दोपहर एक से 2 बजे के बीच लंच टाइम में की जाएगी. लंच का समय इसलिए चुना गया क्योंकि इस दौरान आमतौर पर कोई ग्राहक नहीं होता.

योजना के अनुसार, पवन और सोनू शाखा में घुसे. सोनू ने 315 बोर की पिस्तौल और पवन ने एयरगन दिखा कर कर्मचारियों को डराया और गोली चलाने की धमकी दी. इस दौरान असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह ने बदमाशों के धमकाने पर लौकर में से सोने के जेवरों के पैकेट निकाल कर उन्हें दे दिए.

पवन और सोनू 4 मिनट में ही वारदात को अमलीजामा पहना कर बाहर निकल आए.

गोल्ड लोन शाखा के बाहर एक ट्रक की आड़ में भीम पहले से ही मोटरसाइकिल पर तैयार खड़ा था. भीम ही इन दोनों को होटल से मणप्पुरम गोल्ड लोन शाखा तक लाया था. वारदात के दौरान वह बाहर खड़ा था. इस दौरान वह पवन जाट से मोबाइल पर सीधे संपर्क में था. पवन ने हैडफोन लगा अपना मोबाइल चालू रख रखा था ताकि कोई खतरा होने पर बाहर खड़ा भीम उन को सचेत कर सके.

वारदात के बाद भीम के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर पवन और सोनू भाग लिए. हनुमानगढ़ से ये तीनों मसीतांवाली हैड होते हुए हरियाणा चले गए. बाद में मदन सोनी और डिप्टी उर्फ अनमोल ने इन तीनों से मिल कर लूटे गए जेवर और नकदी का बंटवारा कर लिया.

संजय सिंह को लौकर में रखे सारे जेवरों के बारे में पता था. उसे पता था कि लौकर में ऊपर की दराज में जेवरों के पैकेट जीपीएस ट्रैकर सिस्टम के साथ रखे हुए हैं और नीचे की दराज में रखे जेवरों के पैकट में जीपीएस ट्रैकर नहीं है. इसलिए उस ने चालाकी से बिना जीपीएस ट्रैकर वाले जेवरों के पैकेट नीचे की दराज से निकाल कर लुटेरों के हवाले कर दिए.

दरअसल, कंपनी ने लूट व चोरी की वारदातों को देखते हुए सुरक्षा के तौर पर लौकर में जेवरों के साथ जीपीएस ट्रैकर रखे हुए हैं. ये जीपीएस ट्रैकर ऊपर वाली दराज में जेवरों के पैकेट के बीच में ही रखे गए थे ताकि कोई वारदात होने पर जीपीएस ट्रैकर के जरिए अपराधी तक पहुंचा जा सके.

संजय सिंह की इसी कारस्तानी ने पुलिस अधिकारियों के दिमाग में संदेह पैदा किया और वह लुटेरों तक पहुंच गई.

वारदात के बाद पुलिस ने मणप्पुरम गोल्ड लोन शाखा के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज में नजर आए लुटेरों की तलाश में हनुमानगढ़ टाउन और जंक्शन के तमाम होटल, धर्मशालाओं के अलावा बसअड्डे और रेलवे स्टेशन पर जांचपड़ताल की. इन जगहों पर लगे कैमरों की फुटेज देखी.

इस जांचपड़ताल में हनुमानगढ़ जंक्शन स्थित कमल होटल और अमर होटल में वारदात से 3-4 दिन पहले रुके लोगों के फुटेज और वारदातस्थल की फुटेज में दिखे संदिग्ध लुटेरों से मिलान कर गए. इन संदिग्धों ने 15 मार्च को ही होटल से चैकआउट कर दिया था.

इन फुटेज के आधार पर पुलिस ने बदमाशों से पूछताछ कर सब से पहले पवन जाट को पकड़ा. पूछताछ में उस ने मदन सोनी और संजय सिंह का नाम लिया. संजय सिंह पहले से ही पुलिस के शक के दायरे में था. पुलिस ने इन दोनों को भी पकड़ कर पूछताछ की, तो लूट की सारी कहानी सामने आ गई. पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर लिया.

इन तीनों से पूछताछ के आधार पर दूसरे दिन 21 मार्च को पुलिस ने सोनू और डिप्टी उर्फ अनमोल मेघवाल को भी गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस की जांच में सामने आया कि असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह ने कंपनी की हनुमानगढ़ शाखा में 841 ग्राम सोने के लोन का घोटाला किया था. उस ने गोल्ड वैल्यूअर मदन सोनी, उस के भाई और दूसरे परिचितों के नाम से गोल्ड लोन के नाम से फरजी खाते खोल कर रुपए उठा लिए थे.

संजय ने फरजीवाड़ा कर कंपनी के कागजातों में इन लोगों से सोना जमा करना दिखाया था, जबकि सोना कंपनी में जमा नहीं हुआ था. कंपनी की औडिट होने पर वह सोने के जेवरों के पैकेट औनलाइन रिलीज कर अकाउंट होल्ड कर देता था.

औडिट टीम के जाने के बाद वह लोन के जेवर जमा बता कर पैसा रिलीज करना दिखा देता था. इस तरह कंपनी की औडिट में भी उस का फरजीवाड़ा पकड़ में नहीं आया था. तबादले के बाद रिलीव होने पर चार्ज देने के समय उस का घोटाला सामने आ सकता था, इसीलिए उस ने कंपनी में लूट की वारदात करवा कर नमकहरामी की.

बाद में पुलिस ने 21 साल के भीम उर्फ भीमसेन मेघवाल और 29 साल के सुभाष जाट को भी इस मामले में गिरफ्तार कर लिया. ये दोनों हरियाणा के बेहरवाला खुर्द ऐलनाबाद के रहने वाले थे. पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर 4 किलो 862 ग्राम सोने के आभूषण बरामद कर लिए.

इन में सोने की चूडि़यां, अंगूठी, बाजूबंद, हार, मंगलसूत्र व टौप्स आदि शामिल थे. बदमाशों ने सोने के इन जेवरों से करीब 350 ग्राम वजन के डोरे, चीड व स्टोन आदि ब्लेड से काट कर जला दिए थे.

कंपनी की मैनेजर ने लूटे गए जेवरों का कुल वजन 6 किलो 136.87 ग्राम बताया था. इस में से असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह की ओर से फरजीवाड़ा किया गया 841 ग्राम सोना केवल कागजों में ही था.

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यानी लूटे गए सोने के जेवरों का असल वजन 5 किलो 295.87 ग्राम था. इस में 4 किलो 862 ग्राम जेवर बरामद हो गए और 350 ग्राम वजनी नग वगैरह जला दिए गए. इस तरह लूटे गए लगभग 99 फीसदी जेवर बरामद हो गए.

बदमाशों से पुलिस ने एक लाख 390 रुपए नकद, वारदात में इस्तेमाल एक देसी कट्टा, एक एयरगन, 6 कारतूस और मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली. गिरफ्तार बदमाश भीम उर्फ भीमसेन वारदात के दौरान बाहर मोटरसाइकिल ले कर खड़ा था.

वारदात के बाद पवन और सोनू उसी के साथ बाइक पर भाग गए थे. बदमाशों ने लूटे गए सोने के जेवर और नकदी हरियाणा के बेहरवाला खुर्द गांव में सुभाष जाट के खेत में बने कमरे में 2 फुट गहरा गड्ढा खोद कर दबा दी थी. सुभाष जाट को लूट का माल अपने खेत में छिपाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया.   द्य

मां- भाग 2: आखिर मां तो मां ही होती है

‘‘इस में रह लोगे…पढ़ाई हो जाएगी?’’ मीना ने आश्चर्य से पूछा था.

‘‘हां, क्यों नहीं, लाइट तो होगी न…’’

वह लड़का अब अंदर आ गया था. गैराज देख कर वह उत्साहित था. कहने लगा, ‘‘यह मेज और कुरसी तो मेरे काम आ जाएगी और ये तख्त भी….’’

मीना समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे. लड़के ने जेब से कुछ नोट निकाले और कहने लगा, ‘‘आंटी, यह 500 रुपए तो आप रख लीजिए. मैं 800 रुपए से ज्यादा किराया आप को नहीं दे पाऊंगा. बाकी 300 रुपए मैं एकदो दिन में दे दूंगा. अब सामान ले आऊं?’’

500 रुपए हाथ में ले कर मीना अचंभित थी. चलो, एक किराएदार और सही. बाद में इस हिस्से को भी ठीक करा देगी तो इस का भी अच्छा किराया मिल जाएगा.

घंटे भर बाद ही वह एक रिकशे पर अपना सामान ले आया था. मीना ने देखा एक टिन का बक्सा, एक बड़ा सा पुराना बैग और एक पुरानी चादर की गठरी में कुछ सामान बंधा हुआ दिख रहा था.

‘‘ठीक है, सामान रख दो. अभी नौकरानी आती होगी तो मैं सफाई करवा दूंगी.’’

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‘‘आंटी, झाड़ू दे दीजिए. मैं खुद ही साफ कर लूंगा.’’

खैर, नौकरानी के आने के बाद थोड़ा फालतू सामान मीना ने बाहर निकलवा लिया और ढंग की मेजकुरसी उसे पढ़ाई के लिए दे दी. राघव ने भी अपना सामान जमा लिया था.

शाम को जब मीना ने दीपक से जिक्र किया तो उन्होंने हंस कर कहा था, ‘‘देखो, अधिक लालच मत करना. वैसे यह तुम्हारा क्षेत्र है तो मैं कुछ नहीं बोलूंगा.’’ मीना को यह लड़का निखिल और सुबोध से काफी अलग लगा था. रहता भी दोनों से अलगथलग ही था जबकि तीनों एक ही क्लास में पढ़ते थे.

उस दिन शाम को बिजली चली गई तो मीना बाहर बरामदे में आ गई थी. निखिल और सुबोध बैडमिंटन खेल रहे थे. अंधेरे की वजह से राघव भी बाहर आ गया था पर दोनों ने उसे अनदेखा कर दिया. वह दूर कोने में चुपचाप खड़ा था. फिर मीना ने ही आवाज दे कर उसे पास बुलाया.

‘‘तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? मन तो लग गया न?’’

‘‘मन तो आंटी लगाना ही है. मां ने इतनी जिद कर के पढ़ने भेजा है, खर्चा किया है…’’

‘‘अच्छा, और कौनकौन हैं घर में?’’

‘‘बस, मां ही हैं. पिताजी तो बचपन में ही नहीं रहे. मां ने ही सिलाईबुनाई कर के पढ़ाया. मैं तो चाह रहा था कि वहीं आगे की पढ़ाई कर लूं पर मां को पता नहीं किस ने इस शहर की आईआईटी क्लास की जानकारी दे दी थी और कह दिया कि तुम्हारा बेटा पढ़ने में होशियार है, उसे भेज दो. बस, मां को जिद सवार हो गई,’’ मां की याद में उस का स्वर भर्रा गया था.

‘‘अच्छा, चलो, अब मां का सपना पूरा करो,’’ मीना के मुंह से भी निकल ही गया था. सुबोध और निखिल भी थोड़े अचंभित थे कि वह राघव से क्या बात कर रही है.

एक दिन नौकरानी ने आ कर कहा, ‘‘दीदी, देखो न गैराज से धुआं सा निकल रहा है.’’

‘‘धुआं…’’ मीना घबरा गई और रसोई में गैस बंद कर के वह बाहर आई. हां, धुआं तो है पर राघव क्या अंदर नहीं है.

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मीना ने जा कर देखा तो वह एक स्टोव पर कुछ बना रहा था. कैरोसिन का बत्ती वाला स्टोव धुआं कर रहा था.

‘‘यह क्या कर रहे हो?’’

चौंक कर मीना को देखते हुए राघव बोला, ‘‘आंटी, खाना बना रहा हूं.’’

‘‘यहां तो सभी बच्चे टिफिन मंगाते हैं. तुम खाना बना रहे हो तो फिर पढ़ाई कब करोगे.’’

‘‘आंटी, अभी मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं. टिफिन महंगा पड़ता है तो सोचा कि एक समय खाना बना लूंगा. शाम को भी वही खा लूंगा. यह स्टोव भी अभी ले कर आया हूं,’’ राघव धीमे स्वर में बोला.

राघव की यह मजबूरी मीना को झकझोर गई. ‘‘देखो, तुम्हारी मां जब रुपए भेज दे तब किराया दे देना. अभी ये रुपए रखो और कल से टिफिन सिस्टम शुरू कर दो. समझे…’’

Serial Story: उल्टी पड़ी चाल- भाग 5

लेखक- एडवोकेट अमजद बेग

मैं ने तेज लहजे में कहा, ‘‘मैं हकीकत बयान कर रहा हूं काजी साहब. आप जिस मकान में रह रहे हैं, उस का असली मालिक कबीर वारसी है, जो बदकिसमती से आप जैसे धोखेबाज आदमी का रिश्ते में साला है. कबीर वारसी ने यह मकान अपनी बहन मकतूला रशीदा को रहने के लिए दिया था. फिर अचानक कबीर वारसी की मौत हो गई. क्या मैं गलत कह रहा हूं?’’

काजी के गुब्बारे की पूरी हवा निकल चुकी थी. मेरे सच ने उसे हिला कर रख दिया था. यह सब जानकारी मुझे अली मुराद की मेहनत से मिली थी. काजी की बदलती हुई हालत जज और सारे लोगों से छिपी नहीं रह सकी. उस ने संभलने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘कबीर वारसी, ने अपनी मौत से पहले मकान अपनी बहन यानी मेरी बीवी रशीदा के नाम कर दिया था.’’

‘‘और आप की कोशिश यह थी कि रशीदा अपनी मौत से पहले यह मकान आप के नाम कर दे. जब आप की बीवी ने आप की बात नहीं मानी, आप की सारी कोशिशें बेकार गई तो आप ने क्लाइंट को कुर्बानी का बकरा बना कर बीवी का पत्ता साफ कर दिया?’’

‘‘औब्जेक्शन योर औनर. वकील साहब मेरे क्लाइंट पर संगीन इलजाम लगा रहे हैं जो गलत है.’’

जज जो बहुत ही ध्यान से जिरह सुन रहा था, चौक उठा और मुझ से बोला, ‘‘बेग साहब, आप इस्तेगासा के ऐतराज पर क्या कहेंगे?’’

‘‘जनाबे आली, मैं आप को यकीन दिलाता हूं जो संगीन इलजाम मैं ने काजी वहीद पर लगाया है, मैं उसे अदालत में साबित कर के दिखाऊंगा.’’

जज ने ठहरे हुए लहजे में कहा, ‘‘जिरह जारी रखी जाए.’’

‘‘योर औनर, मैं इस केस के जांच अधिकारी से कुछ सवाल पूछना चाहता हूं.’’ जांच औफिसर को विटनेस बौक्स में बुलाया गया. मैं ने पूछा, ‘‘आईओ साहब, आप ने रिपोर्ट तो बहुत ऐहतियात से तैयार की होगी. मैं कुछ सवाल पूछूंगा, उस का जवाब आप हां या ना में देंगे. मकतूला रशीदा की मौत 15 अक्तूबर की रात 7 से 9 बजे के बीच हुई थी?’’

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‘‘जी हां.’’ आईओ ने जवाब दिया तो मैं ने पूछा, ‘‘उसे गला घोंट कर मारा गया था?’’

‘‘यस.’’

‘‘मकतूला की गरदन पर कातिल की उंगलियों के निशान नहीं मिले, जिस से यह सोचा गया कि कत्ल के वक्त कातिल ने दस्ताने पहन रखे थे?’’

‘‘यस.’’ आईओ का जवाब आया.

‘‘मकतूला की लाश की डाक्टरी जांच से पता चला कि जिस आदमी ने रशीदा का गला घोंटा था, उस ने अपने दाएं हाथ की 2 अंगुलियों में (रिंग फिंगर और मिडिल फिंगर में) हैवी अंगूठियां पहन रखी थीं. अंगुलियों के दबाव के साथ अंगूठियों के दबाव से बनने वाले निशानात मकतूला की गर्दन पर पाए गए थे?’’

‘‘जी हां.’’ आईओ ने कहा.

अंगूठियों के जिक्र पर काजी वहीद ने बेसाख्ता अपने हाथों की तरफ देखा. उस की यह हरकत मुझ से छिपी नहीं रह सकी. मैं ने जांच अधिकारी की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘आईओ साहब, कत्ल की रात लगभग 11 बजे जब आप ने मुल्जिम फुरकान को उस की ससुराल से गिरफ्तार किया तो क्या उस के दाएं हाथ की रिंग फिंगर और मिडिल फिंगर में आप को अंगूठियां नजर आई थीं.’’

‘‘नो.’’ आईओ ने झटके से कहा.

मैं ने एकदम काजी वहीद की तरफ मुंह कर के कहा, ‘‘काजी वहीद, तुम्हारी अंगूठियां कहां हैं?’’

‘‘म…म… मेरी अंगूठियां… मैं ने तो अंगूठियां नहीं पहनी थीं… आप किन अंगूठियों की बात कर रहे हैं?’’

‘‘वह अंगूठियां जो पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से पहले तुम्हारे दाएं हाथ की 2 अंगुलियों में मौजूद थीं और उस वक्त भी मौजूद थी, जब तुम ने अपने हाथों पर दस्ताने चढ़ा कर अपनी बीवी का गला घोंट कर उसे मौत के घाट उतारा था, जिन के निशान तुम्हारी अंगुलियों पर अभी भी मौजूद हैं.’’

काजी बौखला कर बोला, ‘‘आप झूठ बोल रहे हैं, बकवास कर रहे हैं.’’

‘‘काजी, मैं तुम्हारे जानने वालों में से 10 ऐसे लोगों को गवाही के लिए अदालत में ला सकता हूं जिन्होंने हादसे से पहले कई सालों से तुम्हारी अंगुलियों में चांदी की 2 हैवी अंगूठियां देखी हैं. जिन में से एक अंगूठी में 15 कैरेट का फिरोजा और दूसरी में यमन का अकीक जड़ा हुआ था.’’ मैं ने ड्रामाई अंदाज में अपनी बात खत्म की. और इसी के साथ काजी के हौसले के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी. ‘‘इन बैठे हुए गवाहों में ही 8-10 लोग अंगूठियों की गवाही देने को मिल जाएंगे.’’

इधर मेरी बात खत्म हुई, उधर काजी ने दोनों हाथों से सिर थाम लिया. यह मेरे इस हमले का नतीजा था जो मैं ने अंगूठियों के गवाहों के लिए कहा था. अगले ही पल वह धड़ाम से कटघरे के फर्श पर ढेर हो गया.

पिछली पेशी पर मेरे कड़े सवालात के नतीजे में काजी वहीद के गिरने ने उस का जुर्म साबित कर दिया. अदालत के हुक्म पर जब उसे पुलिस के हवाले किया गया तो उस ने इकबाले जुर्म कर लिया.

काजी की बीवी रशीदा बहुत अच्छी औरत थी. वह फुरकान को बेटा ही समझती थी. जब काजी ने फुरकान के साथ एक लाख का फ्रौड किया तो वह सख्त गुस्सा हुई. उस ने काजी को धमकी दी थी कि अगर उस ने फुरकान की रकम वापस नहीं की तो वह उस के खिलाफ फुरकान के हक में गवाह बन जाएगी.

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काजी पहले से ही अपनी बीवी की बीमारी से बहुत तंग था और उसे ठिकाने लगाने की तरकीबे सोच रहा था. ताकि मकान पर उस का अकेले कब्जा हो जाए. रशीदा काजी की नीयत को समझ गई थी. वह अपनी जिंदगी  में किसी भी कीमत पर मकान काजी के नाम करने को राजी नहीं हुई तो काजी ने फुरकान को फंसा कर एक तीर से 2 शिकार करने का मंसूबा बना डाला.

काजी ने 15 अक्तूबर की शाम फुरकान को अपने घर बुलाया ताकि हादसे के दिन उस का वहां आना पक्का हो जाए. वह फुरकान के आने से पहले ही अपनी बीवी को गला घोंट कर मार चुका था और खुद घर के अंदर छिपा बैठा था. उस ने घर को अंदर से लौक कर दिया था ताकि फुरकान यह समझे कि घर के अंदर कोई नहीं है और वह मायूस हो कर वापस लौट जाए.

यह बताने की जरूरत नहीं है कि काजी के इकरारे जुर्म के बाद अदालत ने मेरे क्लाइंट फुरकान को बाइज्जत बरी कर दिया. साथ ही उसे एक लाख देने का भी हुक्म दिया. काजी वहीद ने एक टेढ़ी चाल चली थी, पर वह बुरे अंजाम से बच नहीं सका.

प्रस्तुति : शकीला एस. हुसैन    

Mother’s Day Special: आंचल भर दूध

आखिर क्या गलती थी नसरीन की, यही कि वह 3 बेटियां पैदा कर चुकी थी? मगर एक दिन जब एक और पैदा हुई फूल सी बच्ची चल बसी तो घर के लोग गम नहीं, उसे एक परंपरा निभाने को मजबूर कर रहे थे…

बाहर चबूतरे पर इक्कादुक्का लोग इधरउधर बैठे हैं. सब के सब लगभग शांत. कभीकभार हांहूं… कर लेते. कुछ बच्चे भी हैं, कुछ न कुछ खेलने का प्रयास करते हुए….और इन्हीं बच्चों में नसरीन की 3 बेटियां भी हैं.

सुबह से बासी मुंह… न मुंह धुला है, न हाथ. इधरउधर देख रही हैं. किसी ने तरस खा कर बिस्कुट के पैकेट थमा दिए. ये नन्हीं जान सुखदुख से अनजान हैं. इन्हें क्या पता कि क्या हुआ है?

घर के अंदर नसरीन को समझाया जा रहा है कि वह दूध बख्श दे, पर उस से दूध नहीं बख्शा जाता. ऐसा लगता है जैसे उस की जबान तालू से चिपक गई है या उस के होंठ परस्पर सिल गए हैं. वह बिलकुल बुत बनी बैठी है.

उस के सामने उस की नवजात बच्ची मृत पड़ी है और उस की गोद में 1 और बच्चा है, उस के स्तन से सटा हुआ. ये दोनों बच्चे जुड़वां पैदा हुए थे. इन में से यह गोद वाला बच्चा, जो जीवित है, अपनी मृत बहन से 5 मिनट बड़ा है.

सुबह से ही औरतों का तांता लगा हुआ है. जो भी औरत देखने आती है वह नसरीन को समझाती है कि वह दूध बख्श दे, पर उस की समझ में नहीं आता कि वह दूध बख्शे भी तो कैसे?

उस की सास उसे समझातेसमझाते हार गई हैं. मोहल्ले भर की मुंहबोली खाला हमीदा भी मौजूद हैं. हमीदा खाला का रोज का मामूल यानी दिनचर्या है, सुबह उठ कर सब के चूल्हे झांकना. यह पता लगाना कि किस के यहां क्या बन रहा है, क्या नहीं. किस के यहां सासबहू में बनती है, किस के यहां आपस में तनातनी रहती है. किस के लड़केलड़की की शादी तय हो गई है, किस की टूट गई है. किस की लड़की का चक्कर किस लड़के से है… वगैरहवगैरह…

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बाल की खाल निकालने में माहिर हमीदा खाला ऐसे शोक के अवसर पर भी बाज नहीं आतीं, अपना भरसक प्रयास करती हैं. जानना चाहती हैं कि मामला क्या है और नसरीन दूध क्यों नहीं बख्श रही?

वह नसरीन को समझाती हुई कहती हैं, ‘‘बहू, आखिर तुम्हें दिक्कत क्या है? तुम क्या सोच रही हो? दूध क्यों नहीं बख्श रही हो?”

हमीदा खाला थोड़ी देर शांत रहीं, फिर नसरीन की सास से बोलीं, ‘‘2 दिन पहले कितनी खुशी थी. सब के चेहरे कितने खिलेखिले थे…और आज…सब कुदरत की मरजी…वही जिंदगी देता है, वही मौत… बेचारी की जिंदगी इतनी ही थी…

नसरीन की सास चुपचाप बैठी रहीं. ना हूं किया, ना हां.

हमीदा खाला फिर से नसरीन की तरफ मुड़ीं,”क्यों रूठी हो बहू? यह कोई रूठने का वक्त है…देखो, तुम्हारे ससुर खफा हो रहे हैं… बाहर आदमी लोग इंतजार में बैठे हैं… बच्ची को कफन दिया जा चुका है और तुम झमेला फैलाए बैठी हुई हो?

दूसरी औरतें भी हमीदाखाला की हां में हां मिलाती हैं और नसरीन को दूध बख्शने की नसीहत देती हैं.

कहती हैं,”सिर्फ 3 मरतबा कह दे, ‘मैं ने दूख बख्शा, मैं ने दूख बख्शा, मैं ने दूख बख्शा…'”

पर वह टस से मस नहीं होती. बस एकटक अपनी मृत बच्ची को देखे जा रही है. ऐसा लगता है कि उसे कुछ भी सुनाई नहीं पड़ रहा है.

नहीं, उसे सबकुछ सुनाई पड़ रहा है और दिखाई भी…

शोरशराबा, धूमधाम… उस की सास खुशी से फूले नहीं समा रही हैं. ससुर पोते का मुंह देख कर खुश हैं और अख्तर, उस का तो हाल ही मत पूछो, वह शादी के बाद संभवतया  पहली बार इतना खुश हुआ है.

इस से पहले के अवसरों पर नसरीन के कोई करीब नहीं जाता था. अजी, उसे तो छोड़ ही दो, पैदा होने वाली बच्ची की भी तरफ कोई रुख नहीं करता था. न सास, न ससुर और न ही नन्दें.

अख्तर का व्यवहार तो बहुत ही बुरा होता था. वह कईकई हफ्ते नसरीन से बोलता नहीं था और जब बोलता तो बहुत बदतमीजी से. ऐसा लगता जैसे लड़की के पैदा होने में सारा दोष नसरीन की ही है.

पर इस बार अख्तर बहुत मेहरबान है. वह नसरीन पर सबकुछ लुटाने को तैयार है. मगर वह करे भी तो क्या? उस की जेब खाली है. इन दिनों उस का काम नहीं चल रहा है. बरसात का मौसम जो ठहरा.

इस मौसम में सिलाई का काम कहां चलता है? वैसे तो वह दिल्ली चला जाता था, पर अब रजिया उसे दिल्ली जाने कहां देती है…

रजिया से बहुत प्यार करता है वह और रजिया भी उसे. अख्तर के लिए ही रजिया अपनी ससुराल नहीं जाती. उस का शौहर उसे लेने कई बार आया था, पर उस ने उस की सूरत तक देखना गंवारा नहीं किया.

रजिया का एक बेटा भी है, उसी शौहर से. बहुत खूबसूरत. 8 बरस का. अख्तर को पापा कहता है. उस के पापा कहने पर नसरीन के कलेजे पर मानों सांप लोट जाता है और जब वह रजिया से कहती है कि वह समीर को मना करे कि वह अख्तर को पापा न कहे, तो रजिया नसरीन के घर घुस कर उस की पिटाई कर देती है और रहीसही कसर अख्तर पूरी कर देता है.

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लातघूसों के साथ गंदीगंदी गालियां देता है. तर्क देता है कि खुद बेटा पैदा नहीं कर सकतीं, ऊपर से किसी का बेटा मुझे पापा या अंकल कहे, तो उसे बुरा लगता है.

नसरीन कह सकती है, पर वह नहीं कहती कि रजिया का ही लड़का तुम्हें पापा क्यों कहता है?

मोहल्ले में और भी तो लड़के हैं. वह नहीं कहते पर जबानदराजी करे, तो क्या और पिटे? इसलिए वह बरदाश्त करती है. बरदाश्त करने के अतिरिक्त कोई और चारा भी तो नहीं है. उस के एक के बाद एक बेटी जो पैदा होती गई…

सास और नन्दों के ही नहीं, बल्कि सासससुर और शौहर के ताने सुनसुन कर वह अधमरी सी हो गई. अब तो सूख कर कांटा हो गई है वह. कहां उस का चेहरा फूल सा खिलाखिला रहता था और अब तो मुरझाया सा, बेरौनकबेनूर…

और इस बार बेटा पैदा हुआ भी, तो अकेला नहीं, अपने साथ अपनी एक और बहन को लेता आया. क्या उसे बहनों की कमी थी?

अरे, पैदा होना है, तो वहां हो, जहां रूपएपैसों की कोई कमी नहीं है. हम जैसे फटीचरों के यहां पैदा होने से क्या लाभ? लेकिन तुम को इस से क्या? तुमलोग तो बिना टिकट, बिना पास भागती चली आती हो.

अब देखो ना, एक बच्चे का बोझ उठाना कितना कठिन है. ऊपर से तुम भी…अरे, तुम्हारी क्या जरूरत थी? तुम क्यों चली आईं? किसी ऊंची बिल्डिंग में जा गिरतीं. पर वहां तुम कैसे पहुंच पातीं? वहां तो सारे काम देखभाल कर होते हैं. जांचपरख कर होते हैं…..और हम जैसे गरीबों के यहां तो बस अंधाधुंध, ताबड़तोड़…

अब तुम आई भी थीं, तो अपने साथ रूपयापैसा भी लेती आतीं. भला यह कहां हो सकता था. ऊपर से और कमी हो गई. इस बार मेरे पास आंचलभर दूध भी तो नहीं है. हो भी कैसे? मन भी बहुत खुश रहता है. ऊपर से भरपेट भोजन जो मिलता है…अरे, यह तुम्हारा भाई, कुछ न कुछ कर के अपना पेट पाल ही लेगा. लड़का है, कुछ भी न करे, तो भी खानदान की नस्ल तो बढ़ाएगा ही और तुम…

“बहू…”

हमीदा खाला की आवाज से नसरीन का ध्यान भग्न हुआ,”बहू, क्यों देर करती हो….क्यों जिद खाए बैठी हो? कोई बात हो तो बताओ… आखिर तुम्हें दूध बख्शने में कैसी शर्म… कुछ बोलो भी, क्या बात है? किसी से नाराज हो? किसी ने कुछ कहा है? क्या अख्तर मियां ने…?”

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नसरीन की सास को गुस्सा आ गया, बोलीं, ‘‘क्यों समझाती हो खाला? यह बहुत ढीठ है… कभी किसी की कोई बात मानी भी है, जो आज मानेगी। हमेशा अपने मन की करे है…मन हो, तो बोलेगी….ना हो, तो ना…’’

हमीदा खाला बोल पड़ीं, ‘‘अरे, ऐसी भी मनमानी किस काम की? बच्ची मरी पड़ी है और यह है कि फूली बैठी है।”

तभी अम्मां की आवाज सुन कर अख्तर अंदर आया और बड़े तैश में बोला, ‘‘क्या नौटंकी फैलाए बैठी हो?क्यों सब को परेशान करे है? दूध क्यों नहीं बख्शती?’’

अख्तर की दहाड़ का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा,”नसरीन बोल पड़ी, ‘‘हम इसे दूध पिलाए हों, तो बख्शें.’’

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सौजन्य: मनोहर कहानियां

पारसी व्यवसाई जमशेदजी नौशरवानजी टाटा द्वारा बसाया गया झारखंड का जमशेदपुर भारत के सब से प्रगतिशील औद्योगिक नगरों में एक है. इस शहर की बुनियाद सन 1907 में टाटा आयरन ऐंड स्टील कंपनी (टिस्को) की स्थापना से पड़ी.

जमशेदपुर को टाटानगर भी कहते हैं. इस शहर में टिस्को के अलावा टेल्को, टायो, उषा मार्टिन, जेम्को, टेल्कान, बीओसी सहित आधुनिक स्टील ऐंड पावर के कई उद्योग और देश की नामी इकाइयां हैं.

दीपक कुमार अपने परिवार के साथ इसी जमशेदपुर शहर में कदमा थाना इलाके में तीस्ता रोड पर क्वार्टर नंबर एन-97 में रहता था. परिवार में कुल 4 लोग थे. दीपक, उस की पत्नी वीणा और 2 बेटियां. बड़ी बेटी श्रावणी 15 साल की थी और छोटी बेटी दिव्या 10 साल की. दीपक खुद करीब 40 साल का था और उस की पत्नी वीणा 36 साल की.

मूलरूप से बिहार के खगडि़या जिले का रहने वाला दीपक टाटा स्टील कंपनी में फायर ब्रिगेड कर्मचारी था. पिछले कुछ सालों से नौकरी के सिलसिले में वह जमशेदपुर में रहता था, वेतन ठीकठाक था. साइड बिजनैस के रूप में वह ट्रांसपोर्ट का काम भी करता था. इसलिए घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी. लेकिन दोस्तों के धोखा देने और लौकडाउन में ट्रांसपोर्ट से आमदनी घटने से वह आर्थिक संकट में आ गया था.

इसी 12 अप्रैल की बात है. दीपक ने अपने दोस्त रोशन और उस की पत्नी आराध्या को लंच पर घर बुलाया. सुबह करीब साढ़े 9 बजे जब दीपक का फोन आया था, तब रोशन ने तबीयत ठीक न होने की बात कह कर मना कर दिया था, लेकिन दीपक के काफी इसरार करने पर रोशन ने कह दिया कि तबीयत ठीक रही, तो वह दोपहर बारह-एक बजे तक आने या नहीं आने के बारे में बता देगा.

रोशन और उस की बीवी आराध्या से दीपक के पारिवारिक संबंध थे. दरअसल, रोशन आराध्या से प्यार करता था, लेकिन दोनों के घर वाले इस रिश्ते के लिए राजी नहीं थे. तब दीपक ने दोनों परिवारों को रजामंद कर के रोशन और आराध्या की शादी कराई थी.

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दीपक का छत्तीसगढ़ में ट्रांसपोर्ट का काम था. वहां रोशन का भी ट्रक चलता था. आराध्या दीपक को मामा कहती थी. रोशन और आराध्या कुछ महीने पहले ही जमशेदपुर में शिफ्ट हुए थे.

आराध्या या रोशन का फोन नहीं आया, तो दीपक ने दोपहर करीब एक बजे पत्नी वीणा के मोबाइल से आराध्या को फोन कर लंच पर जरूर आने का आग्रह किया. आराध्या मना नहीं कर सकी. उस ने कहा, ‘‘ठीक है. हम जरूर आएंगे.’’

दोपहर करीब ढाई बजे रोशन अपनी पत्नी आराध्या और एक साल की बेटी के साथ कार से कदमा में दीपक के घर पहुंचे. उन के साथ रोशन का साला अंकित भी था. अंकित दिल्ली रहता था. वह बहनबहनोई से मिलने जमशेदपुर आया था. रोशन और आराध्या दीपक के घर लंच पर जा रहे थे, अंकित घर में अकेला बोर होगा. सोच कर वे उसे भी अपने साथ लेते गए.

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घर पहुंचने पर दीपक ने गेट खोला. उस ने रोशन और उस की बीवी का गर्मजोशी से स्वागत किया. उन के साथ तीसरे युवक को देख कर दीपक ने रोशन की तरफ सवालिया नजरों से देखा. उस की नजरों को भांप कर रोशन ने हंसते हुए कहा, ‘‘यार, ये मेरा साला और मेरी बेगम साहिबा का भाई है. नाम है अंकित. दिल्ली से आया है.’’

रोशन, उस की बीवी और अंकित को ड्राइमरूम में सोफे  पर बैठने का इशारा करते हुए दीपक ने कहा, ‘‘आप लोग बैठो, मैं फ्रिज से ठंडा पानी ले कर आता हूं.’’

दीपक पानी लाने के लिए जाने लगा, तो आराध्या चौंक कर बोली, ‘‘मामा, आप पानी क्यों ला रहे हो? वीणा मामी को कह दो, वह ले आएंगी.’’

‘‘अरे यार, मैं तुम्हें बताना भूल गया. वीणा कुछ देर पहले मेरे भाई के घर रांची चली गई. साथ में दोनों बच्चों को भी ले गई,’’ दीपक ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘घर में अकेला मैं ही हूं. मुझे ही आप लोगों की आवभगत करनी पड़ेगी.’’

‘‘मामा, हमें शर्मिंदा मत कीजिए. आप ने हमें बेकार ही लंच पर बुलाया,’’ आराध्या ने नाराजगी भरे स्वर में कहा, ‘‘मामीजी घर पर नहीं हैं, तो हम लंच के लिए फिर कभी आ जाएंगे.’’

दीपक ने आराध्या को भरोसा दिलाते हुए कहा, ‘‘आप को लंच पर बुलाया है, तो बाजार से खाना ले आएंगे.’’

दीपक की इस बात पर आराध्या ने पति रोशन की ओर देखा. रोशन क्या कहता, उस ने फ्रिज से पानी लेने जा रहे दीपक को सोफे पर ही बैठा लिया और बातें करने लगे. घरपरिवार और बच्चों की बातें करते हुए वे ठहाके भी लगाते जा रहे थे.

उन्हें बातें करते हुए 5-7 मिनट ही हुए थे कि आराध्या की बेटी ने पौटी कर दी. आराध्या बेटी को गोद में ले कर बाथरूम में चली गई. बाथरूम में उस ने बच्ची को साफ किया. पीछेपीछे रोशन भी बीवी की मदद के लिए बाथरूम में आ गया और उस ने बेटी का नैपकिन धोया.

बाथरूम से ड्राइंगरूम में आते समय उन्हें चिल्लाने की आवाज सुनाई दी. वे तेज कदमों से ड्राइंगरूम में पहुंचे, तो दीपक हथौड़े से अंकित पर हमला कर रहा था.

रोशन कुछ समझ नहीं पाया कि अचानक ऐसी क्या बात हो गई, जो दीपक अंकित को मार रहा है. वह दीपक से पूछते हुएअंकित को बचाने लगा, तो दीपक ने उस की बच्ची को अपनी ओर खींचते हुए मारने की कोशिश की. रोशन बचाने लगा, तो दीपक ने उस पर भी हथौड़े से हमला कर दिया. इस से रोशन को भी चोटें लगीं.

किसी तरह रोशन ने अपनी बेटी, पत्नी और साले को बचा कर वहां से बाहर निकाला. अंकित के सिर से खून बह रहा था. उस के सिर पर रुमाल बांध कर खून रोकने की कोशिश की गई. फिर वे कार से सीधे टाटा मैमोरियल हौस्पिटल पहुंचे. अंकित का तुरंत इलाज जरूरी था. उसे हौस्पिटल में भरती कराया गया. रोशन को भी डाक्टरों ने भरती कर लिया.

बाद में रोशन ने दीपक के साले विनोद को फोन कर पूरी बात बताई. विनोद को दाल में कुछ काला नजर आया. उस ने यह बात अपने छोटे भाई आनंद साहू को बताईं. दीपक की ससुराल जमशेदपुर के ही शास्त्रीनगर में थी.

शाम करीब 4 बजे विनोद और उस के घर वाले दीपक के क्वार्टर पर पहुंचे. वहां गेट पर ताला लगा हुआ था, लेकिन अंदर एसी चल रहा था. विनोद और उस के घर वाले सोचविचार कर ही रहे थे कि इसी दौरान रिंकी को ढूंढते हुए उस की मां नीलिमा और मंझली बहन बिपाशा भी वहां पहुंच गईं.

उन्होंने बताया कि रिंकी दीपक के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने आती थी. वह सुबह 11 बजे घर से निकली थी और अभी तक घर नहीं पहुंची. रोजाना वह दोपहर एक बजे घर वापस आ जाती थी. बहनों की औनलाइन क्लास होने के कारण रिंकी उस दिन मोबाइल नहीं ले गई थी.

जब रोजाना के समय पर रिंकी वापस घर नहीं पहुंची, तो घर वालों ने दीपक को फोन किया. दीपक ने कहा कि वह ट्यूशन पढ़ा कर जा चुकी है. इस के बाद भी दोपहर 3 बजे तक जब रिंकी घर नहीं पहुंची, तो नीलिमा और बिपाशा दीपक के क्वार्टर पर पहुंची थीं.

चिंता में मांबेटी वहां से कदमा थाने पहुंचीं और पुलिस को पूरी बात बताई.

पुलिस ने कोई घटना दुर्घटना होने की आशंका जताते हुए एक बार हौस्पिटल में देख आने की सलाह दी. वे टीएमएच गईं, लेकिन वहां कुछ पता नहीं चला, तो थकहार कर दोनों दोबारा दीपक के क्वार्टर पर आईं. यहां उन्हें विनोद और उस के घर वाले मिले.

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विनोद ने रिंकी की मांबहन के साथ सोचविचार कर दीपक के क्वार्टर के दरवाजे पर लगा ताला तोड़ दिया. विनोद अंदर कमरे में गया और चिल्लाते हुए बाहर निकल आया. उस ने बताया कि वीणा और दोनों बेटियां मरी पड़ी हैं.

यह सुन कर विनोद के साथ दूसरे लोग कमरे में गए. उन्होंने वीणा और दोनों बच्चियों को हिलायाडुलाया, लेकिन कोई हलचल नहीं हुई. उन की नब्ज भी ठंडी पड़ चुकी थी. वीणा और उस की दोनों बेटियों की लाश देख कर विनोद और उस के घर वाले रोने लगे.

दीपक की पत्नी और बेटियों की लाश देख कर रिंकी की मां और बहन को शक हुआ. खोजबीन में रिंकी की एक चप्पल बाहर पड़ी मिल गई. इस से संदेह और बढ़ गया. वे घर में रिंकी को तलाशने लगीं. उस की स्कूटी तो बालकनी में खड़ी मिली, लेकिन रिंकी नहीं मिली.

मंझली बेटी बिपाशा मां को दिलासा देते हुए अलगअलग कमरों में बड़ी चीजें हटा कर देखने लगी. उस ने एक कमरे में पलंग का बौक्स खोला, तो उस में रिंकी की लाश पड़ी थी. उस के हाथ बंधे हुए और कपड़े अस्तव्यस्त थे. रिंकी की लाश देख कर नीलिमा और बिपाशा रोने लगीं.

अगले भाग में पढ़ें- चारों हुईं हथौड़े का शिकार

Crime Story: पाताल लोक का हथौड़ेबाज- भाग 3

सौजन्य: मनोहर कहानियां

पहले दीपक परसुडीह थाना इलाके के गांव सोपोडेरा में मातापिता के साथ रहता था. वहां उन का आलीशान पैतृक मकान था. प्रभु उस का जिगरी दोस्त था साल 2004 में दीपक की शादी वीणा से हो गई. बाद में 2012 में दीपक की टाटा स्टील में फायरमैन के पद पर नौकरी लग गई. इस के बाद वह जमशेदपुर के कदमा इलाके में रहने लगा.

परिवार बढ़ने के साथ जिम्मेदारियां और खर्च भी बढ़ गए थे. एक दिन दीपक ने दोस्त प्रभु से कोई साइड बिजनेस कराने की बात कही. इस पर प्रभु ने उसे ट्रांसपोर्ट का काम करने की सलाह दी. प्रभु ने उसे काम तो बता दिया लेकिन इतना पैसा दीपक के पास नहीं था. इस पर प्रभु ने उस से कहा कि वह सोपोडेरा का अपना पुश्तैनी मकान बेच दे और उस का पैसा ट्रांसपोर्ट में लगा दे, तो अच्छी आमदनी होगी. दीपक को यह बात जंच गई.

दोस्तों ने ही दिया धोखा

उस ने अपना मकान 40 लाख रुपए में बेच दिया. इस में से 20 लाख रुपए उस ने अपने भाई मृत्युंजय को दे दिए. बाकी के 20 लाख रुपए दीपक के पास रहे. करीब दो साल पहले प्रभु ने उसे 17 लाख रुपए में एक हाइवा (मालवाहक ट्रक) और एक बुलेट दिलवा दी. यह हाइवा उस ने प्रभु के मार्फत जोजोबेड़ा में चलवा दिया.

इस से उसे अच्छी आमदनी होने लगी. पिछले साल कोरोना के कारण लौकडाउन हो जाने से उस की आमदनी कम हो गई. इस बीच, दीपक को पता चला कि प्रभु ने जो ट्रक दिलवाया था, उस पर 5 लाख रुपए रोड टैक्स बकाया है.

परिवहन विभाग का नोटिस आने पर उस ने कर्ज ले कर टैक्स जमा कराया. इस के लिए उस ने टिस्का कोआपरेटिव सोसायटी से साढ़े चार लाख रुपए और अपने पीएफ अकाउंट से डेढ़ लाख रुपए का कर्ज लिया.

दीपक की तनख्वाह 34 हजार रुपए महीना थी. सोसायटी से कर्ज लेने के बाद उसे केवल 8 हजार रुपए ही मिलने लगे. ट्रक से भी आमदनी कम हो गई थी. करीब छह महीने पहले प्रभु ने बताया कि उस का भांजा रोशन खुद का और उस का ट्रक पश्चिम बंगाल में खड़गपुर की एक स्टील कंपनी में चलवा रहा है. रोशन पहले से ही उस का दोस्त था.

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उस की शादी भी उस ने ही कराई थी. कमाई की उम्मीद में दीपक ने भरोसा कर बिना किसी लिखापढ़ी के अपना ट्रक रोशन को सौंप दिया. रोशन ने दीपक का ट्रक तो कंपनी में लगवा दिया, लेकिन उसे कमाई का हिस्सा नहीं दिया. इस बीच, दीपक लगातार कर्जदार होता गया.

दीपक अपनी इस बर्बादी के लिए प्रभु और रोशन को जिम्मेदार मानता था. उस ने उन से बदला लेने की योजना बनाई. दीपक अपने मोबाइल पर वेबसीरीज देखा करता था. पाताल लोक और असुर वेबसीरीज देख कर उस ने उन की हत्या करने का मन बनाया. वह एक वेबसीरीज पाताललोक के कैरेक्टर हथौड़ा त्यागी से काफी प्रभावित था.

इसीलिए उस ने हथौड़े से हत्या करने का फैसला किया. उस ने दोनों दोस्तों को मारने की तो योजना बना ली लेकिन इस बात से परेशान था कि वह पकड़ा गया और जेल चला गया, तो बीवीबच्चों का क्या होगा? काफी सोचविचार के बाद उस ने अपने परिवार को भी खत्म करने का निर्णय लिया.

12 अप्रैल को दीपक सुबह जल्दी उठ गया. देखा कि पत्नी वीणा पानी भर रही थी. वह बिस्तर पर ही बेचैनी से इधरउधर करवटें बदलता रहा. पानी भरने और छोटेमोटे घरेलू काम निपटाने के बाद सुबह करीब 8 बजे वीणा फिर बैड पर लेट गई. दीपक ने उसी दिन अपने परिवार और दोनों दोस्तों का काम तमाम करने का आखिरी फैसला कर लिया.

दीपक ने पहले से ही बैड के पास छिपा कर रखा हथौड़ा निकाला और वीणा के सिर में पीछे से वार कर दिया. वीणा चीखती, इस से पहले ही उस ने तकिए से उस का गला दबा दिया. वीणा की मौत हो गई.

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इस के बाद दीपक दूसरे कमरे में गया. वहां बैड पर दोनों बेटियां सो रही थीं. दीपक ने एक नजर उन्हें देखा. फिर बेरहमी से पहले बड़ी बेटी के सिर में हथौड़ी से वार कर के उसे मौत के घाट उतारा. फिर इसी तरह छोटी बेटी को भी मौत की नींद सुला दिया.

पत्नी और दोनों बेटियों की हत्या के बाद उस ने रोशन को लंच पर आने के लिए फोन किया. इस के बाद दूसरे दोस्त प्रभु को फोन कर शाम 4 बजे जोजोबेड़ा में मिलने की बात कही. दोनों दोस्तों से बात करने के बाद वह नहाधो कर ससुराल गया और अपने जेवर ले कर ज्वैलर्स के पास पहुंचा. जेवर बेच कर वह वापस घर आया.

कुछ देर बाद ही रिंकी घोष उस के बच्चों को पढ़ाने आ गई. रिंकी ने वीणा और बच्चों की लाशें देख लीं, तो दीपक को भेद खुलने का डर हुआ. उस ने उस के भी सिर पर हथौड़ी से हमला कर उसे मार डाला. इस के बाद उस ने उस की लाश से दुष्कर्म किया और शव पलंग के बौक्स में छिपा दिया.

रोशन की हत्या की योजना फेल हो जाने पर वह डर गया था. इसलिए अपने क्वार्टर पर ताला लगा कर बुलेट से भाग निकला. उस की प्रभु को मारने की योजना भी अधूरी रह गई.

जल्लाद बने दीपक की सनक में ट्यूशन टीचर रिंकी बेमौत मारी गई. वह जमशेदपुर में कदमा रामजनम नगर की रहने वाली नीलिमा घोष की 3 बेटियों में सब से बड़ी थी और जमशेदपुर वीमंस कालेज में बीए अंतिम वर्ष की छात्रा थी. मंझली बेटी बिपाशा केरला पब्लिक स्कूल में 10वीं और छोटी बेटी विशाखा 5वीं कक्षा में पढ़ती थी. दीपक की बड़ी बेटी श्रावणी बिपाशा की क्लासमेट थी. श्रावणी के कहने पर ही रिंकी 2 साल से दीपक के घर ट्यूशन पढ़ाने जाती थी.

दीपक का भाई मृत्युंजय रांची में एसबीआई में ब्रांच मैनेजर था. बाद में वह एक निजी फाइनैंस कंपनी में क्रेडिट इंचार्ज के पद पर काम करने लगा था.

मृत्युंजय अब जमशेदपुर आना चाहता था. इस के लिए उस ने दीपक से कहा भी था. दीपक ने अपने ससुराल वालों को भी यह बात बताई थी.

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इस घटना से कुछ दिन पहले ही दीपक अपने परिवार के साथ पुरी घूम कर आया था. 11 अप्रैल की रात भी वह परिवार के साथ एक पार्टी में गया था और 10 बजे के बाद लौटा था.

दीपक ने अपना परिवार उजाड़ दिया और रिंकी के परिवार की खुशियां छीन लीं. कानून उसे उस के किए की सजा देगा, लेकिन उस के ससुराल वाले और रिंकी के परिवार वाले जीवन भर इस दुख को नहीं भुला पाएंगे. दीपक ने पकड़े जाने पर पुलिस को बताया था कि उस का आत्महत्या करने का प्लान था. इसलिए जेल में अब उस पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है.

Mother’s Day Special: मां का फैसला- भाग 3

मैं ने उसे आश्वस्त किया कि कुछ लड़के अपना प्रभाव जमाने के लिए बेबाक हरकत करते हैं. फिर शादी वगैरह में तो दूल्हे के मित्र और दुलहन की सहेलियों की नोकझोंक चलती ही रहती है. परंतु 2 दिनों बाद ही प्रभाकर हमारे घर आ गया. उस ने मुझ से भी बातें कीं और बिट्टी से भी. मैं ने लक्ष्य किया कि बिट्टी उस से कम समय में ही खुल गई है.

फिर तो प्रभाकर अकसर ही मेरे सामने ही आता और मुझ से तथा बिट्टी से बतिया कर चला जाता. बिट्टी के कालेज के और मित्र भी आते थे. इस कारण प्रभाकर का आना भी मुझे बुरा नहीं लगा. जिस दिन बिट्टी उस के साथ शीतल पेय या कौफी पी कर आती, मुझे बता देती. एकाध बार वह अपने भाई को ले कर भी आया था. इस दौरान शायद बिट्टी सुरेश को कुछ भूल सी गई. सुरेश भी पढ़ाई में व्यस्त था. फिर प्रभाकर की भी परीक्षा आ गई और वह भी व्यस्त हो गया. बिट्टी अपनी पढ़ाई में लगी थी.

धीरेधीरे 2 वर्ष बीत गए. बिट्टी बीएड करने लगी. उस के विवाह का जिक्र मैं पति से कई बार चुकी थी. बिट्टी को भी मैं बता चुकी थी कि यदि उसे कोई लड़का पति के रूप में पसंद हो तो बता दे. फिर तो एक सप्ताह पूर्व की वह घटना घट गई, जब बिट्टी ने स्वीकारा कि उसे प्रेम है, पर किस से, वह निर्णय वह नहीं ले पा रही है.

सुरेश के परिवार से मैं खूब परिचित थी. प्रभाकर के पिता से भी मिलना जरूरी लगा. पति को जाने का अवसर जाने कब मिलता, इस कारण प्रभाकर को बताए बगैर मैं उस के पिता से मिलने चल दी.

बेहतर आधुनिक सुविधाओं से युक्त उन का मकान न छोटा था, न बहुत बड़ा. प्रभाकर के पिता का अच्छाखासा व्यापार था. पत्नी को गुजरे 5 वर्ष हो चुके थे. बेटी कोई थी नहीं, बेटों से उन्हें बहुत लगाव था. इसी कारण प्रभाकर को भी विश्वास था कि उस की पसंद को पिता कभी नापसंद नहीं करेंगे और हुआ भी वही. वे बोले, ‘मैं बिट्टी से मिल चुका हूं, प्यारी बच्ची है.’ इधरउधर की बातों के बीच ही उन्होंने संकेत में मुझे बता दिया कि प्रभाकर की पसंद से उन्हें इनकार नहीं है और प्रत्यक्षरूप से मैं ने भी जता दिया कि मैं बिट्टी की मां हूं और किस प्रयोजन से उन के पास आई हूं.

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‘‘कहां खोई हो, मां?’’ कमरे से बाहर निकलते हुए बिट्टी बोली. मैं चौंक पड़ी. रजनीगंधा की डालियों को पकड़े कब से मैं भावशून्य खड़ी थी. अतीत चलचित्र सा घूमता चला गया. कहानी पूरी नहीं हो पाई थी, अंत बाकी था.

जब घर में प्रभाकर और सुरेश ने एकसाथ प्रवेश किया तो यों प्रतीत हुआ, मानो दोनों एक ही डाली के फूल हों. दोनों ही सुंदर और होनहार थे और बिट्टी को चाहने वाले. प्रभाकर ने तो बिट्टी से विवाह की इच्छा भी प्रकट कर दी थी, परंतु सुरेश अंतर्मुखी व्यक्तित्व का होने के कारण उचित मौके की तलाश में था.

सुरेश ने झुक कर मेरे पांव छुए और बिट्टी को एक गुलाब का फूल पकड़ा कर उस का गाल थपथपा दिया. ‘‘आते समय बगीचे पर नजर पड़ गई, तोड़ लाया.’’

प्रभाकर ने मुझे नमस्ते किया और पूरे घर में नाचते हुए रसोई में प्रवेश कर गया. उस ने दोचार चीजें चखीं और फिर बिट्टी के पास आ कर बैठ गया. मैं भोजन की अंतिम तैयारी में लग गई और बिट्टी ने संगीत की एक मीठी धुन लगा दी. प्रभाकर के पांव बैठेबैठे ही थिरकने लगे. सुरेश बैठक में आते ही रैक के पास जा कर खड़ा हो गया और झुक कर पुस्तकों को देखने लगा. वह जब भी हमारे घर आता, किसी पत्रिका या पुस्तक को देखते ही उसे उठा लेता. वह संकोची स्वभाव का था, भूखा रह जाता. मगर कभी उस ने मुझ से कुछ मांग कर नहीं खाया था.

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मैं सोचने लगी, क्या सुरेश के साथ मेरी बेटी खुश रह सकेगी? वह भारतीय प्रशासनिक सेवा की प्रारंभिक परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुका है. संभवतया साक्षात्कार भी उत्तीर्ण कर लेगा, लेकिन प्रशासनिक अधिकारी बनने की गरिमा से युक्त सुरेश बिट्टी को कितना समय दे पाएगा? उस का ध्येय भी मेरे पति की तरह दिनरात अपनी उन्नति और भविष्य को सुखमय बनाने का है जबकि प्रभाकर का भविष्य बिलकुल स्पष्ट है. सुरेश की गंभीरता बिट्टी की चंचलता के साथ कहीं फिट नहीं बैठती. बिट्टी की बातबात में हंसनेचहकने की आदत है. यह बात कल को अगर सुरेश के व्यक्तित्व या गरिमा में खटकने लगी तो? प्रभाकर एक हंसमुख और मस्त युवक है. बिट्टी के लिए सिर्फ शब्दों से ही नहीं वह भाव से भी प्रेम दर्शाने वाला पति साबित होगा. बिट्टी की आंखों में प्रभाकर के लिए जो चमक है, वही उस का प्यार है. यदि उसे सुरेश से प्यार होता तो वह प्रभाकर की तरफ कभी नहीं झुकती, यह आकर्षण नहीं प्रेम है. सुरेश सिर्फ उस का अच्छा मित्र है, प्रेमी नहीं. खाने की मेज पर बैठने के पहले मैं ने फैसला कर लिया था.

Serial Story: बच्चों की भावना- भाग 1

‘‘अकी, बेटा उठो, सुबह हो गई, स्कूल जाना है,’’ अनुभव ने अपनी लाडली बेटी आकृति को जगाने के लिए आवाज लगानी शुरू की.

‘‘हूं,’’ कह कर अकी ने करवट बदली और रजाई को कानों तक खींच लिया.

‘‘अकी, यह क्या, रजाई में अब और ज्यादा दुबक गई हो, उठो, स्कूल को देर हो जाएगी.’’

‘‘अच्छा, पापा,’’ कह कर अकी और अधिक रजाई में छिप गई.

‘‘यह क्या, तुम अभी भी नहीं उठीं, लगता है, रजाई को हटाना पड़ेगा,’’ कह कर अनुभव ने अकी की रजाई को धीरे से हटाना शुरू किया.

‘‘नहीं, पापा, अभी उठती हूं,’’ बंद आंखों में ही अकी ने कहा.

‘‘नहीं, अकी, साढ़े 5 बज गए हैं, तुम्हें टौयलेट में भी काफी टाइम लग जाता है.’’

यह सुन कर अकी ने धीरे से आंखें खोलीं, ‘‘अभी तो पापा रात है, अभी उठती हूं.’’

अनुभव ने अकी को उठाया और हाथ में टूथब्रश दे कर वाशबेसन के आगे खड़ा कर दिया.

सर्दियों में रातें लंबी होने के कारण सुबह 7 बजे के बाद ही उजाला होना शुरू होता है और ऊपर से घने कोहरे के कारण लगता ही नहीं कि सुबह हो गई. आकृति की स्कूल बस साढ़े 6 बजे आ जाती है. वैसे तो स्कूल 8 बजे लगता है, लेकिन घर से स्कूल की दूरी 14 किलोमीटर तय करने में बस को पूरा सवा घंटा लग जाता है.

जैसेतैसे अकी स्कूल के लिए तैयार हुई. फ्लैट से बाहर निकलते हुए आकृति ने पापा से कहा, ‘‘अभी तो रात है, दिन भी नहीं निकला. मैं आज स्कूल जल्दी क्यों जा रही हूं.’’

‘‘आज कोहरा बहुत अधिक है, इसलिए उजाला नहीं हुआ, ऐसा लग रहा है कि अभी रात है, लेकिन अकी, घड़ी देखो, पूरे साढ़े 6 बज गए हैं. बस आती ही होगी.’’

कोहरा बहुत घना था. 7-8 फुट से आगे कुछ नजर नहीं आ रहा था. सड़क एकदम सुनसान थी. घने कोहरे के बीच सर्द हवा के झोंकों से आकृति के शरीर में झुरझुरी सी होती और इसी झुरझुराहट ने उस की नींद खोल दी. अपने बदन को बे्रक डांस जैसे हिलातेडुलाते वह बोली, ‘‘पापा, लगता है, आज बस नहीं आएगी.’’

‘‘आप को कैसे मालूम, अकी?’’

‘‘देखो पापा, आज स्टाप पर कोई बच्चा नहीं आया है, आप स्कूल फोन कर के मालूम करो, कहीं आज स्कूल में छुट्टी न हो.’’

‘‘आज छुट्टी किस बात की होगी?’’

‘‘ठंड की वजह से आज छुट्टी होगी. इसलिए आज कोई बच्चा नहीं आया. देखो पापा, इसलिए अभी तक बस भी नहीं आई है.’’

‘‘बस कोहरे की वजह से लेट हो गई होगी.’’

‘‘पापा, कल मोटी मैडम शकुंतला राधा मैडम से बात कर रही थीं कि ठंड और कोहरे के कारण सर्दियों की छुट्टियां जल्दी हो जाएंगी.’’

‘‘जब स्कूल की छुट्टी होगी तो सब को मालूम हो जाएगा.’’

‘‘आप ने टीवी में न्यूज सुनी, शायद आज से छुट्टियां कर दी हों.’’

आकृति ही क्या सारे बच्चे ठंड में यही चाहते हैं कि स्कूल बंद रहे, लेकिन स्कूल वाले इस बारे में कब सोचते हैं. चाहे ठंड पहले पड़े या बाद में, छुट्टियों की तारीखें पहले से तय कर लेते हैं. ठंड और कोहरे के कारण न तो छुट्टियां करते हैं न स्कूल का टाइम बदलते हैं. सुबह के बजाय दोपहर का समय कर दें, लेकिन हम बच्चों की कोई नहीं सुनता है. सुबहसुबह इतनी ठंड में बच्चे कैसे उठें. आकृति मन ही मन बड़बड़ा रही थी.

तभी 3-4 बच्चे स्टाप पर आ गए. सभी ठंड में कांप रहे थे. बच्चे आपस में बात करने लगे कि मजा आ जाएगा यदि बस न आए. तभी एक बच्चे की मां अनुभव को संबोधित करते हुए बोलीं, ‘‘भाभीजी के क्या हाल हैं. अब तो डिलीवरी की तारीख नजदीक है. आप अकेले कैसे मैनेज कर पाएंगे. अकी की दादी या नानी को बुलवा लीजिए. वैसे कोई काम हो तो जरूर बताइए.’’

‘‘अकी की नानी आज दोपहर की टे्रन से आ रही हैं,’’ अनुभव ने उत्तर दिया.

तभी स्कूल बस ने हौर्न बजाया, कोहरे के कारण रेंगती रफ्तार से बस चल रही थी. किसी को पता ही नहीं चला कि बस आ गई. बच्चे बस में बैठ गए. सभी पेरेंट्स ने बस ड्राइवर को बस धीरे चलाने की हिदायत दी.

बस के रवाना होने के बाद अनुभव जल्दी से घर आया. स्नेह को लेबर पेन शुरू हो गया था, ‘‘अनु, डाक्टर को फोन करो. अब रहा नहीं जा रहा है,’’ स्नेह के कहते ही अनुभव ने डाक्टर से बात की. डाक्टर ने फौरन अस्पताल आने की सलाह दी.

अनुभव कार में स्नेह को नर्सिंग होम ले गया. डाक्टर ने चेकअप के बाद कहा, ‘‘मिस्टर अनुभव, आज ही आप को खुशखबरी मिल जाएगी.’’

अनुभव ने अपने बौस को फोन कर के स्थिति से अवगत कराया और आफिस से छुट्टी ले ली. अनुभव की चिंता अब रेलवे स्टेशन से आकृति की नानी को घर लाने की थी. वह सोच रहा था कि नर्सिंग होम में किस को स्नेह के पास छोड़े.

आज के समय एकल परिवार में ऐसे मौके पर यह एक गंभीर परेशानी रहती है कि अकेला व्यक्ति क्याक्या और कहांकहां करे. सुबह आकृति को तैयार कर के स्कूल भेजा और फिर स्नेह के साथ नर्सिंग होम. स्नेह को अकेला छोड़ नहीं सकता, मालूम नहीं कब क्या जरूरत पड़ जाए.

आकृति की नानी अकेले स्टेशन से कैसे घर आएंगी. घर में ताला लगा है. नर्सिंग होम के वेटिंगरूम में बैठ कर अनुभव का मस्तिष्क तेजी से चल रहा था कि कैसे सबकुछ मैनेज किया जाए. वर्माजी को फोन लगाया और स्थिति से अवगत कराया तो आधे घंटे में मिसेज वर्मा थर्मस में चाय, नाश्ता ले कर नर्सिंग होम आ गईं.

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