क्या बला है बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट और यह फेल क्यों हुआ

तकरीबन 13 वर्षों पहले सोशल मीडिया पर शुरू हुआ बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट ‘मी टू’ मूवमैंट की तरह दम तोड़ चुका है. हां, अब युवा खुद को ज्यादा एक्सपोज करते हैं. सोशल मीडिया पर हो रही ट्रोलिंग कहती है कि लोगों की मेंटैलिटी इस मामले में नहीं बदली है.

‘तू मोटी है, तू काली है, तू नाटा है, इस की नाक देखो कैसी पकौड़े जैसी है, इस का पेट देखो कितना बाहर निकला हुआ है’ इसी तरह के कमैंट इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं. ऐसा लगता है मानो कुछ लोग बस दूसरों को यह बताना चाहते हैं कि उन की बौडी, उन की पर्सनैलिटी सही नहीं है. उस में कुछ न कुछ कमी है.

इसी का एक उदाहरण इलियाना डिक्रूज है. एक बार इलियाना (इलियाना प्रैग्नैंसी न्यूज) ने अपने इंस्टाग्राम पर ‘आस्क एनीथिंग’ सैशन रखा था. तब एक यूजर ने उन से पूछा कि आप अपनी अजीब बौडीटाइप से कैसे डील करती हैं? इस पर ऐक्ट्रैस ने जवाब देते हुए कहा, ‘‘पहली बात मेरी बौडीटाइप अजीब नहीं है. मेरी क्या किसी की नहीं होती. दूसरी बात मैं अपनी बौडीटाइप को ले कर बहुत क्रिटिसाइज हुई हूं. लेकिन मैं अपनेआप से प्यार करना सीख रही हूं और किसी दूसरे के आदर्शों के अनुरूप नहीं बनना चाहती हूं.’’

कहने का अर्थ यह है कि आम नागरिक क्या, सैलिब्रिटीज भी यानी सभी अपनी बौडी, स्किन के लिए कभी न कभी क्रिटिसाइज जरूर हुए हैं लेकिन युवाओं ने इस मुद्दे को ऐड्रैस किया और साल 2012 के आसपास एक मूवमैंट की शुरुआत हुई जिसे बौडी पौजिटिवटी मूवमैंट कहा गया. इस का उद्देश्य अपनी शारीरिक बनावट को स्वीकार करना और आत्मसम्मान को बढ़ावा देना था.

मूवमैंट की शुरुआत

यह मूवमैंट 2012 में इंस्टाग्राम पर उभरा था. इस मूवमैंट के शुरू होने के बाद इंस्टाग्राम पोस्ट पर बड़ी संख्या में बौडी पौजिटिविटी हैशटैग देखने को मिले. बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट बौडी की शेप को बेहतर बनाने की कोशिश में शरीर के प्रति प्यार और एक्स्पैक्टेशन को बढ़ावा देता है. साथ ही, यह सभी शारीरिक आकृतियों, साइज, लिंग और त्वचा टोन की स्वीकृति को बढ़ावा देता है. लेकिन 13 वर्षों बाद यह मूवमैंट फेल होता दिखाई दे रहा है. इस के फेल होने के कई कारण रहे.

बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट के फेल होने का एक कारण यह है कि शरीर के अतिरिक्त वजन उठाने से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को बौडी पौजिटिविटी की अवधारणा नजरअंदाज करती है. आलोचकों का कहना था बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट के चलते लोग मोटापे को इग्नोर करेंगे और मोटापे से होने वाली बीमारियों से घिर जाएंगे, जो उन की हैल्थ के लिए बिलकुल भी सही नहीं है.

दूसरा कारण यह था कि बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट के हैशटैग का यूज करने वाले ज्यादातर इंस्टाग्राम पोस्ट युवा, श्वेत, पारंपरिक रूप से आकर्षक, गैरविकलांग, सिजैंडर महिलाओं को दर्शाता था. जो बाकी जातीय लोगों, पुरुषों, एलजीबीक्यूटी प्लस समुदायों के लोगों और बूढ़े लोगों को सही प्रतिनिधित्व नहीं देता है.

तीसरा कारण यह था कि बहुत से लोग सोशल मीडिया पर जो फोटो और वीडियो पोस्ट करते हैं वह एडिट किया गया होता था, ऐसे में दूसरों के लिए यह जान पाना बहुत मुश्किल हो गया कि सच क्या है और ?ाठ क्या.

चौथा कारण यह था कि कुछ लोग इसे सिर्फ अभिनेत्रियों की एक प्रकार की पहचान मानते थे. इस का मतलब है कि वे उन्हें केवल उन की शारीरिक सुंदरता के आधार पर मापते थे.  बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट का मुख्य उद्देश्य यह था कि सभी शरीरों को स्वीकार किया जाए, लेकिन यह मूवमैंट कुछ लोगों के लिए बस एक विदेशी कला बन गया था.

पांचवां कारण यह था कि कुछ लोगों का मानना था कि इस में शारीरिक सुंदरता के आधार पर महिलाओं को अधिक प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिस से कि यह केवल महिलाओं के बारे में ही सिमट कर रह गया है. बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट को सामाजिक समता के प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए था, लेकिन कुछ लोगों ने इसे एक महिला आंदोलन के सिवा कुछ और नहीं सम?ा था.

हवाहवाई बन गया कैंपेन

यह मूवमैंट इसलिए भी फेल रहा क्योंकि कुछ लोग इसे एक सामाजिक सुधार प्रक्रिया की तरह देखते थे, जिस में शारीरिक सुंदरता और हैल्थ के मानकों को सामाजिक व राजनीतिक परिवर्तन के साथ जोड़ा गया. कुछ लोग इस मूवमैंट को एक संघर्ष के रूप में देखते थे जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के बीच एक विवाद का विषय बन गया.

इस ने सोसाइटी के अलगअलग ग्रुप्स के लोगों के बीच एक खाई पैदा कर दी. बजाय इस के कि यह एक ग्रुप के रूप में मिल कर बौडी पौजिटिविटी के उद्देश्यों के लिए काम करता, बल्कि इस ने उन गु्रप्स के बीच विरोधात्मक भावना पैदा कर दी.

बौडी पौजिटिविटी को बढ़ावा देना आमतौर पर एक अच्छी बात है. लेकिन जरूरी यह है कि इस पौजिटिविटी की धारा में समाज के सभी सेगमैंट्स को जोड़ा जाए न कि इक्कादुक्का और फिल्मी सैलिब्रिटी को. अगर इन कारणों को नहीं सुधारा गया तो जबजब बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट आएंगे, फेल ही कहलाएंगे.

बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट आखिर क्यों फेल हुआ. अगर इस सवाल का जवाब ढूंढ़ा जाए तो इस का सब से बड़ा जवाब यही है कि यह मूवमैंट एक हवाहवाई मूवमैंट था, बिलकुल वैसे ही जैसे कुछ सालों पहले ‘मी टू’ मूवमैंट आया था, जिस ने हल्ला खूब मचाया पर उस से निकला क्या, किसी को कुछ नहीं पता. इस मूवमैंट का भी कोई सिरपैर न था. हालांकि यह सच है कि इस मूवमैंट के जरिए लोगों में सैल्फ कौन्फिडैंस आया लेकिन उस कौन्फिडैंस का क्या फायदा जो आप को बीमारियों का घर बना दे.

कमियों को स्वीकारना जरूरी

अगर आप मोटे हैं, आप का शरीर थुलथुला है, आप की तोंद आप की पैंट में नहीं फंसती तो आप के लिए यह एक समस्या है, न कि इसे पौजिटिव माना जाए. ऐसे में आप को शरीर पर काम करना चाहिए न कि बौडी पौजिटिविटी के नाम पर प्राउड.

याद रखें, अगर आप मोटे हैं तो लोग आप को मोटा ही कहेंगे. आप के सामने नहीं तो आप के पीठपीछे ही सही, पर कहेंगे जरूर. आप उन की आवाज पर रोक लगा सकते हैं पर सोच पर नहीं. यही उन की मानसिकता है. लेकिन आप औरों के लिए नहीं, खुद के लिए, खुद को बदलें. इस से न सिर्फ आप हैल्दी रहेंगे बल्कि बीमारियों से आप की दोस्ती भी नहीं होगी.

वहीं अगर आप बौडी पौजिटिविटी के नाम पर मोटापे को अपनी बौडी पर कब्जा करने देंगे तो आप भविष्य में जरूर पछताएंगे. मोटापा कोई अच्छी चीज नहीं है. इस से पर्सनैलिटी और कौन्फिडैंस खराब ही होता है.

बौडी पौजिटिविटी उन मानो में अच्छा है जहां यह रंगत की बात करता हो. अगर आप काले हैं, आप की स्किन पर निशान हैं, आप की बौडी पर ज्यादा हेयर हैं और लोग आप को इन चीजों के लिए चिढ़ा रहे हैं तो यहां आप का बौडी पौजिटिविटी वाला एटिट्यूड काम आएगा क्योंकि रंगत से आप की हैल्थ को कोई नुकसान नहीं होगा.

यंग सक्सेस एंटरप्रेन्योर, ऐसे हो रहे मालामाल

पिछले कुछ सालों में यंग एंटरप्रेन्योर की एक लहर सी दौड़ पड़ी है, जिसे देखो वह इस दौड़ में गोते लगा रहा है. यंग जनरेशन अपनी जौब छोड़ कर एंटरप्रेन्योर बन रही है. वहीं कुछ स्कूलकालेज में पढ़ने वाले स्टूडैंट ऐसेऐसे ऐप्स और बिजनैस क्रिएट कर रहे हैं जो न सिर्फ फ्यूचर में उन्हें एक अच्छी मार्केट देंगे बल्कि लोगों के लिए भी काफी यूजफुल होंगे. ऐसे ही कुछ यंग एंटरप्रेन्योर के बारे में यहां चर्चा करते हैं.

श्रेयान डागा

श्रेयान डागा एक स्किल डैवलपमैंट कंपनी के फाउंडर हैं. वे स्टूडैंट्स को टीचर्स की हैल्प से कुछ वैरिफाइड कोर्स करवाते हैं. इन कोर्सेज को एक्सट्रा करिकुलम एक्टिविटीज की तरह बच्चों को पढ़ाया जाता है. ये क्लासेस औनलाइन प्रोवाइड की जाती हैं. श्रेयान का दावा है कि एक्स्ट्रा करिकुलम होने के साथसाथ ये कोर्सेज फ्यूचर में एक जरूरी स्किल के रूप में बच्चों के काम आएंगे.

श्रेयान की एक्स्ट्रा करिकुलम क्लासेस के हर बैच में 5 से 15 स्टूडैंट्स के साथ लाइव क्लासेस होती हैं. इस में एक घंटे की क्लास की फीस सिर्फ 133 रुपए ली जाती है. इस के अलावा, हर स्टूडैंट को यूनेस्को और एसटीईएम का सर्टिफिकेट भी दिया जाता है. आज डागा का औनलाइन लाइव लर्निंग (ओएलएल) वाराणसी, वाकड, ओडिशा, पुणे, लखनऊ, ठाणे और मुंबई के साथसाथ इंडिया के 20+ शहरों में है.

शैली बुलचंदानी

शैली बुलचंदानी राजस्थान के अजमेर की रहने वाली हैं. उन्होंने अगस्त 2020 में हेयर स्टार्टअप ‘द शैल हेयर’ कंपनी की शुरुआत महज 20 साल की उम्र में की. ‘द शैल हेयर’ की खास बात यह है कि इस के प्रोडक्ट में भारतीय रेमी हेयर (सिंगल डोनर के बाल) से बने होते हैं.

वहीं बाकी कंपनियों की तुलना में इन के प्रोडक्ट्स की कीमत भी 30-40 परसैंट कम है. इस कंपनी की एक और खास बात है कि यह कंपनी महिलाओं द्वारा ही चलाई जाती है. इस से कई महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है.

साल 2021-22 में शैली बुलचंदानी की कंपनी ने लगभग 36 लाख रुपए की बिक्री दर्ज की थी. शैली खुद को हेयर इंडस्ट्री में एक विश्वसनीय ब्रैंड के रूप में स्थापित करने की दौड़ में आ चुकी हैं.

हिमांशु अग्रवाल

24 साल के हिमांशु अग्रवाल की आज 3 कंपनियां हैं. इन में इंटरनैट कोचिंग एम्पायर, बैकएंड क्लोजर्स और मेलजर शामिल हैं.

हिमांशु की कंपनी इंटरनैट कोचिंग एम्पायर अलगअलग तरह की सेवाएं देती है. इन में वर्कशौप, कंसल्टिंग सर्विस, एजुटैक नौलेज शामिल हैं. यह कस्टमर बेस कंपनी है. हिमांशु की इन 3 कंपनियों में कई यंग काम करते हैं. बैकएंड क्लोजर्स एक सेल्स एजेंसी है और मेलजर एक सौफ्टवेयर कंपनी है. हिमांशु यंग एंटरप्रेन्योर के लिए प्रेरणा बन चुके हैं.

तिलक मेहता

कहते हैं सफलता किसी उम्र की मुहताज नहीं होती है. तिलक मेहता जब 13 साल के थे तब उन्होंने पेपर-एन-पार्सल नाम की अपनी कंपनी की जो शिपिंग और लौजिस्किल से जुड़ी सेवाएं देती है. शुरुआत की. तिलक ने जब अपना बिजनैस आइडिया अपने पिता के साथ शेयर किया तो उन्होंने तिलक को शुरुआती फंड दिया. फिर तिलक को बैंक अधिकारी घनश्याम पारेख से मिलवाया, जिन्होंने तिलक के बिजनैस में इन्वैस्ट किया.

पारेख को तिलक का आइडिया इतना पसंद आया कि उन्होंने अपनी बैंक की नौकरी छोड़ दी और तिलक का बिजनैस जौइन  कर लिया. तिलक ने घनश्याम पारेख को कंपनी का सीईओ बना दिया. मेहता ने अपनी पढ़ाई के साथसाथ बिजनैस को जारी रखा और

2 सालों में एक सक्सैस स्टोरी लिख डाली. 13 साल की उम्र में मेहता 100 करोड़ रुपए की कंपनी के मालिक बन गए थे. आज इतनी कम उम्र में तिलक 200 से ज्यादा लोगों को रोजगार दे रहे हैं. वर्तमान समय में तिलक की उम्र महज 17 साल है.

रितेश अग्रवाल

शार्क टैंक-3 में जज की कुरसी संभाल रहे रितेश अग्रवाल को आज कौन नहीं जानता. हर महीने 22 करोड़ रुपए का टर्नओवर करने वाले रितेश आज एक यंग सक्सैसफुल एंटरप्रेन्योर हैं. रितेश होटल्स की चेन ओयो के मालिक हैं. इन का नैटवर्क देश के 100 शहरों से भी ज्यादा में फैला हुआ है. इन की कंपनी 2,200 होटल्स के साथ काम करती है. रितेश फोर्ब्स की 30 ‘अंडर 30’ अचीवर्स की लिस्ट में शामिल एक इंडियन सीईओ हैं.

रितेश ने यह मुकाम महज 29 साल में पाया है. रितेश की ओयो रूम्स देश की कामयाब इंटरनैट कंपनियों की लिस्ट में तीसरी कंपनी बन गई है. साथ ही, यह देश की सब से बड़ी होटल चेन भी है.

अद्वैत ठाकुर

अद्वैत एक टैक्नोलौजी एंटरप्रेन्योर हैं. उन्होंने 12 साल की उम्र में अपनी टैक कंपनी एपेक्स इंफोसिस की शुरुआत की थी. यह एक ग्लोबल टैक्नोलौजी और इनोवेशन कंपनी है जो इंटरनैट औफ थिंग्स संबंधित सेवाओं और उत्पादों, एआई और हैल्थटैक सैक्टर में अपनी सेवाएं देती है.

अद्वैत सब से यंग गूगल, हब स्पौट और बिंग सर्टिफाइड प्रोफैशनल भी हैं. 2017 में जब अद्वैत 14 साल के थे तो उन्होंने ‘टैक्नोलौजी क्विज’ का निर्माण किया. यह ऐप बच्चों को साइंस और टैक्नोलौजी के बारे में जानने में हैल्प करता है. अद्वैत द स्टार्टअप इंडिया के ‘टौप 10 यंग एंटरप्रेन्योर इन इंडिया 2018’ की लिस्ट में शामिल थे.

अंगद दरयानी

मुंबई के अंगद दरयानी ने 8 साल की उम्र में अपना पहला रोबोट बनाया. इस के बाद ब्लाइंड लोगों के लिए एक ईरीडर (वर्चुअल बे्रलर) बनाया. फिर सोलर एनर्जी से चलने वाली नाव, इस के बाद गार्डुइनो नाम का एक औटोमैटिक बागबानी सिस्टम बनाया.

इस के अलावा अंगद ने शार्कबोट नाम का इंडिया का सब से सस्ता 3डी प्रिंटर बनाने के लिए ओपन सोर्स सौफ्टवेयर तैयार किया. अंगद बच्चों के लिए सस्ती डीआईवाई किट की कंपनी चला रहे हैं. जिस उम्र में बच्चे पढ़ाई करते है उस उम्र में अंगद ने दुनिया को अपना हुनर दिखाया. आज अंगद को लोग भारत के एलन मस्क के नाम से जानते हैं.

श्रीलक्ष्मी सुरेश

3 साल की उम्र में बच्चे मां का आंचल नहीं छोड़ते पर इस उम्र में श्रीलक्ष्मी ने कंप्यूटर का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था.

4 साल की उम्र में उन्होंने डिजाइन करना शुरू कर दिया और 6 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली वैबसाइट डिजाइन कर दी. इस के बाद 11 साल की उम्र में अपना एक स्टार्टअप शुरू कर दिया.

आज श्रीलक्ष्मी सुरेश को सब से युवा सीईओ और सब से कम उम्र के वैब डिजाइनरों में से एक माना जाता है. अपने स्टार्टअप ईडिजाइन के अलावा श्रीलक्ष्मी एक अन्य कंपनी ‘टिनीलोगो’ जोकि एक लोगो आधारित सर्च इंजन है, की ओनर हैं. श्रीलक्ष्मी सुरेश ने अब तक 100 से ज्यादा वैबसाइटें बनाई हैं. श्रीलक्ष्मी को कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं. श्रीलक्ष्मी सुरेश को एसोसिएशन औफ अमेरिकन वैबमास्टर्स की सदस्यता से भी सम्मानित किया गया. वे इन्फो ग्रुप की ब्रैंड एंबेसेडर भी हैं. श्रीलक्ष्मी अब 26 साल की हो गई हैं.

सोशल मीडिया पर एंटी ट्रांसजैंडर कंटैंट से मचा बवाल, किस की जिम्मेदारी

मीडिया में एलजीबीटीक्यू कम्युनिटी के राइट्स की वकालत करने वाली ग्रुप ‘ग्लाड’ ने अपनी रिपोर्ट में फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स सहित मेटा के टौप सोशल प्लेटफौर्मों पर एंटी ट्रांसकंटैंट के बारे में बताया. यह रिपोर्ट जून 2023 से ले कर मार्च 2024 के बीच की है.

रिपोर्ट में बताया गया कि इन प्लेटफौर्म्स पर ट्रांस विरोधी चीजें डाली जाती हैं और मेटा पौलिसी के बावजूद प्लेटफौर्म इस पर कोई कार्यवाही नहीं करता. इस में एंटी ट्रांस स्लर, प्रोपगंडा, डीह्यूउमनाइजिंग स्टीरियोटाइप, लेबलिंग ट्रांस, सेक्सुअल प्रीडेटर्स जैसा कंटैंट देखने को मिला है. विज्ञापन वाली सरकार गूगल और मेटा में सोशल मीडिया विज्ञापनों में बढ़ोतरी देखी गई है.

गूगल विज्ञापन पारदर्शिता केंद्र के आंकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी, 2024 से 19 मार्च, 2024 के बीच पौलिटिकल विज्ञापनों पर कुल 101.28 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं. जिस में से अकेले भाजपा ने सोशल मीडिया कैम्पेन के लिए 31 करोड़ रुपए खर्च किए हैं. इस के अलावा मेटा एड लाइब्रेरी के अनुसार भाजपा ने पिछले 90 दिनों में 1198 ऐड के लिए 7 करोड़ के लगभग पैसा खर्च किए हैं. कोचिंग का धंधा जेईई की तैयारी के लिए फेमस कोचिंग इंस्टिट्यूट फिटजी अपने विज्ञापन के चलते विवाद में घिर गया है.

यह विवाद सोशल मीडिया पर खूब गरमाया है. दरअसल फिटजी ने एक विज्ञापन बनाया जिस में उस ने एक स्टूडैंट को पौइंट करते दिखाया कि अगर वह फिटजी से ही अपनी पढ़ाई जारी रखती बजाय किसी और इंस्टिट्यूट जाने के तो ज्यादा स्कोर करती. इस विज्ञापन के बाद सोशल मीडिया ने फिटजी को आड़े हाथों ले लिया. एलन मस्क पर मुकदमा सोशल मीडिया प्लेटफौर्म एक्स, जो पहले ट्विटर के नाम से जाना जाता था, के पूर्व सीईओ पराग अग्रवाल और एक्स के कई एक्स औफिशियल्स ने एलन मस्क के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया है.

मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसा दावा किया गया है कि यह मुकदमा नौकरी से निकाले जाने के बाद हर्जाने के तौर पर दिए जाने वाले वेतन को ले कर है. पराग अग्रवाल के अलावा एलन मस्क के खिलाफ मुकदमा करने वाले 4 टौप एक्स औफिशियल भी हैं. मुकदमा लगभग 12.8 करोड़ के भुगतान को ले कर है. इन्फ्लुएंसर्स की रेज बैटिंग हाल के वर्षों में, इंटरनैट वर्ल्ड से ‘रेज बैटिंग’ शब्द ज्यादा सुनाई देने लगा है. सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के लिए यह जल्दी फेमस होने का मीडियम बन गया है. रेज बैटिंग तब होती है जब कोई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स जानबू?ा कर यूजर्स का ध्यान पाने के लिए ऐसे पोस्ट डालता है जिस से उसे नैगेटिव रैस्पौंस मिलें. यह काम इन्फ्लुएंसर्स खूब करते हैं वे क्रिंज वीडियो बनाते हैं.

यह टिकटौक, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफौर्म्स में देखा जा रहा है. सोशल मीडिया लती टीनएजर्स 26 सितंबर से 23 अक्तूबर, 2023 तक किए गए प्यू रिसर्च के सर्वे के अनुसार लगभग तीनचौथाई टीनएजर्स तब ज्यादा खुश रहते हैं जब वे अपने फोन के बिना रहते हैं. इस दौरान वे खुद को शांत और खुश महसूस करते हैं. रिसर्च में यह भी पता चला है कि टीनएजर्स यह जानते हुए भी कि वे अपनी स्क्रीन टाइम के साथ कोम्प्रोमाइज करने को तैयार नहीं है.

किशोरों की आत्महत्या : माता पिता दोषी कैसे?

यह सोच से बाहर है कि मांबाप के दबाव के चलते कोई बच्चा खुदकुशी कर ले, मगर समाज में अकसर ऐसी घटनाएं घट जाती हैं, जो एक सीख दी जाती हैं कि मांबाप को बच्चों के प्रति अपना बरताव अच्छा रखना चाहिए. हम कुछ ऐसी घटनाओं के साथ आप को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर हम मांबाप हैं, तो हमें बहुत ही सोचसमझ कर अपना बरताव उन के प्रति रखना होगा.

पहली घटना

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में एक लड़के ने सिर्फ इसलिए खुदकुशी कर ली, क्योंकि मां उसे अकसर जल्दी उठने और हर काम समय से करने के लिए कहा करती थीं.

दूसरी घटना

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक लड़की में खुदकुशी कर ली. पुलिस की जांचपड़ताल में यह सामने आया कि मांबाप उस की पढ़ाई और ट्यूशन पर ज्यादा जोर दे रहे थे और उसे मोबाइल से भी दूर रखा जा रहा था.

तीसरी घटना

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक गांव में एक किशोर ने इसलिए खुदकुशी कर ली, क्योंकि मांबाप उसे अनुशासन का पाठ पढ़ाया करते थे.

ताजा मामले में मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में 17 साल एक लड़की ने कथिततौर से अपने बाप की शराब पीने की लत और मां के प्रति उस के हिंसक बरताव से परेशान हो कर खुदकुशी कर ली.

खरगोन के बड़वाह थाने के प्रभारी निर्मल श्रीवास ने बताया कि को रावत पलासिया गांव में एक किशोरी ने खुदकुशी कर ली. उन के मुताबिक, लड़की का एक तथाकथित सुसाइड नोट मिला है, जिस में उस ने तफसील से लिखा है कि उस के पिता शराब पीने के आदी हैं और अकसर उस की मां के साथ मारपीट करते हैं.

अफसर ने सुसाइड नोट का हवाला देते हुए बताया कि किशोरी ने पुलिस पर उस के पिता के खिलाफ शिकायत के बावजूद कार्यवाही न करने का भी आरोप भी लगाया. हालांकि, अभिवाहक ने पुलिस के खिलाफ लगाए गए आरोपों से इनकार किया है. उन्होंने कहा कि पुलिस ने लड़की के पिता के खिलाफ शिकायत पर कार्यवाही की और उस से अच्छे बरताव के लिए बौंड भरवाया है.

खरगोन के पुलिस अधीक्षक धर्मराज मीना के मुताबिक, लड़की के पिता के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी. उन्होंने आगे कहा कि पुलिस ने पहले भी शिकायतों पर कार्यवाही की थी और उसे गिरफ्तार भी किया था. उन के मुताबिक, खुदकुशी करने वाली लड़की की छोटी बहन ने भी अपने पिता पर बहुत ज्यादा शराब पीने और उन की मां पर हमला करने का आरोप लगाया था.

इस सिलसिले में पुलिस अफसर विवेक शर्मा कहते हैं कि दरअसल शराब ही इस की खास वजह है.

डाक्टर जीआर पंजवानी कहते हैं कि अशिक्षा के चलते इस तरह की घटनाएं समाज में घट रही हैं और आज जागरूकता फैलाने की जरूरत है.

जीवन की राह आसान बनाएं पेरेंट्स के फैसले

इच्छा और जरूरत का अंतर जेब में रखे पैसों से निर्धारित होता है. बच्चों की कौन सी इच्छा पूरी करनी है और उन की क्या जरूरत है, यह मातापिता से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. उन के फैसले अनुभव और जरूरत के हिसाब से होते हैं.

अक्षत का मूड बहुत खराब था. वह 12वीं के बाद अपने दोस्त कनिष्क की तरह विदेश में पढ़ने जाना चाहता था. पर अक्षत के मम्मीपापा ने एजुकेशन लोन के लिए साफ मना कर दिया था. अक्षत के पापा के अनुसार, ‘‘विदेश में पढ़ने के लिए 30 लाख रुपए का लोन लेने से अच्छा है कि अक्षत भारत के ही किसी अच्छे कालेज से ग्रेजुएशन कर ले.

लेकिन आज, अक्षत के शब्दों में, ‘‘उस समय मैं मम्मीपापा से बेहद नाराज था पर उन्होंने एकदम सही फैसला लिया था. नहीं तो आज मैं और मेरा पूरा परिवार एजुकेशन लोन के कर्ज में डूबा रहता. कोरोना के कारण वैसे ही भविष्य अंधकार में है.’’

ऊर्जा अपनी जन्मदिन की पार्टी अपनी दूसरी फ्रैंड्स की तरह महंगे फाइवस्टार होटल में देना चाहती थी. लेकिन उस की मम्मी ने कहा कि वे लोग एक जन्मदिन के लिए 50 हजार रुपए का खर्च वहन नहीं कर सकते. ऊर्जा ने गुस्से में जन्मदिन पर किसी को नहीं बुलाया. पर उस की जन्मदिन की रात को 12 बजे जब उस की सारी सहेलियां केक ले कर पहुंचीं, तो ऊर्जा की खुशी का ठिकाना न रहा. ऊर्जा की मम्मी ने उस की सभी दोस्तों के मम्मीपापा से परमिशन ले ली थी. पूरी रात ऊर्जा दोस्तों के साथ धमाचौकड़ी करती रही. रात में मम्मीपापा के गले लगते हुए ऊर्जा बोली, ‘‘मम्मी, यह जन्मदिन अब तक का सब से अच्छा जन्मदिन था. जगह से ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है लोगों का साथ.’’

काविश को एप्पल का फोन लेने का कितना मन था. उस के ग्रुप में सब के पास एप्पल का ही मोबाइल था. पर उस के पापा ने उस के लिए अपने बजट के हिसाब से उसे एक अपडेटेड एंड्रोइड मोबाइल दिला दिया था. काविश ने गुस्से में उस मोबाइल को यूज नहीं किया था. तभी लौकडाउन हो गया और अचानक से लैपटौप लेना जरूरी हो गया था. काविश के पापा का बिजनैस भी नहीं चल पा रहा था. काविश को समझ नहीं आया था कि वह लैपटौप कैसे लेगा? लेकिन उस के पापा अगले दिन ही काविश के लिए लैपटौप खरीद कर ले आए थे. उन्होंने काविश को सम झाते हुए कहा, ‘‘बेटा, मोबाइल तुम्हारी इच्छा थी जिसे पूरा करना जरूरी नहीं था, मगर लैपटौप तुम्हारी आवश्यकता थी. अगर मैं अपनी जेब के अनुसार फैसला नहीं लेता और तुम्हें महंगा मोबाइल दिला देता तो अब तुम्हारे लिए लैपटौप नहीं खरीद पाता.’’

बहुत बार ऐसा होता है कि हम अपने मम्मीपापा के फैसलों से सहमत नहीं होते हैं. ऐसा हो भी सकता है कि उन के फैसले आप को आज के समय के हिसाब से अनुकूल न लगें, लेकिन एक बात अवश्य याद रखें कि उन के फैसले उन के अनुभव के हिसाब से होंगे. अगर उन के फैसलों से आप को लाभ नहीं होगा तो नुकसान भी कदापि नहीं होगा.

चलिए अब जानते हैं कुछ कारण कि क्यों हमारे मातापिता हमारे फैसले अपनी जेब को देख कर लेते हैं.

जितनी चादर उतने ही पैर फैलाएं : अगर मम्मीपापा आप की जिद मान कर अपनी चादर से बाहर पैर फैलाएंगे तो बाद में वह आप के लिए ही नुकसानदेह होगा. ऐसा हो सकता है कि आप की जिद पूरी करने के चक्कर में वे अपने जरूरी खर्चों में कटौती कर दें. इसलिए अपने मम्मीपापा के फैसलों को सम झने की कोशिश करें, इस में सब की भलाई ही छिपी हुई होती है.

अनुभव है महत्त्वपूर्ण : मांबाप के हर निर्णय में उन के अनुभव की सीख होती है. उन्होंने आप से अधिक दुनिया देखी है. मम्मीपापा घर की आर्थिक हालत के हिसाब से ही आप की जरूरत और इच्छाओं को पूरा करते हैं. इसलिए उन के फैसलों को दिल से स्वीकार करें.

दूसरों से न करें तुलना : अपने दोस्तों से अपनी तुलना कभी न करें. हर किसी के परिवार का आर्थिक स्तर अलग होता है और सब का रहनसहन भी आर्थिक स्तर के हिसाब से ही तय होता है. अगर आप के दोस्त के पास एप्पल का फोन है तो जरूरी नहीं कि आप भी वही लें. बेवजह की तुलना आप को नकारात्मक ही बनाएगी.

जरूरत और इच्छाओं में फर्क करना सीखें : यह बात अवश्य याद रखें कि जरूरतों और इच्छाओं में फर्क करना सीख लें. आप के मम्मीपापा आप की जरूरतों को पूरा करने के लिए ही बाध्य हैं. अपनी इच्छाओं को पूरा करना आप की जिम्मेदारी है. अगर अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से आप फर्क करना नहीं सीखेंगे तो सदा ही दुखी रहेंगे.

खुल कर करें बातचीत : कभीकभी ऐसा भी हो सकता है कि आप के लिए कोई वस्तु आवश्यक हो लेकिन मम्मीपापा की नजरों में वह जरूरी न हो. ऐसे में आप परेशान न हों. मम्मीपापा से खुल कर बातचीत करें. अगर आप की बात में उन्हें वजन लगा तो वे अवश्य आप को वह वस्तु दिलाने से गुरेज नही करेंगे.

झूठी शान बढ़ाती हैं मुश्किलें : अगर आप के मम्मीपापा आप की  झूठी शान के कारण अपनी जेब से अधिक खर्च करेंगे तो भविष्य में आप की ही मुश्किलें बढ़ेंगी.  झूठी आनबानशान से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है सादा और सरल जीवन. अपनी जेब के अनुसार किए गए फैसले भविष्य की खुशियों को सदा के लिए सुनिश्चित कर लेते हैं.

आज का कर्ज भविष्य का मर्ज : यह बात गांठ बांध कर रख लें कि कर्ज से बड़ा कोई मर्ज नहीं होता है. आप के कहे अनुसार, अगर आप के मम्मीपापा आप के सपनों को पूरा करने के लिए कर्ज भी ले लेंगे तो उन के साथसाथ आप भी इस मर्ज का शिकार हो जाएंगे. अगर अपने जीवनकाल में वे इस मर्ज से उबर न पाए तो आप भी इस मर्ज का शिकार हो जाएंगे. तनावरहित जीवन जीने के लिए, कर्ज नामक मर्ज से सदैव दूर रहें. जेब के अनुसार किए गए मम्मीपापा के फैसले आप के जीवन की राह को आसान बनाते हैं.

मेहमान बनें, सिरदर्द नहीं : रखें इन बातों का खयाल

अपने किसी जानपहचान वाले या सगेसंबंधी के यहां छुट्टियां मनाने जाना एक सुखद अनुभव है. भागदौड़ भरी जिंदगी में वहां कई ऐसे पल मिल जाते हैं, जब हमें चैन की सांसें मिलती हैं. आबोहवा बदलने से बहुत सी परेशानियां तो अपनेआप ही चली जाती हैं. चाहे कोई भी उम्र हो, सब के लिए कुछ न कुछ जरूर होता है. हम खुद को तरोताजा महसूस करने लगते हैं.

आसान शब्दों में कहें तो हमारा तनमन आने वाले समय के लिए रीचार्ज हो जाता है, इसलिए हमारा भी यह फर्ज है कि जिन लोगों के चलते हम को इतना सब मिला, उन के लिए हम भी थोड़ा सोचें.

चलिए, जिक्र करते हैं उन बातों की, जिन का हमें मेहमान बनते वक्त हमेशा खयाल रखना चाहिए:

* अगर हमारा कार्यक्रम लंबा है यानी 15-20 दिन या महीनेभर का है, तो कोशिश की जानी चाहिए कि उसी शहर में जाएं, जहां एक से ज्यादा रिश्तेदार हों. 2-2, 3-3 दिन तक बारीबारी से सब के यहां रुकते रहने से किसी पर ज्यादा बोझ भी नहीं पड़ेगा और सभी से मुलाकात भी हो जाएगी.

* छुट्टियों में किसी खास के पास जाने की आदत नहीं बनानी चाहिए. इस से उस के मन में आप के लिए नयापन लगातार कम होता जाता है, भले ही वह आप का मायका या पुश्तैनी घर ही क्यों न हो. समय के साथ लोगों की पसंद और प्राथमिकताएं लगातार बदलती हैं.

* बहुत से लोगों की आदत होती है कि किसी के भी घर पहुंच जाते हैं. लोग भले ही ऊपर से कुछ न कहें, लेकिन आज की गलाकाट प्रतियोगिता के जमाने में हर कोई इतना फ्री नहीं होता कि उस को बारबार किसी की खातिरदारी करने में दिलचस्पी हो, वह भी दूर के जानपहचान वालों की. खुद को किसी के सिर पर थोपने की लत अपनी इज्जत के लिए भी खतरा है.

* हम अपने घर में तो बच्चों को खूब रोकटोक करते हैं, लेकिन किसी के घर मेहमान बन कर जाते ही उन पर से ध्यान हटा लेते हैं. ऊपर से उन के सामने ही यह बोल कर कि ‘यह तो बहुत शरारती है’ एक तरह से उन को खुली छूट दे देते हैं.

मेजबान खुद आप को संभालने में जुटा हुआ है, ऐसे में अगर आप के बच्चे उस के घर में धमाचौकड़ी, तोड़फोड़ करते रहेंगे, तो झिझक के मारे वह उन को तो कुछ नहीं कहेगा, लेकिन आप के अगली बार न आने की बात मन में जरूर सोचने लगेगा.

* अकसर देखा गया है कि अपने से कम पैसे वाले मेजबान को मेहमान अपना रोब दिखाने का ‘सौफ्ट टारगेट’ समझ लेते हैं. आप कितने महंगे कपड़े पहनते हैं, कितने का खाते हैं. इस का गैरजरूरी हिसाब देना मेजबान के मन में आप के लिए नेगेटिव भाव पैदा करता है.

* मेजबान के बच्चों की तुलना ज्यादा नंबर लाने वाले अपने बच्चे से मत कीजिए. इस से वे बच्चे आप से कन्नी काटने लगेंगे. बच्चों को असहज देख उन के मांबाप भी असहज हो जाएंगे.

अगर आप मेजबान के बच्चों का सचमुच भला चाहते हैं, तो उन्हें कभीकभार दोस्त की तरह सलाह दे दें. अपने बच्चों के सामने इशारोंइशारों में छोटा कतई न दिखाएं.

* हर किसी का अपना स्वभाव होता है. हो सकता है कि किसी को ज्यादा लोगों से मिलनाजुलना पसंद न हो या वह आप से न मिलना चाहे. घर में जिन से आप की अच्छी अंडरस्टैंडिंग है, उन तक ही सीमित रहिए. इस से आप को भरपूर स्वागत का अनुभव होगा.

* जिस मेजबान की जो हैसियत है, उसे उस की जरूरत के हिसाब से उपहार दें. सभी जगह आधा किलो मिठाई का डब्बा ले कर चलने की आदत सही नहीं है. हर कोई आप से प्यार किसी न किसी उम्मीद के साथ ही करता है, इस सच को स्वीकार करना सीखें.

* मेजबान से बहुत ज्यादा प्यार जताना वह भी केवल शब्दों के जरीए, उन के मन में आप की इमेज पर बुरा असर डालेगा. सच्चा प्यार है तो उस को अपने काम से दिखलाइए, वरना बदलाव सामान्य रखिए. खोखली बातें कुछ दिनों तक ही अच्छी लगती हैं.

इन बातों का ध्यान रखें और देखें कि हर मेजबान खुद ही कहेगा, ‘‘आप का हमारे घर में स्वागत है.’’

झूठे प्रचार की मिली सजा : रामदेव की सुप्रीम कोर्ट में माफी

योग के जरीए देशदुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले बाबा रामदेव ने सुप्रीम कोर्ट में हाथ जोड़ कर माफी मांग कर देश की जनता को जता दिया है कि अपने झूठे विज्ञापनों के चलते वे देश से माफी मांग रहे हैं और ऐसा काम आगे नहीं करेंगे.

दरअसल, कोरोना काल में कोरोनील नाम की एक दवा आई थी, जिसे लोगों ने विश्वास कर के खरीदा और रामदेव ने करोड़ों रुपए कमा लिए. यह सीधासीधा किसी लूट से कम नहीं था, मगर नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार ने तब आंखें बंद कर ली थीं.

इस का सीधा सा मतलब यह है कि अगर आप हमारे काम आते हैं तो आप का सारा अपराध माफ है. यह कल्पना की जा सकती है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने रामदेव के बरताव और काम करने के तरीके पर ध्यान नहीं दिया होता तो रामदेव आज भी मुसकराते हुए बड़ेबड़े दावे कर के अपनी उन दवाओं को देश की जनता को बेचते रहते, जिसे सीधेसीधे झूठ और ठगी काम कहा जा सकता है. इतना ही नहीं, देशभर के बड़े चैनलों में विज्ञापन को दे कर अपनी बात को सच बताना भी कोई छोटामोटा अपराध नहीं है. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट में इसे गंभीरता से लिया और आखिरकार रामदेव ने वहां हाजिर हो कर माफी मांग ली.

इस तरह जो काम नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं कर पाई उसे देश के सुप्रीम कोर्ट ने देश की जनता के सामने ला कर रख दिया और चेहरे पर से नकाब उतार दी या कहें कि रामदेव के तन से वह चोला उतार दिया, जिस के भरोसे वे देश की जनता और कानून को ठेंगा दिखाते रहे हैं. यह साबित हो गया है कि रामदेव कोई जनसेवा या देश की जनता के हमदर्द नहीं हैं, बल्कि वे भी एक ऐसे व्यापारी हैं, जो सिर्फ मुनाफा कमाना चाहता है.

आप को बता दें कि पहले भ्रामक विज्ञापन के मामले में पतंजलि आयुर्वेद को सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई थी और बाबा रामदेव व कंपनी के एमडी आचार्य बालकृष्ण को पेशी पर बुलाया था. आखिर तय तारीख पर रामदेव और बालकृष्ण दोनों ही बड़ी अदालत पहुंचे. इस दौरान सुनवाई शुरू हुई तो बाबा रामदेव के वकील ने कहा कि हम ऐसे विज्ञापन के लिए माफी मांगते हैं. आप के आदेश पर खुद योगगुरु रामदेव अदालत आए हैं और वे माफी मांग रहे हैं और आप उन की माफी को रिकौर्ड में दर्ज कर सकते हैं.

बाबा रामदेव के वकील ने आगे कहा, ‘हम इस अदालत से भाग नहीं रहे हैं. क्या मैं यह कुछ पैराग्राफ पढ़ सकता हूं? क्या मैं हाथ जोड़ कर यह कह सकता हूं कि जैंटलमैन खुद अदालत में मौजूद हैं और अदालत उन की माफी को दर्ज कर सकती है.

सुनवाई के दौरान पतंजलि के वकील ने भ्रामक विज्ञापन को ले कर कहा कि हमारे मीडिया विभाग को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की जानकारी नहीं थी, इसलिए ऐसा विज्ञापन चला गया.

इस पर बैंच में शामिल जस्टिस अमानुल्लाह और जस्टिस हिमा कोहली की बैंच ने कहा कि यह मानना मुश्किल है कि आप को इस की जानकारी नहीं थी.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर, 2023 में ही रामदेव के पतंजलि को आदेश दिया था कि वह भ्रामक दावे करने वाले विज्ञापनों को वापस ले. यदि ऐसा नहीं किया गया तो फिर हम ऐक्शन लेंगे. ऐसी हालत में पतंजलि के हर गलत विज्ञापन पर 1 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा.

इस दौरान जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि रामदेव ने योग के मामले में बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन एलोपैथी दवाओं को ले कर ऐसे दावे करना ठीक नहीं है, जबकि इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के वकील ने कहा कि वे अपना विज्ञापन करें, लेकिन उस में एलोपैथी चिकित्सा पद्धति की बेवजह आलोचना नहीं होनी चाहिए.

सुनवाई के दौरान जस्टिस हिमा कोहली ने केंद्र सरकार की भी खिंचाई की. उन्होंने कहा कि हमें हैरानी है कि आखिर इस मामले में केंद्र सरकार ने अपनी आंखें बंद रखीं.

इस पूरे मामले पर अगर देश की जनता गौर करे तो यह साफ है कि रामदेव ने सिर्फ रुपए कमाने के लिए झूठा विज्ञापन जारी किया और सीधेसीधे जनता को ठग लिया. दरअसल, ये सारे पैसे सरकार को वसूल लेने चाहिए, ताकि देश में यह संदेश चला जाए कि ठगी करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा.

पत्नी की बात मानना नहीं है दब्बूपन की निशानी

पुरुषप्रधान समाज में आज महिलाएं हर क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं. ऐसे में पढ़ीलिखी, योग्य व समझदार पत्नी की राय को सम्मान देना पति का गुलाम होना नहीं, बल्कि उस की बुद्धिमत्ता को दर्शाता है.

कपिल इंजीनयर हैं. लोक सेवा आयोग से चयनित राकेश उच्च पद पर हैं. विभागीय परिचितों, साथियों में दोनों की इमेज पत्नियों से डरने, उन के आगे न बोलने वाले भीरु या डरपोक पतियों की है. पत्नियों का आलम यह है कि नौकरी संबंधी समस्याओं की बाबत मशवरे के लिए पतियों के उच्च अधिकारियों के पास जाते समय वे भी उन के साथ जाती हैं.

उच्चाधिकारियों से मशवरे के दौरान कपिल से ज्यादा उन की पत्नी बात करती है. सोसाइटी में कपिल की दयनीय स्थिति को ले कर खूब चर्चाएं होती हैं. वहीं, राकेश ने अपनी स्थिति को जैसे स्वीकार ही कर लिया है और उन्हें इस से कोई दिक्कत नहीं है. असल में, उन्हें पत्नी की सलाह से बहुत बार लाभ हुए. बहुत जगह वह खुद ही काम करा आती. वे सब के सामने स्वीकार करते हैं कि शादी के बाद उन की काबिल पत्नी ने बहुत बड़ा त्याग किया है. वे घर व बाहर के सभी काम खुशीखुशी करते हैं, पत्नी की डांट भी खाते हैं और कभी ऐसा नहीं लगता कि वे खुद को अपमानित महसूस करते हों.

वास्तव में जो पतिपत्नी आपस में अच्छी समझ रखते हैं और मिलजुल कर निर्णय लेते हैं उन के घर में आपसी सामंजस्य और हंसीखुशी का माहौल रहता है. जरूरत इस बात की है कि पति हो या पत्नी, दोनों एकदूसरे की राय को बराबर महत्त्व व सम्मान दें और कोई भी निर्णय किसी एक का थोपा हुआ न हो. यदि पत्नी ज्यादा समझदार, भावनात्मक रूप से संतुलित व व्यावहारिक है तो पति अगर उस की राय को मानता है तो इस में पति को दब्बू न समझ कर, समझदार समझा जाना चाहिए.

इस के विपरीत, महेश और उन की पत्नी का दांपत्य जीवन इसलिए कभी सामान्य नहीं रह पाया क्योंकि उन्होंने अपनी दबंग पत्नी के सामने खुद को समर्पित नहीं किया. उन का सारा वैवाहिक जीवन लड़तेझगड़ते, एकदूसरे पर अविश्वास और शक करते हुए बीता. इस के चलते उन के बच्चे भी इस तनाव का शिकार हुए.

कई परिवार ऐसे दिख जाएंगे जिन में पति की कोई अस्मिता या सम्मान नहीं दिखेगा और पत्नियां पूरी तरह से परिवार पर हावी रहती हैं. ये पति अपने इस जीवन को स्वीकार कर चुके होते हैं और परिस्थितियों से समझौता कर चुके होते हैं. ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या ये दब्बू या कायर व्यक्ति हैं जिन का कोई आत्मसम्मान नहीं है? या फिर किन स्थितियों में उन्होंने हालात से समझौता कर लिया है और अपनी स्थिति को स्वीकार कर लिया है? अगर गहन विश्लेषण करें तो इन स्थितियों के कारण सामाजिक, पारिवारिक ढांचे में निहित दिखते हैं, जिन के कारण कई लोगों को अवांछित परिस्थितियों को भी स्वीकार करना पड़ता है.

समाज में एक बार शादी हो कर उस का टूटना बहुत ही खराब बात मानी जाती है. विवाह जन्मजन्मांतर का बंधन माना जाता है. और फिर बच्चों का भविष्य, परिवार की जगहंसाई, समाज का संकीर्ण रवैया आदि कई बातें हैं जिन के कारण लोग बेमेल शादियों को भी निभाते रहते हैं. कर्कशा और झगड़ालू पत्नियों के साथ  पति सारी जिंदगी बिता देते हैं. ऐसी स्त्रियां बच्चों तक को अपने पिता के इस तरह खिलाफ कर देती हैं कि बच्चे भी बातबात पर पिता का अपमान कर मां को ही सही ठहराते हैं और पुरुष बेचारे खून का घूंट पी कर सब चुपचाप सहन करते रहते हैं. समाज का स्वरूप पुरुषवादी है और यदि वह पत्नी की बात मानता है, उस की सलाह को महत्त्व देता है तो परिवार व समाज द्वारा उस पर दब्बू होने का ठप्पा लगा दिया जाता है.

बच्चे भी तनाव के शिकार

श्रमिक कल्याण विभाग के एक औफिसर की पत्नी ने पति की सारी कमाई यानी घर, प्रौपर्टी हड़प कर, बच्चों को भी अपने पक्ष में कर के गुंडों की मदद से पति को घर से निकलवा दिया और वह बेचारा दूसरे महल्ले में किराए का कमरा ले कर रहता है, कभीकभार ही घर आता है. आखिर, इस तरह के एकतरफा संबंध चलते कैसे रहते हैं?  इतना अपमान झेल कर भी पुरुष क्यों  ऐसी पत्नियों के साथ निभाते रहते हैं?

वास्तव में सारा खेल डिमांड और सप्लाई का है. भारतीय समाज में शादी होना एक बहुत बड़ा आडंबर होने के साथसाथ एक सामाजिक बंधन ज्यादा है. चाहे उस बंधन में प्रेम व विश्वास हो, न हो, फिर भी उसे तोड़ना बहुत ही कठिन है. वैवाहिक संबंध को तोड़ने पर समाज, रिश्तेदारों, आसपास के लोगों के सवालों को झेलना और सामाजिक अवहेलना को सहन करना बहुत ही दुखदायी होता है. और एक नई जिंदगी की शुरुआत करना तो और भी दुष्कर होता है. ऐसे में व्यक्ति अकेला हो जाता है और मानसिक रूप से टूट जाता है.

बच्चों का भी जीवन परेशानियों से भर जाता है. उन की पढ़ाई, कैरियर सब प्रभावित होते हैं, साथ ही, बच्चे मानसिक रूप से अस्थिर हो कर कई तरह के तनावों का शिकार हो जाते हैं

इन परिस्थितियों में अनेक लोग इसी में समझदारी समझते हैं कि बेमेल रिश्ते को ही झेलते रहा जाए और शांति बनाए रखने के लिए चुप ही रहा जाए. जब पति घर में शांति बनाए रखने के लिए चुप रहते हैं और पत्नी के साथ जवाबतलब नहीं करते तो इस तरह की अधिकार जताने वाली शासनप्रिय महिलाएं इस का फायदा उठाती हैं और पतियों पर और ज्यादा हावी होने की कोशिश करने लगती हैं. ऐसी पत्नी को इस बात का अच्छी तरह भान होता है कि यह व्यक्ति उसे छोड़ कर कहीं नहीं जा सकता. अगर पति कुछ विरोध करने की कोशिश करता भी है तो वह उस पर झूठा इलजाम लगाने लगती है. यहां तक कि उसे चरित्रहीन तक साबित कर देती है.

ऐसी हालत में पुरुष की स्थिति मरता क्या न करता की हो जाती है. इधर कुआं तो उधर खाई. पति को अपने चंगुल में रखना ऐसी स्त्रियों का प्रमुख उद्देश्य होता है. वे घर तो घर, बाहर व चार लोगों के सम्मुख भी पति पर अपना अधिकार व शासन प्रदर्शित करने से बाज नहीं आतीं. और धीरेधीरे यह उन की आदत में आ जाता है. स्थिति को और ज्यादा हास्यास्पद बनने न देने के लिए पतियों के पास चुप रहने के सिवा चारा नहीं होता. इसे उन का दब्बूपन समझ कर उन पर दब्बू होने का ठप्पा लगा दिया जाता है. यह इमेज बच्चों की नजरों में भी पिता के सम्मान को कम कर देती है और ये औरतें बच्चों को भी अपने स्वार्थ व अपने अधिकार को पुख्ता बनाने के लिए इस्तेमाल करती हैं. समस्या की जड़ हमारे समाज का दकियानूसी ढांचा है जहां व्यक्ति इस संबंध को तोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाता और अपना सारा जीवन इसी तरह काट देता है.

हमेशा केवल स्त्रियों की त्रासदी का जिक्र किया जाता है. कई पुरुषों का जीवन भी त्रासदीपूर्ण होता है, ऐसा गलत स्त्री से जुड़ जाने के कारण हो जाता है. ऐसे पुरुषों के प्रति भी सहानुभूति रखनी चाहिए और वैवाहिक जीवन को डिमांड व सप्लाई का खेल न बना कर प्रेम व एकदूसरे के प्रति सम्मान की भावना से पूर्ण बनाना चाहिए.

पतिपत्नी गाड़ी के 2 पहिए

इस समस्या को दूसरे पहलू से भी देखा जाना चाहिए. एक धारणा बना रखी गई है कि पुरुष हमेशा स्त्री से ज्यादा समझदार होते हैं. समाज ने पारिवारिक, आर्थिक व सामाजिक सभी तरह के निर्णय लेने के अधिकार पुरुष के लिए रिजर्व कर दिए हैं. जबकि, यह तथ्य हमेशा सही नहीं हो सकता कि पुरुष ही सही निर्णय ले सकते हैं, स्त्री नहीं. जो स्त्री सारा घर चला सकती है, उच्चशिक्षा ग्रहण कर बड़ेबड़े पद संभाल सकती है वह पति को निर्णय लेने में अपनी सलाह या मशवरा क्यों नहीं दे सकती?

कई बार देखा गया है कि स्त्रियां परिस्थितियों को ज्यादा सही ढंग से समझ पाती हैं और अधिक व्यावहारिक निर्णय लेती हैं. ऐसे में यदि पति अपनी पत्नी की राय को सम्मान देता है, उस के मशवरे को मानता है तो उस पर दब्बू होने का ठप्पा लगा देना कैसे उचित है?

परिवार में केवल एक के द्वारा लिए गए फैसले एकतरफा और जल्दबाजी में लिए गए भी हो सकते हैं. जब कहते हैं कि, पतिपत्नी एक गाड़ी के 2 पहिए हैं, तो भला एक पहिए से गाड़ी कैसे चल सकती है? पत्नी को पति की अर्धांगिनी कहा जाता है लेकिन वही अर्धांगिनी अपनी बात मानने को या उस की राय पर विचार करने को कहे तो उसे शासन करना कहा जाता है. अब वह समय आ गया है कि दकियानूसी धारणाओं को छोड़ परिवार के निर्णयों को लेने में स्त्री की राय को भी प्राथमिकता दी जाए और उसे पूरा महत्त्व दिया जाए.

Holi 2024: रिश्तों में रंग घोले होली की ठिठोली

वैसे तो होली रंगों का त्योहार है पर इस में शब्दों से भी होली खेलने का पुराना रिवाज रहा है. होली ही ऐसा त्योहार है जिस में किसी का मजाक उड़ाने की आजादी होती है. उस का वह बुरा भी नहीं मानता. समय के साथ होली में आपसी तनाव बढ़ता जा रहा है. धार्मिक और सांप्रदायिक कुरीतियों की वजह से होली अब तनाव के साए में बीतने लगी है. पड़ोसियों तक के साथ होली खेलने में सोचना पड़ता है. अब होली जैसे मजेदार त्योहार का मजा हम से अधिक विदेशी लेने लगे हैं. हम साल में एक बार ही होली मनाते हैं पर विदेशी पानी, कीचड़, रंग, बीयर और टमाटर जैसी रसदार चीजों से साल में कई बार होली खेलने का मजा लेते हैं. भारत में त्योहारों में धार्मिक रंग चढ़ने से दूसरे धर्म और बिरादरी के लोग उस से दूर होने लगे हैं.

बदलते समय में लोग अपने करीबियों के साथ ही होली का मजा लेना पसंद करते हैं. कालोनियों और अपार्टमैंट में रहने वाले लोग एकदूसरे से करीब आने के लिए होली मिलन और होली पार्टी जैसे आयोजन करने लगे हैं. इस में वे फूलों और हर्बल रंगों से होली खेलते हैं. इस तरह के आयोजनों में महिलाएं आगे होती हैं. पुरुषों की होली पार्टी बिना नशे के पूरी नहीं होती जिस की वजह से महिलाएं अपने को इन से दूर रखती हैं. अच्छी बात यह है कि होली की मस्ती वाली पार्टी का आयोजन अब महिलाएं खुद भी करने लगी हैं. इस में होली गेम्स, होली के गीतों पर डांस और होली क्वीन चुनी जाती है. महिलाओं की ऐसी पहल ने अब होली को पेज थ्री पार्टी की शक्ल दे दी है. शहरों में ऐसे आयोजन बड़ी संख्या में होने लगे हैं. समाज का एक बड़ा वर्ग अब भी होली की मस्ती से दूर ही रह रहा है.

धार्मिक कैद से आजाद हो होली

समाजशास्त्री डा. सुप्रिया कहती हैं, ‘‘त्योहारों की धार्मिक पहचान मौजमस्ती की सीमाओं को बांध देती है. आज का समाज बदल रहा है. जरूरत इस बात की है कि त्योहार भी बदलें और उन को मनाने की पुरानी सोच को छोड़ कर नई सोच के हिसाब से त्योहार मनाए जाएं, जिस से हम समाज की धार्मिक दूरियों, कुरीतियों को कम कर सकें. त्योहार का स्वरूप ऐसा बने जिस में हर वर्ग के लोग शामिल हो सकें. अभी त्योहार के करीब आते ही माहौल में खुशी और प्रसन्नता की जगह पर टैंशन सी होने लगती है. धार्मिक टकराव न हो जाए, इस को रोकने के लिए प्रशासन जिस तरह से सचेत होता है उस से त्योहार की मस्ती उतर जाती है. अगर त्योहार को धार्मिक कैद से मुक्ति मिल जाए तो त्योहार को बेहतर ढंग से एंजौय किया जा सकता है.’’

पूरी दुनिया में ऐसे त्योहारों की संख्या बढ़ती जा रही है जो धार्मिक कैद से दूर होते हैं. त्योहार में धर्म की दखलंदाजी से त्योहार की रोचकता सीमित हो जाती है. त्योहार में शामिल होने वाले लोग कुछ भी अलग करने से बचते हैं. उन को लगता है कि धर्म का अनादार न हो जाए कि जिस से वे अनावश्यक रूप से धर्म के कट्टरवाद के निशाने पर आ जाएं. लोगों को धर्म से अधिक डर धर्म के कट्टरवाद से लगता है. इस डर को खत्म करने का एक ही रास्ता है कि त्योहार को धार्मिक कैद से मुक्त किया जाए. त्योहार के धार्मिक कैद से बाहर होने से हर जाति व धर्म के लोग आपस में बिना किसी भेदभाव के मिल सकते हैं.

मस्त अंदाज होली का

होली का अपना अंदाज होता है. ऐसे में होली की ठिठोली के रास्ते रिश्तों में रस घोलने की पहल भी होनी चाहिए. होली की मस्ती का यह दस्तूर है कि कहा जाता है, ‘होली में बाबा देवर लागे.’ रिश्तों का ऐसा मधुर अंदाज किसी और त्योहार में देखने को नहीं मिलता. होली चमकदार रंगों का त्योहार होता है. हंसीखुशी का आलम यह होता है कि लोग चेहरे और कपड़ों पर रंग लगवाने के बाद भी खुशी का अनुभव करते हैं. होली में मस्ती के अंदाज को फिल्मों में ही नहीं, बल्कि फैशन और लोकरंग में भी खूब देखा जा सकता है. साहित्य में होली का अपना विशेष महत्त्व है. होली में व्यंग्यकार की कलम अपनेआप ही हासपरिहास करने लगती है. नेताओं से ले कर समाज के हर वर्ग पर हास्यपरिहास के अंदाज में गंभीर से गंभीर बात कह दी जाती है.

इस का वे बुरा भी नहीं मानते. ऐसी मस्ती होली को दूसरे त्योहार से अलग करती है. होली के इस अंदाज को जिंदा रखने के लिए जरूरी है कि होली में मस्ती को बढ़ावा दिया जाए और धार्मिक सीमाओं को खत्म किया जाए. रिश्तों में मिश्री सी मिठास घोलने के लिए होली से बेहतर कोई दूसरा तरीका हो ही नहीं सकता है. होली की मस्ती के साथ रंगों का ऐसा रेला चले जिस में सभी सराबोर हो जाएं. सालभर के सारे गिलेशिकवे दूर हो जाएं. कुछ नहीं तो पड़ोसी के साथ संबंध सुधारने की शुरुआत ही हो जाए.

Holi 2024: होली से दूरी, यंग जेनरेशन की मजबूरी

होली का दिन आते ही पूरे शहर में होली की मस्ती भरा रंग चढ़ने लगता है लेकिन 14 साल के अरनव को यह त्योहार अच्छा नहीं लगता. जब सारे बच्चे गली में शोर मचाते, रंग डालते, रंगेपुते दिखते तो अरनव अपने खास दोस्तों को भी मुश्किल से पहचान पाता था. वह होली के दिन घर में एक कमरे में खुद को बंद कर लेता  होली की मस्ती में चूर अरनव की बहन भी जब उसे जबरदस्ती रंग लगाती तो उसे बहुत बुरा लगता था. बहन की खुशी के लिए वह अनमने मन से रंग लगवा जरूर लेता पर खुद उसे रंग लगाने की पहल न करता. जब घर और महल्ले में होली का हंगामा कम हो जाता तभी वह घर से बाहर निकलता. कुछ साल पहले तक अरनव जैसे बच्चों की संख्या कम थी. धीरेधीरे इस तरह के बच्चों की संख्या बढ़ रही है और होली के त्योहार से बच्चों का मोहभंग होता जा रहा है. आज बच्चे होली के त्योहार से खुद को दूर रखने की कोशिश करते हैं.

अगर उन्हें घरपरिवार और दोस्तों के दबाव में होली खेलनी भी पड़े तो तमाम तरह की बंदिशें रख कर वे होली खेलते हैं. पहले जैसी मौजमस्ती करती बच्चों की टोली अब होली पर नजर नहीं आती. इस की वजह यही लगती है कि उन में अब उत्साह कम हो गया है.

1. नशे ने खराब की होली की छवि

पहले होली मौजमस्ती का त्योहार माना जाता था लेकिन अब किशोरों का रुझान इस में कम होने लगा है. लखनऊ की राजवी केसरवानी कहती है, ‘‘आज होली खेलने के तरीके और माने दोनों ही बदल गए हैं. सड़क पर नशा कर के होली खेलने वाले होली के त्योहार की छवि को खराब करने के लिए सब से अधिक जिम्मेदार हैं. वे नशे में गाड़ी चला कर दूसरे वाहनों के लिए खतरा पैदा कर देते हैं ऐसे में होली का नाम आते ही नशे में रंग खेलते लोगों की छवि सामने आने लगती है. इसलिए आज किशोरों में होली को ले कर पहले जैसा उत्साह नहीं रह गया है.’’

2. एग्जाम फीवर का डर

होली और किशोरों के बीच ऐग्जाम फीवर बड़ी भूमिका निभाता है. वैसे तो परीक्षा करीबकरीब होली के आसपास ही पड़ती है. लेकिन अगर बोर्ड के ऐग्जाम हों तो विद्यार्थी होली फैस्टिवल के बारे में सोचते ही नहीं हैं क्योंकि उन का सारा फोकस परीक्षाओं पर जो होता है. पहले परीक्षाओं का दबाव मन पर कम होता था जिस से बच्चे होली का खूब आनंद उठाते थे. अब पढ़ाई का बोझ बढ़ने से कक्षा 10 और 12 की परीक्षाएं और भी महत्त्वपूर्ण होने लगी हैं, जिस से परीक्षाओं के समय होली खेल कर बच्चे अपना समय बरबाद नहीं करना चाहते.

होली के समय मौसम में बदलाव हो रहा होता है. ऐसे में मातापिता को यह चिंता रहती है कि बच्चे कहीं बीमार न पड़ जाएं. अत: वे बच्चों को होली के रंग और पानी से दूर रखने की कोशिश करते हैं, जो बच्चों को होली के उत्साह से दूर ले जाता है. डाक्टर गिरीश मक्कड़ कहते हैं, ‘‘बच्चे खेलकूद के पुराने तौरतरीकों से दूर होते जा रहे हैं. होली से दूरी भी इसी बात को स्पष्ट करती है. खेलकूद से दूर रहने वाले बच्चे मौसम के बदलाव का जल्द शिकार हो जाते हैं. इसलिए कुछ जरूरी सावधानियों के साथ होली की मस्ती का आनंद लेना चाहिए.’’ फोटोग्राफी का शौक रखने वाले क्षितिज गुप्ता का कहना है, ‘‘मुझे रंगों का यह त्योहार बेहद पसंद है. स्कूल में बच्चों पर परीक्षा का दबाव होता है. इस के बाद भी वे इस त्योहार को अच्छे से मनाते हैं. यह सही है कि पहले जैसा उत्साह अब देखने को नहीं मिलता.

‘‘अब हम बच्चों पर तमाम तरह के दबाव होते हैं. साथ ही अब पहले वाला माहौल नहीं है कि सड़कों पर होली खेली जाए बल्कि अब तो घर में ही भाईबहनों के साथ होली खेल ली जाती है. अनजान जगह और लोगों के साथ होली खेलने से बचना चाहिए. इस से रंग में भंग डालने वाली घटनाओं को रोका जा सकता है.’’

3. डराता है जोकर जैसा चेहरा

होली रंगों का त्योहार है लेकिन समय के साथसाथ होली खेलने के तौरतरीके बदल रहे हैं. आज होली में लोग ऐसे रंगों का उपयोग करते हैं जो स्किन को खराब कर देते हैं. रंगों में ऐसी चीजों का प्रयोग भी होने लगा है जिन के कारण रंग कई दिनों तक छूटता ही नहीं. औयल पेंट का प्रयोग करने के अलावा लोग पक्के रंगों का प्रयोग अधिक करने लगे हैं. लखनऊ के आदित्य वर्मा कहता है, ‘‘मुझे होली पसंद है पर जब होली खेल रहे बच्चों के जोकर जैसे चेहरे देखता हूं तो मुझे डर लगता है. इस डर से ही मैं घर के बाहर होली खेलने नहीं जाता.’’

उद्धवराज सिंह चौहान को गरमी का मौसम सब से अच्छा लगता है. गरमी की शुरुआत होली से होती है इसलिए इस त्योहार को वह पसंद करता है. उद्धवराज कहता है, ‘‘होली में मुझे पानी से खेलना अच्छा लगता है. इस फैस्टिवल में जो फन और मस्ती होती है वह अन्य किसी त्योहार में नहीं होती. इस त्योहार के पकवानों में गुझिया मुझे बेहद पसंद है. रंग लगाने में जोरजबरदस्ती मुझे अच्छी नहीं लगती. कुछ लोग खराब रंगों का प्रयोग करते हैं, इस कारण इस त्योहार की बुराई की जाती है. रंग खेलने के लिए अच्छे किस्म के रंगों का प्रयोग करना चाहिए.’’

4. ईको फ्रैंडली होली की हो शुरुआत

‘‘होली का त्योहार पानी की बरबादी और पेड़पौधों की कटाई के कारण मुझे पसंद नहीं है. मेरा मानना है कि अब पानी और पेड़ों का जीवन बचाने के लिए ईको फ्रैंडली होली की पहल होनी चाहिए. ‘‘होली को जलाने के लिए प्रतीक के रूप में कम लकड़ी का प्रयोग करना चाहिए और रंग खेलते समय ऐसे रंगों का प्रयोग किया जाना चाहिए जो सूखे हों, जिन को छुड़ाना आसान हो. इस से इस त्योहार में होने वाले पर्यावरण के नुकसान को बचाया जा सकता है,’’ यह कहना है सिम्बायोसिस कालेज के स्टूडेंट रह चुके शुभांकर कुमार का. वह कहता है, ‘‘समय के साथसाथ हर रीतिरिवाज में बदलाव हो रहे हैं तो इस में भी बदलाव होना चाहिए. इस से इस त्योहार को लोकप्रिय बनाने और दूसरे लोगों को इस से जोड़ने में मदद मिलेगी.’’

एलएलबी कर रहे तन्मय को होली का त्योहार पसंद नहीं है. वह कहता है, ‘‘होली पर लोग जिस तरह से पक्के रंगों का प्रयोग करने लगे हैं उस से कपड़े और स्किन दोनों खराब हो जाते हैं. कपड़ों को धोने के लिए मेहनत करनी पड़ती है. कई बार होली खेले कपड़े दोबारा पहनने लायक ही नहीं रहते. ‘‘ऐसे में जरूरी है कि होली खेलने के तौरतरीकों में बदलाव हो. होली पर पर्यावरण बचाने की मुहिम चलनी चाहिए. लोगों को जागरूक कर इन बातों को समझाना पड़ेगा, जिस से इस त्योहार की बुराई को दूर किया जा सके. इस बात की सब से बड़ी जिम्मेदारी किशोर व युवावर्ग पर ही है.

होली बुराइयों को खत्म करने का त्योहार है, ऐसे में इस को खेलने में जो गड़बड़ियां होती हैं उन को दूर करना पड़ेगा. इस त्योहार में नशा कर के रंग खेलने और सड़क पर गाड़ी चलाने पर भी रोक लगनी चाहिए.’’

5. किसी और त्योहार में नहीं होली जैसा फन

होली की मस्ती किशोरों व युवाओं को पसंद भी आती है. एक स्टूडेंट कहती है, ‘‘होली ऐसा त्योहार है जिस का सालभर इंतजार रहता है. रंग और पानी किशोरों को सब से पसंद आने वाली चीजें हैं. इस के अलावा होली में खाने के लिए तरहतरह के पकवान मिलते हैं. ऐसे में होली किशोरों को बेहद पसंद आती है

‘‘परीक्षा और होली का साथ रहता है. इस के बाद भी टाइम निकाल कर होली के रंग में रंग जाने से मन अपने को रोक नहीं पाता. मेरी राय में होली जैसा फन अन्य किसी त्योहार में नहीं होता. कुछ बुराइयां इस त्योहार की मस्ती को खराब कर रही हैं. इन को दूर कर होली का मजा लिया जा सकता है.’’ ऐसी ही एक दूसरी छात्रा कहती हैं, ‘‘होली यदि सुरक्षित तरह से खेली जाए तो इस से अच्छा कोई त्योहार नहीं हो सकता. होली खेलने में दूसरों की भावनाओं पर ध्यान न देने के कारण कई बार लड़ाईझगड़े की नौबत आ जाती है, जिस से यह त्योहार बदनाम होता है. सही तरह से होली के त्योहार का आनंद लिया जाए तो इस से बेहतर कोई दूसरा त्योहार हो ही नहीं सकता.

‘‘दूसरे आज के किशोरों में हर त्योहार को औनलाइन मनाने का रिवाज चल पड़ा है. वे होली पर अपनों को औनलाइन बधाइयां देते हैं. भले ही हमारा लाइफस्टाइल चेंज हुआ हो लेकिन फिर भी हमारा त्योहारों के प्रति उत्साह कम नहीं होना चाहिए.’’

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