Hindi Story: लोकलाज का इलाज

Hindi Story: डाक्टर राहुल रात को थकेहारे घर लौट कर चैन की नींद सोए ही थे कि अस्पताल से फोन गया. एक बुजुर्ग की हालत बहुत गंभीर थी. डाक्टर राहुल अस्पताल पहुंचे. क्या वे उस मरीज को बचा पाए? दिनभर अस्पताल की भागदौड़ के बाद जब डाक्टर राहुल शाम को घर लौटे, तो थकान जैसे उन के पूरे शरीर में उतर आई थी. कई घंटे लगातार आपरेशन, मरीजों की भीड़ और लगातार आते फोन ने उन की रगरग को थका दिया था. घर पहुंचे तो पत्नी ने चिंता से पूछा, ‘‘इतना थक गए हो राहुलसब ठीक तो था आज अस्पताल में?’’ राहुल ने मुसकराने की कोशिश की, ‘‘आज का दिन बहुत भारी था. लगातार आते मरीज, एक से एक गंभीर केस. बस, अब थोड़ी देर चैन से बैठना चाहता हूं.’’

पत्नी ने गरमागरम खाना परोसा, दोनों ने साथ खाना खाया. हलकीफुलकी बातें हुईं, फिर डाक्टर राहुल बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में खो गए. रात के तकरीबन साढ़े 11 बजे फोन की घनघनाहट ने घर की शांति को तोड़ दिया. पत्नी ने फोन उठाया. फोन पर अस्पताल का रेजिडैंट डाक्टर था, जिस की आवाज में घबराहट साफ झलक रही थी, ‘‘मैम, एक बहुत गंभीर मरीज आया है. 85 साल के बुजुर्ग हैं. तेज बुखार है, होश नहीं है. परिवार वाले कह रहे हैं कि डाक्टर राहुल ही उन की आखिरी उम्मीद हैं.
‘‘सरपंच रामकुमार भी उन के साथ हैं. वे कह रहे हैं कि डाक्टर साहब उनके पुराने परिचित हैं. अगर राहुल सर को एक बार बुला लें, तो शायद मरीज बच जाए.’’
पत्नी बेचैन हो गई थीं. डाक्टर राहुल अभी गहरी नींद में थे. पूरे दिन की थकान के बाद बस कुछ पल आराम के मिले थे.

पत्नी ने रेजिडैंट डाक्टर को समझाने की कोशिश की, ‘‘डाक्टर राहुल बहुत थके हुए हैं. उन की तबियत भी ठीक नहीं है. आप ही इलाज शुरू कीजिए, सुबह होते ही वे खुद देख लेंगे.’’ रेजिडैंट डाक्टर ने कहा, ‘‘मैं संभाल लेता हूं मैम. मैं सब टैस्ट और दवाएं शुरू कर देता हूं.’’ पत्नी ने राहत की सांस ली, ‘‘कम से कम आज तो राहुल को थोड़ा आराम मिल जाएगा.’’ पर मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. 15 मिनट बाद फिर फोन बजा. इस बार आवाज में हताशा थी, ‘‘मैम, मरीज के परिवार वाले नहीं मान रहे. उन का कहना है कि सिविल अस्पताल और बाकी डाक्टरों ने जवाब दे दिया है.
‘‘सब ने कहा है कि अब सिर्फ डाक्टर राहुल ही देख सकते हैं. सरपंच रामकुमार खुद कह रहे हैं कि राहुल सर उन के दोस्त हैं, वे जरूर आएंगे.’’

पत्नी की हालत विचित्र थी. एक ओर डाक्टर राहुल की थकान और उन का सख्त निर्देश था किआज किसी भी हालत में मुझे जगाया जाए’, दूसरी ओर एक जिंदगी की आखिरी सांसें थीं. पत्नी ने इनसानियत का पक्ष चुना और धीरे से डाक्टर राहुल को जगाया और सारी बात बताई. डाक्टर राहुल बिना कोई सवाल किए तुरंत उठे, कपड़े बदले और अस्पताल पहुंच गए. वहां उन्होंने बुजुर्ग मरीज पाला राम की जांच की. उन्हें तेज बुखार था, दिमाग पर चढ़ गया था और होश खो चुका था. डाक्टर राहुल ने तुरंत इलाज शुरू किया, टैस्ट करवाए, दवाएं दीं और परिवार वालों को समझाया,

‘‘इनकी हालत नाजुक है, लेकिन मैं पूरी कोशिश करूंगा.’’
3 घंटे की मेहनत के बाद पाला राम की सांसें सामान्य हुईं, आंखें खुलीं और बुखार उतरने लगा. डाक्टर राहुल के चेहरे पर राहत झलकने लगी. परिवार के एक सदस्य ने हाथ जोड़ कर धन्यवाद दिया,
‘‘डाक्टर साहब, आप ने तो कमाल कर दिया.’’
डाक्टर राहुल मुसकराए, पर ज्यादा कुछ बोले नहीं.
अगली सुबह तकरीबन 4 बजे डाक्टर राहुल घर लौटे और थकान से चूर हो कर सो गए. सुबह अस्पताल पहुंचे तो देखा कि पाला राम की हालत और सुधर रही थी.
डाक्टर राहुल ने परिवार वालों को समझाया, ‘‘अब लगातार दवाएं देते रहिए, एक हफ्ते में हालत काफी बेहतर हो जाएगी.’’
पर बाहर वार्ड के कोने में फुसफुसाहटें शुरू हो चुकी थीं, ‘‘हम तो सोच रहे थे कि यह आज रात ही मर जाएगा, अब तो बचता दिख रहा है.’’
‘‘अब 7 दिन अस्पताल में रखेंगे, तो पैसे कहां से आएंगे?’’
‘‘इतना खर्च कौन करेगा, जब सब डाक्टरों ने पहले ही कह दिया था कि यह नहीं बचेगा?’’

धीरेधीरे उन कानाफूसियों ने एक फैसले का रूप ले लिया. अगले दिन परिवार वालों में से एक ने डाक्टर राहुल से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, हमारी बहू सिविल अस्पताल में भरती है, उस का भी केस गंभीर है. हम 2 जगह इलाज नहीं करा सकते. कृपया छुट्टी दे दीजिए, हम मरीज को घर ले जा कर देखभाल करेंगे.’’
डाक्टर राहुल ने उन्हें बहुत समझाया, ‘‘पाला राम की हालत अभी पहले से बेहतर है, लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं. अगर अब इलाज बीच में छोड़ा, तो हालत फिर बिगड़ जाएगी.’’
परिवार वालों ने सिर झुका दिया. सच यह था कि वे खर्च से घबराए
हुए थे. पैसे थे, इच्छा, पर गांव में यह स्वीकार करना किहम इलाज का खर्च नहीं उठा सकतेउन्हें समाज में बेइज्जती वाला काम लगता, इसलिए उन्होंने अपनीलाजको झूठ का जामा पहन लिया.
पाला राम को छुट्टी दे दी गई. राहुल ने आखिरी बार कहा, ‘‘कम से कम दवा और इंजैक्शन समय पर लगवाते रहिए, तभी उम्मीद है.’’

उन्होंने सिर हिला कर हामी भरी, पर वह सिर्फ औपचारिकता थी. 15 दिन बाद गांव का वही सरपंच रामकुमार अस्पताल आया. डाक्टर राहुल ने पूछा, ‘‘अब कैसे हैं पाला राम?’’ सरपंच रामकुमार ने गहरी सांस ली, ‘‘कल रात उन की मौत हो गई.’’ डाक्टर राहुल सन्न रह गए, ‘‘कैसे? वे तो ठीक हो रहे थे…’’ सरपंच ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘घर ले जा कर उन्होंने सारी दवाएं बंद कर दीं. गांव वालों से कहा, डाक्टर राहुल ने खुद जवाब दे दिया है, अब बस सेवा करो. शायद पैसे की भी तंगी थी, पर असली वजह थी लोकलाज. ‘‘उन्हें डर था कि गांव वाले कहेंगे कि शहर में रह कर इलाज क्यों नहीं करवाया? क्यों उस को
बचाने की कोशिश नहीं की गई? इसलिए उन्होंने झूठ बोलना ही आसान समझा.’’
डाक्टर राहुल लंबे समय तक चुप रहे. मन में तूफान था. एक ओर डाक्टर के रूप में उन का काम, जो पूरी ईमानदारी से निभाया गया था, दूसरी ओर समाज का वह सच, जहां झूठी लाज के लिए लोग जिंदगी की डोर काट देते हैं.

डाक्टर राहुल ने सोचा, ‘गरीबी तो फिर भी किसी दिन मिट सकती है, पर यह दिखावे की बीमारीयह समाज के भीतर का जहर है, जो आदमी से उस का इनसान छीन लेती है.’ उस रात डाक्टर राहुल बहुत देर तक छत की ओर टकटकी लगाए रहे. उन की आंखों में सिर्फ एक चेहरा था, पाला राम का, जो मरते समय शायद यह भी नहीं जानता था कि उसे उस के अपने ही लोग उस की झूठीइज्जतके लिए मौत की तरफ धकेल गए. डाक्टर राहुल की आंखों से एक बूंद गिरी. वह आंसू किसी मरीज के लिए नहीं था, बल्कि उस समाज के लिए था, जो आज भीलाजके नाम परजिंदगीकी कीमत चुका देता है.   

डा. सुभाष चंद्र गर्ग ‘पार्थ’

Film: रवि गोसाईं-अदाकारी का अलहदा सफर

Film: गुल आप अपनी शुरुआती जिंदगी के बारे में बताइए. मैं मूल रूप से दिल्ली का रहने वाला हूं. मेरी पढ़ाई लिखाई जैसे स्कूलकालेज सबकुछ दिल्ली से ही हुआ. मेरे मातापिता पंजाब से थे, लेकिन आज अगर पहचान की बात करूं, तो मैं खुद को पूरी तरह मुंबई का मानता हूं. यही शहर है जहां मैं ने अपने सपनों को जिया और उन्हें पूरा होते देखा.


आप की एक्टिंग और डांस की शुरुआत कैसे हुई?
बचपन से ही मुझे एक्टिंग और डांस का बेहद शौक था. पहले मैं ने प्रोफैशनल डांसिंग शुरू की और साथसाथ थिएटर वर्कशौप्स करने लगा. इसी दौरान नुक्कड़ नाटक किए, जिस से एक्टिंग की समझ और जमीन से जुड़ाव मिला.

आप को मुंबई आने का पहला बड़ा ब्रेक कैसे मिला?
मेरे कालेज के एक सीनियर दोस्त थे, जो डायरैक्टर गिरीश मलिक के साथ काम कर रहे थे. वे एक टीवी शो में लीड रोल कर रहे थे और उसी शो के लिए एक और किरदार कास्ट होना बाकी था. उन्होंने मेरा नाम डायरैक्टर साहब को दिया और मुझे मुंबई बुलाया गया. वह शो थापरवरिश’, जो जी टीवी पर आया और जिस में किरण कुमार मेरे पिता के रोल में थे.


आप का फिल्म की दुनिया में आगे का सफर कैसा रहा?
इस के बाद मैं केतन मेहता के असिस्टैंट प्रशांत नारायणन के साथ पृथ्वी थिएटर में एक्टिंग वर्कशौप्स करने लगा. उन्हीं के जरीए मुझे फिल्मओह डार्लिंग, ये है इंडियामें काम मिला. फिर मेरी जिंदगी का एक बेहद अहम मोड़ आया, जब मेरा दोस्त भूपिंदर, जो उस वक्त मेरा फ्लैटमेट भी था, ने मुझे गुलजार साहब की फिल्ममाचिसके बारे में बताया और उन से मुलाकात तय कराई. पहली ही मीटिंग में गुलजार साहब ने मुझे पसंद कर लिया. उन के साथ काम करना हर एक्टर का सपना होता है और मेरा सपना अचानक सच हो गया.


सीरियल ‘परवरिश’ के बाद टीवी में आप का सफर कैसे आगे बढ़ा?
फिल्ममाचिसके बाद जब मैं अलगअलग डायरैक्टर्स से मिलने लगा, तो संजीव भट्टाचार्य और रवि राय के पास अकसर जाता था. एक दिन मुझे संजीव भट्टाचार्य का फोन आया और उन्होंने कहा, ‘अब तो तुम्हारी फिल्म इतनी बड़ी हिट हो गई है, क्या अब भी मेरे साथ टीवी में काम करोगे?’ मैं ने बिना सोचेहांकर दी.
मैंअमानतसीरियल मेंचंदरका रोल करना चाहता था, लेकिन संजीव भट्टाचार्य ने कहा, ‘वह रोल तो कोई भी कर सकता है, लेकिननिगोड़ेके लिए मुझे एक मंझा हुआ, पुख्ता एक्टर चाहिए. इस किरदार में बहुत शेड्स हैं, जैसे यह हंसाता भी है, रुलाता भी है.’उस एक लाइन ने मुझे क्लीन बोल्ड कर दिया और वही किरदार मेरे लिए यादगार बन गया.


फिल्म ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ आप के लिए क्यों खास थी?
शूटआउट एट लोखंडवालामेरी जिंदगी की बेहद अहम फिल्म है. भले ही मेरा एक बड़ा सीन छोटा हो गया था, लेकिन किरदार बहुत असरदार था. सब से बड़ी बात यह रही कि मुझे फिल्म के पोस्टर में जगह मिली. प्रीमियर शो के दौरान मेरा कटआउट अमिताभ बच्चन साहब के साथ लगा हुआ था. वह पल मेरे लिए यादगार था. और जब फिल्म सुपरहिट हो जाए, तो फायदा तो होता ही है.


आप की महेश भट्ट के साथ जुड़ने की कहानी काफी चर्चित है. क्या था वह किस्सा?
हां, यह बिलकुल सच है. महेश सर अकसर नए एक्टर्स को सीधे फोन कर लेते हैं. एक पंजाबी फिल्मशेरा क्रैकके लिए गिरीश धमीजा के कहने पर उन्होंने मुझे चुना और खुद फोन किया. मैं उस समय सो रहा था. नींद में ही बोला, ‘कौन है यार, सो रहा हूं…’ उधर से आवाज आई, ‘मैं महेश भट्ट बोल रहा हूं. जब तुम सो रहे थे, तुम्हारी किस्मत जाग रही थी. उठ कर औफिस जाना.’ फोन रखते ही 5 मिनट बाद मुझे होश आया और मैं दौड़ पड़ा उन से मिलनेऔर मुझेशेरा क्रैकमिल गई.


आप का ‘द गांधी मर्डर केस’ फिल्म में इंटरनैशनल एक्टर्स के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
उस फिल्म में मुझे हौलीवुड के शानदार कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला, जिन में स्टीफन लैंग भी शामिल थे. साथ ही, ओम पुरी के साथ तकरीबन एक महीना बिताने का मौका मिला.


फिलहाल आप किन प्रोजैक्ट्स पर काम कर रहे हैं?
हाल ही मेंमेहंदी वाला घरऔरमेघा बरसेंगेसीरियल खत्म हुए हैं. इस के बाद वर्टिकल शोज की
एक लाइन सी लग गई हैअब तक मैं 6 सीरीज कर चुका हूं.इस समय मैं सन टीवी के बेहद हिट शोनंदिनी पार्ट 2 (राजनंदिनी)’ की शूटिंग कर रहा हूं, जो अप्रैल महीने तक वडोदरा में चलेगी. इस में मैं भास्कर का मेन नैगेटिव किरदार निभा रहा हूं. एक ऐसा इनसान, जो 2 अलगअलग रूपों में जी रहा है.


सोशल मीडिया को आप कैसे देखते हैं?
अगर सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल किया जाए, तो यह बहुत पौजिटिव टूल है, लेकिन इस की एक लिमिट तय होनी चाहिए वरना यह समय भी खराब कर सकता है. आज इस के अच्छे और बुरे दोनों तरह के असर देखने को मिलते हैं.                                            

Feature Story: “ज़िंदगी झंडवा, फिर भी घमंडवा में जीने वाले रवि किशन की फर्श से अर्श तक की कहानी

Feature Story: भोजपुरी सिनेमा को आसमान की ऊंचाइयों पर ले जाने और खुद माटी से जुड़े रहने वाले, भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री का अमिताभ बच्चन कहे जाने वाले रवि किशन का जीवन सोने की तरह आग में तपकर चमका है. चंद रुपए अपनी जेब में लेकर सपनों की नगरी में पहुंचे रवि किशन अपनी मेहनत के बलबूते आज करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं.

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में जन्मे रवि किशन को बचपन से ही अभिनय में दिलचस्पी थी. उनका असली नाम रविंद्र नाथ शुक्ला है. गांव में होने वाली रामलीलाओं में वे सीता का किरदार निभाया करते थे. उनके पिता एक पुजारी थे. रवि किशन का एक्टिंग की तरफ झुकाव उन्हें बिलकुल पसंद नहीं था, लेकिन मां ने हमेशा उन का साथ दिया और उनका हौसला बढ़ाया.

रवि किशन की मां ही थीं जिन्होंने उनके सपनों को पंख दिए. अभिनय के सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने रवि किशन को अपनी जमा पूंजी देकर मुंबई भेजा. लेकिन वहां काम ढूंढ़ना बिलकुल आसान नहीं था. संघर्ष के दिनों में वे एक छोटे से 10×12 के कमरे में 12 लोगों के साथ रहते थे और अक्सर एक ही थाली में पानी वाली खिचड़ी खाकर दिन गुजारते थे. अभिनय के मौके तलाशने के साथसाथ अपना खर्च चलाने के लिए कई छोटेमोटे काम भी किए.

‘जिंदगी झंडवा, फिर भी घमंडवा, डायलॉग को असल मायनों में जीने वाले रवि किशन ने फिल्म ‘लापता लेडीज’ में भी जबरदस्त एक्टिंग से फिल्म में चार चांद लगाए थे. अपने दमदार अभिनय के दम पर उन्होंने केवल हिंदी और भोजपुरी ही नहीं, बल्कि तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फिल्मों में भी अपना लोहा मनवाया.

रवि किशन ने 600 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है. इसके अलावा वे रियलिटी शो ‘बिग बॉस’ और ‘झलक दिखला जा’ में भी हिस्सा ले चुके हैं, जिनकी बदौलत उन्हें छोटे पर्द पर जबरदस्त लोकप्रियता मिली.

रवि किशन आज न केवल फिल्मों में, बल्कि राजनीति में भी अपनी भूमिका दमदार तरीके से निभा रहे हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर अपने गृह जिले जौनपुर (उत्तर प्रदेश) से की थी. हालांकि, उस समय उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 2017 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के साथ उनकी खट्टीमीठी नोकझोंक अकसर सोशल मीडिया पर खूब वायरल होती है. भाजपा के साथ उनका तालमेल सफल रहा और आज वे गोरखपुर से एक प्रभावशाली सांसद हैं.Feature Story

Equality Struggle: दलित नौजवान – अपनी मशाल खुद बनें

Equality Struggle: हर साल 14 अप्रैल को ‘अंबेडकर जयंती’ के मौके पर ‘नीला गमछा’ गले में लटका कर डाक्टर भीमराव अंबेडकर की एक हाथ में संविधान पकड़े और दूसरे हाथ से आसमान को उंगली दिखाती मूर्ति के ‘चरणों’ में झुक कर गुलाब या गेंदे के ‘लालपीले फूल’ चढ़ा देने भर से अगर आप ने काले फ्रेम का चश्मा और कोटपैंट पहने इस इनसान की सोच पकड़ ली है, तो आप गलत दिशा में जा रहे हैं. आप की इस इनसान को ले कर भ्रामक सोच आज भी कायम है.

डाक्टर भीमराव अंबेडकर को सम झने के लिए हमें जातिवाद के उस जहरीले सांप को सम झना होगा, जिस ने अपने अहंकार में आज तक अपनी केंचुली भी नहीं बदली है. हमें समाज की बेकार सोच के उस कूड़ेदान से वह आईना बाहर निकालना होगा, जिस में शूद्रों को उन की परछाईं तक नहीं दिखती है. कितने भयावह हालात हैं न?

एक उदाहरण से समझते हैं. एक समय देश के सब से ज्यादा पढ़ेलिखे लोगों में शुमार डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान को ले कर अपने एक भाषण में कहा था, ‘मैं यहां पर संविधान की अच्छाइयां गिनाने नहीं जाऊंगा, क्योंकि मु झे लगता है संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, वह अंतत: बुरा साबित होगा, अगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग बुरे होंगे. और संविधान कितना भी बुरा क्यों न हो, वह अंतत: अच्छा साबित होगा, अगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग अच्छे होंगे.’

किसी इनसान के अच्छा या बुरा होने की इस से ज्यादा सटीक व्याख्या नहीं हो सकती, क्योंकि यह बात वह आदमी भरी संसद में बोल रहा है, जिसे अपने बचपन से ले कर आज तक जाति के नाम पर दुत्कार, पीड़ा और नफरत ही मिली है. आज भले ही उस ने अपनी पढ़ाईलिखाई से अपने विचारों को ‘शुद्ध’ कर लिया है, पर जब वह यह शिक्षा पा रहा था, तब स्कूल में उसे ‘अशुद्ध’ होने का ‘जातिगत तमगा’ देने वालों ने पूरी ‘श्रद्धा’ से चाहा था कि ब्रह्मा के पैर से जन्मा यह ‘अछूत’ अपने पुश्तैनी काम के बो झ तले दब कर कीड़ेमकोड़े की तरह मरखप जाए.

अब आज की बात करते हैं. इसी साल सितंबर का महीना और जगह उत्तर प्रदेश का बाराबंकी जिला. वहां के मसौली थाना इलाके के मलौली मजरे डापलिन पुरवा के रहने वाले निचली जाति के उदयभान निर्मल के मुताबिक, वह यूपीएसआई (उत्तर प्रदेश पुलिस सबइंस्पैक्टर) की तैयारी कर रहा था और इस के लिए वह चौराहे पर बनी क्वांटम लाइब्रेरी में रोजाना पढ़ने के लिए जाता था.

आरोप है कि रविवार, 21 सितंबर को दोपहर 2 बजे के बाद लंच हुआ और खाना खाने के लिए सभी छात्र एकत्र हुए. इसी बीच उदयभान निर्मल ने गलती से किसी दूसरे छात्र का टिफिन छू दिया. उस ऊंची जाति के प्रदुम्न ने जातिगत नफरत दिखाते हुए टिफिन दूर फेंक दिया.

पीडि़त छात्र उदयभान निर्मल के मुताबिक, प्रदुम्न ने टिफिन फेंकते हुए कहा कि तुम नीची जाति के हो, मेरे साथ बैठ कर खाना नहीं खा सकते. तुम्हारा काम जूतेचप्पल की मरम्मत करना है, पढ़ाईलिखाई करना तुम्हारा काम नहीं है.

पीडि़त उदयभान निर्मल आगे ने बताया कि प्रदुम्न ने जातिसूचक अपशब्द और गाली देने के बाद दोस्तों को फोन कर के बुला लिया और उस की बेरहमी से पिटाई कर दी. आगे कुछ कार्रवाई करने पर जान से मारने की धमकी दी.

बेइज्जती और मारपीट से दुखी दलित छात्र उदयभान निर्मल ने मसौली थाने में तहरीर दे कर कार्रवाई की मांग की है.

उदयभान निर्मल का कहना है कि वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है, लेकिन ‘शिक्षा के मंदिर’ (लाइब्रेरी) में भी जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा, जो बेहद दुखद और शर्मनाक है.

उदयभान ने भले ही अपने नाम के आगे ‘निर्मल’ लगा है, पर वह प्रदुम्न जैसे अगड़ी जाति वालों के मन का मैल धो नहीं पा रहा है. लाइब्रेरी, जहां शांत रह कर शिक्षा हासिल की जाती है, वहां भी प्रदुम्न के मन में ‘जातिवाद का शोर’ इतना ज्यादा हावी था कि उसे उदयभान की हलकी सी छुअन भी स्वीकार नहीं हुई.

‘तुम्हारा काम जूतेचप्पल की मरम्मत करना है, पढ़ाईलिखाई करना तुम्हारा काम नहीं है’ वाली यह सोच प्रदुम्न में अचानक से नहीं जन्मी है, बल्कि इसे तो उस के बड़े ने पालपोस कर विरासत में दिया है कि भले ही देश कितनी भी तरक्की कर जाए, संविधान कितना भी मजबूत हो जाए, पर ये दोनों तुम्हारे जूते की नोक पर रहेंगे, क्योंकि तुम ‘बह्मा की श्रेष्ठ संतान’ हो, ‘ब्लू ब्लड’ हो. तुम देश और संविधान से भी ऊपर हो. यह ‘वैचारिक बुल्डोजर’ सदियों से वंचित समाज को रौंदता आया है.

यहां सवाल उठता है कि क्या जातिवाद को खत्म करने के लिए पढ़ाईलिखाई को वंचितों का हथियार बनाया जा सकता है? हां, पर हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि निचली जाति के लोगों में पढ़ाईलिखाई को ले कर सोच क्या बनी हुई है.

पढ़ाई करने से हम देश, समाज और दुनिया के प्रति जागरूक होते हैं, अच्छा रोजगार पाते हैं, चार लोगों में अपने विचार रखने की सोच बना पाते हैं, पर साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि जिस देश और समाज में हम रह रहे हैं, उस पर धार्मिक कट्टरता बहुत ज्यादा हावी हो गई है. हर किसी को अपनेअपने ईश्वर की तलाश सी रहती है. यही वजह है कि वंचित समाज ने भी डाक्टर भीमराव अंबेडकर में अपना ईश्वर तलाशना शुरू कर दिया है. यह मूर्तिपूजा का ही नया रूप है, क्योंकि इस तलाश में भीमराव अंबेडकर के विचार तो दब गए हैं.

पाखंडी पंडेपुजारी तो चाहते हैं कि उन के मंदिरों में वे भक्त ही भेड़ की तरह सिर झुकाए चले आएं, जिन में दानपात्र भरने की ताकत है, फिर चाहे वे किसी भी समाज, समुदाय और जाति के क्यों न हों. फटेहाल दलित अंबेडकर की मूर्ति में उल झे रहें, नीले गमछे के बो झ में दबे रहें, नेता के भाषणों को सुनने वाली भीड़ बने रहें और थोड़ा सा बरगलाने पर ढेर सारे वोट सियासी रहनुमाओं के बैलेट बौक्स में दान स्वरूप चढ़ा दें, यही काफी है. वे बिना सिर के (बेदिमाग) वोटबैंक हैं, जिन्हें सिर्फ चुनाव में चूना लगाया जाता है.

यह सियासी प्रपंच तब और ज्यादा बढ़ा, जब हर नेता को यह लगा कि दलित समाज डाक्टर अंबेडकर के नाम पर एकजुट हो गया है या हो सकता है. नेताओं ने इसे अपना ‘दलित प्रेम’ बताया पर हकीकत में ऐसा नहीं है. हर दल इस समुदाय से ‘सियासी स्वार्थ’ साध रहा है, इन के घर भोजन करने की नौटंकी कर रहा है, इन्हें ‘सुरक्षित सीट’ से टिकट दे रहा है, पर भला कुछ नहीं कर रहा. खुद इस समाज से निकले नेता भी कागजी शेर बन कर रह गए हैं. अगड़ों का ‘यैसमैन’ कहलाने में इन्हें अलग तरह का सुख मिलता है.

इस बात को इस उदाहरण से सम झते हैं. ‘फौरवर्ड प्रैस’ में कंवल भारती का एक लेख छपा था, जिस में उत्तर प्रदेश में हाथरस जिले की इगलास सुरक्षित सीट से साल 2017 में चुने गए विधायक राजवीर दिलेर का जिक्र किया गया था. इन के पिता किशन लाल भी 5 बार के विधायक और एक बार के सांसद थे. पढ़ाईलिखाई इन की ज्यादा नहीं है.

राजवीर दिलेर के बारे में पत्रकार आलोक शर्मा की एक रिपोर्ट अखबार ‘टाइम्स औफ इंडिया’ में छपी थी, जिस के मुताबिक ये सवर्णों के यहां जमीन पर बैठते हैं, चाय के लिए अपना कप अपने साथ रखते हैं और कहते हैं कि ‘मेरे बाप भी जातिवाद मानते थे, और मैं भी मानता हूं’.

राजवीर दिलेर का सुरक्षित क्षेत्र जाटों का इलाका है, जिन की तादाद 90,000 है. इन्हीं के वोटों पर इस दलित की जीत निर्भर करती है. क्या इस विधायक से दलितों के लिए काम करने की उम्मीद की जा सकती है?

शायद नहीं, क्योंकि ऐसे नेता भी वोटबैंक की ताकत सम झते हैं. इन्हें भले ही ‘सुरक्षित सीट’ मिल जाती है, पर जब तक दूसरी जातियों का हाथ इन के सिर पर नहीं आता है, तब तक इन का जीतना बड़ा मुश्किल होता है.

जब नेताओं का ऐसा गठजोड़ बनता है, तो दलित तबके के गरीब और अनपढ़ लोग तो क्या, अच्छे पढ़ेलिखे और ‘वैल सैटल्ड’ लोग भी तन और मन से हताश हो जाते हैं. हरियाणा में आईपीएस वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी का मामला इसी प्रशासनिक और राजनीतिक अंधेरगर्दी का नतीजा है, जहां एक बड़ा अफसर 7 अक्तूबर, 2025 को चंडीगढ़ में गोली मार कर अपनी जिंदगी खत्म कर लेता है.

आईपीएस वाई. पूरन कुमार आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे. उन का जन्म 27 अक्तूबर, 1977 को हुआ था. उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से पीजीडीएमसी किया था. इस के बाद उन्होंने यूपीएससी की तैयारी की और ऐग्जाम क्लियर किया. वे साल 2001 बैच के हरियाणा कैडर के आईपीएस अफसर थे.

फिलहाल वाई. पूरन कुमार रोहतक रेंज के आईजी थे. 29 सितंबर, 2025 को ही उन का ट्रांसफर हुआ था. उन्हें अब रोहतक के सुनरिया में पुलिस ट्रेनिंग कालेज में आईजी के तौर पर पोस्टिंग मिली थी.

वाई. पूरन कुमार कई सालों से सिस्टम से परेशान थे. मई, 2021 में उन्होंने अंबाला के एसपी के सामने तब के डीजीपी मनोज यादव के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. उन का आरोप था कि उन्हें उन की जाति के चलते परेशान और सताया जाता है.

नवंबर, 2023 में वाई. पूरन कुमार ने तब के मुख्य सचिव संजीव कौशल से उस समय के गृह सचिव टीवीएसएन प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की इजाजत मांगी थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि उन की जाति के चलते उन्हें गैर कैडर पद पर तैनात किया गया था.

पिछले साल अप्रैल में वाई. पूरन कुमार ने साल 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनावों से ठीक पहले चुनाव आयोग के सामने एक शिकायत दर्ज कराई थी, जिस में उन्होंने आरोप लगाया था कि आचार संहिता लागू होने के बाद 2 एजीजीपी को डीजीपी और 2 आईजी को एडीजीपी के तौर पर प्रमोट किया गया था.

अपने सुसाइड नोट में आपीएस वाई. पूरन कुमार ने 8 आईपीएस और 2 आईएएस अफसरों पर आरोप लगाए थे. उन्होंने जिन पर आरोप लगाया था, उन में 8 आईपीएस अमिताभ ढिल्लों, मनोज यादव, पीके अग्रवाल, संदीप खिरवार, सिबास कविराज, संजय कुमार, पंकज नैन और डाक्टर रवि किरण आदि के नाम शामिल हैं. इन के अलावा 2 रिटायर्ड आईएएस राजीव अरोड़ा और टीवीएसएन प्रसाद का नाम भी है.

अब आप सोचिए कि इतने बड़े रैंक का बड़ा सरकारी अफसर, जिस पर अपने इलाके में शांति और भाईचारा बनाने का दबाव रहता है, वह अपनी जाति की हीनता के बो झ तले दबाया जा रहा था. वह भी ऐसे लोगों द्वारा जो उसी के ‘प्रशासनिक भाईबंधु’ थे.

तो क्या जातिवाद का यह जहरीला सांप कभी भी केंचुली नहीं उतरेगा? चूंकि हमारे समाज में जातपांत बहुत गहरे तक पैठ जमाए हुए है, तो लगता है कि फिलहाल यह दूर की कौड़ी है, पर यहां एक बात जो बहुत ज्यादा अहम है, वह है इस बहुजन समाज की आपसी एकता, जिसे पढ़ाईलिखाई से और ज्यादा मजबूत किया जा सकता है.

दूसरा तरीका यह है कि जहां आप रहते हैं, उस घर, गली, महल्ले को व्यवस्थित करें. लोगों को यह मत सोचने दें कि उन का गंदगी या गरीबी में रहना पिछले जन्म का पाप है, जिसे वे आज इस जन्म में भोग रहे हैं. दुनिया की कोई भी ताकत आप को साफसुथरा और आप के आसपास की जगह को ‘नीट एंड क्लीन’ बनाने से रोक नहीं सकती है.

तीसरा, अपने आसपास के लोगों में फैली सामाजिक बुराइयों को जड़ से खत्म करने का बीड़ा उठाएं. आप कोई बड़े अफसर बने हैं, तो यह मत सम झें कि अब निकलो इस नरक से जहां हमारी पुरानी पीढि़यां जानवर से बदतर जिंदगी गुजार कर मरखप गईं. इस उलट आप की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि समाज के इस हिस्से को कैसे अंधविश्वास, नशाखोरी, बेरोजगारी, आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने से रोका जाए.

रास्ता दिखाने के लिए एक के हाथ में ही मशाल होना काफी है. अपनी मशाल खुद बनें. जातिवाद के अंधेरे से निबटने का यही एकमात्र रास्ता है. Equality Struggle

Success Story: सपनों की उड़ान – मजदूरी करने वाला शुभम शबर बना डाक्टर

Success Story: यह कहना बिलकुल गलत नहीं होगा कि जिस के अंदर कुछ कर गुजरने का जुनून हो, उस के लिए कोई हालात मायने नहीं रखते. ओडिशा के रहने वाले शुभम शबर इस की एक मिसाल हैं. शुभम की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी. घर की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए उन्हें बेंगलुरु जा कर मजदूरी करनी पड़ी. कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें महीने में केवल 15,000 रुपए ही मिलते थे. इसी रकम से वे न सिर्फ अपने परिवार का खर्च उठाते थे, बल्कि खुद की पढ़ाई का सपना भी जिंदा रखते थे.

डाक्टर बनने की चाह ने शुभम को कभी हार नहीं मानने दी. दिनभर मजदूरी करने के बाद उन्होंने रातों को किताबों और औनलाइन फ्री लैक्चर्स से पढ़ाई की. पैसों की तंगी होने के बावजूद उन्होंने उधार किताबें लीं और जितना हो सका खुद को पढ़ाई में झोंक दिया.

उन की यह लगन और मेहनत आखिरकार रंग लाई. शुभम ने इस साल नीट (NEET) परीक्षा पास कर यह साबित कर दिया कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, सच्ची मेहनत कभी बेकार नहीं जाती.

आज शुभम की कहानी उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो हालात से हार मान लेते हैं. वे इस बात के जीतेजागते उदाहरण हैं कि अगर इरादा मजबूत हो तो सीमित साधन भी बड़े सपनों को हकीकत बना सकते हैं. Success Story

ससुराल में पूरे हुए रूपा के सपने

लेखक- डा. श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

रूपा यादव की तीसरी जमात में पढ़ते हुए ही 8 साल की अबोध उम्र में शादी हो गई थी. रूपा ने ब्याहता बन कर भी घर का कामकाज करने के साथसाथ अपनी पढ़ाई जारी रखी.

शादी के बाद गौना नहीं होने तक रूपा मायके में पढ़ी और फिर ससुराल वालों ने उसे पढ़ाया. ससुराल में पति और उन के बड़े भाई यानी रूपा के जेठ ने सामाजिक रूढि़यों को दरकिनार करते हुए रूपा की पढ़ाई जारी रखी. पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए दोनों भाइयों ने खेती करने के साथसाथ टैंपो भी चलाया.

रूपा ने ससुराल का साथ मिलने पर डाक्टर बनने का सपना संजोया और 2 साल कोटा में रह कर एक इंस्टीट्यूट से कोचिंग कर के दिनरात पढ़ाई की.

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जयपुर के चैमू क्षेत्र के गांव करेरी की रूपा यादव, जिस ने नीट 2017 में 603 अंक हासिल किए थे, को प्रदेश के सरकारी सरदार पटेल मैडिकल कालेज में दाखिला मिल गया.

ऐसी है कहानी

रूपा यादव गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ती थी. जब वह तीसरी क्लास में थी, तब उस की शादी कर दी गई. गुडि़यों से खेलने की उम्र में ही वह शादी के बंधन में बंध गई थी. दोनों बहनों की 2 सगे भाइयों से शादी हुई थी. उस के पति शंकरलाल की भी उम्र तब 12 साल की थी. रूपा का गौना 10वीं जमात में हुआ था.

गांव में 8वीं जमात तक का सरकारी स्कूल था, तो वह उस में ही पढ़ी. इस के बाद पास के गांव के एक प्राइवेट स्कूल में दाखिला लिया और वहीं से 10वीं जमात तक की पढ़ाई की.

10वीं जमात का इम्तिहान दिया. जब रिजल्ट आया तब रूपा ससुराल में थी. पता चला कि 84 फीसदी अंक आए हैं. ससुराल में आसपास की औरतों ने घर वालों से कहा कि बहू पढ़ने वाली है, तो इसे आगे पढ़ाओ.

शंकरलाल ने इस बात को स्वीकार कर रूपा का दाखिला गांव से तकरीबन 6 किलोमीटर दूर प्राइवेट स्कूल में करा दिया.

रूपा के 10वीं जमात में अच्छे अंक आए. पढ़ाई के दौरान ही उस के सगे चाचा भीमाराव यादव की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई. उन्हें पूरी तरह से उपचार भी नहीं मिल सका था.

इस के बाद ही रूपा ने बायलौजी विषय ले कर डाक्टर बनने का निश्चिय किया. 11वीं जमात की पढ़ाई के दौरान रूपा बहुत कम स्कूल जा पाती थी. वह घर के कामकाज में भी पूरा हाथ बंटाती थी. गांव से 3 किलोमीटर स्टेशन तक जाना होता था. वहां से बस से

3 किलोमीटर दूर वह स्कूल जाती थी. उस के 11वीं जमात में भी 81 फीसदी अंक आए. उस ने 12वीं जमात का इम्तिहान दिया और 84 फीसदी अंक हासिल किए.

बाद में रूपा यादव ने बीएससी में दाखिला ले लिया. बीएससी के पहले साल के साथ एआईपीएमटी का इम्तिहान भी दिया. इस में उस के 415 नंबर आए और 23,000वीं रैंक आई.

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लिया बड़ा फैसला

रूपा के पति व जेठ ने फैसला किया कि जमीन बेचनी पड़ी तो बेच देंगे, लेकिन रूपा को पढ़ाएंगे. रूपा कोटा में पढ़ने गई तो वहां का माहौल आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने वाला था. टीचर बहुत मदद करते थे. कोटा में रह कर एक साल मेहनत कर के रूपा अपने लक्ष्य के बहुत करीब पहुंच गई.

रूपा ने पिछले साल नीट में 506 अंक हासिल किए, लेकिन लक्ष्य से थोड़ी सी दूर रह गई. फिर से कोचिंग करने में परिवार की गरीबी आड़े आ रही थी. परिवार उलझन में था कि कोचिंग कराएं या नहीं. ऐसे में एक कैरियर इंस्टीट्यूट ने रूपा का हाथ थामा और उसे पढ़ाई के लिए प्रेरित किया.

उस संस्थान द्वारा रूपा की 75 फीसदी फीस माफ कर दी गई. सालभर तक उस ने दिनरात मेहनत की और 603 अंक हासिल किए. नीट रैंक 2283 रही. अगर वह कोटा नहीं आती, तो शायद आज बीएससी कर के घर में ही काम कर रही होती.

रूपा ने लोगों के ताने भी सहे, लेकिन हिम्मत नहीं हारी. तभी तो वह आज यहां तक भी पहुंच पाई है. इस में उस की ससुराल का बहुत बड़ा योगदान रहा है. पहले साल सिलैक्शन नहीं हुआ या तो खुसुरफुसुर होने लगी कि क्यों पढ़ा रहे हो? क्या करोगे पढ़ा कर? घर की बहू है तो काम कराओ.

इस तरह की बातें होने लगी थीं. यही नहीं, कोटा में पढ़ाई के दौरान ससुराल वालों ने खर्चों की भरपाई के लिए उधार पैसे ले कर भैंस खरीदी थी, ताकि दूध दे कर ज्यादा कमाई की जा सके, लेकिन वह भैंस भी 15 दिन में मर गई. इस से तकरीबन सवा लाख रुपए का घाटा हुआ, लेकिन ससुराल वालों ने उसे कुछ नहीं बताया, बल्कि पति व जेठ और मजबूत हो गए. इस से रूपा बहुत प्रोत्साहित हुई और उस ने पढ़ने में बहुत मेहनत की.

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कोटा में रहने व दूसरे खर्च उठाने के लिए पति और जेठ टैंपो चलाने का काम करने लगे, जबकि रूपा रोजाना 8 से 9 घंटे पढ़ाई करती थी. रूपा जब कभी घर जाती है, तो घर का सारा काम भी बड़ी लगन से करती है. सुबहशाम का खाना बनाने के साथसाथ झाड़ूपोंछा लगाना उस की दिनचर्या में शामिल है. इस के साथ ही खेत में खरपतवार हटाने के काम में भी रूपा हाथ बंटाती है.

रूपा ने असाधारण हालात के बावजूद कामयाबी हासिल की है. रूपा की मदद का सिलसिला जारी रखने के लिए एक संस्थान ने उसे एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान 4 साल तक मासिक छात्रावृत्ति देने का फैसला किया है.

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