Hindi Story: डाक्टर राहुल रात को थकेहारे घर लौट कर चैन की नींद सोए ही थे कि अस्पताल से फोन गया. एक बुजुर्ग की हालत बहुत गंभीर थी. डाक्टर राहुल अस्पताल पहुंचे. क्या वे उस मरीज को बचा पाए? दिनभर अस्पताल की भागदौड़ के बाद जब डाक्टर राहुल शाम को घर लौटे, तो थकान जैसे उन के पूरे शरीर में उतर आई थी. कई घंटे लगातार आपरेशन, मरीजों की भीड़ और लगातार आते फोन ने उन की रगरग को थका दिया था. घर पहुंचे तो पत्नी ने चिंता से पूछा, ‘‘इतना थक गए हो राहुलसब ठीक तो था आज अस्पताल में?’’ राहुल ने मुसकराने की कोशिश की, ‘‘आज का दिन बहुत भारी था. लगातार आते मरीज, एक से एक गंभीर केस. बस, अब थोड़ी देर चैन से बैठना चाहता हूं.’’

पत्नी ने गरमागरम खाना परोसा, दोनों ने साथ खाना खाया. हलकीफुलकी बातें हुईं, फिर डाक्टर राहुल बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में खो गए. रात के तकरीबन साढ़े 11 बजे फोन की घनघनाहट ने घर की शांति को तोड़ दिया. पत्नी ने फोन उठाया. फोन पर अस्पताल का रेजिडैंट डाक्टर था, जिस की आवाज में घबराहट साफ झलक रही थी, ‘‘मैम, एक बहुत गंभीर मरीज आया है. 85 साल के बुजुर्ग हैं. तेज बुखार है, होश नहीं है. परिवार वाले कह रहे हैं कि डाक्टर राहुल ही उन की आखिरी उम्मीद हैं.
‘‘सरपंच रामकुमार भी उन के साथ हैं. वे कह रहे हैं कि डाक्टर साहब उनके पुराने परिचित हैं. अगर राहुल सर को एक बार बुला लें, तो शायद मरीज बच जाए.’’
पत्नी बेचैन हो गई थीं. डाक्टर राहुल अभी गहरी नींद में थे. पूरे दिन की थकान के बाद बस कुछ पल आराम के मिले थे.

पत्नी ने रेजिडैंट डाक्टर को समझाने की कोशिश की, ‘‘डाक्टर राहुल बहुत थके हुए हैं. उन की तबियत भी ठीक नहीं है. आप ही इलाज शुरू कीजिए, सुबह होते ही वे खुद देख लेंगे.’’ रेजिडैंट डाक्टर ने कहा, ‘‘मैं संभाल लेता हूं मैम. मैं सब टैस्ट और दवाएं शुरू कर देता हूं.’’ पत्नी ने राहत की सांस ली, ‘‘कम से कम आज तो राहुल को थोड़ा आराम मिल जाएगा.’’ पर मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. 15 मिनट बाद फिर फोन बजा. इस बार आवाज में हताशा थी, ‘‘मैम, मरीज के परिवार वाले नहीं मान रहे. उन का कहना है कि सिविल अस्पताल और बाकी डाक्टरों ने जवाब दे दिया है.
‘‘सब ने कहा है कि अब सिर्फ डाक्टर राहुल ही देख सकते हैं. सरपंच रामकुमार खुद कह रहे हैं कि राहुल सर उन के दोस्त हैं, वे जरूर आएंगे.’’

पत्नी की हालत विचित्र थी. एक ओर डाक्टर राहुल की थकान और उन का सख्त निर्देश था किआज किसी भी हालत में मुझे जगाया जाए’, दूसरी ओर एक जिंदगी की आखिरी सांसें थीं. पत्नी ने इनसानियत का पक्ष चुना और धीरे से डाक्टर राहुल को जगाया और सारी बात बताई. डाक्टर राहुल बिना कोई सवाल किए तुरंत उठे, कपड़े बदले और अस्पताल पहुंच गए. वहां उन्होंने बुजुर्ग मरीज पाला राम की जांच की. उन्हें तेज बुखार था, दिमाग पर चढ़ गया था और होश खो चुका था. डाक्टर राहुल ने तुरंत इलाज शुरू किया, टैस्ट करवाए, दवाएं दीं और परिवार वालों को समझाया,

‘‘इनकी हालत नाजुक है, लेकिन मैं पूरी कोशिश करूंगा.’’
3 घंटे की मेहनत के बाद पाला राम की सांसें सामान्य हुईं, आंखें खुलीं और बुखार उतरने लगा. डाक्टर राहुल के चेहरे पर राहत झलकने लगी. परिवार के एक सदस्य ने हाथ जोड़ कर धन्यवाद दिया,
‘‘डाक्टर साहब, आप ने तो कमाल कर दिया.’’
डाक्टर राहुल मुसकराए, पर ज्यादा कुछ बोले नहीं.
अगली सुबह तकरीबन 4 बजे डाक्टर राहुल घर लौटे और थकान से चूर हो कर सो गए. सुबह अस्पताल पहुंचे तो देखा कि पाला राम की हालत और सुधर रही थी.
डाक्टर राहुल ने परिवार वालों को समझाया, ‘‘अब लगातार दवाएं देते रहिए, एक हफ्ते में हालत काफी बेहतर हो जाएगी.’’
पर बाहर वार्ड के कोने में फुसफुसाहटें शुरू हो चुकी थीं, ‘‘हम तो सोच रहे थे कि यह आज रात ही मर जाएगा, अब तो बचता दिख रहा है.’’
‘‘अब 7 दिन अस्पताल में रखेंगे, तो पैसे कहां से आएंगे?’’
‘‘इतना खर्च कौन करेगा, जब सब डाक्टरों ने पहले ही कह दिया था कि यह नहीं बचेगा?’’

धीरेधीरे उन कानाफूसियों ने एक फैसले का रूप ले लिया. अगले दिन परिवार वालों में से एक ने डाक्टर राहुल से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, हमारी बहू सिविल अस्पताल में भरती है, उस का भी केस गंभीर है. हम 2 जगह इलाज नहीं करा सकते. कृपया छुट्टी दे दीजिए, हम मरीज को घर ले जा कर देखभाल करेंगे.’’
डाक्टर राहुल ने उन्हें बहुत समझाया, ‘‘पाला राम की हालत अभी पहले से बेहतर है, लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं. अगर अब इलाज बीच में छोड़ा, तो हालत फिर बिगड़ जाएगी.’’
परिवार वालों ने सिर झुका दिया. सच यह था कि वे खर्च से घबराए
हुए थे. पैसे थे, इच्छा, पर गांव में यह स्वीकार करना किहम इलाज का खर्च नहीं उठा सकतेउन्हें समाज में बेइज्जती वाला काम लगता, इसलिए उन्होंने अपनीलाजको झूठ का जामा पहन लिया.
पाला राम को छुट्टी दे दी गई. राहुल ने आखिरी बार कहा, ‘‘कम से कम दवा और इंजैक्शन समय पर लगवाते रहिए, तभी उम्मीद है.’’

उन्होंने सिर हिला कर हामी भरी, पर वह सिर्फ औपचारिकता थी. 15 दिन बाद गांव का वही सरपंच रामकुमार अस्पताल आया. डाक्टर राहुल ने पूछा, ‘‘अब कैसे हैं पाला राम?’’ सरपंच रामकुमार ने गहरी सांस ली, ‘‘कल रात उन की मौत हो गई.’’ डाक्टर राहुल सन्न रह गए, ‘‘कैसे? वे तो ठीक हो रहे थे…’’ सरपंच ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘घर ले जा कर उन्होंने सारी दवाएं बंद कर दीं. गांव वालों से कहा, डाक्टर राहुल ने खुद जवाब दे दिया है, अब बस सेवा करो. शायद पैसे की भी तंगी थी, पर असली वजह थी लोकलाज. ‘‘उन्हें डर था कि गांव वाले कहेंगे कि शहर में रह कर इलाज क्यों नहीं करवाया? क्यों उस को
बचाने की कोशिश नहीं की गई? इसलिए उन्होंने झूठ बोलना ही आसान समझा.’’
डाक्टर राहुल लंबे समय तक चुप रहे. मन में तूफान था. एक ओर डाक्टर के रूप में उन का काम, जो पूरी ईमानदारी से निभाया गया था, दूसरी ओर समाज का वह सच, जहां झूठी लाज के लिए लोग जिंदगी की डोर काट देते हैं.

डाक्टर राहुल ने सोचा, ‘गरीबी तो फिर भी किसी दिन मिट सकती है, पर यह दिखावे की बीमारीयह समाज के भीतर का जहर है, जो आदमी से उस का इनसान छीन लेती है.’ उस रात डाक्टर राहुल बहुत देर तक छत की ओर टकटकी लगाए रहे. उन की आंखों में सिर्फ एक चेहरा था, पाला राम का, जो मरते समय शायद यह भी नहीं जानता था कि उसे उस के अपने ही लोग उस की झूठीइज्जतके लिए मौत की तरफ धकेल गए. डाक्टर राहुल की आंखों से एक बूंद गिरी. वह आंसू किसी मरीज के लिए नहीं था, बल्कि उस समाज के लिए था, जो आज भीलाजके नाम परजिंदगीकी कीमत चुका देता है.   

डा. सुभाष चंद्र गर्ग ‘पार्थ’

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