पाखंड: आखिर क्या जान गई थी बहू?

‘‘दीदीजी, हमारी बात मानो तो आप भी पहाड़ी वाली माता के पास हो आओ. फिर देखना, आप के सिर का दर्द कैसे गायब हो जाता है,’’ झाड़ू लगाती रामकली ने कहा.

कल रात को लाइट न होने के कारण मैं रात भर सो नहीं पाई थी, इसलिए सिर में हलका सा दर्द हो रहा था, पर इसे कैसे समझाऊं कि दर्द होने पर दवा खानी चाहिए न कि किसी माता के पास जाना चाहिए.

‘‘रामकली, पहले मेरे लिए चाय बना लाओ,’’ मैं कुछ देर शांति चाहती थी. यहां आए हमें 3 महीने हो चुके थे. ऐसा नहीं था कि मैं यहां पहली बार आई थी. कभी मेरे ससुरजी इस गांव के सरपंच हुआ करते थे. पर यह बात काफी पुरानी हो चुकी है. अब तो इस गांव ने काफी उन्नति कर ली है.

30 साल पहले मेरी डोली इसी गांव में आई थी, पर जल्द ही मेरे पति की नौकरी शहर में लग गई और धीरेधीरे बच्चों की पढ़ाईलिखाई के कारण यहां आना कम हो गया. मेरे सासससुर की मृत्यु के बाद तो यहां आना एकदम बंद हो गया. अब जब हमारे बच्चे अपनेअपने काम में रम गए और पति रिटायर हो गए, तो फिर से एक बार यहां आनाजाना शुरू हो गया.

‘‘मेमसाहब, चाय,’’ रामकली ने मुझे चाय ला कर दी. अब तक सिरदर्द कुछ कम हो गया था. सोचा, थोड़ी देर आराम कर लूं, पर जैसे ही आंखें बंद कीं, गली में बज रहे ढोल की आवाजें सुनाई देने लगीं.

‘‘दीदीजी, आज पहाड़ी माता की चौकी लगनी है न… उस के लिए ही पूरे गांव में जुलूस निकल रहा है. आप भी चल कर दर्शन कर लो.’’

‘‘यह पहाड़ी वाली माता कौन है?’’ मैं ने पूछा, पर रामकली मेरी बात को अनसुना कर के जय माता दी कहती हुई चली गई.

थोड़ी देर बाद ढोल का शोर दूर जाता सुनाई दिया. तभी रामकली आ कर बोली, ‘‘लो दीदी, मातारानी का प्रसाद,’’ और फिर अपने काम में लग गई.

कुछ दिनों बाद रामकली ने मुझ से छुट्टी मांगी. मैं ने छुट्टी मांगने का कारण पूछा तो बोली, ‘‘दीदी, माता की चौकी पर जाना है.’’ मैं ने ज्यादा नानुकर किए बिना छुट्टी दे दी.

मेरे पति अपना अधिकतर समय मेरे ससुरजी के खेतों पर ही बिताते. सेवानिवृत्त होने के बाद यही उन का शौक था. मैं घर पर कभी किताबें पढ़ कर तो कभी टीवी देख कर समय बिताती थी. पासपड़ोस में कम ही जाती थी. अगले दिन जब रामकली वापस आई तो बस सारा वक्त माता का ही गुणगान करती रही. शुरूशुरू में मुझे ये बातें बोर करती थीं, पर फिर धीरेधीरे मुझे इन में मजा आने लगा. मैं ने भी इस बार चौकी में जाने का मन बना लिया. सोचा, थोड़ा टाइम पास हो जाएगा.

मैं ने रामकली से कहा तो वह खुशी से झूम उठी और बोली, ‘‘दीदी, यह तो बहुत अच्छा है. आप देखना, आप की हर मुराद वहां पूरी हो जाएगी.’’

कुछ दिनों बाद मैं भी रामकली के साथ मंदिर चली गई. इस मंदिर में मैं पहले भी अपनी सास के साथ कई बार आई थी, पर अब तो यह मंदिर पहचान में नहीं आ रहा था. एक छोटे से कमरे में बना मंदिर विशाल रूप ले चुका था. जहां पहले सिर्फ एक फूल की दुकान होती थी वहीं अब दर्जनों प्रसाद की दुकानें खुल चुकी थीं और इतनी भीड़ कि पूछो मत.

रामकली मुझे सीधा आगे ले गई. मंच पर एक बड़ा सिंहासन लगा हुआ था. रामकली मंच के पास खड़े एक आदमी के पास जा कर कुछ कहने लगी, फिर वह आदमी मेरी ओर देख कर मुसकराते हुए नमस्ते करने लगा. मैं ने भी नमस्ते का जवाब दे दिया.

रामकली फिर मेरे पास आ कर बोली, ‘‘दीदी, वह मेरा पड़ोसी राजेश है. जब से माताजी की सेवा में आया है, इस के वारेन्यारे हो गए हैं. पहले इस की बीवी भी मेरी तरह ही घरों में काम करती थी, पर अब देखो माता की सेवा में आते ही इन के भाग खुल गए. आज इन के पास सब कुछ है.’’

थोड़ी देर बाद वहां एक 30-35 वर्ष की महिला आई, जिस ने गेरुआ वस्त्र पहन रखे थे. माथे पर बड़ा सा तिलक लगा रखा था और गले में रुद्राक्ष की माला पहनी हुई थी.

उस के मंच पर आते ही सब खड़े हो गए और जोरजोर से माताजी की जय हो, बोलने लगे. सब ने बारीबारी से मंच के पास जा कर उन के पैर छुए. पर मैं मंच के पास नहीं गई, न ही मैं ने उन के पैर छुए. 20-25 मिनट बाद ही माताजी उठ कर वापस अपने पंडाल में चली गईं.

माताजी के जाते ही लाउडस्पीकर पर जोरजोर से आवाजें आने लगीं, ‘‘माताजी का आराम का वक्त हो गया है. भक्तों से प्रार्थना है कि लाइन से आ कर माता के सिंहासन के दर्शन कर के पुण्य कमाएं.’’

अजीब नजारा था. लोग उस खाली सिंहासन के पाए को छू कर ही खुश थे.

‘‘दीदी चलो, राजेश ने माताजी के विशेष दर्शन का प्रबंध किया है,’’ रामकली के कहने पर मैं उस के साथ हो गई.

‘‘आओआओ, अंदर आ जाओ,’’ राजेश हमें कमरे के बाहर ही मिल गया. कमरे के अंदर से अगरबत्ती की खुशबू आ रही थी. हलकी रोशनी में माताजी आंखें बंद कर के बैठी थीं. हम उन के सामने जा कर चुपचाप बैठ गए.

थोड़ी देर बाद माताजी की आंखें खुलीं, ‘‘देवी, आप के माथे की रेखाएं बता रही हैं कि आप के मन में हमें ले कर बहुत सी उलझनें हैं…देवी, मन से सभी शंकाएं निकाल दो. बस, भक्ति की शक्ति पर विश्वास रखो.’’

उन की बातें सुन कर मैं मुसकरा दी.

कुछ देर रुक कर वह फिर बोलीं, ‘‘तुम एक सुखी परिवार से हो…तुम्हारे कर्मों का फल है कि तुम्हारे परिवार में सब कुछ ठीक चल रहा है पर देखो देवी, मैं साफसाफ देख सकती हूं कि तुम्हारे परिवार पर संकट आने वाला है. यह संकट तुम्हारे पति के पिछले जन्म के कर्मों का फल है,’’ और माताजी ने एक नजर मुझ पर डाली.

‘‘संकट…माताजी कैसा संकट?’’ मुझ से पहले ही रामकली बोल पड़ी.

‘‘कोई घोर संकट का साया है…और वह साया तुम्हारे बेटे पर है,’’ फिर एक बार माताजी ने मुझ पर गहरी नजर डाली, ‘‘पर इस संकट का समाधान है.’’

‘‘समाधान…कैसा समाधान?’’ इस बार मैं ने पूछा.

‘‘आप के बेटे की शादी को 3 साल हो गए, पर आप आज तक पोते पोतियों के लिए तरस रही हैं,’’ माताजी के मुंह से ये बातें सुन कर मैं सोच में पड़ गई.

माताजी ने आगे बोलना शुरू किया, ‘‘देवीजी, आप का बेटा किसी दुर्घटना का शिकार होने वाला है, पर आप घबराएं नहीं. हम बस एक पूजा कर के सब संकट टाल देंगे और आप के बेटे को बचा लेंगे…यही नहीं, हमारी पूजा से आप जल्दी दादी भी बन जाएंगी.’’

मेरी समझ काम करना बंद कर चुकी थी. मुझे परेशान देख कर रामकली बोली, ‘‘माताजी, आप जैसा कहेंगी, दीदीजी वैसा ही करेंगी…ठीक कहा न दीदी?’’ रामकली ने मुझ से पूछा पर मैं कुछ न कह पाई. बेटे की दुर्घटना वाली बात ने मुझे अंदर तक हिला दिया.

मेरी चुप्पी को मेरी हां मान कर रामकली ने माताजी से पूजा की विधि पूछी तो माताजी बोलीं, ‘‘पूजा हम कर लेंगे…बाकी बात तुम्हें राजेश समझा देगा…देवी, चिंता मत करना हम हैं न.’’

घर आ कर मैं ने सारी बात अपने पति को बताई. मैं अपने बेटे को ले कर काफी परेशान हो गई थी. मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था. सारी बातें सुन कर मेरे पति बोले, ‘‘शिखा, तुम पढ़ीलिखी हो कर कैसी बातें करती हो? ये सब इन की चालें होती हैं. भोलीभाली औरतों को कभी पति की तो कभी बेटे की जान का खतरा बता कर और मर्दों को पैसों का लालच दे कर ठगते हैं. तुम बेकार में परेशान हो रही हो.’’

‘‘पर अगर उन की बात में कुछ सचाई हुई तो…देखिए पूजा करवाने में हमारा कुछ नहीं जाएगा और मन का डर भी निकल जाएगा…आप समझ रहे हैं न?’’

‘‘हां, समझ रहा हूं…जब तुम जैसी पढ़ीलिखी औरत इन के झांसे में आ गई तो गांव के अनपढ़ लोगों को यह कैसे पागल बनाते होंगे…देखो शिखा, रामकली जैसे लोग इन माताओं और बाबाओं के लिए एजैंट की तरह काम करते हैं. तुम्हारी समझ में क्यों नहीं आ रहा,’’ मेरे पति गुस्से से बोले, फिर मेरे पास आ कर बोले, ‘‘तुम इस माता को नहीं जानती. कुछ महीने पहले यह अपने पति के साथ इस गांव में आई थी. पति महंत बन गया और यह माता बन गई. मंदिर के आसपास की जमीन पर भी गैरकानूनी कब्जा कर रखा है. हम लोगों को तो इन के खिलाफ कुछ करना चाहिए और हम ही इन के जाल में फंस गए…शिखा, सब भूल जाओ और अपने दिमाग से डर को निकाल दो.’’

पति के सामने तो मैं चुप हो गई पर सारी रात सो नहीं पाई.

अगले दिन रामकली ने आ कर बताया कि पूजा के लिए 5 हजार रुपए लगेंगे. मैं ने पति के डर से उसे कुछ दिन टाल दिया. पर मन अब किसी काम में नहीं लग रहा था. 3 दिन बीत गए. इन तीनों दिनों में मैं कम से कम 7 बार अपने बेटे को फोन कर चुकी थी, पर मेरा डर कम नहीं हो रहा था.

1 हफ्ता बीत चुका था. दिल में आया कि अपने पति से एक बार फिर बात कर के देखती हूं, पर हिम्मत नहीं कर पाई. फिर एक दिन रामकली ने आ कर बताया कि माताजी ने कहा है कि कल पूर्णिमा है. पूजा कल नहीं हुई तो संकट टालना मुश्किल हो जाएगा. मेरे पास कोई जवाब नहीं था.

रामकली के जाने के बाद मन में गलत विचार आने लगे. मैं ने बिना अपने पति को बताए पैसे देने का फैसला कर लिया. मैं ने सोचा कि कल पूजा हो जानी चाहिए. इस के लिए मुझे अभी पैसे रामकली को दे देने चाहिए, यह सोच कर मैं रामकली के घर पहुंच गई. वहां पता चला कि वह मंदिर गई है.

मेरे पति के आने में अभी वक्त था, इसलिए मैं तेजतेज कदमों से मंदिर की ओर चल दी. मंदिर में आज रौनक नहीं थी, इसलिए मैं सीधी माताजी के कमरे की ओर चल दी. माता के कमरे के बाहर मेरे कदम रुक गए. अंदर से रामकली की आवाजें आ रही थीं, ‘‘मैं ने तो बहुत कोशिश की माताजी पर वह शहर की है. इतनी आसानी से नहीं मानेगी.’’

‘‘अरे रामकली, तुम नईनई इस काम में आई हो, जरा सीखो कुछ राजेश से…इस का फंसाया मुरगा बिना कटे यहां से आज तक नहीं गया,’’ यह आवाज माताजी की थी.

‘‘यकीन मानिए माताजी, मैं ने बहुत कोशिश की पर उस का आदमी नहीं माना. साफ मना कर दिया उसे.’’

अब तक मुझे समझ आ गया था कि यहां मेरे बारे में ही बातें चल रही हैं.

‘‘देख रामकली, तेरा कमीशन तो हम काम पूरा होने पर ही देंगे, तू उस से 5 हजार रुपए ले आ और अपने 500 रुपए ले जा…अगर उस का आदमी नहीं मान रहा तो तू कोई और मुरगा पकड़,’’ राजेश बोला, ‘‘हां, वह दूध वाले की बेटी की शादी नहीं हो रही…अगली चौकी पर उस की घरवाली को ले कर आ…वह जरूर फंस जाएगी.’’

बाहर खडे़खड़े सब सुनने के बाद मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था. मैं वहां से चली आई, पर अंदर ही अंदर मैं खुद को कोस रही थी कि मैं कैसे इन के झांसे में आ गई. मेरी आंखें भर चुकी थीं और खुल भी चुकी थीं कितने सही थे मेरे पति, जो इन लोगों को पहचान गए थे.

शाम को जब मेरे पति घर आए तो मैं ने उन को एक लिफाफा दिया.

‘‘यह क्या है?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘आप ने ठीक कहा था इन पाखंडियों के चक्कर में नहीं आना चाहिए. ये जाल बिछा कर इस तरह फंसाते हैं कि शिकार को पता भी नहीं चल पाता और उस की जेब खाली हो जाती है,’’ मैं ने कहा.

बाटी चोखा: छबीली ने ठेकेदार को कैसे सबक सिखाया

‘‘बिहार से हम मजदूरों को मुंबई तुम ले कर आए थे… अब हम अपनी समस्या तुम से न कहें तो भला किस से कहने जाएं?’’ छबीली ने कल्लू ठेकेदार से मदद मांगते हुए कहा.

कल्लू ठेकेदार ने बुरा सा मुंह बनाया और बोला, ‘‘माना कि मैं तुम सब को बिहार से यहां मजदूरी करने के लिए लाया था, पर अब अगर तुम्हारा पति मजदूरी करते समय अपना पैर तुड़ा बैठा तो इस में मेरा तो कोई कुसूर नहीं है.

‘‘हां… 2-4 सौ रुपए की जरूरत हो, तो मैं अभी दे देता हूं.’’

छबीली ने कल्लू के आगे हाथ जोड़ लिए और बोली, ‘‘2-4 सौ से तो कुछ न होगा… बल्कि हमें तो अपनी जीविका चलाने और धंधा जमाने के लिए कम से कम 20 हजार रुपए की जरूरत होगी.’’

‘‘20 हजार… रुपए… मान ले कि मैं ने तुझे 20 हजार रुपए दे भी दिए, तो तू वापस कहां से करेगी… ऐसा क्या है तेरे पास?’’ कल्लू ने छबीली के सीने को घूरते हुए कहा, जिस पर छबीली ने उस की एकएक पाई धीरेधीरे लौटा देने का वादा किया, पर कल्लू की नजर तो छबीली की कसी हुई जवानी पर थी, इसलिए वह उसे परेशान कर रहा था.

‘‘इस दुनिया में, इस हाथ दे… उस हाथ ले का नियम चलता है छबीली,’’ कल्लू ने अपनी आंखों को सिकोड़ते  हुए कहा.

छबीली अब तक कल्लू की नीयत को अच्छी तरह भांपने लगी थी, फिर भी वह चुपचाप खड़ी रही.

‘‘देख छबीली, मैं तुझे 20 हजार रुपए दे तो दूंगा, पर उस के बदले तुझे अपनी जवानी को मेरे नाम करना होगा. जब तक तू पूरा पैसा मुझे लौटा नहीं देगी, तब तक तेरी हर रात पर मेरा हक होगा,’’ कल्लू ठेकेदार छबीली की हर रात का सौदा करना चाह रहा था.

छबीली को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, पर वह पैर के अंगूठे से जमीन की मिट्टी को कुरेदने लगी थी.

वैसे भी छबीली का मर्द जोखू लंगड़ा हो चुका था और मजदूरी के लायक नहीं था. मुंबई जैसे शहर में उन्हें पेट भरने के लिए कुछ धंधा जमाना था, जिस के लिए एकमुश्त रकम चाहिए थी, जो सिर्फ कल्लू ठेकेदार ही दे सकता था.

छबीली ने अपने बिहार के गांव में सुन रखा था कि बड़ीबड़ी हीरोइनें भी फिल्मों में काम पाने के लिए लोगों के साथ सोने में नहीं हिचकती हैं और वह तो एक मामूली मजदूर की बीवी है… मजबूरी इनसान से क्याक्या नहीं कराती… और फिर अपनी इज्जत के सौदे वाली बात वह अपने मरद को थोड़े ही बताएगी.

काफी देर तक सोचविचार के बाद छबीली ने 20 हजार रुपए के बदले अपनी हर रात कल्लू ठेकेदार के नाम करने का फैसला कर लिया.

बिहार से लाए गए सारे मजदूर अपने परिवार के साथ एक बिल्डिंग में काम करते थे और उसी बिल्डिंग के एक कोने में इन सभी मजदूरों ने अपने रहने की जगह बना रखी थीं.

छबीली उसी बिल्डिंग के तीसरे फ्लोर पर बने एक कमरे में चली गई

रात में अपने मरद को खिलापिला कर सुलाने के बाद छबीली उसी बिल्डिंग के तीसरे फ्लोर पर बने एक कमरे में चली गई, जहां ठेकेदार रहता था. रातभर कल्लू ठेकेदार ने छबीली के शरीर को ऐसे नोचा, जैसे कोई भूखा भेडि़या मांस के टुकड़े को नोचता है.

सुबह छबीली का पोरपोर दुख रहा था, पर उस के हाथ में 20 हजार रुपए आ चुके थे, जिन से वह अपने लंगड़े आदमी के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ कर सकेगी.

अपने पति को बिना कुछ बताए ही छबीली ने उन पैसों से एक छोटा सा ठेला खरीद तो लिया, पर अब वह यह सोचने लगी कि इस पर धंधा क्या किया जाए?

यह मुंबई का ऐसा एरिया था, जहां पर तमाम कंपनियों के औफिस थे. लिहाजा, खानेपीने का सामान अच्छा बिक सकता था. यहां तो पावभाजी और वडा पाव जैसी चीजें ही लोग खाते थे और छबीली तो ठेठ बिहार से आई थी. उसे तो इन चीजों को बनाना ही नहीं आता था. अपने मरद जोखू से उस ने ये बातें कीं, तो उस ने समाधान बताया कि जब वह मजदूरी करने जाता था, तो उस के गमछे मे बंधे हुए बाटीचोखे को देख कर मुंबई के लोकल लोगों के मुंह में भी पानी आ जाता था.

मुंबई में भी लोग बाटीचोखा के दीवाने हैं, इसलिए हमें भी वही काम करना होगा.

अपने मरद की यह बात छबीली को जम गई थी. उस ने ठेले पर ही एक बड़ा सा तसला रख लिया, जिस में वह आटे की लोई को आग में पका सकती थी. कुछ लकडि़यां और उपले और एक तरफ चोखे के लिए जरूरी सब्जियां जैसे आलू, प्याज, टमाटर वगैरह रख लीं.

छबीली ने हरे पत्ते के बने हुए दोने भी पास ही रख लिए थे और अब उस का ठेला तैयार हो चुका था अपने पहले दिन की बिक्री के लिए.

ठेले को एक ओर लगा कर छबीली गरमागरम बाटी बनाने लगी.

छबीली को झिझक लग रही थी, आतेजाते लोग उसे घूर रहे थे.

‘‘तुम यूपी, बिहार वाले मजदूर… हमारे यहां पर आ कर गंदगी बढ़ाते हो,’’ एक गुंडे सा दिखने वाला मोटा आदमी अपने 1-2 गुरगों के साथ छबीली की तरफ देखते हुए कह रहा था.

‘‘भैया… हम गरीब मजदूर लोग हैं… पेट भरने के लिए कुछ काम तो करना ही है… तभी तो यह ठेला…’’ छबीली हाथ जोड़ कर कह रही थी.

‘‘ऐ… ऐ… यह भैयावैया से काम नहीं चलने वाला… अपन इस इलाके का भाई है… बोले तो अन्ना… मतलब डौन… और तेरे को ठेला लगाना है, तो इस जगह का भाड़ा देना होगा.’’

उस का लंगड़ा मरद जोखू भी निराश हो रहा था

‘‘पर, अभी तक तो बोहनी भी नहीं…’’ छबीली ने कहा, तो उस गुंडे ने शाम तक आने की बात कही और अपने आदमियों के साथ वहां से चला गया.

छबीली ने राहत की सांस ली, पर अभी तक ग्राहक उस के ठेले के पास नहीं आ रहे थे. उस का लंगड़ा मरद जोखू भी निराश हो रहा था.

‘‘लग रहा है कि हमारी लागत भी बेकार जाएगी और हम एक दिन ऐसे ही बिना रोजीरोटी के मर जाएंगे,’’ जोखू ने कहा, तो छबीली ने उसे उम्मीद बंधाई कि अभी नयानया मामला है, थोड़ा समय तो लगेगा ही.

छबीली ने ध्यान दिया कि लोगों की भीड़ तो खाने के लिए आ रही है, पर ज्यादातर लोग सड़क के दूसरी ओर लगे हुए एक फास्ट फूड के एक बढि़या से खोखे पर जा रहे हैं, जहां पर बुरी सी शक्ल का 40-45 साल का आदमी बैठा था, जिस ने अपने सिर के बालों को रंगवा रखा था और उस के बाल किसी कालेभूरे पक्षी के बालों की तरह लग  रहे थे.

उस खोखे पर चाऊमीन, बर्गर, मोमोज वगैरह बिकते थे, जिन्हें नेपाली सी लगने वाली एक लड़की बनाती थी और लोग बहुत चाव से ये सारी चीजें न केवल खाते थे, बल्कि उन्हें पैक करवा कर भी ले जाते थे.

छबीली के काम में इस भीड़ को अपने ठेले की तरफ खींचना पहली चुनौती थी. उसे याद आया कि गांव के मेले में कैसे एक चीनी की मीठीमीठी चिडि़या बनाने वाला गाना गागा कर लोगों को रिझाता था और लोग भी उस की चिडि़या से ज्यादा उस के गाने को सुनने के लिए उस के पास खिंचे चले आते थे.

छबीली मन ही मन कुछ गुनगुनाने लगी थी, पर तेज आवाज में गाने में उसे हिचक सी लग रही थी. उस ने उड़ती हुई एक नजर अपने लाचार पति पर डाली और अचानक ही उसे हिम्मत आ गई और उस के गले से आवाज फूट पड़ी…

‘‘छैल छबीली आई है…

बाटीचोखा लाई है…

जो न इस को खाएगा…

जीवनभर पछताएगा.’’

लोगों के ध्यान को तो छबीली ने खींच लिया था, पर कुछ लोग ठिठक भी गए थे, लेकिन उस का ठेला अब भी कस्टमरों से खाली था.

छबीली अब तक लोगों की नजरों को पढ़ चुकी थी. वह समझ गई थी कि फास्ट फूड वाले खोखे पर बहुत सारे लोग तो अपनी आंखें सेंकने जाते हैं और उस लड़की से हंसीठिठोली का भी मजा लेते हैं. बस, फिर क्या था. छबीली ने तुरंत ही अपनी चोली के ऊपर का एक बटन खोल दिया, जिस से उस के सीने की गोलाइयां दिखने लगी थीं और जिस्मदिखाऊ अंदाज के साथ जब इस बार छबीली ने अपना गाना गाया, तो लोग उस के पास आने लगे.

कुछ बाटीचोखा का स्वाद लेने, तो कुछ उस के नंगे सीने को निहारने. वहीं पर कुछ लोग ऐसे भी थे जो ये दोनों काम साथ में कर रहे थे.

वजह चाहे जो भी थी, शाम तक छबीली के ठेले पर बना हुआ सारा माल खप चुका था और अच्छीखासी दुकानदारी भी हो चुकी थी. छबीली की आंखें खुशी से नम हो गई थीं.

शाम ढली तो अन्ना के आदमी छबीली से उस जगह का हफ्ता मांगने आ गए. छबीली ने सौ का नोट बढ़ाया, तो उन्होंने 2 सौ रुपए मांगे. इस के बाद छबीली ने एक 50 का नोट और दे दिया.

अन्ना के आदमी संतुष्ट होते दिखे और अगले हफ्ते फिर से आने की बात कह कर चले गए.

छबीली एक काम से फुरसत पाती, तो दूसरा काम सामने आ खड़ा होता. दिनभर की थकी हुई छबीली वापस आई, तो अपने और जोखू के लिए खाना बनाया. अभी तो उसे ठेकेदार की हवस भी तो बुझाने जाना था, जहां पर न जाने पर वह छबीली के साथ क्याक्या करेगा? पर छबीली करती भी क्या… फिलहाल तो उस के सामने कोई चारा भी नहीं था.

छबीली ग्राहकों को अपनी ओर खींचने का मंत्र जान चुकी थी. यहां कंपनी में काम करने वाले और सड़कों पर आतेजाते लोग जबान के स्वाद के साथसाथ बदन भी देखना चाह रहे थे और साथ ही कुछ भद्दे मजाक भी करना और सुनना पसंद करते थे.

मसलन, छबीली, तेरा मरद तो लंगड़ा है… यह तो कुछ कर नहीं पाता होगा… फिर तू अपना काम कैसे चलाती है?

ऐसी बातें सुन कर जोखू का मन करता कि उसे मौत क्यों नहीं आती, पर वह जानता था कि इस दुनिया में एक विधवा का जीना कितना मुश्किल होता है, इसलिए वह छबीली के लिए जिंदा रहना चाह रहा था.

छबीली उन लोगों की बातें और हाथ के गंदे इशारे समझ कर मन ही मन उन्हें गरियाती, पर सामने बस मुसकरा कर यही कहती, ‘‘हाय दइया… मत पूछो… बस चला लेती हूं काम किसी तरह… कभी बाटी आग के नीचे तो कभी बाटी आग के ऊपर,’’ और फिर भद्दी सी हंसी का एक फव्वारा छूट पड़ता.

धीरेधीरे छबीली की इन्हीं रसीली बातों के चलते ही उस का ठेला इस इलाके में नंबर वन हो गया था. छबीली को सिर उठाने की फुरसत ही नहीं मिलती, दिनभर काम करती, पर रात को उस ठेकेदार का बिस्तर गरम करने के लिए जाने में मन टीसता था.

दूसरी तरफ उस फास्ट फूड वाली दुकान पर इक्कादुक्का लोग ही नजर आते थे और हालात ये होने लगे थे कि फास्ट फूड वाले को अपनी दुकान बंद करने की नौबत लग रही थी.

फास्ट फूड दुकान चलाने वाले आदमी का नाम चीका था. वह एक शातिर आदमी था. उसे यह बात समझने में देर नहीं लगी कि छबीली के जिस्म और उस की बाटीचोखा के तिलिस्म को तोड़ना आसान नहीं है, इसलिए उस ने छबीली से मेलजोल बढ़ाना शुरू कर दिया. इस के पीछे उस की मंशा छबीली के ठेले को यहां से हटा देने की थी, जिस से उस की दुकान पहले की तरह ही चलने लगती.

चीका अपना काम छोड़ कर छबीली के ठेले पर रोज जाता और उस की बाटीचोखा खा कर खूब तारीफ करता और कभीकभी तो कुछ छोटेमोटे तोहफे भी छबीली के लिए ले जाता. चीका छबीली को प्यार के झांसे में ले रहा था. साथ ही, चीका ने जोखू से भी जानपहचान बढ़ाई. वह जोखू को भी शराब पिला कर उसे पटाने की कोशिश कर रहा था.

छबीली भी उस की इन मेहरबानियों को खूब समझ रही थी, पर उसे भी चीका से अपना काम निकलवाना था, इसलिए वह भी चीका को रिझा रही थी.

‘‘मैं तुम से प्यार करने लगा हूं,’’ चीका ने छबीली की कमर पर कुहनी का दाब बढ़ाते हुए कहा.

‘‘पर, मैं कैसे मानूं…?’’ छबीली काम करतेकरते इठला कर बोली.

‘‘आजमा ले कभी,’’ चीका ने कहा, तो छबीली ने उसे रात में 10 बजे बिल्डिंग के दूसरे फ्लोर वाले कमरे में आने को कहा.

छबीली के इस बुलावे को चीका उस का प्रेम समर्पण समझ रहा था और मन ही मन में जल्दी से रात आने का और छबीली के साथ मजे करने का ख्वाब देखने लगा.

रात में जोखू के सोने के बाद छबीली ठेकेदार के कमरे पर पहुंच गई. ठेकेदार शराब के नशे में धुत्त था. उस ने जैसे ही छबीली को दबोचने की कोशिश की, छबीली वैसे ही दूर भागती हुई बोली, ‘‘क्या रोजरोज एक ही स्टाइल… कभी कुछ नया तो करो.’’

छबीली की इस बात पर ठेकेदार मुसकराते हुए बोला कि वह आखिर उस से क्या चाहती है?

इस पर छबीली ने उसे बताया कि जैसा फिल्मों में दिखाते हैं न कि हीरोइन आगेआगे भागती है और एक गंदा आदमी उस का पीछा करता और उस के कपड़े फाड़ देता है और उस की इज्जत लूट लेता है, वैसा ही कुछ करो न.

‘‘बलात्कार वाला सीन चाह रही है…’’ ठेकेदार ने खुश होते हुए कहा और फिर नशे में झूमते हुए छबीली का पीछा करने लगा, छबीली भी भागने लगी

और जोरजोर से ‘बचाओबचाओ’ चिल्लाने लगी.

तभी छबीली की चोली ठेकेदार के हाथों में फंस गई और झर्र की आवाज के साथ फट गई. ठीक उसी समय वहां पर चीका आ गया था. उस ने छबीली की आवाज सुनी, तो कमरे में झांका. अंदर का सीन देख कर उसे काटो तो खून नहीं. दोनों हाथों से अपने उभारों को छिपाए हुए छबीली पूरे कमरे में दौड़ रही थी और ठेकेदार उस की इज्जत लूटने की कोशिश कर रहा था.

यह देख कर चीका को गुस्सा आ गया. वह अंदर कूद पड़ा और छबीली के प्रेम की खातिर ठेकेदार को मारने लगा.

चीका ने उस पर लातघूंसों और डंडों की बरसात कर दी और मारता ही रहा. छबीली कोने में खड़ीखड़ी मजे ले  रही थी.

चीका ने ठेकेदार को इतना मारा कि  उस की दोनों टांगें तोड़ दीं.

ठेकेदार ने छबीली के आगे हाथ जोड़ लिए. चीका की ओर रुकने का इशारा करते हुए छबीली ने ठेकेदार  से कहा, ‘‘क्यों और पैसे नहीं  चाहिए तुझे?’’

‘‘न… नहीं… मुझे कुछ नहीं चाहिए… मैं कल  ही यहां से चला जाऊंगा… बस मेरी जान बख्श दो.’’

छबीली ने चीका को बताया कि कैसे वह ठेकेदार लोगों की मदद के नाम पर उन की मजबूरी का फायदा उठाता था और लड़कियों और औरतों की इज्जत लूटता था.

छबीली की ये बातें सुन कर चीका को फिर से गुस्सा आया और उस ने पास में पड़ा हुआ एक ईंट का टुकड़ा उठाया और ठेकेदार के मर्दाना हिस्से पर दे मारा. ठेकेदार मारे दर्द के दोहरा हो गया था.

‘‘मत घबरा छबीली, आज के बाद यह किसी औरत के जिस्म को हाथ लगाने लायक ही नहीं रहेगा,’’ चीका  ने कहा.

छबीली किसी शातिर की तरह मुसकरा उठी थी. आज ठेकेदार से उस का इंतकाम पूरा हो गया था.

इस घटना के कुछ दिन बाद चीका ने छबीली से कहा, ‘‘लगता है, मुझे ही यह दुकान छोड़ कर अपना धंधा कहीं और जमाने के लिए यहां से जाना पड़ेगा, क्योंकि तू तो अपने ग्राहक छोड़ कर जाएगी नहीं.’’

‘‘तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है… तुम चाहो तो हम दोनों साथ में काम शुरू कर सकते हैं,’’ छबीली ने कहा. जोखू भी वहीं खड़ा था.

‘‘पर, कैसे…?’’ चीका ने पूछा.

‘‘देख… अब से हम दोनों फास्ट फूड और बिहार की मशहूर बाटीचोखा एकसाथ बेचेंगे… जिस को जो खाना है खाए… जो मुनाफा होगा, वह आधाआधा,’’ छबीली ने चहकते हुए कहा.

चीका की दुकान का बोर्ड अब छबीली के ठेले पर लगा हुआ था, जिस पर लिखा था…

‘फास्ट फूड सैंटर…

बिहार की मशहूर बाटीचोखा

एक बार खाएंगे… बारबार आएंगे.’

वहां आने वालों को छबीली का गाना भी मुफ्त में सुनने को मिलता था…

‘‘छैल छबीली आई है,

बाटीचोखा लाई है,

जो न इस को खाएगा,

जीवनभर पछताएगा.’’

कब बदलेगी खेतों में मशीन बनी महिलाओं की दुनिया

हाल के सालों में देश में कई हिस्सों से खेतों से हल और बैल लुप्त होते जा रहे हैं. बहुत तेजी के साथ कृषि यंत्रीकरण हो रहा है. गेहूं, चावल जैसी फसलों में यंत्रीकरण 65 फीसदी के स्तर तक है, जबकि कपास में बहुत कम स्तर पर.

समग्र तौर पर देखें, तो भारत में कृषि यंत्रीकरण का स्तर 47 फीसदी है, जबकि चीन में यह 59 और ब्राजील में 75 फीसदी तक. वैसे, यंत्रीकरण के लिए सरकारी योजनाएं भी चल रही हैं. यंत्रों पर सब्सिडी भी है और कस्टम हायरिंग केंद्रों के साथ फार्म मशीनरी बैंक भी.

किसी भी इलाके में स्वाभाविक तौर पर मशीनें आप को कृषि क्षेत्र में देखने को मिल जाएंगी. किसान आंदोलनों पर भी ट्रैक्टरों को शक्ति के रुप में दर्शाने का प्रयास होता है. पर जहां तक महिलाओं की बात है, वे खुद मशीन बनी पहाड़ों से ले कर मैदानों तक में नजर आती हैं.

जब भी हम भारतीय किसान की तसवीर देखते हैं, तो वह ट्रैक्टर या दूसरे साजोसामान के साथ मूंछों पर ताव दे रहे किसी पुरुष किसान का चेहरा होता है. धान रोपती महिला, ड्रोन दीदी और लखपति दीदी जैसे संबोधनों के साथ प्रतीक रूप में कुछ ग्रामीण महिलाएं नजर आ जाती हैं. लेकिन यंत्रीकरण या मशीनीकरण का फायदा महिलाओं को सब से कम हुआ है.

Society news

आज ट्रैक्टर, टिलर व स्पेयर जैसे तमाम हथियार पुरुषों के पास हैं और अधिकतर महिलाएं हाथ से काम करते हुए खुद मशीन बनी हुई हैं. उन के लिए अनुसंधान की कमी नहीं, पर बहुत प्रयोगशाला से खेत के बीच काफी दूरियां हैं और महिला हितैषी कृषि यंत्रों का अकाल बना है. जो बने भी हैं, उन तक सामान्य महिलाओं की पहुंच नहीं है. तकनीकी और सामाजिक विकास के बावजूद उन का पिछड़ापन चिंता का विषय है.

दिक्कत यह है कि हमारे नीति निर्माताओं का ध्यान कभी भी महिला किसानों पर नहीं गया. तकनीकी और सामाजिक विकास के बावजूद वे बेहद पिछड़ी हैं. हम उन के जीवन को सुविधाजनक बनाने लायक यंत्र तक जुटा नहीं सके हैं. किसान महिलाएं लगातार हाथ से खटती हैं, जिस का असर उन की सेहत पर भी पड़ता है और कार्यकुशलता पर भी.

पहाड़ की महिला किसानों के लिए फौडर कलक्टर, चाय की पत्तियों की चुनाई का उपकरण, छाता, घास उठाने का यंत्र, पंखा करने का यंत्र और कटर आदि बने, पर उन की सीमित सुलभता है.

वैसे तो 18वीं शताब्दी में उद्योगों में यंत्रीकरण के बाद से कृषि उपकरणों और यंत्रों का बनना आरंभ हो गया. 20वीं शताब्दी में हलों में पर्याप्त सुधार हुआ और आगे रबड़ के पहिए के कारण कृषि यंत्रों और ट्रैक्टरों के भार खींचने में काफी सुविधा हुई.

भारत में हालांकि मानव और पशुचालित यंत्र अभी भी खेती को काफी मदद कर रहे हैं, पर तमाम उन्नतशील कृषि यंत्रों के निर्माण की होड़ मची है. हरित क्रांति के बाद से कृषि यंत्रीकरण में उत्तर भारत में काफी तेजी आई है, लेकिन छोटे किसानों में यंत्रीकरण धीमी गति से हो रहा है. छोटे किसानों और महिलाओं की जरूरतों वाले कृषि यंत्र बनाने में कंपनियों की खास रुचि नहीं, क्योंकि इस में सीमित मुनाफा है. लेकिन ड्रोन आदि मुनाफे की खेती बने हुए हैं, तो सारा जोर उधर ही है.

हाल के सालों में मैं ने हिमाचल प्रदेश के चौधरी श्रवण कुमार हिमाचल कृषि विश्वविद्यालय और डा. वाईएस परमार वानिकी विश्वविद्यालय का कई बार दौरा किया. चौधरी श्रवण कुमार हिमाचल कृषि विश्वविद्यालय में मुझे यह देख कर हैरानी हुई थी कि वहां होम साइंस विभाग में काफी बड़ी तादाद में पुरुष छात्र पढ़ाई कर रहे थे. होम साइंस महिलाओं का विषय माना जाता है, पर हिमाचल प्रदेश की बालिकाओं ने कृषि शिक्षा में पुरुषों का वर्चस्व तोड़ा.

देश में पहला कृषि विश्वविद्यालय 1962 में शुरू हुआ था, लेकिन छात्राओं के लिए खेती रुचि का विषय नहीं रहा. इस नाते उन की भागीदारी बमुश्किल 5 फीसदी तक होती थी. हिमाचल प्रदेश में वर्ष 1995-96 के बाद बालिकाओं ने कृषि शिक्षा की ओर कदम बढ़ाए और तब उन का नामांकन 14 फीसदी तक पहुंच गया. वर्ष 2004-05 तक 43 फीसदी और एक दशक पहले 2010 में 54 फीसदी पर आ गया, जबकि बालकों का वर्चस्व टूट गया. तब से बालिकाएं अग्रणी भूमिका में हैं.

यह तो विश्वविद्यालय की बात है. पर हिमाचल प्रदेश या देश के दूसरे पहाड़ी राज्यों से ले कर केरल तक की तसवीर देखें, तो पता चलता है कि खेतीबारी की रीढ़ महिलाएं ही हैं. कृषि शिक्षा में उन की भागीदारी कम हो या ज्यादा, पर खेतों में बहुत अधिक है. देश में एक से एक काबिल महिला किसान हैं.

खेतीबारी में महिलाएं आखिर क्या काम नहीं करती हैं. बोआई, रोपाई, सिंचाई, निराई, कटाई, ढुलाई, छंटाई, भराई, बंधाई और पशुपालन से जुड़े काम जैसे चारा डालना, चराने ले जाना, दूध निकालना, सफाई करना, गोबर बटोरना व उपले यानी कंडे बनाना, दूध का प्रसंस्करण करना सभी में ज्यादातर महिला श्रम काम आता है.

वे ट्रैक्टर भी चलाती हैं और मोटर भी. लेकिन इतना सब होने के बाद भी वे क्या खेतीबारी की मुख्यधारा में शामिल हैं? क्या सरकार उन को वास्तव में किसान मानती है?

वर्ष 2011 की जनगणना में महिला किसानों की संख्या 3 करोड़, 60 लाख और महिला कृषि मजदूरों की संख्या सवा 6 करोड़ थी, जो अब काफी बढ़ चुकी है.

लेकिन खेतीलायक जमीनों के स्वामित्व में भूजोतों के हिसाब से महिला किसानों की 13.87 फीसदी ही है. उन को तमाम योजनाओं से सीमित फायदा हो रहा है. भूमि, कृषि ऋण, जल, बीज और बाजार जैसे संसाधनों में उन के साथ भेदभाव बरकरार है. तमाम नीतिगत खामियों के नाते वे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाती हैं.

संसद की कृषि संबंधी स्थायी समिति ने कृषि क्षेत्र में महिलाओं को मुख्यधारा में लाने की सिफारिश करते हुए वर्ष 2018 में माना था कि कृषि उत्पादन में महिला किसानों की अनूठी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

यूपीए सरकार के दौरान वर्ष 2007 में राष्ट्रीय कृषि नीति में महिला किसानों को मुख्यधारा में लाने की योजना बनाई गई थी. कई योजनाओं में 30 फीसदी महिला किसानों को लाभ देने के प्रावधान शामिल हैं. मोदी सरकार ने भी कई कदम महिला किसानों के हक में उठाए, लेकिन मशीन बनी महिलाओं का जीवन सहज नहीं हुआ.

बीज तैयार करने से ले कर कटाई के बाद की प्रक्रिया में महिलाओं की 80 फीसदी से ज्यादा भागीदारी होती है. खेती में 65 फीसदी मानवीय श्रम लगता है. लगातार एक स्थिति में शरीर रखने से मांसपेशियों पर खिंचाव होता है और शारीरिक ऊर्जा की अधिक खपत होती है. इस से महिलाएं कई बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं.

पशुपालन क्षेत्र में 71 फीसदी महिलाएं हैं, जबकि डेयरी क्षेत्र में 1.5 करोड़ पुरुषों की तुलना में 7.5 करोड महिलाएं काम करती हैं. चारा देने, दूध निकालने का काम महिलाएं करती हैं, जबकि पशुओं का परिवहन में उपयोग करने और चराने व जोतने जैसी गतिविधि पुरुषों के हाथ होती है.

महिलाएं डेयरी सहकारिता आंदोलन की रीढ़ है. हमारी महिला किसान सामान्यतया छोटी और सीमांत किसान हैं. आधे महिला किसानों के पास आधा हेक्टेयर से भी कम जमीन है और कागजों पर महिलाओं के नाम जमीनें सीमित होने के कारण उन को न खेती के लिए सुविधाएं मिलती हैं और न ही कर्ज. भले ही उन के कंधों पर खेती टिकी है, पर कृषि नीतियां उन को किसान ही नहीं मानती.

हालांकि 15 अक्तूबर, 2017 को पहली बार ‘महिला किसान दिवस’ मनाने के साथ भारत ने दुनिया को यह संकेत दे दिया है कि वह महिला किसानों के योगदान को स्वीकार रहा है. पर जमीनी हकीकत को देखें, तो यह सब प्रतीकात्मकता से अधिक नहीं लगता है.

कृषि में महिलाओं की भागीदारी को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1996 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भुवनेश्वर में सैंटल इंस्टीट्यूट फौर वूमन इन एग्रीकल्चर स्थापित किया था. यह कृषि में महिलाओं से जुड़े विभिन्न आयामों पर अध्ययन और अनुसंधान कर रहा है. तमाम तकनीकों का विकास किया है, जिस से खेती में महिलाओं की कठिनाइयां कम हो सकें.

सरकार ने देश के सभी कृषि विज्ञान केद्रों में एकएक महिला कृषि वैज्ञानिक की तैनाती का भी आदेश भी दिया है, लेकिन हकीकत यह है कि अभी भी अधिकतर केंद्रों पर गृह विज्ञान में ही काम हो रहा है, जिस में मे खुद पारंगत हैं.

खेतिहर मजदूरों में भी महिलाओं का अनुपात लगातार बढ़ रहा है, लेकिन उन की स्थिति कोई बहुत बेहतर नहीं है. खादी सैक्टर में भी ग्रामीण महिलाओं को अनाज और दालों के प्रसंस्करण, पापड़ और मसाले बनाने, अखाद्य तिलहनों का संग्रह से ले कर तमाम क्षेत्रों में प्रशिक्षण का इंतजाम किया गया. लेकिन अभी बहुतकुछ करने की दरकार है.

मनरेगा ने ग्रामीण महिला श्रमिकों की दशा को उन इलाकों में थोड़ा बेहतर बनाया है, जहां इस का जमीनी क्रियान्वयन ठीक है. लेकिन आयोजना के स्तर पर महिलाओं का योगदान अधिक नहीं है, क्योंकि वे इतनी शिक्षित औऱ जागरूक नहीं हैं. ग्रामीण भारत की अधिकांश महिलाएं अब भी रोजगार के लिए कृषि पर ही आश्रित हैं. अगर रोज़गार की गुणवत्ता की बात की जाए, तो यह अनिश्चित ही है.

बेशक, भारतीय महिलाएं सफलता के नए सोपान तय कर रही हैं. खेतीबारी में भी वे सफलता की तमाम कहानियों की नायिकाएं हैं, लेकिन ग्रामीण महिलाओं और खासतौर पर खेतिहर श्रम में लगी उन महिलाओं को भुला देते हैं, जिन का इस देश के विकास में सब से महत्वपूर्ण योगदान है.

पुरुषों ने अलाभकारी खेती को महिलाओं के भरोसे छोड़ शहरों की ओर अपने को केंद्रित कर दिया. तमाम गांव महिलाओं के कंधों पर खड़े हैं. लेकिन क्या ‘महिला दिवस’ देश की रीढ़ इन महिला किसानों और खेतिहर मजदूरों को मशीन बने रहने की विवशता पर भी कुछ चिंतन करेगा?

मैं जिस कंपनी में गार्ड हूं वहां का मैनेजर हमेशा गालीगलौज करता है, मुझे तनाव रहता है

सवाल

मेरी उम्र 21 साल है. मैं उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर में रहता हूं और दिल्ली की एक कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता हूं. उस कंपनी में हमारा मैनेजर हर सिक्योरिटी गार्ड के साथ हमेशा गालीगलौज करता है. वह हम से ज्यादा काम लेता है और तनख्वाह भी समय पर नहीं देता है. मैं 12वीं जमात पास हूं और आगे पढ़ना चाहता हूं, पर मुझे समय नहीं मिल पाता है. क्या इस नौकरी के साथसाथ में कहीं से कोई कंप्यूटर कोर्स सीख सकता हूं?

जवाब

आप क्या चाहते हैं… क्या यही कि जब आप ड्यूटी पर पहुंचें, तो मैनेजर फूलमालाओं और मिठाई से आप का स्वागतसत्कार करते हुए कहे कि आइए सर, वैलकम. आप जिस देश में रहते हैं, उस में छोटे लोगों के साथ वही बरताव किया जाता है, जो आप के साथ किया जा रहा है. छोटी जाति वालों, छोटे ओहदे वालों और गरीबों का भविष्य ही बड़े लोग लिखते हैं. फिर भी हम आप के जज्बे और हिम्मत की दाद देते हैं. आप पढि़ए और खूब पढि़ए, बड़े आदमी बनिए. आप कंप्यूटर भी सीखिए और स्किल वाला कोई दूसरा काम भी, लेकिन सब से पहले आप को अपने मैनेजर जैसे लोगों से सबक लेते हुए अच्छा इनसान बनना है. कम सोचिए, लेकिन आगे की तालीम जारी रखिए, क्योंकि आप की लड़ाई मगरमच्छों से है और रहना सभी को इस तालाब यानी देश में है.

सच्ची सलाह के लिए कैसी भी परेशानी टैक्स्ट या वौइस मैसेज से भेजें.

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धर्म ने जकड़ा औरत को बेड़ियों में

आम औरतों के लिए घर की चारदीवारी बनी रहे, यह सब से बड़ी नियामत होती है और इसीलिए करोड़ों औरतें अपने शराबी, पीटने वाले, निकम्मे, गंदे, बदबूदार मर्द को झेलती ही नहीं हैं, उसे कुछ होने लगे तो बचाने के लिए जीजान लगा देती हैं. औरतों में मांग में सिंदूर की इतनी ज्यादा इच्छा रहती है कि वे घर छोड़ कर चले गए और दूसरी औरत के पास रहने वाले पति को भी अपना मर्द मानती हैं.

इस की वजह साधारण है. यह कोई त्याग का मामला नहीं है और न ही पति से प्यार का है. हर औरत को बचपन से सिखा दिया जाता है कि मर्द नाम की हस्ती ही उस को दुनिया से बचा सकती है और यह बात उस के मन में इस कदर बैठ जाती है कि चाहे मर्द के दूसरी औरतों के साथ संबंध बनें या खुद औरत के दूसरे मर्दों से संबंध बने हों, वे शादी का ठप्पा नहीं छोड़ पातीं. इस का कहीं कोई फायदा होता है, ऐसा नहीं लगता. यह शादी का बिल्ला, ये हाथ की चूडि़यां, यह मांग का सिंदूर असल में औरतों की गुलामी की निशानी बन जाता है जिस का मर्द, उस का परिवार और दूसरे लोग खूब जम कर फायदा उठाते हैं.

अगर औरत चार पैसे कमा रही है तो उस के पास एक पैसा नहीं छोड़ा जाता. अगर वह अकेले रह रही है तो साजिश के तौर पर दूसरे मर्द उस से अश्लील मजाक करने लगते हैं ताकि वह जैसे भी उसी मर्द की छांव में चली जाए. हर कानून में लिखा गया है कि मर्द का नाम बीवी के साथ लिखा जाएगा जबकि मर्द की पहचान उस के पिता से होती है. समाज ने इस तरह के फंदे बना रखे हैं कि पति को छोड़ चुकी अकेली औरत को, चाहे किसी उम्र की हो, मकान किराए पर नहीं मिलता, रेलवे का टिकट नहीं बनता, राशनकार्ड नहीं बनता, बच्चे हैं तो स्कूल में उन्हें तब तक दाखिला नहीं मिलता, जब तक मर्द का नाम न हो.

मर्द को औरत की चाबी पकड़ाने में धर्मों ने बहुत बड़ा काम किया है. हिंदू धर्म में मर्द परमेश्वर है, इसलाम में वह जब चाहे तलाक दे दे, जब चाहे सौतन ले आए. ईसाई धर्म में ईश्वरी जोड़ा बना डाला. तीनों धर्मों ने शादी अपनी निगरानी में करवानी शुरू कर दी पर औरतों के हकों पर तीनों बड़े धर्मों ने भेदभाव खुल कर रखा.

दुनियाभर में शहरों में ही नहीं गांवों तक में वेश्याएं हैं. यह दोतरफा वार है औरतों पर. एक तो जिन्हें वेश्या बनाया जाता है, उन्हें मशीन की तरह पैसा कमाने का साधन रखा जाता है. ये गरीब घरों की ही होती हैं, जिन्हें लीपपोत कर सजाया जाता है. जैसे ही जवानी घटती है, बीमारी होती है, मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. दूसरी तरफ मर्दों को इनाम दिया गया है कि वे अपनी बीवियों के होते हुए इन वेश्याओं के पास जा सकते हैं. किसी धर्म ने इस वेश्या बाजार को बंद नहीं किया.

जो औरत वेश्या बनती है वह सताई जाती है. जिस का मर्द वेश्या के पास जाता है वह भी लुटती है. कहीं भी मर्दों के बाजार क्यों नहीं हैं? अगर औरत मर्द की कोई जरूरत पूरी करती है तो औरतों की भी तो जरूरतें हो सकती हैं. उन्हें ऐसा करते ही मार डाला जाता है.

औरतों को आज भी किसी भी लोकतंत्र में बराबरी के हक नहीं मिल रहे. उन के सारे फैसले मर्द करते हैं या उन के खाविंद हों, समाज के नेता, धर्म के दुकानदार हों या सरकार चलाने वाले नेता, अफसर, जज, पुलिस के डंडे. इन में कहीं भी औरतों का कोई जोर नहीं, कोई दम नहीं, कोई जगह नहीं. जाहिर है, औरत को छिपने के लिए एक ही जगह छोड़ी गई है, उस का अपना शादीशुदा मर्द, वह भी एकलौता.

लोकतंत्र में या उसे वोटतंत्र कहें, औरतों के पास बराबर के हक हैं पर मजाल है कि कोई बीवी अपने मर्द की इजाजत के बिना किसी को वोट दे दे. जब वह घर से बाहर कदम नहीं रख सकती तो भला अपना नेता खुद कैसे चुन सकती है, अपना धर्म दुकानदार खुद कैसे चुन सकती है, अपना घर खुद कैसे बना सकती है. दुनियाभर के लोकतंत्र भी धर्म की आड़ में चल रहे हैं. यहां तो बहुतकुछ धर्म के नाम पर ही हो रहा है. धर्म कायम है तो औरतों की गुलामी कायम है, रही थी और रहेगी.

आजादी का अमृतकाल : दलितों पर जुल्मोसितम की हद

देश में जातिवाद का जहर किस तरह ऊंची जाति वालों की नसनस में भरा है, उस के लिए 27 दिसंबर, 2023 का एक मामला देखिए. उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में एक 18 साल की दलित लड़की को सिर्फ इस बात के लिए गरम कड़ाही में धकेल दिया था, क्योंकि वह अपनी इज्जत से खिलवाड़ करने वालों की खिलाफत कर रही थी.

यह घटना बागपत जिले के बिनौली थाना क्षेत्र के एक गांव की है. पीडि़ता बुधवार, 27 दिसंबर, 2023 को गांव के ही एक कोल्हू की कड़ाही पर काम कर रही थी. तभी तीनों आरोपी प्रमोद, राजू और संदीप वहां आए और उस के साथ छेड़छाड़ करने लगे. इस का विरोध करने पर उन्होंने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उस लड़की के साथ गलत बरताव किया. इतना ही नहीं, उन के अंदर इतना गुस्सा भर गया कि पीडि़ता को जान से मारने के इरादे से उसे गरम कड़ाही में फेंक दिया. इस के बाद वे तीनों वहां से भाग गए.

पीड़िता के भाई की शिकायत पर उन तीनों आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 354 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से हमला), 504 (शील भंग करने के इरादे से अपमान), 307 (हत्या का प्रयास) और अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया.

दूसरे मामले ने तो दिल ही दहला दिया. वहां तो एक दलित लड़के से शादी करने पर एक लड़की का बेरहमी से खून कर दिया गया और ऐसा करने का इलजाम लगा दिया लड़की के मांबाप पर.

दरअसल, तमिलनाडु के तंजावुर जिले में पट्टुकोट्टाई के पास पूवालुर का रहने वाला एक दलित लड़का नवीन अपने पड़ोस के नेवाविदुति गांव की 19 साल की एक लड़की ऐश्वर्या से प्यार करता था.

नवीन और ऐश्वर्या बीते 5 सालों से एकदूसरे को जानते थे और पिछले 2 सालों से तिरुपुर जिले में काम कर रहे थे. उन्होंने आवरापलयम के विनयागर मंदिर में 31 दिसंबर, 2023 को शादी भी कर ली थी.

2 जनवरी, 2024 को इस शादी से गुस्साए ऐश्वर्या के मांबाप अपने रिश्तेदारों के साथ तिरुपुर जिले के पल्लाडम पुलिस स्टेशन पहुंचे और पुलिस से इस मामले में दखल देने की मांग की. थाने में मामला दर्ज कर लिया गया और पुलिस ने ऐश्वर्या को उस के मांबाप को सौंप दिया.

7 जनवरी, 2024 को नवीन ने पुलिस में एक शिकायत दर्ज कराई, जिस में कहा गया कि ‘वह अनुसूचित जाति से आता है और ऐश्वर्या पिछड़ी जाति से. दोनों के बीच कई साल से प्रेम चल रहा था.’

नवीन की शिकायत के मुताबिक, ‘ऐश्वर्या के पिता अपने रिश्तेदारों के साथ पुलिस स्टेशन गए. आधे घंटे बाद ही पल्लाडम पुलिस स्टेशन से ऐश्वर्या को उस के पिता और रिश्तेदारों ने अपने साथ लिया और पुलिस स्टेशन के बाहर खड़ी एक कार में बैठ कर चले गए.’

नवीन की शिकायत पर पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में कहा गया कि ‘नवीन को सूचना मिली थी कि 3 जनवरी की सुबह ऐश्वर्या की हत्या कर दी गई थी और स्थानीय लोगों से छिपा कर शव को तत्काल श्मशान में जला दिया गया था.’

पुलिस ने भी अपनी जांच में कहा कि ऐश्वर्या को उस के अभिभावकों ने नेवाविदुति गांव में इमली के पेड़ से लटका दिया था.

अगस्त, 2023. मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक दलित नौजवान की पीटपीट कर हत्या कर दी गई थी. आरोपियों ने उस नौजवान को बचाने पहुंची उस की मां को भी पीटा और उन के कपड़े भी फाड़ डाले.

दरअसल, मारे गए उस नौजवान की बहन के साथ कुछ दिनों पहले आरोपियों ने छेड़छाड़ की थी, जिस का केस दर्ज हुआ था. वे आरोपी पीडि़त परिवार पर राजीनामा करने का दबाव बना रहे थे.

यह घटना सामने आने के बाद पुलिस ने 9 नामजद और 4 दूसरे आरोपियों के खिलाफ हत्या समेत दूसरी धाराओं में केस दर्ज किया. पुलिस ने मुख्य आरोपी समेत 8 आरोपियों को गिरफ्तार भी किया.

मारे गए उस नौजवान की बहन ने कहा, ‘गांव के विक्रम सिंह, कोमल सिंह और आजाद सिंह घर पर आए थे. मां से कहने लगे कि राजीनामा कर लो. मां ने कहा कि जब पेशी होगी, तो उसी दिन राजीनामा कर लेंगे, तो उन्होंने कहा कि क्या आप को अपने बच्चों की जान प्यारी नहीं है? ऐसा बोल कर वे धमकी दे गए कि जो हमें जहां मिलेगा, उस को निबटा देंगे.

‘मेरा छोटा भाई बसस्टैंड के पास सब्जी लेने गया था. वह वहां से लौट रहा था. रास्ते में आरोपी उस के साथ मारपीट करने लगे. वह भागने लगा, तो कुछ लोगों ने उसे पकड़ लिया.

‘मम्मी जब बाजार की तरफ गईं तो देखा कि वे भाई के साथ मारपीट कर रहे हैं. मम्मी उस को बचाने पहुंचीं. आरोपियों ने मम्मी को भी पीटा. जब मैं वहां गई और मोबाइल फोन से पुलिस को काल करने लगी, तो उन लोगों ने मेरे साथ भी मारपीट शुरू कर दी. मैं ने हाथ जोड़े, पैर पड़ कर कहा कि मेरे भाई को छोड़ दो, पर उन्होंने नहीं छोड़ा.’

इस मुद्दे पर कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, ‘मध्य प्रदेश के सागर में एक दलित नौजवान की पीटपीट कर हत्या कर दी गई. गुंडों ने उस की मां को भी नहीं बख्शा. सागर में संत रविदास मंदिर बनवाने का ढोंग रचने वाले प्रधानमंत्री मध्य प्रदेश में लगातार होते दलित व आदिवासी उत्पीड़न और अन्याय पर चूं तक नहीं करते. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री केवल कैमरे के सामने वंचितों के पैर धो कर अपना गुनाह छिपाने की कोशिश करते हैं.’

मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना सही है कि प्रधानमंत्री एक तरफ तो संत रविदास का मंदिर बनवाने का ढोंग करते हैं, पर दूसरी तरफ वे उन पर होने वाले जुल्म पर चुप्पी साध लेते हैं. क्या दलितों के पैर धोने से समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा मिल जाएगा? बिलकुल नहीं, क्योंकि जब तक हर दलित को पढ़ने का हक नहीं मिलेगा, तब तक समाज में जातिवाद की खाई और गहरी होती जाएगी.

एक फिल्म से दलित समाज की हकीकत सम झते हैं, जिस का नाम है ‘गुठली लड्डू’. इस फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह भारतीय समाज में फैली जातिवाद की सड़ांध नाक के बाल जलाती हुई सीधा दिमाग की नसों में बजबजाने लगती है.

‘अस्पृश्यता अपराध है’ और ‘शिक्षा पर सब का समान अधिकार’ के मुद्दे पर बुनी गई यह फिल्म समाज के उस तबके की जहालत, बेबसी और गरीबी को उजागर करती है, जिसे गलीज सम झा जाता है. वह तबका जो दूसरों की गंदगी साफ करता है और जिस के घर का पानी पीना भी बड़ी जाति के लोगों के लिए हराम है.

साल 2023 में आई इस फिल्म की कहानी के 2 मासूम और मेन किरदार हैं गुठली (धनय सेठ) और लड्डू (हीत शर्मा). ये दोनों दोस्त हैं और छोटी जाति के 2 हमउम्र बच्चे भी. गुठली को पढ़ने का शौक है. या यों कहें कि जुनून है, पर चूंकि वह दलित समाज से है तो उसे स्कूल में घुसने तक नहीं दिया जाता है.

इस फिल्म की कहानी तब अचानक मोड़ लेती है, जब लड्डू अपने बापदादा का पुश्तैनी काम मतलब साफसफाई करने की हामी भर देता है और एक दिन गटर में गिरने से उस की मौत हो जाती है. यह देख कर गुठली का बापू उसी दिन से ठान लेता है कि कुछ भी हो जाए, वह अपने बेटे को स्कूल भेजेगा और इस गटर जैसी गंदी जिंदगी से बाहर निकालेगा.

गुठली के बापू की इसी जद्दोजेहद में फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है और इस हकीकत से रूबरू कराती है कि आज भी अनपढ़ दलित की जिंदगी किस नरक में कट रही है और अगर वह अपने हक की बात करता है, तो उसे लतिया दिया जाता है.

गरीब, अनपढ़ दलितों और साफसफाई करने वालों की असली जिंदगी में  झांकें तो उन की हालत भी गुठली और लड्डू से ज्यादा अच्छी नहीं है. भले ही संविधान ने सब को बराबरी का हक दिया है, पर आज भी न जाने कितने गुठली और लड्डू पढ़ाईलिखाई से कोसों दूर हैं और न चाहते हुए भी छोटी जाति का होने की सजा दूसरों की गंदगी साफ कर के पाते हैं.

‘स्वच्छ भारत’ के हल्ले के बीच साल 2023 के मार्च महीने में हरियाणा के पानीपत में नगरनिगम के गटर की सफाई करते हुए 2 मुलाजिमों की मौत हो गई थी. ऐसा पूरे देश में होता है, पर हैरत की बात तो यह है कि हर साल सीवर और सैप्टिक टैंकों की सफाई करते हुए मरने वालों का आंकड़ा कम होने

के बजाय बढ़ता ही जा रहा है. सरकार खुद मानती है कि साल 2019 में पूरे देश में सीवर और सैप्टिक टैंकों की सफाई करते हुए 110 लोगों की जानें चली गई थीं.

ऊपर से बड़ी जाति वालों का उन्हें नाली का कीड़ा सम झना. उन के हाथ से पैसे तो वे ले लेंगे, पर अगर गलती से वे बड़ी जाति वाले की साइकिल छू देंगे, तो उस साइकिल को कई बार धोने का रोना रोएंगे.

जुल्म की खास वजहें

सब से बड़ी वजह तो यह है कि दलितों को सभ्य समाज का हिस्सा ही नहीं सम झा जाता है. उन्हें धर्म ने अछूत माना है और हर तथाकथित बड़ी जाति वाले के मन में यह गहरे तक पैठ चुका है कि अनुसूचित जाति के लोगों को नीचा दिखाने और उन पर अपना रोब जमाना उन का जन्मजात हक है. तभी तो कोई दलित मूंछ रख ले तो उसे लतिया दिया जाता है. कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर चढ़ जाए, तो उसे सबक सिखा दिया जाता है.

अनुसूचित जाति की औरतों और लड़कियों को तो सरेआम शर्मिंदा करने की खबरें आएदिन सुर्खियों में बनी रहती हैं. स्कूलकालेज में धमकाया जाता है. छात्रों को ही नहीं, बल्कि दलित समाज के टीचरों और प्रोफैसरों को भी जाति के आधार पर सताया जाता है. दलित समाज पर जोरजुल्म की घटनाओं के पीछे लोगों की छोटी सोच और इंसाफ में देरी की वजह से लोगों में कानून का डर कम हो रहा है.

कोढ़ पर खाज यह कि लाखों मामले ऐसे होते हैं, जिन में केस दर्ज नहीं किया जाता है या मामले दबा दिए जाते हैं. सागर वाले मामले में नौजवान की हत्या इसीलिए हुई थी कि उस का परिवार राजीनामा नहीं कर रहा था.

आजादी के अमृतकाल में समाज का यह घिनौना रूप उन लोगों पर तमाचा है, जो देश के हर जने की भलाई की बात तो करते हैं, पर हकीकत में उन से होता जाता कुछ नहीं.

कही आप भी तो नहीं कर रहे प्रेग्नेंसी में बिना कंडोम के सेक्स

प्रेग्नेंसी नारी जीवन की ऐसी अवस्था है जिसमें एक महिला को जितना ध्यान अपने खानपान पर देना होता है उतना ही अपने लाइफस्टाइल पर भी देना होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि जिस तरह से एक आम महिला और एक गर्भवती महिला की संरचना में काफी अंतर होता है. ठीक उसी तरह एक ​महिला के गर्भवती होते ही उसका लाइफस्टाल भी अन्य महिलाओं से अलग हो जाता है. लेकिन कई बार महिलाएं इसे जल्दी से स्वीकार करने से परहेज करती हैं और अपनी मस्ती में रहती हैं. उन महिलाओं को शायद इस बात की जानकारी नहीं होती है कि उनकी इन हरकतों का सीधा असर उनके शिशु पर पड़ रहा है.

सेक्स हर व्यक्ति की जिंदगी का वो पल होता है जिसे करते वक्त बेहद आनंद और खुशी मिलती है. प्रेग्नेंसी के दौरान सेक्स करना अन्य अवस्थाओं से बहुत अलग होता है. यहां हम आपको बता रहे हैं कि गर्भवती महिला को सेक्स के दौरान कंडोम का इस्तेमाल क्यों करना चाहिए.

अक्सर लोग ये सोचते हैं कि प्रेग्नेंसी के वक्त अगर वो बिना कंडोम के सेक्स करते हैं तो कोई नुकसान नहीं होगा. क्योंकि जब एक महिला प्रेग्नेंट है तो फिर ना तो गर्भवती होने के चांस रहते हैं और ना ही वैजाइना में इंफेक्शन होने का खतरा रहता है. अगर आप भी ऐसा सोचते हैं तो ये आपके लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है. क्योंकि गर्भावस्था में कंडोम के बिना सेक्स करने से एसटीडी, एड्स, वैजाइनल इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है. इससे मां और शिशु दोनों को गहरा खतरा होने के चांस रहते हैं.

प्रेगनेंसी के दौरान सर्विक्स म्यूकल प्लग से बंद हो जाता है जिससे गर्भाशय में स्पर्म घुस नहीं पाते हैं. जिसके चलते वैजाइना के अलावा शरीर के दूसरे अंगों में इंफेक्शन होने का खतरा रहता है. प्रेग्नेंसी के वक्त इस बात का खास ध्यान रखें कि भूल कर भी कंडोम के बिना सेक्स ना करें.

प्रेग्नेंसी के चलते अगर आप एसटीडी के उपचार के लिए कोई दवा लेते हैं तो ये आपके शिशु के स्वास्थ्य को काफी नुकसान पहुंचा सकती है. प्रेग्नेंट महिला को एसटीडी के अलावा क्लामिडिया, सिफिलिस, हर्पिस, हेपाटाइटिस बी, ग्रोनोरियाम, एचआईवी/एड्स हो सकता है. इसका सीधा असर डिलीवरी के वक्त मां और शिशु दोनों पर पड़ता है. ध्यान रखें कि प्रेंग्नेसी की प्लानिंग से पहले ही अपना एसटीडी और अन्य चेकअप करा लें. क्योंकि प्रेग्नेंसी के वक्त इसके लक्षणों की पहचान करना बहुत मुश्किल हो जाता है.

‘मां’ तो ‘मां’ है: क्या सास को मां मान सकी पारुल

बेटा पारुल 3 बजने को है खाना खाया कि नहीं ओह! माँ नही खाया आप चिंता ना करो अभी खा लेती हूँ, ठीक है 15 मिनट में फिर फोन करती हूँ सब काम छोड़ पहले खाना खा. कहने को तो निर्मला जी पारुल की सास हैं पर शादी के बाद उसकी हर इच्छा का ध्यान रखते हुए भरपूर प्यार दिया हर जरूरत का ख्याल रखा फटाफट टिफिन खोल खाना खाने बैठी ताकि माँ को तसल्ली हो जाए, खा-पी 10-15 मिनट आराम करने की सोच किसी को कमरे में ना आने के लिए चपरासी को बोल दिया.

आँख बंद कर बैठी ही थी कि एक साल पुरानी यादों ने आ घेरा, उसकी और साहिल की जोड़ी को जो कोई देखता यही कहता एक-दूसरे के लिए ही बने हैं परस्पर इतना आपसी प्रेम कि शादी के 24 साल बाद भी एक साथ घूमते-फिरते यही कोशिश रहती हर क्षण साथ ही रहें पल भर को भी अलग ना होना पड़े, बेहद प्यार करने वाले दो बेटे अंकुर व नवांकुर कहने का मतलब हंसता-मुस्कुराता सुखी परिवार. किंतु विधाता के मन की कोई नहीं जानता, पिछले साल नए साल की पार्टी का जश्न मना खुशी-खुशी सोए रात को अचानक साहिल की छाती में तेज़ दर्द उठा जब तक पारुल या घरवाले कुछ समझ हॉस्पिटल पहुंचाते तब तक साहिल का साथ छूट चुका था पारुल की दुनिया वीरान हो चुकी थी.

‌सुबह से ही लोगों का आना-जाना शुरू हो गया, साहिल थे ही इतने मिलनसार-ज़िंदादिल कि कोई विश्वास नहीं कर पा रहा था वो अब नहीं है अनंत यात्रा के लिए निकल चुके हैं. पारुल को समझ नहीं आ रहा था या यूं कहलें समझना नहीं चाह रही थी ये क्या हो रहा है? एकाएक जिंदगी में कैसा तूफान आ गया? जिससे सारा घर बिखर गया तहस-नहस हो गया, बच्चों का सास-ससुर का मुँह देख अपने को हिम्मत देने लगती फिर अगले ही पल साहिल की याद संभलने ना देती.

खैर! जाने वाला चला गया, अब तो रीति-रिवाज़ निभाने ही थे तीसरे दिन उठावनी की रस्म हुई
विधि-विधान से सब  होने के बाद निर्मला जी पारुल की तरफ देख बोलीं, जल्दी से अच्छी सी साड़ी पहन तैयार हो जा आज ऑफिस खोलने जाना है. पारुल क्या किसी को भी समझ नहीं आया निर्मला जी कह क्या रही हैं? कुछ देर से फिर बोलीं, जा पारुल तैयार होकर आ तुझे आज से ही साहिल का सपना पूरा करना है जो उसका मोटरपार्ट्स का काम है जिन ऊंचाइयों तक वो ले जाना चाहता था अब तुझे ही पूर्ण करना है, उठ! मेरी बिटिया देर ना कर अपने साहिल की इच्छा पूरी करने का प्रण कर.

‌पारुल जानती-समझती थी माँ जो कुछ भी कहेंगी या करेंगी उसमे कहीं ना कहीं भलाई होगी हित ही छुपा होगा, इसलिये सवाल-जवाब किए बिना तैयार हो शॉप के लिए चल दी साथ में ससुर और दोनों बेटे अंकुर-नवांकुर थे. शॉप खोल काम शुरू करने की रस्म निभाई किंतु घर आकर उसके सब्र का बांध फिर टूट गया, निर्मला जी ने तो अपना दिल पत्थर का बना लिया था क्योंकि उनकी आंखों को पारुल व बच्चों का भविष्य जो दिख रहा था.

निर्मला जी ने अपने पति की ओर देखा फिर दोनों जन पारुल के पास आए, सिर पर हाथ रख ढाढस बांधने लगे. निर्मला जी उसका सिर अपनी गोदी में रख पुचकारते हुए बोलीं, हमारा प्यारा साहिल हमसे बहुत दूर चला गया जीवन का कटु सत्य है अब कभी ना लौटकर आएगा, परंतु यह भी उतना ही कटु सत्य है कि जाने वाले के करीबी या जो पारिवारिक सदस्य होते हैं उनकी बाकी जिंदगी सिर्फ रो-रोकर शोक करते रहने से तो नहीं बीत सकती.

जिंदा रहने के लिए खाना-पीना और घरेलू-बाहरी सभी काम करना अत्यंत जरूरी रहता है, यह तो जीवन है बेटा जिसके नियम-कायदे हम इंसानों को मानने ही पड़ते हैं हमारी इच्छा या अनिच्छा मायने नहीं रखती. बेटा अब साहिल तो नहीं है लेकिन तुझसे जुड़े दोनों बच्चे तथा हमारा परिवार है, हम सभी को एक-दूसरे का सहारा बन रहना होगा एक-दूजे के लिए ख़ुशीपूर्वक ज़िंदगानी बितानी होगी.

सबसे अहम बात जीने के लिए आत्मनिर्भर होना पड़ेगा बेटा पारुल जो भी तुझे समझा अथवा कह रही हूँ वो हमेशा अपनी माँ की सीख मान याद रखना, अब से मैं तेरी सासू माँ नहीं माँ हूँ और माँ तो माँ होती है.

साहिल को गए अभी तीन दिन हुए हैं ऐसे ही 30 दिन फिर 3 महीने और साल दर साल होते जाएंगे, ये नाते-रिश्तों का तू सोच रही हो कि तेरा व तेरे बच्चों का संग-साथ देते रहेंगे तो अभी से इस भ्रम में ना रह, भूल जा कोई साथ देता रहेगा.

वो तो जब तक हम माँ-पिता हैं तब तक तुझे किसी तरह की परेशानी ना होने देंगे लेकिन बाद में मेरी बिटिया को किसी पर भी निर्भर ना होना पड़े अभी से इस बारे में सोचना होगा, हम अपने अनुभवों व तज़ुर्बे से बता रहे हैं कोई जीवन में ज्यादा दिन साथ नहीं दे सकता एकाध दिन की बात अलग है. उठ! बेटा पारुल आगे की सोच, जो होना था हो गया हम चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते अब अपने और बच्चों के भविष्य की सोच बाकी का जीवन कैसे बिताना है ध्यान दे.

माँमाँ यह क्या कह रही हो आप, क्या करूं कैसे करूं? मुझे तो कुछ नहीं आता सब तो साहिल ही संभालते थे, आप सब मेरी चिंता ना करो मेरी जिंदगी कैसे ना कैसे बीत ही जाएगी.

कैसी बात कर रही है? सिर्फ भावनाओं के सहारे नहीं रहा जा सकता, समय के साथ-साथ प्रैक्टिकल होना पड़ता है जिंदगी बसर करने के लिए बहुत कुछ सहना और फिर करना भी पड़ता है. साहिल तो यादों में हम सबके साथ हमेशा रहेगा, अब तेरहवीं की रस्म के बाद ऑफिस जा व साहिल ने जो बिजनेस शुरू किया है उसको किसी के भी भरोसे ना छोड़ते हुए स्वयं के बलबूते आगे बुलंदियों तक ले जा, यह काम तुझे ही पूरा करना है बेटा.

अब कुछ और ना सोच, कुछ दिनों बाद तू ऑफिस की जिम्मेदारी संभाल घर और बच्चों को मैं देख लिया करूंगी फिर कह रही हूँ, साहिल की यादों के संग आगे बढ़ अपनी जिंदगी हंसते-मुस्कुराते बच्चों व अपनों के साथ बिता.

किन्तु…पर कैसे माँ मुझे तो बिजनेस का कुछ भी अता-पता नहीं, अकेले नहीं संभाल सकती मैं.

कितनी बार हंसकर ही सही पर साहिल से कहती थी अपने साथ कभी तो मुझे भी ऑफिस ले चला करो जानना-समझना चाहती हूँ तो पता है माँ, साहिल बोला करते थे तू तो घर की रानी बनकर रह किसी बात की चिंता ना कर मैं हूँ ना सब संभालने के लिए, अब तुम्हीं बताओ ऐसा कहकर फिर क्यूँ छोड़कर चले गए मुझे अब कैसे संभालूं?

कोई बात नहीं मेरी बच्ची, होनी का किसी को नहीं पता कब क्या हो जाए? कोई नही जानता यहां तक कि अगले पल की खैर-खबर नहीं रहती. तू समझदार हैं पढ़ी-लिखी है इसलिए काम के बारे में जल्दी सीख जाएगी, तेरे पापा को भी थोड़ी बहुत बिज़नेस की जानकारी व समझ है. वैसे तो साहिल अपने पापा को भी ऑफिस ना आने देता था यही कहता रहता था, घर पर रह आराम करो बहुत काम कर लिया किंतु फिर भी कुछेक जानकारी तो है जिससे काफी हद तक तुझे स्वनिर्भर होने में अपना योगदान दे सकेंगे.

हाँ बेटा! तू बिलकुल चिंता मत कर, अभी तेरा पापा जिंदा है नई राह पर हर कदम तेरे साथ है बस! मानसिक तौर पर खुद को मजबूत कर ले ज़रा हिम्मत ना हार, हम सबकी खुशियों का एकमात्र सहारा तू ही है. अंकुर तथा नवांकुर के जीवन की अभी शुरुआत हुई है उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए उन्हें खुशियों की सौगात देने का स्वयं से वादा करते हुए घर-बाहर की जिम्मेदारी निष्ठा से पूर्ण करने का निश्चय कर, तेरे मम्मी-पापा सिर्फ और सिर्फ तेरे संग हैं.

पारुल अब हम दोनों की बात का मान रखते हुए स्वाभिमान के साथ अपने उद्देश्य को हर हाल में पूरा करना, हिम्मत कर एक और बात मन की कहना चाहूँगी, बिटिया यदि जीवन के किसी मोड़ या रास्ते में दूसरा साहिल मिलने लगे तो इधर-उधर की परवाह किए बिना निःसंकोच उसका हाथ थाम लेना, इससे सफर जीवन का आसानी से कट जाएगा समय का ज्यादा मालुम ना पड़ेगा.

माँमाँ…..आगे के शब्द नही मुँह से निकल सके निःशब्द हो चुकी थी पारुल, सिर्फ अपने माँ-पिताजी तुल्य सास-ससुर को निहार रही थी.

तभी मैडम-मैडम की आवाज से पारुल का ध्यान भंग हुआ चेतना में वापिस लौटी, हाँ-हाँ बोलो क्या कहना चाहते हो? वो मीटिंग के लिए आपका सभी इंतज़ार कर रहे हैं बता दें कब शुरू करनी है? ओह! तुम सभी मेंबर्स को जाकर कह दो 10 मिनट से बातचीत करते हैं.

पारुल उठी, एक गिलास पानी पिया और अपनी सासू माँ यानी अपनी माँ को मन ही मन हाथ जोड़ तहे दिल से धन्यवाद दिया, क्योंकि उन्हीं के स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन से प्रेरित हो कुछ ही समय में आत्मनिर्भर बन अपना आत्मसम्मान अपनी खुद की पहचान बनाने में कामयाब हो सकी थी.

कारवां : लोगों के साथ भी, लोगों के बाद भी

अतीत के ढेर में दफन दम तोड़ती, मुड़ीतुड़ी न जाने कैसीकैसी यादों को वह खींच लाती है…घटनाएं चाहे जब की हों पर उन्हें आज के परिवेश में उतारना उसे हमेशा से बखूबी आता है…कुछ भी तो नहीं भूलता उसे. छोटी से छोटी बातें भी ज्यों की त्यों याद रहती हैं.

आज अपना असली रंग खो चुके पुराने स्वेटर के बहाने स्मृतियों को बटोरने चली है…अब स्वेटर क्या अतीत को ही उधेड़ने बैठ जाएगी…उधेड़ती जाएगी…उस में पड़ आई हर सिकुड़न को बारबार छुएगी, सहलाएगी…ऐसे निहारेगी कि बस, पूछो मत…फिर गोले की शक्ल में ढालने बैठ जाएगी.

‘‘तुम्हें कुछ याद भी है नरेंद्र या नहीं, यह स्वेटर मैं ने कब बुना था तुम्हारे लिए? तब बुना था जब तुम टूर पर गए थे कहीं. हां, याद आया हैदराबाद. मालूम है नरेंद्र, अंकिता तब गोद में थी और मयंक मात्र 4 साल का था. तुम लौटे तो मैं ने कहा था कि नाप कर देखो तो इसे…हैरान रह गए थे न तुम, तुम ने मेरे हाथ से स्वेटर ले कर देखते हुए पता है क्या कहा था…’’ उस की नजरें मेरे चेहरे पर आ टिकीं, उस के होंठ मुसकराने लगे.

‘‘क्या कहा था, यही न कि भई वाह, कमाल करती हो तुम भी…तुम्हारा हाथ है या मशीन, कब बनाया? बहुत मेहनत, बहुत लगन चाहिए ऐसे कामों के लिए. यही कहा था न मैं ने…’’ उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा मैं ने…नहीं कहता तो कहती कि तुम तो ध्यान से मेरी कोई बात सुनते ही नहीं…जैसे कि तुम्हारा  कोई मतलब ही नहीं हो इन बातों से…इस घर में किस से बातें करूं मैं, दीवारों से…

गला रुंध आएगा उस का…आंखें नम पड़ जाएंगी…गलत क्या कहेगी शोभना…उस के और मेरे सिवा इस घर में कौन है, ऊपर से मैं भी चुप लगा जाऊं तो…मेरा क्या है…मैं अगर चुप भी रहूं, वक्त तो तब भी कट ही जाया करता है मेरा. शोभना की तरह बोलने की आदत भी तो नहीं है मेरी. मुझे तो बस, उस को सुनना अच्छा लगता है…अच्छा भी क्या लगता है, न सुनूं तो करूं क्या? 2 दिन भी उस की बकबक सुनने को अगर मैं न होऊं न तो वह बीमार पड़ जाती है बेचारी, सच कहूं तो उस के चेहरे पर मायूसी मुझे जरा भी नहीं भाती…वह तो गुनगुनाती, मुसकराती मेरे इर्दगिर्द डोलती हुई ही अच्छी लगती है. आज तो कुछ ज्यादा ही खुश नजर आ रही थी वह…अब अपने मुंह से कुछ कहे या न कहे मगर मैं तो इस खुशी का राज जानता था…उस के चेहरे की मुसकराहट…होंठों पर गुनगुनाहट मुझे इस बात का एहसास करा जाती है कि अब कोई त्योहार आने वाला है या फिर छुट्टियां…हो सकता है बच्चे आ ही जाएं, घरआंगन चहक उठेगा…बागबगीचा महक उठेगा. असमय अपने चमन में आ जाने वाली बहार की कल्पना मात्र से ही उस का चेहरा खिल उठा है…कोई भी छुट्टियां आने से पहले यही हाल होता है उस का…समय बे समय उठ जाने वाला गांठों का दर्द कुछ दिनों के लिए तो जैसे कहीं गायब ही हो जाता है…और सिरदर्द, कुछ दिन के लिए उस की भी शिकायत से मुक्ति मिल जाती है मेरे कानों को. वरना जब देखो तब…सिर पर पट्टा बंधा हुआ है और होंठ दर्द से कराह रहे होते हैं… ‘उफ् सिर दर्द से फटा जा रहा है…जाने क्या हो गया है….’

शोभना कई दिन से एक ही रट लगाए हुए है. पीछे का स्टोर रूम साफ करवा लूं…कहती है कि ऊनीसूती कपड़ों का जाने क्या हाल होगा, काफी समय से एक ही जगह तह किए पड़े हैं. पिछले दस दिन से हर छुट्टी के दिन काम वाली के लड़के रामधारी को भी बुलवा लेती है मदद के लिए…मैं अकसर चिढ़ जाया करता हूं, ‘एक ही दिन तो चैन से घर में बैठने को मिलता है और तुम हो कि…’

‘काहे की छुट्टी…तुम्हारा तो हर दिन संडे है…नहीं करवाना है कुछ तो वह बोलो…’

कैसे कहूं कि काम जैसा काम हो तब तो करवाऊं भी…कपड़ों को निकालेगी… छोटेछोटे ऊनीसूती फ्राक्स…टोपीमोजे… दस्ताने…एकएक को खोलखोल कर निहारेगी…सहलाएगी और फिर ज्यों की त्यों सहेज कर रख देगी. मजाल है जो किसी चीज को हाथ भी लगाने दे…सब की धूल झाड़ कर जब वापस रखना ही है तो काहे की सफाई…कुछ कह दो तो इस उम्र में कहासुनी और हो जाएगी.

मेरी सोच से बेखबर शोभना बड़ी ही तन्मयता से गोले पर गोले बनाए जा रही थी, ‘‘क्या करोगी अब इस का?’’ मैं ने यों ही पूछ लिया. ‘‘अब…धोऊंगी… सुखाऊंगी…फिर लच्छी करूंगी…फिर गोले बनाऊंगी…’’

‘‘फिर…’’

‘‘…फिर…एक स्वेटर बनाऊंगी… अपने लिए…’’

‘‘स्वेटर…अपने लिए…इस गरमी में…’’ मैं चौंका.

‘‘ए.सी. रूम में पड़ेपड़े कहां पता चलता है कि सर्दी है या गरमी…कुछ हाथ में रहता है तो समय सरलता से कट जाता है.’’

‘‘…समय काटने के और भी बहुत से साधन हैं या आंखें फोड़ना जरूरी है, देखता हूं कभी ऊन ले कर बैठ जाओगी तो कभी सिलाई की मशीन…’’

‘‘तो क्या करूं, तुम्हारी तरह किताब या पेपर ले कर बैठी रहूं…’’

‘‘नहीं बाबा, कुछ भी करो मगर मुझ से मत उलझो…लेकिन एक बात बताओ, तुम क्या करोगी इस का? तुम तो कभी कुछ गरम कपड़े पहनती ही नहीं थीं…दिसंबरजनवरी में भी सुबहसुबह बिना शाल के घूमा करती थीं…कहा करती थीं कि तुम्हें ऊनी कपड़े चुभते हैं…फिर…’’

‘‘अरे बाबा, वो तब की बात थी… अब तो बहुत ठंड लगती है, पहले सौ काम होते थे तब ठंड की कौन परवा किया करता था.’’

‘‘अच्छा, तो ये क्यों नहीं कहतीं कि अब बूढ़ी हो गई हो तुम…उम्र ढलने के साथ अब ठंड ज्यादा लगती है तुम्हें…’’

‘‘हां, और तुम तो जैसे…’’ बात बीच में ही छोड़ कर खामोश हो गई पर कितनी देर, ‘‘नरेंद्र, कभी सुबह से शाम कब हो जाती थी पता ही नहीं चलता था न…घड़ी की सृई के पीछे भागतेभागते थक जाया करती थी मैं…पूरी तरह नींद भी नहीं खुलती और अंकिता के रोने की आवाज कानों में पड़ रही होती…तुम चिढ़ कर कुछ भुनभुनाते और तकिया कान पर धर कर सो जाया करते…फिर शुरू होता काम का शाम तक न थमने वाला सिलसिला…घड़ी पर नजर जाती… ‘बाप रे, 7 बजने वाले हैं…’ जरूर काम वाली खटखटा कर लौट गई होगी…अब क्या? अब तो 10 बजे से पहले आएगी नहीं… गंदे बरतन सिंक में पड़े मुझे मुंह चिढ़ा रहे होते…बच्चों का टिफिन…तुम्हारा लंच… उफ्…फटे दूध में सनी तीनों बोतलें… झुंझलाहट आती अपनेआप पर ही…फिर कितनी भी जल्दी करती, नाश्ते में देर हो ही जाती…लंच बाक्स तुम्हारे पीछे भागभाग कर सीढि़यों पर पकड़ाया करती थी.’’

अकसर वह इस टापिक को इसी मोड़ पर ला कर…एक गहरी सांस छोड़ कर खत्म किया करती… उसे एकटक देखता रह जाता मैं…बात की शुरुआत में कितनी उत्तेजित रहती…और अंत आतेआते…मानो रेत से भरी अंजुरी खाली हो रही हो…मेरे भी होंठ मुसकराने के अंदाज में फैलतेफैलाते मानो ठिठक जाते हैं…कितनी बार तो सुन चुका हूं यही सब.

‘‘नरेंद्र, वक्त कैसे गुजर जाता है…है न, पता ही नहीं चलता…सब से बड़ी मीता की शादी को आज 20 साल पूरे हो जाएंगे. सब से छोटी अंकिता भी 2 बच्चों की मां बन चुकी है. बीच के दोनों मोहित और मयंक अपनेअपने गृहस्थ जीवन का सुखपूर्वक आनंद ले रहे होंगे. सुखी हों भी क्यों न, उन की सुखसुविधा का सदैव ही तो ध्यान रखा है हम ने…उन की जरूरतें पूरी करने के लिए हम क्या कुछ नहीं किया करते थे…मांबाप नहीं एक दोस्त बन कर पाला था हम ने उन्हें…तभी तो अपने प्यार के बारे में मोहित ने सब से पहले मुझे बताया था.

‘‘‘मां, बस, एक बार तुम ममता से मिल तो लो. दाद दोगी मेरी पसंद की… हीरा चुना है हीरा आप के लिए.’ मैं ने उस के लिए कौन सा रत्न चुना था, कहां बता पाई थी उसे…आज भी जब कभी शर्माजी की बेटी हिना मेरे सामने होती है तो मेरे दिल में एक कसक सी उठती है…काश… हिना मेरी बहू होती…’’ वैसे वह अच्छी तरह जानती है कि उस का यों अतीत में भटकना मुझे जरा भी नहीं अच्छा लगता, तभी तो आहिस्ताआहिस्ता खामोश होती चली गई, ‘‘मैं भी, न जाने कबकब की बातें याद करती हूं…है न…’’ मेरे खीझने से पहले ही वह सतर्क हो गई.

मैं आज में जीता हूं…पेपर पढ़ने से फुरसत मिलती है तो घर के आगेपीछे की खाली पड़ी, थोड़ी सी कच्ची जमीन के चक्कर काटने लग जाता हूं…और शोभना, उस की सूई तो जब देखो तब एक ही परिधि में घूमती रहती है. वही मोहित…मयंक…उन के बच्चे…मीता… अंकिता…उन के बच्चे…कुछ नहीं भूलती वह…

‘‘याद आ रही है बच्चों की…’’ मैं उस के करीब खिसक आया, ‘‘नातीपोतों के लिए इतना तरसती हो तो हो क्यों नहीं जातीं किसी के पास…सभी तो बुलाते रहते हैं तुम्हें.’’

हमेशा की तरह भड़क गई वह मेरे ऐसा कहने पर, ‘‘कहीं नहीं जाना मुझे… तुम तो यही चाहते हो कि मैं कहीं चली जाऊं और तुम्हें मेरी बकबक से छुट्टी मिल जाए…न कहीं जानेआने की बंदिश… न खानेपीने की रोकटोक…’’ बात अधूरी छोड़ चली गई वह…

पिछले कुछ वर्षों से वह कहीं जाना ही नहीं चाहती…माना मोहित के पास नहीं जाना चाहती…बड़ी बहू के स्वभाव में अजीब सा रूखापन है…बहुत अपनापन तो छोटी बहू में भी नजर नहीं आता…घर 2 पाली में बंटाबंटा सा लगता है…एक में पतिपत्नी और बच्चे…दूसरे में मांबाप और बेटा…बेटे का डबल रोल देखतेदेखते किसी का भी मन उचट जाए…वह उन सासों में से है भी नहीं जो बहू को दोषी और बेटे को निर्दोष समझें…शायद यही कारण था कि उस का मन सब से उचट गया था…

कभी कुछ कुरेद कर पूछना चाहो तो कुछ कहती भी नहीं…जो भी हो, बड़ी सफाई से अपना दर्द छिपा लिया करती है वह, कहती है, ‘अपना घर अपना ही होता है नरेंद्र…वैसे भी मैं उम्र के इस पड़ाव पर तुम से अलग रहना नहीं चाहती…तुम्हारा साथ बना रहे बस, और कुछ नहीं चाहिए मुझे…’ पहले तो ऐसी नहीं थी वह…जरा सा किसी बच्चे का जन्मदिन भी पड़ता था तो छटपटाने लगती वह…ज्यादा नहीं साल 2 साल पहले की बात है, मोहित के बेटे मयूर का जन्मदिन आने वाला था…बस, क्या था…बेसन के  लड्डू बंधने लगे… मठरियां बनने लगीं…रोजरोज की खरीदारी…कभी बहू के लिए साडि़यां लाई जा रही थीं तो कभी सलवार सूट… बच्चों के लिए ढेरों कपड़े…दुनिया भर की तैयारियां देख कर दंग रह गया था मैं… ‘ये क्या…जन्मदिन तो बस, मयूर का ही है न….’

‘तो क्या हुआ? मोहित हो या मयूर…मेरे लिए तो ऐसे अवसर पर सभी बराबर हैं,’ इतराती हुई सी बोली थी वह.

‘हमें रिजर्वेशन करवाने से पहले एक बार मोहित से बात नहीं कर लेनी चाहिए?’

‘अरे…इस में बात क्या करनी है? हर बार ही तो जाते हैं हम…खैर, तुम्हारी मरजी…कर लो…’ फोन सेट आगे खींच कर रिसीवर मेरी ओर बढ़ा दिया था शोभना ने….

‘नहीं डैड, ममा को कहिए, इस बार हम लोग नहीं मना रहे मयूर का जन्मदिन, वैसे भी उस का क्लास टैस्ट चल रहा है. हम नहीं चाहते कि उस का माइंड डिस्टर्ब हो.’

बस, सारी की सारी तैयारियां धरी रह गईं…लाख समझाया था मैं ने उसे कि तुम्हें आने से कहां मना किया है उस ने…

‘बुलाया भी कहां है…एक बार ये भी तो नहीं कहा न कि आप लोग तो आ जाइए.’

कभीकभी क्यों…अकसर ही सोचता हूं मैं कि शोभना, मेरी पत्नी, मेरी तरह क्यों नहीं सोचती. सोचती तो शायद आज वह भी सुखी रहती…हैरानी होती है.

पब्लिक में रणवीर ने किया दीपिका को लिपलॉक, फैंस ने दिए जबरदस्त रिएक्शन

बौलीवुड की सुपरहीट जौड़ी रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण अपनीअपनी फिल्मों को लेकर अक्सर सुर्खियों में रहते है. कपल की कैमेस्ट्री लोगों को खूब पसंद आती है. अभी हाल में दोनों अपने बेबी पोस्ट को लेकर खूब सुर्खिया बटोर रहे है. जिसके बाद दोनों अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की प्री वेडिंग में शामिल हुए थे. जिसके बाद कपल को मुंबई में स्पॉट किया गया है. अब इन दोनों का न्यू वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो में दोनों ने खुलेआम लिपलॉक किया है. जिसे लेकर दोनों खूब वायरल हो रहे है.

 

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आपको बता दें कि वयरल वीडियो में दीपिका पादुकोण और उनके पति रणवीर सिंह किस करते हुए नजर आएं. दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह की जोड़ी को फैंस काफी पसंद करते हैं. अभी हाल ही में दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की प्री वेडिंग में जमकर मस्ती करते हुए नजर आए. अब इसके बाद कपल का एक वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो में दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह कार में किस करते दिखाई दिए. इस वायरल हो रहे वीडियो में रणवीर सिंह जाने से पहले अपनी पत्नी दीपिका पादुकोण को लिप किस करते नजर आ रहे हैं. दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह का ये वीडियो आते ही सोशल मीडिया पर छा गया है. इस वीडियो को दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के फैंस जमकर शेयर कर रहे हैं.

 

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कपल के इस वीडियो पर यूजर्स जमकर कमेंट करते हुए नजर आए. दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के इस वीडियो पर कमेंट करते हुए एक यूजर ने लिखा कि ‘बेस्ट कपल’. तो इसके अलावा कई यूजर्स दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह को ट्रोल भी करते हुए नजर आए.

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