⚲

Satyakatha- डॉक्टर दंपति केस: भरतपुर बना बदलापुर- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

राजीनामे में आ रही अड़चनों के बीच कुछ समय पहले अनुज ने डा. सुदीप को धमकी भी दी थी. इस पर डाक्टर ने अपने परिचित कुछ अधिकारियों और कानूनविदों से सलाहमशविरा भी किया था. इस में डाक्टर ने खुद पर और परिवार पर खतरे की आशंका जताई थी.

चूंकि यह कानूनी मामला था, इसलिए सभी ने उन्हें विवाद नहीं बढ़ाने और समझाइश से मामला शांत करने को कहा था. शायद इसीलिए डा. सुदीप ने अनुज के धमकी देने की लिखित शिकायत पुलिस में नहीं की थी. लगातार दबाव बनाने के बावजूद डाक्टर से पैसा नहीं मिलने के कारण वह अपनी बहन और भांजे के जलने के दृश्य याद कर बौखला जाता था. इसी बौखलाहट में उस ने बदला लेने के लिए डा. सुदीप और उस की पत्नी डा. सीमा की हत्या कर दी.

अब आप को डेढ़ साल पहले की उस खौफनाक मंजर की कहानी बताते हैं, जिस में दीपा और उस के 6 साल के बेटे शौर्य की मौत हो गई थी.

वह 7 नवंबर, 2019 का दिन था. भरतपुर शहर में जयपुर-आगरा हाईवे पर पौश कालोनी सूर्या सिटी में उस दिन शाम करीब 4 बजे डा. सीमा गुप्ता अपनी सास सुरेखा के साथ अपने पति डा. सुदीप की प्रेमिका दीपा के मकान पर पहुंची.

घर में दीपा और उस का बेटा शौर्य था. उन की दीपा से कहासुनी हुई. इस दौरान अचानक आवेश में आई डा. सीमा ने स्प्रिट की बोतल फरनीचर पर उड़ेल कर आग लगा दी. इस के बाद घर के बाहर की कुंडी लगा कर वह चली गई.

स्प्रिट ने तुरंत भयावह रूप दिखाया. पूरा मकान आग की लपटों से घिर गया. चारों तरफ आग से घिरी दीपा ने अपना और मासूम बेटे का जीवन बचाने के लिए पहले डा. सुदीप का फोन किया. सुदीप ने तुरंत पहुंचने की बात कही. इस बीच, दीपा ने अपने छोटे भाई अनुज से भी जान बचाने की गुहार की. अनुज भरतपुर शहर में ही नीम दा गेट इलाके में रहता था.

ये भी पढ़ें- Crime- टोनही प्रथा: आत्महत्या के बाद!

दीपा की गुहार सुन कर अनुज बाइक ले कर तुरंत उस के मकान पर पहुंचा. वह बिना आवताव देखे मकान के बाहर लगी कुंडी खोल कर तेज लपटों के बीच अंदर घुस गया.

इतनी हिम्मत करने के बावजूद वह जान बचाने के लिए चीखतेचिल्लाते इधरउधर छिपते फिर रही बहन और भांजे को नहीं बचा सका. उस ने दोनों को जिंदा जलता देखा. चारों तरफ आग की लपटों से घिरने के कारण अनुज भी गंभीर रूप से झुलस गया था. बड़ी मुश्किल से वह बाहर निकल सका. बाद में उसे जयपुर ले जा कर अस्पताल में भरती कराया गया. कुछ दिनों बाद वह ठीक हो गया.

यह बताना भी जरूरी है कि डा. सीमा ने दीपा और उस के बेटे को क्यों जलाया?

यह कहानी सन 2017 में शुरू हुई थी. दीपा गुर्जर ने भरतपुर में श्रीराम गुप्ता मेमोरियल अस्पताल में बतौर रिसैप्शनिस्ट नौकरी शुरू की थी. यह अस्पताल प्रसूति रोग विशेषज्ञ डा. सीमा गुप्ता का था. डा. सीमा के पति डा. सुदीप भरतपुर के सरकारी अस्पताल आरबीएम में फिजिशियन थे. सरकारी ड्यूटी के बाद डा. सुदीप भी पत्नी के अस्पताल में कुछ समय बैठ जाते थे. वैसे भी उन्होंने अस्पताल के ऊपरी हिस्से में ही आवास बना रखा था.

दीपा का विवाह उत्तर प्रदेश के जगनेर गांव में हुआ था, लेकिन पारिवारिक विवाद के कारण उस का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहा. उस के एक बेटा हुआ, जिस का नाम शौर्य रखा गया. बाद में वह ससुराल से अलग हो कर भरतपुर में अपने पीहर आ कर रहने लगी. बेटा शौर्य उसी के साथ रहता था. पति से उस का तलाक का केस चल रहा था.

अस्पताल में नौकरी करने के दौरान दीपा का डा. सीमा के पति डा. सुदीप से प्रेम प्रसंग शुरू हो गया. दीपा अकेली थी. डा. सुदीप का प्यार मिला, तो वह उन की बांहों में चली गई. पुरानी कहावत है कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. डा. सुदीप और दीपा के मामले में भी यही हुआ.

अस्पताल में दोनों के प्यार के चर्चे होने लगे. डा. सीमा को भी पता चल गया. वह बहुत गुस्सा हुई. उस ने दीपा को नौकरी से निकाल दिया और हिदायत दी कि फिर कभी उन के पति डा. सुदीप से नहीं मिलना.

दीपा क्या करती, उसे नदी का किनारा मिल रहा था, वह भी छूट गया था. वह अपने पीहर में रह कर नए सिरे से जीवन शुरू करने की सोचने लगी.

उधर, दीपा को नौकरी से निकाले जाने से डा. सुदीप बेचैन हो गया. आग दोनों तरफ लगी हुई थी. आग के शोले भड़कने लगे, तो दोनों चोरीछिपे मिलने लगे. दोनों इस बात की सावधानी रखते थे कि डा. सीमा को इस बात का पता न चले. यह सिलसिला कई महीने तक चलता रहा.

ये भी पढ़ें- Manohar Kahaniya: बबिता का खूनी रोहन- भाग 1

इस बीच, डा. सुदीप ने सूर्या सिटी का अपना मकान दीपा को रहने के लिए दे दिया. दीपा इस मकान में अपने बेटे शौर्य के साथ रहने लगी. यह मकान डा. सुदीप और उस की पत्नी ने कुछ साल पहले खरीदा था. मकान खाली पड़ा था. डा. सीमा को अपने कामकाज से इतनी फुरसत नहीं थी कि वह कभी जा कर अपने मकान को देखे.

इसी का फायदा उठा कर डा. सुदीप ने पत्नी डा. सीमा से कह दिया कि उस ने यह मकान किराए पर दे दिया है. इस मकान में दीपा और डा. सुदीप मिलनेजुलने लगे. डा. सुदीप ही उस का सारा खर्च उठाता था. दीपा के बेटे शौर्य की पढ़ाई का खर्च भी उठाता था. शौर्य भरतपुर के नामी और महंगे स्कूल में पढ़ता था.

दीपा और डा. सुदीप के फिर से पनपे प्रेम संबंधों की जानकारी डा. सीमा को उस समय हुई, जब शहर में आयशा सैलून एंड स्पा सेंटर खुलने के निमंत्रण पत्र बंटे. इस निमंत्रण पत्र में डा. सुदीप का नाम भी था. सूर्या सिटी में डा. सुदीप के मकान में दीपा ने पहली नवंबर 2019 को यह स्पा सेंटर खोला.

अगले भाग में पढ़ें- डा. सीमा ने गुस्से में लगाई आग

उलटी गंगा- भाग 1: आखिर योगेश किस बात से डर रहा था

‘‘देशमें लाखों युवा बेरोजगार घूम रहे हैं. किसान आत्महत्या कर रहे हैं, देश बदहाली की ओर जा रहा है और यहां लोग फालतू की बातों में समय बरबाद कर रहे हैं. अरे, मैं पूछता हूं और कोई काम नहीं बचा है क्या इन औरतों के पास, जो मीटू मीटू का नारा लगाए जा रही हैं.

मैं पूछता हूं कि जिस समय इन का शोषण हुआ, तब क्यों नहीं आवाज उठाई, जो अब चिल्ला रही हैं? झूठा प्रचार कर रही हैं, षड्यंत्र रच रहीं पुरुषों के खिलाफ और कुछ नहीं या फिर हो सकता है फेम में रहने के लिए ये मीटू अभियान से जुड़ गई हों. बंद करो टीवी, कुछ नहीं रखा है इन सब में,’’  झल्लाते हुए योगेश ने खुद ही टीवी औफ कर दिया और फिर रिमोट को एक तरफ फेंकते हुए औफिस जाने के लिए तैयार होने लगा.

‘‘अच्छा, ये औरतें बकवास कर रही हैं और तुम सारे मर्द दूध के धुले हो, क्यों?’’ रोटी को तवे पर पटकती हुई नीलिमा कहने लगी, ‘‘हूं, स्वाभाविक भी है जिस समाज में महिला की चुप्पी को उस की शालीनता और गरिमामय व्यक्तित्व का मूलाधार माना जाता रहा हो, वहां शोषण के विरुद्ध उस की आवाज झूठी ही मानी जाएगी?’’ नीलिमा तलखी से बोली.

ये भी पढ़ें- जड़ें: भाग 1

‘‘मैं ऐसा नहीं कर रहा हूं, पर अब

10-20 या 30 साल पुरानी बातों को कुरेदने का क्या मतलब है बताओ? जब उन के साथ ऐसा कुछ हुआ था तब क्यों नहीं आवाज उठाई थी

जो अब चिल्ला रही हैं, मैं यह कह रहा हूं,’’ शर्ट का बटन लगाते हुए योगेश बोला.

योगेश की बातों पर नीलिमा को हैरानी भी हुई और गुस्सा भी आया. बोली, ‘‘तुम्हें यह चीखनाचिल्लाना लगता है पर मुझे तो इस में एकदम सचाई नजर आ रही है योगेश. दरअसल, गलती सिर्फ मर्दों की ही नहीं, समाज की भी है, जहां प्रताडि़त होने के बाद भी लड़कियों को ही चुप रहने को कहा जाता है.

‘‘अगर औफिस में लड़कियां शोषण के प्रति आवाज उठाती हैं, तो नौकरी चली जाती है और घरेलू महिला ऐसा करे, इतनी उस की हिम्मत कहां. समाज में औरतों को बचपन से ही यह शिक्षा दी जाती है कि वे शर्म का चोला पहन कर रखें. मगर मर्दों के लिए खुली छूट क्यों? महिलाएं क्या पहनें क्या नहीं, यह उन की अपनी मरजी होनी चाहिए न कि दूसरों की. फिर वैसे भी शर्महया देखने वालों की आंखों में होती है योगेश, कपड़ों या आचरण में नही. लेकिन लद गया अब वह जमाना.

‘‘सच कहूं, तो मुझे बड़ी खुशी हो रही है यह देख कर कि भारत के इतिहास में शायद यह पहला अवसर है जब पुरुष भयभीत दिखाई दे रहे हैं कि कहीं उन के वर्षों पूर्व किए गए गुनाह का पिटारा न खुल जाए,’’ गर्व से सिर ऊंचा कर नीलिमा बोली, ‘‘बहुत दे चुकी सीता अग्नि परीक्षा. अब राम की बारी है, क्योंकि स्त्री सिर्फ देह नहीं है, बल्कि उस में सांस और स्पंदन भी है और यह बात अब पुरुष को समझनी पड़ेगी कि औरत का भी अपना वजूद है. वह सिर्फ सहती नहीं, सोचती भी है.’’

ये भी पढ़ें- तुम प्रेमी क्यों नहीं: भाग 1

नीलिमा की लंबीचौड़ी बातें सुन योगेश का दिमाग भन्ना गया. अत:

झल्लाते हुए बोला, ‘‘बस हो गया… अब क्या भाषण ही देती रहोगी या खाना भी मिलेगा? वैसे भी आज मुझे देर हो गई है.’’

खाने की प्लेट योगेश के सामने रखती हुई नीलिमा बोली, ‘‘वैसे तुम क्यों इतना बौखला रहे हो? कहीं तुम ने भी तो किसी के साथ… डर तो नहीं रहे हो कि कहीं तुम्हारा भी कोई पुराना पाप न खुल जाए?’’

यह सुनते ही रोटी का कौर योगेश के गले में ही अटक गया. फिर किसी तरह हलक से रोटी को नीचे उतारते हुए बोला, ‘‘प… प… पागलों सी बातें क्यों कर रही हो तुम? मुझे क्यों बिना वजह इन सब में घसीट रही हो? करे कोई और भरे कोई…? मुझे तो बख्श दो और दुनिया जानती है कि मैं कैसा इंसान हूं. सफाई देने की कोई जरूरत नहीं है मुझे.’’

‘‘हूं, और दुनिया उन्हें भी जानती है जिन का पिटारा खुला… पता चले कि जनाब ने भी कभी किसी लड़की के साथ… मैं सिर्फ कह रही हूं,’’ खाने का डब्बा योगेश के सामने रखते हुए नीलिमा बोली.

नीलिका की बातों से योगेश तमतमा उठा. मन तो किया उस का कि खाने का डब्बा उठा कर फेंक दे और कहे कि हां, दुनिया के सारे मर्द खराब हैं. सिर्फ औरतें ही पावन पवित्र हैं. मगर उस की इतनी हिम्मत कहां, जो नीलिमा के सामने औरतों के खिलाफ कुछ बोले, क्योंकि आखिर वह महिलाओं की हमदर्द जो ठहरी. किसी शोषित महिला के बारे में कुछ सुना नहीं कि सखियों सहित मोरचा ले कर निकल पड़ती है.

ये भी पढ़ें- स्मृति चक्र: भाग 1

‘‘क्या अब अपने पति पर भी तुम्हें भरोसा नहीं रह गया और क्या मैं तुम्हें इतना गिरा हुआ इंसान लगता हूं जो ऐसी बातें बोल रही हो?’’

नीलिमा को लगा कि कहीं योगेश उस की बातों को दिल से न लगा बैठे, इसलिए खुद को शांत कर बोली, ‘‘अरे, मैं तो बस ऐसे ही बोल रही थी और क्या मैं तुम्हें नहीं जानती… चलो अब निकलो औफिस के लिए वरना कहोगे मैं ने ही देर करवा दी.’’

‘‘हूं, वैसे भी आज मेरी जरूरी मीटिंग है,’’ योगेश ने मुसकराते हुए कहा और फिर हमेशा की तरह बाय कह कर औफिस निकल गया. लेकिन उस के माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं. डर तो उसे सताने ही लगा था अपने भविष्य को ले कर. सोच कर ही सिहर उठता कि अगर मीटू की चपेट में वह भी आ गया, तो क्या होगा. नीलिमा तो एक पल भी उसे बरदाश्त नहीं करेगी. और तो और उसे सजा दिलवाने में भी पीछे नहीं रहेगी. अपने बच्चों की नजरों में भी उस की छवि धूमिल पड़ जाएगी सो अलग. कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएगा. समाज में बनीबनाई इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी.

मीटिंग में भी योगेश बस यही सब सोचता रहा. औफिस के किसी काम में आज उसे मजा नहीं आ रहा था और न ही किसी स्टाफ को वह कुछ काम करने को कह रहा था वरना तो किसी को ठीक से सांस तक नहीं लेने देता. सब के सिर पर सवार रहता.

‘‘क्या बात है यार, आज बौस बड़े चुपचुप लग रहे हैं? न चीखना, न चिल्लाना, बस चुपचाप जा कर कैबिन में बैठ गए. गुडमौर्निंग बोला तो कोई जवाब भी नहीं दिया. कहीं इन पर भी किसी देवी ने मीटू का केस तो नहीं कर दिया?’’ ठहाके लगाते हुए संदीप ने कहा तो उस की बात पर औरों को भी हंसी आ गई.

‘‘सही कह रहा हूं यार वरना तो आते ही हमें घूरने लगते थे, मगर आज नजरें नीची किए किसी गहरी चिंता में डूबे हैं. क्या बात हो सकती है?’’ संदीप फिर बोला.

ये भी पढ़ें- राहुल बड़ा हो गया है

‘‘हां यार, मुझे तो लगा था डांटने के लिए बुलाया है, पर कहने लगे कि उन्होंने मेरी छुट्टी मंजूर कर दी है,’’ नमन ने कहा, तो वहां बैठे सभी हैरान रह गए. क्योंकि मजाल थी जो किसी को वह बिना नाक रगड़ाए छुट्टी दे दे.

‘‘खैर, जाने दो न हमें क्या. हो गई होगी पत्नी से लड़ाई और क्या,’’ कह कर सभी अपनेअपने काम में लग गए.

भरे मन से जैसे ही योगेश घर पहुंचा, देखा नीलिमा किसी से फोन पर बातें कर रही

थी. जोरजोर से कह रही थी, ‘‘एकदम नहीं छूटना चाहिए वह इंसान. समझता क्या है? भेडि़या कहीं का. बड़ा संस्कारी बना फिरता था, पर चलन तो देखो. नातीपोता वाला हो कर ऐसे कुकर्म और वह भी अपनी बेटी समान लड़की से?’’

‘‘क्या हुआ?’’ धीरे से योगेश ने पूछा,

‘‘आ गए तुम? अभी मैं तुम्हें ही फोन

लगाने वाली थी. पता है, वे अमनजी अरे हमारे  पड़ोसी… उन पर किसी लड़की ने हैरेसमैंट का केस किया है. देखो, कितने संस्कारी बने फिरते थे.

‘‘मैं तो कहती हूं ऐसे इंसान का मुंह काला कर चौराहे पर खड़ा कर हजार जूते मारने चाहिए. पता है तुम्हें, उस की पत्नी तो यह बोलबोल कर चिल्लाए जा रही थी कि वह लड़की झूठी है.

रुह का स्पंदन- भाग 2

दक्षा मां से बातें कर रही थी कि उसी समय वाट्सऐप पर मैसेज आने की घंटी बजी. दक्षा ने फटाफट बायोडाटा और फोटोग्राफ्स डाउनलोड किए. बायोडाटा परफेक्ट था. दक्षा की तरह सुदेश भी अपने मांबाप की एकलौती संतान था. न कोई भाई न कोई बहन. दिल्ली में उस का जमाजमाया कारोबार था. खाने और ट्रैवलिंग का शौक. वाट्सऐप पर आए फोटोग्राफ्स में एक दाढ़ी वाला फोटो था.

दक्षा को जो चाहिए था, वे सारे गुण तो सुदेश में थे. पर दक्षा खुश नहीं थी. उस के परिवार में जो घटा था, उसे ले कर वह परेशान थी. उसे अपनी मर्यादाओं का भी पता था. साथ ही स्वभाव से वह थोड़ी मूडी और जिद्दी थी. पर समय और संयोग के हिसाब से धीरगंभीर और जिम्मेदारी भी थी.

दक्षा का पालनपोषण एक सामान्य लड़की से हट कर हुआ था. ऐसा नहीं करते, वहां नहीं जाते, यह नहीं बोला जाता, तुम लड़की हो, लड़कियां रात में बाहर नहीं जातीं. जैसे शब्द उस ने नहीं सुने थे, उस के घर का वातावरण अन्य घरों से कदम अलग था. उस की देखभाल एक बेटे से ज्यादा हुई थी. घर के बिजली के बिल से ले कर बैंक से पैसा निकालने, जमा करने तक का काम वह स्वयं करती थी.

दक्षा की मां नौकरी करती थीं, इसलिए खाना बनाना और घर के अन्य काम करना वह काफी कम उम्र में ही सीख गई थी. इस के अलावा तैरना, घुड़सवारी करना, कराटे, डांस करना, सब कुछ उसे आता था. नौकरी के बजाए उसे बिजनैस में रुचि ही नहीं, बल्कि सूझबूझ भी थी. वह बाइक और कार दोनों चला लेती थी. जयपुर और नैनीताल तक वह खुद गाड़ी चला कर गई थी. यानी वह एक अच्छी ड्राइवर थी.

दक्षा को पढ़ने का भी खासा शौक था. इसी वजह से वह कविता, कहानियां, लेख आदि भी लिखती थी. एकदम स्पष्ट बात करती थी, चाहे किसी को अच्छी लगे या बुरी. किसी प्रकार का दंभ नहीं, लेकिन घरपरिवार वालों को वह अभिमानी लगती थी. जबकि उस का स्वभाव नारियल की तरह था. ऊपर से एकदम सख्त, अंदर से मीठी मलाई जैसा.

उस की मित्र मंडली में लड़कियों की अपेक्षा लड़के अधिक थे. इस की वजह यह थी कि लिपस्टिक या नेल पौलिश के बारे में बेकार की चर्चा करने के बजाय वह वहां उठनाबैठना चाहती थी, जहां चार नई बातें सुननेसमझने को मिलें. वह ऐसी ही मित्र मंडली पसंद करती थीं. उस के मित्र भी दिलवाले थे, जो बड़े भाई की तरह हमेशा उस के साथ खड़े रहते थे.

ये भी पढ़ें-  हीरोइन

सब से खास मित्र थी दक्षा की मम्मी, दक्षा उन से अपनी हर बात शेयर करती थी. कोई उस से प्यार का इजहार करता तो यह भी उस की मम्मी को पता होता था. मम्मी से उस की इस हद तक आत्मीयता थी. रूप भी उसे कम नहीं मिला था. न जाने कितने लड़के सालों तक उस की हां की राह देखते रहे.

पर उस ने निश्चय कर लिया था कि कुछ भी हो, वह प्रेम विवाह नहीं करेगी. इसीलिए उस की मम्मी ने बुआ के कहने पर मेट्रोमोनियल साइट पर उस की प्रोफाइल डाल दी थी. जबकि अभी वह शादी के लिए तैयार नहीं थी. उस के डर के पीछे कई कारण थे.

सुदेश और दक्षा के घर वाले चाहते थे कि पहले दोनों मिल कर एकदूसरे को देख लें. बातें कर लें और कैसे रहना है, तय कर लें. क्योंकि जीवन तो उन्हें ही साथ जीना है. उस के बाद घर वाले बैठ कर शादी तय कर लेंगे.

घर वालों की सहमति से दोनों को एकदूसरे के मोबाइल नंबर दे दिए गए. उसी बीच सुदेश को तेज बुखार आ गया, इसलिए वह घर में ही लेटा था. शाम को खाने के बाद उस ने दक्षा को मैसेज किया. फोन पर सीधे बात करने के बजाय उस ने पहले मैसेज करना उचित समझा था.

काफी देर तक राह देखने के बाद दक्षा का कोई जवाब नहीं आया. सुदेश ने दवा ले रखी थी, इसलिए उसे जब थोड़ा आराम मिला तो वह सो गया. रात करीब साढ़े 10 बजे शरीर में दर्द के कारण उस की आंखें खुलीं तो पानी पी कर उस ने मोबाइल देखा. उस में दक्षा का मैसेज आया हुआ था. मैसेज के अनुसार, उस के यहां मेहमान आए थे, जो अभीअभी गए हैं.

सुदेश ने बात आगे बढ़ाई. औपचारिक पूछताछ करतेकरते दोनों एकदूसरे के शौक पर आ गए. यह हैरानी ही थी कि दोनों के अच्छेबुरे सपने, डर, कल्पनाएं, शौक, सब कुछ काफी हद इस तरह से मेल खा रहे थे, मानो दोनों जुड़वा हों. घंटे, 2 घंटे, 3 घंटे हो गए. किसी भी लड़की से 10 मिनट से ज्यादा बात न करने वाला सुदेश दक्षा से बातें करते हुए ऐसा मग्न हो गया कि उस का ध्यान घड़ी की ओर गया ही नहीं, दूसरी ओर दक्ष ने भी कभी किसी से इतना लगाव महसूस नहीं किया था.

सुदेश और दक्षा की बातों का अंत ही नहीं हो रहा था. दोनों सुबह 7 बजे तक बातें करते रहे. दोनों ने बौलीवुड हौलीवुड फिल्मों, स्पोर्ट्स, पौलिटिकल व्यू, समाज की संरचना, स्पोर्ट्स कार और बाइक, विज्ञान और साहित्य, बच्चों के पालनपोषण, फैमिली वैल्यू सहित लगभग सभी विषयों पर बातें कर डालीं. दोनों ही काफी खुश थे कि उन के जैसा कोई तो दुनिया में है. सुबह हो गई तो दोनों ने फुरसत में बात करने को कह कर एकदूसरे से विदा ली.

Father’s Day Special: मोहूम सा परदा

Satyakatha: मकान में दफन 3 लाशें- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

अहसान पूरी तरह आश्वस्त हो गया कि वे गहरी नींद में गए हैं. फिर क्या था, यही सही मौका था उसे अपने मंसूबों को अंजाम देने का. उस ने पहले पत्नी नाजनीन, उस के बाद सोहेल और अंत में साजिद की गला घोंट कर हत्या कर दी और धारदार चाकू से तीनों का गला रेत दिया और एक कमरे में तीनों की लाशें रख कर दरवाजे पर बाहर से ताला जड़ दिया ताकि उस कमरे में कोई और न जा सके.

अगले दिन शहर से एक मजदूर बुला कर अहसान ने मकान के बाहरी दालान में सैफ्टी टैंक बनवाने के लिए एक बड़ा और गहरा गड्ढा खुदवाया. फिर रात में तीनों लाशें बारीबारी से उस में डाल दीं.

सबूत मिटाने के लिए उस ने हत्या में प्रयुक्त आलाकत्ल चाकू भी उसी गड्ढे में डाल दिया. उस के बाद ऊपर से मिट्टी डाल कर उन्हें दफना दिया. फिर मिट्टी के ऊपर सीमेंट का घोल फैला कर रातोंरात उस पर पक्का फर्श तैयार कर दिया और चैन की नींद सो गया.

पड़ोसी जब कभी अहसान से उस की पत्नी और बेटों के बारे में पूछते तो वह बहाना बना कर कर कह देता कि पत्नी बेटों के साथ जगदीश नगर में किराए के कमरे में रहती है. मैं भी कभीकभी रात में वहीं रुक जाया करता हूं.

नाजनीन और उस के दोनों बेटों सोहेल और साजिद की हत्या किए एक साल बीत गया था. साल 2017 में अहसान की पहली पत्नी नूरजहां छोटे बेटे शाकिर के साथ पानीपत एक रिश्तेदार के यहां शादी में आई तो पति से मिलने शिवनगर कालोनी भी आई.

जब उस ने पति से दूसरी पत्नी और उस के दोनों बेटों के बारे में पूछा तो अहसान सकपका गया और घबराहट के मारे उस के मुंह से सच्चाई बाहर निकल आई कि उस ने तीनों की हत्या कर दी है और लाशों को इसी घर में दफना दिया है.

उस ने पत्नी को लालच दिया, ‘‘नूरजहां, मुझे नाजनीन से काफी रुपए मिले हैं, उन पैसों से मैं तुम्हारे लिए एक प्लौट खरीदूंगा. इतना ही नहीं, मैं तुम्हें घर के सारे कीमती सामान जैसे फ्रिज, वाशिंग मशीन, कूलर, एलईडी, ट्राली बैग आदि भी खरीद कर दूंगा. तुम अब मौज करोगी. लेकिन तुम यह बात किसी से नहीं कहना.’’

ये भी पढ़ें- Satyakatha: जानलेवा बना पत्नी के प्रेमी से अवैध संबंध

रुपए और सामान के लालच में पति के गुनाहों को नूरजहां ने अपने सीने में दफन कर लिया और किसी से कुछ नहीं बताया. सारे सबूत मिटाने के लिए अहसान ने नाजनीन की चैकबुक, पासबुक, एटीएम कार्ड, फोटो आदि दस्तावेज जला कर नष्ट कर दिए ताकि पुलिस उस तक किसी कीमत पर न पहुंच सके.

इस के बाद सन 2018 में अहसान ने शुगर मिल कालोनी के रहने वाले पवन कुमार को 5 लाख रुपए में वह मकान बेच दिया. फिर उन रुपयों से पहली पत्नी नूरजहां के लिए मुजफ्फरनगर में एक प्लौट खरीदा. उस के बाद वह मुजफ्फरनगर से भदोही चला गया और किराए का कमरा ले कर रहने लगा.

शादी डौटकौम के जरिए वह एक नए शिकार की तलाश में जुट गया. उसे जल्द ही एक लखपति बीवी फिर से मिल गई. उस ने उस से मंदिर में शादी कर ली और फिर उस के साथ मौज से जीवनयापन करने लगा.

ये भी पढ़ें- Satyakatha: नफरत की विषबेल- भाग 2

अहसान सैफी के अपराध का घड़ा भर गया था. जिस मकान में पवन रह रहा था, उस के दालान में बड़ी संख्या में चींटियां लग रही थीं. चींटियों से त्रस्त हो कर पवन ने जब दालान का फर्श तुड़वाया तो सालों से उस के नीचे दफन हत्या का राज खुल गया और शातिर अहसान जेल की सलाखों के पीछे जा पहुंचा.

उस ने कभी सोचा नहीं था कि उस की फूलप्रूफ योजना पर मामूली सी चींटी पानी फेर देगी और जीवन सलाखों के पीछे कटने के लिए विवश हो जाएगा. कथा लिखे जाने पुलिस ने नाजनीन के सारे सामान नूरजहां के घर (मुजफ्फरनगर) से बरामद कर लिए थे. इसी आधार पर पुलिस ने नूरजहां और उस के बेटे शाकिर को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था.

कथा लिखे जाने तक तिहरे हत्याकांड के तीनों आरोपी अहसान सैफी, पहली पत्नी नूरजहां और उस का बेटा शाकिर जेल की सलाखों के पीछे कैद थे. अब अहसान को अपने किए का पश्चाताप हो रहा था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जरा सी आजादी- भाग 3: नेहा आत्महत्या क्यों करना चाहती थी?

‘‘इतने सालों में तुम ने अपने पति को कभी ‘न’ नहीं कहा और उन का अधिकार क्षेत्र तुम्हारी सांस तक पहुंच गया. 12 घंटे तुम इस बंद घर में इतनी भी हिम्मत नहीं कर सकती कि खिड़कियां ही खोल पाओ. जिंदा इंसान हो, तुम कोई मृत काया नहीं जिसे ताजी हवा नहीं चाहिए. सारा दोष तुम्हारा अपना है, तुम्हारे पति का नहीं. जिस की सांस घुटती है, विरोध भी उसी को करना पड़ता है. 4 दिन घर में अशांति होगी, होने दो मगर अपना जीवन समाप्त मत करो. शांति पाने के लिए कभीकभी अशांति का सहारा भी लेना पड़ता है. तुम्हारे पति को परेशानी तो होगी क्योंकि उन्होंने कभी तुम्हारी ‘न’ नहीं सुनी. इतने बरसों में न की गई कितनी सारी ‘न’ हैं जिन का उन्हें एकसाथ सामना करना होगा. अब जो है सो है. तब नहीं तो अब सही, जब जागे तभी सवेरा. अपना घर अपने तरीके से सजाओ.’’

नेहा आंखें फाड़े उस का चेहरा देखती रही.

‘‘घर में वह सामान जो बेकार पड़ा है, सब निकाल दो. कबाड़ी वाला मैं ले आऊंगी. गति दो हर चीज को. तुम भी रुकी पड़ी हो, सामान भी रुका पड़ा है. तुम मालकिन हो घर की, जैसा चाहो, सजाओ.’’

‘‘वही तो मैं भी सोचती हूं.’’

‘‘कुछ भी गलत नहीं सोचती हो तुम. इस घर में पतिदेव सिर्फ रात गुजारते हैं. तुम्हें तो 24 घंटे गुजारने हैं. किस की मरजी चलनी चाहिए?’’

शुभा को नेहा के चेहरे का रंग बदलाबदला नजर आया. आंखों में बुझीबुझी सी चमक, जराजरा हिलती सी नजर आई.

‘‘अच्छा, भाईसाहब का बिजनैस कार्ड देना जरा. मेरे पतिदेव को इनकम टैक्स की कोई सलाह लेनी थी. तुम चलो, अभी मेरे साथ. आज 31 मार्च है न. क्या पता रात के 12 ही बज जाएं. जब आएंगे, तुम्हें बुला लेंगे. अरे, फोन पर बात कर लेंगे न हम,’’ कहते हुए शुभा उस का हाथ थाम चलने के लिए खड़ी हो गई.

ये भी पढ़ें- Romantic Story: ये लम्हा कहां था मेरा

नेहा के ढेर सारे प्रतिरोध थे जिन्हें शुभा ने माना ही नहीं. हाथ पकड़ कर अपने साथ अपने घर ले आई और ड्राइंगरूम में बैठा दिया. नेहा ने देखा कमरा पूरी तरह से व्यवस्थित था.

‘‘आराम से बैठो. आजकल मेरे पतिदेव भी किसी काम से शहर से बाहर गए हुए हैं. मैं भी अकेली ही हूं. अगर भाईसाहब ज्यादा देर से आएं तो तुम यहीं सो जाना.’’

‘‘सोना क्या है, दीदी. मुझे तो सोए हुए हफ्तों बीत चुके हैं. जागना ही है. यहां जागूं या वहां जागूं.’’

‘‘तो अच्छी बात है न. हम गपशप करेंगे.’’ शुभा ने हंस कर उत्तर दिया.

उस के बाद शुभा ने टीवी चालू कर दिया पर नेहा ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. किताबें लगी थीं रैक में. उस का ध्यान उधर ही था. नेहा की कटी कलाई पर शुभा की पूरी चेतना टिक चुकी थी. अगर वह उस के घर न गई होती तो क्या नेहा अपनी कलाई काट चुकी होती? उस के पति तो शायद रात 12 बजे आ कर उस का शव ही देख पाते. संयोग ही तो है हमारा जीवन.

वह भी आराम करने के लिए लेट ही चुकी थी. पता नहीं क्या हुआ था उसे जो वह सहसा उस के घर जाने को उठ पड़ी थी. शायद वक्त को नेहा को बचाना था इसलिए शुभा तुरंत उठ कर नेहा के घर पहुंच गई. शुभा ने घंटी बजा दी. शायद उसी पल नेहा का क्षणिक उन्माद चरम सीमा पर था.

क्षणिक उन्माद ही तो है जो मानवीय और पाशविक दोनों ही तरह के भावों के लिए जिम्मेदार है. क्षणिक सुख की इच्छा ही बलात्कारी बना डालती है और क्षणिक उन्माद ही हत्या और आत्महत्या तक करवा डालता है. कितना अच्छा हो अगर मनुष्य चरमसीमा पर पहुंच कर भी स्वयं पर काबू पा ले और अमूल्य जीवन नष्ट न हो. न हमारा न किसी और का.

रात 11:30 बजे नेहा के पति आए और उसे ले गए. विचित्र धर्मसंकट में थी शुभा. नेहा की हरकत उस के पति को बता दे तो शायद वे उस की मनोस्थिति की गंभीरता को समझें. कैसे समझाए वह उस के पति को कि उस की पत्नी की जान को खतरा है. किसी के घर का निहायत व्यक्तिगत मसला अनायास ही उस के सामने चला आया था जिस से वह आंखें नहीं मूंद पा रही थी. जीवनमरण का प्रश्न हो जहां वहां क्या अपना और क्या पराया.

दूसरे दिन करीब 11-12 बजे शुभा ने नेहा के घर पर कई बार फोन किया पर नेहा ने फोन नहीं उठाया. विचित्र सी कंपकंपी उस के शरीर में दौड़ गई. किसी तरह अपना घर बंद किया और भागीभागी नेहा के घर पहुंची. बेतहाशा उस के घर की घंटी बजाई.

दरवाजा खुला और सामने उस के पति खड़े थे. अस्तव्यस्त कपड़ों में. नाराजगी थी उन के चेहरे पर. शायद उस ने ही बेवक्त खलल डाल दिया मगर सच तो सच था जिसे वह छिपा नहीं पाई थी.

‘‘आप घर पर होंगे, मुझे पता नहीं था. फोन क्यों नहीं उठाते आप? मैं समझी उस ने कुछ कर लिया. आप उस का खयाल रखिएगा. माफ कीजिएगा, कहां है नेहा?’’

सांस धौंकनी की तरह चल रही थी शुभा की. मन भर आया  था. पता चला, नेहा को नींद की दवा दे कर सुलाया है. आदि से अंत तक शुभा ने सब बता दिया ब्रजेश को. काटो तो खून नहीं रहा ब्रजेश में.

‘‘इसीलिए मैं कल अपने साथ ले गई थी. आप ने उस का घाव देखा क्या?’’

‘‘हां, देखा था मगर हैरान था कि सोने की चूड़ी से हाथ कैसे कट गया. कांच की चूड़ी तो उस ने कभी पहनी ही नहीं,’’ धम्म से बैठ गए ब्रजेश, ‘‘क्या करूं मैं इस का?’’

नजर दौड़ाई शुभा ने. सब खिड़कियां बंद थीं, जिन्हें कल खोला था.

‘‘बुरा न मानें तो मैं एक सुझाव दूं. आप उसे उस की मरजी से जीने दें कुछ दिन. जैसा वह चाहे उसे करने दें.’’

‘‘मैं ने कब मना किया है उसे. वह जो चाहे करे.’’

‘‘ये खिड़कियां कल खुलवाई थीं मैं ने, आप ने शायद आते ही पहला काम इन्हें बंद करने का किया होगा. क्या आप ने सोचा, शायद उसे ताजी हवा पसंद हो?’’

ये भी पढ़ें- जोरू का गुलाम: मां इतनी संगदिल कैसे हो गईं

‘‘अरे, खुली खिड़की से अंदर का नजर आता है.’’

‘‘क्या नजर आता है. आप की पत्नी कोई अपार सुंदरी है क्या जिसे देखने को सारा संसार खिड़की से लगा खड़ा है. अरे, जिंदा इंसान है वह, जिसे इतना भी अधिकार नहीं कि ताजी हवा ही ले सके. परदे हैं न…उसे उस के मन से करने दीजिए कुछ दिन. वह ठीक हो जाएगी. उस का दम घुट रहा है, जरा समझने की कोशिश कीजिए. नींद की दवा खिलाखिला कर सुलाने से उस का इलाज नहीं होगा. उसे जागी हालत में वह करने दीजिए जिस से उसे खुशी मिले,’’ स्वर कड़वाहट से भर उठा था शुभा का, ‘‘उस के मालिक मत बनिए. साथी बनिए उस के.’’

ब्रजेश सकपका से गए शुभा के शब्दों पर.  शुभा बोलती रही, ‘‘आप समझदार हैं. 55 साल तक पहुंचा इंसान बच्चा नहीं होता, जिसे कान पकड़ कर पढ़ाया जाए. अपनी गृहस्थी उजाड़ना नहीं चाहते तो एक बार नेहा का चाहा भी कर के देखिए. बताना मेरा फर्ज था और इंसानी व्यवहार भी. मैं चाहती हूं आप का घर फलेफूले. मैं चलती हूं.’’

ब्रजेश सकपकाए से खड़े रहे और शुभा घर लौट आई, पूरा दिन न कुछ खापी सकी न ठीक से सो सकी. नेहा एक प्रश्न बन कर सामने चली आई है जिस का उत्तर उसे पता तो है मगर लिख नहीं सकती. किसी का जीवन उस के हाथ का पन्ना नहीं है न, जिस पर वह सही या गलत कुछ भी लिख सके. उत्तर उसे शायद पता है मगर अधिकार की स्याही नहीं है उस के पास. क्या होगा नेहा का?

ये भी पढ़ें- काशी वाले पंडाजी: बेटियों ने बचाया परिवार

आत्महत्या का प्रयास भी तो एक जनून है जिसे अवसादग्रस्त इंसान बारबार कार्यान्वित करता है. बच जाने की अवस्था में उसे और अफसोस होता है कि वह बच क्यों गया? जीने में भी असफल रहा और अब मरने में भी असफल. जब वह फिर प्रयास करता है तब असफल हो जाने के सारे कारण बड़ी समझदारी से निबटा देता है. शुभा को डर है कि अब अगर नेहा ने कोई दुस्साहस फिर किया तो शायद सफल हो जाए.

दिल्ली की दोस्ती! वाया फेसबुक

देश की राजधानी दिल्ली के एक ऑटो चालक ने किस तरह एक युवती को फेसबुक के जरिए अपनी दोस्ती के जाल में फंसा कर उसकी अस्मत को लूट लिया. अक्सर यह कहा जाता है कि एक लड़का और लड़की अच्छे दोस्त क्यों नहीं हो सकते, एक दूसरे की मदद क्यों नहीं कर सकते. जमाना आज 21 वी शताब्दी का है तो क्यों नहीं दोनों साथ साथ कदम दर कदम मिलाकर के दोस्ती की एक नई इबारत नहीं लिख सकते.
जी हां! यह अपने आप में एक पक्ष है, दूसरा पक्ष अंधेरे वाला भी है. जहां फेसबुक पर दोस्ती के बाद लड़का लड़की को धोखा देता है. इसलिए  सावधान! आंख मूंदकर लड़कियों का किसी पर विश्वास करना भारी पड़ सकता है.

दिल्ली की सड़कों पर आवारा सा घूमने वाले एक ऑटो चालक ने झूठी कहानी गढ़ कर
छत्तीसगढ़ की अंबिकापुर शहर की एक युवती रजनी (काल्पनिक नाम) को फेसबुक पर दोस्ती कर फंसाया  . जैसा कि आजकल चलन है सोशल मीडिया फेसबुक की मित्रता अपने उफान पर है बड़े महानगरों के लड़कों पर लड़कियां विश्वास भी कर लेती हैं.

ऐसे में युवती की दोस्ती फेसबुक के माध्यम से  राजधानी दिल्ली के एक युवक आशीष से हो गई. जैसा कि अक्सर होता है शातिर युवक आशीष ने बड़ी-बड़ी बातें करके लड़की को अपने संजाल में फंसा लिया. जब रजनी ने कहा कि उसके सामने रोजी रोटी और भविष्य का सवाल है फिर तो मानो आशीष को मौका ही मिल गया वह बोला- अगर तुम दिल्ली आ जाओ तो मैं तुम्हें नौकरी भी दिलवा दूंगा और तुम एक हाई क्लास जिंदगी जी सकोगी. रजनी उसके मीठी चुपड़ी बातों में आ गई.

ये भी पढ़ें- Crime: फ्री का लॉलीपॉप, बड़ा लुभावना!

मगर आगे देखिए! उसके साथ क्या हश्र हुआ.

और बना लिया “बंधक”!

ऑटो चालक आशीष गुप्ता ने लड़की को दिल्ली बुलाया और सामान्य रूप से कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि कोई युवक ऐसा दुस्साहस भी कर सकता है. जब फेसबुक मित्र आशीष के झांसे में आकर रजनी घर से झूठ बोलकर दिल्ली पहुंच गई तो वहां युवक ने उसे मीठी चुपड़ी बातें करके अपने घर ले जाकर  युवती को अपने कमरे में  बंधक बनाकर रखा मारपीट करता और उसके साथ अनाचार करता रहा. शायद युवक मानसिक विकृति लिए हुए था. इसलिए वह उसे सिगरेट से यदा-कदा  दागता भी था. प्रताड़ना के लंबे दौर से गुजरने के बाद  किसी तरह रजनी ने एक दिन आशीष के मोबाइल से ही नातेदारों से संपर्क किया.

परिजनों की जब दोबारा बातचीत बंद हो गई तो उन्होंने अंबिकापुर, पुलिस अधीक्षक के पास पहुंच शिकायत दर्ज कराई इस पर उन्होंने  कोतवाली पुलिस को जांच के निर्देश दिया.

पुलिस हरकत में आई मोबाइल ट्रेस कर दिल्ली पहुंची तो रजनी की एक एक बात सच निकली.  पुलिस ने दिल्ली पुलिस की मदद से आशीष को दिल्ली से गिरफ्तार कर रजनी को उसके कब्जे से मुक्त कराया. पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया बीस साल की रजनी  ( काल्पनिक नाम)  की पहचान फेसबुक के माध्यम से दिल्ली के आदित्य गुप्ता नामक युवक से हुई.

ये भी पढ़ें- Manohar Kahaniya: बबिता का खूनी रोहन

युवक ने युवती से झूठ कहा कि  वह दिल्ली में एक कॉल सेंटर में काम करता है, यदि वह दिल्ली आएगी तो उसे भी बेहतर काम दिला देगा. दिल्ली राजधानी है यहां काम की कमी नहीं है और फिर छत्तीसगढ़ के जाने कितने लड़के लड़कियां यहां काम कर रहे हैं. इन बातों में आकर के रजनी अपने घर से दिल्ली की ओर  28 दिसंबर 2020 को युवती घर से निकल पड़ी. उसने घरवालों से कहा  वह परीक्षा देने जा रही है.  वहां पहुंचकर युवक से संपर्क किया तो वह लेने आ गया.

इसके बाद रजनी को वह अपने कमरे में ले गया और उसके साथ अनाचार अत्याचार करने लगा. रजनी का परिवार जनों से संपर्क टूट गया तो परेशान हो करके उन्होंने 31 दिसंबर2020 को अपनी बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई. रजनी का मोबाइल भी तोड़ दिया गया था ताकि वह अपने परिजनों से बात न कर सके. 6 महीने10 दिन  युवक आशीष युवती से अनाचार करता रहा. उसके विरोध करने पर वह उसे सिगरेट से भी दाग देता था.

ये भी पढ़ें- Crime- टोनही प्रथा: आत्महत्या के बाद!

अंबिकापुर के थाना प्रभारी ने हमारे संवाददाता को बताया- युवती सरगुजा क्षेत्र की रहने वाली है. युवक को गिरफ्तार करके उसका और युवती का बयान लिया गया पुलिस ने युवक पर सख्त कार्रवाई करते हुए जय जेल भेज दिया है.

Serial Story: धनिया का बदला- भाग 1

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

‘‘अरे, आओ रे छंगा… गले लग जाओ हमारे… आज कितने बरसों के बाद तुम से मुलाकात हो रही है… कितने दुबले हो गए हो तुम… खातेवाते नहीं हो क्या?’’ बीरू ने अपने भाई से कहा.

‘‘हां भाई बीरू… तुम तो जानते हो… इस खेतीकिसानी का काम करने के बाद कमबख्त चूल्हाचौका तो होने से रहा हम से… दिनभर की मेहनत के बाद जो भी बन पड़ता है बना लेते हैं और खा कर सो जाते हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं छंगा भैया… अब हम आ गए हैं… कामधाम में तुम्हारा हाथ बंटाएंगे और तुम्हारी भाभी तुम को खूब दूधमलाई खिलाएंगी… और ये तुम्हारी 2 भतीजियां हैं, इन के साथ खूब खुश रहोगे तुम भी और हम भी.

‘‘हम दोनों भाई मिल कर काम करेंगे, तो हमारी खेती सोना उगलेगी सोना,’’ कह कर एक बार फिर से बीरू ने छंगा को गले लगा लिया.

बीरू और छंगा दोनों जुड़वां भाई थे. उन के मांबाप की मौत पहले ही हो  चुकी थी.

बचपन से ही बीरू को शहर जाने का शौक था, इसलिए वह गांव की ही एक लड़की से शादी करने के बाद अपनी बीवी को ले कर शहर निकल गया था और खेतीबारी का काम अकेले छंगा के सिर पर आ गया था.

अभी तक छंगा ही इस पूरी खेतीबारी का मालिक था. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि बीरू किसी दिन शहर को छोड़ कर गांव में भी रहने के लिए आ सकता?है, इसलिए उस ने बातोंबातों में ही बीरू से पूछा, ‘‘तो भैया… क्या शहर वाला मकान, जो किराए पर लिए थे, वह छोड़ दिए हैं आप?’’

‘‘अरे, हां रे… वह सब हम छोड़  के आए हैं… किराए का मकान, नौकरी, सबकुछ… अरे, जब गांव में ही अपनी इतनी सारी जमीन पड़ी हुई?है, तब किसी दूसरे की हांहुजूरी क्या करनी?’’ बीरू ने साफसाफ कह दिया था.

ये भी पढ़ें- शादी: सुरेशजी को अपनी बेटी पर क्यों गर्व हो रहा था?

अभी तक तो छंगा ही इस सारी खेती का मालिक बना बैठा था, पर अब अचानक से बीरू का वापस गांव में आ कर बसने की बात करना उसे बिलकुल सुहा नहीं रहा था.

बीरू की पत्नी का नाम धनिया था. सांवला रंग, तीखे नैननक्श, सांचे में ढला हुआ शरीर. उसे देखने से लगता ही नहीं था कि वह 2 बच्चों की मां है.

धनिया भी गांव में ही पलीबढ़ी थी, पर जब उसे बीरू अपने साथ ब्याह कर शहर ले गया, तो उस ने साड़ी पहनना सीख लिया था.

गांव की लड़की पर जब शहरीपन का रंग चढ़ गया, तो एक अलग किस्म की नजाकत आ गई थी धनिया में. अब जब वह साड़ी बांध कर उस पर खुली पीठ वाला तंग ब्लाउज पहन कर निकलती तो गांव के कुंआरे लड़के तो होश खो ही बैठते, बल्कि शादीशुदा और बूढ़े भी ललचाई नजरों से उसे घूरते रहते थे.

एक दिन की बात है. शाम के समय बीरू और धनिया खेत की तरफ टहलने के लिए निकले थे कि तभी किसी ने धनिया पर छींटाकशी की, ‘‘अरे, तू शहर की है गोरी या गांव की है छोरी. एक बार कलेजे से हमारे लग जा, तो मैं आज मना लूं होली…’’

‘‘तुम लोगों को शर्म नहीं आती इस तरह से एक औरत को छेड़ते हुए,’’ धनिया ने पलट कर देखा, तो 3-4 मनचलों का एक ग्रुप बैठा हुआ था.

बीरू को मामले को भांपने में देर नहीं लगी. उस की त्योरियां चढ़ गईं और मुट्ठियां भिंच गईं. वह आगे बढ़ा और उस ग्रुप में सब से आगे खड़े आदमी का कौलर पकड़ लिया और आननफानन में 1-2 घूंसे रसीद कर दिए.

इस से पहले कि लड़ाई आगे बढ़ती, वहां पर छंगा आ गया और हाथ जोड़ कर उन मनचलों के सरदार से माफी मांगने लगा.

‘‘पर छंगा, तुम इस से माफी क्यों मांग रहे हो? इस ने तो तुम्हारी भाभी को छेड़ा है…’’ बीरू बिफर रहा था.

‘‘अरे नहीं भैया, आप को कोई गलतफहमी हुई होगी… ये तो यहां के बहुत भले लोग हैं. और वैसे भी ये यहां के होने वाले मुखिया हैं. इन से कोई झगड़ा मोल नहीं लेता है,’’ अभी छंगा बीरू को समझा ही रहा था कि मनचलों का सरदार, जिस का नाम कालिया था, गरज उठा, ‘‘छंगा, यह तुम्हारा भाई नहीं होता, तो आज यह अपनी टांगों पर चल कर अपने घर नहीं जा पाता.’’

‘‘कोई बात नहीं भैया… ये अभी नएनए आए हैं… आप के बारे में पता नहीं था… आगे से ऐसा नहीं होगा,’’ छंगा ने बात को ज्यादा तूल नहीं दिया.

ये भी पढ़ें- Short Story: रहने दो रिपोर्टर

अगले दिन छंगा बीरू को अपने खेत दिखाने ले गया. बीरू की खुशी का ठिकाना नहीं था, ‘‘अब तो दोनों भाई जम कर मेहनत करेंगे और इस जमीन से सोना उपजाएंगे,’’ कह कर बीरू ने खेत की मिट्टी उठा कर छंगा के माथे पर तिलक कर दिया और अपने माथे पर भी मिट्टी रगड़ ली थी.

‘‘ठीक है भैया, आप खेत में काम करो… हम जरा मुखियाजी के घर से खाद की बोरी उठा कर ले आते हैं,’’ कह कर छंगा वहां से चला गया.

बीरू तनमन से मेहनत करने में लग गया था और कोई फिल्मी गाने की धुन भी गुनगुना रहा था…

‘धांय’ की आवाज के साथ एक गोली ठीक बीरू के सीने में आ लगी थी और वह वहीं खेत में गिर गया.

गांव में लोग पीठ पीछे बहुतकुछ बातें कर रहे थे और सभी लोग मन ही मन हत्यारे को भी पहचान रहे थे, पर सामने किसी की भी कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी कि बीरू को गोली किस ने मारी है.

छंगा ने पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज कराई. पुलिस ने छानबीन भी की, पर सुबूतों की कमी में पुलिस को मायूस ही लौटना पड़ा.

इस पूरी दुनिया में अब धनिया बेसहारा हो गई थी. वह सफेद साड़ी में बिना किसी साजसिंगार के सूनीसूनी फिरती थी.

‘‘भाभी… हम से आप का यह रूप नहीं देखा जाता… हम आप को ऐसे नहीं रहने देंगे,’’ छंगा की आवाज में दर्द था.

‘‘क्या करेंगे… जब हमारी किस्मत में ही विधवा का रूप लिखा है तो… ऊपर वाले की मरजी के आगे भला किस की चली है…’’

‘‘यह किस्मतविस्मत हम नहीं जानते… पर, सोचो भाभी… अभी तुम्हारे सामने पहाड़ सी जिंदगी है… 2 छोटी बेटियां हैं… और फिर गांव के मनचलों से बचने के लिए भी तो किसी के नाम का सहारा तो चाहिए न,’’ छंगा बोले जा रहा था.

धनिया की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. उस की चुप्पी को छंगा ने हां समझा और पंचायत बुला कर धनिया  से शादी कर के उसे सहारा देने की  बात कही.

‘‘अगर इस मामले में धनिया को कोई एतराज नहीं है, तो हम पंचों को भला क्या एतराज होगा,’’ सरपंच ने कहा.

धनिया भी वहां मौजूद थी. गांव के मनचलों से बचने के लिए अगर उसे किसी के नाम का सहारा मिल रहा है, तो भला इस में बुराई ही क्या है, ऐसा सोच कर धनिया ने अपनी रजामंदी दे दी.

‘‘भाभी, तुम बच्चों को ले कर आराम से यहां सो जाओ, मैं बगल वाली कोठरी में जा कर सो जाता हूं,’’ छंगा  ने कहा.

धनिया अपनी बेटियों को सीने से लगा कर सोती और छंगा दूसरी कोठरी में सोता रहा.

दोनों की शादी को 2 महीने बीत गए थे, पर छंगा ने अपने बरताव से कोई ऐसा काम नहीं किया था, जिस से धनिया को कोई एतराज होता. बात करते समय भी धनिया के चेहरे की तरफ न देख कर बिना नजरें मिलाए ही बात करता था छंगा और जिस्मानी संबंध बनाने की बात भी उस के मन में नहीं आई थी.

छंगा धनिया की बेटियों को खूब प्यार देता था. जब भी वह शहर जाता तो उन के लिए मिठाई जरूर ले आता था और अपने पास बिठा कर बारीबारी से खिलाता था.

ये भी पढ़ें- रज्जो: क्या था सुरेंद्र और माधवी का प्लान

छंगा का अपनी बेटियों के प्रति ऐसा प्यार देख कर धनिया के मन को भी संतोष मिलने लगा था.

कुछ दिनों के बाद अचानक ही धनिया को बुखार आ गया. बुखार बहुत तेज था. छंगा तुरंत ही धनिया को शहर के डाक्टर से दवा दिलवा कर लाया.

दवा खा कर धनिया को कुछ राहत तो मिली, पर उस का शरीर अकसर ढीला रहता और नींद उसे घेरे रहती. शायद बुखार के चलते बदन में कमजोरी आ गई होगी, ऐसा सोच कर वह निश्चिंत थी.

प्रेम ऋण- भाग 3: पारुल अपनी बहन को क्यों बदलना चाहती थी?

‘‘अशीम केवल मित्र है, दीदी? मैं तो सोचती थी कि आप उस के प्रेम में आकंठ डूबी हुई हैं और किसी और के बारे में सोचेंगी भी नहीं. पर आप तो प्रशांत बाबू की मर्सीडीज देख कर सबकुछ भूल गईं.’’

‘‘कालिज का प्रेम समय बिताने के लिए होता है. मैं इस बारे में पूर्णतया व्यावहारिक हूं. अशीम अभी पीएच.डी. कर रहा है. 4-5 वर्ष बाद कहीं नौकरी करेगा. उस की प्रतीक्षा करते हुए मेरी तो आंखें पथरा जाएंगी. घर ढंग से चलाने के लिए मुझे भी 9 से 5 की चक्की में पिसना पड़ेगा. मैं उन भावुक मूर्खों में से नहीं हूं जो प्रेम के नाम पर अपना जीवन बरबाद कर देते हैं.’’

‘‘आप का हर तर्क सिरमाथे पर, लेकिन आप से इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि आप अशीम को सब साफसाफ बता दें और उस के साथ प्यार की पींगें बढ़ाना बंद कर दें. फिर प्रशांतजी का परिवार इसी शहर में रहता है. किसी को भनक लग गई तो…’’

‘‘किसी को भनक नहीं लगने वाली. तुम्हीं बताओ, मांपापा को आज तक कुछ पता चला क्या? हां, इस के लिए मैं तुम्हारी आभारी हूं. पर मैं इस उपकार का बदला अवश्य चुकाऊंगी.’’

‘‘अंशुल दीदी, तुम इस सीमा तक गिर जाओगी मैं ने सोचा भी नहीं था,’’ पारुल बोझिल स्वर में बोली.

‘‘यदि अपने हितों की रक्षा करने को नीचे गिरना कहते हैं तो मैं पाताल तक भी जाने को तैयार हूं. तुम चाहती हो कि मैं अशीम को सब साफसाफ बता दूं, पर जरा सोचो कि जब सारे शहर को मेरे विवाह के संबंध में पता है पर केवल अशीम अनभिज्ञ है तो क्या यह मेरा दोष है?’’

‘‘पता नहीं दीदी, पर कहीं कुछ ठीक नहीं लग रहा है.’’

‘‘व्यर्थ की चिंता में नहीं घुला करते मेरी प्यारी बहन, अभी तो तुम्हारे खानेखेलने के दिन हैं. क्यों ऊंचे आदर्शों के चक्कर में उलझती हो. अशीम को मैं सबकुछ बता दूंगी पर जरा सलीके से. अपने प्रेमी को मैं अधर में तो नहीं छोड़ सकती,’’ अंशुल ने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा.

पारुल चुप रह गई थी. वह भली प्रकार जानती थी कि अंशुल से बहस का कोई लाभ नहीं था. उस ने अपने अगले प्रश्नपत्र की तैयारी प्रारंभ कर दी.

परीक्षा और विवाह की तैयारियों के बीच समय पंख लगा कर उड़ चला था. सुजाताजी ने अपनी लाड़ली के विवाह में दिल खोल कर पैसा लुटाया था. वीरेन बाबू को न चाहते हुए भी उन का साथ देना पड़ा था. अंशुल की विदाई के बाद कई माह से चल रहा तूफान मानो थम सा गया था. पारुल ने सहेलियों के साथ नाचनेगाने और फिर रोने में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था. पर अब सूने घर में कहीं कुछ करने को नहीं बचा था.

धीरेधीरे उस ने स्वयं को व्यवस्थित करना प्रारंभ किया था. पर एक दिन अचानक ही अशीम का संदेश पा कर वह चौंक गई थी. अशीम ने उसे कौफी हाउस में मिलने के लिए बुलाया था.

ये भी पढ़ें- माध्यम: भाग 2

अशीम से पारुल को सच्ची सहानुभूति थी. अत: वह नियत समय पर उस से मिलने पहुंची थी.

‘‘पता नहीं बात कहां से प्रारंभ करूं,’’ अशीम कौफी और कटलेट्स का आर्डर देने के बाद बोला.

‘‘कहिए न क्या कहना है?’’ पारुल आश्चर्यचकित स्वर में बोली.

‘‘विवाह से 4-5 दिन पहले अंशुल ने मुझे सबकुछ बता दिया था.’’

‘‘क्या?’’

‘‘यही कि मातापिता का मन रखने के लिए उसे इस विवाह के लिए तैयार होना पड़ा.’’

‘‘अच्छा, और क्या कहा उस ने?’’

‘‘वह कह रही थी कि उस के विवाह के लिए मातापिता को काफी कर्ज लेना पड़ा. घर तक गिरवी रखना पड़ा. वह मुझ से विनती करने लगी, उस का वह स्वर मैं अभी तक भूला नहीं हूं.’’

‘‘पर ऐसा क्या कहा अंशुल दीदी ने?’’

‘‘वह चाहती है कि मैं तुम से विवाह कर लूं जिस से कि तुम्हारे मातापिता को चिंता से मुक्ति मिल जाए. और भी बहुत कुछ कह रही थी वह,’’ अशीम ने हिचकिचाते हुए बात पूरी की.

कुछ देर तक दोनों के बीच निस्तब्धता पसरी रही. कपप्लेटों पर चम्मचों के स्वर ही उस शांति को भंग कर रहे थे.

‘तो यह उपकार किया है अंशुल ने,’ पारुल सोच रही थी.

‘‘अशीमजी, मैं आप का बहुत सम्मान करती हूं. सच कहूं तो आप मेरे आदर्श रहे हैं. आप की तरह ही पीएच.डी. करने के लिए मैं ने एम.एससी. के प्रथम वर्ष में जीतोड़ परिश्रम किया और विश्वविद्यालय में प्रथम रही. इस वर्ष भी मुझे ऐसी ही आशा है. आप के मन में अंशुल दीदी का क्या स्थान था मैं नहीं जानती पर निश्चय ही आप ‘पैर का जूता’ नहीं हैं कि एक बहन को ठीक नहीं आया तो दूसरी ने पहन लिया,’’ सीधेसपाट स्वर में बोल कर पारुल चुप हो गई थी.

‘‘आज तुम ने मेरे मन का बोझ हलका कर दिया, पारुल. तुम्हारे पास अंशुल जैसा रूपरंग न सही पर तुम्हारे व्यक्तित्व में एक अनोखा तेज है जिस की अंशुल चाह कर भी बराबरी नहीं कर सकती.’’

‘‘यही बात मैं आप के संबंध में भी कह सकती हूं. आप एक सुदृढ़ व्यक्तित्व के स्वामी हैं. इन छोटीमोटी घटनाओं से आप सहज ही विचलित नहीं होते. आप के लिए एक सुनहरा भविष्य बांहें पसारे खड़ा है,’’ पारुल ने कहा तो अशीम खिलखिला कर हंस पड़ा.

ये भी पढ़ें- मैं तो कुछ नहीं खाती

‘‘हम दोनों एकदूसरे के इतने बड़े प्रशंसक हैं यह तो मैं ने कभी सोचा ही नहीं था. तुम से मिल कर और बातें कर के अच्छा लगा,’’ अशीम बोला और दोनों उठ खड़े हुए.

अपने घर की ओर जाते हुए पारुल देर तक यही सोचती रही कि अशीम को ठुकरा कर अंशुल ने अच्छा किया या बुरा? पर इस प्रश्न का उत्तर तो केवल समय ही दे सकता है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें