एक अदद “वधू चाहिए”, जरा ठहरिए !

आप की उम्र चाहे जितनी हो, मगर आप इस दुनिया में कब और कहां ठगी के शिकार हो जाते हैं,  कौन जानता है? प्रश्न है सजग रहने का जागृत रहने का और अपनी आंखें खुले रखने का.

इस आलेख में हम आपको एक ऐसे विधुर की कहानी बताने जा रहे हैं जो रिटायरमेंट के बाद जब दूसरी शादी की सोचने लगा. आगे बढ़ा तो किस तरह ठगों ने उसे लाखों रुपए का चूना लगा दिया.यह सच्ची कहानी है छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर की. जहां शादी का विज्ञापन देखकर एक महिला व उसके कथित फर्जी रिश्तेदारों ने मिलकर देश की नवरत्न कंपनी कहे जाने वाले सार्वजनिक संस्थान एनटीपीसी के रिटायर डिप्टी मैनेजर से 8 लाख 86 हजार रुपए की ठगी कर ली.

जब दूसरे विवाह की बात चली तो वधू पक्ष ने अपनी आर्थिक स्थिति खराब बता मकान बेचने का झांसा दिया और अपने खाते में पैसे जमा करा लिए. मामला की सरकंडा थाने में प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज कराई गई . ठगी गीतांजली सिटी फेस-2 निवासी नरेंद्र कुमार सूद पिता स्व.राजेंद्र कुमार 61 वर्ष के साथ हुई. आप एनपीसीसी में डिप्टी मैनेजर के पद से रिटायर हुए हैं.उनकी पत्नी का निधन हो गया है। उन्होंने दूसरी शादी करने की इच्छा से अखबार में वधु की आवश्यकता के लिए विज्ञापन प्रकाशित करवाया.

15 मार्च 2020 को यह प्रकाशित हुआ था और उसी रात 8 बजे श्रीमान सूद के मोबाइल पर एक नंबर से कॉल आया. जब उन्होंने कॉल रिसीव किया तो दूसरी तरफ से महिला ने अपना नाम अन्नू सिंह बताया और प्रकाशित विज्ञापन के संदर्भ देकर  शादी करने की इच्छा जताई और बताया घर में मुखिया और कर्ताधर्ता के रूप में आंटी हैं जिनका नाम एलिजाबेथ सिंह हैं. अन्नू सिंह ने कहा कि उसका एक बड़ा भाई आदित्य सिंह उर्फ आदि हैं. आदित्य सिंह ने  भी कहा कि उसे यह रिश्ता बहुत पसंद हैं.

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अन्नू सिंह ने 17 मार्च 2020 को अपना फोटो वाट्सअप से भेजा और बताया कि आंटी व भईया को रिश्ता पसंद है. कुछ दिनों के बाद जीत के बाद जब आत्मीयता बढ़ी तो अन्नू सिंह व आदित्य सिंह ने कॉल कर कहा कि उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है अगर उन्हें 50 लाख रुपए एकमुश्त दे देगें तो वे इसे किसी व्यापार में निवेश कर तीन माह के भीतर पूरा पैसा 15 प्रतिशत ब्याज के साथ लौटा देगें. बड़ी रकम होने की वजह से नरेंद्र कुमार सूद ने असमर्थता जताई और इनकार कर दिया.

इसके बाद ठगों ने दूसरा जाल फेंका, आदित्य सिंह ने कहा कि यदि पैसा उधारी में नहीं दे रहे हैं तो उनका पैतृक मकान खरीद लीजिए और कहा कि यदि वे उनका मकान खरीद लेते हैं तो उनके साथ रहने का मौका मिलेगा.  बिलासपुर में अकेले रहते हो इससे अच्छा होगा कि भोपाल में आकर रहो पैतृक मकान का पता अशोका गार्डन थाने के पीछे, मकान न0 556/234, गली नंबर दो, भोपाल बताया गया.

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सुखमय जीवन की चाहत

पत्नी के निधन के पश्चात अक्सर लोग दूसरा विवाह कर लेते हैं. इसमें कोई बुराई भी नहीं है. मगर सावधानी जरूर आवश्यक है. इस सच्चे अपराधिक घटनाक्रम में भी अगर नरेंद्र कुमार थोड़ी भी सजगता रखते तो लाखों रुपए का चूना नहीं लग पाता. आगे जब बातचीत हुई तो महिला ने खुद को तलाकशुदा और गरीब बताते हुए बताया कि दहेज के चलते उसकी दूसरी शादी नहीं हो पा रही है. अन्नू सिंह ने अपना फोटो वॉट्सएप किया. फिर आदित्य सिंह ने कॉल किया और कहा कि लॉकडाउन हटते ही शादी कराएंगे. कुछ दिन बाद फिर कॉल कर बिजनेस के लिए 50 लाख रुपए मांगे गए.

इतनी बड़ी रकम एकमुश्त देने से नरेंद्र सूद ने इनकार कर दिया. इस पर आरोपियों ने फिर कॉल कर कहा कि उधारी नहीं दे सकते तो हमारा भोपाल में अशोका गार्डन के पीछे स्थित पैतृक मकान खरीद लीजिए.

उसकी कीमत एक करोड़ रुपए है, पर 70 लाख रुपए में आपके नाम कर देंगे. इससे हम सबको भी साथ रहने का मौका मिल जाएगा. इस पर फिर नरेंद्र सूद ने एकमुश्त रकम देने से मना किया तो आरोपियों ने उनसे किस्त में रुपए देने की बात कही.

आरोपियों ने ठगी की शुरुआत बड़ी चालाकी से करते हुए वॉट्सएप के जरिए भेजे 50 रुपए के स्टांप पर मकान का सौदा तय किया. उनकी बातों में आकर नरेंद्र ने उनकी आंटी के बताए बैंक खाते में पहले 16 हजार, फिर 45 हजार, 50 हजार, 1.5 लाख, 3 लाख और फिर 3.25 लाख रुपए सहित कुल 8.86 लाख रुपए खाते में ट्रांसफर कर दिए.

इसके बाद एक दिन आदित्य ने फिर कॉल कर बताया कि अन्नू कोरोना संक्रमित हो गई है. इसलिए बातचीत संभव नहीं है.

आरोपियों में से एक महिला ने खुद को तलाकशुदा और गरीब बताते हुए शादी की इच्छा जाहिर की थी. शादी तय होने पर ठगों ने अपना मकान बेचने की बात कही और फिर किस्तों में रुपए खाते में ट्रांसफर करा लिए. और जब ठगे जाने का नरेंद्र कुमार को एहसास हुआ तो बहुत समय हो चुका था.

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Manohar Kahaniya: चित्रकूट जेल साजिश- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

सन 2014 में जेल से छूटने के बाद मुकीम काला ने अपने गैंग के साथ 15 फरवरी, 2015 को सहारनपुर के तनिष्क ज्वैलरी शोरूम में इंसपेक्टर की वरदी में 10 करोड़ की डकैती डाली थी. उसी दरमियान उस ने तीतरो में 2 सगे भाइयों की हत्या और सहारनपुर में सिपाही राहुल ढाका की हत्या कर दी थी.

इस वारदात के बाद यूपी एसटीएफ ने मुकीम काला और उस के शार्प शूटर साबिर जंधेड़ी को 20 अक्तूबर, 2015 को गिरफ्तार किया था. पुलिस ने उस से गिरफ्तारी के दौरान एके-47 भी बरामद की थी.

मुन्ना बजरंगी का करीबी था मेराज

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बदमाशों के खिलाफ सख्त काररवाई का संदेश दिया तो इस के बाद गैंग के कई बदमाश ढेर कर दिए गए. मुकीम काला को पिछले दिनों ही हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिला कारागार से सहारनपुर जिला कारागार में निरुद्ध किया गया था. मुकीम काला 7 मई, 2021 को चित्रकूट जेल आया था.

मुकीम काला के साथ ही उत्तर प्रदेश का एक कुख्यात अपराधी मेराज भी चित्रकूट जेल में अंशुल द्वारा की गई गोलीबारी में मारा गया था.

मेराज अली बसपा के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी की गैंग का सदस्य था. हालांकि उस की नजदीकी मुन्ना बजरंगी से ज्यादा थी. इसी साल 20 मार्च, 2021 को वाराणसी जेल से चित्रकूट जेल में उस का ट्रांसफर हुआ था.

मूलरूप से गाजीपुर निवासी मेराज बनारस के जैतपुर थाने का हिस्ट्रीशीटर था. मुख्तार अंसारी हो या मुन्ना बजरंगी, दोनों की गैंगों के लिए असलहों का इंतजाम मेराज ही करता था. वह फरजी दस्तावेजों पर असलहों का लाइसैंस बनवाने का भी मास्टरमाइंड था.

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मेराज मुन्ना बजरंगी के लिए अदालतों में पैरवी करने से ले कर गवाहों को तोड़ने का भी काम करता था. अक्तूबर 2020 में जैतपुरा पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया था. तब फरजी तरीके से बनवाए गए 9 लाइसेंसी पिस्तौल और रायफल की जानकारी हुई थी.

इस वारदात के बाद जब पुलिस ने चित्रकूट जेल में मारे गए तीनों कैदियों के शवों का पोस्टमार्टम कराया तो पता चला कि मेराज के सिर में एक और सीने में 2 गोलियां लगी थीं. जबकि मुकीम के गोलियों से छलनी बदन में 13 गोलियों के निशान थे.

2 जेलर आए शक के दायरे में

उस के शरीर में करीब 5 गोलियां मिलीं. इधर अंशुल के शरीर में करीब 20 फायर आर्म इंजरी मिलीं, वह पुलिस की गोलियों से मारा गया था.

जेल गोलीकांड की जांच करने वाले दल ने जेल में उस दिन ड्यूटी पर तैनात जेल वार्डनों के साथ मौके पर मौजूद बंदियों, अंशुल द्वारा बंधक बनाए गए कैदियों से भी पूछताछ की. जेल के सभी सीसीटीवी फुटेज कब्जे में लिए. कैदियों की बातचीत के लिए जेल में लगे पीसीओ का पूरा रिकौर्ड कब्जे में लिया और पूरी जेल की तलाशी कराई.

पुलिस को शूटआउट के बाद आस्ट्रिया मेड ग्लोक पिस्तौल व एक खाली मैग्जीन जेल से बरामद हुई. ये वही पिस्तौल थी, जिस से अंशुल ने गोलियां चलाई थीं.

यह पिस्टल छोटे असलहों में सब से घातक हथियार माना जाता है. यही वजह है कि 9 एमएम के इस ग्लोक पिस्तौल की सिविल यानी पब्लिक को सप्लाई प्रतिबंधित है. यह सेना और पुलिस के जवानों को दी जाती है. सवाल उठता है कि सरकारी सप्लाई वाला यह हथियार गैंगस्टर अंशुल को कहां से मिला?

पुलिस जांच में एक और भी बात अभी तक सामने आई है. पता चला कि अंशुल को जिस हाई सिक्योरिटी बैरक में रखा गया था, वहां की सुरक्षा की जिम्मेदारी डिप्टी जेलर पीयूष और अरविंद की थी.

दोनों जेलर बिना किसी बड़े कारण के 10 मई को अचानक छुट्टी पर चले गए थे. ये 13 मई को लौट कर आए थे. माना जा रहा है कि दोनों जेलरों की छुट्टी के दौरान ही जेल में पिस्तौल पहुंचाई गई थी.

जांच में यह भी सामने आया है कि चित्रकूट के पहाड़ी थानाक्षेत्र के परसौजा गांव का निवासी मनोज इस जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है.

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मनोज जेल में मादक पदार्थों की सप्लाई से ले कर कैदियों से बैठकी के रुपए तक वसूलने का काम करता है. वह जेल अधिकारियों का खास है. मनोज अंशुल की खातिरदारी में लगा रहता था.

पुलिस जांच में सामने आया है कि अंशुल जेल में एंड्रायड फोन इस्तेमाल करता था. अंशुल के एनकाउंटर के बाद यह फोन भी पुलिस के हाथ लगा. लेकिन जांच अफसर और लोकल पुलिस इस की जानकारी छिपा रही हैं.

दरअसल, इस वारदात को अंजाम देने के लिए अंशुल ने किसकिस से संपर्क किया. इस की जानकारी फोन में इस्तेमाल हो रहे सिम की काल डिटेल्स से मिल सकती है.

जेल वार्डन जगमोहन पर प्रश्नचिह्न

काल डिटेल्स निकलने पर कई प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता सामने आने के डर से फोन के बारे में अफसर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं.

चित्रकूट जेल शूटआउट मामले में जुटी जांच समिति के हाथ और भी कई अहम जानकारियां लगी हैं.

खुलासा हुआ है कि चित्रकूट जेल में जब अंशुल दीक्षित ने मेराज और मुकीम की हत्या के बाद 5 बंदियों को बंधक बनाया था तो एक जेल वार्डन जगमोहन, अंशुल से बातचीत कर सरेंडर करने को कह रहा था. यह वही जेल वार्डन जगमोहन था, जो बागपत जेल में मुन्ना बजरंगी की हत्या के समय भी मौजूद था.

अब यह महज इत्तफाक है या कोई बड़ी साजिश, इस की जांच में पुलिस और एजेंसियां जुटी हुई हैं. 14 मई को शूटआउट के बाद जब अंशुल दीक्षित को घेरा जा रहा था तो उस वक्त भी जगमोहन की वहां मौजूदगी कई सवाल उठाती है.

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चित्रकूट जेल के घटनाक्रम को देख कर अंदाजा लगाया जा रहा है कि जेल में हुई वारदात मुन्ना बजरंगी की तरह कौन्ट्रैक्ट किलिंग का मामला है. अंशुल को पता था कि मुन्ना की हत्या के बाद सुनील राठी पर कोई आंच नहीं आई थी.

इसी तरह अंशुल को शायद यह भरोसा दिलाया गया होगा कि मेराज और मुकीम को मार कर वह भी सुरक्षित बच जाएगा.

कोरोना काल में जब एक साल से ज्यादा का समय बीत जाने पर भी कैदियों की उन के परिजनों से मिलाई तक नहीं हो रही थी. ऐसे में अंशुल के पास घातक हथियार का पहुंचना और कुछ दिन पहले ही एक के बाद एक मेराज व मुकीम काला का इस जेल में आना साबित करता है कि साजिश के तार बहुत गहरे हैं.

Manohar Kahaniya : पावर बैंक ऐप के जरिए धोखाधड़ी- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

चीनी नागरिक उन्हें बैंकों में खाते खुलवाने, भुगतान गेटवे तैयार कराने, अन्य डमी निदेशकों आदि की व्यवस्था करने के निर्देश देते थे. इस काम के लिए वे 3 लाख रुपए की मोटी रकम लेते थे. सीए अविक केडिया ने बताया कि चीनी धोखेबाजों के लिए उस ने 110 से अधिक शेल कंपनियां बनाई थीं.

चीनी धोखेबाजों और उन के ये सभी गुर्गे बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी फंड ट्रांसफर के लिए उच्च गुणवत्ता  वाले सौफ्टवेयर और वित्तीय टूलों का इस्तेमाल करते थे.

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रोचक खुलासों से चौंकी पुलिस

पुलिस को अब तक की जांच में पता चला है कि पावर बैंक, ईजी मनी के जरिए अब तक पूरे भारत में करीब 5 लाख लोगों को ठगा जा चुका था और इन से करीब 2 महीनों में ही 150 करोड़ रुपए से अधिक की ठगी की गई. पुलिस ने सीए अविक केडिया के गुड़गांव स्थित घर से 97 लाख रुपए नकद भी बरामद किए.

पुलिस को जांच और पूछताछ में पता चला था कि पावर बैंक क्विक अर्निंग ऐप गूगल प्लेस्टोर पर था और इसे चीन के एक सर्वर से कमांड दी जाती थी.

जबकि पावर बैंक व ईजीमनी का ऐप 222.द्ग5श्चद्यड्डठ्ठ.द्बठ्ठ वेबसाइट पर उपलब्ध था. इस ऐप के संदेश लोगों को स्पैम के रूप में आते थे. प्राप्तकर्ता को एक संक्षिप्त (एनक्रिप्टेड) यूआरएल के माध्यम से ऐप डाउनलोड करने के लिए प्रेरित किया जाता था. इसलिए जब पुलिस ने इस की संदिग्ध गतिविधि को परखा तो एनसीएफएल की मैलवेयर फोरैंसिक लैब से इस ऐप की जांच करवाई. जांच में कुछ रोचक खुलासे से पुलिस चौंक गई.

पावर बैंक व ईजीमनी ऐप ने खुद को बेंगलुरु आधारित एक स्टार्टअप कंपनी का प्रोजैक्ट बताया था, जो क्विक चार्जिंग अर्न करने की चेन से जुडा था. लेकिन जिस सर्वर पर ऐप को होस्ट किया गया था, उस के  चीन में होने के कारण पुलिस को इस में छिपे ठगी के नेटवर्क का शक हो गया.

ऐप्स की जांच में यह बात भी साफ हुई कि ये ऐप्स कई खतरनाक अनुमतियों से जुड़े थे. जैसे कि इन की पहुंच उपयोगकर्ता के कैमरे, उस में संग्रहित फोटो, वीडियो और दस्तावेजों की सामग्री तथा उन के कौन्टैक्ट नंबर का डाटा हासिल करने तक थी.

शुरुआती जांच में ही पुलिस को शक हो गया था कि इन ऐप्स का इस्तेमाल लोगों से धोखाधड़ी करने के अलावा उन के डाटा को चोरी करने के लिए भी किया जा रहा था.

पुलिस ने अब तक इस सिंडीकेट से जुड़े जिन 11 लोगों को गिरफ्तार किया था. उन के अलावा भारत में ही इस नेटवर्क से जुड़े दूसरे भारतीय अपराधियों की भूमिका के नाम सामने आ चुके हैं. इन के अलावा कई चीनी नागरिकों के नामों का भी खुलासा हुआ है, जो चीन की सीमा में हैं. इन जालसाजों को कैसे कानून की पकड़ में लाना है, इस के लिए पुलिस बड़ी रणनीति पर काम कर रही है.

दरअसल, इन ऐप्स के जरिए लोग जिस रकम को इनवैस्ट करते थे, उस का करीब 80 फीसदी हिस्सा विभिन्न खातों से होते हुए इसी चाइनीज नेटवर्क के पास आता था.

जांच में पता चला है कि चीनी धोखेबाजों ने इस धोखाधड़ी के जरिए भोलेभाले और शौर्टकट से पैसा कमाने वाले लोगों को लूटने के लिए देश भर में अपने गुर्गों का एक बड़ा नेटवर्क बनाया था.

उन्होंने इस मेगा धोखाधड़ी के संचालन के लिए देश भर के विभिन्न शहरों में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स, बैंक अकाउंट कस्टोडियन, डमी डायरेक्टर्स, मनी म्यूल्स आदि नियुक्त किए हुए हैं.

अभी तक पश्चिम बंगाल, दिल्ली व एनसीआर क्षेत्र, बेंगलुरु, ओडिशा, असम और सूरत में इस तरह की जालसाजी के सबूत पुलिस के सामने आ चुके हैं.

चीनी नागरिकों ने टोनी व फियोना जैसे अंगरेजी नाम रखे थे. इन चीनी नागरिकों ने ठगी के लिए कई ऐप्स को अप्रैल महीने की शुरुआत में भारतीय बाजार में सर्कुलेट करना शुरू किया था. इस के बाद 12 मई को ये ऐप बंद हो गए.

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चीनी नागरिकों के इस गिरोह में कई ऐसे भारतीय काम कर रहे थे, जो कभी चीनी आकाओं से मिले ही नहीं और न ही उन्हें जानते हैं. बस उन के लिए काम कर रहे थे. इन लोगों ने ही ठगी के लिए भारतीयों को गिरोह में भरती किया था.

फिलहाल दिल्ली पुलिस इस मामले की जांच में महत्त्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य हासिल करने के लिए विभिन्न प्रयोगशालाओं की मदद ले रही है और इस अपराध में शामिल अन्य अपराधियों को पकड़ने के लिए लगातार छापेमारी कर रही है.

—कथा पुलिस की जांच व आरोपियों से पूछताछ पर आधारित

मेरा कुसूर क्या है: भाग 3

लेखक- एस भाग्यम शर्मा

जब तक मैं ने बीएड किया. मम्मी पूरे साल इन्हीं चक्करों में पड़ी रहीं और रुपयों को बरबाद करती रहीं. पापा बहुत नाराज होते. मम्मी कभीकभी उन से छिप कर ऐसे काम करने लगीं कि मेरे मम्मीपापा में भी तकरार होने लगी.

पंडितों और ज्योतिषियों ने मम्मी से कह दिया कि इन का डाइवोर्स कभी नहीं होगा. ये दोनों हमेशा साथ रहेंगे, तो मम्मी को विश्वास हो गया कि सब ठीक हो जाएगा.

मु झे लगता कि इन सब का कारण मैं ही हूं. मु झे खुद पर शर्म महसूस होती.

फिर भी मैं राजीव के साथ जाने को तैयार नहीं थी. पर ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान…’ कुछ लोग भी बीच में पड़ कर मु झे सम झौता करने के लिए मजबूर करने लगे.

मेरे पापा की हालत भी ठीक नहीं थी. उस का दोष भी मेरा भाई मु झ पर ही मढ़ना चाहता था.

मेरा बीएड पूरा हो चुका था और राजीव ने अपना ट्रांसफर दूसरे प्रदेश में करा लिया था ताकि दोनों फैमिली का हस्तक्षेप न रहे.

मु झे नौकरी करने की परमिशन मिल गई थी. शहर भी बड़ा था तो मैं ज्यादा कुछ बोल नहीं पाई.

वहां पर मु झे तुरंत नौकरी मिल गई. अच्छी नौकरी थी. मेरा बेटा भी मेरे साथ ही जाने लगा. पर राजीव अपनी हरकतों से बाज नहीं आए. हरेक बात पर लड़ाई झगड़ा करना, बातबात पर हाथ उठाना उन के लिए बड़ी बात नहीं थी.

अब मैं मां को पत्र लिख सकती थी. स्कूल जाने से मेरा मन भी बदल गया था. इन बातों को मैं ने बड़ा नहीं लिया. मैं ने भी सोचा कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा.

इस बीच, मैं फिर प्रैग्नैंट हो गई. एक बार तो गर्भपात करा दिया. जब दूसरी बार प्रैग्नैंट हुई तो गर्भपात कराने के लिए मैं ने ही मना कर दिया.

पापा को लगता कि मम्मी मु झे ससुराल में रहने नहीं देतीं. पर ऐसी बात नहीं थी. पापा और मम्मी के बीच में तकरारें होने लगीं. मम्मी मेरी बहुत चिंता करतीं.

मु झे सर्विस करने की परमिशन तो दे दी पर जौइंट अकाउंट में पैसा जमा होता था, जिस में से मैं निकाल नहीं सकती. राजीव सब ले कर खर्च कर देते. मैं कुछ नहीं कर पाती.

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मु झे अपने खर्चे के लिए उन के आगे हाथ फैलाना पड़ता. घर की सारी जरूरतें मेरी सैलरी से ही पूरी करते. कह दूं तो लड़ाई झगड़ा होता.

जब डिलीवरी कराने की बात आई, फिर पीहर ही गई. मांबाप तो मजबूर थे. एक बच्चा और पैदा हो गया. अब हम 4 लोग हो गए.

इस बीच, पापा का देहांत हो गया. मम्मी पढ़ीलिखी, सक्षम थीं. पर भैया ने घर की बागडोर अपने हाथों में ले ली. मम्मी ऐसी परिस्थिति में डिप्रैशन में रहने लगीं.

मु झे लगा ऐसी परिस्थिति में मैं यहां से चली जाऊं तो ज्यादा ठीक है. राजीव तो बुला ही रहे थे.

मैं ने मम्मी से कहा, ‘मम्मी, आप मेरी प्रेरणास्रोत हो. आप सम झदार हो. मैं भी पढ़ीलिखी हूं. मैं अपनेआप को संभाल लूंगी. आप मेरी चिंता मत करो. मैं जा रही हूं. आप अपनेआप को संभालो.’

मम्मी धीरेधीरे अपनेआप को संभालने लगीं. पर मैं ने कोई भी शिकायत राजीव की मम्मी से नहीं की.

मेरी तकलीफें दिनप्रतिदिन बढ़ती रहीं. राजीव का ट्रांसफर अलगअलग जगहों पर होता रहा. मु झे कई बोल्ड स्टैप उठाने पड़े. मैं जहां जाती थी, मु झे नौकरी आराम से मिल जाती थी. सो, नौकरी को ही अपना मनोरंजन सम झ कर मैं बराबर काम करती रही.

राजीव तो वैसे ही रहे, ‘अभी तक  झाड़ ू नहीं लगी. आज सिर क्यों नहीं धोया? आज तो चौथ का व्रत है. तुम्हारे संस्कार ठीक नहीं. तुम्हारी मां ने तुम्हें कुछ नहीं सिखाया, सुबह उठते ही पहले नहाना चाहिए, फिर रसोई में जाना चाहिए…’

अब मैं स्वयं 40 साल की हो गई थी. वे मेरी मम्मी के बारे में ही बोलते रहते हैं कि उन्होंने मु झे कुछ नहीं सिखाया. अब  तो मेरी बहू आने के दिन आ रहे हैं. पर क्या करूं…

मु झे 6:30 बजे सुबह स्कूल के लिए रवाना होना होता है. मैं नहाधो कर खाना बनाती तो पसीने से तरबतर हो जाती. ऐसी स्थिति में स्कूल जाना मुश्किल हो जाता. मगर यह बात उन के दिमाग में नहीं आती. घर में चाय के लिए दूध भले ही न हो, बच्चे के लिए दूध न हो पर एक लिटर दूध सोमवार को शिवमंदिर में चढ़ाने का ढकोसला जरूर करना है.

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पहले तो राजीव मु झे और बच्चों को भी साथ ले कर मंदिर जाते थे. वहां करीब एक घंटा लगता. हम बुरी तरह थक जाते. फिर बहुत कह कर मना किया.

मैं ने कहा, ‘आप को जो करना है करो, मैं मंदिर नहीं जाऊंगी.’

फिर ससुरजी ने कहा कि उस को नहीं जाना तो छोड़ दे. फिर इस से तो मु झे मुक्ति ही मिली.

राजीव तो अब भी, जब मेरे बच्चे बड़ेबड़े हो गए, यही कहते हैं, ‘‘मेरा दिया खाती हो, शर्म नहीं आती? निकल जा मेरे घर से.’’

अब निकल कर कहां जाऊंगी. मेरे बच्चे पढ़ रहे हैं. उन को बीच म झधार में छोड़ कर मैं कैसे जा सकती हूं.  बच्चों को तो मम्मी की आवश्यकता है न, मेरे भी अपने कर्तव्य हैं न.

मैं एक बच्चे का खर्चा स्वयं वहन करती हूं. इस के बाद भी मेरी इंसल्ट करता रहता है.

मैं समाज से नहीं डरती. उसे जो कहना है कहे. मु झे अपने बच्चों की चिंता है. कोर्टकेस, तलाक… इन सब के बीच में जो होशियार और होनहार बच्चे हैं उन का भविष्य मैं खराब नहीं करना चाहती. यही सोच कर मैं साथ रह रही हूं. जैसे ही मेरे बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे, तो सोचती हूं मैं अलग हो जाऊंगी. उस समय भी मेरे लिए संभव होगा, यह मैं वक्त पर छोड़ती हूं…

बहुत से लोग कहते हैं कि आजकल ऐसा नहीं होता. पढ़ीलिखी, आत्मनिर्भर लड़कियों के साथ ऐसा नहीं होता. अब मैं उन्हें क्या कहूं?

आज भी समाज में ऐसी बहुत लड़कियां हैं जो खून के आंसू रोती हैं पर दुनिया में अपने को प्रसन्न दिखाती हैं. उसी में से मैं भी एक हूं. जब तक पितृसत्तात्मक समाज रहेगा, लड़कियों के साथ ऐसा होता रहेगा.

MK- पूर्व सांसद पप्पू यादव: मददगार को गुनहगार बनाने पर तुली सरकार- भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

इस बारे में मधेपुरा पुलिस ने कहा कि मुरलीगंज थाने में दर्ज केस संख्या 9/89 में इसी साल 22 मार्च को मधेपुरा कोर्ट ने पप्पू यादव के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया था. उन के खिलाफ इश्तहार और कुर्की का वारंट भी निकला था.

वहां पप्पू यादव को गिरफ्तार करने के बाद उन्हें स्थानीय अदालत में 12 मई की शाम को पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

दरअसल, पूर्व सांसद पप्पू यादव बिहार की जन अधिकार पार्टी के संरक्षक हैं. बिहार में उन की छवि एक दबंग बाहुबली के तौर पर रही है. लेकिन बिहार से ले कर दिल्ली की तिहाड़ में काटी गई सजा के 17 सालों ने उन्हें बाहुबली से एक रौबिनहुड के रूप में बदल दिया है. पप्पू यादव की जिंदगी का सफरनामा किसी रोमांचक फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. इस के लिए हमें उन के अतीत में जाना होगा.

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लालू यादव ने दी शह

नब्बे के दशक में जिन दिनों लालू यादव राजनीति की दुनिया में अपना पैर जमा रहे थे और बिहार विधानसभा में विरोधी दल का नेता बनना चाहते थे. उसी समय उत्तर बिहार में अपराध की दुनिया में राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव का बोलबाला था. उस दौरान लालू यादव की पप्पू यादव ने काफी मदद की थी.

लालू यादव से अपनी बढ़ती नजदीकी के कारण पप्पू खुद को उन का उत्तराधिकारी तक मानने लगे थे. उन का ऐसा सोचना भी गलत नहीं था, क्योंकि वह लालू यादव के हर काम को सफल बनाने के लिए बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते थे.

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लेकिन जब लालू यादव की तरफ से पप्पू यादव को मनमाफिक फायदा नहीं मिला तो उन्होंने लालू पर खुले मंच से यह आरोप लगाते हुए अपना रास्ता अलग कर लिया कि लालू यादव ने सिर्फ अपने फायदे के लिए उन का इस्तेमाल किया.

जून, 1991 में बाहुबली पप्पू की दबंगई परवान पर थी. उन के ऊपर हत्या के 3 मामले दर्ज हो चुके थे. कोसी इलाके में उन का आतंक फैला था. उन पर अपहरण और हत्या के आरोप लगे. कोसी इलाके में आतंक फैलाने को ले कर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून दर्ज हो गया और उन्हें जेल की सींखचों के पीछे भेज दिया गया.

जेल से बाहर आने के बाद वह पूर्णिया की सड़कों पर खुलेआम घूमते थे. लेकिन पुलिस वाले उन्हें हाथ लगाने से डरते थे. एक बार उन्होंने एक डीएसपी को चलती गाड़ी के आगे धकेल दिया था. इतना ही नहीं, उन्होंने बिहार पुलिस के चालक रामप्रवेश पासवान को जीप से नीचे उतार कर उसे बुरी तरह पीटा और उस की मूंछें तक उखाड़ लीं.

जेल में ही हो गया था इश्क

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जब पप्पू यादव बांकीपुर जेल में सजा काट रहे थे. तब जेल अधीक्षक के लौन में कुछ बच्चे टेनिस खेलते थे. उन में से विक्की नाम के एक बच्चे से पप्पू यादव की दोस्ती हो गई. जब पप्पू यादव की विक्की से नजदीकी ज्यादा बढ़ गई तो एक दिन विक्की ने उन्हें अपने घर का एलबम दिखाया, जिस में उस की बहन रंजीत की फोटो थी.

रंजीत को देखते ही पप्पू यादव के दिल में हलचल मच गई. उसी समय उन्होंने उसे अपने दिल में बसा लिया. इतना ही नहीं, वह उस पर मर मिटे और मन में रंजीत से शादी के मंसूबे पालने लगे. बांकीपुर जेल से रिहा होने के बाद भी पप्पू यादव ने वहां जाना नहीं छोड़ा. शुरुआत में रंजीत पप्पू यादव को जरा भी पसंद नहीं करती थी. लेकिन बाद में पप्पू रंजीत के दिल में जगह बनाने में कामयाब हो गए.

लेकिन दोनों की शादी आसान नहीं थी. रंजीत सिख धर्म से थी और पप्पू यादव परिवार से थे. काफी प्रयासों के बाद आखिर फरवरी, 1994 में पप्पू यादव की शादी रंजीत से हो गई.

लालू यादव की तरफ से मोह भंग होने के बाद पप्पू यादव ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत विधायक बनने से की. सन 1990 में उन्होंने स्वतंत्र तौर पर चुनाव लड़ा और पहली बार में ही चुन लिए गए. इस के अगले ही साल वह दसवीं लोकसभा चुनाव में पूर्णिया से खड़े हुए और सांसद बन गए. इस के बाद उन्होंने 1996 में लोकसभा का चुनाव जीता.

100 से ज्यादा गोलियां मारी थीं सीपीआई नेता अजीत सरकार को 14 जून, 1998 को सीपीआई नेता अजीत सरकार की दिनदहाड़े उस समय हत्या कर दी गई, जब वह एक पंचायत कर के वापस पूर्णिया लौट रहे थे. एके 47 से कुछ शातिर अपराधियों ने कम्युनिस्ट पार्टी के नेता अजीत सरकार, उन के कार चालक तथा कुछ लोगों को गोलियों से छलनी कर दिया था.

पोस्टमार्टम में अजीत सरकार के शरीर से 107 गोलियां निकली थीं. इस हत्याकांड का आरोप बाहुबली नेता राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव पर लगा था.

इस सनसनीखेज हत्याकांड में पप्पू यादव के साथ गोरखपुर के बदमाश राजन तिवारी और अनिल यादव भी शामिल थे. इस के बाद भी पप्पू यादव पर हत्या के कई अन्य आरोप लगे थे.

मई, 1999 में पप्पू यादव को अजीत सरकार की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. इस से पहले भी पप्पू यादव के ऊपर हत्या के 3 मामलों में वारंट जारी हो चुके थे, मगर वह अग्रिम जमानत ले कर कानून की जद में आने से बचते रहे.

अगले भाग में पढ़ें- पप्पू यादव को बेउर जेल से भेजा तिहाड़

Serial Story: निर्वासित राजकुमार का प्यार- भाग 1

18वीं शताब्दी काल के मराठा वीर पेशवा बाजीराव (प्रथम) की प्रेयसी मस्तानी की तरह उसी शताब्दी काल में जोधपुर रियासत के नरेश महाराजा विजय सिंह की चहेती थी गुलाबराय पासवान. वह अद्वितीय सुंदर थी. न तो मस्तानी ही कभी विधिवत परंपरा के अनुसार बाजीराव के साथ विवाह रचा सकी और न ही गुलाबराय कभी विजय सिंह की पत्नी का दरजा पा सकी. जोधपुर रियासत में गुलाबराय का सिक्का चलता था.

गुलाबराय ने जोधपुर में कई अहम विकास कार्य करवाए. उस की सलाह के बिना विजय सिंह कोई भी कार्य नहीं करवाते थे. गुलाबराय ने पानी की समस्या दूर करने के लिए परकोटे के भीतर गुलाबसागर बनवाया. इस के अलावा कुंजबिहारी मंदिर, महिला बाग, गिरदीकोट आदि का निर्माण भी गुलाबराय की प्रेरणा से हुआ था. वहीं सोजत शहर का परकोटा और जालौर किले में कुछ निर्माण भी उन्होंने करवाया था.

महाराजा विजय सिंह का गुलाबराय से अत्यधिक प्रेम था, इस के चलते उन्होंने अपनी अन्य सभी रानियों को नाराज तक कर लिया था. गुलाबराय के मुंह से निकला हर वाक्य राजा का आदेश बन गया था. गुलाबराय बुद्धिमान और सरल हृदय की थी. उस ने वैष्णव धर्म को अपना रखा था. गुलाबराय ने राजा के माध्यम से पूरी रियासत में वैष्णव धर्मावलंबियों के नियमउपनियम लागू कर रखे थे.

गुलाबराय की इच्छा से राज्य में पशुवध पर सख्ती से पाबंदी लगी. इस आज्ञा का पालन नहीं करने वालों को किले में बुला कर मृत्युदंड दिया जाता था.

जोधपुर राजमहल की रानियों और रियासत के पंडितों ने गुलाबराय के साथ महाराजा विजय सिंह के संबंधों को स्वीकृति नहीं दी. गुलाबराय के बढ़ते प्रभाव से राजकुमार और राजपूत सरदार अकसर नाराज रहते थे. राजमहल गुलाबराय के विरोध में था और यहां अकसर षडयंत्र रचे जाने लगे. आखिर एक रात सरदारों ने गुलाबराय की हत्या करवा दी.

महाराजा विजय सिंह और गुलाबराय पासवान महाराजा के छोटे बेटे मानसिंह को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे. मगर पोकरण ठाकुर सवाईसिंह आदि बड़े बेटे कुंवर भीमसिंह के पक्ष में थे. इसीलिए महाराजा के निर्णय से नाराज सरदारों ने गुलाबराय पासवान की हत्या कर दी थी. महाराजा विजय सिंह को इस से बड़ा आघात लगा था.

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उन्हीं दिनों एक रोज महाराजा विजय सिंह की गैरमौजूदगी में भीमसिंह ने दुर्ग और नगर पर अधिकार कर लिया, लेकिन महाराजा के पुन: लौटने पर भीमसिंह को दुर्ग छोड़ कर भागना पड़ा था. महाराजा विजय सिंह ने उस का पीछा करने के लिए सेना भी भेजी. फिर झंवर के पास महाराजा की सेना और भीमसिंह की सेना के बीच युद्ध भी हुआ. लेकिन पोकरण ठाकुर सवाईसिंह भीमसिंह को ले कर पोकरण चले गए. इस के बाद जब सवाईसिंह तथा भीमसिंह को मारवाड़ में अपना जीवन संकट में दिखाई दिया तो वे जैसलमेर चले आए.

जैसलमेर महारावल मूलराज ने उन्हें अत्यंत आदर सहित शरण दी. थोड़ा समय बीता ही था कि जैसलमेर खबर पहुंची कि जोधपुर के मेहते सिंघवी के नीचे लगभग 100 की संख्या में जोधपुर फौज ने बीजोराई गांव पर कब्जा कर लिया है और जोधपुर की

इस सेना का इरादा जैसलमेर की तरफ बढ़ने का है.

कुंवर भीमसिंह को शरण देने के कारण जोधपुर की सेना ने आक्रमण तो नहीं कर दिया.

इस समाचार ने महारावल मूलराज को हतप्रभ कर दिया. वह सोचने लगे कि जोधपुर ने ऐसा क्यों किया? हमारा तो उन से कोई बैर नहीं है? फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया.

‘‘हम ने भीमसिंह जी को शरण दी है हुकुम.’’ दीवान ने कहा.

‘‘मांगने वाले को शरण देना हमारा धर्म है और उस की अंतिम सांस तक रक्षा करना हमारा फर्ज है.’’ महाराज मूलराज ने कहा, ‘‘आप मुकाबले की तैयारी करो. हां, सेनापति जोरावर सिंह कहां है?’’

‘‘हुकुम वह पासवानजी के डेरे पर हैं.’’ दीवान बोला.

‘‘उन्हें तुरंत बुलाओ.’’

हलकारा पासवान के डेरे पर गया और सेनापति जोरावर सिंह को बुला लाया. जोरावर के आने की हलकारे ने सूचना दी.

महारावल मूलराज ने सेनापति जोरावर सिंह से कहा, ‘‘जोरावर, जोधपुर रियासत ने हम पर हमला कर दिया है. बीजोराई गांव पर उन्होंने कब्जा कर लिया है जो काम करना है फटाफट कर के युद्ध की तैयारी करो.’’

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इस के बाद हाबुर ऊबड़ों की 200 की फौज जैसलमेर बुलाई गई. एक ऊंट सवार उसी समय हाबुर गया और अगले दिन ऊबड़ भाटियों की फौज जैसलमेर आ गई.

दूसरे दिन हथियार तैयार करवाए गए. बारूद की कूडि़यां, पेटियां, तलवारें, तोपें, घोड़े, ऊंट, खानेपीने का सामान सारी तैयारी की गई. रात होने तक सारी फौज आ गई. राज रसोड़े से खानापीना हुआ. ऊंट और घोड़ों के लिए चारा, दाना, पानी का इंतजाम हुआ. रात में थोड़ा आराम कर के और भोर होते ही पूजाअर्चना हुई. योद्धाओं की आरती उतारी गई और ‘लक्ष्मीनाथ की जय’ और ‘स्वांगियां देवी की जय’ के साथ फौज को खुद महारावल मूलराज ने विदा किया.

नादानियां- भाग 2: उम्र की इक दहलीज

लगभग महीनेभर की प्रैक्टिस के बाद प्रथमा ठीकठाक कार चलाने लगी थी. एक दिन उस ने भी राकेश के ही अंदाज में कहा, ‘‘जहांपनाह, कनीज आप को गुरुदक्षिणा देने की चाह रखती है.’’ ‘‘हमारी दक्षिणा बहुत महंगी है बालिके,’’ राकेश ने भी उसी अंदाज

में कहा. ‘‘हमें सब मंजूर है, गुरुजी,’’ प्रथमा ने अदब से झुक कर कहा तो राकेश को हंसी आ गई और यह तय हुआ कि आने वाले रविवार को सब लोग चाट खाने बाहर जाएंगे.

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चूंकि ट्रीट प्रथमा के कार चलाना सीखने के उपलक्ष्य में थी, इसलिए आज कार वही चला रही थी. रितेश अपनी मां के साथ पीछे वाली सीट पर और राकेश उस की बगल में बैठा था. आज प्रथमा को गुडफील हो रहा था. चाट खाते समय जब रितेश अपनी मां को मनुहार करकर के गोलगप्पे खिला रहा था तो प्रथमा को बिलकुल भी बुरा नहीं लग रहा था बल्कि वह तो राकेश के साथ ही ठेले पर आलूटिकिया के मजे ले रही थी. दोनों एक ही प्लेट में खा रहे थे. अचानक मुंह में तेज मिर्च आ जाने से प्रथमा सीसी करने लगी तो राकेश तुरंत भाग कर उस के लिए बर्फ का गोला ले आया. थोड़ा सा चूसने के बाद जब उस ने गोला राकेश की तरफ बढ़ाया तो राकेश ने बिना हिचक उस के हाथ से ले कर गोला चूसना शुरू कर दिया. न जाने क्या सोच कर प्रथमा के गाल दहक उठे. आज उसे लग रहा था मानो उस ने अपने मिशन में कामयाबी की पहली सीढ़ी पार कर ली.

इस रविवार राकेश को अपने रूटीन हैल्थ चैकअप के लिए जाना था. रितेश औफिस के काम से शहर से बाहर टूर पर गया है. राकेश ने डाक्टर से अगले हफ्ते का अपौइंटमैंट लेने की बात कही तो प्रथमा ने कहा, ‘‘रितेश नहीं है तो क्या हुआ? मैं हूं न. मैं चलूंगी आप के साथ. हैल्थ के मामले में कोई लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए.’’ दोनों ससुरबहू फिक्स टाइम पर क्लिनिक पहुंच गए. वहां आज ज्यादा पेशेंट नहीं थे, इसलिए वे जल्दी फ्री हो गए. वापसी में घर लौटते हुए प्रथमा ने कार मल्टीप्लैक्स की तरफ घुमा दी. तो राकेश ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, कुछ काम है क्या यहां?’’

‘‘जी हां, काम ही समझ लीजिए. बहुत दिनों से कोई फिल्म नहीं देखी थी. रितेश को तो मेरे लिए टाइम नहीं है. एक बहुत ही अच्छी फिल्म लगी है, सोचा आज आप के साथ ही देख ली जाए,’’ प्रथमा ने गाड़ी पार्किंग में लगाते हुए कहा. राकेश को उस के साथ यों फिल्म देखना कुछ अजीब सा तो लग रहा था मगर उसे प्रथमा का दिल तोड़ना भी ठीक नहीं लगा, इसलिए फिल्म देखने को राजी हो गया. सोचा, ‘सोचा बच्ची है, इस का भी मन करता होगा…’

प्रथमा की बगल में बैठा राकेश बहुत ही असहज सा महसूस कर रहा था, क्योंकि बारबार सीट के हत्थे पर दोनों के हाथ टकरा रहे थे. उस से भी ज्यादा अजीब उसे तब लगा जब उस के हाथ पर रखा अपना हाथ हटाने में प्रथमा ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई बल्कि बहुत ही सामान्य भाव से फिल्म का मजा लेती रही. उन्होंने ही धीरे से अपना हाथ हटा लिया. ऐसा ही एक वाकेआ उस दिन भी हुआ जब प्रथमा उसे पिज्जा हट ले कर गई थी. दरअसल, उन की बड़ी बेटी पारुल की ससुराल घर से कुछ ही दूरी पर है. पिछले दिनों पारुल के ससुरजी ने अपनी आंख का औपरेशन करवाया था. आज शाम राकेश को उन से मिलने जाना था. प्रथमा ने पूछा, ‘‘मैं भी आप के साथ चलूं? इस बहाने शहर में मेरी कार चलाने की प्रैक्टिस भी हो जाएगी.’’ सास से अनुमति मिलते ही प्रथमा कार की ड्राइविंग सीट पर बैठ कर राकेश के साथ चल दी. वापसी में उस ने कहा, ‘‘चलिए, आज आप को पिज्जा हट ले कर चलती हूं.’’

‘‘अरे नहीं, तुम तो जानती हो कि मुझे पिज्जा पसंद नहीं,’’ राकेश ने टालने के अंदाज में कहा. ‘‘आप से पिज्जा खाने को कौन कह रहा है. वह तो मुझे खाना है. आप तो बस पेमैंट कर देना,’’ प्रथमा ने अदा से मुसकराते हुए कहा. न चाहते हुए भी राकेश को गाड़ी से उतरना ही पड़ा. पास आते ही प्रथमा ने अधिकार से उस की बांहों में बांहें डाल कर जब कहा, ‘‘दैट्स लाइक अ परफैक्ट कपल,’’ तो राकेश से मुसकराते भी नहीं बना.

पिज्जा खातेखाते प्रथमा बीचबीच में उसे भी आग्रह कर के खिला रही थी. मना करने पर भी जबरदस्ती मुंह में ठूंस देती. राकेश समझ नहीं पा रहा था कि उस के साथ क्या हो रहा है. वह प्रथमा की इस हरकत को उस का बचपना समझ कर नजरअंदाज करता रहा. प्रथमा कुछ और जिद करे, इस से पहले ही वह रितेश का फोन आने का बहाना बना कर उसे घर ले आया.

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‘‘यह देखिए. मैं आप के लिए क्या ले कर आई हूं,’’ प्रथमा ने एक दिन राकेश को एक पैकेट पकड़ाते हुए कहा. ‘‘क्या है यह?’’ राकेश ने उसे उलटपलट कर देखा.

‘‘यह है ज्ञान का खजाना यानी बुक्स. आज से हम दोनों साथसाथ पढ़ेंगे,’’ प्रथमा ने नाटकीय अंदाज में कहा. वह जानती थी कि नौवेल्स पढ़ना राकेश की कमजोरी है. राकेश ने एक छोटी सी लाइब्रेरी भी घर में बना रखी थी और सब को सख्त हिदायत थी कि जब वह लाइब्रेरी में हो तो कोई भी उसे डिस्टर्ब न करे. मगर अब प्रथमा का भी दखल उस में होने लगा था. शाम का वह समय जो वे दोनों कार चलाना सीखने को जाया करते थे, अब बंद लाइब्रेरी में किताबों को देने लगे. राकेश ने जब प्रथमा के लाए नौवेल्स को पढ़ना शुरू किया तो उसे महसूस हुआ कि इन में लगभग सभी नौवेल्स में एक बात कौमन थी. वह यह कि सभी में घुमाफिरा कर विवाहेतर संबंधों की वकालत की गई थी. विभिन्न परिस्थितियों में नजदीकी रिश्तों में बनने वाले इन ऐक्स्ट्रा मैरिटल रिलेशन को अपराध या आत्मग्लानि की श्रेणी से बाहर रखा गया था. एक दिन तो राकेश से कुछ भी कहते नहीं बना जब प्रथमा ने ऐसे ही एक किराएदार का उदाहरण दे कर उस से पूछा जिस के अजीबोगरीब हालात में अपनी बहू से अंतरंग संबंध बन गए थे, ‘‘मुझे लगता है इस का फैसला गलत नहीं था. आप इस की जगह होते तो क्या करते?’’

तुमने क्यों कहा मैं सुंदर हूं: भाग 5

‘‘कुछ समय बाद मैं और तुम सेवानिवृत्त हो गए. मैं अब वकील साहिबा को देखने के लिए नियमितरूप से मानसिक अस्पताल जाने लगा और उन के साथ काफी समय गुजारने लगा. एक दिन अस्पताल की डाक्टर ने मुझ से कहा, ‘देखिए, अब वह बिलकुल स्वस्थ हो गई है. वह वकालत फिर से कर पाएगी, यह तो नहीं कहा जा सकता मगर एक औरत की सामान्य जिंदगी जी पाएगी, बशर्ते उसे एक मित्रवत व्यक्ति का सहारा मिल सके जो उसे यह यकीन दिला सके कि वह उसे तन और मन से संरक्षण दे सकता है.

‘‘पत्नी की मृत्यु के बाद मैं ने अपनी संतानों द्वारा मुझे लगभग पूरी तरह इग्नोर कर दिए जाने के चलते गहराए अकेलेपन से छुटकारा पाने के लिए उन का दिल से मित्र बनने का संकल्प लिया. इस बारे में बच्चों से बात की, तो पुत्र ने तो केवल इतना कहा, ‘आप तो हमें भारतीय सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक नैतिकता की बातें सिखाया करते थे, अब हम क्या कहें.’ मगर बड़ी पुत्री ने कहा, ‘आया का देर से आने की सूचना देने के बावजूद आप का औफिस चले जाना और इस बीच उसी दिन मम्मी की दवाइयों का असर समय से पहले ही खत्म होने के कारण उन का बीच में जाग जाना व अपनी दवाइयां घातक होने की हद तक अपनेआप खा लेना पता नहीं कोई कोइंसीडैंट था या साजिश. ऐसी क्या मजबूरी थी कि आप पूरे दिन की नहीं, तो आधे दिन की छुट्टी नहीं ले सके उस दिन. लगता है मम्मी ने डिप्रैशन में नींद की गोलियों के साथ ब्लडप्रैशर कम करने की गोलियां इतनी ज्यादा तादाद में खुद नहीं ली थीं. किसी ने उन्हें जान कर और इस तरह दी थीं कि लगे कि ऐसा उन्होंने डिप्रैशन की हालत में खुद यह सब कर लिया.’

‘‘यह सुन कर तो मैं स्तब्ध ही रह गया. छोटी पुत्री ने, ‘अब मैं क्या कहूं, आप हर तरह आजाद हैं. खुद फैसला कर लें,’ जैसी प्रतिक्रिया दी. तो एक बार तो लगा कि पत्नी की बची पड़ी दवाइयों की गोलियां मैं भी एकसाथ निगल कर सो जाऊं, मगर यह सोच कर कि इस से किसी को क्या फर्क पड़ेगा, इरादा बदल लिया और पिछले कुछ दिनों से सब से अलग इस गैस्टहाउस में रहने लगा हूं. परिचितों को इसी उपनगर में चल रहे किसी धार्मिक आयोजन में व्यस्त होने की बात कह रखी है.’’ यह सब कह कर मेरे मित्र शायद थक कर खामोश हो गए.

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काफी देर मौन पसरा रहा हमारे बीच, फिर मित्र ने ही मौन भंग किया, और बड़े निर्बल स्वर में बोले, ‘‘मैं ने तुम्हें इसलिए बुलाया है कि तुम बताओ, मैं क्या करूं?’’

मित्र के सवाल करने पर मुझे अपना फैसला सुनाने का मौका मिल गया. सो, मैं बोला, ‘‘अभिनव तुम्हें क्या करना है, तुम दोनों अकेले हो. वकील साहिबा के अंदर की औरत को तुम ने ही जगाया था और उन के अंदर की जागी हुई औरत ने तुम्हारे हताशनिराश जीवन में नई उमंग पैदा की और तुम्हारे परिवार को तनमन से अपने प्यार व सेवा का नैतिक संबल दे कर टूटने से बचाया. ऐसे में उसे जीवन की निराशा से टूटने से उबार कर नया जीवन देने की तुम्हारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है. उस के द्वारा तुम्हारे परिवार पर किए गए एहसानों को चुकाने का समय आ गया है. तुम वकील साहिबा से रजिस्ट्रार औफिस में बाकायदा विवाह करो, जिस से वे तुम्हारी विधिसम्मत पत्नी का दर्जा पा सकें और भविष्य में कभी भी तुम्हारी संतानें उन्हें सता न सकें. तुम्हारे संतानों की अब अपनी दुनिया है, उन्हें उन की दुनिया में रहने दो.’’

मेरी बात सुन कर मित्र थोड़ी देर कुछ फैसला लेने जैसी मुद्रा में गंभीर रहे, फिर बोले, ‘‘चलो, उन के पास अस्पताल चलते हैं.’’

मित्र के साथ अस्पताल पहुंच कर डाक्टर से मिले, तो उन्होंने सलाह दी कि आप उन के साथ एक नई जिंदगी शुरू करेंगे, इसलिए उन्हें जो भी दें, वह एकदम नया दें और अपनी दिवंगत पत्नी के कपड़े या ज्वैलरी या दूसरा कोई चीज उन्हें न दें. साथ ही, कुछ दिन उस पुराने मकान से भी कहीं दूर रहें, तो ठीक होगा.

डाक्टर से सलाह कर के और उन्हें कुछ दिन अभी अस्पताल में ही रखने की अपील कर के हम घर लौटे तो पड़ोसी ने घर की चाबी दे कर बताया कि उन की छोटी बेटी सरकारी गाड़ी में थोड़ी देर पहले आई थी. आप द्वारा हमारे पास रखाई गई घर की चाबी हम से ले कर बोली कि उन्होंने मां की मृत्यु के बाद आप को अकेले नहीं रहने देने का फैसला लिया है, और काफी बड़े सरकारी क्वार्टर में वह अकेली ही रहती है, इसलिए अभी आप का कुछ जरूरी सामान ले कर जा रही है. आप ने तो कभी जिक्र किया नहीं, मगर बिटिया चलते समय बातोंबातों में इस मकान के लिए कोई ग्राहक तलाशने की अपील कर गई है.

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ताला खोल कर हम अंदर घुसे तो पाया कि प्रशासनिक अधिकारी पुत्री उन के जरूरी सामान के नाम पर सिर्फ उन की पत्नी का सामान सारे वस्त्र, आभूषण यहां तक कि उन की सारी फोटोज भी उतार कर ले गई थी. एक पत्र टेबल पर छोड़ गई थी. जिस में लिखा था, ‘हम अपनी दिवंगता मां की कोई भी चीज अपने बाप की दूसरी बीवी के हाथ से छुए जाना भी पसंद नहीं करेंगे. इसलिए सिर्फ अपनी मां के सारे सामान ले जा रही हूं. आप का कोईर् सामान रुपयापैसा मैं ने छुआ तक नहीं है. मगर आप को यह भी बताना चाहती हूं कि अब हम आप को इस घर में नहीं रहने देंगे. भले ही यह घर आप के नाम से है और बनवाया भी आप ने ही है, मगर इस में हमारी मां की यादें बसी हैं. हम यह बरदाश्त नहीं करेंगे कि हमारे बाप की दूसरी बीवी इस घर में हमारी मां का स्थान ले. आप समझ जाएं तो ठीक है. वरना जरूरत पड़ी तो हम कानून का भी सहारा लेंगे.’

पत्र पढ़ कर मित्र कुछ देर खिन्न से दिखे. तो मैं ने उन्हें थोड़ा तसल्ली देने के लिए फ्रिज से पानी की बोतल निकाल कर उन्हें थोड़ा पानी पीने को कहा तो वे बोले, ‘‘आश्चर्य है, तुम मुझे इतना कमजोर समझ रहे हो कि मैं इस को पढ़ कर परेशान हो जाऊंगा. नहीं, पहले मैं थोड़ा पसोपेश में था, मगर अब तो मैं ने फैसला कर लिया है कि मैं इस मकान को जल्दी ही बेच दूंगा. पुत्री की धमकी से डर कर नहीं, बल्कि अपने फैसले को पूरा करने के लिए. इस की बिक्री से प्राप्त रकम के 4 हिस्से कर के 3 हिस्से पुत्र और पुत्रियों को दे दूंगा, और अपने हिस्से की रकम से एक छोटा सा मकान व सामान्य जीवन के लिए सामान खरीदूंगा. उस घर से मैं उन के साथ नए जीवन की शुरुआत करूंगा. मगर तब तक तुम्हें यहीं रुकना होगा. तुम रुक सकोगे न.’’ कह कर उन्होंने मेरा साथ पाने के लिए मेरी ओर उम्मीदभरी नजर से देखा. मेरी सांकेतिक स्वीकृति पा कर वे बड़े उत्साह से, ‘‘किसी ने सही कहा है, अ फ्रैंड इन नीड इज अ फ्रैंड इनडीड,’’ कहते हुए कमरे के बाहर निकले, दरवाजे पर ताला लगा कर चाबी पड़ोसी को दी और सड़क पर आ गए. नई जिंदगी की नई राह पर चलने के उत्साह में उन के कदम बहुत तेजी से बढ़ रहे थे.

जरा सी आजादी- भाग 2: नेहा आत्महत्या क्यों करना चाहती थी?

‘‘नेहाजी, क्या बात है? कोई परेशानी है?’’

गरदन हिला दी नेहा ने, न ‘न’ में न ‘हां’ में. कंधे पर हाथ रखा उस ने. सहसा रोना निकल गया. उस के साथ ही चली आई वह भीतर.

‘‘घर इतना बंदबंद क्यों रखा है? खिड़कियांदरवाजे खोलो न. ताजी हवा अंदर आने दो. उस दिन आईं क्यों नहीं?’’ सहसा थोड़ा रुक कर पूछा.

आंखें मिलीं नेहा से. भीगी आंखों में न जाने क्या था, न कुछ कहा न कुछ सुना. नेहा ने नहीं, शायद आने वाली महिला ने ही एक नाता सा बांध लिया.

‘‘मेरा नाम शुभा है. तुम मुझे जैसे चाहो पुकार सकती हो. दीदी कहो, भाभी कहो, नाम भी ले सकती हो. मेरी उम्र 53 साल है, हिसाब लगा लो, कैसे बुलाना चाहती हो. तुम छोटी लग रही हो मुझ से.’’

‘‘जी, मेरी उम्र 50 साल है.’’

‘‘वैसे किसी खूबसूरत महिला से उस की उम्र पूछनी तो नहीं चाहिए थी मगर महिला तुम जैसी हो तो कहना ही क्या, जो खुद अपने को 50 की बता रही हो. तुम इतनी बड़ी तो नहीं लगती हो. मैं नाम ले कर पुकारूं? नेहा पुकारूं तुम्हें?’’

‘‘जी, जैसा आप को अच्छा लगे.’’

‘‘मुझे अच्छा लगे क्यों. तुम्हें क्या अच्छा लगता है, यह तो बताओ.’’

चुप रही नेहा. शुभा ने कंधे पर हाथ रखा. झिलमिलझिलमिल करती आंखों में ढेर सारा नमकीन पानी शुभा को न जाने क्याक्या बता गया.

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‘‘जो तुम्हें अच्छा लगे मैं वही पुकारूंगी तुम्हें. तुम से पहले जो इस घर में रहती थी उस से मेरा बहुत प्यार था. यह घर मेरे लिए पराया नहीं है, उसी अधिकार से चली आई हूं. मीरा नाम था उस का जो यहां रहती थी. बहुत प्यारी सखी थी वह मेरी. तुम भी उतनी ही प्यारी हो. जरा दरवाजे- खिड़कियां तो खोलो.’’

‘‘उन को दरवाजेखिड़कियां खोलना अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘उन को किसी के साथ हंसनाबोलना भी पसंद है कि नहीं? उस दिन तुम किट्टी पार्टी में भी नहीं आईं.’’

‘‘उन्हें किट्टी डालना पसंद नहीं.’’

‘‘तुम्हारे बच्चे कहां हैं. बाहर होस्टल में पढ़ते हैं क्या?’’

‘‘एक ही बेटा है. अभी 4 महीने पहले ही उस की शादी हुई है.’’

‘‘अरे वाह, सास हो तुम. सास हो कर भी उदास हो. भई, बहू को 2-4 जलीकटी सुनाओ, अपनी भड़ास निकालो और खुश रहो. टीवी सीरियल में यही तो सिखाते हैं. शादी होती है, उस के बाद एक तो रोती ही रहती है, या बहू रुलाती है या सास. तुम्हारे यहां क्या सीन है?’’

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‘‘मैं तो यहां अकेली हूं. बहू आगरा में है. दूरदूर रहना है जब, तब लड़ाई कैसी?’’

‘‘बहू तुम ने पसंद की थी या भाईसाहब ने?’’

‘‘किसी ने भी नहीं. उन दोनों ने ही एकदूसरे को पसंद कर लिया था.’’

‘‘चलो, मेहनत कम हुई. मुझे तो अपने बच्चों के लिए साथी ही ढूंढ़ने में बहुत मेहनत करनी पड़ी. कहीं परिवार अच्छा नहीं था, कहीं लड़की पसंद नहीं आती थी.’’

शुभा ने धीरेधीरे घर की खिड़कियां खोलनी शुरू कर दीं. ताजी हवा घर में आने लगी.

‘‘आज खाने में क्या बनाया था तुम ने?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘कुछ नहीं, मतलब. भूखी हो सुबह से? अभी शाम के 6 बज रहे हैं. तुम ने कुछ भी खाया नहीं है.’’

शुभा ने हाथ पकड़ा नेहा का. रोक कर रखा बांध बह निकला. एक अनजान पड़ोसन के गले लग नेहा फूटफूट कर रो पड़ी. शुभा भी उस का माथा सहलाती रही.

‘‘चलो, तुम्हारी रसोई में चलें. बेसन है न घर में. पकौड़े बनाते हैं. आटा तो गूंध रखा होगा, चपाती के साथ पकौड़े और गरमगरम चाय पीते हैं.’’

आननफानन ही सब हो गया. आधे घंटे के बाद ही दोनों मेज पर बैठी चाय पी रही थीं.

‘‘क्यों इतना उदास हो, नेहा? खुश होना चाहिए तुम्हें. नए शहर में आई हो, उदासी स्वाभाविक है, मैं मानती हूं मगर इतनी नहीं कि भूखे ही मरने लगो. एक ही बच्चा है जिसे पालपोस दिया, उस का घर बसा दिया. तुम्हारा कर्तव्य पूरा हो गया, और क्या चाहिए?’’

‘‘बहुत खालीपन लगता है, दीदी. जी चाहता है कि अपने साथ कुछ कर लूं. जीवन और क्यों जीना, अब क्या करना है मुझे, किसे मेरी जरूरत है?’’

‘‘अपने साथ कुछ कर लूं, क्या मतलब?’’ शुभा का स्वर तनिक ऊंचा हो गया.

‘‘कुछ खा कर मर जाऊं.’’

‘‘क्या?’’ अवाक् रह गई शुभा. अनायास उस के सिर पर चपत लगा दी.

‘‘पागल हो क्या. अपने परिवार और अपनी बहू को सजा देना चाहती हो क्या? मर कर उन का क्या बिगाड़ लोगी. तुम्हें क्या लगता है वे उम्रभर रोते रहेंगे? जो जाएगा तुम्हारा जाएगा, किसी का क्या जाएगा.

खालीपन लगता है तो क्या मर कर भरोगी उसे? पति, बेटा और बहू के सिवा भी तुम्हारे पास कुछ है, नेहा. तुम्हारे पास तुम हो, अपनी इज्जत करना सीखो. पति को खिड़की खोलना पसंद नहीं तो तुम खिड़कीदरवाजे बंद कर के बैठी हो. पति को किट्टी डालना पसंद नहीं तो उस दिन तुम मेरे घर ही नहीं आईं. इतना कहना क्यों मान रही हो कि घुट कर मर जाओ?’’

‘‘शुरू से… शुरू से ऐसा ही है. मैं चाहती थी दूसरा बच्चा हो, ये माने ही नहीं. जीवन में मैं ने तो कभी सांस भी खुल कर नहीं ली. सोचा था मनपसंद लड़की को बहू बना कर लाऊंगी, सोचा था बेटी की इच्छा पूरी हो जाएगी. बेटे ने अपनी पसंद की ढूंढ़ ली. मेरी पसंद मन में ही रह गई.’’

‘‘अच्छा किया बेटे ने. अपनी पसंद से तो जी रहा है न. क्या चाहती हो कि आज से 20-30 साल बाद वह भी वही भाषा बोले जो आज तुम बोल रही हो. तुम आज कह रही हो न अपने तरीके से जी नहीं पाई, क्या चाहती हो कि तुम्हारा बच्चा भी तुम्हारी तरह अपना जीवन खालीपन से भरा पाए. अपनी पसंद से जी नहीं पाई और मर जाना चाहती हो. क्या तुम्हारा बच्चा भी…’’

‘‘नहीं… नहीं तो दीदी,’’ सहसा जैसे कुछ कचोटा नेहा को, ‘‘मेरे बच्चे को मेरी उम्र भी लग जाए.’’

‘‘अपने बच्चे को अपनी उम्र देना चाहती हो लेकिन चैन से जीने देना नहीं चाहती. कैसी मां हो? मर कर उम्रभर का अपराधबोध देना चाहती हो. तुम तो मर कर चली जाओगी लेकिन तुम्हारा परिवार चेहरे पर प्रश्नचिह्न लिए उम्रभर किसकिस के प्रश्न का उत्तर देता रहेगा. अरे, मन में जो है आज ही कह कर भड़ास निकाल लो. सुन लो, सुना दो, किस्सा खत्म करो और जिंदा रहो.’’

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सहसा शुभा का हाथ नेहा के हाथ पर पड़ा. कलाई में रूमाल बांध रखा था नेहा ने.

‘‘यह क्या हुआ, जरा दिखाना तो,’’ झट से रूमाल खींच लिया. हाथ सीधा किया, ‘‘अरे, यह क्या किया? यहां काटा था क्या? कब काटा था? ताजे खून के निशान हैं. क्या आज ही काटा? क्या अभी यही काम कर रही थीं जब मैं आई थी?’’

काटो तो खून नहीं रहा शुभा में. यह क्या देख लिया उस ने. यह अनजानी औरत जिस से वह पड़ोसी धर्म निभाने चली आई, क्या भरोसे लायक है? अभी अगर इस के जाने के बाद इस ने यह असफल प्रयास सफल बना लिया तो क्या से क्या हो जाएगा? आत्महत्या या हत्या, इस का निर्णय कौन करेगा? वही तो होगी आखिरी इंसान जो नेहा से मिली. कहीं उसी पर कोई मुसीबत न आ जाए.

‘‘नहीं तो दीदी. चूड़ी टूट कर लग गई थी.’’

‘‘भाईसाहब वापस कब आते हैं औफिस से?’’

‘‘वे तो 9-10 बजे से पहले नहीं आते. आजकल ज्यादा काम रहता है, मार्च का महीना है न.’’

‘‘तुम चलो मेरे साथ, मेरे घर. जब वे आएंगे, तुम्हें उधर से ही लेते आएंगे. तुम अकेली मत रहो.’’

‘‘मैं तो पिछले कई सालों से अकेली हूं. अब थक गई हूं. एक ही बेटे में सब देखती रही. आज वह भी मुझे एक किनारे कर पराई लड़की का हो गया. मैं खाली हाथ रह गई हूं, दीदी. पति तो पहले ही अपने परिवार के थे. मेरी इच्छा उन के लिए न कल कोई मतलब रखती थी न आज रखती है. बेटा अपनी पत्नी की इच्छा पर चलता है, पति अपने तरीके से चलते हैं. दम घुटता है मेरा. सांस ही नहीं आती. इन से कुछ कहती हूं तो कहते हैं, मेरा घर है, जैसा मैं कहता हूं वैसा ही होगा. बहू का घर उस का घर होना ही चाहिए. तो फिर मेरा घर कहां है, दीदी?

‘‘मायके जाती हूं तो वहां लगता है यह भाभी का घर है. वहां मन नहीं लगता. पति कहते हैं कि क्या कमी है, साडि़यां हैं, गहने हैं. भला साडि़यां, गहनों से क्या कोई सुखी हो जाता है? मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता. मैं तो अपने घर में एक पत्ता भी हिला नहीं सकती. यह सोफासैट इधर से उधर कर लूंगी तो भी तूफान आ जाएगा. बेजान गुडि़या हूं मैं, जिसे चूं तक करने का अधिकार नहीं है.’’

अवाक् रह गई शुभा. नेहा की परेशानी समझ रही थी वह. इस की जगह अगर वह भी होती तो शायद उस की भी यही हालत होती.

‘‘कल सोफासैट से ही शुरुआत करते हैं.’’

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‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि अभी खिड़कियां खोली हैं न. इन्हें आज बंद मत करना. कहना मेरा दम घुटता है इसलिए इन्हें बंद मत करो. थोड़ा सा विरोध भी करो. कल बाई के साथ मिल कर जरा सा सामान अपनी मरजी से सजाना. कुछ कहेंगे तो कहना, तुम्हें इसी तरह अच्छा लगता है. अपनी भी कहना सीखो, नेहा. कई बार ऐसा भी होता है, हम ही अपनी बात नहीं कहते या हम ही अपनी इच्छा का सम्मान किए बिना दूसरे की हर इच्छा मानते चले जाते हैं, जिसे सामने वाला हमारी हां ही मानता है. इस में उन का भी क्या दोष.

अटूट बंधन- भाग 3: प्रकाश ने कैसी लड़की का हाथ थामा

त्रिशा ने रुकरुक कर बोलना शुरू किया, ‘‘देखो, 3 वर्ष में हम एकदूसरे को पूरी तरह जानने लगे हैं. मेरा तो कोई काम तुम्हारे बगैर नहीं होता. सच तो यह है, इस शहर में आ कर मैं तो अपनी जिम्मेदारियां ही भुला बैठी हूं. मैं ने तो अभी सोचा भी नहीं कि यहां से जाने के बाद मैं कैसे मैनेज करूंगी. पर प्रकाश, आजाद को मैं ने अपने जीवनसाथी के रूप में देखा है. उन के सिवा मैं किसी और के बारे में सोच भी कैसे…’’ प्रकाश बीच में ही बोल उठा, ‘‘मैं सब जानता हूं, लेकिन जिंदगी इतनी आसान भी नहीं होती, जितना तुम लोग सोच रहे हो. मुझे तुम्हारी फिक्र सताती है. पैसे खर्च कर के ही क्या सबकुछ मिल सकता है? इन सब बातों से अलग, सच तो यह भी है कि मेरे दिल में तुम्हारे लिए चाहत कब पैदा हो गई, मुझे पता ही नहीं चला. मैं तुम्हें ऐसे अकेले नहीं छोड़ सकता. प्लीज, मेरी बात समझने की कोशिश करो, त्रिशा.’’

अगले कुछ पल रुक कर त्रिशा ने कहा, ‘‘मैं अच्छी तरह जानती हूं, तुम मेरी कितनी फिक्र करते हो लेकिन जो प्रस्ताव तुम्हारा है, उस के बारे में सोचने का मेरे लिए सवाल ही पैदा नहीं होता. मैं ने हमेशा यही चाहा था कि मैं जिस कमी के साथ जी रही हूं, जीवनसाथी भी वैसा ही चुनूंगी ताकि हम एकदूसरे की ताकत बन कर कदमकदम पर हौसलाअफजाई कर सकें और आत्मनिर्भर हो कर जी सकें. फिर, आजाद तो मेरे जीवन में एक अलग ही खुशी ले कर आए हैं. मैं यकीन के साथ कह सकती हूं, उन की खूबियां और जीवन के प्रति उन का पौजिटिव रुख ही हमारे घर को खुशियों से भर देगा. जानती हूं, जीवन के हर मोड़ पर चुनौतियां होंगी, लेकिन हम दोनों का एकदूसरे के प्रति विश्वास, सम्मान और प्यार ही हमें उन चुनौतियों से उबरने की ताकत देगा. रही बात तुम्हारी, तो मैं अपने इतने अच्छे दोस्त को कभी खोना नहीं चाहती. मेरे लिए, प्लीज, मेरे लिए मुझे मेरा सब से अच्छा दोस्त वापस दे दो. अगले महीने मेरी इंगेजमैंट है. अगर तुम इसी तरह परेशान रहोगे तो क्या मुझे तकलीफ नहीं होगी?’’ इतने दिनों का सैलाब अब प्रकाश की आंखों से बह चला.

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त्रिशा की जिद और कोशिशों के चलते प्रकाश धीरेधीरे नौर्मल होने लगा. त्रिशा की इंगेजमैंट हुई और फिर शादी के दिन भी करीब आ गए. त्रिशा ने आधी से ज्यादा शौपिंग प्रकाश और शालिनी के साथ ही कर ली थी.

एक शाम त्रिशा के पास प्रकाश के मम्मीपापा का फोन आया. लंबी बातचीत के बाद प्रकाश के पापा ने त्रिशा से कहा, ‘‘बेटा, प्रकाश को शादी के लिए तुम ही तैयार कर सकती हो. हो सके तो उसे समझाओ, इतनी देर करना भी अच्छी बात नहीं. हमारी तो बात ही टाल देता है.’’ त्रिशा हंस पड़ी, ‘‘बस, इतनी सी बात है, अंकल. आप बिलकुल चिंता मत कीजिए. मैं उसे राजी कर लूंगी.’’

यों तो त्रिशा ने पहले भी उस से शादी का जिक्र छेड़ा था, पर हर बार वह उस की बात अनसुनी कर देता था. एक दिन प्रकाश ने त्रिशा से पूछा, ‘‘अच्छा बताओ, तुम्हें शादी पर क्या गिफ्ट दूं?’’ त्रिशा का उत्तर था, ‘‘तुम मुझे जो चाहे गिफ्ट दे देना, पर तुम्हारी शादी के लिए तुम्हारी हां मेरे लिए सब से कीमती गिफ्ट होगा.’’

प्रकाश उस दिन खामोश रहा. त्रिशा की शादी की तैयारियों में प्रकाश ने खुद को इतना उलझा लिया कि उसे अपनी सुध ही नहीं रही. हफ्तेभर पहले छुट्टी ले कर प्रकाश भी त्रिशा के साथ दिल्ली चला आया. यहां आ कर शादी की लगभग सभी जिम्मेदारियां प्रकाश ने संभाल लीं. मेहंदी, हलदी, कोर्ट मैरिज और फिर ग्रैंड रिसैप्शन पार्टी. यह तय था कि शादी के बाद आजाद भी कुछ दिनों के लिए बेंगलुरु घूम आएंगे. त्रिशा की कंपनी का औफिस लखनऊ में नहीं था, इसलिए बेंगलुरु आ कर त्रिशा ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया. उस ने सोच रखा था कि लखनऊ जा कर कुछ दिन घरगृहस्थी ठीकठाक कर के थोड़ा उस शहर के बारे में समझने के बाद वहीं किसी दूसरी नौकरी की तलाश करेगी.

‘‘भई, हम जानते हैं, आप बहुत थक गए हैं, पर हमें बेंगलुरु तो आप ही घुमाएंगे,’’ आजाद ने प्रकाश से कहा तो प्रकाश बोला, ‘‘सोच लीजिए, बदले में आप को हमें लखनऊ की सैर करवानी पड़ेगी.’’ ‘‘कब आ रहे हैं आप?’’

‘‘बहुत जल्द, अपनी शादी के बाद.’’ ‘‘अच्छा, तो जनाब ने शादी का फैसला कर लिया और हमें खबर तक नहीं हुई. सुन रही हो त्रिशा.’’

त्रिशा को भी यह सुन कर तसल्ली हुई, ‘‘फैसला तो नहीं किया पर…’’ प्रकाश बोलतेबोलते रुक गया और फिर उस ने बात बदल दी. बेंगलुरु में वह हफ्ता तो जैसे चुटकियों में कट गया.

प्रकाश ने त्रिशा और आजाद को गाड़ी में बैठा कर उन का सारा सामान व्यवस्थित करवा दिया. गाड़ी यहीं से बन कर चलती थी, इसलिए लेट होने का तो सवाल ही नहीं था. जैसे ही गाड़ी प्लेटफौर्म छोड़ने लगी, सभी का मन भारी हो गया. प्रकाश शायद बिना कुछ बोले ही चला गया था. त्रिशा की आंखें भी नम हो आईं. तभी अचानक सामने बैठे पैसेंजर ने आजाद का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘आप का छोटा बैग मैं इस साइड टेबल पर रख देता हूं. मैं भी लखनऊ जा रहा हूं. आप के सामने की लोअर बर्थ मेरी ही है. कोई भी जरूरत हो तो आप लोग बेझिझक मुझे आवाज दे दीजिएगा. मेरा नाम प्रकाश है.’’ अनजाने ही त्रिशा के होंठों पर मुसकान छा गई.

अगली सुबह घर पहुंचने के कुछ ही देर बाद उन्हें एक कूरियर मिला. यह त्रिशा के नाम का कूरियर था. ‘‘हैप्पी बर्थडे त्रिशा. तुम्हारा सब से कीमती तोहफा भेज रहा हूं,’’ प्रकाश ने लिखा था. उस में त्रिशा के लिए खूबसूरत सी ब्रेल घड़ी थी और एक शादी का कार्ड. त्रिशा उछल पड़ी, ‘‘वाह, इतना बड़ा सरप्राइज. इतनी जल्दी कैसे होगा सब? महीनेभर बाद की ही तो तारीख है.’’

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शादी से 2 दिन पहले आजाद और त्रिशा भोपाल पहुंचे तो प्रकाश ने रचना से उन का परिचय करवाया. ‘‘इतने कम समय में प्रकाश को तो कुछ बताने की फुरसत ही नहीं मिली. अब तुम ही कुछ बताओ न रचना अपने बारे में?’’ त्रिशा ने उत्सुकतावश पूछा. ‘‘बस, अभी आई. पहले जरा मुंह तो मीठा कीजिए, फिर बैठ कर ढेर सारी बातें करते हैं,’’ कहते हुए रचना उठी तो दाहिनी तरफ के सोफे पर बैठे आजाद से टकरातेटकराते बची. अचानक लगने वाले धक्के से आजाद के हाथ से मोबाइल छूट कर फर्श पर गिर पड़ा.

‘‘अरे, आराम से,’’ कहते हुए प्रकाश आजाद का मोबाइल उठाने के लिए झुका. अपनी गलती पर अफसोस जताते हुए अनायास ही रचना के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘ओह, माफी चाहती हूं, डाक्टर साहब. दरअसल, मैं देख नहीं सकती.’’

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