प्यार की सजा : भाग 2

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

थाने में पुलिस ने आरती को प्रताडि़त कर पूछताछ शुरू की. दरअसल पुलिस चाहती थी कि आरती यह स्वीकार कर ले कि प्रेमी युगल की हत्या अंकित के घर वालों ने की है. इस बीच आरती के पिता और भाई थाने पहुंच गए तो उन दोनों को भी जम कर पीटा गया. जब आरती नहीं टूटी तो पुलिस उसे उस के घर छोड़ गई.

आरती एवं उस के घर वालों ने एसएसपी आकाश तोमर से प्रताड़ना की शिकायत की. इस पर एसएसपी ने थानाप्रभारी बलिराज शाही को फटकार लगाई, साथ ही सीओ से भी बात की. उन्होंने कहा कि वह केस को वर्कआउट करें, लेकिन किसी को अनावश्यक प्रताडि़त न करें.

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एसएसपी की हिदायत के बाद पुलिस टीम ने जांच आगे बढ़ाते हुए मृतका सुलेखा के पिता, भाई, चाचा और चचेरे भाई पर शिकंजा कस दिया. पुलिस टीम ने उन के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगा दिए. साथ ही उन की टोह के लिए मुखबिरों को भी लगा दिया. यही नहीं, पुलिस ने घर जा कर मृतका सुलेखा की बहन बरखा से भी मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की.

बरखा ने बताया कि पिता, चाचा व भाई सुलेखा को बहलाफुसला कर गेहूं के खेत पर ले गए थे. उस के बाद वह घर वापस नहीं आई.

बरखा के बयान से स्पष्ट हो गया कि सुलेखा व उस के प्रेमी अंकित की हत्या उस के घर वालों ने ही की थी, अत: पुलिस ने सुलेखा के पिता रामप्रसाद, भाई सनी कुमार, चाचा राजीव उर्फ राजी तथा चचेरे भाई सौरभ को गिरफ्तार करने के लिए कई जगह ताबड़तोड़ दबिश डालीं, लेकिन वे लोग पुलिस के हत्थे नहीं चढ़े. हालांकि उन की लोकेशन भरथना के आसपास के गांवों की मिल रही थी.

7 अप्रैल की सुबह करीब 6 बजे पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि इटावा कन्नौज हाइवे पर स्थित झिझुआ मोड़ गेट के पास रामप्रसाद अपने भाई राजीव, बेटे सनी और भतीजे सौरभ के साथ मौजूद है.

यह सूचना मिलते ही पुलिस टीम झिझुआ मोड़ गेट के पास पहुंच गई और घेराबंदी कर चारों को गिरफ्तार कर लिया. उन सभी को थाना भरथना लाया गया.

थाने में उन से सुलेखा और अंकित की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो वे टूट गए. उन चारों से गहन पूछताछ के बाद पता चला कि प्रेमी युगल की हत्या का मास्टरमाइंड सुलेखा का चाचा राजीव उर्फ राजी था. उस ने ही पूरा षडयंत्र रचा था और घर के अन्य लोगों को उकसाया था.

चूंकि हत्यारोपियों ने जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थानाप्रभारी बलिराज शाही ने मृतका के पिता प्रदीप शाक्य की ओर से भादंवि की धारा 302, 120बी के तहत रामप्रसाद, राजीव उर्फ राजी, सनी कुमार तथा सौरभ कुमार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस जांच में नादान प्रेमियों की हत्या की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना भरथना क्षेत्र में एक गांव है दिवरासई. इसी गांव में रामप्रसाद अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी सीता के अलावा 2 बेटे सनी और मनी तथा 4 बेटियां थीं. जिन में सुलेखा तीसरे नंबर की थी. रामप्रसाद के पास 10 बीघा जमीन थी.

रामप्रसाद का एक अन्य भाई राजीव प्रसाद था, जिसे गांव के लोग राजी कहते थे. दोनों भाइयों के बीच जमीन व मकान का बंटवारा हो चुका था. राजीव दबंग था, पढ़ालिखा भी. किसानी के साथ वह किराने की दुकान भी चलाता था. दुकान पर उस का बेटा सौरभ बैठता था. उस की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

सुलेखा और बरखा के अलावा सभी बहनों की शादी हो चुकी थी. बरखा 11वीं कक्षा में पढ़ती थी. घर के कामों के साथसाथ वह पढ़ती भी थी.

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रामप्रसाद के पड़ोस में प्रदीप कुमार शाक्य का मकान था. उस के परिवार में पत्नी दिलीप कुमारी के अलावा 2 बेटे अमन और अंकित थे. प्रदीप कुमार शाक्य खेतीकिसानी के अलावा गल्ले का व्यवसाय भी करता था. इस से उसे अच्छी कमाई हो जाती थी. उन का 17 वर्षीय बेटा अंकित 11वीं में पढ़ रहा था. पढ़ाई के साथसाथ वह पिता के गल्ले के काम में हाथ बंटाता था.

रामप्रसाद व प्रदीप कुमार हालांकि अलगअलग जातिबिरादरी के थे, लेकिन पड़ोसी होने के नाते दोनों परिवारों में मधुर संबंध थे. एकदूसरे के सुखदुख में बराबर शरीक होते थे. सुलेखा और अंकित हमउम्र थे. बचपन से ही दोनों साथ खेलेबढ़े थे. उन में खूब पटती थी.

दोनों अब जवानी की दहलीज पर कदम रख चुके थे. इसलिए वे साथसाथ खेल तो नहीं पाते थे पर आंखों से एकदूसरे को मूक संदेश देने लगे थे. अंकित की शरारत पर सुलेखा शरमा जाती तो अंकित उसे छूते ही मदहोशी के आलम में पहुंच जाता था. हकीकत यह थी कि सुलेखा उस के दिल की गहराइयों तक समा चुकी थी. वह रातदिन उसी के ख्वाब देखता था.

सुलेखा और अंकित एक ही कालेज में पढ़ते थे. सुलेखा अंकित की चचेरी बहन आरती के साथ कालेज जाती थी. वह उस की प्रिय सहेली थी और उसी की कक्षा में पढ़ती थी. एक दिन सुलेखा कालेज जा रही थी तभी अंकित उसे रास्ते में मिल गया.

अंकित ने इशारे से उसे पेड़ की ओट में बुलाया. दोनों की आंखें चार हुईं और दिल धड़कने लगे. अंकित ने अनायास ही सुलेखा का हाथ थामते हुए कहा, ‘‘सुलेखा, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं. तुम्हारा खूबसूरत चेहरा हर समय मेरी आंखों के सामने घूमता रहता है.’’

सुलेखा नजरें नीची कर के मंदमंद मुसकराती हुई पैर के अंगूठे से मिट्टी खुरचती रही. उस की खामोशी से अंकित को उस के दिल की बात पता चल गई. वह समझ गया कि जो हाल उस का है, वही सुलेखा का भी है.

अंकित ने उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘कुछ तो बोलो, मैं तुम्हारा जवाब सुनने को बेचैन हूं. अगर तुम्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगी तो मुझे डांट दो. लेकिन एक बात जान लो सुलेखा कि अगर तुम ने इनकार किया तो तुम्हारी कसम मैं जान दे दूंगा. तुम्हारे बिना अब मैं जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता.’’

सुलेखा ने आंखें फाड़ कर अंकित को देखा और मुसकराते हुए बोली, ‘‘अंकित, मैं भी तुम्हें उतना ही प्यार करती हूं जितना तुम मुझे करते हो. मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रही थी कि तुम मुझ से यह बात कहो, लेकिन तुम तो निरे बुद्धू हो.’’ अपनी बात कह कर वह घर की तरफ चल दी.

जवाब में अंकित ने कहा, ‘‘सुलेखा, सचमुच मैं बुद्धू हूं, डरपोक हूं. तभी तो सब कुछ जानते हुए भी तुम्हारे सामने नहीं आ पाता था.’’

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इस के बाद अंकित और सुलेखा का प्यार परवान चढ़ने लगा. सुलेखा और अंकित घर से कालेज जाने को निकलते लेकिन वे कालेज न जा कर बागबगीचे में बैठ कर प्यारभरी बातें करते. एकदूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ा तो दोनों शारीरिक मिलन के लिए लालायित रहने लगे. और एक दिन उन की यह हसरत भी पूरी हो गई.

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

प्यार की सजा : भाग 1

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

इटावा जिले के दिवरासई गांव का रहने वाला मेवाराम यादव अपनी गेहूं की पकी फसल काट रहा था. साथ में कई मजदूर भी कटाई कर रहे थे. दोपहर करीब 12 बजे प्यास लगी तो मेवाराम ने मजदूर सुदामा को पानी लाने प्रदीप कुमार के कुएं पर भेजा.

सुदामा कुएं पर पहुंचा तो उसे कुएं से बदबू आती महसूस हुई. जिज्ञासावश उस ने कुएं में झांका तो उस के मुंह से चीख निकल गई. कुएं में लाश पड़ी थी.

सुदामा की चीख सुन कर मेवाराम और मजदूर भी कुएं के पास पहुंच गए. इस के बाद तो पूरे गांव में शोर मच गया. यह बात 2 अप्रैल, 2020 की है.

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अपने कुएं में लाश पड़ी होने की जानकारी प्रदीप कुमार शाक्य को हुई तो उस का माथा ठनका. क्योंकि उस का 17 वर्षीय बेटा अंकित 30 मार्च की शाम 7 बजे घर से निकला था और वापस नहीं लौटा था. उस ने घर वालों के साथ गांव का कोनाकोना छान मारा था, लेकिन अंकित का कुछ भी पता नहीं चला. वह बेटे की गुमशुदगी दर्ज कराने पुलिस के पास भी गया था लेकिन पुलिस ने उसे टरका दिया था.

प्रदीप के मन में तमाम आशंकाओं के बादल उमड़ने लगे. इन्हीं आशंकाओं के बीच उस ने पत्नी दिलीप कुमारी तथा घर के अन्य लोगों को साथ लिया और खेत पर स्थित अपने कुएं पर जा पहुंचा.

उस समय वहां दरजनों लोग थे, जो कुएं में झांकझांक कर लाश को देख रहे थे. प्रदीप कुमार और उस के घर के अन्य लोगों ने भी कुएं में झांक कर लाश देखी, पर यह सुनिश्चित कर पाना मुश्किल था कि लाश किस की है. इस बीच गांव के चौकीदार ने भरथना थाने में फोन कर यह जानकारी दे दी.

सूचना पाते ही थानाप्रभारी बलिराज शाही पुलिस टीम के साथ दिवरासई गांव स्थित उस कुएं पर पहुंच गए, जहां लाश पड़ी थी. गांव के 2 युवकों सूरज और राजू को कुएं में उतारा गया. दोनों अच्छे तैराक थे. कुएं में उतरते ही सूरज चिल्लाया, ‘‘सर, कुएं में एक नहीं 2 लाशें हैं.’’ यह सुन कर पुलिस के साथसाथ गांव वालों की भी सांसें अटक गईं.

उन युवकों के सहयोग से पुलिस ने रस्सी के सहारे खींच कर दोनों शव कुएं से बाहर निकलवाए. शवों को देख कर वहां मौजूद लोगों ने उन की शिनाख्त कर ली. एक शव प्रदीप कुमार शाक्य के बेटे अंकित का था और दूसरा 16 वर्षीया सुलेखा का, जो गांव के ही रामप्रसाद की बेटी थी.

रामप्रसाद तथा उस के घर का कोई सदस्य वहां मौजूद नहीं था. थानाप्रभारी ने उस के घर सूचना भिजवाई. पर सूचना के बाद भी उस के घर से कोई नहीं आया.

घटनास्थल पर मौजूद प्रदीप कुमार व उस की पत्नी दिलीप कुमारी अपने 17 वर्षीय बेटे अंकित के शव को देख कर दहाड़ें मार कर रो रहे थे. परिवार के अन्य लोगों का भी रोरो कर बुरा हाल था. इसी बीच थानाप्रभारी बलिराज शाही ने कुएं से युवकयुवती के शव मिलने की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. कुछ ही देर में एसएसपी आकाश तोमर तथा सीओ (भरथना) आलोक प्रसाद आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया, फिर मृतक के घर वालों तथा अन्य लोगों से घटना के संबंध में जानकारी जुटाई. जिस से पता चला कि अंकित और सुलेखा एक ही कालेज में पढ़ते थे, दोनों के बीच प्रेम संबंध थे. दोनों के घर वाले इस का विरोध करते थे. 2 दिन पहले ही दोनों देर शाम घर से निकले थे.

जामातलाशी में उन के पास से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला. पुलिस अधिकारियों को यह जान कर आश्चर्य हुआ कि सुलेखा के घर वाले वहां नहीं आए थे. लोगों ने बताया कि मृतका के घर पर केवल महिलाएं हैं. पुरुष फरार हैं. सूचना के बावजूद घर की महिलाएं भी मृतका का शव देखने नहीं आईं, यह बात पुलिस की समझ से बाहर थी.

इस से पुलिस अधिकारियों को लगा कि यह मामला औनर किलिंग का हो सकता है. अंकित की मां दिलीप कुमारी भी चीखचीख कर कह रही थी कि उस के बेटे की हत्या सुलेखा के घर वालों ने की है. हत्या कर के शव कुएं में फेंक दिया ताकि लोग समझें कि दोनों ने आत्महत्या की है.

मामला हत्या का था या आत्महत्या का, यह बात तो पोस्टमार्टम के बाद ही पता चल सकती थी. पुलिस ने अंकित व सुलेखा के शव पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल इटावा भिजवा दिए.

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3 अप्रैल, 2020 को 3 डाक्टरों के पैनल ने दोनों शवों का पोस्टमार्टम किया. थानाप्रभारी ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ी तो चौंके. क्योंकि मामला आत्महत्या का नहीं, हत्या का था. उन की मौत पानी में डूबने से नहीं बल्कि दम घुटने से हुई थी. थानाप्रभारी ने यह जानकारी एसएसपी आकाश तोमर को दे दी.

एसएसपी ने प्रेमी युगल हत्याकांड को गंभीरता से लिया और कातिलों को पकड़ने के लिए सीओ आलोक प्रसाद की निगरानी में एक विशेष पुलिस टीम का गठन कर दिया. इस टीम में थानाप्रभारी बलिराज शाही, एसआई अनिल कुमार, महिला सिपाही सरिता सिंह, एसओजी प्रभारी सत्येंद्र सिंह तथा सर्विलांस प्रभारी बेचैन सिंह को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने सब से पहले मृतक अंकित के घर वालों से पूछताछ की. मृतक की मां दिलीप कुमारी ने बताया कि 30 मार्च को 7 बजे अंकित के मोबाइल पर एक काल आई थी. उस ने काल रिसीव कर बात की फिर घर से चला गया. उस के बाद वापस नहीं लौटा. 2 दिन बाद उस की लाश मिली. उस ने अंकित की हत्या का आरोप सुलेखा के घर वालों पर लगाया.

अंकित का मोबाइल घर पर ही था, जिसे वह चार्जिंग पर लगा गया था. पुलिस टीम ने मोबाइल अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस ने जब उस का मोबाइल खंगाला तो पता चला कि उस के मोबाइल पर अंतिम काल 30 मार्च की शाम 7 बजे आई थी. पुलिस ने उस नंबर की जानकारी जुटाई तो पता चला वह नंबर सुलेखा के चचेरे भाई सौरभ का है. पर सौरभ सहित घर के अन्य सदस्य फरार थे.

पुलिस टीम सुलेखा के घर पहुंची तो उस की मां सीता देवी और बहनें फूटफूट कर रोने लगीं. उन्होंने बताया कि सुलेखा की हत्या अंकित के घर वालों ने की है. घर के पुरुष बदनामी और पुलिस के डर से फरार हो गए हैं.

सीता देवी ने यह बात स्वीकार की कि सुलेखा अंकित से प्यार करती थी और परिवार के लोग विरोध करते थे. सुलेखा का मोबाइल फोन भी घर पर ही था. पुलिस ने उस का मोबाइल अपने पास सुरक्षित रख लिया.

प्रेमी युगल की हत्या का इलजाम दोनों परिवार एकदूसरे पर लगा रहे थे. पुलिस परेशान थी कि आखिर अंकित और सुलेखा का कातिल कौन सा परिवार है. इस का पता लगाने के लिए पुलिस ने सुलेखा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला कि सुलेखा 2 नंबरों पर दिन में कईकई बार बात करती थी. इन में एक नंबर अंकित का था और दूसरा अंकित की चचेरी बहन आरती का था, जो उस की सहेली थी और उस के साथ ही पढ़ती थी. पुलिस को लगा कि आरती से सच्चाई पता चल सकती है.

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4 अप्रैल की रात 11 बजे पुलिस टीम अंकित के चाचा रामकुमार के घर पहुंची और पूछताछ के बहाने उस की बेटी आरती को जीप में बिठा लिया. घर वालों ने रात में बेटी को थाने ले जाने का विरोध किया तो पुलिस ने कहा कि उस से कुछ पूछताछ करनी है.

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

जिंदगी बदगुमां नहीं : भाग 3

शिशिर ने सोचा था राम उस की गरीबी दूर करेगा, पैसे कमा कर अमेरिका से भेजेगा, बुढ़ापे की लाठी बनेगा. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. उलटे, उसे फोन पर बेटे से धमकियां मिलतीं, ‘पापा, इस मकान को बेच दो. मैं तुम्हें नई कालोनी में बढि़या प्लैट खरीद दूंगा. मेरा हिस्सा मुझे दे दो वरना…’ ‘नहीं, मैं यहीं ठीक हूं.’

मुन्ना ने समझाया, ‘यह बेवकूफी हरगिज न करना. तेरे सिर पर से छत भी जाएगी और तू सड़क पर

आ जाएगा.’ राम के इस व्यवहार से सब का मन दुखी होता, पर आखिर विकल्प क्या था?

ऐसे दुख की घड़ी में शिशिर को पदम की बड़ी याद आती. काश, वह यहां होता. कितना स्वार्थी था शिशिर जो शिखंडी बेटे के जाने के बाद उस की सुध भी न ली. आज आत्मग्लानि से वह बेटे का सामना नहीं कर पा रहा है. क्या हुआ इन 20-22 बरसों में जानने की उत्कंठा तो थी परंतु जबान जैसे तालू से चिपक गई थी उस की. आज बेटा सामने है तो खुशी तो है पर कहेपूछे किस मुंह से?

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जब से पदम ने घर में कदम रखा है, मुन्ना और रेवा बच्चों की तरह खुश हैं जैसे किसी खोए खिलौने को पा लिया है, पर शिशिर अपनी सोच और व्यवहार से नजरें चुरा रहा है. आज सब ने सुबहसुबह दूधजलेबी खाई थी. नाश्ते के बीच पदम ने पूछा, ‘‘मां, राम भैया कहां हैं?’’

‘‘अमेरिका में,’’ मां ने जवाब दिया था. ‘‘वहां क्या करते हैं?’’

‘‘पता नहीं, बेटा. फोन आता रहता है. आज इतवार है, देखना फोन जरूर आएगा.’’ ‘‘चलो, यह भी अच्छा हुआ जो पढ़लिख कर वे नौकरी कर रहे हैं,’’ पदम ने ठंडी प्रतिक्रिया दी.

‘‘छोड़, यह बता तू ने क्या पढ़ाई की है?’’ ‘‘मैं ने एनीमेशन इंजीनियरिंग की है यानी सौफ्टवेयर इंजीनियर हूं.’’

‘‘वाह, क्या बात है. तू तो बड़ा लायक निकला, सब ने खुशी व्यक्त की थी.’’ ‘‘हां, यहां नोएडा में एक कंपनी में नौकरी भी मिल गई है. कल से जाना है.’’

‘‘बहुत खूब,’’ मुन्ना बाबू ने उस की पीठ थपथपाई. ‘‘भैया का फोन आएगा तब मैं भी बात करूंगा.’’

सब ने सुनी थी उस की बात पर ‘राम प्रकरण’ को छेड़ना इस वक्त किसी को भला नहीं लग रहा था. तभी फोन की घंटी बजी.

शिशिर बाबू ने फोन उठाया, जानते थे उसी का होगा. पदम दूसरे कमरे में रखे पैरलेल लाइन पर बापबेटे की बातें सुन रहा था. ‘‘पापा, वह मकान का क्या हुआ? कोई कस्टमर मिला?’’

‘‘तुझ से मैं ने पहले भी कहा है, मैं यह मकान नहीं बेचूंगा.’’ बापबेटे में बहस छिड़ गई. बीच में पदम बोला, ‘‘भैया, मकान की बात क्यों करते हो?’’

राम चौंका, ‘‘भई, बीच में तू कौन?’’ ‘‘मैं आप का छोटा भाई पदम हूं. आज ही आया हूं.’’

‘‘मेरा कोई भाई नहीं है. पता नहीं पापा किसकिस को घर में घुसा लेते हैं. बुढ़ापे में पापा का दिमाग सठिया गया है. भाई, तू जो भी हो, मुझे परायों से बात नहीं करनी.’’ ‘‘बूढ़ा होगा तू, मैं अब तेरी परवा नहीं करता. जैसे तू मेरा बेटा

है वैसे पदम भी है. बोल, क्या कहना है?’’ शिशिर बाबू तेज आवाज में बोले.

‘‘मैं अगले महीने इंडिया आ रहा हूं. मकान तो मैं बेचूंगा जरूर,’’ राम ने फिर धमकी दी. गुस्से में शिशिर ने फोन पटक दिया. सब उन की हिम्मत देख हैरान थे.

मुन्ना उन्हें देख मुसकराया, ‘‘आज

दूसरा कंधा मिल गया है तो शिशिर में ताकत आ गई है. अच्छा जवाब दिया राम को.’’

‘‘अरे, बाजार से सामान ले आओ, मैं ने लिस्ट बना ली है,’’ रेवा ने माहौल बदलने की गरज से बात बदली. ‘‘हां, लाओ लिस्ट,’’ वे भी इस वक्त बात को छोड़ना चाहते थे.

‘‘पापा, मैं भी साथ आता हूं,’’ पदम साथ हो लिया. दरअसल, शिशिर बाबू बेटे से अकेले में बातें करना चाहते थे. शायद पदम भी यही चाहता था.

‘‘भैया के साथ क्या प्रौब्लम है?’’ पदम ने पूछा. उन्होंने सारी कहानी बेटे को सुना दी. ‘‘बेटा, मैं तो यहां तेरी कहानी सुनने आया हूं. वैसे यह बता इन 22 बरसों में क्या बीता, मेरा मन सब जानने को उत्सुक है.’’

‘‘पापा, मैं बता दूं कि भाई की सोच मुझ से छिपी नहीं है. मैं सारा हैंडिल कर लूंगा, भाई को तो चुटकी में मनाऊंगा. बस, मैं चाहता हूं कि हम सब मिल कर प्यार से रहें. मैं यहां आप लोगों के लिए आया हूं, रिश्ते जोड़ने आया हूं, तोड़ने नहीं. भैया या किसी और से भी.’’ पिता ने बेटे की परिपक्वता और सकारात्मक सोच को मन से सराहा.

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‘‘पापा, मैं अपने बारे में क्या बताऊं, शुरू के 6 वर्षों में जो भोगा दुखदर्द उफ, उस का विवरण आप सुन न पाएंगे. सो, उसे छोड़ो. ‘‘जब मैं 12 वर्ष का हुआ तो एक दिन मैं ने देखा कि एक सरदारजी मुझ से बारबार मेरे बारे में पूछते हैं. मैं जान गया कि यह व्यक्ति मेरी कमजोरी और साहसिक सोच से प्रभावित है.

‘‘बस, एक रोज उस की गाड़ी में बैठ कर उस की कोठी पर चला गया. लगा, सुख की दुनिया में आ गया हूं.’’ ‘‘सरदारजी ने मुझ से सब से पहले कहा, ‘यहां तुम पूर्ण सुरक्षित हो, तुम्हें तुम्हारा टोला छू भी नहीं सकता.

‘‘वे एक व्यापारी थे. पर रहते अकेले थे. घर में नौकरचाकर थे और वो, बस.’’ ‘‘वहां मैं ने पाया न कोई मुझे हिज्जू कहता है, न ही मेरे चेहरेमोहरे को ले कर कोई ताना कसा जाता है.

‘‘मेरा स्कूल में ऐडमिशन हो गया. मैं पढ़ता गया जब 12वीं की तो उन के एक डाक्टर मित्र ने मुझ से पूछा, ‘बेटा, आप ठीक हो सकते हो किंतु आप को कुछ महीने मुंबई में गुजारने होंगे. क्या तुम तैयार हो?’ ‘‘डाक्टर साहब मुझे अपने साथ मुंबई ले गए. जहां सालभर मैं उन की देखरेख में रहा. सालभर में मैं ने महसूस किया कि मेरे चेहरे के पीछे एक पुरुष चेहरा छिपा है, मन में आत्मविश्वास आ गया था.

‘‘मैं काफी बदल गया था. लोग मुझ से बात करना पसंद करते थे. मैं ने महसूस किया जिंदगी बदगुमां नहीं है. कई बार मुझे लगता कि मैं वापस अपने घर दिल्ली आ जाऊं पर मैं ने सरदारजी से वादा किया था, ‘मैं मम्मीपापा के पास कुछ बन कर ही जाऊंगा.’

‘‘उस गौडफादर को मैं कभी नहीं भूलूंगा. मैं ने एनीमेशन इंजीनियरिंग की और कंप्यूटर पर कार्टून बनाने का काम करने लगा. ‘‘आज भी याद है सरदारजी की बात, ‘बेटा, जीवन एक युद्ध है. इसे हमें जीतना ही है. और जो जीतता है वही सिकंदर है.’

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‘‘उन का वह बातबात पर प्यार से समझाना आज तक याद है. पापा, जन्म तो आप ने मुझे दिया पर इस जीवन को तराशा सरदारजी ने. वे न मिलते तो मैं मिट्टी के ढेले सा मिट्टी में समा जाता.’’ सब सुन कर पिता की आंखें छलछला गईं. उन्होंने आसमान की तरफ देखा. ढेरों सितारें भी बेटे की कहानी सुन रहे थे और वहीं से शायद कह रहे थे, वैल डन पदम, सैल्यूट है तेरे जज्बे को.

जिंदगी बदगुमां नहीं : भाग 1

दिल्ली की आउटररिंग रोड पर भागते आटो में बैठा पदम उतावला हो रहा था, घर कब आएगा? कब सब से मिलूंगा.

आटो से बाहर झांका, सुबह का झुटपुटा निखरने लगा था. एअरपोर्ट से उस का घर 18 किलोमीटर होगा. यहां से उस के घर की दूरी एक घंटे में पूरी हो जाएगी और फिर वह अपने घर पर होगा. पूरे 22 बरस बाद लौटा है पदम. उसे मलकागंज का भैरोंगली चौराहा, घर के पास बना पार्क और उस के पास बरगद का मोटा पेड़ सब याद है. इन सब के सामने वह अचानक खड़ा होगा, कितना रोमांचक होगा. नहीं जानता, वक्त के साथ सबकुछ बदल गया हो. हो सकता है मम्मीपापा, भैया कहीं और शिफ्ट हो गए हों. उस ने 2 दशक से उन की खोजखबर नहीं ली. आंखें बंद कर के वह घर आने का इंतजार करने लगा.

22 बरस पहले की यादों की पोटली खुली और एक ढीठ बच्चा ‘छोटा पदम’ सामने खड़ा हुआ. हाथ में बैटबौल और खेल का मैदान, यही थी उस छोटे पदम की पहचान. कुशाग्रबुद्धि का था पदम. सारा महल्ला उसे ‘मलकागंज का गावस्कर’ के नाम से जानता था. एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाला यह बच्चा टीचर्स का भी लाड़ला था. किंतु वह अपनी मां को ले कर हैरान था. जहां जाता, मां साथ जाती. 9 बरस के पदम को मम्मी स्कूल के गेट तक छोड़ कर आती और वापसी में उसे वहीं खड़ी मिलती. यहां तक कि पार्क में जितनी देर वह बैटिंगफील्ंिडग करता, वहीं बैंच पर बैठ कर खेल खत्म होने का इंतजार करती.

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मां के इस व्यवहार से वह कई बार खीझ जाता, ‘मम्मी, मैं कोई बच्चा हूं जो खो जाऊंगा? आप हर समय मेरे पीछे घूमती रहती हो. मेरे सारे दोस्त पूरे महल्ले में अकेले घूमते हैं, उन की मांएं तो उन के साथ नहीं आतीं. फिर मेरे साथ यह तुम्हारा पीछेपीछे आना क्यों?’

मम्मी आंखों में आंसू भर कर कहती, ‘बस, कुछ साल बाद तू अकेला ही घूमेगा, मेरी जरूरत नहीं होगी.’ मां की यह बात उस की समझ से परे थी.

‘‘बाबूजी, आप तो दिल्ली निवासी हो?’’ आटो वाले सरदारजी ने उस की सोच पर शब्दकंकरी फेंकी. उस ने चौंक कर वर्तमान को पकड़ा, ‘‘हां, नहीं, मुझे दिल्ली छोड़े बहुत बरस हो गए.’’

‘‘बाबूजी, आप विदेश में रहते हो?’’ हां, यहां बस किसी से मिलने आया हूं.’’

‘‘अच्छा,’’ कह कर सरदारजी ने आटो की स्पीड बढ़ा दी. सच ही तो है…वह तो परदेसी बन गया था. याद आया 22 बरस पहले का वह मनहूस दिन. उस दिन क्रिकेट का मैच था. पार्क में सारे बच्चों को इकट्ठा होना था.

पदम को घर में छोड़ कर मम्मी बाजार चली गई थी. बाहर से ताला लगा था. पदम पार्क में जाने के लिए छटपटा रहा था कि तभी उस के दोस्त अनिल ने खिड़की से आवाज दी, ‘यार, तू यहां घर में बैठा है और हम सब तेरा पार्क में इंतजार कर रहे हैं.’ ‘कैसे आऊं, मम्मी बाहर से ताला लगा गई हैं.’

‘छत से कूद कर आ जा.’ ‘ठीक है.’

पड़ोस की छतों को पार करता पदम पहुंच गया पार्क में. उसे देखते ही सारे दोस्त खुशी से चिल्लाए, ‘आ गया, हमारा गावस्कर, आ गया. अब आएगा मैच का मजा.’ बस, फिर क्या था, जम गया मैदान में. बल्ला घूमा और 30 रन बटोर कर आ गया. आउट हो कर वह बैंच पर आ कर बैठा ही था कि अचानक पता नहीं कहां से एक व्यक्ति उस के पास आ बैठा. उस ने बड़ी आत्मीयता से उस के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘बेटा, क्रिकेट बहुत बढि़या खेलते हो. लो, इसी खुशी में चौकलेट खाओ. और उस ने हथेली फैला दी. पदम ने चौकलेट उठा कर मुंह में डाल ली. उस के बाद पता नहीं क्या हुआ?

होश आया तो महसूस हुआ कि वह अपनों के बीच नहीं है. जगह और आसपास बैठे लोग सब अनजाने हैं. वह किसी बदबूदार कमरे में गंदी सी जगह पर था. सड़ांध से उस का जी मिचला गया था. कुशाग्रबुद्धि का पदम समझ गया था उसे अगवा कर लिया गया है. लेकिन क्यों? उस ने सुना था कि पैसे वालों के बच्चों को अगवा किया जाता है. बदले में पैसा मांगा जाता है. सब जानते हैं कि उस के पिता एक साधारण से टीचर हैं. वे भला इन लोगों को पैसा कहां से देंगे? वह भी जानता है कि घर में बमुश्किल रोटीदाल चल पाती है. फिर उसे उठा कर इन लोगों को क्या मिलेगा? उस की समझ से परे था. वह घबरा कर रोने लगा था. 2 गुंडा टाइप मुश्टडों ने उसे घूरा, ‘चौप्प, साला भूखा है, तभी रो रहा है. वहीं बैठा रह.’

‘मुझे पापा के पास जाना है.’ ‘खबरदार, जो उस मास्टर का नाम लिया. बैठा रह यहीं पर.’

पदम वहीं बैठा रहा बदबूदार दरी पर. उसे उबकाई आ गई, सारी दरी उलटी से भर गई. सिर भन्ना गया उस का.

शाम होतेहोते उसे कहीं और शिफ्ट कर दिया गया. फिर तो हर 10-12 दिनों बाद उसे किसी और जगह भेज दिया जाता. 4 महीने में 10 जगहें बदली गईं. वह अकेला नहीं था, 3 बच्चे और थे उस के साथ. इस बीच न जाने कितनी ही रातें उस ने आंखों में बिताई थीं और कितनी बार वह मम्मीपापा को याद कर के रोया था. यहां उसे अपनों का चेहरा तो दिखा ही नहीं, सारे बेगाने थे.

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इंदौर, उदयपुर, जयपुर, शेखावटी न जाने कहांकहां उस को रखा गया. इन शहरों के गांवों में उसे रखा जाता जहां सिर्फ तकलीफ, बेज्जती और नफरत ही मिलती थी जिसे उस का बालमन स्वीकार नहीं करता था. इन सब से वह थक चुका था. तीव्रबुद्धि का पदम जानता था कि यह भागमभाग, पुलिस से बचने के लिए है. गंदे काम कराए जाते. गलती करने पर लातघूंसे, गाली और उत्पीड़न किया जाता था. रोटी की जगह यही सब मिलता था.

जब टोले वालों को ज्यादा गुस्सा आता तो उसे शौचालय में बंद कर दिया जाता. टोले के मुखिया की उसे सख्त हिदायत थी कि अपना असली नाम व शहर किसी को मत बताना और नाम तो हरगिज नहीं. टोले वालों ने उस को नया नाम दिया था पम्मी.

उदयपुर के गांव में उसे ट्रेनिंग दी गई. चोरी करना, जेब काटना, उठाईगीरी और लोगों को झांसा दे कर उन की कीमती चीजों को साफ करना. ये सब काम करने का उस का मन न करता, किंतु इसे न करने का विकल्प न था.

सुबहसवेरे होटल से लाई पावभाजी खा कर उसे व उस के साथियों

को रेलवेस्टेशन भीड़भाड़ वाले बजारों या रेडलाइट पर छोड़ दिया जाता. शाम को टोले का एक आदमी उन्हें इकट्ठा करता और पैदल वापस ले आता. याद है उसे, एक रोज उस ने अपने एक दोस्त से पूछा, ‘ये हम से गलत काम क्यों कराते हैं?’

‘अबे साले, हिज्जू से और क्या कराएंगे. हम हिजड़ों को यही सब करना पड़ता है.’ ‘ये हिज्जूहिजड़ा क्या होता है?’

‘तुझे नहीं पता, हम सब हिजड़े ही तो हैं. तू, मैं, कमल, दीपू सब हिजड़े हैं.’ ‘मतलब.’

‘हम सब न लड़का हैं न लड़की, हम तो बीच के हैं.’ वह बच्चा बड़ी देर तक विद्रूप हंसी हंसता रहा था, साथ में गंदे इशारे भी करता रहा था.

पदम को आज भी याद है, ये सब देख कर उसे भरी सर्दी में पसीना आ गया था. तनबदन में आग सी लग गई थी. यह क्या है? ऐसा क्यों हो रहा है? जिन लोगों के बीच वह पल रहा है वह हिजड़ों की मंडली है? कुशाग्रबुद्धि के पदम को काफीकुछ समझ में आ गया था. समझ गया था कि वह ऐसे चक्रवात में फंस गया है जहां से निकलना आसान नहीं है. उस रात उसे बड़े डरावने सपने आते रहे. अब तक तो आंखें बंद करता था तो मम्मी, पापा, राम भैया और मुन्ना अंकल सपनों में रहते थे पर उस दिन के बाद उसे डरावने सपने ही आते. वह चौंक कर आंखें खोल देता था.

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बस, इस सब के साथ एक आस थी, हो सकता है पापा या भैया उसे ढूंढ़ते हुए कहीं स्टेशन या शहर की रेडलाइट पर मिल जाएं. पर ऐसा कभी नहीं हुआ. वह यह सब सहतेसहते पत्थर हो गया था. दुख, घुटन, बेजारी, गाली, तिरस्कार, उस के जीवन के पर्याय हो गए थे. कई बार दुख की पराकाष्ठा होती तो जी करता रेल की पटरी पर लेट कर अपने जीवन का अंत कर ले. दूसरे ही पल सोचता, नहीं, मेरा जीवन इतना सस्ता नहीं है. वह 12 बरस का हो गया था. अब उसे अपने शरीर में कसाव और बेचैनी महसूस होती थी. लेकिन कौन उसे बताता कि यह सब उस के साथ क्यों हो रहा है? खुले आसमान के नीचे बैठ कर अपनी बेनामी मजबूरी पर उसे आंसू बहाना अच्छा नहीं लगता था.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

जिंदगी बदगुमां नहीं : भाग 2

वहां उस का अपना कोई भी तो न था जिस के साथ वह सब साझा करता. लेदे कर बड़ी बूआ (केयरटेकर) थी. उस के आगे वह अकसर दिल खोलता था तो वह समझती, ‘बेटा यह नरक है, यहां सब चलतेफिरते मुरदे हैं. नरक ऐसा ही होता है. इस नरक में कोई नहीं, जिस से तू अपना दर्द बांट सके. मैं तेरी छटपटाहट को समझती हूं. तू यहां से निकलभागने को बेताब है. पर ध्यान रहे टोले वाले बड़े निर्दयी होते हैं. पकड़ा गया तो हाथपैर काट कर सड़क पर छोड़ देंगे भीख मांगने को. तब तेरी हालत बद से बदतर हो जाएगी.’

बूआ की बात सुन वह डर तो गया था पर हां, अगले ही पल उस का निश्चय, ‘कुछ तो करना पड़ेगा’ और दृढ़ हो गया. उसे अपनी इच्छाशक्ति पर कभीकभी हैरानी होती कि क्यों वह इतना खतरा मोल ले रहा है. ‘नहीं, कुछ तो करना होगा, यह सब नहीं चलेगा.’ यह सच था कि उसे अब दर्द सहने की आदत पड़ गई थी, पर और दर्द वह नहीं सहेगा. ‘बस, और नहीं.’

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याद है उसे अहमदाबाद की वह रेडलाइट और सरदारजी की लाल गाड़ी. जब भी सरदारजी की लाल गाड़ी रुकती, वह ड्राइविंग सीट पर बैठे सरदारजी के आगे हाथ फैला देता. वे मुसकरा कर रुपयादोरुपया उस की हथेली पर रख देते. एक रोज सरदारजी ने पूछा, ‘क्या नाम है तुम्हारा?’

‘पम्मी.’ ‘पढ़ते हो?’

‘नहीं.’ ‘पढ़ना चाहते हो?’

‘साब, हम भिखारियों का पढ़नालिखना कहां?’ ‘पढ़ना चाहोगे? तुम्हारी जिंदगी बदल जाएगी. ऐसे तो बेटा, जिंदगी इस रेडलाइट की तरह बुझतीजलती रहेगी.’

उसे लगा, किसी ने थपकी दी है. एक दिन उस ने सरदारजी को वहीं खड़ेखड़े संक्षिप्त में सब बता दिया.

‘अगर छुटकारा पाना है तो कल मुझे यहीं मिलना.’ गाड़ी चली गई. उस का दिल धड़का. बस, यही मौका है. यह सोच वह अगले दिन सरदारजी की गाड़ी में फुर्र हो गया.

‘‘अरे बाबूजी, मलकागंज तो आ गया. ‘‘पर भैरोंगली…आप किसी से पूछ लो.’’ आटो वाले ने अचानक उस के सोचने का क्रम तोड़ा.

वह वर्तमान से जुड़ गया. ‘‘ओह, ठहरो, मैं उस सामने खड़े पुलिस वाले से पूछता हूं.’’ पुलिस वाले ने फौरन पूछा, ‘‘किस के घर में जाना है?’’

‘‘भैरोगली में शिशिर शर्मा के घर.’’ ‘‘सीधे चले जाओ, आखिरी घर शिशिर बाबू का ही है.’’

पदम की आंखें चमक उठीं. आखिर, उस ने अपना घर ढूंढ़ ही लिया. अगले पल वह अपने घर के दरवाजे पर था. एकटक घर को देख रहा था या कहें, घर उसे देख रहा था.

सामने बाउंड्रीवाल से सटा नीम का पेड़, घर की छत को छूती मालती की बेल…सब कितने बड़े हो गए हैं. पर सब वही हैं कुछ भी तो नहीं बदला. वह सब तो है किंतु यदि भैया, पापा ने उसे न पहचाना तो… डोरबैल पर कांपती उंगली रखी तो अंदर से आवाज आई. ‘‘ठहरो, आ रहा हूं.’’

यह आवाज पापा की नहीं है. कोई और ही होगा. दरवाजा खुला. एक अति बूढ़ा व्यक्ति सामने था. ‘‘कौन हो तुम, किस से मिलना है?’’ पहचान गया ये मुन्ना बाबू थे. पापा के बचपन के दोस्त.

‘‘मैं पदम हूं. शिशिर बाबू का बेटा.’’ ‘‘शिशिर बाबू का तो एक ही बेटा है राम और वह भी अमेरिका में है. वैसे, शिशिर घर पर नहीं हैं, पत्नी के साथ बाहर गए हैं. थोड़ी देर बाद आएंगे.’’

इतना कह कर उन्होंने भड़ाक से दरवाजा बंद कर लिया. कैसी विडंबना थी, अपने ही घर के दरवाजे पर वह अजनबियों की भांति खड़ा है. वह वहीं बरामदे में पड़ी कुरसी पर बैठ गया कि सामने से मम्मीपापा को आते देखा. वह दौड़ कर मां से चिपट गया. ‘‘मम्मी…’’

मम्मी को जैसे उसी का इंतजार था. कहते हैं, मां अपने बच्चे को पहचानने में कभी गलती नहीं करती चाहे बच्चा कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए. मां का स्पर्श बरसों बाद. कितना सुखदायी था वह क्षण.

‘‘अरे, तुम कौन हो?’’ अचानक शिशिर बाबू बोले. ‘‘अरे राम के पापा, ये अपना पदम. हमारा छोटा बेटा,’’ रुंधे गले से शिशिर बाबू की पत्नी रेवा ने कहा.

‘‘ओ, तुम तो ऐसे ही सब को गले लगा लेती हो. जाओ, अंदर जाओ,’’ वे गुस्से में दहाड़े, ‘‘पता नहीं कौन अनजान पदम बन कर हमें बेवकूफ बना रहा है.’’ इसी क्षण घर का दरवाजा खुला. मुन्ना बाबू भी इस दृश्य में शामिल हो गए. ‘‘अभी कुछ देर पहले यही लड़का आया था. मैं ने भी इसे टाल दिया था. कहता था, ‘मैं पदम हूं.’ रेवा भाभी ठीक कह रही हैं, यह शायद पदम ही है.’’ अब मुन्ना बाबू भी उसे पहचान गए थे, ‘‘यह तेरा वही छोटा बेटा है जो गुम हो गया था. 22 साल पहले.’’

‘‘ओह…’’ गला उन का भी रुंध गया था. रेवा ने बेटे को कस कर गले से लगा लिया. कभी माथा चूमती, कभी तन पर हाथ फेरती. पगली मां की आंखों से खुशी से गंगाजमुना बह रही थी.

शिशिर बाबू भी अपने को रोक न सके. निशब्द मांबाप की ममता से उस की झोली भरती रही.

शिशिर बाबू के कानों में डाक्टर की कही वह बात अभी भी गूंज रही थी. पदम के जन्म पर उस ने कहा था, ‘आप का बेटा शिखंडी है. बचा कर रखना इसे. शिखंडियों का टोला ऐसे बच्चों को चुपचाप अगवा कर लेता है. पतिपत्नी उस की बड़ी सावधानी से देखभाल करते. पर वही हुआ जिस का डर था. काफी सतर्कता के बाद भी पदम को अगवा कर लिया गया.

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पुलिसथाना, पेपर में ‘मिसिंग है’ का विज्ञापन छपवाया. इस सब के बावजूद कुछ न हुआ. हर सुबह रेवा पति से पूछती, ‘कुछ पता लगा?’ वे सिर झुका कर इनकार कर देते.

बेटे को याद कर रेवा अकसर रोती. मुन्ना समझाता, ‘भाभी, मुझे विश्वास है हमारा पदम एक दिन हमें जरूर वापस मिलेगा.’ महीने, साल, दशक बीत गए.

मुन्ना को लगता था, शिशिर ने बच्चे को ढूंढ़ने का विशेष प्रयास नहीं किया वरना पता तो जरूर लगता. पदम का मुन्ना से सिर्फ पापा के दोस्त का नाता था. पर मुन्ना इस घर का खास आदमी माना जाता था. वह घर की राईरत्ती जानता था.

रेवा को रोते देख उस का दिल भर आता परंतु शिशिर की पदम के लिए ठंडी सोच उन से छिपी न थी. एक दिन पत्नी को रोते देख आखिर शिशिर को गुस्सा आ ही गया, ‘छोड़ो, रोनाधोना. अब राम के भविष्य, उस के कैरियर पर ध्यान दो. मैं सब भूल कर राम के लिए सोचने लगा हूं. मेरा सपना है राम को अमेरिका भेजना.’

यह सुन कर मुन्ना से रहा न गया, ‘शिशिर, सच तो कुछ और ही है. वह सुनना चाहते हो? सच यह है कि तू राम को ले कर धृतराष्ट्र बन गया है. राम को ले कर तू इतना महत्त्वाकांक्षी बन गया है कि भाभी के आंसुओं और ममता की परवा भी नहीं है तुझे. लगता है पदम आ जाएगा तो राम के अमेरिका जाने का सपना कहीं खटाई में न पड़ जाए.

‘दूसरा सच यह भी है कि तू एक हिजड़े का बाप कहलाने से बचना चाहता है. ‘पिछले 10 बरसों में कितनी ही बार पता लगा कि फलां जगह लोगों ने पदम को देखा था पर तू चुप बैठ गया. तेरी इस शीत प्रतिक्रिया ने भाभी को बहुत ज्यादा दुखी किया है.

‘अरे, तू क्या जाने मां का दिल कैसा फटता है. लानत है ऐसे पत्थर दिल बाप पर.’ मुन्ना ने जो कहा वह सब सच था.

शिशिर उस दिन मुंह छिपा कर चला गया था. डरता था कि कहीं मुन्ना की बात से उस का निश्चय डगमगा न जाए.

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लेकिन उस के निश्चय से राम को अमेरिका भेजने का सपना पूरा हो ही गया. यद्यपि उस के जीवन की सारी जमा पूंजी दावं पर लग गई थी, फिर भी वह खुश था. राम को अमेरिका गए पूरे 5 साल हो गए हैं. इस बीच राम का असली चेहरा सब के सामने आ गया था.

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घर में दफ्न 4 लाशें

घर में दफ्न 4 लाशें : भाग 3

नरेंद्र ने विजय के सामने ससुर की सारी संपत्ति की पोल खोल दी, जिस से उस के मन में भी लालच पैदा हो गया. नरेंद्र के इशारे पर उस ने हीरालाल की मंझली बेटी पार्वती पर निगाहें गड़ा दीं. लेकिन पार्वती समझदार थी. विजय के लाख कोशिश करने के बाद भी वह उस के प्रेम जाल में नहीं फंसी. यह बात नरेंद्र को पता चली तो उस के मन में हीरालाल की पूरी संपत्ति हड़पने का लालच आ गया.

संपत्ति के लालच में वह ससुर के साथसाथ बाकी लोगों को भी मौत के घाट उतारने के लिए षडयंत्र रचने लगा. लेकिन वह अपनी योजना में सफल नहीं हो पा रहा था. उसे पता लग गया था कि विजय पार्वती को पटाने में असफल रहा. इस पर उस ने विजय से कहा कि पार्वती ने यह बात अपने पापा को बता दी तो वह मोहल्ले में नहीं रह पाएगा.

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नरेंद्र की बात सुन विजय घबरा गया. इस के बाद विजय नरेंद्र की हां में हां मिलाने लगा. अपना अगला दांव चलते हुए नरेंद्र अपने घर पर विजय की दावत करने लगा. खातेपीते एक दिन नरेंद्र ने लालच दे कर विजय को अपनी योजना बता दी.

नरेंद्र ने विजय के साथ मिल कर 17 अप्रैल, 2019 को अपने ससुराल वालों की हत्या की योजना को अंतिम रूप दे दिया. योजना बन गई तो नरेंद्र बीवीबच्चों को अपने फूफा के घर देवरनियां, बरेली में छोड़ आया ताकि उन्हें उस की साजिश का पता न चल सके.

बीवीबच्चों को बरेली भेजने के बाद नरेंद्र अपनी योजना को अंजाम देने के लिए मौके की तलाश में लग गया. लेकिन उसे मौका नहीं मिल पा रहा था. नरेंद्र और विजय को यह भी डर था कि अगर किसी वजह से वह इस योजना में फेल हो गए तो न घर के रहेंगे न घाट के.

नरेंद्र को पता था कि उस की सास सुबहसुबह दूध लेने जाती है. उस वक्त ससुर और दोनों सालियां सोई रहती हैं. घर का गेट खुला रहता है. पड़ोसी भी सोए होते हैं. घटना को अंजाम देने के लिए नरेंद्र को यह समय ठीक लगा.

20 अप्रैल, 2019 को नरेंद्र गंगवार और विजय गंगवार सुबह जल्दी उठ गए और हेमवती के जाने का इंतजार करने लगे. उस दिन हेमवती सुबह के साढ़े 5 बजे बेटी पार्वती को साथ ले कर दूध लेने के लिए निकली. उन के घर से निकलते ही नरेंद्र विजय को साथ ले कर हीरालाल के घर में घुस गया.

लेकिन तब तक हीरालाल सो कर उठ चुके थे. सुबहसुबह उन दोनों को अपने घर में देख हीरालाल ने आने का कारण पूछा तो नरेंद्र ने कहा कि आज मैं आखिरी बार आप से पूछने आया हूं कि मेरे हिस्से की संपत्ति मुझे देते हो या नहीं.

सुबहसुबह दामाद के मुंह से ऐसी बात सुन कर हीरालाल का पारा चढ़ गया. दोनों के बीच विवाद बढ़ा तो योजनानुसार नरेंद्र ने वहीं रखी लकड़ी की फंटी से पीटपीट कर हीरालाल की हत्या कर दी. पिता के चीखने की आवाज सुन कर बेटी दुर्गा उन के बचाव में आई तो दोनों ने उसे भी फंटी से पीटपीट कर मार डाला.

दोनों को मौत की नींद सुलाने के बाद नरेंद्र और विजय हेमवती और पार्वती के आने का इंतजार करने लगे. जैसे ही उन दोनों ने घर में प्रवेश किया, दरवाजे के पीछे खड़े नरेंद्र और विजय ने उन्हें भी पीटपीट कर मार डाला.

सासससुर और दोनों सालियों की हत्या करने के बाद नरेंद्र और विजय ने चारों को घसीट कर एक कमरे में ले जा कर डाल दिया. कहीं कोई जिंदा तो नहीं रह गया, जानने के लिए दोनों ने एकएक कर सब की नब्ज चैक की.

जब उन्हें पूरा यकीन हो गया कि चारों की मौत हो चुकी है, तो दोनों ने मकान में फैले खून को धो कर साफ किया और घर के बाहर ताला डाल कर घर लौट आए. नरेंद्र और विजय ने चारों की हत्या तो कर दी, लेकिन समस्या थी लाशों को ठिकाने लगाने की. नरेंद्र जानता था कि लाशों को घर से बाहर ले जाना खतरे से खाली नहीं है.

सोचविचार कर दोनों ने तय किया कि बाजार से प्लास्टिक बैग ला कर लाशों को उस में लपेटा जाए और घर में गड्ढा खोद कर दफना दिया जाए. संभावना थी कि पौलीथिन में लिपटी होने से लाशों के सड़ने की बदबू बाहर नहीं आ पाएगी.

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20 अप्रैल, 2019 को ही नरेंद्र बाजार से पौलीथिन खरीद कर लाया. उसी रात दोनों ने हीरालाल के मकान में जा कर चारों लाशों को पैक कर दिया. अगले दिन 21 अप्रैल, 2019 को सुबह नरेंद्र विजय को साथ ले कर ससुर के घर गया. फिर अपनी योजना के मुताबिक दोनों ने जीने के नीचे गड्ढा खोदना शुरू किया.

कुछ पड़ोसियों ने नरेंद्र से हीरालाल के घर में अचानक काम कराने के बारे में पूछा तो नरेंद्र ने कहा कि ससुर मकान बेच कर कहीं दूसरी जगह चले गए. घर में रिपेयरिंग का काम चल रहा है. वैसे उस मोहल्ले में नरेंद्र से कोई ज्यादा मतलब नहीं रखता था.

नरेंद्र ने विजय के साथ मिल कर लगभग 6 घंटे में गहरा गड्ढा खोदा. उस के बाद दोनों ने प्लास्टिक की शीट में पैक चारों लाशें गड्ढे में डाल दीं. लाशों को गड्ढे में दफन कर दोनों ने वहां पर पक्का फर्श बना दिया. नरेंद्र ने हीरालाल के घर के मुख्य दरवाजे पर ताला डाल दिया.

हीरालाल के घर पर अचानक ताला पड़ा देख लोगों को हैरत जरूर हुई. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि हीरालाल रात ही रात में अपने परिवार को ले कर अचानक कहां गायब हो गए. लेकिन नरेंद्र से किसी ने भी पूछने की हिम्मत नहीं की थी.

अपने सासससुर और सालियों को ठिकाने लगा कर नरेंद्र अपने बीवीबच्चों को भी घर ले आया. घर आते ही लीलावती की नजर पिता के मकान की ओर गई, जहां पर ताला पड़ा था. लीलावती ने नरेंद्र से उन के बारे में पूछा, तो उस ने बताया कि उस के पिता अपना मकान बेच कर हल्द्वानी चले गए हैं. उन्होंने वहां पर अपना प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया है.

यह सुन कर लीलावती चुप हो गई. मातापिता के बारे में नरेंद्र से ज्यादा पूछने की हिम्मत उस में नहीं थी. अगर नरेंद्र संपत्ति हड़पने के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में जल्दबाजी न करता तो यह राज शायद राज ही बन कर रह जाता.

इस केस के खुलते ही पुलिस ने आरोपी नरेंद्र गंगवार और विजय गंगवार को भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया था.

चारों शव पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने उन के रिश्तेदार दुर्गा प्रसाद को सौंप दिए. उन का दाह संस्कार बरेली के गांव पैगानगरी के पास भाखड़ा नदी किनारे किया गया.

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नरेंद्र गंगवार इतना शातिर दिमाग इंसान था कि इस केस में उस ने दुर्गा प्रसाद को भी फंसाने की कोशिश की. लेकिन सच्चाई सामने आते ही पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. हालांकि इस केस की रिपोर्ट दुर्गा प्रसाद की ओर से ही दर्ज कराई गई थी. पुलिस ने लीलावती से पूछताछ करने के बाद उसे छोड़ दिया. वह नरेंद्र के फूफा के साथ बहेड़ी चली गई थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

घर में दफ्न 4 लाशें : भाग 2

हीरालाल जिला बरेली के गांव पैगानगरी के रहने वाले थे. उन का परिवार सुखीसंपन्न था. गांव में उन की करीब 60 बीघा जुतासे की जमीन थी. उन की 3 बेटियां थीं.

लीलावती उर्फ लवली, पार्वती और सब से छोटी दुर्गा. पत्नी हेमवती सहित घर में कुल 5 सदस्य थे. हीरालाल की एक ही परेशानी थी कि उन का कोई बेटा नहीं था.

हीरालाल ने बेटे की चाह में काफी हाथपांव मारे. वह कई डाक्टरों और तांत्रिकों से मिले, लेकिन उन की बेटा पाने की इच्छा पूरी न हो सकी.

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अंतत: उन्होंने अपना पूरा ध्यान बेटियों की परवरिश में लगा दिया. बेटियां समझदार हुईं तो हीरालाल ने सोचा कि उन्हें अच्छी शिक्षा दिलानी चाहिए. लेकिन गांव में रहते यह संभव नहीं था.

सोचविचार के बाद हीरालाल ने सन 2007 में अपनी खेती की जमीन में से 44 बीघा जमीन बेच दी. उस पैसे को ले कर वह अपने परिवार के साथ रुद्रपुर की राजा कालोनी में आ बसे. वहीं उन्होेंने अपना मकान बना लिया.

रुद्रपुर आ कर हीरालाल ने अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए तीनों बेटियों का अच्छे स्कूल में दाखिला करा दिया था.

बेटियों की तरफ से निश्चिंत हो कर हीरालाल ने बाकी बचे पैसों से प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू कर दिया. जमीन के पैसों से उन्होंने घर के आसपास कई प्लौट खरीद कर डाल दिए. उसी दौरान हीरालाल की मुलाकात नरेंद्र गंगवार से हुई.

नरेंद्र रामपुर जिले के गांव खेड़ासराय का रहने वाला था. वह उसी मोहल्ले में किराए के मकान में रहता था और सिडकुल की एक फैक्ट्री में काम करता था. उस ने हीरालाल से एक प्लौट खरीदने की इच्छा जाहिर की.

हीरालाल ने उसे अपने घर के सामने पड़ा प्लौट दिखाया तो वह नरेंद्र को पसंद आ गया. नरेंद्र ने वह प्लौट खरीद लिया. प्लौट लेने के बाद नरेंद्र की हीरालाल से जानपहचान हो गई. वह उन के संपर्क में रहने लगा. इसी बहाने वह हीरालाल के घर भी आनेजाने लगा.

इसी बीच नरेंद्र की नजर हीरालाल के बड़ी बेटी लीलावती पर पड़ी. लीला देखनेभालने में सुंदर थी और उस समय पढ़ रही थी. वह जब भी हीरालाल के घर जाता तो उस की निगाहें लीला पर टिकी रहती थीं.

लीला नरेंद्र के बारे में पहले ही सब कुछ जान चुकी थी. जब उस ने नरेंद्र को अपनी ओर आकर्षित होते देखा तो उस के दिल में भी चाहत पैदा हो गई. जल्दी ही दोनों प्रेम की राह पर चल निकले.

लीला स्कूल जाती तो नरेंद्र घंटों उस की राह तकता रहता. उस के स्कूल जाने का फायदा उठा कर वह घर के बाहर ही मिलने लगा. प्रेम बेल फलीफूली तो मोहल्ले वालों की नजरों में किरकरी बन कर चुभने लगी.

दोनों की प्रेम कहानी हीरालाल के सामने जा पहुंची तो बेटी की करतूत सुन कर उन्हें बहुत दुख हुआ. हीरालाल ने लीला को समझाया और नरेंद्र के घर आने पर पाबंदी लगा दी. लेकिन मोबाइल फोन के होते नरेंद्र और लीला के मिलने में किसी तरह की अड़चन नहीं आई. दोनों चोरीछिपे मिलते रहे.

प्रेम कहानी के चलते लीला ने सन 2008 में घर वालों को बिना बताए नरेंद्र से लव मैरिज कर ली. नरेंद्र के साथ शादी करने के बाद लीला उस के साथ किराए के मकान में रहने लगी.

बेटी की इस करतूत से हीरालाल और उन की पत्नी हेमवती दोनों को ही आघात पहुंचा था. उन्होंने बेटी लीला से संबंध खत्म कर दिए.

लेकिन हेमवती मां थी. बच्चों के लिए मां का दिल कोमल होता है. लीलावती ने नरेंद्र से शादी कर भले ही अपनी दुनिया बसा ली थी, लेकिन मां होने के नाते हेमवती उस के लिए परेशान रहने लगी थी. जब उस से बेटी के बिना नहीं रहा गया तो वह पति को बिना बताए उस से मिलने लगी.

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जब कभी वह घर में कुछ अच्छा बनाती, तो चुपके से लीला को दे आती थी. साथ ही वह उस की आर्थिक मदद भी करने लगी थी. यह बात हीरालाल को भी पता चल गई थी. शुरूशुरू में तो इस बात को ले कर मियांबीवी में विवाद होने लगा. लेकिन हीरालाल भी दिल के कमजोर थे. बेटी की परेशानी को देखते हुए उन का दिल भी पसीज गया.

शादी के कुछ समय बाद ही हीरालाल ने नरेंद्र को अपने दामाद के रूप में स्वीकार कर लिया. हीरालाल और हेमवती दोनों को अपने घर ले आए. इस के बाद नरेंद्र और लीला हीरालाल के मकान में रहने लगे.

उसी दौरान नरेंद्र कई बार हीरालाल के साथ उन के गांव पैगानगरी भी गया था. गांव में हीरालाल का मकान था. साथ ही उन की 16 बीघा जमीन भी थी, जिसे उन्होंने बंटाई पर दे रखा था. उस जमीन से उन्हें हर साल इतना रुपया मिल जाता था कि उन के परिवार की जरूरतें पूरी हो जाती थीं, प्रौपर्टी खरीदबेच कर जो कमाते थे वह अलग था.

ससुर के साथ रहते हुए नरेंद्र उन की एकएक बात अपने दिमाग में बैठा लेता था. मातापिता के घर पर रहते हुए लीलावती 2 बेटियों और 2 बेटों की मां बनी.

हीरालाल के घर पर रहते हुए नरेंद्र नौकरी के साथसाथ उन के काम में भी हाथ बंटाने लगा था. हालांकि नरेंद्र के चारों बच्चों का खर्च हीरालाल ही उठाते थे. इस के बावजूद वह अपने खर्च के लिए हीरालाल से पैसे ऐंठता रहता था.

अभी हीरालाल की 2 बेटियां शादी के लिए बाकी थीं. वह चाहते थे कि दोनों बेटियां बड़ी की तरह कोई कदम न उठाएं. यही सोच कर वह टाइम से उन की शादी कर देना चाहते थे.

लेकिन जब से नरेंद्र दामाद बन कर घर में आया था, सालियों को फूटी आंख नहीं देखना चाहता था. वह तेजतर्रार और चालाक था. लीला से शादी कर के उस की निगाह हीरालाल की संपत्ति पर जम गई थी.

उसी दौरान उस ने हीरालाल पर दबाव बनाना शुरू किया कि उस के हिस्से की संपत्ति उस के नाम करा दें. लेकिन हीरालाल ने साफ कह दिया कि जब तक दोनों बेटियां विदा नहीं हो जातीं, वह अपनी संपत्ति का बंटवारा नहीं करेंगे.

हीरालाल जब नरेंद्र की हरकतों से परेशान हो गए तो उन्होंने नरेंद्र के प्लौट पर मकान बनवा दिया. इस के बाद नरेंद्र अपने बीवीबच्चों को साथ ले कर नए मकान में चला गया.

हीरालाल ने सोचा था कि नरेंद्र अपने घर जाने के बाद सुधर जाएगा. लेकिन घर आमनेसामने होने की वजह से उस के बीवीबच्चे तो हीरालाल के घर पर पड़े ही रहते थे, वह भी आ कर बदतमीजी पर उतर आता था. लेकिन ससुर होने के नाते हीरालाल सब कुछ सहन करते रहे.

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उसी दौरान नरेंद्र ने अपने मकान में विजय नाम का एक किराएदार रख लिया. विजय गंगवार जिला बरेली के गांव दमखोदा का रहने वाला था. नरेंद्र विजय गंगवार से पहले से ही परिचित था. सो दोनों में खूब पटने लगी. विजय गंगवार कुंवारा था.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

घर में दफ्न 4 लाशें : भाग 1

25 अगस्त, 2020 को नरेंद्र गंगवार अपने ससुर हीरालाल के पैतृक गांव पैगानगरी पहुंचा. यह गांव बरेली जिले की तहसील मीरगंज में आता है. गांव के दुर्गाप्रसाद नरेंद्र को जानते थे, इसलिए वह उन्हीं से मिला. नरेंद्र के ससुर हीरालाल दुर्गाप्रसाद के नाना थे.

पैगानगरी में हीरालाल की 16 बीघा जमीन थी जो उन्होंने बटाई पर दे रखी थी. वह खेती की पैदावार का हिस्सा लेने गांव आते रहते थे. नरेंद्र बटाई का हिस्सा लेने आया था. साथ ही उसे इस से भी बड़ा एक और काम था. दुर्गा प्रसाद नरेंद्र को जानते थे. वह कई बार अपने ससुर के साथ गांव आया था.

इस पर नरेंद्र ने कहा, ‘‘दुर्गा प्रसादजी, बहुत दुखद खबर है. आप के नाना हीरालालजी अब इस दुनिया में नहीं रहे. 22 अप्रैल, 2020 को हीरालालजी और उन की मंझली बेटी दुर्गा ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली थी. लौकडाउन के चलते हम किसी को उन की मृत्यु की खबर नहीं दे पाए.

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कोरोना महामारी के चलते मैं ने अपनी बीवी लीलावती, किराएदार विजय व अन्य लोगों के सहयोग से उन का दाहसंस्कार करा दिया था.

बाद में पति के वियोग में उन की पत्नी हेमवती भी बेटी पार्वती को ले कर कहीं चली गईं. मैं ने और लीलावती ने उन्हें सब जगह ढूंढा, लेकिन उन का कहीं पता न चल सका.’’

हीरालाल की मृत्यु की खबर सुन कर दुर्गा प्रसाद को झटका लगा.

दुर्गाप्रसाद के पास गांव के कई लोग बैठे थे. यह खबर सुन कर सब हैरत में रह गए. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि जो इंसान अपनी औलादों के सुनहरे भविष्य के लिए गांव छोड़ शहर जा बसा था, वह कायरों की तरह आत्महत्या कर लेगा.

हीरालाल की मृत्यु की खबर सुन कर गांव के लोग तरहतरह की बातें करने लगे. दुर्गाप्रसाद और गांव वालों की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि जब पति और बेटी खत्म हो गई तो हेमवती को छोटी बेटी को ले कर कहीं जाने की क्या जरूरत थी? गांव में उस के पति की 16 बीघा जमीन थी, जिस के सहारे आराम से दोनों की जिंदगी चल जाती. गांव में उन का अपना मकान भी था.

नरेंद्र ने अपने आने का मकसद बताते हुए कहा, ‘‘ससुर के घर के पास ही मेरा भी मकान है. उन के मकान पर एकमात्र बची उन की बेटी लीलावती का मालिकाना हक है. मैं उस मकान को लीलावती के नाम कराना चाहता हूं, लेकिन इस के लिए मुझे हीरालालजी के मृत्यु प्रमाण पत्र की जरूरत है. आप लोग उन के परिवार के लोग हो, आप यह काम करा सकते हैं.’’

नरेंद्र की बात सुन कर दुर्गा प्रसाद का दिमाग घूम गया. उन्हें नरेंद्र की बात में कुछ झोल नजर आया. दुर्गा प्रसाद ने उसी समय हीरालाल के बटाईदार कुंवर सैन के घर जा कर उन्हें सारी बात बताई और नरेंद्र की बातों पर शक जाहिर किया.

कुंवर सैन ने उसे बटाई का हिस्सा देने से साफ मना कर दिया. साथ ही दुर्गा प्रसाद ने लिखित में कुछ देने से भी इनकार कर दिया. नरेंद्र खाली हाथ लौट गया.

नरेंद्र की बातों पर शक हुआ तो दुर्गा प्रसाद हीरालाल के बटाईदार कुंवर सैन को साथ ले कर 27 अगस्त, 2020 को उन की मौत की सच्चाई जानने के लिए रुद्रपुरट्रांजिट कैंप पहुंचे. वहां हीरालाल के घर पर ताला लगा मिला.

उन्होंने पड़ोसियों से उन के बारे में जानकारी लेनी चाही तो पता चला कि हीरालाल के घर पर पिछले 15 महीने से ताला लटका हुआ है. इस दौरान उन्होंने कभी भी हीरालाल और उन के परिवार वालों को आतेजाते नहीं देखा.

यह जान कर दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन को हैरानी हुई, क्योंकि नरेंद्र ने उन्हें बताया था कि हीरालाल ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली थी. लेकिन उस के पड़ोसियों को इस की जानकारी नहीं थी.

नरेंद्र का झूठ सामने आया तो दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन समझ गए कि हीरालाल की संपत्ति हड़पने की मंशा के चलते नरेंद्र ने ही कोई चक्रव्यूह रच कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया होगा.

हीरालाल के परिवार के साथ किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन उसी दिन ट्रांजिट कैंप थाने पहुंच गए. उन्होंने यह बात थानाप्रभारी ललित मोहन जोशी को बताई.

मामला एक ही परिवार के 4 लोगों के लापता होने का था, इसलिए जोशीजी ने इसे गंभीरता से लिया. दुर्गाप्रसाद और कुंवर सैन से जरूरी जानकारी ले कर जोशी ने उन्हें घर भेज दिया. फिर थानाप्रभारी जोशी ने इस मामले की सच्चाई जानने के लिए गुप्तरूप से जांचपड़ताल करानी शुरू की. सादे कपड़ों में जा कर उन्होंने नरेंद्र गंगवार को कब्जे में लिया, ताकि वह फरार न हो सके.

थानाप्रभारी ललित मोहन जोशी ने नरेंद्र से हीरालाल और उन के परिवार के सदस्यों के बारे में कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में नरेंद्र शुरूशुरू में इधरउधर की कहानी गढ़ता रहा. लेकिन जब पुलिस की सख्ती बढ़ी तो उस का धैर्य जवाब दे गया. उस के बाद उस ने अपनी ससुराल वालों की हत्या की बात स्वीकार कर ली. उस ने यह काम अपने किराएदार विजय की मदद से किया था.

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नरेंद्र गंगवार ने बताया कि 20 अप्रैल, 2019 को सुबह साढ़े 5 बजे उस ने विजय के साथ मिल कर सासससुर और 2 सालियों को डंडे से मार कर मौत के घाट उतारा था. फिर गड्ढा खोद कर उन की लाशों को उन्हीं के मकान में दफन कर दिया था.

नरेंद्र द्वारा 4 लोगों की हत्या कर घर में ही दफनाने वाली बात सामने आई तो थानाप्रभारी भी आश्चर्यचकित रह गए. उन्होंने इस की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. साथ ही तत्परता दिखाते हुए थानाप्रभारी ने नरेंद्र के सहयोगी उस के किराएदार विजय को अपनी हिरासत में ले लिया.

अधिकारियों ने थाना ट्रांजिट कैंप के साथसाथ थाना पंतनगर, थाना रुद्रपुर और थाना किच्छा से भी पुलिस टीम बुला ली. देखतेदेखते आजादनगर की मुख्य सड़क पुलिस छावनी में तब्दील हो गई.

आजादनगर के आसपास के लोग इतनी पुलिस को देख हैरत में पड़ गए. एसएसपी दिलीप सिंह व आईजी (कुमाऊं) अजय कुमार रौतेला भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे.

पुलिस ने नरेंद्र की निशानदेही पर मजिस्ट्रैट की मौजूदगी में 4 मजदूरों को लगा कर खुदाई शुरू कराई. लगभग 2 घंटे बाद पुलिस लाश तक पहुंची. साढ़े 4 फीट की गहराई में एक के ऊपर एक 4 लाशें पड़ी मिलीं, जो प्लास्टिक बैग में पैक थीं.

इस हृदयविदारक दृश्य को देख लोगों के होश उड़ गए. किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि जो उन के सामने है वह सच है. पुलिस ने प्लास्टिक बैग को खोल कर लाशों की जांचपड़ताल की. लाशों को देख कर पुलिस हैरान थी, क्योंकि सभी लाशें अच्छी हालत में थीं.

पुलिस को उम्मीद थी कि 15 महीनों के लंबे अंतराल के दौरान लाशें कंकाल में बदल गई होंगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. उसी गड्ढे से पुलिस ने लकड़ी के डंडे के आकार की एक फंटी बरामद की. नरेंद्र ने उसी फंटी से चारों को मारने की बात स्वीकार की.

घटनास्थल पर पहुंची फोरैंसिक टीम ने सैंपल एकत्र किए, जिन्हें जांच के लिए सुरक्षित रख लिया गया.

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पुलिस ने चारों लाशें कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं. मामले की गंभीरता को देखते हुए 4 डाक्टरों के पैनल से लाशों का पोस्टमार्टम कराया गया. साथ ही वीडियोग्राफी भी कराई गई. यह कुमाऊं का पहला ऐसा सनसनीखेज  मामला था, जिस ने पूरे प्रदेश में तहलका मचा दिया था.

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