Manohar Kahaniya: धोखाधड़ी की वजह से जेल पहुंची महात्मा गांधी की परपोती

सौजन्य- मनोहर कहानियां

महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से निकलने वाले अपने अखबार की जिम्मेदारी अपने एक बेटे मणिलाल को सौंपी थी. बाद में मणिलाल वहीं जा कर बस गए थे. इन्हीं

दक्षिण अफ्रीका के डरबन की एक अदालत में 7 जून को एक अहम सुनवाई होनी थी. ज्यूरी के लोग पूरी तैयारी से अपनीअपनी जगहों पर आ

चुके थे. कोर्ट में दोनों पक्षों के वकीलों, कोर्ट के कर्मचारियों और न्यायाधीश के अतिरिक्त मुकदमे के वादी, प्रतिवादी पक्षों के दरजनों लोग मौजूद थे. पूरी दुनिया में कोविड-19 की महामारी, वैक्सीनेशन, औक्सीजन और भारत में कहर बन कर टूटी कोरोना वायरस संक्रमण की हो रही चर्चा के बीच मीडिया में इस सुनवाई को ले कर भी जिज्ञासा बनी हुई थी. गहमागहमी का माहौल था.

अंतिम फैसले पर सब की नजरें टिकी थीं. इस की वजह यह थी कि मामले की जो आरोपी महिला थी, उस का संबंध महात्मा गांधी के परिवार और दक्षिण भारत की राजनीति में एक बड़े नाम के साथ जुड़ा था. पूरा मामला हाईप्रोफाइल होने के साथसाथ 6 साल पुराना कारोबारी धोखाधड़ी का था.

यह आरोप एस.आर. महाराज नाम के एक बिजनैसमैन की शिकायत पर दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रीय अभियोजन प्राधिकरण (एनपीए) के द्वारा लगाया गया था.

करीब 6 साल से जमानत पर चल रही 56 वर्षीया आरोपी महिला कठघरे में हाजिर हो चुकी थीं. अदालत की काररवाई शुरू होते ही अभियोजन पक्ष की तरफ से आरोपी के परिचय के साथसाथ न्यायाधीश के सामने उस पर लगे फरजीवाड़े के तमाम आरोप प्रस्तुत कर दिए गए थे.

प्रोसिक्यूटर द्वारा कहा गया कि धोखाधड़ी की आरोपी आशीष लता रामगोबिन ने अपनी पूर्व सांसद मां इला गांधी की इमेज और अपने परदादा महात्मा गांधी की वैश्विक कीर्ति का सहारा ले कर इस काम को अंजाम दिया था. इला गांधी भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पोती हैं.

वह दक्षिण अफ्रीका में 9 साल तक सांसद रह चुकी हैं और भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से भी नवाजी जा चुकी हैं. वह राजनीतिक रसूख वाली जानीमानी मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.

अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों के जवाब में आरोपी आशीष लता की तरफ से वैसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया जा सका, जिन से अगस्त 2015 में उद्योगपति एस.आर. महाराज के साथ धोखाधड़ी का लगा आरोप गलत साबित हो सकता था.

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नतीजा कुछ समय में ही दक्षिण अफ्रीकी कानून के मुताबिक आशीष लता को अफ्रीकी मुद्रा में 62 लाख रैंड ( करीब 3 करोड़ 22 लाख रुपए) की धोखाधड़ी, जालसाजी का दोषी ठहराते हुए 7 साल जेल की सजा सुना दी गई.

महाराज ने उन्हें कथित तौर पर भारत से ऐसी खेप के आयात और सीमा शुल्क कर के समाशोधन के लिए 62 लाख रैंड दिए थे, जिस का कोई अस्तित्व ही नहीं था. इस में आशीष लता की तरफ से लाभ का एक हिस्सा देने का वादा भी किया गया था.

समाजसेविका के रूप में पहचान थी आशीष लता की

वर्ष 2015 में जब इस संबंध में उन के खिलाफ सुनवाई शुरू हुई थी, तब एनपीए के ब्रिगेडियर हंगवानी मूलौदजी ने कहा था कि उन्होंने संभावित निवेशक को यकीन दिलाने के लिए कथित रूप से फरजी चालान और दस्तावेज दिए थे. उस में भारत से लिनेन के 3 कंटेनर आने की जानकारी दी गई थी.

आशीष लता इंटरनैशनल सेंटर फौर नौन वायलेंस नामक एक गैरसरकारी संगठन के एक प्रोग्राम की संस्थापक और कार्यकारी निदेशक रह चुकी थीं.

हालांकि उन के खिलाफ लगे आरोपों में फरजीवाड़े की रकम भारतीय बैंकों को करीब 23 हजार करोड़ रुपए का चूना लगाने वाले विजय माल्या, मेहुल चौकसी और नीरव मोदी की तुलना में बहुत ही कम है. फिर भी हर भारतीय को आशीष लता का कारनामा क्षुब्ध कर गया है. कारण वह उस बापू की परपोती हैं, जिन्होंने जीवन भर सत्य को अपनाया, सत्य का प्रयोग किया, सत्य की रक्षा के लिए संघर्ष किया और सत्य के लिए जिया.

आज जब भी किसी को अपनी सत्यता का हवाला देना होता है तो वह बापू के अपनाए गए तरीके से प्रदर्शन करता है. लोग अंतर्द्वंद्व और आत्मग्लानि के मौकों पर बापू की प्रतिमा के आगे मौन धारण कर आत्मशुद्धि के लिए बैठ जाते हैं.

इस अनुसार यह कहा जा सकता है कि आशीष लता ने न केवल इस सत्यनिष्ठा को आंच पहुंचाई, बल्कि बापू की वैश्विक कीर्ति पर ही कालिख पोतने का काम किया. यह बात हैरानी के साथसाथ अफसोस करने जैसी है.

बात करीब 6 साल पहले उस समय की है, जब एक दिन उद्योगपति एस.आर. महाराज अपनी लग्जरी गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे औफिस जा रहे थे. उसी दौरान लैपटौप में अपने बैंक के बैलेंसशीट पर एक नजर डालने के बाद वह मेल चैक करने लगे थे. पहले उन्होंने अपने एग्जीक्यूटिव्स के रोजमर्रा के मेल चैक किए. उन्हें जरूरी जवाब दिए, फिर वैसे मेल चैक करने लगे, जो पहली बार आए थे.

एक मेल को देख कर चौंकते हुए उन की नजर ठहर गई. कारण वह सामान्य हो कर भी खास मेल था. उस में फाइनैंस की रिक्वेस्ट थी, जिस से थोड़े समय में ही अच्छी आमदनी का वादा किया गया था.

हालांकि उन के पास आए दिन इस तरह के मेल आते रहते थे, जिसे वे खुद विस्तार से पढ़ने के बजाय उस की डिटेल से जानकारी के लिए अपने सेक्रेटरी को फारवर्ड कर दिया करते थे.

महाराज की बढ़ी रुचि

लेकिन उस मेल में महाराज को जिज्ञासा भेजने वाले को ले कर भी हुई थी. उन्होंने तुरंत जवाब टाइप कर दिया, ‘‘आई नोटिस्ड योर रिक्वेस्ट, विल रिप्लाई सून!’’ यह बात साल 2015 के मई महीने की थी.

थोड़ी देर में महाराज दक्षिण अफ्रीका के डरबन स्थित अपनी कंपनी के औफिस ‘न्यू अफ्रीका अलायंस फुटवेयर डिस्ट्रीब्यूटर्स’ के चैंबर में पहुंच गए. वह इस कंपनी के निदेशक हैं. कंपनी जूतेचप्पल, कपड़े और लिनेन के आयात, बिक्री एवं निर्माण का काम करती है. कंपनी का एक और काम प्रौफिट और मार्जिन के तहत दूसरी कंपनियों की आर्थिक मदद भी करना है.

एस.आर. महाराज ने अपने सेक्रेटरी को बुला कर कहा, ‘‘मिस्टर सुथार, आज ही मुझे उस मेल की तुरंत डिटेल्स दो, जिस में फाइनैंस की रिक्वेस्ट की गई है.’’

‘‘कौन सा मेल… जिसे समाजसेवी महिला आशीष लता रामगोबिन ने भेजा है?’’

‘‘हांहां वही. वह कोई आम महिला नहीं हैं. उन्होंने अपने परिचय में जो लिखा है, शायद तुम ने उस पर गौर नहीं किया.’’ उन्होंने कहा.

‘‘सर, मैं कुछ ज्यादा नहीं समझ पाया.’’ सेक्रेटरी बोला.

‘‘उस ने जिस के लिए काम की बात कही है वह एक विश्वसनीय परिवार से ताल्लुक रखता है. वह भरोसे के लायक है. उस परिवार ने भारत में सामाजिक उत्थान के लिए कई बेमिसाल काम किए हैं. उन के साथ भारत के राष्ट्रपिता का दरजा हासिल कर चुके महात्मा गांधी का नाम जुड़ा है. उन के साथ जल्द ही मीटिंग की डेट फिक्स कर दो.’’

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ऐसे हुआ आशीष लता पर विश्वास

उद्योगपति महाराज का यह मजबूत आत्मविश्वास बनने की वजहें भी कम नहीं थीं. उस बारे में वे कई बातें पहले से जानते थे और कुछ जानकारी बाद में मालूम कर ली थीं. फाइनैंस की रिक्वेस्ट महात्मा गांधी की परपोती आशीष लता रामगोबिन ने भेजी थी.

उन्होंने अपने परिचय में दक्षिण अफ्रीका की राजनीति में सक्रिय महिला इला गांधी की बेटी लिखा था, जिन्होंने रंगभेद के खिलाफ काम किया था. तत्कालीन सरकार से सीधी टक्कर ली थी.

उन्होंने निर्वासन की यातना झेली थी. उस के खात्मे के बाद सन 1994 से 2003 तक अफ्रीकन नैशनल कांग्रेस की सदस्य के रूप में सांसद रह कर लोकहित में कई कार्य किए थे. उन के पति का नाम स्व. मेवा रामगोबिन है. वह महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी के 4 बेटों हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास में दूसरे बेटे मणिलाल मोहनदास गांधी की बेटी हैं.

मणिलाल पहली बार 1897 में दक्षिण अफ्रीका गए थे. महात्मा गांधी ने 1904 में डरबन के पास ‘द फीनिक्स सेटलमेंट’ नामक एक जगह की स्थापना की थी. वहीं उन्होंने एक ग्रामसंस्था भी स्थापित की थी और सत्याग्रह के साथ अपने अनूठे क्रांतिकारी प्रयोग किए थे. इस दौरान मणिलाल 1906 से 1914 के बीच क्वाजुलु नटाल और ग्वाटेंग में रहे. फिर वापस भारत आ गए.

जबकि महात्मा गांधी ने डरबन से अपना साप्ताहिक अखबार अंगरेजी और गुजराती में ‘इंडियन ओपिनियन’ भी छापना शुरू कर दिया था. इस की शुरुआत 1903 में ही हुई थी.

बाद में महात्मा गांधी ने उस अखबार के विशेष रूप से गुजराती खंड प्रकाशन में सहायता के लिए मणिलाल को दक्षिण अफ्रीका भेज दिया था. वहां मणिलाल सन 1920 में उस के संपादक बन गए और लंबे समय तक इस की जिम्मेदारी संभाली.

उन्होंने सन 1927 में सुशीला मशरूवाला से शादी की थी, जो बाद में उन की प्रिंटिंग प्रैस की पार्टनर बन गईं. उन से 3 संतानें सीता, अरुण और इला हुए. ये सभी दक्षिण अफ्रीका के ही नागरिक बन गए. आशीष लता की मां इला का नाम दक्षिण अफ्रीका की राजनीति में बड़ा नाम है. उन का जन्म वहां के क्वाजुलु नटाल में सन 1940 में हुआ था. उन्होंने हर तरह की हिंसा के खिलाफ संघर्ष किया.

इस के लिए उन्होंने गांधी डेवलपमेंट ट्रस्ट बनाया, जो अहिंसा के लिए काम करता है. साथ ही महात्मा गांधी के नाम एक मार्च कमेटी भी बनाई गई है.

विभिन्न सामाजिक कार्यों को देखते हुए सन 2002 में वह ‘कम्युनिटी आफ क्राइस्ट इंटरनैशनल पीस अवार्ड’ से सम्मानित की जा चुकी हैं. भारत सरकार ने भी वर्ष 2007 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया था. दक्षिण अफ्रीका में रह रहे महात्मा गांधी परिवार के कई सदस्यों में कीर्ति मेनन, स्वर्गीय सतीश धुपेलिया, उमा धुपेलिया मेस्त्री, इला गांधी और आशीष लता रामगोबिन शामिल हैं.

3 दिसंबर, 1965 को जन्म लेने वाली आशीष लता रामगोबिन का रहनसहन हिंदू रीतिरिवाज पर आधारित है एवं प्रोफेशनल पहचान सामाजिक कार्यकर्ता और उद्यमिता के रूप में है. वैसे उन की नागरिकता दक्षिण अफ्रीका की है.

उन के 4 छोटे भाईबहनों में आशा और आरती बहनें हैं, जबकि किदार और खुश भाई हैं. उन की फेसबुक अकाउंट के अनुसार उन्होंने सन 1988 में उरबन के ग्लेनहैवेन सकेंडरी स्कूल से सेकेंडरी तक पढ़ाई पूरी कर क्वाजुलु नटाल यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएशन किया है.

फिर दक्षिण अफ्रीका की यूनिवर्सिटी से पब्लिक एडमिनिस्ट्रैशन से पोस्ट ग्रैजुएट तक की पढ़ाई की. बाद में प्रोफ्रेशनल ट्रेनिंग और कोचिंग इंडस्ट्री के गुर सीखे. स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए सरकारी प्रोजेक्ट, गवर्नेंस की बारीक जानकारियां, पं्रोजेक्ट एवं प्रोग्राम का मूल्यांकन, प्रोजेक्ट ड्राफ्ंिटग और एंटरप्रेन्योरशिप में महारत हासिल कर ली.

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आशीष लता की शादी एक कारोबारी मार्क चूनू से हुई थी. उन से तलाक हो चुका है, लेकिन अपनी 2 संतानों बेटा और बेटी के साथ रहती हैं. वे अभी किशोर उम्र के हैं. उन का करियर स्वयंसेवी संस्था इंटरनैशनल सेंटर नान वायलेंस से जुड़ा है, जिस की वह संस्थापक और ओनर हैं.

वह उस की कार्यकारी निदेशक भी हैं. उन की पहचान राजनीतिज्ञ और पर्यावरण कार्यकर्ता की भी है. न्यूजएंडजिप वेब पोर्टल के अनुसार, उन्होंने 29 जनवरी, 2000 को महात्मा गांधी के नक्शेकदम पर चलते हुए एक नान वायलेंस संस्था स्थापित की थी. साथ ही उन्होंने 2016 से 5 साल तक यूनाइटेड ट्रेड सोल्यूशन के मैनेजिंग डायरेक्टर की जिम्मेदारी निभाई. इस तरह उन्होंने स्वयंसेवी संस्था के लिए डोनेशन जुटाने का काम करने के साथसाथ बिजनैस करते हुए अच्छी पूंजी अर्जित कर ली है.

लग गई धोखाधड़ी की कालिख

आशीष लता के बारे में कई वैसी बातें भी हैं, जो उन्हें खास बनाने के लिए काफी हैं. जैसे उन्होंने अपने परदादा महात्मा गांधी और मां इला गांधी के कदमों पर चलने की निर्णय लिया है. उन्होंने अपने एनजीओ के माध्यम से घरेलू हिंसा की शिकार औरतों और बच्चों की मदद की है. वह दक्षिण अफ्रीका के समारोहों में अपने परिवार के साथ शामिल होती रही हैं.

आशीष लता रामगोबिन की उद्योगपति एस.आर. महाराज से मुलाकात सन 2015 में ही हो गई थी. दोनों की पहली मीटिंग के दौरान महाराज ने फाइनैंस की जरूरत के बारे में पूछा, ‘‘आप को पैसा क्यों चाहिए?’’

‘‘दरसअल, हम ने भारत से लिनेन के 3 कंटेनर मंगवाए हैं, जो बंदरगाह पर पड़े हैं. आयात लागत और सीमा शुल्क पेमेंट करने में दिक्कत आ गई है. माल को साउथ अफ्रीकन हौस्पिटल ग्रुप नेट केयर को डिलीवर करना है.’’ लता ने सिलसिलेवार ढंग से जवाब दिया.

‘‘पैसे की वापसी का भरोसा क्या है?’’ महाराज के फाइनैंस एडवाइजर ने पूछा.

‘‘ये रहे नेट केयर कंपनी और हमारे साथ एग्रीमेंट बनाने के डाक्युमेंट्स. इस में सारी बातें लिखी हैं.’’ आशीष लता ने कहा.

‘‘कितना फाइनैंस करना होगा?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘6.2 मिलियन रैंड की जरूरत है. उस की डिटेल्स की मूल कौपी दे रही हूं. आयात किए गए माल के खरीद की रसीद यह रही.’’ लता ने आश्वासन दिया.

‘‘इस में मेरा प्रौफिट क्या होगा?’’ महाराज ने पूछा.

‘‘उस बारे में भी फाइनैंस की रिक्वेस्ट डिटेल्स के साथ दी गई है.’’ लता ने साथ लाए डाक्युमेंट्स के पन्ने पलट कर दिखाए. उन के द्वारा सौंपे गए डाक्युमेंट्स पर महाराज ने एक सरसरी निगाह दौड़ाई और अपने फाइनैंस एडवाइजर को सौंपते हुए उस का बारीकी से अध्ययन करने का निर्देश दिया.

‘‘थोड़ा वक्त दीजिए. वैसे मुझे आप पर और आप की पहचान के साथसाथ पारिवारिक इमेज पर पूरा भरोसा है. डाक्युमेंट्स की जांचपरख तो महज औपचारिकता भर है. जल्द ही फाइनैंस संबंधी सारी प्रक्रिया पूरी करवा दूंगा.’’ एस.आर. महाराज बोले.

‘‘बहुतबहुत धन्यवाद, जितना जल्द हो सके फाइनैंस करवा दें तो अच्छा रहेगा.’’ लता ने आभार जताते हुए आग्रह किया.

‘‘…लेकिन हां, मेरे प्रौफिट की हिस्सेदारी में देरी नहीं होनी चाहिए. इस मामले में हमारी कंपनी काफी सख्त है.’’ महाराज ने साफसाफ कहा.

इसी बीच कंपनी के फाइनैंस एडवाइजर ने आशंका जताई, ‘‘सर, इस में कुछ डाक्युमेंट्स कम हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं, बता दो. जितनी जल्द हो सके, लताजी उसे जमा करवा देंगी. बैंक अकाउंट स्टेटमेंट और रिटर्न की डिटेल्स भी मंगवा लेना.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं, बाकी के सारे डाक्युमेंट्स एक हफ्ते में आप को मिल जाएंगे.’’ लता ने कहते हुए एक बार फिर महाराज को धन्यवाद दिया.

इस तरह दोनों की पहली मीटिंग संभावनाओं से भरी रही. बहुत जल्द ही एक महीने के भीतर ही 3 मीटिंग्स और हुईं और आशीष लता को जरूरत के मुताबिक फाइनैंस मिल गया. उस के बाद मुनाफे के साथ रकम वापसी की एक महीने बाद की एक डेडलाइन तय हो गई.

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कहते हैं कि बिजनैसमैन एस.आर. महाराज की कंपनी ने जिस तरह से फाइनैंस करने में जितनी तत्परता दिखाई, उतनी ही सुस्ती आशीष लता की तरफ से बरती गई.

समय पर नहीं लौटाई रकम

महाराज की कंपनी को समय पर भुगतान नहीं मिलने पर उन्होंने कंपनी के नियम और शर्तों के मुताबिक आशीष लता को नोटिस भेज दिया. नोटिस का सही जवाब नहीं मिलने पर कंपनी ने लता द्वारा जमा करवाए गए डाक्यूमेंट्स की जांच करवाई.

जांच में लता द्वारा किए गए कई दावे गलत साबित हुए. जिस में माल की खरीद के हस्ताक्षरित खरीद का आदेश और नेटकेयर बैंक खाते में भुगतान से संबंधित था. कंपनी ने पाया कि उन के द्वारा जमा किए गए डाक्युमेंट्स जाली थे और उन के साथ नेटकेयर ने कभी कोई व्यवस्था ही नहीं की थी. यहां तक कि लिनेन के कंटेनर बंदरगाह पर पहुंचे ही नहीं थे.

इस फरजीवाड़े का पता चलते ही कंपनी के डायरेक्टर एस.आर. महाराज ने आशीष लता के खिलाफ कोर्ट में केस कर दिया. 2015 में लता के खिलाफ कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई.

सुनवाई के दौरान एनपीए के ब्रिगेडियर हंगवानी मूलौदजी ने कहा कि लता ने इनवैस्टर को यकीन दिलाने के लिए फरजी दस्तावेज और चालान दिखाए थे. भारत से लिनेन का कोई कंटेनर दक्षिण अफ्रीका आया ही नहीं था.

हालांकि सुनवाई के दौरान लता ने सबूत पेश करने के लिए समय मांगा और जमानत की अरजी दाखिल की. लता की पारिवारिक इमेज को ध्यान में रखते हुए अक्तूबर 2015 में 50 हजार रैंड (करीब 2.68 लाख रुपए) की जमानत राशि पर पर उन्हें छोड़ दिया गया.

जमानत पर रिहा हुई आशीष लता ने कुल 6 साल तक राहत की सांस ली, किंतु उन के कारनामे दिनप्रतिदिन और मजबूत होते चले गए और 7 जून, 2021 को डरबन की अदालत ने आशीष लता रामगोबिन को धोखाधड़ी और जालसाजी का दोष सिद्ध करते हुए 7 साल की सजा सुनाई. कथा लिखे जाने तक वह दक्षिण अफ्रीका की जेल में थीं.

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‘तो आज भी मेमसाहब मुझ पर एहसान लादने चली आई हैं. और वह भी इस रूप में? क्या इस स्त्री को तनिक भी लाजशरम नहीं है? जीवन की इस संध्या बेला में यह चटख, चमकीले कपड़े, झुर्री पड़े, बुढ़ाते चेहरे को छिपाने के यत्न में पाउडर और लिपस्टिक की महकतीगमकती परतें. आंखों के आरपार खिंचा सिनेतारिकाओं का सा काजल और चांदी के तारों को छिपाने के यत्न में नकली बालों का ऊंचा फैशनेबल जूड़ा देख कर वितृष्णा से उन के मुंह में ढेर सी कड़वाहट घुल गई.

इंद्रा से पति की बेरुखी छिपी न रह सकी, ‘‘तुम आज भी नाराज हो न? पर क्या कर सकती हूं, समय ही नहीं मिलता आने का.’’

‘‘मैं तो तुम से कोई सफाई नहीं मांग रहा हूं?’’

‘‘तो क्या मैं समझती नहीं हूं तुम्हें. जब देखो मुंह फुलाए पड़े रहते हो. पर सच कहती हूं कि एक बार उन विदेशी महिलाओं को देखते तो समझते. किस कदर भारत पर फिदा हो गई हैं. कहती हैं, ‘यहां की स्त्रियों की संसार में कहीं भी समता नहीं हो सकती. कितनी शांत, कितनी सरल और ममतामयी होती हैं. घर, पति और बच्चों में अनुरक्त. असली पारिवारिक जीवन अगर कहीं है तो केवल भारत में. एक हमारा देश है जहां स्त्रियों को न घर की चिंता होती है, न बच्चों की. और पति नाम का जीव? उसे तो जब चाहो पुराने जूते की तरह पैर से निकालो और तलाक दे दो,’’ वह हंसी, ‘‘हमारे महिला क्लब को देख कर भी वे बेहद प्रभावित हुईं…’’

सुरेंद्र पत्नी के गर्व से दमकते चेहरे को आश्चर्यचकित सा देखते रह गए. पति, घर, बच्चे, सुखी पारिवारिक जीवन, ममतामयी नारियां? यह सब क्या बोल रही है इंद्रा? क्या वह इस सब का अर्थ भी समझती है? यदि हां, तो फिर वह सब क्या था? जीवनभर पति को पराजित करने की दुर्दमनीय महत्त्वाकांक्षा, जिस के वशीभूत उस ने एक अत्यंत कोमल, अत्यंत भावुक हृदय को छलनी कर दिया. उन का सबकुछ नष्ट कर डाला.

‘‘तुम्हें किसी चीज की जरूरत हो तो कहो, किसी के हाथ भिजवा दूंगी. मेरा मतलब है कुछ फल वगैरा या कोई किताब, कोई पत्रिका?’’

सूनीसूनी आंखें कुछ पल पत्नी के चेहरे पर जैसे कुछ खोजती रहीं, ‘‘जरूरत? डाक्टर को बुला दो, बस…’’

ठंडा, उदास स्वर इंद्रा को कहीं गहरे तक सहमाता चला गया.

‘‘कहिए, कोई खास बात?’’

सुरेंद्र ने डाक्टर सुधीर की आवाज सुन कर आंखों पर से हाथ हटाया, ‘‘जी, हां, डाक्टर साहब, इन्हें यहां से बाहर कर दीजिए.’’

डाक्टर सुधीर एकाएक सन्न रह गए. सुरेंद्र का कांपता स्वर, उन की आंखों में छलकता करुण आग्रह आखिर यह सब क्या है? कैसी अनोखी विडंबना है? पतिपत्नी के युगोंयुगों से चले आ रहे तथाकथित अटूट दृढ़ संबंधों का आखिर यह कौन सा रूप है? मृत्युशय्या पर पड़ा व्यक्ति सब से अधिक कामना अपने सब से प्रिय, सब से मधुर संबंधियों के सान्निध्य की करता है, और यह व्यक्ति है कि…

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एक असहाय सी दृष्टि उन्होंने इंद्रा पर डाली.

‘‘लेकिन, डाक्टर, मैं ने तो इन से कोई ऐसीवैसी बात नहीं की. मेरा मतलब है…’’ इंद्रा का चेहरा अपमान से स्याह पड़ गया था.

‘‘मैं समझता हूं, श्रीमती सुरेंद्र. लेकिन आप जब भी यहां आती हैं, इन का ब्लडप्रैशर बढ़ जाता है. और इन के ब्लडप्रैशर बढ़ने का अर्थ आप समझती हैं न, कितना खतरनाक हो सकता है? आज सारी रात ये सो नहीं पाएंगे. कई दिनों के बाद कल रात इन्हें नींद की गोलियों के बगैर नींद आई थी, मगर आज फिर पुरानी हालत हो जाएगी. आप समझने की कोशिश कीजिए.’’

डाक्टर के नम्रता और शालीनता में डूबे शब्द सुन कर इंद्रा का खून खौल गया. ‘‘हां, हां, मैं खूब समझती हूं. कितनी कठिनाई से समय निकाल कर इन्हें देखने आती हूं और ये हैं कि…ठीक है, अब नहीं आऊंगी.’’ झटके से पलट कर वह तेज कदम रखती हुई स्पैशल वार्ड के बाहर निकल गई.

‘‘पत्नी को देख कर आप को इतना उद्विग्न नहीं होना चाहिए, मिस्टर सुरेंद्र. आप समझदार हैं. जरा संयम रखिए,’’ डाक्टर सुधीर सुरेंद्र को अपनी स्नेह भीगी दृष्टि से सहला रहे थे.

‘‘बहुत नियंत्रण किया है अपनेआप पर, डाक्टर. बहुत सहा है इस कलेजे पर पत्थर रख कर, इसी आशा में कि शायद यह किसी दिन संभल जाएगी. पर अब नहीं सहा जाता. इस औरत को देखते ही मेरे दिमाग की नसें फटने लगती हैं. समझ में नहीं आता, क्या कर डालूं? उस का गला दबा दूं या अपना?’’  सुरेंद्र बेहद कातर हो उठे थे.

‘‘आप नहीं जानते, डाक्टर, मेरी इस दशा के लिए पूरी तरह यह औरत जिम्मेदार है. इस ने मेरा जीवन बरबाद कर दिया है. मेरा घर, मेरे बच्चे, मेरा सबकुछ. मैं इसे कभी माफ नहीं कर सकता. डाक्टर, थोड़ा सा ग्लूकोज दीजिए, प्लीज? बड़ी तकलीफ हो रही है सीने में. लगता है दिल डूबा जा रहा है जैसे…’’

ग्लूकोज पिला कर, नर्स को नींद का इंजैक्शन लगाने का आदेश दे कर डाक्टर सुधीर चले गए.

लेकिन नींद का इंजैक्शन और डाक्टर के सांत्वना में डूबे शब्द, सब मिल कर भी सुरेंद्र के मस्तिष्क की फटती नसों को शांति के सागर में न डुबो सके.

इंद्रा ने कुछ पलों के लिए आ कर उन की आर्द्र स्मृतियों के दर्द को फिर से कुरेद कर रख दिया था. यत्न से दबाई चिनगारियां जरा सी हवा पा कर फिर से सुलग उठी थीं.

तब नईनई नौकरी लगी थी उन की. नया शहर, नए मित्र, नया काम, सबकुछ नयानया. एक दिन घूमफिर कर लौटे थे तो पिता का पत्र मिला, ‘लड़की देखी है. सुंदर है, बीए कर रही है. घरखानदान अच्छा है. चाहो तो तुम भी आ कर देख जाओ.’

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उन्होंने सीधासादा सा उत्तर लिख दिया था, ‘आप सब ने देख लिया, पसंद कर लिया. फिर मैं क्या देखूंगा? पढ़ीलिखी लड़की है, जैसी भी है, अच्छी ही होगी. मुझे मंजूर है.’

इंद्रा की परीक्षा तक उन्हें रुकना पड़ा था. वे कुछ महीने उन्होंने कैसे काटे थे, मन हर समय उल्लास की सतरंगी किरणों से घिराघिरा सा रहता. विवाह के नाम से कलियां सी चटखने लगतीं. आंखों में खुमार सा उतर आता. वे क्या जानते थे कि यह विवाह उन के जीवन का सब से बड़ा कंटक बन कर उन के जीवन की दिशा ही मोड़ देगा, उन का सबकुछ अस्तव्यस्त कर डालेगा?

फिर एक दिन इंद्रा ने उन के साथ उन के घर में कदम रखा था. जीवनभर साथ देने की अनेक प्रतिज्ञाएं कर के दुखसुख में कदम से कदम मिला कर जीवन में आए संघर्षों से जूझने के वादे ले कर.

लेकिन उस के सारे वादे, सारी प्रतिज्ञाएं, वर्षभर के ही अंदरअंदर धूल चाटने लगी थीं.

Romantic Story in Hindi: भोर- भाग 3: क्यों पति का मजाक उड़ाती थी राजवी?

Writer- Kalpana Mehta

अक्षय को लगा कि राजवी कुछ छिपा रही है. कहीं वह मां तो नहीं बनने वाली? पर ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि वह तो कहती रही है कि बच्चे के बारे में तो अभी 5 साल तक सोचना भी मत. पहले मैं कैरियर बनाऊंगी, लाइफ को ऐंजौय करूंगी, उस के बाद ही सोचूंगी. फिर कौन सी बात छिपा रही है यह मुझ से? क्या इस के साथ वाकई रेप हुआ होगा? दुखी हो गया अक्षय यह सोच कर. उसे जीवन का यह नया रंग भयानक लग रहा था. 2 दिन बाद अक्षय जब शाम को घर आया तो देखा कि राजवी फिर से बेहोश जैसी पड़ी थी. उसे तेज बुखार था. अक्षय परेशान हो गया. फिर बिना कुछ सोचे वह उसे अस्पताल ले गया. डाक्टर ने जांचपड़ताल करने के बाद उस के जरूरी टैस्ट करवाए और उन की रिपोर्ट्स निकलवाईं.

लेकिन रिपोर्ट्स हाथ में आते ही अक्षय के होश उड़ गए. राजवी की बच्चेदानी में सूजन थी और इंटरनल ब्लीडिंग हो रही थी. डाक्टर ने बताया कि उसे कोई संक्रामक रोग हो गया है.

चेहरा हाथों में छिपा कर अक्षय रो पड़ा. यह क्या हो गया है मेरी राजवी को? वह शुरू से ही कुछ बता देती या खुद ट्रीटमैंट करवा लेती तो बात इतनी बढ़ती नहीं. ये तू ने क्या किया राजवी? मेरे प्यार में तुझे कहां कमी नजर आई कि प्यार की खोज में तू भटक गई? काश तू मेरे दिल की आवाज सुन सकती. अक्षय को डाक्टर ने सांत्वना दी कि लुक मिस्टर अक्षय, अभी भी उतनी देर नहीं हुई है. हम उन का अच्छे से अच्छा ट्रीटमैंट शुरू कर देंगे. शी विल बी औल राइट सून… और वास्तव में डाक्टर के इलाज और अक्षय की केयर से राजवी की तबीयत ठीक होने लगी. लेकिन अक्षय का धैर्य और प्यार भरा बरताव राजवी को गिल्टी फील करा देता था.

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अस्पताल से घर लाने के बाद अक्षय राजवी की हर छोटीमोटी जरूरत का ध्यान रखता था. उसे टाइम पर दवा, चायनाश्ता व खाना देना और उस को मन से खुश रखने के लिए तरहतरह की बातें करना, वह लगन से करता था. और राजवी की इन सब बातों ने आंखें खोल दी थीं. नासमझी में उस ने क्याक्या नहीं कहा था अक्षय को. दोस्तों के सामने उस का तिरस्कार किया था. उस के रंग को ले कर सब के बीच उस का मजाक उड़ाया था और कई बार गुस्से और नफरत के कड़वे बोल बोली थी वह. यह सब सोच कर शर्म सी आती थी उसे.

अपनी गोरी त्वचा और सौंदर्य के गुमान की वजह से उस ने अपना चरित्र भी जैसे गिरवी रख दिया था. अक्षय सांवला था तो क्या हुआ, उस के भीतर सब कुछ कितना उजला था. उस के इतने खराब ऐटिट्यूड के बाद भी अक्षय के बरताव से ऐसा लगता था जैसे कुछ हुआ ही नहीं था. वह पूरे मन से उस की केयर कर रहा था. राजवी सोचती थी मेरी गलतियों, नादानियों और अभिमान को अनदेखा कर अक्षय मुझे प्यार करता रहा और मुझे समझाने की कोशिश करता रहा. लेकिन मैं अपनी आजादी का गलत इस्तेमाल करती रही. कुछ दिनों में राजवी के जख्म तो ठीक हो गए पर उन्होंने अपने गहरे दाग छोड़ दिए थे. जब भी वह आईना देखती थी सहम जाती थी.

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पूरी तरह से ठीक होने के बाद राजवी ने अक्षय के पास बैठ कर अपने बरताव के लिए माफी मांगी. अक्षय गंभीर स्वर में बोला, ‘‘देखो राजवी, मैं जानता हूं कि तुम मेरे साथ खुश नहीं हो. मैं यह भी जानता हूं कि मैं शक्लसूरत में तुम्हारे लायक नहीं हूं. काश मैं अपने शरीर का रंग बदलवा सकता पर वह मुमकिन नहीं है. तब एक ही रास्ता नजर आता है मुझे कि तुम मेरे साथ जबरदस्ती रहने के बजाय अपना मनपसंद रास्ता खोज लो.’’ इस बात पर राजवी चौंकी मगर अक्षय बोला, ‘‘मेरा एक कुलीग है. मेरे जैसी ही पोस्ट पर है और मेरी जितनी ही सैलरी मिलती है उसे. प्लस पौइंट यह है कि वह हैंडसम दिखता है. तुम्हारे जैसा गोरा और तुम्हारे जैसा ही फ्री माइंडेड है. अगर तुम हां कहो तो मैं बात कर सकता हूं उस से. और हां, वह भी इंडिया का ही है. खुश रखेगा तुम्हें…’’

‘‘अक्षय, यह क्या बोल रहे हो तुम?’’ राजवी चीख उठी. अक्षय ऐसी बात करेगा यह उस की सोच से परे था.

‘‘मैं ठीक ही तो कह रहा हूं. इस झूठमूठ की शादी में बंधे रहने से अच्छा होगा कि हम अलग हो जाएं. मेरी ओर से आज से ही तुम आजाद हो…’’

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अक्षय के होंठों पर अपनी कांपती उंगलियां रखती राजवी कांपती आवाज में बोली, ‘‘इस बात को अब यहीं पर स्टौप कर दो अक्षय. मैं ने कहा न कि मैं ने जो कुछ भी किया वह मेरी भूल थी. मेरा घमंड और मेरी नासमझी थी. अपने सौंदर्य पर गुमान था मुझे और उस गुमान के लिए तुम जो चाहे सजा दे सकते हो. पर प्लीज मुझे अपने से अलग मत करना. मैं नहीं जी पाऊंगी तुम्हारे बिना. तुम्हारे प्यार के बिना मैं अधूरी हूं. जिंदगी का और रिश्तों का सच्चा सुख बाहरी चकाचौंध में नहीं होता वह तो आंतरिक सौंदर्य में ही छिपा होता है, यह सच मुझे अच्छी तरह महसूस हो चुका है.’’

इस के आगे न बोल पाई राजवी. उस की आंखों में आंसू भर गए. उस ने हाथ जोड़ लिए और बोली, ‘‘मेरी गलती माफ नहीं करोगे अक्षय?’’ राजवी के मुरझाए गालों पर बह रहे आंसुओं को पोंछता अक्षय बोला, ‘‘ठीक है, तो फिर इस में भी जैसी तुम्हारी मरजी.’’  और यह कह कर वह मुसकराया तो राजवी हंस पड़ी. फिर अक्षय ने अपनी बांहें फैलाईं तो राजवी उन में समा गई.

Satyakatha: 4 करोड़ की चोरी का राज

सौजन्य- सत्यकथा

हरियाणा और पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ के सेक्टर 34 में एक्सिस बैंक का करेंसी चेस्ट है. इस में हर समय करोड़ों रुपए रहते हैं. इस चेस्ट से बैंक की ट्राइसिटी के अलावा हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब व जम्मूकश्मीर की शाखाओं को पैसा भेजा जाता है और वहां से आता भी है. हर समय करोड़ों रुपए रखे होने के कारण यहां सुरक्षा के भी काफी बंदोबस्त हैं. बैंक ने अपने सिक्योरिटी गार्ड तो लगा ही रखे हैं. साथ ही पंजाब पुलिस के जवान भी वहां हर समय तैनात रहते हैं.

इसी 11 अप्रैल की बात है. सुबह हो गई थी. कोई साढ़े 5-6 बजे के बीच का समय रहा होगा. सूरज निकल आया था, लेकिन अभी चहलपहल शुरू नहीं हुई थी. चेस्ट पर तैनात पंजाब पुलिस के जवानों को वहां रात में उन के साथ तैनात रहने वाला बैंक का सिक्योरिटी गार्ड सुनील नजर नहीं आ रहा था.

पुलिसकर्मियों ने एकदूसरे से पूछा, लेकिन किसी को भी सुनील के बारे में पता नहीं था. उन्हें बस इतना ध्यान था कि वह रात को ड्यूटी पर था. रात के 3-4 बजे के बाद से वह दिखाई नहीं दिया था. पुलिस के उन जवानों को चिंता हुई कि कहीं सुनील की तबीयत तो खराब नहीं हो गई? तबीयत खराब होने पर वह बैंक की चेस्ट में ही कहीं इधरउधर सो नहीं गया हो? यह बात सोच कर उन्होंने चेस्ट में चारों तरफ घूमफिर कर सुनील को तलाश किया, लेकिन न तो वह कहीं पर सोता मिला और न ही उस का कुछ पता चला.

सुनील की ड्यूटी रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक थी, लेकिन वह 2-3 घंटे से गायब था. वह किसी को कुछ बता कर भी नहीं गया था. एक पुलिस वाले ने उस के मोबाइल नंबर पर फोन किया, लेकिन उस का मोबाइल स्विच्ड औफ था. पुलिस वालों को पता था कि सुनील रोजाना अपनी पलसर बाइक से आता था. वह बैंक की चेस्ट के पीछे अपनी बाइक खड़ी करता था. उन्होंने उस जगह जा कर बाइक देखी, लेकिन वहां उस की बाइक भी नहीं थी.

अब पुलिस वालों की चिंता बढ़ गई. चिंता का कारण वहां रखी करोड़ों रुपए की रकम थी. उन्होंने बैंक के अफसरों को फोन कर सारी बात बताई. कुछ देर में बैंक के अफसर आ गए. उन्होंने चेस्ट में रखे रुपयों से भरे लोहे के बक्सों की जांचपड़ताल की. पहली नजर में नोटों के इन बक्सों में कोई हेराफेरी नजर नहीं आई. नोटों से भरे सभी बक्सों पर ताले लगे हुए थे. सरसरी तौर पर कोई गड़बड़ी नजर नहीं आ रही थी. दूसरी तरफ सुनील का पता नहीं चल रहा था. उस का मोबाइल बंद होना और बाइक बैंक के बाहर नहीं होने से संदेह पैदा हो रहा था कि कोई न कोई बात जरूर है. वरना सुनील ऐसे बिना बताए कैसे चला गया?

काफी सोचविचार के बाद अफसरों के कहने पर नोटों से भरे बक्सों को हटा कर जांच की गई. एक बक्से को हटा कर चारों तरफ से देखा तो उस का ताला लगा हुआ था, लेकिन वह बक्सा पीछे से कटा हुआ था. बक्से को काट कर नोट निकाले गए थे. सवाल यह था कि कितने नोट निकाले गए हैं? क्या ये नोट सुनील ने ही निकाले हैं? इस की जांचपड़ताल जरूरी थी. इसलिए बैंक अफसरों ने सेक्टर-34 थाना पुलिस को इस की सूचना दी.

पुलिस ने आ कर जांचपड़ताल शुरू की. यह तो साफ हो गया कि बैंक की चेस्ट से बक्से को पीछे से काट कर नोट निकाले गए हैं. कितनी रकम निकाली गई है, इस सवाल पर बैंक वालों ने पुलिस के अफसरों से कहा कि सारे नोटों की गिनती करने के बाद ही इस का पता लग सकेगा.

पुलिस ने बैंक वालों से सुनील के बारे में पूछताछ की. बैंक के रिकौर्ड में सुनील के 2 पते लिखे थे. एक पता पंचकूला में मोरनी के गांव बाबड़वाली भोज कुदाना का था और दूसरा पता मोहाली के पास सोहाना गांव का. वह 3 साल से बैंक में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर रहा था. पुलिस अफसरों ने 2 टीमें सुनील के दोनों पतों पर भेज दीं.

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सुरक्षा के लिहाज से बैंक की चेस्ट में भीतरबाहर कैमरे लगे हुए थे. पुलिस ने कैमरों की फुटेज देखी. इन फुटेज में सामने आया कि सुनील रात को बारबार बैंक के अंदर और बाहर आजा रहा था.

उस की चालढाल और हाथों के ऐक्शन से अंदाजा लग गया कि वह बैंक के अंदर से अपने कपड़ों के नीचे कोई चीज छिपा कर बारबार बाहर आ रहा था. कपड़ों के नीचे छिपे शायद नोटों के बंडल होंगे. बाहर वह इन नोटों के बंडलों को कहां रख रहा था, इस का पता नहीं चला. यह भी पता नहीं चला कि बैंक के बाहर उस का कोई साथी खड़ा था या नहीं. एक फुटेज में वह हाथ में एक बैग ले कर बाहर निकलता नजर आया.

सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद यह बात साफ हो गई थी कि सुनील ने योजनाबद्ध तरीके से बैंक की चेस्ट से रुपए चोरी किए थे. फुटेज में 10-11 अप्रैल की दरम्यानी रात 3 बजे के बाद वह नजर नहीं आया. इस का मतलब था कि रात करीब 3 बजे वह बैंक से रकम चोरी कर फरार हो गया था.

बैंक वालों ने 5-6 घंटे तक सारी रकम की गिनती करने के बाद पुलिस अफसरों को बताया कि 4 करोड़ 4 लाख रुपए गायब हैं. यह सारी रकम 2-2 हजार रुपए के नोटों के रूप में थी. 4 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में बैंक से 4 करोड़ रुपए से ज्यादा चोरी होने का पता चलने पर पुलिस भी हैरान रह गई.

शुरुआती जांच में यह अनुमान लगाया गया कि सुनील ने अपने किसी साथी के सहयोग से यह वारदात की है. अनुमान यह भी लगाया गया कि इतनी बड़ी रकम ले कर वह किसी चारपहिया वाहन से भागा होगा. फिर सवाल आया कि सुनील अगर चारपहिया वाहन से भागा था तो उस की बाइक बैंक के पीछे मिलनी चाहिए थी, लेकिन उस की बाइक वहां नहीं मिली थी. इस से यह बात स्पष्ट हो गई कि बाइक या तो वह खुद या उस का कोई साथी चला कर ले गया.

पुलिस ने बैंक की चेस्ट में उस रात ड्यूटी पर मौजूद पंजाब पुलिस के चारों जवानों के बयान लिए. बैंक वालों के भी बयान लिए. बैंक वालों से सुनील के यारदोस्तों और उस के आनेजाने के ठिकानों के बारे में पूछताछ की गई. तमाम कवायद के बाद भी पुलिस को ऐसी कोई बात पता नहीं चली, जिस से उस के बारे में कोई सुराग मिलता.

सुनील की बाइक का पता लगाने के लिए पुलिस ने खोजी कुत्ते की मदद ली. पुलिस का स्निफर डौग उस के बाइक खड़ी करने की जगह पर चक्कर लगाने के बाद कुछ दूर गया. इस के बाद लौट आया. इस से पुलिस को कुछ भी पता नहीं लग सका. पुलिस ने सुनील की बाइक का पता लगाने के लिए बसस्टैंड के आसपास और दूसरी जगहों की पार्किंग पर तलाश कराई, लेकिन पता नहीं चला. उस के मोबाइल की आखिरी लोकेशन भी बैंक की आई.

सुनील के गांव भेजी गई पुलिस की टीमें शाम को चंडीगढ़ लौट आईं. मोरनी के पास स्थित गांव बाबड़वाली भोज कुदाना में पता चला कि सुनील को गंदी आदतों के कारण उस के मांबाप ने कई साल पहले ही घर से बेदखल कर दिया था. इस के बाद सुनील ने भी गांव आनाजाना कम कर दिया था.

पिता राममूर्ति ने पुलिस को बताया कि सुनील 2011-12 में पढ़ने के लिए कालेज जाता था. उसी दौरान वह एक लड़की को भगा ले गया था और बाद में उस से शादी कर ली थी. सुनील की इस हरकत के बाद ही मांबाप ने उसे घर से निकाल दिया था. बाद में पता चला कि सुनील ने पत्नी को तलाक दे दिया था. बैंक में चोरी की वारदात से करीब 3 महीने पहले वह किसी काम से गांव जरूर आया था.

पुलिस जांचपड़ताल में जुट गई. सुनील के दोस्तों और जानपहचान वालों की सूची बनाई गई. उन से पूछताछ की गई. पता चला कि वह मोहाली में एक दोस्त के साथ पेइंगगेस्ट के तौर पर पीजी में रहता था. पीजी पर जांच में सामने आया कि वह रात को बैंक में ड्यूटी करने के बाद कई बार सुबह पीजी पर नहीं आता था. वारदात के बाद भी वह कमरे पर नहीं आया था.

सुनील का सुराग हासिल करने के लिए पुलिस ने वारदात वाली रात बैंक के आसपास चालू रहे मोबाइल नंबरों का डेटा जुटाया. इन नंबरों की जांच की गई, लेकिन इन में से किसी भी नंबर से सुनील के मोबाइल पर बात नहीं हुई थी.

इस से पहले पुलिस यह मान रही थी कि वारदात में अगर सुनील के साथ दूसरे लोग भी शामिल हैं तो उन की मोबाइल पर आपस में कोई न कोई बात जरूर हुई होगी. इसी का पता लगाने के लिए बैंक के आसपास के मोबाइल टावरों से उस रात जुड़े रहे मोबाइल नंबरों की जांच की गई थी, लेकिन पुलिस का यह तीर भी खाली निकल गया.

पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज से ही क्लू हासिल करने के मकसद से कई बार फुटेज देखी, लेकिन इस से भी ऐसी कोई बात सामने नहीं आई, जिस से सुनील का पता लगता या जांच का नया सिरा मिलता. पुलिस सभी पहलुओं को ध्यान में रख कर जांच में जुटी रही.

अधिकारी यह मान रहे थे कि सुनील ने इतनी बड़ी वारदात करने के लिए पूरी योजना जरूर बनाई होगी. ऐसा नहीं हो सकता कि अचानक ही उस रात उस ने चोरी की हो. इस नजरिए से पुलिस को यह संदेह भी हुआ कि अगर उस ने योजनाबद्ध तरीके से इतनी बड़ी वारदात की है, तो वह भारत से बाहर भी जा सकता है. इस शक की बुनियाद पर पुलिस ने सुनील का लुकआउट नोटिस जारी करवा कर एयरपोर्ट और बंदरगाहों को सतर्क कर दिया.

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इस के साथ ही पुलिस इस बात की जांचपड़ताल में भी जुट गई कि क्या सुनील ने कोई पासपोर्ट बनवाया है या उस के पास पहले से पासपोर्ट तो नहीं है. 2 दिन तक जांच में प्रारंभिक तौर पर यही पता चला कि सुनील के नाम का कोई पासपोर्ट नहीं है.

जांचपड़ताल में जुटी पुलिस को 14 अप्रैल को पता चला कि सुनील को 2-3 दिन के दौरान पंचकूला के पास रायपुररानी में देखा गया है. पुलिस ने रायपुररानी पहुंच कर सूचनाएं जुटाईं. इस के बाद उसी दिन चंडीगढ़ पुलिस की क्राइम ब्रांच ने चंडीगढ़ आते समय मनीमाजरा शास्त्रीनगर ब्रिज के पास सुनील को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल कर ली.

बाद में पुलिस ने उस की निशानदेही पर 4 करोड़ 3 लाख 14 हजार रुपए बरामद कर लिए. पुलिस के लिए यह बड़ी सफलता थी. चोरी हुए 4 करोड़ 4 लाख रुपए में केवल 86 हजार रुपए ही कम थे. पुलिस ने सुनील से पूछताछ की. पूछताछ में बैंक से इतनी बड़ी चोरी करने और उस के पकड़े जाने की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है—

मोरनी इलाके के गांव बाबड़वाली भोज कुदाना का रहने वाला 32 साल का सुनील एक्सिस बैंक में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था. इस नौकरी से उस के शौक पूरे नहीं होते थे. घर वालों से उस के ज्यादा अच्छे संबंध नहीं थे. पत्नी से भी तलाक हो चुका था. वह शराब पीता था और महिलाओं से दोस्ती रखने के साथ दूसरे शौक भी करता था. उस के पास दूसरा कोई कामधंधा था नहीं, इसलिए पैसों के लिए हमेशा उस का हाथ तंग ही रहता था.

उसे पता था कि एक्सिस बैंक की जिस चेस्ट में वह नौकरी करता है, वहां हर समय करोड़ों रुपए बक्सों में भरे रहते हैं. वह सोचता था कि इन बक्सों से 20-30 लाख रुपए निकाल ले, तो उस की लाइफ बदल जाएगी. लेकिन बक्सों से नोट निकालना कोई आसान काम नहीं था. बैंक की चेस्ट में कड़ी सुरक्षा में नोटों के बक्से रहते थे. बक्सों पर ताले लगे होते थे. हर समय पुलिस का पहरा रहता था. चारों तरफ कैमरे लगे थे. वह यही सोचता रहता कि बक्सों से रुपए कैसे निकाले जाएं?

सुरक्षा के इतने तामझाम देख कर वह अपना मन मसोस कर रह जाता था. उसे लगता था कि सारे सपने अधूरे ही रह जाएंगे. तरहतरह की बातें सोच कर भले ही वह डर जाता था, लेकिन उस ने उम्मीदें नहीं छोड़ी थीं. वह मौके की तलाश में लगा रहता था. वह रात को कई बार शराब पी कर ड्यूटी देता था. 10 अप्रैल की रात भी वह शराब पी कर बैंक में ड्यूटी करने पहुंचा. रोजाना की तरह पंजाब पुलिस के जवान भी ड्यूटी पर आ गए. इन जवानों की ड्यूटी चेस्ट के बाहर रहती थी जबकि सुनील की ड्यूटी चेस्ट के अंदर तक रहती थी.

सुनील ने उस रात बैंक की चेस्ट में आनेजाने के दौरान देखा कि एक बक्सा पीछे से कुछ टूटा हुआ था. उस में से नोटों के पैकेट दिख रहे थे. यह देख कर सुनील को अपना सपना साकार होता नजर आया. उस ने तैनात पुलिसकर्मियों की नजर बचा कर उस बक्से का टूटा हुआ हिस्सा इतना तोड़ दिया कि उस में से नोटों के पैकेट आसानी से निकल सकें.

इस के बाद वह 2-3 बार बाहर तक आया और पुलिस वालों पर नजर डाली. उसे यह भरोसा हो गया कि ये पुलिस वाले उस पर किसी तरह का शक नहीं करेंगे. पूरी तरह यकीन हो जाने के बाद सुनील ने बक्से से नोटों के पैकेट निकाले और उन्हें अपने कपड़ों में छिपा कर बाहर आ गया. बाहर आ कर उस ने अपनी बाइक के पास वह नोटों के बंडल रख दिए.

करीब 20-30 मिनट के अंतराल में वह 5-6 चक्कर लगा कर 10-12 नोटों के बंडल बाहर ले आया. इस के बाद वह अपने पास रखे बैग में नोटों के बंडल रख कर बाहर ले आया. एक बंडल में 2-2 हजार के नोटों की 10 गड्डियां थीं. मतलब एक बंडल में 20 लाख रुपए थे. बैग में रख कर और कपड़ों में छिपा कर वह नोटों के 20 बंडल और 2 गड्डियां बाहर ला चुका था. ये सारे रुपए उस ने चेस्ट के बाहर छिपा दिए थे. तब तक रात के 3 बज चुके थे. अब वह जल्द से जल्द वहां से भाग जाना चाहता था.

उस ने मौका देखा. चेस्ट के बाहर पंजाब पुलिस के जवान सुस्ताते हुए बैठे थे. वह उन्हें बिना कुछ बताए चेस्ट के पीछे गया और छिपाए नोटों के बंडल बैग में रख कर अपनी बाइक ले कर चल दिया. कुछ दूर चलने के बाद उसने अपना मोबाइल तोड़ कर फेंक दिया ताकि पुलिस उस तक नहीं पहुंच सके.

बाइक से वह हल्लोमाजरा गया. वहां जंगल में एक गड्ढा खोद कर उस ने एक प्लास्टिक की थैली में रख कर 4 करोड़ रुपए दबा दिए. बाकी के 4 लाख रुपए ले कर वह बाइक से पंचकूला के पास रायपुररानी पहुंचा. वहां एक होटल में जा कर रुक गया.

होटल के कमरे में नरम बिस्तरों पर भी उसे नींद नहीं आई. वह बेचैनी से करवटें बदलता रहा. उसे 2 चिंताएं सता रही थीं. पहली अपने पकड़े जाने की और दूसरी जंगल में छिपाए 4 करोड़ रुपए की.

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बेचैनी में वह होटल से निकल कर रायपुररानी के बसस्टैंड पर आ गया. उस ने पहले अपनी मनपसंद का नाश्ता किया. फिर 24 हजार रुपए का नया मोबाइल फोन खरीदा. उसे सब से ज्यादा चिंता 4 करोड़ रुपए की थी. इसलिए वह बाइक से वापस हल्लोमाजरा गया. वहां जंगल में जा कर उस ने वह जगह देखी, जहां रुपए छिपाए थे. रुपए सुरक्षित थे. वह बाइक से वापस रायपुररानी आ गया. बाजार में घूमफिर कर उस ने नए कपड़े खरीदे और नशा किया.

सुनील अपनी पत्नी से तलाक ले चुका था. वह महिलाओं से दोस्ती रखता था और शादी की एक औनलाइन साइट पर ऐक्टिव रहता था. वह लगातार तलाकशुदा महिलाओं से बातचीत करता रहता था.

जांचपड़ताल के दौरान पुलिस को जब इन बातों का पता चला तो पुलिस ने उस के सोशल मीडिया अकाउंट को खंगाला. सोशल मीडिया अकाउंट से ही पुलिस को उस की लोकेशन का सुराग मिला और पता चला कि वह रायपुररानी में है.

पुलिस ने उसे 14 अप्रैल, 2021 को गिरफ्तार कर उस के पास से 3 लाख 14 हजार रुपए बरामद किए. इस के बाद उस की निशानदेही पर हल्लोमाजरा के जंगल में गड्ढा खोद कर छिपाए गए 4 करोड़ रुपए बरामद कर लिए. पुलिस ने उसे अदालत से एक दिन के रिमांड पर लेने के बाद 16 अप्रैल को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया.

पूछताछ में सामने आया कि सुनील ने अकेले ही चोरी की वारदात की. पहले इस तरह के बड़े अपराध नहीं करने के कारण वारदात के बाद वह काफी डर गया. डर की वजह से वह न तो सो सका और न ही कहीं भाग सका. वह 4 करोड़ रुपयों की सुरक्षा की चिंता में चंडीगढ़, मोहाली और पंचकूला के आसपास ही घूमता रहा.

प्रोफेशनल अपराधी नहीं होने के कारण वह न तो चोरी के रुपयों को ठिकाने लगा पाया और न ही अपने बचाव के बारे में सोच सका. दरअसल, चोरी की वारदात में उसे अपनी उम्मीद से बहुत ज्यादा एक साथ 4 करोड़ रुपए मिलने पर वह इतना बेचैन हो गया कि अपने शौक भी पूरे नहीं कर सका.

अटूट प्यार- भाग 1: यामिनी से क्यों दूर हो गया था रोहित

‘कितने मस्ती भरे दिन थे वे…’ बीते दिनों को याद कर यामिनी की आंखें भर आईं.

कालेज में उस का पहला दिन था. कैमिस्ट्री की क्लास चल रही थी. प्रोफैसर साहब कुछ भी पूछते तो रोहित फटाफट जवाब दे देता. उस की हाजिरजवाबी और विषय की गहराई से समझ देख यामिनी के दिल में वह उतरता चला गया.

कालेज में दाखिले के बाद पहली बार क्लास शुरू हुई थी. इसीलिए सभी छात्रछात्राओं को एकदूसरे को जाननेसमझने में कुछ दिन लग गए. एक दिन यामिनी कालेज पहुंची तो रोहित कालेज के गेट पर ही मिल गया. उस ने मुसकरा कर हैलो कहा और अपना परिचय दिया. यामिनी तो उस पर पहले दिन से ही मोहित थी. उस का मिलनसार व्यवहार देख वह खुश हो गई.

‘‘और मैं यामिनी…’’ उस ने भी अपना परिचय दिया तो रोहत ने उसे कैंटीन में अपने साथ कौफी पीने का औफर कर दिया. वह मना नहीं कर सकी.

साथ कौफी पीते हुए रोहित टकटकी लगा कर यामिनी को देखने लगा. यामिनी उस की नजरों का सामना नहीं कर पा रही थी. लेकिन उस के दिल में खुशी का तूफान उमड़ रहा था. क्लास में भी दोनों साथ बैठे रहे.

शाम को घर लौटते समय रोहित ने यामिनी से अचानक प्यार का इजहार कर दिया. वह भौंचक्की रह गई. लेकिन अगले ही पल शर्म से लाल हो गई और भाग कर रिकशे पर बैठ गई. थोड़ी देर बाद यामिनी ने पीछे मुड़ कर देखा. रोहित अब तक अपनी जगह पर खड़ा उसे ही देख रहा था.

यामिनी के दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं. खुशी से उस के होंठ लरज रहे थे. उस की आंखों में सिर्फ रोहित का मासूम चेहरा दिख रहा था. न जाने क्यों वह हर पल उसे करीब महसूस करने लगी.

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अगले दिन सुबह यामिनी की नींद खुली तो आदतन उस ने अपना मोबाइल चेक किया. रोहित ने मैसेज भेजा था, ‘सुप्रभात, आप का दिन मंगलमय हो.’

यामिनी देर  तक उस मैसेज को देखती रही और रोमांचित होती रही. वह भी उसे एक खूबसूरत सा जवाब देना चाहती थी. लेकिन क्या जवाब दे, सोचने लगी. मैसेज टाइप करने के लिए अनजाने में उस की उंगलियां आगे बढ़ीं. लेकिन वे कांपने लगीं.

यामिनी फिर रोहित के मैसेज को प्यार से देखने लगी और जवाब के लिए कोई अच्छा सा मैसेज सोचने लगी. लेकिन दिमाग जैसे जाम सा हो गया. अच्छा मैसेज सूझ ही नहीं रहा था. आखिरकार उस ने ‘आप को भी सुप्रभात’ टाइप कर मैसेज भेज दिया.

यामिनी की जिंदगी की एक नई शुरुआत हो चुकी थी. रोहित से मिलना, उसे देखना और प्यार भरी बातें करना यामिनी को अच्छा लगने लगा. एकदूसरे से मिले बिना उन्हें चैन नहीं आता. जिस दिन किसी प्रोफैसर के छुट्टी पर रहने के कारण क्लास नहीं रहती, उस दिन दोनों आसपास के किसी पार्क में चले जाते या बाजार घूमते. मस्तियों में उन के दिन गुजर रहे थे. हालांकि कालेज में दोनों को ले कर तरहतरह की बातें होने लगी थीं. लेकिन उन दोनों को कोई परवाह नहीं थी.

बातों ही बातों में यामिनी को मालूम हुआ कि रोहित के मातापिता इस दुनिया में नहीं हैं. एक ऐक्सीडैंट में उन की मौत हो गई थी. रोहित के चाचाचाची ही उस की देखभाल कर रहे थे. रोहित का घर शहर से दूर एक गांव में था. वह यहां किराए का कमरा ले कर कालेज की पढ़ाई कर रहा था. रोहित पढ़ाई में अच्छा था. इसीलिए यामिनी को उस से मदद मिल जाती थी पढ़ाई में.

एक दिन यामिनी कालेज गई तो पाया कि रोहित कालेज नहीं आया है. बहुत देर इंतजार करने के बाद यामिनी ने उसे फोन किया, लेकिन रोहित ने फोन नहीं उठाया. जब यामिनी ने कई बार फोन किया तब रोहित ने काल रिसीव किया और दबी आवाज में बोला, ‘‘यामिनी, मैं कालेज नहीं आ पाऊंगा. बुखार है मुझे. तुम परेशान नहीं होना. मैं ठीक होते ही आऊंगा.’’

दूसरे दिन भी रोहित कालेज नहीं आया. इसीलिए कालेज में यामिनी का मन नहीं लग रहा था. उसे रहरह कर रोहित का खयाल आता. उस ने सोचा, ‘कहीं रोहित की बीमारी बढ़ न जाए. उस से मिलने जाना चाहिए. पता नहीं अकेले किस हाल में है? दवा ले रहा है या नहीं. खाना कैसे खा रहा है.’

बहुत मुश्किल से ढूंढ़तेढूंढ़ते यामिनी रोहित के कमरे पर पहुंची. देर तक दस्तक देने के बाद रोहित ने दरवाजा खोला. उस का बदन तप रहा था. उस की हालत देख कर दया से ज्यादा गुस्सा आ गया यामिनी को. बोली, ‘‘इतनी तेज बुखार है और तुम ने बताया भी नहीं. दवा ली क्या? घर पर किसी को बताया?’’

रोहित अधखुली पलकों से यामिनी को देखते हुए शिथिल आवाज में बोला, ‘‘नहीं. चाचाचाची को कष्ट नहीं देना चाहता और डाक्टर के पास जाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई.’’

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2 दिनों में ही बहुत कमजोर पड़ गया था रोहित. आंखों के नीचे कालापन दिखने लगा था. यामिनी का मन रो पड़ा. रोहित ने शायद कुछ खाया भी नहीं था, क्योंकि खाना वह खुद बनाता था. होटल से लाया हुआ खाना एक स्टूल पर पड़ा था और सूख चुका था. एक शीशे के गिलास में थोड़ा सा पानी था. एक बिस्कुट का अधखुला पैकेट बगल में पड़ा था. कमरा भी अस्तव्यस्त था.

यह सब देख यामिनी से रहा नहीं गया. वह कमरा साफ करने लगी. रोहित हाथ के इशारे से मना करता रहा. पर यामिनी उसे आराम करने को कह कर सफाई में लगी रही. कमरे की सफाई करने के बाद वह पास की दुकान से ब्रैड और दूध ले आई और रोहित को खाने को दिया. रोहित एक ही ब्रैड खा पाया.

रोहित की हालत ठीक नहीं थी. वह अकेला था. यामिनी पास के एक डाक्टर से संपर्क कर दवा ले आई और रोहित को खिलाई. वह शाम तक उसी के पास बैठी रही. रोहित आंखों में आंसू लिए यामिनी को देखता रहा. यामिनी उसे बारबार समझाती, ‘‘मुझ से जितना होगा करूंगी. रोते क्यों हो?’’

‘‘तुम कितनी अच्छी हो यामिनी. बचपन से मैं प्यार को तरसा हूं. मम्मीपापा मुझे छोड़ कर चले गए. साथ में मेरी सारी खुशियां भी ले गए. चाचाचाची ने मुझे आश्रय जरूर दिया. लेकिन एक बोझ समझ कर. उन से प्यार कभी नहीं मिला. जब तुम मेरी जिंदगी में आई तो मैं ने जाना कि प्यार क्या होता है? तुम्हारा प्यार, तुम्हार सेवाभाव देख कर मुझे अपने मम्मीपापा की याद आ गई. इसीलिए मेरी आंखों में आंसू आ गए.

‘‘खैर मुझे अपने चाचाचाची से कोई शिकायत नहीं है. मैं उन की अपनी औलाद तो नहीं हूं. लेकिन बचपन से मुझे किसी का साया तो नसीब हुआ,’’ रोहित की आंखों से आंसू की धारा बह रही थी.

‘‘बस करो रोहित. अभी यह सब सोचने का वक्त नहीं. स्वास्थ्य पर ध्यान दो. खुद को अकेला नहीं समझो. मैं साथ देने से कभी पीछे नहीं हटूंगी,’’ कहते हुए यामिनी ने दुपट्टे से रोहित के आंसू पोंछ दिए.

वह करीब 2 घंटे तक रोहित के पास बैठी रही. शाम होने को आ गई थी. दवा के प्रभाव से रोहित को पसीना आ गया था. बुखार कम हुआ तो वह कुछ अच्छा महसूस करने लगा था. यामिनी ने कहा, ‘‘अब मैं चलूंगी. घर पर सब मेरा इंतजार कर रहे होंगे. तुम रात में दूध गरम कर ब्रैड के साथ ले लेना. दवा भी ले लेना. किसी तरह की परेशानी हो तो फोन जरूर करना. यह नहीं सोचना कि मैं क्या कर पाऊंगी? तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकती हूं.’’

रोहित को ढांढ़स बंधा कर यामिनी अपने घर आ गई. लेकिन उसे चिंता होती रही. रात में वह सब की नजर बचा कर घर की छत पर गई और फोन कर रोहित का हाल पूछा. रोहित ने कहा कि अभी वह ठीक महसूस कर रहा है. यह जान कर यामिनी को राहत महसूस हुई.

चौथे दिन रोहित ठीक हो गया. यामिनी पिछले 2 दिन उस के घर गई थी. सब से नजर बचा कर वह रोहित के लिए घर से खाना ले जाती थी और घंटों उस के पास बैठ कर बातें करती थी. 5वें दिन रोहित कालेज आया तो यामिनी बहुत खुश हुई. उस के ठीक होने की खुशी में वह उस के गले से लिपट गई. यामिनी अब रोहित के बहुत करीब आ चुकी थी.

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ऐसे ही 3 साल कब बीत गए उन्हें एहसास ही न हुआ. खुशियों के वे पल जैसे पंख लगा कर उड़ गए और उन के जुदाई के दिन आ गए. दरअसल, उन की कालेज की पढ़ाई पूरी हो गई थी. रोहित ने आगे की पढ़ाई के लिए कालेज में ही पुन: दाखिला ले लिया. वह प्रोफैसर बनना चाहता था. लेकिन यामिनी के आगे की पढ़ाई के लिए उस के पापा ने मना कर दिया. इसीलिए अब उस का रोहित से मिलनाजुलना बेहद मुश्किल हो गया. हर पल उसे रोहित की याद आती. रोहित से दूर रहने के कारण उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता.

यामिनी के मम्मीपापा अब उस की शादी कर के अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे. इसीलिए यामिनी के लिए लड़का ढूंढ़ा जाने लगा था. उस का घर से बाहर निकलना बंद कर दिया गया था. रोहित से दिल की बात कहना भी कठिन हो गया उस के लिए. मोबाइल फोन का ही आसरा रह गया था. वह जब भी मौका पाती, रोहित को फोन कर देती और उसे कुछ करने के लिए कहती ताकि दोनों हमेशा के लिए एक हो जाएं. लेकिन रोहित को कोई उपाय नहीं दिखता.

जब घर में शादी की बात चलती तो यामिनी की हालत बुरी हो जाती. रोहित से दूर होने की बात सोच कर उस का मन अजीब हो जाता. अपने मम्मीपापा को रोहित के बारे में बताने की उस की हिम्मत नहीं होती थी. पापा पुलिस में थे. इसीलिए गरम मिजाज के थे. हालांकि शायद ही वह कभी गुस्सा हुए हों यामिनी पर. वह उन की इकलौती बेटी जो थी.

एक दिन यामिनी को उस की मां ने बताया कि उसे देखने कुछ मेहमान आएंगे. लड़का डाक्टर है. यह जान कर यामिनी की आंखों से आंसू निकल गए. वह किसी तरह सब से बच कर रोहित से मिलने गई. उस के गले से लिपट कर रो पड़ी. जब उस ने अपने लिए लड़का देखे जाने की बात बताई तो रोहित भी अपने आंसू नहीं रोक पाया.

तभी यामिनी बोली, ‘‘रोहित, तुम मुझे मेरे पापा से मांग लो. तुम्हारे बिना मैं जी नहीं पाऊंगी.’’

उलझे रिश्ते- भाग 2: क्या प्रेमी से बिछड़कर खुश रह पाई रश्मि

Writer- Ravi

‘‘जानती हूं पर यह कौन सा तरीका है?’’ रश्मि ने प्यार से समझाने की कोशिश की,  ‘‘कुछ दिन इंतजार करो मिस्टर. रश्मि तुम्हारी है. एक दिन पूरी तरह तुम्हारी हो जाएगी.’’ परंतु सुधीर पर कोई असर नहीं हुआ. हद से आगे बढ़ता देख रश्मि ने सुधीर को धक्का दिया और हिरणी सी कुलांचे भरती हुई घर से बाहर निकल गई. उस रात रश्मि सो नहीं पाई. उसे सुधीर का यों बांहों में लेना अच्छा लगा. कुछ देर और रुक जाती तो…सोच कर सिहरन सी दौड़ गई. और एक दिन ऐसा आया जब पढ़ाई की आड़ में चल रहा प्यार का खेल पकड़ा गया. दोनों अब तक बी.कौम अंतिम वर्ष में प्रवेश कर चुके थे और एकदूजे में इस कदर खो चुके थे कि उन्हें आभास भी नहीं था कि इस रिश्ते को रश्मि के पिता और भाई कतई स्वीकार नहीं करेंगे. उस दिन रश्मि के घर कोई नहीं था. वह अकेली थी कि सुधीर पहुंच गया. उसे देख रश्मि की धड़कनें बढ़ गईं. वह बोली,  ‘‘सुधीर जाओ तुम, पापा आने वाले हैं.’’

‘‘तो क्या हो गया. दामाद अपने ससुराल ही तो आया है,’’ सुधीर ने मजाकिया लहजे में कहा.

‘‘नहीं, तुम जाओ प्लीज.’’

‘‘रुको डार्लिंग यों धक्के मार कर क्यों घर से निकाल रही हो?’’ कहते हुए सुधीर ने रश्मि को अपनी बांहों में भर लिया. तभी जो न होना चाहिए था वह हो गया. रश्मि के पापा ने अचानक घर में प्रवेश किया और दोनों को एकदूसरे की बांहों में समाया देख आगबबूला हो गए. फिर पता नहीं कितने लातघूंसे सुधीर को पड़े. सुधीर कुछ बोल नहीं पाया. बस पिटता रहा. जब होश आया तो अपने घर में लेटा हुआ था. सुधीर और रश्मि के परिवारजनों की बैठक हुई. सुधीर की मम्मी ने प्रस्ताव रखा कि वे रश्मि को बहू बनाने को तैयार हैं. फिर काफी सोचविचार हुआ. रश्मि के पापा ने कहा,  ‘‘बेटी को कुएं में धकेल दूंगा पर इस लड़के से शादी नहीं करूंगा. जब कोई काम नहीं करता तो क्या खाएगाखिलाएगा?’’ आखिर तय हुआ कि रश्मि की शादी जल्द से जल्द किसी अच्छे परिवार के लड़के से कर दी जाए. रश्मि और सुधीर के मिलने पर पाबंदी लग गई पर वे दोनों कहीं न कहीं मिलने का रास्ता निकाल ही लेते. और एक दिन रश्मि के पापा ने घर में बताया कि दिल्ली से लड़के वाले आ रहे हैं रश्मि को देखने. यह सुन कर रश्मि को अपने सपने टूटते नजर आए. उस ने कुछ नहीं खायापीया.

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भाभी ने समझाया, ‘‘यह बचपना छोड़ो रश्मि, हम इज्जतदार खानदानी परिवार से हैं. सब की इज्जत चली जाएगी.’’

‘‘तो मैं क्या करूं? इस घर में बच्चों की खुशी का खयाल नहीं रखा जाता. दोनों दीदी कौन सी सुखी हैं अपने पतियों के साथ.’’

‘‘तेरी बात ठीक है रश्मि, लेकिन समाज, परिवार में ये बातें माने नहीं रखतीं. तेरे गम में पापा को कुछ हो गया तो…उन्होंने कुछ कर लिया तो सब खत्म हो जाएगा न.’’

रश्मि कुछ नहीं बोल पाई. उसी दिन दिल्ली से लड़का संभव अपने छोटे भाई राजीव और एक रिश्तेदार के साथ रश्मि को देखने आया. रश्मि को देखते ही सब ने पसंद कर लिया. रिश्ता फाइनल हो गया. जब यह बात सुधीर को रश्मि की एक सहेली से पता चली तो उस ने पूरी गली में कुहराम मचा दिया,  ‘‘देखता हूं कैसे शादी करते हैं. रश्मि की शादी होगी तो सिर्फ मेरे साथ. रश्मि मेरी है.’’ पागल सा हो गया सुधीर. इधरउधर बेतहाशा दौड़ा गली में. पत्थर मारमार कर रश्मि के घर की खिड़कियों के शीशे तोड़ डाले. रश्मि के पिता के मन में डर बैठ गया कि कहीं ऐसा न हो कि लड़के वालों को इस बात का पता चल जाए. तब तो इज्जत चली जाएगी. सब हालात देख कर तय हुआ कि रश्मि की शादी किसी दूसरे शहर में जा कर करेंगे. किसी को कानोंकान खबर भी नहीं होगी. अब एक तरफ प्यार, दूसरी तरफ मांबाप के प्रति जिम्मेदारी. बहुत तड़पी, बहुत रोई रश्मि और एक दिन उस ने अपनी भाभी से कहा, ‘‘मैं अपने प्यार का बलिदान देने को तैयार हूं. परंतु मेरी एक शर्त है. मुझे एक बार सुधीर से मिलने की इजाजत दी जाए. मैं उसे समझाऊंगी. मुझे पूरी उम्मीद है वह मान जाएगा.’’

भाभी ने घर वालों से छिपा कर रश्मि को सुधीर से आखिरी बार मिलने की इजाजत दे दी. रश्मि को अपने करीब पा कर फूटफूट कर रोया सुधीर. उस के पांवों में गिर पड़ा. लिपट गया किसी नादान छोटे बच्चे की तरह,  ‘‘मुझे छोड़ कर मत जाओ रश्मि. मैं नहीं जी  पाऊंगा, तुम्हारे बिना. मर जाऊंगा.’’ यंत्रवत खड़ी रह गई रश्मि. सुधीर की यह हालत देख कर वह खुद को नहीं रोक पाई. लिपट गई सुधीर से और फफक पड़ी, ‘‘नहीं सुधीर, तुम ऐसा मत कहो, तुम बच्चे नहीं हो,’’ रोतेरोते रश्मि ने कहा.

‘‘नहीं रश्मि मैं नहीं रह पाऊंगा, तुम बिन,’’ सुबकते हुए सुधीर ने कहा.

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‘‘अगर तुम ने मुझ से सच्चा प्यार किया है तो तुम्हें मुझ से दूर जाना होगा. मुझे भुलाना होगा,’’ यह सब कह कर काफी देर समझाती रही रश्मि और आखिर अपने दिल पर पत्थर रख कर सुधीर को समझाने में सफल रही. सुधीर ने उस से वादा किया कि वह कोई बखेड़ा नहीं करेगा. ‘‘जब भी मायके आऊंगी तुम से मिलूंगी जरूर, यह मेरा भी वादा है,’’ रश्मि यह वादा कर घर लौट आई. पापा किसी तरह का खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे, इसलिए एक दिन रात को घर के सब लोग चले गए एक अनजान शहर में. रश्मि की शादी दिल्ली के एक जानेमाने खानदान में हो गई. ससुराल आ कर रश्मि को पता चला कि उस के पति संभव ने शादी तो उस से कर ली पर असली शादी तो उस ने अपने कारोबार से कर रखी है. देर रात तक कारोबार का काम निबटाना संभव की प्राथमिकता थी. रश्मि देर रात तक सीढि़यों में बैठ कर संभव का इंतजार करती. कभीकभी वहीं बैठेबैठे सो जाती. एक तरफ प्यार की टीस, दूसरी तरफ पति की उपेक्षा से रश्मि टूट कर रह गई. ससुराल में पासपड़ोस की हमउम्र लड़कियां आतीं तो रश्मि से मजाक करतीं  ‘‘आज तो भाभी के गालों पर निशान पड़ गए. भइया ने लगता है सारी रात सोने नहीं दिया.’’ रश्मि मुसकरा कर रह जाती. करती भी क्या, अपना दर्द किस से बयां करती? पड़ोस में ही महेशजी का परिवार था. उन के एक कमरे की खिड़की रश्मि के कमरे की तरफ खुलती थी. यदाकदा रात को वह खिड़की खुली रहती तो महेशजी के नवविवाहित पुत्र की प्रणयलीला रश्मि को देखने को मिल जाती. तब सिसक कर रह जाने के सिवा और कोई चारा नहीं रह जाता था रश्मि के पास.

संभव जब कभी रात में अपने कामकाज से जल्दी फ्री हो जाता तो रश्मि के पास चला आता. लेकिन तब तक संभव इतना थक चुका होता कि बिस्तर पर आते ही खर्राटे भरने लगता. एक दिन संभव कारोबार के सिलसिले में बाहर गया था और रश्मि तपती दोपहर में  फर्स्ट फ्लोर पर बने अपने कमरे में सो रही थी. अचानक उसे एहसास हुआ कोई उस के बगल में आ कर लेट गया है. रश्मि को अपनी पीठ पर किसी मर्दाना हाथ का स्पर्श महसूस हुआ. वह आंखें मूंदे पड़ी रही. वह स्पर्श उसे अच्छा लगा. उस की धड़कनें तेज हो गईं. सांसें धौंकनी की तरह चलने लगीं. उसे लगा शायद संभव है, लेकिन यह उस का देवर राजीव था. उसे कोई एतराज न करता देख राजीव का हौसला बढ़ गया तो रश्मि को कुछ अजीब लगा. उस ने पलट कर देखा तो एक झटके से बिस्तर पर उठ बैठी और कड़े स्वर में राजीव से कहा कि जाओ अपने रूम में, नहीं तो तुम्हारे भैया को सारी बात बता दूंगी, तो वह तुरंत उठा और चला गया. उधर सुधीर ने एक दिन कहीं से रश्मि की ससुराल का फोन नंबर ले कर रश्मि को फोन किया तो उस ने उस से कहा कि सुधीर, तुम्हें मैं ने मना किया था न कि अब कभी मुझ से संपर्क नहीं करना. मैं ने तुम से प्यार किया था. मैं उन यादों को खत्म नहीं करना चाहती. प्लीज, अब फिर कभी मुझ से संपर्क न करना. तब उम्मीद के विपरीत रश्मि के इस तरह के बरताव के बाद सुधीर ने फिर कभी रश्मि से संपर्क नहीं किया.

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Romantic Story in Hindi- रिश्तों की परख: भाग 3

लेखक- शैलेंद्र सिंह परिहार

हमेशा ठंडे दिमाग से काम लेने वाली मम्मी क्रोधित हो गई थीं, ‘नहीं करना किसी के फोनवोन का इंतजार, दूसरा लड़का देखना शुरू कर दीजिए.’

‘पागल न बनो,’ पापा ने समझाया था, ‘अपनी बेटी को यह सपना तुम ने ही दिखाया था, पल भर में उसे कैसे तोड़ दोगी? कभी सोचा है उस के दिल को कितनी ठेस लगेगी?’

एक दिन मां ने मुझ से कहा था, ‘बेटी, कमल शादी के लिए तैयार नहीं है. कहता है कि यदि उस की जबरन शादी की गई तो वह आत्महत्या कर लेगा, अब तू ही बता, हम लोग क्या करें?’

मैं इतना ही पूछ पाई थी, ‘वह इस समय कहां है?’

‘कहां होगा…वहीं…इलाहाबाद में मर रहा है,’ मम्मी ने गुस्से से कहा था.

‘मैं उस से एक बार मिलूंगी…एक बार मां…बस, एक बार,’ मैं ने रोते हुए कहा था.

पापा मुझे ले कर इलाहाबाद गए थे. वह अपने कमरे में ही मिला था. बाल बिखरे हुए, दाढ़ी बढ़ी हुई, कपड़े अस्तव्यस्त, हालत पागलों की तरह लग रही थी. पापा मुझे छोड़ कर कमरे से बाहर चले गए. औपचारिक बातचीत होने के बाद वह मुझ से बोला था, ‘तुम लड़कियों को क्या चाहिए, बस, एक अच्छा सा पति, एक सुंदर सा घर, बालबच्चे और घरखर्च के लिए हर महीने कुछ पैसे. लेकिन मेरे सपने दूसरे हैं. अभी शादी के बारे में सोच भी नहीं सकता. तुम जहां मन करे शादी कर लो.’

कमल की बातें सुन कर मुझे भी क्रोध आ गया था, ‘तुम मुझे अपने पास न रखो, लेकिन शादी तो कर सकते हो, मेरे मांबाप भी चिंतामुक्त हों, कब तक वह लोग तुम्हारे आई.ए.एस. बन जाने का इंतजार करते रहेंगे?’

मेरी बात सुनते ही वह गुस्से से चीख पड़ा, ‘इंतजार नहीं कर सकती हो तो मर जाओ लेकिन मेरा पीछा छोड़ो…प्लीज…’

उस की बात सुन मैं सन्न रह गई थी. एक ही पल में 10 सालों से संजोया हुआ स्वप्न बिखर गया था. सोच रही थी, क्या यह वही कमल है? मन से निकली हूक तब शब्दों में इस तरह फूटी थी कि मरूंगी तो नहीं लेकिन एक बात कहती हूं, जब किसी बेबस की ‘आह’ लगती है तो मौत भी नसीब नहीं होती मिस्टर कमलकांत वर्मा, और इसे याद रखना.

घर आ कर मैं मम्मी से बोली थी, ‘आप लोग जहां भी मेरी शादी करना चाहें कर सकते हैं, लेकिन जिस से भी कीजिएगा उसे मेरी पिछली जिंदगी के बारे में पता होना चाहिए.’

1 वर्ष के अंदर ही मेरी शादी सुप्रीम कोर्ट के वकील गौरव के साथ हो गई. एक जमाने में उन के पापा वहीं के जानेमाने वकील थे. हम लोग दिल्ली में ही रहने लगे. गौरव जैसा चाहने वाला पति पा कर मैं कमल को भूल सी गई. साल भर में एक बार ही मायके जाना हो पाता था. इस बार तो अकेली ही जा रही थी. गौरव को कोर्ट का कुछ आवश्यक काम निकल आया था.

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मैं ने घड़ी की तरफ देखा, रात के 3 बज रहे थे. ट्रेन अपनी गति से चली जा रही थी कि अचानक कर्णभेदी धमाका हुआ और आंखों के सामने अंधेरा सा छाता चला गया. जब होश आया तो खुद को अस्पताल में पाया. गौरव भी आ चुके थे. एक ही ट्रैक पर 2 ट्रेनें आ गई थीं. आमनेसामने की टक्कर थी. कई लोग मारे गए थे. सैकड़ों लोग घायल हुए थे. मैं जिस बोगी में थी वह पीछे थी इसलिए कोई खास क्षति नहीं हुई थी फिर भी बेटे की हालत गंभीर थी. उसे 5-6 घंटे बाद होश आया था. 2 दिन बाद जब मैं डिस्चार्ज हो कर जा रही थी तो नर्स ने मुझे एक खत ला कर यह कहते हुए दिया कि मैडम, यह आप के लिए है…देना भूल गई थी…माफ कीजिएगा.

मैं ने आश्चर्य से पूछा था, ‘‘किस ने दिया?’’

‘‘वही, जो आप लोगों को यहां तक ले कर आया था. क्या आप नहीं जानतीं?’’

‘‘नहीं?’’

‘‘कमाल है,’’ नर्स आश्चर्य से बोल रही थी, ‘‘उस ने आप की मदद की, आप के बेटे को अपना खून भी डोनेट किया और आप कहती हैं कि आप उस को नहीं जानतीं?’’

मैं आतुरता से खत को पढ़ने लगी :

‘स्नेह,

सोचा था कि अपने किए की माफी मांग लूंगा लेकिन मृत्यु के इस तांडव ने मौका ही नहीं दिया. रिजर्वेशन टिकट पर ही गौरव का मोबाइल नंबर था. उन्हें फोन कर दिया है. वह जब तक नहीं आते मैं यहां रहूंगा. हो सके तो मुझे माफ कर देना. तुम्हारा गुनाहगार कमल.’

पत्र को गौरव ने भी पढ़ा था. ‘‘अच्छा तो वह कमल था…’’

गौरव खोएखोए से बोले थे, ‘‘सचमुच उस ने बड़ी मदद की, हमारे बेटे को एक नया जीवन दिया है.’’

बात आईगई हो गई. पीछे गौरव को एक केस में काफी व्यस्त पाया था. पूछने पर बस यही कहते, ‘‘समझ लो स्नेह, एक महत्त्वपूर्ण केस है. यदि जीत गया तो बड़ा आत्मिक सुख मिलेगा.’’

1 वर्ष तक केस चलता रहा, फैसला हुआ, गौरव के पक्ष में ही. वह उस दिन खुशी से पागल हो रहे थे. शाम को आते ही बोले, ‘‘यार, जल्दी से अच्छी- अच्छी चीजें बना लो, मेरा एक दोस्त आ रहा है, आई.ए.एस. है.’’

‘‘कौन दोस्त?’’ मैं ने पूछा था.

‘‘जब आएगा तो खुद ही उसे देख लेना, मैं उसी को लेने जा रहा हूं.’’

कुछ देर बाद गौरव वापस आए थे और अपने साथ जिसे ले कर आए थे उसे देख कर मैं अवाक् रह गई. यह तो ‘कमल’ है लेकिन यह कैसे हो सकता है?

‘‘स्नेह,’’ गौरव ने प्यार से कहा था, ‘‘तुम्हें आहत कर के इस ने भी कोई सुख नहीं पाया है. हमारी शादी के 1 साल बाद इस का आई.ए.एस. में चयन हुआ था. लेकिन तब तक लगातार मिलती असफलताओं ने इसे विक्षिप्त कर दिया था. यह पागलों की तरह हरकतें करने लगा था. इस कारण आयोग ने इस की नियुक्ति को भी निरस्त कर दिया था.

‘‘3 साल तक मेंटल हास्पिटल में रहने के बाद जब यह ठीक हुआ तो सब से पहले तुम्हारे ही घर गया, तुम से माफी मांगने के लिए. लेकिन पापाजी ने इसे हमारा पता ही नहीं दिया था और फिर जीवन से निराश, जीवनयापन के लिए इस ने टी.सी. की नौकरी कर ली. आज मैं इसी का केस जीता हूं, अदालत ने इस की पुन: नियुक्ति का फैसला दिया है. आज यह फिर तुम से माफी मांगने ही आया है.’’

वर्षों बाद मुझे वही कमल दिखा था, जिस से मैं पहली बार मिली थी, शर्मीला और संकोची. उस ने अपने दोनों हाथ मेरे सामने जोड़ दिए थे. मुझ से नजर मिलाने का साहस नहीं कर पा रहा था. उस की आंखों से प्रायश्चित्त के आंसू बह निकले, ‘‘स्नेह, मैं तुम्हारा अपराधी हूं, एक लक्ष्य पाने के लिए जीवन के ही लक्ष्य को भूल गया था…आप के कहे शब्द…आज भी मेरे हृदय में कांटे की तरह चुभते हैं…लगता है आज भी एक आह मेरा पीछा कर रही है…हो सके तो मुझे माफ कर दो.’’

‘‘कमल,’’ मैं ने भरे गले से कहा, ‘‘मैं ने तो तुम्हें उसी दिन माफ कर दिया था जिस दिन तुम ने मेरी ममता की रक्षा की थी. अब तुम से कोई शिकायत नहीं…तुम जहां भी रहो खुश रहो, यह मेरे मन की आवाज है.’’

‘‘हां, कमल,’’ गौरव भी उसे समझाते हुए बोले थे, ‘‘कल तुम ने एक रिश्ते को परखने में भूल की थी, आज फिर से वही भूल मत करना, मातापिता को खुश रखना, अपना घरसंसार बसाना और अपनी शादी में हमें भी बुलाना…भूल तो न जाओगे?’’

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वह गौरव के गले लग रो पड़ा. निर्मल जल के उस शीतल प्रवाह ने हमारे हृदय के सारे मैल को एक ही पल में धो दिया.

‘‘7 वर्षों तक दिशाहीन और पागलों सा जीवन व्यतीत किया है मैं ने, मर ही चुका था, आप ने तो मुझे नया जीवन ही दिया…कैसे भूल जाऊंगा.’’

कमल के जाने के बाद मैं गौरव के सीने से लगते हुए बोली थी, ‘‘गौरव, सचमुच मुझे आप पर गर्व है…लेकिन यह क्या, आप की आंखों में भी आंसू.’’

‘‘हां…खुशी के हैं, जानती हो सच्चा प्रायश्चित्त वही होता है जब आंसू उस की आंखों से भी निकलें जिन के लिए प्रायश्चित्त किया गया हो, आज कमल का प्रायश्चित्त पूरा हुआ.’’

पति की बात सुन कर स्नेह भी अपनेआप को रोने से न रोक सकी.

Family Story in Hindi- खुशियों की दस्तक: भाग 2

‘‘मैं आप का दर्द समझता हूं. मैं भी इन्हीं परिस्थितियों से गुजर रहा हूं. कितनी खूबसूरत थी मेरी जिंदगी और आज क्या हो गई,’’ कौस्तुभ ने कहा. एकदूसरे का दर्द बांटतेबांटते कौस्तुभ और प्रिया ने एकदूसरे का नंबर भी शेयर कर लिया. फिर अकसर दोनों के बीच बातें होने लगीं. दोनों को एकदूसरे का साथ पसंद आने लगा. वैसे भी दोनों की जिंदगी एक सी ही थी. एक ही दर्द से गुजर रहे थे दोनों. एक दिन घर वालों के सुझाव पर दोनों ने शादी का फैसला कर लिया. कोर्ट में सादे समारोह में उन की शादी हो गई.कौस्तुभ को एक नाइट कालेज में नौकरी मिल गई. साथ ही वह शिक्षा से जुड़ी किताबें भी लिखने लगा और अनुवाद का काम भी करने लगा. 2 साल के अंदर उन के घर एक चांद सा बेटा हुआ. बच्चा पूर्ण स्वस्थ था और चेहरा बेहद खूबसूरत. दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा. बेटे को अच्छी शिक्षा दिला कर ऊंचे पद पर पहुंचाना ही अब उन का लक्ष्य बन गया था. बच्चा पिता की तरह तेज दिमाग का और मां की तरह आकर्षक निकला. मगर थोड़ा सा बड़ा होते ही वह मांबाप से कटाकटा सा रहने लगा. वह अपना अधिकांश वक्त दादादादी या रामू काका के पास ही गुजारता, जिसे उस की देखभाल के लिए रखा गया था.

कौस्तुभ समझ रहा था कि वह बच्चा है, इसलिए उन के जले हुए चेहरों को देख कर डर जाता है. समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. लेकिन 8वीं कक्षा के फाइनल ऐग्जाम के बाद एक दिन उस ने अपने दादा से जिद की, ‘‘बाबा, मुझे होस्टल में रह कर पढ़ना है.’’

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‘‘पर ऐसा क्यों बेटे?’’ बाबा चौंक उठे थे.कौस्तुभ तो अपने बेटे को शहर के सब से अच्छे स्कूल में डालने वाला था. इस के लिए कितनी कठिनाई से दोनों ने पैसे इकट्ठा किए थे. मगर बच्चे की बात ने सभी को हैरत में डाल दिया. दादी ने लाड़ लड़ाते हुए पूछा था, ‘‘ऐसा क्यों कह रहे हो बेटा, भला यहां क्या प्रौब्लम है तुम्हें? हम इतना प्यार करते हैं तुम से, होस्टल क्यों जाना चाहते हो?’’ मोहित ने साफ शब्दों में कहा था, ‘‘मेरे दोस्त मुझे चिढ़ाते हैं. वे कहते हैं कि तुम्हारे मांबाप कितने बदसूरत हैं. इसीलिए वे मेरे घर भी नहीं आते. मैं इन के साथ नहीं रहना चाहता.’’ मोहित की बात पर दादी एकदम से भड़क उठी थीं, ‘‘ये क्या कह रहे हो? तुम तो जानते हो कि मम्मीपापा कितनी मेहनत करते हैं तुम्हारे लिए, तभी तुम्हें नएनए कपड़े और किताबें ला कर देते हैं. और तुम्हें कितना प्यार करते हैं, यह भी जानते हो तुम. फिर भी ऐसी बातें कर रहे हो.’’ तभी कौस्तुभ ने मां का हाथ दबा कर उन्हें चुप रहने का इशारा किया और दबे स्वर में बोला, ‘‘ये क्या कर रही हो मम्मी? बच्चा है, इस की गलती नहीं.’’

मगर कई दिनों तक मोहित इसी बात पर अड़ा रहा कि उसे होस्टल में रह कर पढ़ना है, यहां नहीं रहना. दादादादी इस के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे. आखिर पूरे घर में चहलपहल उसी की वजह से तो रहती थी. तब एक दिन कौस्तुभ ने अपनी मां को समझाया, ‘‘मां, मैं चाहता हूं, हमारा बच्चा न सिर्फ शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहे और इस के लिए जरूरी है कि हम उसे अपने से दूर रखें. वह हमारे साथ रहेगा तो जाहिर है कभी भी खुश और मानसिक रूप से मजबूत नहीं बन सकेगा. मेरी गुजारिश है कि वह जो चाहता है, उसे वैसा ही करने दो. मैं कल ही देहरादून के एक अच्छे स्कूल में इस के दाखिले का प्रयास करता हूं. भले ही वहां फीस ज्यादा है पर हमारे बच्चे की जिंदगी संवर जाएगी. उसे वह मिल जाएगा, जिस का वह हकदार है और जो मुझे नहीं मिल सका.’’

2 सप्ताह के अंदर ही कौस्तुभ ने प्रयास कर के मोहित का ऐडमिशन देहरादून के एक अच्छे स्कूल में करा दिया, जहां उसे 70 हजार डोनेशन के देने पड़े. पर बच्चे की ख्वाहिश पूरी करने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था. मोहित को विदा करने के बाद प्रिया बहुत रोई थी. उसे लग रहा था जैसे मोहित हमेशा के लिए उस से बहुत दूर जा चुका है. और वास्तव में ऐसा ही हुआ. छुट्टियों में भी मोहित आता तो बहुत कम समय के लिए और उखड़ाउखड़ा सा ही रहता. उधर उस के पढ़ाई के खर्चे बढ़ते जा रहे थे जिन्हें पूरा करने के लिए कौस्तुभ और प्रिया को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही थी. समय बीतते देर नहीं लगती. मोहित अब बड़ा हो चुका था. उस ने बीए के बाद एम.बी.ए. करने की जिद की. अबतक कौस्तुभ के मांबाप दिवंगत हो चुके थे. कौस्तुभ और प्रिया स्वयं ही एकदूसरे की देखभाल करते थे. उन्होंने एक कामवाली रखी थी, जो घर के साथ बाहर के काम भी कर देती थी. इस से उन्हें थोड़ा आराम मिल जाता था. मगर जब मोहित ने एम.बी.ए. की जिद की तो कौस्तुभ के लिए पैसे जुटाना एक कठिन सवाल बन कर खड़ा हो गया. कम से कम 3-4 लाख रुपए तो लगने ही थे. इतने रुपयों का वह एकसाथ इंतजाम कैसे करता?

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तब प्रिया ने सुझाया, ‘‘क्यों न हम घर बेच दें? हमारा क्या है, एक छोटे से कमरे में भी गुजारा कर लेंगे. मगर जरूरी है कि मोहित ढंग से पढ़ाईलिखाई कर किसी मुकाम तक पहुंचे.’’ ‘‘शायद ठीक कह रही हो तुम. घर बेच देंगे तो काफी रकम मिल जाएगी,’’ कौस्तुभ ने कहा. अगले ही दिन से वह इस प्रयास में जुट गया. अंतत: घर बिक गया और उसे अच्छी रकम भी मिल गई. उन्होंने बेटे का ऐडमिशन करा दिया और स्वयं एक छोटा घर किराए पर ले लिया. बाकी बचे रुपए बैंक में जमा करा दिए ताकि उस के ब्याज से बुढ़ापा गुजर सके. 1 कमरे और किचन, बाथरूम के अलावा इस घर में एक छोटी सी बालकनी थी, जहां बैठ कर दोनों धूप सेंक सकते थे.

बेटे के ऐडमिशन के साथ खर्चे भी काफी बढ़ गए थे, अत: उन्होंने कामवाली भी हटा दी और दूसरे खर्चे भी कम कर दिए. अब उन्हें इंतजार था कि बेटे की पढ़ाई पूरी होते ही उस की अच्छी सी नौकरी लग जाए और वे उस के सपनों को पूरा होते अपनी आंखों से देखें. फिर एक खूबसूरत सी लड़की से उस की शादी करा दें और पोतेपोतियों को खिलाएं. मगर एक दिन मोहित के आए फोन ने उन के इस सपने पर भी पल में पानी फेर दिया, जब उस ने बताया कि पापा मुझे सिंगापुर में एक अच्छी जौब मिल गई है और अगले महीने ही मैं हमेशा के लिए सिंगापुर शिफ्ट हो जाऊंगा. ‘‘क्या? सिंगापुर जा रहा है? पर क्यों बेटे?’’ कौस्तुभ की जबान लड़खड़ा गई, ‘‘अपने देश में भी तो अच्छीअच्छी नौकरियां हैं, फिर तू बाहर क्यों जा रहा है?’’ लपक कर प्रिया ने फोन ले लिया था, ‘‘नहींनहीं बेटा, इतनी दूर मत जाना. तुझे देखने को आंखें तरस जाएंगी. बेटा, तू हमारे साथ नहीं रहना चाहता तो न सही पर कम से कम इसी शहर में तो रह. हम तेरे पास नहीं आएंगे, पर इतना सुकून तो रहेगा कि हमारा बेटा हमारे पास ही है. कभीकभी तो तेरी सूरत देखने को मिल जाएगी. पर सिंगापुर चला गया तो हम…’’ कहतेकहते प्रिया रोने लगी थी.

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‘‘ओह ममा कैसी बातें करती हो? भारत में कितनी गंदगी और भ्रष्टाचार है. मैं यहां नहीं रह सकता. विदेश से भी आनाजाना तो हो ही जाता है. कोशिश करूंगा कि साल दो साल में एक दफा आ जाऊं,’’ कह कर उस ने फोन काट दिया था. प्रिया के आंसू आंखों में सिमट गए. उस ने रिसीवर रखा और बोली, ‘‘वह फैसला कर चुका है. वह हम से पूरी तरह आजादी चाहता है, इसलिए जाने दो उसे. हम सोच लेंगे हमारी कोई संतान हुई ही नहीं. हम दोनों ही एकदूसरे के दुखदर्द में काम आएंगे, सहारा बनेंगे. बस यह खुशी तो है न कि हमारी संतान जहां भी है, खुश है.’’ उस दिन के बाद कौस्तुभ और प्रिया ने बेटे के बारे में सोचना छोड़ दिया. 1 माह बाद मोहित आया और अपना सामान पैक कर हमेशा के लिए सिंगापुर चला गया. शुरुआत में 2-3 माह पर एकबार फोन कर लेता था, मगर धीरेधीरे उन के बीच एक स्याह खामोशी पसरती गई. प्रिया और कौस्तुभ ने दिल पत्थर की तरह कठोर कर लिया. खुद को और भी ज्यादा कमरे में समेट लिया. धीरेधीरे 7 साल गुजर गए. इन 7 सालों में सिर्फ 2 दफा मोहित का फोन आया. एक बार अपनी शादी की खबर सुनाने को और दूसरी दफा यह बताने के लिए कि उस का 1 बेटा हो गया है, जो बहुत प्यारा है.

Social Story in Hindi: डुप्लीकेट- भाग 3: आखिर क्यों दुखी था मनोहर

निशा के साथ मनोहर का मेलजोल बढ़ता रहा. वह भी फिल्म नगरी के इस अंधकार से ऊब चुकी थी. वह भी यहां से कहीं दूर जाना चाहती थी, पर अकेली कहां जाए? हर जगह इनसान के रूप में ऐसे भेडि़ए मौजूद हैं जो उस जैसी अकेली को नोचनोच कर खा जाना चाहते हैं.

मनोहर व निशा को एकदूसरे के सहारे की जरूरत थी. सो, उन्होंने शादी कर ली.

कुछ दिनों बाद वे दोनों मुंबई से हजारों किलोमीटर दूर इस शहर में आ गए थे.

यहां आ कर अपने पैर जमाने के लिए मनोहर को बहुत मेहनत करनी पड़ी थी.

15 साल बीत गए. इस बीच निशा ने एक बेटी को जन्म दिया, जिसे मधुरिमा कहा जाने लगा. मधुरिमा अब 10वीं में और कमल बीए फाइनल में पढ़ रहा था.

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जनकपुरी में रिकशा रुका तो मनोहर यादों से बाहर निकला. रिकशे वाले को पैसे दे कर वह भारी मन से घर पहुंचा. एक कमरे में सोफे पर जा कर वह पसर गया. उस ने आंखें बंद कर लीं. बारबार आंखों के सामने वही सीन आ रहा था, जब नीलू सीढि़यों से लुढ़क कर गिरती है.

मनोहर के पास आ कर निशा सोफे पर बैठते हुए बोली, ‘‘देख आए वह सीन. सचमुच देखा नहीं जाता. बहुत दुख होता है. उस समय नीलू को कितना दर्द सहना पड़ा होगा.’’

मनोहर कुछ नहीं बोला.

‘‘मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूं,’’ कह कर निशा रसोईघर की ओर चल दी.

मनोहर की नजर दीवार पर लगी नीलू की तसवीर पर चली गई. वह एकटक उस की ओर ही देखता रहा.

निशा ने चाय मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘चाय पी लीजिए. मन ज्यादा दुखी करने से कुछ नहीं होगा.’’

मनोहर ने चाय पीते हुए पूछा, ‘‘कमल अभी तक नहीं आया? कहां रह गया वह? उस का कोई फोन आया या नहीं?’’

‘‘हां, एक घंटा पहले आया था कि अभी पहुंच रहा हूं.’’

‘‘फिल्म की शूटिंग देखने वह लखनपुर गया है?’’

‘‘हां, मैं ने तो उसे बहुत मना किया था, पर वह माना नहीं, बच्चों की तरह जिद करने लगा. कह रहा था कि पहली बार फिल्म की शूटिंग देखने जा रहा हूं. बचपन में मुंबई में देखी होगी, वह तो अब याद नहीं. साथ में उस का दोस्त सूरज भी जा रहा है. बस शाम तक लौट आएंगे?’’

‘‘फिल्मी दुनिया की चमकदमक किसे अच्छी नहीं लगती,’’ मनोहर ने कह कर लंबी सांस छोड़ी.

मधुरिमा दूसरे कमरे में पढ़ाई कर रही थी, तभी घर के बाहर मोटरसाइकिल के रुकने की आवाज आई तो मनोहर समझ गया कि कमल आ गया है.

कमल कमरे में घुसा. उस के माथे पर पट्टी बंधी देख मनोहर व निशा बुरी तरह चौंक उठे.

‘‘यह क्या हुआ? कोई हादसा हो गया था क्या?’’ मनोहर ने पूछा.

‘‘नहीं पापा…’’

‘‘फिर यह चोट…? तू तो लखनपुर शूटिंग देखने गया था न? वहां किसी से झगड़ा तो नहीं हो गया?’’ निशा ने कमल की ओर देखते हुए पूछा.

तभी मधुरिमा भी कमरे से बाहर निकल आई. उस ने भी एकदम पूछा, ‘‘यह क्या हुआ भैया?’’

कमल ने कहा, ‘‘मैं शूटिंग देखने ही गया था. जैसे ही शूटिंग शुरू हुई तो हीरो के डुप्लीकेट के पेट में भयंकर दर्द हो गया. जब दवा से भी आराम नहीं हुआ तो उसे शहर के एक बड़े अस्पताल में भेज दिया. प्रोड्यूसर माथा पकड़ कर बैठ गया, तभी डायरैक्टर की नजर मुझ पर पड़ी…’’

‘‘फिर…?’’ मनोहर ने पूछा.

‘‘डायरैक्टर ने मुझे अपने पास बुलाया. नीचे से ऊपर तक देखा और कहा कि एक छोटा सा काम करोगे. काम बहुत आसान है. हीरोइन नाराज हो कर जाती है. हीरो आवाज देता है, पर हीरोइन सुनती नहीं और चली जाती है. हीरो उस के पीछे दौड़ता है. पैर फिसलता है और छोटी सी पहाड़ी से लुढ़क कर नीचे गिरता है. बस यही काम था उस डुप्लीकेट का.

‘‘मैं मना नहीं कर सका. सीन ओके हो गया. तब डायरैक्टर ने मेरी पीठ थपथपा कर मुझे 10,000 रुपए भी दिए थे. सिर में मामूली सी चोट लग गई है. 2-4 दिन में ठीक हो जाएगी,’’ कमल ने बताया.

यह सुन कर मनोहर ने एक जोरदार थप्पड़ कमल के मुंह पर मारा और चीखते हुए कहा, ‘‘तू भी बन गया डुप्लीकेट. दफा हो जा मेरी नजरों के सामने से. मैं तेरी सूरत भी नहीं देखना चाहता. जा, भाग जा… चला जा मुंबई. वहां जा कर देख कि किस तरह कीड़ेमकोड़े की जिंदगी जीते हैं ये डुप्लीकेट.

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‘‘मेरे साथ चल कर देख फिल्म ‘अपना कौन’ में तेरी मम्मी डुप्लीकेट का काम करतेकरते हमेशा के लिए हमें छोड़ कर चली गई. मुझे इस काम से क्यों नफरत हो गई थी. मैं यह काम छोड़ कर क्यों मुंबई से यहां आ गया था? तुझे भी तो यह सब मालूम है, फिर तू ने क्यों जानबूझ कर अपने माथे पर डुप्लीकेट का लेबल लगा लिया?

‘‘अगर तुझे आज कुछ हो जाता तो हमारा क्या होता? यह सब नहीं सोचा होगा तू ने,’’ कहतेकहते मनोहर का गला भर्रा उठा.

कमल को अपनी भूल का अहसास हो रहा था. वह बोला, ‘‘माफ कर देना पापा, मुझे दुख है कि मैं ने आप का दिल दुखाया. यह मेरी पहली और आखिरी भूल है.’’

Romantic Story in Hindi- बात एक रात की: भाग 3

लेखक : श्री प्रकाश

तपन चित्रा को विदा करने स्टेशन गया. चलते समय चित्रा ने कहा, ‘‘आगे जब कोलकाता आएं तो मुझ से जरूर मिलना. फिलहाल मेरे साल्ट लेक फ्लैट में ही मेरी कंपनी है,’’ और फिर अपना कार्ड तपन को दे दिया.

‘‘श्योर,’’ कह तपन ने भी अपना कार्ड चित्रा को दे दिया.

चित्रा कोलकाता लौट गई. अब वे अकसर फोन पर बातें करते थे. तपन ज्यादातर चित्रा के काम और स्वास्थ्य के बारे में पूछता, तो चित्रा तपन और उस की मां के बारे में. कभी चित्रा मां से बात करती तो हर बार मां यही पूछतीं कि उस ने अपने भविष्य के बारे में क्या फैसला लिया है? चित्रा भी हर बार यही कहती कि अभी कोई फैसला नहीं लिया.

एक बार जब चित्रा का फोन आया तो मां ने उस से पूछा, ‘‘मेरा तपन तुम्हें कैसा लगता है?’’

चित्रा इस सवाल के लिए तैयार नहीं थी, फिर भी उस ने कहा, ‘‘तपन तो बहुत ही अच्छे इनसान हैं.’’

‘‘वह हमेशा तुम्हारी तारीफ करता रहता है. कहता है कि बहुत मेहनती लड़की है. खूब तरक्की करेगी,’’ मां बोलीं.

‘‘यही तो उन का बड़प्पन है.’’

कुछ दिनों के बाद तपन को कोलकाता जाना पड़ा. वह चित्रा से मिला. चित्रा ने उसे अपने हाथों से खाना खिलाया. दोनों ने काफी देर तक बातें कीं, पर केवल काम से संबंधित. चलते समय चित्रा ने उसे फिर आने को कहा और हाथ मिला कर विदा किया. यह तपन और चित्रा का दूसरा दैहिक स्पर्श था. पहला स्पर्श रिकशे पर हुआ था. इधर चित्रा का प्रोजैक्ट पूरा होने जा रहा था. उस का टैस्ट चल रहा था, जिस के बाद प्रोजैक्ट को अमेरिकन कंपनी को बेचा जाना था. इधर तपन की मां की तबीयत काफी खराब थी. चित्रा भी सुन कर आई थी. बोकारो में बड़े अस्पताल नहीं थे, तो चित्रा ने तपन को उन्हें कोलकाता ले चलने को कहा. वह स्वयं टैक्सी बुक कर मां और तपन के साथ कोलकाता आई. मां को बड़े अस्पताल में भरती कराया गया. 2 हफ्ते में तपन की मां को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. इस बीच तपन चित्रा के फ्लैट में रहा. चित्रा और तपन अब थोड़ा करीब आ चुके थे. दोनों एकदूसरे को बेहतर समझ रहे थे.

तपन की मां को अस्पताल से छुट्टी मिली तो चित्रा उन्हें भी अपने घर ले आई थी और कहा था कि यहां कुछ दिन आराम करने के बाद ही लौटना. 1 हफ्ते तक वे चित्रा के फ्लैट में ही रहे.

1 सप्ताह बाद तपन मां के साथ बोकारो लौट रहा था. पर चलते समय मां ने चित्रा से फिर कहा, ‘‘बेटी, तुम ने तो अपनी बेटी से भी बढ़ कर मेरा खयाल रखा है. कुदरत तुम्हारी हर मनोकामना पूरी करे… पर मेरी बात पर भी सोचना.’’

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‘‘कौन सी बात मां?’’ चित्रा ने पूछा.

‘‘अपने और तपन के बारे में.’’

आप के आशीर्वाद से मेरा प्रोजैक्ट पूरा हो गया है. 2 हफ्तों के अंदर ही इस के

अच्छे परिणाम मिलने की आशा है. फिर आप की बात भी मान लूंगी.

तपन और मां दोनों चित्रा की ओर देखने लगे. चित्रा की तरफ से पहला पौजिटिव संकेत मिला था.

इधर चित्रा के मातापिता भी उस के लिए चिंतित रहते थे. चित्रा ने तपन की चर्चा उन से कर रखी थी. उस ने कहा था कि बोकारो जाने वाली एक रात की बात ने चित्रा को काफी इंप्रैस किया है. इतना ही नहीं, चित्रा के पिता ने एक बार चुपके से बोकारो आ कर तपन के बारे में जानकारी भी ले ली थी. वे तपन से संतुष्ट थे. उन्होंने अपनी सहमति चित्रा को बता दी थी.

इस के 1 महीने के अंदर ही चित्रा ने तपन को फोन पर बताया कि उस का प्रोडक्ट अमेरिका की कंपनी ने अच्छी कीमत दे कर खरीद लिया है. उस की कंपनी के चारों पार्टनर्स को 5-5 करोड़ रुपए का फायदा हुआ है.

तपन की मां ने चित्रा से फोन पर कहा, ‘‘तुम्हारी सफलता पर बहुतबहुत बधाई. देखा तपन ने ठीक ही कहा था कि तुम बहुत मेहनती लड़की हो और जल्द ही तुम्हें तरक्की मिलेगी.’’

‘‘सब आप लोगों के आशीर्वाद से है.’’

‘‘अब तो तेरा प्रोजैक्ट भी पूरा हो गया तो बता तपन के बारे में क्या सोचा है?’’

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‘‘मैं ने कहा था न कि तपन बहुत अच्छे इनसान हैं. मुझे भी अच्छे लगते हैं. इस के आगे मैं क्या बोलूं? हां, एक और सरप्राइज है, मेरी कंपनी को अमेरिका से बहुत बड़ा और्डर मिला है.’’

मां ने जब यह बात तपन को बताई तो उस ने फोन मां के हाथ से ले कर चित्रा से कहा, ‘‘बहुतबहुत बधाई इस दूसरी कामयाबी पर और एक सरप्राइज मेरी ओर से भी है. मुझे प्रमोशन दे कर कंपनी ने कोलकाता औफिस में पोस्टिंग की है. 1 हफ्ते के अंदर जौइन करना होगा.’’

फिर मां ने चित्रा से कहा, ‘‘अब तो और इंतजार नहीं कराना है?’’

‘‘नो मोर इंतजार मांजी. अब आगे आप की मरजी का इंतजार है. आप जो कहेंगी वैसा ही करूंगी,’’ और हंसते हुए फोन काट दिया.

इधर मां की आंखों में भी खुशी के आंसू छलक आए थे.

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