तृप्ति : क्या था काली डायरी का राज

मैं सुकु बाई, आज 4 महीने की छुट्टी के बाद काम पर वापस गई, तो दीदी ने दरवाजा खोला. उन्होंने मुझे अंदर बुलाया और हालचाल पूछा. मेरे घर वालों की खैरखबर ली.

मैं इस घर में 15 साल से काम कर रही हूं. पिछले दिनों मैं अपने गांव चली गई थी. बेटे को बड़े स्कूल में दाखिल कराना था.

जब से मेरे पति की मौत हुई है, तब से मेरे बेटे को देखने वाला मेरे अलावा और कोई नहीं है. एक दूर की बूढ़ी ताई हैं, जिन के पास उसे छोड़ा हुआ है. ताई को खर्चापानी भेजती रहती हूं.

पर इस बार मुझे गांव जाना पड़ा, क्योंकि बेटे का स्कूल बदली कराना ताई के बस की बात नहीं थी. रोजीरोटी का सवाल है, जिस की वजह से मुझे गांव से कोसों दूर यहां दिल्ली में रहना पड़ता है, वरना किस का मन नहीं करता अपने बच्चों के बीच रहने का.

दीदी और भैया बहुत अच्छे लोग हैं खासतौर पर भैया. बहुत बड़ा दिल है भैया का. मुझे जब कभी जरूरत पड़ती है, तो मैं भैया से ही पैसे मांगती हूं. कभी मना नहीं करते और न ही कभी पैसे लौटाने की बात करते हैं.

भैया हंस कर कहते हैं, ‘दे देना सुकु बाई, जब तुम्हारा बेटा बड़ा हो जाए और कमाने लगे तब लौटा देना.’

दीदी ने बताया कि मेरे पीछे जो काम वाली रखी थी, वह बहुत ही चालू काम करती थी. फिर वे मुझे काम बता कर किसी जरूरी मीटिंग के लिए बाहर चली गईं. फिलहाल मेरे सिवा घर में कोई और नहीं था. दीदी का एकलौता बेटा बाहर पढ़ता है.

मैं ने घर में झाड़ूपोंछा किया, रसोई साफ की, रात के लिए खाना बनाया और फिर कमरों की झाड़पोंछ शुरू कर दी. घर वाकई बहुत गंदा पड़ा था.

काम करतेकरते मैं थक गई. सोचा कि थोड़ा सुस्ता लिया जाए. अपने घर में वैसे भी कौन मेरा इंतजार कर रहा था. खाली पड़ा था.

मगर फिर आसपास देखा तो मन हुआ कि बैठेबैठे क्या करना, थोड़ी और धूलमिट्टी झाड़ ली जाए. मैं झाड़न लेकर बैडरूम में घुसी. बिस्तर पर बहुत सी किताबें बिखरी पड़ी थीं. न जाने कौन से दफ्तर में दीदी काम करती थीं कि जब देखो लिखती ही रहती थीं. मैं बिखरी किताबें समेटने लगी.

मैं ने देखा कि बिस्तर के बीचोंबीच कंबल के नीचे नंगी औरतों की तसवीरों वाली एक मैगजीन पड़ी थी. जाने दीदी और भैया में से कौन इसे देखता होगा. मैं ने उसे उठा कर तकिए के नीचे रख दिया.

एक काली डायरी भी मिली, जिस पर दीदी का नाम था. उस के पन्ने पलटे तो पाया कि उस में बहुत से किस्सेकहानियां लिखे हुए हैं.

मैं 8वीं पास हूं. हिंदी पढ़ लेती हूं. दीदी की डायरी पढ़ना नहीं चाहती थी, मगर उस में कुछ ऐसा लिखा था, जिस ने मुझे उन की डायरी पढ़ने पर मजबूर कर दिया :

मैं और मेरे पति प्रताप बहुत अच्छे दोस्त बन चुके हैं. हमारी उम्र 50 को टापने वाली है. मुझे सैक्स में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है, मगर प्रताप को है. इन की तो यह हालत है कि इस उम्र में भी अगर किसी कमसिन लड़की को देख लें, तो इन की नजर बदल जाती है. मुझ से भी 3 दिन से ज्यादा दूर नहीं रह पाते. और जब कभी मूड में आते हैं, तो देर रात तक सोने नहीं देते और फिर उस के बाद 2 दिन तक शरीर में दर्द रहता है…

मुझे ऐसी निजी बातें पढ़ कर अजीब सा लगा. क्या एक विधवा को यह सब करना ठीक था? हरगिज नहीं. मैं उठ कर दरवाजे की तरफ गई, मगर वहां कोई नहीं था. मैं वापस बैडरूम में आ कर बैठ गई और डायरी खोल ली :

पिछली दफा जब मेरा दिल किया कि इन के साथ बैठ कर प्यारभरी बातें की जाएं, इन के दिल में कोई नया ही खयाल घूम रहा था. कहने लगे कि चलो इस बार कुछ अलग करते हैं.

‘क्या?’

‘किसी लड़की को बुलाते हैं.’

‘कहां से आएगी लड़की?’

‘अरे, इस की फिक्र तुम मत करो. यह लो उस का नंबर और मिलाओ.’

मुझे हलकी सी जलन हुई कि भला यह क्या बात हुई. मेरे पल किसी और को? गलत बात है यह. फिर मैं ने सोचा कि चलो छोड़ो. इन को सैक्स की तलब रहती है और मेरी डायरी को कहानियों की. किसी को बदला नहीं जा सकता. पति जैसा है उसे वैसे ही स्वीकारने में गृहस्थ जीवन की खुशी है.

जब मुझे पहली बार शक हुआ था कि प्रताप शादी के बाद भी बाहर मुंह मारते हैं, मुझे बहुत बुरा लगा था. फिर मैं ने सोचा था, बहुत सोचा और इस निचोड़ पर पहुंची कि इन का अगर एक यह ऐब नजरअंदाज कर दिया जाए, तो इन में और कोई कमी नहीं. दरियादिल हैं, पैसा कमाना खूब जानते हैं, एक अच्छे बेटे, बाप और भाई हैं. बस, एक अच्छे पति नहीं हैं. अगर मैं इन्हें ऐसे ही स्वीकार लूं, तो मेरे अहम को दबना सीखना होगा और बाकी का निजाम जैसा है वैसा ही दिखेगा और चलता रहेगा.

मुझे यह फायदा होगा कि मैं जान पाऊंगी कि अपना अहम खत्म करने के बाद जो सुनहरा मंजर है, जिस के बारे में धर्मग्रंथों में बारबार बोला गया है, आखिर क्या चीज है. फिर आखिर में तो हर औरत एक मां ही है, तो अपने पति के लिए क्यों नहीं.

हर 4-6 महीनों में दोस्तों के साथ घूमने जाना. कभी जकार्ता, कभी चीन, कभी मलयेशिया, कभी सिंगापुर… और कुछ नहीं इन के औरतबाजी करने के रास्ते थे. एक बार तो अपने दोस्तों के साथ भारत में ही किसी शहर में घूमने निकल गए, यह कह कर कि इन का दोस्त और उस के 2 रिश्तेदार ही साथ में होंगे.

सफर के दौरान जब मैं ने हालचाल पूछने के लिए फोन किया, तो पीछे से किसी लड़की के हंसने की आवाजें आ रही थीं. जब सफर से वापस आए तो 2 दिन तक रंगीले मिजाज में रहे. बिस्तर में भी नईनई हरकतें आजमाते रहे.

बीवी हूं, समझ गई, इन के बिना कुछ कहे. बहुत सोचविचार किया और हार कर इस नतीजे पर पहुंची कि मुझे इन का दोस्त बन कर जीना सीखना होगा. तलाक मुझ अनाथ के बस की बात नहीं और न ही कलहक्लेश करना. ये जैसे थे, इन्हें वैसे ही स्वीकारना पड़ा.

जब इन्होंने मुझे लड़की को फोन कर के बुलाने को कहा, तो मैं ने सोचा कि चलो देखते हैं, अपने पति को किसी दूसरी औरत से प्यार करते अपनी आंखों से देखना कैसा लगता है. और कुछ नहीं तो एक नया अनुभव ही सही. मेरी डायरी की भूख भी तो बेअंत है. अपना पेट भरवाने के लिए मुझे कुछ भी दिखाने को तैयार हो गई.

मैं ने फोन कर के लड़की को बुला लिया. थोड़ी देर में घर की घंटी बजी. दरवाजा खोला तो एक 20-22 बरस की जवान लड़की को सामने खड़ा पाया. उस ने फूलों वाला लंबा सा फ्रौक पहना था, जिस में उस की उभरी हुई छाती मुश्किल से छिप रही थी. तीखे नैननक्श और गोरा रंग, पर्स कंधे पर लटका हुआ.

मैं ने उसे अंदर बुला लिया और उसे ले कर बैडरूम में आ गई. प्रताप तब बैडरूम में बैठे किसी से फोन पर बात कर रहे थे. हमें देखते ही वे फोन उठा कर घर से बाहर निकल गए. शायद कोई जरूरी बात करनी थी.

प्रताप कारोबार के आगे सैक्स को कुछ नहीं समझाते. सही भी है. पैसा उड़ाने से पहले कमाना जरूरी है.

मैं लड़की को ले कर पीछे आंगन में चली गई और वक्त बिताने के लिए उसे बातों में लगा लिया. मुझे सुनने का शौक था और उसे बोलने का. वह बहुत बोली. अपने किस्से सुनाने लगी. एक से एक बेहूदा और फूहड़. सारा समय बोलती रही.

उस की बातें बंद ही नहीं हो रही थीं. ग्राहकों की लंबीलंबी गाडि़यों में घूमना, मर्दों का उस के साथ वह सब करना जो वे अपनी बीवियों के साथ नहीं कर सकते, पार्टियों में जाम से जाम टकराना, महफिलों में नंगे नाचना उस के लिए आम बातें थीं.

उस ने बताया था, ‘अरे, एक पार्टी में तो मुझे 3-4 आदमियों ने इकट्ठा पकड़ लिया, एक यहां से शुरू हो गया और दूसरा वहां से. आप मानोगे नहीं कि 60-70 साल के बूढ़े भी मलाई लगा कर चाटते हैं.’

मैं ने पूछा कि कभी पुलिस से पाला नहीं पड़ता, तो वह बोली, ‘पड़ता है न. एक पुलिस ही है, जिस से बिना नागा पाला पड़ता रहता है. हफ्ता भी लेती है और रोब भी जमाती है. कई बार तो मुफ्त में ले कर चलती बनती है.’

एक बार पुलिस ने उसे और उस की 2 सहेलियों को पकड़ लिया और बुरी तरह पीटा. तीनों की साड़ियां एकदूसरे की साड़ी से बांध दीं. भागें तो कपड़े उतरें और न भागें तो डंडे पड़ें. बड़ी मुश्किल से वह समय कटा और आज तक जेहन से उस का खौफ नहीं निकला. बड़ा ही दर्दनाक हादसा था.

‘कभी कोई वहशी भी मिला है? तुम्हें तो कई तरह के लोग मिलते होंगे?’

उस ने बताया कि एक दफा उसे 2 आदमी ले गए थे. दोनों के दोनों लंबेचौड़े मुस्टंडे जिन्हें देख कर वह घबरा गई. फिर उस ने अपनेआप को संभाला और कहा कि 1-1 कर के आएं. मगर वे नहीं माने.

दोनों एकसाथ ही उस पर टूट पड़े और ऐसे लूटा कि उस की सुधबुध खो गई. तृप्ति होने के बाद उन्होंने उसे उस की बस्ती में छोड़ दिया.

‘कैसी बस्ती?’

‘हिजड़ों की बस्ती. वहीं तो रहती हूं मैं. मैं हिजड़ा हूं.’

‘पर, तुम्हारा शरीर?’

‘यह तो सर्जरी का कमाल है.’

मैं ने मन ही मन सोचा कि यह सही रही. प्रताप का यह शौक भी मुझे सहना होगा.

थोड़ी देर बाद हम घर के अंदर वापस आ गए. प्रताप की फोन पर हो रही बात खत्म हो चुकी थी और वे बेसब्री से हमारा इंतजार कर रहे थे. एकदम तैयार बैठे थे.

हमें देखते ही वे हमें बैडरूम के अंदर ले गए और दरवाजा बंद कर लिया. मैं पास ही में बैठ गई.

प्रताप ने एक बड़ा जाम बना कर लड़की को दिया और फिर अपने लिए भी ठीक वैसा ही पैग बनाया. मुझे देने लगे तो मैं ने मना कर दिया कि मेरा मूड नहीं है.

शराब का सुरूर चढ़ते ही प्रताप उस लड़की से चिपट गए और एक घंटा वे उस के जिस्म से खेलते रहे. मैं चुपचाप लिखती रही. फारिग हो कर उन्होंने लड़की को पैसे दे कर भेज दिया और मेरे पास आ कर एक बच्चे की तरह बेफिक्र सो गए.

अगले दिन मैं ने प्रताप को चाय का प्याला देते हुए उठाया और लड़की का सच बताया.

‘मुझे क्या बता रही हो शारदा, मैं ने ही तो उस की सर्जरी करवाई थी…’

तभी घर के बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आई. लगता था दीदी वापस आ गई थीं. मैं ने जल्द ही डायरी वापस रखी और उठ कर अपनी आंखें धोईं.

‘इन बड़े लोगों में क्याक्या चलता रहता है,’ सोचते हुए मैं दरवाजा खोलने चल दी.

लड़कों को भी गर्लफ्रैंड छोड़ने का होता है दर्द, ये 7 टिप्स आएंगे काम

ब्रेकअप के बाद पार्टनर को तुरंत भूलकर जिंदगी में आगे बढ़ जाना आसान काम नहीं है. ऐसा महसूस होता है कि उस पार्टनर के बिना एक दिन का भी गुजारा नहीं हो सकता. कुछ लोगो के लिए तो मूव ऑन (Move On) करना इतना मुश्किल होता है कि वो ब्रेकअप हो जाने के बाद भी कंट्रोल नहीं कर पाते और पार्टनर से संपर्क करने लगते हैं. बात करें, कि मर्द को या औरत क ज्यादा परेशानी होती है ब्रेकअप से तो, ये बिलकुल सही है कि जितना दर्द लड़कियों को होता है उतना है मर्दों को भी, तो अगर आपको भी ब्रेकअप के बाद उन्हें भूलने में दिक्कत आ रही है तो ये टिप्स आपके काम आ सकते हैं.

1. ब्रेकअप को करें स्वीकार

ब्रेकअप के बाद उदासी, अकेलापन और गुस्सा जैसी कई भावनाएं महसूस होना स्वाभाविक है. ब्रेकअप होने पर उस दुख को बाहर आने दें और सभी भावनाओं को दिल से स्वीकार करें.

2. तुरंत दूसरा रिश्ता ना बनाएं

कभी-कभी क्या होता है कि गुस्से या दूसरों को जलाने के लिए हम तुरंत दूसरे रिलेशनशिप में आ जाते हैं. जो कि बहुत गलत निर्णय होता है. ब्रेकअप के बाद कुछ समय तक अकेले रहें और खुद को जानें कि आप क्या नया कर सकते हैं.

3. रिश्ते पर विचार करें

ब्रेकअप के बाद एक बार अकेल बैठकर जरूर सोंचे कि रिश्ते में क्या गलत हुआ और आपने क्या सीखा. यह आपकी सेल्फ ग्रोथ के लिए बहुत जरूरी है. ताकि आपको आगे फिर से ऐसी परेशानी का सामना ना करना पड़े.

4. खुद को समय दें

हर जख्म को भरने में समय तो लगता ही है. ऐसे में ब्रेकअप के बाद खुद को पूरा समय दें. शांत मन और दिमाग से अपने फैसले लें और कुछ भी ऐसा कदम ना उठाएं जिससे आपको आगे पछताव हो.

5. कम ही लोग से रखें संपर्क

कम से कम कुछ समय के लिए अपने करीबियों से दूरी बना लें. इससे आपको खुद को समझने में मदद मिलेगी. लोगों की राय से खुद को दूर रखें क्योंकि जरूरी नहीं है कि हर कोई आपके दर्द को समझें. इसलिए हर किसी के साथ अपने दर्द को ना बाटें.

6. खुद की करें देखभाल

अपनी शारीरिक और मानसिक सेहत का ख्याल रखें. खुद को ऐसी गतिविधियों में शामिल करें जिनसे आपको खुशी मिले.वर्कआउट करें, अच्छा खाना खाएं और पूरी नींद लें.

7. मेंटल हेल्थ

ब्रेकअप के दौरान में हम कई तरह की चीजों से गुजरते हैं. जिसका सबसे ज्यादा असर हमारी मेंटल हेल्थ पर पड़ता है.ऐसे में अगर आप खुद को अकेला महसूस करते हैं तो आप अपने मन की बातें किसी के साथ शेयर करना चाहते हैं तो किसी अच्छे साइकोलॉजिस्ट से संपर्क करें. आपको इस दर्द से बाहर निकलने में काफी मदद भी मिलेगी.

डीडी न्यूज का भगवाकरण और चुनाव आयोग की चुप्पी, किस की साजिश?

भारतीय जनता पार्टी जिस तरह प्रतिकों के आधार पर राजनीति कर रही है वह बेहद मारक है और देश अच्छी तरह देख और समझ रहा है. यह कि देश में 18 वीं लोकसभा चुनाव की उदघोषणा हो चुकी है अब चुनाव आयोग को चाहिए कि जिस तरह भाजपा नरेंद्र मोदी की कार्यवाहक सरकार द्वारा दूरदर्शन के डीडी न्यूज़ का भगवाकरण किया गया है उसे रोक कर यह संदेश अच्छे से दे सकता है कि देश में चुनाव निष्पक्ष हो रहे हैं और सबसे बड़ी बात चुनाव आयोग का अपना एक वजूद अभी बचा हुआ है.

राष्ट्रीय प्रसारक दूरदर्शन ने हाल ही में पहले अपने समाचार चैनल डीडी न्यूज’ के लोगों का रंग लाल से भगवा कर दिया है.इस पर विपक्ष ने सरकार पर चैनल के भगवाकरण का आरोप लगाया है. दूसरी तरफ प्रसारक ने इसे महज दृश्य सौदर्य के अनुरूप बदलाव बताया है. वहीं, विपक्षी दलों के नेताओं ने लोकसभा चुनाव के लिए होने वाले मतदान के दरम्यान इस बदलाव पर सवालिया निशान लगाया है.

आम लोगों ने भी ‘डीडी म्यून’ के लोगों के बदले रंग भर सोशल मीडिया अपनी प्रतिक्रिया दी हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि चुनाव के समय में जिस तरह यह चतुराई बड़ा कार्य किया गया है वह बताता है कि इसके पीछे की सोच कितनी कमजोर है अगर कोई कहता भी है तो सरकार अपने ऊपर से पल्ला झाड़ लेगी और चुनाव आयोग निश्चित रूप से मौन साध लेगा कुल मिलाकर के आरएसएस की सोच को एक मुकाम मिल जाएगा. मगर यह कमजोर मानसिकता की निशानी है समाज में और देश में हर चीज का अपना एक महत्व है अगर दक्षिणपंथी सरकार है तो इसका मतलब यह नहीं है कि हर चीज को अपने रंग में रंग दिया जाए यह आपकी मजबूती नहीं आपकी कमजोरी का परिचायक है.

प्रसार भारती या फिर “प्रचार भारती”

राष्ट्रीय प्रसारक दूरदर्शन ने इसे महज दृश्य सौदर्य के अनुरूप बदलाव बताया है. तो सवाल यह है कि क्या पहले जो किया और बनाया गया था वह दृश्य सौंदर्य के अनुरूप नहीं था…!

दूरदर्शन की ओर से एक्स पर पोस्ट किया गया,- ‘ हमारे मूल्य यही है, अब हम एक नए अवतार में उपलब्ध है.एक ऐसी शानदार यात्रा के लिए तैयार हो जाइए जो पहले कभी नहीं देखी गई….. विकुल नए डीडी न्यूज का अनुभव करें.

कुल मिलाकर के बड़ी-बड़ी बातें की गई जो की कोई भी कर सकता है मगर इसके पीछे के सच को कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति संस्था समझ सकती है. सच्चाई यह है कि हर एक वह चीज बदली जा रही है जो पहले की है और इसे बड़े ही चतुराई से समय को देखकर किया जा रहा है. हड़बड़ी कुछ ऐसी है कि मानो अब हाथों से सत्ता जाने वाली है.

दूरदर्शन की और से कहा गया है – लोगो और ‘टेक्स्ट’ में ये बदलाव एक अत्याधुनिक स्टूडियो सिस्टम और एक संशोधित वेबसाइट की शुरुआत के साथ मेल खाते हैं. किस तरह तर्क दिए जा रहे हैं जो स्पष्ट करते हैं कि इसके पीछे कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है.

उल्लेखनीय है कि दूरदर्शन के इस कार्य व्यवहार की आलोचना विपक्ष कर रहा है मनीष तिवारी जो सूचना प्रसारण मंत्री रहे हैं ने भी कड़े शब्दों में इसकी आलोचना की है. तृणमूल कांग्रेस के सांसद जवाहर सरकार, जिन्होंने 2012 से 2016 तक प्रसार भारती में मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में भी काम किया था, ने लिखा है – राष्ट्रीय प्रसारक दूरदर्शन ने अपने ऐतिहासिक ‘फ्लैगशिप’ लोगो को भगवा रंग में रंग दिया है. इसके पूर्व सीईओ के रूप में मैं इसके भगवाकरण को चिंता के साथ देख रहा हूं और महसूस कर रहा हूं यह अब प्रसार भारती नहीं है यह प्रचार भारती है. सरकार ने कहा – यह स्पष्ट रूप से भगवाकरण है जो विभिन्न संस्थानों में हो रहा है.

उल्लेखनीय है कि आप नए संसद भवन में राज्यसभा में प्रवेश करते हैं, तो रंग और एस्थेटिक ऐतिहासिक मैरून/लाल से केसरिया में बदल दिया गया है. लोकसभा और राज्यसभा के आधे कर्मचारी अब भगवा बंद गला पहनते हैं जो पहले स्टील ग्रे/नीला होता था. यह बातें कहने की नहीं समझने की है किस तरह अपना संदेश पहुंचाने का काम इन सरकारी माध्यमों से किया जा रहा है जो की पूरी तरह अनुचित और आलोचना प्रद है.

42 साल की उम्र एशा देओल ने कराया लिप सर्जरी, लोगों ने किया ट्रोल

बौलीवुड एक्ट्रेस एशा देओल ने भले ही कम फिल्में की हो, लेकिन उनकी पौपुलरी किसी दूसरी एक्ट्रेस से कम नहीं है, हालांकि मीडिया की लाइमलाइट से वे कई दिनों से दूर है. लेकिन इन दिनों एशा सोशल मीडिया पर चर्चा पर आ गई हैं. जी हां, एक वीडियो में लोग उन्हे लिप सर्जरी को लेकर ट्रोल करते नजर आ रहे हैं.

 

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आपको बता दें कि अपने पति से अलग होने की खबर को लेकर एशा देओल खासा सुर्खियों में थी, लेकिन अब कई अरसों बाद उनका एक वीडियो सामने आया हैं. जिससे वे एक बार फिर सुर्खियों में आ गई हैं. एशा देओल का एक वीडियो सामने आया है, जो कि इंटरनेट पर लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है. इस क्लिप को देखने के बाद लोग ईशा के होठों पर कमेंट कर रहे हैं.

एंटरटेनमेंट की दुनिया में एशा देओल का एक वीडियो धड़ल्ले से वायरल हो रहा है, जिसमें वो मीडिया से बातचीत करती नजर आ रही हैं. बता दें, कि एशा देओल और उनकी बहन अहाना देओल, लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान मथुरा में अपनी मां हेमा मालिनी के लिए प्रचार करती नजर आईं. इस दौरान का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें सभी की नजरें एशा के होठों पर टिक गई हैं, इस क्लिप पर लोगों ने कमेंट करते हुए कई बातें कहीं. एक यूजर ने कहा, ‘ये सब क्या करवा लिया चेहरा बर्बाद हो गया.’

 

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बताते चलें कि हाल ही में एशा देओल अपने पति भरत तख्तानी से अलग हुई है. इस बारे में एशा ने कहा, हमने आपस में बातचीत करने के बाद अलग होने का फैसला किया है. ‘हमारे बच्चों का हित हम दोनों के लिए जरूर है और आगे भी रहेगा.’ बता दें, कि एशा देओल ने कई बौलीवुड फिल्मों में अपना जलवा बिखेरा हैं.

पंकज त्रिपाठी के बहनोई की रोड एक्सीडेंट में हुई मौत, बहन की हालत गंभीर

बौलीवुड के दिग्गज एक्टर पंकज त्रिपाठी का नाम तो आप लोगों ने जरूर सुना होगा. इन्होंने मध्यम वर्ग से निकलकर बौलीवुड में खूब नाम कमाया. लेकिन एक्टर से रिलेटिव से जुड़ी एक बुरी खबर सामने आई है. जिसमें ये बताया गया है कि सड़क हादसे में पंकज त्रिपाठी के बहनोई की मौत हो गई है. वही, उनकी बहन की हालत गंभीर बताई जा रही है.

 

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आपको बता दें कि पंकज त्रिपाठी के जीजा राजेश तिवारी और और सरिता तिवारी बिहार के गोपालगंज से वेस्ट बंगाल के लिए जा रहे थे इसी दौरान ये दोंनो हादसे के शिकार हो गए. शनिवार शाम करीब 4 बजे धनबाद जिले के निरसा चौक के समीप पंकज त्रिपाठी के जीजा राजेश तिवारी कार सड़क के डिवाइडर से टकरा गई. इसके बाद राजेश और सरिता को पुलिस ने स्थानीय लोगों की मदद से कार से बाहर निकाला और आनन-फानन में दोनों को धनबाद मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल ले जाया गया. डॉक्टर्स ने राजेश को बचाने की पूरी कोशिश की लेकिन उनकी मौत हो गई. वहीं सरिता आईसीयू में एडमिट है. बता दें कि पंकज त्रिपाठी के बहनोई रेलवे कर्मचारी थे और उनकी पोस्टिंग चितरंजन स्टेशन में थी.

 

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एक्टर के करियर की बात करें तो, पंकज त्रिपाठी की अपकमिंग क्राइम थ्रिलर वेब सीरीज मिर्जापुर 3 का लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. यह वेब सीरीज अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज होगी. पंकज के इस सीरीज के दोनों के पार्ट को लोगों ने काफी पसंद किया हैं. अब फैंस मिर्जापुर 3 के लिए काफी एक्साइटेड हैं. बता दें कि पंकज त्रिपाठी को हाल ही में फिल्म ‘मर्डर मुबारक’ में देखा गया था. इस मूवी में पंकज ने काफी अच्छी एक्टिंग की थी. इससे पहले पंकज त्रिपाठी की फिल्म ‘मैं अटल हूं’ रिलीज हुई थी, जिसे सभी ने दिल खोलकर प्यार दिया था.

औलाद की चाहत : कैसे भरी सायरा की कोख

उस्मान की शादी को 5 साल हो गए थे, मगर अभी भी उसे बाप होने का सुख नहीं मिला था. उस्मान की बीवी सायरा की गोद नहीं भरी तो उस्मान के अब्बा बेचैन रहने लगे. उन्हें यह चिंता सताने लगी कि वे पोते या पोती का मुंह देखे बिना ही इस दुनिया से चले जाएंगे.

तभी किसी ने उन्हें बताया कि पास वाले गांव में एक पहुंचे हुए मुल्लाजी आए हुए हैं. वे जिस किसी को भी तावीज देते हैं, उस की हर मुराद पूरी हो जाती है.

इतना सुनना था कि उस्मान के अब्बा अगले ही दिन उन मुल्लाजी के पास पहुंच गए.

मुल्लाजी ने कहा, ‘‘मैं घर आ कर पहले आप की बहू को देखूंगा कि उस पर किस का साया है. और हां, साए को दूर करने में खर्चा भी आएगा.’’

‘‘आप पैसे की परवाह मत करो, बस मेरे बेटे और बहू को औलाद का सुख दे दो.’’

उस्मान के अब्बा उसी वक्त मुल्लाजी को अपने साथ ले आए और उन्हें बैठक में बिठा कर उन्होंने उस्मान व सायरा को बताया, ‘‘इन मुल्लाजी के तावीज से तुम्हारी औलाद की चाहत जरूर पूरी होगी, बस तुम दोनों को इन की हर बात माननी पड़ेगी.’’

थोड़ी देर के बाद उस्मान की बीवी सायरा को बैठक में बुलाया गया. जैसे ही मुल्लाजी की नजर सायरा पर पड़ी, वे उसे पाने के लिए बेताब हो गए. हों भी क्यों न, सायरा थी ही इतनी खूबसूरत. सुर्ख गाल, गुलाबी होंठ, गदराया बदन जिसे देखते ही कोई भी मदहोश हो जाए.

मुल्लाजी किसी भी कीमत पर सायरा को अपनी बांहों में भरना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपनी चाल चली और उस के मखमली पेट पर हाथ रखते हुए उस्मान के अब्बा से कहा, ‘‘तुम्हारे एक दुश्मन ने जादूटोने से इस की

गोद बांध रखी है. जब तक इस को खोला नहीं जाएगा, तब तक यह मां नहीं बन पाएगी.

‘‘इस काम में 3 दिन लगेंगे और यह काम रात को 12 बजे अकेले में बंद कमरे में करना पड़ेगा और इस में काफी पैसा भी लगेगा, क्योंकि जाफरान से 3 तावीज बनाने पड़ेंगे.’’

उस्मान और सायरा को तो औलाद की इतनी ज्यादा चाहत थी कि उन्होंने फौरन हां कर दी. उस्मान के अब्बा ने 50,000 रुपए उस ढोंगी मुल्लाजी को दे दिए. उन्होंने उन के घर में से एक कमरा ले लिया और कहा, ‘‘जब तक पूरा इलाज न हो, तब तक कोई भी कमरे में मेरी बिना इजाजत के अंदर न आए.’’

मुल्लाजी शाम ढलते ही कमरे के अंदर लुबान जला कर कुछ बुदबुदाने लगे. कभी उन की आवाज तेज हो जाती, तो कभी शांत.

मुल्लाजी कभी किसी से बात करने का नाटक करते और चिल्लाते, ‘‘तू इसे छोड़ कर चला जा, वरना तु?ो यहीं भस्म कर दूंगा. क्यों इस बच्ची की कोख पर बैठा है? क्यों इसे मां नहीं बनने दे रहा है? इस मासूम ने तेरा क्या बिगाड़ा है?’’

इस तरह मुल्लाजी ने कई घंटे तक यह नाटक जारी रखा और रात ढलते ही उन्होंने सायरा को अपने कमरे में बुलाया और उसे एक तावीज देते हुए बोले, ‘‘इसे अपनी शर्मगाह में रख लो और चुपचाप लेट जाओ. एक घंटे तक बिलकुल भी हिलनाडुलना नहीं.

‘‘और हां, इस एक घंटे के लिए अपने बदन पर कोई भी सिला हुआ कपड़ा मत पहनना. बिना सिला हुआ कपड़ा जैसे चादर वगैरह से अपना बदन ढक लो.’’

सायरा तो औलाद की चाहत में अंधी हो चुकी थी. वह उस पाखंडी मुल्लाजी की हवस भरी नजरों को भांप नहीं पा रही थी. सायरा ही क्या, उस का शौहर और ससुर भी औलाद की चाहत में कुछ नहीं सम?ा पा रहे थे, इसलिए उन्होंने सायरा को उस पाखंडी मुल्लाजी के पास अकेले बंद कमरे में भेज दिया था. उन की आंखों पर अंधविश्वास की पट्टी जो बंधी हुई थी.

उधर बंद कमरे में सायरा ने अपने बदन से सारे कपड़े अलग किए और चादर ओढ़ कर एक चटाई पर लेट गई.

उस पाखंडी मुल्लाजी ने सायरा के पास आ कर अगरबत्ती जलाई, पूरे कमरे को खुशबू से महकाया और कुछ बुदबुदाने लगे. फिर वे सायरा से बोले, ‘‘अपनी आंखें बंद कर के चुपचाप लेटी रहो और कुछ भी बोलने की कोशिश

मत करना, वरना सारा कियाधरा बेकार हो जाएगा, फिर तुम कभी भी मां नहीं बन पाओगी.’’

सायरा चुपचाप लेटी थी और पाखंडी मुल्लाजी तावीज ले कर उस के होंठों से रगड़ते हुए कुछ बुदबुदाने का नाटक करते हुए धीरेधीरे उस के बदन को सहलाने लगे. उन की इस हरकत पर सायरा हैरान थी, पर औलाद पाने की चाहत में वह कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी, जिस का वे पाखंडी मुल्लाजी फायदा उठा रहे थे.

मुल्लाजी सायरा का बदन सहलाते रहे और उस तावीज को उस की शर्मगाह के पास ले जा कर छेड़छाड़ करने लगे. जल्द ही सायरा की जवानी उफान पर आ गई और वह मुल्लाजी की इस हरकत से मदहोश होने लगी.

सायरा की हवस जाग उठी थी. पाखंडी मुल्लाजी की इस हरकत ने उस के अंदर जोश भर दिया और इस का फायदा उठा कर उस मुल्लाजी ने उस के साथ खूब मजा किया. औलाद पाने की चाहत में सायरा उन के सामने पूरी तरह से बिछ चुकी थी.

इसी तरह उन पाखंडी मुल्लाजी ने 3 दिन तक सायरा की देह के मजे लिए और उस के जिस्म से खूब खेला. 3 दिन बाद उन्होंने उस्मान और उस के अब्बू से कहा, ‘‘जल्दी ही तुम्हें खुशखबरी मिल जाएगी,’’ और वहां से चले गए.

एक हफ्ता गुजर गया, पर सायरा को उम्मीद की कोई किरण नजर न आई. वह सम?ा चुकी थी कि उन पाखंडी मुल्लाजी ने दौलत के साथसाथ उस की इज्जत भी लूट ली है.

उस्मान और उस के अब्बू हैरान थे कि उन की बहू अभी भी पेट से नहीं हुई. उन्होंने पास के गांव जा कर उन मुल्लाजी से मिलना चाहा, तो पता चला कि वे तो यहां एक परिवार से लाखों रुपए ले कर भाग गए हैं.

अब उस्मान और उस के अब्बा को अपने ऊपर पछतावा हो रहा था कि वे क्यों पाखंडी मुल्लाजी की बातों में आ गए. बाद में उन्होंने एक अस्पताल में जा कर एक लेडी डाक्टर से सायरा का चैकअप कराया, तो उन्होंने बताया कि सायरा की बच्चेदानी में सूजन है,

जिस की वजह से वह मां नहीं बन पा रही है. 2-3 महीने के इलाज से सब ठीक हो जाएगा.

और हुआ भी यही. 3 महीने के इलाज के बाद सायरा को बच्चा ठहर गया और वक्त पूरा होने के बाद उस ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया.

इस तरह न जाने कितनी सायरा औलाद की चाहत में अपनी इज्जत गंवा बैठती हैं और न जाने कितने उस्मान दौलत के साथसाथ अपने घर की आबरू भी पाखंडी मुल्लाओं को सौंप देते हैं.

रहमानी : क्या थी कालू सेठ की चाल

‘‘अ रे रहमानी, तुम्हें कालू सेठ ने बुलाया है,’’ जब शम्मी बोला, तो रहमानी का चौंकना लाजिमी था.

‘‘क्यों मुझ से क्या काम आ गया?’’ रहमानी पूछ बैठा.

‘‘मुझे क्या मालूम, तुम मिल लो न,’’ शम्मी इतना कह कर चला गया.

‘‘जी, आप ने याद किया,’’ रहमानी सीधा कालू के पास जा कर बोला.

‘‘हां, आइए,’’ कहते हुए कालू ने रहमानी को अपने पास बिठाया और चायनाश्ता कराया.

‘‘जी बताइए, मैं आप की क्या खिदमत करूं?’’ रहमानी झुकते हुए बोला.

‘‘अरे, खिदमत कैसी. तुम्हारी बूआ तुम्हें याद कर रही है. घर आओ न,’’ कालू रहमानी से बड़े प्यार से मिला.

‘‘तो भाईजान, मैं कल आऊंगा.’’

‘‘अरे, पैदल नहीं. मैं तुम्हें मंडी से अपने साथ ले चलूंगा. तुम रात का खाना मेरे घर खाना,’’ इतना कह कालू ने रहमानी को प्यार से विदा किया.

रहमानी रात को अपने घर आया. उस का पुराने सुभाषनगर में छोटा सा झुग्गीनुमा घर है. उस के पापा दुकान चलाते थे. गैस कांड के बाद उन्हें सांस की शिकायत है, फिर भी वे घर से ही कारोबार में मदद करते हैं.

‘‘अब्बू, कालू सेठ ने बुलाया है?’’ रहमानी अब्बू से बात करते हुए बोला.

‘‘अरे, वह तो बड़ा बदमाश है. तेरी बूआ की ननद का बेटा है. आलू का बड़ा कारोबारी है. हम गरीब हैं, इसलिए हमें कोई नहीं पूछ रहा है.’’

‘‘उस ने कल शाम को खाने पर बुलाया है. दुकान बंद कर के चल पड़ेंगे.’’

‘‘अच्छा,’’ कह कर दोनों बापबेटा खाना खा कर सो गए.

सुबह 5 बजे उठ कर अब्बू बाजार से सब्जी उठा लाए. रहमानी शाम के 4 बजे मंडी चला गया. वहां से रात के 10 बजे तक सारा माल बेच कर खाली हुआ ही था कि कालू अपनी कार में अब्बू को बिठाए वहां आ गया.

वे दोनों मिठाई खरीद कर बूआ से मिलने कालू के घर पहुंचे. कालू के यहां रहमानी के फूफा फुरकान काम करते थे और 5 बेटियों के अब्बा थे, पर कालू उन की सगी बहन का बेटा था.

रहमानी को देख कर फूफा, बूआ, कालू की मां सब खुश हुए और इसी बीच कालू की बहन का मसला सामने आया.

‘‘भाईजान, आप मेरी बहन से निकाह कर लें,’’ कालू सीधे मुद्दे की बात पर आ गया.

‘‘आप इतने अमीर और कहां मैं गरीब. मेरे घर वह सुखी नहीं रह पाएगी,’’ यह रहमानी के अब्बू की आवाज थी.

‘‘गरीबीअमीरी मुद्दा नहीं है. लड़का मेहनती है, पहचान का है. फिर बीए पास भी है,’’ कालू बोला.

‘‘मेरी लड़की पढ़ीलिखी तो है, पर सब से बड़ी बात यह कि वह दागदार है,’’ लड़की के अब्बा ने कहा.

‘‘क्या मतलब…?’’ रहमानी चौंक गया.

‘‘वह पार्षद सगीर के बेटे अरबाज से प्यार करती थी. दोनों कैरियर कालेज में पढ़ते थे. फिर हम ने निकाह के लिए हामी भरी, बल्कि उन्हें छूट भी दे दी, पर एक महीना पहले सड़क हादसे में अरबाज चल बसा. बस, हम लोग परेशान हो गए.

‘‘सगीर का दूसरा बेटा…’’ रहमानी ने यह वाक्य जान कर अधूरा छोड़ दिया.

‘‘मत लो नाम उन का. वे मतलबी निकले. आज वे माईका के कारोबारी हैं. पूरे 10 लाख की चोट दे गए.’’

‘‘अब हम लोग आप की क्या मदद कर सकते हैं?’’ रहमानी ने कहा.

‘‘कुछ नहीं भाईजान, आप मेरी बहन का हाथ थाम लें. हम आप का यह एहसान कभी नहीं भूलेंगे,’’ कालू बोला.

‘‘आप को पता है कि मेरा बेटा 38 साल का है. लड़की काफी छोटी होगी. फिर हम लोग झुग्गी में रहते हैं. क्या वह हमारे साथ रह पाएगी? दूसरी बात यह कि क्या वह खाना पका सकती है?’’

‘‘खाना बनाना ही नहीं, वह सारा काम जानती है. रुको, हम रुखसाना को बुलाते हैं.’’

थोड़ी देर के बाद रुखसाना चाय ले कर सब के बीच आ कर बैठ गई.

‘‘देखो, हम लोग झुग्गी में रहते हैं. क्या आप हमारे साथ रह पाओगी? दूसरी बात, मेरे अब्बा भी साथ रहते हैं. खाना 3 लोगों का बनाना होगा.’’

‘‘मुझे सबकुछ बनाना आता है, फिर मेहनत करना तो अच्छी बात है,’’ इतना कह कर रुखसाना भीतर चली गई.

सांवले रंग की रुखसाना तकरीबन 28-30 साल के बीच की है. अब सब फाइनल हो गया. कालू की गुंडई के आगे सब शांत थे.

‘‘फिर ठीक है. अगले हफ्ते निकाह पढ़वा

लेते हैं,’’ कालू खुश हो कर बोला.

‘‘इतनी जल्दी, कुछ तो तैयारी करनी होगी,’’ रहमानी बोला.

‘‘सब मैं करवा दूंगा. आप इस तैयारी को देखें,’’ कालू ने उन्हें इज्जत से विदा किया.

फिर तो हफ्तेभर में काजी ने निकाह पढ़वा दिया. रुखसाना ससुराल आ गई. उस ने सबकुछ संभाल लिया. रहमानी के अब्बा ने शादी में जेवर, कपड़े और सामान इतना दिया कि कालू चौंक गया.

‘‘भाईजान, मेरी बहन को जन्नत मिल गई. आप तो हम से भी अमीर हैं.’’

‘‘क्यों मजाक कर रहे हो…’’ रहमानी बोला.

‘‘सच में दूल्हा भाई, 3 लाख के जेवर ही होंगे, फिर कपड़े, सामान, हम सब लोग हैरान हैं,’’ कालू बोला.

‘‘हमारा और कौन है. बस, आप की बहन ही है न. हम दोनों सुखी रहें, हमें और क्या चाहिए,’’ रहमानी मस्ती में जवाब दे बैठा.

सुबह 5 बजे चाय पी कर रहमानी का बूढ़ा बाप मंडी चला जाता और सामान ले आता. कालू के यहां से 4 कट्टा आलू भी ले आता.

फिर दिनरात का काम. बेटा कम काम करता. बस, बाप काम करता था. इस का नतीजा यह हुआ कि घर के हालात अच्छे होने लगे. उधर रुखसाना, जो हवस का शिकार थी, प्यार पा कर निहाल थी.

सो, उस दिन… सुबह के 5 बजे अब्बू चाय पी कर जा चुके थे और रुखसाना उठ कर फै्रश हो चुकी थी. वह चाय बनाने जा रही थी कि रहमानी पीछे से उसे पकड़ बैठा.

‘‘अरे,’’ कहते हुए वह रहमानी के सिर पर हाथ फेरने लगी.

रहमानी को जन्नत का सुख मिलने लगा, ‘‘तुम कितनी अच्छी हो,’’ वह उसे चूमते हुए बोला.

चाय पी कर दोनों पतिपत्नी एक हो गए. रहमानी को खूब मजा मिलने लगा, वहीं रुखसाना को तो कितनी बार लूटाखसोटा जा चुका था, पर उसे यहां गरीबी में भी सुख का अहसास हो चुका था.

कालू गुंडा था, जिस से लोग डरते थे, मगर कुछ लोगों से कालू भी डरता था, इसलिए जानबूझ कर बहन की इज्जत जैसे मामले पर वह चुप रहा.

‘‘कालू उसे मजा चखा दो न,’’ मांबाप के कहने पर वह भड़का जरूर, मगर दूध के उफान सा ठंडा हो चुका था.

‘‘बदनाम लड़की से शादी कौन करेगा? फिर वह तो मर चुका है. बस, हर जगह जोश अच्छा नहीं होता,’’ सभी कालू को समझा रहे थे. वहीं यह बलि का बकरा अच्छा मिल गया था.

‘‘क्या रहमानी, अपना कामधाम अच्छा चल रहा है न?’’

‘‘आराम से और पूरे ढंग से सब काम हो

रहा है.’’

‘‘रहमानी, जोरू कैसी है?’’ जब दोस्त पूछते, तो वह मुसकरा कर काम में खो जाता.

रहमानी को पत्नी बासी रोटी सी मिली थी, मगर वह खुश था. पत्नी के सारे काम ढंग से कर रही थी, वहीं अब्बू भी खुश थे. उधर सगीर भी इस समस्या का सही समाधान पा कर शांत बैठा था.

एक दिन अचानक गाड़ी का टायर फटने से पार्षद सगीर चल बसा. हत्या का केस बना और रहमानी को भी थाने बुलाया गया.

‘‘सगीर की मौत के बारे में पूछताछ करनी है,’’ दारोगा शांत भाव से बोला.

‘‘साहब, मैं न तो सगीर को जानता हूं, न कभी उस से मिला.’’

‘‘देख रहमानी, तू सच बोलेगा तो छूट जाएगा,’’ दारोगा समझाते हुए बोला.

‘‘साहब, सगीर हमारे पार्षद थे, मगर कभी मुलाकात नहीं हुई.’’

‘‘फिर भी कोई वाकिआ?’’

‘‘कुछ भी नहीं. मैं आलू बेचता हूं,’’ रहमानी दीन सी आवाज में बोला.

‘‘क्या तेरी बीवी का पहले सगीर के बेटे से रिश्ता हुआ था?’’ दारोगा ने पूछा.

‘‘मुझे शादी के पहले की बात कैसे पता होगी. कालू भाई मेरे अब्बू के पास आए और फिर मेरा निकाह हो गया,’’ रहमानी बोला.

‘‘ठीक है, तुम जा सकते हो, मगर जरूरत होगी तो हम कल आएंगे.’’

‘‘जरूर हुजूर,’’ सलाम करता हुआ रहमानी घर आ गया.

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ रुखसाना की घबराहट से भरी आवाज थी.

‘‘कुछ नहीं, सगीर गाड़ी का टायर फटने से मर गया. उसी सिलसिले में मुझे थाने में बुलाया था.’’

‘‘फिर…?’’

‘‘कुछ नहीं. मुझे कुछ मालूम नहीं था, इसलिए वापस भेज दिया. चल, चाय बना. मंडी जाना है. वैसे ही लेट हो रहा हूं,’’ रहमानी ने कहा. फिर उस ने जल्दी से चाय पी और मंडी चला गया.

मैं जिस लड़के से प्यार करती हूं उसे शादी भी करना चाहती हूं लेकिन क्या वह मुझे नौकरी करने देगा?

सवाल 

मैं 23 साल की कुंआरी लड़की हूं. गरीबी के चलते मैं 12वीं जमात के आगे नहीं पढ़ पाई हूं. एक साल से मैं रिलेशनशिप में हूं. लड़का मिडिल क्लास परिवार से है और वह मुझ से शादी करना चाहता है. उस ने यह भी कहा है कि मैं शादी के बाद आगे की पढ़ाई कर सकती हूं, पर उस के घर वालों को घरेलू बहू चाहिए. कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि शादी के बाद वे सचमुच मुझे आगे पढ़ने ही न दें? मैं पढ़ कर कोई नौकरी भी करना चाहती हूं. मुझे सलाह दें कि मैं क्या करूं?

जवाब

आप का डर सही भी हो सकता है. लड़का अगर खुद नौकरी में है, तो ऐसी नौबत आने की गुंजाइश कम ही रहेगी.  जिंदगी में कहीं तो भरोसा करना ही पड़ता है, इसलिए सबकुछ ठीकठाक हो तो शादी कर लेना घाटे की बात नहीं.

आप खुद लड़के के घर वालों से एक बार मिल कर अपने मन की बात कह दें. आजकल सभी को कमाऊ बहू चाहिए, इसलिए मुमकिन है कि वे आप की इच्छा का सम्मान करें.

प्रेम परिसीमा: कैसा था उन दोनों का वैवाहिक जीवन

अस्पताल के एक कमरे में पलंग पर लेटेलेटे करुणानिधि ने करवट बदली और प्रेम से अपनी 50 वर्षीया पत्नी मधुमति को देखते हुए कहा, ‘‘जा रही हो?’’

मधुमति समझी थी कि करुणानिधि सो रहा है. आवाज सुन कर पास आई, उस के माथे पर हाथ रखा, बाल सहलाए और मंद मुसकान भर कर धीमे स्वर में बोली, ‘‘जाग गए, अब तबीयत कैसी है, बुखार तो नहीं लगता.’’

करुणानिधि ने किंचित मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे हाथ रखने से तबीयत तो ठीक हो गई है, पर दिल की धड़कन बढ़ गई है.’’

घबरा कर मधुमति ने उस की छाती पर हाथ रखा. करुणानिधि ने उस के हाथ पर अपना हाथ रख कर दबा दिया. मधुमति समझ गई, और बोली, ‘‘फिर वही हरकत, अस्पताल में बिस्तर पर लेटेलेटे भी वही सूझता है. कोई देख लेगा तो क्या कहेगा?’’

करुणानिधि ने बिना हाथ छोड़े कहा, ‘‘देख लेगा तो क्या कहेगा? यही न कि पति ने पत्नी का हाथ पकड़ रखा है या पत्नी ने पति का. इस में डरने या घबराने की क्या बात है? अब तो उम्र बीत गई. अब भी सब से, दुनिया से डर लगता है?’’

मधुमति ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया और बोली, ‘‘डाक्टर ने आप को आराम करने को कहा है, आवेश में आना मना है. दिल का दौरा पड़ चुका है, कुछ तो खयाल करिए.’’

‘‘दिल का दौरा तो बहुत पहले ही पड़ चुका है. शादी से भी पहले. अब तो उस दौरे का अंतिम पड़ाव आने वाला है.’’

मधुमति ने उंगली रख कर उस का मुंह बंद किया और फिर सामान उठा कर घर चलने लगी. वह चलते हुए बोली, ‘‘दोपहर को आऊंगी. जरा घर की व्यवस्था देख आऊं.’’

करुणानिधि ने उस की पीठ देखते हुए फिकरा कसा, ‘‘हांहां, घर को तो कोई उठा ले जाएगा. बस, घर ही घर, तुम्हारा तो वही सबकुछ रहा है.’’

मधुमति बिना कोई उत्तर दिए कमरे से बाहर चली गई. डाक्टर ने कह दिया था कि करुणानिधि से बहस नहीं करनी है.

उस के जाते ही करुणानिधि थोड़ी देर छत की ओर देखता रहा. चारों तरफ शांति थी. धीरेधीरे उस की आंखें मुंदने लगीं. पिछला सारा जीवन उस की आंखों के सामने आ गया, प्रेमभरा, मदभरा जीवन…

शादी से पहले ही मधुमति से उसे प्रेम हो गया था. शादी के बाद के शुरुआती वर्ष तो खूब मस्ती से बीते. बस, प्रेम ही प्रेम, सुख ही सुख, चैन ही चैन. वे दोनों अकेले रहते थे. मधुमति प्रेमकला से अनभिज्ञ सी थी. पर धीरेधीरे वह विकसित होने लगी. मौसम उन का अभिन्न मित्र और प्रेरक बन गया. वर्षा, शरद और बसंत जैसी ऋतुएं उन्हें आलोडित करने लगीं.

होली तो वे दोनों सब से खेलते, पर पहले एकदूसरे के अंगप्रत्यंग में रंग लगाना, पानी की बौछार डालना, जैसे कृष्ण और राधा होली खेल रहे हों. दीवाली में साथसाथ दीए लगाना और जलाना, मिठाई खाना और खिलाना. दीवाली के दिन विशेषकर एक बंधी हुई रीति थी. मधुमति, करुणानिधि के सामने अपनी मांग भरवाने खड़ी हो जाती थी. कितने प्रेम से हर वर्ष वह उस की मांग भरता था. याद कर करुणानिधि की आंखों से आंसू ढलक गए, प्रेम के आंसू.

वे दिन थे जब प्रेम, प्रेम था, जब प्रेम चरमकोटि पर था. एक दिन की जुदाई भी असहनीय थी. कैसे फिर साथ हो, वियोग जल्दी से कैसे दूर हो, इस के मनसूबे बनाने में ही जुदाई का समय कटता था.

वे अविस्मरणीय दिन बीतते गए. अनंतकाल तक कैसे इस उच्चस्तर पर प्रेमालाप चल सकता था? फिर बच्चे हुए. मधुमति का ध्यान बच्चों को पालने में बंटा. बच्चों के साथ ही सामाजिक मेलजोल बढ़ने लगा. बच्चे बड़े होने लगे. मधुमति उन की पढ़ाई में व्यस्त, उन को स्कूल के लिए तैयार करने में, स्कूल के बाद खाना खिलाने, पढ़ाने में व्यस्त, घर सजाने का उसे बहुत शौक था. सो, घंटों सफाई, सजावट में बीत जाते. उद्यान लगाने का भी शौक चढ़ गया था. कभी किसी से मिलने चली गई. कभी कोई मिलने आ गया और कभी किसी पार्टी में जाना पड़ता. रिश्तेदारों से भी मिलनामिलाना जरूरी था.

मधुमति के पास करुणानिधि के लिए बहुत कम समय रह गया. इन सब कामों में व्यस्त रहने से वह थक भी जाती. उन की प्रेमलीला शिखर से उतर कर एकदम ठोस जमीन पर आ कर थम सी गई. जीवन की वास्तविकता ने उस पर अंकुश लगा दिए.

यह बात नहीं थी कि करुणानिधि व्यस्त नहीं था, वह भी काम में लगा रहता. आमतौर पर रात को देर से भी आता. पर उस की प्रबल इच्छा यही रहती कि मधुमति से प्रेम की दो बातें हो जाएं. पर अकसर यही होता कि बिस्तर पर लेटते ही मधुमति निद्रा में मग्न और करुणानिधि करवटें बदलता रहता, झुंझलाता रहता. ऐसा नहीं था कि प्रेम का अंत हो गया था. महीने में 2-3 बार सुस्त वासना फिर तीव्रता से जागृत हो उठती. थोड़े समय के लिए दोनों अतीत जैसे सुहावने आनंद में पहुंच जाते, पर कभीकभी ही, थोड़ी देर के लिए ही.

करुणानिधि मधुमति की मजबूरी  समझता था, पर पूरी तरह नहीं. पूरे जीवन में उसे यह अच्छी तरह समझ नहीं आया कि व्यस्त रहते हुए भी उस की तरह मधुमति प्रेमालाप के लिए कोई समय क्यों नहीं निकाल सकी. उसे तिरछी, मधुर दृष्टि से देखने में, कभी स्पर्शसुख देने में, कभीकभी आलिंगन करने में कितना समय लगता था? कभीकभी उसे ऐसा लगता जैसे उस में कोई कमी है. वह मधुमति को पूरी तरह जागृत करने में असफल रहा है. पर उसे कोई तसल्लीबख्श उत्तर कभी न मिला.

समय बीतता गया. बच्चे बड़े हो गए, उन की शादियां हो गईं. वे अपनेअपने घर चले गए, लड़के भी लड़कियां भी. घर में दोनों अकेले रह गए. तब करुणानिधि को लगा कि अब समय बदलेगा. अब मधुमति उस की ज्यादा परवा करेगी. उस के पास ज्यादा समय होगा. अब शादी के शुरू के वर्षों की पुनरावृत्ति होगी. पर उस की यह इच्छा, इच्छा ही बन कर रह गई. स्थिति और भी खराब हो गई, क्योंकि मधुमति दामादों, बहुओं व अन्य संबंधियों में और भी व्यस्त हो गई.

बेचारा करुणानिधि अतृप्त प्रेम के कारण क्षुब्ध, दुखी रहने लगा. मधुमति उस के क्रोध, दुख को फौरन समझ जाती, कभीकभी उन्हें दूर करने का प्रयत्न भी करती, पर करुणानिधि को लगता यह प्रेम वास्तविक नहीं है.

पिछले 20 वर्षों में कई बार करुणानिधि ने मधुमति से इस बारे में बात की. बातचीत कुछ ऐसे चलती…

करुणानिधि कहता, ‘मधुमति, तुम्हारे प्रेम में अब कमी आ गई है.’

‘वह कैसे? मुझे तो नहीं लगता, प्रेम कम हो गया है. आप का प्रेम कम हो गया होगा. मेरा तो और भी बढ़ गया है.’

‘यह तुम कैसे कह सकती हो? शादी के बाद के शुरुआती वर्ष याद नहीं हैं… कैसेकैसे, कहांकहां, कबकब, क्याक्या होता था.’

इस पर मधुमति कहती, ‘वैसा हमेशा कैसे चल सकता है? उम्र का तकाजा तो होगा ही. तुम्हारी दी हुई किताबों में ही लिखा है कि उम्र के साथसाथ रतिक्रीड़ा कम हो जाती है. फिर क्या रतिक्रीड़ा ही प्रेम है? उम्र के साथसाथ पतिपत्नी साथी, मित्र बनते जाते हैं. एकदूसरे को ज्यादा समझने लगते हैं. समय बीतने पर, पासपास चुप बैठे रहना भी, बात करना भी, प्रेम को समझनेसमझाने के लिए काफी होता है.’

‘किताबों में यह भी तो लिखा है कि इस के अपवाद भी होते हैं और हो सकते हैं. मैं उस का अपवाद हूं. इस उम्र में भी मेरे लिए, सिर्फ पासपास गुमसुम बैठना काफी नहीं है. तुम अपवाद क्यों नहीं बन सकती हो?’

ऐसे में मधुमिता कुछ नाराज हो कर कहती, ‘तो आप समझते हैं, मैं आप से प्रेम नहीं करती? दिनभर तो आप के काम में लगी रहती हूं. आप को अकेला छोड़ कर, मांबाप, बेटों, लड़कियों के पास बहुत कम जाती हूं. किसी परपुरुष पर कभी नजर नहीं डाली. आप से प्रेम न होता तो यह सब कैसे होता?’

‘बस, यही तो तुम्हारी गलती है. तुम समझती हो, प्रेमी के जीवन के लिए यही सबकुछ काफी है. पारस्परिक आकर्षण कायम रखने के लिए इन सब की जरूरत है. इन के बिना प्रेम का पौधा शायद फलेफूले नहीं, शायद शुष्क हो जाए. पर इन का अपना स्थान है. ये वास्तविक प्रेम, शारीरिक सन्निकटता का स्थान नहीं ले सकते. मैं ने भी कभी परस्त्री का ध्यान नहीं किया. कभी भी किसी अन्य स्त्री को प्रेम या वासना की दृष्टि से नहीं देखा. मैं तो तुम्हारी नजर, तुम्हारे स्पर्श के लिए ही तरसता रहा हूं. और तुम, इस पर कभी गौर ही नहीं करती. किताबों में लिखा है या नहीं कि पति के लिए स्त्री को वेश्या का रूप भी धारण करना चाहिए.’

करुणानिधि की इस तरह की बात सुन मधुमति तुनक कर जवाब देती, ‘मैं, और वेश्या? इस अधेड़ उम्र में? आप का दिमाग प्रेम की बातें सोचतेसोचते सही नहीं रहा. उम्र के साथ संतुलन भी तो रखना ही चाहिए. आप मेरी नजर को तरसते रहते हैं, मैं तो आप की नजर का ही इंतजार करती रहती हूं. आप के मुंह के रंग से, भावभंगिमा से, इशारे से समझ जाती हूं कि आप के मन में क्या है.’

‘मधुमति, यही अंतर तो तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा. नजर ‘को’ मत देखो, नजर ‘में’ देखो. कितना समय हो गया है आंखें मिला कर एकदूसरे को देखे हुए? तुम्हारे पास तो उस के लिए भी समय नहीं है. आतेजाते, कभी देखो तो फौरन पहचान जाओगी कि मेरा मन तुम्हें चाहने को, तुम्हें पाने को कैसे उतावला रहता है, अधीर रहता है. पर तुम तो शायद समझ कर भी नजर फेर लेती हो. पता कैसे लगे? बताऊं कैसे?’

‘जैसे पहले बताते थे. पहले रोक कर, कभी आप मेरी आंखों में नहीं देखते थे? कभी हाथ नहीं पकड़ते थे? अब वह सब क्यों नहीं करते?

‘वह भी तो कर के देख लिया, पर सब बेकार है. हाथ पकड़ता हूं तो झट से जवाब आता है, ‘मुझे काम करना है या कोई देख लेगा,’ झट हाथ खींच लेती हो या करवट बदल कर सो जाती हो. मैं भी आखिर स्वाभिमानी हूं. जब वर्षों पहले तय कर लिया कि किसी स्त्री के साथ, पत्नी के साथ भी जोरजबरदस्ती नहीं करूंगा, क्योंकि उस से प्रेम नहीं पनपता, उस से प्रेम की कब्र खुदती है, तो फिर सिवा चुप रहने के, प्रेम को दबा देने के, अपना मुंह फेर लेने के और क्या शेष रह जाता है?

‘तुम साल दर साल और भी बदलती जा रही हो. हमारे पलंग साथसाथ हैं…2 फुट की दूरी पर हम लेटते हैं. पर ऐसा लगता है जैसे मीलों दूर हों. मीलों दूर रहना फिर भी अच्छा है. उस से विरह की आग तो नहीं भड़केगी. उस के बाद पुनर्मिलन तो प्रेम को चरमसीमा तक पहुंचा देगा. पर पासपास लेटें और फिर भी बहुत दूर. इस से तो पीड़ा और भी बढ़ती है. कभीकभी, लेटेलेटे, यदि सोई न हो, तो मुझे आशा बंधती कि शायद आज कुछ परिवर्तन हो. पर तुम घर की, बच्चों की बात शुरू कर देती हो.’

ऐसी बातें कई बार हुईं. कुछ समय तक कुछ परिवर्तन होता. पुराने दिनों, पुरानी रातों की फिर पुनरावृत्ति होती. पर कुछ समय बाद करुणानिधि फिर उदास हो जाता. जब से मधुमति ने 50 वर्ष पार किए थे, तब से वह और भी अलगथलग रहने लगी थी. करुणानिधि ने बहुत समझाया, पर वह कहती, ‘आप तो कभी बूढ़े नहीं होंगे. पर मैं तो हो रही हूं. अब वानप्रस्थ, संन्यास का समय आ गया है. बच्चों की शादी हो चुकी है. अब तो कुछ और सोचो. मुझे तो अब शर्म आती है.’

‘पतिपत्नी के बीच शर्म किस बात की?’ करुणानिधि झुंझला कर कहता, ‘मुझे पता है, तुम्हारे चेहरे पर झुर्रियां पड़ रही हैं. मेरे भी कुछ दांत निकल गए हैं. तुम मोटी भी हो रही हो. मैं भी बीमार रहता हूं. पर इस से क्या होता है? मेरे मन में तो तुम वही और वैसी ही मधुमति हो, जिस के साथ मेरा विवाह हुआ था. मुझे तो अब भी तुम वही नई दुलहन लगती हो. अब भी तुम्हारी नजर से, स्पर्श से, आवाज से मैं रोमांचित हो उठता हूं. फिर तुम्हें क्या कठिनाई है, किस बात की शर्म है?

‘हम दोनों के बारे में कौन सोच रहा है, क्या सोच रहा है, इस से तुम्हें क्या फर्क पड़ता है? अधिक से अधिक बच्चे और उन के बच्चे, मित्र, संबंधी यही तो कहेंगे कि हम दोनों इस उम्र में भी एकदूसरे से प्रेम करते हैं, एकदूसरे का साथ चाहते हैं, शायद सहवास भी करते हैं…तो कहने दो. हमारा जीवन, अपना जीवन है. यह तो दोबारा नहीं आएगा. क्यों न प्रेम की चरमसीमा पर रहतेरहते ही जीवन समाप्त किया जाए.’

मधुमति यह सब समझती थी. आखिर वर्षों से पति की प्रेमिका थी, पर पता नहीं क्यों, उतना नहीं समझती थी, जितना करुणानिधि चाहता था. उस के मन के किसी कोने में कोई रुकावट थी, जिसे वह पूर्णतया दूर न कर सकी. शायद भारतीय नारी के संस्कारों की रुकावट थी.

अस्पताल में बिस्तर पर पड़ा, यह सब सोचता हुआ, करुणानिधि चौंका, मधुमति घर से वापस आ गई थी. वह खाने का सामान मेज पर रख रही थी. वैसा ही सुंदर चेहरा जैसा विवाह के समय था…मुख पर अभी भी तेज और चमक. बाल अभी भी काफी काले थे. कुछ सफेद बाल भी उस की सुंदरता को बढ़ा रहे थे.

बरतनों की आवाज सुन कर करुणानिधि ने मधुमति की ओर देखा तो उसे दिखाई दीं, वही बड़ीबड़ी, कालीकाली आंखें, वही सुंदर, मधुर मुसकान, वही गठा हुआ बदन कसी हुई साड़ी में लिपटा हुआ. करुणानिधि को उस के चेहरे, गले, गरदन पर झुर्रियां तो दिख ही नहीं रही थीं. उसे प्रेम से देखता करुणानिधि बुदबुदाया, ‘तेरे इश्क की इंतिहा चाहता हूं.’

छोटे से कमरे में गूंजता यह वाक्य मधुमति तक पहुंच गया. सब समझते हुए वह मुसकराई और पास आ कर उस के माथे पर हाथ रख कर बोली, ‘‘फिर वही विचार, वही भावनाएं. दिल के दौरे के बाद कुछ दिन तो आराम कर लो.’’

करुणानिधि ने निराशा में एक लंबी, ठंडी सांस ली और करवट बदल कर दीवार की ओर मुंह कर लिया.

लेकिन कुछ समय बाद ही मधुमति को भी करुणानिधि की तरह लंबी, ठंडी सांस भरनी पड़ी और करवट बदल कर दीवार की ओर मुंह करना पड़ा.

अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद करुणानिधि घर आ गया. अच्छी तरह स्वास्थ्य लाभ करने में कुछ महीने लग गए. तब तक मधुमति उस से परे ही रही. उसे डर था कि समीप आने पर उसे दोबारा दिल का दौरा न पड़ जाए. उस ने इस डर के बारे में करुणानिधि को समझाने की कोशिश की, पर सब व्यर्थ. जब भी इस के बारे में बातें होतीं, करुणानिधि कहता कि वह उसे केवल टालने की कोशिश कर रही है.

कुछ महीने बाद करुणानिधि 61 वर्ष का हो गया और लगभग पूर्णतया स्वस्थ भी. इस कारण विवाह की सालगिरह की रात जब उस ने मधुमति की ओर हाथ बढ़ाया तो उस ने इनकार न किया, पर उस के बाद करुणानिधि स्तब्ध रह गया. पहली बार उसे अंगरेजी कहावत ‘माइंड इज विलिंग, बट द फ्लैश इज वीक’ (मन तो चाहता है, पर शरीर जवाब देता है.) का अर्थ ठीक से समझ में आया और वह दुखी हो गया.

मधुमति ने उसे समझाने की कोशिश की. उस रात तो कुछ समझ न आया, पर जब फिर कई बार वैसा ही हुआ तो उसे उस स्थिति को स्वीकार करना पड़ा, क्योंकि डाक्टरों ने उसे बता दिया था कि उच्च रक्तचाव और मधुमेह के कारण ही ऐसी स्थिति आ गई थी.

अब मधुमति दीवार की ओर मुंह मोड़ने लगी, पर मुसकरा कर. एक बार जब करुणानिधि ने इस निराशा पर खेद व्यक्त किया तो उस ने कहा, ‘‘खेद प्रकट करने जैसी कोई बात ही नहीं है. प्रकृति के नियमों के विरुद्ध कोई कैसे जा सकता है. जब बच्चों की देखभाल के कारण या घर के कामकाज के कारण मेरा ध्यान आप की ओर से कुछ खिंचा, तो वह भी प्रकृति के नियमों के अनुसार ही था. आप को उसे स्वीकार करना चाहिए था. जैसे आज मैं स्वीकार कर रही हूं.

आप के प्रति मेरे प्रेम में तब भी कोई अंतर नहीं आया था और न अब आएगा. प्रेम, वासना का दूसरा नाम नहीं है. प्रेम अलग श्रेणी में है, जो समय के साथ बढ़ता है, परिपक्व होता है. उस में ऐसी बातों से, किसी भी उम्र में कमी नहीं आ सकती. यही प्रेम की परिसीमा है.’’

करुणानिधि को एकदम तो नहीं, पर समय बीतने के साथ मधुमति की बातों की सत्यता समझ में आने लगी और फिर धीरेधीरे उन का जीवन फिर से मधुर प्रेम की निश्छल धारा में बहने लगा.

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