Serial Story- कितने झूठ: भाग 3

‘‘कभीकभी लगता है, भैया, तुम ने अच्छा ही किया. तुम इस लड़ाईझगड़े से दूर रहे हो. ऐसा दिन नहीं बीतता जिस दिन खटपट न होती हो.’’

उस ने कोई जवाब नहीं दिया. सिर्फ मूकभाव से खिड़की से आसमान को देखने लगा. बाहर 2 बडे़बडे़ बादल आपस में टकराए. जोरों की गड़गड़ाहट हुई और मामूली सी झड़ी ने मूसलाधार बारिश का रूप ले लिया.

‘‘भैया, इस बार भी सुधा को नहीं लाए?’’उस ने अचकचा कर आदर्श की ओर देखा.

‘‘क्या बात है, भैया, तुम आज कुछ उदासउदास से हो?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘अरे, मैं तो भूल ही गई. मां ने तुम्हें उपमा देने के लिए कहा था,’’ कह कर आदर्र्श चली गई.

जहां वह बैठा था, खिड़की से वहां तक बौछार आने लगी थी और वह उस हलकी सी फुहार से भीग कर एक सुखद झुरझुरी सी लेने लगा. सुधा से मुलाकात के प्रथम महीनों से भी वह ऐसी ही सुखद झुरझुरी से भर उठा था.

खंजन सी आंखें, चौड़ा चेहरा, दरमियाना कद, गोरीचिट्टी, हंसे तो हरसिंगार के फूल झड़ जाएं. किसी पार्टी में उस की एक झलक पा कर वह उसे पाने के लिए उन्मत्त सा हो उठा था. किसी तरह परिचय कर के उस ने उस से पहले दोस्ती की और फिर शादी करने का प्रस्ताव रख दिया था. लेकिन मां बौखला उठी थीं. जहर खा कर मरने की धमकी देने लगी थीं.

ये भी पढ़ें- पछतावा : आखिर दीनानाथ की क्या थी गलती

पर वह अपने निर्णय से डिगा नहीं और पापा ने कह दिया था कि उस से संबंध जोड़ने से पहले तुम्हें हमारे साथ संबंध तोड़ना पड़ेगा.

विवश हो उस ने कोर्टमैरिज कर ली थी. उस शादी में सिर्फ सुधा के मांबाप और रिश्तेदार शामिल हुए थे. उस के घर वालों की तरफ से कोई नहीं आया था. एक साल तक वह उन से अपनेआप को बेहद कटाकटा सा महसूस करता रहा था. फिर जब उसे निमोनिया हो गया था तो मां दौड़ीदौड़ी आईर् थीं और उस की तीमारदारी में लग गई थीं. उस के बाद हर इतवार को यहां आ कर दोपहर का भोजन करने का सिलसिला चालू हुआ था.

‘‘यह लो उपमा, मां ने तुम्हारे लिए ही बनाया है,’’ आदर्श ने उसे एक प्लेट देते हुए कहा.

उपमा खातेखाते उस ने पूछा, ‘‘हर्ष कहां गई है?’’

‘‘ट्यूशन पढ़ने.’’

‘‘और नवीन?’’

‘‘क्रिकेट मैच खेलने. मैं ने तो बहुत कहा कि बारिश के आसार हैं, मत जाओ. मगर वह माना ही नहीं.’’

ये भी पढ़ें- Valentine’s Special- आउटसोर्सिंग: भाग 3

वह धीरेधीरे उपमा खाने लगा. लेकिन लग रहा था जैसे वह दूर कहीं खोया हुआ है.

‘‘तुम खुश तो हो न, भैया?’’

‘‘हूं, क्यों, क्या बात है?’’

‘‘नहीं, यों ही पूछा.’’

उस ने अर्थभरी दृष्टि से देख कर पूछा, ‘‘तुम्हें सुधा तो नहीं मिली थी?’’

‘‘मिली तो थीं.’’

वह उठ कर व्यग्रभाव से टहलने लगा और बारबार आदर्श को जिज्ञासापूर्ण दृष्टि से देखने लगा.

‘भैया, मैं ने तुम्हें परेशान कर दिया?’’

‘‘नहींनहीं, कुछ कह रही थी वह?’’

‘‘पहले तुम यह बताओ कि उस दिन क्या हुआ था?’’

‘‘किस दिन?’’ तपाक से उस ने पूछा.

‘‘जिस दिन तुम दोनों नवीनचंद्र के बेटे की शादी में गए थे.’’

‘‘यह तुम्हें किस ने बताया?’’

‘‘सुधा ने.’’

‘‘फिर तो सुधा ने तुम्हें सबकुछ बता दिया होगा?’’

‘‘सुधा ने जो कुछ बताया वह बाद में बताऊंगी. पहले तुम यह बताओ कि उस दिन क्या हुआ था?’’

‘‘उस दिन, हम दोनों सजधज कर नवीनचंद्र के बेटे की पार्टी में गए थे और हमें जिस युवक ने आइसक्रीम ला कर दी, सुधा उसी को एकटक देखने लगी. वैसे, वह युवक था भी स्मार्ट और गोराचिट्टा. उस की कालीकाली आंखें बेहद चमक रही थीं और उस के घने काले बाल देख कर ऐसा लगता था जैसे उस ने कनटोप पहन लिया हो,’’ कहतेकहते वह अचानक रुक गया. एक क्षण के बाद फिर बोला, ‘‘वह आइसक्रीम दे कर चला गया और हाल में दूसरों को आइसक्रीम देने लगा. लेकिन मैं ने गौर किया कि सुधा की नजरें बारबार उसी को ढूंढ़ रही हैं. जब वह दोबारा हमारे पास आइसक्रीम ले कर आया तो हम ने उसे मना कर दिया. लेकिन सुधा उस से एक और मांग बैठी. वह लेने चला गया.

‘‘मैं ने सुधा से पूछ लिया, ‘तुम इसे जानती हो?’’’

‘‘वह जैसे घबरा गई. ‘नहीं, नहीं तो.’

‘‘मैं ने सोचा, वाकई शायद नहीं जानती होगी और मैं अपने मित्र के साथ बातचीत करने लगा. वह भी अपनी सहेली के साथ गपें मारने लगी. इतने में वही युवक आइसक्रीम ले आया और सुधा की सहेली उसे देख कर जैसे चहक उठी, अरे, यह तो तेरा जीवन है.

‘‘युवक शायद परेशान हुआ. ‘आप कुछ लेंगी?’ उस ने सुधा की सहेली से पूछा. ‘मेरे लिए भी एक आइसक्रीम ला दीजिए.’ वह युवक चला गया.

ये भी पढ़ें- Serial Story: अस्मत का सौदा- भाग 2

‘‘‘सुधा, तू तो कहती थी कि…यह जीवन कहां से आ गया?’

‘‘मैं ने उन की बातचीत के यही टुकड़े सुने. मेरे अंदर कुछ दरक सा उठा. मैं सोचने लगा, न जाने आज तक सुधा कितने झूठ बोलती रही है मुझ से. मुझे कुछ भरभरा कर बहता हुआ सा महसूस हुआ. फिर भी मैं ने उस से कुछ नहीं कहा. सोचा, घर चल कर उस से पूछूंगा कि यह जीवन कौन है? कब से जानती है वह उसे? लेकिन घर पहुंचते ही मेरा विचार बदल गया और मैं ने सोचा कि देखें कब तक वह इस झूठ पर परदा डाले रखती है.

‘‘मेरे मन में एक ज्वालामुखी सा धधक रहा था और मैं उस के फटने की आशंका से चुप रह गया. अंदर ही अंदर घुटता रहा. लेकिन मैं ने कुछ नहीं कहा. 2 दिन संवादहीन स्थिति को जीते हुए बीत गए और ऐसा लगा जैसे हम दोनों के बीच शीशे की दीवार बन गईर् है. आखिर तीसरे दिन सुधा ने वह शीशे की दीवार तोड़ दी और मुझे ऐसा लगा जैसे कांच के अनगिनत टुकड़े मेरे सारे बदन में चुभ गए हैं.

‘‘सुधा ने मुझ से कहा, ‘तुम अंदर ही अंदर क्यों घुट रहे हो, यह मैं जानती हूं. चाहा था जिस बात पर परदा पड़ता आया है वह तुम्हें बताऊं ही नहीं, लेकिन अब बगैर बताए रह नहीं सकती. एक छोटे झूठ की वजह से हमारे बीच जो यह दरार सी पड़ गई है वह शायद मेरे सच बताने से पट जाए. वैसे, उम्मीद कम है. लेकिन फिर भी मैं आज सारी हकीकत बता देती हूं.

Serial Story- कितने झूठ: भाग 4

‘‘ ‘जिस ने मुझे आइसक्रीम दी थी वह जीवन नहीं, उस का भाई है. वह युवक भी हूबहू जीवन जैसा लगता है, वैसा ही स्मार्ट, गोराचिट्टा, चमकती आंखें और कनटोप जैसे घने काले बाल. जीवन मेरे साथ कालेज में पढ़ता था. उसे स्टेज का बहुत शौक था. कालेज के हर ड्रामे में वह जरूर हिस्सा लेता था और मैं उस की थर्राती आवाज के जादू से सम्मोहित थी. जब भी उस का नाटक होता तब मैं सब से आगे जा कर बैठ जाती थी और नाटक खत्म होने के बाद सब से पहले उसे फूल भेंट कर उस के अभिनय व उस की थर्राती आवाज की प्रशंसा  कि या करती थी.’

‘‘मुझे कुछ चुभ सा गया. मैं ने तड़प कर कहा, ‘ऐसा ही था तो उस से तुम ने शादी क्यों नहीं कर ली?’

‘‘उस ने बेलाग शब्दों में कहा, ‘शायद कर भी लेती, अगर डिगरी लेने जाते वक्त मोटरसाइकिल दुर्घटना में उस की मृत्यु न हो गई होती.’

‘जीवन जिंदा नहीं है?’

‘नहीं.’

‘यह बात तुम ने मुझे पहले क्यों नही बताई?’

‘‘उस ने कोई जवाब नहीं दिया. वह होंठ भींच कर दबे स्वर में सुबकने लगी. उस के पास जा कर न तो मैं ने उस की पीठ सहला कर उस के आंसू ही पोंछे और न सांत्वना के दो शब्द ही कहे. वह बैठी सुबकती रही और मैं बैठा सोचता रहा, ‘पिछले 8 सालों से यह औरत अपने पहले प्रेमी की थर्राती आवाज से सम्मोहित हो कर उस की स्मृतियां संजोए मेरे साथ जीने का नाटक करती रही है. यह मक्कार है. यह झूठी है. अब इस झूठ के साथ और मैं नहीं रह सकता.’’’

‘‘फिर?’’ आदर्श ने पूछा.

‘‘अगले दिन शनिवार था और हर शनिवार को वह मायके जाती थी. उस ने सवेरे ही पूछा ‘आज मैं मायके जाऊं?’

‘‘ ‘हां, हां,’ मैं ने कहा.

‘‘ ‘सिकंदराबाद से 2 दिनों के लिए आज मेरी बहन आ रही है. मैं 2 दिन मायके रह आऊं?’

‘‘ ‘जैसा तुम चाहो.’’’

‘‘और उस के बाद न वह आई और न तुम ने उसे बुलाया?’’ आदर्श ने पूछा.

ये भी पढ़ें- Short Story : टूटे हुए पंखों की उड़ान

उस ने जवाब नहीं दिया. परदा सरसराया. किसी की परछाई सी देख कर वह पूछ बैठा, ‘‘अंदर कोई है क्या?’’

‘‘कोई नहीं, हवा से परदा हिल गया होगा.’’उस ने समझा शायद भ्रम हुआ होगा.

‘‘सुधा ने तुम्हें क्या बताया?’’

‘‘यह रक्षा कौन है?’’

‘‘रक्षा?’’ उस ने अचकचा कर पूछा और चकित भाव से आदर्श को देखा, ‘‘तुम्हें किस ने बताया?’’

‘‘सुधा ने.’’

‘‘फिर क्यों पूछती हो?’’

‘‘क्या यह सच है कि रक्षा की आंखें खंजन जैसी और चेहरा चौड़ा है. वह गोरीचिट्टी है और उस का कद दरमियाना है और वह जब हंसती थी तो हरसिंगार के फूल झड़ते थे.’’

‘‘हां.’’

‘‘और वह तुम्हारे साथ कालेज में पढ़ती थी और तुम उस से बेहद प्यार करते थे.’’

‘‘हांहां,’’ उस ने खीझ कर कहा.

‘‘और वह अपने मांबाप के साथ इंगलैंड चली गई?

‘‘यहां उन की दुकान नहीं चल रही थी, और उन की आर्थिक स्थिति बेहद बिगड़ी हुई थी. वे लोग चुपचाप अपनी दुकान बेच कर इंगलैंड चले जाना चाहते थे, ताकि रक्षा के पिता को यहां किसी के यहां ताबेदारी न करनी पड़े.

‘‘और रक्षा तुम्हें यह आश्वासन दे कर चली गई थी कि वह तुम्हें इंगलैंड बुला लेगी और उस ने तुम्हें इंगलैंड बुला लेने के बजाय वहीं किसी यूरोपियन से ब्याह कर लिया और तुम बेहद टूट गए. तुम अपनी पढ़ाई भी पूरी नहीं कर सके और नौकरी कर ली. फिर एक पार्टी में अचानक सुधा की एक झलक पा कर तुम बेचैन हो उठे. उस का परिचय पा कर तुम ने उस से मेलजोल बढ़ा लिया और उस से शादी करने के लिए तुम तैयार हो गए. महज इसलिए कि सुधा की शक्ल कुछकुछ रक्षा से मिलती है. खंजन जैसी आंखें…’’

उस ने आदर्श की बात बीच में ही काट दी और बोला, ‘‘यह सब तुम्हें किस ने बताया?’’

‘‘सुधा ने.’’

‘‘लेकिन मैं ने तो उसे कभी कुछ नहीं बताया. उसे यह सब कैसे मालूम हुआ?’’ यह कहने के साथ वह उठ कर चहलकदमी करने लगा.

‘‘एक दिन घर की सफाई करते वक्त उसे तुम्हारे सारे खतोकिताबत, फोटो, डायरियां आदि मिल गई थीं.’’

‘‘फिर भी उस ने मुझ से कुछ नहीं पूछा?’’

लेकिन आदर्श अपनी ही रौ में कहती गई, ‘‘क्या यह सच नहीं है कि तुम ने सुधा को सुधा के रूप में नहीं, रक्षा के रूप में स्वीकारा था. उसे रक्षा के सांचे में ढालते रहे. रक्षा की तरह हलके शेड्स के कपड़ों में सजनेसंवरने के लिए उसे बाध्य करते रहे. पहले तो वह सोचती रही कि वह तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी कर रही है और उस का जीवन सार्थक हो गया है लेकिन तुम अतीत के एक कालखंड को फिर जीने के लिए लालायित थे. उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह मर रही है और उस में कोई दूसरा जी उठा है.’’

वह बैठ गया और आंखें नीची किए सिर्फ उंगलियां चटकाने लगा.

‘‘उस ने अंगरेजी में एक कहानी पढ़ी थी, जिस में एक पति, जो कलंदर था, अपनी पत्नी को रीछ की खाल ओढ़ा कर उस का खेल दिखा कर अपनी जीविका जुटाता है. उसे भी ऐसा ही लगा जैसे वह किसी दूसरे की खाल ओढ़ कर तुम्हारी पत्नी होने का अभिनय कर रही है.’’

आदर्श की बातें सुन कर वह अजीब सी झेंप से भर उठा. वह उठ कर खिड़की के पास चला गया. बारिश थम गई थी और बादल छंट चुके थे. आसमान धुले कपड़े की तरह साफ चमक रहा था. इतने में कोई आवाज सुन कर वह मुड़ा. आदर्श वहीं बैठी थी, ‘‘वह उलटी कौन कर रहा है?’’

ये भी पढ़ें- मजबूरी: रिहान क्यों नहीं कर पाया तबस्सुम से शादी

‘‘शायद सुधा भाभी होंगी.’’

‘‘क्या, सुधा यहां आई हुई है, तुम ने पहले क्यों नहीं बताया?’’ वह बाथरूम की तरफ दौड़ा. बाथरूम के बाहर झुकी सुधा उलटी कर रही थी और मां उस की पीठ सहला रही थीं.इतने में हड़बड़ाए हुए पापा आए, ‘‘अरे भई, क्या हुआ इसे? बेटा, डाक्टर को तो फोन करो.’’

मां बोली, ‘‘न बेटा, फोन मत करना. विकास के पापा, अब तुम दादा बनने वाले हो. मुंह मीठा करो…’’

लवली मामी: प्यार ने बनाया कातिल- भाग 1

सौजन्य-  सत्यकथा

मंगलवार, 5 जनवरी 2021 का सूरज उदय ही हुआ था कि मूंडवा थाने में फोन द्वारा सूचना मिलीलके मूंडवा गांव के सरोवर के पास मंदिर से सटे घर में चारपाई पर सुरेश की लाश पड़ी है. सुरेश की रात में अज्ञात हत्यारों ने सोते समय धारदार हथियार से हत्या कर दी है.

सूचना मिलते ही मूंडवा थानाप्रभारी बलदेवराम पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. घटनास्थल पास में ही था, इसलिए वह वहां 10 मिनट में ही पहुंच गए. वहां आसपास के लोगों की भीड़ जमा हो गई थी. उन्हें हटा कर पुलिस मकान के अंदर पहुंची, जहां चारपाई पर मृतक सुरेश साद (35 वर्ष) की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. मृतक पुजारी परिवार से था.

खून के छींटे फर्श और दीवारों पर भी लगे थे. थानाप्रभारी बलदेवराम ने जांचपड़ताल और मौकामुआयना किया. घर की दीवारें काफी ऊंची थीं, इस कारण प्रथमदृष्टया ऐसा लग रहा था कि जिस ने भी हत्या की थी, वह दीवार फांद कर घर में नहीं आया था.

तो क्या हत्या में घर के किसी सदस्य का हाथ है? अगर हाथ है तो वह कौन है और उस ने हत्या क्यों की? ये तमाम सवाल थानाप्रभारी के जेहन में आजा रहे थे. थानाप्रभारी बलदेवराम ने सुरेश साद हत्याकांड की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दी.

ये भी पढ़ें- Crime Story: केशरबाई की खूनी प्रेम कहानी

मामला मंदिर के पुजारी से जुड़ा था. ऐसे मामले में राजनीति बहुत जल्द शुरू हो जाती है. इस कारण घटना की खबर मिलते ही एएसपी राजेश मीणा, सीओ विजय कुमार सांखला और एसपी (नागौर) श्वेता धनखड़ घटनास्थल पर आ पहुंचे.

घटनास्थल पर पुलिस अधिकारियों ने मौकामुआयना किया और नागौर से एफएसएल की टीम और एमओबी टीम को मौके पर बुला कर साक्ष्य इकट्ठा किए. पुलिस टीम ने मृतक के घर वालों से पूछताछ की.

पूछताछ में घर वालों ने बताया कि सुरेश रात में पशुओं को चारा खिलाने गया था. रात में वह चारा खिलाने के बाद बरामदे में चारपाई पर आ कर सो गया. अगली सुबह 5 जनवरी को जब मृतक सुरेश की पत्नी किरण ने आ कर पति को आवाज दी तो कोई जवाब नहीं मिला.

फिर वह किरण बरामदे में आई और जैसे ही चारपाई पर खून से लथपथ पति की लाश देखी तो वह रोनेचिल्लाने लगी. तब घर के अन्य सदस्य दौड़ कर आए. उन्होंने देखा कि सुरेश की खून से लथपथ लाश बिस्तर पर पड़ी थी. तब उन्होंने थाना मूंडवा में फोन कर खबर दी.

इस के बाद मूंडवा थाना पुलिस घटनास्थल पर आई और जांच शुरू की. मृतक मंदिर में बने घर में रहता था. सुरेश के परिवार में उस की पत्नी किरण (30 साल) के अलावा 4 बच्चे थे.

घटना वाली रात किरण कमरे में बच्चों के साथ सो रही थी जबकि सुरेश बाहर बरामदे में ही सोता था.

एसपी श्वेता धनखड़ ने मृतक की पत्नी किरण से पूछा, ‘‘आप ने रात में क्या कोई चीख सुनी थी?’’

‘‘नहीं, मैं ने कुछ भी नहीं सुना.’’ किरण बोली.

मृतक के अन्य परिजनों से भी पूछताछ की गई. मगर सभी ने यही कहा कि उन्होंने कोई आवाज या खटका वगैरह नहीं सुना था. तब एसपी श्वेता धनखड़ ने पूछा, ‘‘किसी से कोई दुश्मनी थी क्या सुरेश की? किसी से कोई लड़ाईझगड़ा हुआ हो या किसी पर शक हो तो बताएं.’’

ये भी पढ़ें- Crime Story: मीठे रिश्तों की कड़वाहट

मृतक के परिजनों ने कहा कि मृतक शांत स्वभाव का था. उस की किसी से दुश्मनी नहीं थी. न ही किसी से उस का लड़ाईझगड़ा हुआ था. मृतक के परिजनों का कहना था कि उन्हें किसी पर शक नहीं है.

कोई घर में आ कर सोते व्यक्ति को धारदार हथियार से मार कर चला गया और मृतक के बीवीबच्चे और भाई तथा अन्य सदस्यों को भनक तक नहीं लगी. घर की दीवार इतनी ऊंची थी कि उस पर चढ़ कर अंदर आना संभव नहीं था. न ही घर के चारों ओर की दीवारों के पास किसी के पैरों के निशान थे. अगर कोई दीवार पर चढ़ता तो उस के पदचिह्न जरूर होते. मगर पैरों के निशान नहीं थे.

ऐसे में पुलिस अधिकारियों को मृतक के परिवार के लोगों पर शक हुआ कि हो न हो इस हत्याकांड में परिवार का कोई व्यक्ति शामिल है.

पुलिस टीम ने शव पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिया. एफएसएल टीम ने साक्ष्य एकत्र किए. शव पर धारदार हथियार के 3-4 गहरे जख्म थे. हालांकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक का इंतजार करना था.

पुलिस टीम ने मृतक के परिजनों सहित ग्रामीणों से भी पूछताछ की. हालांकि उस समय तक इस मामले में कोई सुराग हाथ नहीं लगा था. फिर भी पुलिस अधिकारी हत्याकांड के परदाफाश के लिए जीजान से जुटे थे.

अगले भाग में पढ़ें- क्या सुरेश साद हत्याकांड का परदाफाश हुआ

लवली मामी: प्यार ने बनाया कातिल- भाग 2

सौजन्य-  सत्यकथा

एसपी श्वेता धनखड़ ने एएसपी राजेश मीणा, डिप्टी विजय कुमार सांखला और मूंडवा थानाप्रभारी बलदेवराम को दिशानिर्देश दे कर कहा कि जल्द से जल्द हत्याकांड का परदाफाश कर हत्यारों को गिरफ्तार किया जाए.

एसपी श्वेता धनखड़ दिशानिर्देश दे कर नागौर लौट गईं. पुलिस अधिकारियों का शक मृतक की पत्नी किरण पर था. इस का कारण था कि बरामदे के पास के कमरे में वह अपने चारों बच्चों के साथ सोई थी. सुरेश का मकान सुनसान इलाके में था, जहां शोरशराबा नहीं था. ऐसे में कोई आ कर हत्या कर दे और बरामदे से सटे कमरे में पता नहीं चले, यह असंभव था.

इस कारण एकबार किरण पुलिस की निगाहों में आई तो उस की कुंडली खंगाली जाने लगी. सुरेश का शव पोस्टमार्टम के बाद उस के परिजनों को सौंप दिया गया. परिजनों ने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. एसपी के निर्देश पर सुरेश साद हत्याकांड का परदाफाश करने के लिए एएसपी राजेश मीणा, सीओ विजय कुमार सांखला के नेतृत्व में थानाप्रभारी बलदेवराम सहित अन्य पुलिसकर्मियों ने जांच शुरू की.

मृतक की पत्नी किरण साद के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई. साथ ही पुलिस ने अपने मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया. काल डिटेल्स से पता चला कि जोधपुर जिले के बनाड़ थाने के गांव दईकड़ा निवासी शंभूदास साद से किरण की दिन में कईकई बार घंटों तक बातें होती थीं. शंभूदास मृतक का भांजा था.

ये भी पढ़ें- Crime: जब सेवक “किडनैपर” बन जाए!

पुलिस अधिकारियों को मुखबिर से भी सूचना मिल चुकी थी कि शंभूदास और किरण के अवैध संबंध हैं. बस फिर क्या था, पुलिस ने मृतक सुरेश के 21 साल के भांजे शंभूदास को पूछताछ के लिए दबोच लिया.

पुलिस ने उस से पूछताछ की तो पहले तो वह टालमटोल करता रहा मगर पुलिस ने सख्ती की तो वह टूट गया और अपना जुर्म कबूल कर लिया कि मामी किरण से उस के अवैध संबंध हैं. मामा सुरेश को उन के संबंधों पर शक हो गया था. इस कारण वह मामीभांजे के संबंधों के बीच रोड़ा बनने लगा था. इस कारण उन दोनों ने योजनानुसार उस की हत्या कर दी.

जुर्म कबूल करते ही पुलिस ने किरण को भी हिरासत में ले लिया और पूछताछ की. किरण पहले तो मना करती रही मगर जब उसे बताया गया कि शंभूदास ने सब कुछ बता दिया है तो वह टूट गई और उस ने भी अपना जुर्म कबूल लिया कि नाणदे (भांजे) के साथ उस के अवैध संबंध थे.

तब पुलिस ने मृतक सुरेश साद के भाई की रिपोर्ट पर सुरेश की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया और हत्यारोपी शंभूदास और किरण को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस टीम ने शंभूदास और किरण को 8 जनवरी, 2020 को कोर्ट में पेश कर रिमांड पर लिया और कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में जो कहानी प्रकाश में आई वह इस प्रकार से है—

राजस्थान के नागौर जिले के अंतर्गत एक कस्बा मूंडवा आता है. मूंडवा के छोर पर तालाब है, जहां मंदिर बना है. इस मंदिर के पुजारी साद परिवार के लोग हैं. इस साद परिवार में सुरेश साद थे.

सुरेश साद की शादी करीब 12 साल पहले किरण से हुई थी. सुरेश मंदिर में पुजारी का काम करने के अलावा पशुधन भी रखता था. पशुधन के अलावा वह गांव में यजमानों के घर से अनाज व आटा भी लाता था. इस से उस के परिवार की गुजरबसर आराम से होती थी.

सुरेश साद सीधासादा व सरल स्वभाव का व्यक्ति था. वह अपनी पूजापाठ व गृहस्थी में मस्त था. समय के साथ सुरेश की पत्नी किरण 4 बच्चों की मां बन गई थी. 4 बच्चे पैदा करने के बाद भी 30 साल की किरण की आकांक्षाएं अब भी जवान थीं.

सुरेश की उम्र 35 साल के आसपास थी. वह दिन भर पूजापाठ के अलावा पशुओं में खटता था और थकामांदा रात को आ कर बिस्तर पर सो जाता और खर्राटे भरने लगता. जबकि किरण शारीरिक सुख के लिए तड़प कर रह जाती थी.

ऐसे में करीब ढाईतीन साल पहले जब शंभूदास अपनी ननिहाल मूंडवा आया तो वह मामी किरण की आंखों को भा गया. शंभूदास भी 18 साल का था. वह इंटरनेट पर अश्लील फिल्में देख कर औरत का सामीप्य पाने को आतुर था. ऐसे में जब उस की निगाह सांवलीसलोनी मामी किरण पर पड़ी तो वह उस का दीवाना हो गया. वह मामी पर लार टपकाने लगा.

ये भी पढ़ें- Crime Story: सोनू का खूनी खेल

मामी भी कोई नादान नहीं थी कि नाणदा (भांजे) के व्यवहार को न समझती. शंभूदास मामी के शरीर को छूने की कोशिश करता. सुरेश एक रोज बाहर गया था. उस रोज रात में एक ही कमरे में सो रहे शंभूदास और किरण मामी के बीच शारीरिक संबंधों की नींव पड़ गई. उस रात शंभूदास और किरण ने जी भर कर हसरतें पूरी कीं.

किरण को कई साल बाद उस रात शारीरिक सुख की तृप्ति मिली थी. वह शंभूदास के पौरुष की कायल हो गई. वे दोनों अपना मामीभांजे का पवित्र रिश्ता शर्मसार कर बैठे थे.

एक बार वासना के गर्त में डूबे तो उस में वक्त के साथ डूबते ही चले गए. शंभूदास अकसर ननिहाल के चक्कर काटने लगा. ननिहाल आने का मकसद सिर्फ मामी किरण थी. दोनों मौका मिलते ही हसरतें पूरी कर लेते.

शंभूदास का ननिहाल था. मगर जब वह महीने में 3-4 बार आने लगा तो सुरेश को थोड़ा अजीब लगा. एक दिन उस ने कहा, ‘‘शंभू, कुछ कामधंधा करो. अब तुम बच्चे नहीं हो, जो गाहेबगाहे यहां चले आते हो. बहन और बहनोई सा को कुछ कमा कर दो. वे कितने दिन तक तुम सब का पेट भरेंगे.’’

अगले भाग में पढ़ें- सुरेश साद ने किरण और भांजे शंभूदास को रंगरलियां मनाते देख लिया

लवली मामी: प्यार ने बनाया कातिल- भाग 3

सौजन्य-  सत्यकथा

मामा सुरेश की बात शंभू को कांटे की तरह चुभ गई. मगर वह कुछ बोला नहीं. इस के बाद शंभूदास महीने में एक बार आने लगा. किरण उसे फोन कर के कहती कि मामा की बात का बुरा नहीं मानो, वह ऐसे ही हैं. तुम्हारे बगैर मैं जल बिन मछली की तरह तड़पती हूं. आ कर मेरी तड़प शांत तो किया करो. यह तनमन सब तुम्हारा है.

ऐसे में शंभूदास को आना ही पड़ता था. उस का मन तो मामी को छोड़ने का होता ही नहीं था. मगर बिछुड़ने की मजबूरी थी.

इस कारण मन मार कर दोनों को जुदाई सहनी पड़ती थी. सुरेश सीधासादा जरूर था मगर वह नासमझ नहीं था. वह अपने भांजे शंभू के आने पर पत्नी के चेहरे पर खुशी की लकीरें देखता था. शंभू के जाने पर किरण का चेहरा मुरझा जाता था. तब सुरेश को इन के संबंधों पर शक होने लगा.

अगली बार जब शंभूदास ननिहाल आया तो सुरेश साद ने वह सब अपनी आंखों से देख लिया जिस का उसे शक था. सुरेश ने किरण और भांजे शंभूदास को रंगरलियां मनाते देख लिया. पत्नी के इस रूप को देख कर सुरेश हतप्रभ रह गया.

शंभू के आने पर पत्नी के चेहरे की खुशी का यह राज है, जान कर वह परेशान हो गया. वह करे तो क्या? अगर बात खुली तो जगहंसाई होगी.

सोचविचार कर सुरेश ने किरण से एकांत में कहा, ‘‘अपने जैसा शंभू को भी बना दिया. वह तेरे बेटे जैसा है. उस के साथ रंगरलियां मनाने से पहले तू मर क्यों नहीं गई. अगर आज के बाद तू शंभू से मिली तो मैं तुझे जान से मार दूंगा.’’

ये भी पढ़ें- Crime Story: त्रिकोण प्रेम- दीपिका का खूनी खेल

सुन कर किरण के पैरों तले से जमीन सरक गई. वह नजरें नीची किए जमीन कुरेदती रही. उस ने पति से अपने किए की माफी मांगी और कहा कि वह अब शंभू से कभी नहीं मिलेगी. उस का यहां आना बंद करा देगी.

किरण ने त्रियाचरित्र दिखाया तो भोलाभाला सुरेश समझा कि वह सुधर जाएगी. उस ने बीवी को माफ कर दिया. मगर यह सुरेश की गलतफहमी थी. किरण ने शंभू को बता दिया कि उस के मामा ने उन दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया है. वह सचेत रहे.

शंभू और किरण एकदूसरे के सामीप्य को तरस उठे. सुरेश उन्हें राह का कांटा लगा. उसे हटाए बिना वे मिल नहीं सकते थे. ऐसे में दोनों ने योजना बना ली. योजना यह थी कि शंभूदास छिप कर कुल्हाड़ी ले कर किरण के घर आ कर नीचे वाले कमरे में छिप जाएगा. रात में सुरेश बरामदे में ही सोता था. सुरेश को नींद आने पर किरण खाली गिलास जमीन पर गिराएगी. यह इशारा मिलते ही शंभूदास सो रहे मामा सुरेश साद को कुल्हाड़ी से मार देगा और रात के अंधेरे में वापस चला जाएगा. मामा के रास्ते से हटने के बाद उन दोनों का मिलन रोकने वाला कोई नहीं होगा.

साजिश के तहत शंभूदास 4 जनवरी, 2021 को शाम होते ही कुल्हाड़ी ले कर किरण के घर पहुंच गया. किरण ने उसे सारी योजना समझा कर नीचे कमरे में छिपा दिया. उस समय सुरेश पशुओं को चारा डालने गया हुआ था. चारा डाल कर सुरेश घर लौटा और फिर खाना खा कर फिर से पशु देखने गया. उस के बाद आ कर बरामदे में सो गया.

रात के 12 बजे किरण ने खाली गिलास नीचे पटका. शंभूदास के लिए यह एक इशारा था. इशारा मिलते ही सधे कदमों से शंभू कमरे से निकला और बरामदे में आ गया.

उस समय सुरेश गहरी नींद में था. पलक झपकने की देर में शंभूदास ने कुल्हाड़ी का वार सो रहे मामा सुरेश पर किया. उस ने एक के बाद एक 4 वार सुरेश पर किए. खून का फव्वारा फूट पड़ा. वह मौत की नींद सो गया. शंभूदास अपना काम कर के चला गया.

सुबह होने पर किरण ने योजना के अनुसार उठ कर बरामदे में जा कर रोनाधोना शुरू किया. तब घर के अन्य लोग वहां आए. फिर मूंडवा थाने में सूचना दी गई. पुलिस घटनास्थल पर पहुंची व मौका मुआयना किया.

ये भी पढ़ें- प्यार में मिला धोखा: भाग 1

रिमांड अवधि के दौरान शंभूदास से हत्या में प्रयुक्त कुल्हाड़ी, खून सने कपड़े और मोबाइल भी बरामद कर लिया गया. एसपी श्वेता धनखड़ ने सुरेश साद हत्याकांड का खुलासा करते हुए प्रैसवार्ता की.

रिमांड अवधि पूरी होने पर शंभूदास व किरण को पुलिस ने कोर्ट में पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

Serial Story- कितने झूठ: भाग 1

वह सुधा को मोबाइल मिला कर पूछने ही वाला था कि मां के यहां चल रही हो या नहीं. लेकिन उस ने सोचा कि अगर उसे मां के यहां चलना होता तो वह खुद न फोन कर देती. हर इतवार की दोपहर का भोजन वे दोनों मां के यहां ही तो करते हैं. मां हर इतवार को तड़के ही उठ जाती हैं और उन के लिए स्पैशल खाना बनाने लगती हैं.

जब भी वह सुधा के साथ जाता है, खाने की मेज तरहतरह के पकवानों से सजी रहती है और मां उसे ठूंसठूंस कर खिलाती हैं. अगर वह इत्तफाक से जा नहीं पाता है तो उस दिन वे टिफिन कैरियर में सारा खाना भर कर उस के यहां चली आती हैं और उसे खिलाने के बाद ही खुद खाती हैं. आज भी मां उस के लिए खाना बनाने लग गई होंगी. उस ने मां को फोन किया, उधर से पापा बोल रहे थे, ‘‘हैलो, कौन, विकास?’’

‘‘हां, मैं आज…’’ इस से पहले कि वह अपनी बात पूरी करता, उधर से मां की आवाज सुनाई दी, ‘‘आज तुम आ रहे हो न?’’

‘‘हां, मां.’’

‘‘मैं तो घबरा गई थी कि कहीं तुम आने से इनकार न कर दो.’’

‘‘लेकिन मां, सुधा अभी मायके से नहीं लौटी.’’

‘‘नहीं लौटी तो तुम आ जाना. आ रहे हो न?’’

‘‘हां मां,’’ कह कर उस ने फोन रख दिया.

तब तक’’ गैस पर चाय उफन कर बाहर आई और गैस बुझ गई.हड़बड़ा कर उस ने गैस बंद कर दी और चाय छान कर एक कप में उड़ेलने लगा. कप लबालब भर गया. अरे, यह तो 2 जनों की चाय बना बैठा. अब उसे अकेले ही पीनी पड़ेगी. वह बैठ कर चाय पीने लगा.

ये भी पढ़ें- बुलडोजर : कैसे पूरे हुए मनोहर के सपने

‘सब्जी ले लो, सब्जी’, गली में आवाज गूंजी.अखबार उठा कर वह सुर्खियां पढ़ने लगा. अचानक दरवाजे की घंटी बज उठी. वह उठा और उस ने दरवाजा खोल दिया. सामने सब्जी वाली खड़ी थी. उस ने पूछा, ‘‘बीबीजी नहीं हैं?’’

‘‘अभी नहीं आईं.’’

?‘‘कब आ रही हैं?’’

‘‘पता नहीं.’’

‘‘मुझ से तो कहा था कि दोचार दिनों में आ जाऊंगी, लेकिन आज पूरे 15 दिन हो गए.’’

‘‘हां.’’

‘‘साहब, आप खाना कहां खाते हो?’’

‘‘होटल में.’’

‘‘जरा हाथ बढ़ा देना,’’ सब्जी वाली बाई ने कहा.उस ने झल्ला उठाने में उस की मदद कर दी.

‘‘बगैर औरत के कितनी तकलीफ होती है यह तो सोचती ही नहीं आजकल की औरतें. शादी के बाद कैसा मायके का मोह? सच मानोगे, साहब, गौने के बाद मैं सिर्फ 2 बार गई हूं मायके और वह भी भैयाबापू के कूच कर जाने की खबर पा कर. और यहां, ऐसा महीना नहीं गुजरता जब बीबीजी मायके न जाती हों,’’ सब्जी वाली ने कहा.

उस ने कहना चाहा, ‘सच तो यह है कि अब हमारा निवाह नहीं होता और सुधा मुझे हमेशाहमेशा के लिए छोड़ कर चली गई है.’ लेकिन उसी पल उस ने सोचा कि इस सब्जी वाली से यह सब कहने की क्या जरूरत है. जब

सुधा उसे कुछ नहीं बता गई, तो वह क्यों बताए?

इसी बीच, तरन्नुम में आवाज लगाता हुआ सामने से फूल वाला आता दिखाई दिया. अब यह भी छूटते ही सुधा के बारे में पूछने लगेगा. उस का जी चाहा कि वह दरवाजा बंद कर अंदर चला जाए और किसी को जवाब ही न दे. सुधा इन सब लोगों से बोल तो ऐसे गई है जैसे वह लौटी आ रही है.

‘‘बीबीजी आ गईं, साहब?’’ फूल वाले ने फूल देते हुए कहा.

‘‘नहीं.’’

‘‘कब आ रही हैं?’’

उस ने झुंझला कर कहना चाहा, ‘पूछो जा कर उसी से,’ लेकिन वह बोला, ‘‘पता नहीं.’’

‘‘इस बार बहुत दिन लगा दिए.’’

वह सिर्फ दांत कटकटाता रह गया. उस ने मुड़ कर दरवाजा बंद करना चाहा कि महरी सामने खड़ी थी, ‘‘चौकाबरतन कर दूं, साहब?’’

‘‘हांहां.’’

महरी ने चौके से 2-4 बरतन समेटे और मिनटों में मांज कर रसोई साफ कर दी. फिर झाड़ू ले कर बरामदा साफ करने लगी. वह कूड़ा बटोरती हुई बोली, ‘‘बीबीजी ने इस बार कुछ ज्यादा दिन नहीं लगा दिए?’’

‘‘हां.’’

‘‘वापस तो आएंगी न?’’

‘‘हां,’’ कह कर फिर अचकचा कर उस ने पूछा, ‘‘सुना, तूने दूसरा आदमी कर लिया है.’’

‘‘लेकिन अब पछता रही हूं, बाबू. इस से पहला वाला आदमी अच्छा था. यह मर्दुआ तो रोज रात को पी कर आता है और लातोंघूसों से पीटने लगता है. उस के पीटने का भी कोई गम नहीं है, बाबू. लेकिन जब वह पूछने लगता है कि बोल तेरा पहला आदमी कैसा था, तुझे कैसे प्यार करता था. औरतें अपने पहले आदमी को भूल नहीं पातीं. जरूर तू अपने पहले आदमी को याद करती होगी. सचसच बता, याद करती है न? झूठ बोलती हूं तो सच उगलवाना चाहता है और सच बोलती हूं तो उसे गवारा नहीं होता. इस झूठ और सच के बीच में मैं जैसे अधर में लटकी हुई जी रही हूं. सोचती हूं कि न मैं ने पहले आदमी को छोड़ा होता और न दूसरा आदमी कर लिया होता. अपने ही गलत निर्णयों के एहसासों से बिंधी हुई हूं मैं,’’ कह कर सुबकने लगी.

उस ने अपनी दृष्टि खिड़की की तरफ फेर ली. आसमान में कालेकाले बादल छा गए थे व सुबह बेहद उदास, भीगी और उमसभरी हो उठी थी.

ये भी पढ़ें- Short Story: वंस ए सोल्जर आल्वेज ए सोल्जर

‘‘मैं तो अपना ही दुखड़ा ले बैठी. तुम अपनी सुनाओ, बाबू? इन 15 दिनों में तुम बीबीजी से मिले तो होगे?’’

‘‘नहीं,’’ उस ने खोखले स्वर में कहा.

‘‘एक ही शहर में रहते  हुए?’’ चकित भाव से महरी ने पूछा, ‘‘बीबीजी ने फोन भी नहीं किया?’’

उस ने नकारात्मक सिर हिला दिया.

‘‘बीबीजी से आप का कोई झगड़ा हुआ था, साहब?’’

‘‘नहीं तो,’’ वह व्यग्रभाव से उठ कर टहलने लगा.

‘‘वही तो…मैं भी घरघर घूमती हूं. ऐसा घर नहीं देखा जहां मियांबीवी न झगड़ते हों. लेकिन आप दोनों को तो मैं ने कभी उलझते हुए नहीं देखा.’’ फिर कमरे को देखते हुए बोली, ‘‘साहब, आज ये परदे बदल दूं?’’

Crime Story: केशरबाई की खूनी प्रेम कहानी- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

बोरडाबरा का आदमी खालीपीली धमकी नहीं देता. वह सचमुच ऐसा कर सकता है, यह सोच कर सोहन और गोविंद दोनों के प्राण गले में अटक गए. केशरबाई के संग अय्याशी के चक्कर में जान पर बन आई तो सोहन और गोविंद दोनों उस से बचने का रास्ता सोचने लगे.

पहली अक्तूबर, 2020 को गंधवानी थाना इलाके के अवल्दामान गांव निवासी एक आदमी ने थाने आ कर गांव में प्राथमिक स्कूल के पास किसी महिला की अधजली लाश पड़ी होने की खबर दी. अवल्दामान गांव अपराध के लिए कुख्यात बोरडाबरा गांव के नजदीक है, इसलिए गंधवानी टीआई को लगा कि यह बोरडाबरा के बदमाशों का ही काम होगा.

लगभग 30 वर्षीय महिला के शरीर पर धारदार हथियार के घाव भी थे, इसलिए मामला सीधेसीधे हत्या का प्रतीक होने पर टीआई गंधवानी ने इस बात की जानकारी एसपी आदित्य प्रताप सिंह को देने के बाद शव पोस्टमार्टम के लिए इंदौर भेज दिया.

ये भी पढ़ें- 28 साल बाद: भाग 3

मामला गंभीर था क्योंकि आमतौर पर लोग पहचान छिपाने के लिए शव को जलाते हैं, ताकि उस की पहचान न हो सके. लेकिन इस मामले में अजीब बात यह थी कि हत्यारों ने युवती का धड़ तो जला दिया था लेकिन चेहरा पूरी तरह से सुरक्षित था. ऐसा प्रतीक होता था मानो हत्यारे खुद यह चाहते हों कि शव की शिनाख्त आसानी से हो जाए.

ऐसा हुआ भी. मृतका के चेहरे और हाथ पर बने एक निशान ने उस की पहचान केशरबाई भील के रूप में हो गई जो पति को छोड़ कर अपने प्रेमी गोविंद के साथ रह रही थी. मामला रहस्यमयी था, इसलिए एसपी (धार) ने एडीशनल एसपी देवेंद्र पाटीदार के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. जिस में पता चला कि मृतका को घटना से 1-2 दिन पहले सोहन के साथ मोटरसाइकिल पर घूमते देखा गया था.

सोहन अपने घर से गायब था, इसलिए उस पर शक गहराने के बाद पुलिस ने उस की घेराबंदी कर लाश मिलने के 3 दिन बाद उसे गिरफ्तार कर लिया. जिस में पहले तो वह खुद को निर्दोष बताता रहा, लेकिन बाद में गोविंद के साथ मिल कर केशरबाई की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली.

सोहन को पुलिस उठा कर ले गई है, इस बात की जानकारी लगते ही गोविंद भी गांव से गायब हो गया था. इसलिए जब काफी प्रयास के बाद उसे पकड़ने में सफलता नहीं मिली, तब टीम में साइबर सेल को शामिल किया गया. कहना नहीं होगा कि जिम्मेदारी मिलते ही प्रभारी संतोष पांडेय की टीम सक्रिय हो गई और हत्या के 2 महीने बाद आखिर टीम ने फरार आरोपी गोविंद को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल कर ली और उसे सलाखों के पीछे पहुंचा ही दिया.

आरोपियों ने बताया कि उन्होंने केशरबाई की हत्या खेरवा के जगंल में ले जा कर की थी. जहां से उन्होंने लाश को अवल्दामान गांव में ला कर इस तरह जलाया था कि उस की पहचान हो जाए.

ये भी पढ़ें- Crime: एक ठग महिला से ‘दोस्ती का अंजाम’

अवल्दामान गांव बोरडाबरा के नजदीक है. बोरडाबरा में रहने वाले दिनेश ने केशरबाई को जान से मारने की धमकी दी है यह बात कई लोगों को मालूम थी. इसलिए आरोपियों का सोचना था कि अवल्दामान में लाश मिलने से पुलिस दिनेश भिलाला को हत्यारा मान कर उसे जेल भेज देगी, जिस से सोहन और गोविंद आराम से रह सकेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और असली गुनहगार पकड़े गए.

Crime Story: केशरबाई की खूनी प्रेम कहानी- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

26नवंबर, 2020 की दोपहर का समय था. धार क्राइम ब्रांच एवं साइबर सेल प्रभारी संतोष पांडेय कुछ पुराने मामलों के आरोपियों तक पहुंचने के लिए धूल चढ़ी फाइलों से जूझ रहे थे, तभी उन के मोबाइल पर एक खास मुखबिर के नंबर से घंटी बज उठी.

इस मुखबिर को उन्होंने बेहद खास जिम्मेदारी सौंप रखी थी. इसलिए उस मुखबिर की फोन काल को उन्होंने तुरंत रिसीव किया. मुखबिर ने उन्हें एक खास सूचना दी थी. सूचना पाते ही संतोष पांडेय के चेहरे पर मुसकान तैर गई, उस के बाद उन्होंने मुखबिर से मिली खबर के बारे में पूरी जानकारी एसपी (धार) आदित्य प्रताप सिंह और अन्य अधिकारियों को दी. फिर उन से मिले निर्देश के बाद कुछ ही देर में अपनी टीम ले कर मागौद चौराहे पर जा कर डट गए.

दरअसल, धार पुलिस को लंबे समय से गंधवानी थाना इलाके में हुई एक हत्या के आरोपी गोविंद की तलाश थी. एसपी ने गोविंद की गिरफ्तारी पर 10 हजार रुपए का ईनाम भी घोषित कर रखा था.

गोविंद को पकड़ने की जिम्मेदारी जिस टीम को सौंपी गई थी, उस में धार साइबर सेल के प्रमुख संतोष पांडेय और उन का स्टाफ भी शामिल था. इसलिए उस रोज जब मुखबिर ने गोविंद के मोटरसाइकिल से मागौद आने की जानकारी पांडेयजी को दी तो उन्होंने इस ईनामी आरोपी को पकड़ने के  लिए मागौद चौराहे पर अपना जाल  बिछा दिया.

ये भी पढ़ें- Crime Story: मीठे रिश्तों की कड़वाहट

मुखबिर की सूचना गलत नहीं थी. कुछ ही घंटों के बाद पांडेय ने एक बिना नंबर की मोटरसाइकिल पर सवार युवक को तेजी से मागौद की तरफ आते देखा तो उन्होंने उसे घेरने के लिए अपनी टीम को इशारा किया, लेकिन संयोग से मोटरसाइकिल सवार की नजर पुलिस पर पड़ गई. इसलिए खतरा भांप कर उस ने तेजी से मोटरसाइकिल राजगढ़ की तरफ मोड़ दी.

संतोष पांडेय इस स्थिति के लिए पहले से ही तैयार थे सो गोविंद के वापस मुड़ कर भागते ही वे अपनी टीम के साथ उस के पीछे लग गए. दूसरी तरफ इस स्थिति की जानकारी एसपी आदित्य प्रताप सिंह को दी गई तो उन के निर्देश पर एसडीपीओ (सरदारपुर) ऐश्वर्य शास्त्री और राजगढ़ टीआई मगन सिंह वास्केल ने रोड पर आगे की तरफ से घेराबंदी कर दी थी.

इसलिए दोनों तरफ से पुलिस से घिर जाने पर गोविंद ने मोटरसाइकिल खेतों की तरफ मोड़ कर भागने की कोशिश की, मगर साइबर सेल प्रभारी संतोष पांडेय और उन की टीम उसे दबोचने में कामयाब हो ही गई. पुलिस ने उस की तलाशी ली गई तो उस के पास से एक कट्टा, जिंदा कारतूस और चोरी की मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली.

चूंकि केशरबाई भील नाम की जिस महिला की हत्या के आरोप में गोविंद को गिरफ्तार किया गया था, उस में शामिल गोविंद के साथी उदियापुर के सोहन वास्केल को पुलिस पहले ही गिरफ्तार कर चुकी थी. इसलिए पूछताछ के दौरान गोविंद ने बिना किसी हीलहुज्जत के अपनी प्रेमिका और रखैल केशरबाई की हत्या करने की बात स्वीकार करते हुए पूरी कहानी सुना दी, जो इस प्रकार निकली—

कुक्षी थाना इलाके के एक गांव की रहने वाली केशरबाई भील को सिगरेट, शराब और सैक्स की लत किशोर उम्र में ही लग गई थी. संयोग से उस का रूप भी कुछ ऐसा दिया था कि उसे नजर भर कर देखने वाले घायल हो ही जाते थे. इसलिए शौक पूरा करने के लिए उसे अपने रूप का उपयोग करने में भी कोई गुरेज नहीं थी.

ये भी पढ़ें- Crime: जब सेवक “किडनैपर” बन जाए!

केशरबाई की हरकतों से चिंतित उस के मातापिता ने छोटी उम्र में ही उस की शादी कर दी, लेकिन एक पुरुष से केशरबाई का मन भरने वाला नहीं था.

इसलिए शादी के बाद भी उस ने अपने शौक पर लगाम लगाने की कोई जरूरत नहीं समझी. जिस के चलते पति से होने वाले विवादों से तंग आ कर उस ने पति का घर छोड़ कर बच्चों के साथ अलग दुनिया बसा ली.

केशरबाई जानती थी की उस की सुंदरता उसे कभी भूखा नहीं मरने देगी. ऐसा हुआ भी, केशरबाई पति को छोड़ कर भी अपने सभी शौक पूरे करते हुए आराम से जिंदगी बसर करने लगी. पति से अलग रहते हुए केशरबाई को इस बात का अनुभव हो चुका था कि मर्द की पहली जरूरत एक जवान औरत ही होती है. इसलिए उस ने ऐसे लोगों की तलाश कर उन्हें बड़ी रकम के बदले शादी के नाम पर दुलहन उपलब्ध करवाने का काम शुरू कर दिया, जिन की किसी कारण से शादी नहीं हो पा रही थी.

उस ने आसपास के गांव में रहने वाली गरीब परिवार की जरूरतमंद युवतियों के अलावा विधवा और तलाकशुदा महिलाओं से दोस्ती कर ली थी, जो केशरबाई के कहने पर कुछ पैसों के बदले में चंद दिनों के लिए किसी भी युवक की नकली दुलहन बनने को तैयार हो जाती थीं.

केशरबाई जरूरतमंद लोगों से बड़ी रकम ले कर उस में से कुछ पैसे संबंधित युवती को दे कर उस की शादी युवक से करवा देती, जिस के बाद युवती कुछ रातों तक युवक को दुलहन का सुख देने के बाद किसी बहाने से मायके वापस आ कर गायब हो जाती थी. इस पर लोग यदि केशरबाई से शिकायत करते या अपना पैसा वापस मांगते तो वह उन्हें बलात्कार के आरोप में फंसाने की धमकी दे कर चुप करा देती.

कहना नहीं होगा कि इन्हीं सब के चलते केशरबाई ने इस काम में खूब नाम और दाम कमाया.

अगले भाग में पढ़ें- केशरबाई  नकली दुल्हन क्यों बनना चाहती थी

Crime Story: केशरबाई की खूनी प्रेम कहानी- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

गांव उदियापुर निवासी सोहन वास्केल की केशरबाई से अच्छी पटती थी. उस का केशरबाई के यहां अकसर आनाजाना था जिस से वह केशरबाई के सभी कामों से परिचित भी था. सोहन की दोस्ती गांव सनावदा के रहने वाले गोविंद बागरी से थी.

गोविंद आपराधिक और अय्याश प्रवृत्ति का था. उस ने भी इलाके में रहने वाली केशरबाई के चर्चे सुन रखे थे, इसलिए जब उसे पता चला कि सोहन की केशरबाई के संग अच्छी दोस्ती है तो उस ने सोहन से अपनी दोस्ती भी केशरबाई से करवा देने के लिए कहा. सोहन को भला क्या ऐतराज हो सकता था, इसलिए उस ने एक रोज गोविंद की मुलाकात केशरबाई से करवा दी.

गोविंद केशरबाई की खूबसूरती देखते ही उस का दीवाना हो गया. इस पर जब उसे पता चला कि केशरबाई शराब पीने की भी शौकीन है तो वह 2 दिन बाद ही शराब की दरजन भर बोतलें ले कर केशरबाई के पास पहुंच गया.

मर्द की नजर भांपने में केशरबाई कभी गलती नहीं करती थी. वह समझ गई कि गोविंद उस से क्या चाहता है, इसलिए उस ने उस रात गोविंद को शराब के साथ अपने रूप के नशे में भी गले तक डुबो दिया.

वास्तव में केशरबाई ने यह सब एक योजना के तहत किया था. केशरबाई को इस बात की जानकारी लग गई थी कि गोविंद न केवल पैसे वाला आदमी है बल्कि दबंग भी है. उस के खिलाफ कई थानों में अनेक मामले भी दर्ज हैं.

इसलिए केशरबाई गोविंद से दोस्ती कर उस का उपयोग अपनी नकली दुलहन के कारोबार में करना चाहती थी. ताकि गोविंद ऐसे लोगों से उसे बचा सके जो शादी के नाम पर ठगे जाने के बाद उस से विवाद करने के लिए उस के दरवाजे पर आ जाते थे.

केशरबाई के रूप का दीवाना हो कर गोविंद उस के इस काम में मदद करने लगा तो इस का एक कारण यह भी था कि इस काम में केशरबाई के हाथ बड़ी रकम आती थी और गोविंद का सोचना था कि वह केशरबाई की मदद कर के उस की नजदीकी तो हासिल करता ही रहेगा. साथ ही साथ इस रकम में से भी वह अपनी हिस्सेदारी तय कर लेगा.

ये भी पढ़ें- Crime Story: मीठे रिश्तों की कड़वाहट

इसलिए उस ने केशरबाई के सामने दीवाना होने का नाटक किया और अपनी पत्नी एवं बच्चों को छोड़ कर केशरबाई के संग जा कर सेंधवा में रहने लगा.

लेकिन केशरबाई के पैसों पर ऐश करने का गोविंद का सपना चकनाचूर हो गया. केशरबाई फरजी शादी में ठगे पैसों में गोविंद को हाथ भी लगाने नहीं देती थी, उलटे घर का खर्च भी गोविंद से मांगती थी. गोविंद फंस गया था. केशरबाई के रूप का नशा उस के दिमाग से उतर गया. वह समझ गया कि केशरबाई बड़ी शातिर है.

इतना नहीं, केशरबाई परिवार का खर्च तो गोविंद से मांगती थी, ऊपर से अपनी अय्याशी के लिए दूसरे युवकों को खुलेआम घर बुलाती थी. गोविंद इस पर ऐतराज करता तो वह साफ बोल देती कि मैं तुम्हारी बीवी नहीं हूं, जो अकेले तुम्हारे बिस्तर पर सोऊं. मेरा अपना बिस्तर है और मैं जिसे चाहूं उसे अपने साथ सुला सकती हूं.

गोविंद ने उसे अपनी ताकत से दबाना चाहा तो केशरबाई ने जल्द ही उसे इस बात का अहसास भी करवा दिया कि केशरबाई को वह अपनी ताकत से नहीं दबा सकता. कहना नहीं होगा कि सब मिला कर गोविंद केशरबाई नाम की इस खूबसूरत बला के कांटों में उलझ कर रह गया था.

इसी बीच एक और घटना घटी. हुआ यह कि गंधवानी थाना सीमा के बोरडाबरा गांव में सोहन के एक परिचित दिनेश भिलाला को शादी के लिए एक लड़की की जरूरत थी. चूंकि बोरडाबरा गांव अपनी आपराधिक गतिविधियों के लिए पूरे इलाके में कुख्यात है, इसलिए कोई भी भला आदमी अपनी बेटी को बोरडाबरा में रहने वाले युवक से ब्याहना पसंद नहीं करता.

दिनेश भिलाला भी यहां रहने वाले खूंखार आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों में से एक था, इसलिए उम्र गुजर जाने के बाद भी उसे शादी के लिए लड़की नहीं मिल रही थी. उस ने अपनी यह समस्या सोहन के सामने रखी तो सोहन ने केशरबाई के माध्यम से उस की शादी करवा देने का भरोसा दिलाया.

सोहन जानता था कि केशरबाई शादी के नाम पर ठगी का खेल करती है. उस की लड़कियां शादी के कुछ दिन बाद पति के घर से मालपैसा समेट कर फरार हो जाती हैं. लेकिन उसे भरोसा था कि चूंकि केशरबाई उस की परिचित है, इसलिए वह उस के कहने पर ईमानदारी से दिनेश के लिए किसी अच्छी लड़की का इंतजाम करवा देगी.

ये भी पढ़ें- 17 दिन की दुल्हन: भाग 2

केशरबाई ने ऐसा किया भी. सोहन के कहने पर उस ने 80 हजार रुपए के बदले में दिनेश भिलाला की शादी एक बेहद खूबसूरत युवती से करवा दी.

लेकिन सोहन का यह सोचना कि केशरबाई उसे धोखा नहीं देगी, गलत साबित हुआ. शादी के बाद वह युवती 15 दिन तक तो दिनेश भिलाला के साथ उस की पत्नी बन कर रही, उस के बाद केशरबाई  के इशारे पर वह दिनेश के बिस्तर से उतर कर वापस आने के बाद कहीं गायब हो गई.

पत्नी के भाग जाने की बात दिनेश को पता चली तो उस ने सीधे जा कर सोहन का गला पकड़ लिया. उस का कहना था कि या तो पत्नी को उस के पास भेजो या फिर शादी के नाम पर उस से लिया गया पैसा 80 हजार मय खर्च के वापस करो.

सोहन ने इस बारे में केशरबाई से बात की तो उस ने साफ  मना कर दिया. उस का कहना था कि मेरी जिम्मेदारी शादी करवाने की थी, लड़की को दिनेश के गले बांध कर रखने की नहीं. लड़की कहां गई, इस का उसे पता नहीं और न ही वह दिनेश को उस का पैसा वापस करेगी.

लेकिन दिनेश इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं था. उस ने सोहन के साथसाथ केशरबाई और उस के आशिक गोविंद को भी धमकी दी कि अगर 10 दिन में उस की पत्नी वापस नहीं आई तो 11वें दिन उस का पैसा वापस कर देना. और अगर यह भी नहीं कर सकते तो फिर तीनों मरने के लिए तैयार रहना.

अगले भाग में पढ़ें- केशरबाई की हत्या किसने की

Crime Story: मीठे रिश्तों की कड़वाहट- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

नीरज बनसंवर कर घर से जाने लगा, तो उस के भाई धीरज ने टोका, ‘‘नीरज, इतनी रात को तुम कहां जा रहे हो? क्या कोई जरूरी काम है या फिर किसी की शादी में जा रहे हो?’’ ‘‘भैया, मेरे दोस्त के घर भगवती जागरण है. मैं वहीं जा रहा हूं.’’ नीरज बोला.

फिर नीरज ने कलाई पर बंधी घड़ी पर नजर डाली और बोला, ‘‘भैया, अभी साढ़े 9 बजे हैं. मैं 12 बजे तक लौट आऊंगा.’’ कहते हुए नीरज घर से बाहर चला गया. नीरज उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर शहर की सुरेखापुरम कालोनी में रहता था. धीरज और उस की पत्नी नीरज के इंतजार में रात 12 बजे तक जागते रहे. जब वह घर नहीं आया तो उन्हें चिंता हुई. वे दोनों घर के अंदरबाहर कुछ देर चहलकदमी करते रहे, फिर धीरज ने अपने मोबाइल से नीरज को फोन किया. पर उस का फोन बंद था. धीरज ने कई बार फोन मिलाया, लेकिन हर बार फोन बंद ही मिला.

रात 2 बजे तक वह नीरज के इंतजार में जागता रहा. उस के बाद उस की आंख लग गई.

अभी सुबह का उजाला ठीक से फैला भी नहीं था कि धीरज का दरवाजा किसी ने जोरजोर से पीटना शुरू किया. धीरज ने अलसाई आंखों से दरवाजा खोला तो सामने एक अनजान व्यक्ति खड़ा था. धीरज ने उस से पूछा, ‘‘आप कौन हैं और दरवाजा क्यों पीट रहे हैं?’’

उस अनजान व्यक्ति ने अपना परिचय तो नहीं दिया. लेकिन यह जरूर बताया कि उस का भाई नीरज डंगहर मोहल्ले में मीना किन्नर के घर के पास गंभीर हालत में पड़ा है. उस ने घर का पता बताया था और खबर देने का अनुरोध किया था, सो वह चला आया.

भाई के घायल होने की जानकारी पा कर धीरज घबरा गया. उस ने अड़ोसपड़ोस के लोगों को जानकारी दी और फिर उन को साथ ले कर डंगहर मोहल्ले में मीना किन्नर के घर के पास पहुंच गया.

उस समय वहां भीड़ जुटी थी. धीरज ने अपने भाई नीरज को मरणासन्न स्थिति में देखा तो वह घबरा गया. उस का सिर फटा हुआ था, जिस से वह लहूलुहान था. लग रहा था जैसे उस के सिर पर किसी ने भारी चीज से हमला किया था.

धीरज ने इस की जानकारी थाना कटरा पुलिस को दी फिर सहयोगियों के साथ नीरज को इलाज के लिए निजी डाक्टर के पास ले गया. लेकिन डाक्टर ने हाथ खड़े कर लिए और पुलिस केस बता कर सदर अस्पताल ले जाने की सलाह दी. यह बात 28 नवंबर, 2020 की सुबह 8 बजे की है.

जीवित होने की आस में धीरज अपने भाई नीरज को सदर अस्पताल मिर्जापुर ले गया. डाक्टरों ने नीरज को देखते ही मृत घोषित कर दिया. भाई की मृत्यु की बात सुन कर धीरज फफक कर रोने लगा. चूंकि यह पुलिस केस था, इसलिए अस्पताल प्रशासन ने सूचना थाना कटरा पुलिस को दी.

सूचना पाते ही प्रभारी निरीक्षक रमेश यादव पुलिस बल के साथ सदर अस्पताल आ गए. उन्होंने धीरज को धैर्य बंधाया और घटना के संबंध में पूछताछ की. धीरज ने बताया कि वह सुरेखापुरम कालोनी में रहता है.

ये भी पढ़ें- Crime: जब सेवक “किडनैपर” बन जाए!

उस का भाई नीरज बीती रात साढ़े 9 बजे यह कह कर घर से निकला था कि वह दोस्त के घर जागरण में जा रहा है. लेकिन सुबह उसे उस के घायल होने की जानकारी मिली. तब उस ने उसे सदर अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

‘‘क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे भाई पर कातिलाना हमला किस ने किया है?’’ यादव ने पूछा.

‘‘सर, मुझे कुछ भी पता नहीं है.’’ धीरज ने जवाब दिया.

पूछताछ के बाद यादव ने नीरज के शव का बारीकी से निरीक्षण किया. नीरज की उम्र 32 वर्ष के आसपास थी. उस के सिर पर किसी ठोस वस्तु से प्रहार किया गया था, जिस से उस का सिर फट गया था. संभवत: सिर में गहरी चोट लगने के कारण ही उस की मौत हो गई थी. शरीर के अन्य भागों पर भी चोट के निशान थे. निरीक्षण के बाद उन्होंने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

इधर नीरज की हत्या की खबर सुरेखापुरम कालोनी पहुंची तो कालोनी में सनसनी फैल गई. धीरज के घर लोगों की भीड़ जमा हो गई. लोगों में जवान नीरज की हत्या को ले कर गुस्सा था. गुस्साई भीड़ ने मिर्जापुर नगर के बथुआ के पास मिर्जापुर-रीवा मार्ग जाम कर दिया तथा पुलिस विरोधी नारे लगाने शुरू कर दिए.

सड़क जाम की सूचना कटरा कोतवाल रमेश यादव को हुई तो वह पुलिस टीम के साथ वहां पहुंचे. उन्होंने भीड़ को समझाने का प्रयास किया तो भीड़ और उत्तेजित हो गई. लोगों की शर्त थी कि जब तक पुलिस अधिकारी नहीं आएंगे, तब तक वह सड़क पर बैठे रहेंगे. इस पर रमेश यादव ने जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी. उन्होंने अधिकारियों को यह भी बताया कि भीड़ बढ़ती जा रही है तथा स्थिति बिगड़ रही है.

हत्या के विरोध में सड़क जाम की सूचना पा कर एसपी अजय कुमार सिंह, एडीशनल एसपी (सिटी) संजय कुमार तथा सीओ अजय राय मौके पर पहुंचे. उन्होंने मृतक के घर वालों एवं उत्तेजित लोगों को समझाया तथा आश्वासन दिया कि नीरज के कातिलों को जल्द ही पकड़ा जाएगा. पुलिस अधिकारियों के इस आश्वासन पर भीड़ ने सड़क खाली कर दी.

एसपी अजय कुमार सिंह ने नीरज की हत्या को चुनौती के रूप में लिया. अत: हत्या का खुलासा करने के लिए उन्होंने एक विशेष टीम का गठन एएसपी (सिटी) संजय कुमार व सीओ अजय राय की देख रेख में गठित कर दी.

इस टीम में प्रभारी निरीक्षक रमेश चंद्र यादव, चौकी इंचार्ज अजय कुमार श्रीवास्तव, हैडकांस्टेबल भोलानाथ, दारा सिंह, अरविंद सिंह, महिला कांस्टेबल रिचा तथा पूजा मौर्या को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया फिर पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन किया. उस के बाद मृतक नीरज के भाई धीरज का बयान दर्ज किया. पुलिस टीम ने अपनी जांच किन्नर मीना के घर के आसपास से शुरू की और दरजनों लोगों से पूछताछ की.

इस का परिणाम भी सार्थक निकला. पूछताछ से पता चला कि मृतक का आनाजाना डंगहर मोहल्ला निवासी विशाल यादव के घर था. विशाल की पत्नी सीमा (परिवर्तित नाम) और मृतक नीरज के बीच दोस्ती थी. लेकिन विशाल को नीरज का घर आना पसंद नहीं था.

पुलिस टीम ने अपनी जांच आगे बढ़ाई और विशाल यादव के पड़ोसियों से पूछताछ की तो पता चला कि बीती रात 12 बजे के आसपास विशाल यादव के घर झगड़ा हो रहा था. मारपीट और चीखनेचिल्लाने की आवाजें आ रही थीं. फिर कुछ देर बाद खामोशी छा गई थी. झगड़ा किस से और क्यों हो रहा था, यह बात पता नहीं चल सकी.

ये भी पढ़ें- Crime Story- सोनू का खूनी खेल: भाग 2

विशाल यादव और उस की पत्नी सीमा पुलिस टीम की रडार पर आए तो टीम ने दोनों को हिरासत में ले कर पूछताछ करने की योजना बनाई. योजना के तहत पुलिस टीम रात 10 बजे विशाल यादव के घर पहुंची और उसे हिरासत में ले लिया.

अगले भाग में पढ़ें- हत्यारोपियों ने अपना जुर्म कबूल किया

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें