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घर का न घाट का: क्या धोखेबाज निकला सुरेश – भाग 1

सुरेश क्लीवलैंड की एक एयरकंडीशनिंग फर्म में इंजीनियर था. अमेरिका में रहते उसे करीब 7 साल हो गए थे. वेतन अच्छा था. जल्दी ही उस ने जीवन की सभी सुविधाएं जुटा लीं. घर वालों को पैसे भी भेजने लगा. आनेजाने वालों के साथ घर वालों के लिए अनेक उपहार जबतब भेजता रहता.

लेकिन न वह स्वदेश आ कर घर वालों से मिलने का नाम लेता और न ही शादी के लिए हामी भरता. उस के पिता अकसर हर ईमेल में किसी न किसी कन्या के संबंध में लिखते, उस की राय मांगते, पर वह टाल जाता. बहुत पूछे जाने पर उस ने साफ लिख दिया कि मुझे अभी शादी नहीं करनी. 8वें साल जब उस के पिता ने बारबार लिखा कि उस की मां बीमार रहती है और वह कुछ दिन की छुट्टी ले कर घर आ जाए तो वह 6 माह की छुट्टी ले कर स्वदेश की ओर चल पड़ा.

घर वालों की खुशी का ठिकाना न रहा. कई रिश्तेदार हवाईअड्डे पर उसे लेने पहुंचे. मातापिता की आंखें खुशी से चमक उठीं. सुरेश लंबा तो पहले ही था, अब उस का बदन भी भर गया था और रंग निखर आया था. घर वालों व रिश्तेदारों के लिए वह बहुत से उपहार लाया था. सब ने उसे सिरआंखों पर बिठाया. सुरेश की मां की बहुत इच्छा थी कि इस अवधि में उस की शादी कर दे. सुरेश ने तरहतरह से टाला, ‘‘बीवी को तो मैं अपने साथ ले जाऊंगा. फिर तुझे क्या सुख मिलेगा? क्लीवलैंड में मकान बहुत महंगे मिलते हैं. मैं तो सुबह 8 बजे का घर से निकला रात 10 बजे काम से लौट पाता हूं. वह बैठीबैठी मक्खियां मारेगी.’’ पर मां ने उस की एक नहीं सुनी. छोटे भाईबहन भी थे. आगे का मलबा हटे तो उन के लिए रास्ता साफ हो.

सुंदर कमाऊ लड़का देख कर कुंआरी कन्याओं के पिता ने पहले ही चक्कर काटने आरंभ कर दिए थे. जगहजगह से रिश्तेदारों की सिफारिशें आने लगीं. दबाव बढ़ने लगा, खाने की मेज पर शादी के लिए आए प्रस्तावों पर विचारविमर्श होता रहता. सुरेश को न कोई लड़की पसंद आती थी, न कोई रिश्ता. हार कर उस के पिता ने समाचारपत्र में विज्ञापन और इंटरनैट में एक मैट्रीमोनियल साइट पर सुरेश का प्रोफाइल डाल दिया. चट मंगनी, पट ब्याह वाली बात थी. दूसरे ही दिन ढेर सारे फोन और ईमेल आने लगे. उन बहुत सारे ईमेल और फोन में सुरेश ने 3 ईमेल को शौर्टलिस्ट किया. इन तीनों लड़कियों के पास शिक्षा की कोई डिगरी नहीं थी. वे बहुत अधिक संपन्न घराने की भी नहीं थीं. इन के परिवार निम्नमध्यवर्ग से थे.

घर वाले हैरान थे कि इतना पढ़ालिखा, काबिल लड़का और इस ने बिना पढ़ीलिखी लड़कियां पसंद कीं. फिर कोई ख्यातिप्राप्त परिवार भी नहीं कि दहेज अच्छा मिले या वे लोग आगे कुछ काम आ सकें. पर क्या करते? मजबूरी थी, शादी तो सुरेश की होनी थी. तीनों लड़कियों को देखने का प्रोग्राम बनाया गया. एक लड़की बहुत सुंदर थी, पर छरहरे बदन की थी. दूसरी लड़की का रंग सांवला था, पर नैननक्श बहुत अच्छे थे. स्वास्थ्य सामान्य था, तीसरी लड़की का रंगरूप और स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा था.

सुरेश ने तीसरी लड़की को ही पसंद किया. घर वालों को उस की पसंद पर बड़ा आश्चर्य हुआ. शिक्षादीक्षा के संबंध में सुरेश ने दोटूक उत्तर दे दिया, ‘‘मुझे बीवी से नौकरी तो करानी नहीं. मैं स्वयं ही बहुत कमा लेता हूं.’’ रंगरूप के संबंध में उस की दलील थी, ‘‘मुझे फैशनपरस्त, सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाली गुडि़या नहीं चाहिए. मुझे तो गृहस्थी चलाने के लिए औरत चाहिए.’’ सुनने वालों की आंखें फैल गईं. कितना सुंदर, पढ़ालिखा, ऊंचा वेतन पाने वाला लड़का और कैसा सादा मिजाज. दोचार हमजोलियों ने मजाक में अवश्य कहा कि यह तो चावल में उड़द या गिलट में हीरा जड़ने वाली बात हुई. पर जिसे पिया चाहे  ही सुहागिन.

लड़की वालों की तो जैसे लौटरी खुल गई थी. घर बैठे कल्पना से परे दामाद जो मिल गया था. वरना कहां सुदेश जैसी मिडिल पास, साधारण लड़की और कहां सुरेश जैसा सुंदर व सुसंपन्न वर. शादी धूमधाम से हुई. सुरेश और सुदेश हनीमून के लिए नैनीताल गए. एक होटल में जब पहली रात आमोदप्रमोद के बाद सुरेश सो गया तो सुदेश कितनी ही देर तक खिड़की के किनारे बैठी कभी झील में उठती लहरों की ओर, कभी आसमान के तारों को निहारती रही. उस के हृदय में खुशी की लहरें उठ रही थीं और उसे लग रहा था कि जैसे आसमान के सारे सितारे किसी ने उस के आंचल में भर दिए हैं. फिर वह लिहाफ उठा कर सुरेश के पैरों की तरफ लेट गई. सुरेश के पैरों को छाती से लगा कर वह सो गई.

15दिन जैसे पलक झपकते बीत गए. सुबह नाश्ता कर के हाथ में हाथ डाले नवदंपती घूमने निकल जाते. शाम को वे अकसर नौकाविहार करने या पिक्चर देखने चले जाते. सोने के दिन थे और चांदी की रातें. सुदेश को कभीकभी लगता कि यह सब एक सुंदर सपना है. वह आंखें फाड़फाड़ कर सुरेश को घूरने लगती. उस की यह दृष्टि सुरेश के मर्मस्थल को बेध देती. वह गुदगुदी कर के या चिकोटी काट कर उसे वर्तमान में ले आता. सुदेश उस की गोद में लेट जाती. सुरेश की गरदन में दोनों बांहें डाल कर दबे स्वर में पूछती, ‘‘जिंदगीभर मुझे ऐसे ही प्यार करते रहोगे न?’’ और सुरेश अपने अधर झुका कर उस का मुंह बंद कर देता, ‘‘धत पगली,’’ कह कर उस के आंसू पोंछ देता.

नैनीताल से लौटी तो सुदेश के चेहरे पर नूर बरस रहा था. तृप्ति का भी अपना अनोखा सुख होता है. सुरेश की छुट्टियां खत्म होने वाली थीं. सुदेश को वह अपने साथ विदेश ले जाना चाहता था. उस की मां ने दबी जबान से कहा, ‘‘बहू को साल 2 साल यहीं रहने दे. सालभर तक रस्मरिवाज चलते हैं. फिर हम को भी कुछ लगेगा कि हां, सुरेश की बहू आ गई,’’ पर सुरेश ने एक न मानी. उस का कहना था कि क्लीवलैंड में भारतीय खाना तो किसी होटल में मिलता नहीं. घर पर बनाने का उस के पास समय नहीं. पहले वह डबलरोटी, अंडे आदि से किसी प्रकार काम चला लेता था. पर जब सुदेश को अमेरिका में ही रहना है तो बाद में जाने से क्या फायदा? वहां के माहौल में वह जितनी जल्दी घुलमिल जाए उतना ही अच्छा.

वह सुदेश को साथ ले कर अमेरिका रवाना हो गया. जहाज जब बादलों में विचरने लगा तो सुदेश भी खयालों की दुनिया में खो गई. शादी के बाद वह जिस दुनिया में रह रही थी उस की उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. उस ने तो कभी जहाज में बैठने की भी कल्पना नहीं की थी. उस के परिवार में भी शायद ही कोई कभी जहाज में बैठा हो. नैनीताल का भी उस ने नाम ही सुना था. पहाड़ों को काट कर बनाए गए प्रकृति के उस नीरभरे कटोरे को उस ने आंखभर देखने के बारे में भी नहीं सोचा था. पर वहां उस ने जीवन छक कर जिया. वहां बिताए दिनों को क्या वह जीवनभर भूल पाएगी. पूरी यात्रा में वह तरहतरह की कल्पनाओं में खोई रही. वह स्वयं को धरती से ऊपर उठता हुआ महसूस कर रही थी.

सुरेश इस पूरी यात्रा में गंभीर बना रहा. सुदेश का मन करता कि वह उस का हाथ अपने हाथ में ले कर प्रेम प्रदर्शित करे, पर तमाम लोगों की उपस्थिति में उसे लाज लगती थी. यह नैनीताल के होटल का कमरा तो था नहीं. पर थोड़ी देर बाद ही उस का जी घबराने लगता था. उसे सुरेश अजनबी सा लगने लगता था. जहाज के बाद टैक्सी की यात्रा कर के अगली संध्या जब वे गंतव्य स्थान पर पहुंचे तो सुदेश का मन कर रहा था क वह सुरेश के कंधे पर सिर टेक दे और वह उसे बांहों का सहारा दे कर धीरेधीरे फ्लैट में ले चले. कड़ाके की सर्दी थी. सुदेश को कंपकंपी महसूस हो रही थी. पर सुरेश विचारों में खोया गुमसुम, सूटकेस लिए आगेआगे चला जा रहा था.

भूल किसकी: रीता की बहन ने उसके पति के साथ क्या किया? – भाग 1

जैसेही चाय में उबाल आया सुचित्रा ने आंच धीमी कर दी. ‘चाय के उबाल को तो कम या बंद किया जा सकता है पर मन के उबाल पर कैसे काबू पाया जाए? चाय में तो शक्कर डाल कर मिठास बढ़ाई जा सकती है पर जबान की मिठास बढ़ाने की काश कोई शक्कर होती,’ सोचते हुए वे चाय ले कर लौन में शेखर के पास पहुंचीं.

दोनों की आधी चाय खत्म हो चुकी थी. बाहर अभी भी खामोशी पसरी थी, जबकि भीतर सवालों का द्वंद्व चल रहा था. चाय खत्म हो कर कप रखे जा चुके थे.

‘‘शेखर, हम से कहां और क्या गलती हुई.’’

‘‘सुचित्रा अपनेआप को दोष देना बंद करो. तुम से कहीं कोई गलती नहीं हुई.’’

‘‘शायद कुदरत की मरजी यही हो.’’

एक बार बाहर फिर खामोशी छा गई. जब हमें कुछ सम झ नहीं आता या हमारी सम झ के बाहर हो तो कुदरत पर ही डाल दिया जाता है. मानव स्वभाव ऐसा ही है.

शेखर और सुचित्रा की 2 बेटियां हैं- रीता और रीमा. रीता रीमा से डेढ़ साल बड़ी है. पर लगती दोनों जुड़वां. नैननक्श भी काफी मिलते हैं. बस रीमा का रंग रीता से साफ है. भारतीयों की अवधारणा है कि गोरा रंग सुंदरता का प्रतीक होता है. जिस का रंग जितना साफ होगा वह उतना ही सुंदर माना जाएगा, जबकि दोनों की परवरिश समान माहौल में हुई, फिर भी स्वभाव में दोनों एकदूसरे के विपरीत थीं. एक शांत तो दूसरी उतनी ही जिद्दी और उग्र स्वभाव की.

वैसे भी ज्यादातर देखा जाता है कि बड़ी संतान चाहे वह लड़का हो या लड़की शांत स्वभाव की होती है. उस की वजह शायद यही है तुम बड़े/बड़ी हो, उसे यह दे दो, तुम बड़े हो उसे मत मारो, तुम बड़े हो, सम झदार हो भले ही दोनों में अंतर बहुत कम हो और छोटा अपनी अनजाने में ही हर इच्छापूर्ति के कारण जिद्दी हो जाता है. यही रीता और रीमा के साथ हुआ. आर्थिक संपन्नता के कारण बचपन से ही रीमा की हर इच्छा पर होती रही. मगर उस का परिणाम यह होगा, किसी ने सोचा नहीं था.

रीता सम झदार थी. यदि उसे ठीक से सम झाया जाए तो वह सम झ जाती थी पर रीमा वही करती थी जो मन में ठान लेती थी. किसी के सम झाने का उस पर कोई असर नहीं होता था. शेखर यह कह कर सुचित्रा को दिलासा देते कि अभी छोटी है बड़ी होने पर सब सम झ जाएगी. अब तो वह बड़ी भी हो गई पर उस की आदत नहीं बदली, बल्कि पहले से ज्यादा जिद्दी हो गई.

रीता के लिए तुषार का रिश्ता आया है पर सुचित्रा इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि उस घर में कोई भी महिला सदस्य नहीं है. केवल तुषार और उस के बीमार पिता हैं. हर मां को अपनी बच्ची हमेशा छोटी ही लगती है. वह परिवार की इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभा भी पाएगी इस में हमेशा संशय रहता.

शेखर के सम झाने और तुषार की अच्छी जौब के कारण अंत में सुचित्रा शादी के लिए मान गईं. रीता ने भी तुषार से मिल कर अपनी रजामंदी दे दी. शादी की तैयारियां जोरशोर से शुरू हुईं. रीमा भी खुश थी. तैयारियों में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही थी. वह इस बात से ज्यादा खुश थी कि अब पूरे घर में उस का राज रहेगा और बातबात में मां द्वारा रीता से उस की तुलना भी नहीं होगी.

खैर, बिना किसी परेशानी के शादी हो गई. शेखर ने बहुत कोशिश की आंसुओं को रोकने की पर नाकाम रहे. बेटी की विदाई सभी की आंखें गीली करती है. अपने दिल का टुकड़ा किसी और को सौंपना वाकई कठिन होता है. पर तसल्ली थी कि रीता इसी शहर में है और 4 दिन बाद आ जाएगी. लड़की की विदाई के बाद घर का सूनापन असहज होता है. सुचित्रा तो बिखरे घर को समेटने में व्यस्त हो गईं.

ससुराल के नाम से ही हर लड़की के मन में डर समाया रहता है. रीता भी सहमी हुई ससुराल पहुंची. एक अनजाना सा भय था कि पता नहीं कैसे लोग होंगे. पर उस का स्वागत जिस आत्मीयता और धूमधाम से हुआ उस से डर कुछ कम हो गया.

‘‘वाह, तुषार बहू तो छांट कर लाया है… कितनी सुंदर है,’’ चाची ने मुंहदिखाई देते हुए तारीफ की.

‘‘भाभी, आप की मेहंदी का रंग तो बड़ा गाढ़ा है.’’

‘‘भैया की प्यारी जो है,’’ सुनते ही उस का चेहरा शर्म से लाल हो गया.

चुहल और हंसीखुशी के माहौल ने उस के डर को लगभग खत्म कर दिया. तुषार का साथ पा कर बहुत खुश थी. हनीमून पर जाने के लिए तुषार पहले ही मना कर चुका था. वह पापा को अकेला छोड़ कर नहीं जाना चाहता था. अपने पिता के प्रति प्रेम और परवाह देख रीता को बहुत अच्छा लगा. 4 दिन पता ही नहीं चला कैसे बीत गए.

पापा उसे लेने आ गए थे. घर पहुंचने पर उस ने देखा उस की सभी चीजों पर रीमा ने अपना हक जमा लिया है.

उसे बहुत गुस्सा आया पर शांत रही. बोली, ‘‘रीमा ये सारी चीजें मेरी हैं.’’

‘‘पर अब यह घर तो तुम्हारा है नहीं, तो ये सब चीजें मेरी हुईं न? ’’

‘‘रीता उदास होते हुए बोली, मम्मा, क्या सचमुच अब इस घर से मेरा कोई नाता नहीं?’’

‘‘यह घर हमेशा तेरा है पर अब एक और घर तेरा हो गया है, जिस की जिम्मेदारी तु झे निभानी है,’’ मां ने कहा.

अभी आए 2 ही दिन हुए थे पर पता नहीं जिस घर में पलीबढ़ी थी वह अपना सा क्यों नहीं लग रहा… तुषार की कमी खल रही थी जबकि दिन में 2-3 बार फोन पर बातें होती रहती थीं.

मेहमानों के जाने के बाद घर खाली हो गया था. तुषार उसे लेने आ गया. घर पर छोड़ कर जल्दी आने की कह तुषार औफिस चला गया. उस ने चारों ओर नजर घुमाई. उसे घर कम कबाड़खाना ज्यादा लगा. पूरा घर अस्तव्यस्त. उसे सम झ नहीं आ रहा था कि शुरुआत कहां से करे.

‘‘पारो.’’

‘‘जी, बहूरानी.’’

‘‘ झाड़ू कहां है? इस कमरे की सफाई करनी है. देखो कितना गंदा है… तुम ठीक से सफाई नहीं करती लगता.’’

‘‘अभी कर देती हूं.’’

दोनों ने मिल कर कमरा व्यवस्थित किया. बैडसीट बदली. तुषार की अलमारी में कपड़ों को व्यवस्थित किया. सारे सामान को यथास्थान रखा.

‘‘बहुरानी, इस कमरे की तो रंगत ही बदल गई. लग ही नहीं रहा कि यह वही कमरा है.’’

‘‘चलो अब पापाजी के कमरे की सफाई करते हैं.’’

‘‘पापाजी, आप ड्राइंगरूम में आराम कीजिए. हमें आप के कमरे की सफाई करनी है.’’

पापाजी ने अचरज से सिर उठा कर रीता की ओर देखा पर बोले कुछ नहीं, चुपचाप जा कर दीवान पर लेट गए.

कमरे में दवाइयों की खाली शीशियां, रैपर बिखरे पड़े थे. चादर, परदे भी कितने गंदे… पता नहीं कब से नहीं बदले गए. कमरे में सीलन की बदबू से रीता को खड़े रहना भी मुश्किल लग रहा था… इस बीमार कमरे में पापाजी कैसे स्वस्थ रह सकते हैं?

सब से पहले उस ने सारी खिड़कियां खोलीं. न जाने कब से बंद थीं. उन के खोलते ही लगा जैसे मृतप्राय कमरा सांस लेने लगा है.

चिड़िया चुग गईं खेत: शादीशुदा मनोज के साथ थाईलैंड में क्या हुआ था – भाग 1

कंपनी मीटिंग के लिए थाईलैंड ले जाने वाली कंपनी की बात सुनते ही मनोज और उस के दोस्तों की बाछें खिल गईं. एक तो कंपनी के खर्चे पर विदेश जाने का मौका और वह भी थाईलैंड जैसी जगह, जहां पत्नी और बच्चों का झंझट नहीं. यानी सोने पर सुहागा. मनोज और उस के दोस्त सुरेश और भावेश तैयारियों में लग गए. वे दिन गिनने लगे. जाने के जोश में वे अतिरिक्त उत्साह से काम करने लगे. जाने का दिन भी आ गया. अहमदाबाद से तीनों मुंबई पहुंचे. कंपनी के देशभर के डीलर मुंबई में इकट्ठा होने वाले थे फिर वहां से सब इकट्ठा बैंकौक जाने वाले थे.

रात की फ्लाइट से सब बैंकौक पहुंचे और सुबह बस से पटाया पहुंचे. होटल पहुंच कर सब अपनेअपने कमरों में जा कर आराम करने लगे. मनोज को हफ्तेभर से बहुत मेहनत करनी पड़ रही थी. वह थकान से निढाल हो कर पलंग पर लेट गया. लेटते ही उस को झपकी आ गई. आधे घंटे बाद ही रूम की बेल के बजने से उस की नींद खुल गई. उस ने झल्लाते हुए नींद में ही दरवाजा खोला.

भावेश और सुरेश तेजी से कमरे में आए और चहकते हुए बोले, ‘‘चल यार, थाई मसाज करवा कर आते हैं.’’

‘‘शामवाम को चलेंगे यार, अभी तो थोड़ा सोने दो, बहुत थक गया हूं,’’ मनोज ने पलंग पर लेटते हुए कहा.

‘‘अरे, शाम को तो ओपन शो देखने जाएंगे. मसाज का टाइम तो अभी ही है. फिर आने के बाद नाश्ता करेंगे,’’ सुरेश ने कहा.

‘‘अबे, तू यहां सोने आया है क्या. और थाई मसाज करवाने से तो सारी थकान उतर जाएगी,’’ भावेश ने सुरेश को देख कर आंख मारी.

‘‘और क्या, होटल के सामने वाली सड़क के उस पार ही तो मसाज पार्लर है,’’ सुरेश ने कहा.

‘‘तुम लोग जरा देर भी सोए नहीं क्या, मसाज पार्लर भी ढूंढ़ आए. गजब हो यारो तुम भी,’’ मनोज आश्चर्य से उठ बैठा.

सोने के लिए तो उम्र पड़ी है. यहां चार दिन तो ऐश कर लें. चलचल उठ जा और चिंता मत कर, हम भाभी को कुछ नहीं बताएंगे,’’ भावेश ने मनोज से चुटकी ली.

मनोज झेंप गया, ‘‘चलो, चलते हैं,’’ कह कर उठ गया.

तीनों होटल से बाहर निकले और रोड क्रौस कर ली. सामने ही रोज मसाज पार्लर था. तीनों पार्लर में चले गए. रिसैप्शन पर भड़कीले और कम कपड़ों में एक थाई लड़की खड़ी थी. उस ने मुसकरा कर तीनों का स्वागत किया. उस ने गहरे गले की शौर्ट ड्रैस पहन रखी थी. उस के आधे उभार ड्रैस से बाहर दिखाई दे रहे थे.

उसे देखते ही सुरेश और भावेश की बाछें खिल गईं. मीठीमीठी बातें कर के उस लड़की ने तीनों का मन जीत लिया. थाई मसाज के उस लड़की ने तीनों से कुल 2,400 भाट रखवा लिए. भाट थाइलैंड की करैंसी है. सुरेश, भावेश ने तो खुशी से पैसे दे दिए लेकिन मनोज को 800 भाट देते हुए थोड़ा बुरा लगा. इतना पैसा सिर्फ मसाज करवाने के लिए. इस से तो दोनों बच्चों के लिए या पत्नी मीरा के लिए अच्छी ड्रैसेज आ जातीं. थोड़ा भारी मन लिए हुए वह मसाज केबिन की ओर बढ़ा. उस के दोनों दोस्त पहले ही खुशी से फड़कते हुए केबिनों में जा चुके थे. मनोज ने भी एक केबिन का दरवाजा खोला और धड़कते हुए दिल से अंदर दाखिल हुआ.

केबिन में बड़ा रहस्यमय और सपनीला सा माहौल था. पीली नारंगी मद्धिम रोशनी. एकतरफ लाल रंग की सुगंधित मोमबत्तियां जल रही थीं. खुशबू और रोशनी का बड़ा दिलकश कौंबिनेशन था. मसाज बैड के पास एक 25-26 साल की खूबसूरत युवती खड़ी थी. वह चटक लाल रंग की शौर्ट बिना बांहों की ड्रैस पहने खड़ी थी. लाल रंग में उस का गोरा रंग गजब का खिला हुआ दिख रहा था. टाइट ड्रैस में से उस के सीने के उभार स्पष्ट दिख रहे थे. मनोज क्षणभर को अपनी सुधबुध खो कर लोलुप दृष्टि से उसे देखता रह गया. लड़की उस की हालत देख कर मुसकरा दी तो मनोज झेंप गया.

मसाज वाली लड़की ने इशारे से उसे कपड़े उतार कर बैड पर लेटने को कहा. मनोज उस के जादू में खोया या यंत्रवत कपड़े एक ओर रख कर बैड पर लेट गया. बैड की चादर मुलायम और मखमली थी. इतनी नर्म चादर मनोज ने अपने जीवन में पहली बार देखी थी. कमरे में मनोज को ऐसा लग रहा था कि वह किसी तिलिस्मी दुनिया में आ गया है. वह एक अनोखी रूमानी दुनिया में पहुंच गया. तभी लड़की ने एक सुगंधित तेल उस की पीठ पर लगा कर मसाज करना शुरू कर दिया.

लड़की के मादक स्पर्श से वह मदमस्त हो कर एक मादक खुमारी में खो गया. उस पर एक हलका सा नशा छाता जा रहा था. बंद कमरे में एक जवान लड़की के साथ एक रोमांटिक माहौल में मसाज करवाने का यह उस का पहला अनुभव था. 800 भाट खर्च होने का अफसोस जाता रहा. मसाज करीब 1 घंटे तक चला. थोड़ा नशा हलका होने पर जानपहचान बढ़ाने के मकसद से मनोज ने उस लड़की से बातचीत करनी शुरू कर दी. वह लड़की थोड़ीबहुत अंगरेजी बोल पा रही थी. मनोज ने उस से उस का नाम पूछा तो उस ने जूली बताया. मनोज ने उस की शिक्षा और घरपरिवार के बारे में बात की. वह 25 वर्ष की गे्रजुएट लड़की थी. उस का घर पटाया से दूर एक गांव में था. मातापिता बूढ़े थे. वह घर चलाने के लिए पटाया में यह काम कर रही थी.

न जाने उस के चेहरे और स्वर में ऐसी क्या पीड़ा थी, एक दर्द सा झलक रहा था कि मनोज का दिल पिघल गया. यों भी, वह कच्चे मन का भावुक इंसान था.

कर्नल के शिकारी बेटे का कारनामा

उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ के वीआईपी व पौश एरिया सिविललाइंस में पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों के औफिस, आवास, सर्किट हाउस, पुलिस मुख्यालय, कलेक्ट्रेट, कचहरी और पुलिस लाइन हैं. इसी इलाके में कई समृद्ध लोगों के अपने आवास भी हैं. उन्हीं में से एक आलीशान कोठी नंबर 36/4 थी, जो रिटायर्ड कर्नल देवेंद्र विश्नोई की थी. वह कोई मामूली आदमी नहीं थे. कई साल सेना में नौकरी कर के उन्होंने देश की सेवा की थी.

सन 1971 में हुई भारत पाकिस्तान की जंग में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी. बाद में वह पंजाब में हुए औपरेशन ब्लूस्टार का भी हिस्सा रहे. उन के साहस की निशानियां फोटो और मैडल के रूप में उन के ड्राइंगरूम की दीवारों पर सजे थे. कई सम्मान भी उन्हें मिले थे. कुल मिलाकर उन की पृष्ठभूमि शौर्य, साहस और सम्मान की अनोखी मिसाल थी, उन्हें जानने वाले इन बातों को बखूबी जानते थे.

बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी, कर्नल साहब का एकलौता बेटा प्रशांत विश्नोई भी देश का जानामाना शूटर था. मजबूत कदकाठी और रौबदार चेहरे वाले प्रशांत की पत्नी और 2 बेटियां थीं. सभी एक साथ इसी कोठी में रहते थे. कर्नल परिवार के ईंट के भट्ठे और जमीनों के अलावा सिक्योरिटी एजेंसी का बड़ा काम था. विश्नोई परिवार करोड़ों की दौलत का मालिक तो था ही, आसपास उस की शोहरत भी थी.

कर्नल परिवार की लाइफस्टाइल हाईप्रोफाइल थी. आसपास की कोठियों में और भी लोग रहते थे, लेकिन कर्नल परिवार किसी से कोई वास्ता नहीं रखता था. वैसे भी शहरों में लोग इस तरह की जिंदगी जीने के आदी हो गए हैं. पड़ोसी को पड़ोसी की खबर नहीं होती.

हर कोई अपने हिसाब से अपनी जिंदगी जीना चाहता है. किस के यहां क्या हो रहा है, कोई दूसरा नहीं जानता. कर्नल की कोठी की पहचान का एक हिस्सा उन की आधा दरजन से ज्यादा महंगी कारें भी थीं. प्रशांत को कारों का शौक था. इन में लग्जरी कारों के अलावा घने जंगलों व रेगिस्तान में चलने वाली थार नामक जीप भी थी. गाडि़यां बदलती रहती थीं. खास बात यह थी कि इन सभी गाडि़यों के वीआईपी नंबर 0044 ही होते थे.

वक्त कब किस की पहचान किस रूप में सामने ला दे, इस बात को कोई नहीं जानता. 30 अप्रैल, 2017 का सवेरा हुआ तो न सिर्फ तारीख बदली थी, बल्कि कर्नल की कोठी की पहचान भी सनसनीखेज तरीके से बदल गई थी. लोग न केवल हैरान नजरों से कोठी को देख रहे थे बल्कि तरहतरह की बातें भी कर रहे थे. कर्नल साहब की कोठी अचानक ही चर्चाओं का हिस्सा बन गई थी.

दरअसल, 29 अप्रैल की दोपहर देश के गृह मंत्रालय के अधीन आने वाली डायरेक्टोरेट औफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस (डीआरआई) की दिल्ली से आई कई टीमें छापा मारने के लिए कर्नल साहब की कोठी पर पहुंच गई थीं. बाकी लोग गाडि़यों में ही बैठे रहे, सिर्फ 4 लोग कोठी के दरवाजे पर गए, डोरबैल बजाई तो नौकर बाहर आया. उस ने पूछा, ‘‘कहिए?’’

चारों में से एक अफसर ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘हमें कर्नल साहब या प्रशांतजी से मिलना है.’’

‘‘आप लोग कहां से आए हैं?’’ नौकर ने अगला सवाल किया.

‘‘दिल्ली से. उन से कहिएगा कि हमारा मिलना जरूरी है.’’

‘‘आप ठहरिए, मैं पूछ कर आता हूं.’’ नौकर ने कहा.

टीम ने नजरें दौड़ाईं, दरवाजों पर हाई क्वालिटी वाले कैमरे लगे थे, जिन का फोकस दोनों रास्तों की ओर था. कुछ ही देर में नौकर ने आ कर उन के लिए दरवाजा खोल दिया. इशारा पा कर टीम के अन्य सदस्य भी दनदनाते हुए अंदर दाखिल हो गए. इतने सारे लोगों को एक साथ देख कर ड्राइंगरूम में बैठे कर्नल देवेंद्र भड़क उठे, ‘‘यह क्या बदतमीजी है, कौन हैं आप लोग?’’

अधिकारियों ने अपना परिचय देने के साथ ही पूछा, ‘‘पहले आप यह बताइए कि प्रशांत कहां हैं?’’

‘‘वह तो घर पर नहीं है.’’

‘‘ठीक है, हमें घर की तलाशी लेनी है.’’ अफसरों ने कहा.

उन लोगों का इतना कहना था कि देवेंद्र गुस्से में आ गए. उन की उम्र काफी हो चुकी थी और आंख का औपरेशन हुआ था. लेकिन आवाज युवाओं जैसी कड़कदार थी. उन्होंने धमकाते हुए कहा, ‘‘खबरदार, अगर ऐसा किया तो ठीक नहीं होगा.’’

‘‘माफ करें, हमें इस बात का पूरा अधिकार है. बेहतर होगा कि आप शांत रहें.’’ अफसरों ने कहा.

टीम को विरोध का सामना करना पड़ सकता था, इसलिए उन्होंने पुलिस अधिकारियों को फोन कर के सूचना दी तो तुरंत पुलिस बल आ गया. देवेंद्र ने पुलिस को भी आड़े हाथों लिया और इधरउधर फोन करने लगे. पुलिस ने उन का मोबाइल और फोन अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस और टीम का सख्त रुख देख कर उन्हें शांत हो जाना पड़ा. वैसे भी उन की तबीयत ठीक नहीं थी.

डीआरआई और पुलिस की टीम ने 3 मंजिला कोठी की तलाशी लेनी शुरू की तो वहां जो कुछ मिलना शुरू हुआ, उसे देख उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. पहली मंजिल पर बने प्रशांत के कमरों से देशीविदेशी हथियारों और कारतूसों का जखीरा मिलता चला गया. हालांकि प्रशांत शूटर थे, लेकिन किसी को भी इतने हथियार रखने की इजाजत नहीं हो सकती. जांच टीम के होश उड़ गए, क्योंकि यह जखीरा इतना ज्यादा था कि पूरे जिले की पुलिस के पास भी शायद इतनी गोलियां नहीं हो सकती थीं.

इतना ही नहीं, कोठी के एक विशेष कमरे में वन्यजीवों के सिर, हड्डियां, खालें व अन्य वस्तुएं मिलीं. खुद टीम को भी उम्मीद नहीं थी कि छापे में इतना कुछ निकलेगा. मामला हथियारों की तस्करी से होता हुआ वन्यजीवों की तस्करी तक पहुंच गया था.

इस के बाद सूचना पा कर पश्चिम क्षेत्र के वन संरक्षक मुकेश कुमार भी अपनी टीम के साथ कर्नल की कोठी पर पहुंच गए. उन के साथ टीम में वन अधिकारी संजीव कुमार, वन्यजीव प्रतिपालक राज सिंह, क्षेत्रीय वन अधिकारी हरीश मोहन, वन दरोगा रामगोपाल व वनरक्षक  मोहन सिंह भी थे.

प्रशांत कहां था, इस की किसी को खबर नहीं थी. उस का मोबाइल भी स्विच औफ आने लगा था. संभवत: उसे छापेमारी की खबर लग गई थी. जांच काफी बारीकी से चल रही थी. कोठी के बाहर पुलिस बल तैनात कर दिया गया था. खबर पा कर मीडिया वाले भी आ गए थे. कोठी के अंदर प्रतिबंधित सामानों का जखीरा मिलता जा रहा था. टीम सब चीजों को सील करती जा रही थी.

टीम ने जो कुछ भी बरामद किया था, उस की किसी को उम्मीद नहीं थी. कोठी से सौ से भी ज्यादा हथियार, जिन में पिस्टल, रिवौल्वर और बड़े हथियार मिले. 2 लाख कारतूस, करीब एक करोड़ रुपए नकद, कैमरे, दूरबीन के अलावा तेंदुए, काले हिरन की खालें, सांभर और काले हिरन के सींग सहित एकएक खोपड़ी, एक हिरन की खोपड़ी, गरदन सींग सहित, सांभर, हिरन के बच्चों की सींगें, चिंकारा हिरन की सींग सहित 4 खोपडि़यां, कुछ बिना सींग वाली हिरन की खोपडि़यां, अन्य कई प्रजातियों के हिरन की खोपडि़यां, वन्य जीवों के 7 दांत, हाथी दांत की मूठ वाला एक चाकू तथा 47 पैकेटों में रखा गया एक क्विंटल से अधिक 117.50 किलोग्राम वन्य जीवों का मांस बरामद किया गया. मांस के ये पैकेट बाकायदा बड़े फ्रीजर में रखे थे.

खास बात यह थी कि बरामद हथियार विदेशों के नामचीन ब्रांड बेरेटा (इटली), बेनेली (इटली), आर्सेनल (इटली), ग्लौक (आस्ट्रिया) और ब्लेजर (जर्मनी) के थे. इंटरनेशनल ब्रांड के बरामद हथियारों की कीमत 25 करोड़ रुपए के आसपास आंकी गई. कर्नल देवेंद्र और उन की पत्नी प्रशांत की करतूतों का हिस्सा थे या नहीं, यह जांच का विषय था. लेकिन वे दोनों बुजुर्ग और बीमार थे, इसलिए उन्हें हिरासत में नहीं लिया गया.

छापे की यह काररवाई सुबह करीब 5 बजे तक चली. इस के बाद दिन निकलते ही कर्नल साहब की कोठी सुर्खियों में आ गई. कोठी के राज को जान कर पूरा शहर दंग रह गया. डीआरआई के अलावा वन विभाग ने भी मेरठ के थाना सिविल लाइन में प्रशांत के खिलाफ धारा 9, 50, 51, 44, 49(ए), व 49(बी)  वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. मामले की जांच के साथ प्रशांत की तलाश तेज कर दी.

वह विदेश भाग सकता था, इसलिए कोठी से उस का पासपोर्ट पहले ही कब्जे में ले लिया गया था. उस के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर के देश के हवाईअड्डों को सतर्क कर दिया गया था. डीआरआई के अलावा क्राइम ब्रांच, एसटीएफ, वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो और दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल को भी प्रशांत की तलाश में लगा दिया गया था. इस बीच डीआरआई के एडीशनल डायरेक्टर राजकुमार दिग्विजय ने बरामदगी के बारे में विधिवत प्रैस को जानकारी दी. डीएफओ अदिति शर्मा के निर्देशन में कोठी से बरामद मांस के सैंपल जांच के लिए प्रयोगशाला भेज दिए गए.

प्रशांत की पोल शायद कभी खुल न पाती, अगर दिल्ली में हथियारों के साथ कुछ लोग न पकडे़ गए होते. दरअसल, अप्रैल के अंतिम सप्ताह में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से शूटर अमित गोयल और अनिल के साथ 2 विदेशी नागरिकों को 25 विदेशी हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया था.

ये लोग टर्किश एयरलाइंस से स्लोवेनिया की राजधानी लिजबुलजना से इस्तांबुल होते हुए दिल्ली पहुंचे थे. इन में एक बोरिस सोबोटिक मिकोलिक मध्य यूरोप के स्लोवेनिया का रहने वाला था और हथियारों का बड़ा तस्कर था.

हालांकि इन लोगों ने खुद को इंटरनेशनल शूटर बताया था. पता चला ये शूटरों को दी जाने वाली आयात पौलिसी का लाभ उठा रहे थे, लेकिन इस बार ये हवाईअड्डे की सुरक्षा जांच एजेंसियों को झांसा देने में नाकाम रहे. बरामद हथियारों की कीमत साढ़े 4 करोड़ रुपए थी. इन से पूछताछ हुई तो शूटर प्रशांत के तार इन से जुड़े मिले. मामला गंभीर था, लिहाजा शिकंजा कसने की तैयारी कर ली गई. कई दिनों की रेकी के बाद डीआरआई टीम छापा मारने प्रशांत के घर पहुंच गई.

जांच करने वालों ने कर्नल देवेंद्र से पूछताछ की लेकिन उन्होंने बरामद सामान के बारे में किसी भी तरह की जानकारी होने से इनकार कर दिया. हालांकि उन की साफगोई किसी के गले नहीं उतर रही थी. सब से बड़ा सवाल यह था कि एक सैन्य अधिकारी का बेटा इतने बड़े पैमाने पर तस्करी में कैसे लिप्त हो गया था? इस की गहराई से जांच और प्रशांत की गिरफ्तारी जरूरी थी. जबकि प्रशांत अपने मोबाइल फोन का स्विच औफ कर चुका था.

प्रशांत के नंबर की काल डिटेल्स के आधार पर उस के नेटवर्क की तह में जाने की कोशिश की गई. उस की गिरफ्तारी के लिए डीआरआई टीम के अलावा यूपी एसटीएफ, वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो और दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीमें लगी थीं. सभी को उस की सरगर्मी से तलाश थी. लेकिन वह सभी को गच्चा देने में कामयाब रहा.

पुलिस सूचनाओं के आधार पर छापे मारती रही और वह चकमा देने में कामयाब होता रहा. देखतेदेखते एक महीना बीत गया. जांच एजेंसियों के लिए वह चुनौती बना हुआ था. आखिर 1 जून को डीआरआई टीम ने उसे दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में जो कुछ प्रकाश में आया, वह बेहद चौंकाने वाला था. दरअसल, कर्नल देवेंद्र ग्रामीण पृष्ठभूमि से थे. वह मेरठ जिले के ही कस्बा फलावदा के रहने वाले थे. वहां उन की जमीनें थीं. रिटायरमेंट के बाद वह कुछ साल बरेली के समाज कल्याण विभाग में तैनात रहे. इस के बाद करीब 16 साल पहले उन्होंने फलावदा और परीक्षितगढ़ में ब्रिक फील्ड नाम से ईंट के भट्ठे लगाए.

इन भट्ठों में उन्हें घाटा हो गया था, जिस से आर्थिक हालात बिगड़ गए. बाद में पितापुत्र ने बरेली में एक सिक्योरिटी एजेंसी खोली. इस एजेंसी का काम सरकारी टेंडरों के जरिए गार्ड मुहैया कराना था. धीरेधीरे कंपनी का नेटवर्क कई राज्यों में फैल गया. यह काम चल निकला और देखतेदेखते कर्नल के न सिर्फ आर्थिक हालात बदल गए, बल्कि प्रशांत का लाइफस्टाइल भी बदल गया. महंगी कारें उस का शौक बन गईं. प्रशांत शूटिंग के क्षेत्र में भी काफी नाम कमा चुका था.

प्रशांत ने बचपन से ही ऊंचे ख्वाब देखे थे. पिता कर्नल थे, लिहाजा जिंदगी ऐशोआराम में बीती. स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही वह शूटिंग प्रतियोगिताओं में हाथ आजमाने लगा था. सन 2002 में उस का विवाह निधि के साथ हुआ. समय के साथ वह 2 बेटियों का पिता बना. वह बिलियर्ड्स प्लेयर तो था ही, साथ ही राष्ट्रीय स्तर का स्कीट शूटर भी था. इस के तहत 12 बोर से शूटिंग की जाती है.

बिग बोर व .22 कैटेगरी में वह देश के लिए खेल चुका है. पहले वह दिल्ली में रह कर शूटिंग करता था. तब उस ने कई मैडल जीते थे. एक साल पहले उस ने जयपुर में 60वीं नेशनल चैंपियनशिप खेली थी, जिस में उस की 65वीं रैंक आई थी. नेशनल रायफल एसोसिएशन औफ इंडिया ने उसे रिनाउंड शूटर की मान्यता दी हुई थी.

रिनाउंड शूटर को 2 वेपन का लाइसैंस मिल सकता था. अंतरराष्ट्रीय शूटर होने के नाते प्रशांत के नामचीन लोगों से ताल्लुक थे. कई राजनेताओं से भी उस के सीधे रिश्ते थे. इन में स्थानीय नेताओं से ले कर मुख्यमंत्री तक थे. कई बड़े कारोबारी भी उस के संपर्क में रहते थे.

समय के साथ प्रशांत हथियारों और वन्यजीवों की तस्करी करने लगा. यह तस्करी देश से होते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गई. शूटिंग की आड़ में वन्यजीवों का शिकार और तस्करी का धंधा प्रशांत और उस की टीम ने पूरे देश में फैला दिया. वह कितना बड़ा शिकारी और तस्कर बन गया है, इस की खबर आसपास के लोगों को नहीं थी.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के जंगलों के अलावा बिहार के जंगल, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड के जिम कार्बेट पार्क समेत कई जगहों पर भी प्रशांत व उस के साथियों ने वन्यजीवों का शिकार किया. उस की कोठी तस्करी का अड्डा बन गई.

हथियारों के आयात पर रोक के बावजूद देश में बड़ी आसानी से हथियार आते रहे. इन हथियारों को प्रशांत एजेंटों के माध्यम से मुंहमांगी कीमतों पर बेचता था. जिस हथियार की कीमत विदेश में एक लाख रुपए होती थी, उसे वह 15 से 20 लाख रुपए में बेचता था.

हथियार चूंकि विख्यात कंपनियों के होते थे, इसलिए उन की बड़ी कीमत मिल जाती थी. कई बार हथियारों के पार्ट्स ला कर भी उन्हें जोड़ लिया जाता था.

दरअसल, इस खेल को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शूटरों को सीमित मात्रा में विदेशी हथियार लाने की सरकारी छूट का प्रशांत और उस के साथी लाभ उठा रहे थे. कस्टम अधिकारियों को गुमराह कर के ये कम हथियारों की जानकारी दे कर अधिक हथियार भारत लाते थे.

वन्यजीवों का शिकार प्रशांत सिर्फ अपने शौक के लिए ही नहीं करता था, बल्कि उन के मांस की सप्लाई कई नामी होटलों में की जाती थी. हिरनों की लुप्त हो रही प्रजातियों को सहज निशाना बनाया जाता था. वन्यजीवों के मांस और उन के अंगों को कारों के जरिए ही लाया जाता था. प्रशांत ने एक कार में फ्रिजर रखने की व्यवस्था करा रखी थी. कार पर चूंकि आर्मी लिखा होता था, इसलिए चैकिंग में वह कभी नहीं पकड़ा गया.

प्रशांत कई राज्यों में नीलगायों का शिकार करने जा चुका था. उत्तर प्रदेश सहित आसपास के राज्यों में वह किसानों के आमंत्रण पर जाता रहता था. सन 2016 में बिहार सरकार ने भी 5 सौ नीलगायों को मारने के लिए शूटरों की टीम को बुलाया था. उस में प्रशांत भी शामिल था. आरोप है कि इस की आड़ में वह वन्यजीवों का शिकार और उन के अंगों एवं मांस की तस्करी करता था.

सुरक्षा एजेंसियों या स्थानीय पुलिस को कभी उस के गोरखधंधे का पता नहीं चला. लेकिन जब दिल्ली के एयरपोर्ट पर तस्करों की गिरफ्तारी हुई तो उन्होंने प्रशांत का नाम उगल दिया.

पूछताछ के बाद प्रशांत को अगले दिन पटियाला हाउस कोर्ट में मुख्य महानगर न्यायाधीश सुमित दास की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

7 जून को उसे मेरठ की अदालत में पेश किया गया. वन विभाग ने उस के रिमांड की अर्जी लगाई, लेकिन रिमांड नहीं मिल सका. उसे पुन: तिहाड़ जेल भेज दिया गया. प्रशांत ने किनकिन लोगों को हथियार बेचे, मांस की तस्करी कहांकहां की और किन लोगों से उस के तार जुड़े थे, इस सब की गहराई से जांच के लिए उसे रिमांड पर लेने की कोशिश की जा रही थी.

प्रशांत का जो चेहरा समाज के सामने आया है, वह लोगों को सोचने पर मजबूर जरूर कर रहा है कि किस तरह संभ्रांत लोग चौंकाने वाले धंधों में लिप्त होते हैं. वह जो कुछ भी कर रहा था, उस की खबर पड़ोसियों को भी नहीं थी. स्थानीय पुलिस और खुफिया एजेंसी भी जिस तरह से उस के धंधे से अनजान थीं, उस से पता चलता है कि वह कितने शातिराना अंदाज में अपने कारनामों को अंजाम दे रहा था.

दूसरी ओर कर्नल देवेंद्र ने बेटे के गोरखधंधे से खुद को अलग बता कर पल्ला झाड़ लिया है. उन का कहना था कि उन्हें पता नहीं था कि उन का बेटा यह सब कर रहा था. वह शर्मिंदा हैं. मेरठ कचहरी में पेशी के दौरान प्रशांत ने खुद को फंसाए जाने का आरोप लगाया. कथा लिखे जाने तक प्रशांत की जमानत नहीं हो सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जिस ने लूटा, वही बना सुहाग

बिहार के इस हाईप्रोफाइल केस में लड़का एक रिटायर्ड आईएएस अफसर का बेटा और करोड़पति औटोमोबाइल कारोबारी निखिल प्रियदर्शी है, वहीं लड़की बिहार के पूर्व मंत्री की बेटी सुरभि है.

9 महीने तक चले इस हंगामे के बाद दोनों ने शादी रचा कर मामले को ठंडा तो कर दिया, पर इस मामले में सुरभि ने निखिल के साथसाथ बिहार कांग्रेस के उपाध्यक्ष पर भी जिस्मानी शोषण का आरोप लगाया था.

इस आरोप में पिता समेत जेल जाने के बाद निखिल ने अदालत में समझौता याचिका दायर की और आरोप लगाने वाली सुरभि से शादी करने की बात कही थी. उस ने याचिका में कहा था कि सुरभि से अब उस का कोई झगड़ा नहीं है और दोनों शादी करने के लिए राजी हैं.

कोर्ट के आदेश के बाद 6 नवंबर, 2017 को पटना के रजिस्ट्रार के सामने निखिल और सुरभि ने शादी रचा ली.

इस शादी के पीछे एक लंबी कहानी है. 22 दिसंबर, 2016 को सुरभि ने निखिल, उस के भाई मनीष और पिता कृष्ण बिहारी प्रसाद के खिलाफ पटना के एससीएसटी थाने में एफआईआर दर्ज की थी. उस के बाद 8 मार्च, 2017 को पीड़िता ने बुद्धा कालोनी थाने में उस की पहचान उजागर करने, एक करोड़ रुपए और औडी कार मांगने की बातों को सोशल मीडिया पर वायरल करने को ले कर निखिल और ब्रजेश पांडे पर एफआईआर दर्ज कराई थी. सीआईडी की सुपरविजन रिपोर्ट में मुख्य आरोपी निखिल को कुसूरवार करार दिया गया था. अनुसूचित जाति थाने के आईओ द्वारा की गई जांच में सीआईडी के डीएसपी ने सुपरविजन किया था.

सीआईडी के एडीजे विनय कुमार ने सुपरविजन की समीक्षा करने के बाद निखिल के खिलाफ लगाए गए बलात्कार के आरोप को सही पाया था.

आईजी (कमजोर वर्ग) अनिल किशोर यादव ने भी कहा था कि निखिल पर लगे आरोप सही पाए गए हैं.

निखिल को करीब से जानने वाले बताते हैं कि पावर, पैसा, पौलिटिक्स और पुलिस से निखिल की खूब यारी थी. निखिल एक नामी कार कंपनी के शोरूम का मालिक है. उस के बूते उस ने नेताओं और अफसरों के बीच खासी पैठ बना रखी थी. रसूखदारों से मिलना, उन के साथ उठनाबैठना और पार्टियां करने में उसे खूब मजा आता था. इन सब पर वह जमकर पैसा खर्च करता था.

यौन उत्पीड़न और सैक्स रैकेट चलाने के साथ ही बैंकों से लेनदेन को ले कर भी निखिल के खिलाफ कानूनी मामला चल रहा है. कुछ बैंकों से करोड़ों रुपए के लोन लेने के मामले में वह डिफौल्टर करार दिया गया है और बैंकों ने उस पर केस कर दिया है. बैंकों को रुपए लौटने के मामले में निखिल हाथ खड़े कर चुका है.

मुंबई हाईकोर्ट के आदेश पर निखिल प्रियदर्शी के बेली रोड पर बने कार शोरूम को सील कर दिया था.

टाटा कैपिटल फाइनैंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने निखिल की जायदाद जब्त करने का आदेश पुलिस को दिया था. टाटा कैपिटल का करोड़ों रुपए का लोन निखिल नहीं चुका रहा था. सगुना मोड़ के पास बना उस का दूसरा शोरूम पहले ही जब्त किया जा चुका है.

निखिल समेत कांग्रेस नेता ब्रजेश पांडे और संजीत शर्मा पर सुरभि ने बलात्कार और सैक्स रैकेट चलाने का आरोप लगाया था. निखिल ऊंचे ओहदे पर बैठे कई नेताओं और अफसरों को लड़कियां सप्लाई किया करता था.

सुरभि ने एसआईटी को बताया था कि शादी का झांसा दे कर निखिल उसे महंगी गाडि़यों में घुमाता था. एक दिन वह उसे बोरिंग रोड इलाके के एक फ्लैट में ले गया. उसे कोल्ड ड्रिंक पीने के लिए दी. उसे पीने के बाद वह बेहोश हो गई.

कुछ देर बाद जब उसे थोड़ा होश आया तो देखा कि ब्रजेश पांडे और संजीत शर्मा उस के साथ गलत हरकतें कर रहे थे. बाद में उस ने निखिल को फटकार लगाई और उस पर शादी करने का दबाव बनाया तो निखिल ने उस के साथ मारपीट की.

सुरभि ने मार्च महीने में पुलिस को दिए बयान में कहा था कि वह निखिल से प्यार करती थी और उस से शादी करना चाहती थी. निखिल ने उसे शादी करने का भरोसा दिया था, पर उस के बाद वह लगातार टालमटोल कर रहा था.

पहले तो कई महीनों तक शादी का झांसा दे कर निखिल ने उस के साथ जिस्मानी संबंध बनाए. उस के बाद उसे गलत कामों को करने पर जोर देने लगा. वह अपने दोस्तों के सामने उस के जिस्म को परोसना चाहता था.

एक दिन बोरिंग रोड के एक फ्लैट में ब्रजेश पांडे के सामने सुरभि को परोसने की कोशिश की. ब्रजेश ने उस के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की. जब पीडि़ता ने उस का विरोध किया तो उस के साथ मारपीट की गई.

सुरभि ने पुलिस को बताया था कि निखिल उस के साथ गलत हरकतें करता था. पहले वह इस बारे में खुल कर कुछ नहीं कह पाती थी, क्योंकि परिवार की बदनामी का डर था. अब उस का परिवार उस के साथ खड़ा है तो वह खुल कर बोल सकती है.

सुरभि ने बताया कि ब्रजेश उसे अपने साथ दिल्ली ले जाना चाहता था. उस ने कई बार उसे दिल्ली चलने को कहा. रुपयों का लालच भी दिया, लेकिन उस ने निखिल के साथ जाने से इनकार कर दिया.

निखिल गांजा पीता था और ज्यादा डोज लेने के बाद वह जानवरों की तरह बरताव करने लगता था. वह उस के जिस्म को नोचनेखसोटने लगता था.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, फेसबुक और ह्वाट्सऐप के जरीए लड़कियों से चैटिंग करना निखिल का शौक था. कई लड़कियों को वह सैक्स के घिनौने खेल में जबरन उतार चुका था. लड़कियों को परोस कर उस ने सत्ता के गलियारों और पुलिस महकमे में अपनी गहरी पैठ बना रखी थी.

दिखावे के तौर पर तो निखिल कारों का कारोबार करता था, लेकिन लग्जरी कारों के साथसाथ खूबसूरत लड़कियां भी उस की कमजोरी थीं. अफसरों और नेताओं को औडी और जगुआर जैसी महंगी कारों में घुमा कर उन से दोस्ती गांठने में वह माहिर था.

सुरभि ने जब निखिल पर यौन शोषण का आरोप लगा कर केस दर्ज किया था तो निखिल फरार हो गया था. एसआईटी ने उस की खोज में देश के कई राज्यों में छापामारी की. उसे पता था कि पुलिस उस की खोज में भटक रही है, इसलिए वह लगातार अपने ठिकाने बदलता रहा.

साढ़े 3 महीने तक फरार रहने और पुलिस की आंखों में धूल झोंकने वाला निखिल प्रियदर्शी और उस के रिटायर आईएएस पिता कृष्ण बिहारी प्रसाद को 14 मार्च को उत्तराखंड से गिरफ्तार किया गया था.

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के लक्ष्मण झूला थाने के चीला ओपी इलाके से उन्हें सुबहसुबह दबोचा गया. बिहार पुलिस को निखिल के उत्तराखंड में होने की सूचना मिली थी.

पटना के एसएसपी मनु महाराज ने पौड़ी गढ़वाल जिले के एसएसपी और अपने बैचमेट मुख्तार मोहसिन को फोन कर उन्हें निखिल के बारे में सूचना दी. उस के बाद ही उत्तराखंड पुलिस निखिल की खोज में लग गई थी. चीला इलाके में गाड़ी चैकिंग के दौरान निखिल अपनी औडी गाड़ी के साथ पकड़ा गया. गाड़ी में उस के पिता भी बैठे हुए थे.

पुलिस ने बताया कि निखिल और उस के पिता के पास पहचानपत्र था. इस वजह से वे किसी होटल में नहीं रुक पा रहे थे. तकरीबन 3 महीने तक बापबेटे ने दिनरात औडी कार में ही गुजारे. वे किसी पब्लिक प्लेस पर कार खड़ी कर के आराम किया करते थे. सार्वजनिक शौचालय में फ्रैश होते और उस के बाद फिर से कार से ही आगे की ओर बढ़ जाते थे.

अब शादी करने के बाद निखिल और सुरभि की नई जिंदगी क्या करवट लेगी, यह देखने वाली बात होगी.

बच्चों की सुरक्षा के लिए सतर्कता जरूरी

7 साल का प्रद्युम्न ठाकुर गुड़गांव के ख्यातिप्राप्त रायन इंटरनैशनल स्कूल की कक्षा 2 का छात्र था. रोजाना की तरह गत 8 सितंबर को मां ने प्यार से तैयार कर उसे पढ़ने के लिए स्कूल भेजा. पिता द्वारा प्रद्युम्न को स्कूल में पहुंचाने के आधे घंटे के अंदर घर पर फोन आ गया कि बच्चे के साथ हादसा हो गया है. प्रद्युम्न को संदिग्ध परिस्थितियों में ग्राउंडफ्लोर पर मौजूद वाशरूम में खून से लथपथ मृत अवस्था में पाया गया. देखने से स्पष्ट था कि उस की हत्या की गई है. उस पर 2 बार चाकू से वार किए गए थे. अत्यधिक खून बहने से उस की मौत हो गई.

प्रारंभिक जांच में बस कंडक्टर को दोषी पाया गया मगर बाद की जांच में उसी स्कूल की 11वीं कक्षा के एक छात्र को हिरासत में लिया गया. आरोपी छात्र ने स्वीकार किया कि महज परीक्षा की तिथि और टीचर पेरैंट्स मीटिंग की तारीख आगे बढ़वाने के मकसद से उस ने, जानबूझ कर, इस घटना को अंजाम दिया.

वैसे, इस केस में स्कूल प्रशासन पर सुबूत छिपाने के इलजाम भी लगे और एक बार फिर स्कूलों में बच्चों की लचर सुरक्षा व्यवस्था की हकीकत सामने आ गई.

बच्चों की सुरक्षा पर सवाल खड़ा करता ऐसा ही मामला द्वारका, दिल्ली के एक स्कूल का है. यहां 4 साल की बच्ची के साथ यौनशोषण की घटना सामने आई. आरोप बच्ची की ही कक्षा में पढ़ने वाले 4 साल के बच्चे पर लगा. छोटी सी बच्ची से बलात्कार का एक मामला 14 नवंबर को दिल्ली के अमन विहार इलाके में भी सामने आया. यह नाबालिग बच्ची अपने मातापिता के साथ किराए के मकान में रहती थी. आरोपी युवक उसी मकान में पहली मंजिल पर रहता था.

दिल्ली के एक स्कूल में 5 साल की बच्ची के साथ स्कूल के चपरासी द्वारा बलात्कार की घटना ने भी सभी को स्तब्ध कर दिया. इन घटनाओं ने स्कूल परिसरों में बच्चों की सुरक्षा को ले कर कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं. स्कूल परिसरों में मासूम लड़कियां ही नहीं, लड़के भी यौनशोषण के शिकार हो रहे हैं.

इस संदर्भ में सभी राज्य सरकारों, स्कूल प्रशासनों और मातापिता को सतर्क होने की जरूरत है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न घट सकें.

स्कूल की जिम्मेदारियां

कोई भी मातापिता जब अपने बच्चे के लिए किसी स्कूल का चुनाव करते हैं तो स्कूल की आधारभूत संरचना और वहां की पढ़ाई के स्तर को जांचने के साथ ही उन का विश्वास भी होता है जो उन्हें किसी विशेष स्कूल को अपने बच्चे के लिए चुनने हेतु प्रेरित करता है. ऐसे में स्कूल प्रशासन की पूरी जिम्मेदारी बनती है कि वह न सिर्फ बेहतरीन शिक्षा उपलब्ध कराए, बल्कि मातापिता के विश्वास पर भी खरा उतरे.

मातापिता की जिम्मेदारियां

हर मातापिता का कर्तव्य है कि वे घरबाहर अपने बच्चों की सुरक्षा को ले कर सतर्क रहें. घर के बाद बच्चे सब से अधिक समय स्कूल में बिताते हैं. ऐसे में स्कूल परिसर में बच्चों की सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा है. द्य मातापिता को चाहिए कि जिस स्कूल में वे बच्चे को दाखिल कराने जा रहे हैं, वहां की सुरक्षा व्यवस्था की वे विस्तृत जानकारी लें.

हमेशा टीचरपेरैंट्स मीटिंग में जाएं और बच्चों की सुरक्षा से संबंधित कोई कमी नजर आए तो टीचर से उस की चर्चा जरूर करें. द्य बच्चों से स्कूल में उन के अनुभवों के बारे में खुल कर चर्चा करें. अगर अचानक बच्चा स्कूल जाने से घबराने लगे या उस के नंबर कम आने लगें तो इन संकेतों को गंभीरता से लें और इन का कारण जानने का प्रयास करें.

बच्चों को अच्छे और बुरे टच के बारे में समझाएं ताकि यदि कोई उन्हें गलत मकसद से छुए तो वे शोर मचा दें. द्य बच्चों को यह भी समझाएं कि यदि कोई बच्चा उन्हें डराधमका रहा है तो वे टीचर या मम्मीपापा को सारी बात बताएं.

बच्चों को मोबाइल और दूसरी कीमती चीजें स्कूल न ले जाने दें. द्य अगर आप के बच्चे का व्यवहार कुछ दिनों से बदलाबदला नजर आ रहा है, वह आक्रामक होने लगा है या ज्यादा चुप रहने लगा है तो इस की वजह जानने का प्रयास करें.

रोज स्कूल से आने के बाद बच्चे का बैग चैक करें. उस के होमवर्क, क्लासवर्क और ग्रेड्स पर नजर रखें. उस के दोस्तों के बारे में भी सारी जानकारी रखें. द्य छोटे बच्चे को बस में चढ़नाउतरना सिखाएं.

बसस्टौप पर कम से कम 5 मिनट पहले पहुंचें. द्य आप अपने बच्चों को सिखाएं कि किसी आपातकालीन स्थिति में किस तरह के सुरक्षात्मक कदम उठाए जा सकते हैं. हो सके तो बच्चों को सैल्फडिफैंस के गुर, जैसे मार्शल आर्ट व कराटे वगैरा सिखाएं.

मनोवैज्ञानिक पहलू तुलसी हैल्थ केयर, नई दिल्ली के मनोचिकित्सक डा. गौरव गुप्ता बताते हैं कि गुड़गांव के प्रद्युम्न केस की बात हो या 4 साल की बच्ची का यौनशोषण, इस तरह की घटनाएं बच्चों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति व गलत कामों के प्रति आकर्षण को चिह्नित करती हैं.

इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि आज लोगों के पास वक्त कम है. हर कोई भागदौड़भरी जिंदगी में व्यस्त है. संयुक्त परिवारों की प्रथा खत्म होने के कगार पर पहुंच चुकी है. नतीजा यह है कि बच्चों का लालनपालन एक मशीनी प्रक्रिया के तहत हो रहा है. परिवार वालों के साथ रह कर जीवन की वास्तविकताओं से अवगत होने और टीवी धारावाहिक व फिल्में देख कर जिंदगी को समझने में बहुत अंतर है. एकाकीपन के माहौल में पल रहे बच्चों के मन की बातों और कुंठाओं को समझना जरूरी है. मांबाप द्वारा बच्चों के आगे झूठ बोलने, बेमतलब की कलह और विवादों में फंसने, छोटीछोटी बातों पर हिंसा करने पर उतारू हो जाने जैसी बातें ऐसी घटनाओं का सबब बनती हैं क्योंकि बच्चे बड़ों से ही सीखते हैं.

स्कूल भी पीछे कहां हैं? स्कूल आज शिक्षाग्रहण करने का स्थान कम, पैसा कमाने का जरिया अधिक बन गए हैं. स्कूल का जितना नाम, उतनी ही महंगी पढ़ाई. जरूरी है कि शिक्षा प्रणाली में बाल मनोविज्ञान का खास खयाल रखा जाए. अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है. यदि हम सब आज भी अपनी आने वाली पीढ़ी के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझें और उसे सही ढंग से निभाएं तो अवश्य ही हम उन्हें बेहतर भविष्य दे सकते हैं.

साइबर बुलिंग

बुलिंग का अर्थ है तंग करना. इतना तंग करना कि पीडि़त का मानसिक संतुलन बिगड़ जाए. बुलिंग व्यक्ति को भावनात्मक और दिमागी दोनों ही तौर पर प्रभावित करती है. बुलिंग जब इंटरनैट के जरिए होती है तो इसे साइबर बुलिंग कहते हैं.

साइबर बुलिंग के कहर से भी स्कूली बच्चे सुरक्षित नहीं हैं. हाल ही में 174 बच्चों पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, 17 फीसदी बच्चे बुलिंग के शिकार हैं. स्टडी में पाया गया कि 15 फीसदी बच्चे शारीरिक तौर पर भी बुलिंग के शिकार हो रहे हैं. इस में मारपीट की धमकी प्रमुख है. लड़कियों की तुलना में लड़के इस के ज्यादा शिकार होते हैं.

अपराध के बढ़ते मामले चिंताजनक

एनसीआरबी द्वारा हाल ही में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, 2015 और 2016 के बीच बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या में 11 फीसदी बढ़ोतरी हुई है. क्राइ यानी चाइल्ड राइट्स ऐंड यू द्वारा किए गए विश्लेषण दर्शाते हैं कि पिछले एक दशक में बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध तेजी से बढ़े हैं. 2006 में 18,967 से बढ़ कर 2016 में यह संख्या 1,06,958 हो गई. राज्यों के अनुसार बात करें तो 50 फीसदी से ज्यादा अपराध केवल 5 राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में दर्ज किए गए है. उत्तर प्रदेश 15 फीसदी अपराधों के साथ इस सूची में सब से ऊपर है. वहीं महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश क्रमश: 14 और 13 फीसदी अपराधों के साथ ज्यादा पीछे नहीं हैं.

अपराध की प्रवृत्ति और कैटिगरी की बात करें तो सूची में सब से ऊपर अपहरण रहा. 2016 में दर्ज किए गए कुल अपराधों में से लगभग आधे अपराध इसी प्रवृत्ति (48.9 फीसदी) के थे. इस के बाद अगली सब से बड़ी कैटिगरी बलात्कार की रही. बच्चों के खिलाफ दर्ज किए गए 18 फीसदी से ज्यादा अपराध इस श्रेणी में दर्ज किए गए.

सोच से आगे: आखिर कौन था हत्यारा

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वारदात: बेखौफ हो रहे नौसिखिए अपराधी

उत्तर प्रदेश में 53 दिनों के अंदर 2 बड़ी आपराधिक घटनाएं हुईं, जिन में बड़े माफिया का कत्ल छोटी उम्र के नौसिखिए अपराधियों ने कर दिया. पहली घटना 15 अप्रैल, 2023 को प्रयागराज में हुई, जिस में माफिया अतीक अहमद और उस के भाई अशरफ की हत्या 3 नौसिखिए अपराधियों मोहित उर्फ सनी, लवलेश तिवारी और अरुण कुमार मौर्य ने कर दी थी.

उसी अंदाज में 7 जून, 2023 को लखनऊ सिविल कोर्ट में विजय यादव उर्फ ‘आनंद’ नामक 25 साल के एक नौजवान ने माफिया संजीव माहेश्वरी उर्फ ‘जीवा’ की हत्या कर दी. यह हत्याकांड कोर्ट के भीतर पुलिस, जज, वकील और तमाम लोगों के सामने शूट हुआ था. दोनों ही वारदात में नौजवानों का इस्तेमाल शूटर के रूप में किया गया, जो समाज के लिए खतरनाक संकेत है.

अतीक अहमद और अशरफ की हत्या करने वाले तीनों नौजवान 20 से 23 साल की उम्र के थे. इस उम्र में जब उन्हें अपनी पढ़ाई और कैरियर पर ध्यान देना चाहिए था, वे हत्या कर के शोहरत हासिल करना चाहते थे.

मोहित उर्फ सनी नामक लड़के की उम्र 23 साल थी. उस ने ही अतीक अहमद पर पहली गोली चलाई थी. हमीरपुर जिले का रहने वाला मोहित शातिर अपराधी है. उस के खिलाफ इतनी कम उम्र में 14 मुकदमे दर्ज हैं. इन में हत्या के प्रयास और लूट जैसे मुकदमे भी शामिल हैं.

दूसरा लवलेश तिवारी नामक लड़का बांदा जिले का रहने वाला है. उस की उम्र महज 22 साल है. उस के संबंध बजरंग दल से बताए गए थे. हालांकि बजरंग दल ने इस बात से इनकार किया था.

सोशल मीडिया पर लवलेश तिवारी का एक फोटो भारतीय जनता पार्टी युवा मोरचा के अध्यक्ष रह चुके पुष्कर द्विवेदी के साथ देखा गया. इसी तरह पुष्कर द्विवेदी का फोटो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भी देखा गया.

लवलेश तिवारी ने अपने फेसबुक पेज पर अपने परिचय में खुद को जिला सह सुरक्षा प्रमुख बजरंग दल के रूप में लिख रखा है. उस ने लिखा है कि ‘हम शास्त्र वाले ब्राह्मण नहीं शस्त्र ब्राह्मण हैं’.

अतीक अहमद और अशरफ की हत्या में शामिल तीसरा अपराधी अरुण कुमार मौर्य था, जिस की उम्र 18 साल थी. उस के मातापिता की मौत हो चुकी है. उस पर कासगंज में जीआरपी के एक सिपाही की हत्या करने का आरोप है.

अतीक अहमद और अशरफ की हत्या इन लोगों ने क्यों की, इस बात का खुलासा अभी तक नहीं हो पाया है. जिन हथियारों से हत्या की गई, वे महंगे हैं और इन नौजवानों की माली हालत ऐसी नहीं है कि वे उन्हें खरीद सकें, जिस से साफ होता है कि इन माफियाओं की हत्या के पीछे कोई और है.

नौजवानों के सामने जब रोजीरोजगार का संकट होगा, तो वे किसी भी तरह से अपनी जिंदगी चलाने का काम करेंगे. ऐसे में अपराध की दुनिया उन्हें लुभाती है. छोटीमोटी घटनाओं में जेल जाने वाले नौजवान अपराधी जेल में सुधरने की जगह और बिगड़ कर बाहर आते हैं. इन दोनों घटनाओं में देखें, तो ये हत्यारे छोटीछोटी बातों में जेल गए और वहां से भाड़े के शूटर बन कर निकले.

अतीक अहमद और अशरफ की हत्या पुलिस और मीडिया के सामने हुई, तो लखनऊ में 7 जून, 2023 को सिविल कोर्ट में माफिया संजीव माहेश्वरी उर्फ ‘जीवा’ की हत्या 20 साल के विजय यादव ने कर दी.

अतीक अहमद और अशरफ हत्याकांड में हत्यारे मीडिया के वेश में आए थे. ‘जीवा’ हत्याकांड में हत्यारा वकील की ड्रैस में था. इन दोनों ही हत्याकांड में सब से खतरनाक और सोचने वाली समानता यह है कि हत्या करने वालों की कोई निजी दुश्मनी नहीं थी. वे भाड़े के हत्यारे थे.

एक खास बात यह भी है कि अपराध करने वाले ये नौजवान गांव या छोटे शहरों के रहने वाले हैं. इन के अपराध में शामिल होने की सब से बड़ी वजह रोजाना बढ़ती बेरोजगारी है. दूसरी वजह यह है कि नौजवानों के मन में कट्टरपन बढ़ता जा रहा है, जिस से वे बेखौफ होते जा रहे हैं.

जौनपुर का है विजय यादव लखनऊ के कैसरबाग में बने सिविल कोर्ट में 7 जून, 2023 की दोपहर को 48 साल का संजीव माहेश्वरी उर्फ ‘जीवा’ पेशी पर आया था. 3 बज कर 55 मिनट पर कुछ पुलिस वाले उसे ले कर पहुंचे थे. हत्या के एक मामले में उस की कोर्ट में सुनवाई होनी थी.

संजीव ‘जीवा’ एक कुरसी पर बैठा था. आसपास कई पुलिस वाले और वकील घूम रहे थे. तभी वकीलों की तरह काला कोट पहने एक नौजवान विजय यादव वहां आया और उस ने धड़ाधड़ गोलियां चलानी शुरू कर दीं. संजीव को 6 गोलियां लगीं. चारों तरफ अफरातफरी मच गई.

जैसे ही विजय की पिस्टल की गोलियां खत्म हुईं, वकीलों ने उसे पकड़ कर पीटना शुरू कर दिया. थोड़ी ही देर में पुलिस ने वहां आ कर विजय को धर लिया.

लखनऊ कोर्ट में माफिया संजीव माहेश्वरी उर्फ ‘जीवा’ की हत्या करने वाला विजय यादव उर्फ आनंद 25 साल का नौजवान है. वह जौनपुर जिले के केराकत कसबे के सुलतानपुर गांव का रहने वाला है. उस के हावभाव देख कर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था कि वह कितने खतरनाक इरादे वाला है.

विजय ने मैग्नम अल्फा .357 बोर पिस्टल से संजीव ‘जीवा’ को निशाने पर ले कर 6 राउंड फायरिंग की थी. उस का सीधा निशाना ‘जीवा’ पर था.

विजय यादव के घर का नाम आनंद है. इस के पिता का नाम श्याम यादव है. आनंद के 3 भाई स्वतंत्र, सत्यम और सुंदरम हैं. पिता श्याम यादव मिठाई की दुकान चलाते हैं.

विजय यादव उर्फ आनंद मार्च में गांव आया था. तब उस ने अपने घर वालों से कहा था कि मुंबई में पैसा कम मिल रहा है, इसलिए वह काम की तलाश में लखनऊ जा रहा है. 22 मार्च को वह लखनऊ आ गया. उस ने घर वालों को यह बताया था कि पानी के पाइप बनाने वाली एक कंपनी में वह काम कर रहा है.

विजय यादव उर्फ आनंद की शुरुआती पढ़ाई गांव में ही हुई. इस के बाद उस ने 9वीं से इंटर तक की पढ़ाई एक पब्लिक इंटर कालेज से की. साल 2016 में विजय ने मोहम्मद हसन डिगरी कालेज से बीए किया. इस के बाद से वह नौकरी तलाश रहा था.

10 जुलाई, 2016 को आजमगढ़ की एक लड़की अपने घर से भाग गई थी. आजमगढ़ पुलिस ने विजय पर लड़की भगाने का आरोप लगाया. उन दिनों वह मुंबई में था. पुलिस ने उसे वहां से पकड़ा, फिर आजमगढ़ जेल ले गई.

6 महीने बाद विजय की जमानत हो गई. पुलिस ने लड़की को किसी दूसरे लड़के के साथ बरामद कर लिया था. इस के बाद विजय उर्फ आनंद मुंबई में काम करने चला गया. वह तारीख पड़ने पर आता था.

मार्च, 2023 में यह केस खत्म हो गया था. लड़की के घर वालों ने सुलहनामा कर लिया था. केस खत्म होने के बाद विजय उर्फ आनंद ने मुंबई न जाने के बजाय घर के पास ही नौकरी तलाश करने की बात कही और फिर लखनऊ चला गया.

आजमगढ़ जेल में विजय यादव का अपराधियों से संपर्क हुआ. जिस जेल में वह बंद था, वहां पूर्वांचल के कई कुख्यात अपराधी बंद हैं. इन में बृजेश सिंह और मुख्तार अंसारी के कई गुरगे शामिल हैं.

जिस तरह से विजय यादव ने संजीव ‘जीवा’ की हत्या की, उस से साफ है कि किसी के कहने पर उस ने इस घटना को अंजाम दिया है.

कौन था संजीव माहेश्वरी ‘जीवा’

संजीव ‘जीवा’ मुख्तार अंसारी का खास शूटर था. भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी और कृष्णानंद राय की हत्या में यह भी अभियुक्त था.

संजीव माहेश्वरी उर्फ संजीव ‘जीवा’ मूल रूप से शामली जिले का रहने वाला था. शुरुआती दिनों में वह एक दवाखाना संचालक के यहां कंपाउंडर की नौकरी करता था. इसी नौकरी के दौरान संजीव ‘जीवा’ ने अपने मालिक यानी दवाखाना संचालक को ही अगवा कर लिया था.

इस घटना के बाद संजीव ‘जीवा’ ने साल 1991 में कोलकाता के एक कारोबारी के बेटे का भी अपहरण किया और 2 करोड़ रुपए की फिरौती मांगी थी. उस समय किसी से 2 करोड़ रुपए की फिरौती की मांग होना भी अपनेआप में बहुत बड़ी होती थी.

इस के बाद संजीव ‘जीवा’ हरिद्वार की नाजिम गैंग में घुसा और फिर सतेंद्र बरनाला के साथ जुड़ा. वह जल्द से जल्द अपना खुद का गिरोह बनाना चाहता था.

10 फरवरी, 1997 को हुई भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या में संजीव ‘जीवा’ का नाम आया. इस में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई. थोड़े दिनों बाद संजीव ‘जीवा’ पूर्वांचल के माफिया मुन्ना बजरंगी गैंग में शामिल हो गया. यहीं से वह मुख्तार अंसारी के संपर्क में आया.

मुख्तार अंसारी को नए हथियारों का शौक था, तो संजीव ‘जीवा’ के पास ऐसे हथियारों को जुटाने का नैटवर्क था. साल 2005 में संजीव ‘जीवा’ का नाम कृष्णानंद राय हत्याकांड में भी आया. वहां गवाह न होने के चलते मुकदमा खत्म हो गया था.

संजीव माहेश्वरी उर्फ ‘जीवा’ पर 2 दर्जन से ज्यादा मुकदमे दर्ज थे. इन में से 17 मामलों में वह बरी हो चुका था, जबकि उस के गैंग में 35 से भी ज्यादा सदस्य हैं.

संजीव ‘जीवा’ जेल से भी गैंग औपरेट करता था. उस पर साल 2017 में कारोबारी अमित दीक्षित उर्फ गोल्डी हत्याकांड में भी आरोप लगे थे. इस में जांच के बाद अदालत ने ‘जीवा’ समेत

4 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. ‘जीवा’ लखनऊ की जेल में बंद था और वहीं से पेशी पर सुनवाई के लिए 7 जून, 2023 को सिविल कोर्ट पुलिस की सुरक्षा में गया था.

साल 2021 में संजीव ‘जीवा’ की पत्नी पायल ने चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिख कर कहा था कि ‘जीवा’ की जान को खतरा है. पायल साल 2017 में रालोद के टिकट पर विधानसभा चुनाव भी लड़ चुकी हैं, पर वे हार गई थीं.

संजीव ‘जीवा’ माफिया की लिस्ट में 15वें नंबर पर था. पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ले कर उत्तराखंड तक ‘जीवा’ का खौफ था. उस पर उत्तराखंड में 5, गाजीपुर, फर्रुखाबाद और लखनऊ में 1-1 केस मिला कर कुल 25 मामले दर्ज थे.

संजीव ‘जीवा’ पिछले 2 दशक से सलाखों के पीछे था. 10 जून, 2019 को उसे मैनपुरी से लखनऊ जेल में शिफ्ट किया गया था, तब से ही वह लखनऊ जेल में बंद था. उस को हाई सिक्योरिटी बैरक में रखा गया था, जहां सीसीटीवी कैमरों से लगातार निगरानी होती थी.

सरकार पर उठ रहे सवाल

आजाद अधिकार सेना चलाने वाले और पुलिस अफसर रह चुके अमिताभ ठाकुर ने घटनास्थल का दौरा करने के बाद कहा कि ‘इस घटना में कुछ बड़े लोग शामिल हो सकते हैं. यह राज्यपोषित अपराध है. पुलिस संरक्षण

में यह हुआ है, इसलिए संजीव ‘जीवा’ और अतीक अहमद मसले की जांच सीबीआई द्वारा कराई जाए, तभी इन का सच बाहर आ सकेगा.’

उत्तर प्रदेश पुलिस दावा कर रही है कि बुलडोजर के डर से अपराधी या तो जेल में बंद हैं या फरार हैं और वे कहीं और रहने लगे हैं. पर जिस तरह से बेखौफ अंदाज में यह घटना सिविल कोर्ट के अंदर घटी, उस से कानून व्यवस्था पर सवाल उठ गए हैं.

उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए यह शर्मनाक बात है कि 53 दिनों के अंदर पुलिस सुरक्षा में 3 अपराधियों को मार दिया जाता है. पुलिस यह नहीं बता पा रही है कि वे कौन बड़े अपराधी हैं, जो नौजवानों को शूटर के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं.

नौजवानों का इस तरह गलत इस्तेमाल समाज के हित में नहीं है. उत्तर प्रदेश की जिस कड़ी कानून व्यवस्था का ढोल पूरे देश में जोरशोर से पीटा जा रहा है, उस की पोल इन घटनाओं ने खोल कर रख दी है.

अश्लीलता पर प्रतिबंध के बहाने

अश्लीलता परोसने वाली लगभग 850 पोर्न वैबसाइट्स पर प्रतिबंध लगाया गया है. हजारों वैबसाइट्स में से सिर्फ 850 ही क्यों चुनी गईं? इन्हें चुनने का क्या पैमाना है? इस के पीछे सरकार की क्या मंशा है? यदि इन सभी सवालों के जवाब तलाशने की जगह क्या हम यह मान कर निश्चिंत हो सकते हैं कि पोर्नोग्राफी पर नियंत्रण से समाज में स्वस्थ मानसिकता फलीभूत होगी. फलस्वरूप क्राइम रेट घटेगा. यह कोई गारंटी नहीं है क्योंकि यौन अपराध तो साइबर क्रांति से पहले भी हो रहे थे. हां, इस बहाने सरकार को अपना छिपा एजेंडा लागू करने का मौका मिल रहा है और विरोधियों पर नियंत्रण करने का भी. कुछ लोगों का सही मानना है कि यह पाबंदी उन के अधिकारों का हनन है.

यह ठीक है कि यौन शोषण को रोकने के लिए सरकार को कड़े कानून बनाने चाहिए. नियमों के साथ उस के पालन पर भी पैनी नजर सरकार की होनी चाहिए. अगर इस ओर सख्ती नहीं बरती गई तो मासूम बच्चों को जिस्मफरोशी से ले कर पोर्नोग्राफी जैसे गंदे व्यवसाय में धकेला जा सकता है.

बेबुनियाद तर्क

मोबाइल पर पोर्न  देखने के मामले पर भारत चौथे स्थान पर है. कुछ ही दिनों में इंटरनैट के सब से अधिक उपभोक्ता भारत में होंगे. ऐसे में यह कहना कि पोर्न पर नियत्रंण की यह पहल समाज से हिंसा, रेप, शोषण, वेश्यावृत्ति आदि के नामोनिशान मिटाने में कारगर होगी, बेबुनियाद है.

इस प्रतिबंध से कुछ हासिल नहीं होगा. समाज में हिंसा, रेप, शोषण, वेश्यावृत्ति आदि घिनौनी हरकतों का अस्तित्व रहेगा. इंसान को जिस चीज के लिए रोका जाता है वह उसी के पीछे दौड़ता है. यह इंसान की फितरत है.

चीनी सरकार अपने नागरिकों पर नकेल कसने के लिए अनापशनाप पैसा खर्च करती है. वहां इस के लिए कई लोग नियुक्त किए गए हैं. और तो और इंटरनैट सरकारी नियंत्रण में है. फिर भी उसे आंशिक कामयाबी मिलती है. ऐसे में भारत की नीतियां व संसाधन मजबूत नहीं हैं.

चीन के मुकाबले भारत की नीतियां कमजोर हैं. हमारे यहां जिस गति से नियमकानून बनते हैं उसी गति से उन का उल्लंघन भी होता है. नियमों का पालन सख्ती से नहीं किया जाता. आपराधिक मामले लंबे अरसे तक कोट में चलते रहते हैं.

पोर्नोग्राफी मानसिक प्रदूषण फैला रहा है, जिस का सीधा प्रभाव मनुष्य के मस्तिष्क पर पड़ता है. यह नकारात्मक प्रभाव उस के व्यक्तित्व में इस कदर शुमार हो जाती है कि अमानवीय विकारों से समाज प्रदूषित होने में देर नहीं लगती.

सामाजिक स्तर पर पोर्नोग्राफी स्वस्थ समाज वाले संस्कारों जैसे नैतिकता शिष्टाचार आदि को नष्ट कर देती है. पोर्न  वैबसाइट्स पर प्रतिबंध तभी समाज में गहरी छाप छोड़ेगा जब प्रतिबंध के उल्लंघन को अपराध माना जाए.

इंटरनैट से पोर्न  वैबसाइट्स पर रोक के लिए सख्ती बहुत जरूरी है. हमारे यहां नियम बनते हैं. कुछ दिनों तक उस उस का बिगुल दुनिया भर में बजता है. फिर नियम किताबों में कैद हो जाते हैं. ऐसे में नियमों से समाज का कल्याण असंभव है.

माना हमारा संविधान भारतीय नागरिकों को इच्छानुसार जीने का अधिकार देता है, ऐसे में इस के खिलाफ आवाज उठाना गलत है. अगर कोई वयस्क चारदीवारी में पोर्न  देखता है और इस से समाज को कोई नुकसान नहीं. ऐसे में पोर्न वैबसाइट्स पर प्रतिबंध व्यक्ति का हनन है.

वहीं दूसरी ओर पोर्न वैबसाइट्स समाज के सामने हो तो वह सरासर गलत है. सरकार ने प्रतिबंध तो लगा दिया लेकिन इस के लिए सख्ती नहीं बरती तो ऐसे नियमों का कोई फायदा नहीं है. रोक लगाने के बाद भी इस की उपलब्धता को नष्ट करना होगा अन्यथा मानसिक रूप से विकृत इंसान के लिए सोशल मीडिया पर पोर्न  परोसा जा रहा है.

पैसों के लालच में दोस्ती का कत्ल

5 जून की रात के 10 बजने को थे. ग्वालियर के कंपू थाना इलाके के टोटा की बजरिया में रहने वाले जिला विशेष शाखा के आरक्षक समीर ढींगरा ने अपने पड़ोसी मनोज श्रीवास्तव के बेटे संजू की बाइक अपने घर के सामने खड़ी देखी तो वह बुदबुदाने लगे, ‘सारी जगह छोड़ कर इस लड़के को सिर्फ मेरे ही दरवाजे पर बाइक खड़ी करने को जगह मिलती है.’

बाइक को हटवाने के लिए पहले उन्होंने संजू को आवाज दी, लेकिन जब उस ने कोई रिस्पौंस नहीं दिया तो उन्होंने संजू के मोबाइल पर फोन किया. स्क्रीन पर समीर अंकल का नंबर देख संजू समझ गया कि उन्हें सड़क किनारे खड़ी अपनी स्कौर्पियो घर के भीतर रखनी होगी, इसीलिए बाहर खड़ी बाइक को हटाने के लिए फोन किया है.

समीर को हालांकि पुलिस की नौकरी में 20 साल हो गए थे, लेकिन पुलिस महकमे में आरक्षक को इतनी पगार नहीं मिलती कि वह स्कौर्पियो जैसी लग्जरी कार खरीद सके. लेकिन समीर की बात और थी, उस की महत्त्वाकांक्षाएं ऊंची थीं. उस का अपना शानदार मकान था, साथ ही 2 लग्जरी कारें भी.

दरअसल, समीर के आर्थिक दृष्टि से मजबूत होने की वजह यह थी कि वह पिछले कई सालों से प्रौपर्टी के कारोबार में जुड़ा था. इस कारोबार में उस ने अपने साझेदारों के साथ मिल कर करोड़ों रुपए कमाए थे. बस दुख की बात यह थी कि उस ने दौलत तो खूब कमाई थी, लेकिन उसे पारिवारिक सुख नहीं मिला था.

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पिता के निधन के बाद तमाम कठिनाइयों से जूझते हुए समीर को पुलिस महकमे में आरक्षक की नौकरी मिल गई थी. इस के साथ ही उस ने साझेदारी में प्रौपर्टी का कारोबार भी कर लिया था.

इसी बीच उस के बहनोई का सड़क हादसे में निधन हो गया था. पति की मौत के बाद उस की बहन गीता आहूजा और भांजी को अकेलेपन का बोझ न सहना पड़े, इसलिए समीर बहन और भांजी को अपने साथ ले आया था और उन दोनों को अपने साथ घर में ही रख लिया था. भांजी पढ़लिख कर कुछ बन जाए, इसलिए उस ने उस का दाखिला बनारस के एक अच्छे स्कूल में करवा दिया था.

समीर के बारे में अच्छी बात यह थी कि वह सभी से सौहार्दपूर्ण संबंध रखता था, साथ ही दूसरों की मदद के लिए भी तैयार रहता था. धार्मिक मामलों में भी उस की काफी रुचि थी. वह ऐसे किसी भी आयोजन के लिए पैसे देता रहता था.

5 साल पहले समीर की दोनों किडनी खराब हो चुकी थी. डाक्टरों ने उसे इस बात के संकेत दे दिए थे कि उस का जीवन ज्यादा लंबा चलने वाला नहीं है. यह जान कर उसे तगड़ा झटका लगा था. उसे यह चिंता सताने लगी थी कि दुनिया से जाने के बाद उस की मां, बहन और भांजी का क्या होगा. समीर को इस बात का कतई आभास नहीं था कि इस से पहले ही कोई उस की जान लेने के लिए तैयार बैठा है.

बहरहाल, समीर अंकल का फोन आने पर संजू अपनी बाइक हटाने के लिए जैसे ही घर के बाहर आया, वह यह देख कर हक्काबक्का रह गया कि समीर पर 2 युवक गोलियां चला रहे हैं. गोली चलने की आवाज सुन कर आसपास के लोग भी घर से बाहर निकल आए.

लोगों ने देखा कि समीर खून से लथपथ सड़क पर पड़ा छटपटा रहा है. जब तक पड़ोसी कुछ समझ पाते, तब तक हमलावर अंधेरे का लाभ उठा कर सफेद रंग की गाड़ी से भाग खड़े हुए थे.  पड़ोस में रहने वाले लोगों ने फोन कर के इस घटना की सूचना कंपू थाने को दे दी.

संयोग से थानाप्रभारी महेश शर्मा थाने में ही मौजूद थे. उन्होंने मामला दर्ज करवा कर इस की सूचना एसपी डा. आशीष, एएसपी अभिषेक तिवारी और सीएसपी शैलेंद्र जादौन को दे दी. इस के साथ ही वह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. थोड़ी देर बाद एसपी डा. आशीष, एएसपी अभिषेक तिवारी और सीएसपी शैलेंद्र जादौन भी वहां आ गए.

फोरैंसिक टीम को भी मौकाएवारदात पर बुला लिया गया था. समीर को 315 बोर के कट्टे से काफी नजदीक से गोली मारी गई थी. समीर की मां और बहन भी घर से बाहर आ गई थीं और बिलखबिलख कर रो रही थीं.

इस बीच डा. आशीष ने समीर की मां को पहचान लिया. उन्हें याद आया कि 1 जून को जब वह अपने औफिस में बैठे थे, तब यह वृद्ध महिला उन के पास शिकायत ले कर आई थी, जिस में लिखा था कि उस के बेटे के साझीदार बेईमानी पर उतर आए हैं. उन्होंने उस का काफी पैसा हड़प लिया है. इस मामले में एसपी ने उचित काररवाई की थी.

घटनास्थल से सारे साक्ष्य एकत्र करने के बाद पुलिस ने समीर की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. सीएसपी श्री जादौन और टीआई श्री शर्मा ने समीर के पड़ोस में रहने वालों से पूछताछ की तो पता चला कि उस की दोनों किडनी खराब हो चुकी थीं. डाक्टरों ने उसे बता दिया था कि इस स्थिति में वह ज्यादा दिन जीवित नहीं रह पाएगा. तभी से वह काफी मायूस रहने लगा था.

पुलिस के लिए हैरानी की बात यह थी कि जब समीर की जिंदगी चंद दिनों की बची थी तो फिर ऐसी कौन सी वजह थी कि उस की हत्या कर दी गई. पूछताछ में पुलिस को पता चला कि हत्यारे ने समीर को काफी करीब से गोली मारी थी. इस से यह बात साफ हो गई कि समीर की हत्या रेकी करने के बाद किराए के बदमाशों से कराई गई थी.

छानबीन में पुलिस को पता चला कि समीर पुलिस की नौकरी के साथ प्रौपर्टी का कारोबार भी करता था. उस ने अपनी मां गंगादेवी के नाम से गंगादेवी बिल्डर प्राइवेट लिमिटेड नाम से फर्म बना रखी थी. इस फर्म में उस की मां गंगादेवी, बहन गीता आहूआ और परिवार के एक सदस्य पंकज गुगनानी 51 प्रतिशत के साझेदार थे. शेष में उस के जिगरी दोस्त महेश जाट की पत्नी सुनीता जाट, पिता प्रीतम जाट और मोहम्मद फारुख सहित कुछ अन्य लोग साझेदार थे.

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पुलिस ने हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए समीर के आधा दरजन साझेदारों से गहन पूछताछ की. लेकिन हत्या की हकीकत सामने नहीं आई. क्राइम ब्रांच में तैनात कांस्टेबल महेश जाट समीर का खास दोस्त था. जब उस के बारे में समीर की मां से पूछा गया तो उन्होंने दो टूक कहा कि महेश ऐसा काम नहीं कर सकता.

पुलिस इस हत्या की गुत्थी सुलझाने में लग गई. उस ने कई बिंदुओं पर गौर किया और गंगादेवी के इनकार करने के बावजूद टीआई महेश शर्मा ने महेश जाट को थाने बुला कर सीधे सवाल किया कि फुटेज में जो जीप दिख रही है, वह किस की है? महेश ने देख कर बताया, ‘‘यह तो दीपक जाट के भाई जगमोहन किरार की है.’’

इसी क्लू से तेजतर्रार थानाप्रभारी ने सारा मामला सुलझा लिया. सुपारी किलिंग कराने वाले महेश जाट ने ही 2 लाख रुपए में समीर को ठिकाने लगाने की सुपारी दी थी. इस में बोनस औफर यह था कि जिस की गोली समीर को लगेगी, उसे पैसे के साथ एक बुलेट मोटरसाइकिल भी तोहफे में दी जाएगी. पुलिस को पूछताछ में यह भी पता चला कि समीर की हत्या करने के बाद घटनास्थल से भागते सतवीर उर्फ जग्गू किरार ने महेश जाट को फोन कर के कहा था, ‘‘मामा काम हो गया.’’

इसी वजह से पुलिस का ध्यान समीर के सब से करीबी लोगों पर जा रहा था. पुलिस ने समीर के साझेदारों को बुला कर उन से फिर पूछताछ की. लेकिन कुछ खास पता नहीं चला तो सभी को घर भेज दिया गया. 10 जून की रात में क्राइम ब्रांच की टीम ने बिरलानगर से बेताल किरार, सतवीर किरार और शिवम जाट को उठा लिया.

इन तीनों को हिरासत में ले कर जब सख्ती से पूछताछ की गई तो तीनों टूट गए. उन्होंने मान लिया कि समीर ढींगरा की हत्या का मास्टरमाइंड समीर का जिगरी दोस्त महेश जाट है. उस ने ही गैंगस्टर हरेंद्र राणा के साथी दीपक जाट के भाई सतवीर को सुपारी दी थी. इस अहम जानकारी के बाद पुलिस ने महेश जाट को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में समीर ढींगरा की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

महेश और समीर ढींगरा एक ही महकमे में कार्यरत होने की वजह से पिछले 22 सालों से जिगरी दोस्त थे और दोनों मिल कर पिछले 10 सालों से प्रौपर्टी खरीदने और बेचने का काम कर रहे थे. इन दोनों ने अशोक गोयल की 42 बीघा जमीन खरीद कर उस में 300 प्लौट काट कर बेचे थे. इस कारोबार में महेश का शातिर दिमाग और समीर का पैसा चल रहा था. महेश ने वहां बड़ेबड़े 20 प्लौट बेच दिए थे. लेकिन उस ने समीर के हिस्से का पैसा नहीं दिया था. अलबत्ता उस ने डेढ़ करोड़ में से कुछ रकम अशोक गोयल को जरूर दे दी थी.

इस जमीन में पौवर औफ अटार्नी में समीर की मां गंगादेवी के हस्ताक्षर थे. जिस की वजह से उन की मरजी से ही रजिस्ट्री हो सकती थी. दरअसल, जब समीर को लगा कि महेश की नीयत में खोट आ गया है तो उस ने उस जमीन की बिक्री के लिए ऐसी व्यवस्था करा दी थी कि उस की मां के बगैर जमीन की बिक्री न हो सके. इसी वजह से महेश उन प्लौटों की रजिस्ट्री उन के नाम नहीं करवा पा रहा था, जिन से उस ने एडवांस लिया था. एडवांस देने वाली पार्टी उस पर रजिस्ट्री के लिए दबाव बना रही थी.

दूसरी ओर अशोक गोयल भी समीर के व्यवहार और लेनदेन से काफी खुश थे, इसलिए वह उस के पक्ष में ही बोलते थे. मां के नाम से पंजीकृत फर्म का 12 करोड़ रुपए का चैक समीर अशोक गोयल को दे चुका था, लेकिन समीर के साझेदार महेश ने अपने हिस्से में 2 करोड़ की हेराफेरी कर दी थी. इस बात को ले कर दोनों जिगरी दोस्तों में जम कर तकरार हुई. यहां तक कि दोनों ने एकदूसरे को कानूनी नोटिस तक दे दिए थे.

महेश जाट ने बिना समीर को बताए सिटी सैंटर में 85 लाख रुपए की एक आलीशान कोठी खरीद ली थी. महेश की इस हरकत से समीर के दिल में महेश के लिए प्यार कम और नफरत ज्यादा हो गई. इसी के चलते महेश ने टेकनपुर प्रौपर्टी में पार्टनर जगमोहन किरार उर्फ जग्गू को प्रलोभन दिया कि जिस प्लौट का उस ने उसे एडवांस दिया है, उस की रजिस्ट्री मुफ्त में कर देगा लेकिन इस के एवज में उस के साझीदार समीर ढींगरा को निपटाना होगा.

जगमोहन की बहन बिरलानगर में रहती थी. आरोपी बेताल किरार भी वहीं पास में रहता था. जगमोहन ने बेताल से कहा कि कट्टे से अचूक गोली मारने वाले लड़के ढूंढो. बेताल ने शुभम जाट और सतबीर जाट को तलाश कर के सुपारी के रूप में 1-1 लाख तय किए.

जगमोहन ने पूछताछ में बताया कि महेश पिछले एक पखवाड़े से समीर को निपटाने की जुगत में लगा था. कुछ दिनों पहले भी उस ने रेलवे स्टेशन के नजदीक समीर को ठिकाने लगाने की योजना बनाई थी. लेकिन संयोग से समीर बच निकला था. समीर की हत्या के बाद पुलिस को 2 बदमाशों को भागते देखने की बात बताने वाले संजू श्रीवास्तव के पिता मनोज श्रीवास्तव ने समीर की रेकी की थी और सतबीर को फोन कर के बता दिया था कि वह अपनी स्कौर्पियो उठाने आ गया है.

मनोज के फोन के बाद ही सतबीर और शुभम समीर को गोली मारने पहुंचे. वहां पहुंच कर गोली सतबीर ने चलाई. समीर को मौत के घाट उतारने के बाद वे जगमोहन की बोलेरो में बैठ कर वहां से फरार हो गए. पुलिस पड़ताल में यह भी पता चला कि जिस वक्त सतबीर और शुभम समीर ढींगरा को जान से मारने गए, उस वक्त महेश जाट घटनास्थल के करीब ही मौजूद था और सारे घटनाक्रम पर नजर रख रहा था.

समीर ढींगरा को मौत के घाट उतारने के बाद जगमोहन उर्फ जग्गू किरार अलीगढ़ भाग गया था. वहां जा कर उस ने बड़े ही सुनियोजित ढंग से खुद को अवैध कट्टा और कारतूस रखने के जुर्म में गिरफ्तार करवा दिया था. पुलिस उसे जेल भेज चुकी थी. उस की मंशा थी कि किसी भी तरह पुलिस उस तक न पहुंच पाए.

महेश जाट कितना बड़ा मास्टरमाइंड था, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि समीर की हत्या सतबीर जाट और शुभम जाट के हाथों करवाने के बाद वह मृतक की मां गंगादेवी और बड़ी बहन को दिलासा देने उन के घर पहुंच गया, क्योंकि उसे लगता था कि इस मामले में उस का नाम नहीं आएगा. वह एक हफ्ते तक बेखटके समीर के घर आताजाता रहा. लेकिन उसे यह मालूम नहीं था कि अपराध चाहे कितनी भी चालाकी से क्यों न किया गया हो, एक न एक दिन उस का राज खुल ही जाता है.

कथा लिखे जाने तक समीर ढींगरा की हत्या के आरोप में पुलिस ने महेश जाट सहित सतबीर, शुभम जाट, बेताल किरार, मनोज श्रीवास्तव और जगमोहन किरार को गिरफ्तार कर के मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया था, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया था.

बहरहाल, समीर नहीं रहा. उस के न रहने से जहां उस की बूढ़ी मां गंगादेवी की दुनिया उजड़ गई, वहीं विधवा बहन गीता आहूजा का सहारा भी छिन गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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