Satyakatha- सुहागन की साजिश: सिंदूर की आड़ में इश्क की उड़ान- भाग 3

सौजन्य: सत्यकथा

दोनों के दिल एकदूसरे के लिए धड़के तो नजदीकियां खुदबखुद बन गईं. इस के बाद दीपक शिवगोविंद की गैरमौजूदगी में रीता से मिलने आने लगा. रीता को उस का आना और उस के साथ लच्छेदार बातें करना अच्छा लगता था. जल्द ही वे एकदूसरे से खुल गए और हंसीमजाक होने लगा.

एक रोज दोपहर में दीपक आया. रीता ने उकसाया तो उस दिन दोनों के बीच की हर दीवार टूट गई और अवैध संबंधों का रिश्ता बन गया.

पति का दोस्त बन गया मीत

उस दिन के बाद रीता और दीपक अकसर देहसुख प्राप्त करने लगे. दीपक ऐसे समय आता, जब शिवगोविंद घर पर नहीं होता. सूने घर में दोनों खूब रंगरलियां मनाते. कभीकभी तो रीता स्वयं ही फोन कर लल्ला को बुला लेती. फिर दो शरीर एक हो जाते.

लेकिन ऐसे संबंध छिपाए नहीं छिपते. धीरेधीरे गांव में रीता और दीपक के संबंधों की चर्चा होने लगी.

रीता के पति शिवगोविंद यादव को जब रीता और दीपक के संबंधों के बारे में पता चला तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस ने इस बारे में पत्नी व दोस्त से बात की तो दोनों ने साफ कह दिया कि ऐसी कोई बात नहीं है.

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लेकिन एक रोज जब उस ने अचानक दोनों को हंसीठिठोली करते देख लिया, तो उस ने रीता की पिटाई की तथा दीपक उर्फ लल्ला को भी फटकारा. पर उन दोनों पर इस का कोई असर नहीं हुआ. दोनों पहले की तरह मौजमस्ती करते रहे.

इस के बाद तो यह रवैया ही बन गया. जिस दिन शिवगोविंद को पता चलता कि दीपक उर्फ लल्ला उस के घर आया था, उस दिन वह रीता से मारपीट करता.

शिवगोविंद का परिवार और गांव वाले इस बात को जान गए थे कि दोनों के बीच तनाव रीता और दीपक के नाजायज रिश्तों को ले कर है.

पत्नी की बेवफाई से तंग आ कर एक दिन शिवगोविंद अपनी भाभी ममता के सामने फूटफूट कर रोने लगा, ‘‘भाभी, कल जिस औरत की मांग में सिंदूर सजा कर मैं ने विधवा होने का कलंक मिटाया तथा समाज में सम्मान दिलाया, आज उस औरत ने समाज में मेरा सिर नीचा कर दिया. जी करता है कि या तो उस नागिन का फन कुचल दूं या फिर खुद जान दे दूं.’’

ममता ने शिवगोविंद को समझाया कि वह सब्र से काम ले. वह रीता को समझाएगी, उसे सही रास्ते पर लाने का प्रयास करेगी. लेकिन ऐसा हो न सका. ममता व उस के पति बालगोविंद ने रीता को समझाया, मानमर्यादा में रहने का पाठ पढ़ाया. लेकिन रीता पर कोई असर नहीं पड़ा.

5 जून, 2021 की शाम शिवगोविंद का दोस्त सतीश उस के घर आया. चायपानी के दौरान दोनों में गपशप होने लगी. सतीश ने रीता की तारीफ की तो शिवगोविंद ने मन की भड़ास निकालनी शुरू कर दी.

सतीश के सामने उस ने रीता की पोल खोल कर रख दी. उस ने कुछ ऐसी भी बातें कह दीं, जो रीता के दिल को चुभ गईं.

पति बना इश्क में रोड़ा

पति की बात दिल में चुभी तो रीता ने पति को मिटाने का निश्चय कर लिया. उस ने प्रेमी दीपक उर्फ लल्ला को घर बुला लिया और घडि़याली आंसू बहाते हुए बोली, ‘‘तुम्हारी वजह से मेरा पति मुझे मारतापीटता है, दूसरों के सामने जलील करता है और तुम दुम दबा कर भाग जाते हो. आखिर तुम कुछ करते क्यों नहीं?’’

‘‘घर का मामला है भाभी, मैं कर ही क्या सकता हूं?’’ दीपक ने मजबूरी जाहिर की.

‘‘विरोध तो कर सकते हो, मुझ पर उठने वाला उस का हाथ मरोड़ तो सकते हो. फिर भी न माने तो…’’ रीता बोली.

‘‘तो क्या भाभी..?’’ दीपक ने आश्चर्य से पूछा.

रीता गुस्से में बोली, ‘‘उस का गला घोट दो, मार डालो उसे, ताकि मैं चैन से रह सकूं.’’

‘‘ठीक है जैसा तुम चाहती हो वैसा ही होगा.’’ इस के बाद रीता और दीपक ने मिल कर शिवगोविंद की हत्या की योजना बनाई. इस योजना में दीपक ने अपने दोस्त अमन व निखिल को भी पैसों का लालच दे कर शामिल कर लिया.

योजना के तहत दीपक उर्फ लल्ला ने 6 जून, 2021 की शाम 5 बजे अमन व निखिल को साबड़ व फावड़े के साथ नोन नदी किनारे खेत पर भेज दिया. फिर वह शिवगोविंद के घर पहुंचा. शिवगोविंद घर पर ही था.

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दीपक ने शिवगोविंद से कहा, ‘‘शौचालय पाटने के लिए लकड़ी चाहिए हो तो मेरे साथ खेत पर चलो. वहां यूकेलिप्टस की लकड़ी दिलवा दूंगा. कीमत भी नहीं चुकानी पड़ेगी.’’

शिवगोविंद ने अंधेरा घिर आने का बहाना बनाया. लेकिन रीता ने उस की बात खारिज कर दी और जबरदस्ती दीपक के साथ भेज दिया. शिवगोविंद नोन नदी के किनारे खेत पर पहुंचा तो वहां अमन और निखिल भी मौजूद थे. उन सब में आपस में बातें होने लगीं.

बातचीत के बीच में ही अमन और निखिल ने शिवगोविंद को दबोच लिया और दीपक ने साबड़ का प्रहार शिवगोविंद के सिर पर कर दिया. साबड़ के प्रहार से शिवगोविंद का सिर फट गया. इस के बाद अमन व निखिल ने फावड़े से प्रहार कर शिवगोविंद को मौत के घाट उतार दिया.

हत्या करने के बाद अमन, निखिल व दीपक शव को उठा कर नदी के किनारे लाए. नोन नदी सूखी थी. वहां तीनों ने मिल कर फावड़े से गहरा गड्ढा खोदा और शिवगोविंद की लाश गड्ढे में दफन कर दी. उन्होंने आलाकत्ल फावड़ा व साबड़ झाडि़यों में छिपा दिए. फिर वापस अपने अपने घर आ गए.

दीपक ने रीता को फोन कर के बता दिया कि उस के सुहाग को मिटा दिया गया है और शव को नोन नदी में दफना दिया है.

इधर जब कई दिनों से शिवगोविंद दिखाई नहीं दिया, तो ममता ने रीता से सवालजवाब किया. शक होने पर उस ने सारी बात पति बालगोविंद को बताई. बालगोविंद ने तब थाना अकबरपुर में भाई की गुमशुदगी दर्ज कराई और शक उस की पत्नी रीता पर किया.

शक होने पर थानाप्रभारी तुलसीराम पांडेय ने रीता को गिरफ्तार किया. उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो शिवगोविंद की हत्या का परदाफाश हो गया और कातिल पकड़े गए.

13 जून, 2021 को थाना अकबरपुर पुलिस ने आरोपी दीपक उर्फ लल्ला, अमन तथा रीता को कानपुर देहात की माती अदालत में पेश किया, जहां से उन को जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक निखिल फरार था. पुलिस उसे गिरफ्तार करने का प्रयास कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सहयोगी : जय कुमार मिश्र

Manohar Kahaniya- किडनैपिंग: चंबल से ऐसे छूटा अपहृत डॉक्टर- भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

आगरा के ट्रांसयमुना कालोनी के रहने वाले सीनियर डाक्टर उमाकांत गुप्ता अपने रोजाना की रुटीन के मुताबिक 13 जुलाई, 2021 की शाम साढ़े 7 बजे अपने विद्या नर्सिंग होम जाने के लिए घर से अपनी नीले रंग की बलेनो कार से निकले थे. उन का नर्सिंग होम घर से महज 700 मीटर की दूरी पर रौयल कट चौराहे के पास है और रामबाग क्षेत्र में उन का दूसरा बांकेबिहारी हौस्पिटल भी है.

वह हौस्पिटल और नर्सिंग होम में विजिट कर हमेशा रात 10 बजे तक वापस घर लौट आते थे. लेकिन उस दिन वे रात 11 बजे तक घर नहीं लौटे थे. इस कारण घर वालों को  चिंता हुई. उन की पत्नी डा. विद्या गुप्ता ने उन्हें कई बार फोन मिलाया. हर बार फोन स्विच्ड औफ मिला.

डा. विद्या ने नर्सिंग होम फोन कर स्टाफ से डाक्टर साहब के बारे में पूछा. वहां से पता चला कि आज तो डाक्टर साहब विजिट करने नर्सिंग होम आए ही नहीं. यह सुन कर डा. विद्या गुप्ता का माथा ठनका, वह सोच में पड़ गईं, ‘‘आए नहीं तब कहां गए?’’

उन्होंने तुरंत बांकेबिहारी हौस्पिटल में फोन मिलाया. वहां से भी वही सुनने को मिला कि डाक्टर साहब आज आए ही नहीं. डा. विद्या की अपने पति के सकुशल होने की चिंता अनहोनी की आशंका में बदलती जा रही थी. देरी किए बगैर उन्होंने इस की सूचना पुलिस को दे दी.

सूचना पर थाना एत्माद्दौला के थानाप्रभारी देवेंद्र शंकर पांडेय पुलिस टीम के साथ  डाक्टर के आवास पर पहुंच गए. पूरे घटनाक्रम की जानकारी ले कर परिवार के सभी सदस्यों के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया. इसी के साथ डा. गुप्ता के मोबाइल की अंतिम लोकेशन का पता लगाया, जो सैयां के गांव रोहता की मिली.

इसे देख कर पुलिस भी किसी अप्रिय घटना से आशंकित हो गई. उस ने घरवालों से पूछा कि डाक्टर साहब वहां क्यों गए होंगे. तब उन्होंने बताया कि इस की उन्हें जानकारी नहीं, क्योंकि वहां उन का कोई परिचित या कोई रिश्तेदार भी नहीं रहता.

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डा. विद्या ने बताया कि उन के पति ने कभी भी उस गांव को ले कर चर्चा तक नहीं की थी. फिर भी सवाल था कि डाक्टर साहब वहां क्यों गए, किसी भी तरह से जवाब नहीं मिलने की स्थिति में पुलिस को उन के अपहरण का शक हुआ.

यानी डा. गुप्ता का अपहरण! यह संदेह उन के परिवार वालों के होश उड़ाने वाला था. दबी आवाज में इस की कानोकान खबर भी पूरे शहर में फैल गई.

डा. उमाकांत गुप्ता के मोबाइल पर 13 जुलाई की शाम साढ़े 7 बजे एक अनजान नंबर से काल आई थी. उस के बाद ही वह घर से कार ले कर निकल पड़े थे. पुलिस ने उन के दूसरे काल की भी डिटेल्स जांची. सभी काल के साथ राहुल नाम दर्शा रहा था. पुलिस ने राहुल के बारे में पूछा तो डाक्टर के घर वालों ने अनभिज्ञता प्रकट की.

डाक्टर को ढूंढने में जुटीं 5 टीमें

पुलिस सोच में पड़ गई कि आखिर राहुल कौन है, उस ने डाक्टर को क्यों बुलाया होगा? क्या वह डाक्टर की कार में ही उन के साथ खंदारी से रोहता तक गया होगा? इन सवालों के जवाब के लिए पुलिस सक्रिय हो गई.

घटना की जानकारी आला अधिकारियों को भी दे दी गई. डाक्टर की तलाश तेजी से की जाने लगी. वारदात को ले कर उन के परिजन, नर्सिंग होम या फिर अस्पताल के लोगों से कोई सहयोग नहीं मिल पाया. उन्होंने डाक्टर साहब के किसी से विवाद या धमकी को लेकर अनभिज्ञता जाहिर कर दी.

पुलिस को अपने स्तर से छानबीन करते हुए डाक्टर गुप्ता को सकुशल वापस लाना बड़ी चुनौती थी. सैयां टोल प्लाजा के सारे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज चेक किए, लेकिन उस से किसी भी तरह का सुराग नहीं मिला.

पुलिस को आशंका थी कि डा. गुप्ता का अपहरण करने से पहले गैंग ने पूरी तैयारी की होगी. वे डाक्टर को सैयां रोड पर रोहता की तरफ अकेले गाड़ी चला कर नहीं जा सकते हैं. इसलिए अनुमान लगाया गया कि उन्हें बहाने से फोन कर बुलाया होगा. उस के बाद बदमाशों ने अपहरण कर लिया हो.

डाक्टर गुप्ता के अपहरण की सूचना पर एडीजी (जोन) राजीव कृष्ण, आईजी नवीन अरोड़ा, एसएसपी मुनिराज और एसपी (सिटी) बोत्रे रोहन प्रमोद भी सक्रिय हो गए. उन्होंने परिजनों को आश्वासन देने के साथसाथ हिदायत भी दी कि फिरौती के संबंध में किसी भी तरह के फोन आने पर वे पुलिस को अवश्य सूचित करें.

डा. विद्या को इस बात का विशेष ध्यान रखने को कहा गया. उन्होंने बताया कि डा. गुप्ता दिल के मरीज भी हैं, उन का 3 महीने पहले औपरेशन हुआ था.

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आगरा में अपहरण की यह पहली घटना नहीं हुई थी. इस से पहले भी अपहरण की कई वारदातों में डाक्टर से ले कर व्यापारी तक को निशाना बनाया जा चुका है. अपहर्त्ताओं के गैंग फिरौती में मोटी मोटी रकम वसूलते रहे हैं.

बताते हैं कि इन की सक्रियता धौलपुर (राजस्थान) में है, वह आगरा से अपहृत को ले जाते हैं और उन्हें चंबल के बीहड़ में छिपा कर रखते हैं. फिरौती वसूलने के काम गैंग के अलगअलग सदस्य करते हैं.

इसे ध्यान में रखते हुए पुलिस ने पहले के अपहरण की वारदातों में लिप्त गैंग के ऐसे सरगना और सदस्यों की सूची तैयार की, जो जमानत पर रिहा थे. एसएसपी मुनिराज के निर्देश पर जांच की 5 टीमें गठित की गईं.  टीमों का नेतृत्व एसपी (सिटी) प्रमोद बोत्रे को सौंपी गई.

जांच की शुरुआत मोबाइल नंबरों से हुई. जांच और सर्विलांस के तहत वारदात के दिन की तमाम संदिग्ध सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को भी खंगाला गया. इन से मिली जानकारियों के आधार पर पूछताछ की तैयारी की गई. यह सब काम घटना की रात को ही कर लिया गया.

धौलपुर पुलिस के चंगुल में आया पवन

पुलिस ने रात में ही ट्रांसयमुना कालोनी से ले कर रामबाग, भगवान टाकीज और खंदारी तक के सीसीटीवी कैमरे चेक किए. उन में डाक्टर की कार कहीं नजर नहीं आई. जबकि उस के बाद कार एमजी रोड पर हरी पर्वत, धाकरान और प्रतापपुरा चौराहे से आगे जाती हुई दिखाई दी.

अगले रोज 14 जुलाई, 2021 की सुबह 10 बजे धौलपुर के एसपी केसर सिंह शेखावत ने एसएसपी मुनिराज को घटना के बारे में बताया. उन के आदेश पर आगरा पुलिस की एक टीम एसपी (सिटी) के नेतृत्व में राजस्थान बौर्डर पर पहुंची. उस ने धौलपुर पुलिस से संपर्क किया. वहीं डाक्टर गुप्ता के कार की बरामदगी का पता चला, जो रात साढ़े 12 बजे धौलपुर में जब्त की गई थी.

उस के ड्राइवर द्वारा ओवरटेक किए जाने के कारण स्थानीय सिपाहियों ने पकड़ा था. पकड़े गए ड्राइवर पवन ने बताया कि वह आगरा में निबोहरा का निवासी है और डा. गुप्ता की कार का ड्राइवर है. डाक्टर साहब धौलपुर आए हुए हैं. वह उन की कार ले कर अपने काम से जा रहा था.

सिपाहियों को पवन ने पूछे गए सवालों का सटीक जवाब नहीं दिया. क्योंकि कार छोड़ने के लिए उस ने पुलिस को 500 से ले कर 5 हजार तक रिश्वत देने की पेशकश की थी.

इस कारण उस के किसी गंभीर मामले में शामिल होने का संदेह हो गया और उसे थाने लाया गया. कड़ाई से की गई पूछताछ के बाद उस ने आगरा के डाक्टर के अपहरण की बात कुबूल कर ली.

2 अपहर्त्ता और चढ़े पुलिस के हत्थे

एक अन्य घटना के तहत रात के लगभग एक बजे चैकिंग कर रही पुलिस ने बाइक पर जा रहे एक युवक और युवती को रोकने का प्रयास किया. युवक युवती को उतार कर तेजी से बाइक को भगा ले गया. भागते समय युवक की जेब से उस का मोबाइल गिर गया.

पुलिस ने तुरंत युवती और गिरे मोबाइल को अपने कब्जे में ले लिया. पूछताछ में युवती ने अपना नाम मंगला पाटीदार बताया. उसी से पता चला कि वह भी डाक्टर के अपहरण में शामिल है.

इन 2 घटनाओं में 2 अपहर्त्ताओं के पकड़े जाने की सूचना मिलने से आगरा पुलिस ने थोड़ी राहत की सांस ली. मात्र 15 घंटे में ही डाक्टर की कार बरामद होने के साथसाथ 2 अपहर्त्ता पकड़े गए थे. अब पुलिस को उन के चंगुल से डाक्टर को सकुशल वापस लाने की चुनौती थी.

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डा. गुप्ता के आगरा से अपहरण का समाचार जब समाचार पत्रों के अलावा न्यूज चैनलों पर भी आया तो पूरे शहर में सनसनी फैल गई.

इस प्रकरण पर इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने डीएम और एसएसपी से बात कर जल्द से जल्द उन की बरामदगी और दोषियों पर काररवाई की मांग की.

पदाधिकारियों ने वर्चुअल मीटिंग कर  पुलिस प्रशासन पर दबाव बनाते हुए 24 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया. डाक्टर की बरामदगी नहीं होने पर आगरा के तमाम डाक्टरों ने हड़ताल पर जाने की धमकी दे डाली.

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Satyakatha: खूंखार प्यार- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

‘‘अच्छा, ऐसी अंतिम धमकियां तो तुम जाने कितनी बार दे चुके हो. तुम मेरा मुंह बंद कर के गुलछर्रे उड़ाना चाहते हो. मेरी जिंदगी, मेरी बच्ची की जिंदगी बरबाद करना चाहते हो. मैं तुम से डरने वाली नहीं. देखो, एक मैं ही हूं जो तुम्हें बारबार माफ करती हूं. कोई दूसरी औरत होती तो अभी तक तुम जेल में होते.’’ वह गुस्से में बोली.

‘‘दीपू, तुम बारबार मुझे जेल की धमकी मत दिया करो, मैं भी कोई आम आदमी नहीं, मेरी भी ऊंची पहुंच है. चाहूं तो तुम्हें गायब करवा दूं, कोई ढूंढ भी नहीं पाएगा. बहुत ऊंची पहुंच है मेरी.’’

वे दोनों इसी तरह आपस में नोकझोंक करते हुए गृहनगर बिलासपुर की ओर बढ़ रहे थे. अचानक देवेंद्र ने कार रोकी और दीप्ति की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘मैं एक मिनट में आता हूं.’’

दीप्ति ने उस की तरफ प्रश्नसूचक भाव से  देखा तो देवेंद्र ने छोटी अंगुली दिखाते हुए कहा, ‘‘लघुशंका.’’

देवेंद्र ने गाड़ी को सड़क से नीचे उतार दिया था. रात के लगभग 10 बज रहे थे, दीप्ति पीछे सीट पर बैठी हुई थी. दीप्ति ने गौर किया देवेंद्र देखतेदेखते कहीं दूर चला गया, दिखाई नहीं दे रहा था.

वह चिंतित हो उठी और इधरउधर देखने लगी. तभी उस ने देखा सामने से 2 लोग उस की ओर तेजी से आ रहे हैं. दोनों के चेहरे पर नकाब था, यह देख दीप्ति घबराई मगर देखते ही देखते दोनों उस पर टूट पड़े.

उन में एक पुरुष था और एक महिला, पुरुष ने जल्दी से एक नायलोन की रस्सी उस के गले में डाल दी और उस का गला रस्सी से दबाने लगा. इस में उस की साथी महिला भी उस की मदद करने लगी और दीप्ति का दम घुटने लगा. थोड़ी देर वह छटपटाती रही फिर आखिर में उस का दम टूट गया.

पुरुष और महिला ने मिल कर के उस का पर्स और मोबाइल अपने कब्जे में लिया. रुपए ले लिए, मोबाइल का सिम निकाला और जल्दीजल्दी उसे अपने कब्जे में ले कर के जेब में रखा. और एक झोले में लाए पत्थर से कार का शीशा तोड़ कर चले गए.

मगर उन लोगों ने यह ध्यान नहीं दिया कि इस आपाधापी में मोबाइल में लगा एक दूसरा सिम वहीं नीचे जमीन पर गिर गया है.

देवेंद्र सोनी और दीप्ति का विवाह 2003 में हुआ था. देवेंद्र के पिता रामस्नेही सोनी नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे और उन का संयुक्त परिवार बिलासपुर के सरकंडा बंगाली पारा में रहता था.

देवेंद्र बीकौम की पढ़ाई कर ही रहा था कि पिता ने जिला कोरबा के उपनगर बालको कंपनी में कार्यरत कृष्ण कुमार सोनी की दूसरी बेटी दीप्ति से उस के विवाह की बात चलाई और दोनों परिवारों की सहमति से विवाह संपन्न हो गया.

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विवाह के बाद मानो देवेंद्र सोनी का असली रूप धीरेधीरे सामने आता चला गया. देवेंद्र चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने की तैयारी कर रहा था, मगर परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पा रहा था. इधर उस की आकांक्षाएं बहुत ऊंची थीं. अपनी ऊंची उड़ान के कारण ऐसीऐसी बातें कहता और नित्य नईनई लड़कियों से दोस्ती की बातें दीप्ति को बताता.

शुरू में तो वह नजरअंदाज करती रही, परंतु पैसों की कमी होने के बावजूद वह हमेशा अच्छेअच्छे कपड़े पहनता और नईनई लड़कियों से संबंध बनाता रहता था.

यह बात जब दीप्ति को पता चलने लगी तो दोनों में अकसर विवाद गहराने लगा. इस बीच दोनों की एक बेटी सोनिया का जन्म हुआ, जो लगभग 7 साल की हो गई थी. और बिलासपुर के एक अच्छे कौन्वेंट स्कूल में पढ़ रही थी.

रात के लगभग साढ़े 11 बज रहे थे. जिला चांपा जांजगीर के पंतोरा थाने के अपने कक्ष में थानाप्रभारी अविनाश कुमार श्रीवास बैठे अपने स्टाफ से कुछ चर्चा कर रहे थे कि उसी समय घबराए हुए 2 लोग भीतर आए.

एक के चेहरे पर मानो हवाइयां उड़ रही थीं. उन्हें इस हालत में देख अविनाश कुमार को यह समझते देर नहीं लगी कि कोई बड़ी घटना घटित हो गई है. उन्होंने कहा, ‘‘हांहां बताओ, क्या बात है, क्यों इतना घबराए हुए हो?’’

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दोनों व्यक्तियों, जिन की उम्र लगभग 30-35 वर्ष के लपेटे में थी, में से एक ने खड़ेखड़े ही लगभग कांपती हुई आवाज में बोला, ‘‘सर, मैं देवेंद्र सोनी 2-3 जिलों में कई प्रतिष्ठित लोगों के लिए अकाउंटेंट का काम करता हूं. मैं अपनी पत्नी दीप्ति के साथ कोरबा से बिलासपुर जा रहा था कि कुछ लोगों ने हम से लूटपाट की और मेरी पत्नी को…’’ ऐसा कह कर वह इधरउधर देखने लगा.

‘‘क्यों, क्या हो गया आप की पत्नी को… विस्तार से बताओ. आओ, पहले आराम से कुरसी पर बैठ जाओ.’’ अविनाश कुमार श्रीवास ने  उठ कर दोनों को अपने सामने कुरसी पर बैठाया और पानी मंगा कर के पिलाते हुए कहा.

अगले भाग में पढ़ें- श्रीवास ने फोन लगाया तो उस का फोन दिन भर बंद  मिला

अब और नहीं- भाग 4: आखिर क्या करना चाहती थी दीपमाला

Writer- ममता रैना

उस की फजूलखर्ची से भूपेश अब परेशान रहने लगा था. कभी उस पर झुंझला उठता तो उपासना उस का जीना हराम कर देती, तलाक और पुलिस की धमकी देती.

जो शारीरिक सुख उपासना से प्रेमिका के रूप में मिल रहा था वह उस के पत्नी बनते ही नीरस लगने लगा. इश्क का भूत जल्दी ही सिर से उतर गया.

दीपमाला के साथ शादी के शुरुआती दिनों की कल्पना कर के भूपेश के मन में बहुत से विचार आने लगे. वह एक बार फिर दीपमाला के संग के लिए उत्सुक होने लगा. खाने की थाली की तरह जिस्म की भूख भी स्वाद बदलना चाहती थी.

किसी तरह दीपमाला के घर और सैलून का पता लगा कर एक दिन वह दीपमाला के फ्लैट पर आ धमका. एक अरसे बाद अचानक उसे सामने देख दीपमाला चौंक उठी कि भूपेश को आखिर उस का पता कैसे मिला और अब यहां क्या करने आया है?

‘‘कैसी हो दीपमाला? बिलकुल बदल गई हो… पहचान में ही नहीं आ रही,’’ भूपेश ने उसे भरपूर नजरों से घूरा.

दीपमाला संजसंवर कर रहती थी ताकि उस के सैलून में ग्राहकों का आना बना रहे. अब वह आधुनिक फैशन के कपड़े भी पहनने लगी थी. सलीके से कटे बाल और आत्मनिर्भरता के भाव उस के चेहरे की रौनक बढ़ा रहे थे. उस का रंगरूप भी पहले की तुलना में निखर आया था.

कांच के मानिंद टूटे दिल के टुकड़े बटोरते उस के हाथ लहूलुहान भी हुए थे, मगर उस ने अपनी हिम्मत कभी नहीं टूटने दी. वह अब जीवन की हर मुश्किल का सामना कर सकती थी तो फिर भूपेश क्या चीज थी.

‘‘किस काम से आए हो?’’ उस ने बेहद उपेक्षा भरे लहजे में पूछा. उस की बेखौफी देख भूपेश जलभुन गया, लेकिन फौरन उस ने पलटवार किया, ‘‘मैं अपने बेटे से मिलने आया हूं. तुम ने मुझे मेरे ही बेटे से अलग कर दिया है.’’

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‘‘आज अचानक तुम्हें बेटे पर प्यार कैसे आ गया? इतने दिनों में तो एक बार भी खबर नहीं ली उस की,’’ एक व्यंग्य भरी मुसकराहट दीपमाला के अधरों पर आ गई.

‘‘तुम्हें क्या लगता है मैं अंशुल से प्यार नहीं करता? बाप हूं उस का, जितना हक तुम्हारा है उतना मेरा भी है.’’

‘‘तो तुम अब हक जताने आए हो? कानून ने तुम्हें बेशक हक दिया है, मगर वह मेरा बेटा है,’’ दीपमाला ने कहा.

बेटे से मिलना बस एक बहाना था भूपेश के लिए. उसे तो दीपमाला के साथ की प्यास थी. बोला, ‘‘सुनो दीपमाला, मैं तुम्हारा गुनाहगार हूं. मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई… हो सके तो मुझे माफ कर दो.’’

भूपेश के तेवर अचानक नर्म पड़ गए. उस ने दीपमाला का हाथ पकड़ लिया.

तभी एक झन्नाटेदार तमाचा भूपेश के गाल पर पड़ा. दीपमाला ने बिजली की फुरती से फौरन अपना हाथ छुड़ा लिया.

भूपेश का चेहरा तमतमा गया. इस खातिरदारी की तो उसे उम्मीद ही नहीं थी. वह कुछ बोलता उस से पहले ही दीपमाला गुर्राई, ‘‘आज के बाद दोबारा मुझे छूने की हिम्मत की तो अंजाम इस से भी बुरा होगा. यह मत भूलो कि तुम अब मेरे पति नहीं हो और एक गैरमर्द मेरा हाथ इस तरह नहीं पकड़ सकता, समझे तुम? अब दफा हो जाओ यहां से.’’

उसे एक भद्दी सी गाली दे कर भूपेश बोला, ‘‘सतीसावित्री बनने का नाटक कर रही हो. किसकिस के साथ ऐयाशी करती हो सब जानता हूं, अगर उन के साथ तुम खुश रह सकती हो तो मुझ में क्या कमी है? मैं अगर चाहूं तो तुम्हारी इज्जत सारे शहर में उछाल सकता हूं… इस थप्पड़ का बदला तो मैं ले कर रहूंगा और फिर दीपमाला को बदनाम करने की धमकी दे कर भूपेश वहां से चला गया.

कितना नीच और कू्रर हो चुका है भूपेश… दीपमाला की सहनशक्ति जवाब दे गई. वह तकिए पर सिर रख कर खुद पर रोती रही, जुल्म उस पर हुआ था, लेकिन कुसूरवार उसे ठहराया जा रहा था.

इस मुश्किल की घड़ी में उसे अमित की जरूरत होने लगी. उस के प्यार का मरहम उस के दिल को सुकून दे सकता था. उस ने अपने फोन पर अमित का नंबर मिलाया. कई बार कोशिश करने पर भी जब उस ने फोन नहीं उठाया तो वह अपना पर्स उठा कर उस से मिलने चल पड़ी.

भूपेश किसी भी हद तक जा सकता है, यह दीपमाला को यकीन था. वह चुप नहीं बैठेगा. अगर उस की बदनामी हई तो उस के सैलून के बिजनैस पर असर पड़ सकता है. वह अमित से मिल कर इस मुश्किल का कोई हल ढूंढ़ना चाहती थी. क्या पता उसे पुलिस की भी मदद लेनी पड़े.

अमित के औफिस में ताला लगा देख कर वह निराश हो गई. अमित उस के एक बार बुलाने पर दौड़ा चला आता था, फिर आज उस का फोन क्यों नहीं उठा रहा? उसे याद आया जब वह पहली बार अमित से मिली थी तो उसे अपना विजिटिंग कार्ड दिया था. उस ने पर्स टटोला, कार्ड मिल गया. औफिस और घर का पता उस में मौजूद था. उस ने पास से गुजरते औटो को हाथ दे कर रोका और पता बताया. धड़कते दिल से दीपमाला ने फ्लैट की घंटी बजाई. एक आदमी ने दरवाजा खोला. दीपमाला ने उस से अमित के बारे में पूछा तो वह अंदर चला गया. थोड़ी देर बाद एक औरत बाहर आई. बोली, ‘‘जी कहिए, किस से मिलना है? लगभग उस की ही उम्र की दिखने वाली उस औरत ने दीपमाला से पूछा.’’

‘‘मैं अमित से मिलने आई हूं. क्या यह उन का घर है?’’ पूछते हुए उसे थोड़ा अटपटा लगा कि पता नहीं यह सही पता है भी या नहीं.

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‘‘मैं अमित की पत्नी हूं. क्या काम है आप को? आप अंदर आ जाइए,’’ अमित की पत्नी विनम्रता से बोली.

दीपमाला ने उस औरत को करीब से देखा. वह सुंदर और मासूम थी, मांग में सिंदूर दमक रहा था और चेहरे पर एक पत्नी का विश्वास.

कुछ रुक कर अपनी लड़खड़ाती जबान पर काबू पा कर दीपमाला बोली, ‘‘कोई खास बात नहीं थी. मुझे एक मकान किराए पर चाहिए था. उसी सिलसिले में बात करनी थी.’’

‘‘मगर आप ने अपना नाम तो बताया नहीं… मैं अपने पति को कैसे आप का संदेश दूंगी.’’

‘‘वे खुद समझ जाएंगे,’’ और दीपमाला पलट कर तेज कदमों से मकान की सीढि़यां उतर सड़क पर आ गई.

अजीब मजाक किया था कुदरत ने उस के साथ. उस ने शुक्र मनाया कि उस की आंखें समय रहते खुल गईं.

अमित ने भी वही दोहराया था जो भूपेश ने उस के साथ किया था. एक बार फिर से वह ठगी गई थी. मगर इस बार वह मजबूती से अपने पैरों पर खड़ी थी. जिस जगह पर कभी उपासना खड़ी थी, उसी जगह उस ने आज खुद को पाया. क्या फर्क था भला उस में और उपासना में? दीपमाला ने सोचा.

नहीं, बहुत फर्क है, उस का जमीर अभी मरा नहीं, वह इतनी खुदगर्ज नहीं हो सकती कि किसी का बसेरा उजाड़े. जो गलती उस से हो गई है उसे अब वह दोहराएगी नहीं. उस ने तय कर लिया अब वह किसी को अपने दिल से खेलने नहीं देगी. बस अब और नहीं.

Satyakatha: डॉक्टर की बीवी- रसूखदार के प्यार का वार- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

खुशबू विक्रम के प्यार में ऐसी पड़ी कि हमेशा के लिए उस के साथ रहने के बारे में सोचने लगी. उस ने विक्रम से बात की, ‘‘विक्रम, मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. हमें अब हमेशा के लिए एक हो जाना चाहिए. साथ रहेंगे तो और भी प्यार बढ़ेगा.’’

विक्रम यह सुन कर सन्न रह गया, ‘‘बोलने से पहले आप एक बार सोच लेती कि क्या कहने जा रही हो. तुम शादीशुदा हो और 2 बच्चों की मां हो और एक प्रतिष्ठित परिवार से हो. ऐसा करने पर तुम्हारा परिवार तो बरबाद होगा ही, मैं भी कहीं का नहीं रहूंगा. राजीव सर भी मुझे नहीं छोड़ेगे, जान से मार देंगे.’’

‘‘मैं ने सब सोच लिया है, अब मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगी. चाहे कुछ हो जाए. तुम को मेरी बात माननी ही पड़ेगी. एक बात ध्यान रखो कि मैं जो चाहती हूं, वह पा कर रहती हूं, नहीं तो मैं सामने वाले को बरबाद कर देती हूं. अब तुम सोच लो, क्या करना है.’’ कह कर खुशबू वहां से चली गई.

खुशबू हमेशा के लिए अपना बनाना चाहती थी जिम ट्रेनर को

विक्रम तो सिर्फ खुशबू से संबंध बनाने के लिए जुड़ा था, लेकिन अब वह उस के लिए गले की हड्डी बन रही थी. ऐसे में विक्रम ने उस से दूरी बनानी शुरू कर दी. खुशबू को यह बात समझते देर नहीं लगी.

वह विक्रम के जिम जाने लगी, वहां रोज वह घंटों बैठी रहती. वह विक्रम का पीछा छोड़ने को बिलकुल तैयार ही नहीं थी. दोनों में अब प्यार के बजाय झगड़े होने लगे.

खुशबू अपनी जिद पूरी न होती देख कर बौखला सी गई. उस ने विक्रम के साथ रहने के लिए विक्रम को हर तरह से मना कर देख लिया था, लेकिन विक्रम मानने को तैयार ही नहीं था. खुशबू का दीवानापन या कहें पागलपन अपनी सीमाएं लांघने लगा था.

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विक्रम के न मानने पर वह उसे सबक सिखाने पर आमादा हो गई. वह विक्रम के घर जा कर विक्रम और उस के परिवार को धमकाने लगी कि विक्रम अगर उस की बात नहीं मानता तो वह उसे जान से मार देगी. एक बार तो उस ने विक्रम पर सर्जिकल ब्लेड से हमला भी कर दिया, जिस में विक्रम को 14 टांके लगे थे.

खुशबू गुस्से में बिफरी नागिन की तरह विक्रम को डंसने को आतुर थी. विक्रम को जान से मारने के लिए उस ने अपने पूर्व प्रेमी मिहिर सिंह से संपर्क किया. मिहिर दानापुर के नासरीगंज के यदुवंशी नगर में रहता

था. पिछले 5 सालों से उस के खुशबू से प्रेम संबंध थे.

घटना से डेढ़दो साल पहले ही उन का बे्रकअप हुआ था. अब खुशबू ने उस से प्रेम संबंध बनाए रखने के लिए अपने दूसरे प्रेमी विक्रम की जान का सौदा करवाने के लिए कहा. मिहिर उस का काम करवाने के लिए तैयार हो गया.

मिहिर 2 लोगों की मदद से शूटर अमन तक पहुंचा. अमन समस्तीपुर के किशनपुर बैकुंठ में रहता था. वह पत्राचार से एमबीए कर रहा था, साथ ही डिलीवरी बौय का भी काम करता था. अमन विक्रम की सुपारी लेने को तैयार हो गया. अमन ने अपने साथ आर्यन और शमशाद को मिला लिया.

आर्यन उर्फ रोहित सिंह सारण के सोनपुर के जहांगीरपुर का रहने वाला था. जबकि शमशाद बेगूसराय के चेरिया बरियापुर का रहने वाला था. वह गोवा में रह कर राजमिस्त्री का काम करता था. 5 महीने पहले ही वह वापस आया था.

मिहिर ने तीनों से बात कर के पूरा प्लान बनाया. सुपारी की रकम ढाई लाख रुपए तय हुई, जिस में एक लाख 85 हजार रुपए खुशबू ने 2-3 बार में दिए.

2 महीने पहले ही योजना बन गई थी. तीनों शूटर भागवतनगर इलाके में 14 हजार रुपए महीने के किराए के मकान में आ कर रहने लगे थे. 2 महीने पहले ही रुपए दिए जाने के बावजूद भी शूटर्स ने अपना काम नहीं किया तो मिहिर रुपए वापस ले कर खुशबू को दे कर इस झंझट से बाहर निकलना चाहता था.

मगर ऐसा हुआ नहीं, दबाव बढ़ा तो शूटर जल्द ही काम को अंजाम तक पहुंचाने को तैयार हो गए. शूटर्स ने कुछ दिन विक्रम की रेकी की, फिर 18 सितंबर, 2021 की सुबह एक चोरी की बाइक से कदमकुआं थाना क्षेत्र के लोहा मंडी इलाके में पहुंच गए. अमन

और आर्यन रास्ते में निश्चित स्थान पर खड़े हो गए. शमशाद कुछ दूरी पर बाइक ले कर खड़ा हो गया.

जैसे ही विक्रम स्कूटी से उस रास्ते से उन के पास से गुजरने लगा तो अमन और आर्यन ने उस पर ताबड़तोड़ फायरिंग करनी शुरू कर दी. गोलियां मारने के बाद तीनों शूटर भागवतनगर के किराए के मकान पर वापस आ गए. अंतत: पकड़े गए.

पुलिस ने उन के पास से 2 पिस्टल, मैगजीन और गोलियां बरामद कीं. पुलिस ने डाक्टर दंपति, मिहिर सिंह और तीनों शूटर्स को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. कथा लिखने तक 2 आरोपी गिरफ्तार नहीं हो सके थे.

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खुशबू अपनी जिद और प्यार के पागलपन में इतनी अंधी हो गई कि उस ने अपना बसाबसाया घर तक बरबाद कर लिया. अच्छीखासी घरगृहस्थी और जिंदगी को छोड़ कर अब खुशबू बेउर जेल की बैरक में तन्हा जिंदगी गुजार रही है.

साजिश का पता होते हुए भी पति राजीव ने साथ दिया, वह भी अलग बैरक में बड़ी मुश्किलों में रह रहा है.

यह कहानी उन लोगों के लिए सबक है जो अपनी जिद, चाहत और पागलपन में सब कुछ बरबाद कर देते हैं. समय रहते अपने को संभाल लें तो उन की और उन के अपनों की जिंदगी बरबाद होने से बच सकती है.

—कथा पुलिस सूत्रों व मीडिया रिपोर्टों पर आधारित

Satyakatha- अय्याशी में गई जान: भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

Writer- प्रमोद गौडि़या

वह फ्लैट सत्यम और विशाल के लिए मौजमस्ती का अड्डा बन कर रह गया था. कई बार वहां सरवन के साथ भी बैठकें होती थीं और पार्टी का दौर चलता था.

उस फ्लैट पर एक और लड़की राधा का भी अकसर आनाजाना लगा रहता था. वह वहां बेधड़क आती थी और अधिकार के साथ कुछ समय वहां गुजार कर चली जाती थी.

हालांकि वह दूसरे मोहल्ल्ले मनीराम बगिया में रहती थी. वास्तव में वह सत्यम की मौसेरी बहन थी. सत्यम ने एक चाबी राधा को भी दे रखी थी. वहीं करीब 2 साल पहले एक बार उस की विशाल से मुलाकात हो गई थी. पहली नजर में ही दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए थे.

विशाल राधा की खिलती किशोरावस्था को देख कर हतप्रभ रह गया था, जबकि राधा उस की बातें और माचो बदन की दीवानी बन गई थी. उस के बाद से विशाल और राधा अकसर साथसाथ घूमनेफिरने लगे थे, लेकिन दोनों सत्यम की नजरों से बच कर भी रहते थे.

वे नहीं चाहते थे कि उन के प्रेम संबंध के बारे में सत्यम को कोई जानकारी हो. जल्द ही विशाल ने मौका पा कर राधा से शारीरिक संबंध भी बना लिए. राधा की भी उस में स्वीकृति मिल गई थी. सत्यम की गैरमौजूदगी में राधा विशाल को उसी फ्लैट पर बुला लेती थी.

7 सितंबर, 2021 को सत्यम ओमर ने राधा को फोन पर बताया था कि वह आज वहां नहीं आएगा. बाहर बालकनी में उस के कपड़े सूख गए होंगे, उन्हें अलमारी में रख दे. किचन और दूसरे कमरे के बिखरे सामान आ कर ठीक कर दे.

अपने भाई की बातों पर अमल करते हुए राधा ने अपने प्रेमी विशाल के साथ मौज करने की भी योजना बना ली. उस ने तुरंत फोन कर इस की सूचना विशाल को दी और शाम को खानेपीने का सामान ले कर फ्लैट पर आने को कहा.

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शाम होने से पहले वह फ्लैट पर चली गई, किचन और कमरे को दुरुस्त किया. तब तक शाम के साढ़े 8 बज चुके थे. अब तक विशाल को आ जाना चाहिए था, क्योंकि उस ने 8 बजे तक आने को कहा था. देर होने पर राधा ने विशाल को फोन किया, जिसे विशाल ने रिसीव नहीं किया.

करीब 20 मिनट बाद विशाल ने फोन कर राधा को बताया कि वह पहुंचने वाला है. और फिर वह ठीक 9 बजे फ्लैट पर पहुंच गया. वहीं अपार्टमेंट की पार्किंग में उस ने अपनी स्कूटी भी लगा दी.

राधा उस का बेसब्री से इंतजार कर रही थी. उसे देखते ही वह उस के गले लग गई. दोनों अकेले में कई हफ्तों बाद मिले थे. इस मौके को किसी भी सूरत में गंवाना नहीं चाहते थे. राधा के लिए पूरी रात थी. विशाल भी खानेपीने के सामान के साथ आया था.

दोनों बेफिक्र थे. मौजमस्ती के लिए पूरी तरह से तैयार और तत्पर भी थे. इसी तत्परता में उन से एक भूल हो गई. मुख्य दरवाजे की अंदर से कुंडी लगाना भूल गए. वे बैडरूम में थे. ड्राइंगरूम की ओर उन का जरा भी ध्यान नहीं था.

दोनों एकदूसरे पर प्यार की बौछार करते हुए कब यौनाचार में लीन हो गए, पता ही नहीं चला. दूसरी ओर वाटर प्लांट में काम समाप्त हो जाने पर सत्यम फ्लैट पर अचानक आ गया. फ्लैट का दरवाजा खुला होने पर वह सीधे ड्राइंगरूम में दाखिल हुआ. बैडरूम में रोशनी देख कर चौंक गया और वहां जा कर दरवाजे पर लगे परदे को हटाया.

बैड पर अपनी बहन राधा के साथ विशाल को लिपटा देख सन्न रह गया. वे दोनों आंखें मूंदे इतने बेफिक्र थे कि सत्यम के दरवाजे पर आने की जरा भी आहट नहीं हुई. गुस्से की ज्वाला को दबाए सत्यम चुपचाप फ्लैट के नीचे आया.

नीचे से लोहे की रौड निकाली और ऊपर पहुंच कर राधा के आलिंगन में बंधे विशाल के सिर पर दे मारी. एक ही वार में सिर से खून बहने लगा. राधा अपनी जान बचाते हुए दूसरे कमरे में भागी. गुस्से में सत्यम ने विशाल के सिर पर दनादन 3-4 और वार कर दिए.

सिर पर ताबड़तोड़ वार से विशाल की वहीं मौत हो गई. राधा के सामने ही विशाल की मौत हो गई थी, लेकिन वह डर गई थी कि कहीं सत्यम उसे भी न मार डाले.

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सत्यम ने डपटते हुए इस बारे में किसी को बताने की उसे सख्त हिदायत दे दी. उसे जल्दी से दीवार पर लगे खून के दाग मिटाने को कहा. उस के बाद तुरंत अपने दोस्त सरवन को बुलाया.

सरवन भागाभागा आया. लाश देख कर उस के होश उड़ गए, लेकिन जल्द ही सामान्य होने पर लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. तब तक रात के साढ़े 11 बज गए थे.

इसलिए सरवन योजना के अनुसार अगले रोज 8 सितंबर को प्लास्टिक का एक ड्रम खरीद लाया. उस में विशाल की लाश ठूंस कर पैक कर दी. ड्रम को उस पर लगी स्टील की स्ट्रिप से पैक कर दिया.

उस के बाद ड्रम को विशाल की स्कूटी पर लादकर कैंट होते हुए जाजमऊ गंगापुल से दही थाने की खेड़ा चौकी क्षेत्र जा पहुंचे. उन्होंने ड्रम को नहर के पास झाडि़यों में फेंक दिया. साथ ही विशाल का मोबाइल फोन भी नहर में फेंक दिया. उस की स्कूटी से वापस कानपुर आ गए.

सत्यम ने विशाल की स्कूटी अपने यशोदा नगर स्थित प्लौट के पास पेड़ के नीचे खड़ी कर दी. जबकि उस के खून से सने कपड़ों को कूड़ाघर में फेंक आया.

आरोपियों द्वारा अपना जुर्म स्वीकार कर लेने के बाद थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह ने आईपीसी की धारा 302/201/120बी के तहत हत्यारोपी सत्यम ओमर, सरवन किशोरी राधा को न्यायालय में पेश किया.

वहां से सत्यम और सरवन को कानपुर के जिला कारागार भेज दिया गया, जबकि साक्ष्य छिपाने के आरोप में राधा को नारी निकेतन के सुरक्षा गृह में भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है तथा किशोरी राधा का नाम कल्पनिक है

तुम सही थी निशा: वैभव क्यों इतना निशा के प्रति आकर्षित था

‘अभी तुम 10-15 मिनट हो न यहां?’’ वैभव ने गार्डन में निशा के करीब जा कर पूछा.

‘‘कुछ काम है?’’ निशा ने पलट कर सवाल किया.

निशा का यह औपचारिक व्यवहार वैभव को अजीब लगा. वह झेंपता हुआ बोला, ‘‘कोई काम नहीं है. बस, तुम्हें न्यू ईयर का गिफ्ट देना है. तुम्हारे लिए एक डायरी खरीद कर रखी है. तुम पहली जनवरी को तो आई नहीं, 10 को आई हो. मैं कई दिन डायरी ले कर गार्डन आया, लेकिन आज नहीं ले कर आया. रुकना, मैं डायरी ले कर आ रहा हूं.’’

‘‘तुम डायरी लेने घर जाओगे? रहने दो, मुझे नहीं चाहिए. कई डायरियां हैं घर में,’’ निशा बोली.

‘‘यह मैं ने कब कहा कि तुम्हारे पास डायरी नहीं है. तुम्हारे पास सबकुछ है. बस, मेरी खुशी के लिए ले लो. मैं ने बड़े प्रेम से उसे तुम्हारे लिए रखा है. मैं लेने जा रहा हूं,’’ निशा के जवाब को सुने बिना वैभव वहां से चला गया.

कुछ देर बाद वह बतौर गिफ्ट डायरी ले कर गार्डन में वापस आया. तब तक निशा के आसपास काफी लोग आ गए थे. वहां उस ने गिफ्ट देना उचित नहीं समझा, लेकिन जब निशा गार्डन से जाने लगी तो वैभव रास्ते में उस से मिला.

‘‘लो,’’ वैभव ने डायरी आगे बढ़ाते हुए बड़े प्रेम से कहा.

लेकिन निशा ने डायरी लेने के लिए हाथ आगे नहीं बढ़ाया. वह चुपचाप खड़ी रही.

‘‘लो,’’ वैभव ने दोबारा कहा.

‘‘नहीं, मैं इसे नहीं ले सकती,’’ निशा ने सीधे शब्दों में इनकार कर दिया.

‘‘आखिर क्यों?’’ वैभव ने खुद को अपमानित महसूस करते हुए जानना चाहा.

‘‘मैं घरपरिवार वाली हूं, मैं इसे किसी भी हालत में नहीं ले सकती,’’ निशा यह कह कर आगे बढ़ गई.

इस बार वैभव ने भी कुछ नहीं कहा. उस के दिल को जबरदस्त धक्का लगा. वह डायरी को अपनी कमीज के नीचे छिपाते हुए विपरीत दिशा की ओर चल पड़ा. उस की आंखों में आंसू उमड़ आए थे. कुछ दूर चलने के बाद वह एकांत में बैठ गया और सोचने लगा कि वह उस डायरी का क्या करे?

तभी उस के मन में आया कि डायरी को वह योग सिखाने वाले गुरुजी को दे देगा. तत्काल उस ने उस पृष्ठ को फाड़ा, जिस पर बड़े प्यार से निशा को संबोधित करते हुए नववर्ष की शुभकामना लिखी थी. उस ने जा कर गुरुजी को डायरी दे दी. गुरुजी ने गिफ्ट सहर्ष स्वीकार कर लिया और उसे आशीर्वाद दिया, लेकिन उसे वह खुशी नहीं मिली, जो निशा से मिलती. अभी भी उस का मन अशांत था और वह यकीन ही नहीं कर पा रहा था कि एक छोटी सी डायरी स्वीकार करने में निशा ने इतनी हठ क्यों दिखाई.

वह तरहतरह की बातें सोच रहा था, ‘चलो, इस गिफ्ट के बहाने हकीकत पता लग गई. जिस निशा को मैं जीजान से चाहता हूं, उस के मन में मेरे प्रति इतनी भी भावना नहीं है कि वह मेरा गिफ्ट तक ले सके. मैं भ्रम में जी रहा था.

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‘अब उस से कोई संबंध नहीं रखूंगा. आज से सारा रिश्ता खत्म…नहीं…नहीं, लेकिन क्या मैं ऐसा कर पाऊंगा? क्या मैं उस से दूर रह कर जी पाऊंगा…शायद नहीं…क्यों नहीं जी पाऊंगा? उस से दूरी तो बना ही सकता हूं. दूर से देख लिया करूंगा, लेकिन मिलूंगा नहीं और न ही बात करूंगा. वह यही तो चाहती है. कब उस ने मुझ से मन से बात की? मैं ही तो उस से बात करता था. 10 शब्द बोलता था तो ‘हांहूं’ वह भी कर देती थी. कोई लगाव थोड़े ही था. लगाव तो मेरा था कि उस के बिना रातदिन बेचैन रहा करता था. उस के लिए तड़पता रहा, जिस ने आज मेरा इतना बड़ा अपमान कर दिया.

‘अगर ऐसा मालूम होता तो मैं उसे गिफ्ट देने का विचार ही मन में न लाता. ऐसी बेइज्जती मेरी इस से पहले कभी नहीं हुई. अब मैं उस से नजरें मिलाने लायक भी नहीं रहा. क्या मुंह ले कर उस के सामने जाऊंगा? अब तो दूरी ही ठीक है.’

लेकिन क्या ऐसा सोचने से मन बदल सकता था वैभव का? उस का प्यार बारबार उस पर हावी हो जाता और वह निशा से दूर रहने का निर्णय ले पाने में असफल हो जाता.

दिनभर उस का मन किसी काम में नहीं लगा. वह बेचैन रहा. उसे रात को ठीक से नींद भी नहीं आई. तरहतरह के विचार उस के मन में आते रहे.

वह उस बात को अपनी पत्नी सरिता से भी शेयर नहीं कर सकता था. हालांकि निशा के बारे में वह सरिता को बताया करता था, लेकिन यह बताने की उस की हिम्मत न थी. उसे डर था कि सरिता उस का मजाक उड़ाएगी. अंदर ही अंदर वह घुट रहा था.

अगले दिन सुबह 5 बजे वह जागा. रात को उस ने निश्चय किया था कि कुछ दिन तक वह गार्डन नहीं जाएगा, लेकिन सुबह खुद को रोक नहीं सका. निशा की एक झलक पाने के लिए वह बेचैन हो उठा और घर से चल पड़ा.

रास्ते में तरहतरह के विचार उस के मन में आते रहे, ‘आज निशा मिलेगी तो उस से बात नहीं करूंगा. अभिवादन भी नहीं. वह अपनेआप को समझती क्या है? उसे खुद पर घमंड है, तो मैं भी किसी मामले में उस से कम नहीं हूं. उस से मेरा कोई स्वार्थ नहीं है. बस, एक लगाव है, अपनापन है, जिसे वह गलत समझती है.’

लेकिन जब गार्डन आती हुई निशा अचानक दिखी, तो वैभव खुद को रोक नहीं पाया. वह उसे देखने लगा. निशा भी उसी की ओर देख रही थी. वैभव के मन में आया कि वह रास्ता बदल ले, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका.

निशा वैभव के करीब आ गई, लेकिन वह उस की ओर न देख कर सामने देख रही थी. वैभव की निगाहें उसी पर थीं. वह सोच रहा था, ‘देखो न, आज इस ने एक बार भी पलट कर नहीं देखा. जाओजाओ, मैं ही कौन सा मरा जा रहा हूं, तुम से बात करने के लिए. मैं आज निशा की तरफ बिलकुल नहीं देखूंगा आखिर वह अपनेआप को समझती क्या है और ऐसे ही कब तक अपनी मनमरजी चलाती है.‘

तभी निशा उस की ओर पलटी. वैभव के हाथ तत्काल अभिवादन की मुद्रा में जुड़ गए. निशा ने भी अभिवादन का जवाब दिया, लेकिन आगे उन दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई.

इस के बाद गार्डन में दोनों अपनेअपने क्रियाकलाप में लग गए, लेकिन वैभव का मन बारबार निशा की ओर भाग रहा था.

ऐसे ही कई दिन गुजर गए. वैभव को निशा के बिना चैन नहीं था, लेकिन वह ऊपर से खुद को ऐसा दिखाने की कोशिश करता कि जैसे उस का निशा से कोई सरोकार ही नहीं है.

निशा सबकुछ समझ रही थी. एक दिन उस ने वैभव को रोका और मुसकराते हुए पूछा, ‘‘नाराज हो क्या?’’

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‘‘नहीं. नाराज उन से हुआ जाता है, जो अपने हों. आप से मैं क्यों नाराज होने लगा?’’

निशा मुसकराते हुए बोली, ‘‘कुछ भी कहो, लेकिन नाराज तो हो. तुम्हारा चेहरा, दिल का हाल बयान कर रहा है, लेकिन तुम ने मेरी मजबूरी नहीं समझी.’’

‘‘एक छोटा सा गिफ्ट लेने में क्या मजबूरी थी?’’ वैभव ने तल्खी के साथ पूछा.

‘‘मजबूरी थी, वैभव. तुम ने समझने की कोशिश नहीं की,’’ निशा ने कहा.

‘‘मैं भी जानूं कि क्या मजबूरी थी?’’ वैभव ने जानना चाहा.

‘‘वैभव, सिर्फ भावनाओं से ही काम नहीं चलता. आगेपीछे भी सोचना पड़ता है. मैं ने कहा था न कि मैं घरपरिवार वाली हूं. तुम ने इस पर तो विचार नहीं किया और नाराज हो कर बैठ गए,’’ निशा ने कहा, ‘‘मैं अगर तुम्हारा गिफ्ट ले कर घर जाती तो घर के लोगपूछते कि किस ने दिया? सोचो, मैं क्या जवाब देती?

‘‘डायरी में तुम ने अपना नाम तो जरूर लिखा होगा. तुम्हारा नाम देख कर घर वाले क्या सोचते? इस बारे में तो तुम ने कुछ सोचा नहीं. बस, मुंह फुला लिया. बेवजह शक पैदा होता और मेरे लिए परेशानी खड़ी हो जाती. ऐसा भी हो सकता था कि मेरा गार्डन में आना हमेशा के लिए बंद हो जाता. तब हम दोनों मिल भी न पाते.’’

यह सुन कर वैभव को अपनी गलती का एहसास हुआ. उस के सारे गिलेशिकवे दूर हो गए और वह बोला, ‘‘तुम अपनी जगह सही थी, निशा.

‘‘तुम ने तो बड़ी समझदारी का काम किया. मुझे माफ कर दो. तुम्हारा फैसला ठीक था.

‘‘अब मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं है. एक छोटा सा गिफ्ट तुम्हें वाकई परेशानी में डाल सकता था.’’

Manohar Kahaniya: डिंपल का मायावी प्रेमजाल- भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

इस गलती का अहसास उन्हें तब हुआ, जब डिंपल और उस के गैंग के सदस्यों ने उन से करीब 60 लाख रुपए ऐंठ लिए. यह शातिर गैंग डिंपल के सहारे मोटी आसामी को इस तरह फांसता था कि…

गुजरात के जिला ऊंझा की गंजबाजार की एक कंपनी में मेहता (मुनीम) की नौकरी करने वाले मेहताजी आ कर अभी गद्दी पर बैठे ही थे कि उन के

फोन की घंटी बजी. उन्होंने फोन उठा कर स्क्रीन देखी तो पता चला फोन किसी अंजान का है, क्योंकि स्क्रीन पर नाम के बजाए नंबर आ रहा था.

किसी व्यापारी का नया नंबर होगा, यह सोच कर मेहताजी ने फोन उठा लिया. उन्होंने फोन उठा कर जैसे ही ‘हैलो’ कहा, दूसरी ओर से शहद में घुली आवाज आई, ‘‘हैलो मेहताजी, मैं डिंपल बोल रही हूं.’’

हैरान हो कर मेहताजी ने पूछा, ‘‘कौन डिंपल, मैं तो किसी डिंपल को नहीं जानता?’’

‘‘नहीं जानते तो अब जान जाएंगे. मैं तो आप को खूब अच्छी तरह जानती हूं मेहताजी.’’ दूसरी ओर से फिर उसी खनकती आवाज में कहा गया.

‘‘आप भले मुझे जानती हैं, पर मैं तो आप को बिलकुल नहीं जानता. खैर, छोड़ो यह सब. यह बताइए कि आप ने फोन क्यों किया है?’’ मेहताजी ने पूछा.

‘‘दोस्ती करने के लिए,’’ डिंपल ने कहा.

‘‘दोस्तीऽऽ आप मुझ से क्यों दोस्ती करना चाहती हैं?’’ मेहताजी ने हैरानी से पूछा जरूर, पर एक लड़की द्वारा दोस्ती करने की बात सुन कर उन के मन में लड्डू फूटने लगे थे. एक लड़की ने खुद ही दोस्ती का औफर जो किया था. लेकिन उसी समय औफिस में कस्टम आ गए तो उन्होंने कहा, ‘‘ऐसा है डिंपलजी, अब औफिस में लोग आ गए हैं, इसलिए इस तरह की बातें नहीं हो सकतीं. दोपहर को लंचटाइम में मैं आप को फोन करता हूं.’’

‘‘कितने बजे होता है आप का लंच?’’ डिंपल ने पूछा.

‘‘एक बजे.’’

‘‘तब तक मुझे इंतजार करना होगा? इतनी देर तक कैसे इंतजार करूंगी मैं?’’ वह बोली.

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‘‘जैसे अब तक किया है. आज से पहले जिस तरह आप का काम चल रहा था, उसी तरह चलाइए,’’ मेहता ने कहा.

‘‘मेहताजी, तब की बात और थी. तब आप से दोस्ती कहां हुई थी. अब दोस्ती हो गई है तो इंतजार करना बहुत मुश्किल लग रहा है.’’

‘‘ऐसा है, अब काम करने दो. दोपहर को एक बजे मैं फोन करता हूं. बाय…’’

‘‘बाय करने का मन तो नहीं कर रहा है, पर आप को काम करना है न, इसलिए बेमन से बाय कह रही हूं.’’ डिंपल बोली.

डिंपल ने जैसे ही बाय कहा, मेहताजी ने काल डिसकनेक्ट कर दी और डिंपल का नंबर अपने फोन में सेव कर लिया.

मेहताजी की भी मजबूरी थी, इसलिए न चाहते हुए उन्होंने फोन तो काट दिया था, पर उन का मन यही कर रहा था कि वह काम छोड़ कर बाहर निकल जाएं और डिंपल को फोन लगा कर आराम से बैठ जाएं और खूब बातें करें.

दूसरी ओर वह यह भी सोच रहे थे कि यह डिंपल कौन है, उन्हें कैसे जानती है, उन से क्यों दोस्ती करना चाहती है. यह सब उन की समझ में नहीं आ रहा था. इसी सोच में डूबे होने की वजह से उस दिन काम में उन का मन नहीं लग रहा था. उन का पैसों के हिसाबकिताब का काम था, अगर कुछ गड़बड़ होती तो उन की साख खराब हो सकती थी.

बहरहाल, किसी तरह उन्होंने दोपहर तक का समय बिताया. लंच होते ही लंच बौक्स खोलने के साथ ही उन्होंने डिंपल को फोन लगा दिया.

दूसरी ओर डिंपल जैसे उन्हीं के फोन का इंतजार ही कर रही थी. क्योंकि मेहताजी का फोन लगते ही दूसरी ओर से फोन रिसीव कर लिया गया था.

मायावी प्यार में फंस गए मेहताजी

फोन रसीव होते ही मेहताजी के कानों में घुंघरू जैसी खनकती आवाज आई, ‘‘हैलो मेहताजी, कैसे हैं आप? लगता है, आप भी मेरी तरह मुझ से बात करने के लिए बेचैन थे. इसीलिए लंच होते ही, लगता है टिफिन भी नहीं खोला और फोन लगा दिया.’’

‘‘सही कह रही हो डिंपलजी, अभी लंच बौक्स नहीं खोला है. सोचा कि फोन लगा लूं, आप से बात भी होती रहेगी और लंच भी होता रहेगा. आप से बात करते हुए लंच करने में आज कुछ ही ज्यादा मजा आएगा. शायद खाने का स्वाद भी बढ़ जाएगा.’’ मेहताजी ने मक्खन लगाते हुए कहा.

मेहताजी कुछ और कहते, डिंपल बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘अब बस कीजिए मेहताजी, इतना ज्यादा भी मत चढ़ा दीजिए कि नीचे न आ पाऊं. एक बात और, आप यह जो बारबार आप और डिंपलजी कह रहे हैं, दोस्ती में यह अच्छा नहीं लगता. जो प्यार और अपनापन तुम कहने और नाम लेने में झलकता है, वह आप और डिंपलजी में बिलकुल नहीं. इसलिए अब मैं भी तुम्हें आप नहीं तुम कहूंगी. ठीक कहा न?’’ डिंपल बोली.

‘‘ठीक है, मैं वही कहूंगा, जो तुम्हें अच्छा लगेगा.’’

‘‘मैं तुम से बात कर के ही खुश थी. लेकिन अब लगा कि तुम प्यार भी करने लगे हो. अब तो मेरी खुशी की कोई सीमा ही नहीं है. इसलिए अब तो तुम से मिलने का मन हो रहा है.’’ डिंपल ने हंसते हुए कहा, ‘‘मिलोगे मुझ से?’’

‘‘क्यों नहीं. तुम मिलना चाहोगी तो मैं जरूर मिलूंगा. अरे हां, तुम ने अभी तक अपनी कोई फोटो तो भेजी नहीं. जरा देखूं तो मेरी दोस्त कितनी खूबसूरत है.’’

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‘‘मेहताजी, मैं अब केवल तुम्हारी दोस्त ही नहीं रही. बात आगे बढ़ गई है. तुम्हारे दिल का तो पता नहीं, पर मेरे दिल में तो अब कुछकुछ होने लगा है.’’ डिंपल ने कहा, ‘‘मैं अपना फोटो भेज रही हूं. और हां, मेरा फोटो देखते हुए अपना दिल थामे रखना, क्योंकि धड़कन तो बढ़ेगी ही, पर कहीं इतनी न बढ़ जाए कि…’’

मेहताजी को लगा कि डिंपल यह बात कहते हुए मुसकरा रही थी. फोटो भेजने की बात सुन कर ही मेहताजी की धड़कनें बढ़ गई थीं. बात करते हुए ही उन्होंने वाट्सऐप खोल कर देखा तो डिंपल का फोटो आया हुआ था.

मेहताजी ने झट से फोटो डाउनलोड किया. फोटो देख कर वह उसे देखते ही रह गए. डिंपल की खूबसूरती में वह इस तरह खो गए कि उन्हें खयाल ही नहीं रहा कि वह इतनी खूबसूरत लड़की से बात कर रहे हैं.

दूसरी ओर से डिंपल चिल्लाई, ‘अरे, कहां चले गए तुम,’ तब मेहताजी को खयाल आया.

उन्होंने कहा, ‘‘अरे भाई, मैं तुम्हारा फोटो देख रहा था. सचमुच तुम बहुत खूबसूरत हो. मैं तुम्हें देख कर भूल ही गया कि तुम से बात भी कर रहा हूं.’’

‘‘तुम मजाक बहुत अच्छा कर लेते हो. मैं इतनी खूबसूरत तो नहीं हूं कि तुम बात करना ही भूल गए.’’ डिंपल ने कहा.

‘‘कोेई खुद को सुंदर थोड़े ही कहता है. सुंदर तो वही कहेगा, जिसे लगेगा. तुम सुंदर लग रही हो, इसलिए मैं कह रहा हूं. मन करता है कि बस, तुम्हें ही देखता रहूं.’’

‘‘फोटो देखने से क्या होगा?’’

‘‘अब तो तुम से मिलने का मन हो रहा है.’’ मेहताजी ने कहा, ‘‘मैं ने भी अपनी फोटो भेज दी है.’’

‘‘तो आ जाओ. मैं ने कहां मना किया है. रही बात आप के फोटो की तो मैं ने आप से पहले ही कहा था कि मैं आप को जानती हूं.’’

‘‘खैर, उसे छोड़ो, तुम यह बताओ कि तुम से मिलने के लिए कहां आना होगा?’’ मेहताजी ने पूछा.

‘‘ऐसा करो, तुम ऐठोर चौराहे पर आ कर फोन करो. मैं तुम्हें वहीं मिल जाऊंगी.’’ डिंपल ने कहा.

‘‘अभी तो मैं औफिस में हूं. शाम 6 बजे के बाद ही आ सकता हूं.’’ मेहताजी ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं, शाम 6 बजे के बाद ही आना. मैं कहीं जा थोड़े ही रही हूं. पर अब मैं भी आप से मिलने के लिए बेकरार हूं. आप की बातों ने मुझे बेचैन कर दिया है.’’ डिंपल ने थोड़ा नशीले अंदाज में कहा. अब तक लंचटाइम खत्म हो चुका था, इसलिए मेहताजी को न चाहते हुए भी फोन काटना पड़ा.

मेहताजी का वह पूरा दिन डिंपल के खयालों में ही बीता. वह बस यही सोचते रहे कि डिंपल से मिल कर क्या बातें करेंगे? क्या कहेंगे? संयोग देखो, उन्होंने शाम को डिंपल से मिलने का वादा कर लिया था, पर वह उस शाम डिंपल से मिलने जा नहीं पाए.

हुआ यह कि उन की कंपनी के डायरेक्टर ने उन्हें किसी व्यापारी को पैसे देने के लिए भेज दिया था. बड़े दुखी मन से उन्होंने डिंपल से माफी मांग ली थी.

उस रात उन्हें नींद नहीं आई. वह डिंपल को ले कर तरहतरह की बातें सोचते रहे कि मिलेंगे तो क्या बातें करेंगे? वह उन से क्या कहेगी? देर रात नींद आई तो उस ने सपने में भी उसे ही देखा. सपने में वह उन से कह रही थी, ‘‘अब मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकती.’’

मेहताजी अभी कुंवारे ही थे. डिंपल पहली लड़की थी, जो उन के जीवन में आई थी. इस के पहले किसी लड़की से इस तरह की बातें करने की कौन कहे, उन की दोस्ती तक नहीं हुई थी. इसीलिए तो उस की रसीली बातों ने उन्हें पागल कर दिया था. जब भी उन्हें मौका मिलता, वह फोन में आई डिंपल की फोटो देख लेते थे. वह उस से मिलने के लिए बेचैन थे. सुबह वह उस से मिल नहीं सकते थे. क्योंकि सुबह मिलने से डिंपल ने मना कर दिया था. उस ने कहा था कि 11 बजे से पहले वह घर से नहीं निकल पाएगी.

जबकि साढ़े 9 बजे मेहताजी को औफिस पहुंचना होता था. वह छुट्टी भी नहीं ले सकते थे. उस दिन औफिस में डायरेक्टर से उन की जरूरी मीटिंग थी. आखिर मन मार कर वह औफिस पहुंच गए.

उस दिन जरूरी काम की बात कह कर वह घर से आधा घंटा पहले निकल गए थे. औफिस पहुंचते ही उन्होंने डिंपल को फोन मिला दिया. बातचीत शुरू हुई तो मेहताजी ने कहा, ‘‘आज लंचटाइम से मैं छुट्टी ले लूंगा. तुम 2 बजे मिलने के लिए तैयार रहना. औफिस से निकलते ही मैं तुम्हें फोन करूंगा.’’

डिंपल तो उन से मिलने के लिए तैयार ही थी. उस ने हामी भर दी. औफिस से निकल कर मेहताजी ने फोन किया तो डिंपल ऐठोर चौराहे पर आ कर खड़ी हो गई.

दोनों ने एकदूसरे के फोटो देखे ही थे, इसलिए एकदूसरे को पहचानने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई. मेहताजी ने डिंपल को देखा तो देखते ही रह गए. इस समय वह फोटो से भी ज्यादा खूबसूरत लग रही थी. जवानी में तो वैसे भी हर लड़की खूबसूरत लगती है. जबकि डिंपल तो वैसे भी खूबसूरत थी.

मेहताजी खूबसूरत डिंपल को पा कर निहाल हो गए थे. कुछ पल तक वह उसे निहारते रहे. चौराहे पर खड़े हो कर किसी लड़की से बात करना ठीक नहीं था, इसलिए मेहताजी ने डिंपल से कहीं एकांत में चलने को कहा तो डिंपल बोली, ‘‘कहीं ऐसी जगह ले चलो, जहां तुम्हारे और मेरे अलावा और कोई न हो.’’

मेहताजी ने सोचा था कि डिंपल किसी रेस्टोरेंट में चल कर फैमिली बौक्स में बैठने की बात कहेगी. पर जब उस ने कहीं ऐसी जगह चलने की बात कही कि जहां उन दोनों के अलावा कोई और न हो तो वह असमंजस में पड़ गए. वह इस तरह की जगह के बारे में सोचने लगे. काफी सोचनेविचारने के बावजूद कोई ऐसी एकांत जगह उन की नजर में नहीं आई, जहां उसे ले कर जाते. क्योंकि वह समझ गए थे कि डिंपल इस तरह की जगह पर चलने के लिए क्यों कह रही है.

पहली मुलाकात में ही हो गईं हसरतें पूरी

आखिर वह उसे ले कर अपने एक दोस्त के औफिस पहुंच गए. तब डिंपल खीझ कर बोली, ‘‘तुम्हें यही एकांत जगह मिली थी? औफिस में क्या होगा?’’

मेहताजी सोच में पड़ गए. जब कुछ देर तक वह कुछ नहीं बोले तो डिंपल ने कहा, ‘‘क्या सोच रहे हो? तुम्हारे पास कोई ऐसी जगह नहीं है क्या, जहां मेरे और तुम्हारे अलावा और कोई न हो?’’

थोड़ा सकुचाते हुए मेहताजी ने कहा, ‘‘हां, मेरे पास ऐसी कोई जगह नहीं है. कहो तो किसी होटल में कमरा ले लेते हैं. पर इस तरह किसी होटल में जाएंगे तो होटल वाला भी हमारे बारे में अच्छा नहीं सोचेगा.’’

‘‘मैं होटल में वैसे भी नहीं जाऊंगी. आप के पास ऐसी कोई जगह नहीं है तो मेरे साथ चलो. मेरे पास है ऐसी जगह. मेरी सहेली का घर है. इस समय वह मायके गई हुई है. देखभाल के लिए घर की चाबी मुझे दे गई है. वहां किसी तरह का कोई डर नहीं है. आराम से बैठ कर जब तक मन होगा, तब तक बातें करेंगे. और हां, खानेपीने के लिए कुछ साथ लेते चलेंगे, जिस से अंदर जाने के बाद फिर किसी चीज के लिए बाहर निकलना न पड़े.’’

मेहताजी भी तो इसी तरह की जगह चाहते थे. डिंपल की सुंदरता और उस की बातों में वह कुछ इस तरह खो चुके थे कि यह भी नहीं सोच पा रहे थे कि डिंपल आखिर उस पर इतना क्यों मेहरबान है कि पहली ही मुलाकात में वह उसे ऐसी जगह ले जा रही है, जहां उन दोनों के अलावा और कोई न हो.

डिंपल के साथ ऐसी जगह जा कर क्या होगा, वह इस से भी अंजान नहीं थे. लेकिन जब आदमी की मति मारी जाती है तो वह अपना भलाबुरा नहीं सोच पाता.

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यही हुआ मेहताजी के साथ. वह भी अपना भलाबुरा नहीं सोच पाए. रास्ते में एक रेस्टोरेंट से खानेपीने का अच्छाखासा सामान बंधवा कर वह डिंपल के साथ उस की सहेली के घर पहुंचे तो घर पर ताला लगा था.

ताला खोल कर दोनों अंदर पहुंचे तो घर एकदम साफसुथरा था. कहीं से ऐसा नहीं लग रहा था कि यह घर कई दिनों से बंद था. पर मेहताजी ने इस बात पर भी ध्यान ही नहीं दिया.

मेहताजी सोफे पर बैठे तो डिंपल भी उन से सट कर बैठी ही नहीं, बल्कि उन की गोद में लेट सी गई. मेहताजी भी डिंपल का इरादा भांप कर अपने काम में लग गए. उन्होंने उस के शरीर पर अपने हाथों से हरकत करनी शुरू कर दी. थोड़ी ही देर में वह सब हो गया,

जो एक मर्द और औरत के बीच में एकांत में होता है.

इस के बाद तो डिंपल और मेहताजी के बीच फोन पर खूब बातें तो होती ही थीं, जब देखो, तब मेहताजी डिंपल से मिलने भी लगे थे. मेहताजी को डिंपल से मिलने में मजा भी खूब आ रहा था.

पर एक दिन जब मेहताजी अपनी कार से डिंपल के कहने पर उसे विसपुर छोड़ने जा रहे थे तो रास्ते में एक युवक मिला जो उन से लड़नेझगड़ने लगा.

वह डिंपल को अपनी पत्नी बता कर मेहताजी पर आरोप लगाने लगा कि इस आदमी ने उस की पत्नी को बहलाफुसला कर अवैध संबंध बना लिए हैं. अब वह ऐसी औरत को कतई नहीं रखेगा, जिस के किसी अन्य पुरुष से संबंध हैं.

डिंपल भी रोने लगी कि अब वह कहां जाएगी. वह मेहताजी से कहने लगी कि अगर उस का पति उसे नहीं रख रहा है तो वह उसे अपने साथ रखें.

मेहताजी तो डिंपल के साथ सिर्फ मौजमजा करना चाहते थे. उन्होंने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं था कि मौजमजा के चक्कर में बात यहां तक पहुंच जाएगी. डिंपल अब उन के गले की हड्डी बन गई थी. वह डिंपल के चक्कर में बुरी तरह फंस चुके थे.

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जीने की राह- भाग 4: उदास और हताश सोनू के जीवन की कहानी

Writer- संध्या 

मैं ने स्वयं ही मन में एक संकल्प लिया कि मैं नीता और रिया की यादों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दूंगा बल्कि उसे संबल बनाऊंगा और उस से प्रेरणा ले कर जिंदगी आगे जीऊंगा. एक पल बाद मैं सोचने लगा, मैं करूंगा क्या ऐसा, जिस से जीवन सार्थक महसूस हो. एकाएक सोनू की याद आ गई-तनहा, उदासीन, सोनू. मन में एक संकल्प उभर आया, हां, मैं नीता व रिया की अपनी यादों को अपने दिल में बसाए, अपने जीवन में संजोए, तनहा व उदासीन सोनू की जिंदगी संवारने की कोशिश करूंगा. इस उदास युवती को एक सामान्य खुशहाल जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करूंगा. अब मेरे जीवन का यही लक्ष्य होगा. मैं खुद को बेहद हलका महसूस करने लग गया, जीने की राह जो मुझे मिल गई थी.

अपने संकल्प की चर्चा मैं ने किसी से भी नहीं की थी. मैं ने कालेज भी जौइन कर लिया. मन में खयाल आया, अपने दुख के कारण विद्यार्थियों को हानि पहुंचाना गलत है, सो, अब सुबह कालेज जाने की व्यस्तता हो गई थी. सोनू ने भी स्कूल जौइन कर लिया था. दिन में हम अपनेअपने कार्यों में व्यस्त रहते थे किंतु शाम में अवश्य मौका निकाल कर हम मिल लेते थे. अचानक 5 दिनों के लिए उत्तम एवं भाभीजी को दिल्ली जाने का प्रोग्राम बनाना पड़ गया, परिवार में एक शादी पड़ गई थी. सोनू फ्लैट में अकेली रह गई थी, इसलिए मैं उस का ज्यादा खयाल रखने लगा था. अब वह भी मुझ से ज्यादा बातें करने लगी है. उस ने अपने मांपापा के विषय में विस्तार से बताया कि उस के मांपापा ने दोनों परिवारों के विरोध के बावजूद अंतर्जातीय विवाह किया था. इसलिए दोनों परिवार वालों ने उन लोगों से संबंध तोड़ लिए थे. उस ने बताया कि उस के मांपापा को उस से पहले भी एक बेटी हुई थी, जिस का नाम पापा ने बड़े प्यार से ‘संगम’ रखा था. 2 भिन्न जातिधर्म का संगम. उस की मां बहुत सरल स्वभाव की थीं, उन्होंने दोनों परिवारों को संगम के बहाने मिलाने का काफी प्रयास किया किंतु दोनों तरफ से कड़ा जवाब ही मिला कि वे संगम को नाजायज औलाद मानते हैं, उस के जन्म से उन्हें कोई खुशी नहीं है. सो, मेलमिलाप का तो सवाल ही नहीं उठता है. उस ने आगे बताया, ‘‘संगम 9 माह की हो कर खत्म हो गई. मां ने बताया था कि संगम को सिर्फ बुखार हुआ था, जो अचानक काफी तेज हो गया था. उसे डाक्टर के पास ले गए किंतु उस ने कम समय में ही आंखें उलट दीं एवं उस का शरीर ऐंठ गया. डाक्टर कुछ भी न कर सके.

‘‘मांपापा का प्यार सच्चा था, दोनों एकदूसरे का संबल बन एकदूसरे के लिए खुश रहते एवं एकदूसरे को खुश रखने की पूरी कोशिश करते. संगम की मृत्यु के 2 साल बाद मेरा जन्म हुआ. मां ने फिर दोनों परिवारों से मुझे स्वीकार करने की मिन्नतें कीं. उन्होंने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि इस नन्ही जान को स्वीकार कर लीजिए. आप लोगों ने मेरी पहली बच्ची को नहीं स्वीकारा, वह रूठ कर चली गई. किंतु मां की पुकार दोनों परिवारों के बीच की तपन को पिघला न सकी. दोनों परिवारों का एक ही जवाब था, जब हमारा तुम से ही कोई संबंध नहीं है तब तुम्हारी औलाद से हमें क्या मोह?

‘‘मां ने मुझे बताया था कि दोनों परिवारों के रुख के कारण पापा ने नाराज हो कर मां से वचन लिया था कि अब वह कभी भी दोनों परिवारों से मेलमिलाप का प्रयास नहीं करेगी. इस के बाद मां ने दोनों परिवारों के संबंध में सोचना बंद कर दिया,’’ मुझे यह सब बता कर सोनू फूटफूट कर रो पड़ी. मैं ने उसे सांत्वना देने के उद्देश्य से उस के कंधे थपथपाते हुए कहा, ‘‘सोनू, धैर्य रखो, आश्चर्य होता है लोग इतने निर्दयी क्यों हो जाते हैं जो अपने खून को पहचानने से, उसे स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं.’’ सोनू अपने आंसू पोंछती हुई बोली, ‘‘मनजी, मेरी समझ में नहीं आता, लोग प्यार से इतनी घृणा क्यों करते हैं. मेरे मांपापा अलगअलग जातिधर्म के थे, दोनों ने प्यार किया था, कोई अपराध तो नहीं किया था, किंतु दोनों परिवारों ने उन का बहिष्कार कर दिया. मां ने एक बार बताया था कि उन की मां ने उन्हें उलाहना देते हुए कहा था कि यह दिन दिखाने से तो अच्छा होता कि वे मर गई होतीं, तो उन्हें खुशी होती.’’

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सोनू की जीवनगाथा सुननेसुनाने में हमें समय का खयाल ही नहीं रहा. रात के साढ़े 8 बज चुके थे. मैं ने कहा, ‘‘सोनू, काफी देर हो चुकी है. अब तुम घर जाओ. हम कल मिलते हैं. अपना खयाल रखना.’’ वह बिना कुछ बोले, धीरे से बाय, गुडनाइट कह कर चल दी. रविवार का दिन था, सोनू का फोन आया, ‘‘मनजी, मेरे साथ मार्केट चलिएगा, घर का थोड़ा जरूरी सामान खरीदना है.’’

मैं ने कहा, ‘‘ठीक है, 4 बजे तक चलते हैं.’’ हम नजदीक के मौल में चले गए. उस ने चादरें, तौलिया तथा किचन का काफी सामान लिया. मैं ने भी किचन की कुछ चीजें खरीद लीं. यह सब खरीदारी नीता ही किया करती थी. सो, मुझे थोड़ी असुविधा हो रही थी. सोनू से मुझे खरीदारी में काफी मदद मिली. खरीदारी करते हुए हमें 8 से ऊपर बज गए. सो हम ने डिनर भी बाहर ही कर लिया. सोनू का सामान कुछ ज्यादा था, इसलिए मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारा सामान तो ज्यादा है, इसलिए कुछ सामान मैं तुम्हारे घर तक पहुंचा देता हूं.’’ उस ने सहमति में सिर हिला दिया. उस का सामान पहुंचा कर मैं लौटने लगा तब वह बोली, ‘‘मनजी, मैं आप से कुछ कहना चाहती हूं.’’

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‘‘हांहां, बोलो,’’ मैं ने कहा.

वह झिझकते हुए बोली, ‘‘मनजी, अब हम एकदूसरे को अच्छी तरह से जानते हैं.’’ मैं ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘दरअसल, समान दुख के कारण हम एकदूसरे को जल्दी समझ सके.’’ ‘‘मनजी, हमें एकदूसरे को जानते हुए 6 माह से भी ऊपर हो चुके हैं. मैं इंतजार में थी कि आप ही इस संबंध में कुछ करते किंतु आप तो…’’ वह एक पल रुक कर मुसकराते हुए बोली, ‘‘मनजी, आप बहुत भले इंसान हैं. इतनी बातें मैं मांपापा के सिवा सिर्फ आप से करती हूं.’’ मैं ने भी उस की हां में हां मिलाते हुए कहा, ‘‘मैं भी इतनी बातें सिर्फ नीता और रिया से करता था. हम दोनों बातें कर ही रहे थे कि उत्तम और भाभीजी दिल्ली से लौट आए. घर के सामने उन की टैक्सी आ चुकी थी, हम दोनों उन की अगवानी में लग गए. उत्तम से सारी बातें जानने के लिए मैं अधीर हो रहा था, क्योंकि मैं ने उस से विशेष आग्रह किया था कि वह दिल्ली में समय निकाल कर मेरे बड़े भैया एवं भतीजे सुमन से अवश्य मिल ले तथा मैं ने शादी संबंधी जो भैया एवं सुमन से सलाह मांगी थी, वह प्रत्यक्षत: उस संबंध में राय जान ले एवं उन की प्रतिक्रिया प्रत्यक्षत: देख कर, उन के विचार साफतौर पर समझ ले. उत्तम ने बताया कि दोनों ही मेरे विचारों से सहमत हैं तथा इस सिलसिले में इसी हफ्ते आ जाएंगे. अगले दिन सोनू शाम को मेरे घर पर आई थी. हम दोनों चाय पी रहे थे एवं बातें कर रहे थे कि बड़े भैया का फोन आया. जरूरी बातें कर, मैं ने उन से थोड़ी देर बाद बात करने की बात कह कर फोन काट दिया.

तांक झांक- भाग 2: क्यों शालू को रणवीर की सूरत से नफरत होने लगी?

Writer- Neerja Srivastava

‘ओह आज तो सुबह से बड़ी चहलकदमी हो रही है… तैयार मैडम प्रिया सधे कदमों से हाईहील में खटखट करते इधरउधर आजा रही हैं,’ दिल में उस के जलतरंग सी उठने लगी. ‘लगता है किसी फंक्शन में जा रही है… उफ लो यह खड़ूस अपने जूते पहने यहीं आ मरा… बेटा, थ्री पीस सूट पहन कर हीरो नहीं बन जाएगा… बीवी की बात कभी तो मान लिया कर… थोड़ी बौडीशौडी बना ले,’ तरुण परदे के पीछे खड़ा बड़बड़ाए जारहा था.

‘काश, प्रिया जैसी मेरी बीवी होती… खटखट करते2 कदम आगे2 कदम पीछे करके मेरे साथ डांस करती… मैं उसे यों गोलगोल घुमाता,’ वह खयालों में खो गया.

एक दिन खयालों को सच करने के लिए तरुण शालू के नाप के हाईहील सैंडल ले आया. बड़े चाव से शालू को पहना कर उस ने म्यूजिक औन कर दिया. शालू को सहारा दे कर उस ने खड़ा किया. घुमाया तो शालू खिलखिला कर हंसते हुए बोली, ‘‘अरे तरु मुझ से नहीं होगा… गिर जाऊंगी,’’ फिर अपनेआप को संभालने के लिए उसने तरुण को जो खींचा तो दोनों बिस्तर पर जा गिरे. तरुण को भी हंसी आ गई. थोड़ी देर तक दोनों हंसते रहे.

प्रिया को अपनी बालकनी से ज्यादा कुछ तो दिखाई नहीं दिया पर दोनों की हंसी बड़ी देर तक सुनाई देती रही.

‘अकसर दोनों की हंसीखिलखिलाहट सुनाई देती है. कितना हंसमुख है तरुण… अपनी पत्नी को कितना खुश रखता है और एक ये हैं श्रीमान रणवीर हमेशा मुंह फुलाए बैठे रहते हैं जैसे दुनिया का सारा बोझ इन्हीं के कंधों पर हो,’ प्रिया के दिल में हूक सी उठी तो वह अंदर हो ली.

थोड़ी देर बाद ही तरुण उठा और शालू को भी उठा दिया, ‘‘चलो, थोड़ी प्रैक्टिस करते हैं… कल 35 नंबर कोठी वाले उमेशजी के बेटे की सगाई है. सारे पड़ोसियों को बुलाया है. हमें भी. और रणवीर फैमिली को भी. खूब डांसवांस होगा. बोला है खूब तैयार हो कर आना.’’

‘‘अच्छा तो यह बात है. तभी ये सैंडल…’’ शालू मुसकराई.

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शालू फिर खड़ी हो गई. किसी तरह तरुण कमर में हाथ डाल कर डांस करवाने लगा. हंसते हुए शालू ने 2 राउंड लिए. फिर अचानक पैर ऐसा मुड़ा कि हील सैंडल से अलग जा पड़ी और शालू अलग.

‘‘तुम से कुछ नहीं होगा शालू… तुम ने अच्छेखासे सैंडल भी बेकार कर दिए.’’

‘‘ब्रैंडेड नहीं थे…  तो पहले ही लग रहा था पर आप को बुरा लगेगा इसलिए कहा नहीं. प्रिया को रणवीर हर चीज ब्रैंडेड ही दिलाते हैं. काश, मेरा पति भी इतना रईस होता,’’ कह शालू ने ठंडी आह भरी.

‘‘यह देखो क्या किया…’’ तरुण ने दोनों टुकड़े उसे थमा दिए.

शालू ने उन्हें क्विकफिक्स से चिपका दिया. बोली, ‘‘देखो तरु सैंडल बिलकुल सही हो गया. अब चलो पार्टी में.’’

‘‘हां पर डांसवांस तुम रहने ही देना… वहां तुम्हारे साथ कहीं मेरी भी भद्द न हो जाए,’’ तरुण बेरुखाई से बोला.

उधर रणवीर अपनी बालकनी में शालू की किचन से रोज आती आलू, पुदीने के परांठों की खुशबू से काफी प्रभावित था. पत्नी प्रिया के रोजरोज के उबले अंडे, दलिया के नाश्ते से त्रस्त था. कई बार चुपके से शालू की तारीफ भी कर चुका था और वह कई बार मेड के हाथों उसे भिजवा भी चुकी थी. आज सुबह भी उस ने परांठे भिजवाए थे.

शालू तरुण के साथ नीचे उतरी तो प्रिया और रणवीर भी आ चुके थे. रणवीर गाड़ी स्टार्ट कर रहा था.

‘‘आइए, साथ ही चलते हैं तरुणजी,’’ रणवीर ने कहा तो प्रिया ने भी इशारा किया. चारों बैठ गए.

रणवीर बोला, ‘‘परांठों के लिए थैंक्स शालूजी… आप के हाथों में जादू है… मैं अपनी बालकनी से रोज पकवानों की खुशबू का मजा लेता हूं… प्रिया को तो घी, तेल पसंद नहीं… न बनाती है न मु?ो खाने देना चाहती है. तरुणजी आप के तो मजे हैं. रोज बढि़याबढि़या पकवान खाने को मिलते हैं. काश…’’

‘अबे आगे 1 लफ्ज भी न बोलना… क्या बोलने जा रहा था तू,’ तरुण मुट्ठियां भींचते हुए मन ही मन बुदबुदा उठा.

इधर शालू महंगी बड़ी सी गाड़ी में बैठ एक रईस से अपनी तारीफ सुन कर निहाल हुई जा रही थी.

और प्रिया ‘हां फैट खूब खाओ और ऐक्सरसाइज मत करो. फिर थुलथुल बौडी लेकर घूमना इन्हीं यानी शालू के साथ… तरुणकी तारीफ में क्यों बोलोगे? क्या गठीली बौडीहै. काश मेरा हबी ऐसा होता,’ प्रिया मन हीमन बोली.

शालू पर उड़ती नजर पड़ी तो न जाने क्यों वह जलन सी महसूस करने लगी. गाड़ी के ब्रेक के साथ सभी के उठते विचारों को भी ब्रेक लगे. पार्टी स्थल आ गया था.

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मेहमान आ चुके थे. फंक्शन जोरों पर था. मीठीमीठी धुन के साथ कोल्डड्रिंक्स, मौकटेल के दौर चल रहे थे. तभी वधू का प्रवेश हुआ. स्टेज से उतर लड़के ने उस का स्वागत किया और स्टेज पर ले आया. तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सगाई की रस्म पूरी की गई.

सभी ने बारीबारी से स्टेज पर आ कर बधाई दी. लड़कालड़की की शान में कुछ कहना भी था उन्हें चाहे गा कर चाहे वैसे ही. सभी ने कुछ न कुछ सुनाया.

तरुण और शालू स्टेज पर आए तो प्रिया की हसरत भरी नजरें डैशिंग तरुण पर ही जमी थीं. तरुण ने किसी गीत की मुश्किल से 2 लाइन ही गुनगुनाईं और फिर बधाई गिफ्ट थमा शालू का हाथ थामे शरमाते हुए स्टेज से उतर गया.

‘ओह तरुण की तो बस बौडी ही बौडी है. अंदर तो कुछ है ही नहीं… 2 शब्द भी नहीं बोल पाया लोगों के सामने. कितना शाई… गाना भी पूरा नहीं गा सका,’ तरुण को स्टेज पर चढ़ता देख प्रिया की आंखों में आई चमक की जगह अब निराशा झलक रही थी. आकर्षण कहीं काफूर हो रहा था.

‘शालू, आप ऐसे कैसे जा सकती हो बगैर डांस किए. मैं ने आप का बढि़या डांस देखा है… मेरे हाथों में… आइएआइए,’’ उमेशजी की पत्नी आशाजी ने आत्मीयता से उसे ऊपर बुला लिया.

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