Crime Story: पराई मोहब्बत के लिए दी जान- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

दलबीर सिंह की यह बात सुन कर सरिता खिलखिला कर हंस पड़ी. फिर बोली, ‘‘तुम आराम से चारपाई पर बैठो. मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं.’’

थोड़ी देर में सरिता 2 कप चाय ले आई. दोनों पासपास बैठ कर गपशप लड़ाते हुए चाय पीते रहे और चोरीछिपे एकदूसरे को देखते रहे. दोनों के दिलोदिमाग में हलचल सी मची हुई थी. सच तो यह था कि सरिता दलबीर पर फिदा हो गई थी. वह ही नहीं, दलबीर सिंह भी सरिता का दीवाना बन गया था.

दोनों के दिल एकदूसरे के लिए धड़के तो नजदीकियां खुदबखुद बन गईं. इस के बाद दलबीर सिंह अकसर सरिता से मिलने आने लगा. सरिता को दलबीर सिंह का आना अच्छा लगता था.

जल्द ही वे एकदूसरे से खुल गए और दोनों के बीच हंसीमजाक होने लगा. सरिता चाहती थी कि पहल दलबीर सिंह करे, जबकि दलबीर चाहता था कि जिस्म की भूखी सरिता स्वयं उसे उकसाए.

आखिर जब सरिता से नहीं रहा गया तो एक रोज रात में उस ने दलबीर सिंह को अपने घर रोक लिया. फिर तो उस रात दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. हर रिश्ता टूट कर बिखर गया और एक नए रिश्ते ने जन्म लिया, जिस का नाम है अवैध संबंधों का रिश्ता.

उस दिन के बाद सरिता और दलबीर सिंह अकसर एकांत में मिलने लगे. लेकिन यह सच है कि ऐसे संबंध ज्यादा दिनों तक छिपते नहीं हैं. उन का भांडा एक न एक दिन फूट ही जाता है. सरिता और दलबीर के साथ भी ऐसा ही हुआ.

एक रात जब सरिता और दलबीर सिंह देह मिलन कर रहे थे तो सरिता की देवरानी आरती ने छत से दोनों को देख लिया. उस ने यह बात अपने पति मुकुंद को बताई. फिर तो यह बात गांव में फैल गई. और उन के नाजायज रिश्तों की चर्चा पूरे गांव में होने लगी.

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सरिता के पति अरविंद दोहरे को जब सरिता और दलबीर सिंह के संबंधों का पता चला तो उस के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. उस ने इस बारे में पत्नी व दोस्त दलबीर से बात की तो दोनों मुकर गए और साफसाफ कह दिया कि ऐसी कोई बात नहीं है. गांव के लोग उन्हें बेवजह बदनाम कर रहे हैं.

लेकिन एक रोज अरविंद ने जब दोनों को हंसीठिठोली करते अचानक देख लिया तो उस ने सरिता की पिटाई की तथा दलबीर सिंह को भी फटकारा. लेकिन उन दोनों पर इस का कोई

असर नहीं हुआ. दोनों पहले की तरह ही मिलते रहे. पत्नी की इस बेवफाई से अरविंद टूट चुका था. महीना-15 दिन में जब वह घर आता था तो दलबीर को ले कर सरिता से उस की जम कर तकरार होती थी. कई बार नौबत मारपीट तक आ जाती थी. अरविंद का पूरा परिवार और गांव वाले इस बात को जान गए थे कि दोनों के बीच तनाव सरिता और दलबीर सिंह के नाजायज संबंधों को ले कर है.

अरविंद की जब गांव में ज्यादा बदनामी होने लगी तो उस ने फफूंद कस्बे में रहना जरूरी नहीं समझा और अपने गांव आ कर रहने लगा. पर सरिता तो दलबीर सिंह की दीवानी थी. उसे न तो पति की परवाह थी और न ही परिवार की इज्जत की. वह किसी न किसी बहाने दलबीर से मिल ही लेती थी.

हां, इतना जरूर था कि अब वह उस से घर के बजाय बाहर मिल लेती थी. दरअसल घर से कुछ दूरी पर अरविंद का प्लौट था. इस प्लौट में एक झोपड़ी बनी हुई थी. इसी झोपड़ी में दोनों का मिल लेते थे.

जुलाई, 2020 में सरिता का छोटा बेटा नीरज उर्फ जानू बीमार पड़ गया. उस के इलाज के लिए सरिता ने अपने प्रेमी दलबीर सिंह से पैसे मांगे, लेकिन उस ने धंधे में घाटा होने का बहाना बना कर सरिता को पैसे देने से इनकार कर दिया.

उचित इलाज न मिल पाने से एक महीने बाद सरिता के बेटे जानू की मौत हो गई. बेटे की मौत का सरिता को बेहद दुख हुआ.

विपत्ति के समय आर्थिक मदद न करने के कारण सरिता दलबीर सिंह से नाराज रहने लगी थी. वह न तो स्वयं उस से मिलती और न ही दलबीर को पास फटकने देती. सरिता सोचती, ‘जिस प्रेमी के लिए उस ने पति से विश्वासघात किया. परिवार की मर्यादाओं को ताक पर रख दिया, उसी ने बुरे वक्त पर धोखा दे दिया. समय रहते यदि उस ने आर्थिक मदद की होती, तो आज उस का बेटा जीवित होता.’

सरिता ने प्रेमी से दूरियां बनाईं तो दलबीर सिंह परेशान हो उठा. वह उसे मनाने की कोशिश करता, लेकिन सरिता उसे दुत्कार देती. दलबीर सरिता को भोगने का आदी बन चुका था. उसे सरिता के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था.

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आखिर जब उस से नहीं रहा गया तो उस ने सरिता को मनाने के लिए उसे प्लौट में बनी झोपड़ी में बुलाया. सरिता वहां पहुंची तो दलबीर ने उस से पूछा, ‘‘सरिता, तुम मुझ से दूरदूर क्यों भागती हो. मैं तुम्हें बेइंतहा प्यार करता हूं.’’

‘‘तुम मुझ से नहीं, मेरे शरीर से प्यार करते हो. तुम्हारा प्यार स्वार्थ का है. सच्चे प्रेमी सुखदुख में एकदूसरे का साथ देते हैं. लेकिन तुम ने हमारे दुख में साथ नहीं दिया. जब तुम स्वार्थी हो, तो अब मैं भी स्वार्थी बन गई हूं. अब मुझे भी तन के बदले धन चाहिए.’’

‘‘क्या तुम प्यार की जगह अपने तन का सौदा करना चाहती हो?’’ दलबीर ने पूछा.

‘‘जब प्यार की जगह स्वार्थ पनप गया हो तो समझ लो कि मैं भी तन का सौदा करना चाहती हूं. अब तुम मेरे शरीर से तभी खेल पाओगे, जब एक लाख रुपया मेरे हाथ में थमाओगे.’’

‘‘यदि रुपयों का इंतजाम न हो पाया तो..?’’ दलबीर ने पूछा.

‘‘…तो मुझे भूल जाना.’’

अगले भाग में पढ़ें- राजेश कुमार सिंह ने सरिता की हत्या का खुलासा किया

Crime Story: पराई मोहब्बत के लिए दी जान- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

दलबीर को सपने में भी उम्मीद न थी कि सरिता तन के सौदे की बात करेगी. उसे उम्मीद थी कि वह उस से माफी मांग कर तथा कुछ आर्थिक मदद कर उसे मना लेगा. पर ऐसा नहीं हुआ बल्कि सरिता ने उस से बड़ी रकम की मांग कर दी.

इस के बाद सरिता और दलबीर में दूरियां और बढ़ गईं. जब कभी दोनों का आमनासामना होता और दलबीर सरिता को मनाने की कोशिश करता तो वह एक ही जवाब देती, ‘‘मुझे तन के बदले धन चाहिए.’’

13 जनवरी, 2021 की सुबह 5 बजे दलबीर सिंह ने सरिता को फोन कर के अपने प्लौट में बनी झोपड़ी में बुलाया. सरिता को लगा कि शायद दलबीर ने रुपयों का इंतजाम कर लिया है. सो वह वहां जा पहुंच गई.

सरिता के वहां पहुंचते ही दलबीर उस के शरीर से छेड़छाड़ तथा प्रणय निवेदन करने लगा. सरिता ने छेड़छाड़ का विरोध किया और कहा कि वह तभी राजी होगी, जब उस के हाथ पर एक लाख रुपया होगा.

सरिता के इनकार पर दलबीर सिंह जबरदस्ती करने लगा. सरिता ने तब गुस्से में उस की नाक पर घूंसा जड़ दिया. नाक पर घूंसा पड़ते ही दलबीर तिलमिला उठा. उस ने पास पड़ी ईंट उठाई और सरिता के सिर पर दे मारी.

सरिता का सिर फट गया और खून की धार बह निकली. इस के बाद उस ने उस के सिर पर ईंट से कई प्रहार किए. कुछ देर छटपटाने के बाद सरिता ने दम तोड़ दिया. सरिता की हत्या के बाद दलबीर सिंह फरार हो गया.

इधर कुछ देर बाद सरिता की देवरानी आरती किसी काम से प्लौट पर गई तो वहां उस ने झोपड़ी में सरिता की खून से सनी लाश देखी. वह वहां से चीखती हुई घर आई और जानकारी अपने पति मुकुंद तथा जेठ अरविंद को दी.

दोनों भाई प्लौट पर पहुंचे और सरिता का शव देख कर अवाक रह गए. इस के बाद तो पूरे गांव में सनसनी फैल गई और मौके पर भीड़ जुटने लगी.

इसी बीच परिवार के किसी सदस्य ने थाना फफूंद पुलिस को सरिता की हत्या की सूचना दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी राजेश कुमार सिंह पुलिस फोर्स के साथ लालपुर गांव की ओर रवाना हो लिए. रवाना होने से पहले उन्होंने पुलिस अधिकारियों को भी सूचित कर दिया था. कुछ देर बाद ही एसपी अपर्णा गौतम, एएसपी कमलेश कुमार दीक्षित तथा सीओ (अजीतमल) कमलेश नारायण पांडेय भी लालपुर गांव पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तथा मृतका सरिता के पति अरविंद दोहरे तथा अन्य लोगों से पूछताछ की. फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए तथा फिंगरप्रिंट लिए.

एसपी अपर्णा गौतम ने जब मृतका के पति अरविंद दोहरे से हत्या के संबंध में पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की पत्नी सरिता के दलबीर सिंह से नाजायज संबंध थे, जिस का वह विरोध करता था. इसी नाजायज रिश्तों की वजह से सरिता की हत्या उस के प्रेमी दलबीर सिंह ने की है. दलबीर और सरिता के बीच किसी बात को ले कर मनमुटाव चल रहा था.

अवैध रिश्तों में हुई हत्या का पता चलते ही एसपी अपर्णा गौतम ने थानाप्रभारी राजेश कुमार सिंह को आदेश दिया कि वह आरोपी के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार करें.

आदेश पाते ही राजेश कुमार सिंह ने मृतका के पति अरविंद दोहरे की तहरीर पर भादंवि की धारा 302 तथा (3) (2) अ, एससी/एसटी ऐक्ट के तहत दलबीर सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया तथा उस की तलाश में जुट गए.  15 जनवरी, 2021 की शाम चैकिंग के दौरान थानाप्रभारी राजेश कुमार सिंह को मुखबिर से सूचना मिली कि हत्यारोपी दलबीर सिंह आरटीओ औफिस की नई बिल्डिंग के अंदर मौजूद है.

मुखबिर की सूचना पर थानाप्रभारी ने आरटीओ औफिस की नई बिल्डिंग से दलबीर सिंह को गिरफ्तार कर लिया. उस की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त खून सनी ईंट तथा खून सने कपड़े बरामद कर लिए.

दलबीर सिंह ने बताया कि सरिता से उस का नाजायज रिश्ता था. सरिता उस से एक लाख रुपए मांग रही थी. इसी विवाद में उस ने सरिता की हत्या कर दी.

राजेश कुमार सिंह ने सरिता की हत्या का खुलासा करने तथा आरोपी दलबीर सिंह को गिरफ्तार करने की जानकारी एसपी अपर्णा गौतम को दी, तो उन्होंने पुलिस लाइन सभागार में प्रैसवार्ता की और आरोपी दलबीर सिंह को मीडिया के समक्ष पेश कर हत्या का खुलासा किया.

16 जनवरी, 2021 को पुलिस ने अभियुक्त दलबीर सिंह को औरैया कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Mother’s Day Special: मां का फैसला- भाग 2

परंतु मैं जानती थी, निश्चितरूप से वह प्रेम पूर्णरूप से किसी एक को ही करती है. दूसरे से महज दोस्ती है. वह नहीं जानती कि वह किसे चाहती है, परंतु निश्चित ही किसी एक का ही पलड़ा भारी होगा. वह किस का है, मुझे यही देखना था.

रात में बिट्टी पढ़तेपढ़ते सो गई तो उसे चादर ओढ़ा कर मैं भी बगल के बिस्तर पर लेट गई. योगेश 2 दिनों से बाहर गए हुए थे. बिट्टी उन की भी बेटी थी, लेकिन मैं जानती थी, यदि वे यहां होते, तो भी बिट्टी के भविष्य से ज्यादा अपने व्यापार को ले कर ही चिंतित होते. कभीकभी मैं समझ नहीं पाती कि उन्हें बेटी या पत्नी से ज्यादा काम क्यों प्यारा है. बिस्तर पर लेट कर रोजाना की तरह मैं ने कुछ पढ़ना चाहा, परंतु एक भी शब्द पल्ले न पड़ा. घूमफिर कर दिमाग पीछे की तरफ दौड़ने लगता. मैं हर बार उसे खींच कर बाहर लाती और वह हर बार बेशर्मों की तरह मुझे अतीत की तरफ खींच लेता. अपने अतीत के अध्याय को तो मैं जाने कब का बंद कर चुकी थी, परंतु बिट्टी के मासूम चेहरे को देखते हुए मैं अपने को अतीत में जाने से न रोक सकी…

जब मैं भी बिट्टी की उम्र की थी, तब मुझे भी यह रोग हो गया था. हां, तब वह रोग ही था. विशेषरूप से हमारे परिवार में तो प्रेम कैंसर से कम खतरनाक नहीं था. तब न तो मेरी मां इतनी सहिष्णु थीं, जो मेरा फैसला मेरे हक में सुना देतीं, न ही पिता इतने उदासीन थे कि मेरी पसंद से उन्हें कुछ लेनादेना ही होता. तब घर की देहरी पर ज्यादा देर खड़ा होना बूआ या दादी की नजरों में बहुत बड़ा गुनाह मान लिया जाता था. किसी लड़के से बात करना तो दूर, किसी लड़की के घर भी भाई को ले कर जाना पड़ता, चाहे भाई छोटा ही क्यों न हो. हजारों बंदिशें थीं, परंतु जवानी कहां किसी के बांधे बंधी है. मेरा अल्हड़ मन आखिर प्रेम से पीडि़त हो ही गया. मैं बड़ी मां के घर गई हुई थी. सुमंत से वहीं मुलाकात हुई थी और मेरा मन प्रेम की पुकार कर बैठा. परंतु बचपन से मिले संस्कारों ने मेरे होंठों का साथ नहीं दिया. सुमंत के प्रणय निवेदन को मां और परिवार के अन्य लोगों ने निष्ठुरता से ठुकरा दिया.

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फिर 1 वर्ष के अंदर ही मेरी शादी एक ऐसे व्यक्ति से कर दी गई जो था तो छोटा सा व्यापारी, पर जिस का ध्येय भविष्य में बड़ा आदमी बनने का था. इस के लिए मेरे पति ने व्यापार में हर रास्ता अपनाया. मेरी गोद में बिट्टी को डाल कर वे आश्वस्त हो दिनरात व्यापार की उन्नति के सपने देखते. प्रेम से पराजित मेरा तप्त हृदय पति के प्यार और समर्पण का भूखा था. उन के निस्वार्थ स्पर्श से शायद मैं पहले प्रेम को भूल कर उन की सच्ची सहचरी बनती, पर व्यापार के बीच मेरा बोलना उन्हें बिलकुल पसंद नहीं था. मुझे याद नहीं, व्यापारिक पार्टी के अलावा वे मुझे कभी कहीं अपने साथ ले गए हों.

लेकिन घर और बिट्टी के बारे में सारे फैसले मेरे होते. उन्हें इस के लिए अवकाश ही न था. बिट्टी द्वारा दी गई जिम्मेदारी से मेरे अतीत की पुस्तक फड़फड़ाती रही. अतीत का अध्याय सारी रात चलता रहा, क्योंकि उस के समाप्त होने तक पक्षियों ने चहचहाना शुरू कर दिया था… दूसरे दिन से मैं बिट्टी के विषय में चौकन्नी हो गई. प्रभाकर का फोन आते ही मैं सतर्क हो जाती. बिट्टी का उस से बात करने का ढंग व चहकना देखती. घंटी की आवाज सुनते ही उस का भागना देखती.

एक दिन सुरेश ने कहा, ‘चाचीजी, देखिएगा, एक दिन मैं प्रशासनिक सेवा में आ कर रहूंगा, मां का एक बड़ा सपना पूरा होगा. मैं आगे बढ़ना चाहता हूं, बहुत आगे,’ उस के ये वाक्य मेरे लिए नए नहीं थे, परंतु अब मैं उन्हें भी तोलने लगी.

प्रभाकर से बिट्टी की मुलाकात उस के एक मित्र की शादी में हुई थी. उस दिन पहली बार बिट्टी जिद कर के मुझ से साड़ी बंधवा कर गईर् थी और बालों में वेणी लगाई थी. उस दिन सुरेश साक्षात्कार देने के लिए इलाहाबाद गया हुआ था. बिट्टी अपनी एक मित्र के साथ थी और उसी के साथ वापस भी आना था. मैं सोच रही थी कि सुरेश होता तो उसे भेज कर बिट्टी को बुलवा सकती थी. उस के आने में काफी देर हो गई थी. मैं बेहद घबरा गई. फोन मिलाया तो घंटी बजती रही, किसी ने उठाया ही नहीं.

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लेकिन शीघ्र ही फोन आ गया था कि बिट्टी रात को वहीं रुक जाएगी. दूसरे दिन जब बिट्टी लौटी तो उदास सी थी. मैं ने सोचा, सहेली से बिछुड़ने का दर्द होगा. 2 दिन वह शांत रही, फिर मुझे बताया, ‘मां, वहां मुझे प्रभाकर मिला था.’

‘वह कौन है?’ मैं ने प्रश्न किया. ‘मीता के भाई का दोस्त, फोटो खींच रहा था, मेरे भी बहुत सारे फोटो खींचे.’

‘क्यों?’ ‘मां, वह कहता था कि मैं उसे अच्छी लग रही हूं.’

‘तुम ने उसे पास आने का अवसर दिया होगा?’ मैं ने उसे गहराई से देखा. ‘नहीं, हम लोग डांस कर रहे थे, तभी बीच में वह आया और मुझे ऐसा कह कर चला गया.’

Crime- अंधविश्वास: इनसान नहीं, हैवान हैं ये

22 मार्च, 2021 को तेलंगाना के सूर्यापेट जिले में एक कबड्डी मैच के दौरान बड़ा हादसा हो गया था. हुआ यों कि तेलंगाना कबड्डी एसोसिएशन की ओर से कबड्डी मैच कराया जा रहा था. वहां लकड़ी से बनी एक गैलरी पर कई दर्शक बैठे हुए थे. लोगों का वजन ज्यादा होने के चलते वह गैलरी टूट गई और 100 से ज्यादा दर्शक गैलरी के नीचे दबने से घायल हो गए.

यह एक हादसा था, जो कहीं भी और कभी भी हो सकता है. हालांकि प्रशासन की लापरवाही को नकारा नहीं जा सकता. पर इस दूसरे मामले के बारे में आप क्या कहेंगे, जहां एक पढ़ीलिखी मां ने अपनी बेटी के साथ ऐसी करतूत की कि कायनात भी शर्मसार हो जाए.

दिल दहला देने वाली यह वारदात तेलंगाना के सूर्यपेट जिले की है. उस औरत का नाम बी. भारती है और उस ने बीएससी के बाद बीऐड भी की हुई है. अभी तो वह पुलिस की नौकरी का इम्तिहान देने की तैयारी कर रही है.

बी. भारती की शादी 8 साल पहले महबूबाबाद के एक शख्स के साथ हुई थी, पर कुछ समय बाद ही यह शादी टूट गई थी. 2 साल पहले ही वह एक दूसरे आदमी कृष्णा के साथ रिलेशन में आई, जिस से उसे एक बेटी भी पैदा हुई.

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बी. भारती के इस रिश्ते से उस के परिवार वाले खुश नहीं थे. इस बात से वह परेशान थी और उस ने यूट्यूब पर धार्मिक और आध्यात्मिक वीडियो देखने शुरू कर दिए. 15 अप्रैल, 2021 को जब उस का पति काम के सिलसिले में सूर्यपेट गया और ससुराल वाले खेत पर गए, तो बी. भारती ने मूर्ति के सामने अपनी 6 महीने की बेटी रितु की बलि दे दी.

जब घर वाले वापस आए और बच्ची को नदारद पाया, तो बी. भारती से बच्ची के बारे में पूछा. वह चुप रही, तो वे घबरा गए. उन्होंने बच्ची को काफी खोजा, तो उस की गरदन कटी हुई मिली. इस बात से गुस्साया परिवार पुलिस के पास पहुंचा, जिस के बाद बी. भारती को हिरासत में ले लिया गया.

तथाकथित तांत्रिकों के तो कहने ही क्या. बात बेशक साल 2015 की है, पर हमारी आंखें खोलने के लिए उस का जिक्र करना जरूरी है. तब इसी अंधविश्वास के चलते एक 5 साल के मासूम बच्चे की जान चली गई थी.

यह घटना आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले की है. आरोपी ने पोकुरु गांव में तांत्रिक अनुष्ठान के दौरान बच्चे की बलि चढ़ा दी थी.

पुलिस जांच में पता चला कि बच्चे की बलि चढ़ाने वाले आरोपी 35 साल के तथाकथित तांत्रिक राव ने गांव के ही आंगनबाड़ी केंद्र से एक बच्चे को अगवा किया और उसे अपने घर ले गया. घर ले जाने के बाद उस ने अपने घर में पूजापाठ किया और उसी दौरान बच्चे का सिर काट कर उस की बलि चढ़ा दी. आरोपी ने सिर काटने के बाद उस बच्चे का खून एक बरतन में भर कर पूरे घर में छिड़क दिया.

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जब तांत्रिक राव का भांडा फूटा और गांव वालों को इस की खबर लगी, तो गुस्साए लोगों ने आरोपी को खंभे से बांध कर कैरोसिन छिड़क कर उसे जिंदा जलाने की कोशिश की, पर किसी तरह  पुलिस ने उसे छुड़ा लिया.

किसी अंधविश्वास के चलते अपनों या परायों की इस तरह बलि दे देना भारत जैसे अंधविश्वासियों के देश में नई बात नहीं है. जाहिल तांत्रिकों की गंवार सोच पर तो सैकड़ों सवाल उठाए जा सकते हैं, पर जब कोई पढ़ीलिखी औरत अपनी मासूम बेटी के साथ ऐसा करती है, तो कलेजा मुंह को आ जाता है.

यह एक घनघोर अपराध ही नहीं है, बल्कि समाज के मुंह पर तमाचा भी है. वह भी उस समय जब देश में किसी महिला को सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की मांग जोर पकड़ रही है.

Serial Story- एक तवायफ मां नहीं हो सकती: भाग 2

अब सोचने वाली बात यह थी कि अगर घर में हलवा नहीं बना तो सरदारी को हलवे में जहर किस ने दिया? सरदारी बेगम के नाम कोई जायदाद भी नहीं थी और न ही वह सुंदर थी, जिस की वजह से उसे जहर दे कर मार दिया गया हो. मैं ने शादो से पूछा कि उस का किसी से कोई लड़ाईझगड़ा तो नहीं था.

उस ने कहा, ‘‘नहीं जी, मेरी सौतन तो बहुत भली औरत थी. कभी किसी से न झगड़ने वाली. मैं ने उसे कभी गुस्से में नहीं देखा. मैं खुद सोच रही हूं कि उसे जहर कौन दे सकता है?’’

केस मेरी समझ से बाहर था. मैं ने सरदारी बेगम के दोनों बेटों को बुला कर जांच करने का मन बनाया. शादो से मैं ने पूछा कि उसे किसी पर शक तो नहीं, उस ने कहा नहीं.

मैं ने शादो से बहुत से सवाल किए और कुरेदकुरेद कर पूछा कि कोई काम की बात पता चल सके, लेकिन उस से कुछ पता नहीं लग सका. अगले दिन तो वे लोग सरदारी बेगम के अंतिम संस्कार में लगे रहे. इस के तीसरे दिन मैं ने उस के दोनों बेटों को थाने बुलवाने का प्रोग्राम बनाया.

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थाने बुला कर मैं ने शरीफ और उस के छोटे भाई इदरीस से पूछताछ की. लेकिन उन से भी कोई बात पता नहीं लगी. इदरीस कम बोलता था, मेरे हर सवाल का संक्षेप में जवाब देता था. उस ने अधिकतर सवालों के जवाब हां या ना में दिए थे. मैं ने दोनों भाइयों को यह कह कर भेज दिया कि जरूरत पड़ी तो फिर बुला लूंगा.

मैं ने अपने मुखबिर चारों ओर फैला दिए थे. मुझे उम्मीद थी कि वे जरूर कुछ न कुछ पता लगा लेंगे. मैं ने उन से कह दिया था कि वे यह पता करें कि शादो और सरदारी बेगम के आपसी संबंध कैसे थे? क्या उन में कभी झगड़ा हुआ था? हत्या वाले दिन मृतका के घर कौनकौन आया था? किसी ने प्लेट में किसी को कोई चीज लाते तो नहीं देखा था?

यह केस मेरे लिए सिरदर्द बन गया था. हत्या का कोई कारण पता नहीं लग रहा था. मैं ने बहुत दिमाग लगाया. घूमफिर कर शादो ही दिमाग में आ रही थी, इसलिए मैं ने शादो से पूछताछ करने का फैसला कर लिया.

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सरदारी बेगम के मरने के बाद शादो अकेली रह गई थी. वह अकसर सरदारी को याद कर के रोती रहती थी. स्कूल की हेडमिस्ट्रैस ने उस की यह हालत देख कर उस के रहने के लिए स्कूल में एक कमरा दे दिया था. वह उसी कमरे में रहने लगी थी. मैं ने एक सिपाही को बुला कर स्कूल का पता दे कर कहा कि छुट्टी के बाद शादो को ले आए.

करीब ढाई बजे वह शादो को ले कर आ गया. उस के साथ स्कूल की हेडमिस्ट्रैस भी थीं. उस ने बताया कि वह शादो के साथ इसलिए आई है क्योंकि वह बहुत डरी हुई थी.मैं ने हेडमिस्ट्रैस को तसल्ली दी कि शादो से केवल पूछताछ करनी है, आप इसे यहीं छोड़ जाएं. वह चली गई तो मैं ने शादो के दिल से थाने का डर निकालने के लिए इधरउधर की बातें कीं और फिर बातों का रुख उस के दिवंगत पति की ओर मोड़ दिया.पति की बात सुन कर वह भावुक हो गई और उस की ऐसे तारीफ करने लगी, जैसे वह कोई फरिश्ता हो.बातोंबातों में मैं ने एक सवाल पूछा, ‘‘क्या यह सच है कि तुम एक वेश्या हो?’’ न चाहते हुए भी मैं ने उस से सवाल किया.

यह सवाल सुन कर उसे झटका सा लगा. उस के चेहरे का रंग लाल हो गया, उस की आंखों से आंसू निकल आए. उस ने सिर झुका कर जवाब दिया, ‘‘हूं नहीं, लेकिन कभी थी.’’

 

फिर झटके से अपना सिर उठा कर बोली, ‘‘यह बात आप से शरीफ ने कही होगी. उस के पिता ने मुझे गंदगी से निकाल कर इज्जत की जगह दी थी. इस हिसाब से मैं उस की मां लगती हूं, लेकिन वह मुझे मां समझने के बजाय अपने पिता की रखैल समझता है.’’

शादो की यह बात सुन कर मेरी रुचि बढ़ी और मैं ने उस से कहा कि वह मुझे विस्तृत जानकारी दे कि उस की शादी मसूद से कैसे हुई. उस ने कहा, ‘‘यह बहुत लंबी कहानी है.’’

मैं ने उस से कहा कि वह निश्चिंत हो कर सब कुछ बताए. इस पर उस ने अपनी दुखभरी लंबी कहानी सुनाई, जो मैं यहां संक्षेप में लिख रहा हूं.

शादो का असली नाम शमशाद बेगम था लेकिन घर वाले उसे शादो कहा करते थे. उस का बाप एक सरकारी औफिस में चपरासी था. बहुत गरीब थे ये लोग. मुश्किल से गुजारा होता था. शादो के 2 भाई और 2 बहनें थीं. शादो सब से बड़ी थी इसलिए

वह सब की लाडली थी. पिता उस की हर चाहत पूरी करता था, इसलिए उस की आदत बिगड़ गई थी.

5 बच्चे होने के कारण घर का खर्च मुश्किल से चलता था, इसलिए उस के पिता ने पार्टटाइम दुकान कर ली, जो चल निकली. इस के बाद घर का खर्च भी ठीक से चलने लगा.

शादो गरीब के घर जरूर पैदा हुई थी, लेकिन थी बहुत सुंदर. शादो को 5 जमात पढ़ाने के बाद घर बैठा लिया गया. वह घर पर मां के साथ घर का काम करने लगी.

शादो को फिल्मों और फिल्मी गानों का शौक था, लेकिन उस ने फिल्म कभी नहीं देखी थी. इस के बावजूद वह अपने आप को किसी हीरोइन से कम नहीं समझती थी. बाप से जिद कर के उस ने एक ट्रांजिस्टर मंगवा लिया, जिस पर वह बराबर गाने सुनती थी. जवान होते ही उस पर मोहल्ले के लड़कों की नजर पड़ी. उन में एक लड़का जमाल था. वह खातेपीते घर का था. गोराचिट्टा जवान. जमाल के रिश्तेदार लाहौर में रहते थे.

वह अकसर लाहौर जाता रहता था. शादो भी उसे चाहने लगी थी. दोनों छिपछिप कर मिलते थे. एक दिन ऐसा भी आया जब वह उस के साथ भागने को तैयार हो गई. जमाल ने उसे बताया था कि लाहौर के फिल्म उद्योग में उस की जानपहचान है. वह उसे फिल्मों में काम दिलवा देगा. उस ने शादो से यह वादा भी किया कि वह उस के साथ शादी कर लेगा.

और फिर एक दिन वह अपनी मां से सहेली के घर जाने का बहाना कर के जमाल के साथ भाग गई. उसे मांबाप, अपने घर की याद  तो आई लेकिन उस की सोच पर जमाल के जादू ने परदा डाल दिया. लाहौर की फिल्मी दुनिया की चकाचौंध ने उसे अंधा कर दिया था. वह यह बात सुनातेसुनाते हिचकियां ले कर रोने लगी.

जरा सी देर रुक कर वह आगे बोली, ‘‘जमाल ने मुझे बता दिया था कि घर से निकल कर कहां पहुंचना है. मैं उस जगह पहुंच गई. वहां जमाल मेरा इंतजार कर रहा था. जमाल घर से काफी रकम चुरा कर लाया था. हम दोनों लाहौर पहुंच गए. वहां जमाल का एक मित्र सरकारी औफिस में नौकरी करता था. वह मुझे उस के क्वार्टर पर ले गया. जमाल के मित्र ने उसे एक अलग कमरा दे दिया. अगले दिन वह हमें नाश्ता करा कर अपने औफिस चला गया. जमाल और मैं कमरे में अकेले रह गए.’’

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दोस्त के जाने के बाद जमाल ने शादो के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी. शादो ने उसे रोका तो वह बोला, ‘‘फिल्मों में काम करने के लिए इस तरह की झिझक दूर करना जरूरी है.’’ फिर धीरेधीरे जमाल ने उस की ऐसी शर्म उतारी कि वह अपनी इज्जत खो बैठी. इस तरह एक शरीफ औरत बेगैरत बन गई.

जमाल का मित्र अंधा नहीं था. वह जानबूझ कर अनजान बना हुआ था. वह भी मौके की तलाश में था और लूट के माल में अपना हिस्सा लेना चाहता था. दूसरी ओर शादो जमाल पर शादी के लिए जोर डाल रही थी.

लेकिन उस ने यह कह कर मना कर दिया कि फिल्मों में शादीशुदा औरतों को नहीं लेते. फिर एक दिन जमाल यह कह कर चला गया कि वह अपने एक फिल्मी दोस्त के पास जा रहा है. उस के जाने के बाद उस का वह मित्र आ गया, जिस ने उसे कमरा दिया हुआ था. उस ने शादो के साथ जबरदस्ती शुरू कर दी.

वह कमजोर औरत थी, कुछ नहीं कर सकी. वेश्या का तो कुछ मोल भी होता है, लेकिन वह तो लूट का माल थी. पहले जमाल लूट रहा था और अब एक और लुटेरा आ गया था.

जमाल जब वापस आया तो उस ने उसे यह बात बताई. सुन कर वह गुस्से में आ गया और अपने दोस्त से झगड़ने लगा. उस के दोस्त ने कहा कि ये कौन सी शरीफ है. तुम दोनों का रिश्ता क्या है? अगर यहां रहना है तो मेरी शर्तों पर रहना होगा, नहीं तो पुलिस को बता दूंगा, फिर समझ लेना तुम दोनों का क्या होगा. यह सुन कर वे दोनों चुप हो गए.

मित्र के औफिस जाने के बाद जमाल शादो को एक ऐसे इलाके में ले गया, जहां चारों ओर फिल्मों के बोर्ड लगे थे. वह उसे साथ लिए एक ऐसे औफिस में गया, जहां 3-4 लोग बैठे थे. कमरे में सिगरेट का धुआं भरा हुआ था. शादो के आते ही सब उस के शरीर को ऐसे देखने लगे, जैसे कोई कसाई बकरे को देखता है. शादो घबराई लेकिन जमाल ने कहा, ‘‘घबराओ नहीं, ये लोग फिल्म के प्रोड्यूसर और डायरेक्टर हैं.’’

जमाल ने एक मोटे से आदमी से कहा, ‘‘अच्छी तरह देख लो राठौर साहब, हीरा है हीरा…आप इसे अपनी फिल्म में काम दे कर घाटे में नहीं रहेंगे.’’

राठौर बोला, ‘‘लड़की तो ठीक है, लेकिन खर्च कुछ कम कर दो.’’

जमाल ने कहा, ‘‘खर्च कम नहीं होगा, अगर आप को पसंद नहीं तो मैं दूसरे डायरेक्टर से बात कर लेता हूं. ऐसी हीरोइन के लिए तो मुंहमांगा पैसा मिलेगा.’’

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राठौर साहब ने उसे एक लिफाफा देते हुए कहा, ‘‘चलो, ये रखो, हम इसे काम दे देंगे. इस खुशी में मुंह मीठा होना चाहिए.’’

राठौर ने जमाल को सौ रुपए का नोट दे कर कहा कि जा कर मिठाई ले आए. जमाल ने शादो से कहा, ‘‘मैं मिठाई ले कर आता हूं.’’

जब जमाल को गए काफी देर हो गई तो शादो घबरा कर रोने लगी. वे लोग बोले, ‘‘रोओ नहीं, जमाल अभी आ जाएगा.’’

लेकिन वह नहीं मानी और जोरजोर से रोने लगी. इस पर राठौर ने कहा, ‘‘यार, ये लड़की तो हमारे लिए मुसीबत खड़ी कर देगी. इसे सुला दो.’’

एक आदमी ने एक शीशी ले कर रुमाल पर लगाई और शादो का मुंह दबोच लिया. इस से वह बेहोश हो गई. जब उसे होश आया तो वह एक कमरे में बंद थी. इस के बाद उस के साथ वही खेल खेला जाने लगा जो जमाल और उस का मित्र खेल चुके थे.

राठौर से पता लगा कि जमाल उसे बेच कर चला गया है. राठौर ने उसे यह भी बताया कि जब उस से दिल भर जाएगा तो उसे वेश्याओं को बेच देगा. यह सुन कर शादो ने वहां से भागने का इरादा किया.

एक दिन राठौर ने बहुत शराब पी और सो गया. शादो ने उस की जेबों की तलाशी ली तो उसे काफी नोट मिल गए. उस ने जल्दीजल्दी उस की जेब से नोट निकाले और वहां से भाग कर सीधा रिक्शा कर के स्टेशन पहुंची. वह अपने घर वापस जाना नहीं चाहती थी. उस ने आत्महत्या करने के बारे में भी सोचा.

शादो परेशान हाल सी बेंच पर बैठी रो रही थी कि उस पर एक शरीफ से आदमी की नजर पड़ गई. उस व्यक्ति ने उस की परेशानी का कारण पूछने के बाद कहा, ‘‘अगर ऐसे ही रोती रही तो किसी गलत आदमी के हत्थे चढ़ जाओगी.’’

उस ने रोरो कर अपनी विपदा सुनाई. उस आदमी ने उस से कहा कि वह उस की पूरी मदद करेगा और उसे उस के घर छोड़ देगा. शादो ने घर जाने से मना कर दिया तो वह आदमी कहने लगा कि अगर उसे विश्वास हो तो वह उस के साथ चले. उस आदमी की शराफत को देख कर वह उस के साथ चलने को तैयार हो गई.

वह आदमी मसूद अहमद था. मसूद उसे अपने एक मित्र के घर ले गया और वहां उस से शादी का प्रस्ताव रखा. साथ ही उसे यह भी बता दिया कि वह विवाहित है और उस के बच्चे भी हैं. शादो उस से शादी के लिए तैयार हो गई. मसूद ने अपने कुछ दोस्तों को बुलाया और शादो से निकाह कर के उसे एक अलग मकान में रखा.

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अपनी इस शादी के बारे में मसूद ने अपने घर वालों को नहीं बताया. शादो मसूद द्वारा दिलाए गए घर में रह कर उस की सेवा करने लगी. उस के साथ जो गलत काम हुआ था, उस की वजह से उस के शरीर में ऐसी खराबी आ गई कि वह मां बनने के लायक नहीं रह गई थी. साल डेढ़ साल ठीक से गुजरा. फिर अचानक मसूद गंभीर रूप से बीमार हो गया. उस ने शादो से कहा कि मेरे मरने के बाद पता नहीं तुम्हारा क्या हो, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम्हें अपनी पत्नी के हवाले कर जाऊं, वह बहुत शरीफ औरत है, तुम्हारा पूरा ध्यान रखेगी.

फिर मसूद अहमद ने अपनी पहली पत्नी सरदारी बेगम को बुला कर पूरी कहानी सुनाई और शादो को उस के हवाले कर दिया. सरदारी बेगम ने पति से वादा किया कि वह उस का पूरा खयाल रखेगी. उस ने शादो का इतना साथ दिया कि वह अपने बच्चों को छोड़ कर शादो के साथ रहने लगी.

शादो के इतने लंबे बयान से मुझे लगा कि शादो जैसी शरीफ औरत सरदारी बेगम को जहर नहीं दे सकती, इसलिए मैं ने उसे घर जाने दिया. मैं सरदारी के हत्यारे के बारे में सोचने लगा. सोचविचार कर मैं ने शरीफ से पूछताछ करने का इरादा किया. एक मुखबिर ने मुझे बताया कि शरीफ शादो के खिलाफ तो था ही, जब उस की मां ने उस की बात नहीं मानी तो वह अपनी मां के भी खिलाफ हो गया था.

वह कहता था कि उस की मां उस की बदनामी करा रही है. लोग उस पर थूथू कर रहे हैं. जवान बेटों के होते हुए वह बच्चों को पढ़ा कर अपना गुजारा कर रही है. शरीफ ने पूरी कोशिश कर के देख ली कि उस की मां शादो को छोड़ दे, लेकिन उस की मां अपने दिवंगत पति से किया हुआ वादा तोड़ना नहीं चाहती थी.

अगले दिन मैं ने अपने एएसआई से शरीफ को उस के औफिस से लाने के लिए कहा. शरीफ एक सरकारी औफिस में स्टेनो था. वह उसे लेने चला गया. तभी 2 औरतें मेरे कमरे में आईं. उन में से एक शादो थी और दूसरी उस के स्कूल की टीचर. दूसरी औरत ने अपने पर्स में से एक पर्चा निकाल कर मुझे दिया. वह पर्चा शादो के नाम था. मैं ने उसे पढ़ा तो मेरी आंखें खुल गईं. मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरी समस्या इतनी जल्दी हल हो जाएगी.

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यह पर्चा सरदारी बेगम का शादो के नाम था, जिस में लिखा था, ‘आज शरीफ मेरे पास हलवा ले कर आया और उस ने बहुत कोशिश कर के मुझे हलवा खिलाया. कुछ देर तक वह मेरे पास बैठा और फिर चला गया. उस के जाने के बाद मेरा दिल मिचलाने लगा. मेरी सांस रुकने लगी. मैं समझ गई कि हलवे में वह मुझे जहर दे कर गया है. अब मैं बच नहीं सकूंगी. मैं यह तहरीर लिख कर संदूक में रख रही हूं, जिस से कि किसी निर्दोष को तंग न किया जाए.’ उस पर्चे में सब से नीचे सरदारी बेगम ने अपना नाम भी लिखा था.

मैं ने मिस्ट्रैस से पूछा कि यह पर्चा तुम्हें कहां से मिला. इस का जवाब शादो ने दिया. उस ने बताया कि सरदारी बेगम के पास एक ट्रंक था. उस की चाबी वह अपने सिर के पीछे की ओर बालों के नीचे लटका कर रखती थी. जिस दिन वह मरी तो मैं ने सब से पहले वह चाबी बालों से निकाल कर अपने पास रख ली थी. बाद में मैं उस चाबी के बारे में भूल गई थी.

भूलने का कारण यह था कि वह ट्रंक इतना महत्त्वपूर्ण नहीं था. उस में पैसा या जेवर जैसी कीमती कोई चीज नहीं थी. उस में वह अपने पति के कपड़े रखती थी. शादो उसे याद कर के बहुत रोती थी. यह उस दिन की बात है जब वह थाने आई थी. उस दिन वह रो रही थी तो वही मिस्ट्रैस जो उस के साथ आई थी. उस ने रोने का कारण पूछा तो उस ने कहा, ‘‘सरदारी को मरे काफी दिन हो गए हैं. उसे अपना कुछ सामान उस घर से लाना है, लेकिन वहां जाते डर लगता है.’’

मिस्ट्रैस ने कहा, ‘‘चलो मेरे साथ.’’

वह उस के साथ चली गई और वहां जा कर उस ने अपना सामान इकट्ठा किया. तभी उस की नजर सरदारी के संदूक पर पड़ी तो शादो से चाबी ले कर उसे खोला. कपड़ों के ऊपर यह पर्चा रखा मिला. पर्चा पढ़ते ही टीचर शादो को ले कर सीधी थाने आ गई थी.

Serial Story- एक तवायफ मां नहीं हो सकती: भाग 4

पर्चा पढ़ कर मैं ने शादो से पूछा कि क्या सरदारी बेगम की कोई लिखावट मिल सकती है? उस ने बताया कि वह बच्चों को पढ़ाती थी, घर में जरूर उन का लिखा हुआ कुछ न कुछ मिल जाएगा. मैं ने एक कांस्टेबल को शादो के साथ भेज दिया. उस ने घर जा कर सरदारी बेगम की लिखावट ढूंढ कर दे दी.

उन दोनों के जाते ही एएसआई शरीफ को ले कर आ गया. उसे देख कर मुझे गुस्सा आ गया. मैं ने एएसआई को जाने के लिए कहा. उस के जाते ही शरीफ कुरसी पर बैठ गया.

‘‘खड़े हो जाओ,’’ मैं ने छड़ी को जोर से मेज पर मार कर कहा, ‘‘सामने दीवार की ओर मुंह कर के खड़े हो जाओ.’’

उस ने कहा, ‘‘क्या हुआ आगा साहब, मैं ने क्या गलती कर दी?’’

वह मेरे सामने नाटक कर रहा था. उस ने अपनी मां की हत्या की और नाम शादो का लगा दिया. उसे हत्यारिन साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और मुझे भी झूठ बोल कर गलत रास्ते पर जांच करने पर लगा दिया.

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वह कुरसी पर बैठ चुका था और मेज पर हाथ रख लिए. मैं ने जोर से उस के हाथों पर छड़ी मारी, वह अपने हाथों को बगल में दबा कर सी…सी… करने लगा. उस की आंखों में आंसू आ गए.

‘‘अपना इकबाली बयान दो, नहीं तो तुम्हारी चमड़ी उधेड़ कर रख दूंगा.’’ मैं ने गुस्से में कहा.

‘‘कैसा इकबाली बयान आगा साहब?’’ वह ढिठाई से बोला.

मैं उस के पास गया और छड़ी से उस का गला दबा कर कहा, ‘‘बको, जल्दी बको. तुम ने अपनी मां की हत्या की है या नहीं?’’

‘‘आप कैसी बातें कर रहे हैं आगा साहब, मैं अपनी मां की हत्या कैसे कर सकता हूं?’’

मैं ने उस की मां के हाथ का लिखा हुआ पर्चा दिखाते हुए कहा, ‘‘पढ़ो.’’

वह पर्चा लेना चाह रहा था. मैं ने उस का हाथ झटक दिया और कहा, ‘‘दूर से पढ़ो.’’

वह जैसेजैसे पर्चा पढ़ता जा रहा था, वैसेवैसे उस का शरीर ढीला पड़ता जा रहा था. फिर उस ने सिर झुका लिया. मैं ने उसे बताया कि यह पर्चा उस की मां के संदूक से मिला है. वह मेरी ओर आंखें फाड़ कर देखता रहा, बोला कुछ नहीं. मैं ने उसे बयान देने के लिए तैयार कर लिया. उस ने अपने बयान में बताया कि उसे मां के साथ शादो का रहना बिलकुल पसंद नहीं था. उस ने कई बार मां को शादो से अलग रहने के लिए कहा भी था, लेकिन वह तैयार नहीं हुई. उसे उस वक्त जबरदस्त झटका लगा, जब उस के पिता मसूद अहमद के एक मित्र ने उसे बताया कि शादो एक वेश्या है और उस का पिता शादो को लाहौर की हीरामंडी से ले कर आया था. ऐसी बातें सुनसुन कर वह कुढ़ता रहता था. उसे अपनी मां का एक बाजारू औरत के साथ रहना बिलकुल पसंद नहीं था, इसलिए उस ने तय कर लिया कि वह अपनी मां और शादो दोनों को जहर दे कर मार देगा.

उस ने हकीम जुम्मा खां से संखिया लिया और हलवा बना कर उस में मिला दिया और अपनी मां के घर ले गया. लेकिन उस दिन शादो घर में नहीं थी. उस ने मां को जोर दे कर हलवा खिलाया और उस से कहा कि यह हलवा शादो को भी खिलाना.

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कुछ ही देर में उस ने देखा, मां की हालत खराब हो रही है, वह सांस खींचखींच कर ले रही थी. वह वहां से भाग आया. बाद में उसे पता चला कि उस की मां मर गई. उस ने अपने बयान में यह भी कहा कि उसे क्या पता था कि उस की मां मरतेमरते उसे फंसा जाएगी. उस ने वहां से भागने में जल्दी की, मरने के बाद आता तो मां को लिखने का मौका ही नहीं मिलता.

बयान लिख कर मैं ने शरीफ के हस्ताक्षर करा लिए और एक कांस्टेबल को हकीम जुम्मा खां को गिरफ्तार करने के लिए भेज दिया. वह भी गिरफ्तार हो कर थाने आ गया. मैं ने उसे अवैध रूप से जहर रखने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. मैं ने पूरे केस को मेहनत से तैयार किया और अदालत में पेश कर दिया. शरीफ को आजीवन कारावास की सजा मिली और हकीम को 2 साल की. इस तरह एक निकृष्ट बेटा अपने अंत को पहुंचा.

प्रस्तुति : एस. एम. खा

Mother’s Day Special- बहू-बेटी: भाग 2

जया को मालूम था कि एक तो छुटकी मांजी की गोद में ज्यादा देर टिकती नहीं, दूसरे जहां उस ने कपड़े गंदे किए कि वह बहू को आवाज देने लगती हैं. स्वयं गंदे कपड़े नहीं छूतीं.

रश्मि को लगा, यहां भी कुछ गड़बड़ है. चुपचाप धीरे से छुटकी को गोद में ले कर बैठ गई और प्यार से उस का सुंदर मुख निहारने लगी. कुछ ही महीने की तो बात है, उस के घर भी मेहमान आने वाला है. वह भी ऐसे ही व्यस्त हो जाएगी. घर का पूरा काम न कर पाएगी तो उस की सास क्या कर लेगी, पर उस की सास तो सैलानी है, वह तो घर में ही नहीं टिकती. उस का सामाजिक दायरा बहुत बड़ा है. गरदन को झटका दे कर रश्मि मन ही मन बोली, ‘देखा जाएगा.’

मुश्किल से 15 मिनट हुए थे कि बच्ची रो पड़ी. हाथ से टटोल कर देखा तो पोतड़ा गीला था. उस ने जल्दी से कपड़ा बदल दिया, पर बच्ची चुप न हुई. शायद भूखी है. अब तो भाभी को बुलाना ही पड़ेगा. भाभी ने टोस्ट सेंक दिए थे, आमलेट बनाने जा रही थी. पिताजी अभी गरमगरम जलेबियां ले कर आए थे.

भाभी को जबरदस्ती बाहर कर दिया. बच्ची की देखभाल आवश्यक थी. फुरती से आमलेट बना कर ट्रे में रख कर मेज पर पहुंचा दिए. कांटेचम्मच, प्यालेप्लेट सब सही तरह से सजा कर पिताजी और अपने पति को बुला लाई. मां अभी नहा रही थीं. उस ने सोचा वह मां और भाभी के साथ खाएगी बाद में.

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नाश्ते के बाद रश्मि ने कुछ काम बता कर पति को बाजार भेज दिया. अब मैदान खाली था. झट से झाडू  उठा ली. सोचा कि पति के वापस आने से पहले ही सारा घर साफसुथरा कर देगी. वह नहीं चाहती थी कि पति के ऊपर उस के मायके का बुरा प्रभाव पड़े. घर का मानअपमान उस का मानअपमान था. पति को इस से क्या मतलब कि महरी आई या नहीं.

जैसे ही उस ने झाड़ू  उठाई कि जया आ गई. दोनों में खींचातानी होने लगी.

‘‘ननद रानी, यह क्या कर रही हो? लोग क्या कहेंगे कि 2 दिन के लिए मायके आई और झाड़ ूबुहारु, चौकाबरतन सब करवा लिए. चलो हटो, जा कर नहाधो लो.’’

‘‘नहीं जाती, क्या कर लोगी?’’ रश्मि ने मुसकरा कर कहा, ‘‘मेरा घर है, मैं कुछ भी करूं, तुम्हें मतलब?’’

‘‘है, मतलब है. तुम तो 2 दिन बाद चली जाओगी, पर मुझे तो सारा जीवन यहां बिताना है.’’

रश्मि ने इशारा समझा, फिर भी कहा, ‘‘अच्छा चलो, काम बांट लेते हैं. तुम उधर सफाई कर लो और मैं इधर.’’

‘‘बिलकुल नहीं,’’ जया ने दृढ़ता से कहा, ‘‘ऐसा नहीं होगा.’’

भाभी और ननद झगड़ ही रही थीं कि बच्ची ने रो कर फैसला सुना दिया. भाभी मैदान से हट गई. इधर मां ने दिन के खाने का काम संभाल लिया. छुटकी को नहलानेधुलाने व कपड़े साफ करने में ही बहू को घंटों लग जाते हैं. सास बहू की मजबूरी को समझती थी, पर एक अनकही शिकायत दिल में मसोसती रहती थी. बहू के आने से उसे क्या सुख मिला? वह तो जैसे पहले घरबार में फंसी थी वैसे ही अब भी. कैसेकैसे सपनों का अंबार लगा रखा था, पर वह तो ताश के पत्तों से बने घर की तरह बिखर गया.

वह कसक और बढ़ गई थी. नहीं, शायद कसक तो वही थी, केवल उस की चुभन बढ़ गई थी. दयावती के हाथ सब्जी की ओर बढ़ गए. फिर भी उस का मन बारबार कह रहा था, लड़की को देखो, 2 दिन के लिए आई है, पर घर का काम ऐसे कर रही है जैसे अभी विवाह ही न हुआ हो. आखिर लड़की है. मां को समझती है…और बहू…

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संध्या हो चुकी थी. रश्मि और उस का पति विजय अभीअभी जनपथ से लौटे थे. कितना सारा सामान खरीद कर लाए थे. कहकहे लग रहे थे. चाय ठंडी हो गई थी, पर उस का ध्यान किसे था? विजय ने पैराशूटनायलोन की एक जाकेट अपने लिए और एक अपनी पत्नी के लिए खरीदी थी. रश्मि के लिए एक जींस भी खरीदी थी. उसे रश्मि दोनों चीजें पहन कर दिखा रही थी. कितनी चुस्त और सुंदर लग रही थी. दयावती का चेहरा खिल उठा था. दिल गर्व से भर गया था.

बहू रश्मि को देख कर हंस रही थी, पर दिल पर एक बोझ सा था. शादी के बाद सास ने उस की जींस व हाउसकोट बकसे में बंद करवा दिए थे, क्योंकि उन्हें पहन कर वह बहू जैसी नहीं लगती थी.

Serial Story: बच्चों की भावना- भाग 2

‘‘बेटा, पहले तो आप चाय और नाश्ता लीजिए, मैं यहां स्नेह के पास बैठती हूं. आप आकृति की नानी को रेलवे स्टेशन से ले आइए.’’

अनुभव ने बिस्कुट के साथ चाय पी और रेलवे स्टेशन रवाना हुआ. स्टेशन पहुंचने पर पता चला कि गाड़ी 2 घंटे लेट है. रेलवे प्लेटफार्म के बेंच पर बैठा अनुभव सोचने लगा कि एकल परिवार के जहां एक तरफ अपने सुख हैं तो दूसरी ओर दुख भी. आज जब प्रसव के समय किसी अपने की जरूरत है, तो अकेले सभी कार्य खुद को करने पड़ रहे हैं. लेकिन यह उस की मजबूरी है. नौकरी जहां मिलेगी, वहीं रहना पड़ेगा. ऐसे समय में पड़ोस ही सगा होता है. पता नहीं डाक्टर भी डिलीवरी की गलत तारीख क्यों बताते हैं. तारीख के हिसाब से आकृति की नानी को 10 दिन पहले बुलाया है, लेकिन कुदरत के सामने किसी का बस चलता तो नहीं न.

पड़ोसी वर्माजी की भी कुछ ऐसी स्थिति है. दोनों बुजुर्ग दंपती रिटायरमेंट के बाद अकेले रह रहे हैं. एक बेटा विदेश में नौकरी कर रहा है, 2-3 साल बाद 2 महीने के लिए मिलने आता है और दूसरा बेटा बंगलौर में आईटी कंपनी में नौकरी करता है. साल में 10 दिन के लिए मिलने आता है. 2 बेटियां हैं, एक अहमदाबाद में रहती है, दूसरी नोएडा में, जो हर रविवार को सपरिवार मिलने आती है. बाकी सप्ताह भर वर्मा दंपती अकेले. इसी कारण अनुभव और वर्माजी के बीच काफी नजदीकियां हो गई थीं.

अनुभव और स्नेह दोनों नौकरी करते थे. आकृति की वजह से वर्मा दंपती की नजदीकियां बढ़ीं. दोपहर को आकृति स्कूल से आती तो अधिक समय उस का वर्माजी के घर बीतता. घर के कार्य के लिए अनुभव ने नौकरानी रखी हुई थी, लेकिन नौकरानी आकृति का कम और अपना ध्यान अधिक रखती थी. इस कारण कई नौकरानियां आईं और चली गईं, लेकिन वर्मा परिवार से संबंध बढ़ता ही गया. अकेलेपन को दूर करने के लिए एक छोटे बच्चे का सहारा वर्माजी को अपने खुद के बच्चों की दूरी भुला देता था. इस में दोष किसी का नहीं है.

तभी रेलवे की घोषणा ने अनुभव को विचलित कर दिया. गाड़ी 2 घंटे और लेट है. उफ, ये रेलवे वाले कभी नहीं सुधरेंगे. एक बार में क्यों नहीं बता देते कि गाड़ी कितनी देर से आएगी. सुबह से एकएक घंटे बाद और अधिक देरी से आने की घोषणा कर रहे हैं. सर्दियों में कोहरे के कारण गाडि़यां अकसर देरी से चलती हैं. अनुभव आज और अधिक इंतजार नहीं कर सकता था. लेकिन इस समय वह केवल झुंझला कर रेलवे प्लेटफार्म के एक छोर से दूसरे छोर के चक्कर लगा रहा था. तभी मोबाइल की घंटी बजी. दूसरी तरफ वर्माजी थे.

‘‘मुबारक हो, अनु बेटे. अकी का भाई आया है. स्नेह और छोटा काका एकदम ठीक हैं. तुम चिंता मत करो. मैं घर जा रहा हूं, अकी के स्कूल से वापस आने का समय हो गया है. चिंता मत करना.’’

यह सुन कर अनुभव की जान में जान आई. अब शांति से बेंच पर बैठ गया. निश्ंिचत हो कर अब अनुभव टे्रन का इंतजार करने लगा. गाड़ी पूरे 6 घंटे देरी से आई. बच्चे की खुशखबरी सुन कर नानी की सफर की सारी थकान मिट गई.

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‘‘अनु बेटे, अब सीधा नर्सिंग होम ले चल. पहले छोटे काके को देख कर स्नेह से मिल लूं.’’

नर्सिंग होम में स्नेह के पास झूले में छोटा काका सो रहा था. नानी को देख कर वर्मा दंपती ने बधाई दी. नानी ने नर्स और आया को रुपए न्योछावर किए और छोटे काके को गोद में लिया. छोटे काके को गोद में लेते देख आकृति बोली, ‘‘नानी, मैं ने आप से पहले छोटे काका को देखा. नानी, कितना गोरा है. देखो, कितना सौफ्ट है लेकिन एकदम गंजा है. सिर पर एक भी बाल नहीं है.’’

नानी ने लाड़ में कहा, ‘‘बाल भी आ जाएंगे. अकी से भी ज्यादा. जब तुम पैदा हुई थीं, तुम्हारे भी सिर में बाल नहीं थे, अब देखो, कितने लंबे बाल हैं.’’

‘‘नानी, मुझे दो न छोटे काका को, मम्मी तो हाथ भी नहीं लगाने दे रहीं.’’

नानी ने प्यार से कहा, ‘‘अभी बहुत छोटा है, मेरे पास बैठो, तुम्हारी गोदी में देती हूं.’’

गोदी में काका को पा कर आकृति उल्लास से भर कर बोली, ‘‘नानी, देखो, अभी आंखें खोल रहा था, देखो, कितने अच्छे तरीके से मुसकरा रहा है.’’

ऐसे हंसतेखेलते शाम हो गई. स्नेह ने नानी को घर जा कर आराम करने को कहा. आकृति का मन जाने को नहीं हो रहा था.

‘‘नानी, थोड़ा रुक कर चलते हैं. अभी काका जाग रहा है. जब सो जाएगा, तब चलेंगे.’’

‘‘अकी, अब घर चलो, होमवर्क भी करना होगा और फिर तुम उठने में देर कर देती हो,’’ अनुभव ने आकृति से कहा.

घर में होमवर्क करते समय अकी का ध्यान छोटे काका में लगा हुआ था. जैसेतैसे होमवर्क पूरा किया. रात को एक बार फिर वह अनुभव के साथ नर्सिंग होम गई और काफी देर तक छोटे काका को निहारती रही, पुचकारती रही.

रात को घर आने में देरी हो गई. पूरे दिन की थकान के बाद स्नेह और अपने बेटे को सही देख कर संपूर्ण निश्चितता के साथ अनुभव सोया तो सुबह उठने में देरी हो गई.

वर्मा आंटी ने कालबेल बजाई तब जा कर अनुभव की आंख खुली.

‘‘बेटे, क्या बात है, क्या अकी स्कूल नहीं जाएगी. मैं ने उस का नाश्ता भी बना दिया है.’’

‘‘आंटी, मालूम नहीं आज घड़ी का अलार्म कैसे नहीं सुनाई दिया. अभी अकी को उठाता हूं. स्कूल की तो अगले सप्ताह से छुट्टियां हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं, बेटा. मैं तुम्हारी चाय और अकी का नाश्ता रसोई में रख देती हूं और हां, स्नेह और नानी की चाय ले कर नर्सिंग होम जा रही हूं. तुम आराम से अकी को स्कूल के लिए तैयार करो.’’

अनुभव के उठने पर बड़ी मुश्किल से अकी स्कूल जाने के लिए तैयार हुई. चूंकि स्कूल बस आज निकल गई, इसलिए अनुभव को कार ले जानी पड़ी. अनुभव अकी को ले कर स्कूल पहुंचा तो गेट पर प्रिंसिपल खड़ी थीं और देरी से आने वाले बच्चों को घर वापस भेज रही थीं.

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अनुभव ने काफी मिन्नत की लेकिन प्रिंसिपल के ऊपर कोई असर नहीं पड़ा, उलटे वह अनुभव पर बिफर पड़ीं, ‘‘आप अभिभावकों का कर्तव्य है कि बच्चों को नियमित समय पर स्कूल भेजें, उन को अनुशासित करें, लेकिन आप उन को शह दे कर और अधिक बिगाड़ रहे हैं. मैं स्कूल का नियम किसी को नहीं तोड़ने दूंगी. आप अपने बच्चे को वापस ले जाइए.’’

‘‘मैडम प्लीज, आगे से देर नहीं होगी. आज अधिक सर्दी और धुंध के कारण देर हुई है,’’ अनुभव ने विनती की.

‘‘अगर आप का घर दूर है तो आप घर के पास किसी स्कूल में बच्चे को दाखिल करवाइए. मुझे अपने स्कूल का अनुशासन नहीं तोड़ना,’’ पिं्रसिपल ने कड़क स्वर में कहा.

इस के आगे अनुभव कुछ नहीं कह सका और चुपचाप अकी के साथ कार स्टार्ट कर घर के लिए रवाना हो गया. अनुभव का मूड खराब हो गया कि कितने कठोर हैं स्कूल वाले जो बच्चों के साथ उन के मातापिता से भी कितने गलत तरीके से पेश आते हैं. इतनी ठंड में छोटे बच्चों को सुबह उठाना, तैयार करना कितना मुश्किल होता है. ठंड की परेशानी को समझना चाहिए. स्कूल के समय को बदलना चाहिए. यदि 1 घंटा देरी से सर्दियों में स्कूल लगाया जाए तो सब समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है. चाहे कुछ हो जाए, इस साल अकी का स्कूल बदलवा दूंगा. घर के पास जिस भी स्कूल में दाखिला मिलेगा, उसी में करवा दूंगा. आखिर मैं भी तो घर के पास के सरकारी स्कूल में पढ़ा हूं. क्या जिंदगी की दौड़ में पिछड़ गया. स्कूल के बड़े नाम में क्या रखा है.

अनुभव यह सोचता हुआ धीरेधीरे कार चला रहा था. अकी समझ गई कि पापा पिं्रसिपल की बात से उदास और नाराज हो गए हैं. अकी ने सीडी प्लेयर औन कर पापा की मनपसंद सीडी लगा दी. मुसकरा कर अनुभव ने अकी को देखा और कार की रफ्तार तेज की. आखिर बच्चे भी सब समझते हैं. हमें कुछ कहते नहीं, शायद डरते हैं क्योंकि हम डांट मार कर उन्हें चुप करा देते हैं.

‘‘अकी, जब स्कूल की छुट्टी हो गई है तब कुछ समय नानी, स्नेह और छोटे काका के संग गुजारा जाए,’’ यह कहते हुए अनुभव ने कार सीधे नर्सिंग होम की तरफ मोड़ दी. अकी बहुत खुश हुई कि छोटे काका के साथ उसे सारा दिन गुजारने को मिलेगा.

स्कूल बैग के साथ अकी को देख कर स्नेह कुछ नाराज हुई, ‘‘आप ने अकी की छुट्टी क्यों करवाई.’’

अनुभव ने कहा कि इस विषय में घर चल कर बात करेंगे.

शाम को स्नेह को नर्सिंग होम से छुट्टी मिल गई. अनुभव ने अकी से कहा कि आज स्कूल की छुट्टी हो गई तो वह अपनी फें्रड से होमवर्क पूछ कर पूरा कर ले.

अकी ने जैसेतैसे होमवर्क किया और फिर नानी के पास सट के बैठ गई कि इसी बहाने वह छोटे काका के पास रह लेगी. रात काफी हो गई थी, खुशी में बातोंबातों में आंखों से नींद गायब थी, घड़ी देख कर स्नेह ने अकी को सोने को कहा कि कल सुबह भी कहीं लेट न हो जाए.

अभी अकी को एक सप्ताह और स्कूल जाना था, ठंड इस साल कुछ अधिक थी. सुबह जबरदस्त कोहरा होने लगा. रोज सुबह अकी को इतनी जल्दी स्कूल के लिए तैयार होते देख कर नानी ने स्नेह से कहा, ‘‘बेटी, किसी पास के स्कूल में अकी को दाखिल करवा दे. इतना अधिक परिश्रम छोटे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए घातक है.’’

‘‘मां, मैं स्कूल चेंज नहीं कराऊंगी. बहुत नामी और बढि़या स्कूल है.’’

इस का जवाब अनुभव ने दिया, ‘‘स्नेह, नानी ठीक कह रही हैं, मैं ने सोच लिया है कि इस साल रिजल्ट निकलने पर अकी का दाखिला किसी पास के स्कूल में करवा दूंगा,’’ और फिर उस ने पूरी बात स्नेह को विस्तारपूर्वक बताई कि कैसे फटकार लगा कर प्रिंसिपल ने उसे अपमानित किया. ऐसी बात सुन कर स्नेह उदास हो गई कि उस का अकी को एक नामी स्कूल में पढ़ाने का अरमान साकार नहीं हो पाएगा. लेकिन अनुभव के दृढ़ निश्चय और नानी के सहयोग के आगे स्नेह को झुकना पड़ा.

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आकृति यह सुन कर बहुत खुश हुई कि अब उसे नए सत्र से पास के किसी स्कूल में जाना होगा. इतनी जल्दी भी नहीं उठना पड़ेगा. स्कूल बस में वह बहुत अधिक परेशान होती थी. बड़े बच्चे बस की सीटों पर छोटे बच्चों को बैठने नहीं देते थे. स्कूल टीचर भी उन्हें कुछ नहीं कहती थीं. उलटे सब से आगे की सीटों पर बैठ जाती थीं.

गरमियों में तो इतना ज्यादा पसीना आता, घबराहट होती कि तबीयत खराब हो जाती थी, लेकिन पापामम्मी तो इस बारे में सोचते ही नहीं. सर्दियों में कितनी ज्यादा ठंड होती है. स्कर्ट पहन कर जाना पड़ता है. ऊपर से कोट पहना देते हैं, लेकिन स्कर्ट पहनने से टांगों में बहुत ज्यादा ठंड लगती है. छोटे बच्चों की परेशानी कोई नहीं समझता.

ठंड बढ़ती जा रही थी. बच्चों की परेशानी को महसूस कर प्रशासन ने सरकारी स्कूलों की छुट्टी समय से पहले घोषित कर दी. अभिभावकों के दबाव में आ कर निजी स्कूलों में भी निर्धारित समय से पहले सर्दियों की छुट्टियां घोषित कर दीं. जिस दिन छुट्टियों की घोषणा की, आकृति अत्याधिक खुशी के साथ झूमती हुई, नाचती हुई स्कूल से वापस आई. जैसे नानी ने फ्लैट का दरवाजा खोला, आकृति नानी से लिपट गई.

‘‘नानी, मेरी प्यारी नानी, आज मैं आजाद पंछी हूं. हमारी कल से पूरे 20 दिन की छुट्टी. अब मैं रोज छोटे काका के संग खेलूंगी,’’ और अपना स्कूल बैग एक तरफ पटक दिया और आईने के सामने कमर मटकाते हुए गीत गाने लगी.

तभी स्नेह ने आवाज लगाई, ‘‘अकी, काका सो रहा है, शोर मत मचाओ.’’

‘‘गाना भी नहीं गाने देते,’’ कह कर अकी बाथरूम में मुंह धोने के लिए चली गई और गीत गाने लगी, ‘‘मैं ने जिसे अभी देखा है, उसे कह दूं, प्रीटी वूमन, देखो, देखो न प्रीटी वूमन, तुम भी कहो न प्रीटी वूमन.’’

अकी का गाना सुन कर स्नेह ने उस की नानी से कहा, ‘‘मम्मी, जा कर अकी को बाथरूम से निकालो, वरना वह 2 घंटे से पहले बाहर नहीं आएगी.’’

नानी ने अकी को बाथरूम में जा कर कहा, ‘‘प्रीटी वूमन, बहुत बनसंवर लिए. अब बाहर आ जाइए. छोटा काका आप को बुला रहा है.’’

‘‘सच्ची,’’ कह कर अकी ने फर्राटे की दौड़ लगाई, ‘‘यह क्या नानी, छोटा काका तो सो रहा है, आप ने मेरा मजाक उड़ा कर सारा मूड खराब कर दिया,’’ अकी ने मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘मूड कैसे बनेगा, मेरी लाड़ो का,’’ नानी ने अकी को अपनी गोद में बिठाते हुए पूछा.

‘‘जब पापा गाना गाएंगे तब मैं पापा के साथ मिल कर गाऊंगी.’’

‘‘वह क्यों?’’

‘‘नानी, आप को नहीं पता, पापा को यह गाना बहुत अच्छा लगता है. मम्मी को देख कर गाते हैं.’’

‘‘अच्छा अकी, पापा का गाना तो बता दिया, मम्मी कौन सा गाना गाती हैं, पापा को देख कर?’’ इस से पहले अकी कुछ कहती, स्नेह तुनक कर बोली, ‘‘मां, तुम यह क्या बातें ले कर बैठ गईं.’’

यह सुनते ही अकी नानी के कान में धीरे से बोली, ‘‘नानी, मम्मी को थोड़ा समझाओ. हमेशा डांटती रहती हैं.’’

Serial Story: बच्चों की भावना- भाग 3

छुट्टियों में अकी को बेफिक्र देख कर नानी ने स्नेह से कहा कि बच्चों के कुदरती विकास के लिए जरूरी है कि उन्हें पूरा समय मिले, पढ़ने के साथ खेलने का मौका मिले. क्या तू भूल गई, किस तरह बचपन में तू पड़ोस की लड़कियों के साथ खेलती थी और पूरा महल्ला शोर से सिर पर उठाती थी. हम अपना बचपन भूल जाते हैं कि हम ने भी शैतानियां की थीं. बच्चों पर आदर्श थोपते हैं, जो एकदम अनुचित है.

‘‘मां, तुम भाषण पर आ गई हो,’’ स्नेह ने तुनक कर कहा.

‘‘तुम खुद देखो कि अकी आजकल कितनी खुश है, जितने दिन स्कूल गई, एकदम थकी सी रहती थी, अब एकदम चुस्त रहती है. इसलिए कहती हूं कि अनुभव की बात मान ले.’’

‘‘मम्मी, तुम और अनु एक जैसे हो, एकदूसरे की हां में हां मिलाते रहते हो. मेरी भावनाओं की तरफ सोचते भी नहीं हो. आखिर आप ने मुझे इतना क्यों पढ़ाया. एमबीए के बाद शादी कर दी. मेरा कैरियर भी नहीं बनने दिया. मुश्किल से 1 साल भी नौकरी नहीं की, शादी हो गई. शादी के बाद शहर बदल गया, फिर अकी के जन्म के कारण नौकरी नहीं की. अकी स्कूल जाने लगी, तब बड़ी मुश्किल से अनु को राजी किया. 3-4 साल ही नौकरी की, अब फिर छोटे काका के जन्म पर नौकरी छोड़नी पड़ रही है.’’

‘‘स्नेह, एक बात तुम समझ लो, परिवार के लालनपालन और बच्चों में अच्छी आदतों की नींव डालने के लिए मांबाप को अपनी कई इच्छाओं को मारना पड़ता है. परिवार को सही तरीके से पालना नौकरी करने से अधिक कठिन है. गृहस्थी की कठिन राह से परेशान लोग संन्यास लेते हैं, लेकिन दरदर भटकने पर भी न तो शांति मिलती है और न ही सुख. कठिन गृहस्थी में ही सच्चा सुख है.’’

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स्नेह मां के आगे निरुत्तर हो गई और आकृति को घर के पास वाले स्कूल में दाखिल करने को राजी हो गई. सर्दियों की छुट्टियों में वर्माजी की लड़की भी अपने परिवार के साथ रहने आ गई. वर्माजी की नातिन वृंदा आकृति की हमउम्र थी. दोनों सारा दिन एकसाथ धमाचौकड़ी करती रहतीं और नानी, स्नेह, छोटा काका वर्मा परिवार के साथ सोसाइटी के लौन में धूप सेंकते. एक दिन धूप सेंकते वर्माजी ने अपनी लड़की को सलाह दी कि वह भी वृंदा को पास के स्कूल में दाखिल करवा दे. वे आकृति की नानी के गुण गाने लगे कि उन्होंने स्नेह को आकृति के स्कूल बदलने के लिए राजी कर लिया है.

स्नेह मुंह बना कर बोली, ‘‘क्या अंकल आप भी स्कूल पुराण ले कर बैठ गए. बड़ी मुश्किल से तो नानी की कथा बंद की है.’’

‘‘बेटे, इस का जिक्र बहुत जरूरी है. देखो, जब हम स्कूल में पढ़ते थे तब गरमियों और सर्दियों में स्कूल का अलग समय होता था. गरमी में सुबह 7 बजे और सर्दियों में 10 बजे स्कूल लगता था. गरमी में 12 बजे घर वापस आ जाते थे और सर्दी में धूप में बैठ कर पढ़ते थे.’’

‘‘अच्छा,’’ वृंदा ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘आप कुरसीमेज क्लास से रोज बाहर लाते थे और फिर अंदर करते थे. अपने सर पर उठाते थे, क्या नानाजी?’’

‘‘नहीं बेटे, हमारे समय में तो मेजकुरसी नहीं होते थे. जमीन पर दरी बिछा कर बैठते थे. धूप निकलते ही मास्टरजी हुक्म देते थे और सारे बच्चे फटाफट दरियां उठा कर क्लासरूम के बाहर धूप में बैठ जाते थे. मजे की बात तो बरसात में होती थी. स्कूल की छत टपकती थी. जिस दिन बारिश होती थी, उस दिन छुट्टी हो जाती थी, मास्टरजी कहते थे, रेनी डे, बच्चो, आज की छुट्टी.’’

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यह सुन कर वृंदा और आकृति जोरजोर से हंसने लगीं…रेनी डे, होलीडे, कहतेकहते और हंसतेहंसते दोनों लोटपोट हो गईं.

अब अनुभव कहने लगा, ‘‘वर्मा अंकल के बाद मेरी भी सुनो, मेरा स्कूल 2 शिफ्टों में लगता था. छठी क्लास तक दूसरी शिफ्ट में स्कूल लगता था. खाना खा कर 1 बजे स्कूल जाते थे. 6 बजे वापस आते थे, मजे से सुबह 7-8 बजे सो कर उठते थे, सुबह स्कूल जाने की कोई जल्दी नहीं होती थी.’’

आकृति और वृंदा को स्कूल की बातों में बहुत अधिक रस आ रहा था और वे हंसतेहंसते लोटपोट होती जा रही थीं.

अकी को छुट्टियों में इतना अधिक खुश देख कर स्नेह ने पास के स्कूल का महत्त्व समझा और फाइनल परीक्षा के बाद नए सत्र में घर के पास स्कूल में अकी का दाखिला करा दिया. घर से स्कूल का पैदल रास्ता सिर्फ 5 मिनट का था. 2 दिन में ही अकी इतनी अधिक खुश हुई और स्नेह से कहा, ‘‘मम्मी, यह स्कूल बहुत अच्छा है, मेरी 2 फ्रेंड्स साथ वाली सोसाइटी में रहती हैं. मम्मी, आप को मालूम है, वे साइकिल पर स्कूल आती हैं, मुझे भी साइकिल दिला दो, 2 मिनट में स्कूल पहुंच जाऊंगी.’’

अनुभव ने आकृति को साइकिल दिला दी. अब अकी को न तो टेंशन था सुबह जल्दी उठ कर स्कूल जाने की और न स्कूल बस मिस हो जाने का. सारा दिन वह खुश रहती था. होमवर्क करने के बाद काफी समय छोटे काका के साथ खेलती और बेफिक्र चहकती रहती.

6 महीने में एकदम लंबा कद पा गई आकृति को देख कर स्नेह खुशी से फूली नहीं समाती थी. जो अकी कल तक सारा दिन थकीथकी रहती थी, आज वह कहने लगी, ‘‘मम्मी, मुझे चाय बनाना सिखाओ, मैं आप को सुबह बेड टी पिलाया करूंगी.’’

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सुन कर स्नेह को अपनी मां की कही बातें बारबार याद आतीं कि बच्चों के बहुमुखी विकास के लिए उन का बेफिक्र होना बहुत जरूरी है. उन पर उन की क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालना चाहिए. बच्चों की खुशी में ही हमारी खुशी होती है.

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