हिजाब : क्या बंदिशों को तोड़ पाई चिलमन?

‘‘आपा,दरवाजा बंद कर लो, मैं निकल रही हूं. और हां, आज आने में थोड़ी देर हो सकती है. स्कूटी सर्विसिंग के लिए दूंगी.’’

‘‘अब्बा ने निगम का टैक्स भरने को भी तो दिया था. उस का क्या करेगी?’’

‘‘भर दूंगी… और भी कई काम हैं. रियाद और शिगुफ्ता की शादी की सालगिरह का गिफ्ट भी ले लूंगी.’’

‘‘ठीक है, जो भी हो, जल्दी आना. 2 घंटे में आ जाना. ज्यादा देर न हो,’’ कह आपा ने दरवाजा बंद कर लिया.

मैं अब गिने हुए चंद घंटों के लिए पूरी तरह आजाद थी. जब भी घर से निकलती हूं मेरी हाथों में घड़ी की सूईयां पकड़ा दी जाती हैं. ये सूईयां मेरे जेहन को वक्तवक्त पर वक्त का आगाह कराती बेधती हैं- अपराधबोध से, औरत हो कर खतरों के बीच घूमने के डर से, खानदान की नाक की ऊंचाई कम हो जाने के खतरे से और मैं दौड़ती होती हूं काम निबटा कर जल्दी दरवाजे के अंदर हो जाने को.

किन दिमागी खुराफातों में उलझा दिया मैं ने… इतने बगावती तेवर तो हिजाब की तौहीन हैं. खैर, क्यों न इन चंद घंटों में लगे हाथ अपने घर वालों से भी रूबरू करा दूं.

तो हम कानपुर के बाशिंदे हैं. मेरे अब्बा होम्योपैथी के डाक्टर हैं. 70 की उम्र में भी उन की प्रैक्टिस अच्छी चल रही है. मेरे वालिदान अपनी बिरादरी के हिसाब से बड़े खुले दिलोदिमाग वाले हैं, ऐसा कहा जाता है.

6 बहनों में मैं सब से छोटी. मैं ने माइक्रोबायोलौजी में एमएससी की है. मेरी सारी बहनों को भी अच्छी तालीम की छूट दी गई थी और वे भी बड़ी डिगरियां हासिल करने में कामयाब हुईं. हमें याद है हम सारी बहनें बढि़या रिजल्ट लाने के लिए कितनी जीतोड़ मेहनत करती थीं और पढ़ने से आगे कैरियर भी मेरे लिए माने रखता ही था. मुझे एक प्राइवेट संस्थान में अच्छी सैलरी पर लैक्चरर की जौब मिल रही थी. लेकिन यह बात मेरे अब्बा की खींची गई आजादी की लकीर से उस पार की हो जाती थी.

साहिबा आपा को छोड़ वैसे तो मेरी सारी बहनों ने ऊंची डिगरियां हासिल की थीं, लेकिन दीगर बात यह भी थी कि अब वे सारी अपनीअपनी ससुराल की मोटीतगड़ी चौखट के अंदर बुरके में कैद थीं. हां, मेरे हिसाब से कैद ही. उन्होंने अपने सर्टिफिकेट को दिमाग के जंग लगे कबूलनामे के बक्से में बंद कर राजीखुशी ताउम्र इस तरह बसर करने का अलिखित हुक्म मान लिया था.

वे उन गलतियों के लिए शौक से शौहर की डांट खातीं, जिन्हें उन के शौहर भी अकसर सरेआम किया करते. वे सारी खायतों को आंख मूंद कर मानतीं और लगे हाथों मुझे मेरे तेवर पर कोसती रहतीं.

वालिदान के घर मैं और सब से बड़ी आपा रहती थीं. बाकी मेरी 4 बहनों की कानपुर के आसपास ही शादी हुई थी. ये सभी बहनें पढ़ीलिखी होने के साथसाथ बाहरी कामकाज में भी स्मार्ट थीं. वैसे अब ये बातें बेजा थीं, ससुराली कायदों के खिलाफ थीं. सब से बड़ी आपा साहिबा की शादी कम उम्र में ही हो गई थी. उन का पढ़ाई में मन नहीं था और शादी के लिए वे तैयार थीं.

बाद के कुछ सालों में उन का तलाक हो गया और वे अपने बेटे रियाद के साथ हमारे पास रहने आ गईं. मेरी दूसरी आपा जीनत की शादी पड़ोस के गांव में हुई थी. उन की बेटी शिगुफ्ता की अच्छी तालीम के लिए अब्बा ने अपने पास रखा. उम्र बढ़ने के साथ रियाद और शिगुफ्ता के बीच ‘गुल गुलशन गुलफाम’ होने लगे तो इन लोगों की शादी पक्की कर दी गई.

अब्बा के बनाए घर में हम सब बड़े प्रेम से रहते थे. हां, प्रेम के बाड़े के अंदर उठापटक तब होती जब अब्बा की दी गई आजादी के निशान से हमारे कदम कुछ कमज्यादा हो जाते.

घर में पूरी तरह इसलामी कानून लागू था. बावजूद इस के अब्बा कुछ हद तक अपने खुले विचारों के लिए जाने जाते थे. मगर यह ‘हद’ जिस से अब मेरा ही हर वक्त वास्ता पड़ता मेरे लिए कोफ्त का सबब बन गया था. मैं चिढ़ी सी रहती कि मैं क्यों न अपनी तालीम को अपनी कामयाबी का जरीया बनाऊं? क्यों वालिदान का घर संभालते ही मैं जाया हो जाऊं?

सारे काम निबटा कर रियाद और शिगुफ्ता के तोहफे ले कर मैं जब अपनी स्कूटी सर्विसिंग में देने पहुंची तो 4 बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे. मन में बुरे खयालात आने लगे… घर में फिर वही बेबात की बातें… दिमाग गरम…

मैं स्कूटी दे कर जल्दी सड़क पर आई और औटो का इंतजार करने लगी. अभी औटो के इंतजार में बेचैन ही हो रही थी कि पास खड़ी एक दुबलीपतली सांवली सामान्य से कुछ ऊंची हाइट की लड़की विचित्र स्थिति से जूझती मिली. उस की तुलना में उस की भारीभरकम ड्युऐट ने उसे खासा परेशान किया हुए था.

सर्विस सैंटर के सामने उस की गाड़ी सड़क से उतर गई थी और वह उसे खींच कर सड़क पर उठाने की कोशिश में अपनी ताकत जाया कर रही थी. हाइट वैसे मेरी उस से भले ही कुछ कम थी, लेकिन अपनी बाजुओं की ताकत का जायजा लिया मैं ने तो वे उस से 20 ही लगीं मुझे. मैं ने पीछे से उस की गाड़ी को एक झटके में यों धक्का दिया कि गाड़ी आसानी से सड़क पर आ गई. पीछे से अचानक मिल गई इस आसान राहत पर उसे बड़ी हैरानी हुई. उस ने पीछे मुड़ कर मुझे देख मुझ पर अपनी सवालिया नजर रख दी.

मैं ने मुस्करा कर उस का अभिवादन किया. बदले में उस सलोनी सी लड़की ने मुझ पर प्यारी सी मुसकान डाली. मैं पढ़ाई पूरी कर के 3 सालों से घर में बैठी हूं, मेरी उम्र 26 की हो रही. उस की भी कोई यही होगी. उस की शुक्रियाअदायगी से अचानक ऐसा लगा मुझे जैसे कभी हम मिली थीं.

मेरी उम्मीद से आगे उस ने मुझ से पूछ लिया कि मैं कहां जा रही हूं. वह मुझे मेरी मंजिल तक छोड़ सकती है. तब तक औटो को मैं ने रोक लिया था, इसलिए उसे मना करना पड़ा. हां, वह मुझे बड़ी प्यारी लगी थी, इसीलिए मैं ने उस से उस का फोन नंबर मांग लिया.

औटो में बैठ कर मैं उस सलोनी लड़की के बारे में ही सोचती रही…

वह नयनिका थी. छोटीछोटी आंखें, छोटी सी नाक पर मासूम सी सूरत. सांवली त्वचा निखरी ऐसी जैसे चमक शांति और बुद्धि की हो. बारबार मेरे जेहन में एहसास जगता रहा कि इसे मैं कहीं मिली हूं, लेकिन वे पल मुझे याद नहीं आए.

शाम को 4 बजे तक घर लौट आने का हुक्मनामा साथ ले गई थी, लेकिन अब 6 बजने में कुछ ही मिनटों का फासला था.

सूर्य का दरवाजा बंद होते ही एक लड़की बाहर महफूज नहीं रह सकती या तो बेवफाई की कालिख या फिर बिरादरी वालों की तोहमत अथवा औरत पर मंडराता जनूनी काला साया.

कहते हैं हिजाब हट रहा है. हिजाब तो समाज के दिमाग पर पड़ा है. समाज की सोच हिजाब के पीछे चेहरा छिपाए खड़ी है… वह रोशनी से खौफ खाती है. जब तक उस हिजाब को नहीं हटाओगे औरतों के हिजाब हट भी गए तो क्या?

अब्बा अम्मी पर बरस रहे थे, ‘‘लड़की जात को ज्यादा पढ़ालिखा देने से

यही होता है. मैं ही कमअक्ल था जो अपनी बिरादरी के उसूलों के खिलाफ जा कर लड़कियों को इतना पढ़ा डाला.. पैर मैं चटके बांध दिए… उस की सभी बहनें खानदान के रिवाजों की कद्र करते चल रही हैं… उन की कौन सी बेइज्जती हो रही है? वे तो किसी बात का मलाल नहीं करतीं… और इस छोटी चिलमन का यह हाल क्यों? मैं कहे देता हूं, वह कितना भी रोक ले, वाकर अली से उसे निकाह पढ़ना ही है. उस के आपा के बेटेबेटियों की शादी हो गई और यह अभी तक…

‘‘कैरियर बनाएगी… और क्या बनाएगी? इतना पढ़ा दिया… बिन बुरके यूनिवर्सिटी जाती रही… अब भी बुरका नहीं पहनती. मैं भी कुछ कहता नहीं… चलो जमाने के हिसाब से हम भी उसे छूट दें, लेकिन यह तो किसी को कुछ मानना ही नहीं चाहती?’’

अब्बा की पीठ दरवाजे की तरफ थी.

उन्होंने देखा नहीं मुझे. वैसे मुझे और उन्हें इस से फर्क भी नहीं पड़ने वाला था. मुझे जितनी आजादी थमाई गई थी, उस का सारा रस बारबार निचोड़ लिया जाता था और मैं सूखे हुए चारे की जुगाली करती जाती थी. वैसे मेरा मानना तो यह था कि जो दी गई हो वह आजादी कहां? मेरी शादी मेरे खाला के बेटे से तय करने की पहल चल रही थी.

वाकर अली नाम था उस का. वह मैट्रिक पास था. अपनी बैग्स की दुकान थी.

दिनरात एक कर के ईमानदारी से कमाई गई मेरी माइक्रोबायोलौजी की एमएससी की डिगरी चुल्लू भर पानी मांग रही थी डूब मरने को… और घर वाले मेरी बहनों का नाम गिना रहे थे. कैसे

वे ऊंची डिगरियां ले कर भी कम पढ़ेलिखे बिजनैस और खेती करने वाले पतियों से बाखुशी निभा रही हैं… वाकई मैं घर वालों की नजरों में उन बहनों जैसी अक्लमंद, गैरतमंद और धीरज वाली नहीं थी.

वाकर अली आज मुझे देखने आया. वैसे देखा मैं ने उसे ज्यादा… मुझ जैसी हाइट 5 फुट

5 इंच से ज्यादा नहीं होगी. सामान्य शक्लसूरत वैसे इस की कोई बात नहीं थी, लेकिन जो बात हुई वह तो जरूर कोई बात थी.

वकौल वाकर अली, ‘‘घर पर रह लेंगी न? हमारे यहां शादी के बाद औरत को घर से बाहर अकेले घूमते रहने की इजाजत नहीं होती… और आप को बुरके की आदत डाल लेनी होगी. आप को बिरादरी का खयाल रखना चाहिए था.’’

मैं अब्बा की इज्जत का खयाल कर चुप रही. मगर मैं चुप नहीं थी. सोच रही थी कि ये इजाजत देने वाले क्याक्या सोच कर इजाजत देते हैं.जेहन में सवाल थे कि क्या क्या फायदा होता है अगर आप के घर लड़कियां शादी बाद घर से अकेले नहीं निकलें या क्या नुकसान हो जाता है अगर निकलें तो? क्या बीवी पर भरोसे की कमी है या मर्दजात पर…

खानदानी आबरू के नाम पर काले सायों से ढकी रहने वाली औरतों की इज्जत घर में कितनी महफूज है?

वाकर अली मेरे अब्बा की तरह ही कई सारे कानून मुझ पर थोप कर चला गया कि अगर राजी रहूं तो अब्बा उस से बात आगे बढ़ाएं.

अब्बा तो जैसे इस बंदे के गले में मुझे बांधने को बेताब हुए जा रहे थे. घर में 2 दिन से इस बात पर बहस छिड़ी थी कि आखिर मुझे उस आदमी से दिक्कत क्या है? एक जोरू को चाहिए क्या- अपना घरबार, दुकान इतना कमाऊ पति, गाड़ी, काम लेने को घर में 2-3 मददगार हमेशा हाजिर… क्या बताऊं, क्या नहीं चाहिए मुझे? मुझे तो ये सब चाहिए ही नहीं.

मैं ने सोचा एक बार साहिबा आपा से बात की जाए. दीदी हैं कुछ तो समझेंगी मुझे. अभी मैं सोच कर अपने बिस्तर से उठी ही थी कि साहिबा आपा मेरे कमरे का दरवाजा ठेल अंदर आ गईं. बिना किसी लागलपेट के मैं ने कहा, ‘‘आपा, मैं परेशान हूं आप से बात करने को…’’

बीच में टोक दिया आपा ने, ‘‘हम सब भी परेशान हैं… आखिर तू निकाह क्यों नहीं करना चाहती? वाकर अली किस लिहाज से बुरा है?’’

‘‘पर वही क्यों?’’

‘‘हां, वही क्योंकि वह हमारी जिन जरूरतों का खयाल रख रहा है उन का और कोई नहीं रखेगा.’’

मैं उत्सुक हो उठी थी, ‘‘क्या? कैसी मदद?’’

‘‘वह तुझे बुटीक खुलवा देगा, तू घर पर ही रह कर कारीगरों से काम करवा कर पैसा कमाएगी.’’

‘‘पर सिर्फ पैसा कमाना मेरा मकसद नहीं… मैं ने जो पढ़ा वह शौक से पढ़ा… उस डिगरी को बक्से में बंद ही रख दूं?’’

‘‘बड़ी जिद्दी है तू!’’

‘‘हां, हूं… अगर मैं कुछ काम करूंगी तो अपनी पसंद का वरना कुछ नहीं.’’

‘‘निकाह भी नहीं?’’

‘‘जब मुझे खुद कोई पसंद आएगा तब.’’

साहिबा आपा गुस्से में पैर पटकती चली गईं. मैं सोच में पड़ गई कि वाकर अली से ब्याह कराने का बस इतना ही मकसद है कि वह मुझे बुटीक खुलवा देगा. वह बुटीक न भी खुलवाए तो इन लोगों को क्या? बात कुछ हजम नहीं हो रही थी. मन बहुत उलझन में था.

बिस्तर पर करवटें बदलते मेरा ध्यान पुरानी बातों और पुराने दिनों पर चला गया.

अचानक नयनिका याद आ गई. फिर मैं उसे पुराने किसी दिन से मिलान करने की कोशिश करने लगी. अचानक जैसे घुप्प अंधेरे में रोशनी जल उठी…

अरे, यह तो 5वीं कक्षा तक साथ पढ़ी नयना लग रही है… हो न हो वही है… अलग सैक्शन में थी, लेकिन कई बार हम ने साथ खेल भी खेले. उस की दूसरी पक्की सहेलियां उसे नयना बुलाती थीं और इसीलिए हमें भी इसी नाम का पता था. वह मुझे बिलकुल भी नहीं समझ पाई थी. ठीक ही है…

16-17 साल पुरानी सूरत आसान नहीं था समझना. रात के 12 बजने को थे. सोचा उसे एक मैसेज भेज रखूं. अगर कहीं वह देख ले तो उस से बात करूं. संदेश उस ने कुछ ही देर में देख लिया और मुझे फोन किया.

बातों का सिलसिला शुरू हो कर हम ज्यों 5वीं क्लास तक पहुंचे हमारी घनिष्ठता गहरी होती गई. जल्दी मिलने का तय कर हम ने फोन रखा तो बहुत हद तक मैं शांत महसूस कर रही थी.

कुछ ही मुलाकातों में विचारों और भावनाओं के स्तर पर मैं खुद को नयनिका के करीब पा रही थी. वह सरल, सभ्य शालीन और कम बोलने वाली लड़की थी. बिना किसी ऊपरी पौलिश के एकदम सहज. उस के घर में पिता सरकारी अफसर थे और बड़ा भाई सिविल इंजीनियर. मां भी काफी पढ़ीलिखी महिला थीं, लेकिन घर की साजसंभाल में ही व्यस्त रहतीं.

नयनिका कानपुर आईआईटी से ऐरोस्पेस इंजीनियरिंग में डिगरी हासिल कर के अब पायलट बनने की नई इबारत लिख रही थी.

इतनी दूर तक उस की जिंदगी भले ही समतल जमीन पर चलती दिख रही हो, लेकिन उस की जिंदगी की उठापटक से मैं भी दूर नहीं रह पा रही थी.

इधर मेरे घर पर अचानक अब्बा अब वाकर अली से निकाह के लिए जोर देने के साथसाथ बुटीक खोल लेने की बात मान लेने को ले कर मुझ से लड़ने लगे थे. साथ कभीकभार अम्मी भी बोल पड़तीं. हां, आपा सीधे तो कुछ नहीं कहतीं, लेकिन उन का मुझ से खफा रहना मैं साफ समझती थी. अब तो रियाद और शिगुफ्ता भी बुटीक की बात को ले कर मुझ से खफा रहने लगे थे. अलबत्ता निकाह की बात पर वे कुछ न कहते. मैं बड़ी हैरत में थी. दिनोदिन घर का माहौल कसैला होता जा रहा था. आखिर बात थी क्या? मुझे भी जानने की जिद ठन गई.

साहिबा आपा से पूछने की मैं सोच ही रही थी कि रात को किचन समेटते वक्त बगल के कमरे से अब्बा की किसी से बातचीत सुनाई पड़ी. अब्बा के शब्द धीरेधीरे हथौड़ा बन मेरे कानों में पड़ने लगे.

अच्छा, तो यह वाकर अली था फोन पर.

रियाद की प्राइवेट कंपनी में घाटा होने की वजह से उस के सिर पर छंटनी की तलवार लटक रही थी. इधर शिगुफ्ता को बुटीक का काम अच्छा आता था. रियाद और शिगुफ्ता के लिए एक विकल्प की तलाश थी. मुझ से बुटीक खुलवाना. लगे हाथ मेरे हाथ पीले हो जाएं… रियाद और शिगुफ्ता को मेरे नाम से बुटीक मिल जाए… मालिकाना हक रियाद और शिगुफ्ता का रहे, लेकिन मेरा नाम आगे कर के कामगारों से काम लेने का जिम्मा मेरा रहे. शिगुफ्ता को जब फुरसत मिले वह बुटीक जाए.

मैं रात को साहिबा आपा के पास जा बैठी… कहीं उन का मन मेरे लिए पसीजे. मगर वे लगीं उलटा मुझे समझाने, ‘‘वाकर तो अपनी खाला का बेटा है. गैर थोड़े ही है. पहली बीवी बेचारी मर गई थी… दूसरी भी तलाक के बाद चली गई… 38 का जवान जहान लड़का… क्यों न उस का घर बस जाए? शादी तो तुझे करनी ही है… कहीं तेरी शादी से मेरे बच्चों का जरा भला न हो जाए वह तुझे फूटी आंख नहीं सुहा रहा न?’’

‘‘अब आगे इन के बच्चे होंगे, हमारा घर छोटा पड़ेगा… इन का कारोबार जम जाए तो ये फ्लैट ले लें… यहां भी जगह बने. अब्बा फिर इस घर को बड़ा करवा कर किराए पर चढ़ाएं तो हमें भी कुछ आमदनी हो.’’

‘‘घर तोड़ेंगे क्या अब्बा… किस का कमरा?’’

‘‘किस का क्या बाहर वाला?’’

‘‘पर वह तो मेरा कमरा है?’’

‘‘तो तू कौन सी घर में रह जाएगी… वाकर के घर चली तो जाएगी ही न? जरा घर वालों का भी सोच चिलमन.’’

‘‘क्या मतलब? सुबह से ले कर रात तक सब की सेवा में लगी रहती हूं… और क्या सोचूं?’’

‘‘कमाल है… तुझे बिना बुरके के आनेजाने, घूमनेफिरने की आजादी दी गई है… और क्या चाहिए तुझे?’’

हताश हो कर मैं आपा के कमरे से अपने कमरे में बिस्तर पर आ कर लेट गई… सच मैं क्या चाहती हूं? क्या चाहना चाहिए मुझे? एक औरत को खुद के बारे में कभी सोचना नहीं है, यही सीख है परिवार और समाज की?

मुझे एक दोस्त की बेहद जरूरत थी. नयनिका से मिलतेमिलाते सालभर होने को था. बचपन का सूत्र कहूं या हम दोनों की सोच की समानता दोनों ही एकदूसरे की दोस्ती में गहरे उतर रहे थे.

मैं जिस वक्त उस के घर गई वह अपनी पढ़ाई की तैयारी में व्यस्त थी. नयनिका कमर्शियल पायलट के लाइसैंस के लिए तैयारी कर रही थी. हम दोनों उस के बगीचे में आ गए थे. रंगबिरंगे फूलों के बीच जब हम जा बैठे तो कुछ और करीबियां हमारे पास सिमट आईं. उस की आंखों में छिपा दर्द शायद मुझे अपना हाल सुनाने को बेताब था. शायद मैं भी. बरदाश्त की वह लकीर जब तक अंगारा नहीं बन जाती, हम उसे पार करना नहीं चाहतीं, हम अपने प्रियजनों के खिलाफ जल्दी कुछ बुरा कहना-सुनना भी नहीं चाहते.

मैं ने उस से पूछा, ‘‘उदास क्यों रहती हो हमेशा? तैयारी तो अच्छी चल रही न?’’

उस ने कहा, ‘‘कारण है, तभी तो उदास हूं… कमर्शियल पायलट बनने की कामयाबी मिल भी जाए तो हजारों रुपए लगेंगे इस की ट्रेनिंग में जाने को. बड़े भैया ने तो आदेश जारी कर दिया है कि बहुत हो गया, हवा में उड़ना… अब घरगृहस्थी में मन रमाओ.’’

‘‘हूं, दिक्कत तो है… फिर कर लो शादी.’’

‘‘क्यों, तुम मान रही हो वाकर से शादी और बुटीक की बात? वह तुम्हारे

हिसाब से, तुम्हारी मरजी से अलग है… अमेरिका में हर महीने लाखों कमाने वाले खूबसूरत इंजीनियर से शादी वैसे ही मेरी मंजिल नहीं. जो मैं बनना चाहती हूं, वह बनने न देना और सब की मरजी पर कुरबान हो जाना… यह इसलिए कि एक स्त्री की स्वतंत्रता मात्र उस के सिंदूर, कंगन और घूमनेफिरने के लिए दी गई छूट या रहने को मिली छत पर ही आ कर खत्म हो जाती है.’’

‘‘वाकई तुम प्लेन उड़ा लोगी,’’

मैं मुसकराई.

वह अब भी गंभीर थी. पूछा, ‘‘क्यों? अच्छेअच्छे उड़ जाएंगे, प्लेन क्या चीज है,’’ वह उदासी में भी मुसकरा पड़ी.

‘‘क्या करना चाहती हो आगे?’’

‘‘कमर्शियल पायलट का लाइसैंस मिल जाए तो मल्टीइंजिन ट्रैनिंग के लिए न्यूजीलैंड जाना चाहती हूं. पापा किसी तरह मान भी जाएं तो भैया यह नहीं होने देंगे.’’

‘‘क्यों, उन्हें इतनी भी क्या दिक्कत?’’

‘‘वे एक सामान्य इंजीनियर मैं कमर्शियल पायलट… एक स्त्री हो कर उन से ज्यादा डेयरिंग काम करूं… रिश्तेदारों और समाज में चर्चा का विषय बनूं? बड़ा भाई क्यों पायलट नहीं बन सका? आदि सवाल न उठ खड़े हों… दूसरी बात यह है कि अमेरिका में उन का दोस्त इंजीनियर है. अगर मैं उस दोस्त से शादी कर लूं तो वह अपनी पहचान से भैया को अमेरिका में अच्छी कंपनी में जौब दिलवाने में मदद करेगा. तीसरी बात यह है कि इन की बहन को मेरे भैया पसंद करते हैं और शादी करना चाहते हैं, जो अभी अमेरिका में ही जौब कर रही है.’’

‘‘उफ, बड़ी टेढ़ी खीर है,’’ मैं बोल पड़ी.

‘‘सब सधे लोग हैं… पक्के व्यवसायी… मैं तो उस दोस्त को पसंद भी नहीं करती और न ही वह मुझे.’’

‘‘हम ही नहीं सीख पा रहे दुनियादारी.’’

‘‘सीखना पड़ेगा चिलमन… लोग हम जैसों के सिर पर पैर रख सीढि़यां चढ़ते रहेंगे… हम आंसुओं पर लंबीलंबी शायरियां लिख उन पन्नों को रूह की आग में जलाते जाएंगे.’’

‘‘तुम्हें मिलाऊंगी अर्क से… आने ही वाला है… शाम को उस के साथ मुझे डिनर पर जाना पड़ेगा… भैया का आदेश है,’’ नयनिका उदास सी बोली जा रही थी.

मैं अब यहां से निकलने की जल्दी में थी. मेरी मोहलत भी खत्म होने को आई थी.

‘ये सख्श कौन? अर्क साहब तो नहीं? फुरसत से बनाया है बनाने वाले ने,’ मैं मन ही मन अनायास सोचती चली गई.

अर्क ही थे महाशय. 5 फुट 10 इंच लंबे, गेहुंए रंग में निखरे… वाकई खूबसूरत नौजवान. उन्हें देखते मैं पहली बार छुईमुई सी हया बन गई… न जाने क्यों उन से नजरें मिलीं नहीं कि चिलमन खुद आंखों में शरमा कर पलकों के अंदर सिमट गई.

अर्क साहब मेरे चेहरे पर नजर रख खड़े हो गए. फिर नयनिका की ओर मुखाबित हुए, ‘‘ये नई मुहतरमा कौन?’’

‘‘चिलमन, मेरी बचपन की सहेली.’’

अर्क साहब ने हाथ मिलाने को मेरी ओर हाथ बढ़ाया. मैं ने हाथ तो मिलाया, पर फिर घर वालों की याद आते ही मैं असहज हो गई. मैं ने जोर दे कर कहा, ‘‘मैं चलूंगी.’’

नयनिका समझ रही थी, बोली, ‘‘हां, तुम निकलो.’’

अर्क मुझ पर छा गए थे. मैं नयनिका से मन ही मन माफी मांग रही थी, लेकिन इस अनजाने से एहसास को जाने क्यों अब रोक पाना संभव नहीं था मेरे लिए.

कुछ दिनों बाद नयनिका ने खुशखबरी सुनाई. उस की लड़ाई कामयाब हुई थी… उसे मल्टी इंजिन ट्रेनिंग के लिए राज्य सरकार के खर्चे पर न्यूजीलैंड भेजा जाना था.

इस खुशी में उस ने मुझे रात होटल में डिनर पर बुलाया.

उस की इस खबर ने मुझ में न सिर्फ उम्मीद की किरण जगाई, बल्कि काफी हिम्मत भी दे गई. मैं ने भी आरपार की लड़ाई में उतर जाने को मन बना लिया.

होटल में अर्क को देख मैं अवाक थी और नहीं भी.

हलकेफुलके खुशीभरी माहौल में नयनिका ने मुझ से कहा, ‘‘तुम दोनों को यहां साथ बुलाने का मेरा एक मकसद है. अर्क और तुम्हारी बातों से मैं समझने लगी हूं कि यकीनन तुम दोनों एकदूसरे को पसंद करते हो वरना अर्क माफी मांगते हुए तुम्हारे मोबाइल नंबर मुझ से न मांगते… चिलमन, अर्क जानते हैं मैं किस मिट्टी की बनी हूं… यह घरगृहस्थी का तामझाम मेरे बस का नहीं है… सब लोग एक ही सांचे में नहीं ढल सकते… मैं अभी न्यूजीलैंड चली जाऊंगी, फिर आते ही पायलट के काम में समर्पण. चिलमन तुम अर्क से आज ही अपने मन की बात कह दो.’’

अर्क खुशी से सुर्ख हो रहे थे. बोले, ‘‘अरे, ऐसा है क्या? मैं तो सोच रहा था कि मैं अकेला ही जी जला रहा हूं.’’

कुछ देर चुप रहने के बाद अर्क फिर बोले, ‘‘नयनिका के पास बड़े मकसद हैं.’’

मेरे मुंह से अचानक निकला, ‘‘मेरे पास भी थे.’’

‘‘तो बताइए न मुझे.’’

नयनिका ने कहा, ‘‘जाओ उस कोने वाली टेबल पर और औपचारिकता छोड़ कर बातें कर लो.’’

अर्क ने पूरी सचाई के साथ मेरा हाथ थाम लिया था… विदेश जा कर मेरे कैरियर को नई ऊंचाई देने का मुझ से वादा किया.

इधर शादी के मामले में अर्क ने नयनिका के घर वालों का भी मोरचा संभाला.

अब थी मेरी बारी. अर्क का साथ मिल गया तो मुझे राह दिख गई.

घर से निकलते वक्त मन भारी जरूर था, लेकिन अब डर, बेचारगी की जंजीरों से अपने पैर छुड़ाने जरूरी हो गए थे.

कानपुर से दिल्ली की फ्लाइट पकड़ी हम ने. फिर वक्त से अमेरिकन एयरवेज में दाखिल हो गए.

साहिबा आपा को फोन से सूचना दे दी कि अर्क के साथ मैं अपनी नई जिंदगी शुरू करने अमेरिका जा रही हूं. वहां माइक्रोबायोलौजी ले कर काम करूंगी और अर्क को खुश रखूंगी.’’

साहिबा आपा जैसे आसमान से गिरी हों. हकला कर पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

हमारी आजादी हिजाब हटनेभर से नहीं है आपा… हमारी आजादी में एक उड़ान होनी चाहिए.

आपा के फोन रख देने भर से हमारी आजादी की नई दास्तां शुरू हो गई थी.

कंगना की हिमाचली टोपी ने बनाया राजनीति जीत के सफर को रंगीन

हिमाचल प्रदेश की सभी चारों लोकसभा सीटों से भाजपा ने जीत हासिल कर ली है. इनमें सबसे ज्यादा चर्चित मंडी सीट रही. कंगना रनौत (Kangana Ranaut) की जीत ने सभी को चौंका कर रख दिया. उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी विक्रमादित्य सिंह (Vikramaditya Singh) को भारी मतों से हराया. लेकिन पूरी राजनीति में कंगना की जीत में अगर किसी ने रंग दिखाया तो वे है उनकी हिमाचली टोपी.

 

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कंगना रनौत ने जब भी राजनीति रैलियों में शामिल हुई है उन्होंने अपनी टोपी का रंग हर जगह दिखाया. बता दें कंगना रनौत हिमाचल प्रदेश से ही है उनका पैतृक गांव हिमाचल है. जहां की उन्होंने टोपी हर राजनीति मंच में पहनी और यही टोपी ने उनकी जीत की इज्जत रखी हैं और इसी टोपी ने विक्रमादित्य सिंह को मात दे दी.

जब चंबा पहुंची तो दिखाया हिमाचली टोपी का रंग. जिसके बाद इंस्टाग्राम पर इस पोस्ट को शेयर किया था.

 

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कूल्लू पहुंच भी लोगों की बीच पहनी थी रंगीन हिमाचली टोपी, लोगों पर खूब लुटाया था प्यार.

 

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रामपुर में भी मंच पर टोपी पहन नजर आई थी कंगना रनौत.

बता दें कंगना अपनी हिमाचली टोपी पहन होली पर भी फोटो शेयर की थी. जिसके बाद लोगों ने कमेंट्स की बौछार लगा दी थी. ये फोटो उन्होंने टिकट मिलने के बाद ट्विटर पर शेयर की थीं.

बता दें कगंना रनौत ने अपनी जीत के बाद मुंबई वापस जाने को लेकर बड़ी बात कही है उन्होंने मीडिया से कहा है कि “अगर मेरे मुंबई जाने का सवाल है, मेरी तो ये जन्मभूमि है. यहां मैं लोगों की सेवा में तत्पर रहूंगी. जिस तरह से मोदीजी का सपना है, सबका साथ सबका विकास मैंने हमेशा से कहा है कि उनकी सेना बनकर काम करूंगी. तो मैं कहीं नहीं जा रही, हो सकता है कि किसी और को अपने बस्ते पैक करके कहीं जाना पड़े. मैं कहीं नहीं जा रही.

जान्हवी कपूर ने किया खुलासा, ‘जब राजकुमार राव ने पी ली थी बीटाडीन की एक बोतल’

जान्हवी कपूर और राजकुमार राव की हाल में फिल्म मिस्टर एंड मिसेज माही रीलिज होने वाली है जिसमें दोनों स्टार्स एक साथ फिल्म में नजर आएंगे. दोनों स्टार्स ने इस दौरान खूब मस्ती भी की है जिसके किस्से वे प्रमोशन के दौरान सबको बता रहे है. हाल ही वे अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए दोनों द ग्रेट इंडियन कपिल शो में नजर आए. जहां उन्होने के मजेदार किस्सा सबको सुनाया.

 

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आपको बता दें कि राजकुमार राव और जान्हवी कपूर पहले भी फिल्म में एक साथ काम कर चुके है. दोनों की कमेस्ट्री पर्दे पर भी और रीयल लाइफ में काफी मजेदार है. दोनों ने ‘मिस्टर एंड मिसेज माही’ की फिल्म प्रमोशन के दौरान अपना एक किस्सा बताया कि जब राजकुमार राव ने बीटाडीन की आधी बोतल पी ली थी, क्योंकि जान्हवी ने उनसे कहा था कि इससे उनका गला ठीक हो जाएगा.

जान्हवी ने कहा कि राजकुमार लोगों पर बहुत आसानी से विश्वास कर लेते हैं. एक बार रूही के सेट पर, उनके गले में खराश थी और मैंने उनसे बताया कि बीटाडीन नाम की एक दवा है, जिससे आपके गले का दर्द ठीक हो जाएगा. सिर्फ इसलिए कि मैंने उनसे कहा ‘आपको इसे लेना चाहिए’. उन्होंने ये दवा ले लिया. लेकिन बीटाडीन से गरारा करना होता है, न कि इसे पिया जाता है.

 

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जान्हवी ने कहा, अगले दिन मैंने राजकुमार से पूछा, ‘तुम्हें कैसा लग रहा है?’ और उन्होंने कहा, ‘हां, ये पूरी तरह से ठीक हो गया है.’ मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने कितनी बार गरारे किए और उन्होंने कहा, ‘नहीं नहीं मैंने आधी बोतल पी ली.’

​​​​​बता दें कि जान्हवी जल्द ही फिल्म ‘उलझ’ में नजर आएंगी. इसके अलावा वो फिल्म ‘देवरा: पार्ट वन’ में जूनियर NTR के साथ काम करती ही नजर आएंगी.

भोजपुरी एक्ट्रेस रानी चटर्जी ने ब्लैक ड्रेस में दिखाया जलवा, खुले बाल पर फिदा हुए फैंस

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की जानी मानी मशहूर एक्ट्रेस रानी चटर्जी की खूबसूरती से हर कोई वाकिफ है उनकी हर एक अदा पर फैंस मरते है. लोग उनकी एक झलक पाने के लिए तरसते है. रानी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती है. वे अपने बोल्ड लुक्स से सभी को घायल कर देती हैं. हाल में सोशल मीडिया पर वे ब्लैक ड्रेस में नजर आई है जहां वे अपने खुले बाल बिखेर अपनी सुंदरता से सबको घायल कर रही है.


आपको बता दें कि कुछ साल पहले तक रानी चटर्जी को उनके बढ़े हुए वजन की वजह से लोग जमकर ट्रोल करते थे. रानी चटर्जी ने अपने लुक को बदलकर ट्रोल्स को मुंहतोड़ जवाब दिया है. इसके लिए रानी चटर्जी ने जिम में घंटों पसीना बहाया है. इस बीच भोजपुरी की क्वीन रानी चटर्जी ने अपने फैंस को विजुअल ट्रीट दिया है. भोजपुरी एक्ट्रेस रानी चटर्जी की कुछ तस्वीरें सामने आई हैं, जो कि इंटरनेट वर्ल्ड की आग की तरह फैल रही हैं.

जी हां, उनके न्यू लुक को देख फैंस काफी खुश है और उनकी फोटोज को धड़ल्ले से वायरल कर रहे है. एक्ट्रेस रानी चटर्जी ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट को अपडेट करते हुए 3 तस्वीरें शेयर की हैं. सामने आई इन फोटोज में रानी चटर्जी ब्लैक ड्रेस में दिखाई दे रही हैं. साथ ही उन्होंने खुले बाल कैरी किए है. इन फोटोज पर लोग जमकर कमेंट करते हुए रानी चटर्जी की तारीफ कर रहे हैं.


एक्ट्रेस के वर्कफ्रंट की बात करें तो एक्ट्रेस रानी चटर्जी ने एक से बढ़कर एक फिल्मों में काम किया हैं. रानी चटर्जी की एक्टिंग लोगों को काफी पसंद आती है. इतना ही नहीं रानी चटर्जी ने टीवी शोज में भी अपना जलवा दिखाया है. भोजपुरी की क्वीन रानी चटर्जी खूबसूरती के मामले में बड़ी-बड़ी एक्ट्रेसेस को टक्कर देती हैं.

वर्जिनिटी या कौमार्य के बारे में क्या आप को सही जानकारी है

वर्जिनिटी (कौमार्य) को व्यक्ति के संभोग से जोड़कर देखा जाता है. माना जाता है कि जिस व्यक्ति ने पहले कभी भी सेक्स नहीं किया हैं वह वर्जिन है. इस विषय को लेकर लोगों में कई तरह की बातें प्रचलित है. किसी के साथ सेक्स करना और वर्जिनिटी को खोना, दो अलग-अलग बातें हैं, जिस पर विशेषज्ञ कई तर्क रखते हैं. कई लोगों का मानना है कि महिला के साथ योनि सेक्स करने से वर्जिनिटी खो जाती है, जबकि कई बार योनि सेक्स न करके भी कई अन्य यौन गतिविधि (ओरल सेक्स व एनल सेक्स) करने से भी वर्जिनिटी खो जाती है.

एक महिला में वर्जिनिटी पूरी तरह से हाइमन के सही होने या न होने पर निर्भर करती है. विशेषज्ञों का कहना है कि वर्जिनिटी को हाइमन से जोड़कर देखना बेहद ही गलत है, क्योंकि इसके खोने की कई अन्य वजह भी होती हैं.

हाइमन झिल्ली क्या है?                 

हाइमन योनि मुख के पास ऊतकों से बनी एक पतली झिल्ली होती है. हाइमन के बारे में लोग मानते हैं कि योनि जब तक पूरी तरह से नहीं खुलती तब तक हाइमन (योनिद्वार) सुरक्षित रहती है. वहीं योनि के खुलते ही हाइमन झिल्ली टूट जाती है. वैसे देखा जाए तो हाइमन में प्राकृतिक रूप से इतना बड़ा छिद्र होता है, जिससे माहवारी के दौरान आपको कोई परेशानी नहीं होती है. इसके अलावा आप टैम्पोन भी आसानी से इस्तेमाल कर सकती हैं.

कुछ महिलाएं जन्म से ही बहुत ही छोटे हाइमन ऊतकों के साथ पैदा होती हैं, जिसे पहली नजर में देखने पर यह लगता है कि उनकी योनि में हाइमन की झिल्ली मौजूद नहीं है, जबकि कुछ दुर्लभ मामलों में हाइमन की झिल्ली महिलाओं की योनि को पूरी तरह से आवरण में लिए होती है, इन मामलों में डॉक्टरों की मदद से इसके अतिरिक्त ऊतकों को हटा दिया जाता है.

सामान्यतः पहली बार सेक्स करने के दौरान हाइमन की झिल्ली पर दबाव व खिंचाव पड़ता है. जिससे हाइमन के टूटने पर योनि में दर्द के साथ ही खून भी निकलता है, लेकिन ऐसा हर महिला के साथ हो, यह जरूरी नहीं है. हाइमन की झिल्ली के टूटने के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं. साइकिल चलाने, दौड़ने व घुड़सवारी से भी कई बार हाइमन की झिल्ली टूट जाती है. एक बार महिलाओं की हाइमन की झिल्ली टूट जाए तो यह प्राकृतिक रूप में दोबारा विकसित नहीं हो पाती है.

वर्जिनिटी टेस्ट कैसे होता है

वर्जिनिटी या कौमार्य को जांचने के लिए जो परीक्षण किया जाता है उसमें हाइमन (योनिद्वार की झिल्ली) की मौजूदा स्थिति को ही जांचा जाता है. इस परीक्षण (Test/ टेस्ट) में यह माना जाता है कि हाइमन संभोग के बाद ही टूट या फट सकती है. इस टेस्ट को दो उंगलियों का परीक्षण (Two fingers Test) भी कहा जाता है. बताया जाता है इस तरह के टेस्ट को करने की प्रक्रिया की खोज सन 1898 में की गई थी. इस तरह की जांच के परिणामों की सटिकता न होने के कारण यह टेस्ट आज भी विवादस्पद विषय बना हुआ है. कई देशों ने इस परीक्षण को मानवीय कानूनों का उल्लघंन मानते हुए अवैध करार दिया है.

कई देशों में दो अंगुलियों के टेस्ट से ही किसी रेप पीड़िता की भी जांच की जाती है. इसमें अंदर प्रवेश करने वाली अंगुलियों के आधार पर डॉक्टर अपने विचार देता है और बताता है कि महिला के साथ किसी तरह की घटना हुई है या नहीं. एक रिपोर्ट में इस बात को बताया गया है कि महिला के योनिद्वार के लचीला होने का संबंध किसी भी तरह से बलात्कार से नहीं होता है. इसके साथ ही इस रिपोर्ट में दो अंगुलियों से किए जाने वाले टेस्ट को भी न करने की सलाह दी गई है.

क्या हाइमन झिल्ली का सही होना ही आपकी वर्जिनिटी को बताता है?

इस विषय पर लंबे समय से बहस चल रही है, जबकि साइंस और चिकित्सा जगत इस बारे में अपने अलग ही तर्क समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं. कुछ लोगों का मानना है कि जिन महिलाओं की योनि में हाइमन झिल्ली टूटी हुई होती है, वह वर्जिन यानि की कौमार्य नहीं हैं. वहीं हाइमन से जुड़े कुछ मामलों में ऐसा भी देखा गया है कि यह महिलाओं में जन्म से ही अधिक खुली हुई होती है, जबकि कई खेलों में हिस्सा लेने के दौरान भी हाइमन झिल्ली टूट जाती है, ऐसे में हाइमन को किसी महिला की वर्जिनिटी से जोड़ कर देखना बेहद गलत है.

हाइमन को ठीक करने की सर्जरी

हाइमन यानि योनिद्वार पर बनी ऊतकों की झिल्ली सेक्स या अन्य कारण से भी फट सकती है. कई बार तो कुछ महिलाओं के योनिद्वार पर इस प्रकार की झिल्ली होती ही नहीं हैं, ऐसे में उन महिलाओं के लिए अपनी वर्जिनिटी को साबित करने में मुश्किल हो सकती हैं. लेकिन लोगों में वर्जिनिटी टेस्ट के बढ़ते चलन के कारण हाइमन को ठीक करने वाली सर्जरी की शुरुआत हो चुकी है. हाइम्नोप्लास्टी (Hymenoplasty) नाम की यह सर्जरी किसी भी कॉस्मेटिक सर्जन से करवाई जा सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि इसके बेहद कम साइड इफेक्ट होते हैं और इस सर्जरी के बाद महिलाओं की हाइमन दोबारा पहले की तरह ही हो जाती है.

वर्जिनिटी (कौमार्य) खोने की सही उम्र क्या है?

किसी के साथ सेक्स करने का फैसला आपका अपना निजी निर्णय होता है, आप कब और किसके साथ अपनी वर्जिनिटी को खोते हैं इसका लोगों से कोई लेना देना नहीं है. किसी भी उम्र में आप पहली बार सेक्स कर सकते हैं. कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में वर्जिनिटी को खोने की उम्र दुनिया के अन्य क्षेत्रों के मुकाबले अधिक है. माना जाता है कि भारत में इसकी औसत आयु 19.8 हैं, जबकि दुनिया भर में पहली बार सेक्स कर वर्जिनिटी को खोने वालों की औसत आयु 17.8 है.

वर्जिनिटी को खोने की उम्र आपके प्यार भरे संबंधों के आधार पर भी निर्भर करती है. यदि कोई व्यक्ति या आपका कोई दोस्त अपनी वर्जिनिटी खो चुका है, तो इसका यह मतलब बिलकुल नहीं हैं कि पहली बार सेक्स करने के लिए आप भी तैयार हैं. अगर आप केवल सेक्स करने के नजरीये से अपनी वर्जिनिटी को खोना चाहते हैं, तो यह जरूरी नहीं कि इसमें आपको अच्छा ही महसूस हो. इससे बेहतर यह होगा कि आप पहले खुद को सेक्स के लिए तैयार कर लें, इसके बाद ही इस क्रिया को करें.

इसके साथ ही आपको सेक्स करने से पूर्व इससे होने वाले यौन संक्रमणों, एसटीडी (यौन संचारित रोग) व उनसे बचावों के बारे में जानकारी लेना बेहद ही जरूरी होता है.

इन्फ्लुएंसर्स करते पौयजनस फूड का प्रचार लोग होते बीमार

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हुआ. वायरल वीडियो में दिखाया गया कि एक बच्चा जिस की उम्र लगभग 11-12 साल है, कुछ खा रहा है और खाते समय उस के मुंह से धुआं निकल रहा है. सामने ही एक स्टौल है जिस पर स्मोक्ड बिस्कुट लिखा हुआ है. बच्चा वहीं से बिस्कुट ले कर खा रहा है. असल में वह स्मोक्ड बिस्कुट खा रहा है.

दरअसल, स्मोक्ड बिस्कुट कोई अलग बिस्कुट नहीं है. नौर्मल बिस्कुट को ही लिक्विड नाइट्रोजन के साथ परोस दिया जाता है और इसे ही स्मोक्ड बिस्कुट कहा जाता है. असल में बच्चा वही स्मोक्ड बिस्कुट खा रहा है और बिस्कुट खाते ही बच्चे की तबीयत अचानक खराब हो जाती है. आननफानन बच्चे को हौस्पिटल ले जाया जाता है. जहां इलाज के बाद उसे घर भेज दिया जाता है. यह वीडियो कर्नाटक के दावणगेरे से आया है.

गुरुग्राम मामले में क्या हुआ

लेकिन यह कोई पहला केस नहीं है जहां कैमिकल का इस्तेमाल ठेलों, दुकानों, रैस्टोरैंटों में मिलने वाले फूड में किया जा रहा हो. इस से पहले भी खाने में कस्टमर को कैमिकल यूज्ड फूड दिया गया. अभी कुछ महीने पहले ही गुरुग्राम में एक केस आया था. जहां एक रैस्टोरैंट में डिनर करने गई फैमिली को माउथफ्रैशनर के नाम पर ड्राई आइस सर्व कर दी गई. ड्राई आइस खाते ही फैमिली के 5 लोग नेहा सबरवाल, मनिका गोयनका, प्रितिका रुस्तगी, दीपक अरोड़ा और हिमानी के मुंह से खून आने लगा. उन्हें उलटियां होने लगीं. वे दर्द से तड़पने लगे. जल्दबाजी में उन्हें हौस्पिटल ले जाया गया. जहां इलाज के बाद उन्हें घर भेज दिया गया.

जब डाक्टर से ड्राई आइस के बारे में बात की गई तो डाक्टर ने आशुतोष शुक्ला को बताया, ‘जब इन 5 लोगों ने ड्राई आइस के टुकड़े खाए तो ठंड के कारण उन के मुंह में अल्सर हो गया और उस से खून आना शुरू हो गया. इसी वजह से उन की हालत खराब हुई.’

इन दोनों घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि स्वाद के चक्कर में सेहत के साथ खिलवाड़ करना कितना महंगा साबित हो सकता है.

क्या है ड्राई आइस

बात करें अगर ड्राई आइस की तो ड्राई आइस जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि इसे सूखी बर्फ कहते हैं. जिस का टैंपरेचर 80 डिग्री तक होता है. यह सौलिड कार्बन डाइऔक्साइड से बना होता है. इसे आप आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि नौर्मल बर्फ को जब आप मुंह में रखते हैं तो वह पिघलने लगती है. जब नौर्मल बर्फ पिघलती है तो पानी में बदलने लगती है. वहीं ड्राई आइस पिघलती है तो वह सीधी कार्बन डाइऔक्साइड गैस में बदल जाती है. यह अकसर मैडिकल स्टोर, किराने के सामान को स्टोर करने के लिए किया जाता है. इस का इस्तेमाल फोटोशूट और थिएटर के दौरान भी किया जाता है.

ड्राई आइस इतनी खतरनाक है कि पेट में जाते ही वहां छेद बना देती है, जो काफी जानलेवा साबित हो सकता है. जब यह कार्बन डाइऔक्साइड गैस में बदल जाती है तो मुंह के आसपास के टिश्यूज और सेल्स को नुकसान पहुंचाती है.

लिक्विड नाइट्रोजन कितना खतरनाक

लिक्विड नाइट्रोजन कितना खतरनाक है, इस का अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है.  2017 में दिल्ली में एक व्यक्ति ने गलती से ऐसी ड्रिंक पी ली थी जिस में लिक्विड नाइट्रोजन था. व्यक्ति को ड्रिंक से निकल रहे धुएं को हटाने के बाद उसे पीना था लेकिन उस ने धुएं हटने का इंतजार नहीं किया और उसे ऐसे ही पी लिया. इस के बाद उस व्यक्ति के पेट में दर्द हुआ और बाद में सर्जरी में पता चला कि उस के पेट में एक बड़ा छेद हो चुका है.

लिक्विड नाइट्रोजन और ड्राई आइस दोनों पदार्थों के नाम से ही सम?ा आता है कि लिक्विड नाइट्रोजन तरल होता है और ड्राई आइस ठोस. ड्राई आइस का तापमान -78.5 डिग्री सैल्सियस तक होता है. वहीं लिक्विड नाइट्रोजन इस से भी ज्यादा ठंडी होती है और इस का तापमान -196 डिग्री सैल्सियस तक हो सकता है. दोनों पदार्थों का इस्तेमाल खानेपीने की चीजों में स्मोक इफैक्ट देने के काम में किया जाता है.

कितने खतनाक हैं ये

2018 में अमेरिकी सरकार के फूड एंड ड्रग विभाग ने खानपान में लिक्विड नाइट्रोजन और ड्राई आइस के इस्तेमाल को ले कर एक रिपोर्ट पेश की थी. इस रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ड्राई आइस या लिक्विड नाइट्रोजन का इस्तेमाल सावधानी से न किया जाए तो अत्यधिक कम तापमान की वजह से यह घातक हो सकता है. इन्हें सीधेतौर पर खाना नहीं चाहिए. इस से स्किन और हमारे इंटरनल और्गन को नुकसान पहुंच सकता है.

लेकिन फिर भी दिनबदिन रासायनिक पदार्थों का खानपान में इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है और इन को बढ़ावा देने वाला और कोई नहीं, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों का ग्रुप है, जो खुद को फूड व्लौगर कहते हैं. ज्यादा व्यूज बटोरने के लिए ये दुकानदारों को उकसाते भी हैं कि अलग और बेढंगी चीजें बनाएं, उस के लिए ऊटपटांग फ्यूजन किए जाते हैं. दुकानदार भी ज्यादा वायरल होने के चक्कर में कुछ भी चीजें खाने में इस्तेमाल करते हैं, ताकि लोगों का ध्यान अनोखेपन पर जाए.

एक्सपैरिमैंटल फूड

सोशल मीडिया पर ये इन्फ्लुएंसर्स आएदिन ऐसे फूड स्टौल और रैस्टोरैंट को कवर करते हैं जो फ्यूजन के नाम पर कुछ भी बना रहे हैं, जैसे फेंटा मैगी, दही मैगी, चौकलेट पकोड़ा, पेस्टी मैगी, कौफी आइसक्रीम, गुलाबजामुन के पकौड़े, चुकंदर से बनी चाय, चौकलेट मोमोस, चौकलेट डोसा और न जाने क्याक्या. ये शरीर में जा कर कैसा प्रभाव छोड़ रहे हैं, इस पर कोई बात नहीं करता. इन क्या दिक्कतें हो रही हैं. इस पर कोई बात नहीं करता.

बहुत जगह दुकानदार वायरल होने के चक्कर में भरभर कर बटर, तेल, घी डाल कर दिखाता है. कोई आम इंसान जो नौर्मल या कहें घर का सिंपल खाना खाने वाला हो, इसे खा ले तो उस का सिर चकरा जाए, पैसे अलग उस के कुएं में जाएं.

मूक क्यों खाद्य विभाग

क्या फूड सेफ्टी एंड स्टेटैंडर्ड अथौरिटी औफ इंडिया (एफएसएसएआई) को इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए? क्यों यह विभाग इस पर चुप है? जिस तरह सोशल मीडिया पर खाने से संबंधित ऊटपटांग चीजें वायरल होती रहती हैं, घटिया चीजें परोसी जाती हैं, क्या यह फूड सिक्योरिटी औफिसर की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह ध्यान दे कि मैगी के साथ कोल्डड्रिंक का छौंका हैल्थ के लिए नुकसानदेह तो नहीं?

दरअसल, ये फूड औफिसर भी चीजों को चलता करने के मूड में रहते हैं या दुकानदारों से लेदे कर मामला रफादफा करते हैं. उन्हें नागरिकों की हैल्थ की परवा नहीं होती. सड़क के किनारे एक व्यक्ति ठेला खोल कर गरीबों को सस्ते में स्वाद वाला खाना तो दे रहा है पर साथ में बीमारियां भी दे रहा है. आम लोग कुछ कहते नहीं क्योंकि हर नुक्कड़, चौराहे पर यही कचरा परोसा जा रहा है.

फूड व्लौगर का साथ

फूड एक्सपैरिमैंट करने वाले दुकानदारों को फूड इन्फ्लुएंसर्स ने आसमान पर बैठा लिया है. जहां कहीं भी देखो, ये व्लौगर अपना कैमरा उठा कर चालू हो जाते हैं. न तो इन्होंने खाने की क्वालिटी चैक करने का कोर्स कर रखा है, न ही ये फूड की वैराइटीज के बारे में ज्यादा जानकारी रखते हैं. अब इन को क्या पता कि स्मोक्ड बिस्कुट किस एज ग्रुप के लिए है. इन्हें क्या पता कि स्मोक्ड बिस्कुट को कितनी देर बाद खाना चाहिए? इन्हें क्या पता कि इसे खाने के बाद ठंडा पानी पीना चाहिए या नहीं?

सच बात तो यह है कि इन्फ्लुएंसर को एक्सपैरिमैंटल फूड की सिर्फ वीडियो नहीं बनानी चाहिए बल्कि उस के फायदे और नुकसान भी बताने चाहिए. तभी वह एक अच्छा जानकारी देने वाला मार्गदर्शक कहलाएगा.

मैं दूसरी कास्ट की लड़की से शादी करना चाहता हूं, क्या करूं?

सवाल

मैं छोटी जाति का सरकारी नौकरी करने वाला एक नौजवान हूं और अपने पड़ोस की एक ऊंची जाति की लड़की से प्यार करता हूं. लड़की के मांबाप को मेरी सरकारी नौकरी के चलते यह रिश्ता मंजूर है, पर पड़ोस के कुछ लोग भांजी मार रहे हैं. वे इसे जातिवाद से जोड़ रहे हैं और नाक कटने की दुहाई दे कर यह रिश्ता तोड़ देना चाहते हैं. वे लड़की के परिवार का हुक्कापानी बंद कर चुके हैं. हमें क्या करना चाहिए?

जवाब

लड़की के मांबाप आप की जाति से नहीं, बल्कि नौकरी से लड़की की शादी के लिए तैयार हुए हैं, जो हर्ज की बात इस लिहाज से नहीं कि आप दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं, इसलिए जिंदगी अच्छे से कट जाएगी. बीच वालों की परवाह न करें, उन का तो काम ही टांग अड़ाना होता है. आप इन टांगों को मरोड़ते हुए अपना घर बसाइए और इतमीनान से रहिए. कुछ दिनों में वे लोग खुद रास्ते पर आ जाएंगे. जिन की मंशा यह है कि ऊंची जाति वाली लड़की नीची जाति वाले लड़के से ब्याह कर घरसमाज में उन की नाक न कटाए.

लड़की के घर वालों का हुक्कापानी बंद कर देना सदियों पुराना टोटका है. उन से कहिए कि वे डरे नहीं, बल्कि अपनी लड़की का सुख देखें.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

जूलियट की अनोखी मुहब्बत : कैसे प्यार में पड़ा जय

जय अपने घूमनेफिरने के शौक को पूरा करने के लिए गाइड बन गया था. उस ने इतिहास औनर्स से ग्रेजुएशन की थी. उस के पास अपने पुरखों की खूब सारी दौलत थी.

जय के पिता एक किसान थे. पूरे इलाके में सब से ज्यादा जमीन उन्हीं के पास थी. उन्होंने खेती की देखभाल के लिए नौकर रखे हुए थे. जय 3 बहनों में अकेला भाई था. तीनों बहनों की नामी खानदान में शादी हुई थी. जय की मां एक घरेलू औरत थी.

भारत के बहुत से ऐतिहासिक पर्यटक  स्थलों के मुलाजिम, वहां के दुकानदार और तमाम लोग जय को पहचानते थे. इस बार जय गाइड के रूप में बोधगया  गया हुआ था. विदेशी पर्यटकों में उस की मुलाकात जूलियट और उस की मां से हुई.

जूलियट की उम्र 19 साल थी. वह अपनी मां के साथ ताजमहल देखने आई थी. जूलियट और उस की मां को जय का जानकारी देने का तरीका बहुत पसंद आता है, इसलिए उन्होंने उसे अपना पर्सनल गाइड बना लिया. पहली ही नजर में जूलियट को जय का कसरती बदन भा गया और वह उस के तीखे नैननक्श पर फिदा हो गई. जय दोपहर के भोजन के लिए भारतीय व्यंजन खिलाने के लिए उन्हें एक होटल में ले गया. जूलियट को खाना इतना तीखा लगा कि उस ने पानी पीने की जल्दी में गरमगरम सब्जी जय के ऊपर गिरा दी और फिर अपने रूमाल से बड़े प्यार और अपनेपन से साफ किया. अब जय भी जूलियट की तरफ खिंचने लगा.

जूलियट और उस की मां की ताजमहल देखने की बहुत इच्छा थी और जय का गांव आगरा में ताजमहल के पास ही था. बोधगया और एयरपोर्ट के रास्ते के बीच में बड़ी नदी पड़ती थी. बारिश की वजह से नदी अपने उफान पर थी. जय के बारबार मना करने के बावजूद नाविक ने ज्यादा मुसाफिर अपनी नाव में बिठा लिए. नाव बीच नदी में जा कर अपना कंट्रोल खोने लगी और नदी में पलट गई. इस वजह से बहुत से लोगों की जानें चली गईं.

इस भयानक हादसे का जूलियट की मां पर बहुत बुरा असर पड़ा और उन्होंने उसी समय अपने देश लौट जाने का फैसला ले लिया. पर इस हादसे के बाद जय जूलियट की निगाह में उस का असली हीरो बन गया. वह उसे मन ही मन अपना सबकुछ मानने लगी और उस की दीवानी हो गई. पर मां की जिद के आगे झुक कर जूलियट को वापस अपने देश लौट जाना पड़ा. पर अपने घर लौटने के बाद भी जूलियट दिन में एक बार जय को फोन जरूर करती थी.

एक रात जय अपने घर की छत पर बैठा हुआ था. गुलाबी मौसम था. जय की छत पर गमलों में फूलों के पौधे लगे हुए थे. उन फूलों की खुशबू चारों तरफ फैल रही थी. उसी समय जूलियट का फोन आ गया. उस दिन जय सुबह से ही रोमांटिक था. वह फोन पर जूलियट के बालों, होंठों और रंगरूप की बहुत तारीफ करने लगा और फिर हिम्मत कर के अपने प्यार का इजहार कर दिया.

जूलियट तो प्यार के ये खूबसूरत शब्द सुनने के लिए कब से बेकरार थी. वह बिना सोचेसमझे जय के प्रस्ताव को अपना लेती है. फिर उन दोनों के प्यार का सिलसिला फोन पर शुरू हो जाता है. दोनों रोजाना फोन पर घंटों प्यार की बातें किया करते थे. उन्हीं दिनों एक बड़े घर से जय की शादी का रिश्ता आया. जय के ससुर ने जय के पिताजी से यह वादा किया था कि जय की शादी के बाद वे आगरा शहर की 10,000 गज जमीन जय के नाम कर देंगे.

जय जूलियट से प्यार करता था और उसी से शादी करना चाहता था, इसलिए उस ने शादी से साफ इनकार कर दिया. इस बात से नाराज जय के पिताजी ने परिवार वालों को अपना घर छोड़ने की धमकी दी, इसलिए जय की मां और तीनों बहनें बहुत घबरा गईं और उन्होंने जय पर दबाव डाल कर उसे शादी करने के लिए मजबूर कर लिया.

जय ने उन के प्यार और दुख को समझ कर अपना मन मार कर हां कह दी, पर जूलियट और अपने संबंध के बारे में अपनी मां और बहनों को भी बता दिया, फिर फोन कर के जूलियट को अपने घर की सारी समस्या समझा दी. जय का फोन सुनने के बाद जूलियट ने अपनी मां को बताया कि वह जय से बहुत प्यार करती है और वह उसी समय भारत आने का फैसला लेती है.

जय जूलियट और उस की मां को एयरपोर्ट से सीधे अपने घर ले कर आया. वहां उस की शादी की तैयारियां बहुत जोरशोर से चल रही थीं. शादी बहुत धूमधाम और शानोशौकत से होने वाली थी.

जूलियट से मिलने के बाद जय की मां और उस की तीनों बहनों को जूलियट का स्वभाव इतना मीठा और सुंदर लगा कि वे भी जूलियट को पसंद करने लगीं. जय के पिता को भी जूलियट बहुत अच्छी लड़की लगी. शादी के रीतिरिवाज शुरू हो गए थे. जूलियट को हलदी और गीतों की रस्म बहुत पसंद आई और उस की आंखों से आंसू बह निकले, क्योंकि वह बारबार यही सोच रही थी कि काश, वह जय की दुलहन होती.

शादी का दिन आ गया और जय की शादी भी हो गई. जूलियट की मां को भारतीय शादी के रीतिरिवाज और खानपान बहुत पसंद आया, पर उन्हें अपनी बेटी के दुख का एहसास भी था. उन्हें भी जय बहुत पसंद था. जय की बरात जिस दिन वापस आती है, जूलियट उसी दिन दुखी मन से अपनी मां के साथ अपने देश लौट जाने का फैसला लेती है. जय बहुत गुजारिश कर के जूलियट को रोक लेता है. जय उन से कहता है, ‘‘मैं जिंदगीभर आप लोगों को भूल नहीं सकता. मेरे घर के दरवाजे आप लोगों के लिए हमेशा खुले रहेंगे. मैं गाइड का काम छोड़ दूंगा. मेरी आखिरी इच्छा आप लोगों को ताजमहल दिखाने की है.’’

जूलियट और उस की मां जय के साथ ताजमहल देखने के लिए तैयार हो जाते हैं. आज ही के दिन जय की सुहागरात थी, पर जय जूलियट और उस की मां को ताजमहल दिखाने के लिए घर से निकल जाता है.

जय की मां और बहनें जूलियट और उस की मां को बहुत से उपहार देती हैं. उन्हें ताजमहल घुमाने के बाद जय दोपहर को एक रैस्टोरैंट में ले कर जाता है. जूलियट को फिर खाना बहुत तीखा लगता है. वह हड़बड़ाहट में फिर उसी तरह गरम सब्जी जय पर गिरा देती है.

दोबारा वही घटना होने पर वे दोनों हंसने लगते हैं. फिर उन की आंखों में आंसू आ जाते हैं.

जय जूलियट को छोटा सा खूबसूरत ताजमहल उपहार में देता है. जूलियट  की मां को वह भारत की ऐतिहासिक चीजें उपहार में देता है.

जूलियट एयरपोर्ट पर बारबार पीछे मुड़मुड़ कर जय को देखती है, फिर ‘बायबाय’ कर के अपनी मां के साथ अपने देश चली जाती है. इस तरह जूलियट का प्यार अधूरा रह जाता है.

पहचान: लता और मंगेश को करीब देख गुजरिया ने क्या किया?

चिलचिलाती धूप में रिकशा एक झांके के साथ एक खूबसूरत मकान के सामने ठहर गया. लता रिकशे से उतर कर मकान के अंदर जाने लगी कि तभी रिकशे वाले ने पुकारा, ‘‘मेम साहब, आप ने अभी मेरे पैसे नहीं दिए.’’

लता ने पलट कर देखा और झोंपती सी बोली, ‘‘ओह सौरी, मैं जल्दी में थी,’’ और पर्स से कुछ पैसे निकाल कर रिकशे वाले को दिए.

रिकशे वाला उसे देखते हुए बोला, ‘‘मेम साहब, गरमी बहुत है. थोड़ा पानी मिल जाता तो…’’ लता ने कहा, ‘‘हांहां, क्यों नहीं. अंदर आ जाओ.’’

वह रिकशे से उतर गया. लता आगेआगे और रिकशे वाला पीछेपीछे घर के भीतर चला गया. वह फ्रिज से पानी निकालने लगी.

रिकशे वाला बड़े ध्यान से घर देखता हुआ बोला, ‘‘मेम साहब, बड़ा सुंदर घर है आप का.’’

लता ने उसे पानी की एक बोतल पकड़ाई और गिलास थमाते हुए बोली, ‘‘यह लो और पानी लो.’’

रिकशे वाला पानी पी रहा था. लता उसे एकटक देख रही थी. वह तकरीबन 30-35 साल के आसपास का होगा. लंबीचौड़ी कदकाठी, चेहरे पर हलकी मूंछें और सिर पर घने बाल.

रिकशे वाले ने पानी पी कर लता को बोतल वापस की, तो लता बोली, ‘‘आओ, मैं तुम्हें अपना पूरा घर दिखाती हूं.’’

रिकशे वाला ‘जी’ कहते हुए लता के पीछेपीछे हो लिया.

‘‘यह देखो रसोईघर है.’’

रिकशे वाले ने कहा, ‘‘वाह…’’

लता बोली, ‘‘और यह बाथरूम.’’

इस के बाद लता ने शावर खोल कर दिखाया, तो वह मुसकरा उठा. शावर की बौछार से थोड़ा बदन लता का और थोड़ा बदन रिकशे वाले का भीग गया. वह सिहर कर पीछे हट गया.

लता ने अजीब नजरों से उसे देखा. कुछ पल के लिए वे दोनों ठिठक से गए, फिर लता ने खामोशी तोड़ी, ‘‘आओ, अब उधर चलें…’’ और वह उसे एक खूबसूरत हाल की ओर ले गई.

रिकशे वाला बड़े ध्यान से सब देख रहा था कि अचानक उस की नजर एक तसवीर पर टिक कर रह गई.

लता ने उस की ओर देखते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

रिकशे वाले ने कहा, ‘‘आप का यह फोटो बड़ा वो है.’’

लता ने पूछा, ‘‘वो मतलब…?’’

वह थोड़ा शरमाते हुए बोला, ‘‘जिसे कहते हैं सक्सी.’’

लता ठहाका मार कर हंस पड़ी, फिर बोली, ‘‘सक्सी नहीं… सैक्सी.’’

रिकशे वाले ने कहा, ‘‘हां, वही बात मैडम. हम ज्यादा पढ़ेलिखे तो हैं नहीं.’’

तभी लता ने आंखों में खुमारी लाते हुए पूछा, ‘‘वैसे, तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘जी, मंगेश.’’

‘‘तो मंगेश, मैं सिर्फ फोटो में ही सैक्सी लगती हूं… ऐसे नहीं?’’ कहते हुए लता ने उस की बांहें थाम लीं.

मंगेश एकदम से हकलाने लगा,

‘‘म… मैडम…’’

‘‘बोलो मंगेश… क्या मैं ऐसे सैक्सी नहीं लगती?’’ कहते हुए लता ने अपनी साड़ी का आंचल नीचे गिरा दिया और उसे बिस्तर पर धकेल दिया.

मंगेश संभलते हुए बोला, ‘‘मेम साहब, मेरी सवारियां आती होंगी. मुझे जाने दीजिए अब.’’

लता ने रिकशे वाले के करीब बैठ कर अपनी बांहें उस की कमर के इर्दगिर्द कर लीं और बोली, ‘‘कितनी सवारियां आएंगी दिनभर में? कितना पैसा कमा लोगे तुम?’’

मंगेश बोला, ‘‘यही कोई 8 से 10 सवारियां. पूरे दिन में तकरीबन 500 रुपए कमा लूंगा.’’

‘‘मैं तुम्हें 1,000 रुपए दूंगी. तुम कहीं मत जाओ. आज तुम देखो कि मैं सैक्सी दिखती ही नहीं… सैक्सी हूं भी,’’ इतना कह कर लता ने मंगेश का हाथ मजबूती से पकड़ लिया.

मंगेश सहमा सा हाथ छुड़ाते हुए बोला, ‘‘नहीं मेम साहब…’’

लता दांत पीसते हुए बोली, ‘‘जैसा कह रही हूं वैसा करो, वरना अभी पुलिस बुलाती हूं कि तुम ने पानी पीने के बहाने घर में घुस कर मेरे साथ छेड़छाड़ की है.’’

यह सुन कर मंगेश सहम गया. लता ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया और बैडरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया.

आधा घंटे बाद मंगेश थकाथका सा बाहर निकला. उस की मुट्ठी में 1,000 रुपए थे. रास्ता सुनसान था. जेठ की गरमी के चलते लोग अपनेअपने घरों में दुबके पड़े थे. कुछ दूरी पर एक परचून की दुकान थी. उस पर भी जो लड़का बैठा था, वह अधसोया सा था.

मंगेश ने एक बार चोर निगाहों से हर तरफ देखा, फिर रिकशे पर बैठ कर वहां से निकल गया.

आते वक्त लता ने उस से कहा था, ‘तुम रोज यहीं आ जाया करो. तुम्हें दिनभर की कमाई भी मिल जाएगी और धूप में यहांवहां थकना भी नहीं पड़ेगा.’

अगले दिन मंगेश संकोच में कहीं बाहर नहीं गया. उस के दिमाग में पिछले दिन की सारी बातें चल रही थीं. एकएक सीन याद आ रहा था, जबकि पत्नी गुजरिया कई बार कह चुकी थी, ‘‘काम पर नहीं जाना हैं क्या? राशन भी खत्म हो गया है.’’

मंगेश अलसाते हुए बोला, ‘‘सब हो जाएगा, तुम चिंता न कर…’’ और फिर आंखें बंद कर के कुछ सोचने लगा.

अगले दिन मंगेश कुछ सहमा सा लता के पास गया. वह उसे देख कर खुश हो गई और बोली, ‘‘अरे, कहां चले गए थे? तुम कल क्यों नहीं आए? बैठो, मैं तुम्हें कुछ दिखाती हूं,’’ कहते हुए वह कमरे की तरफ जाने लगी.

मंगेश बैठने लगा कि तभी लता रुक कर बोली, ‘‘सुनो, तुम भी इधर ही चले आओ.’’

यह सुन कर मंगेश कांप गया. वह ठिठकते हुए उठा और लता के पीछेपीछे चला गया.

लता ने एक कुरसी की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘बैठो.’’

मंगेश बैठ गया. इतने में लता ने अलमारी खोली. उस में से 2 पैकेट निकाले और उस की तरफ बढ़ा दिए.

मंगेश ने पैकेट ले लिए और उन्हें खोलने लगा, फिर हैरत से बोला, ‘‘अरे मेम साहब, इतने कीमती कपड़े…’’

लता बोली, ‘‘अरे कीमती क्या, बस ऐसे ही हैं…’’ फिर उस से कपड़े ले कर वह समेटते हुए बोली, ‘‘अब घर ले जा कर देखना अच्छी तरह से. चलो, अब कुछ काम कर लें…’’

इतना सुनते ही मंगेश का चेहरा उतर गया, मगर वह मजबूर सा बैठा रहा. लता ने आगे बढ़ कर दरवाजा बंद कर दिया.

अब यह रोज का काम हो गया था. मंगेश की रोजाना 1,000 रुपए की आमदनी हो जाती थी.

एक दिन मंगेश ने लता से पूछा, ‘‘मेम साहब, आप का परिवार और बच्चे कहां हैं?’’

लता ने एकदम सपाट सा जवाब दिया, ‘‘बच्चे नहीं हैं. पति सारा दिन औफिस में रहते हैं और शाम को वापस आते हैं. तुम ने क्यों पूछा वैसे?’’

मंगेश बोला, ‘‘बस, ऐसे ही.’’

लता ने कहा, ‘‘मेरा पति सिर्फ पैसे कमाने के लायक है… सुना तुम ने… औरत के लायक नहीं…’’

मंगेश ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, ‘‘आह… वे आप जैसी खूबसूरत पत्नी को भोग भी नहीं पा रहे हैं…’’ लता चुप रही.

गुजरिया कई दिनों से देख रही थी कि मंगेश सिर्फ 2-3 घंटे के लिए बाहर जाता है और अच्छाखासा पैसा कमा लाता है. वह कहीं कोई नंबर दो का काम तो नहीं करने लगा?

गुजरिया ने एक दिन पूछा, ‘‘मुनिया के बापू, तुम 2-4 घंटे में इतना पैसा कैसे कमा लाते हो… एकसाथ इतनी दिहाड़ी कैसे मिल जाती है?’’

मंगेश हंस कर पीढ़े पर बैठते हुए बोला, ‘‘सब तुम लोगों के भाग्य से आता है, इतना समझ लो.’’

गुजरिया ने आंखें तरेर कर उसे देखा, मगर बोली कुछ नहीं. यह बात उसे हजम नहीं हुई.

दूसरे दिन जब अपना रिकशा ले कर मंगेश घर से चला, तो गुजरिया भी दूसरे रिकशे वाले को बोल कर उस के पीछेपीछे चल दी. कई चौराहे और गलियां पार करते हुए आखिरकार मंगेश का रिकशा एक मकान के सामने ठहरा.

गुजरिया ने भी अपना रिकशा काफी दूरी पर रुकवा लिया, उसे पैसे दिए और वहीं खड़ी हो गई दीवार की ओट में.

गुजरिया ने देखा कि मकान का गेट खुला है और उस का पति अंदर दाखिल हो गया है. परचून की दुकान खुली थी. लड़का बैठा इधरउधर देख रहा था कि तभी गुजरिया वहां पहुंची और बोली, ‘‘भैया, यह घर किस का है?’’

दुकान वाला बोला, ‘‘रमेश बाबू का है. वे टैलीफोन दफ्तर में जेई हैं. वे बेचारे औफिस में खटते हैं और उन की बीवी यहां मजे करती है.’’

गुजरिया ने पूछा, ‘‘मतलब…?’’

दुकान वाला बोला, ‘‘दिख नहीं रहा सामने रिकशा. रिकशे वाले के हाथ मोती लग गया है. हम लोग तो वहां फटक भी नहीं पाते…’’

गुजरिया फौरन वापस हो ली और रिकशा कर के टैलीफोन दफ्तर पहुंची. वहां रमेश बाबू का केबिन पता किया और जल्दी से वहां पहुंची.

गुजरिया ने अंदर आने की इजाजत मांगी, तो रमेश बाबू ने शीशे से बाहर देखा और हुड़क दिया, ‘‘जाओ, अपना काम करो. ये भिखमंगे यहां भी पीछा नहीं छोड़ते.’’

लेकिन, गुजरिया दरवाजे पर ‘खटखट’ करती रही. आखिरकार वे झल्ला कर अपनी कुरसी से उठे और झटके से दरवाजा खोला.

गुजरिया ने हाथ जोड़ कर नमस्ते किया, लेकिन उन्होंने उसे नजरअंदाज कर आवाज लगाई, ‘‘चौकीदार, ये किसकिस को आने देते हो यहां… ये भिखमंगों का अड्डा नहीं है, समझे…’’

चौकीदार गुजरिया की बांहें पकड़े खींच रहा था, तभी वह उस का हाथ झटकते हुए रमेश बाबू की ओर चिल्लाई, ‘‘बाबूजी, हमारे कपड़े गंदे हैं, लेकिन मन नहीं गंदा है…

‘‘जा कर अपने घर की गंदगी देखो एक बार. तुम को अपनी गंदगी का अंदाजा ही नहीं, जिसे गले से लगाए फिरते हो.’’

यह सुन कर रमेश बाबू सन्न रह गए. वे मुड़े और बोले, ‘‘चौकीदार, छोड़ दो इसे.’’

गुजरिया तीर की तरह केबिन में उन के पीछेपीछे आ गई और बोली, ‘‘साहब, इसी समय मेरे साथ चलिए.’’

रमेश बाबू कांपती सी आवाज में बोले, ‘‘कहां?’’

गुजरिया ने कहा, ‘‘आप के घर.’’

रमेश बाबू चिल्लाए, ‘‘तुम्हारा दिमाग खराब है क्या? जाओ, अपना काम करो.’’

गुजरिया ने हाथ जोड़ दिए और बोली, ‘‘चलिए बाबूजी, बहुत जरूरी है. मेरे लिए न सही तो अपने लिए चलिए.’’

रमेश बाबू ने लता को फोन करना चाहा, तो गुजरिया बोली, ‘‘नहीं बाबूजी, बात खराब हो जाएगी. बिना बताए चलिए, देर मत कीजिए.’’

रमेश बाबू ने एक गहरी निगाह से उसे देखा, फिर उठ गए और पीछेपीछे गुजरिया. उन्होंने अपनी कार निकाली. पीछे गुजरिया बैठ गई.

कुछ ही देर में रमेश बाबू अपने घर के सामने थे. बाहरी गेट की एक चाभी उन के पास रहती थी. उन्होंने गेट खोला और दबे कदमों से बैडरूम की ओर गए.

बैडरूम का दरवाजा हलका सा बंद था. वे दोनों तेजी से अंदर घुसे. वहां का सीन देख कर गुजरिया तेजी से चीख ही पड़ी, ‘‘तू यहां अपना मुंह काला करा रहा है…’’

सैक्स में डूबे लता और मंगेश उन को देख कर हड़बड़ा गए. रमेश बाबू ने बढ़ कर लता को कई थप्पड़ जड़े. गुजरिया ने मंगेश को कई थप्पड़ लगाए.

मंगेश ने गुजरिया को धकेल दिया, तो वह चिल्लाई, ‘‘एक तो तू हम सब को हराम की कमाई खिलाता रहा, ऊपर से चिल्लाता है… बेहया,’’ फिर वह रमेश बाबू से बोली, ‘‘बाबूजी, पुलिस बुलाओ… इस को इस का अंजाम भुगतना पड़ेगा. अब इस का और हमारा साथ खत्म…’’

रमेश बाबू गुस्से से थरथरा रहे थे. वे फोन मिलाने लगे कि मंगेश ने उन का गला दबोच लिया. रमेश बाबू के गले से ‘गोंगों’ की आवाज निकलने लगी. गुजरिया उन्हें छुड़ा रही थी.

मंगेश ने लात मार कर गुजरिया को अलग किया. रमेश बाबू के गले पर उस की पकड़ कसती जा रही थी.

लता ने जल्दीजल्दी कपड़े पहन लिए थे. उस ने रमेश बाबू की हालत देखी, तो हड़बड़ाहट में बड़ा सा गुलदान उठा कर मंगेश के सिर पर दे मारा. वह चीख कर वहीं ढेर हो गया.

तब तक पड़ोसियों ने पुलिस बुला ली थी. लता को गिरफ्तार कर लिया गया. वह रमेश बाबू से हाथ जोड़ते हुए बोली, ‘‘रमेश… बचा लो मुझे…’’

रमेश बाबू ने नफरत से मुंह घुमा लिया और गुजरिया से बोले, ‘‘तुम ने सही कहा था. साफसुथरे कपड़ों में भी घिनौने और नीच लोग रहते हैं… माफ करना बहन. मुझे अच्छेबुरे की पहचान ही नहीं थी.’’

अपने ही “मासूम” की बलि….

अगर आज ऐसा होता है तो इसका मतलब यह है कि आज भी हम सैकड़ो साल पीछे की जिंदगी जी रहे हैं. जहां अपने अंधविश्वास में आकर बलि चढ़ा दी जाती थी, अपने बच्चों को या किसी मासूम को. बलि चढ़ाना तो अंधविश्वास की पराकाष्ठा ही है.

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में शख्स ने अपने चार वर्षीय बेटे की बेरहमी से गला रेंतकर हत्या कर दी. घटना की वजह अंधविश्वास बताया गया है. शख्स की मानसिक स्थिति कुछ दिनों से ठीक नहीं थी. एक रात उसने परिवारजनों से कहा – “सुनो सुनो! मै किसी की बलि दे दूंगा.”

उसकी बात पर किसी ने तवज्जो नहीं दिया लगा कि यह मानसिक सन्निपात में कुछ का कुछ बोल रहा है.
एक रात उसने चाकू से एक मुर्गे को काटा फिर अपने मासूम बेटे का गला काट दिया. यह उद्वेलित करने वाला मामला शंकरगढ़ थानाक्षेत्र का है. हमारे संवाददाता को पुलिस ने बताया -शंकरगढ़ थानाक्षेत्र अंतर्गत ग्राम महुआडीह निवासी कमलेश नगेशिया (26 वर्ष) दो दिनों से पागलों की तरह हरकत कर रहा था. उसने परिवारजनों के बीच कहा – उसके कानों में अजीब सी आवाज सुनाई दे रही है, उसे किसी की बलि चढ़ाने के लिए कोई बोल रहा है.

एक दिन वह कमलेश चाकू लेकर घूम रहा था एवं उसने परिवारजनों से कहा कि आज वह किसी की बलि लेगा. उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए परिवारजनों ने उसे नजरअंदाज कर दिया था . मगर रात को खाना खाने के बाद कमलेश नगेशिया की पत्नी अपने दोनों बच्चों को लेकर कमरे में सोने चली गई. कमलेश के भाईयों के परिवार बगल के घर में रहते हैं, वे भी रात को सोने चले गए.

देर रात कमलेश ने घर के आंगन में एक मुर्गे का गला काट दिया. फिर कमरे में जाकर वह अपने बड़े बेटे अविनाश (4) को उठाकर आंगन में ले आया. उसने बेरहमी से अपने बेटे अविनाश का चाकू से गला काट दिया. अविनाश की मौके पर ही मौत हो गई. सुबह करीब चार बजे जब कमलेश की पत्नी की नींद खुली तो अविनाश बगल में नहीं मिला. उसने कमलेश से बेटे अविनाश के बारे में पूछा तो उसने पत्नी को बताया कि उसने अविनाश की बलि चढ़ा दी है.

घटना की जानकारी मिलने पर घर में कोहराम मच गया. सूचना पर शंकरगढ़ थाना प्रभारी जितेंद्र सोनी के नेतृत्व में पुलिस टीम मौके पर पहुंची. पुलिस ने आरोपी को हिरासत में ले लिया . बच्चे के शव को पंचनामा पश्चात् पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया . थाना प्रभारी जितेंद्र सोनी ने बताया – परिजनों से पूछताछ कर उनका बयान दर्ज किया गया है. आरोपी दो दिनों से ही अजीब हरकत कर रहा था. पहले वह ठीक था. एक शाम परिवारजनों के सामने उसने किसी की बलि चढ़ाने की बात कही थी, लेकिन परिवारजनों ने उसे गंभीरता से नहीं लिया. मामले में पुलिस ने धारा 302, 201 का अपराध दर्ज किया है. मामले की जांच की जा रही है.

इस घटनाक्रम में परिजनों ने समझदारी से काम लिया होता और इसकी शिकायत पहले ही पुलिस में की होती या फिर उस व्यक्ति को मानसिक चिकित्सालय भेज दिया गया होता तो मासूम बच्चे की जिंदगी बच सकती थी. मासूम की बाली के इस मामले में सबसे अधिक दोषी मां का वह चेहरा भी है जो दोनों बच्चों को लेकर कमरे में सो रही होती है और पति एक बच्चे को उठाकर ले जाता है.

एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक गांव देहात में इस तरह की घटनाएं घटित हो जाती है, इसका दोषी जहां परिवार होता है वही आसपास के रहवासी भी दोषी हैं मगर पुलिस सिर्फ एक हत्यारे पर कार्रवाई करके मामले को बंद कर देती है.

कुल मिलाकर के ऐसे घटनाक्रम सिर्फ एक खबर के रूप में समाज के सामने आते है और फिर समाज सुधारक भूल जाते है कुल मिला करके आगे पाठ पीछे सपाट की स्थिति .यह एक बड़ी ही सोचनीय स्थिति है. इस दिशा में अब सरकार के पीछे-पीछे दौड़ने या यह सोचने से की सरकार कुछ करेगी यह अपेक्षा छोड़ कर हमें स्वयं आगे आना होगा ताकि फिर आगे कोई ऐसी घटना घटित ना हो.

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