यह कैसा प्यार- भाग 1

वे दोनों बचपन से एक ही कालोनी में आसपड़ोस में रहते हुए बड़े हुए थे. दोनों ने एकसाथ स्कूल व कालेज की पढ़ाई पूरी की. उन के संबंध मित्रता तक सीमित थे, वो भी सीमित मात्रा में. दोनों एक ही जाति के थे. सो, स्कूल समय तक एकदूसरे के घर भी आतेजाते थे. कालेज में भी एकदूसरे की पढ़ाई में मदद कर देते थे. एकदूसरे के छोटेमोटे कामों में भी सहयोग कर देते थे. लेकिन कालेज के समय से उन का एकदूसरे के घर आनाजाना बहुत कम हो गया. जाना हुआ भी तो अपने काम के साथ में एकदूसरे के परिवार से मिलना मुख्य होता था.

दोनों अपने समाज, जाति की मर्यादा जानते थे. अब दोनों जवानी की उम्र से गुजर रहे थे. रमा तभी विजय के घर जाती जब विजय की बहन से उसे काम होता. विजय से तो एक औपचारिक सी हैलो ही होती. कालेज में भी उन का मिलना बहुत जरूरत पर ही होता. रमा को यदि विजय से कोई काम होता तो वह विजय की बहन या मां से कहती. विजय को वैसे तो जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी रमा के घर, पर कई बार ऐसे मौके आते कि जाना पड़ता. जैसे रमा को नोट्स देने हों या कालेज की लाइब्रेरी से निकाल कर पुस्तकें देनी हों.

विजय जाता तो रमा के मम्मी या पापा घर पर मिलते. रमा चाय बना कर दे जाती. विजय पुस्तकें रमा के मातापिता को दे देता. रमा के मातापिता उसे बैठा कर घरपरिवार, पढ़ाईलिखाई, भविष्य की बातें पूछते, कुछ अपनी बताते. विजय वापस आ जाता.

रमा के मातापिता अपनी इकलौती बेटी के लिए अच्छे वर की तलाश में जुटे थे. बात विजय की भी निकली. रमा के पिता ने कहा, ‘‘लड़का तो ठीकठाक है लेकिन करता तो कुछ नहीं है फिलहाल.’’

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रमा की मां ने कहा, ‘‘अभी तो पढ़ाई कर रहा है. पास का देखापरखा लड़का है. रमा से पटती भी है.’’ मां की बातें रमा के कानों से होती हुईं उस के दिल में पहुंचीं, पहली बार. और पहली बार ही रमा के हृदय में कंपन सी हुई. रमा के पिता ने एक सिरे से नकारते हुए कहा, ‘‘पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी की कोई गांरटी नहीं है और मैं अपनी इकलौती बेटी का विवाह किसी बेरोजगार से नहीं कर सकता. फिर इतनी पास रिश्ता करना भी ठीक नहीं है. अभी तो विजय की बहन बैठी हुई है शादी के लिए. मुझे विजय के पिता का व्यवहार और उन की क्लर्की की नौकरी दोनों खास पसंद नहीं हैं.’’

रमा की मां ने कहा, ‘‘मैं ने तो ऐसे ही बात कह दी थी. आप उस के परिवार के बारे में क्यों उलटासीधा कह रहे हैं?’’

रमा के पिता ने कहा, ‘‘उलटासीधा नहीं, सच कह रहा हूं. मैं अपनी हैसियत वाले घर में ही रिश्ता करूंगा. इंजीनियर हूं. क्लर्क के घर में क्यों रिश्ता करूं?’’

पति को आवेश में देख रमा की मां किचन में जा कर घरेलू कामों में जुट गई. विजय को जब मालूम हुआ कि रमा के लिए लड़के वाले देखने आ रहे हैं तो पता नहीं क्यों पहली बार उसे लगा कि उस की प्रियवस्तु कोई उस से छीन रहा है. उस ने हिम्मत कर के अपनी मां से रमा के साथ शादी की बात चलाने के लिए कहा.

विजय की मां ने कहा, ‘‘बेटा, पहले नौकरी करो. फिर बहन के हाथ पीले करो. उस के बाद अपनी शादी के विषय में सोचना.’’ मां ने कह तो दिया लेकिन बेटे के चेहरे को भी पढ़ लिया. उन्हें स्पष्ट नजर आया कि उन का बेटा रमा से प्रेम करता है. बेटे की तसल्ली के लिए मां ने कहा, ‘‘अच्छा, देखती हूं, तुम्हारे पिता से बात करती हूं.’’ विजय के चेहरे पर प्रसन्नता छा गई, जिसे मां से छिपाने के लिए वह दूसरे कमरे में चला गया.

विजय की मां ने रात को भोजन के बाद अपने कमरे में पति से बेटे के मन की बात कही. पति ने कहा, ‘‘वे लोग ऊंची हैसियत वाले हैं. अपने से बड़े घर की लड़की लाने का मतलब समझती हो. सह पाओगी बड़े घर की बेटी के नखरे. फिर इतनी पास में रिश्ता. घर में जवान बेटी बैठी है. बेटा बेरोजगार है. किस मुंह से शादी का रिश्ता ले कर जाएंगे. अपना अपमान नहीं कराना मुझे. फिर मैं ठहरा ईमानदार आदमी और मामूली सा क्लर्क. वे हैं इंजीनियर और 2 नंबर के पैसे वाले.’’

विजय की मां ने कहा, ‘‘वो मैं समझती हूं. बेटे के दिल में है कुछ रमा के लिए, इसलिए कहा.’’

विजय के पिता ने कुछ पल ठहर कर कहा, ‘‘मैं तो बात करने नहीं जाऊंगा. तुम चाहो तो किसी और के माध्यम से बात चलवा कर देख लो. बेटे की तरफदारी करने से अच्छा है, बेटे को समझाओ कि अपने पैरों पर खड़े हो कर उन के बराबर बन कर दिखाए.’’

पत्नी ने करवट ली और सोने का प्रयास करने लगी. वे इस बात को यहीं खत्म कर देना चाहती थी.

बाजार से जरूरी सामान मंगवाना था. रमा के पिता कुछ अस्वस्थ थे. रमा की मां ने विजय को आवाज दे कर बुलाया और कहा, ‘‘रमा को देखने वाले आ रहे हैं. यह लिस्ट ले जाओ. बाजार से सामान ले कर जल्दी आना.’’

सामान की लिस्ट और रुपए ले कर विजय बाजार की ओर चल दिया. लेकिन मन उस का उदास था. वह सोच रहा था कि रमा किस तरह उसे मिलेगी. कैसे वह रमा को अपना जीवनसाथी बनाएगा. एमएससी का अंतिम वर्ष था उस का. नौकरी मिलने में समय लगेगा.

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विजय के अंदर इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह रमा के पिता से अपने विवाह की बात कर पाता. मां ने अपने एक परिचित से रिश्ते की खबर भेजी थी, लेकिन उत्तर अनुकूल न था. बात औकात, हैसियत, बेरोजगारी पर आ कर अटक गई थी. विजय के मन में अजीब से अंधड़ चल रहे थे. स्वयं को संभालते हुए बाजार से सामान ला कर उस ने रमा के पिता को सौंप दिया. लड़के वाले आ चुके थे, इसलिए रमा के मातापिता ने विजय को बैठने को भी नहीं कहा.

विजय पास के गार्डन में पहुंचा. थकेहारे, टूटे हुए व्यक्ति की तरह मन में सोचने लगा, ‘रमा का ये रिश्ता टूट जाए, रमा का विवाह हो तो मुझ से, अन्यथा न हो.’

हार से गुस्सा उपजता है और गुस्से से मस्तिष्क बेकाबू हो कर किसी भी दिशा में भटकने लगता है. पास बैठे एक अंकल से उस ने कहा, ‘‘क्या जिंदगी में जिसे चाहो वह मिल जाता है?’’

अंकल ने रूखे स्वर में कहा ‘‘हां, शायद.’’

अंकल की बात से असंतुष्ट विजय उठ कर घर की तरफ चल दिया. रातभर वह यही सोचता रहा कि उसे रमा से इतना लगाव, इतना प्यार कैसे हो गया? यदि पहले से था तो उसे पता क्यों नहीं चला? यही तड़प पहले होती तो वह रमा से इस विषय में कालेज में बात कर लेता. क्या पता रमा के मन में कुछ है भी या नहीं. होता तो कभी तो वह कहती बातों में, इशारों में. प्रेम कहां छिपता है? कहीं यह एकतरफा प्यार का मामला तो नहीं. वह खुद से कहने लगा, ‘रमा का ग्रैजुएशन का अंतिम वर्ष है. शादी आज नहीं तो कल हो ही जाएगी. फिर मेरा क्या होगा? क्या मैं रमा से बात करूं? कहीं ऐसा तो नहीं कि बात और बिगड़ जाए.’

विचारों के आंधीतूफान से उलझता विजय घर आ गया. रात में बिस्तर पर उसे नींद नहीं आई. वह करवटें बदलते हुए सोचने लगा कि रमा को कैसे हासिल किया जाए. पत्रपत्रिकाओं में छपने वाले तांत्रिक बाबाओं, वशीकरण विधा के जानकारों वाले विज्ञापन उस के दिमाग में कौंधने लगे. बाजार से उस ने कुछ तंत्रमंत्र की किताबें खरीद कर उन्हें आजमाने पर विचार किया. यदि लड़की वशीभूत हो कर विवाह के लिए तैयार हो जाए तो फिर कोई क्या कर सकता है?

तंत्रमंत्र की पुस्तकें पढ़ कर विजय को निराशा हाथ लगी. वशीकरण मंत्र के लाखों की संख्या में जाप कर के  उन्हें सिद्ध करना, फिर पूरे नियम से उन का दसवां हिस्सा हवनतर्पण, मार्जन करना, उस के बाद विशेष तिथि, योग में ऐसी सामग्री जुटाना जो उस के लिए क्या, किसी भी साधारण आदमी के लिए संभव नहीं थी. विजय ने पुस्तकें एकतरफ फेंक कर इंटरनैट पर वशीकरण संबंधी प्रयोग तलाशने शुरू किए, उसे मिले भी. सारे प्रयोग एकएक कर के किए भी, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली.

विजय समझ गया कि सारे प्रयोग झूठे हैं. फिर उस ने तंत्रमंत्र, वशीकरण के विज्ञापनों पर दृष्टि डाली जहां 24 घंटे से ले कर 4 मिनट में वशीकरण के दावे किए गए थे. विजय ने कई बाबाओं से मुलाकात की. रुपए इधरउधर से इंतजाम कर के फीस भरी. कभी नीबू के प्रयोग, कभी नारियल वशीकरण, कभी लौंग वशीकरण प्रयोग बाबाओं द्वारा बताए गए. लेकिन नतीजा शून्य निकला.

रमा की तरफ से उसे कोई जवाब नहीं मिला. विजय समझ गया कि वशीकरण, तंत्रमंत्र जैसा कुछ नहीं, सब बेवकूफ बनाते हैं. लेकिन रमा की तरफ विजय का लगाव निरंतर बढ़ता जा रहा था. फिर वह सोचने लगा कि शायद मुझ से ही कोई चूक हो गई हो. सब तो गलत नहीं हो सकते. क्यों न अब की बार प्रयोग तांत्रिक से ही करवाया जाए.

विजय ने बंगाली बाबा नाम के व्यक्ति को फोन लगाया. बाबा ने कहा, ‘‘मैं सौ टके तुम्हारा काम कर दूंगा. लेकिन तुम्हें श्मशान की राख, उल्लू का जिगर, किसी मुर्दे की हड्डी लानी पड़ेगी. यदि नहीं ला सकते तो हम सामान की अलग से फीस लेंगे. साथ में, हमारी फीस. जिस का वशीकरण करना है उस की पूरी जानकारी नाम, पता, फोटो, मोबाइल सब हमारे मेल पर भेजना होगा. और अपना विवरण भी. फीस हमारे बताए अकाउंट में जमा करनी होगी.’’

विजय जानतेसमझते हुए भी बेवफूफ बन गया. रमा की फोटो कालेज फंक्शन के गु्रप में उस के पास थी. उस ने उस फोटो की एक और फोटो निकाल कर पोस्टकार्ड साइज में रमा की फोटो स्टूडियो से बनवा ली. सारी सामग्री बाबा को मेल कर दी. फीस अकाउंट में जमा कर दी. लेकिन कई दिन बीतने के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ. विजय समझ गया कि तंत्रमंत्र का बाजार झूठ और धोखे पर आधारित है.

Crime Story in Hindi: वह नीला परदा- भाग 4: आखिर ऐसा क्या देख लिया था जौन ने?

Writer- Kadambari Mehra

पूर्व कथा

एक रोज जौन सुबहसुबह अपने कुत्ते डोरा के साथ जंगल में सैर के लिए गया, तो वहां नीले परदे में लिपटी सड़ीगली लाश देख कर वह बुरी तरह घबरा गया. उस ने तुरंत पुलिस को सूचना दी. बिना सिर और हाथ की लाश की पहचान कराना पुलिस के लिए नामुमकिन हो रहा था. ऐसे में हत्यारे तक पहुंचने का जरिया सिर्फ वह नीला परदा था, जिस में उस लड़की की लाश थी. इंस्पैक्टर क्रिस्टी ने टीवी पर वह नीला परदा बारबार दिखाया, मगर कोई सुराग हाथ नहीं लगा. एक रोज क्रिस्टी के पास किसी जैनेट नाम की लड़की का फोन आया, जो पेशे से नर्स थी. वह क्रिस्टी से मिल कर नीले परदे के बारे में कुछ बताना चाहती थी.

अब आगे पढ़ें…

मौयरा की मदद से जैनेट एक गत्ते का बड़ा सा डब्बा कमरे के बीचोबीच खींच लाई. बीच में बिछे गलीचे पर नीचे बैठ कर उस ने सभी चीजें तरतीब से सजा दीं. फैमी नाम की इस स्त्री का फोटो करीब 9५12 इंच के स्टील के फ्रेम में जड़ा था. उस में क्रिस्टी द्वारा प्रसारित खिड़की के अनुमानित चित्र से मिलतीजुलती एक खिड़की के सामने एक काले चमड़े से मढ़ा सोफा पड़ा था और उस पर एक युवती लगभग 3 साल के गोलमटोल बच्चे को गालों से सटाए बैठी मुसकरा रही थी.

‘‘क्या नाम बताया जैनेट आप ने?’’

‘‘फैमी.’’

‘‘सरनेम पता है?’’

‘‘नहीं, बताया तो था परंतु विदेशी नामों को याद रखना बेहद कठिन लगता है.’’

‘‘क्यों, क्या किराए की कोई लिखतपढ़त नहीं है?’’

जैनेट का मुंह उतर गया. घबरा कर हकलाती हुई वह बोली, ‘‘लड़की भली थी. ऐडवांस किराया नकद दे कर यहां रहने आई थी. कोई किरायानामा तो मैं ने नहीं लिखवाया, मगर रसीद मैं उसे जरूर दे देती थी. पहली तारीख को वह महीने का किराया कैश दे देती थी. मैं कुसूरवार हूं अफसर, पर यह कोई ऐसी बड़ी आमदनी तो न थी जिसे छिपाया जाए…’’

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‘‘घबराओ नहीं, ऐसे गैरकानूनी अनुबंध अनेक बेवकूफ लोग कर लेते हैं. अब खुद ही देखो न क्या हो सकता है लापरवाही का अंजाम…’’

‘‘क्यों, क्या कोई संगीन मामला है?’’

‘‘हो भी सकता है. हम तुम्हें डराना नहीं चाहते, क्योंकि अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. बहरहाल, हम एक लापता लड़की को ढूंढ़ रहे हैं. क्या कोई सुराग तुम हमें दे सकती हो? कोई इस का मित्र? यह तसवीर वाला बच्चा?’’

‘‘शायद यह बच्चा उस का बेटा है, जो अपने बाप के पास रहता है. फैमी छुट्टी वाले दिन शायद इस से मिलने जाती थी.’’

‘‘इस का मतलब वह तलाक ले चुकी थी?’’

‘‘नहीं पता.’’

‘‘बाकी समय वह क्या करती थी?’’

‘‘ठीक से नहीं पता, मगर कहीं 9 से 5 तक नौकरी करती थी. घर जल्दी आ जाती थी और मेरी ही रसोई में पकातीखाती थी. अफसर, बात यह है कि मैं ज्यादातर यूरोप में रहती हूं. मैं ने खुद ही नहीं पूछा.’’

‘‘जैनेट, यहां उस का कोई परिचित तो आता होगा?’’

‘‘विदेशियों पर मेरा इतना विश्वास नहीं है, इसलिए मैं ने उसे साफ मना कर दिया था कि वह किसी मेहमान को नहीं लाएगी. आप को तो पता ही है कि यहां जवान लड़कियां क्याक्या कर्म करती हैं. मगर मेरी पीठ पीछे अगर कोई आता हो तो कह नहीं सकती.’’

‘‘जब रखा तब कोई रेफरेंस लैटर तो लिया होगा उस के बौस का या बैंक का?’’

‘‘हां, मगर जब वह वापस नहीं आई तो मैं ने फेंक दिया.’’

‘‘कुछ कह कर गई थी तुम से?’’

‘‘हां, उस ने कहा कि वह क्रिसमस की छुट्टियों में मोरक्को अपने वतन जा रही है.’’

‘‘अच्छा, मदद के लिए शुक्रिया. अगर आप को कोई एतराज न हो तो मैं सामान का यह डब्बा संग ले जाऊं?’’

‘‘बेशक, बेशक.’’

अपने औफिस में ला कर क्रिस्टी ने सारा सामान खोला, मगर उस स्त्री की पहचान के सभी कागजात गायब थे. कहीं नाम तक का सुबूत नहीं था. क्रिस्टी ने अनुमान लगाया कि किसी ने जानबूझ कर सभी कागजात गायब किए होंगे. मगर मेज पर रखी तसवीर शायद इसलिए फेंक गया कि उस की अब जरूरत नहीं थी. फिर भी कुछ भी ठीक नहीं बैठ रहा था.

क्रिस्टी ने पुलिस फाइल के अगले कार्यक्रम में इस चित्र को प्रसारित किया. टीवी स्क्रीन पर बड़ा कर के दिखाया, मगर उस स्त्री को जानने वाला कोई भी सामने नहीं आया. उस का अगला कदम था, मोरक्को जाने वाली सभी सवारियों की पड़ताल. पिछले 1 साल के सभी यात्रियों के रिकार्ड उस ने हीथ्रो एअरपोर्ट से मंगवाए, मगर कोई सफलता नहीं मिली. हो सकता है कि वह स्त्री किसी अन्य देश में गई हो और फिर वहां से मोरक्को चली गई हो. हो सकता है, फैमी नाम केवल बुलाने का नाम हो. मगर उस का असली नाम क्या होगा?

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मौयरा ने सुझाया कि जाने वाले यात्रियों के बजाय वह मोरक्को से आ कर यहां बस जाने वाली लड़कियों के रिकार्ड तफतीश करे. क्रिस्टी को यह बात जंच गई.

उस ने मोरक्को के दूतावास से संपर्क किया. वहां से आए नागरिकों को पासपोर्ट औफिस में ढूंढ़ा. आखिरकार एक लड़की का पता मिला, जो 7-8 साल पहले पढ़ाई करने के लिए यहां आई थी. उस का नाम फहमीदा सादी था. फहमीदा सादी के वापस मोरक्को जाने का कोई प्रमाण नहीं मिला. यह आसानी से अपना नाम फैमी रख सकती थी. क्रिस्टी ने इसे भी एक सूत्र मान लिया और अपनी खोज जारी रखी, मगर अन्य तथ्यों की तरह यह भी एक हवाईकिला था. केवल मान्यता पर की गई खोज से क्या हत्यारा मिल जाएगा?

लंदन में फहमीदा सादी कहां रह रही थी, यह पता लगाना कठिन काम था, मगर पासपोर्ट औफिस से उस के अपने देश में उस का पता मिल गया. क्रिस्टी ने जैसेतैसे अपने विभाग को दलीलें दे कर खर्चे के लिए राजी कर लिया और वह मोरक्को चला गया फहमीदा के परिवार से मिलने.

फहमीदा का परिवार बहुत अमीर नहीं था. 1 विधवा अधेड़ उम्र की मां, 1 अंधा भाई और 3 कुंआरी छोटी बहनें. पर ये लोग बड़े शिष्ट और विनम्र थे.

क्रिस्टी को देख कर वे लोग घबरा न जाएं, इसलिए उस ने अपनेआप को उन की पुत्री का प्रोफेसर बताया. बताया कि फहमीदा उन से कई महीनों से नहीं मिली है. वह इत्तफाक से किसी रिसर्च के सिलसिले में यहां आए थे. उन्होंने सोचा वह यहां होगी. अत: मिलने चले आए.

फहमीदा की मां ने कौफी और खजूर चांदी की तश्तरी में पेश किए और हंस कर बोली कि उन की बेटी लंदन में ही है और उस के खत बराबर आते हैं.

अब क्रिस्टी यह कैसे सोच लेता कि फहमीदा मर गई है? उस का यहां आना बेकार की कोशिश साबित हो रहा था. उसे लग रहा था कि वह गलत जगह झक मार रहा है. अपनी नकली मित्रता की साख बरकरार रखने के लिए वह बेकार के हंसीमजाक और बातचीत की कडि़यां पिरोता रहा, लेकिन कुछ बातों पर मां और भाई की तरफ से अनापेक्षित बातें सुनने को मिलीं. मसलन, उस के यह कहने पर कि वह हिजाब पहनती है, इसीलिए मैं ने यहां से उस के लिए 2 बढि़या रूमाल खरीदे हैं. मां आश्चर्य से उसे देख कर बोली, ‘‘अरे वह कब से रूमाल सिर पर बांधने लगी?

वह तो नित नए फैशन रचती है केशों के.’’

क्रिस्टी सकपका गया. बोला, ‘‘नहीं, लंदन में विवाहित स्त्रियां हिजाब पहनने लगी हैं. उस का बेटा कैसा है?’’

‘‘हमारी बेटी तो अभी तक कुंआरी है. आप गलत पते पर आ गए हैं,’’ मां ने कहा.

‘‘हो सकता है. आप के पास आप की बेटी का कोई फोटो है?’’

मां झटपट फोटो ले आई. निस्संदेह यह फैमी का ही चित्र है. हालांकि इस में उस

के केश लंबे और वेशभूषा मोरक्कन थी. अब क्रिस्टी का माथा ठनका. उस ने दुभाषियों के माध्यम से बातचीत जारी रखते हुए पूछा, ‘‘क्या मैं आप की पुत्री के पत्र देख सकता हूं?’’

फैमी की मां को भी कुछ संदेह हुआ, मगर फिर वह पत्र ले आई. क्रिस्टी ने बहाने से मां को समझाया कि उसे ये पत्र दे दे ताकि वह फैमी को इन्हें दिखा कर चकित कर सके.

दुभाषियों के समझाने पर मां ने पत्र दे दिए.

‘‘1-2 दिन शहर घूम लूं. फिर आप से आ कर मिलूंगा जाने से पहले,’’ यह कह कर क्रिस्टी उठ खड़ा हुआ. फहमीदा सादी की मां को असमंजस में छोड़ कर वह भारी मन से बाहर आ गया.

2 बातें पक्की हो गई थीं. एक तो यह कि लड़की यही चित्र वाली लड़की थी, दूसरी यह कि उस का नाम फैमी ही था.

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मगर तीसरी बात एक विशाल प्रश्न के हुक से लटक रही थी, वह यह कि फैमी का बेटा कहां था, क्यों उस के बारे में मां को पता नहीं था. जरूर या तो वह अवैध था या गोद लिया. जैनेट ने साफसाफ कहा था कि उस का किसी से संबंध था. बच्चा अपने बाप के पास था और फैमी उस से बराबर मिलने जाती थी. लंदन में अनेक बच्चे अकेले अभिभावक पालते हैं, परंतु अधिकांश में स्त्री के पास बच्चा रहता है और पुरुष अपना आनाजाना भर रखता है. यहां स्थिति उलटी बैठ रही थी. शायद अपने अवैध रिश्ते को छिपाने के लिए फैमी ने बच्चे को पिता के पास रखा हुआ था, विचित्र.

फैमी के लिखे हुए शुरू के पत्र, खुले दिल से एक बेटी की ओर से अपनी मां को लिखे गए पत्र थे. वे बराबर हर हफ्ते लिखे गए थे. उन में पैसा घर भेजने का भी जिक्र था, मगर बाद वाले पत्र बेहद संक्षिप्त और औपचारिक समाचार भर थे. पैसों का कोई जिक्र नहीं था.

अगले 2-4 दिन बाद क्रिस्टी फैमी की मां से विदा लेने गया. बातोंबातों में उस ने पूछा कि जब एक कुंआरी लड़की को इतनी दूर परदेश भेजा था तो कोई तो मित्र या जानपहचान का परिवार वहां होगा. मां ने कई नाम गिना दिए.

क्रिस्टी ने उन के पते मांगे तो मां अचंभित रह गई, पूछने लगी, ‘‘आप क्या करेंगे?’’

‘‘वह कई दिनों से मिली नहीं है न, इसलिए उस के मित्रों से पूछ लूंगा. यों ही बस.’’

फैमी की बहन ने किसी पुरानी डायरी में से 1-2 पते दिए, जो कई साल पहले के रहे होंगे. पते ले कर वह लंदन लौट गया.

लंदन आ कर क्रिस्टी ने उन पतों पर तहकीकात करनी चाही. एक घर में अब कोई नाइजीरियन परिवार रह रहा था, तो दूसरे घर के व्यक्ति का रुख बड़ा टालमटोल वाला था. ये सभी पते लंदन के पूर्वी भाग के थे, जो मुख्य शहर से करीब 30-40 मील दूर पड़ते हैं. तीसरे व्यक्ति ने फहमीदा के बारे में अच्छा नहीं बोला, मगर क्रिस्टी ने बल दे कर उस से तहकीकात की. पुलिस का नाम सुन कर वह कुछकुछ बता पाया.

फहमीदा पहले इधर ही रहती थी और कैडबरी की फैक्टरी में काम करती थी. मगर

4 साल पहले वह यह जगह छोड़ कर पता नहीं कहां चली गई.

इस फैक्टरी में सब कुछ बदल गया था. कैडबरी कंपनी ने यहां का काम बंद कर दिया था और कारखाना कोटपैंट बनाने वाले एक भारतीय ने खरीद लिया था.

व्रत उपवास- भाग 2: नारायणी के व्रत से घर के सदस्य क्यों घबराते थे?

नारायणी ने फिर आवाज लगाई, ‘अरे, निम्मो, जा कर नमक की डली ले आ. एक डली मुंह में डाल लेंगे तो आराम मिलेगा.’

निर्मला ने दौड़ कर मां की आज्ञा का पालन किया. देवीलाल जानते थे कि अब दौरा कम हो रहा है. एकआध घंटे में सामान्य हो जाएगा. फिर भी नमक की डली मुंह में रख कर चूसने लगे.

‘अरे, चाय दी आप ने पिताजी को?’ कमरे से नारायणी की आवाज आई.

‘जी, अम्मां.’

निर्मला जाने क्यों सदा से मां को अम्मां ही कहती आई है. कुछ लोगों ने उसे टोका भी था. पर उसे आदत सी पड़ गई थी और अब कोई कुछ नहीं कहता था.

‘जा, एक प्याला और बना दे. अदरक डाल कर पानी खौला लेना,’  फिर नारायणी बड़बड़ाई, ‘कितनी बार कहा है कि तुलसी का पेड़ लगा लो, पर समझ में आए तब न.’

दिन चढ़ने लगा था. देवीलाल की खांसी दब गई थी. नारायणी उठ कर बाहर आ गई थी. वह आ कर देवीलाल को सामान गिनाने लगी जो उसे उपवास के लिए चाहिए था. उस की सूची सदा खोए की मिठाई और फलों से शुरू होती थी. व्रतों में फलाहार का प्रमुख स्थान है, पर आज उस की सूची में ऐसा कुछ नहीं था.

व्यंग्य से देवीलाल ने कहा, ‘क्या बात है, फलाहार नहीं होगा क्या?’

नारायणी ने उत्तर दिया, ‘आज निर्जल और निराहार रहना है. करवाचौथ है न, पर तुम जल्दी आना. दिनभर पूरीपकवान की तैयारी करनी है. हां, तुम्हें उड़द की दाल की कचौड़ी अच्छी लगती है न? लौटते समय बाजार से पीठी ले आना.’

देवीलाल चुपचाप चले गए. उन के जाते ही नारायणी ने बच्चों को काम में पेलना शुरू कर दिया, ‘निर्मला, तू यह पीस डाल.’

‘गोलू, तू भाग कर सामान ले आ. ‘तेरे पिताजी को कहना भूल गई थी. सोनू, तू किसी काम का नहीं. जा कर पंडिताइन से मेरी बड़ी घंटी ले आ. एक दिन को ले गई थीं. आज 1 हफ्ता हो गया. ऐसे मांगने आ जाते हैं, मानो सारे महल्ले में एक यही घंटी है.’

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सारा दिन ऐसी ही भागदौड़ में निकल गया. नारायणी का गालीगलौज जारी रहा. वह देवीलाल की खीज बच्चों पर उतारती रही. सब को 1-2 धौल भी पड़ गए. निर्मला रो पड़ी. गोलू दांत पीसता हुआ कोने में चला गया. सोनू ने आगे कोई काम करने से साफ इनकार कर दिया. नारायणी का क्रोध भी सातवें आसमान पर चढ़ता गया. वह बारबार व्रत और अपने कष्टों की दुहाई देती रही और सब को कोसती रही.

दोपहर में सब ने यों ही दो कौर मुंह में डाल कर पानी पी लिया. नारायणी की तानाशाही के नीचे सब दब गए थे.

7 बजतेबजते नारायणी ने पूजा की तैयारी कर ली. थाली सजा ली. वह असली घी का दीया, गुलगुले, 7 पूरियां, पानी का लोटा, कलावा, रोली सब बारबार देख कर संतुष्ट होने का प्रयत्न करती रही.

‘देख तो, चांद निकला या नहीं?’ सोनू को आज्ञा मिली.

‘नहीं निकला,’ सोनू ने बैठेबैठे कह दिया.

‘यहीं से कह दिया,’ नारायणी ने डांटा, ‘बाहर जा कर देख कर आने में क्या पैर घिसते हैं?’

‘कितनी बार तो देख आया. अब मैं नहीं जाता. गोलू से कह दो.’

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गोलू अपनी और पड़ोसिन की छत पर भी कई बार हो आया था. चौथ थी न. उस दिन विशेष तौर पर जाने कहां से बादल आ कर चांद पर छा जाते हैं. कल ही तो एकदम साफ गोल सा चांद चमक रहा था. नारायणी भूख के मारे तड़प रही थी. प्यास के मारे गला सूख रहा था. सारा खाना बड़ी मेहनत से बनाया था. कचौड़ी, दहीबड़े, जिमीकंद, आलूपरवल और गुलाब जामुन, सब उस की प्रतीक्षा कर रहे थे.

पौने 9 बजने को हुए तब कोई चिल्लाया, ‘देखो, वह रहा चांद.’

नारायणी लपक कर कमरे में गई. दोबारा अपना शृंगार देखा. मांग में गहरा लाल सिंदूर, माथे पर बड़ा सा टीका, गले में मंगलसूत्र के ऊपर सोने का भारी हार, कानों में झुमके, उंगलियों में 4 अंगूठियां और चौड़े बार्डर की गोटे वाली चमकीली जार्जेट की साड़ी. सबकुछ ठीक था.

नारायणी नईनवेली दुलहन की तरह पल्ले से सिर ढकती हुई हाथों में थाली और लोटा ले कर ऊपर छत पर गई, पर चांद कहीं दूरदूर तक दिखाई नहीं दिया. पता लगा कि किसी को भ्रम हो गया था. वह चांद नहीं था, एक चमकता बादल का टुकड़ा था, जो जैसे आया था वैसे ही चला गया.

नारायणी निराश हो गई. नीचे आ कर धम से बैठ गई.

कुछ देर में चिल्लाई, ‘अरे, सुनते हो? ये बच्चे तो किसी काम के नहीं हैं. तुम ही देख कर आओ कि चांद निकला या नहीं.’

देवीलाल ने झल्ला कर जवाब दिया, ‘अरे, जब निकलेगा तो सब को दिखेगा.’

बेचारे 4 बार तो वह खुद भी चक्कर काट चुके थे.

सोनू ने कहा, ‘पिताजी, कुतुब मीनार से तो अवश्य दिखाई देगा. टैक्सी ले कर आऊं?’

नारायणी ने उसे घूर कर देखा. सोनू जहां खड़ा था वहीं ठिठक कर रह गया. उस घर में मजाक की इजाजत नहीं थी.

चांद निकला साढ़े 9 बजे. पहले हलकी सी लाली दिखाई दी. फिर उस का एक टुकड़ा. जैसे ही समाचार मिला नारायणी अपना सामान उठा कर खड़ी हो गई.

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‘जरा यह थाली तो पकड़ना, मैं अपना सिर ठीक से ढक लूं,’ नारायणी ने थाली पति की ओर बढ़ाई.

नारायणी ने माथा ठोक कर कहा, ‘हाय, यह क्या बदशगुनी कर दी. एक भी काम ठीक से नहीं होता. सारे दिन का व्रत बेकार हो गया. तुम्हें तो मुझ से दुश्मनी है दुश्मनी.’

देवीलाल से भूल हुई थी, इसलिए धीरे से कह दिया, ‘अरे, घी ही तो गिरा है, और ले आओ.’

नारायणी ने चिढ़ कर कहा, ‘घी गिरना तो एकदम अशुभ है. सुबह से सिवा मनहूसियत फैलाने के कर क्या रहे हो? मैं भूखप्यास से तड़प रही हूं, ऊपर से यह बदशगुनी. मेरे तो करम ही फूट गए.’

देवीलाल कड़क कर कुछ कहने ही वाले थे कि पड़ोस की छतों से आवाजें आने लगीं, ‘अरे, चाची, जल्दी आओ न. सब तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.’

‘अरे, भौजी, बाद में झगड़ लेना, अभी तो ऊपर आओ.’

‘बहनजी, कितनी देर करोगी? बड़ी भूख लगी है.’

करवाचौथ के दिन पड़ोस की सारी सधवाएं एकसाथ मिल कर चांद की पूजा करती हैं. नारायणी ने ऐसे थूक सटका मानो जहर पी रही हो. देवीलाल को आग्नेय नेत्रों से देखा तो देवीलाल सिकुड़ गए. वह पैर पटकती हुई गई. दीए में फिर से घी डाला और बत्ती ठीक कर के थालीलोटा ले कर ऊपर चली गई. ऊपर से स्त्रियों के ‘खीखी’ कर के हंसने के स्वर आ रहे थे.

ऊपर जा कर स्त्रियों की हंसी में नारायणी भी शामिल हो गई. ठठा कर हंसने और ठिठोली करने में उस का सब से ऊंचा स्वर था. देवीलाल सोच रहे थे, ‘यह मुखौटा कैसा?’

जब नारायणी नीचे आई तो फिर से वैसी ही गंभीर थी. चेहरे पर तनाव था. बड़बड़ा रही थी, ‘हाय, मेरे तो करम फूट गए हैं.’

देवीलाल ने कहा, ‘अरे, पूजा कर के आ रही हो, कुछ तो शुभ बोलो.’

‘क्या शुभ बोलूं?’ नारायणी ने तड़क कर कहा, ‘तुम सब मेरे दुश्मन हो दुश्मन.’

‘कैसी बातें कर रही हो?’ देवीलाल ने डांट कर कहा, ‘क्यों मनहूसियत फैला रही हो?’

‘क्या कहा? मैं मनहूस हूं. अरे, जिस के लिए दिनभर भूखीप्यासी रह कर उपवास किया, वही मुझे मनहूस कह रहा है. यह मैं क्या सुन रही हूं, भगवान. ऐसा सुनने से पहले मैं मर क्यों नहीं गई?’

‘किस ने कहा था यह मनहूस व्रत रखने को?’ देवीलाल ने चिल्ला कर कहा, ‘यह व्रत तो मेरे जीवन का सब से बड़ा शाप है. सुबह से सिर्फ रोनेधोने, उठापटक के और हो क्या रहा है?’

‘शाप है, शाप है?’ नारायणी की घिग्घी बंध गई. उस से आगे कुछ न बोला गया. वह कुछ क्षण रुक कर रोने लगी. जा कर औंधे मुंह बिस्तर पर पड़ गई.

‘भगवान, तू नरक दे दे या फिर इस घर से उठा ले,’ वह बारबार यही कह कर माथा पीट रही थी.

जब तक नारायणी शांत हुई, घर में सन्नाटा हो गया था. बच्चे सहम कर बैठे हुए थे. सब की भूख मर गई थी.

देवीलाल ने निर्मला से कहा, ‘बेटी, खाना गरम कर के तुम लोग खा लो.’

यह कह कर वह अपने बिस्तर पर हाथ से मुंह ढक कर लेट गए.

पर ऐसे में कोई खाना कैसे खा सकता था? निर्मला दोनों भाइयों को दाएंबाएं बगल में लिटा कर अपने बिस्तर पर पड़ गई. आखिर सब को नींद आ गई.

आधी रात हुई. नारायणी उठी. उस ने खाना गरम कर के मेज पर रखा. सब को हिलाहिला कर उठाया, पर किसी ने उठने का नाम नहीं लिया.

‘मरो सब लोग,’ नारायणी ने कहा. कपड़े बदल कर वह भी बिस्तर पर लेट कर करवटें बदलने लगी.

Romantic Story in Hindi- बात एक रात की: भाग 2

लेखक : श्री प्रकाश

‘‘इतनी देर रात में बिना फ्लैट नंबर तो उन्हें ढूंढ़ना संभव नहीं है. बस कुछ घंटों की तो बात है, मेरे घर चलो. अपने रिश्तेदार को इतनी रात में क्यों तंग करोगी?’’

‘‘नहीं, यह ठीक नहीं होगा. मैं टैक्सी स्टैंड में रुक जाऊंगी. सुबह उन्हें फोन कर बुला लूंगी.’’

‘‘नहीं, स्टैंड पर रुकना सेफ नहीं है,’’ कह कर तपन ने अपने घर फोन किया और बोला, ‘‘मां, तुम अभी तक सोई नहीं थीं. एक ही रिंग पर फोन उठा लिया. मां, मैं 10 मिनट के अंदर घर पहुंच रहा हूं,’’ कह कर चित्रा से बोला, ‘‘मेरी बूढ़ी मां अभी तक मेरे लिए जाग रही हैं. तुम्हें कोई प्रौब्लम नहीं होगी. तुम मेरे घर चलो.’’

चित्रा ने सिर हिला कर अपनी सहमति

जाता दी. थोड़ी देर में दोनों घर पहुंचे, तो चित्रा को देख उस की मां बोलीं, ‘‘क्यों, मीरा को मना लाया है क्या?’’

दरअसल, उस की मां की आंखों की रोशनी बहुत कमजोर थी और फिर रात की वजह से और परेशानी होती थी, इसलिए ठीक से नहीं देख पा रही थीं.

तपन बोला, ‘‘मां, आप समझती क्यों नहीं? अब वह यहां क्यों आएगी? आप जा कर सो जाओ.’’

पर मां ने जब उस से चित्रा के बारे में पूछा तो तपन ने संक्षेप में उस के बारे में बता कर मां को सोने के लिए भेज दिया.

फिर उस ने चित्रा को गैस्टरूम में आराम करने को कहा.

चित्रा ने तपन से पूछा, ‘‘बुरा न मानें तो एक बात पूछूं?’’

फिर तपन के हां कहने पर वह बोली, ‘‘मीरा आप की पत्नी है?’’

‘‘है नहीं थी. हमारा तलाक हो चुका है.’’

‘‘सौरी. क्या इत्तफाक है. कल कोर्ट में मेरे तलाक पर फाइनल फैसला होना है. फैसला क्या बस तलाक पर मुहर लगनी है. मेरा और चेतन का आपसी सहमति से तलाक हो रहा है.’’

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कुछ देर तक दोनों खामोश एकदूसरे को हैरानी से देखते रहे. फिर तपन ने कहा, ‘‘तुम तो पढ़ीलिखी हो, काफी खूबसूरत भी हो. तुम्हारे पति को तो तुम पर गर्व होना चाहिए.’’

‘‘नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं था. मेरी ससुराल यहीं है, पर अब हमारा तलाक हो रहा है, इसलिए मैं वहां नहीं जा सकती हूं. मेरे पति कोलकाता में बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी करते हैं. मेरा मायके तो पटना में है. मैं भी सौफ्टवेयर इंजीनियर हूं. मैं ने अपने कालेज के 3 सीनियर लड़कों के साथ मिल कर एक स्टार्टअप कंपनी खोली है. शुरू में तो यह कंपनी मेरे पति के गैराज में ही थी. लगभग 1 साल तक ठीकठाक रहा था. हम एक अमेरिकन कंपनी के लिए प्रोडक्ट बना रहे हैं. अकसर देर रात तक गैराज में ही हम चारों काम किया करते थे. बीचबीच में मैं चायकौफी भी बना लाती थी. कभी हम चारों होते तो कभी मैं किसी एक के साथ अकेले भी होती थी. अपना मूड ठीक करने के लिए कभी हंसीमजाक भी कर लेते थे. यह सब मेरे पति चेतन को ठीक नहीं लगा. अकसर झगड़ा होने लगा. इसी बीच हमें अमेरिकन कंपनी से कुछ फंड भी मिला, तो अपने घर की बगल में ही एक छोटा फ्लैट किराए पर ले लिया और कंपनी को वहां शिफ्ट करा लिया, पर अकसर रात में देर हो जाती थी. हालांकि यह नितांत आवश्यक था, क्योंकि प्रोडक्ट को समय पर देना होता है. इस से हम लोगों को लाखों रुपए का लाभ होता.’’

चित्रा ने फिर बोलना शुरू किया, ‘‘पर चेतन हमारी मजबूरी समझने को तैयार नहीं था. एक दिन तो हद हो गई जब उस ने कहा कि काम के साथसाथ वहां रंगरलियां भी मनाते हो तुम लोग… या तो मैं कंपनी छोड़ दूं या हम दोनों को तलाक लेना होगा. मैं ने उन्हें समझाने की भरपूर कोशिश की पर वह नहीं माना, उलटे उस ने मेरे चरित्र पर ऊंगली उठाई थी. फिर हम दोनों आपसी सहमति से तलाक के लिए तैयार हो गए.’’

अब तक सुबह के 5 बज गए थे. तपन चाय ले कर चित्रा के पास गया और बोला, ‘‘अभी चाय के साथ कुछ बिस्कुट या स्नैक्स लोगी? नाश्ते में थोड़ा वक्त लगेगा.’’

चित्रा ने कहा कि फिलहाल सिर्फ चाय ही लेगी. फिर दोनों वहीं बैठ कर चाय पीने लगे. चित्रा ने अपने रिश्तेदार को फोन किया तो पता चला कि उन की ए शिफ्ट ड्यूटी है. प्लांट चले गए हैं. दोपहर 3 बजे तक लौटेंगे. चित्रा ने उन्हें फोन पर बता दिया कि वह थोड़ी देर में कोर्ट जाएगी और फिर वहां का काम कर सीधे कोलकाता लौट जाएगी.

चित्रा ने फिर तपन से कहा, ‘‘अगर उचित समझें तो बताएं कि आप और मीरा क्यों अलग हुए थे?’’

‘‘मैं यहां के प्लांट में इंजीनियर हूं, परचेज डिपार्टमैंट में हूं. मशीनों के पार्ट्स खरीदने के लिए बीचबीच में कोलकाता जाना पड़ता है. मैं मध्यवर्गीय परिवार से हूं. मीरा के पिता का अपना अच्छाखासा बिजनैस है, पर मीरा भी इसी प्लांट में अकाउंट औफिस में काम करती थी. हम दोनों में जानपहचान हुई. आगे चल कर प्यार हुआ और हम ने शादी कर ली. शुरू में 6 महीने काफी अच्छे बीते. उस के बाद उस ने जिद पकड़ ली अलग घर लेने की. उस ने कहा कि मां को किसी अच्छे वृद्धाश्रम में छोड़ देंगे. मैं इस के लिए तैयार नहीं?था. रोज खिचखिच होने लगी. अंत में उस ने कहा कि मुझे मां या मीरा में से किसी एक को चुनना होगा. मैं ने जब कहा कि मैं मां को अकेली नहीं छोड़ सकता तो उस ने कहा कि फिर मुझे छोड़ दो. मैं ने इस रिश्ते को बचाने की बहुत कोशिश की, पर वह नहीं मानी और उस ने तलाक के विकल्प को ही बेहतर समझा.’’

‘‘आजकल हमारे देश में भी तलाक लेने वालों की संख्या काफी बढ़ गई है. यह दुख की बात है न? लड़कियां भी पढ़लिख कर कमाने लगी हैं मर्दों की तरह तो उन को भी घर में उतनी इज्जत देनी होगी जितना मर्द अपने लिए चाहते हैं. उन्हें भी अपना कैरियर बनाने का हक है न? क्या मैं गलत बोल रही हूं?’’

‘‘नहीं, पर लड़के क्या अपने मातापिता के भले के लिए कुछ करना चाहें तो यह गलत है?’’

आखिर चित्रा और चेतन के तलाक पर कोर्ट ने मुहर लगा दी. तपन ने कहा कि यह एक ऐसा फैसला है जिस पर खुशी भी जाहिर नहीं की जा सकती है. चित्रा और चेतन अब सदा के लिए अलग हो चुके थे.

इस के बाद तपन चित्रा को अपने घर ले कर आया. उस ने उस दिन छुट्टी ले ली थी. मां ने दोनों को भोजन परोसा. मां ने पूछा, ‘‘बेटी, तुम ने भविष्य के बारे में क्या सोचा है? अभी तुम्हारे आगे लंबी जिंदगी है.’’

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‘‘मैं ने अभी कुछ नहीं सोचा है. अभी मैं कंपनी के जरूरी काम में कुछ महीने इतनी व्यस्त रहूंगी कि कुछ और सोचने की फुरसत ही नहीं है,’’ चित्रा ने कहा.

‘‘चिंता नहीं करना, एक रास्ता बंद होता है तो दूसरा खुल जाता है…’’

Crime Story in Hindi: वर्चस्व का मोह- भाग 3: आखिर किसने दादजी की हत्या की?

‘‘क्योंकि दादाजी की हत्या के बाद पापा ने मुझे अकेले ऊपर नहीं रहने दिया. हां, तो मैं बता रही थी कि उस रात पत्तों की आवाज सुन कर मुझे लगा कि आलोक आ गया है. मैं बाहर आई. पत्ते तो हिल रहे थे, लेकिन छत पर कोई नहीं था. मैं ने नीचे से झांक कर देखा तो पेड़ से उतर कोई भागता नजर आया और दादाजी के कमरे से उन के नौकर राजू के चिल्लाने की आवाजें आईं कि देखो दादाजी को क्या हो गया. मैं भाग कर नीचे आई और सब को राजू के चिल्लाने के बारे में बताया. हम लोग आलोक के घर गए. दादाजी के मुंह पर तकिया रख कर किसी ने दम घोंट कर उन की हत्या कर दी थी.

‘‘राजू दादाजी के लिए दूध ले कर ऊपर जा रहा था कि गिलास पर ढक्कन की जगह रखी कटोरी गिर सीढि़यों से झनझनाती हुई नीचे चली गई. शायद उसी की आवाज सुन कर हत्यारा कहीं छिप गया था. सब उस की तलाश करने लगे. मगर मैं ने किसी को नहीं बताया कि मैं ने हत्यारे को पेड़ से उतरते और दीवार फांदते देखा था. क्योंकि मैं ने उस की शक्ल तो नहीं सिर्फ लिबास देखा था.

‘‘वैसा ही रेशमी कुरतापाजामा जैसा आलोक पहने हुए था. पापा ने मेरे छोटे भाई बंटी को फंक्शन हौल से आलोक को लाने भेजा. मेरा खयाल था कि आलोक वहां नहीं होगा, लेकिन बंटी आलोक को ले कर आ गया. गौर से देखने पर भी आलोक के कपड़ों पर पेड़ पर चढ़नेउतरने के निशान नहीं थे. और आलोक भी परिवार के अन्य सदस्यों की तरह ही हैरान था…’’

‘‘फिर तुम्हें यह शक क्यों है कि हत्यारा आलोक ही है?’’ देव ने बीच में पूछा.

‘‘क्योंकि अगले दिन जब पुलिस ने पेड़ के नीचे जूतों के निशान देखे तो वे जोधपुरी जूतियों के थे जिन्हें आलोक उस समय भी पहने हुए था. सही साइज का पता नहीं चल रहा था क्योंकि भागने की वजह से निशान अधूरे थे. आलोक शक के घेरे में आ गया, मगर उस ने अपने बचाव में रवि की शादी की वे तसवीरें दिखाई, जिन में वह उस समय तक रवि के साथ था जब तक बंटी उसे बुलाने नहीं गया था. पुलिस ने भले ही उसे छोड़ दिया हो, लेकिन मुझे लगता है कि वह आलोक ही था. एक तो पेड़ पर से चढ़नेउतरने का रास्ता उसे ही मालूम है, दूसरे दादाजी की मौत से फायदा भी उसे ही हुआ.

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‘‘13वीं के तुरंत बाद उस ने एजेंसी लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी. रहा सवाल तसवीर का, तो खाने और फेरों के दरम्यान तो लगातार तसवीरें कहां खिंचती हैं सर? फोटोग्राफर भी उसी दौरान खाना खाते हैं. फंक्शन हौल घर के पीछे ही तो था. दीवार फांद कर आनेजाने और तकिए से मुंह दबा कर किसी बुजुर्ग को मारने में समय ही कितना लगता है?’’

‘‘तुम ने इस बारे में आलोक से बात की?’’

‘‘नहीं सर, आज पहली बार आप को बता रही हूं.’’

‘‘तुम ने अपनी सगाई या शादी कैसे टाली?’’

‘‘दादाजी की मृत्यु के तुरंत बाद तो सवाल ही नहीं उठता था. उस के बाद आलोक भी बहुत व्यस्त हो गया था. घर पर आता तो था, मगर पापा से सलाहमशवरा करने और मैं अपनी तरफ से उस से अकेले मिलने की कोशिश ही नहीं करती थी. साल भर बाद जब मां ने सगाई की जल्दी मचाई तो मैं ने उन से साफ कहा कि मुझे शादी से पहले कुछ समय चाहिए. आलोक के घर वाले भी उस की व्यस्तता के चलते अभी शादी करने की जल्दी में नहीं थे सो मेरे घर वाले भी मान गए.’’

‘‘और आलोक से मिलनाजुलना कैसे कम किया?’’

किरण मुसकराई, ‘‘उसे समझा दिया सर कि हमें ज्यादा मिलतेजुलते देख कर मां शादी जल्दी करवा देंगी. चूंकि आलोक भी धंधा जमने के बाद ही शादी करना चाहता था सो मान गया. वैसे भी उसे फुरसत तो थी नहीं, लेकिन अब जब भी फुरसत मिलती है आ जाता है और मां का शादी वाला राग शुरू हो जाता है. अब आप ही बताइए सर, जिस आदमी पर मैं शक करती हूं उस से शादी करना मुनासिब होगा?’’

‘‘बिलकुल नहीं. मैं कल ही इस केस की फाइल देखता हूं. मुझे दादाजी का नाम और हत्या की तारीख बताओ,’’ देव ने कहा, ‘‘तुम भी अब शादी के लिए मना मत करो. जब तक घर वाले तैयारी करेंगे, तब तक मैं हत्यारे को पकड़ लूंगा. अगर आलोक हुआ तो शादी का सवाल ही नहीं उठता और कोई दूसरा हुआ तो तुम्हारे इनकार करने की, फिर मना कर के घर में सब को परेशान करने की क्या जरूरत है?’’

‘‘जी सर.’’

रास्ते में देव ने नीना को बताया कि उस ने किरण को समझा दिया है और वह शादी के लिए मना नहीं करेगी. सोनिया को फिलहाल परेशान होने की जरूरत नहीं है.

अगले दिन देव ने कमिश्नर साहब को सारी बात बता कर केस की फाइल निकलवा ली. उस में लिखे तथ्यों के मुताबिक सुबूत न के बराबर थे, जिन के आधार पर हत्यारे को पकड़ना भूसे के ढेर में सूई ढूंढ़ने के समान था. लेकिन देव ने कमिश्नर साहब से आग्रह किया कि वे यह केस उस के सुपुर्द कर दें.

आलोक के घर वालों को दोबारा तफ्तीश की बात सुन कर पहले हैरान और फिर खुश होना स्वाभाविक ही था. सब से ज्यादा खुश आलोक लगा.

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‘‘मैं अपने को जानबूझ कर व्यस्त रखता हूं सर क्योंकि जहां जरा सी फुरसत मिली, मैं

यही सोचने लगता हूं कि दादाजी की हत्या किस ने की होगी?’’

‘‘और क्यों की होगी?’’ देव ने जोड़ा.

‘‘चोरी के लिए सर दादाजी गले में सोने की मोटी चेन, उंगलियों में हीरेपन्ने की अंगूठियां, सोने की कलाई घड़ी और सोने के बटन वाले कुरते पहनते थे. उन के बटुए में भी हजारों रुपए रहते थे. कमरे में मेरा भी लैपटौप, आईपौड वगैरह पड़े थे, लेकिन इस से पहले कि चोर ये सब समेट सकता, राजू के हाथ से सीढि़यों में कटोरी गिर गई और उस की आवाज से वह डर कर भाग गया,’’ आलोक ने कहा.

‘‘पेड़ से चढ़नेउतरने का रास्ता नए आदमी को तो मालूम नहीं हो सकता?’’

‘‘यही तो परेशानी है सर, हत्या तो किसी जानपहचान वाले ने ही की है. आप को एक बात बतांऊ, पेड़ के नीचे मिले निशान मेरी राजस्थानी जूतियों से मेल खा रहे थे. मैं शक के घेरे में तो आ गया था, लेकिन उसी दिन मेरे एक दोस्त की शादी थी और हर तसवीर और वीडियो के फ्रेम में होने की वजह से मैं बच गया.’’

‘‘मैं वह अलबम और वीडियो देख सकता हूं?’’

‘‘जरूर सर. मैं रवि के घर से अलबम और वीडियो कैसेट ला कर आप को फोन करूंगा,’’ आलोक ने कहा.

कुछ देर बाद आलोक ने देव को फोन किया कि उसे अलबम तो मिल गया है, मगर वीडियो कैसेट बारबार चलाने के कारण इतनी घिस गई है कि देखने में उलझन होती है सो न जाने कहां रख दी है. ढूंढ़ने को कह दिया है.

‘‘ठीक किया. फिलहाल अलबम मेरे औफिस में ला या भिजवा सकते हो?’’

‘‘अभी भेज देता हूं सर और अगर मेरी जरूरत हो तो फोन कर दीजिएगा, मैं फौरन हाजिर हो जाऊंगा.’’

अलबम देखने के बाद देव ने किरण को फोन किया, ‘‘किरण, उस रात तुम ने भागने वाले के कपड़ों का रंग भी देखा था?’’

‘‘नहीं सर, इतनी रोशनी नहीं थी…सिर्फ चमक और कुरते की लंबाई देखी थी.’’

‘‘वैसे उस शादी में आलोक के अलावा और कई लोग सिल्क के कुरतेपाजामों में थे.’’

‘‘हां सर, यह उस समय का खास फैशन था.’’

‘‘तो फिर भागने वाला आलोक ही क्यों, कोई और भी तो हो सकता है?’’

‘‘आलोक इसलिए सर कि एक तो भागने का रास्ता सिर्फ उसे ही मालूम था और दूसरे दादाजी के न रहने से फायदा भी तो उसी को हुआ.’’

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किरण के तर्क में दम तो था, लेकिन देव फिलहाल उस से सहमत होने को तैयार नहीं था. उस ने तसवीरों को फिर गौर से देखा. फिर आलोक को फोन कर के बुलाया.

‘‘इन तसवीरों में दूल्हा और तुम्हारे दूसरे सभी दोस्त तो अपने कालेज के साथी ही हैं सिवा एक के जो हर तसवीर में तुम से सट कर खड़ा है,’’ देव ने टिप्पणी की.

‘‘वह मेरा बिजनैस पाटर्नर नकुल है सर. अमेरिका से कंप्यूटर में डिप्लोमा कर के आया है. आप को तो मालूम ही होगा सर, आईबीएम की एजेंसी लेने के लिए कंप्यूटर स्पैशलिस्ट होना अनिवार्य है, इस के अलावा इलैक्ट्रौनिक प्रोडक्ट्स बेचने का अनुभव और एक बड़े एअरकंडीशंड शोरूम का मालिक होना भी. मैं ने और नकुल ने साथ मिल कर ये सब शर्तें पूरी कर के जोनल डिस्ट्रिब्यूटरशिप ली है.’’

‘‘कब से जानते हो नकुल को?’’

डुप्लीकेट- भाग 1: आखिर क्यों दुखी था मनोहर

कल्पना सिनेमाघर में काफी पुरानी फिल्म ‘अपना कौन’ चल रही थी. बहुत कम दर्शक थे. मनोहर भी फिल्म देखने आया था. जैसेजैसे वह सीन निकट आ रहा था, उस के दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. एक घंटे बाद वह सीन आया. अचानक फिल्म की हीरोइन सीढि़यों से लुढ़कती हुई फर्श पर आ गिरती है.

यह देखते हुए मनोहर के मुंह से दुखभरी चीख निकली. वह बुरी तरह कांप उठा. उस का मन बहुत भारी हो गया. वह सीट से उठा और सिनेमाघर से बाहर निकल गया. वह बस इतनी ही फिल्म देखने आया था.

सिनेमाघर से बाहर आ कर मनोहर ने एक रिकशा वाले को जनकपुरी चलने को कहा.

मनोहर के चेहरे पर दुख की रेखाएं फैलती जा रही थीं. 20 साल पहले बनी थी यह फिल्म ‘अपना कौन’. किसी को क्या पता था कि सीढि़यों से लुढ़क कर फर्श पर गिरने वाली हीरोइन नहीं, बल्कि हीरोइन की डुप्लीकेट नीलू थी. नीलू उस की पत्नी ऊंचे जीने से बुरी तरह लुढ़कती हुई फर्श पर गिरी. उस के बाद वह कभी उठ ही न पाई.

फिल्म नगरी की नकली सुनहरी चमकदमक. खिंचे चले जा रहे हैं अनेक नौजवान. न जाने कितने चेहरे इस चमक के पीछे छिपे गहरे अंधकार में हमेशा के लिए खो जाते हैं.

मनोहर विचारों के सागर में गोते लगाने लगा

मनोहर विचारों के सागर में गोते लगाने लगा. उसे याद आ रहा था जब वह नौजवान था, हैंडसम था. उसे ऐक्टिंग करने का शौक था. शहर के कुछ मंचों पर नाटकों में भी ऐक्टिंग की थी. उसे भी फिल्मों में काम करने का भूत सवार हो गया था. वह घर से मुंबई भाग आया था. महीनों मारामारा घूमता रहा. जो रुपए लाया था, खत्म हो गए.

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तभी उस की दोस्ती विजय से हो गई जो फिल्मों में डुप्लीकेट का काम करता था. विजय उसे भी स्टूडियो में साथ ले जाने लगा. वहां वह फिल्मों की शूटिंग देखता और सोचता कि काश, मुझे भी किसी फिल्म में काम मिल जाता.

वह दिन मनोहर की खुशी का दिन था जब एक फिल्म में विजय ने उसे भी डुप्लीकेट का काम दिला दिया था. उस ने मन ही मन सोचा था कि आज वह डुप्लीकेट बना है, कल हीरो भी जरूर बनेगा.

पर, यह सोचना कितना गलत रहा, क्योंकि फिल्म नगरी में हीरो कभी डुप्लीकेट नहीं बनता और डुप्लीकेट कभी हीरो नहीं बनता. जो जिस लाइन पर चल निकला, सो चल निकला. जिस पर जो लेबल यानी ठप्पा लग गया, सो लग गया.

फिल्मी दुनिया में मनोहर भी एक डुप्लीकेट बन कर रह गया

फिल्मी दुनिया में मनोहर भी एक डुप्लीकेट बन कर रह गया था. वह कुछ नामचीन हीरो के लिए काम करने लगा था. शीशे तोड़ कर कमरे में घुसता. ऊंचीऊंची इमारतों पर विलेन के डुप्लीकेट से लड़ाई के शौट देता. कभी वह पहाडि़यों से लुढ़कता तो कभीकभी ऐसे स्टंट भी करने पड़ते जिन्हें देख कर दर्शक अपनी सांसें रोक लेते.

फिल्मों की शूटिंग पर मनोहर सुंदर सलोनी सी एक लड़की को देखा करता था. एक दिन जब उस से बात की गई, तो उस ने बताया था कि उस का नाम नीलिमा है. पर सभी उसे नीलू कहते हैं. उसे भी थोड़ीबहुत ऐक्टिंग आती थी. वह भी अपने शहर में कई नाटकों में रोल कर चुकी थी. वह भी फिल्मों में हीरोइन बनना चाहती थी.

यहां मुंबई में नीलू के दूर के एक रिश्ते का मामा रहता है. उस से फोन पर बात हुई तो उस ने एकदम कह दिया कि आ जाओ, मेरी बहुत जानपहचान है फिल्म नगरी में.

नीलू ने जब मम्मीपापा को मुंबई में जाने के बारे में बताया तो दोनों ने साफ मना कर दिया था. फिल्मी दुनिया में फैली अनेक बुराइयों व परेशानियों के बारे में भी उसे समझाया था.

पापा ने कहा था, ‘नए लोगों को वहां पैर जमाने में बहुत संघर्ष करना पड़ता है. उन लड़कियों के लिए दलदल में गिरने जैसी बात हो जाती है जिन का फिल्म नगरी या मुंबई में कोई अपना नहीं होता.’

‘वहां पर मामा जगत प्रसाद तो हैं. उन्होंने फोन पर मुझ से कहा है कि उन की बहुत जानपहचान है,’ नीलू बोली थी.

‘नीलू बेटी, वह तेरा सगा मामा तो है नहीं. दूर के रिश्ते में मेरा भाई लगता है. तू फिल्मी दुनिया के सपने छोड़ कर यहीं पढ़ाईलिखाई में अपना ध्यान दे,’ मम्मी ने कहा था.

पर नीलू नहीं मानी. उस की जिद के सामने वे मजबूर हो गए. उन दोनों को नाराज कर वह मुंबई पहुंच गई. जगत मामा व मामी उसे देख कर बहुत खुश हुए.

जगत मामा ने नीलू को फिल्मी दुनिया के अनेक लोगों के साथ अपने फोटो भी दिखाए. उसे पूरा विश्वास हो गया था कि मामा उसे जल्द ही किसी न किसी फिल्म में रोल दिला देंगे.

एक दिन मामी बाजार गई हुई थीं. मामा और वह घर पर अकेले ही थे. वह एक फिल्मी पत्रिका पढ़ रही थी.

‘नीलू, एक दिन तुम्हारी तसवीरें भी इसी तरह पत्रिकाओं व अखबारों में छपेंगी.’

‘सच, मामाजी,’ नीलू की आंखों में खुशी भरी चमक तैरने लगी मानो उस की फिल्म की शूटिंग हो रही है. उसे हीरोइन की सहेली का रोल मिला है. उस के फोटो भी अखबारों में छप रहे हैं.

तभी नीलू चौंक उठी. मामा ने एक झटके से उसे अपनी तरफ खींचना चाहा था. वह एकदम बोल उठी, ‘यह क्या करते हो आप मामाजी?’

मामा ने मुसकरा कर उस की ओर देखा था. मामा की आंखों में वासना के डोरे तैर रहे थे.

‘मामाजी, आप से मैं क्या कहूं? आप को तो शर्म आनी चाहिए. आप अपनी भांजी के साथ ऐसी हरकत कर रहे हो.’

‘अरे, तुम मेरी सगी भांजी तो हो नहीं. मेरी 2-3 निर्माताओं से बात चल रही है. उन्होंने कहा है कि वे जल्द ही तुम्हें स्क्रीन टैस्ट के लिए बुला लेंगे. स्क्रीन टैस्ट के नाम पर यह सब होना मामूली बात है.

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‘अगर तुम इस से बचना चाहोगी तो नामुमकिन हो जाएगा काम मिलना. अखबारमैगजीनों में तुम ने पढ़ा होगा कि बहुत सी हीरोइन अपने इंटरव्यू में बता देती हैं कि फिल्मों में काम देने के नाम पर उन का यौन शोषण हुआ है.’

Satyakatha- खुद बेच डाला अपना चिराग

सौजन्य- सत्यकथा

लेखक- शाहनवाज

मांकी ममता ही ऐसी होती है कि वह अपने नवजात को अकसर सीने से लगाए रहती है. और तो और रात को जब वह सो जाती है तो बगल में सोए अपने बच्चे को बारबार छू कर देखती है कि कहीं उस के कपड़े गीले तो नहीं हो गए. पूजा देवी भी अपने 6 दिन के नवजात की इसी तरह देखभाल कर रही थी.

15 जून, 2021 की रात के करीब 11 बज रहे थे. पूजा नींद में ही टटोल कर यह देख रही थी कि कहीं उस के बच्चे ने सूसू तो नहीं कर दी. कमरे की लाइट बंद थी, इसलिए जब उस ने अपनी बाईं ओर हाथ बढ़ाया तो उस का हाथ सीधा सीमेंट के फर्श पर पड़ा. पूजा ने सोचा कि शायद वह बच्चे को गलत जगह देख रही है. उस ने उसी समय अपने दाईं ओर हाथ बढ़ाया तो उस का बच्चा उधर भी नहीं था.

पूजा की नींद अब भाग चुकी थी. वह उठ कर बैठ गई. उस ने इधरउधर देखा लेकिन उसे उस का बच्चा नहीं मिला तो वह घबरा गई. तभी उस ने पास में लेटे पति गोविंद को भी जगा दिया.

पूजा ने फटाफट उठ कर कमरे की लाइट जलाई. कमरे में रोशनी होने के बाद पूजा को अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ. क्योंकि उस का बच्चा कमरे में नहीं था. बच्चा गायब होने पर गोविंद भी घबरा गया.

पूजा ने डबडबाई आंखों से अपने पति गोविंद की ओर देखा और बिना कुछ देखे कमरे से बाहर निकलते हुए जोरजोर से मुन्ना…मुन्ना चीखती हुई निकल गई. देखते ही देखते उस मकान में रहने वाले अन्य किराएदार जो अपनेअपने कमरों में आराम कर रहे थे, बाहर निकल आए और सब गोविंद से पूछने लगे, ‘‘क्या हुआ है?’’

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पूजा ने रोते हुए और जोर से चीखते हुए सब को बताया कि उस का मुन्ना नहीं मिल रहा है. किराएदार गोविंद और पूजा की बढ़ती बेचैनी को कम करने के लिए खुद उन के साथ सब के कमरों में घुसघुस कर चेक करने लगे. कुछ देर में हर किसी का कमरा खंगालने के बाद जब मुन्ना नहीं मिला तो पूजा फूटफूट कर रोने लगी और उस का नाम ले कर जोरजोर से चीखनेचिल्लाने लगी. गोविंद भी अपनी पत्नी का सिर अपने कंधे पर रख कर रोने लगा.

कुछ ही देर में यह बात आया नगर की पूरी गली में फैल गई कि पूजा का 6 दिन का बच्चा चोरी हो गया है. गोविंद और पूजा की यह हालत देख कर किसी ने उन्हें सुझाया कि उन्हें जल्द ही पुलिस को इस बारे में बताना चाहिए.

गोविंद ने उन की बात मानते हुए तुरंत 100 नंबर पर फोन कर पुलिस को इस बारे में बताया. कुछ देर में पुलिस आया नगर में स्थित गोविंद के कमरे पर पहुंच गई. जिस के बाद गोविंद और पूजा ने पुलिस को पूरा घटनाक्रम बताया.
दक्षिणी दिल्ली में स्थित आया नगर फतेहपुर बेरी थाने के अंतर्गत आता है. इसलिए मामला थाने में दर्ज हो गया और पुलिस इस के बाद मामले की जांच में जुट गई.

बिहार के मुजफ्फरपुर के रहने वाले गोविंद कुमार को दिल्ली में आए बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ था. वह 2014 में ही दिल्ली में आया था और मजदूरी करता था. जब जहां पर, जैसा भी काम मिल जाए, उसी के आसपास किराए पर कमरा ले कर रहने लगता था.

गोविंद की शादी 2017 में हुई थी. शादी के साल भर बाद वह अपनी पत्नी पूजा को अपने साथ दिल्ली ले आया था. उन का एक ढाई साल का बेटा
भी था.

गोविंद एक दिहाड़ी मजदूर था. जिस से उस के घर में हमेशा पैसों की किल्लत रहती थी. ऊपर से बीते साल कोरोना की वजह से लगे लौकडाउन ने तो उस के परिवार की मानो कमर ही तोड़ दी थी.

जब लौकडाउन लगा था, उस समय गोविंद और उस का परिवार दिल्ली से सटे हरियाणा के सिकंदरपुर में एक किराए के कमरे में फंस गया था. उस की आर्थिक हालत उन दिनों बेहद खराब हो गई थी.

इस से पहले उस की पत्नी पूजा उसे कई बार गांव में ही बस जाने के लिए कहा करती थी. लेकिन गोविंद पूजा की बात को नकार देता था और कहता था कि अगर गांव चले जाएंगे तो थोड़ाबहुत जितना भी पैसा यहां अपने बच्चे के लिए बचा पा रहे हैं, वह भी नहीं बचा पाएंगे. यह सुन कर पूजा पति को कुछ कह नहीं पाती थी, क्योंकि गोविंद की इस बात में कहीं न कहीं सच्चाई थी.

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मुजफ्फरपुर में गोविंद के गांव में भी उस की संपत्ति बहुत अधिक नहीं थी. खेती लायक जितनी जमीन थी, उस पर गोविंद के बड़े और छोटे भाई मिल कर खेती करते थे.

इधर गोविंद और पूजा के 6 दिन के बच्चे को ढूंढने की जिम्मेदारी थानाप्रभारी कुलदीप सिंह ने एएसआई बरमेश्वर को सौंप दी. एएसआई बरमेश्वर ने अपनी शुरुआती जांच में पाया कि जिस दिन गोविंद और पूजा ने अपने बच्चे के अपहरण की शिकायत दर्ज कराई थी, ठीक उसी दिन गोविंद और उस का परिवार दिल्ली के आया नगर में शिफ्ट हुआ था.

इस बिंदु को ध्यान में रखते हुए पुलिस टीम ने गोविंद से पूछा कि कहीं उस की किसी से दुश्मनी तो नहीं है या फिर इस अपहरण के पीछे उसे किसी पर शक तो नहीं.

गोविंद ने पुलिस के इस सवाल का जवाब थोड़े नाटकीय अंदाज में घुमाफिरा कर दिया. उस ने कहा, ‘‘साहब, हम तो इस मकान में आज ही रहने के लिए आए थे. इस के पहले हम सिकंदरपुर में किराए पर रहते थे तो मेरे दोस्त हरिपाल सिंह ने मेरे परिवार को अपने घर चले आने के लिए कहा. क्योंकि पहले जहां रहते थे, वहां जगह बहुत छोटी थी. मुश्किल से हम 4 लोग जमीन पर सो पाते थे.’’
‘‘साहब, मुझे लगता है कि हरिपाल ने ही हमारे बच्चे का अपहरण किया है.’’ पूजा ने रोते हुए गोविंद की बात बीच में काटते हुए कहा. इस के बाद पुलिस टीम ने अन्य किराएदारों से हरिपाल सिंह के बारे में पूछताछ की.

हरिपाल सिंह हरियाणा के गुड़गांव में प्लंबर का ठेकेदार था और वह गोविंद को जानता था. दरअसल, हरिपाल गोविंद को दिहाड़ी मजदूरी के लिए अकसर बुला लिया करता था. पिछले 4-5 सालों से हरिपाल और गोविंद एकदूसरे को जानते थे और इस बीच वे दोस्त भी बन गए थे.

जब पूजा ने हरिपाल पर शक होने की बात कही तो पुलिस ने सब से पहले मकान मालिक हरिपाल को ढूंढने के लिए अपने सभी मुखबिरों को अलर्ट कर दिया. इस के बाद हरिपाल के घर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज इकट्ठी की गई और उन्हें एकएक कर बारीकी से देखा गया.

थाने में टैक्निकल टीम और अन्य जांच टीम की मदद से पुलिस ने यह पता लगा लिया कि हरिपाल आया नगर के ई-ब्लौक में कहीं मौजूद है.

यह सूचना मिलने के बाद थानाप्रभारी कुलदीप सिंह के नेतृत्व में पुलिस टीम ने आया नगर के ई-ब्लौक में, जिस मकान में हरिपाल के मौजूद होने का शक था, वहां एकाएक रेड डाली. हरिपाल सिंह उसी मकान में मिल गया. उसे हिरासत में ले कर टीम थाने लौट आई.

थाने में उस से बच्चे के बारे में पूछा. जिस के जवाब में हरिपाल ने कुछ ऐसा कहा, जिस के बारे में पुलिस ने बिलकुल भी नहीं सोचा था. हरिपाल ने डरते हुए पुलिस को बताया, ‘‘साहब, जिस बच्चे के अपहरण की बात आप लोग कर रहे हैं, उस का अपहरण नहीं हुआ. बल्कि गोविंद और पूजा की मंजूरी से ही उसे बेचा गया है.’’

यह सुनते ही पुलिस भी चौंक गई कि क्या कोई मांबाप अपना बच्चा बेच भी सकते हैं. गोविंद और पूजा से पूछताछ करने से पहले पुलिस कीपहली प्राथमिकता बच्चे को सहीसलामत बरामद करने की थी.

इसलिए पुलिस ने हरिपाल से पूछताछ जारी रखी. हरिपाल ने बताया, ‘‘साहब, बच्चा मांबाप की सहमति से ही खरीदने वाले दंपति को दिया गया है, जिस के लिए गोविंद और पूजा को 3 लाख 60 हजार रुपए दिए गए थे.’’

उस ने पुलिस को सच बताते हुए अपने दोस्त रमन यादव का नाम बताया, जिस के रिश्तेदार बच्चा खरीदने वाले विद्यानंद यादव और रामपरी देवी हैं. पुलिस ने हरिपाल से रमन यादव के बारे में तफ्तीश की और दिल्ली के संजय कैंप, मोती बाग के रहने वाले रमन को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

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बच्चा खरीदने वाले दंपति विद्यानंद यादव (50) और रामपरी देवी (45) बिहार के मधुबनी जिले के इनरवा गांव के रहने वाले थे. विद्यानंद और रामपरी को शादी के कई सालों बाद भी जब कोई बच्चा नहीं हुआ तो समाज में उन्हें हेयदृष्टि से देखा जाने लगा था.

पुलिस ने जब रमन यादव को गिरफ्तार कर उस से पूछताछ की तो उस ने कहा, ‘‘साहब, विद्यानंद मेरा साढ़ू है और वह 50 साल का हो चुका है लेकिन उस की खुद की कोई औलाद नहीं है. गांव के लोग मेरे साढ़ू के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं.

‘‘आसपास के किसी बच्चे के साथ जब कोई घटना हो जाती है या जब बच्चे खेलतेखेलते गिर जाते हैं और चोट लग जाती है तो लोग उस का इलजाम भी विद्यानंद और उस की पत्नी रामपरी पर लगाते हैं. लोग कहते हैं कि उन की बुरी नजर की वजह से गांव में बच्चों के साथ दुर्घटना होती है.

‘‘इतना ही नहीं गांव वाले यह तक कहते हैं कि विद्यानंद और उस की पत्नी गांव में बच्चों को बुरी नजर से देखते हैं. यहां तक कि कई लोग उस से अनायास ही झगड़ा करते हैं. यह सब मुझ से देखा नहीं जाता था.’’

पुलिस ने रमन यादव से पूछा कि अभी इस समय बच्चा कहां हैं तो रमन ने बताया, ‘‘विद्यानंद और रामपरी बच्चे को अपने साथ ले कर गांव के लिए रवाना हो गए हैं. रात को आनंद विहार रेलवे स्टेशन से मधुबनी के लिए निकल चुके हैं.’’

पुलिस की टीम ने जल्द ही बच्चे को सहीसलामत ढूंढने के लिए आनंद विहार से मधुबनी जाने वाली ट्रेन का पता लगाया और ट्रेन की लाइव लोकेशन का पता कर आगे की काररवाई तेजी से की.

पता चला कि ट्रेन कानपुर पहुंचने वाली है. देरी न करते हुए पुलिस की टीम ने रेलवे अधिकारियों से पैसेंजर की लिस्ट मंगवा कर कानपुर सेंट्रल के नजदीकी पुलिस थाने हरबंस मोहाल के थानाप्रभारी सत्यदेव शर्मा को मामले के बारे में सारी जानकारी दी.

सत्यदेव शर्मा ने तत्परता दिखाते हुए कानपुर रेलवे स्टेशन जा कर बताई गई ट्रेन के कोच और सीट नंबर पहुंच गए. एक बुजुर्ग दंपति उस ट्रेन में एसी डिब्बे में सफर कर रहे थे और रामपरी बच्चे को कंबल में लपेट कर उसे अपने हाथों में लिए चुपचाप बैठी थी.

जब पुलिस को आते हुए उस बुजुर्ग ने देखा तो तुरंत ट्रेन में दूसरी ओर जाने का प्रयास किया, लेकिन दूसरी तरफ से भी पुलिस उस की तरफ आ रही थी.
अंत में हार मानते हुए उन्होंने पुलिस के हाथों खुद को सरेंडर कर दिया और थानाप्रभारी की टीम ने आरोपी दंपति को पकड़ कर दिल्ली फतेहपुर बेरी थाने के प्रभारी कुलदीप सिंह को सूचना दे दी. जिस के बाद दिल्ली से एक टीम तुरंत कानपुर के लिए रवाना हो गई और सारी औपचारिकताएं पूरी कर विद्यानंद यादव, उस की पत्नी रामपरी व बच्चे को ले कर दिल्ली लौट आई.

पुलिस ने विद्यानंद ने पूछताछ की तब उस ने अपनी दुखभरी कहानी पुलिस को बताई, वह इस प्रकार थी.

बच्चे की लालसा में बुजुर्ग दंपति विद्यानंद यादव और रामपरी देवी लगातार अपने गांव में लोगों के उपेक्षित व्यवहार से परेशान थे. हालांकि विद्यानंद और रामपरी का परिवार पैसों के मामले में बहुत संपन्न नहीं था. खेती लायक बेहद कम जमीन थी, एक घर था वह भी आधा कच्चा और आधा पक्का. उन्हें बच्चा तो चाहिए था लेकिन लड़का ही.

यह बात उस के साढू रमन यादव को मालूम थी. रमन यादव गुड़गांव में पीओपी का काम किया करता था और वह हरिपाल को जानता था.

रमन और हरिपाल अकसर काम से निकलने के बाद घर जाने से पहले दारू पीते थे. ऐसे ही एक दिन जब रमन और हरिपाल दारू पी रहे थे तो रमन ने उसे अपने साढू विद्यानंद के बारे में बताया.

दारू पीते हुए रमन ने अपनी लड़खड़ाती जुबान में कहा, ‘‘यार, गांव में मेरा एक साढू है विद्यानंद. उस की कोई औलाद नहीं है. बेचारे को गांव में लोग बहुत जलील करते हैं. फालतू का झगड़ा करते हैं.’’

‘‘लेकिन ऐसा क्यों?’’ हरिपाल ने नशे की हालत में रमन से पूछा. ‘‘अरे यार, तुझे बताया तो, औलाद नहीं है बेचारों की. कोई भी कुछ भी बोलता है उन के बारे में. उन के घर के आंगन में लोग थूकते हैं.’’ रमन बोला.

‘‘कुछ करना चाहिए यार. कम से कम मरने से पहले उन्हें औलाद का सुख तो नसीब होना ही चाहिए.’’

हरिपाल अपने ऐसे ही एक दोस्त को जानता था, जिस के घर हालफिलहाल में बच्चा हुआ था. वह था गोविंद. उस ने रमन को नशे की हालत में वादा किया कि वह जरूर उस के साढू विद्यानंद के लिए कुछ करेगा.

8 जून, 2021 को गोविंद के घर में बच्चे की किलकारियां गूंजी थीं. उस के चौथे दिन ही हरिपाल गोविंद से मिला और उस से अपने बच्चे को बेचने के बारे में बात की.

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हरिपाल ने गोविंद के सामने डरसहम कर अपनी बात रखी. उस ने कहा, ‘‘गोविंद देख तेरी हालत के बारे में तुझ से बेहतर अभी कोई नहीं जानता. मुझे मालूम ह कि पिछले साल जब लौकडाउन लगा था तब तेरे परिवार ने किस तरह से गुजारा किया था. ये स्थिति सुधारने का एक उपाय है. अगर तू कहे तो मैं उस के बारे में बताऊंगा.’’

गोविंद ने बिना हिचकिचाए उस से इस के बारे में पूछा, ‘‘हां बताइए न, क्या तरीका है.’’हरिपाल ने अपनी आवाज में आत्मविश्वास पैदा किया और बोला, ‘‘देख, गुस्सा मत करियो. तेरे घर में जो बच्चा अभी पैदा हुआ है, उसे बेच दे. देख मैं जानता हूं कि इस बात से तुझे गुस्सा जरूर आएगा, लेकिन तू भी तो सोच जरा. ऐसे मजदूरी कर के क्या तू अपने परिवार को खुशी दे सकता है? क्या इस बढ़ती महंगाई के जमाने में तू अपनी बीवी समेत अपने दोनों बच्चों को पाल सकता है? मैं एक आदमी को जानता हूं, जो बच्चा खरीदने के लिए तैयार है. अब तू देख, तुझे क्या करना है.’’

हरिपाल के मुंह से यह सब सुन कर बेशक गोविंद के होश जरूर उड़ गए थे, लेकिन उस की बातों को कहीं न कहीं सच और ठीक जरूर मान रहा था. गोविंद हरिपाल को बिना कुछ कहे वहां से निकल गया और घर जा कर उस ने इस बारे में अपनी पत्नी पूजा से ठीक उसी अंदाज में बात की.

पूजा अपने परिवार के मौजूदा हालात को अच्छी तरह से जानती थी. वह गोविंद की बातों से नाराज नहीं हुई, बल्कि उस की इन बातों ने उसे सोच में डाल दिया था. उस रात वह सो भी नहीं पाई, बल्कि जमीन पर लेटे हुए करवट बदलबदल कर पूरी रात सोचती रही.

सुबह हुई तो उस ने गोविंद को बीती रात को हुई बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘हां तो क्या सोचा है तुम ने? क्या ये करना है?’’

गोविंद को एकपल के लिए हैरानी हुई. लेकिन उस ने तुरंत अपनी पत्नी के सवाल का जवाब दिया और बोला, ‘‘देखो, हमारे पास इस के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं नजर आ रहा है. कम से कम जिसे अपना बच्चा देंगे उस को औलाद नसीब होगी, और जो पैसे हमें मिलेंगे उस से हमारा कुछ तो भला हो जाएगा. और हमारा एक सहारा तो है ही.’’ यह कहते हुए गोविंद और पूजा ने बच्चे की कीमत 4 लाख रुपए तय की और दोनों ने एकदूसरे को भरोसे के साथ देखा. यह बात गोविंद ने हरिपाल को मिल कर बताई कि वे दोनों इस काम के लिए तैयार हैं और बच्चे की कीमत उन्होंने 4 लाख रुपए रखी है. हरिपाल ने यह बात रमन को बताई और रमन ने यह बात आगे विद्यानंद तक पहुंचा दी.
विद्यानंद और रामपरी दोनों को बच्चा तो चाहिए था, लेकिन वे 4 लाख रुपए नहीं दे सकते थे. इसी तरह से फोन पर गोविंद और पूजा ने हरिपाल और रमन के जरिए विद्यानंद से बात कर आखिरी कीमत 3 लाख 60 हजार रुपए तय कर दी, जिस में दोनों पार्टी संतुष्ट हो गईं.

कीमत तय होने के बाद विद्यानंद को अब पैसों का जुगाड़ करना था क्योंकि उस के पास इतने पैसे नहीं थे. इस के लिए उस ने अपनी खेती की जमीन में से 3 कट्ठा जमीन तुरंत गांव में किसी खरीददार को 3 लाख रुपए में बेच दी. पैसे मिल जाने के बाद विद्यानंद और रामपरी दोनों हरिपाल और रमन से बात कर दिल्ली पहुंच गए.

बच्चा जिस दिन 6 दिनों का हुआ उस रात को विद्यानंद, रामपरी, गोविंद, पूजा और रमन हरिपाल के घर पर डील करने के लिए आ गए. गोविंद और पूजा ने दिन भर लग के अपना किराए का कमरा भी खाली कर दिया था और वे लोग हरिपाल के घर पर किराए पर शिफ्ट हो गए थे. क्योंकि इस से उन्हें डर था कि यदि पुराने किराएदार बच्चे को नहीं देखेंगे तो शक करेंगे.

विद्यानंद ने गोविंद को 2 लाख रुपए नकद दिए और 40-40 हजार के 4 चैक दिए. हरिपाल और रमन ने मिल कर गोविंद और पूजा से वहीं सहमति पत्र भी लिखवा लिया, जिस में उन्होंने उन के दस्तखत भी करवा लिए.

सारी डीलिंग हो गई तो रमन अपने साढू विद्यानंद, रामपरी और बच्चे को ले कर वहां से रवाना हो गया. रमन विद्यानंद को आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर छोड़ आया और खुद अपने घर चला गया.

उधर गोविंद और पूजा पैसे तथा चैक ले कर अपने कमरे की ओर चल दिए. जब वे अपने कमरे में पहुंच कर पैसे गिन रहे थे और चैक देख रहे थे तो चैक पर तारीख उस दिन के बजाय 18 जून की थी. यह देखते ही गोविंद को झटका लगा और उन दोनों को उस समय ठगा हुआ महसूस हुआ. उन्हें लगा कि एक तो उन्होंने अपना बच्चा भी दे दिया है और वहीं दूसरी ओर उन्हें पैसे भी पूरे नहीं मिले.

फिर अचानक से गोविंद की पत्नी पूजा के अंदर अपने बच्चे को ले कर ममता जाग उठी. एक तो उन्हें पैसे कम मिले थे और वहीं दूसरी तरफ पूजा के
मन में अपने बच्चे को ले कर उपजी चिंता ने उसे अंदर ही अंदर शर्मिंदगी महसूस करवा दी.

अंत में उस से रहा नहीं गया और वह अपने कमरे से निकल कर जोरजोर मुन्नामुन्ना पुकार कर रोने लगी. 100 नंबर पर फोन करने के बाद जब पुलिस आई तो पुलिस को गुमराह किया गया, लेकिन पुलिस की जांच से उन का झूठ जल्द ही उजागर हो गया. और इस मामले के सभी आरोपी पकड़े गए.

इस मामले के मुख्य सभी आरोपी जिस में बच्चे को जन्म देने वाली मां पूजा देवी, उस का पिता गोविंद कुमार, गोविंद का दोस्त हरिपाल सिंह, हरिपाल का दोस्त रमन यादव, रमन यादव का साढू और बच्चे को खरीदने का मुख्य आरोपी विद्यानंद यादव और उस की पत्नी रामपरी सब पुलिस की हिरासत में हैं.

मांबाप के भी जेल चले जाने के बाद पुलिस ने बरामद किए बच्चे को सरिता विहार स्थित शिशु गृह को सौंप दिया. जहां वह महफूज हाथों में है. द्य

Romantic Story in Hindi- रिश्तों की परख: भाग 1

लेखक- शैलेंद्र सिंह परिहार

हर रिश्ते की एक पहचान होती है. हर रिश्ते का अपना एक अलग एहसास होता है और एक अलग अस्तित्व भी. इन में कुछ कायम रहते हैं, कुछ समय के साथ बिखर जाते हैं. बस, उन के होने का एक एहसास भर रह जाता है. समय की धूल परत दर परत कुछ इस तरह उन पर चढ़ती चली जाती है कि वे धुंधले से हो जाते हैं. और जब भी कोई ऐसा रिश्ता अचानक सामने आ कर खड़ा हो जाता है तो इनसान को एक पल के लिए कुछ नहीं सूझता. उसे क्या नाम दें? कुछ ऐसी ही हालत मेरी भी हो रही थी. मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि 7 वर्ष बाद वह अचानक ही मेरे सामने आ खड़ा होगा.

‘‘टिकट,’’ उस ने हाथ बढ़ाते हुए मुझ से पूछा था. उसे देखते ही मैं चौंक पड़ी थी. चौंका तो वह भी था किंतु जल्दी ही सामान्य हो खाली बर्थ की तरफ देखते हुए उस ने पूछा, ‘‘और आप के साथ…’’

मैं थोड़ा गर्व से बोली थी, ‘‘जी, मेरे पति, किसी कारण से साथ नहीं आ सके.’’

‘‘यह बच्चा आप के साथ है,’’ उस ने मेरे 5 वर्षीय बेटे की तरफ इशारा करते हुए पूछा.

‘‘मेरा बेटा है,’’ मैं उसी गर्व के साथ बोली थी.

वह कुछ देर तक खड़ा रहा, जैसे मुझ से कुछ कहना चाहता हो लेकिन मैं ने ध्यान नहीं दिया, उपेक्षित सा अपना मुंह खिड़की की तरफ फेर लिया. मेरे मन में एक सवाल बारबार उठ रहा था कि नायब तहसीलदार की पोस्ट को तुच्छ समझने वाला कमलकांत वर्मा टी.सी. की नौकरी कैसे कर रहा है?

बड़ी अजीब बात लग रही थी. कभी अपने उज्ज्वल भविष्य…अपनी जिद के लिए अपने प्यार को ठुकराने वाला, क्या अपनी जिंदगी से उस ने समझौता कर लिया है? क्या यह वही आदमी है जिसे मैं लगभग 17 वर्ष पहले पहली बार मिली थी…10 वर्षों का साथ…ढेर सारे सपने…और फिर लगभग 7 वर्ष पूर्व आखिरी बार मिली थी?

17 साल पहले मेरे पापा का तबादला जबलपुर में हुआ था. आयकर विभाग में आयकर निरीक्षक की पोस्ट पर तरक्की हुई थी. नयानया माहौल था. एक अजनबी शहर, न कोई परिचित न कोई मित्र. वह दीवाली का दिन था, अपने घर के बरामदे में ही मैं और मेरे दोनों छोटे भाई फुलझड़ी, अनार और चकरी जला कर दीवाली मना रहे थे कि गेट पर एक लड़का खड़ा दिखाई दिया. पहले तो मैं ने सोचा कि राह चलते कोई रुक गया होगा, लेकिन जब वह काफी देर तक वहीं खड़ा रहा तो मैं ने जा कर उस से पूछा था, ‘जी, कहिए…आप को किस से मिलना है?’

मुझे देख कर वह नर्वस हो गया था, ‘जी…वह आयकर विभाग वाले निगमजी का घर यही है…’

‘हां, क्यों?’ मैं ने उस की बात भी पूरी नहीं होने दी थी.

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‘जी…मैं ये प्रसाद लाया था…मुझे उन से…’ वह रुकरुक कर बोला था.

मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, मैं ने पापा से ही मिलवाने में भलाई समझी. उस ने पापा को ही अपना परिचय दिया था. पापा के आफिस में कार्यरत वर्माजी का बेटा था वह. वर्माजी पापा के मातहत क्लर्क थे. वह लगभग 10 मिनट तक रुका था. मां ने उसे प्रसाद और मिठाइयां दीं लेकिन वह प्लेट को छू तक नहीं रहा था. मैं उस के सामने बैठी थी. उस का लजानासकुचाना बराबर चालू था. मैं ने मन ही मन कहा था, ‘लल्लू लाल.’

‘आप किस क्लास में पढ़ते हैं?’ मैं ने ही पूछा था.

‘जी…मैं…’ वह घबरा सा गया था, ‘जी हायर सेकंडरी में…’

उस के जाते ही मम्मीपापा में बहस शुरू हो गई थी

उस समय मैं हाईस्कूल में पढ़ रही थी. इस के बाद न तो मैं ने उस से कुछ पूछा और न ही उस ने मुझ से बात की. जातेजाते पापा से कह गया था, ‘अंकल, आप को पापा ने कल लंच पर पूरे परिवार के साथ बुलाया है.’

‘हूं…’ पापा ने कुछ सोचते हुए कहा था, ‘ठीक है, मैं वर्माजी से फोन पर बात कर लूंगा, पर बेटा, अभी कुछ निश्चित नहीं है.’

उस के जाते ही मम्मीपापा में बहस शुरू हो गई थी कि निमंत्रण स्वीकार करें या न करें. पापा को ज्यादा मेलजोल पसंद नहीं था. पापा ने ही बताया था कि वर्माजी बड़े ही ‘पे्रक्टिकल’ इनसान हैं. कलम भर न फंसे, शेष सब जायज है.

पापा ठहरे ईमानदार, ‘केरबेर’ का संग कैसे निभे? पापा के साथ वर्माजी की हालत नाजुक थी. पापा न तो खाते थे न ही वर्माजी को खाने का मौका मिलता था.

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पापा ने मां को समझाया, ‘देखो, यह निमंत्रण मुझे शीशे में उतारने का एक जरिया है.’ लेकिन मां के तर्क के सामने पापा के विचार ज्यादा समय के लिए नहीं टिक पाते थे.

‘इस अजनबी शहर में हमारा कौन है? आप तो दिन भर के लिए आफिस चले जाते हैं, बच्चे स्कूल और मैं बचती हूं, मैं कहां जाऊं? जब कहती थी कि कुछ लेदे कर तबादला ग्वालियर करा लीजिए तो उस समय भी यही ईमानदारी का भूत सवार था, मैं नहीं कहती कि ईमानदारी छोड़ दीजिए, लेकिन हर समय हर किसी पर शक करने का क्या फायदा? आफिस की बात आफिस तक रखिए, हो सकता है मुझे एक अच्छी सहेली मिल जाए.’

मम्मी की बात सही निकली. उन्हें एक अच्छी सहेली मिल गई थी. आंटी का स्वभाव बहुत ही सरल लगा था. हम बच्चों को देख कर तो वह खुशी से पागल सी हो रही थीं. मुझे अपनी बांहों में भरते हुए कहा था, ‘कितनी प्यारी बेटी है, इसे तो मुझे दे दीजिए,’ फिर उन की आंखों में आंसू आ गए थे, ‘बहनजी, जिस घर में एक बेटी न हो वह घर, घर नहीं होता.’

हम लोगों को बाद में पता चला कि उन की कमल से बड़ी एक बेटी थी जिस की 3-4 साल पहले ही मृत्यु हुई थी. आंटीजी ने मुझे अपने हाथ से कौर खिलाए थे.

‘मैं खा लूंगी न आंटीजी,’ मैं ने प्रतिरोध किया था.

और उन्होंने स्नेह से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था, ‘अपने हाथ से तो रोज ही खाती होगी, आज मेरे हाथ से खा ले बेटी.’

अंकल और आंटीजी हमें छोड़ने गेट तक आए थे

हम लोग लगभग 2 घंटे तक उन के घर में रुके थे, इस बीच मुझे कमल की सूरत तक देखने को नहीं मिली थी. मैं ने सोचा था, हो सकता है घर के बाहर हो. जब हम लोग चलने लगे तो अंकल और आंटीजी हमें छोड़ने गेट तक आए थे.

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‘अब आप लोग कब हमारे यहां आ रहे हैं?’ मम्मी ने पूछा था.

‘आप को बुलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी बहनजी,’ आंटीजी ने हंसते हुए कहा था, ‘जब भी अपनी बेटी से मिलने का मन होगा, आ जाऊंगी.’

हमारा घर पास में ही था, अत: पैदल ही हम सब चल पड़े थे. अनायास ही मेरी नजर उन के घर की तरफ गई थी तो देखा कमल खिड़की से हमें जाते हुए देख रहा था. जब तक उस के घर में थे तो जनाब बाहर ही नहीं आए, और अब छिप कर दीदार कर रहे हैं. मेरे मुख से अचानक ही निकल गया था, ‘लल्लू कहीं का.’

फिर तो आनेजाने का सिलसिला सा शुरू हो गया था. दोनों घर के सदस्य एकदूसरे से घुलमिल गए थे. कमल का शरमानासकुचाना अभी भी पूरी तरह से नहीं गया था. हां, पहले की अपेक्षा अब वह छिपता नहीं था. सामने आता और कभीकभी 2-4 बातें भी कर लेता था. आंटीजी का स्नेह तो मुझ पर सदैव ही बरसता रहता था.

छमाही परीक्षा में गणित में मेरे बहुत कम अंक आए थे. पापा कुछ परेशान से थे कि कहीं मैं सालाना परीक्षा में गणित में फेल न हो जाऊं. यह बात जब आंटीजी तक पहुंची तो उन्होंने कहा था, ‘इसे कमल गणित पढ़ा दिया करेगा, वह गणित से ही तो हायर सेकंडरी कर रहा है और वैसे भी उस की गणित बहुत अच्छी है. देख लीजिए, यदि स्नेह की समझ में न आए तो फिर किसी दूसरे को रख लीजिएगा.’

‘लेकिन बहनजी, उस की भी तो बोर्ड की परीक्षा है, उसे भी तो पढ़ना होगा?’ पापा ने अपनी शंका जताई थी पर दूसरे दिन ठीक 6 बजे कमल मुझे पढ़ाने के लिए हाजिर हो गया था. मैं भी अपनी कापीकिताब ले कर बैठ गई. 3-4 दिन तक तो मुझे कुछ समझ में नहीं आया था कि वह क्या पढ़ा रहा है. कोई सवाल समझाता तो ऐसा लगता जैसे वह मुझे नहीं बल्कि खुद अपने को समझा रहा है. लेकिन धीरेधीरे उस की भाषा मुझे समझ में आने लगी थी. वह स्वभाव से लल्लू जरूर था लेकिन पढ़ने में होशियार था..

Crime Story in Hindi: सोने का घंटा- भाग 3: एक घंटे को लेकर हुए दो कत्ल

प्रस्तुति : शकीला एस. हुसैन

उस से पहले ही मैं चौधरी श्याम सिंह और उस के भाई को गिरफ्तार कर चुका था. क्योंकि मुझे खतरा था कि लहना सिंह के बयान के बाद वह फरार हो जाएगा. चौधरी ने अपना जुर्म कबूल नहीं किया और मुझे धमकियां दे रहा था. लहना सिंह के बयान के बाद चौधरी श्याम सिंह के खिलाफ केस मजबूत हो गया. अस्पताल के सर्जिकल वार्ड के बिस्तर पर लेटेलेटे लहना सिंह ने बहुत कमजोर आवाज में अपना बयान कलमबंद करवाया.

‘‘साहब, रंजन सिंह का कातिल चौधरी श्याम सिंह ही है. उस ने अपने बदमाश जोरा सिंह के जरिए उसे कत्ल करवाया है. मैं उस रोज थाने में यही खबर देने के लिए आप के पास आया था, पर बदकिस्मती से आप से बात नहीं हो सकी. आप अपने काम में बहुत मसरूफ थे.

‘‘मैं बैठेबैठे थक गया था. सोचा घर का एक चक्कर लगा लूं. मैं घर के पीछे पहुंचा ही था कि श्याम सिंह के बंदों ने मुझ पर कुल्हाड़ी से हमला कर दिया. फिर उठा कर ले गए और कुएं वाले कमरे में बंद कर दिया. बाकी जो कुछ हुआ वह आप के सामने है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘रंजन सिंह को कत्ल करने की कोई ना कोई वजह होगी. उस ने कत्ल क्यों किया? तुम निडर हो कर बोलो. तुम्हारा एकएक शब्द श्याम सिंह के खिलाफ गवाही बनेगा.’’

‘‘बड़ी खास वजह थी जनाब, रंजन सिंह के पास सोने का एक घंटा था. इस घंटे का वजन करीब 3 सेर था. जिस के पास 3 सेर खालिस सोना हो उसे कोई भी जान से मार सकता है. चौधरी श्याम सिंह को इस सोने का पता चल गया था. उस ने रंजन का कत्ल करवा कर सोना हड़प लिया. यह सोना चौधरी के पास ही है. उसे जूते पड़ेंगे तो सब सच बक देगा.’’

लहना सिंह की खबर बहुत सनसनीखेज थी. 3 सेर सोना उस वक्त भी लाखों रुपयों का था. मैं ने लहना सिंह से फिर पूछा, ‘‘यह घंटा रंजन को मिला कहां से था?’’

लहना सिंह ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘यह तो पक्का पता नहीं, पर रंजन अपनी दुकान पर पुराना सामान ले कर भी पैसे दिया करता था. सोने का वह घंटा भी किसी को जमीन में से मिला था. टूटाफूटा, मिट्टी में सना हुआ. उस का रंग भी काला था.

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कोई देहाती बंदा उसे पीतल का समझ कर रंजन को कुछ सौ रुपए में बेच गया था. घंटे के साथ आधा किलो की एक जंजीर भी थी. रंजन बहुत चालाक आदमी था. उस ने लाहौर जा कर पता किया तो वह असली सोना निकला. उस ने जंजीर बेच दी और यह हवेली खरीदी. साथ ही शहर में अनाज की आढ़त का काम शुरू कर दिया. धूमधाम से बेटी की शादी की. फिर अपने लिए रिश्ता ढूंढने लगा.’’

मैं ने लहना सिंह से पूछा, ‘‘तुम्हें इन सारी बातों का कैसे पता चला?’’

उस ने एक लंबी कराह लेते हुए कहा, ‘‘उन दिनों मेरी और श्याम सिंह की अच्छी दोस्ती थी. वह सब बातें मुझे बताता था. उसे अपने किसी मुखबिर के जरिए पता लग चुका था कि रंजन के पास सोने का घंटा है. 3 सेर सोना कोई छोटी बात नहीं थी. उसने सोच लिया था कि रंजन का कत्ल कर के सोने पर कब्जा कर लेगा. यह बात उस ने मुझे खुद बताई थी.

‘‘उस वक्त वह शराब के नशे में था. जब 2 हफ्ते पहले रंजन का कत्ल हुआ तो मेरा ध्यान फौरन श्याम सिंह की तरफ गया. मुझे पूरा यकीन था रंजन को मार कर घंटा उसी ने गायब किया है. थानेदार साहब, मैं ने आप से वादा किया था झूठ नहीं बोलूंगा. मैं ने सारा सच बता दिया है, अब श्याम सिंह को फांसी के तख्ते पर पहुंचाना आप का काम है.’’

मैं ने ध्यान से उस का बयान सुना फिर पूछा, ‘‘उस ने तुम्हें मारने की कोशिश क्यों की?’’

वह सिसकी ले कर बोला, ‘‘साहब, मैं ने श्याम सिंह से कहा था कि सोने के घंटे में से मुझे भी हिस्सा दे, नहीं तो मैं यह बात पुलिस को बता दूंगा. पहले तो वह मुझे टालता रहा. जब मैं ने धमकी दी तो उस ने मेरा यह हाल कर दिया. उस दिन मैं आप को यही बात बताने आया था.’’

मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हारे खयाल में अब वह घंटा कहां है?’’

‘‘साहब, उस ने उस घंटे को हवेली में ही कहीं छुपा कर रखा है. हो सकता है कहीं गायब भी कर दिया हो.’’

मैं ने लहना सिंह को तसल्ली दी और अमृतसर से फौरन ढाब के लिए रवाना हो गया. ढाब पहुंचते ही हम ने चौधरी श्याम सिंह की हवेली पर धावा बोल दिया. चौधरी श्याम सिंह और उस का एक भाई गिरफ्तार थे. इसलिए खास विरोध नहीं हुआ. सारी हवेली की बारीकी से तलाशी ली गई. काफी मेहनत के बाद चावल के ड्रम में से सोने का घंटा बरामद हो गया.

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घंटे को देख कर लगता था कि वह काफी दिन तक जमीन में गड़ा रहा था. निस्संदेह वह या तो किसी मंदिर का घंटा था या फिर किसी राजा महाराजा के हाथी के गले में सजता होगा. घंटे को जब्त कर के थाने में हिफाजत से रखवा दिया गया. उस जमाने में भी उस की कीमत करीब छह लाख होगी.

कोई बदनसीब उस घंटे को रंजन को 2-3 सौ में बेच गया था. इतना कीमती घंटा देख कर कई लोगों के ईमान डोलने लगे, पर मैं इमान का पक्का था. घंटे की बरामदगी बाकायदा दर्ज की गई.

फिर उसे हिफाजत से कस्बे के चौराहे पर नुमाइश के लिए रख दिया गया. इस का नतीजा बहुत अच्छा निकला. एक घंटे के बाद एक आदमी ने मेरे पास आ कर कहा, ‘‘थानेदार साहब, मैं इस घंटे को पहचानता हूं. यह मैं ने सुगरा के आदमी नजीर के पास देखा था.’’

मैं भौंचक्का रह गया. फौरन पूछा, ‘‘तुम ने इसे उस के पास कब देखा था?’’

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