रिश्तों की कब्र खोदने वाला क्रूर हत्यारा

30 जनवरी, 2017 को पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले से क्राइम ब्रांच की एक टीम भोपाल आई. 5 सदस्यीय इस टीम का नेतृत्व बांकुरा क्राइम ब्रांच के टीआई अमिताभ कुमार कर रहे थे. उन के साथ सबइंसपेक्टर कौशिक हजरत और संदीप बनर्जी के अलावा एएसआई चंद्रबाला भी थीं. इस टीम के साथ एक स्मार्ट और खूबसूरत युवक आयुष सत्यम भी था, जो काफी परेशान लग रहा था. भोपाल स्टेशन पर उतर कर यह टीम सीधे गोविंदपुरा इलाके के सीएसपी वीरेंद्र कुमार मिश्रा के पास पहुंची और उन्हें सिलसिलेवार सारी बात बता कर अपने आने का कारण स्पष्ट किया. अमिताभ ने वीरेंद्र मिश्रा को बताया कि एक युवती आकांक्षा शर्मा जोकि उन के साथ आए आयुष सत्यम की बड़ी बहन है, रहस्यमय तरीके से गायब है. उस के घर वालों ने 5 जनवरी को उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई है. उन लोगों ने उदयन दास नाम के एक युवक पर संदेह व्यक्त किया है. पश्चिम बंगाल की पुलिस टीम ने यह भी बताया कि आकांक्षा का मोबाइल चालू है और उस की लोकेशन भोपाल के साकेतनगर की आ रही है.

अमिताभ कुमार ने यह भी बताया कि 28 वर्षीय आकांक्षा ने जयपुर के नजदीक स्थित वनस्थली से एमएससी इलैक्ट्रौनिक्स से डिग्री ली थी. उस के पिता शिवेंद्र शर्मा यूनाइटेड बैंक औफ इंडिया में चीफ मैनेजर हैं. जून 2016 में आकांक्षा ने घर वालों को बताया था कि अमेरिका में उस की जौब लग गई है और वह अमेरिका जा रही है. पासपोर्ट बनवाने की बात कह कर वह दिल्ली चली गई थी. इस के पहले कुछ दिनों तक वह दिल्ली की एक कंपनी में नौकरी भी कर चुकी थी.

आजकल के युवाओं के लिए विदेश में नौकरी करना अब कोई बहुत बड़ी बात नहीं रह गई है. ज्यादातर अभिभावकों की तरफ से उन्हें कैरियर चुनने के मामले में छूट मिली होती है. 24 जून, 2016 को आकांक्षा नौकरी के लिए कथित रूप से न्यूयार्क चली गई थी. जुलाई तक तो वह फोन पर घर वालों से बातें करती रही, लेकिन फिर व्यस्तता का बहाना बना कर उन्हें टालने लगी थी. मोबाइल फोन पर घर वालों से उस की आखिरी बार बात 20 जुलाई को हुई थी.

इस के बाद आकांक्षा ने वायस काल करना बंद कर दिया और मैसेज के जरिए चैट करने लगी थी. इस से शिवेंद्र शर्मा को तसल्ली तो थी लेकिन पूरी तरह नहीं. उन्हें बेटी को ले कर कुछकुछ आशंकाएं भी होने लगी थीं. उन की परेशानी तब बढ़ी जब मैसेज के जरिए भी बात होना बंद हो गया. इस पर उन्होंने 5 जनवरी, 2016 को बांकुरा थाने में आकांक्षा की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवा दी.

दरअसल, बात उतनी मामूली भी नहीं थी, जितनी दिख रही थी. शिवेंद्र और उन का बेटा अपने स्तर पर आकांक्षा को ढूंढ रहे थे. जब कहीं से कोई सुराग नहीं मिला तो पुलिस ने अपनी साइबर सेल के जरिए आकांक्षा के मोबाइल फोन की लोकेशन ट्रेस की. पता चला उस के फोन की लोकेशन भोपाल की आ रही है.

इस के कुछ दिन पहले शिवेंद्र शर्मा एक उम्मीद ले कर भोपाल आए थे. मोबाइल फोन पर हुई बात के आधार पर वह उदयन के घर एमआईजी 62, सेक्टर-3ए, साकेतनगर, भोपाल पहुंचे और उस से आकांक्षा के बारे में पूछताछ की. उदयन को वह पहले से जानते थे क्योंकि वह आकांक्षा का खास दोस्त था.

उदयन ने यह तो नहीं कहा कि वह आकांक्षा को नहीं जानता, लेकिन गोलमोल बातें बना कर वह शिवेंद्र शर्मा को टरकाने में जरूर कामयाब रहा था. शिवेंद्र शर्मा को उदयन की बातों पर पूरी तरह विश्वास नहीं हुआ था, लेकिन वह कर ही क्या सकते थे.

शिवेंद्र शर्मा को मायूस लौटाने के बाद उदयन का माथा ठनकने लगा था. कुछ दिन बाद वह सीधे कोलकाता स्थित शिवेंद्र के घर जा पहुंचा और 2 दिन तक वहीं रुका. आकांक्षा के बारे में शिवेंद्र और उन की पत्नी शशिकला की चिंता का भागीदार बन कर उस ने उन्हें भरोसा दिलाया कि आकांक्षा चूंकि उस की अच्छी फ्रैंड है, इसलिए वह उसे ढूंढने में उन की हरसंभव मदद करेगा.

उसी दौरान शिवेंद्र ने यह महसूस किया कि उदयन असामान्य व्यवहार कर रहा है और उन के घर आने के बाद ठीक से सोया भी नहीं है. इस से उन का शक यकीन में बदल गया कि जरूर कोई गड़बड़ है. यह उन के लिए एक और संदिग्ध बात थी कि उदयन बेवजह शशिकला से जिद करता रहा था कि किचन में जा कर वह खुद चाय बनाएगा. जाहिर है सहज होने की कोशिश में उदयन कुछ ज्यादा ही असहज हो गया था. यह बात शर्मा दंपति से छिपी नहीं रह सकी थी.

खूबसूरत, बिंदास और महत्त्वाकांक्षी आकांक्षा और उदयन के इस कनेक्शन को ले कर बांकुरा और भोपाल पुलिस के बीच लंबी मंत्रणा हुई, जिस का निष्कर्ष यह निकला कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. इस गड़बड़ का पता लगाने के लिए पुलिस टीम ने जो योजना तैयार की, उस का पहला चरण उदयन के बारे में खुफिया तरीके से जानकारियां इकट्ठा करने के साथसाथ उस की निगरानी करना भी था.

31 जनवरी और 1 फरवरी को पुलिस टीम ने उदयन की रैकी की. इस कवायद में पुलिस को जो जानकारियां मिलीं, वे चौंका देने वाली थीं. उदयन अड़ोसपड़ोस में किसी से भी मिलताजुलता नहीं था. अलबत्ता वह बेहद विलासी जिंदगी जी रहा था. उस के पास महंगी कारें औडी और मर्सिडीज थीं. पुलिस वालों को उस की जिंदगी और हरकतें हद से ज्यादा रहस्यमय लगीं. साकेतनगर वाला मकान, जिस में वह रहता था, उस का नीचे का हिस्सा उस ने ब्रह्मकुमारी आश्रम को किराए पर दे रखा था.

इन 2 दिनों में वह अपनी एक गर्लफ्रैंड पूजा अटवानी के साथ ‘काबिल’ और ‘रईस’ फिल्में देखने सिनेमा हौल गया था. पुलिस वालों ने दोनों फिल्में उस के पीछे वाली सीट पर बैठ कर देखी थीं, जिस की उसे भनक तक नहीं लगी थी.

2 फरवरी को पुलिस वाले जब उस के घर पहुंचे तो ताला बाहर से बंद था, लेकिन उदयन अंदर मौजूद था. ताला बंद होने के बावजूद पुलिस वालों ने दरवाजा खटखटाया तो अंदर किसी के होने की आहट मिली.

किसी अनहोनी से बचने के लिए बांकुरा पुलिस टीम ने गोविंदपुरा थाने से भी पुलिस बुला ली. उदयन अंदर है, पुलिस यह जान चुकी थी. उसे पकड़ने के लिए गोविंदपुरा थाने के एएसआई सत्येंद्र सिंह कुशवाहा छत के रास्ते से हो कर नीचे गए और उदयन का हाथ पकड़ कर उस से मुख्य दरवाजा खुलवाया.

पुलिस टीम जब अंदर दाखिल हुई तो वहां का नजारा देख चौंकी. कमरों का इंटीरियर बहुत अच्छा था, हर कमरे में एलसीडी लगे थे पर पूरा घर अस्तव्यस्त पड़ा था. ऐसा लग रहा था जैसे वहां मुद्दत से साफसफाई नहीं की गई है. पुलिस ने उदयन से आकांक्षा के बारे में पूछा तो वह खामोश रहा.

पहली मंजिल पर चबूतरा बना देख पुलिस वालों का चौंकना स्वाभाविक था. कमरों में सिगरेट के टोंटे पड़े थे. साथ ही शराब की खाली बोतलें भी लुढ़की पड़ी थीं. सिगरेट के टोंटों की तादाद हजारों में थी. कुछ प्लेटों में बासी सब्जी व दाल पड़ी थी, जिन से बदबू आ रही थी.

जैसेजैसे पुलिस टीम घर को देख रही थी, वैसेवैसे रोमांच और उत्तेजना दोनों ही बढ़ती जा रही थीं. हर कमरे की दीवार पर लव नोट्स लिखे हुए थे, जिन में आकांक्षा के साथ बिताए लम्हों का जिक्र साफ दिखाई दे रहा था.

कुछ देर घर में घूमने के बाद पुलिस ने जब उदयन से दोबारा पूछा कि आकांक्षा कहां है तो उस ने बेहद सर्द आवाज में जवाब दिया, ‘‘मैं ने उस का कत्ल कर दिया है और वह इस चबूतरे के नीचे है.’’

मकसद में इतनी जल्दी और आसानी से कामयाबी मिल जाएगी, यह बात पुलिस टीम की उम्मीद से बाहर थी. एक बम सा फोड़ कर उदयन खामोश हो गया. उस के चेहरे पर कोई शिकन या घबराहट नहीं थी. आकांक्षा की हत्या कर के उदयन ने उस की लाश दफना दी थी, यह जान कर पुलिस वालों ने उस पर सवालों की झड़ी लगा दी. इस के बदले उदयन ने जो जवाब दिए, उन से सिलसिलेवार यह कहानी सामने आई.

दरअसल, आकांक्षा घर वालों से झूठ बोल कर उदयन के पास भोपाल आ गई थी. उदयन से उस की जानपहचान फेसबुक के जरिए 2007-08 में हुई थी. फेसबुक पर उदयन ने आकांक्षा को बताया था कि वह एक आईएफएस अधिकारी है. उस के पिता भेल भोपाल से रिटायर्ड अधिकारी हैं और इन दिनों वह रायपुर में खुद की फैक्ट्री चलाते हैं. मां रिटायर्ड डीएसपी हैं और अमेरिका में रह रही हैं. उदयन की रईसी, पद और पारिवारिक पृष्ठभूमि का आकांक्षा पर वाजिब असर पड़ा और दोनों की दोस्ती गहराने लगी.

इस के बाद दोनों दिल्ली और भोपाल में मिलने लगे. उदयन ने जो झूठ रौब झाड़ने की गरज से आकांक्षा से बोले थे, उन में से एक यह भी था कि वह भी अमेरिका में रहता है. इसलिए जब भी वे मिलते थे तो उदयन यही बताता था कि वह कुछ समय के लिए अमेरिका से आया है.

इश्क में अंधी आकांक्षा उस की हर बात बच्चों की तरह मान जाती थी. इस दरम्यान दोनों के बीच क्या और कैसी बातें हुईं, यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था. अलबत्ता यह जरूर था कि दोनों ही एकदूसरे का पहला प्यार नहीं थे.

बहरहाल, जून में जब आकांक्षा भोपाल आई तो उदयन ने उस से बरखेड़ा स्थित बंगाली समुदाय के मंदिर कालीबाड़ी में शादी कर ली. इस के बाद दोनों पतिपत्नी की तरह साकेतनगर में रहने लगे. आकांक्षा खुश थी, लेकिन उदयन की हिदायत पर अमल करते हुए वह पड़ोसियों से ज्यादा बातचीत नहीं करती थी. अलबत्ता एकदो धार्मिक आयोजनों में वह जरूर शामिल हुई थी.

यह बात गलत नहीं है कि एक झूठ को ढकने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं. उदयन ने तो आकांक्षा से शायद एक भी सच नहीं बोला था. उस ने आकांक्षा को न जाने कौन सी घुट्टी पिलाई थी जो वह चाबी वाले खिलौने की तरह उस पर भरोसा किए जा रही थी. लेकिन कहते हैं कि झूठ के पांव नहीं होते. जल्द ही आकांक्षा के सामने उदयन की असलियत उजागर होने लगी.

आकांक्षा ने कभी भी उदयन को अपने मांबाप से फोन तक पर बात करते नहीं देखा था. जब भी वह उन के बारे में पूछती थी या उदयन की गुजरी जिंदगी को कुरेदती थी तो वह चालाकी से उसे टाल जाता था. लेकिन उसे यह भी समझ में आने लगा था कि यह सब बहुत ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है. उस ने आकांक्षा से कहा कि अमेरिका में उस का मन नहीं लगता, इसलिए वह उस के साथ भोपाल में ही घर बसाना चाहता है. आकांक्षा इस के लिए भी तैयार हो गई.

दोनों का अफेयर 8 साल पुराना था लेकिन शादी और गृहस्थी की मियाद महीने भर ही रही. तब तक उदयन के काफी झूठ फरेब उजागर हो चुके थे. फिर भी आकांक्षा ने समझदारी दिखाते हुए उन से समझौता कर लिया था. वह एक भावुक स्वभाव वाली युवती थी, जो अपने प्रेमी की खातिर मांबाप से झूठ बोल कर आई थी.

इसी वजह से वह ज्यादा कलह कर के न तो खुद को जोखिम में डालना चाहती थी और न ही कोई फसाद खड़ा करना चाहती थी. बावजूद इस के दोनों में खटपट तो होने ही लगी थी. लेकिन दोनों ने इस की भनक मोहल्ले वालों को नहीं लगने दी थी.

थाने ला कर पुलिस ने जब उदयन से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था. उदयन और आकांक्षा के बीच 14 जुलाई, 2016 को जम कर कलह हुई थी, जिस की वजह थी उदयन के कई लड़कियों से जायजनाजायज संबंध.

यहां स्पष्ट कर दें कि दूध की धुली आकांक्षा भी नहीं थी. इस घटना के चंद दिन पहले आकांक्षा के एक पूर्व बौयफ्रैंड, जिस से वह अकसर फोन पर बात किया करती थी, ने उस के कुछ अश्लील फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिए थे. इसे ले कर उदयन के तनबदन में आग लग गई थी. उसे रहरह कर लग रहा था कि आकांक्षा के अपने एक्सबौयफ्रैंड से नाजायज संबंध भी थे और वह उस की आर्थिक मदद भी करती थी.

उस रात उदयन सोया नहीं, बल्कि जाग कर आकांक्षा की हत्या की साजिश रचता रहा. जबकि आकांक्षा लड़झगड़ कर सो गई थी. 15 जुलाई की सुबह लगभग 5 बजे एकाएक उदयन के सिर पर एक अजीब सा वहशीपन सवार हो गया. उस ने गहरी नींद में सो रही आकांक्षा का मुंह तकिए से दबा दिया. आकांक्षा कुछ देर छटपटाई और फिर उस का शरीर ढीला पड़ गया. हालांकि उदयन को तसल्ली हो गई थी कि वह मर चुकी है फिर भी उस ने कुछ मिनटों तक उस के चेहरे से तकिया नहीं हटाया.

कुछ देर बाद उदयन ने आकांक्षा के चेहरे से तकिया हटाया और दरिंदों की तरह उस का गला दबाने लगा, जिस से उस के गले की हड्डी टूट गई. आकांक्षा के मरने की पूरी तरह तसल्ली करने के बाद उदयन के सामने समस्या उस की लाश को ठिकाने लगाने की थी. लाश का चेहरा उस ने एक पौलीथिन से ढंक दिया था.

आकांक्षा की लाश को वह दूसरे कमरे में ले गया और उसे एक पुराने बक्से में डाल दिया. एक घंटे सुस्ताने और कुछ सोचने के बाद उदयन बाहर निकला और साकेतनगर की ही एक दुकान से शैलेष नाम के सीमेंट विक्रेता से 14 बोरी सीमेंट खरीद लाया. शैलेष ज्यादा सवाल या शक न करे, इसलिए उस ने उसे बताया था कि नईनई शादी हुई है, पत्नी के लिए बाथटब बनवाना है.

इस के बाद उदयन ने रवि नाम के मिस्त्री को बुलाया, जिस से उस की पुरानी पहचान थी. रवि को उस ने यह कह कर कमरे में चबूतरा बनाने को कहा कि वह उस के ऊपर मंदिर बनवाएगा. चबूतरा बनते समय उदयन ने आधा काम खुद किया. थोड़ी देर के लिए रवि को इधरउधर कर के उस ने लाश वाला बक्सा चबूतरे के नीचे बने गड्ढे में डाला और ऊपर से खुद चिनाई कर दी रवि को इस की भनक भी नहीं लगी. वैसे भी एक मामूली काम के एवज में उसे खासी मजदूरी मिल रही थी, इसलिए उस ने उदयन के इस विचित्र व्यवहार पर गौर नहीं किया.

चबूतरा बना कर उदयन ने उस पर पलस्तर कर दिया और खूबसूरती बढ़ाने के लिए उस पर मार्बल भी लगवा दिया. यह उस के अंदर की ग्लानि थी, डर था या आकांक्षा के प्रति नफरत कि वह अकसर इस चबूतरे पर बैठ कर सुबहसुबह ध्यान लगाता था.

आकांक्षा की लाश निकालने वाली पुलिस टीम ने चबूतरा खोदना शुरू किया तो 7 महीने पुरानी लाश को बाहर निकालने में उसे 7 घंटे पसीना बहाना पड़ा. खुदाई के लिए बाहर से मजदूर बुलाए गए, जिन्होंने सब से पहले मार्बल तोड़ा लेकिन उन के गैंती, फावड़े जैसे मामूली औजार इस चबूतरे को नहीं खोद  पाए तो ड्रिल मशीन मंगानी पड़ी. चबूतरा इतना मजबूत था कि खुदाई करने के दौरान एक ड्रिल मशीन भी टूट गई. उस की जगह दूसरी ड्रिल मशीन मंगानी पड़ी.

जैसेतैसे आकांक्षा की लाश वाला बक्सा बाहर निकाला गया. जब लाश बाहर निकली तो वहां मौजूद पुलिस वाले फिर सकते में आ गए. संदूक में लाश का अस्थिपंजर मिला, जिन्हें पोस्टमार्टम और फिर डीएनए जांच के लिए भेज दिया गया. प्रतीकात्मक तौर पर आकांक्षा का अंतिम संस्कार आयुष और उस के परिजनों ने भोपाल में ही कर दिया, जिस में शामिल होने के लिए उस के मातापिता नहीं आए.

इस जघन्य हत्याकांड की खबर देश भर में फैल गई. जिस ने भी सुना, उस ने उदयन को साइको कहा. पर उस के चेहरे पर पसरी बेफिक्री और बेशरमी वे पुलिस वाले ही देख पाए जो उसे ट्रांजिट रिमांड के लिए अदालत ले गए थे. इस के बाद रिमांड अवधि में शुरू हुई 32 वर्षीय उदयन दास और उस से जुड़ी दूसरी जानकारियां जुटाने की कवायद, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि उसे साइको किलर बेवजह नहीं कहा जा रहा.

उदयन के पड़ोसियों की नजर में वह अजीबोगरीब यानी असामान्य व्यक्ति था, जो खुद को दुनिया से छिपा कर रखना चाहता था. दरअसल, वह अपनी बुनी एक काल्पनिक दुनिया में रहता था और उसे ही सच मान बैठा था. यानी व्यवहारिकता से उस का कोई सरोकार नहीं रह गया था. सुबहसुबह जब साकेतनगर में रहने वाले संभ्रांत और धनाढ्य लोगों के घरों से नाश्ता बनने की खुशबू आती थी, तब उदयन के घर से गांजे की गंध आ रही होती थी.

उदयन की कोई नियमित या तयशुदा दिनचर्या नहीं थी. वह अकसर शराब के नशे में धुत रहता था. पड़ोसियों के लिए वह एक रहस्य था. कभीकभार बात भी करता था तो खुद को इंटेलीजेंस ब्यूरो का अफसर बताता था. साथ ही जल्द ही अमेरिका शिफ्ट होने की बात भी करता था.

वह ऐसा शायद इसलिए करता था कि लोग उस की शाही जिंदगी के बारे में ज्यादा सिर न खपाएं. महंगी कारों का मालिक उदयन कभीकभार आटोरिक्शा में भी आताजाता दिखता था और रिक्शाचालक को 25-30 रुपए की जगह 500 रुपए थमा दिया करता था. नजदीक की दुकान से वह मैगी दूध बिस्किट जैसे आइटम लाता रहता था और दुकानदार को एकमुश्त भुगतान करता था.

पुलिस वालों ने जब उस के मांबाप के बारे में पूछा तो वह खामोश रहा. इस खामोशी में एक और तूफान छिपा हुआ था. आकांक्षा के कत्ल और लाश बरामदगी में उलझी पुलिस को इतना ही पता चला था कि उदयन के पिता का नाम बी.के. दास है और वे भोपाल के भेल के रिटायर्ड अफसर हैं और मां इंद्राणी भी सरकारी कर्मचारी रह चुकी हैं.

जब आकांक्षा की लाश बरामद हो गई और उदयन ने जुर्म कबूल लिया तो पुलिस का ध्यान उदयन से जुड़ी दूसरी बातों पर गया. काफी बवंडर मच जाने के बाद भी उस का कोई हमदर्द या दोस्त तो क्या कोई सगासंबंधी भी सामने नहीं आया, यह एक हैरानी की बात थी.

रिमांड पर लेने के बाद पुलिस ने जब सख्ती बरती तो उदयन बारबार बयान बदलता रहा. जब उस के दिल्ली आईआईटी से पढ़ने की बात भी झूठी निकली तो पुलिस वालों का माथा ठनका कि यह हत्यारा पागल ही नहीं बल्कि शातिर भी है. जब उस के मांबाप के फोन नंबर मांगे गए तो पहले तो वह मुकर गया कि उन के नंबर उस के पास नहीं हैं. लेकिन फिर दबाव पड़ने पर उस ने मां इंद्राणी का एक नंबर दिया जो बंद जा रहा था.

2 मकानों के किराए और मां की पेंशन से रईसी से जिंदगी गुजारने वाला उदयन कह रहा था कि उस की मां अमेरिका में है. लेकिन अब उस की बातें बयान और चेहरा साफसाफ चुगली कर रहे थे कि वह झूठ बोल रहा है. लिहाजा पुलिस ने उस के साथ सख्ती की, जो कामयाब रही.

उस की मां इंद्राणी दास डीएसपी नहीं थी, जैसा कि उस ने आकांक्षा और पड़ोसियों को बताया था. उस की मां भोपाल में सांख्यिकी विभाग में अधिकारी थीं और शिवाजीनगर के जी टाइप सरकारी क्वार्टर 122/43 में रहती थीं. पति के रायपुर शिफ्ट होने के बाद वह भी उन के साथ रायपुर चली गई थीं.

दरअसल, उदयन की कोशिश यह थी कि पुलिस वालों का ध्यान और काररवाई आकांक्षा के कत्ल में ही उलझ कर रह जाए. कह सकते हैं कि यह अहसास या उम्मीद इस चालाक कातिल को थी कि उसे आकांक्षा का हत्यारा साबित करना कानूनन उतना आसान काम नहीं है, जितना कि दिख रहा है.

गलत नहीं कहा जाता कि पुलिस की मार पत्थरों से भी मुंह खुलवा देती है, फिर उदयन साइको या शातिर ही सही था तो हाड़मांस का पुतला ही, जो 48 घंटे में ही टूट गया. इस के बाद सामने आई एक और कहानी, जिसे सुन कर पुलिस वालों के भी तिरपन कांप उठे. अब तक देश भर की दिलचस्पी इस साइको किलर में और बढ़ गई थी, जिस के कारनामों से अखबार भरे पड़े थे. जबकि न्यूज चैनल्स का तो वह हीरो बन गया था. 8 नवंबर को नोटबंदी के बाद यह दूसरी घटना थी, जिस पर आम लोग तरहतरह से अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे थे.

4 फरवरी को उदयन ने न केवल मान लिया बल्कि बता भी दिया कि उस ने अपने मांबाप की भी हत्या की थी और उन्हें रायपुर वाले घर के लौन में दफना दिया था. यानी रिश्तों की कब्र खोदने की उस की सनक या बीमारी काफी पुरानी थी. बहरहाल, फिर से एक नई कहानी इस तरह उभर कर सामने आई.

उदयन अपने मांबाप का एकलौता बेटा था. चूंकि मांबाप दोनों कामकाजी थे, इसलिए उसे कम ही वक्त दे पाते थे. बचपन से ही वह उद्दंड प्रवृत्ति का था. शुरुआती पढ़ाई के लिए उसे भोपाल के नामी सेंट जोसेफ को-एड स्कूल में दाखिला दिलाया गया था.

पढ़ाईलिखाई में उस का मन नहीं लगता था और वह अकसर अकेले रहना पसंद करता था. ये वे समस्याएं थीं जो आमतौर पर उन कामकाजी अभिभावकों के बच्चों के सामने पेश आती हैं, जिन्हें पैसों की कोई कमी नहीं होती. उदयन जब सातवीं कक्षा में था तब उस ने स्कूल में दीवार पर मारमार कर एक सहपाठी का सिर फोड़ दिया था, जिस की वजह से उसे स्कूल से निकाल दिया गया था.

संभ्रांत बंगाली दास परिवार जहांजहां भी रहा, लोगों से कटा ही रहा. इधर उदयन की शैतानियां इतनी बढ़ गई थीं कि मांबाप उसे पारिवारिक समारोहों में भी नहीं ले जाते थे. वे लोग उसे काबू में रखने के लिए बातबात पर डांटतेडपटते रहते थे.

मेरे मांबाप हिटलर सरीखे थे, अपनी कहानी सुनाते हुए उस ने यह बात जोर दे कर पुलिस को बताई. उदयन के हिंसक और असामान्य व्यवहार के बावजूद उस के पिता बी.के. दास की इच्छा थी कि बेटा गणित पढ़े और इंजीनियर बने. लेकिन बेटे की इस मनोदशा को वे नहीं समझ पाए थे कि वह उन से मरनेमारने की हद तक नफरत करने लगा है.

भोपाल से रिटायर होने के बाद बी.के. दास ने रायपुर में अपनी खुद की फैक्ट्री खोल ली थी. अपने सेवाकाल के दौरान दोहरी कमाई के चलते वे खासी जायदाद बना चुके थे. यानी वे एक अच्छे निवेशक जरूर थे पर अच्छे पिता नहीं बन पाए थे. रायपुर के पौश इलाके सुंदरनगर में एनसीसी औफिस के पास भी उन्होंने पत्नी के नाम से एक शानदार मकान बनवाया था और वहीं रहने लगे थे. उदयन का दाखिला भी उन्होंने वहीं के एक स्कूल में करा दिया था. जैसेतैसे 12वीं पास करने के बाद उदयन का दाखिला एक प्राइवेट कालेज में करा दिया गया.

उदयन ने कभी अपने कैरियर और जिंदगी के बारे में नहीं सोचा. उलटे कालेज में आ कर वह नशे का भी आदी हो गया था. यहां भी उस का कोई दोस्त नहीं था और मातापिता भी किसी से संपर्क नहीं रखते थे. यानी पूरा परिवार एकाकी जीवन जीने का आदी हो चला था.

पढ़ाई के बारे में पूछने पर वह मातापिता से साफ झूठ बोल जाता था. जब पढ़ाई खत्म होने का वक्त आया तो उस ने घर में झूठ बोल दिया कि उसे डिग्री मिल गई है. डिग्री मिल गई तो कहीं नौकरी करो, पिता के यह कहने पर उदयन को लगने लगा कि पढ़ाई का झूठ अब छिपने वाला नहीं है. मांबाप नहीं मानेंगे, यह सोच कर उदयन ने एक खतरनाक फैसला ले लिया. उस ने सोच लिया कि क्यों न मांबाप दोनों को ठिकाने लगा दिया जाए, फिर कोई रोकनेटोकने नहीं वाला होगा. करोड़ों की जायदाद व दौलत भी उस की हो जाएगी. उस ने ऐसा ही किया भी.

मांबाप के कत्ल की ठीक तारीख तो उदयन नहीं बता पाया, पर उस ने बताया कि यह कोई 5-6 साल पहले की बात है. उस दिन बारिश हो रही थी. पापा चिकन लेने बाजार गए थे और मम्मी कमरे में अलमारी में कपड़े रख रही थीं. हत्या के 2 हफ्ते पहले उस ने एक इंगलिश चैनल पर ‘वाकिंग डैथ’ नामक सीरियल देख कर मातापिता की हत्या की योजना बनाई थी. हत्या के दिन उदयन ने सुंदरनगर के ही गायत्री मैडिकल स्टोर्स से नींद की गोलियां खरीद ली थीं.

अलमारी में कपड़े सहेज कर रखती इंद्राणी को उदयन ने धक्का दे कर पलंग पर ढकेल दिया. इंद्राणी की बूढ़ी हड्डियों में दम नहीं था, वह अपने हट्टेकट्टे बेटे का ज्यादा विरोध नहीं कर पाईं. कुछ ही देर में उदयन ने उन का गला घोंट दिया.

लगभग आधे घंटे बाद बी.के. दास चिकन ले कर घर आए और इंद्राणी के बारे में पूछा तो उदयन ने सहज भाव से उन्हें बताया कि मां ऊपर कपड़े रख रही हैं. इस बात से संतुष्ट हो कर उन्होंने उदयन से चाय बनाने को कहा तो वह चाय बना लाया और उन के कप में नींद की 5 गोलियां मिला दीं.

चाय पीने के बाद बी.के. दास नींद की आगोश में चले गए तो उदयन ने उन की गला घोंट कर हत्या कर दी. अब समस्या लाशों को ठिकाने लगाने की थी. उन दिनों सुंदरनगर इलाके में कंस्ट्रक्शन का काम जोरों पर चल रहा था. उदयन ने बगल में काम करने वाले एक मजदूर को बुलाया और लौन के दोनों कोनों में गड्ढे खुदवा लिए. देर रात उस ने अपने जन्मदाताओं की लाशें घसीट कर गड्डों में डालीं और उन्हें हमेशा के लिए दफना दिया.

इस के बाद किसी ने बी.के. दास और उन की पत्नी इंद्राणी दास को नहीं देखा और न ही उन के बारे में कोई पूछने वाला था. उदयन की मौसी प्रिया चटर्जी ने जरूर एकाध बार उस के घर आ कर पूछा तो उदयन ने उन्हें टरकाऊ जवाब दे दिया.

भोपाल पुलिस उदयन को ले कर राजधानी एक्सप्रैस से 6 फरवरी को करीब 11 बजे रायपुर पहुंची और सुंदरनगर जा कर उस लौन की खुदाई शुरू करवा दी, जहां उदयन ने अपने मांबाप की कब्र बनाई थी. 3 घंटे की खुदाई के बाद लगभग 6 फुट नीचे से दोनों की खोपडि़यां निकलीं. साथ ही इंद्राणी के कपड़े, सोने की 4 चूडि़यां, चेन, एक ताबीज और बी.के. दास की पैंटशर्ट, बेल्ट और ताबीज भी कब्रों से मिले.

इस बंगले के मौजूदा मालिक हरीश पांडेय हैं, जो खुदाई होते वक्त वहां मौजूद थे. उन्होंने यह मकान उदयन से सुरेंद्र दुआ नाम के ब्रोकर के जरिए खरीदा था. 1800 वर्गफीट पर बने इस मकान का सौदा 30 लाख रुपए में हुआ था जोकि उन्हें सस्ता लगा था. हरीश ने जब यह मकान खरीदा था तब यहां बगीचा नहीं था, बल्कि खाली जमीन थी, जिस पर उन्होंने काली मिट्टी डाल कर गार्डन बनवा लिया था. उस वक्त उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उदयन के मांबाप की कब्रें यहां बनी हुई हैं.

दोपहर ढाई बजे तक खुदाई का काम पूरा हो गया और सारे सबूत मिल गए. रायपुर पुलिस ने उदयन के खिलाफ मांबाप की हत्या का मामला दर्ज कर लिया. उदयन अब चर्चा के साथसाथ शोध का भी विषय बन गया था. 3 राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल की पुलिस ने उस के खिलाफ हत्या, अपहरण व धोखाधड़ी जैसे दरजन भर मामले दर्ज किए हैं. रायपुर से उसे बांकुरा पुलिस बंगाल ले गई, फिर उसे वापस रायपुर लाया गया. जाहिर है, सब कुछ साफ होने तक उदयन रिमांड पर भोपाल, रायपुर और कोलकाता के बीच झूलता रहेगा.

7 फरवरी को जब उसे बांकुरा पुलिस ने सीजेएम अरुण कुमार नंदी की अदालत में पेश किया गया तो वहां गणतंत्र समनाधिकार नारी मुक्ति ने विरोध प्रदर्शन करते हुए उस पर पत्थर बरसाए. उदयन की कहानी खत्म सी हो गई है, पर जिज्ञासाएं और सवाल अभी भी बाकी हैं, जिन में से कुछ के जवाब मिल गए हैं और कुछ के मिलना शेष हैं.

अपनी मां इंद्राणी का मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने के लिए उस ने 8 फरवरी, 2013 को इटारसी नगर पालिका में रजिस्ट्रेशन फार्म भरा था. इस में उस ने मां की मौत 3 फरवरी, 2013 को 66 वर्ष की उम्र में होना लिखा था. इंद्राणी का स्थाई पता उस ने रायपुर का ही लिखाया था और अस्थाई पता द्वारा हेलिना दास, गांधीनगर, इटारसी लिखवाया था. इस आधार पर उसे इंद्राणी का डेथ सर्टिफिकेट मिल गया था जबकि पिता बी.के. दास का मृत्यु प्रमाणपत्र उस ने इंदौर जा कर बनवाया था.

जल्द ही साबित हो गया कि उदयन अव्वल दरजे का खुराफाती और चालाक शख्स भी था जो संयुक्त खाते से अपनी मां की पेंशन निकाल रहा था. इस बारे में फेडरल बैंक के कुछ अधिकारी शक के दायरे में हैं. इंद्राणी पेंशनभोगी कर्मचारी थीं. हर पेंशनभोगी को साल में एक बार अपने जीवित होने का प्रमाणपत्र बैंक को देना होता है. आमतौर पर पेंशनधारी खुद बैंक जा कर अपने जीवित होने का प्रमाण दे कर आते हैं.

अस्वस्थता, नि:शक्तता या किसी दूसरी वजह से बैंक जाने में असमर्थ पेंशनर्स को डाक्टरी हेल्थ सर्टिफिकेट देना पड़ता है. कैसे हर साल उदयन अपनी मां के जीवित होने का प्रमाणपत्र बैंक को दे रहा था, यह गुत्थी अभी पूरी तरह नहीं सुलझी है. लेकिन साफ दिख रहा है कि उदयन से किसी बैंक कर्मचारी की मिलीभगत थी.

हालांकि जनवरी 2012 में उस ने मां के जीवित होने का प्रमाण पत्र डिफेंस कालोनी, दिल्ली के डाक्टर एस.के. सूरी से लिया था, जिस की जांच ये पंक्तियां लिखे जाने तक चल रही थीं. अगर शुरू में ही फेडरल बैंक कर्मचारियों ने सख्ती बरती होती तो इंद्राणी की मौत का राज वक्त रहते खुल जाता.

सब कुछ साफ होने के बाद यह भी उजागर हुआ कि उदयन मांबाप की हत्या के बाद अय्याश हो गया था. नशे के साथसाथ उसे अलगअलग लड़कियों से सैक्स करने की लत भी लग गई थी. अपनी हवस बुझाने के लिए वह कालगर्ल्स के पास भी जाता था या फिर उन्हें होटलों में बुला कर ऐश करता था. फेसबुक पर उस के सौ से भी ज्यादा एकाउंट थे, जिन की प्रोफाइल में खुद को वह बड़ा कारोबारी बता कर लड़कियों को फांसता था.

उदयन की एकदो नहीं, बल्कि 40 गर्लफ्रैंड थीं जो उस की हवस पूरी करने के काम आती थीं. इन में कई अच्छे घरों की लड़कियां भी शामिल थीं.

उदयन का प्यार दिखावा भर होता था. साल छह महीने में ही एक लड़की से उस का जी भर जाता था और उसे वह बासी लगने लगती थी. फिर किसी न किसी बहाने वह उसे छोड़ देता था. अभी तक 14 ऐसी लड़कियों की पहचान हो चुकी है, जिन के उदयन के साथ अंतरंग संबंध थे. 2 गायब युवतियों को पुलिस ढूंढ रही है, शक यह है कि कहीं उदयन ने इसी तर्ज पर और भी कत्ल तो नहीं किए.

शराब और ड्रग्स के आदी उदयन ने मांबाप का पैसा जम कर अय्याशियों में उड़ाया. ऐसा मामला पहले न मनोवैज्ञानिकों ने देखा है, न ही वकीलों ने और न ही उन पुलिस वालों ने जिन का वास्ता कई अनूठे अपराधियों से पड़ता है. सब के सब उदयन दास की हकीकत जान कर हैरान हैं.

दास दंपति ने हाड़तोड़ मेहनत कर के जो पैसा कमाया था. शायद यह सोच कर कि बुढ़ापा आराम से बेटेबहू और पोते के साथ गुजरेगा. लेकिन उसी बेटे ने उन का बेरहमी से अर्पणतर्पण कर डाला और उन की अस्थियां तक लेने से मना कर दिया.

उदयन की परवरिश का मामला एक गंभीर विषय है जिस पर काफी सोचसमझ कर बोलने और सोचने की जरूरत है, क्योंकि हत्या जैसे संगीन जुर्म की वजह बचपन के एकाकीपन, किशोरावस्था की हिंसा और युवावस्था की क्रूरता को नहीं ठहराया जा सकता.

बंदूक के दम पर तेजी से बढ़ते अपराध

उत्तर प्रदेश के आगरा में एक मेला लगा था. मेले में डांस दिखाने वाला आरकेस्ट्रा चल रहा था. मंच पर तमाम डांसर नाच रही थीं. कम कपड़ों में डांस करती डांसर फिल्म ‘बुलेट राजा’ के गाने ‘तमंचे पे डिस्को…’ पर डांस कर रही थीं. इस बीच वहां डांस देख रहा एक बाहुबली मंच पर चढ़ गया. उस ने अपनी जेब से पिस्तौल निकाली और एक डांसर की कमर पर लगा दी. वह बाहुबली अपने दूसरे हाथ में पैसे भी लिए हुए था. डांसर की नजर उस के पैसों पर थी. डांसर पैसे लेने के चक्कर में पिस्तौल पर ठुमके लगा रही थी. पैसे की छीनाझपटी के बीच कब पिस्तौल से गोली चल गई, पता ही नहीं चला. वह गोली डांस देख रहे एक आदमी को लग गई. वह आदमी वहीं मर गया. यह इस तरह की अकेली वारदात नहीं है.

वाराणसी जिले में नौटंकी में एक लड़की ‘नथनिया पर गोली मारे सैयां हमार…’ गाने पर डांस कर रही थी. उस के डांस को देख कर वहां मौजूद एक दारोगा तैश में आ गया. उस ने अपनी जेब से पिस्तौल निकाल ली और डांसर के साथ डांस करना शुरू कर दिया.

नशे में धुत्त उस दारोगा को एहसास ही नहीं था कि उस से क्या गलती होने जा रही है. पिस्तौल से गोली चला कर वह नचनिया पर निशाना लगाने लगा. उस का निशाना चूक गया, जिस से डांसर घायल हो गई. अगर निशाना सही लग जाता, तो वह मर जाती.

लखनऊ शहर में एक कारोबारी परिवार में शादी की पार्टी चल रही थी. जब जयमाल हो गया, तो नातेरिश्तेदारों में से कुछ लोगों ने खुशी में बंदूक से गोली चलानी शुरू कर दी. गलती से एक गोली दूल्हे के भाई को लग गई, जिस से वह शादी के उसी मंडप में मर गया.

खुशी में होने वाली इस तरह की तमाम फायरिंग पीडि़त परिवार पर गम का पहाड़ तोड़ देती है.

शादी के अलावा जन्मदिन, बच्चा होने, मुंडन और दूसरे तमाम संस्कारों पर खुशी में फायरिंग का रिवाज होता है. ऐसे में तमाम घटनाएं घट जाती हैं, जो दुख की वजह बनती हैं.

लाइसैंसी असलहे का एक सच यह भी सामने आता है कि ये अपनी हिफाजत से कहीं ज्यादा खुदकुशी करने में इस्तेमाल होते हैं. पुलिस महकमे के आंकड़े बताते हैं कि बंदूक से होने वाली खुदकुशी में 95 फीसदी वारदातें लाइसैंसी असलहे से ही होती हैं.

लखनऊ में ही एक दारोगा की बेटी ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई में फेल होने के बाद पिता की लाइसैंसी रिवौल्वर से गोली मार कर खुदकुशी कर ली. एक रिटायर अफसर ने तनाव में आने के बाद अपनी लाइसैंसी राइफल से खुद को खत्म कर लिया.

ऐसी तमाम वारदातें रोज रोशनी में आती हैं, जहां पर बंदूक संस्कृति अपराध को बढ़ाने का काम करती है. असलहे की यह संस्कृति आम लोगों में दहशत फैलाने का काम भी करती है. बंदूक के बल पर केवल लूट और डकैती ही नहीं, बल्कि बलात्कार जैसे अपराध भी होते हैं.

1. दहशत में शहरी

लखनऊ के विकास नगर महल्ले में माफिया मुन्ना बजरंगी के रिश्तेदार रहते हैं. मुन्ना बजरंगी उत्तर प्रदेश के झांसी जेल में बंद है. जब वह पुलिस की निगरानी में अपने रिश्तेदार से मिलने आया, तो असलहे से लैस उस के समर्थक किसी कमांडो की तरह महल्ले की गलियों में फैल गए. किसी के हाथ में सिंगल बंदूक, तो किसी के हाथ में डबल बैरल रिपीटर बंदूक थी.

ज्यादातर लोगों के पास अंगरेजी राइफल थी. राइफल के साथ ये लोग कारतूस से भरे बैग भी अपने हाथों में लटकाए थे. कई लोगों के पास कमर में लगी पिस्टल भी देखी जा सकती थी.

मुन्ना बजरंगी 3 दिन के पैरोल पर झांसी जेल से बाहर आया था. उस के एक रिश्तेदार की मौत हो गई थी, जिस के परिवार से वह मिलने आया था. मुन्ना बजरंगी को पुलिस एक बुलेटप्रूफ वैन से लाई थी.

लखनऊ के विकास नगर महल्ले में रहने वालों ने पहली बार किसी के साथ बंदूकों का इतना बड़ा जखीरा देखा था. इस के कुछ दिन पहले ही एक और माफिया ब्रजेश सिंह उत्तर प्रदेश विधानपरिषद का चुनाव जीत कर जब शपथ ग्रहण करने लखनऊ विधानसभा पहुंचा था, तो उस के साथ भी बंदूकों का ऐसा ही जलजला देखा गया था.

उत्तर प्रदेश में बाहुबलियों की पसंद रेलवे ठेकेदारी है. आंकडे़ बताते हैं कि साल 1991 से साल 2016 के बीच लखनऊ में रेलवे का ठेका हासिल करने में 12 ठेकेदारों की हत्या हो चुकी है. 1999 के बाद इस में कुछ कमी आई, पर 18 मार्च, 2016 को उत्तर रेलवे में ठेकेदारी विवाद में आशीष पांडेय की हत्या कर दी गई. यह विवाद एक करोड़ रुपए के ठेके को ले कर हुआ था.

लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 6 पर वाशेबल एप्रैल लगाने का काम होना था. आशीष पांडेय अपने साथियों के साथ यह ठेका हासिल करने आया था. ठेका लेने आए दूसरे गुट के लोगों को जब टैंडर डालने से रोका जाने लगा, तो संघर्ष शुरू हुआ और यह वारदात हो गई.

आशीष पांडेय हरदोई जिले का रहने वाला था. वह एक मामले में पहले भी जेलजा चुका था.

उत्तर प्रदेश सब से ज्यादा बंदूक रखने वाले राज्यों में शामिल है. साल 2012 से साल 2015 के बीच देश में 47 फीसदी बंदूकें जब्त की गईं, जिन की तादाद 16,925 रही. बंदूकों के जब्त होने के मामले में उत्तर प्रदेश सब से आगे है. यहां तकरीबन 7 फीसदी बंदूकें जब्त की गईं. इन की कुल तादाद 2,283 रही.

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर को भारत की गन कैपिटल कहा जाता है. यहां बंदूक बेचने की सब से ज्यादा दुकानें हैं. उत्तर प्रदेश के बाद बिहार, पश्चिम बंगाल, जम्मूकश्मीर, असम, महाराष्ट्र, मणिपुर, हरियाणा और झारखंड का नंबर आता है. यही वजह है कि इन राज्यों में बंदूक से होने वाले अपराध सब से ज्यादा होते हैं.

इन प्रदेशों में जब लोकल लैवल पर हिंसा होती है, तो वहां पर सब से ज्यादा इस तरह की बंदूकों का इस्तेमाल होता है. चुनावों के समय यहां होने वाली हिंसा में भी गैरलाइसैंसी बंदूकों का इस्तेमाल सब से ज्यादा होता है. केवल दुश्मनी निकालने में ही नहीं, बल्कि खुशी के समय पर भी होने वाली फायरिंग में तमाम बार जान चले जाने की वारदातें होती हैं.

2. अपराध हैं ज्यादा

बंदूक को अपनी हिफाजत के लिए रखा जाता है. असल बात यह है कि बंदूक अपनी हिफाजत से ज्यादा दहशत फैलाने और समाज में अपराध को बढ़ावा देने में काम आती है. बंदूक रखना अपने दबदबे को बनाए रखने का आसान तरीका हो गया है.

भारत में कितनी बंदूकें हैं, इस बात का कोई आधिकारिक आंकड़ा सरकार के पास नहीं है. अपराध के आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि देश में लाइसैंसी बंदूकों से ज्यादा गैरलाइसैंसी बंदूकें हैं.

बंदूकों से होने वाली हत्याओं को देखें, तो पता चलता है कि 90 फीसदी हत्याओं में गैरलाइसैंसी बंदूकों का इस्तेमाल होता है. चुनावी हिंसा में सब से ज्यादा बंदूकों का इस्तेमाल होता है.

चुनाव को करीब से देखने वाले कहते हैं कि चुनावों में बूथ कैप्चरिंग और वोट न डालने देने की वारदातों में बंदूकों का जम कर इस्तेमाल होता है. छोटेबडे़ पंचायत चुनावों से ले कर लोकसभा चुनावों तक में बहुत सारे पुलिस इंतजाम के बाद भी बंदूक का जोर देखने को मिलता है.

इन चुनावों में हिंसक वारदातें होती रहती हैं. इन को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने चुनावों के समय बंदूकों को जमा कराने की मुश्किल भी शुरू की. लाइसैंसी बंदूकों के जमा होने के बाद भी चुनावी हिंसा की वारदातों से पता चलता है कि देश में लाइसैंसी हथियार से ज्यादा गैरलाइसैंसी हथियार हैं.

देश में फैक्टरी मेड और हैंडमेड हर तरह के असलहे मिलते हैं. इन का इस्तेमाल ऐसे ही अपराधों में किया जाता है. देश में बढ़ती बंदूक संस्कृति ने ही नक्सलवाद और आतंकवाद को बढ़ाने का काम किया है.

3. गैरलाइसैंसी हथियार ज्यादा

देश में लाइसैंसी से ज्यादा गैरलाइसैंसी हथियार जमा हो रहे हैं. लाइसैंसी हथियार लेने के लिए सरकारी सिस्टम से गुजरना पड़ता है. पुलिस से ले कर जिला प्रशासन तक की जांच से गुजरने के बाद बंदूक रखने का लाइसैंस मिलता है.

कई तरह के असलहे रखने के लिए शासन लैवल से मंजूरी लेनी पड़ती है. इस सिस्टम में बहुत सारा पैसा रिश्वत और सिफारिश में खर्च हो जाता है.

हर जिलाधिकारी के पास सैकड़ों की तादाद में लाइसैंस लेने के लिए भेजे गए आवेदन फाइलों में धूल खाते हैं. ऐसे में अपराध करने वाले लोग गैरकानूनी असलहे रखने लगते हैं.

आकंड़ों के मुताबिक, देश में साल 2012 से साल 2015 के बीच 4 सालों में 36 हजार से ज्यादा गैरकानूनी असलहे पकडे़ गए. साल 2009 से ले कर 2013 बीच 15 हजार से ज्यादा मौतें गैरकानूनी असलहों से हुईं. पुलिस महकमे से जुडे़ लोगों का मानना है कि कई ऐसे परिवार हैं, जहां पीढ़ी दर पीढ़ी केवल बंदूक बनाने का ही काम होता है.

उत्तर प्रदेश का पश्चिमी हिस्सा इस तरह की फैक्टरी चलाने वाला सब से बड़ा इलाका है. मध्य उत्तर प्रदेश में हरदोई सब से बड़ा जिला है, जहां हर तरह की ऐसी बंदूकें बनाई जाती हैं, जैसी ओरिजनल बनती हैं. इन को भ्रष्ट पुलिस की मिलीभगत से खरीदाबेचा जाता है.

दरअसल, गैरकानूनी असलहे को खरीदने और बेचने का एक बड़ा कारोबार है. इस के जरीए करोड़ों रुपयों की रकम इधर से उधर होती है. 3 हजार से ले कर 50 हजार रुपए तक के असलहे इन गैरकानूनी फैक्टरियों में बनते और बिकते हैं. उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में जितने हथियार एक जिले में हैं, उतने किसी बाहरी देश में नहीं हैं.

साल 2011 के एक सर्वे में बताया गया कि भारत के 671 जिलों में से केवल 324 जिलों में 4 करोड़ लोगों के पास हथियार पाए गए. इन में से केवल 15 फीसदी लोगों के पास लाइसैंसी हथियार थे. बंदूक से होने वाली मौतों के मामले में 5 शहरों में से 4 शहर मेरठ, इलाहाबाद, वाराणसी और कानपुर उत्तर प्रदेश के हैं.

उत्तर प्रदेश के बाद बिहार सब से ज्यादा असलहे वाला प्रदेश है. गैरकानूनी असलहे का इस्तेमाल सब से ज्यादा बाहुबली और दबंग अपने दबदबे को बढ़ाने के लिए करते हैं. इस से ही वह अपना असर बढ़ाने का काम करते हैं.

समाज में अपराध को रोकने के लिए बंदूक संस्कृति पर रोक लगाने की जरूरत है. यह काम केवल लाइसैंस सिस्टम से काबू में आने वाला नहीं है. ऐसे में जरूरी है कि कुछ नया सिस्टम लागू किया जाए, जिस से समाज में बढ़ती बंदूक संस्कृति को रोका जा सके.

4. ‘बंदूक कल्चर’ पर फिल्मों का असर

आज तमाम फिल्में ऐसी बनती हैं, जिन में बंदूक संस्कृति को ग्लैमर की तरह पेश किया जाता है. बंदूक के बल पर अपराधियों को ऐश करते दिखाया जाता है. इस को देख कर आम जिंदगी में भी लोग बंदूक संस्कृति को बढ़ाने में लग जाते हैं. इस के अलावा आम लोगों में दिखावे की सोच बढ़ रही है, जिस से वे बंदूक खरीदना चाहते हैं.

शहरों से कहीं ज्यादा गांवों में यह चलन बढ़ रहा है. गांवों में जमीन बेच कर बंदूक खरीदने का चलन है. यहां पर लोग अपने दबदबे को बढ़ाने के लिए बंदूक खरीदते हैं. कई लोग तो ऐसे भी हैं, जिन के पास केवल साइकिल है, पर वे लोग भी बंदूक रखते हैं.

बंदूक की आड़ में समाज में गैरकानूनी असलहे बढ़ रहे हैं. सरकार को गैरकानूनी असलहे को जब्त करने के लिए सरकार को योजना बनानी होगी. जब तक यह योजना नहीं बनती, तब तक समाज को अपराध से मुक्त नहीं किया जा सकता. आम जिंदगी ठीक से गुजरे, इस के लिए जरूरी है कि समाज को बंदूक से दूर रखा जाए.

नक्सली ने खोली नक्सलवाद की पोलपट्टी

झारखंड के हार्डकोर नक्सली कुंदन पाहन ने आत्मसमर्पण करने के बाद माओवादियों और नक्सलियों की पोलपट्टी खोल कर रख दी है. कुंदन पाहन ने पुलिस को बताया कि माओवादी संगठन के ज्यादातर नक्सली नेता खुद ही नए जमींदार बन बैठे हैं. वे सूद पर पैसा लगाने से ले कर ठेकेदारी का काम करने लगे हैं.

करोड़पति नक्सली कुंदन पर 128 मामले दर्ज हैं. उस के सिर पर 15 लाख रुपए का इनाम था. गौरतलब है कि कुछ समय पहले खुफिया विभाग ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी कि सरकारी योजनाओं में कई नक्सली पेटी कौंट्रैक्टर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे सरकारी योजनाओं के ठेके हासिल करने वाली बड़ीबड़ी कंपनियों को धमका कर छोटेछोटे कामों के ठेके अपने हाथ में ले लेते हैं. बड़ी कंपनियां इस डर से नक्सलियों को ठेके दे देती हैं कि काम आसानी से हो सकेगा और दूसरे अपराधियों की ओर से कोई परेशानी खड़ी नहीं की जाएगी.

खुफिया विभाग ने कुछ साल पहले ही राज्य सरकार को बताया था कि पेटी कौंट्रैक्टर के काम में लग कर कई नक्सली करोड़पति बन बैठे हैं. पुलिस महकमे से मिली जानकारी के मुताबिक, कुछ समय पहले पटना, बिहार में पकड़े गए नक्सलियों के पास से 68 लाख रुपए बरामद हुए थे. जहानाबाद में गिरफ्तार नक्सलियों के पास से 27 लाख, 50 हजार रुपए और 5 मोबाइल फोन जब्त किए गए थे.

औरंगाबाद में नक्सलियों के पास से 3 लाख, 34 हजार रुपए और एक बोलैरो गाड़ी, गया में 15 लाख रुपए, मुंगेर में एक कार, 50 हजार रुपए, पिस्तौल वगैरह सामान बरामद किए गए थे.

कुंदन पाहन ने बताया कि माओवादी संगठन के ऊंचे पदों पर बैठे नक्सलियों के बच्चे बड़ेबड़े अंगरेजी स्कूलों में पढ़ते हैं और छोटे नक्सलियों से गांवों के स्कूलों को बम से उड़ाने को कहा जाता है. जहां एक ओर बड़े नक्सली शानोशौकत की जिंदगी गुजारते हैं, वहीं दूसरी ओर जंगल में दिनरात बंदूक ढोने वाले नक्सलियों के परिवार दानेदाने को मुहताज रहते हैं.

पुलिस हैडर्क्वाटर के सूत्रों पर भरोसा करें, तो बिहार के कई नक्सलियों की करोड़ों की दौलत पता लगाने का काम शुरू किया गया है. उस के बाद उन की गैरकानूनी तरीके से बनाई गई जायदाद को जब्त करने का काम शुरू किया जा सकता है.

हार्डकोर नक्सली कुंदन पाहन का पुलिस ने 14 मई को आत्मसमर्पण कराया था. 77 हत्याएं करने की बात कबूलने वाले कुंदन ने पुलिस को कोई हथियार नहीं सौंपा था.

कुंदन करोड़पति है और उस ने झारखंड के बुंडू, तमाड़, अड़की, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम जिलों के कारोबारियों समेत ओडिशा के दर्जनों कारोबारियों को सूद पर रकम दे रखी है.

कुंदन किसी राजनीतिक दल से चुनाव लड़ने का मन बना रहा है. वह इस की पूरी तैयारी भी कर चुका है. उस ने साफतौर पर कहा है कि वह जेल से ही चुनाव लड़ेगा और चुनाव जीतने के बाद अपने इलाके की तरक्की करेगा.

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी), झारखंड की क्षेत्रीय समिति के सचिव कुंदन ने साल 2008 में स्पैशल ब्रांच के इंस्पैक्टर फ्रांसिस इंडवर की हत्या की थी. उसी साल सरांडा के जंगल में डीएसपी प्रमोद कुमार की हत्या की थी. आईसीआईसीआई बैंक के 5 करोड़ रुपए और सवा किलो सोना लूटने के बाद संगठन में उस की तूती बोलने लगी थी. उस के बाद उस ने सांसद सुनील महतो और विधायक रमेश मुंडा को मार डाला था.

कुंदन के खिलाफ रांची में 42, खूंटी में 50, चाईबासा में 27, सरायकेला में 7 और गुमला जिले में एक मामला अलगअलग थानों में दर्ज है. उस से पूछताछ के बाद मिली जानकारी के बाद झारखंड पुलिस रांची, खूंटी, लोहरदगा, गुमला, सरांडा, पूर्वी सिंहभूम और पश्चिम बंगाल से सटे इलाकों में जम कर छापामारी कर रही है.

बैंक से करोड़ों की लूट के बाद रुपए के बंटवारे को ले कर कुंदन और उस के करीबी दोस्त राजेश टोप्पो के बीच तीखी झड़प हो गई थी. कुंदन लूट की रकम में ज्यादा हिस्सा लेना चाहता था और राजेश बराबरबराबर बांटने की जिद पर अड़ा हुआ था. दोनों के बीच का झगड़ा इतना बढ़ा कि उन्होंने अपने रास्ते अलगअलग कर लिए.

राजेश ने अपना अलग दस्ता बना लिया. उस के बाद वह संगठन में कुंदन को नीचा दिखाने की ताक में रहने लगा. कुछ दिनों के बाद ही उसे बड़ा मौका मिल भी गया. राहे इलाके में राजेश की अगुआई वाले दस्ते ने 5 पुलिस वालों की हत्या कर दी और उन से हथियारों को लूट लिया.

इस के बाद संगठन में राजेश की हैसियत रातोंरात काफी बढ़ गई. उसे संगठन में काफी तवज्जुह मिलने लगी. संगठन के बड़े नक्सली नेताओं द्वारा राजेश को ज्यादा तरजीह देने से कुंदन नाराज रहने लगा. उस ने राजेश को अपने रास्ते से हटाने की साजिश रचनी शुरू कर दी. उस ने झांसा दे कर राजेश को अड़की के जंगल में बुलवाया और वहीं उस की हत्या कर दी.

पहले तो नक्सली नेता यह समझ बैठे कि पुलिस की मुठभेड़ में राजेश की जान गई है, पर बाद में उन्हें पता चला कि कुंदन ने उसे धोखे से मार डाला है, तो संगठन के सभी नक्सली नेता उस से नाराज हो गए. संगठन ने कुंदन के पर कतर डाले और उसे अलगथलग कर दिया. इस के बाद से ही उस ने आत्मसमर्पण करने की प्लानिंग शुरू कर दी थी.

रांचीटाटा हाईवे पर कुंदन की दहशत पिछले कई सालों से कायम थी. शाम ढलते ही हाईवे पर सन्नाटा पसरने लगता था. बुंडू और तमाड़ इलाकों के बाजार शाम होते ही बंद हो जाते थे. नेताओं और सरकारी अफसरों के बीच उस का खौफ इतना ज्यादा था कि अगर उन्हें शाम के बाद हाईवे से गुजरना होता था, तो पूरे रास्ते पर सीआरपीएफ के जवानों की तैनाती कर दी जाती थी.

खूंटी जिले का रहने वाला कुंदन साल 1998-99 में अपने 2 बड़े भाइयों डिंबा पाहन और श्याम पाहन के साथ नक्सली दस्ते में शामिल हुआ था. उस समय कुंदन की उम्र महज 17 साल थी. कुंदन और उस के परिवार वालों के पास अड़की ब्लौक के बाड़गाड़ा गांव में 27 सौ एकड़ जमीन है. उस में से तकरीबन 1350 एकड़ जमीन पर उस के एक चाचा ने कब्जा जमा रखा है.

तमाड़ में आल झारखंड स्टूडैंट यूनियन के विधायक विकास मुंडा कुंदन के आत्मसमर्पण करने के तरीके को गलत बताते हुए सरकार से नाराज हैं. कुंदन ने ही लैंडमाइंस ब्लास्ट कर के उन के पिता रमेश मुंडा की हत्या कर दी थी.

बदनामी से बचने के लिए खेला मौत का खेल

विपिन ने रात का खाना अपनी पत्नी कुमकुम के साथ खाया था. खाना खाने के बाद उसे गुड़ खाने की आदत थी. उस ने पत्नी से गुड़ मांगा. कुमकुम पति को गुड़ दे कर टेबल के बरतन समेटने लगी. गुड़ खाते हुए विपिन ने पत्नी से कहा कि वह जरा टहल कर आता है और घर के बाहर निकल गया. रात का खाना खा कर टहलना विपिन की पुरानी आदत थी. कुमकुम घर का काम निपटाने लगी. काम निपटा कर वह बिस्तर पर लेट कर पति का इंतजार करने लगी. यह 8 फरवरी, 2017 की बात है.

विपिन मूलरूप से गांव बेनीनगर, जिला गोंडा, उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. उस के पिता का नाम त्रिवेणी शुक्ला था. 27 साल का विपिन कई साल पहले पंजाब के जिला बठिंडा में आ कर बस गया था. वहां उसे बठिंडा एयरबेस के एयरफोर्स स्टेशन में एयरफोर्स कर्मचारियों द्वारा बनाई गई कैंटीन एयरफोर्स वाइव्ज एसोसिएशन में नौकरी मिल गई थी.

इस कैंटीन में ज्यादातर एयरफोर्स के अधिकारियों की पत्नियां ही घरेलू सामान खरीदने आया करती थीं. विपिन सुबह 9 बजे से शाम के 7 बजे तक कैंटीन में रहता था. उस के बाद घर आ कर वह कुछ देर आराम करता. इस के बाद रात का खाना खा कर टहलने निकल जाता. टहलते हुए एयरफोर्स कालोनी का एक चक्कर लगाना उस की दिनचर्या में शामिल था.

एयरफोर्स की कैंटीन में काम करने की वजह से उसे एयरफोर्स कालोनी का स्टाफ क्वार्टर रहने के लिए मिला हुआ था, जिस में वह अपनी पत्नी के साथ रहता था. उन दिनों उस के घर गांव से उस के पिता और चाचा संतोष शुक्ला भी आए हुए थे. बहरहाल बिस्तर पर लेटेलेटे कुमकुम की आंख लग गई. जब उस की नींद टूटी तो विपिन लौट कर नहीं आया था. घबरा कर उस ने घड़ी की ओर देखा.

रात के 12 बजने वाले थे. विपिन अभी तक लौट कर नहीं आया था. पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था. आधे घंटे में वह लौट कर आ जाता था, पर उस रात… कुमकुम उठी और बगल वाले कमरे में गई, जहां सो रहे विपिन के पिता और चाचा को जगा कर उस ने विपिन के अब तक घर न लौटने की बात बताई. वे भी चिंतित हो उठे. इस के बाद सभी विपिन की तलाश में निकल पड़े.

तलाश में पड़ोस के भी 5-7 लोग साथ हो गए थे. पूरी रात ढूंढने पर भी विपिन का कहीं पता नहीं चला. अगले दिन यानी 9 फरवरी, 2017 की सुबह कुमकुम अपने ससुर और चचिया ससुर के साथ कैंटीन पर गई. विपिन वहां भी नहीं था.

इस के बाद उस ने एयरफोर्स के अधिकारियों को विपिन के लापता होने की सूचना दी. उसी दिन कुमकुम ने बठिंडा के थाना सदर की पुलिस चौकी बल्लुआना जा कर विपिन की गुमशुदगी दर्ज करा दी. इस के बाद सभी अपने स्तर से भी विपिन की तलाश करते रहे.  पर उस का कहीं कोई सुराग नहीं मिला.

धीरेधीरे विपिन को लापता हुए एक सप्ताह बीत गया. इस मामले में एयरफोर्स के अधिकारियों ने भी कोई विशेष काररवाई नहीं की थी. पुलिस ने भी इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया था.

हर ओर से निराश हो कर 14 फरवरी, 2017 को कुमकुम बठिंडा के एसएसपी स्वप्न शर्मा के औफिस जा कर उन से मिली और पति के लापता होने की जानकारी दे कर निवेदन किया कि उस के पति की तलाश करवाई जाए.

एसएसपी स्वप्न शर्मा ने उसी समय फोन द्वारा थाना सदर के थानाप्रभारी वेदप्रकाश को आदेश दिया कि मुकदमा दर्ज कर के इस मामले में तुरंत काररवाई करें. इस के बाद पुलिस चौकी बल्लुआना में कुमकुम के बयान नए सिरे से दर्ज किए गए, इस बार कुमकुम ने आशंका व्यक्त की थी कि या तो उस के पति विपिन शुक्ला का अपहरण हुआ है या हत्या कर के लाश कहीं छिपा दी गई है. कुमकुम के इस बयान के आधार पर पुलिस ने विपिन की गुमशुदगी के साथ अपहरण का मुकदमा दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी.

इस के बाद भी विपिन की गुमशुदगी को एक सप्ताह और बीत गया. इन 15 दिनों में पुलिस और एयरफोर्स के अधिकारियों द्वारा ढंग से कोई काररवाई नहीं की गई. इसी का नतीजा था कि विपिन शुक्ला का कोई सुराग इन लोगों के हाथ नहीं लगा. इस बीच कुमकुम एसएसपी स्वप्न शर्मा से 2-3 बार मिल कर गुहार लगा चुकी थी.

पुलिस हर प्रकार से विपिन शुक्ला की तलाश कर के थक चुकी थी. मुखबिरों का भी सहारा लिया गया था. लेकिन उन से भी कोई लाभ नहीं मिला. शहर के बदनाम लोगों से भी पूछताछ की गई, पर नतीजा शून्य ही रहा.

इंसपेक्टर वेदप्रकाश पर एसएसपी स्वप्न शर्मा की ओर से काफी दबाव डाला जा रहा था. इसलिए उन्होंने नए सिरे से जांच करते हुए एयरफोर्स कालोनी के निवासियों और कैंटीन कर्मचारियों से पूछताछ की. इस पूछताछ में उन्हें लगा कि विपिन की गुमशुदगी में कालोनी के ही किसी आदमी का हाथ है.

उन्होंने अपने मुखबिरों को कालोनी वालों पर नजर रखने को कहा. पुलिस और मुखबिर कालोनी में सुराग ढूंढने में लगे थे. अगले दिन यानी 21 फरवरी को वेदप्रकाश ने शैलेश को पूछताछ करने के लिए थाने बुलाना चाहा तो पता चला कि बिना एयरफोर्स अधिकारियों से इजाजत लिए पूछताछ करना संभव नहीं है.

इस पर वेदप्रकाश ने एयरफोर्स के अधिकारियों से इजाजत ले कर सार्जेंट शैलेश से उन्हीं के सामने पूछताछ शुरू की. दूसरी ओर एसएसपी स्वप्न शर्मा के आदेश पर एसपी औपरेशन गुरमीत सिंह और डीएसपी देहात कुलदीप सिंह के नेतृत्व में एक सर्च टीम तैयार की गई, जिस में एयरफोर्स के अधिकारियों सहित 40 जवानों, छोटेबड़े 85 पुलिस वालों और 30 मजदूरों सहित एयरफोर्स के स्निफर डौग एक्सपर्ट की टीम को शामिल किया गया.

इस भारीभरकम टीम ने एयरफोर्स कालोनी में सुबह 9 बजे से सर्च अभियान शुरू करते हुए एकएक क्वार्टर की तलाशी लेनी शुरू की. दूसरी ओर सार्जेंट शैलेश से पूछताछ चल रही थी. पूछताछ में शैलेश ने बताया कि अन्य लोगों की तरह उस की भी विपिन से जानपहचान थी. लेकिन वह उस की गुमशुदगी के बारे में कुछ नहीं जानता. लेकिन थानाप्रभारी के पास कुछ ऐसी जानकारियां थीं, जिन्हें शैलेश छिपाने की कोशिश कर रहा था.

शैलेश से अभी पूछताछ चल ही रही थी कि कालोनी में सर्च अभियान चलाने वाली टीम में शामिल स्निफर डौग भौंकते हुए सार्जेंट शैलेश शर्मा के क्वार्टर में घुस गया. कुत्ते के पीछे पुलिस अफसर भी घुस गए. सार्जेंट शैलेश शर्मा को भी वहीं बुला लिया गया. पूरे क्वार्टर में अजीब सी दुर्गंध फैली थी. जब विश्वास हो गया कि इस क्वार्टर में लाश जैसी कोई चीज है तो पुख्ता सबूत के लिए इलाका मजिस्ट्रैट और तहसीलदार भसीयाना को बुला लिया गया.

सब की मौजूदगी में जब सार्जेंट शैलेश के क्वार्टर की तलाशी ली गई तो वहां से जो बरामद हुआ, उस की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. वहां का लोमहर्षक दृश्य देख कर पत्थरदिल एयरफोर्स और पुलिस के जवानों के भी दिल कांप उठे. कुछ लोगों को तो चक्कर तक आ गए.

क्वार्टर में लापता विपिन शुक्ला की लाश के 16 टुकड़े पड़े थे, जिन्हें काले रंग की 16 अलगअलग थैलियों में पैक कर के पैकेट बना कर फ्रिज में रखा गया था. लाश के टुकड़े बरामद होते ही सार्जेंट शैलेश ने इलाका मजिस्ट्रैट, तहसीलदार, एयरफोर्स के अधिकारियों और पुलिस के वरिष्ठ अफसरों के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

उस ने बताया कि उसी ने अपनी पत्नी अनुराधा और अपने साले शशिभूषण के साथ मिल कर विपिन शुक्ला की हत्या कर के लाश के टुकड़े कर के फ्रिज में रखे थे. पुलिस ने लाश के टुकडे़ और फ्रिज कब्जे में ले लिया. लाश के टुकड़ों का पंचनामा कर के उन्हें पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया.

अपहरण की धारा 365 के तहत दर्ज इस मुकदमे में योजनाबद्ध तरीके से की गई हत्या की धारा 302, 120बी और लाश को खुर्दबुर्द करने के लिए धारा 201 जोड़ दी गई. सार्जेंट शैलेश और उस की पत्नी अनुराधा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. इस हत्या का तीसरा आरोपी शशिभूषण फरार हो गया था.

उस की तलाश में पुलिस टीम उत्तराखंड भेजी गई. उसी दिन शाम को यानी 21 फरवरी, 2017 को एसपी औपरेशन गुरमीत सिंह ने प्रैसवार्ता कर इस हत्याकांड के संबंध में विस्तार से जानकारी दी, साथ ही दोनों गिरफ्तार अभियुक्तों शैलेश और अनुराधा को मीडिया के सामने पेश किया.

पुलिस अधिकारियों द्वारा पूछताछ करने पर सार्जेंट शैलेश और अनुराधा ने विपिन शुक्ला की गुमशुदगी से ले कर हत्या करने तक की जो कहानी बताई, वह अवैधसंबंधों और बदनामी से बचने के लिए की गई हत्या का नतीजा थी—

सार्जेंट शैलेश मूलरूप से उत्तराखंड का निवासी था. लगभग 7 साल पहले उस की अनुराधा से शादी हुई थी. उस का एक 5 साल का बेटा है. इन दिनों उस की पत्नी गर्भवती थी.

इस कहानी की शुरुआत 2 साल पहले सन 2014-15 से शुरू हुई थी. 27 साल का विपिन शुक्ला खूबसूरत युवक था. हंसीमजाक करना उस की आदत में था. वह एयरफोर्स की वाइव्ज एसोसिएशन की कैंटीन में काम करता था. इस कैंटीन में एयरफोर्स के अफसरों जवानों की पत्नियां घरेलू सामान खरीदने आती हैं.

सार्जेंट शैलेश की खूबसूरत पत्नी अनुराधा भी यहां से सामान खरीदा करती थी. एक बच्चे की मां अनुराधा काफी खूबसूरत थी. उसे देखते ही शादीशुदा विपिन अपना दिल हार बैठा था. उस ने बात को आगे बढ़ाने के लिए पहल करते हुए अनुराधा से हंसीमजाक और छेड़छाड़ शुरू कर दी.

अनुराधा ने इस का विरोध करते हुए विपिन को काफी खरीखोटी भी सुनाई, पर उस ने उस का पीछा नहीं छोड़ा. धीरेधीरे अनुराधा को विपिन की छेड़छाड़ और हंसीमजाक में आनंद आने लगा. इस से विपिन की हिम्मत बढ़ गई.

पहले दोनों में प्यार का इजहार हुआ, फिर मुलाकातें शुरू हुई. वक्त के साथ दोनों के बीच अवैधसंबंध भी बन गए. उसी बीच अनुराधा गर्भवती हो गई और शादीशुदा होते हुए भी विपिन पर शादी के लिए दबाव डालने लगी. उस का कहना था कि वह अपने पति को छोड़ देगी और विपिन अपनी पत्नी को तलाक दे दे. लेकिन विपिन ने अनुराधा की इस बात को मानने से इनकार कर दिया.

उस बीच शैलेश को भी अपनी पत्नी के विपिन शुक्ला के साथ अवैध संबंध होने और उस के गर्भवती होने की जानकारी मिल गई. उस ने अनुराधा को आड़े हाथों लेते हुए खूब फटकार लगाई. इस बात को ले कर पतिपत्नी के बीच क्लेश भी शुरू हो गया. यह बात पिछले साल की है.

रोजरोज के क्लेश से तंग आ कर शैलेश अनुराधा को अपनी ससुराल उत्तराखंड ले गया और वहां उस ने यह बात अनुराधा के मातापिता और भाई को बताई तो उन्होंने भी अनुराधा को डांटते हुए फौरन विपिन से संबंध खत्म करने को कहा.

शैलेश और अनुराधा कुछ दिन उत्तराखंड रह कर बठिंडा लौट आए. वापस आने के बाद अनुराधा ने विपिन से बातचीत करनी बंद कर दी. बारबार बुलाने पर भी जब अनुराधा ने विपिन से बात नहीं की तो नाराज हो कर वह अनुराधा को बदनाम करने लगा.

वह कालोनी वालों और कैंटीन में काम करने वाले अन्य कर्मचारियों को अपने और अनुराधा के अवैधसंबंधों की कहानियां चटखारे लेले कर सुनाता. इस से सार्जेंट शैलेश और उस की पत्नी अनुराधा की बदनामी होने लगी. शैलेश अपने अधिकारियों और कालोनी वालों से नजर मिलाने में कतराने लगा.

एक दिन शैलेश ने विपिन से मिल कर उसे समझाया, ‘‘देखो शैलेश, गलती चाहे किसी की भी रही हो, अब यह बात यहीं दफन कर दो. पिछली सभी बातों को भूल कर भविष्य में हमें बदनाम करना बंद कर दो.’’

विपिन ने उस समय तो शैलेश की बात मान कर वादा कर लिया, पर वह अपनी बात पर कायम नहीं रह सका. उस की छिछोरी हरकतें जारी रहीं. विपिन जब अपनी हरकतों से बाज नहीं आया और पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो शैलेश ने अपने साले शशिभूषण को बठिंडा बुला लिया. शशिभूषण नेवी में नौकरी करता था.

शैलेश के बुलाने पर जब शशिभूषण बठिंडा पहुंचा तो शैलेश, अनुराधा और शशिभूषण ने रोजरोज की इस बदनामी से अपना पीछा छुड़ाने के लिए विपिन का गला घोंट कर दफन करने की योजना बना डाली.

अपनी योजना पर अच्छी तरह सोचविचार कर उसे अमली जामा पहनाने के लिए सब से पहले शैलेश ने अपने अधिकारियों को अपना क्वार्टर बदलने की अर्जी दी. उसे एयरफोर्स कालोनी में क्वार्टर नंबर 214/10 अलाट था. उस ने अधिकारियों को मौजूदा क्वार्टर में कुछ कमियां बता कर नया क्वार्टर अलाट करा लिया.

योजना के अनुसार, नए क्वार्टर में जाने की तारीख 8 फरवरी, 2017 तय की गई. 8 फरवरी को रात का खाना खा कर विपिन अपनी आदत के अनुसार टहलने के लिए निकला तो शैलेश उसे अपने क्वार्टर के पास ही मिल गया. विपिन को देखते ही शैलेश ने कहा, ‘‘यार, मैं तुम्हारे घर ही जा रहा था.’’

‘‘क्यों क्या बात हो गई?’’ विपिन ने हैरानी से पूछा तो शैलेश ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘यार, तुम तो जानते ही हो कि आज मुझे क्वार्टर बदलना है. काफी सामान तो पैक कर चुका हूं. बस कुछ सामान बचा है. तुम चल कर पैक करवा दो. उस के बाद अनुराधा के हाथ की चाय पीएंगे.’’ शैलेश ने यह बात जानबूझ कर कही थी.

सुन कर विपिन झट से तैयार हो गया. शैलेश विपिन को ले कर अपने पुराने क्वार्टर पर पहुंचा. सामान पैक करते हुए विपिन जब नीचे की ओर झुका, तभी उस ने पीछे से विपिन के सिर पर कुल्हाड़ी का भरपूर वार कर दिया. बिना चीखे ही विपिन फर्श पर ढेर हो गया. शशिभूषण ने भी उस की गरदन पर एक वार कर के सिर धड़ से अलग कर दिया.

इस के बाद तीनों ने मिल कर विपिन की लाश को एक बड़े ट्रंक में डाल कर बाहर से ताला लगा दिया और घर के अन्य सामान के साथ लाश वाला ट्रंक भी नए क्वार्टर में ले आए.

विपिन की हत्या करने के बाद जहां शैलेश ने चैन की सांस ली थी, वहीं उसे यह चिंता भी सताने लगी थी कि विपिन की लाश को ठिकाने कैसे लगाया जाए. वह कुछ सोच पाता, उस के पहले ही उसे अगले दिन अपने अधिकारियों से पता चला कि विपिन रात से घर से लापता है. यह सुन कर उस ने लाश ठिकाने लगाने का इरादा त्याग दिया.

उस ने सोचा कि कुछ दिनों में मामला ठंडा हो जाएगा तो इस विषय पर वह सोचेगा. पर विपिन की पत्नी कुमकुम के बारबार एयरफोर्स और पुलिस के अधिकारियों के पास चक्कर लगाने से मामला ठंडा होने के बजाए गरमाता गया.

लाश को ठिकाने लगाना जरूरी था. फरवरी का महीना होने के कारण मौसम बदल रहा था. ज्यादा दिनों तक लाश को रखा नहीं जा सकता था, इसलिए सोचविचार कर शैलेश ने 19 फरवरी को विपिन की लाश के छोटेछोटे 16 टुकड़े किए और उन्हें पौलिथिन की अलगअलग थैलियों में भर फ्रिज में रख दिया.

शैलेश ने सोचा था कि वह किसी रोज मौका देख कर 2-3 थैलियों को बाहर ले जा कर वीरान जगह पर फेंक देगा, जहां कुत्ते या जंगली जानवर उन्हें खा जाएंगे. कुछ टुकडों को जला देगा और कुछ को नाले या गटर में फेंक देगा. लेकिन इस के पहले ही 21 फरवरी को पुलिस ने उसे और उस की पत्नी अनुराधा को गिरफ्तार कर के उस के घर से फ्रिज में रखे लाश के 16 टुकड़े बरामद कर लिए.

अभियुक्त सार्जेंट शैलेश कुमार और अनुराधा को उसी दिन अदालत में पेश कर के थानाप्रभारी वेदप्रकाश ने 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि में शैलेश और अनुराधा की निशानदेही पर उन के घर से हत्या में इस्तेमाल की गई कुल्हाड़ी और मृतक विपिन शुक्ला का मोबाइल बरामद कर लिया गया. पूछताछ और पुलिस काररवाई पूरी कर के दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया.

अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए शैलेश ने जिस तरह अपने दिमाग का इस्तेमाल किया था, वह काबिले तारीफ था. उस की योजना फूलप्रूफ थी. लेकिन लाश ठिकाने लगाने में की गई देर ने उस की पोल खोल दी. बहरहाल अब पतिपत्नी जेल में हैं और इस हत्या के लिए तीसरे दोषी शशिभूषण की पुलिस सरगर्मी से तलाश कर रही है.

बठिंडा के सरकारी अस्पताल के डाक्टरों ने मृतक विपिन की लाश के टुकड़ों का पोस्टमार्टम कर ने से इनकार करते हुए कहा कि तकनीकी कारणों और पुख्ता सबूतों के लिए पोस्टमार्टम फरीदकोट के मैडिकल कालेज में करवाना ठीक रहेगा.

मृतक की पत्नी कुमकुम का आरोप है कि अगर एयरफोर्स और स्थानीय पुलिस सही समय पर काररवाई करती तो उस के पति की लाश इस तरह 16 टुकड़ों में न मिलती. विपिन की लाश 12 दिनों तक सलामत थी. इस के बाद ही हत्यारों ने उस के टुकड़े किए थे.

कुमकुम का यह भी कहना है कि उस के पति के अनुराधा के साथ अवैधसंबंध नहीं थे. हकीकत में शैलेश और अनुराधा विपिन को ब्लैकमेल कर रहे थे. विपिन की हत्या करने से पहले पतिपत्नी दोनों रोजाना शाम को उन के घर आते थे और देर रात तक बैठ कर बातें व हंसीमजाक करते थे. लेकिन 8 फरवरी के बाद वे एक बार भी उन के घर नहीं आए और ना ही विपिन की तलाश में उन्होंने कोई सहयोग किया.

– पुलिस सूत्रों पर आधारित

साइबर अपराध के जाल से रहें सावधान

बिहार में साइबर अपराध की तादाद में तेजी से इजाफा होता जा रहा है. इस के लिए नएनए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं. बैंकिंग फ्राड की वारदातें सब से ज्यादा बिहार में ही हो रही हैं. औनलाइन शौपिंग साइटों से ले कर औनलाइन सामान बेचने वाली वैबसाइटों पर साइबर फ्राड के मामले बड़ी तेजी में सामने आ रहे हैं. घर बैठे रुपए कमाने का लालच दे कर नोएडा की एक कंपनी ने 6 लाख, 30 हजार लोगों से 37 अरब रुपए ठग लिए. उत्तर बिहार के 7 हजार से ज्यादा लोग भी ठगी का शिकार बने. सोशल ट्रेड डौट बिज नाम की कंपनी ने बिहार से भी 42 करोड़ रुपए ठग लिए थे.

कई सोशल साइटों पर धोखाधड़ी और किसी को बदनाम करने की वारदातें भी बढ़ती जा रही हैं. फेसबुक पर हजारोंलाखों अकाउंट फर्जी नाम और फोटो से बने हुए हैं. इस पर रोक लगाने के लिए फेसबुक वाले भी समयसमय पर एहतियात बरतते रहते हैं, पर फर्जी अकाउंट पर रोक नहीं लग सकी है.

पटना से सटे बिहटा इलाके का रंजय मिश्रा बताता है कि उस ने सुनीता कुमारी के नाम से फेसबुक पर फर्जी अकाउंट बना रखा है और फोटो भी किसी मौडल का लगा दिया है. वह लड़की बन कर तकरीबन 4 लड़कों के साथ चैटिंग करता है और प्यार व सैक्स की बातें करता है.

रंजय मिश्रा ने आगे बताया कि एक दिन एक लड़के से उस से मोबाइल नंबर मांगा और फोन पर बात करने को कहा. रंजय ने चैट बौक्स में लिखा कि उस के मोबाइल में बैलैंस नहीं है. लड़के ने उस का मोबाइल नंबर मांगा और तुरंत ही 2 सौ रुपए का रीचार्ज करा दिया. उस के बाद रंजय लड़की की आवाज बना कर उस से बातें करने लगा.

उस के बाद रंजय ने बाकी तीनों फेसबुक फ्रैंड्स के साथ भी यही नुसखा आजमाया और अपने मोबाइल फोन को रीचार्ज कराया. रंजय बताता है कि उस के मोबाइल फोन में हमेशा हजार 2 रुपए का बैलैंस रहता है. इस तरह के न जाने कितने फर्जी अकाउंट फेसबुक पर होंगे और न जाने कौन किस तरह से उन का बेजा इस्तेमाल कर रहा होगा.

पिछले 5 सालों के दौरान साइबर अपराध में 4 गुना इजाफा हो गया है. साल 2012 में जहां ऐसे मामलों की तादाद 51 थी, वहीं साल 2016 में यह बढ़ कर 225 हो गई और साल 2017 में तो 3 महीने में ही सौ मामले दर्ज हो गए. ऐसे मामलों के बढ़ने से साइबर दारोगा की बहाली की कवायद शुरू की गई है. हर जिले के थाने में एकएक साइबर यूनिट भी बनाई जाएगी.

हाल ही में साइबर ठगी का एक नया ही रूप देखने सामने आया. सैकंडहैंड सामान बेचने वाली एक बड़ी वैबसाइट पर नकली मोबाइल फोन बेचने का मामला सामने आया.

पटना के कुम्हरार महल्ले के रहने वाले एक शख्स ने सैमसंग का एस-7 मौडल मोबाइल फोन खरीदने के लिए और्डर किया. आधी कीमत पर मिल रहे मोबाइल फोन को फुलवारीशरीफ महल्ले का रहने वाला लड़का बेच रहा था. खरीदने के बाद पता चला कि वह मोबाइल फोन नकली है. कंपनी में शिकायत करने पर आईडी ब्लौक कर दी गई.

भागलपुर के चार्टर्ड अकाउंटैंट पल्लव पराशर के पैन नंबर पर साइबर ठगों ने विदेश में 50 अरब रुपए का ट्रांजैक्शन कर लिया. पल्लव पराशर को इस की जरा भी भनक नहीं लगी. पटना से आयकर विभाग ने जब उन्हें नोटिस भेजा, तो वे चौंक गए. उन्होंने 7 जनवरी को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के कोर्ट में केस दर्ज किया.

दिल्ली पुलिस ने लोगों के बैंक खाते से औनलाइन करोड़ों रुपए की ठगी करने वाले एक गिरोह का भंडाफोड़ किया. इस गिरोह ने पिछले 2 सालों में करोड़ों रुपयों की औनलाइन ठगी की थी. ठगों की पहचान 34 साल के सुभाष और 32 साल के रामशरण राय के रूप में हुई है.

सुभाष ने पुलिस को बताया कि वह लोगों को फोन कर के बैंक का मुलाजिम बताता था और कहता था कि यह काल उन के कार्ड की क्रेडिट लिमिट बढ़ाने के लिए की गई है. उस के बाद एटीएम का नंबर और पिन मांगा जाता था.

उस के बाद पलक झपकते ही अकाउंट से लाखों रुपए उड़ा लिए जाते थे. उड़ाए गए रुपयों को पेटीएम और औक्सिजन जैसे अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाता था. बाद में उस रकम को औनलाइन रीचार्जिंग अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाता. फिर अलगअलग जगहों पर रीचार्ज करने वाले दुकानदारों से संपर्क कर मोटा कमीशन देने का लालच दिया जाता था.

मिसाल के तौर पर अगर एयरटेल कंपनी उन्हें रीचार्ज करने पर 2 फीसदी कमीशन देती है, तो साइबर ठग उसे 30 से 35 फीसदी कमीशन दे देते थे. औनलाइन वालेट से रकम खत्म होने पर दुकानदार और ठग आपस में रकम बांट लेते थे. दुकानदार अपना कमीशन काट कर बाकी रकम ठग को दे देते थे.

पिछले साल बिहार के जानेमाने अर्थशास्त्री शैवाल गुप्ता भी साइबर फ्राड के शिकार बन गए थे. उन से 72 हजार, 8 सौ रुपए की ठगी कर ली गई थी. शैवाल गुप्ता के मोबाइल फोन नंबर  पर 07503434669 नंबर से विजय सिंह नाम के आदमी ने काल कर के कहा था कि वह दिल्ली पुलिस का सहायक अवर निरीक्षक है. उस ने शैवाल गुप्ता को बताया कि उन के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी किया गया?है.

जब शैवाल गुप्ता ने इस की वजह जाननी चाही, तो कहा गया कि इस मामले में वे सरकारी वकील विनोद अग्रवाल के मोबाइल फोन नंबर 09716801457 पर बात कर लें.

शैवाल गुप्ता ने जब उस नंबर पर बात की, तो बताया गया कि उन के क्रेडिट कार्ड पर 72 हजार, 8 सौ रुपए बकाया हैं. उसी रकम की वसूली के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने केस किया है. उस वकील ने भारतीय स्टेट बैंक का एक अकाउंट नंबर देते हुए कहा कि अगर सैटलमैंट कराना है, तो 72 हजार, 8 सौ रुपए उस में डाल दें.

शैवाल गुप्ता ने 14 अक्तूबर को ऐक्सिस बैंक की बोरिंग रोड शाखा के अपने अकाउंट से भारतीय स्टेट बैंक के बताए अकाउंट में रुपए ट्रांसफर कर दिए. रुपए ट्रांसफर कराने के बाद उन्हें कुछ शक हुआ. जब उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक के अकाउंट के बारे में पता किया तो पता चला कि वह अकाउंट तो बिहार के ही सुपौल जिले की भारतीय स्टेट बैंक की एक शाखा का है.

शैवाल गुप्ता ने इस ठगी की सूचना आर्थिक अपराध शाखा (ईओयू) को दी. ईओयू ने जब पूरे मामले की जांच की, तो इंस्पैक्टर विजय सिंह और वकील विनोद अग्रवाल दोनों फर्जी निकले.

सुपौल की जिस भारतीय स्टेट बैंक की शाखा के अकाउंट में रुपए ट्रांसफर किए गए थे, वह सुपौल के ही जगतपुर गांव के अरविंद कुमार का पाया गया. अरविंद ने कबूल किया कि उस के खाते में 72 हजार, 8 सौ रुपए ट्रांसफर हुए हैं. अरविंद ने पूरी रकम वापस कर दी.

पिछले साल पटना की एक शादीशुदा और 5 महीने के बच्चे की मां फेसबुक के प्यार के चक्कर में फंस कर अपना सबकुछ गंवा बैठी थी. वह एक करोड़ रुपए के गहने और नकदी ले कर अपने आशिक के साथ ससुराल से फुर्र हो गई. इतना ही नहीं, वह अपने साथ 5 महीने के बच्चे को भी ले भागी थी.

पटना के कंकड़बाग इलाके की एक पाइप फैक्टरी के मालिक निखिल कुमार ने कोतवाली थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी कि उन की बीवी स्वाति करोड़ों रुपए के गहने और नकदी ले कर अपने प्रेमी शैलेंद्र के साथ भाग गई है.

स्वाति और निखिल की 5 साल पहले बड़े ही धूमधाम से शादी हुई थी. स्वाति को इंटरनैट से काफी लगाव था और वह अकसर कंप्यूटर पर समय गुजारती थी. इसी दौरान फेसबुक पर चैटिंग के जरीए उस की पहचान आस्ट्रेलिया के एक नौजवान शैलेंद्र शर्मा से हुई. वह वहां एमबीए की पढ़ाई कर रहा था.

शैलेंद्र पंजाब के फिरोजपुर जिले के अबोहर सिटी-2 के अजीमगढ़ गांव का रहने वाला था. चैटिंग के जरीए प्यार की कसमें खाते हुए वे दोनों घर से भाग निकले. स्वाति के मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर सिकंदराबाद में पुलिस ने उसे धर दबोचा था.

पटना के एसएसपी मनु महाराज बताते हैं कि बिहार पुलिस का साइबर सैल अब सीबीआई की तरह जांच पड़ताल करेगा.

याद रखें ये बातें

* कभी भी लैंडलाइन फोन या मोबाइल फोन पर किसी को भी अपने बैंक अकाउंट, क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड से जुड़ी किसी भी तरह की जानकारी न दें.

* अगर कोई फोन पर खुद को बैंक का मुलाजिम बता कर भी कोई जानकारी मांगे तो भी कोई जानकारी न दें. अपने बैंक जा कर मैनेजर से खुद ही इस सिलसिले में पूछताछ कर लें.

* क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड या अकाउंट से रुपए निकालने की सीमा कम रखें.

* हर 5-6 दिन पर अपने बैंक अकाउंट की जांच करते रहें और किसी भी तरह की गड़बड़ी की भनक लगने पर बैंक को सूचित करें.

* अपने बैंक अकाउंट का एसएमएस अलर्ट जरूर रखें.

* कोई भी फोन पर आधार कार्ड नंबर मांगे, तो उसे न बताएं.

* लौटरी लगने, डौलर में इनाम मिलने, गिफ्ट मिलने जैसे ईमेल का कोई जवाब न दें.

जब सिरफिरा आशिक बन गया वहशी कातिल

भोपाल, मध्य प्रदेश के तकरीबन 32 साला उदयन दास को ऐयाशी करने के लिए दौलत नहीं कमानी पड़ी थी, क्योंकि उस के मांबाप इतना कमा कर रख गए थे कि अगर वह कुछ काम नहीं करता, तो भी जिंदगी में कभी भूखा नहीं सोता. उदयन दास की कई माशूकाएं थीं. उन में से एक थी कोलकाता की रहने वाली 26 साला आकांक्षा शर्मा, जो एमएससी पास थी. उस के पिता शिवेंद्र शर्मा पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले के एक बैंक में चीफ मैनेजर थे. अब से तकरीबन 8 साल पहले आकांक्षा शर्मा की दोस्ती फेसबुक के जरीए उदयन दास से हुई थी. फेसबुक चैटिंग में उदयन दास ने खुद को आईएफएस अफसर बताया था, जो अमेरिका में रहता है और अकसर भारत आया करता है.

अपने पिता बीके दास को उस ने भेल, भोपाल का अफसर बताया था, जो रिटायरमैंट के बाद रायपुर में खुद की फैक्टरी चला रहे हैं और मां इंद्राणी दास को पुलिस महकमे से रिटायर्ड डीएसपी बताया था. उस ने मां का भी अमेरिका में रहना बताया था.

उदयन दास ने आकांक्षा शर्मा को यह भी बताया था कि वह आईआईटी, दिल्ली से ग्रेजुएट है.

आजकल जैसा कि आमतौर पर फेसबुक चैटिंग में होता है, वह आकांक्षा शर्मा और उदयन दास के मामले में भी हुआ. पहले जानपहचान, फिर दोस्ती और उस के बाद प्यार. जल्द ही दोनों ने मिलनाजुलना शुरू कर दिया.

उदयन दास भले ही भोपाल में रह रहा था, पर आकांक्षा शर्मा के लिए तो वह अमेरिका में था, इसलिए जल्द ही उदयन दास ने उसे बताया कि वह दिल्ली आ रहा है.

दोनों दिल्ली में मिले और कुछ दिन साथ गुजारे. उदयन दास की रईसी का आकांक्षा शर्मा पर खासा असर पड़ा. वे दोनों एकसाथ हरिद्वार, मसूरी और देहरादून भी घूमने गए और एक ही होटल में एकसाथ एक कमरे में रुके. फिर उदयन दास अमेरिका यानी भोपाल लौट गया, इस वादे के साथ कि जल्द ही वह फिर भारत आएगा और अब वे दोनों भोपाल में मिलेंगे, जहां उस के 2 मकान हैं.

उदयन दास ने आकांक्षा शर्मा को बताया था कि उस का भोपाल वाला मकान काफी बड़ा है और उस का नीचे वाला हिस्सा किराए पर ब्रह्मकुमारी आश्रम को दे रखा है.

इन 2-3 मुलाकातों में आकांक्षा शर्मा सोचने लगी कि उदयन दास वैसा ही लड़का है, जैसा वह चाहती थी. वह तो शादी के बाद अमेरिका में नौकरी करने के सपने देखने लगी थी. लिहाजा, उन दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया.

1. शादी, कत्ल और कब्र

एक दिन उदयन दास ने आकांक्षा शर्मा को बताया कि उस का मन अब अमेरिका में नहीं लग रहा है और वह उस से शादी कर भोपाल में ही बस जाना चाहता है. इस से अमेरिका जा कर नौकरी करने की आकांक्षा शर्मा की ख्वाहिश मिट्टी में मिल गई, क्योंकि अब तक वह अपने घर वालों को बता चुकी थी कि वह नौकरी करने अमेरिका जा रही है.

आकांक्षा शर्मा उदयन दास को चाहने लगी थी, इसलिए राजी हो गई. आज नहीं तो कल उसे अमेरिका जाने का मौका मिल सकता है, इसलिए वह उदयन की बताई तारीख पर बीते साल जून महीने में भोपाल आ गई. मांबाप से हकीकत छिपाने के लिए उस ने यह झूठ बोला कि वह नौकरी करने न्यूयौर्क जा रही है.

आकांक्षा शर्मा ने भोपाल के ही पिपलानी के काली बाड़ी मंदिर में उदयन दास के साथ शादी भी कर ली. इस दौरान वह फोन पर घर वालों से भी बात करती रही, लेकिन खुद को अमेरिका में होने का झूठ बोलती रही. यह जून, 2016 की बात है.

कुछ दिन उदयन दास के साथ बीवी की तरह गुजारने के बाद आकांक्षा शर्मा को मालूम हुआ कि उस के शौहर ने उस से कई झूठ बोले हैं, क्योंकि न तो वह कभी अपने मांबाप से फोन पर बात करता था और न ही उन के बारे में पूछने पर कुछ बताता था.

हद तो उस वक्त हो गई, जब आकांक्षा शर्मा को यह पता चला कि उदयन दास अव्वल दर्जे का नशेड़ी है और दूसरी कई लड़कियों से उस के नाजायज ताल्लुकात हैं. जुलाई, 2016 तक तो आकांक्षा शर्मा ने अपने घर वालों से फोन पर बात की, लेकिन अब वह उन से कम ही बात करती थी. लेकिन फिर धीरेधीरे वह एसएमएस के जरीए उन से बात करने लगी थी.

14 जुलाई, 2016 का दिन आकांक्षा शर्मा पर कहर बन कर टूटा. अगर उदयन दास ने उस से कई झूठ बोले थे, तो एक झूठ उस ने भी उदयन से बोला था. दरअसल, आकांक्षा शर्मा का एक बौयफ्रैंड और था, जिस ने उस के कुछ फोटो, जो कम कपड़ों में थे, ह्वाट्सऐप पर डाल दिए थे. ये फोटो उदयन दास की निगाह में आए, तो वह भड़क उठा.

पूछने पर आकांक्षा ने कुछ सच्ची और कुछ झूठी बातें उसे बताईं, तो उदयन को लगा कि आकांक्षा ने उस से झूठ तो बोला ही है, साथ ही उस के नाजायज ताल्लुकात पुराने बौयफ्रैंड से हैं और वह उसे पैसे भी देती रहती है.

रात को लड़झगड़ कर आकांक्षा तो सो गई, पर उदयन की आंखों में नींद नहीं थी. साथ में सो रही बीवी उसे धोखेबाज लगने लगी थी. रातभर जाग कर उदयन दास आकांक्षा शर्मा के कत्ल की योजना बनाता रहा और सुबह के 5 बजतेबजते उस ने उस की हत्या भी कर डाली.

उदयन ने पहले गहरी नींद में सोती हुई आकांक्षा का चेहरा तकिए से दबाया. जब उस के मर जाने की पूरी तरह से तसल्ली हो गई, तब तकिया हटाया और उस का गला घोंट डाला, जिस से आकांक्षा के गले की हड्डी चटक गई.

अब समस्या आकांक्षा की लाश को ठिकाने लगाने की थी. सुबह नजदीक की दुकान से उदयन दास ने 14 बोरी सीमेंट खरीदा और आकांक्षा की लाश एक पुराने बक्से में डाल दी और तकरीबन 10 बोरी सीमेंट घोल कर उस में भर दिया, जिस से लाश जम जाए. बक्से से बदबू न आए, इसलिए उस के चारों तरफ उस ने सैलो टेप लगा दी.

दोपहर को उस ने अपने एक पहचान वाले मिस्त्री रवि को बुलाया और कमरे में चबूतरा बनाने की बात कही. इस बाबत उदयन ने बहाना यह बनाया कि वह मंदिर बनवाना चाहता है. रवि ने चबूतरा बनाने के लिए कमरा खोदा, पर चूंकि उस के सामने लाश वाला बक्सा नहीं रखा जा सकता था, इसलिए उदयन ने चतुराई से उसे बातों में उलझाया और तगड़ा मेहनताना दे कर चलता कर दिया.

इस के बाद उस ने बक्सा गड्ढे में डाला और उस पर चबूतरा बना दिया. खूबसूरती बढ़ाने के लिए उस पर मार्बल भी जड़ दिया.

2. यों पकड़ा गया

आकांक्षा शर्मा के मांबाप बांकुरा में परेशान थे, क्योंकि धीरेधीरे उन की बेटी ने एसएमएस के जरीए भी बात करना कम कर दिया था. कुछ दिनों तक तो उन्होंने सब्र रखा, लेकिन किसी अनहोनी का शक उन्हें हुआ, तो उन्होंने आकांक्षा की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करा दी.

बांकुरा क्राइम ब्रांच ने जब आकांक्षा के मोबाइल फोन की लोकेशन ट्रेस की, तो वह साकेत नगर, भोपाल की निकली. आकांक्षा के पिता शिवेंद्र शर्मा भोपाल आए और उदयन से मिले, क्योंकि आकांक्षा उन्हें उस के बारे में पहले बता चुकी थी.

उदयन ने उन्हें गोलमोल बातें बनाते हुए चलता कर दिया कि आकांक्षा तो न्यूयौर्क में नौकरी कर रही है. शिवेंद्र शर्मा के हावभाव देख कर समझ तो गए कि दाल में कुछ काला जरूर है, पर कुछ कहने की हालत में नहीं थे.

बांकुरा जा कर उन्होंने फिर पुलिस पर दबाव बनाया, तो क्राइम ब्रांच के टीआई अमिताभ कुमार 30 जनवरी, 2017 को अपनी टीम समेत भोपाल आए और गोविंदपुरा इलाके के सीएसपी वीरेंद्र कुमार मिश्रा से मिल कर उन्हें सारी बात बताई. इस पुलिस टीम के साथ आकांक्षा का छोटा भाई आयुष सत्यम भी था, जो बहन की चिंता में घुला जा रहा था.

पुलिस वालों ने योजना बना कर उदयन की निगरानी की, तो उस की तमाम हरकतें रहस्यमय निकलीं. 31 जनवरी, 2017 और 1 फरवरी, 2017 को पुलिस उदयन की निगरानी करती रही. इस से ज्यादा कुछ और हासिल नहीं हुआ, तो उन्होंने 2 फरवरी को उदयन के घर एमआईजी 62, सैक्टर 3-ए, साकेत नगर पर दबिश डाल दी.

उस वक्त उदयन दरवाजे पर ताला लगा कर अंदर बैठा था. गोविंदपुरा थाने के एएसआई सत्येंद्र सिंह कुशवाह छत के रास्ते अंदर गए और उदयन से मेन गेट का ताला खुलवाया, फिर तमाम पुलिस वाले अंदर दाखिल हुए.

अंदर का नजारा अजीबोगरीब था. उदयन का सारा घर धूल और गंदगी से भरा पड़ा था. तीनों कमरों में तकरीबन 10 हजार सिगरेट के ठूंठ बिखरे पड़े थे और शराब की खाली बोतलें भी लुढ़की पड़ी थीं. खाने की बासी प्लेटें भी पाई गईं, जिन से बदबू आ रही थी.

पर सब से ज्यादा हैरान कर देने वाली बात दूसरे कमरे में बना एक चबूतरा था, जिस के ऊपर फांसी का फंदा लटक रहा था और कमरों की दीवारों पर जगहजगह प्यारभरी बातें लिखी हुई थीं.

चबूतरे के बाबत पुलिस वालों ने सवालजवाब शुरू किए, तो पहले तो उदयन खामोश रहा, पर थोड़ी देर बाद ही उस ने फिल्मी स्टाइल में कहा कि उस ने आकांक्षा का कत्ल कर दिया है और उस की लाश इस चबूतरे के नीचे दफन है.

इतना सुनते ही पुलिस वालों के होश फाख्ता हो गए. उन्होंने तुरंत चबूतरे की खुदाई के लिए मजदूर बुला लिए. चबूतरा इतना पक्का था कि मजदूरों से नहीं खुदा, तो पुलिस वालों ने उसे जेसीबी मशीनों से खुदवाया. थोड़ी खुदाई के बाद निकला वह बक्सा, जिस में आकांक्षा की लाश 2 महीनों से पड़ी थी.

बक्सा खोला गया, तो उस में से आकांक्षा की मुड़ीतुड़ी हड्डियां निकलीं, जिन्हें पहले पोस्टमार्टम और फिर डीएनए टैस्ट के लिए भेज दिया गया.

3. खुली एक और कहानी

उदयन दास के मांबाप कहां हैं, यह सवाल भी अहम हो चला था. पुलिस वालों ने जब उन के बारे में पूछा, तो पहले तो उस ने उन्हें टरकाने की कोशिश की, पर जैसे ही पुलिस ने उस पर थर्ड डिगरी का इस्तेमाल किया, तो उस ने पूरा सच उगल दिया कि उस ने अपने मांबाप की हत्या अब से तकरीबन 5 साल पहले रायपुर वाले मकान में की थी और उन्हें लान में दफना दिया था.

मामला कुछ यों था. भोपाल में जब उदयन दास 7वीं जमात में था, तब उस ने एक दोस्त का स्कूल की दीवार पर सिर मारमार कर फोड़ दिया था. रायपुर आ कर भी उस की बेजा हरकतें कम नहीं हुई थीं. पढ़ाईलिखाई में तो वह शुरू से ही फिसड्डी था, पर रायपुर आ कर नशा भी करने लगा था.

मांबाप चूंकि उसे पढ़ाईलिखाई के बाबत डांटते रहते थे, इसलिए वह उन से नफरत करने लगा था. जब कालेज की डिगरी पूरी होने का वक्त आया, तो उस ने मांबाप से झूठ बोल दिया कि वह पास हो गया है. इस पर मांबाप ने उसे नौकरी करने को कहा, तो उसे लगा कि झूठ पकड़ा जाने वाला है. लिहाजा, उस ने मांबाप को ही ठिकाने लगाने का फैसला ले डाला.

एक रात जब पिता चिकन लेने बाजार गए हुए थे और मां ऊपर की मंजिल पर कमरे में कपड़े रख रही थीं, तो उस ने गला घोंट कर उन का कत्ल कर डाला. पिता जब बाजार से आए, तो उन की चाय में उस ने नींद की गोलियां मिला दीं और उन के गहरी नींद में चले जाने पर उन का भी गला घोंट दिया.

मांबाप की लाशें ठिकाने लगाने से उस ने मजदूर बुला कर लान में 2 बड़े गड्ढे खुदवाए और देर रात लाशें घसीट कर उन में डाल दीं और सीमेंट से उन्हें चुन दिया. मांबाप की हत्या करने के बाद उदयन ने रायपुर वाला मकान 30 लाख रुपए में बेच दिया और भोपाल आ कर साकेत नगर वाले घर में ऐशोआराम की जिंदगी जीने लगा.

निकम्मा और ऐयाश उदयन चालाक भी कम नहीं था. उस ने इंदौर से पिता का और इटारसी नगरपालिका से मां की मौत का झूठा सर्टिफिकेट बनवाया और उन की बिना पर सारी जायदाद अपने नाम करा ली.

मां की पैंशन के लिए जरूरी था कि उन के जिंदा होने का सर्टिफिकेट बनवाया जाए, जो उस ने साल 2012 में दिल्ली की डिफैंस कालोनी के एक डाक्टर से बनवाया और बैंक मुलाजिमों को घूस दे कर हर महीने पैंशन निकालने लगा.

वैसे, उदयन दास के मामले से एक सबक लड़कियों को जरूर मिलता है कि फेसबुक की दोस्ती उस वक्त जानलेवा हो जाती है, जब वे उदयन दास जैसे जालसाज और फरेबियों के चंगुल में फंस कर घर वालों से झूठ बोलने लगती हैं और एक अनजान आदमी से चोरीछिपे शादी कर लेती हैं, इसलिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल उन्हें सोचसमझ कर करना चाहिए.

4. सैक्स और सिर्फ सैक्स

गिरफ्तारी के बाद भोपाल से रायपुर और रायपुर से बांकुरा ले जाए गए उदयन दास को जब 20 फरवरी, 2017 को भोपाल लाया गया, तब पता चला कि शादी के बाद अपनी बीवी आकांक्षा शर्मा के साथ वह खानेपीने के अलावा सिर्फ सैक्स ही करता रहा था. लगता ऐसा है कि सैक्स उस के लिए जरूरत नहीं, बल्कि एक खास किस्म की बीमारी बन गई थी. लगातार सैक्स करने में वह थकता इसलिए नहीं था कि हमेशा नशे में रहता था.

मुमकिन है कि आकांक्षा शर्मा को उस की इस आदत पर भी शक हुआ हो और उस ने एतराज जताया हो, लेकिन चूंकि वह एक तरह से उस की कैदी सी हो कर रह गई थी, इसलिए जीतेजी किसी से इस बरताव का जिक्र नहीं कर पाई और पूछने पर उदयन ने पुलिस वालों को बताया कि वह जब 8वीं जमात में था, तब जेब में कंडोम रख कर चलता था कि क्या पता कब कोई लड़की सैक्स करने के लिए राजी हो जाए.

बाप ने बेटी के जिस्म को देखा और फिर हवस में अंधा होकर किया ये काम

अंबाला शहर में परिवार के लोग हरिद्वार गंगा स्‍नान के लिए गए थे और घर में पिता-पुत्री रह गए थे. घर में बेटी को अकेली देख पिता की नीयत खराब हो गई और उसने उसे दुष्‍कर्म का शिकार बना डाला. परिजन लौटकर आए तो बेटी ने मां से पेट दर्द की शिकायत की. इसके बाद उसे डॉक्‍टर को दिखाया गया तो सारा मामला उजागर हो गया. अब अदालत ने दुष्‍कर्मी पिता को उम्रकैद की सजा सुनाई है.

घर में बेटी को अकेली देख पिता ने उसे अपनी हवस का शिकार बना डाला. आरोप है कि बेटी ने विरोध किया तो उसने जान से मारने की धमकी दी. उसने बेटी को इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताने को कहा. परिवार के लोग हरिद्वार से लौटे तो लड़की को असहज पाया. पूछताछ करने पर लड़की ने मां को पेट में दर्द होने की बात कही.

इसके बाद वह उसे डॉक्टर के पास ले गई तो सारे मामले का खुलासा हो गया और लड़की ने मां को पिता की करतूत के बारे में बताया. इसके बाद मां ने आवाज उठाते हुए शहर के कोतवाली थाने में पति के खिलाफ मामला दर्ज करवाया. केस दर्ज करने के बाद पुलिस ने आरोपी पिता को गिरफ्तार कर लिया. एक साल दो माह चली सुनवाई के दौरान अदालत में 14 लोगों की गवाही हुई.

एडिशनल सेशन जज नरेंद्र सूरा की अदालत ने पिता को उम्रकैद के संग तीन हजार रुपये जुर्माना भी किया है. सुनवाई के दौरान पीड़िता लड़की और मां ने अपने बयान भी बदल लिए, लेकिन दोषी को बचा न सके.

शहर में डाले डेरे, बेखौफ हुए चेन लुटेरे

जयपुर में पुलिस की ढिलाई से चेन खींचने वाले गिरोहों की भरमार हो गई है. तकरीबन 15 साल पहले शहर में चेन खींचने की वारदातें करने वाले इंदर सिंधी और विनोद लांबा के 2 गिरोह थे, लेकिन ऐसे लोगों के खिलाफ पुलिस की कड़ी कार्यवाही की कमी के चलते सरेराह चेन खींचने वालों की तादाद लगातार बढ़ती ही गई. इस के चलते शहर में आज 2 दर्जन से ज्यादा चेन खींचने वाले गिरोह बन गए हैं. यही वजह है कि महज पिछले 5 महीनों में ही चेन खींचने वाले 60 से ज्यादा वारदातें कर शहर से तकरीबन 60 लाख रुपए की कीमत की चेन लूट ले गए हैं. चेन खींचने की लगातार बढ़ती वारदातों को देखते हुए पिछले दिनों पुलिस कमिश्नर खुद गश्त पर निकले, लेकिन गश्त ढीली पड़ने के साथ ही चेन खींचने वाले गिरोह फिर से हरकत में आ जाते हैं.

पुलिस सूत्रों ने बताया कि तकरीबन 15 साल पहले शहर में केवल इंदर सिंधी और विनोद लांबा के गिरोह ही इस तरह की वारदातों को अंजाम देते थे. हर वारदात के बाद पुलिस इन दोनों शातिर गिरोह की लोकेशन को ही सब से पहले ट्रेस किया करती थी.

इस के बाद खानाबदोश परिवारों के कुछ नौजवान शहर में चेन तोड़ने लगे, लेकिन पुलिस की ढिलाई और अनदेखी के चलते आज शहर की गलीगली में चेन खींचने वाले गिरोह बन गए हैं और ऐसी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं.

  1. लगाते चोरी की धारा

सूत्रों ने बताया कि ऐसे गिरोह खड़े होने के पीछे पुलिस का काम करने का तरीका बड़ी वजह है. पुलिस ने अपना रिकौर्ड अच्छा रखने के चक्कर में चेन खींचने की वारदातों को लूट की धाराओं में दर्ज करने के बजाय चोरी की धाराओं में ही दर्ज करने का सिस्टम बना लिया है.

शिकार लोग फौजदारी धाराओं के इस खेल को इतना समझते नहीं हैं. इस वजह से चेन तोड़ने का अपराध ज्यादा आसान लगने लग गया है. दूसरे अपराधों से जुड़े कई अपराधी भी इस के चलते चेन खींचने वाले अपराधी बन गए हैं.

इस के अलावा आदतन चेन खींचने को चोरी की धारा के चलते जमानत मिलने में आसानी हो गई है. जमानत पर जेल से बाहर आने के साथ ही ये अपराधी फिर से अपने धंधे में जुट जाते हैं.

2. नाकाम रहती है नाकाबंदी

चैन खींचने वाले शातिर हर वारदात से पहले इलाके की रेकी कर के ही इस को अंजाम देते हैं. फिर वे अपने शिकार को टारगेट करते हैं. मसलन, कोई औरत रोज मंदिर जाती है, तो उस के आनेजाने का समय नोट किया जाता है. साथ ही, उस के साथ जाने वाले लोग कहां तक उस के साथ जाते हैं, इसे भी ध्यान में रखा जाता है.

चेन तोड़ने वाले गिरोहों द्वारा वारदात करने से पहले एक रूपरेखा तैयार की जाती है कि चेन किस जगह से तोड़नी है और वहां से निकलने के लिए किस रास्ते से वे आसानी से भागने में कामयाब हो सकते हैं.

यही वजह है कि वारदात के बाद पुलिस नाकाबंदी के दौरान आज तक एक भी चेन खींचने वाला नहीं पकड़ा गया है. इस के पीछे पुलिस की लापरवाही को ही खास वजह माना गया है. पुलिस चेन खींचने वाले की लोकेशन पर निगाह रखने में नाकाम रहती है. इस से चेन चोरों का हौसला बढ़ जाता है.

3. महीनों का चैन

पकड़ में आए कुछ चेन खींचने वालों ने बताया कि जिस चेन को वे तोड़ते हैं, वह कम से कम डेढ़ से 3 तोले के बीच होती है. 3 तोले चेन की कीमत 80 से 90 हजार रुपए बैठती है. ऐसे में वे चेन को बेचने सुनार के पास जाते हैं, तो उन्हें अच्छाखासा पैसा मिल जाता है. महज कुछ पल की मेहनत के बाद उन्हें दोढ़ाई महीने तक काम की चिंता नहीं रहती. पैसा पूरा होने के बाद दूसरे टारगेट पर निशाना साधने निकल जाते हैं.

वकील बीएस चौहान का कहना है कि पुलिस को चेन खींचने के मामलों को लूट की धाराओं में ही दर्ज करना चाहिए. आईपीसी की धारा 309 में 10 साल की सजा का प्रावधान है, वहीं चोरी की आईपीसी की धारा 379 में महज 3 साल की सजा का प्रावधान है.

4. बरामदगी नहीं हो पाती

कई मामलों में पुलिस चेन खींचने वालों को पकड़ लेती है, मगर उन से बरामदगी नहीं कर पाती है. पुलिस का कहना है कि वारदात के बाद चेन खींचने वाले सुनार के पास जा कर उसे गलवा देते हैं.

हालांकि कई सुनारों को भी गिरफ्तार किया है, लेकिन यह भी नाकाफी है. बरामदगी नहीं होने और सुबूत नहीं मिल पाने से चोरों को सजा में राहत मिल जाती है.

5. मुहिम से पकड़ में आएंगे

चेन खींचने की वारदातों ने आम आदमी का चैन छीन लिया है. टोंक फाटक कालोनी की रहने वाली साक्षी शर्मा का कहना है कि चेन खींचने वालों को पकड़ने की मुहिम चलानी चाहिए. इस में एक महिला कांस्टेबल को चेन पहना कर सुबह की सैर पर भेजना चाहिए, ताकि बदमाशों को रंगे हाथों दबोचा जा सके.

महेश नगर इलाके में रहने वाली सोनाली शर्मा का कहना है कि पुलिस सुबह के समय नियमित रूप से गश्त करे, ताकि सुबह की सैर और मंदिर जाते समय चेन तोड़ने की वारदातों पर रोक लगाई जा सके.

6. ऐसे हो सकता है बचाव

चेन खींचने की वारदातों के लिए पुलिस को जन सहयोग से जगहजगह पर सीसीटीवी कैमरे लगाने चाहिए, ताकि किसी तरह का भी अपराध होता है, तो वारदात करने वाले बदमाश उस में तसवीर के रूप में कैद हो जाएं.

जितने भी कैमरे लगाए जाएं, वे नाइटविजन वाले होने चाहिए, ताकि रात में भी अपराधियों का चेहरा पूरी तरह से साफ नजर आए.

साथ ही, कैमरों की मौनीटरिंग रोजाना हो और इस के लिए पुलिस वाले रोजाना अपडेट लेते रहें. संदिग्ध लगने वाले लोगों पर कड़ी नजर रखी जाए.

पुलिस के कुछ जवानों को भीड़ भरे बाजार और यातायात के बीच से मोटरसाइकिल चलाने की ट्रेनिंग देनी चाहिए, ताकि वे बदमाशों को पकड़ने का हुनर सीख सकें. इस के लिए किसी गैरसरकारी संस्था की मदद भी ली जा सकती है.

7. औरतें ये सावधानियां बरतें

* साड़ी या सूट इस तरह पहनें कि गले से चेन दिखाई नहीं दे.

* सुबह की सैर व मंदिर जाते समय निगाह रखें कि कोई उन का पीछा तो नहीं कर रहा है.

* वारदात के बाद बदमाशों का गाड़ी नंबर जरूर देखें और उसे याद रखें.

* असली गहने पहनने से अच्छा है कि नकली गहने पहन कर अपना शौक पूरा कर लें.

* किसी अनजान को घर के आसपास घूमता देख तुरंत पुलिस को सूचना दें.

सत्यकथा- प्यार की ये कैसी सजा

सुबह के करीब 7 बजे होंगे. थानाप्रभारी आशीष चौधरी नाइट ड्यूटी से अपने घर लौटे थे. वरदी उतार कर खूंटी से टांग ही रहे थे कि उन के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. काल करने वाला उन के ही सिलवानी थाने का कांस्टेबल था. काल रिसीव करते ही आशीष चौधरी ने जैसे ही हेलो कहा, दूसरी तरफ से आवाज आई.

‘‘सर, जमुनिया घाटी पर कोई एक्सीडेंट हुआ है, जिस में 2 युवतियां घायल हुई हैं.’’

पूरी बात सुने बिना ही थानाप्रभारी ने निर्देश दिया ‘‘उन्हें तत्काल हौस्पिटल में एडमिट कराओ.’’

कांस्टेबल ने जानकारी देते हुए बताया, ‘‘सर, घायल युवतियों को एक एंबुलेंस चालक ने सिविल अस्पताल सिलवानी में भरती करा दिया है.’’

‘‘ओके, ड्यूटी पर तैनात स्टाफ को हौस्पिटल भेजो. मैं भी पहुंच रहा हूं.’’

इतना कह कर वह अपनी वरदी को खूंटी से उतार वह फिर से तैयार होने लगे. घर में उन की पत्नी ने शिकायती लहजे में कहा, ‘‘पुलिस की नौकरी में रातदिन चैन कहां.’’ यह बात 28 जून, 2021 की है.

यह पहला अवसर नहीं था, जब थानाप्रभारी आशीष घर लौटने के बाद फिर से ड्यूटी पहुंच रहे थे. पिछले 8-10 साल की नौकरी का उन का अनुभव यही था कि पुलिस की नौकरी में सातों दिन और चौबीसों घंटे अपना फर्ज निभाना पड़ता है.

सिलवानी थाने के प्रभारी आशीष चौधरी एसआई रामसुजान पांडे को साथ ले कर सिविल हौस्पिटल पहुंचे तो वहां का नजारा देख कर दंग रह गए. हौस्पिटल में भरती दोनों युवतियों के कपड़े खून से सने हुए थे.

दोनों युवतियों के गले पर बने घावों को देख कर सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता था कि इन दोनों को जान से मारने की नीयत से उन पर धारदार हथियार से हमला किया गया था.

हौस्पिटल में मौजूद पुलिस स्टाफ ने मेडिको लीगल एक्सपर्ट को बुलाया तो उन्होंने बताया कि दोनों युवतियां एक्सीडेंट में घायल नहीं हुई हैं. भोपाल से सिलवानी की तरफ आ रहे एंबुलेंस चालक शाहरुख खान को दोनों युवतियां जमुनिया घाटी के ऊपर सड़क पर घायल अवस्था में मिली थीं. शाहरुख की नजर खून से लथपथ सड़क पर पड़ी इन युवतियों पर पड़ी तो गाड़ी रोकी.

एंबुलेंस चालक ने तत्काल पुलिस को सूचना दी और वहां से निकल रहे एक डंपर को रोक कर ड्राइवर सुरेंद्र सिंह की मदद से दोनों को तत्काल सिविल अस्पताल सिलवानी ले कर आ गया.

पहले तो शाहरुख भी यही समझ रहा था कि किसी गाड़ी ने इन्हें टक्कर मारी होगी, लेकिन घायल युवतियों ने उसे बताया कि उन दोनों को धक्का दे कर घाटी से नीचे धकेला गया है.

युवतियों का प्राथमिक उपचार सिलवानी में कराने के बाद जब उन की हालत सामान्य हुई तो उन के बयान लिए गए. आगे के इलाज के लिए रायसेन जिला अस्पताल रेफर करने के पहले उन दोनों से पूछताछ की तो उन्होंने अपने नाम जरीना और तबस्सुम बताए. पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह दिल दहलाने वाली थी.

मंडला जिले की निवास तहसील में रहने वाले जाकिर खान (परिवर्तित नाम) की 2 बेटियां जरीना और तबस्सुम हैं. जाकिर खान की माली हालत इतनी अच्छी नहीं थी, इसलिए वह हमेशा इस बात के लिए चिंतित रहता कि बेटियों की शादी किस तरह होगी. जरीना और तबस्सुम आजाद खयालात रखने वाली थीं.

पिता के कंधों का बोझ कम करने के लिए 22 साल की जरीना और 20 साल की तबस्सुम करीब ढाईतीन साल पहले नौकरी की तलाश में भोपाल आ गईं. उन्हें भोपाल के आदर्श प्रिंटिंग प्रेस में काम मिल गया तो जरीना और तबस्सुम अशोका गार्डन में किराए के मकान में रहने लगीं.

करीब 2 साल पहले की बात है. दोनों बहनें प्रिंटिंग प्रेस पर अपने काम में व्यस्त थीं, तभी एक युवक प्रेस पर आया. काउंटर पर बैठी जरीना से वह वोला, ‘‘मुझे मैडिकल स्टोर्स की बिल बुक प्रिंट करानी है.’’

अपने काम में व्यस्त जरीना ने कागज पेन देते हुए उस नवयुवक से बिल बुक का मैटर बनाने को कहा. थोड़ी देर बाद जरीना ने नजरें उठा कर जैसे ही उस युवक को देखा तो बस देखती ही रह गई.

गोरे रंग के स्मार्ट लड़के ने उसे सम्मोहित कर दिया था. जरीना ने और्डर बुक करते हुए उस का नाम व मोबाइल पूछा तो उस लड़के ने अपना नाम निखिल गौर बताया.

21 साल का निखिल भोपाल के सुभाष नगर इलाके में रहता था. निखिल ने बिल बुक प्रिंट होने की जानकारी लेने के लिए जरीना का मोबाइल नंबर भी ले लिया.

बिल बुक प्रिंट होने की जानकारी लेने की गरज से निखिल और जरीना की रोज मोबाइल फोन पर बातें होने लगीं. इस तरह जरीना की निखिल से दोस्ती हो गई. तबस्सुम अब बड़ी बहन जरीना को घंटों फोन पर ही बिजी देखती.

कभीकभी निखिल अपने दोस्त करण परिहार को ले कर आदर्श प्रिटिंग प्रेस पर जरीना से मिलने जाता था. 20 साल का करण गोविंदपुरा भोपाल का रहने वाला था. जब निखिल जरीना के साथ प्यारमोहब्बत की बातें करता तो तबस्सुम और करण भी एकदूसरे से नजरें मिलाने लगे.

इसी दौरान तबस्सुम की दोस्ती भी करण सिंह परिहार से हुई जो पाइप फैक्ट्री में काम करता था.

अब दोनों बहनें दोस्तों की तरह अपने प्यार की चर्चा आपस में करती रहती थीं. धीरेधीरे दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई .जब भी उन्हें समय मिलता वे अपने बौयफ्रैंड निखिल गौर और करण सिंह परिहार के साथ घूमने निकल जातीं.

किसी पार्क में दोनों प्रेमी जोड़े बाहों में बाहें डाले घूमते और एकांत पाते ही एकदूसरे को चूमते हुए प्यार का इजहार करते. दोनों बहनों का प्यार अब परवान चढ़ चुका था. जरीना और तबस्सुम अपने बौयफ्रैंड के बिना एक दिन भी नहीं रह पाती थीं.

उन्हें जब भी मौका मिलता अशोका गार्डन के किराए वाले कमरे में निखिल और करण को बुला लेतीं. जरीना और तबस्सुम के अपने प्रेमियों के साथ शारीरिक संबंध भी बनने लगे.

जवानी की दहलीज पर कदम रखने वाले इन प्रेमियों में तजुर्बे की कमी थी. भले ही वे प्रेम की पींगें बढ़ा रहे थे, मगर उन का प्यार वासना के रंग में रंगा हुआ था. यही वजह थी कि एकदूजे के प्यार में पागल प्रेमी जोड़े इस कदर डूब जाते कि उन्हें शारीरिक संबंध बनाते समय रखने वाली सावधानियों का ध्यान ही नहीं रहता.

बिना सोचेविचारे बनाए गए असुरक्षित यौन संबंधों के चलते जरीना और तबस्सुम पेट से हो गईं. पेट से होते ही दोनों अपने प्रेमियों पर शादी करने का दबाव बनाने लगीं.

निखिल और करण इतनी जल्दी शादी के लिए तैयार नहीं थे. पहले तो दोनों ने एक निजी क्लीनिक में उन का गर्भपात करा दिया और जब शादी का जिक्र होता तो दोनों चुप्पी साध कर रह जाते.

एक रात जरीना से मिलने निखिल उस के कमरे पर आया था. जरीना से मिलते ही निखिल उसे अपनी बाहों में भरने को बेताब हो रहा था, परंतु जरीना ने उसे अपने से दूर करते हुए निखिल से कहा, ‘‘देखो निखिल, तुम मेरी जिंदगी के साथ खिलवाड़ मत करो. मेरे साथ शादी कर लो, वरना मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी.’’

हमेशा की तरह निखिल ने जरीना का मन बहलाते हुए कहा, ‘‘मेरी जान, मैं शादी करने के लिए खुद तैयार हूं, लेकिन घर वाले आसानी से मानने वाले नहीं हैं. मुझे डर है कि वे कोई बखेड़ा खड़ा न कर दें.’’

‘‘प्यार में डर कैसा निखिल, हम कहीं मंदिर में शादी कर लेते हैं.’’ जरीना बोली.

‘‘मैं करण से बात कर के कोई तरकीब सोचता हूं, मुझे थोड़ा वक्त और दो जरीना.’’ निखिल ने उस के माथे को चूमते हुए कहा.

उस दिन के बाद निखिल जब करण से मिला तो करण ने बताया कि तबस्सुम भी उस पर शादी करने दबाब डाल रही है.

दोनों ने प्यार के नाम पर मजे तो खूब लूट लिए, मगर शादी करने के नाम से उन के पसीने छूट रहे थे. निखिल और करण को यह उम्मीद कतई नहीं थी कि ये लड़कियां हाथ धो कर उन के पीछे ही पड़ जाएंगी.

निखिल के पिता का कुछ समय पहले देहांत हो गया था. घर में उस की मां और एक भाई था. मां को उस से काफी उम्मीदें थीं. करण के पिता रात की पारी में सिक्युरिटी गार्ड की नौकरी करते थे.

निखिल और करण को पता था कि दूसरे धर्म की लड़कियों से उन के घर वाले कभी शादी करने की इजाजत नहीं देंगे. रातदिन निखिल और करण इसी चिंता में परेशान रहने लगे. उन का प्यार का भूत उतर चुका था.

जरीना और तबस्सुम के साथ जीनेमरने की कसमें खाने वाले निखिल और करण ने आखिरकार ऐसा निर्णय ले लिया, जिस की कल्पना जरीना और तबस्सुम ने कभी सपने में भी नहीं की होगी.

दोनों ने अपनी प्रेमिकाओं को हमेशा के लिए अपने रास्ते से हटाने की योजना बना ली. निखिल और करण ने जरीना और तबस्सुम को झांसा दिया कि हम लोग शादी करने को राजी हैं. करण ने चालबाजी के साथ कहा ‘‘भोपाल में शादी करने में घर वाले रोड़ा बन सकते हैं.’’

निखिल ने बात को आगे बढ़ाते हुए सुझाव दिया, ‘‘मेरे एक चाचा रायसेन जिले के सिलवानी में रहते हैं. हम ने उन के बेटे अंकित को सब कुछ बता दिया है. हम वहां पहुंच कर शादी कर लेंगे.’’

जरीना और तबस्सुम निखिल और करण के शादी के लिए रजामंद होने से खुशी के मारे चहक रही थीं. योजना के मुताबिक निखिल व करण ने दोनों युवतियों को सिलवानी चलने को कहा.

रविवार 27 जून, 2021 की शाम को 6 बजे निखिल व करण तथा जरीना और तबस्सुम को ले कर भोपाल से सिलवानी के लिए दीपक ट्रेवल्स की एक बस में सवार हो कर रवाना हो गए.

रात करीब 11 बजे सिलवानी पहुंचने से पहले ही योजनाबद्ध तरीके से युवकों ने बस को जमुनिया घाटी के पास रुकवाया. बस के रुकते ही चारों लोग बस से उतर गए. निखिल का चचेरा भाई अंकित पटेल बाइक ले कर वहां पहले से उन का इंतजार कर रहा था. अंकित पहले बाइक पर करण व तबस्सुम को बैठा कर घाटी की ओर ले गया. तबस्सुम दोनों के बीच में बैठी थी.

बमुश्किल 2-3 किलोमीटर का फासला तय हुआ था कि करण ने तबस्सुम के दुपट्टे से गले में फंदा डाल दिया. पहले तो तबस्सुम को लगा कि करण उस के साथ कोई चुहलबाजी कर रहा है, मगर जब उस का दम घुटने लग तो वह तड़पने लगी. फिर बाइक रोक कर दोनों ने तबस्सुम पर चाकू से हमला कर के उसे वहीं छोड़ दिया.

फिर अंकित अकेला बाइक ले कर निखिल और जरीना को लेने चला गया. जरीना के वहां पहुंचते ही निखिल ने उस के सिर पर पत्थर से हमला कर दिया. अचानक हुए इस हमले से जरीना बेहोश हो गई. दोनों बहनों को गंभीर रूप से घायल कर मरणासन्न हालत में निखिल, करण और अंकित ने घाटी के नीचे जंगल में फेंक दिया.

तीनों वहां से बाइक से नौनिया बरेली गांव पहुंच गए. वहां जा कर उन्होंने एक हैंडपंप पर अपने कपड़ों पर लगे खून के दागधब्बों को धो लिया. इस के बाद निखिल और करण को सुबह की बस में भोपाल की ओर रवाना कर अंकित वहां से अपने गांव मढि़या पगारा चला गया.

रात के चौथे पहर में जब जरीना और तबस्सुम को होश आया तो उन्होंने अपने आप को एक गहरी खाई में पाया. खून से लथपथ दोनों बहनें दर्द से कराह रही थीं. हिम्मत जुटा कर जैसेतैसे दोनों बहनें धीरेधीरे घाटी चढ़ कर सड़क पर आ गईं.

तब तक सुबह का उजाला दिखने लगा था. दोनों बहनें सड़क से गुजरने वाले वाहनों को हाथ हिला कर रोकने का इशारा करतीं, मगर कोई उन की मदद के लिए नहीं रुक रहा था.

तभी भोपाल से सिलवानी की तरफ जा रहे एक एंबुलेंस के चालक शाहरुख की नजर सड़क पर खून से लथपथ उन दोनों बहनों पर पड़ी. उस ने एंबुलेंस रोक कर देखा तो दोनों के कपड़े खून से सने थे और वे दर्द से कराह रही थीं.

शाहरुख ने सड़क से गुजर रहे एक डंपर को रोक कर उस के ड्राइवर से मदद मांगी. डंपर ड्राइवर सुरेंद्र सिंह की मदद से दोनों बहनों को वह सिलवानी अस्पताल ले आया. इस तरह जरीना और तबस्सुम की जान बच गई.

सिलवानी थानाप्रभारी आशीष चौधरी सूचना मिलते ही अपने स्टाफ के साथ अस्पताल पहुंच गए तथा युवतियों का प्राथमिक उपचार सिलवानी में कराने के बाद रायसेन जिला अस्पताल भिजवा दिया.

दोनों बहनों की हालत में सुधार होने पर उन के बयान के आधार पर पुलिस ने निखिल गौर निवासी सुभाष नगर भोपाल, करण सिंह परिहार निवासी गोविंदपुरा, भोपाल और अंकित पटेल निवासी मढि़या पगारा, सिलवानी के खिलाफ भादंवि की धारा 307, 201, 34 के तहत मामला दर्ज कर लिया.

अपने जिन प्रेमियों निखिल और करण परिहार के लिए दोनों बहनों ने घरपरिवार तक छोड़ दिया, उन्होंने ही दोनों बहनों को मौत की कगार पर ला खड़ा किया. रात के अंधेरे में दोनों बहनों पर धारदार हथियारों से हमला किया और मृत समझ कर घाटी से नीचे फेंक कर फरार हो गए.

जरीना और तबस्सुम को मरा समझ कर गहरी घाटी में धकेल कर निखिल और करण निश्चिंत हो गए थे. अपने प्लान को सफल मान कर वे बस में सवार हो कर भोपाल अपने घर जा रहे थे. दोनों को अब इस बात का सुकून मिल गया था कि अब उन्हें जबरदस्ती उन लड़कियों से शादी नहीं करनी पड़ेगी.

सुबह करीब 9 बजे दोनों बस से उतर कर अपनेअपने घर चले गए.

रायसेन जिले की एसपी मोनिका शुक्ला ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए सिलवानी पुलिस टीम को जल्द ही दोनों आरोपी प्रेमियों को गिरफ्तार करने के निर्देश दिए.

सिलवानी पुलिस ने सब से पहले मढि़या पगारा गांव के अंकित को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो उस ने बताया कि अपने चचेरे भाई निखिल के कहने पर वह बाइक ले कर जमुनिया घाटी पहुंचा था.

निखिल और करण की तलाश में सिलवानी पुलिस थाने की एक टीम भोपाल रवाना हो गई. भोपाल के अशोका गार्डन थाना पुलिस की मदद से निखिल और करण के बताए गए पते पर पहुंची तो दोनों घर पर ही मिल गए. पुलिस को घर आया देख कर उन के हाथपैर कांपने लगे.

दोनों को हिरासत में ले लिया. अशोका गार्डन पुलिस थाने ला कर उन से पूछताछ की तो निखिल और करण ने पूरी सच्चाई पुलिस को बता दी.

निखिल और करण की निशानदेही पर वारदात के समय प्रयुक्त चाकू और मुंह बांधने का एक कपड़ा पुलिस ने घटनास्थल से बरामद कर लिया.

युवतियों के बयान के आधार पर पुलिस ने भोपाल अशोका गार्डन पुलिस की मदद से आरोपी तीनों युवकों निखिल गौर, करण सिंह परिहार और अंकित पटेल को हिरासत में ले कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हे बेगमगंज जेल भेज दिया गया.

नौकरी की तलाश में भोपाल आईं 2 सगी बहनें जवानी की इस उम्र में प्यार तो कर बैठीं, मगर उन्हें यह मालूम नहीं था कि दुनिया में प्यार के नाम पर धोखा देने वालों की कमी नहीं है.

प्यार का नाटक कर वासना की आग बुझाने वाले निखिल और करण को जरीना और तबस्सुम ने अपने प्रेमियों को भरपूर प्यार दिया, मगर दोनों प्रेमियों ने उन्हें प्यार की जो सजा दी उसे वे ताउम्र नहीं भूल सकतीं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में पीडि़त युवतियों के भविष्य को देखते हुए उन के नाम परिवर्तित कर दिए हैं.

Crime Story: धोखाधड़ी- फ्रैंडशिप क्लब सैक्स और ठगी का धंधा

लेखक- बृहस्पति कुमार पांडेय

इन इश्तिहारों में बिना पता लिखे कुछ मोबाइल नंबर भी दिए होते हैं जिन में कुछ घंटों में ही हजारों रुपए कमाने के दावे भी किए जाते हैं.

मैं ने भी इस तरह के तमाम इश्तिहार कई बार अखबारों में देखे हैं, लेकिन एक दिन मेरी नजर उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रेलवे स्टेशन रोड के कुछ मकानों पर चिपके पोस्टरों पर पड़ी. उन पोस्टरों पर मेरा ध्यान इसलिए चला गया क्योंकि उन में भी अखबारों में छपने वाले फ्रैंडशिप क्लब जैसा ही कुछ लिखा था.

मैं ने जब नजदीक जा कर उन पोस्टरों को देखा तो उन में ‘सौम्या फ्रैंडशिप क्लब’ के बारे में लिखा था और उन में उन बेरोजगार नौजवानों को रिझाने वाली कुछ लाइनें भी लिखी थीं जो बिना कुछ किएधरे अमीर बनने के सपने देखते हैं.

पोस्टरों में कुछ इस तरह से लिखा था कि हाई प्रोफाइल लड़कियों के साथ दोस्ती और मीटिंग कर के कुछ ही घंटों में कमाएं 1,500 से ले कर 3,500 रुपए रोजाना.

मैं ने इस क्लब की असलियत जानने के लिए अपने मोबाइल फोन का काल रिकौर्डर औन कर उन में से एक नंबर पर फोन मिला दिया. कुछ देर घंटी बजने के बाद जब उधर से फोन उठा तो एक मर्दाना आवाज आई और बोला गया कि ‘सौम्या फ्रैंडशिप क्लब’ में आप का स्वागत है. बताइए, मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं?

मैं ने उस शख्स से कहा कि मैं ने उस के पोस्टर में से यह नंबर देख कर उसे फोन किया है और मैं भी हाई प्रोफाइल लड़कियों से दोस्ती गांठ कर ढेर सारे पैसे कमाना चाहता हूं तो उधर से उस शख्स ने बड़े ही खुले शब्दों में कहा कि मुझे इस के लिए 800 रुपए जमा करा कर इस क्लब की मैंबरशिप लेनी होगी. इस के बाद मुझे एक कोड दिया जाएगा और फिर मेरे पास बड़े घरों की लड़कियों और औरतों के फोन आने शुरू हो जाएंगे.

ये वे लड़कियां और औरतें होंगी जो अकेली रहती हैं या जिन के पति बिजनैस के सिलसिले में अकसर घर से बाहर टूर पर रहते हैं या फिर वे औरतें होंगी जो विधवा हैं.

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उस आदमी ने आगे कहा कि मुझे ऐसी औरतों के फोन भी आएंगे जो एक से ज्यादा मर्दों के साथ संबंध रखती हैं. उस के बाद उधर से सैक्स से जुड़ी ऐसी बातें बताई जाने लगीं कि मेरे अंगअंग में जोश आने लगा.

मैं उस शख्स की सारी बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था और जब वह अपने क्लब के बारे में बहुतकुछ बता चुका था तो मैं ने उस से कहा कि क्या उसे फोन पर ऐसी बातें बताते हुए पुलिस में पकड़े जाने का डर नहीं है?

यह सुन कर उस शख्स ने बिना वजह पूछे कहा कि इस में जो भी नौजवान औरतें, लड़कियां या लड़के शामिल होते हैं, वे सब अपनी मरजी से आते हैं. ऐसे में पुलिस का डर किस बात का?

मैं ने उस से कहा कि उस ने इतनी सैक्सी बातें फोन पर की हैं, क्या उसे काल रिकौर्ड होने का डर नहीं है? तो उस आदमी ने जो बताया उस से मेरा चौंकना लाजिमी था, क्योंकि उस ने कहा कि उस ने ऐसा सौफ्टवेयर लगा रखा

है कि उस के मोबाइल पर होने वाली कोई भी बातचीत रिकौर्ड नहीं की जा सकती है.

इस के बाद उस आदमी ने मुझ से कहा कि वह मैंबरशिप के लिए कुछ देर में एक बैंक अकाउंट नंबर सैंड करेगा, फिर उधर से फोन कट गया.

फोन कटने के बाद मैं ने जब अपनी रिकौर्डिंग लिस्ट देखी तो सचमुच उस नंबर से हुई बातचीत का कोई भी अंश रिकौर्ड नहीं हुआ था.

मैं ने दोबारा जांचने के लिए अपने परिचित के मोबाइल पर हालचाल लेने के बहाने फोन किया और बाद में उस काल की रिकौर्डिंग चैक की, तो उस बातचीत की रिकौर्डिंग मौजूद थी.

फैल रहा कारोबार

फ्रैंडशिप के नाम पर नौजवानों को फांसने का धंधा पूरे देश में फैला हुआ है. आप किसी भी शहर में चले जाएं वहां के लोकल अखबारों से ले कर दीवारों तक पर इन के इश्तिहार मिल जाएंगे. फ्रैंडशिप क्लब का धंधा करने वालों में औरतें और मर्द दोनों शामिल हैं.

फ्रैंडशिप के नाम पर सैक्स और ठगी का धंधा करने वाले अकसर पुलिस से बचने के लिए एक शहर से दूसरे शहर में ठिकाने बदलते रहते हैं, जिस से अगर कोई शिकायत भी करे तो फंसने के चांस कम हो जाएं.

इसी तरह के एक गिरोह का परदाफाश नागपुर पुलिस ने एक आदमी की शिकायत पर तब किया था, जब उसे इस गिरोह के लोगों ने सवा लाख रुपए का चूना लगा दिया था. इस के बाद पुलिस ने इस गिरोह के लोगों को दबिश डाल कर गिरफ्तार किया था.

इन गिरफ्तार लोगों में ‘निशा फ्रैंडशिप क्लब’ चलाने वाले गिरोह में मुखिया रितेश उर्फ भैरूलाल भगवानलाल, सुवर्णा मिनेश निकम, पल्लवी, विनायक पाटिल, शिल्पा समीर साखरे और निशा सचिन साठे शामिल थे. ये लोग महाराष्ट्र के ठाणे से राजस्थान तक अपना जाल फैलाए हुए थे. ये लोग सैकड़ों सिम रखते थे और जिस सिम से ये लोग ग्राहक को फांसते थे उसे ठगी के बाद बंद कर देते थे.

पुलिस गिरफ्त में आने के बाद इन के अलगअलग बैंकों में 20 खातों की जांच की गई तो उन में हर रोज बड़ेबड़े ट्रांजैक्शन सामने आने के बाद बीसियों खातों को सीज कर दिया गया.

दोस्ती के नाम पर ठगी

जो लोग इस तरह के गिरोह के चक्कर में पड़ते हैं उन से पहले क्लब की मैंबरशिप फीस के नाम पर अमूमन 1000 रुपए से ले कर 10,000 रुपए तक ऐंठ लिए जाते हैं. फिर इन से मैडिकल जांच और एचआईवी जांच के नाम पर 10,000 रुपए तक अलग से जमा कराए जाते हैं.

इन के चक्कर में फंसे नौजवान इस भरम में पैसे जमा करा देते हैं कि उन्हें तो हाई प्रोफाइल लोगों से दोस्ती के साथ ही कुछ घंटों के मजे के एवज में मोटी रकम हर रोज मिलनी ही है, पर जैसे

ही इन अकाउंट पैसे जमा करने की जानकारी दी जाती है उस के बाद क्लब के जिस मोबाइल नंबर से बात होती है, वह स्विच औफ हो जाता है.

इन क्लबों के शिकार नौजवान शर्मिंदगी के चलते अपने ठगे जाने की बात न तो परिवार वालों को बताते हैं और न ही पुलिस के पास जाते हैं, इसलिए इन क्लबों का यह धंधा फलताफूलता रहता है.

सैक्स और ब्लैकमेलिंग

फ्रैंडशिप क्लब में मैंबरशिप लेने के बाद क्लब की तरफ से एक कोड दिया जाता है. उस के बाद कुछ मोबाइल नंबर दिए जाते हैं.

मैंबरशिप लेने वाले को यह बताया जाता है कि ये नंबर उन के हैं जो नएनए लोगों के साथ बिस्तर गरम करने की चाहत रखते हैं. कुछ मामलों में तो फ्रैंडशिप क्लब की मैंबरशिप लेने वाले लोगों को आपस में ही फ्रैंड बना कर उन्हें सैक्स करने के लिए उकसाया जाता है और फिर जब बात संबंध बनने तक पहुंचती है तो ये लोग सैक्स के लिए महफूज जगह के नाम पर कमरे भी मुहैया कराते हैं, जहां इन के जाल में फंसे लोगों के सैक्स के दौरान के वीडियो बना कर उन्हें ब्लैकमेल किया जाता है.

कई बार इस गिरोह की औरतें सैक्स के शौकीन लोगों से किसी अमीर घर की औरत बन कर बातें करती हैं. जब मैंबर को पूरी तरह से यकीन हो जाता है तो वह उन के साथ बिस्तर गरम करने की इच्छा रख देता है.

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गिरोह की लड़कियां इन लोगों को ऐसी जगह पर बुलाती हैं जहां इन के साथ आसानी से वीडियो बनाया जा सके. इस के बाद ऐसे वीडियो के जरीए इस गिरोह के लोग मैंबर को लूटने लगते हैं. जब तक लुटने वाले लोगों को बात समझ में आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

कोड के जरीए धंधा

ये लोग अपने इश्तिहार के जरीए बड़े घरों की औरतों को फांसते हैं और फिर मैंबर बने नौजवानों को दिए गए कोड से उन औरतों से बात कराते हैं. फिर तय रकम में से 70 से 80 फीसदी कमीशन इस गिरोह वाले खुद ले लेते हैं, बाकी पैसा उस नौजवान को मिल जाता है.

लेकिन इस तरह के क्लबों के चक्कर में पड़ कर अकसर बड़े घरों की औरतें अपने पतियों की गाढ़ी कमाई तो लुटाती ही हैं साथ ही अपनी इज्जत भी गंवाती हैं. जो नौजवान

इन क्लबों के चक्कर में पड़ते हैं वे अपना कैरियर और अपने मांबाप के सपनों को दांव पर लगा देते हैं.

इन क्लबों की शिकार बड़े घरों की औरतें ज्यादा होती है, क्योंकि खुला जीवन जीने की चाहत इन्हें इस तरह से अपनी गिरफ्त में लेती है कि जल्दी ये उस से उबर नहीं पाती हैं. जो औरतें हिम्मत दिखाती हैं उन के चलते कई बार ऐसे गिरोह के लोग जेल भी गए हैं.

इस के साथसाथ आम लोगों को भी जागरूक होना पड़ेगा खासकर नौजवान तबके को, क्योंकि ऐसे क्लब उन की दुखती रग पर हाथ रखते हैं. वे जानते हैं कि नौजवान पीढ़ी को सैक्स के नाम पर भरमाया जा सकता है. मीठीमीठी बातों से उस से पैसे ऐंठे जा सकते हैं.

क्या कहते हैं जानकार

फ्रैंडशिप क्लबों द्वारा की जाने वाली ठगी से बचने के मामले को ले कर सामाजिक कार्यकर्ता विशाल पांडेय का कहना है कि आज के नौजवान शौर्टकट से अमीर बनने के सपने देखते हैं. साथ ही नईनई औरतों के साथ हमबिस्तरी की चाहत रखने वाले भी इस तरह के गिरोहों के जाल में आसानी से फंस जाते हैं, जिस के चलते ये नौजवान लंबे समय तक ब्लैकमेलिंग और ठगी के शिकार होते हैं.

शौर्टकट से पैसे कमाने के ऐसे सपने देखना सलाखों के पीछे पहुंचने की वजह बन जाता है, इसलिए अपनी काबिलीयत से पैसे कमाएं और अपने जीवनसाथी के प्रति ईमानदार रहें, नहीं तो इज्जत तो जाएगी ही, यह लत आप को कंगाल भी कर देगी.

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सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका उर्मिला वर्मा का कहना है कि अगर आप फ्रैंडशिप क्लबों के जाल में गलती से भी फंस जाएं तो हिम्मत दिखाएं और अपने परिवार वालों के साथ ही पुलिस में रिपोर्ट जरूर दर्ज कराएं. इस से दूसरे लोग ऐसे गिरोहों के चक्कर में पड़ने से बचेंगे, साथ ही इन का परदाफाश होने से लोगों में जागरूकता भी बढ़ेगी.

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