Story In Hindi: बेरंग – श्रुति से मुलाकात कहां हुईं थी

Story In Hindi: मेरा गला सूख रहा था. मैं ने अपने छोटे भाई को आवाज दी लेकिन कोई जवाब न पा कर मैं समझ गई कि सोनू सो चुका है. उसे न जगा कर मैं ने स्वयं ही पानी ढूंढ़ने की कोशिश की थी, उस रात पानी तो नहीं मिला लेकिन ‘ठक’ की तेज आवाज हुई. ‘‘दीदी, आप ठीक हो न,’’ सोनू की घबराई आवाज सुन कर मुझे बहुत शर्मिंदगी हुई. आखिर जगा ही दिया न मैं ने. ‘‘पूरा गिलास पानी पी लिया आप ने. इतनी प्यास थी फिर भी मुझे नहीं उठाया.

दीदी, मैं यहां आप का ध्यान रखने आता हूं. प्लीज, मेरी नींद का मत सोचा करो.’’ सोनू की मीठी सी हक भरी झिड़की सुनना मुझे अच्छा लग रहा था. ‘अब तो शायद जिंदगी भर केवल सुनना ही सुनना हो,’ मैं बुदबुदाई थी. अजीब सी हालत थी उस वक्त दिल की. कल क्या होगा यही सोचसोच कर मेरे पूरे शरीर में सिहरन सी दौड़ रही थी. रात के 3 बज रहे थे लेकिन नींद नहीं आ रही थी. रहरह कर श्रुति की याद आ रही थी. श्रुति, क्या अपनी आंखों से अब उस को कभी नहीं देख पाऊंगी? श्रुति मेरी स्कूल के समय की सहेली, मुझे अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी थी.

लेकिन आज लग रहा है कि अपनों से कहीं ज्यादा प्यार श्रुति मुझे करती थी. कुदरत का यह कैसा नियम है कि इनसान को जब नींद नहीं आती तो वह अपने अतीत को ही बारबार याद करता रहता है. मैं ने सोचा, चलो यह भी अच्छा है, कम से कम समय तो आसानी से कट जाएगा, वरना पिछले 18 दिन तो पहाड़ जैसे कटे थे. क्या करती मैं उन 18 दिनों में? चुपचाप लेटे रहने के अलावा मेरे पास और चारा भी क्या था. सारा शरीर, यहां तक कि मेरी आत्मा भी घायल हो चुकी थी.

कुछ भी करने लायक नहीं थी उस समय. एक गिलास पानी तक के लिए तो मैं दूसरों पर निर्भर थी. लेकिन हां, मेरी सोच पर तो मेरा बस था. मैं एक उच्च मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुई. मम्मी और पापा मुझे और छोटे भाई को बहुत प्यार करते हैं. बूआ, जो भरी जवानी में ही विधवा हो गई थीं, अपनी कोई औलाद न होने का दर्द, वह मुझे भरपूर प्यार दे कर दूर करती हैं. बूआ, पापा से उम्र में काफी बड़ी हैं. मैं इसलिए भी बूआ के बहुत करीब रही हूं क्योंकि उन की बातें मुझे बहुत अच्छी लगती थीं.

यह सच है कि बच्चे की जिस तरह परवरिश होती है वैसा ही वह बन जाता है. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. बूआ बहुत कम पढ़ीलिखी थीं. अंधविश्वासी भी बहुत थीं. बस, मुझ पर भी उन का अंधविश्वास हावी होता चला गया. बूआ का मानना था कि लड़की के लिए जो काम हैं वह हैं, सुंदर लगना, सजधज कर बैठना, पति की सेवा करना और बच्चे पालना. और भी जाने कितनी ही ऐसी बातें थीं जो बूआ ने मुझे बचपन में बताईं और मैं उन की सब बातें ग्रहण करती चली गई.

मैं स्कूल से लौटती तो बूआ को बताती, ‘बूआ, पता है आज वह सायरा मेरे साथ बैठी थी. वही काली सी.’ तब बूआ कहतीं, ‘अरे, हम ब्राह्मण लोग हैं, तू टीचर से नहीं कह सकती थी कि उस मलेच्छ के साथ न बैठाएं. एक तो काली, ऊपर से जाति की नीच.’ फिर बूआ मुझ पर गंगाजल छिड़कतीं और अच्छी तरह नहलातीं. श्रुति से मेरी मुलाकात छठी क क्षा में हुई थी. यों तो कक्षा में और भी लड़कियां थीं पर श्रुति सुंदर थी, शायद यही पहली खूबी थी जिस वजह से मैं ने उस की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था. पहली बार श्रुति मेरे साथ घर आई थी तो मैं बोली थी, ‘बूआ, यह श्रुति है.

पढ़ने में बहुत तेज है.’ बूआ को पढ़ाईलिखाई से क्या लेनादेना था. वह बोलीं, ‘संजू, तेरी सहेली तो बहुत सुंदर और गोरी है.’ 12वीं कक्षा अच्छे नंबरों से पास कर के मैं ने कालिज में दाखिला लिया. श्रुति भी उसी कालिज में थी. हम ने सोचा हुआ था कि कभी भी अलग नहीं होंगे. समय के साथ हमारी दोस्ती बहुत मजबूत हो गई थी.

मैं कालिज में ‘ब्यूटी क्वीन’ क्या बनी कि सब मुझे ‘क्वीनी’ कह कर पुकारने लगे. बस, श्रुति ही मुझे ‘सजल’ कह कर पुकारती थी. सजल, तू क्या ले रही है, एन.सी.सी या एन.एस.एस. हमें इन दोनों में से किसी एक को चुनना था. मैं ने एन.सी.सी (नेशनल कैडेट कोर) ही चुना क्योंकि उस में कालिज के बाहर स्टेडियम आदि में ले जाया जाता था. लेकिन श्रुति ने एन.एस.एस (नेशनल सोशल सर्विस) लिया. उस के तहत उस ने ब्लाइंड स्टूडेंट प्रोजेक्ट लिया. उस का काम था खाली पीरियड में नेत्रहीन लड़कियों को पढ़ाना.

एक दिन उस ने मुझे कुछ बताया तो मैं खीज कर बोली थी, ‘देख श्रुति, तू उन्हें पढ़ाती है यह भलाई का काम है. लेकिन ये ‘डोनर कार्ड’ का क्या चक्कर डाल दिया है तू ने.’ ‘सजल, इन नेत्रहीन लड़कियों की तकलीफें देख कर मन बहुत भर आता है. इन से हम कुछ भी बात कर सकते हैं, लेकिन जानती है, मैं पूरापूरा ध्यान रखती हूं कि ‘देखो’ जैसे शब्द इन के आगे न बोलूं.’ ‘हां, श्रुति, मुझे भी इन्हें देख कर बहुत तरस आता है.’ ‘नहीं, सजल, इन के बारे में गलत धारणा बना बैठी है. ये दया के पात्र नहीं हैं.

बस, इन्हें हमारी मदद की थोड़ी जरूरत होती है, जो हम दे सकते हैं. ये लड़कियां बहुत मेहनती हैं. जानती है, हमें तो बने बनाए नोट्स गाइड के रूप में दुकानों पर मिल जाते हैं लेकिन ये लोग सारे उत्तर पहले बे्रल की मदद से लिखते हैं फिर उन्हें याद करते हैं.’ ‘तू डोनर कार्ड क्यों भर रही है?

मैं जानती हूं कि किसी के मरने के बाद उस की आंखें कुछ घंटों के भीतर दान करनी होती हैं. बस, ऐसा सोच कर ही तब मेरा मन दुखी हो गया था.’ श्रुति हंस पड़ी थी, ‘सजल, मरना तो सभी को है एक दिन. जीतेजी तो चल, हम अच्छे काम करते हैं और सब के काम आते हैं. लेकिन सोच, मरने के बाद भी अगर हम किसी के काम आएं तो मेरे खयाल में यह एक बहुत अच्छा काम है.’ ‘तुझे नहीं लगता कि ये डोनर कार्ड हर वक्त मौत का एहसास दिलाता रहेगा.?’ श्रुति कुछ बोली नहीं तो मैं गुस्से से वहां से चल पड़ी.

‘सुन, सजल, मेरी मान और तू भी कार्ड भर दे,’ वह हंसी तो मैं भुनभुनाती हुई वहां से चली आई. घर पहुंच कर बूआ को बताया तो वह हैरान थीं कि मेरी सहेली ऐसा कह सकती है. ‘इस में बुराई क्या है, दीदी?’ मम्मी के यह कहते ही बूआ भड़क उठी थीं, ‘बुराई की बात कर रही है, सुदेश? जानती भी है, अगर मौत के बाद कोई अंग निकल जाए तो अगले जन्म में उस अंग के बगैर जन्म होता है.’ बूआ की बात पर हमेशा की तरह मम्मी ने सिर हिलाया और चली गई थीं.

वैसे भी मम्मी की बूआ के आगे नहीं चलती थी. लेकिन बूआ के मुंह से पुनर्जन्म में अंगहीन होने की बात सुन कर मैं भयभीत हो गई थी. उम्र ही क्या थी मेरी, 18 साल. कालिज का पहला साल ही तो था. इस के बाद मैं ने श्रुति को बहुत समझाने की कोशिश की थी लेकिन वह टस से मस नहीं हुई थी और उस ने ‘डोनर कार्ड’ भर कर ही दम लिया था. श्रुति ने कालिज के पहले और दूसरे साल में 260 घंटे पढ़ाया था. वह अपनेआप में एक रिकार्ड था. मुझे एन.सी.सी. में कोई सर्टिफिकेट नहीं मिला था.

दरअसल परेड आदि से मेरी गोरी त्वचा झुलस जाती. बूआ ने जब मेरा रंग सांवला होते देखा तो मुझे परेड आदि में जाने से रोकने लगीं. मन से मैं भी यही चाहती थी. एक दिन श्रुति कालिज आई तो उसे देख कर मुझे हंसी आ गई. फिर 3 दिन बाद मैं उसे एक दुकान पर ले गई. ‘यह कहां ले आई मुझे?’ श्रुति ने हैरानी से पूछा. दुकान पर लगे बोर्ड की तरफ इशारा करते हुए मैं बोली, ‘पढ़, कहां खड़े हैं?’ वह कांटेक्ट लैंस की दुकान थी. दरअसल श्रुति को चश्मा लग गया था और मुझे उस का चश्मा लगाना पसंद नहीं आ रहा था.

मेरी बहुत जिद करने पर भी श्रुति लैंस लगवाने के लिए राजी नहीं हुई. तब मैं ने गुस्से में आ कर उस से बोलना बंद कर दिया. आखिर एक दिन उस ने हार मान अपने लिए लैंस बनवा लिए. मैं जानती थी वह मुझ से बात किए बगैर नहीं रह सकती थी.

तीसरे साल भी उस ने ब्लाइंड स्टूडेंट प्रोजेक्ट जारी रखा था. श्रुति कार चलाना सीख रही थी. जब वह अच्छी तरह सीख गई तब मैं यदाकदा उस के साथ कालिज आनेजाने लगी. एक दिन श्रुति घर आई हुई थी. बातोंबातों में पापा ने उसे बताया कि उन के एक दोस्त की बेटी की शादी है. वह तो आफिस से सीधे चले जाएंगे लेकिन हम सब को भी पहुंचना था.

अब समस्या यह थी कि शादी शहर से बाहर थी और टैक्सी से जाने के लिए बूआ तैयार नहीं थीं. तब श्रुति ने हम को सपरिवार छोड़ने की बात पापा से कही थी. उस दिन श्रुति दोपहर को ही हमारे घर आ गई थी पर वह कुछ थकीथकी सी लग रही थी. उस की आंखें भी सूजी हुई थीं, सो वह देर शाम तक सोती रही. जब मैं ने उसे जगाया और बताया कि उठ, अंधेरा होने लगा है तो वह हड़बड़ा कर उठी और जल्दील्दी तैयार होने लगी. तैयार होते समय श्रुति ने अपना बैग मुझे पकड़ा दिया था, जिसे मैं ने अपने पलंग पर रख दिया.

मैं, मम्मी व बूआ के साथ बाहर आई तो देखा श्रुति कार की पिछली सीट पर पड़े सामान को हटा रही थी. मैं श्रुति के साथ आगे बैठ गई. मम्मी, बूआ और सोनू पीछे बैठे हुए थे. कुछ देर बाद श्रुति ने मुझ से अपना बैग मांगा. ‘सौरी श्रुति, वह तो शायद घर पर ही रह गया.’ ‘सजल, मैं ने कहा था न कि बैग को कार में रख दो.’ ‘श्रुति बेटे, अगर बहुत जरूरी है तो अभी बहुत आगे नहीं आए हैं, वापस चलते हैं,’ मम्मी ने कहा तो बूआ भड़क गईं. ‘सुदेश, ऐसे आधे रास्ते मुड़ना बहुत बड़ा अपशकुन होता है,’ बूआजी लगातार बोले जा रही थीं. मम्मी का उतरा चेहरा श्रुति ने शीशे में देख लिया था.

वह शांत भाव से मम्मी से बोली, ‘नहीं, आंटी, ठीक है, वापसी में ले लूंगी.’ अभी हम रास्ते में ही थे कि पापा का मोबाइल पर फोन आ गया. बूआ ने उन से बात की. ‘श्रुति तेज चला न, क्या बैलगाड़ी चला रही है. आनंद हैरान हो रहा है कि हम अभी तक नहीं पहुंचे हैं.’ ‘जी बूआ,’ श्रुति तेज गाड़ी चलाने लगी. कार की रफ्तार अच्छीखासी थी पर बूआ को कुछ न कुछ कहना था सो बोलीं, ‘कल तक तो पहुंच ही जाएंगे न श्रुति, गाड़ी चलानी तो आती है न?’ बूआ का यों बोलना सोनू को अच्छा नहीं लगा.

सो वह बूआ को चुप होने के लिए बोलने लगा. बस, बूआ भड़क गईं. इधर मम्मी दोनों का बीचबचाव करने लगीं. तभी मैं चिल्लाई, ‘श्रुति, देख सामने….’ और फिर तेज धमाका हुआ, दर्द की लहर पूरे शरीर में फैल गई और फिर चारों ओर अंधेरा छा गया. मेरे पूरे बदन में दर्द हो रहा था. सिर में भी भारीपन महसूस हो रहा था. हाथ उठाने की कोशिश की तो उठा नहीं. आंखें खोलनी चाहीं तो खुलीं नहीं. अचानक मुझे याद आया कि हमारा तो एक्सीडेंट हुआ है. मैं जोर से चिल्लाई. ‘सोनू, सोनू, मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा, मेरा हाथ नहीं उठ रहा?’ मैं हांफने लगी थी.

फिर ध्यान आया कि सोनू भी तो पीछे ही बैठा था. पूछा, ‘हम कहां हैं सोनू, हमारी तो ट्रक से टक्कर हुई थी न? क्या हम अभी भी कार में ही हैं और तू ठीक है न?’ उस के हां कहने पर मुझे कुछ तसल्ली हुई. फिर मैं ने बाकी का पूछा. अचानक एक आवाज आई, ‘सिस्टर, इन्हें इंजेक्शन लगा दिया?’ ‘यह आवाज किस की थी, सोनू? कोई सिस्टर कह रहा था. हम कहां हैं?’ ‘दीदी,’ सोनू ने धीरे से कहा, ‘हम अस्पताल में हैं.’ ‘और मम्मी, बूआ और श्रुति?’ ‘वे सब अलगअलग कमरों में हैं.’

तभी माथे पर स्पर्श महसूस हुआ, ‘सजल, कैसी हो बेटा.’ ‘पापा, मैं ठीक नहीं हूं. मुझे बहुत दर्द हो रहा है. मैं आप को नहीं देख सकती. पापा, मुझे क्या हुआ है?’ मैं तेजतेज चिल्लाने लगी. तब 2 हाथों ने मुझे तेजी से पकड़ा और बांह पर इंजेक्शन लगाने का दर्द महसूस हुआ. इस के बाद मेरा दिमाग सुन्न हो गया. फिर ऐसे ही कई दिनों तक चलता रहा.

मैं अपनी आंखों के बारे में पूछती तो कोई संतोषजनक जवाब न मिलता. मेरी दुनिया तो केवल पीड़ा व आवाजों तक ही सीमित रह गई थी. कौन आ रहा है, जा रहा है, मुझे कुछ भी नहीं पता होता. बस, कदमों की आहट बता देती कि कोई है मेरे आसपास. कुछ दिनों बाद मम्मी मिलने आईं. मेरी आंखों पर बंधी पट्टी को धीरे से उन्होंने छुआ था. उन के कांपते हाथ उन की कमजोरी और दुख बता रहे थे. फिर 12 दिनों बाद बूआ भी मिलने आईं.

खिड़की के पास बैठे होने की वजह से शीशे के टुकड़े उन की कनपटी में घुस गए थे. वह मुझ से मिलते ही रोने लगी थीं. ‘दीदी, सजल ठीक है.’ मम्मी इतना ही बोल पाई थीं, ‘सोनू, बूआ को ले जाओ.’ ‘मम्मी, श्रुति कैसी है? वह अभी तक मिलने नहीं आई मुझ से.’ ‘जैसे तुम्हें बहुत चोटें आई हैं वैसे ही श्रुति को भी बहुत चोटें लगी थीं. बस, ठीक होते ही वह अवश्य आएगी,’ मम्मी का कांपता स्वर गूंजा था. इस के बाद मैं प्रतीक्षा कर रही थी उस दिन की, जब मेरी आंखों से पट्टी हटनी थी.

मम्मीपापा ने मुझे धीरेधीरे बताया था कि मैं 4 दिनों तक बेहोश रही थी. सामने से तेजी से आते ट्रक को श्रुति देख न सकी की. जब देखा तब तक संभलना बहुत मुश्किल था. हमारी और ट्रक की बहुत तेज टक्कर हुई थी. हमें अस्पताल में 3 घंटे लग गए थे. कांच के बारीक टुकडे़ मेरे चेहरे में घुस गए थे. घड़ी में 5 का घंटा बजा. सुबह होने वाली थी. पिछले कई दिनों से मेरे लिए दिनरात एक समान थे. सिर्फ घंटे की आवाज से ही दिन या रात होने का आभास होता था. उन दिनों एक ही सवाल मन में आता था, कैसे होती होगी उन लोगों की जिंदगी जो जन्मजात नेत्रहीन हैं.

मुझे तो फिर भी आस दिलाई गई है कि कल मेरी पट्टी खुलेगी और मैं फिर से देख सकूंगी. लेकिन वे लोग किस उम्मीद में जीते होंगे. क्या श्रुति जैसे लोगों के नेत्रदान की आस में? हां, वरना वे लोग कै से हंसते होंगे. मैं तब कितनी छटपटाई थी जब कुछ देख नहीं पा रही थी. आंखों से भले ही न रोई लेकिन दिल तो मेरा हर पल रोता रहा था. कितनी बेबस हो गई थी मैं. हो सकता है कुछ घंटों बाद जब पट्टी खुलेगी, मैं देख पाऊं और हो सकता है…. न भी देख पाऊं.

एक बार फिर से मेरा समूचा शरीर कांप उठा था. कुछ दिनों का अंधेरा मुझे बहुत कुछ सिखा गया था. सोचने लगी थी कि उस अंधेरे से यदि मैं उजाले की ओर न भी पहुंच सकी तो भी कुछ गम नहीं. कम से कम इस रंगीन दुनिया के कई रंग तो मैं देख पाई. अब तो मुझे यही रंग उन खास लोगों को भी दिखाने होंगे जो अब तक इन्हें देखने से वंचित रहे हैं. सोनू उठा और प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा तो मेरी तंद्रा भंग हुई. वह बोला, ‘‘दीदी, सुबह हो गई है. आप बैठना चाहेंगी.’’

मैं ने इशारे से कहा तो सोनू ने मुझे सहारा दे कर बैठा दिया. मेरी पट्टी खोली गई तो हलकी सी रोशनी भी चुभ रही थी. सामने मम्मी, पापा, मेरा भाई धुंधले से ही सही, लेकिन दिख रहे थे. मैं ने दोबारा आंखें बंद कर लीं. कुछ दिनों बाद मैं घर पर आराम कर रही थी. अभी मुझे बाहर निकलना मना था. मुझे श्रुति की बहुत याद आ रही थी. मैं ने उस के घर फोन मिलाया. फोन उस के नौकर ने उठाया था.

श्रुति को बुलाने के लिए कहा तो उस ने ऐसी बात कह दी कि मुझे सारा कमरा घूमता नजर आया. इतना बड़ा धोखा. मुझ से इतना बड़ा सच छिपाया गया था. श्रुति, मेरी सब से प्यारी सहेली, इस दुनिया में न थी. वह मुझ से बहुत दूर जा चुकी थी. मैं फूटफूट कर रो रही थी. ‘‘पापा, आप लोगों ने मुझ से झूठ क्यों बोला?’’ कुछ देर बाद मम्मी ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए सारी बात बताई. मुझे उस की मौत की खबर ने अंदर तक तोड़ दिया था.

इन दिनों मम्मी, बूआ को मेरे पास नहीं आने देती थीं. क्यों, मैं अच्छी तरह जानती थी. मेरा पूरा चेहरा चोटों की वजह से कुरूप हो गया था. मगर मुझे अब इस की परवा नहीं थी. असली सुंदरता क्या होती है, यह मैं अब जान चुकी थी. मेरी आंखों पर पट्टी क्या चढ़ी, बूआ की पढ़ाई हुई हर पट्टी उतर गई. एक दिन बूआ मेरे कमरे में आईं. उन का मुंह कुछ उतरा हुआ था. मैं चुपचाप बैठी रही. वह मेरे पास आईं और मेरे हाथ में कुछ रख दिया. जैसे ही मेरी नजर उस चीज पर पड़ी, मेरी रुलाई फूट पड़ी.

‘‘यह तो श्रुति का वही बैग है न बूआ, जिसे मैं जल्दी में घर पर ही भूल गई थी.’’ मैं ने कांपते हाथों से बैग खोला और अंदर हाथ डाला तो मेरे हाथ में कुछ चीजें आईं. उन चीजों को देख कर मुझे लगा कि धरती फटे और मैं उस में समा जाऊं. मेरे सामने उस का आई डोनर कार्ड, चश्मा, कांटेक्ट लैंस और किसी नेत्र विशेषज्ञ का पर्चा था. श्रुति को आंखों में इन्फैक्शन हो गया था. मुझे याद आया कि उस दिन उस की आंखें लाल हो रही थीं. इसीलिए उस ने लैंस नहीं पहने होंगे. मैं उस का बैग घर पर ही भूल गई थी. काश, मैं यह बैग लेना न भूली होती. उफ, यह मैं ने क्या किया, हमारी दोस्ती, उस का मुझे नाराज न करना ही उस की मौत का कारण बन गया. मैं तड़पती रही.

अगले दिन बूआ, मम्मी और पापा मेरे पास बैठे हुए थे. मेरी आंखों से अभी भी आंसू बह रहे थे. मम्मी ने धीरे से मेरे हाथ में कुछ रखा. आंसू पोंछ कर ध्यान से देखा तो मेरी आंखें फिर छलछला गईं. वह और कुछ नहीं उन तीनों के कार्ड थे. बूआ की आंखों में पश्चात्ताप के आंसू थे. मैं उन के गले लग गई. यह अंत नहीं है. श्रुति का डोनर कार्ड मेरे घर रहने के कारण उस की आंखें दान करने की इच्छा तो पूरी नहीं हो पाई थी, लेकिन कहना नहीं होगा कि मेरा डोनर कार्ड तो उस की नेत्रदान की इच्छा पूर्ण कर सकता है. मैं खुद को उस के मातापिता की गुनाहगार मानती हूं. जबतब मैं उन से मिलती रहती हूं. श्रुति की जगह तो नहीं ले सकती लेकिन उस की कमी का एहसास मैं एक प्रतिशत भी कर सकूं, यह मेरी कोशिश रहती है.मेरी जानपहचान वालों में से अब कई लोगों ने नेत्रदान का फैसला ले लिया है. मैं उसी कालिज से एम.ए. कर रही हूं और ब्लाइंड स्टूडेंट प्रोजेक्ट, जो श्रुति की जिंदगी का एक अटूट हिस्सा रहा है, से भी जुड़ी हुई हूं. जी चाहता है कि सारी दुनिया को बता दूं कि अंधविश्वास में डूबे लोग, मौत के बाद भी उजाले की आस रखते हैं, शायद इसीलिए नेत्रदान करने के खयाल मात्र से ही कांप जाते हैं. लेकिन एक बार, सिर्फ एक बार, केवल 1 घंटे के लिए अपनी आंखों पर पट्टी बांध कर देखें. तब मेरी तरह शायद उन्हें भी पता चलेगा कि रंगों से दूर रह वह काली, अंधेरी दुनिया कैसी बेरंग होती है. Story In Hindi

Hindi Story : मिसेज चोपड़ा, मीडिया और न्यूज

Hindi Story : लंबा कद, गोरा रंग, सलीके से   बंधा हुआ जूड़ा, कलफ लगी बढि़या सूती साड़ी और साड़ी के रंग से मेल खाते गहने पहने मिसेज चोपड़ा पूरे दफ्तर में अलग ही दिखती थीं. मैं जिस दफ्तर में काम करती थी वहां काम कम ही होता था. यों समझ लीजिए, अकसर लोग गरमगरम चाय और गरमागरम बहस से टाइम पास करते थे. कुछ ही दिनों में दफ्तर का यह माहौल देखदेख कर मेरा धैर्य जवाब दे गया.

मैं ने अपने एन.जी.ओ. के कोआर्डिनेटर से एक दिन बातों ही बातों में पूछ लिया, ‘‘यह मिसेज चोपड़ा मुझे आफिस में सब से अलग दिखती हैं, यह कैसा काम करती हैं. मैं अभी नई हूं इसलिए इन के बारे में ज्यादा जानती नहीं हूं.’’

सामने बैठे मिस्टर शर्मा बोले, ‘‘यह यहां पी.आर.ओ. के पद पर हैं. पब्लिक और प्रेस से डीलिंग करना ही इन का काम है. यह किसी मजबूरी में नौकरी नहीं कर रही हैं. मिसेज चोपड़ा जैसी हाइक्लास सोसाइटी की औरतें जब अपनी किटी पार्टियों से बोर हो जाती हैं और उन्हें अपना समय बिताना होता है तो वे किसी एन.जी.ओ. से जुड़ जाती हैं. समय भी बीत जाता है, नाम भी मिल जाता है. मिसेज चोपड़ा भी इसी रंग में रंगी हैं.’’

मैं थोड़ी देर में अपनी जगह पर वापस आ कर काम में जुट गई. चूंकि मेरे ऊपर अपनी विधवा मां की जिम्मेदारी थी इसलिए मैं अपना काम बड़ी ईमानदारी से करती थी. मैं कुछ दिनों से यह भी अनुभव कर रही थी कि मिसेज चोपड़ा मुझे पसंद नहीं करती हैं. मेरे हर काम में उन्हें सिर्फ कमी ही नजर आती थी.

मिसेज चोपड़ा ने धीरेधीरे मुझे सताना शुरू कर दिया. मेरी किसी भी रिपोर्ट को रद्द कर देतीं और फिर से नए ढंग से बनाने को कहतीं. कभी आफिस के काम से हटा कर फील्ड वर्क पर लगा देतीं तो कभी अचानक फील्ड वर्क से आफिस भेज देतीं.

एक दिन उन्होंने मुझ से पूछ ही लिया, ‘‘मिस बेला, आप इतना कम क्यों बोलती हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैडम, ऐसा तो नहीं है. बस, मैं बोलने से ज्यादा काम करना पसंद करती हूं. फिर हम जो काम कर रहे हैं अगर उस में हम अपने बारे में ही सोचेंगे तो दूसरों के दुख कब शेयर करेंगे.’’

वह अचानक बौस के ढंग में बोलीं, ‘‘मिस बेला, इस केस की डिटेल्स पढि़ए. नेहा के घर वालों का बयान लीजिए और गवाहों से बात कीजिए. पुलिस से भी मिलिए. आजकल बहुत कंपीटीशन है. मैं मीडिया से बात कर के रखती हूं. हम पहले केस सुलझा लेंगे तो हमारा नाम होगा. हमारी बढि़या न्यूज तैयार होगी.’’

मैं सिर झुकाए बोली, ‘‘किसी के दुख पर सफलता की सीढ़ी लगाना अच्छा तो नहीं लगता, मैडम.’’

उन की नजरें मुझ पर जम गईं. अच्छा स्टेटस, पैसा और अच्छे संबंध यही दुनिया में जीने के उन के सिद्धांत थे.

मैं अपने गु्रप के साथ घटनास्थल पर जाने को निकल गई. वह एक बौस की तरह मेरे साथ थीं. मैं ने नेहा के घर वालों से बहुत से सवाल पूछे. नेहा को उस के ससुराल वालों ने जला कर मार दिया था. नशे की हालत में उस के पति ने उस पर तेल छिड़क कर आग लगा दी थी. मिसेज चोपड़ा बहुत खुश थीं कि अगर मीडिया यह न्यूज अच्छी तरह से पेश करता है तो उन का बहुत नाम होगा. उन्होंने प्रेस कान्फ्रेंस बुला कर मीडिया में इस मामले पर हलचल मचा दी.

उन की इस हरकत से मैं बहुत बेचैन थी. अपनी उस बेचैनी को कम करने के लिए मैं उन के केबिन में जा कर फट पड़ी, ‘‘मैडम, इस प्रेस कान्फ्रेंस से नेहा को क्या फायदा पहुंच रहा है? उस की मौत को भुना कर हमें क्या मिलेगा?’’

मेरे अंदर सवालों का ढेर लगा था. उन्हें मुझ पर गुस्सा आ गया, ‘‘मिस बेला, आप को क्या लगता है कि हमारी संस्था सिर्फ नाम कमाने के लिए दूसरों के दुख अपने पास जमा करती है? क्या हम उन के लिए कुछ नहीं करते? अगर किसी की मदद के साथ मीडिया वाले हमें भी कैमरे के सामने ला कर न्यूज बना देते हैं तो इस में बुरा क्या है?’’

मैं ने अपनी आवाज को संतुलित करते हुए जवाब दिया, ‘‘मैडम, हम क्या करते रहे हैं महिलाओं के लिए? जो बात सिर्फ घर वाले जानते हैं हम उन्हें सब के सामने ला कर दुखी लोगों को और दुखी कर देते हैं. थोड़ी सी जबानी सहानुभूति या कभीकभी कुछ आर्थिक सहायता. हमारी संस्था औरत को कभीकभी एक तमाशा बना देती है. मीडिया को तो खबरें ही चाहिए. मैडम, मैं यहां नौकरी नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘हां, यही अच्छा रहेगा. जहां काम में रुचि न हो वहां इनसान को काम नहीं करना चाहिए. आप जा सकती हैं.’’

मैं अपना बैग उठा कर आफिस से बाहर आ गई. मैं हर उस नौकरी को बुरा समझती हूं जिस में किसी के दुख को भुनाया जाता है.

मैं ने कुछ दिन बाद एक स्कूल में नौकरी ज्वाइन कर ली लेकिन मिसेज चोपड़ा और उन की संस्था के बारे में मुझे खबर मिलती रहती थी. नेहा का केस उन्होंने सुलझा लिया था, उन की संस्था की धूम मची हुई थी.

जीवन अपने ढर्रे पर चल रहा था कि एक दिन अचानक सुबह उठने पर पेपर पढ़ा तो रोंगटे खडे़ हो गए. मिसेज चोपड़ा की बेटी आकृति के साथ कुछ दरिंदों ने रेप किया था. वह अपने कालिज से घर आ रही थी कि सुनसान सड़क पर कुछ लड़के कार में उसे उठा कर ले गए थे.

इस खबर को पढ़ने के बाद मैं अपने को वहां जा कर उन से मिलने से रोक नहीं पाई. उन के घर पहुंची तो वह मासूम सी लड़की कमरे में बंद थी और बारबार बेहोश हो रही थी. बहुत ही हृदयविदारक दृश्य था. पूरा स्टाफ वहां था. सब को आकृति पर तरस आ रहा था. मिसेज चोपड़ा का विलाप दिल को चीर रहा था. चोपड़ा साहब विदेश में थे. उन मांबेटी से सब को सहानुभूति हो रही थी. कुछ देर वहां ठहर कर मैं वापस घर आ गई लेकिन अगले दिन भी उन दुखियारी मांबेटी के पास कुछ देर बैठने के लिए मैं गई. फिर कई दिनों तक रोज ही जाती रही. सब को आकृति के सामान्य होने का इंतजार था.

एक दिन अचानक एक प्रसिद्ध एन.जी.ओ. की महिलाएं मीडिया के साथ मिसेज चोपड़ा के घर पहुंच गईं. हर तरफ कैमरे की रोशनियां और उन की बेटी का रोना, मिसेज चोपड़ा बारबार उन लोगों से जाने की प्रार्थना करते हुए सिसक उठीं, लेकिन संस्था की महिलाएं, हाथ में पेपर, पैन लिए मीडिया के लोग, मांबेटी से सवाल पर सवाल पूछे जा रहे थे और अपनी संस्था की शान में कमेंट भी किए जा रहे थे कि हम आप की बेटी को न्याय दिलवाएंगे. मैडम, आप तो खुद एक संस्था चलाती थीं. आज आप आम आदमी की जगह खड़ी हैं. आप को कैसा लग रहा है? मैडम, आप कुछ जवाब दें. आप इस केस में क्या कहना चाहेंगी.

मिसेज चोपड़ा ने कुछ कहने की कोशिश की लेकिन उन के शब्द अंदर ही रह गए और वे गिर पड़ीं.

आफिस के कुछ लोगों के साथ मैं उन को अस्पताल ले गई. आकृति को मैं ने अपनी मां के पास भेज दिया. मिसेज चोपड़ा को हार्टअटैक पड़ा था. उन की देखरेख मैं ने एक दोस्त की तरह की, क्योंकि मेरी मां ने मुझे यही सिखाया था. उन के दिए गए संस्कार मेरे अंदर खून बन कर बहते थे. स्कूल से मैं ने छुट्टियां ली हुई थीं. मिसेज चोपड़ा जब तक अस्पताल से घर आने लायक हुईं हम एक अच्छे दोस्त बन चुके थे.

घर आ कर वह अपने काम में व्यस्त हो गईं और मैं अपने में. जीवन निर्बाध गति से चल रहा था. एक दिन मैं ने टेलीविजन चलाया तो मिसेज चोपड़ा अपने साक्षात्कार में कह रही थीं, ‘‘अगर हम किसी बहन या बेटी की इज्जत करते हैं तो क्या हमें उस को हजारों लोगों के सामने खड़ा कर देना चाहिए. हमें यदि किसी की मदद करनी है तो क्या हम चुपचाप नहीं कर सकते. मैं एक नई संस्था बना रही हूं जिस का मीडिया से बहुत ही कम लेनादेना होगा. हम चुपचाप दुखी जनता के आंसू पोंछेंगे.’’

आज मुझे लगा कि मिसेज चोपड़ा ने अब जो रास्ता चुना है वह सही है. मुझे उन की इस बदली हुई सोच पर खुशी हुई और मैं उन को इस नए कदम के लिए शुभकामनाएं देने को फोन मिलाने लगी, साथ ही मुझे उन को यह भी बताना था कि मैं उन की नई संस्था में काम करने आ रही हूं.

Social Story : हिंदुस्तान जिंदा है – दंगाइयों की कैसी थी मानसिकता

Social Story : यह एक इत्तफाक ही था कि मौलवी रशीद की पत्नी जिस दिन मरी थी उसी दिन मीना का पति भी मरा था. मौलवी रशीद की पत्नी को दंगाइयों ने पहले नंगा किया फिर अपना मुंह काला किया और अंत में उसे गोली मार दी. अब वह कहां जिंदा थी कि किसी का नाम बताती. बस, सड़क के किनारे एक नंगी लाश के रूप में पड़ी मिली थी.

मीना के पति को बाजार में छुरा मारा गया था, मर्द को दंगाई नंगा नहीं करते क्योंकि दंगाई भी मर्द होते हैं.

मीना और मौलवी रशीद दोनों ने अपनीअपनी लाशें उठा कर उन का अंतिम संस्कार किया था. ये दोनों जिस शहर के थे वहां की फितरत में ही दंगा था और वह भी धर्म के नाम पर.

इस शहर के लोग पढ़ेलिखे जरूर थे पर नेताओं की भड़काऊ बातों को सुन कर सड़कों पर उतर आना, छतों से पत्थरों की वर्षा करना और फिर गोली चलाना इन की आदत हो गई थी. कोई तो था जो निरंतर इस दंगा कल्चर को बढ़ावा दे रहा था ताकि जनता बंटी रहे और उन का मकसद पूरा होता रहे.

मौलवी रशीद और मीना दोनों एकसाथ पढ़े थे. दोनों का बचपन भी साथसाथ ही गुजरा था. दोनों आपस में प्रेम भी करते थे, लेकिन इन की आपस में शादी इसलिए नहीं हुई कि दोनों का धर्म अलगअलग था और ऐसे कट्टर धार्मिक, सोच वाले शहर में एक हिंदू लड़की किसी मुसलमान लड़के से शादी कर ले तो शहर में हंगामा बरपा हो जाए.

मीना ने तो चाहा था कि वह रशीद से शादी कर ले लेकिन खुद रशीद ने यह कह कर मना कर दिया था कि यदि तुम चाहती हो कि 4-5 मुसलमान मरें तो मैं यह शादी करने के लिए तैयार हूं. और फिर मीना अपने दिल पर पत्थर रख कर बैठ गई थी.

इसी के बाद दोनों के जीवन की धारा बदल गई. रशीद ने अपने संप्रदाय में एक नेक लड़की से शादी कर अपनी गृहस्थी बसा ली तो मीना ने अपनी ही जाति के एक लड़के के साथ शादी कर ली. फिर तो दोनों एक ही शहर में रहते हुए एकदूसरे के लिए अजनबी बन गए.

इधर धर्म का बाजार सजता रहा, धर्म का व्यापार होता रहा और इस धर्म ने देश को 2 टुकड़ों में बांट दिया. इनसान के लिए धर्म एक ऐसा रास्ता है जिसे केवल मन में रखा जाए और खामोशी के साथ उस पर विश्वास करता चला जाए न कि उस के लिए बेबस औरतों को नंगा किया जाए, संपत्तियों को जलाया जाए और बेगुनाह लोगों की जानें ली जाएं.

मौलवी रशीद की कोई संतान नहीं थी पर मीना के 2 बच्चे थे. एक 3 साल का और दूसरा 3 मास का. पति के मरने के बाद मीना बिलकुल बेसहारा हो गई थी. अब उस शहर में उस का दर्द, उस की जरूरतों को समझने वाला मौलवी रशीद के अलावा दूसरा कोई भी नहीं था.

सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला शहर से खत्म नहीं हो रहा था. कभी दिन का कर्फ्यू तो कभी रात का कर्फ्यू. इनसान तो क्या जानवर भी इस से तंग हो गए थे. मौलवी रशीद ने टेलीविजन खोला तो एक खबर आई कि प्रशासन ने शाम को कर्फ्यू में 2 घंटे की ढील दी है ताकि लोग घरों से बाहर निकल कर अपनी दैनिक जरूरतों की वस्तुओं को खरीद सकें. मौलवी रशीद को मीना के 3 माह के बच्चे की चिंता थी क्योंकि पति की मौत के बाद मीना की छाती का दूध सूख गया था. उस बच्चे के लिए उसे दूध लेना था और ले जा कर हिंदू इलाके में मीना के घर देना था.

रशीद जब घर से स्कूटर पर चला तो उसे थोड़ा डर सा लगा था. वह सआदत हसन मंटो (उर्दू का प्रसिद्ध कथाकार) तो था नहीं कि अपनी जेब में 2 टोपियां रखे और हिंदू महल्ले से गुजरते समय सिर पर गांधी टोपी तथा मुसलमान महल्ले से गुजरते समय गोल टोपी लगा ले.

खैर, रशीद किसी तरह हिम्मत कर के मीना के बच्चे के लिए दूध का पैकेट ले कर चला तो रास्ते भर लोगों की तरहतरह की बातें सुनता रहा.

किसी एक ने कहा, ‘‘इस का मीना के साथ चक्कर है. मीना को कोई हिंदू नहीं मिलता क्या?’’

दूसरे के मुंह से निकला, ‘‘लगता है इस का संपर्क अलकायदा से है. हिंदू इलाके में बम रखने जा रहा है. इस मौलवी का हिंदू महल्ले में आने का क्या मतलब?’’

दूसरे की कही बातें सुन कर तीसरे ने कहा, ‘‘यदि अलकायदा का नहीं तो इस का संबंध आई.एस.आई. से जरूर है. तभी तो इस की औरत को नंगा कर के गोली मारी गई.

रशीद ने मीना के घर पहुंच कर उसे आवाज लगाई और दूध का पैकेट दे कर वापस आ गया. एक सेना का अधिकारी, जो मीना के घर के सामने अपने जवानों के साथ ड्यूटी दे रहा था, उस ने रशीद को दूध देते देखा. मौलवी रशीद उसे देख कर डर के मारे थरथर कांपने लगा. वह आर्मी अफसर आगे बढ़ा और रशीद की पीठ को थपथपाते हुए बोला, ‘‘शाबाश.’’

रशीद जब अपने महल्ले में पहुंचा तो देखा कि लोग उस के घर को घेर कर खड़े थे. वह स्कूटर से उतरा तो महल्ले के मुसलमान लड़के उस की पिटाई करते हुए कहने लगे, ‘‘तू कौम का गद्दार है. एक हिंदू लड़की के घर गया था. तू देख नहीं रहा है कि वे हमें जिंदा जला रहे हैं? हमारी बहनबेटियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. क्या उस महल्ले के हिंदू मर गए थे जो तू उस के बच्चे को दूध पिलाने गया था.’’

एक बूढ़े मौलाना ने कहा, ‘‘रशीद, तू महल्ला खाली कर फौरन यहां से चला जा नहीं तो तेरी वजह से इस महल्ले पर हिंदू कभी भी हमला कर सकते हैं. तेरा मीना के साथ यह अनैतिक संबंध हम को बरबाद कर देगा.’’

इस बीच पुलिस की एक जीप वहां आई और पुलिस वाले यह कह कर चले गए कि यहां तो मुसलमानों ने ही मुसलमान को मारा है, खतरे की कोई बात नहीं है. लगता है कोई पुरानी रंजिश होगी.

मार खाने के बाद रशीद अपने घर चला गया और बिस्तर पर लेट कर कराहने लगा. कुछ देर के बाद फोन की घंटी बजी. फोन मीना का था. वह कह रही थी, ‘‘रशीद, तुम्हारे जाने के बाद महल्ले के कुछ हिंदू लड़के मेरे घर में घुस आए थे और उन्होेंने दूध के साथ घर का सारा सामान सड़क पर फेंक दिया. अब मैं क्या करूं. तुम जब तक माहौल सामान्य नहीं हो जाता मेरे घर मत आना. बच्चे तो जैसेतैसे जी ही लेंगे.’’

रशीद फोन पर हूं हां कर के चुप हो गया क्योंकि उसे चोट बहुत लगी थी. वह लेटेलेटे सोच रहा था कि हिंदूमुसलिम फसाद में एक तरफ से कुछ भी नहीं होता है. दोनों तरफ से लड़ाई होती है और कौम के नेता इस जलती हुई आग पर घी डालते हैं. यदि हिंदू मुसलमान को मारता है तो वही उस को सड़क से उठाता भी है. अस्पताल भी वही ले जाता है, वही पुलिस की वर्दी पहन कर उस का रक्षक भी बनता है और वही जज की कुरसी पर बैठ कर इंसाफ भी करता है, कहीं तो कुछ है जो टूटता नहीं.

4 दिन बाद कुछ हालात संभले थे. इस दौरान समाचारपत्रों ने बहुत सी घटनाओं को अपनी सुर्खियां बनाया था. इन्हीं में एक खबर रशीद और मीना को ले कर छपी थी कि ‘हिंदू इलाके में एक मुसलमान अपनी प्रेमिका से मिलने आता है.’

ऐसे माहौल में समाचारपत्रों का काम है खबर बेचना. अगर सच्ची खबर न हो तो झूठी खबर ही सही, उन के अखबार की बिक्री बढ़नी चाहिए. अब तो राजनीतिक पार्टियां भी अपना अखबार निकाल रही हैं ताकि पार्टी की पालिसी के अनुसार समाचार को प्रकाशित किया जाए. आजादी के बाद हम कितने बदल गए हैं. अब नेताओं को देश की जगह अपनी पार्टी से प्रेम अधिक है.

शहर में कर्फ्यू समाप्त हो गया था. रशीद भी अब पूरी तरह से ठीक हो गया था. उस ने फैसला किया कि अब यह शहर उस के रहने के लायक नहीं रहा पर शहर छोड़ने से पहले वह मीना से मिलना चाहता था.

वह घर से निकला और सीधा मीना के घर पहुंचा. उसे घर के दरवाजे पर बुलाया और हमेशाहमेशा के लिए उसे एक नजर देख कर मुड़ना ही चाहता था कि कुछ लोग उस को चारों ओर से घेर कर खड़े हो गए.

रशीद ने मीना से सब्जी काटने वाला चाकू मांगा और सब को संबोधित कर के बोला, ‘‘आप लोगों को मुझे मारने की आवश्यकता नहीं है. मैं अपने पेट में चाकू मार कर आत्महत्या करने जा रहा हूं. अब यह शहर जीने लायक नहीं रह गया.’’

उस भीड़ ने रशीद को पकड़ लिया और एक सम्मिलित स्वर में आवाज आई, ‘‘भाई साहब, हम आप को मारने नहीं बल्कि देखने आए हैं. आप की पत्नी को हिंदुओं ने नंगा कर के गोली मारी थी और आप एक हिंदू विधवा के बच्चों के लिए दूध लाते रहे. अब आप जैसे इनसान को देखने के बाद यकीन हो गया है कि हिंदुस्तान जिंदा है और हमेशा जिंदा रहेगा.

इस तरह रोमांस में बनी रहेगी ताजगी

आप की शादी के कुछ साल हो गए. अब आप दिन में कितनी बार एकदूसरे का हाथ थामते हैं? आंखों से कितनी बार एकदूसरे को मौन निमंत्रण देते हैं? कितनी बार एकदूसरे को गले लगाते हैं? अगर आप का जवाब नकारात्मक है, तो संभल जाएं क्योंकि यह आप के रिश्तों की मिठास को कड़वाहट में बदलने की शुरुआत है. वैसे घबराने की कोई बात नहीं है, क्योंकि रिश्तों की ताजगी कहीं जाती नहीं. बस, भीड़ भरे रास्तों पर गुम हो जाती है. इसे ढूंढ़ने के लिए यहां दी गई बातों पर अमल करेंगे, तो बदलाव खुद ब खुद महसूस करेंगे.

करें कुछ नया

कहा जाता है कि प्यार एक एहसास है, लेकिन सच तो यह है कि शादी के बाद प्यार सिर्फ एक एहसास नहीं होता. बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में जिन बातों को अपनाने से हमारे जीवनसाथी को खुशी, संतुष्टि, नयापन मिलता हो, वही प्यार है. पति को गिफ्ट देना, मदद करना, लैटर लिखना आम बातें हैं. अब यह परिपाटी बहुत पुरानी हो चुकी है.

आप कुछ ऐसा अलग हट कर करें, जिस में नयापन हो. जैसे, विशेष अवसरों पर अपने पति को गिफ्ट तो सभी देते हैं, लेकिन शौपिंग कांपलैक्स में जब आप उन की पसंद की चीज उन्हें रोमांटिक अंदाज में देंगी, तो उपहार का मजा दोगुना हो जाएगा.

बीती बातों को याद करें

रोजरोज की जाने वाली एक जैसी बातों से अकसर बोरियत होने लगती है. ऐसे में कुछ अलग हट कर करें. जैसे, अगर आप की लव मैरिज है तो पति से सवाल करें कि अगर घर वाले आसानी से शादी के लिए न माने होते, तो? अगर हमारी शादी न हुई होती, तब तुम क्या करते? क्या तुम मेरे बिना रह पाते? ऐसे सवाल करने पर वे सोच में पड़ जाएंगे, पर बातों के जवाब अच्छे मिलेंगे, जो आप की बातचीत को एक नयापन देंगे. इसी तरह दोनों एकदूसरे को अपने कुछ अच्छे पलों को याद दिलाएं. यदि आप दोनों कामकाजी हैं, तो दफ्तर में फुरसत पाते ही मौका ढूंढ़ कर एकदूसरे को फोन करें. वह भी उसी शिद्दत के साथ, जैसे शादी के शुरुआती दिनों में आप किया करते थे.

हमेशा की तरह फाइव स्टार होटल में कैंडल लाइट डिनर करने के बजाय किसी छोटे से पुराने रेस्तरां में सरप्राइज डिनर पर जाएं, जहां आप शादी से पहले भी जाया करते थे. आप दोनों कालेज के उन पुराने दोस्तों को बुला कर, जिन्होंने आप का हर पल साथ दिया हो, छोटी सी पार्टी दें. ऐसा करने से आप की पुरानी यादें ताजा होंगी. कभीकभी पति के लिए भी तैयार हो जाएं. यकीन मानिए, वे खुश हो जाएंगे आप का यह रूप देख कर.

छेड़छाड़ का सहारा लें

इस के साथ ही आप छोटीमोटी चुहलबाजी और छेड़खानी करना शुरू कर दें. पति से फ्लर्ट करने पर जो मजा आएगा, वह कभी कालेज में लड़कों को छेड़ने पर भी नहीं आया होगा. पति को कोई अजनबी लड़का समझ छेड़ें और परेशान करें. कभी उन के औफिस बैग में बेनाम लव लैटर और कार्ड रख दें, तो कभी एक दिन में कई बार उन के फोन पर अननोन नंबर से मिस्ड कौल दें. फिर देखिएगा, यह पता लगते ही कि यह शरारत करने वाली आप थीं, वे कैसे आप से मिलने के लिए बेचैन हो उठते हैं.

सजना के लिए सजना

पार्टी या शादी में जाने के लिए तो सभी सजते हैं, लेकिन क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप अपने पति के लिए तैयार हुई हों. इसे बेकार की झंझट मत समझिए. जब आप बिना किसी मौके के उन के मनपसंद रंग में सज कर उन के पास जाएंगी, जो सिर्फ उन के लिए होगा, तो यकीनन उन की नजरें आप पर से हटेंगी नहीं.

इन्हें नजरअंदाज न करें

– वे जोड़े ज्यादा खुश रहते हैं, जो शाम को अपनी शिकायतों का पिटारा नहीं खोलते. शिकायत करने पर पतिपत्नी एकदूसरे से बचने के बहाने ढूंढ़ने लगते हैं.

– वे पतिपत्नी ज्यादा खुश रहते हैं जिन का कम से कम एक शौक आपस में मिलता हो. ऐसी रुचियां उन्हें आपस में बांधे रखती हैं तथा रिश्तों में प्रगाढ़ता लाती हैं.

– कुछ शब्दों को बारबार कहना और सुनना अच्छा लगता है. जैसे, ‘आई लव यू’, ‘आई एम औलवेज विद यू’ आदि. इस से पार्टनर को एहसास होता है कि आप कितने लविंग और केयरिंग हैं.

– कुछ शारीरिक स्पर्श ऐसे होते हैं, जो पार्टनर को आप की भावना समझने में मदद करते हैं. जैसे, जातेजाते कंधा टकराते जाना, पार्टनर का हाथ दबाना या छू लेना और खाना खाते समय टेबल के नीचे से पैरों का स्पर्श या हाथ पकड़ लेना.

मिडिल एज में रोमांस, इन बातों का रखे खास ध्यान

शादी के बाद पतिपत्नी के जीवन में एक अलग सी चाहत होती है. एकदूसरे के साथ अधिक से अधिक समय तक करीब रहना, एकदूसरे को छूना, उत्तेजित हो जाना, सैक्स के लिए पोर्न फिल्में देखना, उसी तरह की चाहत रखना सामान्य बातें होती हैं. यही वजह है कि शादी के निजी पलों को खुल कर जीने के लिए लोग हनीमून के लिए जाते हैं.

शादी के बाद का आनंद जीवन में दोबारा तब आता है जब बच्चे होस्टल चले जाते हैं. पतिपत्नी के जीवन में आने वाला यह एकांत उन को बहका देता है. कई कपल्स तो ऐसे मौके का लाभ उठा कर सैकंड हनीमून तक प्लान कर लेते हैं. ऐसे में कई बार वैसी ही गड़बडि़यां हो जाती हैं जैसी शादी के बाद होती हैं. शादी के बाद अबौर्शन संभव हो जाता था पर सैकंड हनीमून के बाद ऐसी गड़बड़ी भारी पड़ सकती है. इसलिए जरूरी है कि गर्भधारण से बचने वाले उपाय व साधनों का प्रयोग करें.

महिला रोग विशेषज्ञ डाक्टर नमिता चंद्रा कहती हैं, ‘‘कंडोम और पिल्स सब से अहम उपाय हैं. महिलाएं गर्भ रोकने के लिए पिल्स का प्रयोग डाक्टर की राय से करें. गर्भनिरोधक गोलियां कई बार बौडी के हार्मोंस को प्रभावित करती हैं. इन के लगातार प्रयोग से जिस्म में कैल्शियम भी प्रभावित होता है. कुछ औरतों में जल्दी मेनोपौज की शुरुआत हो जाती है. जिस से कई बार मासिकधर्म अनियमित हो जाता है. ऐसे में यह भ्रम हो जाता है कि माहवारी बंद है तो गर्भधारण कैसे हो सकता है?

‘‘कई मामलों में देखा गया कि माहवारी बंद होने के बाद भी गर्भधारण हो गया. कई बार माहवारी न होने का कारण मेनोपौज को समझ लिया जाता है, जबकि माहवारी न होने का कारण गर्भधारण होता है. इस का पता तब चलता है जब पेट में दर्द या दूसरे कारण दिखाई देते हैं. देर से पता चलने के कारण गर्भपात कराना संभव नहीं रह जाता और बच्चा पैदा करने के बाद तमाम तरह की सामाजिक व शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ जाता है.’’

भ्रांतियों का शिकार न हों

आज के दौर में 40 से 50 वर्ष की उम्र वाली महिलाओं का मुकाबला 20 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ किया जा सकता है. दोनों ही उम्र में सैक्स को ले कर कुछ भ्रांतियां होती हैं. आमतौर पर पुरुष इस उम्र में कंडोम का इस्तेमाल पसंद नहीं करते. इस का कारण यह होता है कि कई बार उन में इरैक्शन को ले कर परेशानियां होती हैं. ऐसे में महिला को पिल्स का सेवन करना चाहिए. वैसे गर्भनिरोधक पिल्स के साथ ही साथ इमरजैंसी पिल्स का भी प्रयोग कर सकती हैं. इमरजैंसी पिल्स का प्रयोग सैक्स संबंध बनने के बाद जितनी जल्दी हो सके कर लें.

कई बार इरैक्शन के शिकार व्यक्ति का डिस्चार्ज योनि के बाहर ही हो जाता है. वह सोचता है कि डिस्चार्ज योनि के बाहर होने से गर्भधारण का खतरा नहीं रहता. यह भी एक तरह की भ्रांति है. पुरुष का वीर्य अगर किसी भी तरह से योनि के अंदर पहुंच गया तो गर्भधारण हो सकता है. ऐसे में किसी भी तरह से वीर्यस्खलन होने पर सावधान रहें. अगर ऐसा हो जाता है तो सावधानी बरतें. गर्भधारण से बचने के लिए उचित डाक्टरी सलाह व प्रैग्नैंसी टैस्ट किट की मदद लें.

शादी के बाद हसबैंड-वाइफ पूरे करे ये वादे, मजबूत बनेगा रिश्ता

शादी एक बहुत खूबसूरत रिश्ता है. जिसे जितना सच्चाई और प्यार के साथ निभाया जाएं वो रिश्ता उतना ही ज्यादा खूबसूरत बनता चला जाता है. इसलिए पति पत्नी के लिए कुछ ऐसी बातें है जो उन्हे शादी के बाद जरूर निभानी चाहिएं. इससे आपका रिश्ता भी स्ट्रौंग बनेगा और प्यार भी बना रहेगा.

शादी के बाद वैसे तो हस्बैंड और वाइफ के बीच कुछ भी प्राइवेट नहीं रहता है, लेकिन इसके बावजूद हर इंसान का एक प्राइवेट स्पेस होता है. ये एक ऐसा दायरा है जिसे कभी नहीं लांघना चाहिए. पति या पत्नी की कुछ बातें प्राइवेट हो सकती हैं, जैसे दोस्तों के राज, माता पिता या भाई बहनों का रिश्ता. ऐसे में बेवजह आपको उनके रिश्तों के बीच में नहीं आना चाहिए.

एक दूसरे के प्रोफेशन की रिस्पेक्ट करना

हो सकता है कि दुनिया की नजर में आपके लाइफ पार्टनर के प्रोफेशन की कोई खास अहमियत न हो, लेकिन इसकी वजह से आप उनका मजाक नहीं उड़ा सकते. किसी भी काम को छोटा समझना बड़ी भूल होती है. शादी के बाद आपके लिए जरूरी है कि अपने लाइफ पार्टनर के काम को कम न समझते हुए उन्हें बेहतर होने का अहसास दिलाएं.

एक-दूसरे की बात को सुनना

भले ही आपके लाइफ पार्टनर की बातें कितनी भी अजीब और गैरजरूरी क्यों न लगे, ये जरूरी है कि आप उनकी बातों को गौर से सुनें ताकी उनको ये अहसास हो कि कम से कम उनकी केयर करने वाला इस दुनिया में कोई तो है.

सपने पूरे करने में मदद करना

हर इंसान की जिंदगी का एक मकसद होता है. शादी के बाद वो उम्मीद करता है कि उसे लाइफ पार्टनर की तरफ से सपने पूरे करने में फुल सपोर्ट मिले, ऐसा न होने पर रिश्तों में दरार पड़ना लाजमी है. अगर आप उनकी फाइनेंशियल हेल्प नहीं कर सकते तो कम से कम मानसिक तौर पर समर्थन जरूर करें.

क्वालिटी टाइम स्पेंड करना

आजकल लाइफ काफी बिजी हो चुकी है, करियर और फ्यूचर को संवारने की कोशिश में हस्बैंड और वाइफ को एक दूसरे के लिए मुकम्मल वक्त नहीं मिल पाता. इसके बावजूद कपल को क्वालिटी टाइम बिताना चाहिए और इसके लिए शेड्यूल को मैनेज करना जरूरी है.

कितने दूर कितने पास : एक हसंता खेलते परिवार की कहानी

सरकारी सेवा से मुक्त होने में बस, 2 महीने और थे. भविष्य की चिंता अभी से खाए जा रही थी. कैसे गुजारा होगा थोड़ी सी पेंशन में. सेवा से तो मुक्त हो गए परंतु कोई संसार से तो मुक्त नहीं हो गए. बुढ़ापा आ गया था. कोई न कोई बीमारी तो लगी ही रहती है. कहीं चारपाई पकड़नी पड़ गई तो क्या होगा, यह सोच कर ही दिल कांप उठता था. यही कामना थी कि जब संसार से उठें तो चलतेफिरते ही जाएं, खटिया रगड़ते हुए नहीं.

सब ने समझाया और हम ने भी अपने अनुभव से समझ लिया था कि पैसा पास हो तो सब से प्रेमभाव और सुखद संबंध बने रहते हैं. इस भावना ने हमें इतना जकड़ लिया था कि पैसा बचाने की खातिर हम ने अपने ऊपर काफी कंजूसी करनी शुरू कर दी. पैसे का सुख चाहे न भोग सकें परंतु मरते दम तक एक मोटी थैली हाथ में अवश्य होनी चाहिए. बेटी का विवाह हो चुका था.

वह पति और बच्चों के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रही थी. जैसेजैसे समय निकलता गया हमारा लगाव कुछ कम होता चला गया था. हमारे रिश्तों में मोह तो था परंतु आकर्षण में कमी आ गई थी. कारण यह था कि न अब हम उन्हें अधिक बुला सकते थे और न उन की आशा के अनुसार उन पर खर्च कर सकते थे. पुत्र ने अवसर पाते ही दिल्ली में अपना मकान बना लिया था. इस मकान पर मैं ने भी काफी खर्च किया था.

आशा थी कि अवकाश प्राप्त करने के बाद इसी मकान में आ कर पतिपत्नी रहेंगे. कम से कम रहने की जगह तो हम ने सुरक्षित कर ली थी. एक दिन पत्नी के सीने में दर्द उठा. घर में जितनी दवाइयां थीं सब का इस्तेमाल कर लिया परंतु कुछ आराम न हुआ.

सस्ते डाक्टरों से भी इलाज कराया और फिर बाद में पड़ोसियों की सलाह मान कर 1 रुपए की 3 पुडि़या देने वाले होमियोपैथी के डाक्टर की दवा भी ले आए. दर्द में कितनी कमी आई यह कहना तो बड़ा कठिन था परंतु पत्नी की बेचैनी बढ़ गई. एक ही बात कहती थी, ‘‘बेटी को बुला लो. देखने को बड़ा जी चाह रहा है. कुछ दिन रहेगी तो खानेपीने का सहारा भी हो जाएगा. बहू तो नौकरी करती है, वैसे भी न आ पाएगी.’’ ‘‘प्यारी बेटी,’’ मैं ने पत्र लिखा, ‘‘तुम्हारी मां की तबीयत बड़ी खराब चल रही है. चिंता की कोई बात नहीं. पर वह तुम्हें व बच्चों को देखना चाह रही है. हो सके तो तुम सब एक बार आ जाओ.

कुछ देखभाल भी हो जाएगी. वैसे अब 2 महीने बाद तो यह घर छोड़ कर दिल्ली जाना ही है. अच्छा है कि तुम अंतिम बार इस घर में आ कर हम लोगों से मिल लो. यह वही घर है जहां तुम ने जन्म लिया, बड़ी हुईं और बाजेगाजे के साथ विदा हुईं…’’ पत्र कुछ अधिक ही भावुक हो गया था.

मेरी ऐसी कोई इच्छा नहीं थी, पर कलम ही तो है. जब चलने लगती है तो रुकती नहीं. इस पत्र का कुछ ऐसा असर हुआ कि बेटी अपने दोनों बच्चों के साथ अगले सप्ताह ही आ गई. दामाद ने 10 दिन बाद आने के लिए कहा था. न जाने क्यों मांबेटी दोनों एकदूसरे के गले मिल कर खूब रोईं. भला रोने की बात क्या थी? यह तो खुशी का अवसर था. मैं अपने नातियों से गपें लगाने लगा.

रचना ने कहा, ‘‘बोलो, मां, तुम्हारे लिए क्या बनाऊं? तुम कितनी दुबली हो गई हो,’’ फिर मुझे संबोधित कर बोली, ‘‘पिताजी, बकरे के दोचार पाए रोज ले आया कीजिए. यखनी बना दिया करूंगी. बच्चों को भी बहुत पसंद है. रोज सूप पीते हैं. आप को भी पीना चाहिए,’’ फिर मेरी छाती को देखते हुए बोली, ‘‘क्या हो गया है पिताजी आप को?

सारी हड्डियां दिखाई दे रही हैं. ठहरिए, मैं आप को खिलापिला कर खूब मोटा कर के जाऊंगी. और हां, आधा किलो कलेजी- गुर्दा भी ले आइएगा. बच्चे बहुत शौक से खाते हैं.’’ मैं मुसकराने का प्रयत्न कर रहा था, ‘‘कुछ भी तो नहीं हुआ. अरे, इनसान क्या कभी बुड्ढा नहीं होता? कब तक मोटा- ताजा सांड बना रहूंगा? तू तो अपनी मां की चिंता कर.’’ ‘‘मां को तो देख लूंगी, पर आप भी खाने के कम चोर नहीं हैं. आप को क्या चिंता है? लो, मैं तो भूल ही गई. आप तो रोज इस समय एक कप कौफी पीते हैं. बैठिए, मैं अभी कौफी बना कर लाती हूं. बच्चो, तुम भी कौफी पियोगे न?’’

मैं एक असफल विरोध करता रह गया. रचना कहां सुनने वाली थी. दरअसल, मैं ने कौफी पीना अरसे से बंद कर दिया था. यह घर के खर्चे कम करने का एक प्रयास था. कौफी, चीनी और दूध, सब की एकसाथ बचत. पत्नी को पान खाने का शौक था. अब वह बंद कर के 10 पैसे की खैनी की पुडि़या मंगा लेती थी, जो 4 दिन चलती थी. हमें तो आखिर भविष्य को देखना था न. 

‘‘अरे, कौफी कहां है, मां?’’ रचना ने आवाज लगा कर पूछा, ‘‘यहां तो दूध भी दिखाई नहीं दे रहा है? लो, फ्रिज भी बंद पड़ा है. क्या खराब हो गया?’’ मां ने दबे स्वर में कहा, ‘‘अब फ्रिज का क्या काम है? कुछ रखने को तो है नहीं. बेकार में बिजली का खर्चा.’’ ‘‘पिताजी, ऐसे नहीं चलेगा,’’ रचना ने झुंझला कर कहा, ‘‘यह कोई रहने का तरीका है? क्या इसीलिए आप ने जिंदगी भर कमाया है?

अरे ठाट से रहिए. मैं भी तो सिर उठा कर कह सकूं कि मेरे पिताजी कितनी शान से रहते हैं. ए बिट्टू, जा, नीचे वाली दुकान से दौड़ कर कौफी तो ले आ. हां, पास ही जो मिट्ठन हलवाई की दुकान है, उस से 1 किलो दूध भी ले आना. नानाजी का नाम ले देना, समझा? भाग जल्दी से, मैं पानी रख रही हूं.’’ किट्टू बोला, ‘‘मां, मैं भी जाऊं. फाइव स्टार चाकलेट खानी है.’’ ‘‘जा, तू भी जा, शांति तो हो घर में,’’ रचना ने हंस कर कहा, ‘‘चाकलेट खाने की तो ऐसी आदत पड़ गई है कि बस, पूछो मत. इन की तो नौकरी भी ऐसी है कि मुफ्त देने वालों की कमी नहीं है.’’

मैं मन ही मन गणित बिठा रहा था. 5 रुपए की चाकलेट, 6 रुपए का दूध, 15 रुपए की कौफी, 16 रुपए की आधा किलो कलेजी, ढाई रुपए के 2 पाए…’’ कौफी पी ही रहा था कि रचना का क्रुद्ध स्वर कानों में पड़ा, ‘‘मां, तुम ने घर को क्या कबाड़ बना रखा है. न दालें हैं न सब्जी है, न मसाले हैं. आप लोग खाते क्या हैं? बीमार नहीं होंगे तो क्या होंगे? छि:, मैं भाभी को लिख दूंगी. आप की खूब शिकायत करूंगी. दिल्ली में अगर आप को इस हालत में देखा तो समझ लेना कि भाभी से तो लड़ाई करूंगी ही, आप से भी कभी मिलने नहीं आऊंगी.’

रचना जल्दी से सामान की सूची बनाने लगी. मेरी पत्नी का खाना बनाने को मन नहीं करता था. उसे अपनी बीमारी की चिंता अधिक सताती थी. पासपड़ोस की औरतें भी उलटीसीधी सीख दे जाया करती थीं. मैं ने भी समझौता कर लिया था. जो एक समय बन जाता था वही दोनों समय खा लेते थे.

आखिर इनसान जिंदा रहने के लिए ही तो खाता है. अब इस उम्र में चटोरापन किस काम का. यह बात अलग थी कि हमारा खर्च आधा रह गया था. बैंक में पैसे भी बढ़ रहे थे और सूद भी. पत्नी ने धीरे से कहा, ‘‘यह तो पराया समझ कर घर लुटा रही है. सामान तुम ही लाना और मुझे यखनीवखनी कुछ नहीं चाहिए. कलेजी भी कम लाना. अगर बच्चों को खिलाना है तो सीधी तरह से कह देती.

लगता है मुझे ही रसोई में लगना पड़ेगा. हमें आगे का देखना है कि अभी का?’’ फिर सिर पर हाथ रखते हुए बोली, ‘‘अभी तो दामाद को भी आना है. उन्हें तो सारा दिन खानेपीने के सिवा कुछ सूझता ही नहीं.’’ ‘‘तुम ने ही तो कहा था बुलाने को.’’ ‘‘कहा था तो क्या तुम मना नहीं कर सकते थे. ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि जो मैं ने कहा वह पत्थर की लकीर हो गई,’’ पत्नी ने उलाहना दिया. ‘‘अब तो भुगतना ही पड़ेगा. अब देर हो गई. कल सुबह बैंक से पैसे निकालने जाना पड़ेगा,’’ मैं ने दुखी हो कर कहा. इतने में रचना आ गई, ‘‘मां, देसी घी कहां है? दाल किस में छौंकूंगी? रोटी पर क्या लगेगा?’’ मां ने ठंडे दिल से कहा, ‘‘डाक्टर ने देसी घी खाने को मना किया है न.

चरबी वाली चीजें बंद हैं. तेरे लिए आधा किलो मंगवा दूंगी.’’ मैं ने खोखली हंसी से कहा, ‘‘कोलेस्टेराल बढ़ जाता है न, और रक्तचाप भी.’’ ‘‘भाड़ में गए ऐसे डाक्टर. हड्डी- पसली निकल रही है, सूख कर कांटा हो रहे हैं और कोलेस्टेराल की बात कर रहे हैं. आप अभी 5 किलोग्राम वाले डब्बे का आर्डर कर आइए. मेरे सामने आ जाना चाहिए,’’ रचना ने धमकी दी. मेरे और पत्नी के दिमाग में एक ही बात घूम रही थी, ‘कितना खर्च हो जाएगा इन के रहते. सेवा से अवकाश लेने वाला हूं. कम खर्च में काम चलाना होगा. बेटे के ऊपर भी तो बोझ बन कर नहीं रहना है.’

सुबह ही सुबह रचना दूध वाले से झगड़ा कर रही थी, ‘‘क्यों, पहलवान, मैं क्या चली गई, तुम ने तो दूध देना ही बंद कर दिया.’’ ‘‘बिटिया, हम क्यों दूध बंद करेंगे? मांजी ने ही कहा कि बस, आधा किलो दे जाया करो. चाय के लिए बहुत है. क्या इसी घर में हम ने 4-4 किलो दूध नहीं दिया है?’’ ‘‘देखो, जब तक मैं हूं, 3 किलो दूध रोज चाहिए. बच्चे दोनों समय दूध लेते हैं. जब मैं चली जाऊं तो 2 किलो देना, मां मना करें या पिताजी.

यह मेरा हुक्म है, समझे?’’ ‘‘समझा, बिटिया, हम भी तो कहें, क्यों मांजी और बाबूजी कमजोर हो रहे हैं. यही तो खानेपीने की उम्र है. अभी दूध नहीं पिएंगे तो कब पिएंगे?’’ 18 रुपए का दूध रोज. मैं मन ही मन सोच रहा था कि पत्नी इशारे से दूध वाले को कुछ कहने का असफल प्रयत्न कर रही थी. ‘‘अंडे भी नहीं हैं. न मक्खन न डबल रोटी,’’ रचना चिल्ला रही थी, ‘‘आप लोग बीमार नहीं पड़ेंगे तो क्या होगा.

बिट्टू, जा दौड़ कर नीचे से एक दर्जन अंडे ले आ और 500 ग्राम वाली मक्खन की टिकिया, नानाजी का नाम ले देना.’’ ‘‘मां, मैं भी जाऊं,’’ किट्टू बोला, ‘‘टाफी लाऊंगा. तुम्हारे लिए भी ले आऊं न?’’ ‘‘जा बाबा, जा, सिर मत खा,’’ रचना ने हंसते हुए कहा. हाथ दबा कर खर्च करने के चक्कर में बहुत मना करने पर भी पत्नी ने रसोई का काम संभाल लिया.

जब दामाद आए तब तो किसी को फुरसत ही कहां. रोज बाजार कुछ न कुछ खरीदने जाना और नहीं तो यों ही घूमने के लिए. रिश्तेदार भी कई थे. कोई मिलने आया तो किसी के यहां मिलने गए. परिणाम यह हुआ कि पत्नी के लिए रसोई लक्ष्मण रेखा बन गई. दामाद की सारी फरमाइशें रचना मां को पहुंचा देती थी, ‘‘सास के हाथ के कबाब तो बस, लाजवाब होते हैं.

उफ, पिछली दफा जो कीमापनीर खाया था, आज तक याद है. मुर्गमुसल्लम तो जो मां के हाथ का खाया था अशोक होटल में भी क्या बनेगा.’’ जब तक रचना पति और बच्चों के साथ वापस गई, मेरी पत्नी के सीने का दर्द वापस आ गया था, लेकिन दर्द के बारे में सोचने की फुरसत कहां थी. घर छोड़ कर दिल्ली जाने में 1 महीना रह गया था. कुछ सामान बेचा तो कुछ सहेजा. एक दिन 20-25 बक्सों का कारवां ले कर जब दिल्ली पहुंचे तो चमचमाते मुंह से पुत्र ने स्वागत किया और बहू ने सिर पर औपचारिक रूप से साड़ी का पल्ला खींचते हुए सादर पैर छू कर हमारा आशीर्वाद प्राप्त किया.

पोता दादी से चिपक गया तो नन्ही पोती मेरी गोदी में चढ़ गई. सुबह जल्दी उठने की आदत थी. पुत्र का स्वर कानों में पड़ा, ‘‘सुनो, दूध 1 किलो ज्यादा लेना. मां और पिताजी सुबह नाश्ते में दूध लेते हैं.’’ बहू ने उत्तर दिया, ‘‘दूध का बिल बढ़ जाएगा. इतने पैसे कहां से आएंगे? और फिर अकेला दूध थोड़े ही है. अंडे भी आएंगे. मक्खन भी ज्यादा लगेगा…’’ पुत्र ने झुंझला कर कहा, ‘‘ओहो, वह हिसाबकिताब बाद में करना. मांबाप हमारे पास रहने आए हैं. उन्हें ठीक तरह से रखना हमारा कर्तव्य है.’’ ‘‘तो मैं कोई रोक रही हूं? यही तो कह रही हूं कि खर्च बढ़ेगा तो कुछ पैसों का बंदोबस्त भी करना पड़ेगा. बंधीबंधाई तनख्वाह के अलावा है क्या?’’ ‘‘देखो, समय से सब बंदोबस्त हो जाएगा. अभी तो तुम रोज दूध और अंडों का नाश्ता बना देना.’’ ‘‘ठीक है, बच्चों का दूध आधा कर दूंगी. एक समय ही पी लेंगे. अंडे रोज न बना कर 2-3 दिन में एक बार बना दूंगी.’’

‘‘अब जो ठीक समझो, करो,’’ बेटे ने कहा, ‘‘सेना के एक कप्तान से मैं ने दोस्ती की है. एक दिन बुला कर उसे दावत देनी है.’’ ‘‘वह किस खुशी में?’’ ‘‘अरे, जानती तो हो, आर्मी कैंटीन में सामान सस्ता मिलता है, एक दिन दावत देंगे तो साल भर सामान लाते रहेंगे.’’ ‘‘ठीक तो है, रंजना के यहां तो ढेर लगा है. जब पूछो, कहां से लिया है तो बस, इतरा कर कहती है कि मेजर साहब ने दिलवा दिया है.’’

जब नाश्ता करने बैठे तो मैं ने कहा, ‘‘अरे, यह दूध मेरे लिए क्यों रख दिया. अब कोई हमारी उम्र दूध पीने की है. लो, बेटा, तुम पी लो,’’ मैं ने अपना आधा प्याला पोते के आधे प्याले में डाल दिया. पत्नी ने कहा, ‘‘यह अंडा तो मुझे अब हजम नहीं होता. बहू, इन बच्चों को ही दे दिया करो. बाबा, डबल रोटी में इतना मक्खन लगा दिया…मैं तो बस, नाम मात्र का लेती हूं.’’ बहू ने कहा, ‘‘मांजी, ऐसे कैसे होगा? बच्चे तो रोज ही खाते हैं. आप जब तक हमारे पास हैं अच्छी तरह खाइए. लीजिए, आप ने भी दूध छोड़ दिया.’’ ‘‘मेरी सोना को दे दो. बच्चों को तो खूब दूध पीना चाहिए.’’

‘‘हां, बेटा, मैं तो भूल ही गया था. तुम्हारी मां के सीने में दर्द रहता है. काफी दवा की पर जाता ही नहीं. अच्छा होता किसी डाक्टर को दिखा देते. है कोई अच्छा डाक्टर तुम्हारी जानपहचान का?’’ बेटे ने सोच कर उत्तर दिया, ‘‘मेरी जानपहचान का तो कोई है नहीं पर दफ्तर में पता करूंगा. हो सकता है एक्सरे कराना पड़े.’’ बहू ने तुरंत कहा, ‘‘अरे, कहां डाक्टर के चक्कर में पड़ोगे, यहां कोने में सड़क के उस पार घोड़े की नाल बनाने वाला एक लोहार है. बड़ी तारीफ है उस की. उस के पास एक खास दवा है. बड़े से बड़े दर्द ठीक कर दिए हैं उस ने. अरे, तुम्हें तो मालूम है, वही, जिस ने चमनलाल का बरसों पुराना दर्द ठीक किया था.’’

‘‘हां,’’ बेटे ने याद करते हुए कहा, ‘‘ठीक तो है. वह पैसे भी नहीं लेता. बस, कबूतरों को दाना खिलाने का शौक है. सो वही कहता है कि पैसों की जगह आप आधा किलो दाना डाल दो, वही काफी है.’’ मैं ने गहरी सांस ली. पत्नी साड़ी के कोने से मेज पर पड़ा डबल रोटी का टुकड़ा साफ कर रही थी. मेरी मुट्ठी भिंच गईं. मुझे लगा मेरी मुट्ठी में इस समय अनगिनत रुपए हैं.

सोचने की बात सिर्फ यह थी कि इन्हें आज खत्म करूं या कल, परसों या कभी नहीं. बेटा दफ्तर जा रहा था. ‘‘सुनो,’’ उस ने बहू से कहा, ‘‘जरा कुछ रुपए दे दो. लौटते हुए गोश्त लेता आऊंगा, और रबड़ी भी. पिताजी को बहुत पसंद है न.’’ बहू ने झिड़क कर कहा, ‘‘अरे, पिताजी कोई भागे जा रहे हैं जो आज ही रबड़ी लानी है? रहा गोश्त, सो पाव आध पाव से तो काम चलेगा नहीं.

कम से कम 1 किलो लाना पड़ेगा. मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं. अब खाना ही है तो अगले महीने खाना.’’ ‘‘ठीक है,’’ कह कर बेटा चला गया. मुझे एक बार फिर लगा कि मेरी मुट्ठी में बहुत से पैसे हैं. मैं ने मुट्ठी कस रखी है. प्रतीक्षा है सिर्फ इस बात की कि कब अपनी मुट्ठी ढीली करूं. पत्नी ने कराहा. शायद सीने में फिर दर्द उठा था.

प्यार में खुद को न मिटाएं

असम के होम ऐंड पौलिटिकल सैक्रेटरी शिलादित्य चेतिया ने 18 जून, 2024 को गुवाहाटी के एक प्राइवेट हौस्पिटल के आईसीयू में पत्नी की लाश के सामने ही अपनी सर्विस रिवौल्वर से खुद को गोली मार ली. पत्नी की मौत के कुछ मिनटों बाद ही उन्होंने अपनी जान दे दी.

उसी अस्पताल में कुछ देर पहले उन की पत्नी की मौत कैंसर से हो गई थी. 44 साल के शिलादित्य चेतिया राष्ट्रपति के वीरता पदक से सम्मानित आईपीएस अधिकारी थे.

दरअसल, शिलादित्य चेतिया की पत्नी ब्रेन ट्यूमर से पीडि़त थीं और पिछले कुछ महीनों से अस्पताल में भरती थीं. शिलादित्य चेतिया पिछले 4 महीनों से छुट्टी ले कर अपनी पत्नी का इलाज करा रहे थे.

शिलादित्य की पत्नी अगमोनी बोरबरुआ की उम्र 40 साल थी. नेमकेयर अस्पताल में शाम के 4 बज कर 25 मिनट पर उन की मौत हो गई.

10 मिनट बाद ही आईपीएस अधिकारी शिलादित्य चेतिया ने भी दुनिया छोड़ दी.

पत्नी की मौत के बाद पहले वे आईसीयू केबिन में गए और मैडिकल स्टाफ से कहा कि वे अपनी पत्नी की लाश के पास प्रार्थना करना चाहते हैं, इसलिए उन्हें कुछ देर के लिए अकेला छोड़ दिया जाए. इस के बाद उन्होंने अपनी सर्विस रिवौल्वर से अपनी ही जान दे दी.

इसी तरह 18 जून, 2024 को ही उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में एक शादीशुदा जोड़े ने भी साथ जीनेमरने का वादा निभाया. पत्नी की मौत के कुछ घंटे बाद ही बुजुर्ग पति ने भी दम तोड़ दिया.

दरअसल, 70 साल की पार्वती प्रजापति और 75 साल के मगन प्रजापति की शादी 50 साल पहले हुई थी. पिछले कुछ समय से पार्वती काफी बीमार चल रही थीं.

17 जून, 2024 की रात को उन की मौत हो गई.

18 जून की सुबह जब पति मगन प्रजापति चाय ले कर उन के पास पहुंचे, तो देखा कि वे बिस्तर पर मरी हुई पड़ी थीं. उन की मौत से पति मगन सदमे में आ गए.

रिवाज के मुताबिक, जब पति मगन आखिरी बार उन की मांग में सिंदूर भरने लगे तो अचानक से उन की भी हालत खराब हो गई और कुछ ही देर में उन्होंने भी दम तोड़ दिया. इस के बाद पतिपत्नी का एकसाथ अंतिम संस्कार किया गया.

इसी तरह 9 अप्रैल, 2024 को उत्तर प्रदेश के एटा से एक सच्चे प्यार का मामला सामने आया था. बीमार पति की इलाज के दौरान मौत हो गई.

यह सूचना जैसे ही पत्नी को मिली कि उस का पति इस दुनिया में नहीं रहा, तो वह रोने लगी. फिर अचानक ही उस की भी मौत हो गई. पत्नी की मौत के साथ ही 2 बच्चे अनाथ हो गए.

यह मामला कोतवाली अलीगंज का है. 50 साल के ओम नारायण उर्फ राजू की कुछ दिन पहले तबीयत खराब हो गई थी, जिन का इलाज चल रहा था. वे सही हो गए थे. पर फिर ओम नारायण की अचानक फिर से तबीयत बिगड़ गई थी. वे फर्रुखाबाद के एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज के लिए ले जाए गए, जहां उन की मौत हो गई.

जब इस बात की सूचना उन की पत्नी मोहिनी को हुई, तो वह रोने लगीं. जैसे ही पति की लाश घर पर आई, तो वे और तेज रोने लगीं.

तभी अचानक मोहिनी की भी तबीयत खराब हो गई. जब तक परिवार वाले उन्हें संभाल पाते, तब तक उन की भी मौत हो गई. दोनों का अंतिम संस्कार एक ही चिता पर हुआ.

इन घटनाओं के बारे में जान कर दिल को यह अहसास जरूर होता है कि आज भी प्यार जिंदा है. किसी को इस हद तक चाहना कि उस के बगैर जीने की चाह ही खत्म हो जाए और इनसान खुद ही अपना वजूद खत्म कर दे, बहुत मुश्किल है. पर ऐसी कहानियां हम अकसर फिल्मों में जरूर देखते हैं.

प्यार क्या है

प्यार क्या है? किसी को पाना या खुद को खो देना? यह एक बंधन या फिर आजादी? यह जिंदगी है या फिर जहर?

दरअसल, प्यार का मतलब है कि कोई और आप से कहीं ज्यादा खास हो चुका है. जैसे ही आप किसी से कहते हैं कि मैं तुम से प्यार करता हूं, आप अपनी आजादी खो देते हैं. आप की मरजी में अब उस की मरजी भी शामिल हो जाती है. आप के पास जो भी है, वह उस का भी हो जाता है. आप की खुशी उस की खुशी में शामिल हो जाती है. उस के गम आप अपने दिल में महसूस करने लगते हैं. जिंदगी में आप जो भी करना चाहते हैं, वह उस के साथ मिल कर करने की ख्वाहिश रखने लगते हैं. उस के बिना आप को अपना वजूद ही अधूरा लगने लगता है यानी प्यार बड़ी खूबसूरती से खुद को मिटा देने वाली हालत है.

अगर आप खुद को नहीं मिटाते, तो आप कभी प्यार को जान ही नहीं पाएंगे. आप के अंदर का कोई न कोई हिस्सा मरना ही चाहिए. आप के अंदर का वह हिस्सा जो अभी तक आप का था, वह मिट कर उस का हो जाता है. कोई और इनसान उस हिस्से की जगह ले लेता है.

दरअसल, जब हमें किसी से प्यार होता है, तो हमारे दिमाग में एक रासायनिक मिश्रण निकलता है, जो हमारी हरकतों और भावनाओं को प्रभावित करता है. डोपामाइन जैसे हार्मोन की वजह से उत्तेजना और खुशी महसूस होती है, जबकि औक्सीटोसिन जैसे हार्मोन से हमें अपने प्यार में विश्वास और भावनाएं आती हैं.

ये हार्मोन हमें अंदर से खुश रखते हैं, जिस वजह से हम अपने पार्टनर के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहते हैं. हमारे दिमाग को सम?ा आ जाता है कि इस रिश्ते में हमें खुशी मिलती है और उस वजह से हम एक तरह से इस फीलिंग के आदी यानी एडिक्ट से हो जाते हैं. प्यार एक तरह का नशा ही है, जिस के बिना हमें अपना वजूद अधूरा लगने लगता है.

इस तरह का सच्चा प्यार आजकल ज्यादातर रिश्तों में नजर नहीं आता है. जराजरा सी बात पर पार्टनर पर हाथ उठा देना, ?ागड़े करना, दूर हो जाना, बात नहीं करना और यहां तक की तलाक ले लेना बहुत आम हो गया है.

वैसे भी आज के समय में नाजायज रिश्ते बनाने मुश्किल नहीं. मोबाइल और इंटरनैट के जरीए दूसरों के संपर्क में आने के बहुत से रास्ते खुले हुए हैं, तभी तो लोग शादी में रहते हुए भी किसी और के साथ रिश्ते बना लेते हैं, पार्टनर से ?ाठ बोलते हैं, उसे बेवकूफ बनाते हैं और कई दफा तो बात इतनी बढ़ जाती है कि वे एकदूसरे के ही खून के प्यासे बन जाते हैं. बहुत आसानी से पार्टनर को मौत की नींद सुला देते हैं, ताकि आजाद हो जाएं. पर यह आजादी प्यार नहीं है. प्यार तो वह बंधन है, जो किसी भी हालत में आप को पार्टनर से जोड़े रखता है.

प्यार : निखिल अपनी पत्नी से क्यों दूर होने लगा था

कहने को निखिल मुझ से बहुत प्यार करते हैं. सभी कहते हैं कि निखिल जैसा पति संयोग से मिलता है. घर में सभी सुखसुविधाएं हैं. मैं जो चाहती हूं वह मुझे मिल जाता है लेकिन लोग यह क्यों नहीं समझते कि मैं इनसान हूं. मुझे घर में सजी रखी वस्तुओं से ज्यादा छोटेछोटे खुशी के पलों की जरूरत है.

शादी के इतने साल बाद भी मुझे यह याद नहीं पड़ता कि कभी निखिल ने मेरे पास बैठ कर मेरा हाथ पकड़ कर यह पूछा हो कि मेघा, तुम खुश तो हो या मैं तुम्हें उतना समय नहीं दे पाता जितना मुझे देना चाहिए लेकिन फिर भी मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं. निखिल और मुझ में हमेशा एक दूरी ही रही. मैं अपने उस दोस्त को निखिल में कभी नहीं देख पाई जो एक लड़की अपने पति में ढूंढ़ती है. मैं कभी अपने मन की बात निखिल से नहीं कह पाई. मुझे निखिल के रूप में हमसफर तो मिला लेकिन साथी कभी नहीं मिला. इतने अपनों के होते हुए भी आज मैं बिलकुल अकेली हूं. जिस रिश्ते में मैं ने प्यार की उम्मीद की थी, मेरे उसी रिश्ते में इतनी दूरी है कि एक समुद्र भी छोटा पड़ जाए. मैं अपने इस रिश्ते को कभी प्यार का नाम नहीं दे पाई. मेरे लिए वह बस, एक समझौता ही बन कर रह गया जिसे मुझे निभाना था…चाहे घुटघुट कर ही सही. मैं ने धीरेधीरे अपने हालात से समझौता करना सीख लिया था.

 

अपने आसपास से छोटीछोटी खुशियों के पल समेट कर उन्हीं को अपने जीने की वजह बना लिया था. मैं ने इस के लिए एक स्कूल में नौकरी कर ली थी, जहां बच्चों की छोटीछोटी खुशियों में मैं अपनी खुशियां भी ढूंढ़ लेती थी. बच्चों की प्यारी और मासूमियत भरी बातें मुझे जीने का हौसला देती थीं. किसी इनसान के पास अगर उस के अपनों का प्यार होता है तो वह बड़ी से बड़ी मुसीबत का सामना भी आसानी से कर लेता है, क्योंकि उसे पता होता है कि उस के अपने उस के साथ हैं. लेकिन उसी प्यार की कमी उसे अंदर से तोड़ देती है, बिखरने लगता है सबकुछ…मैं भी टूट कर बिखर रही थी लेकिन मेरे अंदर का टूटना व बिखरना किसी ने नहीं देखा. जिंदगी का यह सफर सीधा चला जा रहा था कि अचानक उस में एक मोड़ आ गया और मेरी जिंदगी ने एक नई राह पर कदम रख दिया. मेरे दिल की सूखी जमीन पर जैसे कचनार के फूल खिलने लगे और उसी के साथ मेरे अरमान भी महकने लगे. स्कूल में एक नए टीचर समीर की नियुक्ति हुई. वह विचारों से जितने सुलझे थे उन का व्यक्तित्व भी उतना ही आकर्षक था. उन से बात कर के दिल को न केवल बहुत राहत मिलती थी बल्कि वक्त का भी एहसास नहीं रहता था. समीर कहा करते थे कि इनसान जो चाहता है उसे हासिल करने की हिम्मत खुद उस में होनी चाहिए. एक दिन बातों ही बातों में समीर ने पूछ लिया, ‘मेघा, तुम इतनी अलगअलग सी क्यों रहती हो? किसी से ज्यादा बात भी नहीं करती हो. क्यों तुम ने अपने अंदर की उस लड़की को कैद कर के रखा है, जो जीना चाहती है? क्या तुम्हारा दिल नहीं करता कि उड़ कर उस आसमान को छू लूं…एक बार अपने अंदर की उस लड़की को आजाद कर के देखो, जिंदगी कितनी खूबसूरत है.’ समीर की बातें सुनने के बाद मुझे लगने लगा था कि मेरा भी कुछ अस्तित्व है और मुझे भी अपनी जिंदगी खुशियों के साथ जीने का हक है.

यों घुटघुट कर जीने के लिए मैं ने जन्म नहीं लिया है. इस तरह मुझे मेरे होने का एहसास दिया समीर ने और मुझे लगने लगा था जैसे मुझे वह दोस्त व साथी मिल गया है जिस की मुझे तलाश थी, जिसे मैं ने हमेशा निखिल में ढूंढ़ा लेकिन मुझे कभी नहीं मिला. मैं फिर से सपने देखना चाहती थी लेकिन मन में एक डर था कि यह सही नहीं है. समीर की आंखों में एक कशिश थी जो मुझे मुझ से ही चुराती जा रही थी. उन की आंखों में डूब जाने का मन करता था और मैं कहीं न कहीं अपने को बचाने की कोशिश कर रही थी लेकिन असफल होती जा रही थी. मन कह रहा था कि सभी पिंजरे तोड़ कर खुले आकाश में उड़ जाऊं पर इस दुनिया की रस्मोरिवाज की बेडि़यां, जिन में मैं इस कदर जकड़ी हुई थी कि उन्हें तोड़ने की हिम्मत नहीं थी मुझ में. मेरे अंदर एक द्वंद्व चल रहा था. दिल और दिमाग की लड़ाई में कभी दिल दिमाग पर हावी हो जाता तो कभी दिमाग दिल पर. कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं. समीर का बातें करतेकरते मेरे हाथ को पकड़ना, मुझे छूने की कोशिश करना, मुझे अच्छा लगता था. उन के कहे हर एक शब्द में मुझे अपनी जिंदगी आसान करने की राह नजर आती थी. मेरा मन करने लगा था कि मैं दुनिया को उन की नजरों से देखूं, उन के कदमों से चल कर अपनी राहें चुन लूं. भुला दूं कि मेरी शादी हो चुकी है. पता नहीं वह सब क्या था जो मेरे अंदर चल रहा था. एक अजीब सी कशमकश थी.

अपने अंदर की इस हलचल को छिपाने की मैं कोशिश करती रहती थी. डरती थी कि कहीं मेरे जज्बात मेरी आंखों में नजर न आ जाएं और कोई कुछ समझे, खासकर समीर को कुछ समझ में आए. समीर जब भी मेरे सामने होते थे तो मन करता था कि उन्हें अपलक देखती रहूं और यों ही जिंदगी तमाम हो जाए. उन की आंखों में डूब जाने का मन करता था. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं और क्या न करूं. दिमाग कहता था कि मुझे समीर से दूरी बना कर रखनी चाहिए और दिल उन की ओर खिंचता ही जा रहा था. दिमाग कहता था कि नौकरी ही छोड़ दूं और दिल मेरे कदमों को खुद ब खुद उस राह पर डाल देता था जो समीर की तरफ जाती थी. बहुत सोचने के बाद मैं ने दिमाग की बात मानने में ही भलाई समझी और फैसला किया कि अपने बढ़ते कदमों को रोक लूंगी. मैं ने समीर से कतराना शुरू कर दिया. अब मैं बस, काम की ही बात करती थी. समीर ने कई बार मुझ से बात करने की कोशिश की लेकिन मैं ने टाल दिया. वह परेशानी जो अब तक मैं ने अपने मन में छिपा रखी थी अब समीर की आंखों में दिखने लगी थी और मैं अपनेआप को यह कह कर समझाने लगी थी कि क्या हुआ अगर समीर मेरे पास नहीं हैं, कम से कम मेरे सामने तो हैं. क्या हुआ अगर हमसफर नहीं बन सकते, मगर वह मेरे साथ हमेशा रहेंगे मेरी यादों में…मेरे जीने के लिए तो इतना ही काफी है. मैं अपने विचारों में खोई समीर से दूर, बहुत दूर जाने के मनसूबे बना रही थी कि अगले दिन समीर स्कूल नहीं आए. मेरी नजरें उन्हें ढूंढ़ रही थीं लेकिन किसी से पूछने की हिम्मत नहीं थी क्योंकि जब अपने मन में ही चोर हो तो सारी दुनिया ही थानेदार नजर आने लगती है. किसी तरह वह दिन बीता पर घर आने के बाद भी अजीब सी बेचैनी छाई हुई थी.

अगले दिन भी समीर स्कूल नहीं आए और इसी तरह 4 दिन निकल गए. मेरी बेचैनी दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही थी फिर बहुत हिम्मत कर के सोचा कि फोन ही कर लेती हूं. कुछ तो पता चलेगा. मैं ने फोन किया तो उधर से सीमा ने फोन उठाया. मैं ने उस से पूछा, ‘‘अरे, सीमा तुम, कब आईं होस्टल से?’’ ‘‘दीदी, मुझे तो आए 2 दिन हो गए,’’ सीमा ने बताया. ‘‘सब ठीक तो है न…समीरजी भी 4 दिन से स्कूल नहीं आ रहे हैं.’’ ‘‘दीदी, इसीलिए तो मैं यहां आई हूं. भैया की तबीयत ठीक नहीं है. उन्हें बुखार है और मेरी बातों का उन पर कोई असर नहीं हो रहा. न तो ठीक से कुछ खा रहे हैं और न ही समय पर दवा ले रहे हैं. मैं तो कहकह कर थक गई. आप ही आ कर समझा दीजिए न.’’ मैं सीमा को मना नहीं कर पाई और अगले दिन आने को कह दिया. अगले दिन समीर के घर जा कर घंटी बजाई तो सीमा ने ही दरवाजा खोला. मुझे देख कर वह बोली, ‘‘अंदर आइए न, मेघाजी, मैं तो आप का ही इंतजार कर रही थी.’’ ‘‘कैसी हो, सीमा,’’ मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है.’’ ‘‘पढ़ाई तो ठीक चल रही है, मेघाजी,’’ सीमा बोली, ‘‘बस, समीर भैया की चिंता है. हम दोनों का एकदूसरे के सिवा है ही कौन और मैं तो होस्टल में रहती हूं और भैया यहां पर बिलकुल अकेले. जब से मैं घर आई हूं देख रही हूं कि भैया बहुत उदास रहने लगे हैं. आप ही देखो न कितना बुखार है लेकिन ढंग से दवा भी नहीं लेते. आप तो उन की दोस्त हैं, आप ही बात कीजिए, शायद उन की समझ में आ जाए.’’ मैं सीमा के साथ समीर के कमरे में गई तो वह लेटे हुए थे. बहुत कमजोर लग रहे थे. मैं ने माथे पर हाथ रखा तो बुखार अभी भी था. मैं ने सीमा से कुछ खाने के लिए और ठंडा पानी लाने के लिए कहा और समीर को बैठने में मदद करने लगी. सीमा खिचड़ी ले आई.

मैं खिलाने लगी तो समीर बच्चों की तरह न खाने की जिद करने लगे. मैं ने कहा, ‘‘समीरजी, आप अपना नहीं तो कम से कम सीमा का तो खयाल कीजिए… वह कितनी परेशान है.’’ खैर, उन्हें खिचड़ी खिला कर दवा दी और लिटा दिया. मैं माथे पर पानी की पट्टियां रखने लगी. कुछ देर बाद बुखार कम हो गया. समीर सो गए तो मैं ने सीमा से कहा, ‘‘सीमा, मैं जा रही हूं. तुम अपने भैया का ध्यान रखना. अगर हो सका तो मैं कल फिर आने की कोशिश करूंगी.’’ मैं घर आ गई लेकिन दिमाग में एक सवाल घूम रहा था कि क्या समीर की इस हालत की जिम्मेदार मैं हूं? क्या मेरी बेरुखी से वह इतने आहत हो गए कि उन की तबीयत खराब हो गई. मुझे ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए था. ये बातें सोचतेसोचते न जाने कब मेरी आंख लग गई. फोन की घंटी की आवाज सुन कर मेरी नींद खुली. घड़ी में सुबह के 8 बज चुके थे. आज भी स्कूल की छुट्टी हो गई, यह सोचते हुए मैं ने फोन उठाया तो दूसरी तरफ सीमा थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘समीरजी की तबीयत कैसी है?’’ ‘‘मेघाजी, भैया ठीक हैं. बस, मुझे एक जरूरी काम से अपनी सहेली के साथ बाहर जाना है और भैया अभी इस लायक नहीं हैं कि उन्हें अकेला छोड़ा जा सके इसलिए आप की मदद की जरूरत है. क्या आप कुछ देर के लिए यहां आ सकती हैं?’’ मैं ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं आती हूं,’’ और फोन रख दिया. मैं तैयार हो कर वहां पहुंची तो सीमा और उस की सहेली मेरा ही इंतजार कर रही थीं. वह मुझे थैंक्स कहती हुई चली गई. मैं ने समीर के कमरे में जा कर देखा तो वह सो रहे थे. मैं ड्राइंगरूम में आ कर सोफे पर बैठ गई और मेज पर रखी किताब के पन्ने पलटने लगी. थोड़ी देर बाद समीर के कमरे में कुछ आवाज हुई…मैं ने जा कर देखा तो समीर अपने बिस्तर पर नहीं थे. शायद बाथरूम में थे, मैं वहां से आ गई और रसोई में जा कर चाय का पानी चूल्हे पर रख दिया. चाय बना कर जब मैं बाहर आई तो समीर नहा चुके थे. उन की तबीयत पहले से ठीक लग रही थी लेकिन कमजोरी बहुत थी. मुझे देख कर वह चौंक गए. शायद उन्हें पता नहीं था कि मैं वहां पर हूं. ‘‘मेघाजी…आप, सीमा कहां है?’’ ‘‘उसे किसी जरूरी काम से जाना था, आप की तबीयत ठीक नहीं थी. अकेला छोड़ कर कैसे जाती इसलिए मुझे बुला लिया. आप चाय पीजिए, वह आ जाएगी.’’ ‘‘सीमा भी पागल है. अगर उसे जाना था तो चली जाती…आप को क्यों परेशान किया,’’ समीर बोले. मैं ने समीर की तरफ देखा और चुपचाप चाय का प्याला उन्हें थमा दिया.

हम खामोशी से चाय पीने लगे. कुछ भी कहने की हिम्मत न तो मुझ में थी और न शायद उन में. चाय पी कर मैं बर्तन रसोई में रखने के लिए उठी तो समीर ने मेरा हाथ पकड़ लिया. एक सिहरन सी दौड़ गई मेरे पूरे शरीर में. टे्र हाथ से छूट जाती अगर मैं उसे मेज पर न रख देती. मैं ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की तो उन्होंने और कस कर मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले, ‘‘मेघा, तुम ने मेरे लिए यह सबकुछ क्यों किया?’’ समीर के मुंह से अपने लिए पहली बार मेघाजी की जगह मेघा और आप की जगह तुम का उच्चारण सुन कर मैं चौंक गई. इस तरह से मुझे पुकारने का अधिकार उन्होंने कब ले लिया. मैं कुछ बोल ही नहीं पा रही थी कि उन्होंने फिर से पूछा, ‘‘मेघा, तुम ने मेरे सवालों का जवाब नहीं दिया. तुम ने मेरे लिए यह सब क्यों किया?’’ बहुत हिम्मत कर के मैं ने अपना हाथ छुड़ाया और कहा, ‘‘एक दोस्त होने के नाते मैं इतना तो आप के लिए कर ही सकती थी, इतना भी अधिकार नहीं है मेरा?’’ ‘‘पहले तुम यह बताओ कि क्या हमारे बीच अभी भी सिर्फ दोस्ती का रिश्ता है? मेघा, तुम्हारा अधिकार क्या है और कितना है इस का फैसला तो तुम्हें ही करना है,’’ समीर बोले. मैं ने अपनी नजरें उठाईं तो समीर मुझे ही देख रहे थे. कितना दर्द, कितना अपनापन था उन की आंखों में. दिल चाह रहा था कि कह दूं…समीर, मैं आप से बेइंतहा प्यार करती हूं…नहीं जी सकती मैं आप के बिना. अपने सभी जज्बात, सभी एहसास उन के सामने रख दूं…उन की बांहों में समा जाऊं और सबकुछ भुला दूं लेकिन होंठ जैसे सिल गए थे. बिना कुछ कहे ही हम एकदूसरे के जज्बात और हालात समझ रहे थे. मुझे भी यह एहसास हो चुका था कि समीर भी मुझे उतना ही प्यार करते हैं जितना मैं उन्हें करती हूं. वह भी अपने प्यार की मौन सहमति मेरी आंखों में पढ़ चुके थे और शायद उस अस्वीकृति को भी पढ़ लिया था उन्होंने. कुछ नहीं बोल पाए…हम बस, यों ही जाने कितनी देर बैठे रहे. फिर अचानक समीर ने मेरे चेहरे को अपने हाथों में लिया और मेरे माथे को चूम लिया. अब मैं खुद को रोक नहीं पाई और उन की बांहों में समा गई. कितनी देर हम रोते रहे मुझे नहीं पता. दिल चाह रहा था कि यह पल यहीं रुक जाए और हम यों ही बैठे रहें. फिर समीर ने कहा, ‘‘मेघा, तुम जहां भी रहो खुश रहना और एक बात याद रखना कि मुझे तुम्हारी आंखों में आंसू और उदासी अच्छी नहीं लगती.

मैं चाहे तुम्हारे पास न रहूं, लेकिन तुम्हारे साथ हमेशा रहूंगा. बहुत देर हो गई है, अब तुम जाओ.’’ मैं ने अपना बैग उठाया और वहां से अपने घर आने के लिए निकल पड़ी. इसी प्यार ने एक बार फिर मुझे नए मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया. मैं ने सोच लिया था कि अब मैं समीर से कभी नहीं मिलूंगी. आज तो उस तूफान को हम पार कर गए, खुद को संभाल लिया, लेकिन दोबारा मैं ऐसा शायद न कर पाऊं और मैं नहीं चाहती थी कि समीर के आगे कमजोर पड़ जाऊं. मैं अपने प्यार को अपना तो नहीं सकती थी लेकिन उसी प्यार को अपनी शक्ति बना कर अपने फर्ज के रास्ते पर कदम बढ़ा चुकी थी

मैं ने अगले दिन स्कूल में अपना इस्तीफा भेज दिया. मैं ने एक बार फिर प्यार और समझौते में से समझौते को चुन लिया. मेरे अंदर जो प्यार समीर ने जगाया वह एहसास, उन की कही हर एक बात, उन के साथ बिताए हर एक पल मेरी जिंदगी का वह अनमोल खजाना है, जो न तो कभी कोई देख सकता है और न ही मुझ से छीन सकता है. कितना अजीब सा एहसास है न यह प्यार, कब किस से क्या करवाएगा, कोई नहीं जानता. यह एहसास किसी के लिए जान देने पर मजबूर करता है तो किसी की जान लेने पर भी मजबूर कर सकता है. अब आप ही बताइए कि आप प्यार को किस तरह से परिभाषित करेंगे, क्योंकि मेरे लिए तो यह एक ऐसी पहेली है जो कम से कम मैं तो नहीं सुलझा पाई. मैं नहीं जानती कि मैं ने इतना प्यार करते हुए भी समीर को क्यों नहीं अपनाया और अपनी शादी के समझौते.

क्रिकेट मैदान में ही क्रिकटर्स करने लगें रोमांस, वायरल है इनके किस्से

क्रिकेट के खेल में हमेशा से ही देखा गया है दो दिल मैदान पर मिल जाते है क्योकि ये खेल ही ऐसा है. इस खेल में कुछ भी हो सकता है और इस खेल को खेलने वालों की यही खासियत है. कि वे खेल को बहुत ही शिद्दत के साथ खेलते है. साथ ही खेल के मैदान में रोमांस भी दिखाते है क्रिकेटर्स के ऐसे किस्से कई ज्यादा है जो आए दिन मीडिया में वायरल होते रहते है.

 

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विराट कोहली और अनुष्का शर्मा

विराट कोहली और अनुष्का शर्मा के प्यार सिंबल कई बार खेल के मैदान में देखें गए है. कभी अनुष्का तालियों की गूंज से विराट का मनोबल बढ़ाती है, तो कभी एक्ट्रेस विराट के बल्लेबाजी की वाहवाही करती है. हालांकि इनका एक किस्सा बहुत मशहूर है जब कोहली ने सचिन का रिकोर्ड तोड़ दिया था और 50 शतक जड़ दिया था. तब अनुष्का ने दिल खोलकर प्यार लुटाया था. एक्ट्रेस एख ने कई बार विराट की तरफ देख फ्लाइंग किस किया. वही, दर्शकों के सामने विराट ने भी मैदान से ही वाइफ अनुष्का को किस किया था.

हार्दिक पांड्या और नताशा स्तानकोविक

IPL फिनाले में राजस्थान रौयल्स को गुजरात टाइटन्स ने करारी मात दी थी. बड़ी जीत के बाद गुजरात टाइटन्स के कप्तान हार्दिक पांड्या ने जीत की ट्रौफी अपने नाम की थी. ये नजारा देख हार्दिक पांड्या की पत्नी और फिल्म स्टार नताशा स्तानकोविक खुशी से झूम उठीं थी. नताशा स्तानकोविक ने जीत के बाद हार्दिक पांड्या को बीच मैदान में ही गले लगा लिया था और ट्रौफी के साथ फोटो भी क्लिक कराई. हालांकि दोनों का हाल ही में तलाक हो चुका है.

धोनी और साक्षी

फ्लाइंग किस के किस्से तो खूब सुने लेकिन जब धोनी के एक शौट पर साक्षी ने फ्लाइंग किस सभी के सामने कर दी तो, सभी के लिए वो यादगार लम्हा बन गया. साथ ही, दोनों का ये मूमंट हिट हो गया.

सारा तेंदुलकर और शुभमन गिल

एक बार बांग्लादेश के खिलाफ शुभमन गिल ने शानदार बल्लेबाजी की थी. इस मैच को देखने के लिए महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर की बेटी सारा तेंदुलकर पुणे के एमसीए स्टेडियम पहुंची थीं. सारा तेंदुलकर इस मुकाबले के दौरान शुभमन गिल को चियर करती नजर आईं. जब शुभमन गिल की पारी की शुरुआत में चौका मारा तो सारा खुशी से झूम उठीं. इसके बाद गिल ने अपनी फिफ्टी पूरी की. जिसकी वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई.

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