Hindi Story: उद्धार

Hindi Story: ‘‘  री छमिया, री कहां रह गई. चल, जल्दीजल्दी चल. सब से पहले हमें पहुंचना है. तेरे भाई को मैं ने पहले ही भेज दिया, ताकि वह हमारी जगह रोक कर रखे.’’ ‘‘आई भाभी आई, कोई ढंग का कपड़ालत्ता नहीं मिल रिहा था. फटाफट  दर्जी से यह लहंगा बनवाने लग गई थी. इसी खातिर देर हो गई,’’ छमिया ने कहा.


जैसे ही छमिया लहंगा पहन कर झोपड़े से बाहर निकली, उस की मुंहबोली भाभी बस्ती के मांगेलाल की बहू लाजो बिना पलकें ? झपकाए उसे ही देखे जा रही थी. मानो उस ने कोई अजूबा देख लिया हो.
‘‘भाभी, चालो अब, यह मुझे मुझे टुकुरटुकुर क्या देख रही हो?’’ ‘‘वाह छोरी, मैं ने तो पहचाना ही नहीं, एकदम परी लग रही है आज तोध्यान से रहना वहां, कहीं कोई शहरी बाबू दिल दे बैठे .’’


‘‘क्या भाभी, तुम भी …’’ छमिया ने ऐसा कहते हुए शरमा कर नजरें झुका लीं. झॉ दोनों  उस तरफ चल पड़ीं, जिधर आज बहुत बड़ा पंडाल बना हुआ था. मुफ्त में खाना बंटने वाला था. खाने के साथ हर ?  झोपड़पट्टी वाले को 1-1 कंबल मुफ्त में दिया जाएगा. ऐसी घोषणा 2 दिन पहले हुई थी. कोई नेता रहे थे नारी उद्धार का बीड़ा उठाने. इस बस्ती में वे नारी उद्धार कर के रहेंगे. अब कोई नारी किसी भी वजह से दुखी नहीं रहेगी, इसलिए बस्ती के सभी लोगों को उस पंडाल में जमा होने को कहा गया था. सभी अपनीअपनी फरियाद ले कर पहुंचें, सभी की समस्याओं का हल किया जाएगा. ऐसी अनाउंसमैंट हुई थी.


लाजो और छमिया दोनों को जातेजाते रास्ते में और भी औरतें मिली थीं. बहुत ज्यादा बड़ी बस्ती तो थी नहीं, लेदे कर 400-500 घर ही होंगे उस बस्ती में. घर भी क्या ?ांपड़पट्टी ही कहो. सभी औरतें रास्ते में अपनीअपनी समस्याओं का जिक्र करती जा रही थीं. कोई कहती कि बस्ती में पानी की समस्या का समाधान होना चाहिए, तो कोई कहती कि बस्ती में एक भी डाक्टर नहींअगर कोई बीमार पड़ जाए तो दवादारू के लिए उसे शहर जाना पड़ता है. कभी किसी की हालत ज्यादा खराब हो तो शहर तक जातेजाते रास्ते में ही उस का राम नाम सत्य हो जाता है.


1-2 बार ऐसा हुआ भी था. बस्ती के नाई घसीटामल को सांस की तकलीफ थी. एक बार तकलीफ इतनी बढ़ी कि सांस लेना दूभर हो रहा था. बस्ती का ?ालाछाप डाक्टर भी कुछ नहीं कर पा रहा था. जितना वह इलाज करता, सांस लेने में और दिक्कत आती, इसलिए शहर के डाक्टर के पास जाने की सलाह दी गई.
लेकिन शहर जाते समय रास्ते में घसीटामल की सांस हमेशा के लिए बंद हो गई. इसी तरह के और भी कई केस हुए थे.


इसी तरह सभी औरतें अपनीअपनी समस्याओं के बारे में बातें करते हुए पंडाल में जा पहुंची थीं. तरहतरह के खाने की खुशबू से पंडाल महक रहा था. खुशबू इतनी शानदार थी कि सब के मुंह में पानी गया.
‘‘ भाई, ये साहब लोग कब तक आएंगे? मेरा तो खाना खाने का जी कर रहा है. इतना खुशबूदार खाना आज तक नहीं देखा है. पता नहीं आज क्याक्या मिलेगा खाने को.’’ ‘‘थम जा भाई, अभी जाएंगे. पहले साहब लोगों को खाने देना, फिर आप जितना जी चाहे खा लेना.’’ ‘‘रे बावले, यह जो खाना हम गरीब लोगों के लिए बनाया है, वह साहब लोग थोड़ी खाएंगे. साहब लोगों का खाना तो स्पैशल बनेगा…’’


थोड़ी ही देर में एक लंबी सी गाड़ी कर रुकी. उस के पीछेपीछे कुछ गाडि़यां और भी थीं. लंबी गाड़ी में से सफेद कुरताधोती पहने, सिर पर सफेद टोपी लगाए एक सज्जन निकले और दनदनाते हुए सीधे उस टैंट में घुस गए, जो खास उन के लिए शहर से आए लोगों ने बनाया था. उन के पीछेपीछे कुछ बस्ती वाले भी, जो अपना चौधरपना दिखाना चाहते थे, दुमछल्ले के जैसे पीछे लग लिए, जैसे वे इन मंत्री के सगे वाले हों.
लेकिन टैंट के पास आते ही नेताजी के चमचों ने उन्हें बाहर ही रोक लिया, मगर टैंट के अंदर की एकालक तो देखने को मिल ही गई.


एक शानदार सोफा और सैंट्रल टेबल पर ताजा फूलों से महकता हुआ गुलदस्ता सजा हुआ था. साथ में फलों से भरी हुई छोटी सी खूबसूरत टोकरी रखी हुई थी. और भी जाने क्याक्या पीने के सामान रखे थे, ये वे मासूम बस्ती वाले क्या जानेंखैर, थोड़ी ही देर में जो खाना यहां बना हुआ था उस की एक थाली अंदर टैंट में ले जाई गई और उस के बाद अनाउंसमैंट हुई, ‘‘बस्ती वालो, जो खाना आप लोगों के लिए बनवाया गया है, वही खाना नेताजी को भी दिया गया है, क्योंकि हमारे आदर्श नेता आप सब को अपना भाईबंधु मानते हैं, इसलिए वे भी आप के साथ ही बैठ कर खाना खाना चाहते थे.


‘‘मगर तबीयत खराब होने की वजह से उन का खाना अंदर ही दे दिया गया है और अब आप सब भी खाना शुरू करें. उस के बाद नेताजी खुद कर आप सब के उद्धार के बारे में चर्चा करेंगे.’’ सभी लोग यह सुनते ही खाने वाले पंडाल की तरफ टूट पड़े. आज जाने कितने सालों बाद इतने लजीज खाने की खुशबू सूंघी है. जैसे ही जनता खाने वाले स्टौल की तरफ लपकी, नेताजी का एक चमचा दौड़ कर नेताजी की कार में से टिफिन बौक्स निकाल लाया. हां, इस बस्ती में एक बंदा ऐसा था, जो थोड़ाबहुत सुनसुना कर टूटीफूटी इंगलिश ?ाड़ता था. उस ने नेताजी के बाशिंदे को टिफिन ले जाते देख करा झट से उसे दबोच लिया, ‘‘क्यों सरजी, बट इज इट…’’

‘‘नथिंग, नथिंग, जस्ट मैडिसन…’’
‘‘हांजीक्या बोले जी? अरे, हम पूछिंग, बट इज दिस…’’
‘‘ओह, इस टिफिन में साहब की दवाएं हैं. खाने के साथ लेनी होती हैं, इसलिए ले जा रहा हूं.’’
‘‘ओके, ओके, गो, गो…’’


आप समझ सकते हैं सबकुछ कि टिफिन में कौन दवाएं रखता है. अरे, नेताजी भला वह खाना खाएंगे जो आम लोगों के लिए लंगर चलवाया था? खैरभोजनपानी हो गया. सब लोग पंडाल में गए. नेताजी भी दांतों मेंसे कुछ फंसा हुआ चिकन का पीस
माचिस की तीली से निकालते हुए पधार रहे हैं. चमचों ने सब को शांत हो कर बैठने को कह दिया. सब लोग शांति से बैठ गए.


जिन के छोटे बच्चे थे, वे थोड़ा शोरशराबा करने लगे, तो नेताजी के चमचों ने फरमान सुनाया कि इन बच्चों को उन के दादादादी पंडाल के पीछे के हिस्से में खेलने के लिए ले जाएं, ताकि वे जवान लोगों को उन के उद्धार का तरीका अच्छे ढंग से सम? सकें. औरतें आगे और मर्द पीछे बैठ गए. नेताजी कि नजरें उद्धार करने लायक चेहरे खोजने लगीं. अब हुआ नेताजी का भाषण शुरू.


नेताजी ने सब की शिकायतें सुनीं और अपने एक चमचे को हुक्म दिया कि कागज पर सब की शिकायतें नोट कर लें, ताकि किसी की भी कोई समस्या रह जाए, जिस का समाधान हो. अब नेताजी ने सब को आश्वासन दिया कि सत्ता में आते ही सब की समस्या का समाधान किया जाएगा और इस बस्ती का उद्धार नेताजी कर के रहेंगे. नेताजी ने एक और बहुत बड़ी बात कह दी कि चाहे वे सत्ता में आएं या आएं, लेकिन इस बस्ती का उद्धार तो वे आज से करना शुरू करेंगे, क्योंकि यह बस्ती उन्हें अपने परिवार की तरह है.


जी हां, सामने छमिया जैसी कई सुंदरियां उन्हें अपनी ही लग रही थीं, इसलिए भाषण के बाद उन के टैंट में उन सुंदरियों की भीड़ लग गई, जिनजिन के नाम ले कर उद्धार के लिए बुलाया गया था. नेताजी उन सब सुंदरियों को शहर में अच्छी नौकरी, अच्छा रहनसहन, अच्छा खानपान और शहरी सलीका सिखाने के लिए साथ ले गए. 2 साल बाद छमिया जैसी सभी वे लड़कियां जिन का उद्धार करने के लिए ले जाया गया था, बस्ती में आईं. सब ने बेशकीमती कपड़े और गहने पहने हुए थे. हाथों में पान की छोटी सी डिबिया जिन में से वे पान निकाल कर मुंह में ठूंस कर इधरउधर पीक फेंक रही थीं. उन के परिवारजनों के पास छोटेछोटे पक्के मकान थे. बिजलीपानी की सुविधा थी.


दूसरे  झांपड़पट्टी वालों ने उद्धार की गुहार लगाई, तो उन्हें बताया गया कि शहर में केवल सुंदरियों को ही काम पर रखा जाता है. उन के द्वारा ही उन के परिवारों का उद्धार हो सकता है और इसलिए वे उद्धार करने के लिए ही दूसरी सुंदरियों को चुनने आई हैं.  Hindi Story 

लेखक प्रेम बजाज

Hindi Kahani: मां की भूमिका में चमेली

Hindi Kahani: छत्तीसगढ़ का शहर बिलासपुर हाईकोर्ट होने की वजह से न्यायधानी के नाम से जाना जाता है. दिनेश अपने परिवार के साथ बिलासपुर के जरहाभाटा के मंझवापारा में रहता था. वह अपने ही मोहल्ले की किशोरी वीना कौशिक को भगा ले गया था. यह भी कह सकते हैं कि वीना दिनेश के साथ जीनेमरने की कसम खा कर अपने घर की देहरी लांघ आई थी और उस के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगी थी.

वीना के पिता जवाहर कौशिक अपनी पत्नी चमेली और बेटी वीना से अलग दूसरे मोहल्ले में रहते थे. सिर्फ मां चमेली ही वीना की एकमात्र गार्जियन थी. वीना अभी 18 वर्ष की हुई थी कि उसे दिनेश से प्रेम हो गया. फिर एक दिन वह घर से बिना बताए गायब हो गई.

दिनेश के पिता रविशंकर श्रीवास की हेयर कटिंग सैलून थी जिस से वे परिवार का भरण पोषण करते थे. दिनेश भी पिता की दुकान पर काम करता था. वह अल्पायु में ही पढ़ाई छोड़ चुका था. फिलहाल वह 21 वर्ष का था. दिनेश और वीना एकदूसरे का हाथ थाम कर घर से निकले तो कुछ दिन रायपुर में बिताने के बाद बिलासपुर आ गए. इस शहर में वह तिफरा में किराए का मकान ले कर रहने लगे.

दिनेश एक सैलून में नौकरी करने लगा, ताकि वीना की और अपनी जिंदगी को हसीन बना सके. लेकिन यह संभव न हो सका. दिनेश के पिता रविशंकर और मां नूतन को यह पता चला कि बेटा वीना के साथ सुखपूर्वक रह रहा है तो वे मौन रह गए. लेकिन वीना की मां चमेली मौन नहीं रह सकी.

एक दिन जब दिनेश काम पर गया हुआ था, तो वीना की मां आ धमकी. वीना ने मां को बैठाया, चायपानी को पूछा. दोनों की बातचीत हुई तो चमेली आंसू बहाते हुए कहने लगी, ‘‘बेटी, तुम ने यह क्या कर दिया, हमारी तो सारी इज्जत ही मिट्टी में मिल गई.’’

वीना मां की बातें सुनती रही. बातोंबातों में चमेली ने पूछा, ‘‘बेटा, तुम ने दिनेश से ब्याह कहां किया? गवाह कौनकौन थे?’’

इस पर वीना का सिर झुक गया, वह बोली, ‘‘मां, हम ने अभी तक विवाह नहीं किया है.’’

इस पर चमेली स्तब्ध रह गई. बोली, ‘‘तुम बिना विवाह के दिनेश के साथ कैसे रह सकती हो? यह तो पाप है बेटी.’’

वीना चुपचाप मां की बातें सुनती रही.

चमेली ने आगे कहा, ‘‘तुम खुश तो हो न? मैं तुम्हारी शादी दिनेश से ही करा दूंगी. ऊंचनीच तुम क्या जानो, औरत के लिए मंगलसूत्र और सिंदूर का बड़ा महत्त्व होता है. समाज में रह कर उसी के हिसाब से जीना पड़ता है और उस के नियमकायदे मानने होते हैं. तुम अगर मेरी बात नहीं मानोगी तो पछताओगी.’’

वीना कुछ दिन दिनेश के साथ रह कर समझ गई थी कि प्यार के शुरुआती आकर्षण वाले मीठे सपने जब हकीकत के कठोर धरातल पर टकराते हैं, तब टूट कर किरचाकिरचा बिखर जाते हैं. उसे मां का सहारा मिला तो वह फट पड़ी और आंखों में आंसू लिए मां की गोद में सिर रख कर रोने लगी.

मां ने उसे ढांढस बंधाया, फिर बोली, ‘‘बेटा, तुम ने गलती तो बहुत बड़ी की है. लेकिन मैं मां हूं. मैं तुम्हें माफ नहीं करूंगी तो कौन करेगा.’’

वीना मां की ओर आशा भरी निगाहों से देखने लगी. चमेली ने कहा, ‘‘अच्छा, अब तू दिनेश के साथ खुश है या नहीं, साफसाफ बता.’’

वीना ने बहुत सोचा, फिर कहा, ‘‘मां, मुझे लगता है कि मैं ने भूल की है. मुझे दिनेश के लिए घर नहीं छोड़ना चाहिए था. बताओ, अब मैं क्या करूं?’’

चमेली ने कहा, ‘‘अच्छा, अभी तुम मेरे साथ चलो, बाद में देखेंगे कि क्या करना है.’’

वीना तैयार हो गई. घर में ताला लगा कर उस ने चाबी पड़ोस की एक महिला को दे दी. इस के बाद वह मां चमेली के साथ घर मन्नाडोला चली गई.

रात में जब दिनेश काम से घर लौटा तो वहां ताला लगा था. पड़ोस से पता चला कि वीना की मां आई थी, वह उसे अपने साथ ले गई है. उस ने घर का ताला खोला और चुपचाप लेट गया. उस की आंखों के आगे अंधेरा फैला हुआ था, तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. उस ने दरवाजा खोला तो 2 पुलिस वाले खड़े थे. उन्हें देख दिनेश डर गया. पुलिस वाले उसे थाना सिविल लाइंस ले गए.

एक पुलिस वाले ने उसे बताया कि उस पर वीना नाम की लड़की को बहलाफुसला कर भगा ले जाने का आरोप है. केस दर्ज हो चुका है. यह सुन कर दिनेश घबरा गया.

उस ने पुलिस को बताया कि वह और वीना अपनी मरजी से घर छोड़ कर नई जिंदगी बसर करने के लिए निकले थे और तिफरा में किराए का मकान ले कर खुशीखुशी रह रहे थे. आज उस की मां चमेली यहां आई और बिना बताए उसे अपने साथ ले गई.

लेकिन पुलिस ने दिनेश की एक नहीं सुनी. उस के खिलाफ थाने में भादंवि की धारा 363 के अंतर्गत वीना को बहलाफुसला कर भगा ले जाने का मुकदमा दर्ज था. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. दिनेश गम का घूंट पी कर रह गया.

वह यह भी साबित नहीं कर सका कि उस ने वीना के साथ विवाह किया था. वैसे भी वीना से अपने पक्ष की कोई उम्मीद रखना बेवकूफी थी, क्योंकि अब वह अपनी मां चमेली के प्रभाव में थी. वह वही कहती जो उस की मां चाहती.

दिनेश के जेल जाने की खबर जब उस के घर वालों को मिली तो उन्होंने एक वकील से इस मामले की पैरवी कराई. फलस्वरूव वह 2 महीने में जेल से बाहर आ गया. जो होना था, वह हो चुका था. दिनेश अब वीना को भुलाने की कोशिश करते हुए अपने परिवार के साथ रहने लगा. इसी बीच एक दिन गोल बाजार में उसे वीना मिल गई.

दिनेश उस से जानना चाहता था कि उस ने उसे किस बात की सजा दिलाई, इसलिए वह उसे एक कौफी हाउस में ले गया. बातचीत हुई तो दोनों के गिलेशिकवे शुरू हो गए. दिनेश ने वीना का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘वीना, जो भी हुआ, मैं उसे भूलने को तैयार हूं.’’

वीना ने आंखें नीची कर के कहा, ‘‘तुम ने मेरे साथ बहुत गलत किया है.’’

दिनेश ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘क्या गलत किया मैं ने?’’

‘‘तुम ने मुझ से शादी नहीं की, मुझे प्यार के बहकावे में रख कर मेरा शोषण करते रहे. क्या यह तुम्हारा फर्ज नहीं था कि मुझ से विवाह कर के अपने घर ले जाते?’’

‘‘देखो वीना, मैं ने जो भी किया, तुम्हारी मरजी से किया. मैं ने कभी जबरदस्ती नहीं की, फिर भी तुम ने मेरे खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा कर मुझे जेल भिजवा दिया, क्या यह सही था?’’

‘‘तुम्हारी नीयत मुझे ठीक नहीं लगी, मां ने मुझे बताया कि शादी के बाद लड़की को सुरक्षा मिलनी चाहिए. तुम तो मुझे मंगलसूत्र और सिंदूर तक नहीं दे सके. अगर तुम मुझे छोड़ कर भाग जाते तो मैं तो बरबाद हो जाती. न इधर की रह जाती, न उधर की. तुम मुझ से प्यार करते थे तो शादी क्यों नहीं की?’’

दिनेश निरुत्तर रह गया. उसे अपनी भूल का अहसास हो रहा था. उसे वीना से ब्याह कर लेना चाहिए था. वह संभल गया, ‘‘अच्छा, मुझ से गलती हो गई. मैं अब तुम से शादी करूंगा, ठीक है.’’

वीना मौन बैठी थी. दिनेश ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘तुम मुझ पर अविश्वास कैसे कर सकती हो. क्या मैं बेवफा हूं? मैं तुम्हारे साथ सारी जिंदगी हंसीखुशी गुजारने को तैयार हूं.’’

इस पर वीना ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘मैं सोच कर बताऊंगी. एक बार गलती कर चुकी हूं. इसलिए अब मैं दोबारा कोई गलती करना नहीं चाहती.’’

बहरहाल दिनेश और वीना में सहमति बनी कि दोनों एक बार फिर से एकदूसरे को समझेंगे, जानेंगे, तब कोई कदम उठाएंगे ताकि पहले की तरह कोई भूल न हो. अब जो भी कदम उठाएंगे, सोचसमझ कर उठाएंगे.

दोनों एक बार फिर घरपरिवार के बंधनों को भूल कर मिलने लगे, भविष्य के सपने बुनने लगे. वीना दिनेश के प्रभाव में आ गई थी. वह जब चाहता, उसे एकांत में ले जा कर संबंध बना लेता और फिर उसे उस के घर छोड़ जाता. लेकिन इस बार भी चमेली दिनेश और वीना के बीच आ कर खड़ी हो गई. इस बार कुछ ऐसा भयावह हो गया, जिस की कल्पना किसी ने नहीं की होगी.

19 जून, 2019 की सुबह दिनेश के मोबाइल की घंटी बजी. देखा वीना की काल थी. उस ने काल रिसीव की. उधर से वीना चहकी, ‘‘आज कोर्ट में तुम्हारी पेशी है न? मैं कोर्ट आऊंगी और मजिस्ट्रैट के सामने तुम्हारे ही पक्ष में बयान दे दूंगी.’’

वीना की बात सुन कर दिनेश श्रीवास खुश हो कर बोला, ‘‘मैं तुम से कब से बोल रहा था कि आ कर मजिस्ट्रैट के सामने बयान दे दो, लेकिन तुम टालती जा रही थी.’’

‘‘मैं मां के कितने प्रेशर में हूं, तुम नहीं जानते. मां ने मेरा जीना हराम कर रखा है. एक तरह से मैं घर में कैद सी हो गई हूं. मां मेरी हर गतिविधि पर निगाह रखती हैं. मैं ने बड़ी मुश्किल से काल की है और आऊंगी भी. मां आज बाहर जाने वाली हैं न…’’ वीना ने ऐसे कहा जैसे उत्साह से भरी हो.

‘‘चलो, कम से कम तुम को सद्बुद्धि तो आई.’’ दिनेश ने हंसते हुए कहा.

19 जून, 2019 को पूर्वाह्न लगभग 11 बजे दिनेश श्रीवास न्यायालय परिसर में पहुंच गया. अब उसे अपने वकील और वीना के आने का इंतजार था. लेकिन पता चला कि उस का वकील नहीं आएगा. पेशी की तारीख आगामी किसी दिन की ली जाएगी. इस से उसे बेचैनी होने लगी. थोड़ी देर में उसे वीना आती दिखाई दी, लेकिन वह अकेली नहीं थी. उस के साथ उस की मां चमेली भी थी.

दिनेश श्रीवास ने वीना को अगली पेशी की तारीख बता कर कहा, ‘‘हमारे वकील साहब बीमार हैं, इसलिए नहीं आए. तुम्हें अगली बार आना होगा, तभी बयान हो पाएगा.’’

वीना कुछ कहती, इस से पहले ही चमेली ने बातों का सिरा अपने हाथों में ले लिया. वह बोली, ‘‘दिनेश, बयान तो हो जाएगा. लेकिन तुम्हें क्या लगता है, वीना का जीवन बरबाद कर के तुम खुश रह पाओगे. मैं ने सुना है तुम कहीं और ब्याह करने की सोच रहे हो?’’

‘‘नहींनहीं, मैं नहीं मेरे पिताजी बात चला रहे हैं.’’ दिनेश ने बात घुमानी चाही.

‘‘और तुम..? तुम क्या करोगे?’’ चमेली ने दिनेश से पूछा.

‘‘मैं क्या करूंगा, मुझे भी नहीं मालूम. मैं पिताजी को नाराज नहीं कर पाऊंगा. उन्होंने मुझे जेल से निकलवाया, मुझे माफ किया. मुझे लगता है आप ने ठीक ही किया, जो वीना को उस दिन घर से ले आईं. बिना ब्याह हम लोगों का एक साथ रहना हमारे और हमारे परिवारों के लिए कलंक बन जाता.’’ दिनेश ने नजरें झुका कर कहा.

‘‘मगर बेटा,’’ चमेली ने प्यार से कहा, ‘‘फिर तो वीना का भविष्य बरबाद हो गया मानूं. अब उस के साथ कौन शादी करेगा?’’

यह सुन कर दिनेश कनखियों से वीना की ओर देखने लगा. बोला कुछ नहीं. चमेली बोली, ‘‘मैं और मेरी बेटी दोनों कोर्ट में तुम्हारे हक में बयान दे देंगे, मगर तुम्हें वीना को सम्मान के साथ ब्याह कर उसे स्वीकार करना होगा.’’

दिनेश चमेली की बात सुन अनसुनी कर के दूसरी तरफ देखने लगा. चमेली को उस का यह व्यवहार बुरा लगा. उस ने पुचकारते हुए कहा, ‘‘दिनेश, आज क्यों न हम पिकनिक पर चलें. एकदूसरे से बातें भी हो पाएंगी और समझनेसमझाने का मौका भी मिल जाएगा. नहीं तो हमारे रास्ते अलगअलग तो हैं ही.’’

चमेली की बात सुन दिनेश ने हामी भर दी. कोर्ट परिसर में से एक आटो ले कर तीनों पिकनिक मनाने और एकदूसरे को समझने के लिए चमेली के बताए उसलापुर सकरी की ओर निकल गए.

5 जुलाई, 2019 को बिलासपुर सिटी के थाना सिविल लाइंस के दरजनों बार चक्कर लगाने के बाद दिनेश श्रीवास के पिता रविशंकर व मां नूतन अंतत: आईजी कार्यालय में अपना प्रार्थना पत्र ले कर पहुंचे. प्रार्थना पत्र में उन्होंने लिखा था—

हमारा बेटा दिनेश श्रीवास विगत 19 जून, 2019 से लापता है. हमें शक है कि उस के साथ कुछ अनिष्ट हो गया है. हमें यह भी अंदेशा है कि उसे गायब करने में हमारी पड़ोसी वीना और चमेली का हाथ है. हम दरजनों बार सिविल लाइंस थानाप्रभारी से मिले और गुजारिश की कि हमारे बच्चे को ढूंढें, लेकिन वह हमें टाल कर घर भेज देते हैं.

आईजी प्रदीप गुप्ता अपने औफिस में बैठे थे. अर्दली ने अंदर जा कर रविशंकर और नूतन के नाम का पेपर दे दिया. उन्होंने दोनों को तत्काल बुलाया और सामने बैठा कर पूछा, ‘‘बताइए, क्या बात है?’’

इस पर दिनेश की मां ने लिखा हुआ प्रार्थना पत्र उन्हें दे कर निवेदन करते हुए कहा, ‘‘साहब, हमें न्याय दिलाएं, हमारा बेटा गायब है.’’

नूतन ने आंसू बहाते हुए जब आईजी से थाने आनेजाने की आपबीती बताई तो आईजी साहब नाराज हो गए. उन्होंने तत्काल थानाप्रभारी सिविललाइंस से फोन पर बात की. उन्होंने थानाप्रभारी कलीम खान को डांटते हुए कहा, ‘‘इस संवेदनशील मामले में 24 घंटे के अंदर एफआईआर दर्ज कर रिपोर्ट मेरे सामने पेश करें.’’

आईजी प्रदीप गुप्ता के आदेश पर थाना सिविल लाइंस में हड़कंप मच गया. थानाप्रभारी कलीम खान ने तत्काल 2 सिपाही भेज कर वीना और उस की मां को थाने बुला लिया. दोनों थाने आईं तो पुलिस ने सख्ती से पूछताछ करनी शुरू कर दी, लेकिन वीना ने स्पष्ट इनकार करते हुए कहा कि वह दिनेश श्रीवास से बहुत दिनों से नहीं मिली है.

मोबाइल फोन की काल डिटेल्स खंगालने पर इस बात का खुलासा हो गया कि 19 जून तक दिनेश और वीना के बीच मोबाइल पर बातें हो रही थीं. एक सूत्र ने पुलिस को बताया कि 19 तारीख को तीनों कोर्ट में एक साथ दिखाई दिए थे. इसी सूत्र के आधार पर कलीम खान ने कोर्ट में लगे सीसीटीवी की फुटेज खंगालनी शुरू कर दी. एक फुटेज में तीनों को आटो में बैठ कर जाते देखा गया.

पुलिस को बहुत बड़ा सूत्र मिल गया था. इस पर जांच आगे बढ़ाई गई तो वीना की मां चमेली ने 19 जून, 2019 को तीनों के पिकनिक जाने की बात स्वीकार करते हुए उस की हत्या की बात स्वीकार कर ली.

चमेली ने अपने बयान में बताया कि बेटी की जिंदगी बरबाद होते देख वह परेशान रहने लगी थी. उसलापुर सकरी में पिकनिक के दौरान दिनेश श्रीवास ने जब स्पष्ट रूप से हाथ खड़े कर लिए कि अब वह वीना का साथ नहीं निभा सकेगा, तब उस ने और वीना ने मिल कर उस की हत्या कर दी.

चमेली ने बताया- पिकनिक स्पॉट में दिनेश जब दोपहर को आंखें बंद कर के लेटा था तो उन दोनों ने उस के सिर पर पत्थर दे मारा, जिस से वह बुरी तरह घायल हो गया. बाद में उन्होंने धारदार हंसिया से दिनेश का गला रेत दिया. साथ ही एक पत्थर मार कर उस का चेहरा विकृत कर दिया और उसे वहीं फेंक कर वापस आ गईं.

दिनेश को कोई पहचान न सके, इसलिए उस का मोबाइल वीना ने अपने पास रख लिया. पुलिस ने चमेली और वीना के बयान के आधार पर दिनेश की खोजबीन की तो उन्हें उसलापुर के कोकने नाला में दिनेश का क्षतविक्षत शव मिल गया.

पुलिस ने वीना और चमेली को गिरफ्तार कर लिया. उन के खिलाफ भादंवि की धाराओं 302, 120बी के तहत केस दर्ज किया गया. पूछताछ के बाद दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें सेंट्रल जेल बिलासपुर भेज दिया गया. Hindi Kahani

Crime Story: जुर्म- वजह छोटी, अपराध बड़े- मकसद से भटकती कमउम्र पीढ़ी

Crime Story: दक्षिण भारत की सुपरहिट फिल्म ‘केजीएफ चैप्टर वन’ के एक सीन में जब बच्चा रौकी दिनदहाड़े एक पुलिस वाले के सिर पर बोतल फोड़ कर भागताभागता रुक जाता है, तो उस का साथी बच्चा पूछता है कि रुक क्यों गया? इस पर रौकी बोलता है कि उस पुलिस वाले को अपना नाम तो बताया ही नहीं. वह फिर उस घायल पुलिस वाले के पास जाता है और दोबारा उस का सिर फोड़ कर अपना नाम बताता है.

यह तो महज एक फिल्मी सीन था, जिस पर सिनेमाघरों में खूब सीटियां और तालियां बजी थीं, पर असली जिंदगी में अपराध इतना ग्लैमरस नहीं होता है और न ही किसी अपराधी का भविष्य सुनहरा होता है.

इस के बावजूद बहुत से नौजवान अपनी छोटीमोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं, पर जब वे पुलिस के हत्थे चढ़ते हैं, तो अपनी जरूरतों का रोना रोने लगते हैं.

मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले का एक मामला देखते हैं. वहां 2 लड़के लूट के एक मामले में पकड़े गए थे. इस सिलसिले में पुलिस ने 19 साल के शुभम उर्फ अर्पण और 18 साल के अभिषेक शुक्ला उर्फ बच्ची को गिरफ्तार किया था. वे दोनों रीवां जिले के मिसिरिहा गांव के रहने वाले थे.

इन दोनों आरोपियों ने 13 जुलाई, 2022 को गांव बुढ़ाकर में लूट की वारदात को अंजाम देने से पहले बैंक की रेकी की थी. एक पतिपत्नी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपने खाते में जमा 40,000 रुपए बैंक से निकाल कर बाहर फल विक्रेता के पास खड़े थे.

उसी दौरान दोनों आरोपी मोटरसाइकिल से आए और उन्होंने औरत से नकदी भरा बैग छीन लिया. बाद में पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज की मदद से आरोपियों को पकड़ा था.

अर्पण ने इस कांड की वजह के तौर पर पुलिस को बताया कि उस के परिवार में पैसे की बेहद तंगी थी और उस के पास जबलपुर में प्रतियोगी परीक्षा की अपनी कोचिंग फीस और मकान का किराया देने के लिए पैसे नहीं थे.

अर्पण का दोस्त अभिषेक भी प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षा की कोचिंग ले रहा था और वह भी पैसे की तंगी का सामना कर रहा था.

अर्पण ने पुलिस को यह भी बताया कि पैसे के लिए किसी को लूटने का प्लान अभिषेक ने बनाया था. उन दोनों ने कई दिनों तक कई बैंकों की रेकी की थी और 40,000 रुपए निकालने वाले इन पतिपत्नी का पता लगाया था.

चलो, यहां तो पैसे की तंगी के चलते अपराध हुआ था, पर आजकल के कमउम्र नौजवान तो इश्क के चक्कर में क्याक्या नहीं कर बैठते हैं, इस की एक बानगी देखिए.

प्रेमिका की चाहत पूरी करने के लिए गोंडा, उत्तर प्रदेश में कुछ नौजवानों ने अपराध की सारी हदें पार कर दीं और लुटेरे बन गए. हैरत की बात तो यह है कि इन में से कोई इंजीनियरिंग, तो कोई डाक्टर बनने का सपना लिए घर से निकला था, पर उन्हें माशूका के नखरे उठाने का ऐसा चसका लगा कि वे लुटेरे बन बैठे.

दरअसल, गिरफ्तार किए गए ये पांचों नौजवान आदतन अपराधी नहीं थे, पर जब अचानक उन की जिंदगी में माशूका आ गई तो मुहब्बत की अंधी राह ने उन्हें अपराध की दुनिया में धकेल दिया. ये आरोपी गोंडा और आसपास के जनपदों में मोबाइल की लूट और छीनाझपटी की वारदात को अंजाम दे रहे थे.

पुलिस ने केस दर्ज कर जब इस मामले की छानबीन शुरू की, तो एक रैकेट इस के पीछे काम करता हुआ मिला. पुलिस ने एक नौजवान को गिरफ्तार कर के पूछताछ की तो एकएक कर 5 लोगों के नाम सामने आए.

जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की, तो पता चला कि गोंडा जिले के तरबगंज थाना क्षेत्र के रहने वाले ये लड़के लखनऊ, दिल्ली और पंजाब में रह रही अपनी गर्लफ्रैंड की ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए लूट की वारदात को अंजाम देने लगे थे.

देहात कोतवाली पुलिस और एसओजी की टीम ने गिरफ्तार नौजवानों के कब्जे से चोरी के 9 मोबाइल फोन, वारदात में इस्तेमाल की जाने वाली 2 मोटरसाइकिल, नकदी के अलावा दूसरा सामान भी बरामद किया.

बालिग तो बालिग, नाबालिग भी अपराध के दलदल में काफी अंदर तक धंसे हुए हैं. नैशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड और नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2020 में हत्या, अपहरण, लूट, डकैती, चोरी जैसी 29,768 आपराधिक वारदात ऐसी थीं, जिन में 74,124 नाबालिग शामिल थे.

बच्चों द्वारा की गई आपराधिक वारदात की बात करें तो इस में नंबर एक पर मध्य प्रदेश रहा था, जहां 4,819 वारदात में बच्चे शामिल थे. 4,079 ऐसी वारदात के साथ महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर, 3,394 वारदात के साथ तमिलनाडु तीसरे नंबर पर और 2,455 वारदात के साथ दिल्ली चौथे नंबर पर रही थी.

5वें नंबर पर राजस्थान (2,386 वारदात), 6ठे नंबर पर छत्तीसगढ़ (2,090 वारदात) और 7वें नंबर पर गुजरात (1,812 वारदात) जैसे राज्य थे.

ऐसे अपराधों की जड़ में पैसे की कमी और सामाजिक वजह बताई जाती हैं. यह कड़वी हकीकत है कि आज बड़ी तादाद में नौजवान बेरोजगार हैं. ऐसे में वे जब अपराध की तरफ खिंचते हैं, तो उन का पहला पड़ाव झपटमारी होता है. इस में मिली कामयाबी के बाद वे लूट और डकैती की तरफ चले जाते हैं. जेल में जा कर उन में से कुछ तो सुधर जाते हैं, पर बहुत से जेल में सजा काट रहे दूसरे बड़े अपराधियों की संगत में पूरी तरह से अपराधी बन जाते हैं.

इस के अलावा बहुत से नौजवान खराब परवरिश, महंगी जरूरतों, अपनी बढ़ती इच्छाओं, स्कूलकालेज के कैंपस की गुंडागर्दी, अकेलेपन और अपने गुस्सैल स्वभाव के चलते अपराध की ओर बढ़ने लगते हैं.

इस बुराई में समाज के साथसाथ सरकार भी बराबर की जिम्मेदार है. आज की नौजवान पीढ़ी नारों पर नहीं, बल्कि नतीजों पर यकीन करती है, जबकि केंद्र सरकार ने उसे रोजगार देने के नाम पर सिर्फ सपने दिखाए हैं.

हकीकत तो यह है कि दिसंबर, 2021 तक भारत में बेरोजगार लोगों की तादाद 5.3 करोड़ रही थी. देश की आजादी की 75वीं सालगिरह पर इस तरह के आंकड़े चिंता और शर्म की बात हैं. Crime Story

Crime Story: देवर के चक्कर में पति की हत्या

Crime Story: हरियाणा के सोनीपत जिले के थाना गन्नौर क्षेत्र के गांव झरगढ़ी के रहने वाले शाहनवाज की शादी 9 साल पहले साल 2016 में उत्तर प्रदेश के शामली जिले के थाना कांधला क्षेत्र के गांव गढ़ी दौलत की रहने वाली महफरीन से हुई थी.


शादी के बाद शाहनवाज और महफरीन की जिंदगी मजे से चल रही थी. शाहनवाज दिनभर काम कर के जब शाम को घर वापस लौटता, को महफरीन उस पर अपना भरपूर प्यार लुटाती थी. दोनों की जिंदगी हंसीखुशी से गुजर रही थी. इस दौरान महफरीन ने 2 बच्चों को जन्म दिया. पहला लड़का तकरीबन
8 साल का है, जबकि दूसरा लड़का तकरीबन 4 साल का है. जैसा कि सभी परिवारों में होता है, रिश्तेदार आतेजाते रहते हैं. शाहनवाज के मामा का लड़का तसव्वुर का भी वहां आनाजाना था. जब कभी तसव्वुर और महफरीन मिलते तो देवरभाभी होने के नाते एकदूसरे से हंसीमजाक भी करलेते थे.

शाहनवाज इसे यह सोच कर नजरअंदाज कर देता था कि देवरभाभी में मजाक तो चलता ही रहता है.
पिछले तकरीबन 6 महीने से महफरीन और तसव्वुर में अचानक से नजदीकियां ज्यादा बढ़ गई थीं. दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर भी शेयर कर लिया था.
‘‘भाभी, आप मु? बहुत अच्छी लगती हो,’’ एक दिन तसव्वुर ने महफरीन से कहा.
इस पर महफरीन ने जवाब दिया, ‘‘रहने दो.’’ ‘‘रब करे आप को किसी की नजर लगे…’’ तसव्वुर ने कहा, ‘‘मैं आप को दिल से कह रहा हूं कि आप बहुत खूबसूरत हो.’’ हिम्मत कर के तसव्वुर ने अपने दिल की बात भी कह दी, ‘‘भाभी, मैं तुम से प्यार करता हूं और तुम्हारे बगैर रह नहीं सकता.’’


तसव्वुर के मुंह से यह बात सुन कर महफरीन को थोड़ी देर के लिए अजीब सा लगा, लेकिन जब दोनों में काफी देर तक बात हुई, तो महफरीन भी तसव्वुर को अपना दिल दे बैठी.
इस के बाद तो उन दोनों में घंटों बात होने लगी, फिर दोनों चोरीछिपे मिलने भी लगे. दोनों ने प्यार की तमाम हदों को पार कर दिया.


पर जब देखो तब और घंटों तसव्वुर से बात करने पर शाहनवाज को महफरीन पर शक हो गया. उस ने 1-2 बार महफरीन को समझाया भी, लेकिन वह नहीं मानी और लगातार तसव्वुर से संबंध जारी रखे.
3 अगस्त की रात को शाहनवाज ने महफरीन को मोबाइल पर किसी से बात करते रंगे हाथ पकड़ लिया, ‘‘किस से बात कर रही थी? क्या चल रहा है?’’ महफरीन बोली, ‘‘कुछ भी नहीं, मैं तो बस…’’शाहनवाज ने गुस्से में उस का फोन छीना और देखा कि कौल लौग में बारबार तसव्वुर का नाम था. वह भड़क उठा और महफरीन की पिटाई कर दी.


उस रात महफरीन की आंखों में सिर्फ आंसू नहीं थे, नफरत और बदले की आग भी थी. महफरीन ने उसी रात तसव्वुर को  फोन कर कहा, ‘‘अब बहुत हो गया, उसे रास्ते से हटाना होगा.’’रात में ही महफरीन और तसव्वुर ने एक ऐसी योजना बनाई, जिस का किसी को अंदाजा भी नहीं था. इस के बाद महफरीन ने शाहनवाज से ऐसा बरताव किया जैसे पिटाई के बाद वह शाहनवाज की बात मान गई हो.

उस ने शाहनवाज को इस का जरा भी अहसास नहीं होने दिया कि उस के दिमाग में क्या चल रहा है.
7 अगस्त, 2025 को शामली जनपद के गांव खुरगान के बाशिंदे और शाहनवाज के ममेरे साले इमलाक की शादी थी. महफरीन और शाहनवाज ने मिल कर शादी में जाने का प्रोग्राम बनाया.


महफरीन बोली, ‘‘हम बाइक पर जाएंगे, ताकि जल्दी पहुंच सके, क्योंकि हरियाणा की बसों में बहुत भीड़ चल रही है. फिर गांव तक पहुंचने के लिए साधन भी नहीं मिलता है. बसअड्डे पर खड़े होकर घंटों इंतजार करना पड़ता है. अपनी बाइक होगी तो आसानी से घर तक पहुंच जाएंगे.’’


‘‘हां, यह सही रहेगा गरमी भी बहुत ज्यादा है. अपना साधन होगा तो पहुंचने में आसानी रहेगी,’’ शाहनवाज ने जवाब दिया, फिर थोड़ा रुक कर बोला, ‘‘एक दिन पहले चलेंगे. काफी दिन हो गए, तुम्हारे परिवार वालों से भी नहीं मिला हूं मैं. वे भी कहते रहते हैं…’’‘‘रात को तुम्हारे मायके गांव गढ़ी दौलत चलेंगे अगले दिन वहीं से खुगरान चलेंगे,’’ शाहनवाज ने अपना प्लान बताया.


जैसा कि महफरीन और शाहनवाज ने शादी के लिए प्रोग्राम बनाया था, उसी के मुताबिक 6 अगस्त, 2025 को दोनों बाइक पर सवार हो कर गांव गढ़ी दौलत पहुंच गए.शाहनवाज को देख कर महफरीन के मायके वाले भी बहुत खुश हुए. सभी ने घर और परिवार का हालचाल पूछा. दामादजी घर पर आए थे, तो शाहनवाज की खातिरदारी भी अच्छी तरह से हुई.


7 अगस्त की सुबह शाहनवाज अपनी बीवी महफरीन को बाइक पर बैठा कर गांव खुरगान के लिए निकल पड़ा. गांव में पहुंचने से पहले कसबा कैराना में उस ने कुछ सामान भी खरीदा और फिर से चल पड़ा.
बाइक पर पीछे बैठी महफरीन फोन पर बारबार किसी से बात कर रही थी. बाइक की स्पीड तेज होने के चलते वह समझ नहीं पा रहा था. उसे केवल इतना ही समझ आया कि शायद शादी वाले घर से फोन रहे होंगे कि कितनी देर में पहुंचोगे.


लेकिन महफरीन किसी से कोडवर्ड में बात कर रही थी. उस ने बोला, ‘मंजिल आने वाली है…’ थोड़ा आगे चलने पर उस ने फिर से कोडवर्ड में बात की, ‘पुल पार करोऔर इस के बाद फोन पर फिर से कहाबस थोड़ा इंतजार करो.’ महफरीन के इन कोडवर्ड से खून और धोखे की गंध रही थी. सुबह के 10 बज रहे थे. शाहनवाज और महफरीन की बाइक नैशनल हाईवे पर दौड़ी जा रही थी.

जब वे पानीपतहरिद्वार नैशनल हाईवे पर बने एक फ्लाईओवर से थोड़ा आगे बेरी के बाग के निकट पहुंचे, तो पीछे से 2 बाइकों पर सवार 4 लड़कों ने ओवरटेक कर शाहनवाज की बाइक में टक्कर मार दी और शाहनवाज को डंडा मार कर बाइक रुकवा ली. उन्होंने चाकू से शाहनवाज पर ताबड़तोड़ कई वार किए. एक लड़के ने उस पर तमंचे से गोली चलाई. गंभीर रूप से घायल शाहनवाज सड़क पर नीचे गिर गया. वारदात को अंजाम देने के बाद वे सभी हमलावर फरार हो गए.


शाहनवाज की आंखों में दर्द और धोखे कीलक थीशायद आखिरी बार उस ने महफरीन को देखा, जो चुपचाप खड़ी थी. महफरीन ने डायल 112 को फोन किया और पुलिस को सूचना दी, ‘‘हम पर हमला हुआ है. बदमाशों ने मेरे पति को मार डाला.’’ पुलिस मौके पर पहुंची और सड़क पर घायल पड़े शाहनवाज को अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मरा हुआ घोषित कर दिया. जानकारी पा कर सोनीपत से शाहनवाज के परिवार वाले भी कैराना पहुंच गए. उन्होंने पुलिस को डेढ़ लाख रुपए की दूल्हे के लिए ले जाई जा रही नोटों की माला और बाइक लूटने की सूचना दी.


एसपी रामसेवक गौतम, एएसपी संतोष कुमार सिंह और सीओ कैराना श्याम सिंह मौके पर पहुंचे. इस दौरान पुलिस ने मौके से शाहनवाज की बाइक भी बरामद की. फोरैंसिक टीम ने पहुंच कर सुबूत जुटाए.
वहीं, अस्पताल में महफरीन जमीन पर गिर कर बारबार बेहोशी का नाटक करने लगी, रोती रही. महफरीन की तरफ से कैराना कोतवाली में अज्ञात बदमाशों के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई गई.

2 डाक्टरों की टीम द्वारा शाहनवाज की लाश का पोस्टमार्टम कराया गया
तो उस के शरीर में गोली लगना भी पाया गया, चाकुओं से वार किए गए थे, सो अलग.कैराना पुलिस के मुताबिक, महफरीन के बयान लिए तो उस ने पुलिस को चाकुओं से हमला करना ही बताया. पुलिस को महफरीन की बातों में दम नहीं लगा. उस की आंखों में पति की मौत के आंसू जरूर थे, लेकिन पकड़े जाने का डर भी साफ दिख रहा था.


पुलिस ने महफरीन को दोबारा से बयान लेने के लिए बुलाया, तो उस ने बयान देने से मना कर दिया. इस पर पुलिस को शक हुआ तो पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए उठा लिया. इसी दौरान केस के खुलासे के लिए लगाई गई टीमों ने जब महफरीन की कौल डिटेल खंगाली तो सारे राज खुलते चले गए.
तसव्वुर से महफरीन की लगातार बातचीत और लोकेशन शेयरिंग से पूरा राज खुला. पुलिस की कड़ी पूछताछ में महफरीन टूट गई.


‘‘हांमैं ने करवाया मर्डरतसव्वुर से प्यार करती हूं. शाहनवाज ने मारा था  पिटाई सह नहीं पाई.’’
महफरीन ने आगे बताया कि शाहनवाज ने उसे तसव्वुर से मोबाइलपर बात करते हुए रंगे हाथ पकड़ा था. इस के बाद दोनों के बीच  झगड़ा हुआ. शाहनवाज ने उस की पिटाई भी की थी. इसी के बाद उस ने प्रेमी तसव्वुर के साथ मिल कर शाहनवाज की हत्या की योजना बनाई. उस का काम सिर्फ लोकेशन देना था.

हत्या की प्लानिंग के तहत उसे शाहनवाज को सही समय पर सही जगह तक ले जाना था.
कैराना और आसपास लगे 10 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों में 2 बाइकों पर सवार 4 हमलावर नजर आए.फुटेज से उन की बाइक का नंबर मिला. इस के कुछ ही घंटों में हत्या के आरोपी तसव्वुर और शोएब को पकड़ लिया गया. पुलिस की जांच में सामने आया है कि हत्या में इस्तेमाल तमंचा और चाकू गढ़ी दौलत गांव के एक नौजवान ने मुहैया कराए थे.   

लेखक     महेश कांत शिवा

Hindi Story: चुनौती

Hindi Story: गांव की झाडि़यों में मिली एक बच्ची को बांझ कहे जाने वाली मुनिया ने पालने और कुछ बनाने का फैसला किया. गांव वालों ने मुनिया से किनारा सा कर लिया. जब मुनिया की वह गुडि़या 8वीं जमात में थी, तब मुनिया नहीं रही. क्या गुडि़या अपनी मां के सपनों को पूरा कर पाई?


सुबह सुबह महल्ले में एक सनसनी खबर फैल गई कि ?ाडि़यों में एक नवजात बच्ची मिली है. शायद रात में इसे किसी ने फेंका दिया था. बीचबीच में लड़की के रोने की आवाज भी सुनाई दे रही थी. पूरे महल्ले में चर्चा का आज का मुद्दा यह लड़की ही थी.


पहली औरत दूसरी से बोली, ‘‘यह जरूर किसी किसी का पाप है. पता नहीं कौन जात है. बड़ा खराब जमाना गया है. लोग बच्चे कर के यहांवहां फेंक देते हैं.’’

दूसरी ने पहली की हां में हां मिलाई, ‘‘जात छोड़ो, पता नहीं यह किस धरम की है.’’
शादी के 10 साल बाद भी मुनिया के कोई औलाद नहीं थी. पति ने छोड़ दिया था. किसी तरह लोगों के घर का चौकाबरतन कर के वह अपना पेट पालती थी. उसे इस बच्ची पर रहम गया. उस ने ?ाटपट बच्ची को उठा कर गोद में ले लिया.

मुनिया के एक तो औलाद नहीं थी, पति ने भी बां? होने का आरोप लगा कर उसे छोड़ दिया था. इस बात से वह डिप्रैशन में चली गई थी. तलाक होने से पहले मुनिया डाक्टर के पास भी गई थी. तब डाक्टर बोली थी, ‘तेरे अंदर कोई कमी नहीं है, बल्कि कमी तो तेरे मर्द में है. तू उसे ले कर किसी माहिर डाक्टर के पास जा. डाक्टर बताएगा इस का इलाज.’’

इधर, फुलिया ने मुनिया से कहा, ‘‘क्या तू इस पाप को पालेगीपता नहीं किस खानदान की है यह लड़की. किस जातिधरम की है. फेंक दे इसे कचरे में. कचरे की चीज कचरे में ही अच्छी लगती है, उसे लोग घर की शोभा नहीं बनाते.’’

मुनिया का दिल मोम का था. उस ने फुलिया को जवाब दिया, ‘‘देख फुलिया, मैं जातपांत को नहीं मानती. मैं धरम में भी यकीन नहीं करती. मैं इनसानियत को मानती हूं. फिर आदमी जातपांत और धर्म का हो कर भी तो अधर्म करता है. जिस की जैसी परवरिश होती है, वह आदमी भी वैसा ही बनता है.
‘‘मैं इसे अपने घर ले जाऊंगी,

इसे खूब पढ़ाऊंगीलिखाऊंगी और अच्छे संस्कार दूंगी. फिर देखती हूं कि कैसे
यह बेराह चलती है. सारा फल अच्छी परवरिश और अच्छे संस्कारों का
होता है.’’

फुलिया ने ललकारा, ‘‘सोच ले, यह तु? भारी भी पड़ सकता है. कहीं कुछ ऊंचनीच हो गई, तो बाद में मत कहना कि चेताया नहीं था. हम लोगों में से किसी ने इसे नहीं उठाया, लेकिन तेरी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि तू ने इस बच्ची को पालने का बीड़ा उठाया है. फिर यह भी तो है कि तू चौकाबरतन कर के कितना कमा लेगी

‘‘नहीं पाल पाएगी तू इस को. फेंक दे इसे वापस कूड़े में. मरती है, तो मरने दे इसे. क्यों किसी के पाप को अपनाने का जोखिम उठा रही है…’’

पर मुनिया बोली, ‘‘मां की ताकत का तु? एहसास नहीं है. गरीब से गरीब मां भी अपने बालबच्चों को रूखासूखा खिला कर पालपोस ही लेती है. फिर मेरे लिए भी तो यह एक चुनौती की तरह है कि मैं किसी और के बच्चे को पाल कर दिखाऊं.’’

फुलिया हवा में हाथ लहराती हुई बोली, ‘‘सोच ले इस से बेवकूफी भरा फैसला कुछ नहीं होगा. लोग हंसेंगे और तेरा जीना हराम कर देंगे.’’

‘‘सोच लिया है. इस समाज को भी तो पता चलना चाहिए कि इनसानियत का रिश्ता जातपांत से ऊपर होता है. समाज के सामने औरत शुरू से ही कमजोर साबित होती रही है, फिर समाज को कैसे पता चलेगा कि औरत चट्टान की तरह मजबूत है. जायज मांग होने पर वह समाज से लोहा भी ले सकती है.


‘‘फिर समाज के डर से किसी को ?ाडि़यों में तो मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता . इस में इस नन्ही सी गुडि़या की क्या गलती…’’

लेकिन फुलिया और समाज के लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं था. सब मुनिया को भलाबुरा कहते, उस से कतरा कर निकल जाते. मुनिया भी अपने काम से काम रखती थी. उस का मकसद अब बस इतना था कि वह गुडि़या को किसी तरह से पढ़ालिखा कर कुछ बना दे.

धीरेधीरे समय बीतता गया. गुडि़या बड़ी होती गई. अब वह 8वीं क्लास में पढ़ती थी. मुनिया ने गुडि़या को अच्छे संस्कार दिए थे. गुडि़या भी मेधावी और मेहनती लड़की थी. वह मुनिया की कही बातों को हमेशा मानती थी. गुडि़या 8वीं क्लास पास कर गई थी. एक दिन जब वह स्कूल से लौटी तो देखा कि मां की हालत बेहद खराब है. उसे अस्पताल में भरती करवाया गया, लेकिन मुनिया चल बसी.


मुनिया के मरने के बाद तो जैसे गुडि़या की जिंदगी ही उजड़ गई. फुलिया और महल्ले की दूसरी औरतें अब गुडि़या को ताने मारती थीं कि इस की मां तो इसे बड़ा अफसर बनाने चली थी और खुद ही इस दुनिया से चली गई. मुनिया की एक भतीजी थी शीतल, जो शहर में रहती थी और एक बैंक में क्लर्क थी. उस का तलाक उस के काले रंग की वजह से हो गया था. जिस लड़के से उस की शादी हुई थी, वह पियक्कड़ था.
मरने से पहले मुनिया ने शीतल से अपनी बेटी गुडि़या की बाबत फोन पर सब बातें बता रखी थीं. वह कह चुकी थी कि उस के अलावा गुडि़या का इस दुनिया में कोई नहीं है. अगर उसे कुछ हो जाता है, तो वह गुडि़या की देखभाल करे.


शीतल को गांव में आए हफ्ताभर हो गया था. स्कूल का टीसी बनने में समय लग रहा था. 1-2 दिन में टीसी मिल गया था. गुडि़या शीतल के साथ शहर गई थी, लेकिन शहर में आने के बाद भी गुडि़या को अपनी मां का चेहरा नहीं भूलता था. गांव की भी याद आती थी. गुडि़या किसी भी हाल में अपनी मां के सपनों को पूरा करना चाहती थी. इधर शीतल और गुडि़या को फुलिया और  महल्ले की औरतों की बातें रातों को सोने नहीं देती थीं. शीतल ने उस समय फुलिया और महल्ले की औरतों के तंज का कोई जवाब नहीं दिया था. उसे पता था कि उन को जवाब देने से बेहतर है कि सही समय का इंतजार किया जाए.


धीरेधीरे समय बीतने लगा. गुडि़या और जोरशोर से मेहनत करने लगी थी. अब वह यहां शहर में भी वही काम करती. सुबह उठ कर ?ाड़ूबरतन कर के नहाधो कर नाश्ता तैयार कर देती. शीतल दीदी के लिए भी नाश्ता तैयार कर देती. शहर में गैस का कनैक्शन था, लिहाजा चूल्हा जलाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. पानी भर कर बाहर से नहीं लाना पड़ता था, इसलिए गुडि़या का बहुत सा समय बच जाता था. अब वह और मन लगा कर पढ़ाई करने लगी थी.

इधर, शीतल को अपने पति से तलाक लेने के बाद खाली घर काटने को दौड़ता था. गुडि़या के चले आने से उस का भी मन लगने लगा. उस ने घर में रखा हुआ नौकर भी हटा दिया था. गुडि़या आसपड़ोस के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी थी. 9वीं क्लास में गुडि़या ने पूरे स्कूल में टौप किया था. अब शीतल को भी यकीन हो गया था कि गुडि़या एक एक दिन कुछ बड़ा जरूर करेगी.
10वीं क्लास के इम्तिहान हुए, लेकिन इस बार गुडि़या का नतीजा बहुत बेहतर नहीं था. वह अपने स्कूल में फर्स्ट डिवीजन में पास हुई थी.

गुडि़या घर कर रोने लगी. तब शीतल ने उस को सम?ाया, ‘‘इतनी जल्दी तुम्हें हार मानने की जरूरत नहीं है. तुम पढ़ाई में बहुत अच्छी हो. तुम अगले साल जरूर बहुत अच्छा करोगी.’’


दिन बीतते रहे और गुडि़या दिन दोगुनी और रात चौगुनी रफ्तार से तरक्की करती रही. देखतेदेखते उस ने नीट का इम्तिहान भी पास कर लिया और एक सरकारी कालेज में उसे दाखिला मिल गया. 4-5 साल की कड़ी मेहनत के बाद उस ने एमबीबीएस भी पास कर लिया. अब वह एक डाक्टर बन गई थी. शीतल को भी गुडि़या पर भरोसा था और गुडि़या उस के भरोसे पर खरी उतरी थी. आज शीतल ने अपनी बूआ मुनिया को दिया हुआ वचन पूरा किया था.


शीतल ने इनसानियत के लिए तो गुडि़या की मदद की ही थी, उस का मदद करने के पीछे एक और कारण
था. वह कारण था औरत को कमजोर सम?ाने वाले लोगों को मुंहतोड़ जवाब देना. शीतल को अपने पति को भी जवाब देना था और समाज को भी दिखाना था कि बिना किसी मर्द की मदद के भी औरत आगे बढ़ सकती है. वह अपनी मरजी की खुद मालिक है. तकरीबन 10 साल के बाद एक दिन गुडि़या की पोस्टिंग उस के गांव में हुई थी. उस को प्रमोशन मिल गई थी.


वह अब डाक्टरों की सीनियर थी. अब वह सीएमओ थी. एक दिन गुडि़या अपने केबिन में बैठी परची पर कुछ दवाएं लिख ही रही थी कि नर्स ने अगले मरीज का नाम पुकारा. मरीज का नाम फुलिया
था. नर्स ने जोर से 2 बारफुलियाकह कर पुकारा. थोड़ी देर में गुडि़या के सामने उस के गांव की फुलिया खड़ी थी. गुडि़या को तो एकबारगी अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ.

गुडि़या ने इशारे से फुलिया को सामने की कुरसी पर बैठने को कहा, ‘‘बैठिए.’’
फुलिया ने इतने दिनों के बाद

गुडि़या को देखा था. वह रोते हुए बोली, ‘‘बेटी, मु? पहचानामैं फुलिया…’’
गुडि़या की भी आंखें भीगने लगी थीं, ‘‘हां चाची, आप को कैसे नहीं पहचानूंगी. आप को मैं कभी भूल ही नहीं सकती. आप के कारण ही मैं आज यहां पर हूं.’’


‘‘बेटी, मु? माफ कर दे. मुनिया के मुंह से निकली एकएक बात सही थी. पापपुण्य कुछ नहीं होता है, बल्कि इनसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. मुनिया भले ही गरीब थी, लेकिन बहुत ही जिद्दी और आत्मविश्वासी औरत थी. मुनिया की परछाईं है बेटी तू तो. जैसा वह चाहती थी, वैसा ही तु? बनाया. आज अगर वह जिंदा होती तो कितना खुश होती.


‘‘मेरा आशीर्वाद है बेटी तु?. मैं फिर से एक बार माफी मांगती हूं बेटी. मु? माफ कर दे. मैं गलत थी, फुलिया ही सही थी. परवरिश, इनसानियत और संस्कार ही सबकुछ होता है बेटी. आज मैं यह अपनी आंखों से देख रही हूं.’’


फुलिया आसमान की तरफ ताकती हुई आगे बोली, ‘‘ मुनिया, आशीर्वाद दे अपनी बेटी को. मैं अपनी गलती मानती हूं. जहां भी तू है री मुनिया, मु? माफ कर
दे बहन.’’ कहां तो गुडि़या फुलिया को मिलने पर उस को और महल्ले की औरतों को खरीखोटी सुनाना चाहती थी और कहां वह भी फुलिया के साथसाथ रोए जा रही थी.  Hindi Story               

Hindi Kahani: अधेड़ को सबक


Hindi Kahani. ए अधेड़ आदमी ट्रेन में सफर कर रहा था. उस के आसपास कई औरतें बैठी हुई थीं. वह ट्रेन लोकल थी, इसलिए छोटेछोटे स्टेशनों पर भी रुक रही थी. जब भीड़ बढ़ जाती तो उस अधेड़ आदमी का हाथ गलत काम के लिए हरकत में जाता. कभी नींद के बहाने तो कभी ऐसे ही वह औरतों को छू देता था.

एक स्टेशन पर उस अधेड़ के आसपास की सीटें खाली हो गईं, लेकिन थोड़ी ही देर में लड़कियों का एक दल गया. जहां भी जगह मिली, लड़कियां बैठने लगीं. वे खिलाड़ी लग रही थीं और शायद कहीं खेलने जा रही थीं. ट्रेन आगे बढ़ रही थी और वे लड़कियां खिलखिला रही थीं.
वह अधेड़  अपने काले चश्मे के अंदर से उन्हें घूर रहा था. उस के पास एक काफी स्मार्ट लड़की बैठी थी. उस लड़की के बगल में एक पहलवान किस्म की उस की सहेली कविता बैठी थी, जो मर्दों की तरह बातें कर रही थी.

अपनी आदत के मुताबिक, अधेड़ दोबारा उस स्मार्ट लड़की से सटने लगा. उस ने अपना हाथ लड़की की जांघ पर रखा और फिरसौरीकह कर हटा लिया. इस के बाद भी वह छेड़छाड़ की लगातार कोशिश कर रहा था. अचानक कविता का ध्यान अधेड़ की हरकतों की ओर गया. वह बड़े ध्यान से उस की कारगुजारी देखने लगी. कुछ देर बाद उस ने जगह बदल ली. अब वह अधेड़ के पास बैठ गई.

एक स्टेशन पर भीड़ बढ़ी. कई ग्वाले दूध के डब्बे ले कर चढ़ आए. लोगों का ध्यान बंटा तो अधेड़ का हाथ दोबारा हरकत में गया. कभी हाथ कविता की जांघ पर पड़ता तो कभी कंधे पर. लेकिन कुछ देर बाद वह अधेड़ वहां से उठ गया और कुछ दूर सिंगल वाली सीट पर जा कर बैठ गया.

अरे, यह क्या? दर्द से उस के आंसू निकल आए थे. उस ने चश्मा उतार कर रूमाल से आंसू पोंछे. उस की हरकतें कविता देख कर मंदमंद मुसकरा रही थी. अधेड़ भी एक बेचारे की तरह कविता को देख रहा था.
बाकी किसी को कुछ पता नहीं था कि उन दोनों के बीच क्या हुआ. किसी का ध्यान भी उस ओर नहीं था, क्योंकि कोई शोरशराबा नहीं हुआ था.

अधेड़ बारबार अपनी जांघ सहला रहा था. वह खुद से सवाल कर रहा था, ‘क्या कोई देख रहा है? यह लड़की कौन है? क्या इसे पता चल गया था? अब कभी नहीं करूंगा ऐसा…’कुछ देर बाद वह अधेड़ उठा और दूर जा कर बैठ गया. अब उसे वह पहलवान टाइप की लड़की कविता नहीं दिखाई दे रही थी. वह मन ही मन उसे कोस रहा था. अब भी वह कुछ औरतों के पासही बैठा था, लेकिन उस का हाथ कहीं और नहीं, अपनी जांघ पर ही था. वह धोती के ऊपर से अपनी जांघ सहलारहा था,

जैसे बहुत दर्द हो रहा हो.कुछ देर बाद कविता अपनी सीट से उठी और उस अधेड़ की खोज में निकल पड़ी. एक सीट पर दुबका वह अधेड़ उसे दिखाई पड़ गया कविता ने मुसकरा कर मजाकभरे लहजे में उस अधेड़ से धीरे से पूछा, ‘‘क्या हुआ अंकल?’’ अधेड़ कुछ नहीं बोला. उस ने नजरें झुका लीं. कविता भी आगे कुछ नहीं बोली और वह अपनी सीट पर लौट आईवह अब भी मंदमंद मुसकरा रही थी.

कुछ देर बाद उन लड़कियों का स्टेशन गया. ट्रेन रुकी तो वे सब जल्दीजल्दी उतरने लगीं.
कविता उतरते समय अधेड़ से बोली, ‘‘बाय अंकल. जांघ में हल्दीप्याज गरम कर के लगा लीजिएगा.’’
कविता ट्रेन से उतर गई तो अधेड़ ने राहत की सांस ली. अभी इस सवाल का जवाब बाकी है कि अधेड़ ने अपनी सीट क्यों छोड़ी और पहलवान टाइप लड़की कविता ने उस का क्यों मजाक उड़ाया?
कविता ने फुरसत के पलों में खिलखिलाते हुए अपनी सहेलियों को बताया, ‘‘आज ट्रेन में बहुत मजा
आया. एक मनचले बुढ़ऊ को जम कर मजा चखाया.’’

‘‘कब? किसी को कुछ पता नहीं चला?’’ सहेलियों में से एक ने पूछा.‘‘हां. चुपचाप मजा चखाया. वह गोल्डी को छेड़ रहा था. मेरी नजर पड़ी तो मुझे बहुत गुस्सा आया. मैं उसे डांट भी सकती थी, लेकिन उस के पास बैठ कर चुपचाप उस की जांघ पर बोरा सिलने वाले इस सूए के पिछले भाग को इतनी जोर से चुभाया कि उस के आंसू निकल आए.‘‘पोल खुलने के डर से वह कुछ कह भी नहीं सका. पूरा दर्द सह गया. असली मर्द होगा तो दोबारा ऐसी हरकत नहीं करेगा.’’

लड़कियां खूब जोर से हंसीं. गोल्डी बोली मुझे भी बहुत गुस्सा रहा था, लेकिन मैं कुछ बोली नहीं, पर तुम ने उसे सबक सिखा ही दिया.’’ ‘‘हां. मैं यह सूआ लिए रहती हूं और नुकीले भाग से नहीं, पीछे के हिस्से से
ही मनचलों की चीख निकाल लेती हूं. यह मेरा कारगर हथियार है. खून नहीं निकलता, लेकिन जान निकाल लेता है. इस सूए से मेरे पिता तेंदूपत्ते से भरे बोरे सिला करते थे. काम ऐसा करो कि सांप भी मर जाए और लाठी भी टूटे,’’ 

कविता ने कहा.बाकी लड़कियां उस की तारीफ कर रही थीं. सुरेखा ने कहा, ‘‘बढि़या रहा सबक सिखाने का तुम्हारा तरीका. ये अधेड़ और बूढ़े लोग भी शर्मनाक काम करते हैं. अपनी मर्यादा भूल जाते हैं.’’

Hindi Kahani : औरत

Hindi Kahani. रिमझिम शादी के 4 साल में 2 बच्चों की मां बन गई. उस का पति अंजुम शराबी था और मारपीट भी करता था. रिमझिम इस जिंदगी से तंग गई और एक दिन उस ने अंजुम को ही धुन दिया. क्या वह अपनी शादी निभा पाई? उस के बच्चों का क्या हुआ?

कि सिरे से इस कहानी को शुरू करूंऋतुएं अपना वेश बदलती रहती हैं. बादलों के बीच झांकते कई अक्सर भी अपना रूप बदलते रहते हैं और सब से ज्यादा इनसान अपना बरताव बदलता रहता है.
18 साल की उम्र में ब्याह और फिर 20-22 साल की उम्र में 2 बच्चों की मां बन जाना, अल्हड़पन और जवानी रिमझिम के हिस्से में कभी नहीं आई. पति शराबी था. संयुक्त परिवार था. सब की बातों को सुनती, सहती. तानों को सहतेसहते उस का मन सब से उचाट हो गया था.

आज भी रिमझि को याद है ब्याह के चौथे दिन ही पति का गलत बरताव. रात के 11 बज रहे थे. अंजुम अभी तक घर नहीं लौटे थे. घर के सभी सदस्यों से रिमझिम पूछ चुकी थी. सभी का यही कहना था कि जाएगा कुछ देर में. रिमझिम का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. तभी दरवाजे की घंटी बजी. वह बेतहाशा दौड़ी और दरवाजा खोला, सामने अंजुम शराब के नशे में चूर था. उसे कुछ समझ  नहीं आया. रोते हुए बोली, ‘‘आप शराब पी कर आए हैं?’’

‘‘हां, पी कर आया हूं. तेरे बाप के पैसे की नहीं पी कर आया हूं,’’ इतना कह करान्नाटेदार थप्पड़ से रिमझिम का गाल लाल हो गया. रिमझिम की डबडबाई आंखों में अपने मातापिता का स्नेहिल चेहरा धुंधलाने लगा. उसे लगा कि अगर दीवार का सहारा नहीं लिया, तो वह चकरा कर वहीं गिर जाएगी.
तभी ससुर दौड़ कर आए और रिमझिम को सास के पास बैठा कर अंजुम के पास चले गए.
सास ने कहा, ‘‘अब तुम्हें ही इसे संभालना है बहू. बहुत पीताखाता है.’’

‘‘आप लोग जान रहे थे तो इन की शादी क्यों कराई?’’ रिमझिम की बेबसी उस की आंखों से बह रही थी.
‘‘जी छोटा मत करो, कोई कोई रास्ता निकल आएगा. तुम गई हो, अब सब संभाल लोगी,’’ सास
की रुंधी हुई आवाज रिमझिम को असमय ही मैच्योर हो गई. मारपीट, गालीगलौज अब रोज की बात हो गई थी.

एक दिन अंजुम दिन में ही पी कर गया. बच्चे घर में ही थे. रिमझिम बच्चों को ले कर ऊपर के कमरे में
चली गई.कुछ देर बाद अंजुम आया और दहाड़ते हुए बोला, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे से बगैर पूछे ऊपर आने की? बकरा लाया हूं. जाओ, उसे पकाओ. और हां, मेरे 4 दोस्त भी साथ में हैं.’’ रिमझिम बच्चों के सामने किसी तरह का बखेड़ा नहीं चाहती थी. वह चुपचाप नीचे चली गई. अंजुम भी साथ में गया और बच्चे भी.

रसोईघर में नम आंखों से रिमझिम प्याज काटने लगी कि तभी अंजुम उसे पकड़ कर बोला, ‘‘रो रही हो? बकरा बनाने को बोल दिया इसलिए?’’ रिमझिम गुस्से से अंजुम को देखने लगी. अंजुम बोला, ‘‘आंखें नीची कर बेशर्म औरत.’’ लेकिन रिमझिम अंजुम को उसी तरह देखती रही.

तभी अंजुम बालों से पकड़ कर रिमझिम को घसीटने लगा. बच्चे सहमे हुए दरवाजे से छिप कर देख रहे थे.
रिमझिम अपने ही बच्चों के सामने यह बेइज्जती सहन नहीं कर पाई. वह अचानक शेरनी की तरह झपटी और अंजुम को वहीं पटक कर घूंसे मारने लगी. वह चिल्लाती जा रही थी, ‘‘देख मेरी हिम्मतदेखना चाहता था . बहुत हो गया तुम्हारा वहशीपन, अब मैं दिखाऊंगी बगैर पीए अपना वही रूप.’’
अंजुम का नशा कपूर की तरह उड़ गया था. सास ससुर, जेठ जेठानी सभी आवाज सुन कर गए. ससुर की कड़कड़ाती आवाज सुनाई दी, ‘‘यही कमीनी है. इसी के चलते घर में कलह हो रही है.’’

इतना सुनते ही रिमझिम दहाड़ उठी, ‘‘अभी तक मैं ही कलह कर रही थीहै ? आप का बेटा संस्कारी है. जब मैं पीटी जाती थी, तब तो आप लोग खामोश रहे और आज जब मैं अपने लिए आवाज उठा रही हूं, तो आप सब की निगाह में कमीनी हो गई.’’

‘‘चुप कर बेशर्म औरत, आज तक तेरे जैसी औरत कहीं नहीं देखी. बेहया कहीं की. अंजुम ठीक करता है. अगर तुम्हारे ऊपर लाठीडंडा चले, तो तुम बेहयाई पर उतर आओगी.’’ तड़प कर रिमझिम उठी और हाथ का डंडा ससुर पर फेंक मारा. सारे लोग अवाक से ताकते रह गए.

‘‘अंजुम, तुम अपना परिवार ले कर अलग हो जाओ. मुझे से अब यह सब बरदाश्त नहीं होगा,’’ ससुर धीमी आवाज में बोले.‘‘एक शर्त पर, घर मेरे नाम पर होगा,’’ रिमझिम की हठी आवाज हवा में तैर गई.
बंटवारा हो गया. अंजुम अपने परिवार के साथ इस घर में गया, पर पीना नहीं छूटा और ही छूटी मारपीट.

जेठ के बेटे की शादी थी. रिश्तेदारों की भीड़ से घर अटा पड़ा था. रात 9 बजे रिमझिम सब को खाना खिला रही थी. अंजुम आया और उस का हाथ पकड़ कर खींचने लगा. रिमझिम ने झटके से
हाथ छुड़ा लिया कि तभी हवा में लहराता हाथ उस के गालों पर पड़ा. वह गुस्से में बदहवास अंजुम पर टूट पड़ी. गुस्से से दांत किटकिटाते हुए बोली, ‘‘संभल जाओ अंजुम, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा.’’ परिवार के कुछ लोग कर रिमझिम को साथ ले गए.

4 सासों के बीच रिमझिम बैठी थी.
‘‘बहू तुम ने अच्छा नहीं किया अपने पति को मार कर. हमारे धर्म में पति पर हाथ उठाना पाप है. जिस पति की लंबी उम्र के लिए तुम तीजत्योहार करती हो उस को तुम कैसे मार सकती होतुम्हें नरक में भी जगह नहीं मिलेगी.’’

‘‘नरक की भी चाह नहीं रही अब मेरी. इस से बुरा और क्या हो सकता है किसी के लिए. 25 साल से जुल्म सहती आई हूं. अब नहीं और कभी नहीं,’’ रिमझिम की मजबूत, लेकिन कांपती आवाज सुनाई दी.
‘‘बेलगाम हो गई है रिमझिम,’’ उस की अपनी सास ने धीरे से कहा.

समय रेत की तरह फिसलता रहा. बच्चों को एक खास माहौल में रखने की जिद में रिमझिम जिद्दी से और जिद्दी होती गई. उस के दोनों बच्चे काबिल थे. अच्छी परवरिश और रिमझिम के दिए संस्कार से बड़ा बेटा डाक्टर और छोटा बीडीओ बन गया.

बच्चों के बड़े पद पर जाते ही सारे रिश्तेदारों की नजरों में रिमझिम के लिए एक खास जगह बन गई. ससुर भी अपनी बहू के कायल हो गए, पर रिमझिम के दिल में किसी के लिए कोई इज्जत नहीं बची थी. वह सब को आदरस्नेह देती थी, पर दिल के अंदर अजीब से भाव भरे हुए थे.

बड़े बेटे की शादी की तैयारी में बिजी रिमझिम खुद सबकुछ कर रही थी. उसे रिश्तेदारों का कोई सहयोग नहीं चाहिए था. बेटे को देखती और बलिहारी जाती. उस के लिए अपने बच्चों की खुशियों से ज्यादा कुछ नहीं था. सास बनने की चाह उस के चेहरे पर अनूठी मुसकान बिखेर रही थी.अंजुम में बदलाव आया था, पर अकड़ अभी भी बाकी थी. शराब कम हुई थी, पर पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी.

रिमझिम नहीं चाहती थी कि बेटे की शादी में कोई भी शराब पी कर माहौल को खराब करे. सब से ज्यादा तो डर उसे अपने पति से ही था. आज शाम बेटे की बरात जानी थी. रिमझिम का मन अजीब सी उथलपुथल से भर रहा था. उस ने मन ही मन एक फैसला लिया.दोपहर के 2 बज रहे थे. रिमझिम अपने पति के पास गई और बोली, ‘‘बारात में कोई शराब पी कर नहीं जाएगा.’’

‘‘तुम बावली हो गई हो क्या? पीनापिलाना हमारी शान है,’’ अंजुम ने कहा. ‘‘पत्नी को पीटना और बच्चों को दुत्कारना भी शायद आप के लिए शान की बात है, है ?’’ ‘‘उन सब बातों को अभी भूल जाओ रिमझिम. वैसे तुम किसकिस को रोकोगीअगर ऐसा करोगी तो शायद कोई बरात में ही नहीं जाए.’’
‘‘ जाए कोई. मुझे  फर्क नहीं पड़ता. पर शराब पीकर कोई नहीं जाएगा और यही मेरा आखिरी फैसला है. बच्चे भी सहमत हैं मुझे से,’’ रिमझिम ने अपनी बात रख दी. अंजुम अजीब उलझन में फंस गया. दोस्त और कई रिश्तेदार बगैर शराब कहीं जाते ही नहीं. दोस्तों तक बात पहुंची. उन्हें ?ाटका लगा.

एक दोस्त ने ताना कसा, ‘‘तुम मेहरारू भक्त हो गए हो क्या अंजुम? तुम उन की बात क्यों मानोगे? मालिक तो तुम हो. तुम जैसा चाहोगे भाभीजी को वैसा ही करना होगा. औरतों का घर पर राज नहीं चलना चाहिए. आओ, पी कर चलते हैं. देखते हैं कि भाभीजी क्या कर लेंगी.’’ दोस्तों की हुंकार के सामने अंजुम भी शेर बन गया और शराब का दौर शुरू हो गया.

इधर शादी का लोकगीत का गीत गाया जा रहा था. रिमझिम की आंखें खुशी से नम थीं. मां को खुश देख कर विनय का भी मन खुशी  था. आज बरसों के बाद मां के चेहरे पर सुकून था. तभी अंजुम आया और दूल्हे के गाड़ी में बैठ गया. रिमझिम तमतमा उठी. अंजुम के मुंह से उठती शराब की बदबू उस की सांसों को मानो रोक रही थी.

अचानक रिमझिम दहाड़ी, ‘‘अंजुम, आप गाड़ी से नीचे उतरिए. आप बरात में नहीं जाएंगे और जिसजिस ने भी शराब पी है, वे अपनेअपने घर चले जाएं.’’
अंजुम गाड़ी से उतरा और तमतमाते हुए बोला, ‘‘बहुत गरमी चढ़ गई है शरीर में. सब उतार दूंगादेखता हूं कि कौन मुझे बैठने नहीं देता है…’’

अंजुम गाड़ी में बैठने गया कि तभी विनय ने गाड़ी का दरवाजा बंद कर लिया और बोला, ‘‘पापा, आप लोग बरात में नहीं जाएंगे.’’ ‘‘मैं तेरा बाप हूं,’’ अंजुम चीखा. ‘‘मैं सिर्फ मां का बेटा हूं.’’‘‘रिमझिम, मान जाओ. तकरीबन सभी ने पी रखी है. अगर तुम्हारी यही जिद रही तो इक्कादुक्का लोग ही बरात में जा पाएंगे और अगर अंजुम नहींगया तो शादी की रस्में कौन निभाएगा?’’ ससुर बोले.

ससुर का कहना भी रिमझिम ने ठुकरा दिया, ‘‘मैं निभाऊंगी. जैसे अभी तक बच्चों की परवरिश करती आई हूं. और रहा सवाल इक्कादुक्का लोगों के बरात में जाने का, तो यही बेहतर है. मेरी बहू के घर कोई भी नशेड़ी या गंजेड़ी नहीं जाएगा.’’ 
रिमझिम दूल्हे की गाड़ी में बैठ गई. गाड़ी रफ्तार पकड़ चुकी थी. सभी हैरान हो कर एक औरत की हिमाकत और हिम्मत देखते रह गए. Hindi Kahani

लेखक – कात्यायनी सिंह             

  

Hindi Crime Story: हवस – मर्यादा तोड़ने का खतरनाक अंजाम

Hindi Crime Story: जय प्रकाश दोपहर में अपनी दुकान से घर आ गया. उस ने तय कर लिया था कि आज वह हर हाल में अपनी बीवी सीमा और उस के चचेरे भाई मनोज के असली चेहरे बेनकाब कर के रहेगा.

आंगन का दरवाजा बंद था. चारदीवारी फांद कर जय प्रकाश अंदर गया. दबे पैर चल कर उस ने बैडरूम के दरवाजे पर कान लगाया, तो अंदर से उसे सीमा और मनोज की बातें सुनाई पड़ीं.

‘‘काश, तुम मेरी बीवी बन कर जिंदगीभर मेरे साथ रहतीं?’’ यह मनोज की आवाज थी.

‘‘बीवी तो मैं दूसरे की हूं, लेकिन प्रेमिका के नाते तुम्हारे साथ बीवी जैसा फर्ज तो अदा कर रही हूं,’’ सीमा बोल रही थी.

‘‘मैं तुम्हें जिंदगीभर के लिए पाना चाहता हूं,’’ मनोज ने कहा था.

‘‘ठीक है, अगर कभी मेरे पति को हमारे नाजायज रिश्ते की जानकारी हो गई और उसी ने मु?ो अपने साथ रखने से मना कर दिया, तो तुम मु?ो अपनी बीवी बना लेना.

‘‘मैं क्या अपनी खुशी से जय प्रकाश के साथ रह रही हूं. यह मैं ही जानती हूं कि मैं उस से कैसे निबाह रही हूं. यह मेरी बदकिस्मती थी कि लाख कोशिशों के बावजूद मेरी तुम से शादी नहीं हो सकी, नहीं तो मैं आज तुम्हारी ही बीवी होती. खैर, छोड़ो उन सब बातों को, अपने कपड़े तो उतारो.’’

जय प्रकाश सबकुछ सम?ा गया, मगर दरवाजे पर दस्तक देने से पहले वह अपनी आंखों से कमरे का नजारा देख कर यह पक्का कर लेना चाहता था कि उन दोनों में नाजायज रिश्ता है.

दरवाजे में कोई छेद नहीं था, इसलिए वह खिड़की की तरफ बढ़ गया. उस ने खिड़की के पाटों के बीच एक दरार में आंख लगा दी.

भीतर का नजारा देख कर जय प्रकाश हैरान था. सीमा बिस्तर पर लेटी थी. मनोज उस से सट कर बैठा था. वह सीमा के होंठों और गालों को चूम रहा था.

जय प्रकाश का खून खौल उठा. उस का मन सीमा का कत्ल कर के जेल चले जाने का हुआ, मगर उस ने यह सोच कर इस विचार को छोड़ दिया कि अगर वह जेल चला जाएगा, तो उस के 3 साल के बेटे रोहित की परवरिश कौन करेगा?

मगर जय प्रकाश सीमा और मनोज को यों ही नहीं छोड़ना चाहता था. वह उन्हें सबक सिखाना चाहता था, इसलिए उस ने दरवाजे पर दस्तक दी.

दस्तक सुन कर वे दोनों सचेत हो गए. अपने कपडे़ ठीक करते हुए सीमा बिस्तर से उठ कर आई और दरवाजा खोल दिया.

जैसे ही सीमा की नजर जय प्रकाश पर पड़ी, उस का हलक सूख गया.

सीमा को कुछ कहे बिना जय प्रकाश कमरे में आ गया और उस ने मनोज को ढूंढ़ निकाला. वह पलंग के नीचे छिप गया था.

सीमा को लातघूंसों से मारते हुए जय प्रकाश ने कहा, ‘‘बदजात औरत, तू ने तो कहा था कि मनोज तुम्हारा चचेरा भाई है. महल्ले के लोग यों ही तु?ो बदनाम करते हैं.

‘‘अब बता कि यह सब क्या है? भाई के साथ कमरा बंद कर के क्या कोई चोंच से चोंच मिलाता है?’’

सीमा ने ?ाट से जय प्रकाश के पैर पकड़ लिए और अपनी गलती के लिए माफी मांगते हुए कहा कि अब वह मनोज के साथ नाजायज संबंध नहीं रखेगी.

जय प्रकाश सीमा को एक मौका और देना चाहता था, इसलिए उस ने उसे इस शर्त पर माफ किया कि वह आइंदा मनोज से नहीं मिलेगी.

मनोज के जाने के कुछ देर बाद जय प्रकाश अपने मकान से बाहर आया, तो वहां लोगों की भीड़ लगी थी. लोग उसे ऐसे देख रहे थे, जैसे आज उन्हें पता चला हो कि उन के महल्ले में कोई नामर्द रहता है.

पड़ोस की एक औरत ने जय प्रकाश के मुंह पर कह भी दिया, ‘‘क्यों भैया, मर्द नहीं हो क्या? बीवी को दूसरे मर्द के साथ सोते देख कर भी उसे माफ कर दिया?’’

जय प्रकाश सिर ?ाका कर अपने रास्ते चला गया. भला वह उस औरत की बात का क्या जवाब देता? उसे कैसे बताता कि अपने बेटे का खयाल कर के उस ने अपनेआप से सम?ौता किया है.

सीमा मुजफ्फरपुर के एक गांव की रहने वाली थी. मनोज का घर भी उसी गांव में था. वह सीमा से एक साल बड़ा था, मगर दोनों ने बीए तक एकसाथ पढ़ाई की थी.

जवानी की दहलीज पर आते ही मनोज सीमा की तरफ खिंच गया और उसे अपना दिल दे दिया.

सीमा भी मनोज को मन ही मन प्यार करती थी. दोनों का मिलनाजुलना शुरू हो गया. एक दिन मौका मिला, तो दोनों ने जिस्मों का मिलन भी कर लिया.

कुछ महीनों के बाद उन दोनों ने शादी कर के जिंदगीभर साथ रहने का फैसला किया, मगर उन की एक न चली.

दोनों एक ही गांव के थे और अलगअलग जाति के भी. उन के घर वाले जाति की दीवार तोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए.

आखिरकार सीमा की शादी जय प्रकाश से कर दी गई. वह कोलकाता का रहने वाला था. वहां उस की कपड़े की दुकान थी.

सीमा अपने पति के घर आ गई. पति से भरपूर प्यार और सासससुर का दुलार पा कर भी वह मनोज को भुला न सकी. जब भी मौका मिलता, सीमा मनोज को फोन कर लेती.

मनोज भी सीमा से मिलने के लिए कम बेचैन नहीं था.

इसी तरह 6 महीने बीत गए. मनोज अपनेआप पर काबू न रख सका. फोन पर सीमा से इजाजत ले कर एक दिन वह कोलकाता पहुंच गया.

सीमा ने पति और सासससुर से मनोज की पहचान अपने चचेरे भाई के रूप में कराई, इसलिए उन दोनों के नाजायज रिश्ते पर किसी को शक नहीं हुआ. एकदूसरे की बांहों में समा कर वे दोनों अपनी हवस शांत कर लेते.

जल्दी ही मनोज के घर वालों को पता चल गया कि वह सीमा से मिलने बारबार कोलकाता जाता है, फिर तो मनोज के पिता ने जल्दी ही उस की शादी वीणा से करा दी.

वीणा सीमा से भी ज्यादा खूबसूरत थी. लेकिन मनोज उस के रूपजाल में ज्यादा दिनों तक बंधा न रह सका.

अपनी शादी के 4 महीने बाद ही मनोज कोलकाता जा कर सीमा से मिला. उस समय वह मां बन चुकी थी. उस के बेटे का नाम रोहित था. इस के बावजूद सीमा ने मनोज से नाजायज संबंध नहीं तोड़ा.

सीमा से मिलने बारबार कोलकाता न आना पड़े, इसलिए मनोज ने वहीं रहने का फैसला किया.

कुछ कोशिश के बाद मनोज को एक कंपनी में नौकरी मिल गई. उसे सीमा के घर से कुछ ही दूरी पर किराए का मकान भी मिल गया.

जय प्रकाश रोजाना घर से सुबह 10 बजे दुकान जाता था. वहां से लौट कर वह रात के 10 बजे घर आता था. इस बीच सीमा पूरी तरह आजाद रहती थी. उस का जब भी मन होता, वह मनोज को घर बुला लेती.

मनोज की आजादी पर अंकुश उस समय लगा, जब उस की पत्नी वीणा गांव से शहर आ गई. उस की एक साल की बच्ची थी.

जल्दी ही वीणा को मनोज और सीमा के नाजायज संबंध की सारी जानकारी हो गई. फिर तो उन दोनों में सीमा को ले कर ?ागड़ा होने लगा.

मनोज किसी भी हाल में सीमा से नाजायज संबंध तोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ, तो एक दिन वीणा सीमा के घर गई.

उस ने सीमा को सम?ाने की कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

सीमा ने उसी दिन मनोज को बुला कर बताया. मनोज को वीणा पर बहुत गुस्सा आया. उस ने घर जा कर वीणा की खूब पिटाई की और यह चेतावनी दी कि अगर उस ने फिर कभी सीमा से कुछ कहा, तो वह उसे तलाक दे देगा.

वीणा को इस बात से इतना धक्का पहुंचा कि एक दिन वह गले में साड़ी का फंदा लगा कर पंखे से ?ाल गई. खुदकुशी करने से पहले उस ने अपनी बेटी को भी जहर दे कर मार डाला था.

पत्नी और बच्ची की मौत के बाद भी मनोज नहीं सुधरा. उस ने पहले की तरह सीमा से नाजायज संबंध बनाए रखा.

सीमा ने भी इस घटना से कोई सीख नहीं ली.

वीणा ने जब अपनी बेटी को मार कर खुदकुशी की थी, तभी जय प्रकाश को किसी ने मनोज और सीमा के नाजायज संबंध के बारे में सबकुछ बता दिया था.

जय प्रकाश सीधासादा था. वह मन में छलकपट नहीं रखता था. सो, एक दिन उस ने सीमा से पूछा, ‘‘क्या यह सच है कि मनोज से तुम्हारा नाजायज रिश्ता है? तुम दोनों की वजह से ही मनोज की पत्नी ने खुदकुशी की थी?’’

पहले तो सीमा घबरा गई, मगर तुरंत उस ने अपनेआप को संभाल लिया और बोली ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं? महल्ले वालों की बातों में आ कर भाईबहन के पवित्र रिश्ते पर लांछन लगा रहे हैं? आप ही बताइए कि क्या मैं चरित्रहीन लगती हूं?’’ यह कह कर सीमा फफकफफक कर रोने लगी.

जय प्रकाश को उस की बात पर भरोसा हो गया और उस ने उसे यह कह कर चुप कराया कि अब वह उस पर शक नहीं करेगा.

इस के बाद 3 महीने और बीत गए. एक दिन जय प्रकाश के पड़ोस की मुंहबोली भाभी ने उसे मनोज और सीमा की सारी करतूतें बताते हुए कहा कि अगर उस ने जल्दी ही सीमा और मनोज के नाजायज संबंध को नहीं रोका, तो महल्ले के लोग उस की बीवी पर जिस्मफरोशी का आरोप लगा कर पुलिस के हवाले कर देंगे.

जय प्रकाश को अपनी मुंहबोली भाभी पर पूरा भरोसा था. उस ने मनोज और सीमा को रंगे हाथ पकड़ने का प्लान बना लिया.

अगले दिन ही जय प्रकाश दुकान से घर आया और उस ने सीमा को मनोज के साथ पकड़ लिया.

अपने बेटे का खयाल कर के जय प्रकाश ने सीमा को माफ कर दिया. मगर सीमा ने मनोज से नाजायज संबंध नहीं तोड़ा, वह सिर्फ सावधानी बरतने लगी.

2-3 महीने बाद जब सीमा को लगा कि महल्ले के लोग अब उस के पति के कान नहीं भरेंगे, तो उस ने फिर से मनोज को अपने घर बुलाना शुरू कर दिया.

एक दिन जय प्रकाश को एक काम से किसी रिश्तेदार के घर पटना जाना था. सीमा को 3 दिन बाद लौटने की बात कह कर वह चला गया, मगर उस की ट्रेन छूट गई और वह घर लौट आया.

उस समय शाम के 4 बज रहे थे. उस के घर के बाहर महल्ले के बहुत से लोग खड़े थे.

जय प्रकाश ने उस भीड़ में एक से पूछा, ‘‘क्या बात है?’’

‘‘हम लोग यहां तमाशा देखने के लिए खड़े हैं. तुम अंदर जाओगे, तो खुद जान जाओगे कि यहां कैसा तमाशा हो रहा है.’’

जय प्रकाश उस शख्स की बात सम?ा नहीं पाया. वह चुपचाप आंगन में चला गया.

उस के बैडरूम का दरवाजा बंद था. पड़ोस में रहने वाला एक 16 साल का लड़का दरवाजे से आंख लगाए खड़ा था.

जय प्रकाश को गुस्सा आ गया.

उस ने लड़के का गरीबान पकड़ कर पूछा, ‘‘मेरे घर में ताक?ांक क्यों कर रहा है? चल, तेरे बाप को तेरी करतूत बताता हूं.’’

वह लड़का भी कोई कम नहीं था. उस ने तुरंत जवाब दिया, ‘‘मेरे बाप को बाद में बताना, पहले दरवाजा खुलवा कर अपनी बीवी से पूछ कि तेरे रहते वह गैरमर्द के साथ कमरा बंद कर के क्या कर रही है?’’

जय प्रकाश के हाथों के तोते उड़ गए. लड़के ने अपना गिरेबान छुड़ाया और अपनी राह चला गया.

जय प्रकाश ने गुस्से में दरवाजा पीटना शुरू कर दिया.

जय प्रकाश को देखते ही सीमा डर गई. वह कुछ सम?ा नहीं पाई कि ऐसी हालत में उसे क्या करना चाहिए.

लेकिन जय प्रकाश समझ गया था कि सीमा और मनोज के दिल में हवस का तूफान है. वे दोनों समझने वालों में से नहीं हैं, इसलिए उस ने छुटकारा पाने के लिए उन का कत्ल कर देना ही ठीक समझा.

जय प्रकाश ने बरामदे में पड़ी लोहे की छड़ उठाई और सीमा के सिर पर एक जोरदार वार किया, जिस से उस का सिर फट गया और वह चीख कर जमीन पर गिर गई.

सीमा का हश्र देख कर मनोज ने वहां से भागने की कोशिश की, मगर जय प्रकाश ने उसे भागने नहीं दिया.

लोहे की उसी छड़ से उस ने मनोज के सिर पर कई वार किए. जो हश्र सीमा का हुआ, वही मनोज का भी हुआ. थोड़ी देर में दोनों की लाशें बिछ गईं.

सूचना पा कर पुलिस आई और जय प्रकाश को गिरफ्तार कर के ले गई. रोहित अनाथ हो गया. Hindi Crime Story

Hindi Crime Story: अपराध – क्या थी नीलकंठ की गलती

Hindi Crime Story: ऐलिस का साथ पाने के लिए नीलकंठ ने अपनी दम तोड़ती पत्नी सुरमा को बचाने की कोई कोशिश नहीं की.

एंबुलैंस का सायरन बज रहा था. लोग घबरा कर इधरउधर भाग रहे थे. छुट्टी का दिन होने से अस्पताल का आपातकालीन सेवा विभाग ही खुला था, शोरशराबे से डाक्टर नीलकंठ की तंद्रा भंग हो गई.

घड़ी पर निगाह डाली, रात के 10 बज कर 20 मिनट हो रहे थे. उसे ऐलिस के लिए चिंता हो रही थी और उस पर क्रोध भी आ रहा था. 9 बजे वह उस के लिए कौफी बना कर लाती थी. वैसे, उस ने फोन पर बताया था कि वह 1-2 घंटे देर से आएगी.

‘‘सर,’’ वार्ड बौय ने आ कर कहा, ‘‘एक गंभीर केस है, औपरेशन थिएटर में पहुंचा दिया है.’’

‘‘आदमी है या औरत?’’ नीलकंठ ने खड़े होते हुए पूछा.

‘‘औरत है,’’ वार्ड बौय ने उत्तर दिया, ‘‘कहते हैं कि आत्महत्या का मामला है.’’

‘‘पुलिस को बुलाना होगा,’’ नीलकंठ ने पूछा, ‘‘साथ में कौन है?’’

‘‘2-3 पड़ोसी हैं.’’

‘‘ठीक है,’’ औपरेशन की तैयारी करने को कहो. मैं आ रहा हूं. और हां, सिस्टर ऐलिस आई हैं?’’

‘‘जी, अभीअभी आई हैं. उस घायल औरत के साथ ही ओटी में हैं,’’ वार्ड बौय ने जाते हुए कहा.

राहत की सांस लेते हुए नीलकंठ ने कहा, ‘‘तब तो ठीक है.’’

वह जल्दी से ओटी की ओर चल पड़ा. दरअसल, मन में ऐलिस से मिलने की जल्दी थी, घायल की ओर ध्यान कम ही था.

ऐलिस को देखते ही वह बोला, ‘‘इतनी देर कहां लगा दी? मैं तो चिंता में पड़ गया था.’’

‘‘सर, जल्दी कीजिए,’’ ऐलिस ने उत्तर दिया, ‘‘मरीज की हालत बहुत खराब है. और…’’

‘‘और क्या?’’ नीलकंठ ने एप्रन पहनते हुए पूछा, ‘‘सारी तैयारी कर दी है न?’’

‘‘जी, सब तैयार है,’’ ऐलिस ने गंभीरता से कहा, ‘‘घायल औरत और कोई नहीं, आप की पत्नी सुरमा है.’’

‘‘सुरमा,’’ वह लगभग चीख उठा.

सुबह ही नीलकंठ का सुरमा से खूब झगड़ा हुआ था. झगड़े का कारण ऐलिस थी. नीलकंठ और ऐलिस का प्रणय प्रसंग उन के विवाहित जीवन में विष घोल रहा था. सुबह सुरमा बहुत अधिक तनाव में थी, क्योंकि नीलकंठ के कोट पर 2-4 सुनहरे बाल चमक रहे थे और रूमाल पर लिपस्टिक का रंग लगा था. सुरमा को पूरा विश्वास था कि ये दोनों चिह्न ऐलिस के ही हैं. कुछ कहने को रह ही क्या गया था? पूरी कहानी परदे पर चलती फिल्म की तरह साफ थी.

झुंझला कर क्रोध से पैर पटकता हुआ नीलकंठ बाहर निकल गया.

जातेजाते सुरमा के चीखते शब्द कानों में पड़े, ‘आज तुम मेरा मरा मुंह देखोगे.’

ऐसी धमकियां सुरमा कई बार दे

चुकी थी. एक बार नीलकंठ ने

उसे ताना भी दिया था, ‘जानेमन, जीना जितना आसान है, मरना उतना ही मुश्किल है. मरने के लिए बहुत बड़ा दिल और हिम्मत चाहिए.’

‘मर कर भी दिखा दूंगी,’ सुरमा ने तड़प कर कहा था, ‘तुम्हारी तरह नाटकबाज नहीं हूं.’

‘देख लूंगा, देख लूंगा,’ नीलकंठ ने विषैली मुसकराहट के साथ कहा था, ‘वह शुभ घड़ी आने तो दो.’

आखिर सुरमा ने अपनी धमकी को हकीकत में बदल दिया था. उन का घर 5वीं मंजिल पर था. वह बालकनी से नीचे कूद पड़ी थी. इतनी ऊंचाई से गिर कर बचना बहुत मुश्किल था. नीचे हरीहरी घास का लौन था. उस दिन घास की कटाई हो रही थी. सो, कटी घास के ढेर लगे थे. सुरमा उसी एक ढेर पर जा कर गिरी. उस समय मरी तो नहीं, पर चोट बहुत गहरी आई थी.

शोर मचते ही कुछ लोग जमा हो गए, उन्होंने सुरमा को पहचाना और यही ठीक समझा कि उसे नीलकंठ के पास उसी के अस्पताल में पहुंचा दिया जाए.

काफी खून बह चुका था. नब्ज बड़ी मुश्किल से पकड़ में आ रही थी. शरीर का रंग फीका पड़ रहा था. नीलकंठ के मन में कई प्रश्न उठ रहे थे, ‘सुरमा से पीछा छुड़ाने का बहुत अच्छा अवसर है. इस के साथ जीवन काटना बहुत दूभर हो रहा है. हमेशा की किटकिट से परेशान हो चुका हूं. एक डाक्टर को समझना हर औरत के वश की बात नहीं, कितना तनावपूर्ण जीवन होता है. अगर चंद पल किसी के साथ मन बहला लिया तो क्या हुआ? पत्नी को इतना तो समझना ही चाहिए कि हर पेशे का अपनाअपना अंदाज होता है.’

सहसा चलतेचलते नीलकंठ रुक गया.

‘‘क्या हुआ, सर?’’ ऐलिस ने चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘मैं यह औपरेशन नहीं कर सकता,’’ नीलकंठ ने लड़खड़ाते स्वर में कहा, ‘‘कोई डाक्टर अपनी पत्नी या सगेसंबंधी का औपरेशन नहीं करता, क्योंकि वह उन से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. उस के हाथ कांपने लगते हैं.’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं?’’ ऐलिस ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘जल्दी से डाक्टर जतिन को बुला लो,’’ नीलकंठ ने वापस मुड़ते हुए कहा. वह सोच रहा था कि औपरेशन में जितनी देर लगेगी, उतनी जल्दी ही सुरमा इस दुनिया से दूर चली जाएगी.

‘‘यह कैसे हो सकता है?’’ ऐलिस ने तनिक ऊंचे स्वर में कहा, ‘‘डाक्टर जतिन को आतेआते एक घंटा तो लगेगा ही. लेकिन इतना समय कहां है? मैं मानती हूं कि आप के लिए पत्नी को इस दशा में देखना बड़ा कठिन होगा और औपरेशन करना उस से भी अधिक मुश्किल, पर यह तो आपातस्थिति है.’’

‘‘नहीं,’’ नीलकंठ ने कहा, ‘‘यह डाक्टरी नियमों के विरुद्ध होगा और यह बात तुम अच्छी तरह जानती हो.’’

‘‘ठीक है, कम से कम आप कुछ देखभाल तो करें,’’ ऐलिस ने कहा, ‘‘मैं अभी डाक्टर जतिन को संदेश भेजती हूं.’’

डाक्टर नीलकंठ जब ओटी में घुसा तो आंखों के सामने अंधेरा छा रहा था, कितने ही उद्गार मन में उठते और फिर बादलों की तरह गायब हो जाते थे.

सामने सुरमा का खून से लथपथ शरीर पड़ा था, जिस से कभी उस ने प्यार किया था. वे क्षण कितने मधुर थे. इस समय सुरमा की आंखें बंद थीं, एकदम बेहोश और दीनदुनिया से बेखबर. इतना बड़ा कदम उठाने से पहले उस के मन में कितना तूफान उठा होगा? एक क्षण अपराधभावना से नीलकंठ का हृदय कांप उठा, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उस के शरीर को झंझोड़ रही हो.

नीलकंठ ने कांपते हाथों से सुरमा के बदन से खून साफ किया. उस का सिर फट गया था. वह कितने ही ऐसे घायल व्यक्ति देख चुका था, पर कभी मन इतना विचलित नहीं हुआ था. वह सोचने लगा, क्या सुरमा की जान बचा सकना उस के वश में है?

लेकिन डाक्टर जतिन के आने से पहले ही सुरमा मर चुकी थी. नीलकंठ सूनी आंखों से उसे देख रहा था, वह जड़वत खड़ा था.

जतिन ने शव की परीक्षा की और धीरे से नीलकंठ के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘मुझे दुख है, सुरमा अब इस दुनिया में नहीं है. ऐलिस, नीलकंठ को केबिन में ले जाओ, इसे कौफी की जरूरत है.’’

ऐलिस ने आहिस्ता से नीलकंठ का हाथ पकड़ा और लगभग खींचते हुए ओटी से बाहर ले गई. कमरे में ले जा कर उसे कुरसी पर बैठाया.

‘‘सर, मुझे दुख है,’’ ऐलिस ने आहत स्वर में कहा, ‘‘सुरमा के ऐसे अंत की मैं ने कभी स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी. मैं अपने को कभी माफ नहीं कर सकूंगी.’’

नीलकंठ ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘तुम्हारा कोई दोष नहीं, कुसूर मेरा है.’’

नीलकंठ आंखें बंद किए सोच रहा था, ‘शायद सुरमा को बचा पाना मेरे वश से बाहर था, पर कोशिश तो कर ही सकता था. लेकिन मैं टालता रहा, क्योंकि सुरमा से छुटकारा पाने का यह सुनहरा अवसर था. मैं कलह से मुक्ति पाना चाहता था. अब शायद ऐलिस मेरे और करीब आ जाएगी.’

ऐलिस सामने कौफी का प्याला लिए खड़ी थी. वह आकर्षक लग रही थी.

पुलिस सूचना पा कर आ गई थी. औपचारिक रूप से पूछताछ की गई. यह स्पष्ट था कि दुर्घटना के पीछे पतिपत्नी के बिगड़ते संबंध थे, परंतु नीलकंठ का इस दुर्घटना में कोईर् हाथ नहीं था. नैतिक जिम्मेदारी रही हो, पर कानूनी निगाह से वह निर्दोष था. पोस्टमार्टम के बाद शव नीलकंठ को सौंप दिया गया. दोनों ओर के रिश्तेदार सांत्वना देने और घर संभालने आ गए थे. दाहसंस्कार के बाद सब के चले जाने पर एक सूनापन सा छा गया.

नीलकंठ को सामान्य होने में सहायता दी तो केवल ऐलिस ने. अस्पताल में ड्यूटी के समय तो वह उस की देखभाल करती ही थी, पर समय पा कर अपनी छोटी बहन अनीषा के साथ उस के घर भी चली जाती थी. चाय, नाश्ता, भोजन, जैसा भी समय हो, अपने हाथों से बना कर देती थी. धीरेधीरे नीलकंठ के जीवन में शून्य का स्थान एक प्रश्न ने ले लिया.

कई महीनों के बाद नीलकंठ ने एक दिन ऐलिस से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे जैसी पत्नी ही पाना चाहता था. तुम मुझे पहले क्यों नहीं मिलीं. यह सोच कर कभीकभी आश्चर्य होता है.’’

‘‘सर,’’ ऐलिस बोली, ‘‘सर.’’

नीलकंठ ने टोकते हुए कहा, ‘‘मैं ने कितनी बार कहा है कि मुझे ‘सर’ मत कहा करो. अब तो हम दोनों अच्छे दोस्त हैं. यह औपचारिकता मुझे अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘क्या करूं,’’ ऐलिस हंस पड़ी, ‘‘सर, आदत सी पड़ गई है, वैसे कोशिश करूंगी.’’

‘‘तुम मुझे नील कहा करो,’’ उस ने ऐलिस की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘मुझे अच्छा लगेगा.’’

ऐलिस हंस पड़ी, ‘‘कोशिश करूंगी, वैसे है जरा मुश्किल.’’

‘‘कोई मुश्किल नहीं,’’ नीलकंठ हंसा, ‘‘आखिर मैं भी तो तुम्हें ऐलिस कह कर बुलाता हूं.’’

‘‘आप की बात और है,’’ ऐलिस ने कहा, ‘‘आप किसी भी संबंध से मुझे मेरे नाम से पुकार सकते हैं.’’

‘‘तो फिर किस संबंध से तुम मेरा नाम ले कर मुझे बुलाओगी?’’ नीलकंठ के स्वर में शरारत थी.

‘‘पता नहीं,’’ ऐलिस ने निगाहें फेर लीं.

‘‘तुम जानती हो, मेरे मन में तुम्हारे लिए क्या भावना है,’’ नीलकंठ ने कहा, ‘‘मैं चाहता हूं कि तुम मेरे सूने जीवन में बहार बन कर प्रवेश करो.’’

‘‘यह तो अभी मुमकिन नहीं,’’ ऐलिस ने छत की ओर देखा.

‘‘अभी नहीं तो कोई बात नहीं,’’ नीलकंठ ने कहा, ‘‘पर वादा तो कर सकती हो?’’ नीलकंठ को विश्वास था कि ऐलिस इनकार नहीं करेगी, शक की कोई गुंजाइश नहीं थी.

‘‘यह कहना भी मुश्किल है,’’ ऐलिस ने मेज पर पड़े चम्मच से खेलते हुए कहा.

‘‘क्यों?’’ नीलकंठ ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘आखिर हम अच्छे दोस्त हैं?’’

‘‘बस, दोस्त ही बने रहें तो अच्छा है,’’ ऐलिस ने कहा.

‘‘क्या मतलब?’’ नीलकंठ ने खड़े होते हुए पूछा, ‘‘तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘यही कि अगर शादी कर ली तो इस बात की क्या गारंटी है,’’ ऐलिस ने एकएक शब्द तोलते हुए कहा, ‘‘कि मेरा भी वही हश्र नहीं होगा, जो सुरमा का हुआ? आखिर दुर्घटना तो सभी के साथ घट सकती है?’’

यह सुनते ही नीलकंठ को मानो सांप सूंघ गया. उस ने कुछ कहना चाहा, पर जबान पर मानो ताला पड़ गया था. ऐलिस ने साथ देने से इनकार जो कर दिया था. Hindi Crime Story

Best Hindi Kahani: शिकार – काव्या के लिए रंजन की नफरत

Best Hindi Kahani: वह एक बार फिर उस के सामने खड़ा था. लंबाचौड़ा काला भुजंग. आंखों से झांकती भूख. एक ऐसी भूख जिसे कोई भी औरत चुटकियों में ताड़ जाती है. उस आदमी के लंबेचौड़े डीलडौल से उस की सही उम्र का पता नहीं लगता था, पर उस की उम्र 30 से 40 साल के बीच कुछ भी हो सकती थी.

वहीं दूसरी ओर काव्या गोरीचिट्टी, छरहरे बदन की गुडि़या सी दिखने वाली एक भोलीभाली, मासूम सी लड़की थी. मुश्किल से अभी उस ने 20वां वसंत पार किया होगा. कुछ महीने पहले दुख क्या होता है, तकलीफ कैसी होती है, वह जानती तक न थी.

मांबाप के प्यार और स्नेह की शीतल छाया में काव्या बढि़या जिंदगी गुजार रही थी, पर दुख की एक तेज आंधी आई और उस के परिवार के सिर से प्यार, स्नेह और सुरक्षा की वह पिता रूपी शीतल छाया छिन गई.

अभी काव्या दुखों की इस आंधी से अपने और अपने परिवार को निकालने के लिए जद्दोजेहद कर ही रही थी कि एक नई समस्या उस के सामने आ खड़ी हुई.

उस दिन काव्या अपनी नईनई लगी नौकरी पर पहुंचने के लिए घर से थोड़ी दूर ही आई थी कि उस आदमी ने उस का रास्ता रोक लिया था.

एकबारगी तो काव्या घबरा उठी थी, फिर संभलते हुए बोली थी, ‘‘क्या है?’’

वह उसे भूखी नजरों से घूर रहा था, फिर बोला था, ‘‘तू बहुत ही खूबसूरत है.’’

‘‘क्या मतलब…?’’ उस की आंखों से झांकती भूख से डरी काव्या कांपती आवाज में बोली.

‘‘रंजन नाम है मेरा और खूबसूरत चीजें मेरी कमजोरी हैं…’’ उस की हवस भरी नजरें काव्या के खूबसूरत चेहरे और भरे जिस्म पर फिसल रही थीं, ‘‘खासकर खूबसूरत लड़कियां… मैं जब भी उन्हें देखता हूं, मेरा दिल उन्हें पाने को मचल उठता है.’’

‘‘क्या बकवास कर रहे हो…’’ अपने अंदर के डर से लड़ती काव्या कठोर आवाज में बोली, ‘‘मेरे सामने से हटो. मुझे अपने काम पर जाना है.’’

‘‘चली जाना, पर मेरे दिल की प्यास तो बुझा दो.’’

काव्या ने अपने चारों ओर निगाह डाली. इक्कादुक्का लोग आजा रहे थे. लोगों को देख कर उस के डरे हुए दिल को थोड़ी राहत मिली. उस ने हिम्मत कर के अपना रास्ता बदला और रंजन से बच कर आगे निकल गई.

आगे बढ़ते हुए भी उस का दिल बुरी तरह धड़क रहा था. ऐसा लगता था जैसे रंजन आगे बढ़ कर उसे पकड़ लेगा.

पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. उस ने कुछ दूरी तय करने के बाद पीछे मुड़ कर देखा. रंजन को अपने पीछे न पा कर उस ने राहत की सांस ली.

काव्या लोकल ट्रेन पकड़ कर अपने काम पर पहुंची, पर उस दिन उस का मन पूरे दिन अपने काम में नहीं लगा. वह दिनभर रंजन के बारे में ही सोचती रही. जिस अंदाज से उस ने उस का रास्ता रोका था, उस से बातें की थीं, उस से इस बात का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था कि रंजन की नीयत ठीक नहीं थी.

शाम को घर पहुंचने के बाद भी काव्या थोड़ी डरी हुई थी, लेकिन फिर उस ने यह सोच कर अपने दिल को हिम्मत बंधाई कि रंजन कोई सड़कछाप बदमाश था और वक्ती तौर पर उस ने उस का रास्ता रोक लिया था.

आगे से ऐसा कुछ नहीं होने वाला. लेकिन काव्या की यह सोच गलत साबित हुई. रंजन ने आगे भी उस का रास्ता बारबार रोका. कई बार उस की इस हरकत से काव्या इतनी परेशान हुई कि उस का जी चाहा कि वह सबकुछ अपनी मां को बता दे, लेकिन यह सोच कर खामोश रही कि इस से पहले से ही दुखी उस की मां और ज्यादा परेशान हो जाएंगी. काश, आज उस के पापा जिंदा होते तो उसे इतना न सोचना पड़ता.

पापा की याद आते ही काव्या की आंखें नम हो उठीं. उन के रहते उस का परिवार कितना खुश था. मम्मीपापा और उस का एक छोटा भाई. कुल 4 सदस्यों का परिवार था उस का.

उस के पापा एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करते थे और उन्हें जो पैसे मिलते थे, उस से उन का परिवार मजे में चल रहा था. जहां काव्या अपने पापा की दुलारी थी, वहीं उस की मां उस से बेहद प्यार करती थीं.

उस दिन काव्या के पापा अपनी कंपनी के काम के चलते मोटरसाइकिल से कहीं जा रहे थे कि पीछे से एक कार वाले ने उन की मोटरसाइकिल को तेज टक्कर मार दी.

वे मोटरसाइकिल से उछले, फिर सिर के बल सड़क पर जा गिरे. उस से उन के सिर के पिछले हिस्से में बेहद गंभीर चोट लगी थी.

टक्कर लगने के बाद लोगों की भीड़ जमा हो गई. भीड़ के दबाव के चलते कार वाले ने उस के घायल पापा को उठा कर नजदीक के एक निजी अस्पताल में भरती कराया, फिर फरार हो गया.

पापा की जेब से मिले आईकार्ड पर लिखे मोबाइल से अस्पताल वालों ने जब उन्हें फोन किया तो वे बदहवास अस्पताल पहुंचे, पर वहां पहुंच कर उन्होंने जिस हालत में उन्हें पाया, उसे देख कर उन का कलेजा मुंह को आ गया.

उस के पापा कोमा में जा चुके थे. उन की आंखें तो खुली थीं, पर वे किसी को पहचान नहीं पा रहे थे.

फिर शुरू हुआ मुश्किलों का न थमने वाला एक सिलसिला. डाक्टरों ने बताया कि पापा के सिर का आपरेशन करना होगा. इस का खर्च उन्होंने ढाई लाख रुपए बताया.

किसी तरह रुपयों का इंतजाम किया गया. पापा का आपरेशन हुआ, पर इस से कोई खास फायदा न हुआ. उन्हें विभिन्न यंत्रों के सहारे एसी वार्ड में रखा गया था, जिस की एक दिन की फीस 10,000 रुपए थी.

धीरेधीरे घर का सारा पैसा खत्म होने लगा. काव्या की मां के गहने तक बिक गए, फिर नौबत यहां तक आई कि उन के पास के सारे पैसे खत्म हो गए.

बुरी तरह टूट चुकी काव्या की मां जब अपने बच्चों को यों बिलखते देखतीं तो उन का कलेजा मुंह को आ जाता, पर अपने बच्चों के लिए वे अपनेआप को किसी तरह संभाले हुए थीं. कभीकभी उन्हें लगता कि पापा की हालत में सुधार हो रहा है तो उन के दिल में उम्मीद की किरण जागती, पर अगले ही दिन उन की हालत बिगड़ने लगती तो यह आस टूट जाती.

डेढ़ महीना बीत गया और अब ऐसी हालत हो गई कि वे अस्पताल के एकएक दिन की फीस चुकाने में नाकाम होने लगे. आपस में रायमशवरा कर उन्होंने पापा को सरकारी अस्पताल में भरती कराने का फैसला किया.

पापा को ले कर सरकारी अस्पताल गए, पर वहां बैड न होने के चलते उन्हें एक रात बरामदे में गुजारनी पड़ी. वही रात पापा के लिए कयामत की रात साबित हुई. काव्या के पापा की सांसों की डोर टूट गई और उस के साथ ही उम्मीद की किरण हमेशा के लिए बुझ गई.

फिर तो उन की जिंदगी दुख, पीड़ा और निराशा के अंधकार में डूबती चली गई. तब तक काव्या एमबीए का फाइनल इम्तिहान दे चुकी थी.

बुरे हालात को देखते हुए और अपने परिवार को दुख के इस भंवर से निकालने के लिए काव्या नौकरी की तलाश में निकल पड़ी. उसे एक प्राइवेट बैंक में 20,000 रुपए की नौकरी मिल गई और उस के परिवार की गाड़ी खिसकने लगी. तब उस के छोटे भाई की पढ़ाई का आखिरी साल था. उस ने कहा कि वह भी कोई छोटीमोटी नौकरी पकड़ लेगा, पर काव्या ने उसे सख्ती से मना कर दिया और उस से अपनी पढ़ाई पूरी करने को कहा.

20 साल की उम्र में काव्या ने अपने नाजुक कंधों पर परिवार की सारी जिम्मेदारी ले ली थी, पर इसे संभालते हुए कभीकभी वह बुरी तरह परेशान हो उठती और तब वह रोते हुए अपनी मां से कहती, ‘‘मम्मी, आखिर पापा हमें छोड़ कर इतनी दूर क्यों चले गए जहां से कोई वापस नहीं लौटता,’’ और तब उस की मां उसे बांहों में समेटते हुए खुद रो पड़तीं.

धीरेधीरे दुख का आवेग कम हुआ और फिर काव्या का परिवार जिंदगी की जद्दोजेहद में जुट गया.

समय बीतने लगा और बीतते समय के साथ सबकुछ एक ढर्रे पर चलने लगा तभी यह एक नई समस्या काव्या के सामने आ खड़ी हुई.

काव्या जानती थी कि बड़ी मुश्किल से उस की मां और छोटे भाई ने उस के पापा की मौत का गम सहा है. अगर उस के साथ कुछ हो गया तो वे यह सदमा सहन नहीं कर पाएंगे और उस का परिवार, जिसे संभालने की वह भरपूर कोशिश कर रही है, टूट कर बिखर जाएगा.

काव्या ने इस बारे में काफी सोचा, फिर इस निश्चय पर पहुंची कि उसे एक बार रंजन से गंभीरता से बात करनी होगी. उसे अपनी जिंदगी की परेशानियां बता कर उस से गुजारिश करनी होगी

कि वह उसे बख्श दे. उम्मीद तो कम थी कि वह उस की बात समझेगा, पर फिर भी उस ने एक कोशिश करने का मन बना लिया.

अगली बार जब रंजन ने काव्या का रास्ता रोका तो वह बोली, ‘‘आखिर तुम मुझ से चाहते क्या हो? क्यों बारबार मेरा रास्ता रोकते हो?’’

‘‘मैं तुम्हें चाहता हूं,’’ रंजन उस के खूबसूरत चेहरे को देखता हुआ बोला, ‘‘मेरा यकीन करो. मैं ने जब से तुम्हें देखा है, मेरी रातों की नींद उड़ गई है. आंखें बंद करता हूं तो तुम्हारा खूबसूरत चेहरा सामने आ जाता है.’’

‘‘सड़क पर बात करने से क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम किसी रैस्टोरैंट में चल कर बात करें.’’

काव्या के इस प्रस्ताव पर पहले तो रंजन चौंका, फिर उस की आंखों में एक अनोखी चमक जाग उठी. वह जल्दी से बोला, ‘‘हांहां, क्यों नहीं.’’

रंजन काव्या को ले कर सड़क के किनारे बने एक रैस्टोरैंट में पहुंचा, फिर बोला, ‘‘क्या लोगी?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘कुछ तो लेना होगा.’’

‘‘तुम्हारी जो मरजी मंगवा लो.’’

रंजन ने काव्या और अपने लिए कौफी मंगवाईं और जब वे कौफी पी चुके तो वह बोला, ‘‘हां, अब कहो, तुम क्या कहना चाहती हो?’’

‘‘देखो, मैं उस तरह की लड़की नहीं हूं जैसा तुम समझते हो,’’ काव्या ने गंभीर लहजे में कहना शुरू किया, ‘‘मैं एक मध्यम और इज्जतदार परिवार से हूं, जहां लड़की की इज्जत को काफी अहमियत दी जाती है. अगर उस की इज्जत पर कोई आंच आई तो उस का और उस के परिवार का जीना मुश्किल हो जाता है.

‘‘वैसे भी आजकल मेरा परिवार जिस मुश्किल दौर से गुजर रहा है, उस में ऐसी कोई बात मेरे परिवार की बरबादी का कारण बन सकती है.’’

‘‘कैसी मुश्किलों का दौर?’’ रंजन ने जोर दे कर पूछा.

काव्या ने उसे सबकुछ बताया, फिर अपनी बात खत्म करते हुए बोली, ‘‘मेरी मां और भाई बड़ी मुश्किल से पापा की मौत के गम को बरदाश्त कर पाए हैं, ऐसे में अगर मेरे साथ कुछ हुआ तो मेरा परिवार टूट कर बिखर जाएगा…’’ कहतेकहते काव्या की आंखों में आंसू आ गए और उस ने उस के आगे हाथ जोड़ दिए, ‘‘इसलिए मेरी तुम से विनती है कि तुम मेरा पीछा करना छोड़ दो.’’

पलभर के लिए रंजन की आंखों में दया और हमदर्दी के भाव उभरे, फिर उस के होंठों पर एक मक्कारी भरी मुसकान फैल गई.

रंजन काव्या के जुड़े हाथ थामता हुआ बोला, ‘‘मेरी बात मान लो, तुम्हारी सारी परेशानियों का खात्मा हो जाएगा. मैं तुम्हें पैसे भी दूंगा और प्यार भी. तू रानी बन कर राज करेगी.’’

काव्या को समझते देर न लगी कि उस के सामने बैठा आदमी इनसान नहीं, बल्कि भेडि़या है. उस के सामने रोने, गिड़गिड़ाने और दया की भीख मांगने का कोई फायदा नहीं. उसे तो उसी की भाषा में समझाना होगा. वह मजबूरी भरी भाषा में बोली, ‘‘अगर मैं ने तुम्हारी बात मान ली तो क्या तुम मुझे बख्श दोगे?’’

‘‘बिलकुल,’’ रंजन की आंखों में तेज चमक जागी, ‘‘बस, एक बार मुझे अपने हुस्न के दरिया में उतरने का मौका दे दो.’’

‘‘बस, एक बार?’’

‘‘हां.’’

‘‘ठीक है,’’ काव्या ने धीरे से अपना हाथ उस के हाथ से छुड़ाया, ‘‘मैं तुम्हें यह मौका दूंगी.’’

‘‘कब?’’

‘‘बहुत जल्द…’’ काव्या बोली, ‘‘पर, याद रखो सिर्फ एक बार,’’ कहने के बाद काव्या उठी, फिर रैस्टोरैंट के दरवाजे की ओर चल पड़ी.

‘तुम एक बार मेरे जाल में फंसो तो सही, फिर तुम्हारे पंख ऐसे काटूंगा कि तुम उड़ने लायक ही न रहोगी,’ रंजन बुदबुदाया.

रात के 12 बजे थे. काव्या महानगर से तकरीबन 3 किलोमीटर दूर एक सुनसान जगह पर एक नई बन रही इमारत की 10वीं मंजिल की छत पर खड़ी थी. छत के चारों तरफ अभी रेलिंग नहीं बनी थी और थोड़ी सी लापरवाही बरतने के चलते छत पर खड़ा कोई शख्स छत से नीचे गिर सकता था.

काव्या ने इस समय बहुत ही भड़कीले कपड़े पहन रखे थे जिस से उस की जवानी छलक रही थी. इस समय उस की आंखों में एक हिंसक चमक उभरी हुई थी और वह जंगल में शिकार के लिए निकले किसी चीते की तरह चौकन्नी थी.

अचानक काव्या को किसी के सीढि़यों पर चढ़ने की आवाज सुनाई पड़ी. उस की आंखें सीढि़यों की ओर लग गईं.

आने वाला रंजन ही था. उस की नजर जब कयामत बनी काव्या पर पड़ी, तो उस की आंखों में हवस की तेज चमक उभरी. वह तेजी से काव्या की ओर लपका. पर उस के पहले कि वह काव्या के करीब पहुंचे, काव्या के होंठों पर एक कातिलाना मुसकान उभरी और वह उस से दूर भागी.

‘‘काव्या, मेरी बांहों में आओ,’’ रंजन उस के पीछे भागता हुआ बोला.

‘‘दम है तो पकड़ लो,’’ काव्या हंसते हुए बोली.

काव्या की इस कातिल हंसी ने रंजन की पहले से ही भड़की हुई हवस को और भड़का दिया. उस ने अपनी रफ्तार तेज की, पर काव्या की रफ्तार उस से कहीं तेज थी.

थोड़ी देर बाद हालात ये थे कि काव्या छत के किनारेकिनारे तेजी से भाग रही थी और रंजन उस का पीछा कर रहा था. पर हिरनी की तरह चंचल काव्या को रंजन पकड़ नहीं पा रहा था.

रंजन की सांसें उखड़ने लगी थीं और फिर वह एक जगह रुक कर हांफने लगा.

इस समय रंजन छत के बिलकुल किनारे खड़ा था, जबकि काव्या ठीक उस के सामने खड़ी हिंसक नजरों से उसे घूर रही थी.

अचानक काव्या तेजी से रंजन की ओर दौड़ी. इस से पहले कि रंजन कुछ समझ सके, उछल कर अपने दोनों पैरों की ठोकर रंजन की छाती पर मारी.

ठोकर लगते ही रंजन के पैर उखड़े और वह छत से नीचे जा गिरा. उस की लहराती हुई चीख उस सुनसान इलाके में गूंजी, फिर ‘धड़ाम’ की एक तेज आवाज हुई. दूसरी ओर काव्या विपरीत दिशा में छत पर गिरी थी.

काव्या कई पलों तक यों ही पड़ी रही, फिर उठ कर सीढि़यों की ओर दौड़ी. जब वह नीचे पहुंची तो रंजन को अपने ही खून में नहाया जमीन पर पड़ा पाया. उस की आंखें खुली हुई थीं और उस में खौफ और हैरानी के भाव ठहर कर रह गए थे. शायद उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की मौत इतनी भयानक होगी.

काव्या ने नफरत भरी एक नजर रंजन की लाश पर डाली, फिर अंधेरे में गुम होती चली गई. Best Hindi Kahani

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