मनोहर कहानियां: सर्किट हाउस में महंत की रासलीला

मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र के रीवा शहर में चैत्र नवरात्र के अवसर पर संकटमोचन हनुमान कथा के आयोजन की तैयारियां जोरशोर से चल रही थीं. पहली अप्रैल से 10 अप्रैल तक चलने वाले इस कार्यक्रम के आयोजक करोड़पति बिल्डर अजीत समदडि़या थे.

समदडि़या ग्रुप मध्य प्रदेश का बड़ा व्यापारिक घराना है, जिस के जबलपुर और रीवा में आलीशान होटल, मौल और आधुनिक ज्वैलरी शोरूम हैं. रीवा में भी समदडि़या ग्रुप के मौल ‘समदडि़या गोल्ड’ का शुभारंभ होना था.

इसी मकसद से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के भाजपा के पूर्व सांसद और अयोध्या के राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट से जुड़े रामविलास वेदांती के द्वारा हनुमान कथा का वाचन किया जाना था.

इस आयोजन की जिम्मेदारी समदडि़या ग्रुप द्वारा महंत सीताराम दास को सौंपी गई थी. पूरा शहर इस आयोजन के बैनर और होर्डिंग से पटा हुआ था.

महंत सीताराम दास उत्तर प्रदेश के बहराइच में श्रीराम जानकी मंदिर में महंत की गद्दी संभाले हुए हैं. पिछले 2 महीने से रीवा में कई बार आ कर वह स्थानीय नेताओं, अफसरों और कारोबारियों से मिल कर इस आयोजन की तैयारियों में लगे हुए थे.

पहली अप्रैल, 2022 से शुरू होने वाले इस धार्मिक आयोजन के सिलसिले में महंत सीताराम दास 28 मार्च, 2022 को ही रीवा पहुंच गए थे. वह अपने शिष्यों को साथ ले कर हनुमान कथा और यज्ञ की व्यवस्थाओं को देख रहे थे.

रीवा में महंत के खास शिष्य विनोद पांडे ने उन के ठहरने के लिए सर्किट हाउस राजनिवास बुक करवाया था. सर्किट हाउस के एनेक्सी नंबर 4 में महंत ठहरे हुए थे. शाम होते ही महंत शिष्य विनोद से बोला, ‘‘आज कुछ खास इंतजाम नहीं है क्या?’’

विनोद महंत सीताराम दास की रंगीनमिजाजी से वाकिफ था, लिहाजा उस ने जबाब देते हुए कहा, ‘‘ महाराज, आप निश्चिंत रहें, सब इंतजाम हो जाएगा.’’

विनोद पांडे रीवा जिले के हिस्ट्रीशीटर बदमाशों में शुमार था, जिस पर जिले के कई थानों में 40 से अधिक केस दर्ज हैं. कुछ ही समय पहले विनोद पांडे महंत के रसूख का फायदा उठा कर जमानत पर जेल से बाहर आया था, इस वजह से वह महंत की सेवा में कोई कमी नहीं रखना चाहता था.

विनोद पांडे का जिले में दबदबा था, जिस के चलते लोग मदद के लिए उस के पास पहुंचते थे. कुछ दिनों पहले सतना की रहने वाली 17 साल की किशोरी मालती ने विनोद पांडेय को फोन कर के कालेज में दाखिला दिलाने में मदद मांगी थी. वह विनोद को दादा कहती थी.

उसे रीवा के कालेज में एडमिशन लेना था, लेकिन हो नहीं पा रहा था. इस संबंध में विनोद से बात की तो उस ने भरोसा दिलाया और रीवा आ कर मिलने को कहा था.

महंत के रीवा आने से पहले ही विनोद ने उस दिन सुबह उसी लड़की को फोन मिलाते हुए कहा, ‘‘मालती, तुम्हें कालेज में एडमिशन लेना है तो आज ही रीवा आ कर मिल लो.’’

मालती को कालेज में एडमिशन दिलाने का आश्वासन मिलते ही वह खुशी से उछल पड़ी और विनोद पांडे से बोली, ‘‘दादा, मैं आज ही रीवा आ रही हूं.’’

दोपहर 3 बजे बस से जब वह रीवा पहुंची तो विनोद को फोन कर के कहा, ‘‘दादा, मैं रीवा आ गई हूं, कहां पर मिलना है?’’

‘‘मैं राजनिवास में हूं, यहां महंत सीताराम दासजी ठहरे हुए हैं. तुम भी आटो पकड़ कर यहीं आ जाओ.’’ विनोद ने जाल फेंकते हुए कहा.

इस पर मालती बोली, ‘‘दादा, बसस्टैंड से राजनिवास बहुत दूर है, आटो वाले बहुत पैसे मांग रहे हैं. मेरे पास इतने पैसे भी नहीं हैं.’’

इस पर विनोद बोला, ‘‘अच्छा मालती, तुम सैनिक स्कूल के पास मिलो, मैं लड़के को कार से भेज रहा हूं.’’

विनोद पांडे ने अपने साथ रहने वाले लड़के को पैसे और कार ले कर भेज दिया. इस के बाद मालती कार से राजनिवास तक पहुंच गई. विनोद ने सर्किट हाउस में उसे बाबा सीताराम दास और उस के चेले धीरेंद्र मिश्रा से मिलवाया.

विनोद ने मालती से कहा, ‘‘आज यहीं रुक जाओ, सुबह तुम्हारा काम करा दिया जाएगा.’’

जबरदस्ती पिलाई शराब फिर किया दुष्कर्म

राजनिवास के एनेक्सी नंबर 4 में महंत सीताराम दास ने मालती से कालेज में दाखिला दिलाने का भरोसा दिलाया. बातचीत का दौर चल ही रहा था कि बाबा के कुछ चेले कमरे में आ गए.

चेलों ने एक थैली में से शराब की बोतलें निकालीं तो मालती हैरत में पड़ गई. देखते ही देखते सभी शराब पीने लगे. इसी बीच उस की बड़ी बहन का फोन आ गया तो विनोद ने बहन को कहलवा दिया कि आज काम नहीं हो पाया, इसलिए वह गर्ल्स हौस्टल में सहेली के पास रुकी है.

महंत की नजरें मालती के जिस्म पर ही गड़ी हुई थीं और मालती यहां आ कर अपने को असहज महसूस कर रही थी. तभी शराब का पैग मुंह से लगाते हुए महंत मालती से बोला, ‘‘ये भैरवनाथ का प्रसाद है, इसे पी लो तुम्हारे सब बिगड़े काम चुटकियों में बन जाएंगे.’’

जब मालती ने इनकार किया तो उसे भगवान का प्रसाद कह कर जबरदस्ती शराब पिला दी गई. कुछ देर बाद विनोद और दूसरे साथी मालती से यह कह कर चले गए कि ‘‘बाबाजी की सेवा करो, तुम्हारे सारे काम हो जाएंगे.’’

मालती कुछ समझ पाती, इस के पहले ही विनोद पांडे और महंत के चेलों ने बाहर से दरवाजा बंद कर दिया और एनेक्सी से बाहर निकल गए.

शराब का नशा चढ़ते ही मालती मदहोश हो गई, तभी मौके का फायदा उठा कर राजनिवास के एनेक्सी नंबर 4 में सीताराम दास ने मालती के साथ जबरदस्ती छेड़छाड़ करनी शुरू कर दी.

मालती ने मदहोशी की हालत में भी इस का विरोध करना शुरू किया तो महंत ने पूरी ताकत के साथ उसे पलंग पर गिरा दिया और उस के साथ अपना मुंह काला कर लिया.

दुष्कर्म करने के बाद महंत ने दरवाजा खोलना चाहा तो दरवाजा लौक था. तभी महंत ने मालती के फोन से विनोद को काल कर दरवाजा खुलवाया.

दुष्कर्म करने के बाद आरोपी और उस के साथी उसे नीचे ले आए थे, जहां खाना लगा हुआ था. सभी ने बैठ कर खाना खाया, मालती गुमसुम सी बैठी हुई थी. तभी विनोद पांडे मालती से बोला, ‘‘जो कुछ हुआ, उसे भूल कर एंजौय करो. बाबाजी के रहते तुम्हारा भला ही होगा.’’

मालती का चेहरा फीका पड़ चुका था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह क्या करे. महंत ने मालती को भी जबरदस्ती सलाद खिलाया और अपने चेलों से कहा, ‘‘इसे किसी होटल में छोड़ आओ.’’

महंत का आदेश मिलते ही कुछ चेले उसे छोड़ने कार से निकल पड़े. रास्ते में कार रुकवा कर मालती उतर कर भागने लगी. महाराजा होटल के पास उसे उस के 2 परिचित मिल गए. परिचित लोगों ने जैसे ही मालती से पूछा कि कार मे आए लोग कौन थे, महंत के चेले वहां से भाग निकले.

मालती ने परिचितों को अपनी आपबीती सुनाई तो वे ही उसे रीवा के सिविल लाइन थाने ले गए. इस के बाद मालती ने आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया.

पुलिस ने महंत सहित अन्य आरोपियों पर भादंवि की धारा 342, 504, 323, 328, 376बी, 506 एवं 5/6 पोक्सो एक्ट का मामला दर्ज कर लिया. इस बार तो यह बात मीडिया वालों को भी पता चल गई.

टीवी चैनलों पर महंत की दरिंदगी के समाचार ने पूरे विंध्याचल को हिला कर रख दिया. समदडि़या ग्रुप ने पहली अप्रैल से होने वाले आयोजन को तुरंत रद्द कर दिया.

रीवा पुलिस ने महंत के खास चेले विनोद पांडे को गिरफ्तार कर लिया, जबकि महंत अपने साथियों के साथ फरार हो गया था.

कौन है महंत सीताराम दास

नाबालिग लड़की से रेप की घटना के मुख्य आरोपी महंत सीताराम दास के बचपन का नाम समर्थ त्रिपाठी है, जो रीवा जिले की गुढ़ तहसील के गुढ़वा गांव का रहने वाला है. इस ने संत का चोला ओढ़ने के बाद अपने कई नाम रख लिए थे, जिन में विद्यारण्य त्रिपाठी, अंकित त्रिपाठी, के नाम से भी जाना जाता है.

10वीं कक्षा तक गुढ़ तहसील के गणेश उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में पढ़ाई करने वाले महंत का स्कूली नाम विद्यारण्य त्रिपाठी है.

बचपन से ही उपद्रव करने की प्रवृत्ति के कारण वह स्कूल में पढ़ाई के दौरान लड़ाईझगड़ा करता था. 12वीं में फेल होने के बाद सन 2016 में विद्यारण्य का दाखिला मिलेनियम कालेज भोपाल में पौलिटेक्निक की पढ़ाई के लिए उस के पिता सच्चिदानंद त्रिपाठी ने करा दिया.

सच्चिदानंद त्रिपाठी की माली हालत ठीक नहीं थी. वह भोपाल में प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड है. जबकि महंत की मां भोपाल में टिफिन सेंटर चलाती है. मांबाप एकएक पैसे जोड़ कर अपने एकलौते बेटे के लिए इंजीनियरिंग कराने की कोशिश में लगे थे, परंतु उस की रुचि पढाई में नहीं थी.

वह आए दिन हमउम्र लड़कों के साथ गुंडागर्दी करने लगा और पौलिटेक्निक की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी. भोपाल में गलत संगत में पड़ कर पढ़ाई के बजाय शराब और सिगरेट के नशे का आदी हो गया. इस की आपराधिक गतिविधियो से मांबाप भी परेशान रहने लगे थे.

आपराधिक मामलों से जुड़े होने के कारण इसे परिवार में भी ज्यादा नहीं पसंद किया जाता था. जब इस की असामाजिक गतिविधियां बढ़ गईं तो पिता ने अपने चाचा संत रामविलास वेदांती से बेटे को अपने साथ रखने का आग्रह किया.

श्रीराम जन्मभूमि न्यास के पूर्व सदस्य राम विलास वेदांती की पैदाइश रीवा की है. वह अविवाहित हैं. भाजपा के पूर्व सांसद रामविलास वेदांती सच्चिदानंद के सब से छोटे चाचा हैं.

पारिवारिक होने के चलते उन्होंने इसे अपना लिया. सच्चिदानंद त्रिपाठी के कहने पर संत रामविलास वेदांती द्वारा वर्ष 2018 में गोंडा के किसी मंदिर में विद्यारण्य त्रिपाठी को पुजारी का काम दे दिया, लेकिन अपनी आदत के मुताबिक यह अपनी कारगुजारियों से बाज नहीं आया.

तथाकथित महंत ने उस समय उत्तर प्रदेश के गोंडा में पंचायत चुनाव के दौरान अपने ही एक साथी महंत सम्राट दास पर कातिलाना हमला करवाया था, जिस में वह 6 महीने तक जेल में भी रहा है.

इस के बाद इसे वहां से हटा दिया गया, बाद में बहराइच के वशिष्ठ भवन ट्रस्ट के राम जानकी मंदिर में सेवादार बन कर रहने लगा और अपने आप को वहां का महंत बताने लगा. वह महंत सीताराम के नाम से जाना जाने लगा.

महंत अपने आप को रामविलास वेदांती का नाती बता कर उन के प्रभाव का इस्तेमाल कर बड़ेबड़े अफसरों, राजनेताओं के संपर्क में आ कर लोगों के बीच अपनी धाक जमाने लगा.

हाईप्रोफाइल संतों की मंडली में हो गया शामिल

हाईप्रोफाइल संतों की मंडली में शामिल महंत सीताराम के जिले के प्रभावशाली नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों से घनिष्ठ संबंध हो गए थे.

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तसवीरों से साफ जाहिर होता है कि रीवा के कमिश्नर और पुलिस कप्तान के साथ विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम बाबा के खास चेलों में गिने जाते हैं. यही वजह है कि सारे नियमकायदों को दरकिनार कर इस ढोंगी को रीवा का सर्किट हाउस अलाट हुआ था.

सर्किट हाउस में आमतौर पर राजकीय मेहमानों और अधिकारियों को रुकने की अनुमति होती है, लेकिन महंत के रसूख और अफसरों से संपर्क के कारण एसडीएम ने उसे सर्किट हाउस अलाट कर दिया.

विंध्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित नेता और मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष गिरीश गौतम भी महंत सीताराम दास के भक्तों में शामिल थे.

सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर दोनों की एक तसवीर सामने आई, जिस में गिरीश गौतम बाबा से आशीर्वाद लेते हुए नजर आ रहे हैं. फोटो में पीछे भारत का झंडा भी दिख रहा है. इस से अनुमान लगाया जा सकता है कि तसवीर किसी सरकारी कार्यक्रम या दफ्तर की हो सकती है.

रीवा के एसपी नवनीत भसीन के साथ भी इस तथाकथित बाबा की कई तसवीरें हैं. एक तसवीर में सीताराम दास एसपी को शाल और श्रीफल दे कर तिलक लगा कर सम्मान करता हुआ दिख रहा है.

दबंग पुलिस अधिकारियों में गिने जाने वाले भसीन पाखंडी बाबा के हाथों सम्मानित हो कर बेहद प्रसन्न हुए थे रीवा संभाग के कमिश्नर अनिल सुचारी भी इस बाबा के मुरीद बताए जाते हैं. कमिश्नर की सीताराम दास के साथ कई तसवीरें हैं. एक तसवीर में कमिश्नर भी उसे श्रीफल दे कर सम्मानित करते नजर आ रहे हैं. तसवीर में सुचारी ने मास्क लगा रखा है, जिस से पता चलता है कि यह फोटो कोरोना काल की है और ज्यादा पुरानी नहीं है.

जिले के उद्योगपति और बिल्डर्स भी बाबा के करीबियों में शुमार हैं. जानकारी के मुताबिक सीताराम दास जब भी रीवा आता था, उस से मिलने के लिए इन लोगों की लाइन लगी रहती थी.

इस बार भी वह एक बिल्डर अजीत समदडि़या के बुलावे पर ही रीवा आया था. समदडि़या बिल्डर्स के बनाए एक आलीशान मौल के उद्घाटन के जिस कार्यक्रम के लिए बाबा आया था, उस के लिए बाकायदा निमंत्रण पत्र छपवाए गए थे.

महंत की एक फोटो मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के साथ भी वायरल हुई, जिस में महंत नरोत्तम मिश्रा को भगवत गीता भेंट करता दिख रहा है.

प्रभावशाली लोगों के साथ तसवीर खिंचवाने में माहिर इस ढोंगी महंत के साथ सुरक्षा व्यवस्था भी रहती थी. बाबा जहां कहीं भी जाता था, उस की सुरक्षा में पुलिस के जवान लगे होते थे. ऐसी कई तसवीरें भी मौजूद हैं, जिन में पुलिसकर्मी आरोपी बाबा के आगेपीछे चलते हुए दिख रहे हैं.

मुख्यमंत्री ने सभा में लगाई एसपी और कलेक्टर को फटकार

राज निवास में हुई रेप की घटना के तीसरे दिन रीवा के पीटीएस मैदान में राज्य स्तरीय रोजगार दिवस समारोह के आयोजन में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सभा मंच से ही रीवा के कलेक्टर और एसपी को जम कर फटकार लगाई.

उन्होंने कहा, ‘‘बेटी के साथ अगर किसी ने दुराचार किया तो उसे कुचल दिया जाएगा. कहां हैं कलेक्टर और एसपी. ये बुलडोजर कब काम आएंगे. करो इन को जमींदोज. तोड़ दो ऐसे गुंडों को और बदमाशों को, जो बहन और बेटी पर गलत नजर उठा कर देखते हैं.’’

मुख्यमंत्री के कठोर रवैए को देख कर जिले का पुलिस प्रशासन हरकत में आया.

अश्लील तसवीरें हुईं वायरल

सोशल मीडिया पर वायरल तसवीरें बता रही हैं कि किस तरह भगवा चोला ओढ़ने वाला पाखंडी महंत सीताराम दास बिगड़े काम बनाने के नाम पर लड़कियों की अस्मत से खेल कर रासलीला रचा रहा था. घटना के बाद महंत सीताराम की लड़कियों के साथ कमरे में रंगरलियां मनाने वाली तसवीरें भी वायरल हो गईं.

इन तसवीरों में खुले तौर पर देखा जा सकता है कि महंत अय्याशी का शौकीन है. जिस प्रकार से इन वायरल हो रही तसवीरों में महंत को लड़की के साथ देखा जा रहा है, उस से यह कहना गलत नहीं होगा कि साधु का चोला ओढ़े महंत किसी हैवान से कम नहीं है.

महंत की लड़की के साथ वायरल हो रही यह तसवीर रीवा के किसी होटल की ही है, इस में जो शौपिंग बैग रखा हुआ है वह रीवा के ही एक मौल का है.

इन तसवीरों के वायरल होने के बाद यही कहा जा रहा है कि महंत ने रीवा में अपने स्थानीय चेलों की मदद से अय्याशी का अड्डा बना रखा था और महंत के आपराधिक प्रवृत्ति के स्थानीय चेले ही इस तरह के इंतजाम महंत के लिए बदलबदल कर करते थे. शायद यही वजह है कि महंत का टूर रीवा के लिए जल्दीजल्दी बनता रहता था.

सिंगरौली में नाई की दुकान पर मिला महंत

आसाराम बापू, नारायण साईं, राम रहीम जैसे कई संत धर्म के नाम पर महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ कर चुके हैं, मगर इन घटनाओं से लोग सबक लेने के बजाय पाखंडी धर्मगुरुओं के चंगुल में फंस जाते हैं.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की फटकार के बाद हरकत में आई रीवा पुलिस ने महंत की गिरफ्तारी के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा दिया.

पुलिस को जांच में पता चला कि घटना के बाद महंत को रीवा से भगाने में ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय त्रिपाठी और उस के भांजे अंशुल मिश्रा की भूमिका रही थी.

महंत से जुड़े लोगों से पूछताछ में पुलिस को अहम सुराग मिले कि संजय मिश्रा ने अपने फार्महाउस पर महंत को छिपाया था और अपनी फौर्च्युनर कार से उसे रीवा से सीधी तक छोड़ा गया था.

पुलिस ने संजय त्रिपाठी और उस के भांजे अंशुल को भोपाल से धर दबोचा और रीवा रेंज के आईजी ने सीधी और सिंगरौली जिले की पुलिस को महंत की घेराबंदी करने के निर्देश दिए.

30 मार्च, 2022 की शाम को सिंगरौली के एसडीपीओ राजीव पाठक को मुखबिर के माध्यम से खबर मिली कि महंत सीताराम दास बैढ़न बस स्टैंड के पास घूम रहा है. राजीव पाठक और टीआई यू.पी. सिंह ने पुलिस टीम के साथ महंत को घेर लिया.

दुष्कर्मी महंत बैढ़न बस स्टैंड पर एक नाई के सैलून पर बैठ कर दाड़ीमूंछ और बाल कटवा कर भेष बदल कर भागने की फिराक में था. सिंगरौली पुलिस ने महंत को गिरफ्तार कर लिया और बाद में उसे रीवा पुलिस के हवाले कर दिया.

महंत और सहयोगियों के ठिकानों पर चले बुलडोजर

31 मार्च की शाम कलेक्टर मनोज पुष्प और एसपी नवनीत भसीन बुलडोजर ले कर नगर परिषद गुढ़ के गांव गुड़वा पहुंचे. प्रशासन ने अपनी काररवाई के दौरान 500 मीटर के दायरे में जैमर लगाया था, जिस से किसी को काररवाई की खबर नहीं लग सके.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कहने पर 24 घंटे के भीतर बाबा की अय्याशी का अड्डा बना मकान जमींदोज कर दिया. महंत सीताराम के जिस निर्माणाधीन मकान को जिला प्रशासन ने ध्वस्त किया, वह 50×30 फीट का था. हालांकि इस मकान में महंत सीताराम दास की फूटी कौड़ी तक नहीं लगी है.

दुष्कर्मी महंत अपने बाप की इकलौती संतान था, जिस के मातापिता भोपाल में रह कर गुजरबसर करते हैं.

इसी तरह दुराचार के आरोपी महंत सीताराम दास महाराज को अपने फार्महाउस में छिपाने वाले संजय त्रिपाठी के भी रेलवे ब्रिज के पास बन रहे शौपिंग मौल को पुलिस ने जमींदोज कर दिया है. संजय त्रिपाठी अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज का राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया जा रहा है.

संजय त्रिपाठी को रेपकांड मामले में सहआरोपी बनाया गया है. पुलिस पूछताछ में इस बात का खुलासा हुआ है कि रीवा के राजनिवास सर्किट हाउस में किशोरी के साथ बलात्कार की घटना को अंजाम देने के बाद महंत सीताराम दास महाराज उर्फ समर्थ त्रिपाठी को फरारी के दौरान संजय त्रिपाठी ने अपने फार्महाउस में शरण दी थी और इस के बाद सीधी तक पहुंचाने में भी मदद की थी.

पूरी काररवाई के दौरान रीवा कलेक्टर मनोज पुष्प और एसएसपी नवनीत भसीन के निर्देश पर गठित टीम में एडीएम शैलेंद्र सिंह, एसडीएम अनुराग तिवारी, तहसीलदार सौरभ द्विवेदी, गुढ़ थानाप्रभारी आराधना सिंह, गोविंदगढ़ थानाप्रभारी मृगेंद्र सिंह,

सगरा थानाप्रभारी ऋषभ सिंह बघेल, रायपुर कचुर्लियान थानाप्रभारी पुष्पेंद्र सिंह यादव सहित नगर पंचायत गुढ़ का अमला मौजूद रहा.

पुलिस ने महंत को न्यायालय में पेश कर रिमांड पर ले कर पूछताछ की तो महंत के साधु से शैतान बनने की पूरी कहानी सामने आ गई.

ब्राह्मण समाज के प्रदेश संयोजक अंशुल मिश्रा के कहने पर ही विनोद पांडेय के नाम से सर्किट हाउस में एनेक्सी नंबर 4 को बुक किया गया था. अंशुल मिश्रा संजय त्रिपाठी का भांजा है.

विनोद ने ही महंत सीताराम महाराज के लिए शराब पार्टी का इंतजाम किया था. महंत के साथ रहने वाला मोनू मिश्रा चखना आदि ले कर आया था. वारदात के बाद महंत के चेले मोनू मिश्रा ने रीवा के दुबारी से भितरी तक महंत को कार से छोड़ा था.

इस के बाद तौफीक अंसारी नाम का शख्स अपनी बाइक से महंत को भितरी से सीधी के रामपुर नैकिन तक ले कर गया. तौफीक ने महंत से 10 हजार रुपए ले कर कपड़े दिए, फिर सिंगरौली की बस में बिठा दिया.

महंत सीताराम महाराज का चेला धीरेंद्र मिश्रा महंत के हर गलत काम से शुरू से अंत तक साथ रहा. पुलिस ने रेप कांड के मुख्य आरोपी महंत सीताराम दास महाराज के अलावा विनोद पांडेय, संजय त्रिपाठी, अंशुल मिश्रा, तौफीक अंसारी को भी गिरफ्तार कर लिया गया है.

कथा लिखे जाने तक मोनू मिश्रा व धीरेंद्र मिश्रा फरार थे, जिन्हें पकड़ने के लिए पुलिस संभावित ठिकानों पर दबिश डाल रही थी.

पुलिस ने सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया.

रीवा की इस घटना ने तथाकथित धर्मगुरु और संत का चोला ओढ़े पाखंडियों की काली करतूत को उजागर कर दिया है और लोगों को सचेत भी किया है कि वे चमत्कारों के चक्कर में अपनी बहनबेटियों की इज्जत को दांव पर न लगाएं.

—कथा मीडिया रिपोर्ट पर आधारित. कथा में मालती परिवर्तित नाम है…

इश्क का खेल- भाग 1: क्या हुआ था निहारिका के साथ

निहारिका दिल्ली में सीबीआई ब्रांच में है. इंस्पैक्टर रुस्तम की असिस्टैंट, बहुत ही तेज दिमाग… इंस्पैक्टर रुस्तम के पास एक ही घर के 2 केस आते हैं. केस करनाल का है, जो काफी समय से उलझा हुआ है. एक 26-27 साल की शादीशुदा श्रेया ने खुदकुशी कर ली है. श्रेया का पति सुजल आस्ट्रेलिया में रहता है, लेकिन श्रेया की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चलता है कि वह 2 महीने के पेट से थी. श्रेया की खुदकुशी के 5 महीने बाद उस की सास यानी सुजल की मां भी खुदकुशी कर लेती हैं, लेकिन दोनों का खुदकुशी का तरीका एक ही है यानी पंखे से लटक कर मरना. दोनों की खुदकुशी करने का वही तकरीबन आधी रात का समय. यह जान कर निहारिका सोचती है कि कहीं तो कुछ गड़बड़ है.

दोनों खुदकुशी एक सी और सुजल एक साल से घर नहीं आया, फिर श्रेया पेट से कैसे हो सकती है? निहारिका बोली, ‘‘सर, सुजल एक साल से घर नहीं आया, फिर श्रेया…’’ इंस्पैक्टर रुस्तम ने कहा, ‘‘मैं भी वही सोच रहा हूं. मुझे लगता है कि इस केस को जानने के लिए करनाल जाना पड़ेगा. लेकिन मेरी टांग में फै्रक्चर भी अभी होना था. मैं वहां जा कर भी कुछ नहीं कर पाऊंगा.’’ निहारिका ने कहा, ‘‘सर, आप परमिशन दें, तो मैं जाना चाहूंगी.’’ ‘‘तुम अकेली? कोई दिक्कत तो नहीं होगी? सोच लो…’’ ‘‘नहीं सर, मुझे कोई परेशानी नहीं होगी.’’ ‘‘ठीक है, तुम जाने की तैयारी करो. और हां, मुझे हर पल की खबर देते रहना. यह मेरी पिस्टल अपने पास रख लो, मुसीबत में इस से मदद मिलेगी. मैं अभी ट्रेन की टिकट बुक कराता हूं, तुम निकलने की तैयारी कर लो.’’ ‘‘ठीक है सर.’’ इंस्पैक्टर रुस्तम ने सुबह की ट्रेन की टिकट बुक करवा दी. निहारिका करनाल जाने की तैयारी करती है.

अब उसे अकेले ही वहां काम करना है. इंस्पैक्टर रुस्तम कहते हैं कि वे रोज उस से फोन पर बात कर के सारी डिटेल्स जानते रहेंगे और सलाहमशवरा भी देते रहेंगे. केस फाइल जब निहारिका को दी जाती है, तो वह उस में दिए गए एक नंबर पर फोन करती है. उधर से आवाज आती है, ‘हैलो, कौन?’ ‘‘क्या मैं सुजल से बात कर सकती हूं?’’ ‘जी, बोल रहा हूं, आप कौन?’ ‘‘मैं सीबीआई से सबइंस्पैक्टर निहारिका बोल रही हूं. आप ने जो केस फाइल किया था, उस के बारे में कुछ डिस्कस करनी थी.’’ ‘जी जरूर… मैडम, जल्दी से जल्दी  मेरी मां और बीवी के कातिल को पकडि़ए. उस में अगर मैं कोई हैल्प कर सकता हूं तो बताएं… अभी तो मैं इंडिया आ नहीं सकता. कोरोना की वजह से सब फ्लाइट कैंसिल कर दी गई हैं.’

‘‘आप इंडिया कब आए थे और आप को किसी पर कोई खास शक…? आप की पत्नी की रिपोर्ट बताती है कि जिस समय उन का कत्ल हुआ, वे पेट से थीं. और दोनों कत्ल भी शायद एक ही शख्स ने किए हैं, क्योंकि दोनों औरतों को पहले गला घोंट कर मारा गया और उस के बाद उन्हें पंखे से लटका कर खुदकुशी का नाम दिया गया.’’ ‘यही बात तो मुझे भी कचोट रही है. मैं अपनी वाइफ के चालचलन पर शक करने का तो सोच भी नहीं सकता… या तो किसी ने उस के साथ कुछ गलत किया है, जो वह बरदाश्त नहीं कर सकी और न ही किसी से अपना दुख कह सकी, शायद इसलिए उस ने खुदकुशी कर ली. मैं एक साल पहले तब इंडिया आया था, जब मेरी मां को हार्ट अटैक आया था.

‘सोचिए, जिस इनसान के 2 सहारे चले गए हों और वह उन के आखिरी समय पर पहुंच भी न पाए, क्या बीत रही होगी उस पर. पापा वहां अकेले कैसे पहाड़ जैसा दुख झेल रहे होंगे, बिलकुल टूट गए होंगे.’ ‘‘आप चिंता मत कीजिए, हम जल्दी ही कातिल का पता लगाएंगे.’’ जब निहारिका को पक्का हो गया कि  सुजल एक साल से घर नहीं आया है और श्रेया की रिपोर्ट प्रैगनैंसी की है, तो उस की छठी इंद्री जाग जाती है. वह करनाल के लिए निकल पड़ती है. करनाल जा कर सब से पहले निहारिका सुजल के पापा आशीष बजाज के घर में नौकरी हासिल करती है, ताकि वह घर के अंदर से कुछ सुबूत ढूंढ़ सके. ‘‘निहारिका, तुम इस छोटी उम्र में इस तरह होम केयर की नौकरी क्यों करती हो? तुम्हारे घर में और कोई नहीं है क्या काम करने वाला?’’ आशीष बजाज  ने पूछा. ‘‘नहीं सर, मेरा कोई नहीं है. मेरे पति की एक हादसे में मौत हो चुकी है.

प्यार में कंजूसी- भाग 1: क्या थी शुभा की कहानी

कुछ दिन से मन में बड़ी उथल- पुथल है. मन में कितना कुछ उमड़घुमड़ रहा है जिसे मैं कोई नाम नहीं दे पा रहा हूं. उदासी और खुशी के बीच की अवस्था को क्या कहा जाता है समझ नहीं पा रहा हूं. शायद, स्तब्ध सा हूं, कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं हूं. चाहूं तो खुश हो सकता हूं क्योंकि उदास होने की भी कोई खास वजह मेरे पास नहीं है.

‘‘क्या बात है पापा, आप चुपचाप से हैं?’’

‘‘नहीं तो, ऐसा तो कुछ नहीं…बस, यही सोच रहा हूं कि पानीपत जाऊं या नहीं.’’

‘‘सवाल ही पैदा नहीं होता. चाचीचाचा ने एक बार भी ढंग से नहीं बुलाया. हम क्या बेकार बैठे हैं जो सारे काम छोड़ कर वहां जा बैठें…इज्जत करना तो उन्हें आता ही नहीं है और बेइज्जती कराने का हमें कोई शौक नहीं है.’’

‘‘मैं उस बेवकूफ के बारे में नहीं सोच रहा. वह तो नासमझ है.’’

‘‘नासमझ हैं तो इतने चुस्त हैं अगर समझदार होते तो पता नहीं क्याक्या कर जाते…पापा, आप मान क्यों नहीं जाते कि आप के भाई ने आप की अच्छाई का पूरापूरा फायदा उठाया है. बच्चों को पढ़ाना था तो आप के पास छोड़ दिया. आज वे चार पैसे कमाने लगे तो उन की आंखें ही पलट गईं.’’

‘‘मुझे खुशी है इस बात की. छोटे से शहर में रह कर वह बच्चों को कैसे पढ़ातालिखाता, सो यहां होस्टल में डाल दिया.’’

‘‘और घर का खाना खाने के लिए महीने में 15 दिन वे हमारे घर पर रहते थे. कभी भी आ धमकते थे.’’

‘‘तो क्या हुआ बेटा, उन के ताऊ का घर था न. उन के पिता का बड़ा भाई हूं मैं. अगर मेरे घर पर मेरे भाई के बच्चे कुछ दिन रह कर खापी गए तो ऐसी क्या कमी आ गई हमारे राशनपानी में? क्या हम गरीब हो गए?’’

‘‘पापा, आप भी जानते हैं कि मैं क्या कहना चाह रहा हूं. किसी को खिलाने से कोई गरीब नहीं हो जाता, यह आप भी जानते हैं और मैं भी. सवाल यह नहीं है कि वे हमारे घर पर रहे और हमारे घर को पूरे अधिकार से इस्तेमाल करते रहे. सवाल यह है कि दोनों बच्चे लंदन से वापस आए और हम से मिले तक नहीं. दोनों की शादी हो गई, उन्होंने हमें शामिल तक नहीं किया और अब गृहभोज कर रहे हैं तब हमें बुला लिया. यह भी नहीं कहा कि 1-2 दिन पहले चले आएं. बस, कह दिया…रात के 8 बजे पार्टी दे रहे हैं… आप सब आ जाना. पापा, यहां से उन के शहर की दूरी कितने घंटे की है, यह आप जानते हैं न. कहां रहेंगे हम वहां? रात 9 बजे खाना खाने के बाद हम कहां जाएंगे?’’

‘‘उस के घर पर रहेंगे और कहां रहेंगे. कैसे बेमतलब के सवाल कर रहे हो तुम सब. तुम्हारी मां भी इसी सवाल पर अटकी हुई है और तुम भी. हमारे घर पर जब कोई आता है तो रात को कहां रहता है?’’

‘‘हमारे घर पर जो भी आता है, वह हमारे सिरआंखों पर रहता है, हमारे दिल में रहता है और हमारे घर में शादी जैसा उत्सव जब होता है तब हम बड़े प्यार से चाचाचाची को बुला कर अपनी हर रस्म में उन्हें शामिल करते हैं. मां हर काम में चाचीचाचा को स्थान देती हैं. मेहमानों को बिस्तर पर सुलाते हैं और खुद जमीन पर सोेते हैं हम लोग.’’

दनदनाता हुआ चला गया अजय. मैं समझ रहा हूं अजय के मनोभाव. अजय उन्हें अपना भाई समझता था. नरेन और महेन को चचेरा भाई समझा कब था जो उसे तकलीफ न होती. अजय की शादी जब हुई तो नईनवेली भाभी के आगेपीछे हरपल डोलते रहते थे नरेन और महेन.

दोनों बच्चे एमबीए कर के अच्छी कंपनियों में लग गए और वहीं से लंदन चले गए. जब जा चुके थे तब हमें पता चला. विदेश जाते समय मिल कर भी नहीं गए. सुना है वे लाखों रुपए साल का कमा रहे हैं…मुझे भी खुशी होती है सुन कर, पर क्या करूं अपने भाई की अक्ल का जिसे रिश्ते का मान रखना कभी आया ही नहीं.  एकएक पैसा दांत से कैसे पकड़ा जाता है, उस ने पता नहीं कहां से सीखा है. एक ही मां के बच्चे हैं हम, पर उस की और मेरी नीयत में जमीनआसमान का अंतर है. रिश्तों को ताक पर रख कर पैसा बचाना मुझे कभी नहीं आया. सीख भी नहीं पाया क्योंकि मेरी पत्नी ने कभी मुझे ऐसा नहीं करने दिया. नरेनमहेन को अजय जैसा ही मानती रही मेरी पत्नी. पूरे 6 साल वे दोनों हमारे पास रहे और इन 6 सालों में न जाने कितने तीजत्योहार आए. जैसा कपड़ा शुभा अजय के लिए लाती वैसा ही नरेन, महेन का भी लाती. घर का बजट बनता था तो उस में नरेनमहेन का हिस्सा भी होता था. कई बार अजय की जरूरत काट कर हम उन की जरूरत देखा करते थे.

हमारी एक ही औलाद थी लेकिन हम ने सदा 3 बेटों को पालापोसा. वे दोनों इस तरह हमें भूल जाएंगे, सोचा ही नहीं था. भूल जाने से मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि उन्होंने मेरा कर्ज नहीं चुकाया. सदा देने वाले मेरे हाथ आज भी कुछ देते ही उन्हें, पर जरा सा नाता तो रखें वे लोग. इस तरह बिसरा दिया है हमें जैसे हम जिंदा ही नहीं हैं.  शुभा भी दुखी सी लग रही है.   बातबात पर खीज उठती है. जानता हूं उसे बच्चों की याद आ रही है. किसी न किसी बहाने से उन का नाम ले रही है, खुल कर कुछ कहती नहीं है पर जानता हूं नरेनमहेन से मिलने को उस का मन छटपटा रहा है. दोनों ने एक बार फोन पर भी बात नहीं की. अपनी बड़ी मां से कुछ देर बतिया लेते तो क्या फर्क पड़ जाता.

‘‘कितना सफेद हो गया है इन दोनों का खून. विदेश जा कर क्या इंसान इतना पत्थर हो जाता है?’’

‘‘विदेश को दोष क्यों दे रही हो. मेरा अपना भाई तो देशी है न. क्या वह पत्थर नहीं है?’’

‘‘पत्थर नहीं, इसे कहते हैं प्रैक्टिकल होना. आज सब इतने ज्यादा मतलबी हो गए हैं कि हम जैसा भावुक इंसान बस ठगा सा रह जाता है. हम लोग प्रैक्टिकल नहीं हैं न इसीलिए बड़ी जल्दी बेवकूफ बन जाते हैं.’’

‘‘क्या करें हम? हमारा दिल यह कैसे भूल जाए कि रिश्तों के बिना मनुष्य कितना अपाहिज, कितना बेसहारा है. जहां दो हाथ काम आते हैं वहां रुपएपैसे काम नहीं आ सकते.’’

‘‘आप यह ज्ञान मुझे क्यों समझा रहे हैं? रिश्तों को निभाने में मैं ने कभी कोई कंजूसी नहीं की.’’

‘‘इसलिए कि अगर एक इंसान बेवकूफी करे तो जरूरी नहीं कि हम भी वही गलती करें. जीवन के कुछ पल इतने मूल्यवान होते हैं जो बस एक ही बार जीवन में आते हैं. उन्हें दोहराया नहीं जा सकता. गया पल चला जाता है…पीछे यादें रह जाती हैं, कड़वी या मीठी.

‘‘नरेनमहेन हमारे बच्चे हैं. हम यह क्यों न सोचें कि वे मासूम हैं, जिन्हें रिश्ता निभाना ही नहीं आया. हम तो समझदार हैं. उन का सुखी परिवार देखने की मेरी तीव्र इच्छा है जिसे मैं दबा नहीं पा रहा हूं. अजय का गुस्सा भी जायज है. मैं मानता हूं शुभा, पर तुम्हीं सोचो, हफ्ते भर में दोनों लौट भी जाएंगे. फिर मिलें न मिलें. कौन जाने हमारी जीवनयात्रा कब समाप्त हो जाए.’’

मेरा स्वर अचकचा सा गया. मैं दिल का मरीज हूं. आधे से ज्यादा हिस्सा काम ही नहीं कर रहा. कब धड़कना बंद कर दे क्या पता. मैं दोनों बच्चों से बहुत प्यार करता हूं. चाहता हूं उन की नईनई बसी गृहस्थी देख लूं. उन बच्चियों का क्या कुसूर. उन्हें मेरे बारे में क्या पता कि मैं कौन हूं. उन के ताऊताई उन से कितनाममत्व रखते हैं, उन्हें तभी पता चलेगा जब वे देखेंगी हमें और हमारा आशीर्वाद पाएंगी.

‘‘बस, मैं जाना चाहता हूं. वह मेरे भाई का घर है. वहीं रात काट कर सुबह वापस आ जाऊंगा. नहीं रहूंगा वहां अगर उस ने नहीं चाहा तो…फुजूल मानअपमान का सवाल मत उठाओ. मुझे जाने दो. इस उम्र में यह कैसा व्यर्थ का अहं.’’

‘‘रात में सोएंगे कहां. 3 बैडरूम का उन का घर है. 2 में बच्चे और 1 में देवरदेवरानी सो जाएंगे.’’

प्रेम का निजी स्वाद: महिमा की जिंदगी में क्यों थी प्यार की कमी

Romantic Story In Hindi

मनोहर कहानियां: अय्याशी में गई जान

27 फरवरी, 2022 को सुबह ही भाई सोनू कुमार का नंबर देखते ही सोनिया चहक उठी. उस ने फोन उठाया तो सोनू ने कहा, ‘‘आज रात मैं ने नीशू और उस की मां जयंती की हत्या कर दी. उन दोनों की लाशें घर में पड़ी हुई हैं. मैं बच्चों को साथ ले कर तेरे पास आ रहा हूं.’’

भाई का फोन रिसीव करते ही उस की खुशियां काफूर हो गईं. इस से पहले कि सोनिया उस से कुछ बात कर पाती, सोनू ने फोन काट दिया.

भाई की बात सुनते ही उस का माथा घूम गया. उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उस का भाई जो कह रहा था, वह सच था या वह मजाक कर रहा था.

भाई की बात सुनते ही सोनिया सदमे में पहुंच गई. उस ने उस के बाद कई बार भाई के मोबाइल पर काल लगाने की कोशिश की, लेकिन उस ने रिसीव नहीं की. उस के बाद सच्चाई जानने के लिए उस ने अपने ममेरे भाई रामपाल को फोन कर भाई सोनू के घर की स्थिति जानने के लिए भेजा.

ममेरा भाई रामपाल उस के घर पहुंचा तो घर पर बाहर से ताला लगा हुआ था. उस ने उस के पड़ोसियों से सोनू के बारे में जानकारी लेनी चाही तो किसी से भी कुछ जानकारी नहीं मिल पाई. उस के बाद रामपाल सिंह सीधे जसपुर कोतवाली पहुंचा.

कोतवाली पहुंचते ही उस ने कोतवाल जे.एस. देऊपा के सामने सारी हकीकत रख दी.

एक घर में दोहरे हत्याकांड की बात सुनते ही कोतवाल देऊपा पुलिस टीम के साथ जसपुर कस्बे में मोहल्ला नत्था सिंह पंडों वाले कुएं के पास स्थित सोनू के घर पहुंचे और उन्होंने उस के बंद घर का ताला तुड़वाया.

पुलिस जैसे ही घर के अंदर घुसी, वहां का दृश्य दिल को दहलाने वाला था. एक कमरे में सोनू की 35 वर्षीय पत्नी नीशू की खून से लथपथ लाश पड़ी हुई थी. लाश के पास ही रक्तरंजित पाटल (गंडासा) पड़ा हुआ था.

दूसरे कमरे में उस की 55 वर्षीय सास जयंती की चारपाई पर लाश पड़ी हुई थी. जयंती का शव रजाई से ढंका हुआ था. दोनों की एक ही तरह पाटल से काट कर हत्या की गई थी. दोनों के गरदन और शरीर पर पाटल के कई निशान मौजूद थे.

दोनों को मौत की नींद सुलाने के बाद सोनू घर से फरार हो गया था. इस दोहरे हत्याकांड की जानकारी लगते ही पूरे शहर में सनसनी फैल गई. जिस ने भी सुना, वह घटना की जानकारी लेने के लिए सोनू के घर पहुंचने लगा.

देखते ही देखते वहां पर लोगों का हूजूम उमड़ पड़ा. इस घटना की सूचना पर एसपी चंद्रमोहन सिंह, सीओ वीर सिंह भी जानकारी लेने के लिए घटनास्थल पर पहुंचे.

पुलिस ने ही इस घटना की जानकारी सोनू की ससुराल जिला मुरादाबाद, गांव टांडा अफजल ठाकुरद्वारा निवासी वीरसिंह की दी. अपनी पत्नी और बेटी की हत्या की सूचना पाते ही वीर सिंह ऊधमसिंह नगर के कस्बा जसपुर पहुंच गए.

पुलिस ने घटनास्थल की बारीकी से जांचपड़ताल करने के बाद सोनू के बारे में जानकारी ली. इस से पहले कि पुलिस सोनू के पास पहुंच पाती, वह अपने तीनों बच्चों को अपनी बहन सोनिया के पास छोड़ कर फरार हो गया था.

पुलिस पूछताछ के दौरान पता चला कि सोनू की नीशू के साथ दूसरी शादी हुई थी. उस की पहली पत्नी उसे छोड़ कर चली गई थी. सोनू नेटवर्किंग करता था. जिस में वह युवकयुवतियों को भी अपने साथ जोड़ता था. उसी काम के चलते उस ने कई युवतियों से अवैध संबंध बना रखे थे.

सोनू की बीवी नीशू उस की इन हरकतों से परेशान थी. जिस के कारण वह अपनी पत्नी से नफरत करने लगा था. उसी नफरत के चलते उस ने अपनी पत्नी नीशू और सास की हत्या कर दी होगी.

सोनू कुमार के बारे में विस्तृत जानकारी जुटा कर पुलिस ने सासबहू दोनों की लाशों का पंचनामा भर कर उन्हें पोस्टमार्टम हेतु भिजवा दिया था. इस डबल मर्डर मामले के जल्दी खुलासे के लिए काशीपुर एसपी चंद्रमोहन सिंह ने एसओजी टीम को भी लगा दिया.

आरोपी सोनू की गिरफ्तारी के लिए एसओजी की कई टीमें गठित की गईं. एसओजी प्रभारी कमलेश भट्ट ने सोनू के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगाया तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला.

उसी दौरान पता चला कि सोनू बिजनौर के धामपुर कस्बे में देखा गया था. लेकिन मोबाइल बंद होने के कारण पुलिस उस की लोकेशन का पता नहीं कर पा रही थी.

पुलिस जांचपड़ताल के दौरान सोनू की बहन सोनिया ने पुलिस को बताया कि सोनू ने उस से बात करते वक्त कहा था कि उस ने अपनी पत्नी और सास को खत्म कर दिया है, अब वह स्वयं भी आत्महत्या करने जा रहा है. उस के बाद से ही उस का मोबाइल बंद आ रहा है.

इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने सोचा कि कहीं सोनू ने कुछ जहरीला पदार्थ खा कर आत्महत्या तो नहीं कर ली. उस के बाद पुलिस ने उसे हरसंभव स्थान पर खोजा, लेकिन उस का कहीं भी अतापता नहीं लग सका.

पुलिस को जानकारी मिली थी कि सोनू अपनी बीवी और सास की हत्या कर अपने बच्चों को एक कार में बैठा कर अमरोहा पहुंचा था. लेकिन वह कार किस की थी, इस बात की जानकारी किसी को नहीं थी. पुलिस ने हरसंभव स्थान पर उस की तलाश की, लेकिन उस का कहीं भी अतापता नहीं चल सका.

रेलवे ट्रैक पर मिली लाश

उसी दौरान 28 फरवरी, 2022 को मृतका नीशू के भाई सौरभ कुमार ने सोनू कुमार के खिलाफ जसपुर कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

सोनू के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होते ही एसओजी टीम एक्शन में आ गई. पुलिस की कई टीमें जिला बिजनौर, मुरादाबाद, अमरोहा आदि क्षेत्रों में रवाना हुईं, लेकिन कहीं से भी उस की लोकेशन ट्रेस नहीं हो पाई.

पुलिस सोनू की तलाश में इधरउधर भटक रही थी, उसी दौरान पहली मार्च को गाजियाबाद रेलवे स्टेशन के नजदीक रेलवे ट्रैक पर रेलवे पुलिस फोर्स (आरपीएफ) के जवानों को एक व्यक्ति की लाश पड़ी मिली. आरपीएफ के जवानों ने उस की सूचना कविनगर थानाप्रभारी आनंद प्रकाश मिश्र को दी.

लाश की सूचना पर कवि नगर थाना पुलिस घटनास्थल पर पहुंची. पुलिस ने पहुंचते ही मृतक की जेब की तलाशी ली तो उस में एक पौकेट डायरी और आधार कार्ड मिला. उस की जेब से एक सुसाइड नोट भी मिला, जिस में लिखा था, ‘मैं सोनू कुमार नीशू की मौत का जिम्मेदार हूं.’

आधार कार्ड के माध्यम से मृतक की पहचान जसपुर, उत्तराखंड निवासी सोनू के रूप में हुई.

कविनगर थानाप्रभारी आनंद प्रकाश मिश्र ने उत्तराखंड एसओजी प्रभारी कमलेश भट्ट को फोन पर मामले की जानकारी दी.

इस जानकारी के मिलते ही जसपुर कोतवाल जे.एस. देऊपा ने मृतक सोनू के घर वालों को इस की सूचना दी. सोनू के आत्महत्या करने की जानकारी मिलते ही उस के घर वाले और जसपुर पुलिस तुरंत ही गाजियाबाद पहुंची, जहां पर पुलिस ने अपनी काररवाई करते हुए उस की लाश उस की बहनों को सौंप दी.

सोनू के खत्म होते ही एक परिवार पूरी तरह से खत्म हो गया. मृतक सोनू के तीनों बच्चे उस की बहन के पास अमरोहा में थे. सोनू ने अपने सुसाइड नोट में लिखा, ‘नीशू, मैं तुझे बहुत ही प्यार करता था.’

फिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक दोनों के बीच की डोर इतनी कमजोर पड़ गई कि सोनू को इतना बड़ा कदम उठाने को मजबूर होना पड़ा.

इस की जो हकीकत सामने आई, वह इस प्रकार थी.

उत्तराखंड के जिला ऊधमसिंह नगर का एक कस्बा है जसपुर. इसी कस्बे में ठाकुर मंदिर के ठीक पीछे स्थित मोहल्ले में रहता था कैलाशनाथ का परिवार.

कैलाशनाथ के 5 बच्चे थे. 4 बेटियां और इकलौता बेटा निखिल उर्फ सोनू कुमार. कैलाशनाथ ने समय से ही सभी बच्चों की शादी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली थी.

बच्चों की शादी होने के बाद ही कैलाशनाथ और उन की पत्नी की मौत हो गई थी. मांबाप की मौत के बाद सोनू अपनी बीवी राजवती के साथ रह रहा था.

सोनू की शादी अब से लगभग 10 साल पहले जिला बिजनौर के गांव झालू निवासी राजवती से हुई थी. सोनू शुरू से ही तेजतर्रार था. राजवती के साथ शादी करने के कुछ समय तक तो उन दोनों के बीच सब कुछ सही रहा था. लेकिन फिर सोनू उसे परेशान करने लगा था.

सोनू शुरू से ही आवारा किस्म का युवक था. वह कामधंधा कुछ नहीं करता था. शादी के बाद उस के खर्चे बढ़े तो वह परेशान रहने लगा. घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए राजवती ने कई बार उस से कुछ काम तलाशने को कहा. लेकिन उसे कहीं भी कोई काम नहीं मिला. उस के बाद वह राजवती के पास रखे पैसे भी अपने खर्च के लिए ले लेता था.

उसी बीच राजवती एक बच्ची स्पर्श की मां भी बन गई थी. बच्ची के घर में आने के बाद आए दिन दोनों के बीच में खटपट रहने लगी थी. मियांबीवी में मनमुटाव के चलते ही कई बार राजवती अपने मायके भी चली गई थी.

घर में विवाद ज्यादा बढ़ा तो जल्दी ही दोनों के बीच तलाक की नौबत आ गई थी. उसी सब के चलते राजवती एक दिन अपने मायके चली गई, फिर वापस नहीं आई.

सोनू की हरकतों से आजिज आ कर राजवती के मायके वालों ने सोनू पर मुकदमा डाल दिया था, जिस के कारण उसे जेल की हवा भी खानी पड़ी थी.

जेल से आने के बाद वह कुछ ज्यादा ही परेशान रहने लगा था. उस का सब से बड़ा कारण था उस की बेटी स्पर्श, जो राजवती के मायके जाने के बाद उसी के पास रह रही थी. राजवती के मायके वालों ने काफी कोशिश की कि किसी भी तरह से दोनों के संबंध बने रहें. लेकिन सोनू अपनी हरकतों से बाज नहीं आया.

उस की हरकतों से परेशान हो कर राजवती ने कोर्ट के माध्यम से उस से तलाक ले लिया. बीवी से तलाक लेने के बाद वह अकेला पड़ गया था. उस की सभी बहनों की शादी हो चुकी थी. उस की बेटी स्पर्श उसी के साथ थी, जिस की परवरिश करना उस के लिए टेढ़ी खीर हो रही थी.

उसी मुसीबत के दौर में सोनू की मुलाकात बिजनौर निवासी पंकज राजपूत से हुई. पंकज राजपूत एक मार्केटिंग कंपनी में एरिया मैनेजर था. पंकज के संपर्क में आते ही उसे उसी कंपनी में सेल्स एग्जीक्यूटिव की नौकरी मिल गई. लेकिन उस की नौकरी ऐसी नहीं थी, जिस से उसे हर माह बंधाबंधाया वेतन मिल सके. वह एक मार्केटिंग कंपनी थी, जिस में कंपनी में टिके रहने के लिए एक टारगेट पूरा करना होता था.

उस मार्केटिंग कंपनी का औनलाइन काम था, जिस में कंपनी का काम करते हुए खुद अपना भविष्य बनाना होता था. अपना कैरियर बनाने के लिए सोनू को युवकयुवतियों से संपर्क करने के लिए दिनरात एक करना पड़ा.

सोनू हर रोज घर से निकलता और नएनए ग्राहकों की तलाश करता. कुछ ही दिनों में उस की मेहनत रंग लाई. जल्दी ही उस के कई युवकयुवतियों से संपर्क बन गए थे.

सोनू शुरू से ही ऐशोआराम की जिंदगी जीने वाला शख्स था. वह इस से पहले कई जगह काम कर चुका था. लेकिन वह कहीं पर भी ज्यादा दिन नहीं टिक पाता था.

मार्केटिंग का काम चालू होते ही उस के घर पर युवकयुवतियों का आनाजाना शुरू हो गया था. उसी नेटवर्किंग के काम के चलते वह महिलाओं के करीब हो जाता. उसी काम के चलते उस की मुलाकात नीशू से हुई.

सोनू की प्रेम दीवानी हो गई नीशू

नीशू देखनेभालने में सुंदर थी. नीशू ने इंटरमीडिएट पास कर लिया था. उस के बाद वह भी किसी जौब की तलाश में थी.

कुछ अनौपचारिक मुलाकातों के बाद ही सोनू ने नीशू को नौकरी दिलाने का झांसा दे कर अपने जाल में फंसा लिया था. फिर धीरेधीरे अपने दिल की पीड़ा उस के सामने रखते हुए उस के दिल में भी अपने प्रति प्यार जगा दिया था.

सोनू के संपर्क में आने के बाद नीशू उस की प्रेम दीवानी हो गई. सोनू ने नीशू के सामने अपनी पिछली जिंदगी पर परदा डालते हुए बताया कि वह अभी कुंवारा ही है. जिस के बाद नीशू पूरी तरह से अपनी जिंदगी की बागडोर उस के हाथ में थमाने पर मजबूर हो गई थी.

नीशू के संपर्क में आने के बाद सोनू भी उस के साथ अपनी जिंदगी गुजारने के सपने संजोने लगा. दोनों के बीच प्रेम प्रसंग चालू होते ही सोनू कई बार नीशू को अपने साथ अपने घर पर भी ले जाता था.

उस दौरान कई बार नीशू ने सोनू से उस की नौकरी लगाने की बात कही तो उस ने साफ शब्दों में कहा कि अब उसे नौकरी की चिंता करने की जरूरत नहीं. वह जल्दी ही उस के साथ शादी कर के अपना घर बसाते ही उसे नौकरी भी दिला देगा.

इस के बाद नीशू पूरी तरह से निश्चिंत हो गई थी. सोनू ने नीशू से प्रेम जताते हुए उस के साथ अवैध संबंध भी स्थापित कर लिए थे.

कुछ समय तक तो दोनों के बीच प्रेम प्रसंग चोरीछिपे चलता रहा. लेकिन समय के गुजरते उन दोनों की हकीकत नीशू के घर वालों के सामने आ गई.

नीशू की हकीकत सामने आते ही उस के घर वालों को बहुत ही बुरा लगा. लेकिन नीशू ने अपने घर वालों को समझा दिया कि वह अब बालिग हो चुकी है, अपनी जिंदगी का फैसला स्वयं ले सकती है. उस ने घर वालों से साफ कह दिया कि सोनू उस से शादी करने को तैयार है.

नीशू की यह बात उस के पिता वीर सिंह को बहुत बुरी लगी. लेकिन वह भी अपनी बेटी को बहुत प्यार करते थे. उन्हें पता था कि अगर उन्होंने अपनी बेटी के अरमानों का गला घोटने की कोशिश की तो वह कुछ भी कर सकती है. यही सोच कर उन्होंने सोनू के साथ शादी करने की हामी भर ली.

सोनू लंगोट का था कच्चा

उस के बाद वीर सिंह ने 10 अप्रैल, 2014 को आर्यसमाज रीतिरिवाज के अनुसार सोनू कुमार के साथ अपनी बेटी नीशू की शादी कर दी. नीशू और सोनू शादी कर के खुश थे. कुछ समय तक दोनों के बीच सब कुछ ठीकठाक चला. समय के साथ नीशू 2 बच्चों की मां भी बन गई.

उस की नौकरी तो नहीं लग पाई. लेकिन वह अपने 2 बच्चों स्तुति और ओम सिंह के साथसाथ सोनू की पहली बीवी की बेटी स्पर्श का भी ठीक प्रकार से लालनपालन कर रही थी.

सोनू का नेटवर्किंग का काम था. उस की कमाई अपने ग्रुप में सदस्य जोड़ने के बाद ही हो पाती थी. इसी कारण वह हर वक्त नए सदस्यों की तलाश में जुटा रहता था.

वह अपने संपर्क में आने वाले युवकयुवतियों को कंपनी में काम दिलाने का झांसा दे कर फंसा लेता, फिर उन पर काफी खर्च भी करता था. जिस से युवकयुवतियां उस के रहनसहन और ठाटबाट को देख कर जल्दी ही उस से प्रभावित हो जाते थे.

सोनू लंगोट का बहुत ही कच्चा था. कोई भी सुंदर युवती उस के संपर्क में आती तो उसे देख कर उसे पाने की लालसा जाग जाती थी. नौकरी का लालच दिखा कर वह हर युवती के साथ यौन संबंध बनाने की लालसा करने लगता था. जिस के कारण कमाई से ज्यादा वह खर्च करने लगा था.

यही कारण रहा कि जल्दी ही उसे आर्थिक तंगी से गुजरना पड़ा. वह पैसों के लिए तरसने लगा. उस के बाद वह नीशू से पैसों की मांग करने लगा था. यह बात नीशू के पिता वीर सिंह के सामने पहुंची तो उन्होंने भी उसे समझाने की कोशिश की.

उस की आर्थिक स्थिति खराब होने के बाद वीर सिंह ने गांव से ही अपने मिलने वाले से ब्याज पर एक लाख रुपए उसे दिला दिए, जो कुछ ही दिनों में उस ने खर्च कर दिए. उस के बाद वह फिर से नीशू पर और रुपयों की मांग करने लगा था.

वीर सिंह आर्थिक रूप से इतना मजबूत नहीं था कि वह बारबार उस की सहायता करता. वीर सिंह ने सोनू को रुपए देने से इनकार किया तो उस ने नीशू के साथ मारपीट करनी शुरू कर दी.

सोनू की हरकतें देख वीर सिंह का परिवार परेशान हो उठा. उस के बाद वीर सिंह ने अपनी बेटी का भविष्य देखते हुए अपनी जुतासे की जमीन बेच कर सोनू को 5 लाख रुपए दिए. लेकिन सोनू फिर भी सीधे रास्ते पर नहीं आया था.

उस ने वह रुपए भी शीघ्र ही अय्याशी में उड़ा दिए. उस पैसे के बल पर उस ने कई युवतियों के साथ अवैध संबंध बना लिए थे. दूसरी युवतियों पर रुपए खर्च करने को ले कर उस के ससुराल वाले खफा हो गए. उस के बाद वह अपनी बीवी को एक नजर तक नहीं देखना चाहता था. उस के बावजूद वह हर रोज नईनई युवतियों को घर लाने लगा था. एक दिन नीशू किसी काम से बाजार गई हुई थी. घर आई तो सोनू के साथ एक युवती भी थी, जिसे देखते ही नीशू के तनबदन में आग लग गई.

उस युवती को ले कर दोनों में काफी विवाद भी हुआ. उस की हरकतों से आजिज आ कर नीशू ने अपनी मां जयंती से शिकायत की तो उस की मां जयंती उसे बच्चों सहित अपने साथ ले गई.

कुछ दिन गुजरने के बाद सोनू फिर से अपनी ससुराल गया और भविष्य में नीशू को तंग न करने की बात कहते हुए फिर से बुला लाया. इस बार नीशू की मां जयंती भी उस के साथ आ गई थी. घर आते ही सोनू के तेवर फिर से बदल गए.

पत्नी और सास की कर दी हत्या

वह जल्दी ही अपनी हरकतों पर आ गया. अय्याशी में आड़े आने पर सोनू ने अपनी पत्नी को रास्ते से हटाने के लिए पहले ही योजना बना ली थी. जिस की नीशू को भनक तक नहीं लगी.

26 फरवरी, 2022 की रात को खाना खाने के बाद सोते वक्त मांबेटी का सोनू से किसी बात पर झगड़ा हो गया. सोनू ने उसी समय मांबेटी को मौत की नींद सुलाने का मन बना लिया था.

27 फरवरी, 2022 की सुबह 5 बजे उस ने अपने बच्चों को एक कमरे में सुला दिया. उस के बाद गहरी नींद में सो रही सास जयंती और पत्नी नीशू की पाटल से काट कर हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद उस ने बच्चों को साथ लिया और कार में बिठा कर सीधा अमरोहा निवासी अपनी बहन सोनिया के पास चल दिया. उस ने रास्ते में ही फोन कर के जानकारी दी कि उस ने अपनी पत्नी नीशू और उस की मां जयंती की हत्या कर दी है.

अमरोहा पहुंचते ही अपने तीनों बच्चों को बहन के पास छोड़ कर कार से फरार हो गया. उसी दौरान उसे पता चला कि पुलिस उस की तलाश में आई थी. यह सुनते ही उस ने अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर लिया.

अमरोहा से सोनू कार ले कर सीधा अपने दोस्त पंकज के पास पहुंचा. पंकज को गंगा जल लाने हरिद्वार जाना था. वह उस के साथ ही हरिद्वार भी गया.

हरिद्वार से वापसी में उस ने अपने दोस्त को सास और पत्नी की हत्या वाली बात बता दी. जिस से पंकज नाराज हो गया और उस ने सोनू को भलाबुरा कहते हुए रास्ते में ही उतार दिया. जिस के बाद सोनू सीधा गाजियाबाद पहुंच गया.

गाजियाबाद पहुंचने के बाद ही उसे अपने किए पर पश्ताचाप होने लगा था. उसे यह भी पता था कि वह चाहे कितनी भी भागदौड़ कर ले, पुलिस एक दिन उसे गिरफ्तार कर ही लेगी. उस के बाद उसे उम्र भर के लिए जेल में ही रहना पड़ेगा.

यही सोच कर उस ने अपनी जिंदगी का आखिरी रास्ता देखते हुए खुद भी सुसाइड करने का फैसला लिया. उसी फैसले के तहत उस ने चलती ट्रेन के आगे कूद कर अपनी जान दे दी.

सोनू के आत्महत्या करने के साथ ही एक हंसताखेलता परिवार पूरी तरह से बिखर गया. उसी के साथ एक गृहस्थी पूरी तरह से खत्म हो गई थी. फिलहाल मृतक के तीनों बच्चे उस की बहन के पास रह रहे थे.

वैसे तो सोनू ने जो जघन्य अपराध किया था, उस की कड़ी सजा थी. लेकिन उस ने मरने से पहले पौकेट डायरी के 7 पन्नों में अपने दिल की जो व्यथा लिखी थी, क्या वह उसे माफ करने लायक थी.

उस ने लिखा कि उस की मृत्यु के बाद यह डायरी जिस किसी भी भाई को मिले, कृपया इस में लिखे नंबरों पर फोन मिला कर मेरे रिश्तेदारों को सूचित कर देना.

‘नीशू, तू मेरी पत्नी थी, मैं तुझे बहुत ही प्यार करता था. लेकिन तूने अपनी बहन पिंकी के कहने में आ कर मुझे यह सब कुछ करने पर मजबूर कर दिया. मुझे पता था कि तुझे और तेरी मां को पिंकी ही चढ़ाती थी, जिस के कारण बारबार समझाने के बाद भी तेरी मां मेरी एक भी बात मानने को तैयार न थी.

‘अगर पिंकी तुम लोगों को बारबार न उकसाती तो हमारे बीच बारबार लड़ाई नहीं होती. मैं सोनू तेरी मौत का जिम्मेदार हूं. मैं मजबूर हो गया था. नीशू तू मेरी पत्नी थी. मैं तुझे बहुत ही प्यार करता था, फिर भी मैं ने तुझे मार दिया. मैं माफी के काबिल नहीं. मैं तेरे पास ही आ रहा हूं. हो सके तो मुझे माफ कर देना.’

सुसाइड नोट में सोनू ने जो लिखा था, उस में कितनी सच्चाई थी, यह तो पता नहीं लेकिन परिवार के खत्म होते ही सब खत्म हो गया.

यक्ष प्रश्न- भाग 4: निमी को क्यों बचाना चाहती थी अनुभा

वरुण अपने दोस्तों की तरह कठोर नहीं था. उस के अंदर सहज मानवीय भाव थे. वह काफी संवेदनशील था और निमी के प्रति दयाभाव भी रखता था, परंतु उस के लिए वह अपना भविष्य दांव पर नहीं लगा सकता था. अत. कुछ सोच कर बोला, ‘‘तुम प्राइवेट नौकरी कर सकती हो?’’

‘‘हां, मेरे पास और चारा भी क्या है?’’

‘‘तो फिर ठीक है, तुम इसी फ्लैट में रहो. इस का किराया मैं दे दिया करूंगा. मैं अपने पिता से बात कर के तुम्हें किसी कंपनी में काम दिलवा दूंगा, जिस से तुम्हारा गुजारा चल सके.’’

‘‘मैं तुम्हारा एहसान कभी नहीं भूलूंगी.’’

वरुण ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘या तुम अपने घर चली जाओ.’’

निमी ने आश्चर्य से उसे देखा. फिर बोली, ‘‘कौन सा मुंह ले कर जाऊं उन के पास? क्या बताऊंगी उन्हें कि मैं ने इतने दिन क्या किया है? नहीं वरुण, मैं उन के पास जा कर उन्हें और परेशान नहीं करना चाहती.’’

वरुण के पिता सरकारी विभाग में अच्छे पद थे. उस ने पिता से कह कर निमी को एक प्राइवेट कंपनी में लगवा दिया. क्व20 हजार महीने पर. निमी का जो लाइफस्टाइल था, उस के हिसाब से उस की यह सैलरी ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर थी, परंतु मुसीबत की घड़ी में मनुष्य को तिनके का सहारा भी बहुत होता है.

निमी ने उन्मुक्त यौन संबंधों से तो छुटकारा पा लिया, परंतु वह शराब और सिगरेट से छुटकारा नहीं पा सकी. एकांत उसे परेशान करता, पुरानी यादें उसे कचोटतीं, मांबाप की याद आती, तो वह पीने बैठ जाती.

वरुण जब भी उस से मिलने आता, वह उस की बांहों में गिर कर रोने लगती. वह समझाता, ‘‘मत पीया करो इतना, बीमार हो जाओगी.’’

‘‘वरुण, एकाकी जीवन मुझे बहुत डराता है,’’ वह उस से चिपक जाती.

‘‘मातापिता के पास वापस चली जाओ. वे तुम्हें माफ कर देंगे,’’

वह कई बार निमी से यह बात कह चुका था, पर हर बार निमी का यही जवाब होता, ‘‘कौन सा मुंह ले कर जाऊं उन के पास? वे मुझे क्या बनाना चाहते थे और मैं क्या बन बैठी… माफ तो कर देंगे, परंतु समाज को क्या जवाब देंगे.’’

‘‘वही, जो अभी दे रहे होंगे.’’

‘‘अभी वे मुझे मरा समझ कर माफ कर देंगे, परंतु उन के पास रह कर मैं उन्हें बहुत दुख दूंगी.’’

‘‘एक बार जा कर तो देखो.’’

‘‘नहीं वरुण, तुम मेरे मांबाप को नहीं जानते. वे मुझे माफ नहीं करेंगे. अगर उन्हें माफ करना होता, तो अब तक मुझे ढूंढ़ लिया होता. यह बहुत मुश्किल नहीं था. उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं की होगी,’’ वरुण के समझाने का उस पर कोई प्रभाव न पड़ता.

यथास्थिति बनी रही. बस वरुण सिविल सर्विसेज की तैयारी में निरंतर जुटा रहा. इस का परिणाम यह रहा कि वह यूपीएससी परीक्षा पास कर गया.

जब वरुण ट्रेनिंग के लिए जाने लगा तो निमी ने कहा, ‘‘अब तुम पूरी तरह से मुझ से दूर चले जाओगे.’’

‘‘वह तो जाना ही था,’’ वरुण ने उसे समझाते हुए कहा. निमी के मन में बहुत कुछ टूट गया. वह जानती थी, वरुण उस का नहीं हो सकता है,

फिर भी उस के दिल में कसक सी उठी. वह खोईखोई आंखों से वरुण को देख रही थी. वरुण ने उस के सिर को सहलाते हुए कहा, ‘‘देखो, निमी, मेरा कहना मानो, अब भटकने से कोई फायदा नहीं. तुम ने अपने जीवन को जितना गिराना था, गिरा लिया. अब सावधानी से उठने की कोशिश करो. तुम्हारी तनख्वाह बढ़ गई है. कुछ बचा कर पैसे जोड़ लो और किसी लड़के से शादी कर के घर बसा लो. मेरी तरफ से जो हो सकेगा मैं मदद करूंगा.’’

निमी ने जवाब नहीं दिया. अगले कुछ दिनों में वरुण मसूरी चला गया. निमी पूरी तरह टूट गई. उस ने अपनी सोच पर ताले लगा लिए. जैसे वह सुधरना ही नहीं चाहती थी.

1 साल की ट्रेनिंग के दौरान वरुण उस से मिलने केवल एक बार आया और रातभर उस के साथ रुका. तब भी उस ने निमी को घर बसाने की सलाह दी. परंतु वह चुप ही रही.

कई साल बीत गए. वरुण की पोस्टिंग हो गई थी. वह एक जिले का कलैक्टर बन गया था. उसे छुट्टी नहीं मिलती थी या दिल्ली आ कर भी वह उस से मिलना नहीं चाहता था, परंतु हर माह वह एक अच्छी राशि निमी के खाते में जमा करा देता था.

निमी ने तय कर लिया था कि वह शादी नहीं करेगी. वरुण उस का नहीं है, फिर भी उस का इंतजार करती थी. इंतजार जितना लंबा हो रहा था, उस के शराब पीने की मात्रा भी उतनी ही बढ़ती जा रही थी. फिर पता चला कि वरुण की शादी किसी चीफ सैक्रेटरी की आईएएस बेटी से हो गई है. निमी के अंदर जो थोड़ी सी आस बची थी, वह पूर्णरूप से टूट गई. उस की शराब की मात्रा इतनी ज्यादा हो गई कि अब वह दफ्तर भी नहीं जा पाती थी.

वरुण से उस का कोई सीधा संपर्क नहीं था. कभीकभी वरुण के पिता का नौकर उस के हालचाल पूछ जाता था. वही वरुण के बारे में बताता था और उस के बारे में वही वरुण को खबर करता होगा.

अत्यधिक शराब के सेवन से उस की तबीयत खराब रहने लगी. वरुण के पिता का नौकर लगभग रोज उस के पास आने लगा था. एक दिन उसी के सामने निमी को खून की उलटी हुई. उसे आननफानन में अस्पताल में भरती करवाया गया.

मैडिकल रिपोर्ट से यह साबित हो गया था कि अत्यधिक शराब के सेवन से उस के सारे अंदरूनी अंग खराब हो गए हैं. वरुण ने अपने नौकर के माध्यम से उसे सेमी प्राइवेट वार्ड में भरती करवा दिया था. इलाज का सारा खर्च वह भेज रहा था, परंतु कभी मिलने नहीं आया.

उस के इलाज में कोई कमी नहीं थी, परंतु उस का दुख उसे खाए जा रहा था जैसे वह किसी बीमारी से नहीं, अपने दुख से ही मरेगी, परंतु इसी बीच संयोग से अस्पताल में अनुभा प्रकट हुई और उस के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन आ गया. अब वह ठीक हो कर घर आ गई थी. घर तो आ गई थी, परंतु किस के  घर? उस का अपना घर, संसार कहां था?

यक्ष प्रश्न अभी भी उस के सामने खड़ा था. अब आगे क्या? 35 वर्ष की अवस्था में अब वह कोई युवती नहीं थी. बीमारी ने उस की सुंदरता को काफी हद तक क्षीण कर दिया था. नौकरी हाथ से जा चुकी थी, वरुण से भी व्यक्तिगत संपर्क टूट चुका था.

हिमांशु केंद्र सरकार में उच्च अधिकारी थे. उन्होंने अपने प्रयासों से निमी को एक संस्था से जोड़ दिया. यह संस्था अनाथ बच्चों की देखभाल और उन्हें शिक्षा प्रदान करती थी. कुछ दिन तक निमी अनुभा के घर पर रही. फिर उस की संस्था ने उसे एक घर लीज पर दिलवा दिया. साफसफाई के बाद जिस दिन निमी ने अपने घर में प्रवेश किया, तब अनुभा और उस के पति के कुछ दोस्त मौजूद थे. छोटी सी पार्टी रखी गई थी.

शाम को पार्टी के बाद जब अनुभा निमी को छोड़ कर जाने लगी, तो निमी ने कहा, ‘‘मैं फिर अकेली हो जाऊंगी.’’

‘‘नहीं, तुम अकेली नहीं हो. हम सब तुम्हारे साथ हैं. पहले जो लोग तुम से जुड़े थे, वे स्वार्थवश जुड़े थे. इसीलिए तुम पतन की राह पर चल पड़ी थी. अब तुम्हारे सामने एक लक्ष्य है, बच्चों का भविष्य सुधारने का. इस लक्ष्य को ध्यान में रखोगी और अपनी पिछली जिंदगी के बारे में विचार करोगी, तो तुम एकाकी जीवन जीते हुए भी कभी गलत रास्ते पर नहीं चलोगी.’’

निमी ने शरमा कर सिर झुका लिया. अनुभा ने उस का चेहरा ऊपर उठाया. उस की आंखों में आंसू थे. कई वर्षों बाद उस की आंखों में खुशी के आंसू आए थे.

पराकाष्ठा- भाग 1: एक विज्ञापन ने कैसे बदली साक्षी की जिंदगी

आज भी मुखपृष्ठ की सुर्खियों पर नजर दौड़ाने के पश्चात वह भीतरी पृष्ठों को देखने लगी. लघु विज्ञापन तथा वर/वधू चाहिए, पढ़ने में साक्षी को सदा से ही आनंद आता है.

कालिज के जमाने में वह ऐसे विज्ञापन पढ़ने के बाद अखबार में से उन्हें काट कर अपनी सहेलियों को दिखाती थी और हंसीठट्ठा करती थी.

शहर के समाचार देखने के बाद साक्षी की नजर वैवाहिक विज्ञापन पर पड़ी जिसे बाक्स में मोटे अक्षरों के साथ प्रकाशित किया गया था, ‘30 वर्षीय नौकरीपेशा, तलाकशुदा, 1 वर्षीय बेटे के पिता के लिए आवश्यकता है सुघड़, सुशील, पढ़ीलिखी कन्या की. गृहकार्य में दक्ष, पति की भावनाओं, संवेदनाओं के प्रति आदर रखने वाली, समझौतावादी व उदार दृष्टिकोण वाली को प्राथमिकता. शीघ्र संपर्र्ककरें…’

साक्षी के पूरे शरीर में झुरझुरी सी होने लगी, ‘कहीं यह विज्ञापन सुदीप ने ही तो नहीं दिया? मजमून पढ़ कर तो यही लगता है. लेकिन वह तलाकशुदा कहां है? अभी तो उन के बीच तलाक हुआ ही नहीं है. हां, तलाक की बात 2-4 बार उठी जरूर है.

शादी के पश्चात हनीमून के दौरान सुदीप ने महसूस किया कि अंतरंग क्षणोें में भी वह उस की भावनाओं का मखौल उड़ा देती है और अपनी ही बात को सही ठहराती है. सुदीप को बुरा तो लगा लेकिन तब उस ने चुप रहना ही उचित समझा.

शादी के 2 महीने ही बीते होंगे, छुट्टी का दिन था. शाम के समय अचानक साक्षी बोली, ‘सुदीप अब हमें अपना अलग घर बसा लेना चाहिए, यहां मेरा दम घुटता है.’

सुदीप जैसे आसमान से नीचे गिरा, ‘यह क्या कह रही हो, साक्षी? अभी तो हमारी शादी को 2 महीने ही हुए हैं और फिर मैं इकलौता लड़का हूं. पिताजी नहीं हैं इसलिए मां की और कविता की जिम्मेदारी भी मुझ पर ही है. तुम ने कैसे सोच लिया कि हम अलग घर बसा लेंगे.’

साक्षी तुनक कर बोली, ‘क्या तुम्हारी जिम्मेदारी सिर्फ तुम्हारी मां और बहन हैं? मेरे प्रति तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं?’

‘तुम्हारे प्रति कौन सी जिम्मेदारी मैं नहीं निभा रहा? घर में कोई रोकटोक, प्रतिबंध नहीं. और क्या चाहिए तुम्हें?’ सुदीप भी कुछ आवेश में आ गया.

‘मुझे आजादी चाहिए, अपने ढंग से जीने की आजादी, मैं जो चाहूं पहनूं, खाऊं, करूं. मुझे किसी की भी, किसी तरह की टोकाटाकी पसंद नहीं.’

‘अभी भी तो तुम अपने ढंग से जी रही हो. सवेरे 9 बजे से पहले बिस्तर नहीं छोड़तीं फिर भी मां चुप रहती हैं, भले ही उन्हें बुरा लगता हो. मां को तुम से प्यार है. वह तुम्हें सुंदर कपड़े, आभूषण पहने देख कर अपनी चाह, लालसा पूरी करना चाहती हैं. रसोई के काम तुम्हें नहीं आते तो तुम्हें सिखा कर सुघड़ बनाना चाहती हैं. इस में नाराजगी की क्या बात है?’

‘बस, अपनी मां की तारीफों के कसीदे मत काढ़ो. मैं ने कह दिया सो कह दिया. मैं उस घर में असहज महसूस करती हूं, मुझे वहां नहीं रहना?’

‘चलो, आज खाना बाहर ही खा लेते हैं. इस विषय पर बाद में बात करेंगे,’ सुदीप ने बात खत्म करने के उद्देश्य से कहा.

‘बाद में क्यों? अभी क्यों नहीं? मुझे अभी जवाब चाहिए कि तुम्हें मेरे साथ रहना है या अपनी मां और बहन के  साथ?’

सुदीप सन्न रह गया. साक्षी के इस रूप की तो उस ने कल्पना भी नहीं की थी. फिर किसी तरह स्वयं को संयत कर के उस ने कहा, ‘ठीक है, घर चल कर बात करते हैं.’

‘मुझे नहीं जाना उस घर में,’ साक्षी ने अकड़ कर कहा. सुदीप ने उस का हाथ खींच कर गाड़़ी में बैठाया और गाड़ी स्टार्ट की.

‘तुम ने मुझ पर हाथ उठाया. यह देखो मेरी बांह पर नीले निशान छप गए हैं. मैं अभी अपने मम्मीपापा को फोन कर के बताती हूं.’

साक्षी के चीखने पर सुदीप हक्काबक्का रह गया. किसी तरह स्वयं पर नियंत्रण रख कर गाड़ी चलाता रहा.

घर पहुंचते ही साक्षी दनदनाती हुई अपने कमरे की ओर चल पड़ी. मां तथा कविता संशय से भर उठीं.

‘सुदीप बेटा, क्या बात है. साक्षी कुछ नाराज लग रही है?’ मां ने पूछा.

‘कुछ नहीं मां, छोटीमोटी बहसें तो चलती ही रहती हैं. आप लोग सो जाइए. हम बाहर से खाना खा कर आए हैं.’

साक्षी को समझाने की गरज से सुदीप ने कहा, ‘साक्षी, शादी के बाद लड़की को अपनी ससुराल में तालमेल बैठाना पड़ता है, तभी तो शादी को समझौता भी कहा जाता है. शादी के पहले की जिंदगी की तरह बेफिक्र, स्वच्छंद नहीं रहा जा सकता. पति, परिवार के सदस्यों के साथ मिल कर रहना ही अच्छा होता है. आपस में आदर, प्रेम, विश्वास हो तो संबंधों की डोर मजबूत बनती है. अब तुम बच्ची नहीं हो, परिपक्व हो, छोटीछोटी बातों पर बहस करना, रूठना ठीक नहीं…’

‘तुम्हारे उपदेश हो गए खत्म या अभी बाकी हैं? मैं सिर्फ एक बात जानती हूं, मुझे यहां इस घर में नहीं रहना. अगर तुम्हें मंजूर नहीं तो मैं मायके चली जाऊंगी. जब अलग घर लोगे तभी आऊंगी,’ साक्षी ने सपाट शब्दों में धमकी दे डाली.

अमावस की काली रात उस रोज और अधिक गहरी और लंबी हो गई थी. सुदीप को अपने जीवन में अंधेरे के आने की आहट सुनाई पड़ने लगी. किस से अपनी परेशानियां कहे? जब लोगों को पता लगेगा कि शादी के 2-3 महीनों में ही साक्षी सासननद को लाचार, अकेले छोड़ कर पति के साथ अलग रहना चाहती है तो कितनी छीछालेदर होगी.

सुदीप रात भर इन्हीं तनावों के सागर में गोते लगाता रहा. इस के बाद भी अनेक रातें इन्हीं तनावों के बीच गुजरती रहीं.

मां की अनुभवी आंखों से कब तक सुदीप आंखें चुराता. उस दिन साक्षी पड़ोस की किसी सहेली के यहां गई थी. मां ने पूछ ही लिया, ‘सुदीप बेटा, तुम दोनों के बीच कुछ गलत चल रहा है? मुझ से छिपाओगे तो समस्या कम नहीं होगी, हो सकता है मैं तुम्हारी मदद कर सकूं?’

सुदीप की आंखें नम हो आईं. मां के प्रेम, आश्वासन, ढाढ़स ने हिम्मत बंधाई तो उस ने सारी बातें कह डालीं. मां के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह तो साक्षी को बेटी से भी अधिक प्रेम, स्नेह दे रही थीं और उस के दिल में उन के प्रति अनादर, नफरत की भावना. कहां चूक हो गई?

एक दिन मां ने दिल कड़ा कर के फैसला सुना दिया, ‘सुदीप, मैं ने इसी कालोनी में तुम्हारे लिए किराए का मकान देख लिया है. अगले हफ्ते तुम लोग वहां शिफ्ट हो जाओ.’ सुदीप अवाक् सा मां के उदास चेहरे को देखता रह गया. हां, साक्षी के चेहरे पर राहत के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे.

‘लेकिन मां, यहां आप और कविता अकेली कैसे रहेंगी?’ सुदीप का स्वर भर्रा गया.

‘हमारी फिक्र मत करो. हो सकता है कि अलग रह कर साक्षी खुश रहे तथा हमारे प्रति उस के दिल में प्यार, आदर, इज्जत की भावना बढ़े.’

विदाई के समय मां, कविता के साथसाथ सुदीप की भी रुलाई फूट पड़ी थी. साक्षी मूकदर्शक सी चुपचाप खड़ी थी. कदाचित परिवार के प्रगाढ़ संबंधों में दरार डालने की कोशिश की पहली सफलता पर वह मन ही मन पुलकित हो रही थी.

अलग घर बसाने के कुछ ही दिनों बाद साक्षी ने 2-3 महिला क्लबों की सदस्यता प्राप्त कर ली. आएदिन महिलाओं का जमघट उस के घर लगने लगा. गप्पबाजी, निंदा पुराण, खानेपीने में समय बीतने लगा. साक्षी यही तो चाहती थी.

उस दिन सुदीप मां और बहन से मिलने गया तो प्यार से मां ने खाने का आग्रह किया. वह टाल न सका. घर लौटा तो साक्षी ने तूफान खड़ा कर दिया, ‘मैं यहां तुम्हारा इंतजार करती भूखी बैठी हूं और तुम मां के घर मजे से पेट भर कर आ रहे हो. मुझे भी अब खाना नहीं खाना.’

सुदीप ने खुशामद कर के उसे खाना खिलाया और उस के जोर देने पर थोड़ा सा स्वयं भी खाया.

CRPF जवान की पत्नी निकली बिस्तर का साथी बदलने की खिलाड़ी

उस दिन फरवरी 2022 की 21 तारीख थी. सुबह के 10 बज रहे थे. पनकी थानाप्रभारी अंजन कुमार सिंह थाने पर मौजूद थे. चुनाव ड्यूटी में व्यस्त रहने के कारण वह थकान महसूस कर रहे थे. तभी एक युवक ने उन के कक्ष में प्रवेश किया. वह दिखने में फोर्स का लग रहा था, लेकिन घबराया हुआ था. उसे उस हालत में देख कर उन्होंने पूछा, ‘‘कहो जवान, क्या बात है. तुम इतने घबराए हुए क्यों हो?’’

‘‘सर, मेरा नाम इंद्रपाल है. मैं सीआरपीएफ में हैडकांस्टेबल हूं. मेरी पत्नी रीता 2 बच्चों के साथ रतनपुर की एमआईजी कालोनी में रहती है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दरम्यान मेरी ड्यूटी मैनपुरी जिले के जमालपुर पोलिंग बूथ पर थी. तभी बीती रात बड़े बेटे ने मुझे फोन पर बताया कि उस की मम्मी घर से गायब है. यह सुनते ही मैं घबरा गया.

‘‘रात भर मैं सगेसंबंधियों को फोन करता रहा. लेकिन रीता के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिली. उस का मोबाइल फोन भी बंद था. सुबह होते ही मैं कानपुर आ गया और सीधे आप के पास चला आया. आप रीता की गुमशुदगी दर्ज कर उसे ढूंढने में मेरी मदद करें.’’

चूकि मामला अर्द्धसैनिक बल का था, इसलिए थानाप्रभारी अंजन कुमार सिंह ने रीता की गुमशुदगी दर्ज कर ली और इंद्रपाल से कुछ आवश्यक पूछताछ की. उस के बाद वह पुलिसकर्मियों के साथ इंद्रपाल के रतनपुर कालोनी स्थित घर पर पहुंचे.

उन्होंने घर का निरीक्षण किया तो सोच में डूब गए. घर के अंदर कमरे में मेज पर बियर की 2 खाली बोतलें तथा 2 खाली गिलास रखे थे. कमरे से कुछ अश्लील सामान तथा शक्तिवर्द्धक दवाएं भी बरामद हुईं.

पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि घर के अंदर अय्याशी का खेल चलता था. पुलिस ने बरामद सामान को सुरक्षित कर लिया.

घर पर इंद्रपाल का बड़ा बेटा मौजूद था. थानाप्रभारी अंजन कुमार सिंह ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि पुष्पेंद्र अंकल घर आए थे. रात 8 बजे तक वह घर पर ही थे. उस के बाद वह कमरे में जा कर सो गया. रात 12 बजे वह उठा तो मम्मी घर पर नहीं थीं. वह घबरा गया और रोने लगा. उस के बाद उस ने पापा को मम्मी के गायब होने की खबर मोबाइल फोन से दी.

‘‘यह पुष्पेंद्र कौन है?’’ अंजन कुमार सिंह ने इंद्रपाल से पूछा.

‘‘सर, पुष्पेंद्र कठेरिया, गंगागंज (पनकी) में रहता है. वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता है. रतनपुर कालोनी में उस का औफिस है. फ्लैट खरीदने के दौरान उस से परिचय हुआ था. उस के बाद वह घर आनेजाने लगा था.’’

‘‘तुम ने रीता के संबंध में पुष्पेंद्र से बात नहीं की?’’ थानाप्रभारी ने इंद्रपाल से पूछा.

‘‘सर, हम ने रात में ही उस से पूछा था, तब उस ने बताया था कि वह तो इस समय कानपुर देहात में है.’’

थानाप्रभारी अंजन कुमार सिंह ने इंद्रपाल के पड़ोसियों से पूछताछ की तो पता चला कि इंद्रपाल की गैरमौजूदगी में फ्लैट पर कई लोगों का आनाजाना लगा रहता था. उस की पत्नी रीता चरित्रहीन है. पति की पीठ पीछे वह यारों के साथ गुलछर्रे उड़ाती है.

अंजन कुमार सिंह ने अनुमान लगाया कि रीता जरूर अपने किसी यार के साथ मौजमस्ती के लिए चली गई होगी. वह 1-2 दिन बाद खुद ही लौट आएगी. अत: वह इंद्रपाल को ढांढस बंधा कर वापस थाने आ गए. इस के बाद वह निश्चिंत हो गए और हाथ पर हाथ रख कर बैठ गए. उन्होंने रीता को खोजने का कोई प्रयास नहीं किया.

इधर ज्योंज्यों दिन बीतते जा रहे थे, त्योंत्यों इंद्रपाल की चिंता बढ़ती जा रही थी. वह अपने स्तर से पत्नी की खोज में जुटा था, लेकिन रीता का कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था.

आखिर जब इंद्रपाल हताश हो गया तो वह परिजनों के साथ एडिशनल डीसीपी (पश्चिम) बृजेश कुमार श्रीवास्तव व एसीपी (कल्याणपुर) दिनेश कुमार शुक्ला से मिला और पत्नी को खोजने की गुहार लगाई.

इतना ही नहीं, इंद्रपाल ने थाना पनकी में भी हंगामा किया. हंगामा और अधिकारियों की फटकार से पनकी पुलिस की नींद टूटी और वह रीता की खोज में जुट गई.

थानाप्रभारी अंजन कुमार सिंह ने सब से पहले रीता के मोबाइल फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो जानकारी मिली कि रीता 3 नंबरों पर ज्यादा बातें करती थी.

संदेह के घेरे में आए प्रौपर्टी डीलर और कार मैकेनिक

इन नंबरों की जानकारी जुटाई गई तो पता चला कि एक नंबर उस के पति इंद्रपाल का है जबकि दूसरा नंबर प्रौपर्टी डीलर गंगागंज (पनकी) निवासी पुष्पेंद्र कठेरिया का है. आखिरी बार रीता ने जिस नंबर से बात की थी, वह नंबर कार मैकेनिक मुख्तार का था.

जांच से यह भी पता चला कि घटना वाली शाम पुष्पेंद्र व मुख्तार के मोबाइल फोन की लोकेशन रीता के घर की थी. रात 10 बजे के बाद लोकेशन कानपुर (देहात) की थी.

पुष्पेंद्र व मुख्तार संदेह के दायरे में आए तो अंजन कुमार सिंह की टीम ने दोनों को 25 फरवरी की रात 10 बजे हिरासत में ले लिया और थाने ले आए.

डीसीपी रवीना त्यागी, बृजेश श्रीवास्तव व एसीपी दिनेश शुक्ला की मौजूदगी में पुष्पेंद्र व मुख्तार से रीता के संबंध में पूछताछ शुरू हुई.

साधारण पूछताछ में दोनों पुलिस को गुमराह करते रहे, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती की तो मुख्तार टूट गया. मुख्तार ने जो बताया, उसे सुन कर पुलिस की सांसें अटक गईं.

मुख्तार ने बताया कि रीता अब इस दुनिया में नहीं है. उस की हत्या कर शव को दफना दिया है. हत्या से पहले उस के साथ चलती कार में सामूहिक दुष्कर्म किया गया था.

उस के द्वारा धमकी देने पर गला दबा कर उसे मार डाला तथा शव से कीमती जेवर भी उतार लिए थे. हत्या में उस का साथी राशिद व शमशाद भी शामिल थे. मुख्तार के टूटते ही पुष्पेंद्र भी टूट गया और उस ने रीता की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया.

‘‘रीता का शव तुम लोगों ने कहां दफनाया?’’ एसीपी दिनेश शुक्ला ने मुख्तार से पूछा.

‘‘साहब, कानपुर (देहात) जिले के भाऊपुर रेलवे स्टेशन के पास एक पुलिया है. उसी के नीचे रीता का शव दफन है,’’ मुख्तार ने बताया.

26 फरवरी की सुबह मुख्तार व पुष्पेंद्र को साथ ले कर पुलिस टीम भाऊपुर स्थित पुलिया के समीप पहुंची. फिर मुख्तार की निशानदेही पर दफन शव को बाहर निकलवाया.

शव बुरी तरह सड़गल चुका था और दुर्गंध आ रही थी. इस शव को इंद्रपाल ने देखा तो वह फफक पड़ा. क्योंकि शव उस की पत्नी रीता का ही था.

शव बरामद होने की खबर पा कर डीसीपी (साउथ) रवीना त्यागी, एडिशनल डीसीपी (पश्चिम) बृजेश श्रीवास्तव व एसीपी दिनेश शुक्ला भी मौके पर आ गए थे.

पुलिस अधिकारियों ने रीता के शव का बारीकी से निरीक्षण किया. फिर काररवाई निपटा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए माती भिजवा दिया.

सामूहिक दुष्कर्म की हुई पुष्टि

अब तक पुलिस टीम रीता की हत्या के आरोपी पुष्पेंद्र व मुख्तार को तो गिरफ्तार कर चुकी थी, लेकिन मुख्तार के साथी राशिद व शमशाद को गिरफ्तार नहीं कर पाई थी.

अत: उन दोनों को पकड़ने के लिए पुलिस टीम ने कानपुर (देहात) जनपद के रनिया, रूरा अकबरपुर कस्बे में ताबड़तोड़ दबिशें डालीं और रूरा कस्बा से शमशाद को गिरफ्तार कर लिया. उसे थाना पनकी लाया गया.

पूछताछ में उस ने भी हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. लेकिन राशिद पुलिस के हत्थे नहीं आया. मुख्तार की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त कार भी बरामद कर ली, जिसे उस ने अपने गैराज में छिपा दी थी.

इधर रीता के शव का परीक्षण डा. शिवम तिवारी, डा. स्वाति तथा डा. अमित के पैनल ने किया. परीक्षण के बाद शव को उस के पति तथा रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि रीता की हत्या गला दबा कर की गई थी तथा उस के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया था. शरीर पर चोट के निशान भी पाए गए.

थानाप्रभारी अंजन कुमार सिंह ने मृतका के भाई विनय कुमार की तहरीर पर भादंवि की धारा 302/201/376/392 तथा एससी/एसटी एक्ट के तहत पुष्पेंद्र कठेरिया, मुख्तार, राशिद तथा शमशाद के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा पुष्पेंद्र, मुख्तार व शमशाद को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस पूछताछ में रंगीनमिजाज रीता की हत्या की एक सनसनीखेज कहानी सामने आई.

उत्तर प्रदेश के कानपुर (देहात) जिले का एक बड़ा कस्बा रूरा है. इस कस्बे से 3 किलोमीटर दूर हसनापुर गांव है. दलित बाहुल्य इस गांव में रामदीन अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी उमा देवी के अलावा बेटा विनय तथा बेटी रीता थी.

रामदीन के पास 5 बीघा उपजाऊ भूमि थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. खेतीबाड़ी से ही वह अपने परिवार का भरणपोषण करता था. रामदीन सरल स्वभाव का था.

रीता रामदीन की रूपवती बेटी थी. वह सुंदर तो बचपन से ही थी, लेकिन जब वह जवानी के बोझ से लदी, तो उस की सुंदरता में और भी निखार आ गया था. उस ने गांव के माध्यमिक विद्यालय से हाईस्कूल की परीक्षा पास कर ली थी और रूरा कस्बा के आरपीएस इंटर कालेज में दाखिला ले लिया था.

मुख्तार से हो गया रीता को प्यार

रीता बनसंवर कर कालेज जाती थी. उस के चाहने वाले वैसे तो कई युवक थे, लेकिन मुख्तार उसे कुछ ज्यादा ही चाहता था.

दरअसल मुख्तार भी हसनापुर गांव का ही रहने वाला था. वह आकर्षक चेहरे और कसी हुई कदकाठी का युवक था. एक रोज कालेज से लौट रही रीता पर उस की नजर पड़ी तो रीता उस की आंखों से उतर कर उस के मन में समा गई.

मन में गुदगुदी मची, तो वह अकसर ही उस की राहों में खड़ा रहने व उस से किसी न किसी बहाने बातचीत करने का प्रयास करने लगा.

रीता उम्र के उस मोड़ पर थी, जहां लड़कियां अकसर बहकावे में आ जाती हैं. मुख्तार की रसीली बातों में रीता भी बहक गई. आखिरकार रीता का दिल जीतने में मुख्तार कामयाब हो गया. दोनों घर और समाज के लोगों से छिपछिप कर मिलने लगे.

इसी छिपाछिपाई के खेल में एक रोज दोनों बहक गए और उन का शारीरिक मिलन हो गया. शारीरिक मिलन का सुख ही निराला होता है. एक बार सुख भोगा तो वह इस सुख को प्राप्त करने के लिए अवसर तलाशने लगे.

धीरेधीरे रीता और मुख्तार के प्यार के चर्चे पूरे गांव में होने लगे. इन चर्चों की भनक रामदीन के कानों में पड़ी तो वह परेशान रहने लगा.

इसी परेशानी में वह एक रोज माथा पकड़े बैठा था, तभी उमा की नजर पति पर पड़ी. वह बोली, ‘‘रीतू के बापू, का भवा, जो खपडि़या पकड़े हौ? तनिक हमहूं तौ जानी तोहका काहे की चिंता है?’’

रामदीन ने अपनी पत्नी पर नजर डाली, फिर उस का दर्द छलक पड़ा, ‘‘भाग्यवान, तोहरी लाडली ने बिरादरी मां हमरा सिर झुकाय दवो. हम मुंह दिखाय काबिल नाहीं रहे. मुंह पर कालिख पोत दी वाने.’’

‘‘ऐसो का गजब ढा दओ हमरी रीतू ने, जौने मां तोहार सिर झुक गवा,’’ उमा ने पूछा.

‘‘जनिहौ, तौ सुनौ. बड़े मियां का लौंडा है न मुख्तार. वाहके साथ तोहरी लाडली नैनमटक्का करत है. सैरसपाटा करत है और हमरी इज्जत नीलाम करत है.’’

‘‘का कहत हौ रीतू के बापू. हम का तौ विश्वास नाही होत हवै. कौनो ने तोहरे कान फूंके हवै.’’

‘‘नाही भाग्यवान, धुआं होत है, तवैं आग लागत है. बात फैली है, तौ सच्चाई जरूर हवै.’’

‘‘ठीक है, रीतू के बापू. सच्चाई है तौ हम खबर जरूर लीहैं. उस लौंडियां ने अम्मा का दुलार देखा हवै. अब नफरत भी दिखिहैं.’’ उमा का चेहरा तमतमा गया.

फूट गया प्यार का भांडा

उस रोज शाम 5 बजे रीता कालेज से लौटी तो उमा फट पड़ी और रीता को खूब खरीखोटी सुनाई. रीता चुप रही. क्योंकि उसे पता था कि उस के और मुख्तार के प्यार का भांडा फूट गया है.

उमा और रामदीन ने आपस में सलाहमशविरा किया फिर रीता की पढ़ाई बंद करने का हुक्म सुना दिया. इसके बाद रामदीन रीता के ब्याह के लिए वर की तलाश में जुट गया.

रीता की शादी की जानकारी मुख्तार को हुई तो एक दिन वह लोगों की नजर बचा कर रीता से मिला, ‘‘सुना है, तुम्हारे पापा तुम्हारी शादी की बात चला रहे हैं.’’

‘‘हां, यह बात बिलकुल ठीक है,’’ रीता बोली, ‘‘पर मैं भला क्या कर सकती हूं. पापा बड़े जिद्दी हैं और अपनी जिद के आगे वह किसी की भी नहीं सुनते.’’

‘‘तो चलो, हमतुम हसनापुर गांव छोड़ कर कहीं दूर निकल चलें और वहीं रह कर अपना घर बसा लें.’’

रीता सोच में पड़ गई. मुख्तार भावुक हो उठा, ‘‘अगर तुम ने मेरा साथ नहीं दिया तो मैं कल ही हसनापुर छोड़ कर कहीं चला जाऊंगा और किसी तालपोखरे में डूब कर अपनी जान दे दूंगा.’’

‘‘ऐसा मत कहो मुख्तार,’’ रीता ने उस के होंठों पर हथेली रख दी, ‘‘मेरी मजबूरी समझो मुख्तार. हम हिंदू, तुम मुसलमान. घर वाले तुम से ब्याह रचाने को कभी राजी नहीं होंगे. मैं तुम से वादा करती हूं कि जितना प्यार मैं अभी तुम से करती हूं, उतना ही शादी के बाद भी करती रहूंगी. मिलन भी होता रहेगा.’’

‘‘तब ठीक है,’’ मुख्तार ने रीता की बात मान ली. फिर दोनों अपनेअपने घर चले गए.

शहर में फ्लैट ले कर रहने लगा इंद्रपाल

मुख्तार कार मोटर मैकेनिक था. रूरा के एक गैराज में वह काम करता था. रीता से उस का मिलन बंद हुआ तो वह मन लगा कर काम करने लगा. घर वालों के हाथ पर भी वह चार पैसे रखने लगा. रीता के घर वालों ने भी चैन की सांस ली. हालांकि फोन पर उन की बातें जबतब होती रहती थीं.

इधर रामदीन ने रीता के योग्य वर की तलाश शुरू की तो उसे एक लड़का इंद्रपाल पसंद आ गया. इंद्रपाल कानपुर (देहात) जिले के थाना अकबरपुर के गांव विसानपुर का रहने वाला था.

मातापिता के अलावा एक भाई रामपाल था, जो फौज में था. इंद्रपाल स्वयं भी सीआरपीएफ में था. दोनों भाई कुंवारे थे. उस के पिता लाखन इंद्रपाल की शादी के लिए लालायित थे.

रामदीन ने जब हट्टेकट्टे जवान इंद्रपाल को देखा तो उस ने उसे अपनी बेटी रीता के लिए पसंद कर लिया. रीता और इंद्रपाल ने भी एकदूसरे को देख कर पसंद कर लिया. दोनों की रजामंदी होने के बाद रामदीन ने 24 फरवरी, 2006 को रीता का विवाह इंद्रपाल के साथ कर दिया.

रीता इंद्रपाल की दुलहन बन कर अपनी ससुराल विसानपुर आ गई. ससुराल में रीता को जिस ने भी देखा, उसी ने उस के रूप की सराहना की. विसानपुर गांव में बरसों बाद रीता जैसी रूपसी बहू आई थी. इंद्रपाल भी खूबसूरत पत्नी पा कर खुश था और रीता भी सुंदर स्वस्थ पति पा कर खुश थी.

शादी के 2 साल बाद रीता ने एक सुंदर बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म के 4 साल बाद रीता ने दूसरे बेटे को जन्म दिया.

2 बेटों के जन्म से इंद्रपाल और रीता के जीवन में बहार आ गई. इंद्रपाल की भी किस्मत पलटी और वह सिपाही से हैडकांस्टेबल बन गया. रीता जहां खुश थी, वहीं उस के सासससुर भी 2 बेटों के जन्म से फूले नहीं समा रहे थे.

समय बीतते जब दोनों बेटे कुछ बड़े हुए तो रीता को उन की चिंता सताने लगी. दरअसल रीता दोनों बेटों को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहती थी, जो गांव में रह कर संभव नहीं थी. अत: जब इंद्रपाल गांव आया तो उस ने अपनी बात रखी और शहर में रहने की इच्छा जताई.

इंद्रपाल ने पहले तो मना कर दिया, लेकिन बाद में उसे पत्नी की जिद के आगे झुकना पड़ा. वह रीता व बच्चों को शहर में रखने को राजी हो गया.

इस के बाद इंद्रपाल ने कानपुर शहर के पनकी थाना अंतर्गत रतनपुर में एक एमआईजी फ्लैट खरीद लिया. इस का सौदा उस ने प्रौपर्टी डीलर पुष्पेंद्र कठेरिया के मार्फत किया था.

फ्लैट खरीदने के बाद इंद्रपाल अपनी पत्नी रीता व बच्चों के साथ कालोनी में रहने लगा. कुछ दिनों बाद उस ने इंग्लिश मीडियम स्कूल में दोनों बेटों का एडमिशन करा दिया.

इधर मुख्तार को जब पता चला कि रीता अपने बच्चों के साथ रतनपुर कालोनी में रहने लगी है तो वह रीता से मिलने उस के घर आने लगा. चूंकि मुख्तार रीता का पुराना प्रेमी था, सो जल्द ही दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ गईं और नाजायज रिश्ता फिर से कायम हो गया.

शादी के बाद भी प्रेमी मुख्तार की बांहों में खेलती रही रीता

मुख्तार भी अब तक गांव छोड़ कर कानपुर शहर आ गया था और पनकी क्षेत्र में गैराज चलाने लगा था. चूंकि मुख्तार कुशल कार मैकेनिक था सो उस का काम वहां भी चल पड़ा था और कमाई भी होने लगी थी.

रीता का पति इंद्रपाल केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में था. उस की तैनाती विभिन्न प्रांतों में होती रहती थी. उसे जब छुट्टी मिलती थी, तभी घर आ पाता था.

रीता 2 बच्चों की मां जरूर थी. लेकिन तन्हाई उसे सताती थी. ऐसे में पुराने आशिक मुख्तार ने आना शुरू किया तो वह उसे रोक न पाई और तन्हाई दूर करने लगी.

मुख्तार का आना और देर रात तक रुकना, अड़ोसपड़ोस के लोगों को खलने लगा. वह रीता को संदेह की नजर से देखने लगे. कुछ महीने बाद इंद्रपाल घर आया तो उन्होंने उस से चुगली कर दी.

इंद्रपाल ने रीता से सवालजवाब किया तो रीता तुनक कर बोली, ‘‘जिन के पति बाहर रह कर कमाते हैं, उन की औरतों को ऐसे ताने सुनने ही पड़ते हैं. मुख्तार उस के गांव का है. उस के भाई जैसा है. घर आ कर हमारी मदद करता है. लेकिन पड़ोसियों को जलन होती है. तुम्हारे भी कान उन्होंने भरे होंगे.’’

इंद्रपाल को भी लगा कि रीता शायद सही कह रही है. उस ने यह बात वहीं खत्म कर दी. रीता ने भी मुख्तार को फोन पर जानकारी दे दी कि इंद्रपाल घर आया है, इसलिए वह घर न आए. इंद्रपाल की मौजूदगी में वह उसे फोन भी न करे.

फ्लैट खरीदने के दौरान इंद्रपाल की दोस्ती प्रौपर्टी डीलर पुष्पेंद्र कठेरिया से हो गई थी. जब वह घर आता था, तो पुष्पेंद्र से जरूर मिलता था. दोनों में खूब बातचीत होती थी और खानेपीने का दौर चलता था.

दोनों का मिलन पुष्पेंद्र के रतनपुर वाले औफिस में होता था. इंद्रपाल उस की शानोशौकत से भी प्रभावित था.

इस बार इंद्रपाल आया तो उस ने पुष्पेंद्र को अपने घर दावत पर बुलाया. पुष्पेंद्र सजसंवर कर इंद्रपाल के घर आया, तो वहां उस की मुलाकात इंद्रपाल की पत्नी रीता से हुई.

पहली ही नजर में दोनों एकदूसरे के प्रति आकर्षित हुए. खानेपीने के दौरान भी पुष्पेंद्र की नजरें रीता पर ही टिकी रहीं. वह उस की खूबसूरती का बखान भी करता रहा. रीता मन ही मन खुश होती रही और मंदमंद मुसकराती रही. इंद्रपाल कुछ दिनों बाद ड्यूटी पर चला गया, लेकिन पुष्पेंद्र का रीता के घर आना जारी रहा. वह हृष्टपुष्ट बांका जवान था और स्वभाव से मृदु व शालीन भी. उधर 2 बच्चों की मां हो कर भी रीता के रूपलावण्य में कमी नहीं आई थी.

प्रौपर्टी डीलर पुष्पेंद्र भी बन गया बिस्तर का साथी

पुष्पेंद्र उसे उठतेबैठते देखता, तो उस के मन में खोट आ जाती. वह उस से हंसीठिठोली करने लगता. धीरेधीरे रीता को भी उस की बातें अच्छी लगने लगीं.

कहते हैं, औरत एक बार पतन की राह पकड़ ले तो वह उसी राह पर बढ़ती जाती है. रीता भी ऐसी ही औरत थी. वह एक बार फिसली तो फिर फिसलती ही चली गई. उस ने न मानमर्यादा की परवाह की और न ही घर की इज्जत की. उस ने पति के साथ भी विश्वासघात किया.

पुष्पेंद्र जानता था कि पति सुख से वंचित रीता एक प्यासी औरत है. ओस की एक बूंद भी उसे तृप्त कर सकती है. वह रीता से नजदीकियां बढ़ाने लगा. वह रीता को भाभी कहता था. इस नाते खूब हंसीमजाक करता था. रीता उस के मजाक का बुरा नहीं मानती थी, बल्कि जवाब दे कर ठहाके लगाती थी.

रीता को अब उस की बातों में रस आने लगा था. आखिर एक रात भाभीदेवर के रिश्ते की दीवार ढह ही गई. दोनों को इस खेल का पछतावा भी नहीं हुआ.

रीता ने पुष्पेंद्र से जिस्म का रिश्ता बनाया तो वह मुख्तार से दूरियां बनाने की कोशिश करने लगी. मुख्तार को शक हुआ तो उस ने रीता पर निगरानी शुरू कर दी. तब उसे पता चला कि रीता ने प्रौपर्टी डीलर पुष्पेंद्र को अपने बिस्तर का साथी बना लिया है. इसी कारण वह उस से दूरियां बना रही है.

उसे रीता पर गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन वह गुस्से को पी गया. रीता के साथ पुष्पेंद्र की निकटता मुख्तार की आंखों में चुभने लगी. एक शाम मुख्तार रीता के घर आया तो घर के बाहर पुष्पेंद्र भी खड़ा था. उसे देख कर मुख्तार बोला, ‘‘आइंदा तूने इस देहरी पर कदम रखा तो मैं तेरे पैर ही काट डालूंगा, ध्यान रखना.’’

पुष्पेंद्र ने आंखें तरेर कर मुख्तार को घूरा, ‘‘तू रीता का खसम तो है नहीं. फिर तू मुझे रोकने वाला होता कौन है?’’

‘‘कौन होता हूं, यह तो मैं तुझे अभी बता सकता हूं. इस समय चुपचाप यहां से भाग जा, नहीं तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा मेरे हाथों से.’’ मुख्तार ने आस्तीनें चढ़ा लीं.

दोनों के बीच झगड़े की आवाजें सुन कर रीता भी घर से बाहर निकल आई. वह पुष्पेंद्र से बोली, ‘‘तुम यहां से चले जाओ. इस समय मेरी बात मानो.’’

पुष्पेंद्र बड़बड़ाता हुआ चला गया. तब मुख्तार रीता का हाथ पकड़ कर उसे खींचते हुए मकान के अंदर ले गया. फिर बोला, ‘‘अब कभी वह तुम से मिलने आया तो उसे ठिकाने लगा दूंगा, तुझे भी जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’

‘‘देखो मुख्तार, गुस्सा थूक दो और मेरी बात सुनो, तुम दोनों मेरे बिस्तर के साथी हो. न मैं तुम्हें छोड़ सकती हूं और न पुष्पेंद्र को. आपस में लड़ाई करने से कोई फायदा नहीं. आज के बाद तुम दोनों कभी भी आ सकते हो. साथ बैठ कर ड्रिंक कर सकते हो और बिस्तर के साथी भी बन सकते हो.’’

ग्रुप सैक्स का मजा लेती थी रीता

मुख्तार ने रीता की बात मान तो ली, लेकिन वह नफरत से सुलग उठा. उस ने निश्चय कर लिया कि वह इस विश्वासघाती औरत को सबक जरूर सिखाएगा.

इस के बाद मुख्तार ने पुष्पेंद्र से हाथ मिला लिया. फिर वे दोनों साथसाथ खानेपीने लगे. रीता के घर पर भी उन की महफिल सजने लगी. अय्याशी के लिए शक्तिवर्द्धक दवाओं, स्प्रे आदि का भी प्रयोग होने लगा. रीता भी ग्रुप सैक्स का भरपूर मजा लेती थी.

20 फरवरी, 2022 को पुष्पेंद्र ने कई बार रीता को फोन किया, लेकिन उस ने काल रिसीव नहीं की. शाम 5 बजे उस ने पुष्पेंद्र की काल रिसीव की और उस से बात की.

बात करने के बाद पुष्पेंद्र बियर की 2 बोतलें ले कर रीता के घर पहुंच गया. वहां उस ने रीता के साथ बैठ कर बियर पी. रीता का बड़ा बेटा घर पर ही था. उस ने पुष्पेंद्र को मां के साथ हंसतेबतियाते भी देखा था. रात 8 बजे बेटे को नींद सताने लगी तो वह कमरे में जा कर सो गया.

कुछ देर बाद मुख्तार भी कार ले कर रीता के घर आ गया. कार किसी ग्राहक की थी, जो उस के गैराज में मरम्मत के लिए आई थी. कार में उस के 2 साथी राशिद व शमशाद भी थे. वह कार में ही बैठे रहे.

मुख्तार का रीता ने जोरदार स्वागत किया. पुष्पेंद्र भी गले मिला. उस के बाद मुख्तार और पुष्पेंद्र ने बैठ कर बियर पी. रीता ने भी उन का साथ दिया. बियर पीने के बाद मुख्तार ने बाहर घूमने और खाना खाने की बात कही. इस पर थोड़ी नानुकुर के बाद रीता घूमने जाने को राजी हो गई.

रीता के साथ कार में किया सामूहिक बलात्कार

कुछ देर बाद रीता सजधज कर कमरे से बाहर आई तो पुष्पेंद्र और मुख्तार की आंखें चौंधिया गईं. वह जेवर पहने थी और दुलहन की तरह सजी थी. जेवर देख कर मुख्तार के मन में लालच आ गया. फिर नफरत और लालच ने उसे जुर्म करने को मजबूर कर दिया.

रात 9 बजे मुख्तार उस के साथी राशिद, शमशाद व पुष्पेंद्र रीता को कार में बिठा कर घूमने निकले. वह भौंती होते हुए रूरा की तरफ बढ़े. इसी बीच मुख्तार और पुष्पेंद्र रीता से शारीरिक छेड़छाड़ करने लगे. रीता ने विरोध किया तो मुख्तार उसे नोचनेकाटने लगा.

रीता चीखी तो पुष्पेंद्र ने उस का मुंह दबोच लिया. इस के बाद चलती कार में बारीबारी से मुख्तार, पुष्पेंद्र, राशिद व शमशाद ने रीता के साथ गैंगरेप किया.

रेप के बाद मुख्तार, रीता के जेवर उतारने लगा तो रीता ने सब को जेल भिजवाने की धमकी दी.

इस धमकी से चारों डर गए. उस के बाद सब ने मिल कर रीता की गला दबा कर हत्या कर दी. फिर शव से आभूषण उतार कर रख लिए. उस का मोबाइल फोन तोड़ कर बंबी में फेंक दिया.

रीता की हत्या के बाद वे भाऊपुर पहुंचे. स्टेशन के पास पुलिया पर उन्होंने कार रोकी. फिर सब ने मिल कर शव को कार से उतारा और पुलिया के नीचे दफन कर दिया. ऊपर से ईंटें रख दीं.

शव को ठिकाने लगाने के बाद मुख्तार ने कार गैराज में खड़ी कर दी. इस के बाद सब अपनेअपने घर चले गए. दूसरे रोज मुख्तार ने लूटे गए आभूषण अपने परिचित सर्राफ को बेच दिए.

इधर रात 12 बजे बड़े बेटे की आंखें खुलीं तो वह कमरे से बाहर आया. उस ने मम्मी को आवाज लगाई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. वह जोर से रोने लगा.

उस के रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी आ गए. उस ने उन्हें सारी बात बताई, फिर पड़ोसी के फोन से अपने पापा इंद्रपाल को मम्मी के अचानक गायब होने की जानकारी दी.

जानकारी पा कर इंद्रपाल घर आया और रीता की गुमशुदगी थाना पनकी में दर्ज कराई. गुमशुदगी के 4 दिन बाद पुलिस ने रीता के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस के बाद यह केस खुल सका.

27 फरवरी, 2022 को पुलिस ने आरोपी मुख्तार, पुष्पेंद्र कठेरिया तथा शमशाद को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. चौथा आरोपी राशिद फरार था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

यक्ष प्रश्न- भाग 3: निमी को क्यों बचाना चाहती थी अनुभा

लड़के उस के सामीप्य के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा देते. दिन, महीनों में नहीं बदले, उस के पहले ही निमी कई लड़कों के गले का हार बन गई. उस के बदन के फूल लड़कों के बिस्तर पर महकने लगे.

बहुत जल्दी उस के मम्मीपापा को उस की हरकतों के बारे में पता चल गया. मम्मी ने समझाया, ‘‘बेटा, यह क्या है? इस तरह का जीवन तुम्हें कहां ले जा कर छोड़ेगा, कुछ सोचा है? हम ने तुम्हें कुछ ज्यादा ही छूट दे दी थी. इतनी छूट तो विदेशों में भी मांबाप अपने बच्चों को नहीं देते. चलो, अब तुम पीजी में नहीं रहोगी… जो कुछ करना है हमारी निगाहों के सामने घर पर रह कर करोगी.’’

‘‘मम्मी, मेरी कोचिंग तो पूरी हो जाने दो,’’  निमी ने प्रतिरोध किया.

‘‘जो तुम्हारे आचरण हैं, उन से क्या तुम्हें लगता है कि तुम कोचिंग की पढ़ाई कर पाओगी… कोचिंग पूरी भी कर ली, तो कंपीटिशन की तैयारी कर पाओगी? पढ़ाई करने के लिए किताबें ले कर बैठना पड़ता है, लड़कों के हाथ में हाथ डाल कर पढ़ाई नहीं होती,’’ मां ने कड़ाई से कहा.

‘‘मम्मी, प्लीज. आप पापा को एक बार समझाओ न,’’ निमी ने फिर प्रतिरोध किया.

‘‘नहीं, निमी. तुम्हारे पापा बहुत दुखी और आहत हैं. मैं उन से कुछ नहीं कह सकती. तुम अपने मन की करोगी, तो हम तुम्हें रुपयापैसा देना बंद कर देंगे. फिर तुम्हें जो अच्छा लगे करना.’’

निमी अपने घर आ तो गई, परंतु अंदर से बहुत अशांत थी. घर पर ढेर सारे प्रतिबंध थे. अब हर क्षण मां की उस पर नजर रहती.

शराब, सिगरेट और लड़कों से वह भले ही दूर हो गई थी, परंतु मोबाइल फोन के माध्यम से उस के दोस्तों से उस का संपर्क बना हुआ था.

जब फोन करना संभव न होता, फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप के माध्यम से संपर्क हो जाता. लड़के इतनी आसानी से सुंदर मछली को फिसल कर पानी में जाने देना नहीं चाहते.

लड़कों ने उसे तरहतरह से समझाया. वे सभी उस का खर्चा उठाने के लिए तैयार थे. रहनेखाने से ले कर कपड़ेलत्ते और शौक तक… सब कुछ… बस वह वापस आ जाए. प्रलोभन इतने सुंदर थे कि वह लोभ संवरण न कर सकी. मांबाप के प्यार, संरक्षण और सलाहों के बंधन टूटने लगे.

निमी ने बुद्धि के सारे द्वार बंद कर दिए. विवेक को तिलांजलि दे दी और एक दिन घर से कुछ रुपएपैसे और कपड़े ले कर फरार हो गई. दोस्तों ने उस के खाने व रहने के लिए एक फ्लैट का इंतजाम कर रखा था. काफी दिनों तक वह बाहरी दुनिया से दूर अपने घर में बंद रही.

पता नहीं उस के मांबाप ने उसे ढूंढ़ने का प्रयत्न किया था या नहीं. उस ने अपना फोन नंबर ही नहीं, फोन सैट भी बदल लिया था. मांबाप अगर पुलिस में रिपोर्ट लिखाते तो उस का पता चलना मुश्किल नहीं था. उस के पुराने फोन की काल डिटेल्स से उस के दोस्तों और फिर उस तक पुलिस पहुंच सकती थी, परंतु संभवतया उस के मांबाप ने पुलिस में उस के गुम होने की रिपोर्ट नहीं लिखाई थी.

निमी का जीवन एक दायरे में बंध कर रह गया था. खानापीना और ऐयाशी, जब तक वह नशे में रहती, उसे कुछ महसूस न होता, परंतु जबजब एकांत के साए घेरते उस के दिमाग में तमाम तरह के विचार उमड़ते, मांबाप की याद आती.

न तो समय एकजैसा रहता है, न कोई वस्तु अक्षुण्ण रहती है. निमी ने धीरेधीरे महसूस किया, उस के जो मित्र पहले रोज उस के पास आते थे, अब हफ्ते में 2-3 बार ही आते थे. पूछने पर बताते व्यस्तता बढ़ रही है. दूसरे काम आ गए हैं. मगर सत्य तो यह था उन के जीवन में एकरसता आ गई थी. अनापशनाप पैसा खर्च हो रहा था. मांबाप सवाल उठाने लगे थे. निमी की तरह बेवकूफ तो थे नहीं, उन्हें अपना कैरियर बनाना था. कुछ की कोचिंग समाप्त हो गई, तो वे अपने घर चल गए. जो दिल्ली के थे, वे कभीकभार आते थे, परंतु अब उन के लिए भी निमी का खर्चा उठाना भारी पड़ने लगा था.

निमी वरुण को अपना सर्वश्रेष्ठ हितैषी समझती थी. एक दिन उसी से पूछा, ‘‘वरुण, एक बात बताओ, मैं ने तुम लोगों की दोस्ती के लिए अपना घरपरिवार और मांबाप छोड़ दिए, अब तुम लोग मुझे 1-1 कर छोड़ कर जाने लगे हो. मैं तो कहीं की न रही… मेरा क्या होगा?’’

वरुण कुछ पल सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘निमी, मेरी बात तुम्हें कड़वी लगेगी, परंतु सचाई यही है कि तुम ने हमारी दोस्ती नहीं अपने स्वार्थ और सुख के लिए घर छोड़ा था. यहां कोई किसी के लिए कुछ नहीं करता, सब अपने लिए करते हैं. अपनी स्वार्थ सिद्धि के बाद सब अलग हो जाते हैं, जैसा अब तुम्हारे साथ हो रहा है.

यह कड़वी सचाई तुम्हें बहुत पहले समझ जानी चाहिए थी. हम सभी अभी बेरोजगार हैं, मांबाप के ऊपर निर्भर हैं, कैरियर बनाना है. ऐसे में रातदिन हम  भोगविलास में लिप्त रहेंगे, तो हमारा भविष्य चौपट हो जाएगा.’’

अपनी स्थिति पर उसे रोना आ रहा था, परंतु वह रो नहीं सकती थी. आगे आने वाले दिनों के बारे में सोच कर उस का मन बैठा जा रहा था. वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे?

‘‘मैं क्या करूं, वरुण?’’ वह लगभग रोंआसी हो गई थी, ‘‘नासमझी में मैं ने क्या कर डाला?’’

‘‘बहुत सारी लड़कियां जवानी में ऐसा कर गुजरती हैं और बाद में पछताती हैं.’’

‘‘तुम ने भी मुझे कभी नहीं समझाया, मैं तो तुम्हें सब से अच्छा दोस्त समझती थी.’’

वरुण हंसा, ‘‘कैसी बेवकूफी वाली बातें कर रही हो. तुम कभी एक लड़के के प्रति वफादार नहीं रही. तुम्हारी नशे की आदत और तुम्हारी सैक्स की भूख ने तुम्हारी अक्ल पर परदा डाल दिया था. तुम एक ही समय में कई लड़कों के साथ प्रेमव्यवहार करोगी, तो कौन तुम्हारे साथ निष्ठा से प्रेमसंबंध निभाएगा… सभी लड़के तुम्हारे तन के भूखे थे और तुम उन्हें बहुत आसान शिकार नजर आई. बिना किसी प्रतिरोध के तुम किसी के भी साथ सोने के लिए तैयार हो जाती थी. ऐसे में तुम किसी एक लड़के से सच्चे और अटूट प्रेम की कामना कैसे कर सकती हो?’’

वरुण की बातों में कड़वी सचाई थी. निमी ने कहा, ‘‘मैं ने जोश में आ कर

अपना सब कुछ गवां दिया. दोस्त भी 1-1 कर चले गए. तुम तो मेरा साथ दे सकते हो.’’

वरुण ने हैरान भरी निगाहों से उसे देखा, ‘‘तुम्हारा साथ कैसे दे सकता हूं? मैं तो स्वयं तुम से दूर जाने वाला था. 1 साल मेरा बरबाद हो गया. इस बार प्री ऐग्जाम भी क्वालिफाई नहीं कर पाया. तुम्हारे चक्कर में पढ़ाईलिखाई हो ही नहीं पाई. घर में मम्मीपापा सभी नाराज हैं. ऐयाशी और मौजमस्ती छोड़ कर मैं ईमानदारी से तैयारी करना चाहता हूं. मैं तुम से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता. वरना मेरा जीवन चौपट हो जाएगा.’’

निमी ने उस के दोनों हाथों को पकड़ कर अपने सीने पर रख लिया, ‘‘वरुण, मैं जानती हूं मैं ने गलती की है. मछली की तरह एक से दूसरे हाथ में फिसलती रही, परंतु सच मानो मैं ने तुम्हें सच्चे मन से प्यार किया है. जब कभी मन में अवसाद के बादल उमड़े मैं ने केवल तुम्हें याद किया. मुझे इस तरह छोड़ कर न जाओ.’’

‘‘निमी, तुम समझने का प्रयास करो, मैं ने अगर तुम्हारा साथ नहीं छोड़ा, तो मेरा भविष्य मेरे रास्ते से गायब हो जाएगा. मुझे कुछ बन जाने दो.’’

‘‘मैं तुम से प्यार की भीख नहीं मांगती. प्यार और सैक्स को पूरी तरह से भोग लिया है मैं ने परंतु पेट की भूख के आगे मनुष्य सदा लाचार रहता है. मेरे पास जीविका का कोई साधन नहीं है. जहां इतना सब कुछ किया, मेरे प्यार के बदले इतना सा उपकार और कर दो. रहने के लिए 1 कमरा और पेट की रोटी के लिए दो पैसे का इंतजाम कर दो. मैं वेश्यावृत्ति नहीं अपनाना चाहती,’’ निमी की आवाज दुनियाभर की बेचारगी और दीनता से भर गयी थी.

मौत का कारण: क्यों दम तोड़ रहा था वरुण का बचपन

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